इस विधि से खेती की तो बढ़ सकती है आय

खेती से मुनाफा कमाना धीरे-धीरे मुश्किल होता जा रहा है। सरकार 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने की बात कर रही है। लेकिन सरकार ये मंशा बिना किसानों के प्रयास से नहीं हो सकती है। ऐसे में जब खेती-किसानी से किसानों के हाथ सिवाय निराशा के कुछ नहीं लग रहा तो खेती की ये विधि अन्नदाता के लिए लाभकारी साबित हो सकती है।

यहां हम बात कर रहे हैं एकीकृत खेती की। एकीकृत का सीधा सा मतलब है कि खेती के साथ कृषि से जुड़ी सह गतिविधियों को भी जोड़ देना। किसान अगर ऐसा कर पाते हैं तो खेती को आर्थिक रूप से सफल तो बनाया ही जा सकता है, किसानों की आय बढ़ने की संभावना भी प्रबल हो जाती है।

एकीकृत के जरिए ऐसा किया जा सकता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के कई शोध संस्थान और राज्यों के कृषि विश्वविद्यालय भी इस दिशा में काम कर रहे हैं। वे एकीकृत कृषि पर काम कर रहै हैं और अपने-अपने क्षेत्र की जरूरत के हिसाब से एकीकृत उद्योग को ढालने के तरीके तलाश रहे हैं। पिछले दिनों आईसीएआर शोध परिसर ने कुछ विश्वसनीय और व्यावहारिक परीक्षण किया। ये परीक्षण छोटे और सीमांत किसानों के लिए किया गया।

बिहार में 75 फीसदी से भी ज्यादा किसानों के पास आधा हेक्टेयर से भी कम जमीन है। सबसे खराब बात है कि छोटी जमीन के ये टुकड़े भी एक जगह नहीं होकर दूर दूर होते हैं और एक उद्यम आधारित कृषि के लिए ये जरा भी उपयुक्त नहीं हैं। बिहार में 75 फीसदी से भी ज्यादा किसानों के पास आधा हेक्टेयर से भी कम जमीन है। सबसे खराब बात है कि छोटी जमीन के ये टुकड़े भी एक जगह नहीं होकर दूर-दूर होते हैं और एक उद्यम आधारित कृषि के लिए ये जरा भी उपयुक्त नहीं हैं।

आईसीएआर, पटना सेंटर के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ संजीव कुमार कहते हैं “जिस उद्यम मिश्रण को हासिल किया है वह एक हेक्टेयर से कम भूमि वाले किसानों के लिए बिल्कुल उपयुक्त और काफी आकर्षक है। सेंटर द्वारा खोजे गए तरीके के तहत एक हेक्टेयर से कम भूमि वाले किसान मुर्गीपालन और बकरी पालन करने के साथ ही फसल (अनाज, सब्जियां, फल और चारा) उगा सकते हैं।

इस संयोजन में मशरूम उत्पादन को भी शामिल किया जा सकता है क्योंकि इसमें बहुत ज्यादा जमीन की जरूरत नहीं पड़ती है। ये सभी गतिविधियां आसानी से एक साथ जाती हैं और किसानों की पारिवारिक जरूरतों को पूरा करने में मदद करने के साथ ही बिक्री के लिए भी पर्याप्त फसल के उत्पादन में मदद कर सकती हैं।

शोध केंद्र के अनुमान के अनुसार उद्यमों के इस संयोजन से एक हेक्टेयर भूमि का मालिक भी सालाना 1.42 लाख रुपये की आमदनी कर सकता है जबकि उसे लागत पर महज 24,250 रुपये ही खर्च करने होंगे। दो हेक्टेयर जमीन वाले किसानों के लिए विशेषज्ञ दलहन, सब्जियों और फलों की खेती के साथ मछलियां और बतख पालने का सुझाव देते हैं। इस तरह की एकीकृत खेती से सालाना करीब 2 लाख रुपये की आय होने का अनुमान है।

इन दोनों ही मामलों में आधे खेत में फसल चावल व गेहूं जैसे अनाज और सब्जियां मसलन पत्ता गोभी, मटर और फूलगोभी उगाने का सुझाव दिया जाता है। खेत या तालाब की मेढ़ का इस्तेमाल केले, नींबू और अमरूद जैसे फलों के पेड़ लगाने के लिए किया जा सकता है। बेल पर लगने वाली सब्जियां मसलन खीरे, ककड़ी भी मेढ़ या खेत के चारों ओर लगाई गई बाड़ पर भी उगाई जा सकती हैं। बकरी या गाय जैसे पशुओं को रखने के लिए अलग से छप्पर डालकर ठिकाना बनाया जा सकता है।

खेती की करीब 20 फीसदी जमीन पर खोदे गए तालाब का उपयोग बतख पालने या फिर ऐसी मछलियों की प्रजाति का पालन किया जा सकता है, जो एक साथ रह सकती हों यानी वे अपना भोजन जल की अलग अलग परत से ग्रहण करती हों। उदाहरण के लिए कैटला जल की सतह से भोजन लेती है, रोहू थोड़ा नीचे रहकर भोजन लेना पसंद करती है जबकि मृगाल तल पर भोजन लेती है। बतखों की बीट मछली तालाब के लिए अच्छे खाद का काम करती है।

एकीकृत खेती के सभी उद्यमों के लिए केंचुओं की खेती की सलाह दी जाती है। दरअसल ये केंचुएं जैविक कचरे को खाद बनाने में मदद करते हैं। पौधों के लिए जरूरी माइक्रोन्यूट्रिएंट्स में समृद्घ होने के अलावा वानस्पतिक खाद में इन जीवित केंचुओं की मौजूदगी मिट्टी का भौतिक ढांचा बेहतर बनाने के साथ ही इसकी उर्वरता में भी बढ़ोतरी करती है।

एक साथ किए जा सकने वाले कृषि कार्यों की कोई कमी नहीं है। इनमें पशुपालन, बागवानी, हर्बल खेती, मशरूम उत्पादन, मधुमक्खी पालन, रेशम उत्पादन, मत्स्य पालन और कृषि-वानिकी जैसे काम शामिल हैं। किसान मिश्रित खेती से अपरिचित नहीं हैं। करीब 80 फीसदी किसान नियमित तौर पर खेती के साथ मवेशी भी रखते हैं जिनमें गाय एवं भैंसों की बहुतायत होती है।

मवेशी पालने से किसानों का कृषि से संबंधित जोखिम तो कम होता ही है, उसके अलावा उनकी आय और पोषण स्तर में भी बढ़ोतरी होती है। कई किसान बकरियां, भेड़ें या मुर्गियां भी रखते हैं। लेकिन अधिकांश खेतों में जिस तरह की मिश्रित खेती की जाती है वह एकीकृत खेती की श्रेणी में आने के लायक नहीं है। दरअसल मिश्रित खेती में विभिन्न सहयोगी गतिविधियों को इस तरह से समाहित किया जाता है कि वे संबंधित क्षेत्रों के लिए लाभदायक साबित हो सकें।

 

अब इस राज्य किसानों को मिलेगा बिना किसी गारंटी के तीन लाख तक कृषि ऋण

बिहार के किसानों को अब बिना किसी गारंटी के तीन लाख रुपए तक कृषि ऋण मिल सकता है। अभी इसकी अधिकतम सीमा एक लाख रुपए है। राज्य मे 1.61 करोड़ किसान हैं, जिनमें 60 लाख के पास ही केसीसी है। केसीसी को बढाने के लिए प्रखंडों में शिविर लगाए जाएंगे। कृषि मंत्री डॉ. प्रेम कुमार से बैंक प्रतिनिधियों के साथ बैठक के बाद जानकारी दी। 23 जनवरी को हुई इस बैठक में फैसला लिया गया।

उन्होंने कहा कि प्रखंड स्तर पर तिथि तय कर कैंप लगा कर किसान क्रेडिट कार्ड बनाए जाएंगे। कैं में सभी संबंधित पदाधिकारी मौजूद रहेंगे। किसान चैपाल में बैंक खाते की जानकारी ली जाए, ताकि किसानों को योजनाओं का लाभ डीबीटी के माध्यम से आसानी से मिल सके।

किसानों के ज्वाइंट लाइबिलिटी ग्रुप (जेएलजी) के माध्यम से पिछले वर्षों में बैंकों द्वापरा ऋण देने में कमी आई है। जेएलजी के माध्यम से अधिकतर बटाईदारों, भूमिहीन किसानों को ऋण की सुविधा मिलती है। पर जब से खाता-खेसरा की मांग होने लगी है, बटाईदार व भूमिहीन किसानों को ऋण मिलने में परेशानी हो रही है।

कृषि मंत्री ने बैंक प्रतिनिधियों से कहा कि राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत 200 प्रोजेक्ट में मात्र 15 प्रोजेक्ट स्वीकृत होना दुखद है। उन्होंने कहा कि सरकार किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य के तहत लेकर काम कर रही है। 21 जिलों में बाढ़ से हुए फसल नुकसान के लिए 894 करोड़ रुपये में से 80 प्रतिशत राशि किसानों के खाते में चली गई है।

 

सिर्फ C2 फार्मूला से मिल सकता है किसानो को लाभ

वित्त मंत्री अरुण जेटली के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) बढ़ाने के फॉर्मूले को एक्‍सपर्ट्स ने सि‍रे से खारि‍ज कर दि‍या। उनका कहना है कि‍ इसमें कुछ भी नया नहीं है। अभी जो MSP तय होती है वह भी तकरीबन इसी फॉर्मूले पर है। जब लागत की कैलकुलेशन ही सही नहीं होगी तो उस पर लाभ कैसे मि‍लेगा। स्‍थि‍ति‍ जस की तस है, जेटली का यह फॉर्मूला लाभकारी नहीं है।

दरअसल, विपक्ष और कृषि विशेषज्ञ सरकार से उत्पादन की कॉस्ट का फॉर्मूला बताने की मांग कर रहे थे। जेटली ने राज्यसभा में कहा कि सरकार एमएसपी तय करते समय ए2+एफएल (वास्तविक लागत और किसान परिवार के श्रम की लागत) का फॉर्मूला अपनाएगी।

उन्‍होंने बताया कि‍ किसानों को बीज, फर्टिलाइजर कॉस्ट, फैमिली लेबर की इनपुट वैल्यू जैसे फैक्टर्स को कैलकुलेट करके 50 फीसदी रिटर्न उपलब्ध कराएगी। इस आधार पर ही एमएसपी तय किया जाएगा, लेकि‍न कृषि‍ वि‍शेषज्ञों ने इसका वि‍रोध कि‍या है।

फॉर्मूले पर नहीं रि‍जल्‍ट पर बात करें

इंटरनेशनल एग्री बि‍जनेस एक्‍सपर्ट वि‍जय सरदाना कहते हैं कि हमें फॉर्मूले की बात नहीं कि‍सानों के वेलफेयर की बात करनी चाहि‍ए। मुद्दा ये है कि सरकार जो भी तरीका अपना रही है क्‍या उससे कि‍सानों को फायदा हो रहा है। अगर उससे कि‍सानों को फायदा ही नहीं हो रहा तो ये एक तरह की पॉलिटि‍क धोखाधड़ी है। फॉर्मूला तो कुछ भी हो सकता है। हमें उसका रि‍जल्‍ट देखना होगा।मकसद है कि‍सानों को गरीबी से बाहर नि‍कालना और मुझे इस बात पर संदेह है कि‍ इस फॉर्मूले से यह मकसद हासि‍ल हो पाएगा।

मान लें पंजाब का कि‍सान ईंधन, फर्टीलाइजर्स वगैरा पर खूब खर्च करता है और उसकी कॉस्‍ट 30 हजार रुपए आ गई तो क्‍या सरकार उसे 45 हजार रुपए देगी। वहीं ऑर्गेनि‍क खेती करने वाला कि‍सान फर्टीलाइजर्स वगैरा नहीं खरीदता। अगर सरकार के गणि‍त पर चलें तो उस कि‍सान की कॉस्‍ट तो बहुत कम रह जाएगी। फॉर्मूले केवल उलझाने के लि‍ए होते हैं।

प्रॉफिट बढ़ाने की बजाए लागत घटा दी

जय कि‍सान आंदोलन के राष्‍ट्रीय संयोजक अवि‍क साहा के मुताबि‍क, वि‍त्‍त मंत्री अरुण जेटली की इस घोषणा में कुछ भी नया नहीं है। अभी भी सभी प्रमुख फसलों का न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य देखें तो यह इसी फॉर्मूले के आसपास है जो जेटली अब बता रहे हैं, जब वह पहले लाभकारी नहीं था तो अब कैसे हो गया? लागत कैलकुलेट करने का तरीका ही सही नहीं है।

वहीं भारतीय किसान यूनियन के राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता धर्मेंद्र मलि‍क ने कहा कि‍ हमें पहले से ही इस बात पर संदेह था, आखि‍र सरकार ने वही कि‍या। जेटली ने अपने बजट भाषण में कहा था कि‍ सरकार ने रबी की फसलों की जो एमएसपी तय की है वह लागत का डेढ़ गुना है।

इस बार गेहूं की एमएसपी 1735 रुपए तय की गई है। वर्ष 2016-17 में यह 1625 रुपए थी। यानी केवल 6.8 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। क्‍या यही है लागत का डेढ़ गुना। उन्‍होंने कहा कि‍ कि‍सान नासमझ नहीं है। इस घोषणा को कोई अर्थ नहीं है। लागत कैलकुलेट करने का सरकार का तरीका ही पूरी तरह से अवैज्ञानि‍क है।

कृषि‍ विशेषज्ञ देविंदर शर्मा भी इस पर सवाल उठा चुके हैं। उन्‍होंने अपनी फेसबुक पोस्‍ट पर लि‍खा है कि‍ सरकार का यह दावा कि‍ वह कि‍सानों को लागत का डेढ़ गुना एमएसपी दे रही है, मुझे पि‍छले साल की एक फि‍ल्‍म की याद दि‍लाता है। जि‍सका शीर्षक है, ‘डोंट रेज़ द ब्रि‍ज, लोवर द रि‍वर’ यानी पुल की ऊंचाई बढ़ाने की बजाए नदी को और गहरा कर दि‍या जाए। फसलों की कीमत बढ़ाने की बजाए कि‍सानी की लागत की कैलकुलेशन को ही कम कर दि‍या जाए। 50 % लाभ का आभास कराया जाए, बाकी काम शोर मचाने वाले कर देंगे।

सरकार को क्‍या करना चाहिए था

जय कि‍सान आंदोलन के राष्‍ट्रीय संयोजक अवि‍क साहा का कहना है कि सरकार को अगर वाकई अपने बजट वादे को पूरा करना है तो A2+FL पर नहीं बल्‍कि C2 पर 50 फीसदी जोड़कर एमएसपी तय करनी चाहि‍ए। भले ही सरकार 50 फीसदी नहीं करती 40 ही करती मगर कॉस्‍ट सी2 रखती। धर्मेंद्र भी इससे हामी भरते हैं। वह कहते हैं कि‍ अगर सरकार सी2 के ऊपर कुछ प्रति‍शत बढ़ा कर एमएसपी तय करती है यह कि‍सानों के लि‍ए फायदेमंद होता।

अभी इस तरह से तय होती है लागत

अभी सरकार कमीशन फॉर एग्रीकल्‍चर कॉस्ट एंड प्राइज (CACP) की सिफारिशों के आधार पर एमएसपी तय करती है। वहीं सीएसीपी सरकार को सि‍फारि‍शें भेजने से पहले सभी राज्‍यो से सि‍फारि‍शें लेती है।

प्रोडक्‍शन की कॉस्‍ट नि‍कालने के तीन फॉर्मूले हैं – A2, A2+FL और C2.

A2 – कि‍सान की ओर से की गई सभी तरह की पेमेंट चाहे वो कैश में हो या कि‍सी वस्‍तु की शक्‍ल में, फर्टीलाइजर्स, कैमिकल, मजदूरों की मजदूरी, ईंधन, सिंचाई का खर्च सहि‍त अन्‍य खर्च जोड़े जाते हैं।

A2+FL – इसमें A2 के अलावा परि‍वार के सदस्‍यों द्वारा खेतीबाड़ी में की गई मेहतन का मेहनताना जोड़ा जाता है, जि‍से अनपेड फैमिली लेबर कहा जाता है।

C2 – लागत को कैलकुलेट करने का यह फार्मूला सबसे ज्‍यादा समग्र है। इसमें इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर कॉस्‍ट को भी जोड़ा जाता है। इसमें जमीन का कि‍राया व जमीन तथा खेतीबाड़ी के काम में लगी स्‍थाई पूंजी पर ब्‍याज को भी शामि‍ल कि‍या जाता है। यह कॉस्‍ट A2+FL के ऊपर जोड़ी जाती है।

क्या अब धान की फसल लेने वाले किसान जाएंगे जेल?

मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार में किसानों के लगातार प्रदर्शन की खबरें तो आपने पढ़ी होंगी लेकिन प्रदेश सरकार अब ऐसा कदम उठाने जा रही है जिससे शिवराज सरकार फिर सुर्खियों में आ सकती है। राज्य प्रशासन ने गर्मी के मौसम में धान की फसल लेने वाले किसानों को उनकी जगह दिखा दी है।

दरअसल शुक्रवार को यहां संभागायुक्त टीसी महावर की अध्यक्षा में जल उपयोगिता समिति की बैठक हुई। जिसमें राज्य शासन के निर्देशों का हवाला देते हुए प्रशासनिक अमले से दो टूक कहा कि जलाशयों में उपलब्ध पानी सबसे पहले उद्योगों को दें। मनाही के बाद भी अगर किसान धान की फसल लेते हैं तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जिले में इस बार बहुत कम बारिश के कारण बांधों व जलाशयों में पानी की उपलब्धता बीते वर्ष की तुलना में कम है। राज्य शासन की चिंता इस इस बात को लेकर है कि जिले में संचालित होने वाले उद्योगों को अगले बारिश के मौसम में पानी की आपूर्ति हो पाएगी या नहीं शुक्रवार को बैठक के दौरान राज्य सरकार की चिंता की झलक दिखाई दी।

बैठक के दौरान पूरे समय इसी बात को लेकर चर्चा होती रही कि किस जलाशय में कितना पानी है। जिले में स्थापित उद्योगों को उनकी मांग के अनुसार पूरे गर्मी भर पानी दे पाएंगे या नहीं। जल भराव का आंकलन करने के बाद कमिश्नर ने कहा कि बांधों व जलाशयों में पानी का पहला उपयोग उद्योगों का होगा। इसके बाद पेयजल आपूर्ति के लिए रिजर्व वाटर रखा जाएगा। रिजर्व वाटर के बाद अगर जलाशयों व बांधों में पानी बच पाता है तो रबी फसल के रुप में दलहन व तिलहन की खेती करने वाले किसानों को जल आपूर्ति की जाएगी।

बैठक में कमिश्नर ने साफ कहा कि जल्द ही कृषि, सिंचाई व पीएचई विभाग के अधिकारियों की बैठक कर स्थिति के अनुसार जल भराव क्षेत्र घोषित करने और भूजल स्तर के दोहन को रोकने के लिए कड़े कानून बनाए जाए।

संभाग के चार वृहद जलाशयों मिनीमाता हसदेव बांगों, खारंग जलाशय, मनियारी जलाशय और केलो परियोजना तथा मध्यम जलाशय घोंघा, मांड, केदार, पुटका, किंकारी और ख्महार पाकुट जलाशयों में वर्तमान में 64.23 प्रतिशत जल उपलब्ध है तथा 337 लघु जलाशयों में 25.9 प्रतिशत जल भराव स्थिति है।

यूरिया की खपत घटाने के लिए सरकार ने निकाला यह अनोखा जुगाड़

किसान यूरिया का कम उपयोग करें इसके लिए सरकार ने नई तरकीब निकाली है। अब यूरिया 50 किलो के बदले 45 किलो के बैग में मिलेगा। उर्वरक मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने यह जानकारी दी है। अधिकारी ने कहा कि यूरिया के 45 किग्रा के बैग की बिक्री 245 रुपए (टैक्स अलग से) में की जाएगी। ये अभी की 50 किग्रा के यूरिया की कीमत 268 रुपए (टैक्स अलग से) से कम होगी।

कंपनियां तैयार

अधिकारी ने बताया कि योजना तैयार की जा रही है। कंपनियां इस परिवर्तन के लिए तैयार हैं। वे 45 किग्रा बैग होने की छपाई करेंगे। इसे अगले वर्ष से लागू किया जायेगा।उन्होंने कहा कि असल उद्देश्य यूरिया की खपत को कम करना तथा उर्वरकों के संतुलित इस्तेमाल को प्रोत्साहित करना है। चूंकि यूरिया अन्य उर्वरकों से सस्ता है, इसलिए व्यापक तौर पर इसका इस्तेमाल करते हैं। सरकार की ओर से इसको काफी सब्सिडी प्राप्त होती है तथा इसकी अधिकतम खुदरा कीमत अब 5,360 रुपए प्रति टन की है।

खपत कम करेंगे

अधिकारी ने ब्योरा दिया, यूरिया की खपत को घटाने के लिए हमने विभिन्न उपायों के बारे में सोचा। नीम लोपित यूरिया उनमें से एक था। जो हमने लागू किया है। अब हम 45 किग्रा के बैग के बारे में सोच रहे हैं। सामान्य तौर पर किसान प्रत्येक हेक्टेयर भूमि के लिए बैगों की संख्या के हिसाब से यूरिया का इस्तेमाल करते हैं। जब हमने किसानों को 50 किग्रा के बैग की संख्या को कम करने के लिए कहा, उन्होंने नहीं सुना। इसलिए हमने खपत को कम करने के लिए 45 किग्रा के बैग का इस्तेमाल करने का फैसला किया है।

40 हजार करोड़ है सबसिडी

अधिकारी ने कहा कि किसान 45 किग्रा का बैग खरीदेंगे और जितने बैग का वह पहले इस्तेमाल करते थे उतने का ही इस्तेमाल करेंगे। यह अप्रत्यक्ष रूप से खपत में 10 प्रतिशत की कमी करेगा। यूरिया की वार्षिक सब्सिडी करीब 40,000 करोड़ रुपए है। भारत में पिछले वर्ष से करीब 2.4 करोड़ टन यूरिया का उत्पादन हो रहा है जो 2.2 करोड़ टन की मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त है।

विदेशों में ऐसे होती है अफीम की खेती ,कंबाइन से कटवाते है फसल

अफीम की खेती करना भारत में गैर क़ानूनी है ।लेकिन मध्य प्रदेश ,राजस्थान और भारत के और कुश राज्यों में इसकी खेती के लिए सरकारी लाइसेंस मिलते है । इस अफीम को दवाई बनाने वाली कंपनी द्वारा इस्तेमाल क्या जाता है । दुनिआ में सबसे ज्यादा अफीम अफगानिस्तान में पैदा की जाती है  । यहाँ पर दुन्या की 90 % अफीम पैदा की जाती है ।अफीम की तासीर बहुत गर्म होती है | इसका अधिक सेवन करने से व्यक्ति का रंग सावंला हो जाता है |

लेकिन अफीम की खेती को चाहे भारत में हो या फिर अफगानिस्तान में अभी भी हजारों साल पुराने तरिके से इसकी खेती की जाती है ।जैसा की हम जानते है की अफीम हमे पोस्त के पौधे से प्राप्त होता है | पोस्त फूल देने वाला एक पौधा होता है | इसमें पहले फूल बनता है और फिर डोडा |भारत के किसान डोडा को चीरा लगा कर अफीम प्राप्त करते है |

