बासमती की इस किस्म में नहीं लगेगा रोग, होगा अच्छा उत्पादन

दुनिया भर में बासमती चावल उत्पादन में नंबर एक भारत में पिछले कई वर्षों से बासमती चावल में रसायनों की अधिक मात्रा निर्यात में रोड़ा बन रही है, लेकिन बासमती की ये नई किस्म रोग अवरोधी होने के कारण इसमें रसायन का छिड़काव नहीं करना पड़ेगा।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने पूसा बासमती-1 से नई किस्म पूसा बासमती 1637 विकसित की है। ये किस्म रोग अवरोधी हैं, इनमें गर्दन तोड़ (ब्लास्ट) रोग नहीं लगता है, जिससे इसमें रसायन का स्प्रे नहीं करना पड़ेगा या बहुत कम मात्रा में करना पड़ेगा।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय पादप जैव प्रौद्योगिकी संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. दीपक सिंह बताते हैं, “इस किस्म को हमने पूसा बासमती-1 से विकसित किया है, जिसमें फंजाई से होने वाला रोग गर्दन तोड़ और ब्लास्ट रोग नहीं लगेगा, जिससे किसानों को फायदा होने वाला है।” वो आगे बताते हैं, “इस किस्म के बीज के लिए किसान पूसा में सम्पर्क कर सकते हैं, जहां से किसानों को सही दाम पर बीज मिल जाएगा।”

किसान व बासमती निर्यातकों को इसका फायदा होने वाला है। दोनों किस्मों के चावल यूरोप में एक्सपोर्ट होते हैं। बीमारी आने पर किसान ज्यादा स्प्रे करते थे, इस कारण जहर की मात्रा चावल में भी बढ़ जाती थी। इससे चावल यूरोप में कई बार रिजेक्ट हो जाता था, लेकिन अब नई किस्म में ऐसा नहीं होगा। इससे किसानों की आय भी बढ़ेगी।

इस किस्म को हमने पूसा बासमती-1 से विकसित किया है, जिसमें फंजाई से होने वाला रोग गर्दन तोड़ और ब्लास्ट रोग नहीं लगेगा, जिससे किसानों को फायदा होने वाला है। डॉ. दीपक सिंह, राष्ट्रीय पादप जैव प्रौद्योगिकी संस्थान ऑल इंडिया चावल एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अनुसार हर वर्ष देश में लगभग 8773.78 हजार टन बासमती चावल का उत्पादन होता है।

भारत बासमती चावल में विश्व बाज़ार का अग्रणी निर्यातक है। देश ने वर्ष 2016-2017 के दौरान विश्व को 21,604.58 करोड़ रुपए (यानि 3,230.24 अमेरिकी मिलियन डॉलर) मूल्य का 40,00,471.56 मीट्रिक टन बासमती चावल निर्यात किया था जिसमें प्रमुख रूप से सउदी अरब, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, इराक और कुवैत में बड़ी मात्रा में बासमती चावल गया था।

ऐसे में इस सला बासमती धान की खेती और पैदावार घटने से चावल के निर्यात पर असर पड़ेगा। ये भी पढ़ें- फेफड़े व स्तन कैंसर के खात्मे में मददगार छत्तीसगढ़ के ये तीन धान पूसा बासमती 1637 पूसा बासमती-1 का सुधरा हुआ रूप है। पूसा बासमती- 1 में ब्लास्ट (झोंका) रोग आने की संभावना ज्यादा रहती थी, लेकिन 1637 में यह बीमारी नहीं आएगी। इस किस्म में रोग रोधी क्षमता हैं, इसका प्रति एकड़ 22 से 25 कुंतल तक हो सकता है।

इन प्रदेशों में होती है बासमती की खेती

देश में पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली में किसान बासमती की खेती करते हैं, जिसमें पंजाब बासमती उत्पादन में अग्रणी राज्य है।

ये हैं बासमती की अन्य किस्में

भारत सरकार के बीज अधिनियम तहत वर्ष 1966 से अभी तक बासमती चावल की 29 किस्में खेती के लिए अधिसूचित की गई हैं, जिनका देश के 7 राज्यों के लगभग 81 जिलों में खेती की जाती है।बासमती चावल की प्रमुख किस्में में बासमती 217, बासमती 370, टाइप 3 (देहरादूनी बासमती) पंजाब बासमती 1 (बउनी बासमती), पूसा बासमती 1, कस्तूरी, हरियाणा बासमती 1, माही सुगंधा, तरोरी बासमती (एच.बी.सी 19/ करनाल लोकल), रणबीर बासमती, बासमती 386,

इम्प्रूव्ड पूसा बासमती 1 (पूसा 1460), पूसा बासमती 1121 (संशोधन के पश्चात्), वल्लभ बासमती 22, पूसा बासमती 6 (पूसा 1401), पंजाब बासमती 2, बासमती सी.एस.आर 30 (संशोधन के पश्चात्), मालविया बासमती धान 10-9 (आई.ई.टी 21669), वल्लभ बासमती 21 (आई.ई.टी 19493), पूसा बासमती 1509 (आई.ई.टी 21960), बासमती 564, वल्लभ बासमती 23, वल्लभ बासमती 24, पूसा बासमती 1609, पंत बासमती 1 (आई.ई.टी 21665), पंत बासमती 2(आई.ई.टी 21953), पंजाब बासमती 3, पूसा बासमती 1637 और पूसा बासमती 1728 जिनकी खेती की जाती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *