एक किसान ने महीनों की मेहनत से उगाई 400 किलो गोभी को ख़राब कर दिया

हम जिस देश में रहते हैं उसकी पूरी दुनिया में एक प्रधान देश के रूप में पहचान है. और देश में किसान को अन्नदाता भी कहा जाता है. लेकिन सबको भर पेट खाना देने वाला यही किसान जाने कितने सालों से आये दिन भूखा रह जाता है.

कभी सोचा है कि आने वाले समय में देश के इस अन्नदाता का क्या होगा? अब आप सोच रहे होंगे कि हम आपसे ये सवाल क्यों कर रहे हैं… तो इसका जवाब भी हम आपको दे देते हैं. हम ऐसा इसलिए बोल रहे हैं क्योंकि जो किसान पूरे साल मेहनत करके हमारे लिए सैंकड़ों किलो अनाज, फल, सब्ज़ियां उगाता है, उसको उसकी साल भर की मेहनत का इतना फल (पैसा) नहीं मिलता है कि वो एक हफ़्ते भी ठीक से खाना खा सके.

जी हां, ऐसा ही कुछ हुआ है महाराष्ट्र के एक किसान के साथ, जिसने दिन-रात मेहनत करके 400 किलो फूल गोभी का उत्पादन किया पर जब वो मार्केट में उसे बेचने गया तो उसे मात्र 442 रुपये देने की बात की गई. मतलब कि 1 किलो फूल गोभी 1 रुपये और 10 पैसे में.

जबकि मार्केट में जब हम लोग गोभी खरीदने जाते हैं तो 10 रुपये किलो से कम में तो कभी भी नहीं मिलती है. शायद आप भी सहमत होंगे मेरी इस बात से

जो लोग ऑनलाइन फ़्रेश सब्ज़ी खरीदते हैं, ताकि उनको उनके दरवाज़े पर ताज़ी सब्ज़ी मिले, क्या वो जानते हैं कि ये सब्ज़ी किसानों से कितने कम दामों में खरीदी जाती है और ऑनलाइन उसको अच्छी खासी कीमत में बेचा जाता है. बावजूद इसके वो ऐसा करते हैं तो ऐसे लोगों को किसान की दयनीय स्थिति से कोई मतलब नहीं होता है.

लेकिन एक कड़वा सच ये है कि अगर किसान की बात की जाए तो वो महीनों या सालभर मेहनत करके फ़सल उगाता है. इतना ही सालभर फ़सल को कीड़े, या किसी बीमारी से बचाने के लिए तरह-तरह के फ़र्टिलाइज़र्स, पेस्टिसाइड्स आदि को भी समय-समय पर डालता है.

एक बार की फसल के लिए एक किसान अपनी जमा-पूंजी सब कुछ दांव पर लगा देता है और उसके बदले उसको ना के बराबर पैसा मिलता है. अधिकतर मामलों में तो उनको इसके एवज में इतना भी नहीं मिलता, जितना कि उन्होंने उस पर खर्च किया होता है, और इसका नतीजा ये होता है वो क़र्ज़ के दलदल में फंसता चला जाता है, जहां से निकलना उसके लिए नामुमकिन ही होता है.

ऐसी ही कहानी है महाराष्ट्र के एक किसान की जो जलना जिले में रहकर खेती करता है. उसका एक बेहद ही परेशान करने वाला वीडियो ऑनलाइन पोस्ट किया गया है, जिसमें वो अपनी अपनी गोभी की पूरी फसल, जो उनने महीनों की मेहनत करके उगाई थी, को ख़ुद ही बर्बाद कर रहा है.

इस किसान ने ये कठोर कदम इसलिए लिया क्योंकि उसको 400 किलो गोभी के बदले मात्र 442 रुपये देने की बात की गई. 16 मार्च को पूरे महाराष्ट्र में फूलगोभी की कीमत निम्नानुसार है:

  • इस्लामपुर में 90 रुपये प्रति क्विंटल
  • पंढरपुर में 200 रुपये प्रति क्विंटल
  • नासिक में 285 रुपये प्रति क्विंटल
  • कोल्हापुर में 350 रुपये प्रति क्विंटल

आखिर सरकार ने कर दी वो घोषणा जिसका किसानो को बहुत वक़्त से था इंतज़ार

कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने आज कहा कि खरीफ फसलों के आने के पहले ही किसानों के लिए फसलों की लागत का डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित कर दिया जाएगा। सिंह ने फिक्की की ओर से आयोजित मक्का सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए कहा कि कुछ फसलों पर कृषि लागत का डेढ गुना मूल्य दिया जा रहा है लेकिन कुछ फसलों को यह मूल्य नहीं मिल रहा है।

खरीफ फसल के पहले ही सभी फसलों का बढा हुआ समर्थन मूल्य घोषित कर दिया जाएगा। इस संबंध में नीति आयोग से चर्चा की गई है और राज्यों के साथ भी विचार विमर्श किया जाएगा। उन्होंने कहा कि मक्का का भी मूल्य उत्पादन लागत का डेढ़ गुना नहीं है।

मक्का का न्यूनतम समर्थन मूल्य उत्पादन लागत का 37 प्रतिशत ही है। इस समय मक्का का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1,440 रुपए प्रति क्विंटल है। उन्होंने कहा कि फसलों का मूल्य न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे आता है तो व्यापक पैमाने पर सरकारी स्तर पर उसकी खरीद की जाएगी। इससे राजकोष पर बोझ बढेगा लेकिन लोगों को यह समझना चाहिए कि इस पर पहला अधिकार किसानों और मजदूरों का है।

कृषि मंत्री ने कहा कि बिहार, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और राजस्थान आदि राज्यों में व्यापक पैमाने पर मक्का की खेती की जाती है।उन्होंने विश्व की तुलना में प्रति हेक्टेयर मक्के की कम उत्पादकता पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि जहां अमेरिका में प्रति हेक्टेयर 9.6 टन प्रति हेक्टेयर से अधिक उत्पादन होता है वहीं भारत में इसका उत्पादन 2.43 टन प्रति हेक्टेयर है। भारत विश्व के 5 प्रमुख मक्का निर्यातक देशों में शामिल है।

अन्ना का अनशन शुरू ,किसानो को लेकर ये रखीं है मांगे

अन्ना हजारे आज से रामलीला मैदान पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठ गए हैं। अन्ना किसानों की सात मांगों को लेकर दोबारा आंदोलन कर रहे हैं। हालांकि पिछली बार जिस लोकपाल कानून की मांग उन्होंने की थी वो इस आंदोलन का हिस्सा भी है।

अन्ना ने भूख हड़ताल शुरू करने से पहले कहा कि, ‘मैंने सरकार को 42 बार पत्र लिखा, मगर सरकार ने नहीं सुनी। अंत में मुझे अनशन पर बैठना पड़ा।’ इसके साथ ही अन्ना ये भी कहा कि चाहे इस बार भीड़ आए ना आए वह अकेले ही रामलीला मैदान में बैठे रहेंगे और जब तक उनकी मांग नहीं मानी जाती वह यहां से नहीं हटेंगे।

LIVE:

  • 1:26 PM- लोगों को आंदोलन में आने से रोका जा रहा है। ट्रेनें रद्द की और बसों को दिल्ली के बाहर रोकी जा रही हैं। शहीदों का बलिदान व्यर्थ नहीं होने देंगे।
  • 1:24 PM- मांगें पूरी होने तक अनशन जारी रहेगा। सरकार से चर्चा के लिए तैयार हूं। आजादी मिल गई, लेकिन आजादी कहां है?
  • 1:22 PM- किसानों के हक के लिए लड़ेंगे, मरेंगे। देश के लिए मरना मेरे लिए सौभाग्य है। सरकार ने आंदोलन करने से मुझे रोका। सरकार के आश्वासन पर मुझे भरोसा नहीं है।
  • 1:20 PM- देश के वीरों ने कुर्बानी देकर अंग्रेजों को निकाला, लेकिन देश में लोकतंत्र आज भी नहीं आया। गोरे अंग्रेज़ गए और काले अंग्रेज आ गए।
  • 12:40 PM- अन्ना ये भी कहा कि चाहे इस बार भीड़ आए ना आए वह अकेले ही रामलीला मैदान में बैठे रहेंगे और जब तक उनकी मांग नहीं मानी जाती वह यहां से नहीं हटेंगे।
  • 12:30 PM- कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्त व सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज एन संतोष हेगड़े भी आंदोलन का हिस्सा बनने रामलीला मैदान पहुंचे।

रामलीला मैदान से पहले पहुंचे राजघाट

इससे पहले आज सुबह अन्ना हजारे राजघाट पहुंचे जहां उन्होंने गांधी जी की समाधि पर श्रद्धा सुमन अर्पित किए और फिर वहीं बैठ गए। इस वक्त अन्ना हजारे राजघाट पर बैठ कर प्रार्थना की। आधा घंटे से ज्यादा समय तक राजघाट में बिताने के बाद अन्ना हजारे यहां से रवाना हो गए।जानकारी के अनुसार जब अन्ना बापू की समाधि पर पहुंचे तो वह रो पड़े।

यहां से निकलकर अन्ना हजारे शहीद पार्क जाएंगे। उसके बाद वह रामलीला मैदान पहुंचे और अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल की शुरुआत कर दी।इससे पहले अन्ना हजारे ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा था कि, प्रदर्शन के लिए दिल्ली आ रहे लोगों की ट्रेनें रद्द की जा रही है। उन्होंने कहा कि क्या सरकार हिंसा को बढ़ावा देना चाहती है।

मेरे लिए पुलिस बल तैनात किया गया है जबकि मैंने कई बार पत्र लिख कर कहा था कि मुझे पुलिस प्रोटेक्शन की जरूरत नहीं हैं, आपकी पुलिस हमें नहीं बचा सकती है। सरकार को ऐसा धूर्त रवैया नहीं अपनाना चाहिए।दरअसल अन्ना लंबे समय से किसान आंदोलन को लेकर देशभर में भ्रमण कर रहे थे। वह किसानों के न्यूनतम मूल्य, फिक्स आमदनी की वकालत की बात कर रहे हैं। इसे लेकर ही केंद्र सरकार के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं।

यहाँ पर 180 किलोमीटर लंबे मार्च पर निकले 25,000 किसान, पूर्ण ऋणमांफी की है मांग

उत्तरी महाराष्ट्र के नासिक से करीब 25,000 किसान पूर्ण ऋणमाफी और अन्य समस्याएं हल करने की मांग के साथ मुंबई तक एक लंबे मार्च पर निकले हैं. ठाणे और पालघर के किसान भी मुंबई जा रहे हैं और ऐसी उम्मीद है कि वह भी बाद में इस मार्च में शामिल होंगे. ऑल इंडिया किसान सभा( एआईकेएस) किसानों के इस मार्च की अगुवाई कर रहा है.

मध्य नासिक के सीबीएस चौक पर किसानों की एक बड़ी सभा को संबोधित करते हुए किसानों के नेता ने घोषणा की कि वह अपने मुद्दों के हल की मांग के लिए मुंबई में महाराष्ट्र विधानसभा का घेराव करेंगे. नासिक से मुंबई की दूरी 180 किलोमीटर है.

किसानों ने पूर्ण ऋमाफी और बिजली बिल माफी के अलावा स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की भी मांग की है. एआईकेएस सचिव राजू देसले ने किसानों को संबोधित करने के दौरान कहा, “हम लोग राज्य सरकार से चाहते हैं कि वह सुपर हाइवे और बुलेट ट्रेन जैसी विकास परियोजनाओं के नाम पर कृषि योग्य भूमि का जबरन अधिग्रहण बंद करें.”

देसले ने कहा कि 25,000 किसान मुंबई तक मार्च करने के लिए मंगलवार से निकल चुके हैं. देसले ने दावा किया कि बीजेपी सरकार द्वारा 34,000 करोड़ रुपये की सशर्त कृषि ऋणमाफी की घोषणा के बाद से अब तक 1,753 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. उन्होंने केंद्र और राज्य सरकार पर‘ किसान- विरोधी’ नीति अपनाने का आरोप लगाया.

एआईकेएस के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक धावले, स्थानीय विधायक जे पी गवित और अन्य नेता इस मार्च का नेतृत्व कर रहे हैं. किसानों की यह यात्रा 12 मार्च को समाप्त होगी.

इस विधि से खेती की तो बढ़ सकती है आय

खेती से मुनाफा कमाना धीरे-धीरे मुश्किल होता जा रहा है। सरकार 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने की बात कर रही है। लेकिन सरकार ये मंशा बिना किसानों के प्रयास से नहीं हो सकती है। ऐसे में जब खेती-किसानी से किसानों के हाथ सिवाय निराशा के कुछ नहीं लग रहा तो खेती की ये विधि अन्नदाता के लिए लाभकारी साबित हो सकती है।

यहां हम बात कर रहे हैं एकीकृत खेती की। एकीकृत का सीधा सा मतलब है कि खेती के साथ कृषि से जुड़ी सह गतिविधियों को भी जोड़ देना। किसान अगर ऐसा कर पाते हैं तो खेती को आर्थिक रूप से सफल तो बनाया ही जा सकता है, किसानों की आय बढ़ने की संभावना भी प्रबल हो जाती है।

एकीकृत के जरिए ऐसा किया जा सकता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के कई शोध संस्थान और राज्यों के कृषि विश्वविद्यालय भी इस दिशा में काम कर रहे हैं। वे एकीकृत कृषि पर काम कर रहै हैं और अपने-अपने क्षेत्र की जरूरत के हिसाब से एकीकृत उद्योग को ढालने के तरीके तलाश रहे हैं। पिछले दिनों आईसीएआर शोध परिसर ने कुछ विश्वसनीय और व्यावहारिक परीक्षण किया। ये परीक्षण छोटे और सीमांत किसानों के लिए किया गया।

बिहार में 75 फीसदी से भी ज्यादा किसानों के पास आधा हेक्टेयर से भी कम जमीन है। सबसे खराब बात है कि छोटी जमीन के ये टुकड़े भी एक जगह नहीं होकर दूर दूर होते हैं और एक उद्यम आधारित कृषि के लिए ये जरा भी उपयुक्त नहीं हैं। बिहार में 75 फीसदी से भी ज्यादा किसानों के पास आधा हेक्टेयर से भी कम जमीन है। सबसे खराब बात है कि छोटी जमीन के ये टुकड़े भी एक जगह नहीं होकर दूर-दूर होते हैं और एक उद्यम आधारित कृषि के लिए ये जरा भी उपयुक्त नहीं हैं।

आईसीएआर, पटना सेंटर के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ संजीव कुमार कहते हैं “जिस उद्यम मिश्रण को हासिल किया है वह एक हेक्टेयर से कम भूमि वाले किसानों के लिए बिल्कुल उपयुक्त और काफी आकर्षक है। सेंटर द्वारा खोजे गए तरीके के तहत एक हेक्टेयर से कम भूमि वाले किसान मुर्गीपालन और बकरी पालन करने के साथ ही फसल (अनाज, सब्जियां, फल और चारा) उगा सकते हैं।

इस संयोजन में मशरूम उत्पादन को भी शामिल किया जा सकता है क्योंकि इसमें बहुत ज्यादा जमीन की जरूरत नहीं पड़ती है। ये सभी गतिविधियां आसानी से एक साथ जाती हैं और किसानों की पारिवारिक जरूरतों को पूरा करने में मदद करने के साथ ही बिक्री के लिए भी पर्याप्त फसल के उत्पादन में मदद कर सकती हैं।

शोध केंद्र के अनुमान के अनुसार उद्यमों के इस संयोजन से एक हेक्टेयर भूमि का मालिक भी सालाना 1.42 लाख रुपये की आमदनी कर सकता है जबकि उसे लागत पर महज 24,250 रुपये ही खर्च करने होंगे। दो हेक्टेयर जमीन वाले किसानों के लिए विशेषज्ञ दलहन, सब्जियों और फलों की खेती के साथ मछलियां और बतख पालने का सुझाव देते हैं। इस तरह की एकीकृत खेती से सालाना करीब 2 लाख रुपये की आय होने का अनुमान है।

इन दोनों ही मामलों में आधे खेत में फसल चावल व गेहूं जैसे अनाज और सब्जियां मसलन पत्ता गोभी, मटर और फूलगोभी उगाने का सुझाव दिया जाता है। खेत या तालाब की मेढ़ का इस्तेमाल केले, नींबू और अमरूद जैसे फलों के पेड़ लगाने के लिए किया जा सकता है। बेल पर लगने वाली सब्जियां मसलन खीरे, ककड़ी भी मेढ़ या खेत के चारों ओर लगाई गई बाड़ पर भी उगाई जा सकती हैं। बकरी या गाय जैसे पशुओं को रखने के लिए अलग से छप्पर डालकर ठिकाना बनाया जा सकता है।

खेती की करीब 20 फीसदी जमीन पर खोदे गए तालाब का उपयोग बतख पालने या फिर ऐसी मछलियों की प्रजाति का पालन किया जा सकता है, जो एक साथ रह सकती हों यानी वे अपना भोजन जल की अलग अलग परत से ग्रहण करती हों। उदाहरण के लिए कैटला जल की सतह से भोजन लेती है, रोहू थोड़ा नीचे रहकर भोजन लेना पसंद करती है जबकि मृगाल तल पर भोजन लेती है। बतखों की बीट मछली तालाब के लिए अच्छे खाद का काम करती है।

एकीकृत खेती के सभी उद्यमों के लिए केंचुओं की खेती की सलाह दी जाती है। दरअसल ये केंचुएं जैविक कचरे को खाद बनाने में मदद करते हैं। पौधों के लिए जरूरी माइक्रोन्यूट्रिएंट्स में समृद्घ होने के अलावा वानस्पतिक खाद में इन जीवित केंचुओं की मौजूदगी मिट्टी का भौतिक ढांचा बेहतर बनाने के साथ ही इसकी उर्वरता में भी बढ़ोतरी करती है।

एक साथ किए जा सकने वाले कृषि कार्यों की कोई कमी नहीं है। इनमें पशुपालन, बागवानी, हर्बल खेती, मशरूम उत्पादन, मधुमक्खी पालन, रेशम उत्पादन, मत्स्य पालन और कृषि-वानिकी जैसे काम शामिल हैं। किसान मिश्रित खेती से अपरिचित नहीं हैं। करीब 80 फीसदी किसान नियमित तौर पर खेती के साथ मवेशी भी रखते हैं जिनमें गाय एवं भैंसों की बहुतायत होती है।

मवेशी पालने से किसानों का कृषि से संबंधित जोखिम तो कम होता ही है, उसके अलावा उनकी आय और पोषण स्तर में भी बढ़ोतरी होती है। कई किसान बकरियां, भेड़ें या मुर्गियां भी रखते हैं। लेकिन अधिकांश खेतों में जिस तरह की मिश्रित खेती की जाती है वह एकीकृत खेती की श्रेणी में आने के लायक नहीं है। दरअसल मिश्रित खेती में विभिन्न सहयोगी गतिविधियों को इस तरह से समाहित किया जाता है कि वे संबंधित क्षेत्रों के लिए लाभदायक साबित हो सकें।

 

अब इस राज्य किसानों को मिलेगा बिना किसी गारंटी के तीन लाख तक कृषि ऋण

बिहार के किसानों को अब बिना किसी गारंटी के तीन लाख रुपए तक कृषि ऋण मिल सकता है। अभी इसकी अधिकतम सीमा एक लाख रुपए है। राज्य मे 1.61 करोड़ किसान हैं, जिनमें 60 लाख के पास ही केसीसी है। केसीसी को बढाने के लिए प्रखंडों में शिविर लगाए जाएंगे। कृषि मंत्री डॉ. प्रेम कुमार से बैंक प्रतिनिधियों के साथ बैठक के बाद जानकारी दी। 23 जनवरी को हुई इस बैठक में फैसला लिया गया।

उन्होंने कहा कि प्रखंड स्तर पर तिथि तय कर कैंप लगा कर किसान क्रेडिट कार्ड बनाए जाएंगे। कैं में सभी संबंधित पदाधिकारी मौजूद रहेंगे। किसान चैपाल में बैंक खाते की जानकारी ली जाए, ताकि किसानों को योजनाओं का लाभ डीबीटी के माध्यम से आसानी से मिल सके।

किसानों के ज्वाइंट लाइबिलिटी ग्रुप (जेएलजी) के माध्यम से पिछले वर्षों में बैंकों द्वापरा ऋण देने में कमी आई है। जेएलजी के माध्यम से अधिकतर बटाईदारों, भूमिहीन किसानों को ऋण की सुविधा मिलती है। पर जब से खाता-खेसरा की मांग होने लगी है, बटाईदार व भूमिहीन किसानों को ऋण मिलने में परेशानी हो रही है।

कृषि मंत्री ने बैंक प्रतिनिधियों से कहा कि राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत 200 प्रोजेक्ट में मात्र 15 प्रोजेक्ट स्वीकृत होना दुखद है। उन्होंने कहा कि सरकार किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य के तहत लेकर काम कर रही है। 21 जिलों में बाढ़ से हुए फसल नुकसान के लिए 894 करोड़ रुपये में से 80 प्रतिशत राशि किसानों के खाते में चली गई है।

 

सिर्फ C2 फार्मूला से मिल सकता है किसानो को लाभ

वित्त मंत्री अरुण जेटली के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) बढ़ाने के फॉर्मूले को एक्‍सपर्ट्स ने सि‍रे से खारि‍ज कर दि‍या। उनका कहना है कि‍ इसमें कुछ भी नया नहीं है। अभी जो MSP तय होती है वह भी तकरीबन इसी फॉर्मूले पर है। जब लागत की कैलकुलेशन ही सही नहीं होगी तो उस पर लाभ कैसे मि‍लेगा। स्‍थि‍ति‍ जस की तस है, जेटली का यह फॉर्मूला लाभकारी नहीं है।

दरअसल, विपक्ष और कृषि विशेषज्ञ सरकार से उत्पादन की कॉस्ट का फॉर्मूला बताने की मांग कर रहे थे। जेटली ने राज्यसभा में कहा कि सरकार एमएसपी तय करते समय ए2+एफएल (वास्तविक लागत और किसान परिवार के श्रम की लागत) का फॉर्मूला अपनाएगी।

उन्‍होंने बताया कि‍ किसानों को बीज, फर्टिलाइजर कॉस्ट, फैमिली लेबर की इनपुट वैल्यू जैसे फैक्टर्स को कैलकुलेट करके 50 फीसदी रिटर्न उपलब्ध कराएगी। इस आधार पर ही एमएसपी तय किया जाएगा, लेकि‍न कृषि‍ वि‍शेषज्ञों ने इसका वि‍रोध कि‍या है।

फॉर्मूले पर नहीं रि‍जल्‍ट पर बात करें

इंटरनेशनल एग्री बि‍जनेस एक्‍सपर्ट वि‍जय सरदाना कहते हैं कि हमें फॉर्मूले की बात नहीं कि‍सानों के वेलफेयर की बात करनी चाहि‍ए। मुद्दा ये है कि सरकार जो भी तरीका अपना रही है क्‍या उससे कि‍सानों को फायदा हो रहा है। अगर उससे कि‍सानों को फायदा ही नहीं हो रहा तो ये एक तरह की पॉलिटि‍क धोखाधड़ी है। फॉर्मूला तो कुछ भी हो सकता है। हमें उसका रि‍जल्‍ट देखना होगा।मकसद है कि‍सानों को गरीबी से बाहर नि‍कालना और मुझे इस बात पर संदेह है कि‍ इस फॉर्मूले से यह मकसद हासि‍ल हो पाएगा।

मान लें पंजाब का कि‍सान ईंधन, फर्टीलाइजर्स वगैरा पर खूब खर्च करता है और उसकी कॉस्‍ट 30 हजार रुपए आ गई तो क्‍या सरकार उसे 45 हजार रुपए देगी। वहीं ऑर्गेनि‍क खेती करने वाला कि‍सान फर्टीलाइजर्स वगैरा नहीं खरीदता। अगर सरकार के गणि‍त पर चलें तो उस कि‍सान की कॉस्‍ट तो बहुत कम रह जाएगी। फॉर्मूले केवल उलझाने के लि‍ए होते हैं।

प्रॉफिट बढ़ाने की बजाए लागत घटा दी

जय कि‍सान आंदोलन के राष्‍ट्रीय संयोजक अवि‍क साहा के मुताबि‍क, वि‍त्‍त मंत्री अरुण जेटली की इस घोषणा में कुछ भी नया नहीं है। अभी भी सभी प्रमुख फसलों का न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य देखें तो यह इसी फॉर्मूले के आसपास है जो जेटली अब बता रहे हैं, जब वह पहले लाभकारी नहीं था तो अब कैसे हो गया? लागत कैलकुलेट करने का तरीका ही सही नहीं है।

वहीं भारतीय किसान यूनियन के राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता धर्मेंद्र मलि‍क ने कहा कि‍ हमें पहले से ही इस बात पर संदेह था, आखि‍र सरकार ने वही कि‍या। जेटली ने अपने बजट भाषण में कहा था कि‍ सरकार ने रबी की फसलों की जो एमएसपी तय की है वह लागत का डेढ़ गुना है।

इस बार गेहूं की एमएसपी 1735 रुपए तय की गई है। वर्ष 2016-17 में यह 1625 रुपए थी। यानी केवल 6.8 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। क्‍या यही है लागत का डेढ़ गुना। उन्‍होंने कहा कि‍ कि‍सान नासमझ नहीं है। इस घोषणा को कोई अर्थ नहीं है। लागत कैलकुलेट करने का सरकार का तरीका ही पूरी तरह से अवैज्ञानि‍क है।

कृषि‍ विशेषज्ञ देविंदर शर्मा भी इस पर सवाल उठा चुके हैं। उन्‍होंने अपनी फेसबुक पोस्‍ट पर लि‍खा है कि‍ सरकार का यह दावा कि‍ वह कि‍सानों को लागत का डेढ़ गुना एमएसपी दे रही है, मुझे पि‍छले साल की एक फि‍ल्‍म की याद दि‍लाता है। जि‍सका शीर्षक है, ‘डोंट रेज़ द ब्रि‍ज, लोवर द रि‍वर’ यानी पुल की ऊंचाई बढ़ाने की बजाए नदी को और गहरा कर दि‍या जाए। फसलों की कीमत बढ़ाने की बजाए कि‍सानी की लागत की कैलकुलेशन को ही कम कर दि‍या जाए। 50 % लाभ का आभास कराया जाए, बाकी काम शोर मचाने वाले कर देंगे।

सरकार को क्‍या करना चाहिए था

जय कि‍सान आंदोलन के राष्‍ट्रीय संयोजक अवि‍क साहा का कहना है कि सरकार को अगर वाकई अपने बजट वादे को पूरा करना है तो A2+FL पर नहीं बल्‍कि C2 पर 50 फीसदी जोड़कर एमएसपी तय करनी चाहि‍ए। भले ही सरकार 50 फीसदी नहीं करती 40 ही करती मगर कॉस्‍ट सी2 रखती। धर्मेंद्र भी इससे हामी भरते हैं। वह कहते हैं कि‍ अगर सरकार सी2 के ऊपर कुछ प्रति‍शत बढ़ा कर एमएसपी तय करती है यह कि‍सानों के लि‍ए फायदेमंद होता।

अभी इस तरह से तय होती है लागत

अभी सरकार कमीशन फॉर एग्रीकल्‍चर कॉस्ट एंड प्राइज (CACP) की सिफारिशों के आधार पर एमएसपी तय करती है। वहीं सीएसीपी सरकार को सि‍फारि‍शें भेजने से पहले सभी राज्‍यो से सि‍फारि‍शें लेती है।

प्रोडक्‍शन की कॉस्‍ट नि‍कालने के तीन फॉर्मूले हैं – A2, A2+FL और C2.

A2 – कि‍सान की ओर से की गई सभी तरह की पेमेंट चाहे वो कैश में हो या कि‍सी वस्‍तु की शक्‍ल में, फर्टीलाइजर्स, कैमिकल, मजदूरों की मजदूरी, ईंधन, सिंचाई का खर्च सहि‍त अन्‍य खर्च जोड़े जाते हैं।

A2+FL – इसमें A2 के अलावा परि‍वार के सदस्‍यों द्वारा खेतीबाड़ी में की गई मेहतन का मेहनताना जोड़ा जाता है, जि‍से अनपेड फैमिली लेबर कहा जाता है।

C2 – लागत को कैलकुलेट करने का यह फार्मूला सबसे ज्‍यादा समग्र है। इसमें इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर कॉस्‍ट को भी जोड़ा जाता है। इसमें जमीन का कि‍राया व जमीन तथा खेतीबाड़ी के काम में लगी स्‍थाई पूंजी पर ब्‍याज को भी शामि‍ल कि‍या जाता है। यह कॉस्‍ट A2+FL के ऊपर जोड़ी जाती है।

यूरिया की खपत घटाने के लिए सरकार ने निकाला यह अनोखा जुगाड़

किसान यूरिया का कम उपयोग करें इसके लिए सरकार ने नई तरकीब निकाली है। अब यूरिया 50 किलो के बदले 45 किलो के बैग में मिलेगा। उर्वरक मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने यह जानकारी दी है। अधिकारी ने कहा कि यूरिया के 45 किग्रा के बैग की बिक्री 245 रुपए (टैक्स अलग से) में की जाएगी। ये अभी की 50 किग्रा के यूरिया की कीमत 268 रुपए (टैक्स अलग से) से कम होगी।

कंपनियां तैयार

अधिकारी ने बताया कि योजना तैयार की जा रही है। कंपनियां इस परिवर्तन के लिए तैयार हैं। वे 45 किग्रा बैग होने की छपाई करेंगे। इसे अगले वर्ष से लागू किया जायेगा।उन्होंने कहा कि असल उद्देश्य यूरिया की खपत को कम करना तथा उर्वरकों के संतुलित इस्तेमाल को प्रोत्साहित करना है। चूंकि यूरिया अन्य उर्वरकों से सस्ता है, इसलिए व्यापक तौर पर इसका इस्तेमाल करते हैं। सरकार की ओर से इसको काफी सब्सिडी प्राप्त होती है तथा इसकी अधिकतम खुदरा कीमत अब 5,360 रुपए प्रति टन की है।

खपत कम करेंगे

अधिकारी ने ब्योरा दिया, यूरिया की खपत को घटाने के लिए हमने विभिन्न उपायों के बारे में सोचा। नीम लोपित यूरिया उनमें से एक था। जो हमने लागू किया है। अब हम 45 किग्रा के बैग के बारे में सोच रहे हैं। सामान्य तौर पर किसान प्रत्येक हेक्टेयर भूमि के लिए बैगों की संख्या के हिसाब से यूरिया का इस्तेमाल करते हैं। जब हमने किसानों को 50 किग्रा के बैग की संख्या को कम करने के लिए कहा, उन्होंने नहीं सुना। इसलिए हमने खपत को कम करने के लिए 45 किग्रा के बैग का इस्तेमाल करने का फैसला किया है।

40 हजार करोड़ है सबसिडी

अधिकारी ने कहा कि किसान 45 किग्रा का बैग खरीदेंगे और जितने बैग का वह पहले इस्तेमाल करते थे उतने का ही इस्तेमाल करेंगे। यह अप्रत्यक्ष रूप से खपत में 10 प्रतिशत की कमी करेगा। यूरिया की वार्षिक सब्सिडी करीब 40,000 करोड़ रुपए है। भारत में पिछले वर्ष से करीब 2.4 करोड़ टन यूरिया का उत्पादन हो रहा है जो 2.2 करोड़ टन की मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त है।

विदेशों में ऐसे होती है अफीम की खेती ,कंबाइन से कटवाते है फसल

अफीम की खेती करना भारत में गैर क़ानूनी है ।लेकिन मध्य प्रदेश ,राजस्थान और भारत के और कुश राज्यों में इसकी खेती के लिए सरकारी लाइसेंस मिलते है । इस अफीम को दवाई बनाने वाली कंपनी द्वारा इस्तेमाल क्या जाता है । दुनिआ में सबसे ज्यादा अफीम अफगानिस्तान में पैदा की जाती है  । यहाँ पर दुन्या की 90 % अफीम पैदा की जाती है ।अफीम की तासीर बहुत गर्म होती है | इसका अधिक सेवन करने से व्यक्ति का रंग सावंला हो जाता है |

लेकिन अफीम की खेती को चाहे भारत में हो या फिर अफगानिस्तान में अभी भी हजारों साल पुराने तरिके से इसकी खेती की जाती है ।जैसा की हम जानते है की अफीम हमे पोस्त के पौधे से प्राप्त होता है | पोस्त फूल देने वाला एक पौधा होता है | इसमें पहले फूल बनता है और फिर डोडा |भारत के किसान डोडा को चीरा लगा कर अफीम प्राप्त करते है |

लेकिन बहुत से देश ऐसे है जहाँ इसकी खेती बिलकुल नए तरिके से की जाती है ।नीदरलैंड में इसकी खेती बाकी फसलों की तरह ही की जाती है ।जैसे आम फसल बोई जाती है वैसे ही अफीम की फसल बोई जाती है और फिर पोस्त के डोडे को कंबाइन के साथ काट लिए जाता है ।

विदेशो में अफीम की खेती कैसे होती है इसके लिए ये निचे दी हुई वीडियो देखें

मोदी सरकार किसानो को देगी एक और झटका , इतने महंगे हो जाएंगे ट्रैक्‍टर

मोदी सरकार ने ट्रैक्‍टर को नॉन ट्रांसपोर्ट व्‍हीकल की कैटेगिरी से बाहर करने का निर्णय लिया है। मिनिस्‍ट्री ऑफ रोड एंड ट्रांसपोर्ट ने इस संबंध में ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी कर दिया है। एक्‍सपर्ट्स का कहना है कि इससे जहां ट्रेक्‍टर की कीमत बढ़ जाएगी, वहीं ट्रैक्‍टर मालिकों पर टैक्‍स का बोझ भी बढ़ जाएगा।

मिनिस्‍ट्री ऑफ रोड एंड ट्रांसपोर्ट ने एक ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया है। इसमें कहा गया है कि सेंट्रल मोटर व्‍हीकल रूल्‍स 1989 में संशोधन किया जा रहा है और नया रूल सेंट्रल मोटर व्‍हीकल (अमेंडमेंट) रूल्‍स 2017 के नाम से जाना जाएगा।

रूल्‍स्‍ा 1989 के मुताबिक एग्रीकल्‍चर ट्रैक्‍टर को एक नॉन ट्रांसपोर्ट व्‍हीकल माना जाता है। लेकिन नए रूल्‍स में संशोधन करते हुए कहा गया है कि इस लाइन को हटा दिया जाए। यानी कि एग्रीकल्‍चर ट्रैक्‍टर को नॉन ट्रांसपोर्ट व्‍हीकल की कैटेगिरी से हटा दिया जाए। मिनिस्‍ट्री ने इस अमेंडमेंट को लेकर लोगों से सुझाव और आपत्तियां मांगी हैं, जो 27 अक्‍टूबर से पहले मिनिस्‍ट्री को भेजनी होगी।

इतने महंगे हो जाएंगे ट्रैक्‍टर

सिंह ने बताया कि अब तक ट्रैक्‍टर को फार्मिंग इक्विपमेंट माना जाता है और खरीदते वक्‍त ट्रैक्‍टर पर 12 फीसदी जीएसटी लगता है, लेकिन अब इन्‍हें टेम्‍पो, ट्रक की कैटेगिरी में डाला जाता है तो उस पर 28 फीसदी जीएसटी लगेगा। इससे ट्रैक्‍टर 16 फीसदी महंगे हो सकते हैं।

जिस से एक लाख के पीछे 16 हज़ार रुपये और देने पड़ेंगे । सिंह के मुताबिक, अब तक ट्रैक्‍टर पर रोड टैक्‍स में भी छूट है, लेकिन ट्रांसपोर्ट व्‍हीकल की कैटेगिरी में आने के बाद ट्रैक्‍टर मालिकों से भी रोड टैक्‍स वसूला जाएगा। इससे उन पर टैक्‍स का बोझ बढ़ जाएगा।

सरकार टेक्स बढ़ने की बड़ी वजह हर राज्‍य में ट्रैक्‍टर का कॉमर्शियल इस्‍तेमाल हो रहा है। कंस्‍ट्रक्‍शन सेक्‍टर में सामान की ढुलाई में ट्रैक्‍टर ट्रॉली का लगातार इस्‍तेमाल होता रहा है।