लेकिन बहुत से देश ऐसे है जहाँ इसकी खेती बिलकुल नए तरिके से की जाती है ।नीदरलैंड में इसकी खेती बाकी फसलों की तरह ही की जाती है ।जैसे आम फसल बोई जाती है वैसे ही अफीम की फसल बोई जाती है और फिर पोस्त के डोडे को कंबाइन के साथ काट लिए जाता है ।

विदेशो में अफीम की खेती कैसे होती है इसके लिए ये निचे दी हुई वीडियो देखें

मोदी सरकार किसानो को देगी एक और झटका , इतने महंगे हो जाएंगे ट्रैक्‍टर

मोदी सरकार ने ट्रैक्‍टर को नॉन ट्रांसपोर्ट व्‍हीकल की कैटेगिरी से बाहर करने का निर्णय लिया है। मिनिस्‍ट्री ऑफ रोड एंड ट्रांसपोर्ट ने इस संबंध में ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी कर दिया है। एक्‍सपर्ट्स का कहना है कि इससे जहां ट्रेक्‍टर की कीमत बढ़ जाएगी, वहीं ट्रैक्‍टर मालिकों पर टैक्‍स का बोझ भी बढ़ जाएगा।

मिनिस्‍ट्री ऑफ रोड एंड ट्रांसपोर्ट ने एक ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया है। इसमें कहा गया है कि सेंट्रल मोटर व्‍हीकल रूल्‍स 1989 में संशोधन किया जा रहा है और नया रूल सेंट्रल मोटर व्‍हीकल (अमेंडमेंट) रूल्‍स 2017 के नाम से जाना जाएगा।

रूल्‍स्‍ा 1989 के मुताबिक एग्रीकल्‍चर ट्रैक्‍टर को एक नॉन ट्रांसपोर्ट व्‍हीकल माना जाता है। लेकिन नए रूल्‍स में संशोधन करते हुए कहा गया है कि इस लाइन को हटा दिया जाए। यानी कि एग्रीकल्‍चर ट्रैक्‍टर को नॉन ट्रांसपोर्ट व्‍हीकल की कैटेगिरी से हटा दिया जाए। मिनिस्‍ट्री ने इस अमेंडमेंट को लेकर लोगों से सुझाव और आपत्तियां मांगी हैं, जो 27 अक्‍टूबर से पहले मिनिस्‍ट्री को भेजनी होगी।

इतने महंगे हो जाएंगे ट्रैक्‍टर

सिंह ने बताया कि अब तक ट्रैक्‍टर को फार्मिंग इक्विपमेंट माना जाता है और खरीदते वक्‍त ट्रैक्‍टर पर 12 फीसदी जीएसटी लगता है, लेकिन अब इन्‍हें टेम्‍पो, ट्रक की कैटेगिरी में डाला जाता है तो उस पर 28 फीसदी जीएसटी लगेगा। इससे ट्रैक्‍टर 16 फीसदी महंगे हो सकते हैं।

जिस से एक लाख के पीछे 16 हज़ार रुपये और देने पड़ेंगे । सिंह के मुताबिक, अब तक ट्रैक्‍टर पर रोड टैक्‍स में भी छूट है, लेकिन ट्रांसपोर्ट व्‍हीकल की कैटेगिरी में आने के बाद ट्रैक्‍टर मालिकों से भी रोड टैक्‍स वसूला जाएगा। इससे उन पर टैक्‍स का बोझ बढ़ जाएगा।

सरकार टेक्स बढ़ने की बड़ी वजह हर राज्‍य में ट्रैक्‍टर का कॉमर्शियल इस्‍तेमाल हो रहा है। कंस्‍ट्रक्‍शन सेक्‍टर में सामान की ढुलाई में ट्रैक्‍टर ट्रॉली का लगातार इस्‍तेमाल होता रहा है।

राजस्थान के किसानो का इतना कर्जा होगा माफ़

राजस्थान में किसानों ने सरकार को झुकनें पर मजबूर कर दिया. राजस्थान सरकार ने राज्य के किसानों के 50 हजार तक के कर्ज माफी के लिए तैयार हो गई है. 13 दिन,13 घंटे के आंदोलन के बाद सरकार से अपनी 11 मांगों पर सहमति के बाद किसानों ने आधी रात को आन्दोलन खत्म किया.

11 मांगों को लेकर बनी सहमति

किसानों और सरकार के बीच 11 मांगों को लेकर बुधवार देर रात सहमति बनी. तीन दिन के चक्का जाम के बाद मंत्री समूह और किसान नेताओं के बीच जयपुर में हुई वार्ता में मंत्रियों ने रात करीब 12.30 बजे कर्ज माफी सहित 11 मांगों पर सहमति जताई.

गठित की जाएगी कमेटी

50 हजार रुपए तक का कर्ज माफ करने के निर्णय के लिए अन्य राज्यों द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया का अध्ययन के लिए कमेटी गठित की जाएगी. यह कमेटी एक महीने में रिपोर्ट पेश करेगी.

चक्काजाम हुआ खत्म

मांगों पर सरकार से सहमति बनने के बाद किसान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमराराम ने रात 12.50 बजे किसान कमेटियों से चक्का जाम खोलने का आह्वान किया. आंदोलन खत्म करने की घोषणा अमराराम साढ़े दस बजे सभा स्थल पर जाकर सीकर में की. इस बीच किसानों और पुलिस ने भी रोडसे बेरिकेड्स हटा लिए. इसके अलावा जिले सहित प्रदेशभर में हाईवे से किसानों ने चक्काजाम हटाना शुरू कर दिया. इसी के साथ 13 दिन से चल रहे किसान आंदोलन का भी समापन हो गया.

1 सिंतबर को हुआ था शुरु

उल्लेखनीय है कि कर्ज माफी सहित विभिन्न मागों को लेकर अखिल भारतीय किसान सभा द्वारा कृषि उपज मंडी में एक सितंबर को महापड़ाव शुरू किया गया था. किसानों के साथ दोपहर बुधवार 1.15 बजे से लेकर रात करीब 12.30 बजे तक वार्ता के चार दौर चले.

इस साल कम हुई मध्य प्रदेश में सोयाबीन की पैदावार, ये हैं वजहें

एक समय मध्यप्रदेश को सोया राज्य का दर्जा हासिल था और देश का 88 फीसदी सोयाबीन मध्य प्रदेश में पैदा होता था. लेकिन अब धीरे धीरे किसानों का रुझान सोयाबीन से हटता जा रहा है.

सोयाबीन की फसल में लागत का अधिक होना, बारिश की कमी और फसल में कचरे की अधिकता ने सोयाबीन लगाने वाले किसानों की कमर तोड़ दी और इसी कारण अब सोया किसान दूसरी फसलों के प्रति आकृषित हो रहे हैं.

रायसेन जिले में भी सोयाबीन के रकबे में काफी कमी आई हैं. कुछ वर्षों पहले तक जिले में लगभग डेढ़ लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सोयाबीन की फसल बोई जाती थी लेकिन इस वर्ष मात्र 90 हज़ार हेक्टेयर क्षेत्र में ही सोयाबीन की फसल का लक्ष्य कृषि विभाग द्वारा रखा गया है.

सोयाबीन बोने वाले किसानों का भी कहना है कि उन्होने इस वर्ष कम रकबे में सोयाबीन बोई है और यदि इस वर्ष अच्छी पैदावार नही हुई तो अगले साल से इसे बंद कर देंगे.

कृषि विभाग के अधिकारी भी मानते हैं कि सोयाबीन के बीजों की खराब क्वालिटी के कारण इस वर्ष कई किसानों ने सोयाबीन नही बोई है. अधिकारियों ने उम्मीद जताई है कि सोयाबीन में अगले वर्ष अधिक संख्या में किसान रुचि दिखाएंगे.

ग्रीन हाउस निर्माण की लागत और आमदनी

ग्रीनहाउस क्या है ? वास्तव में ग्रीन हाउस एक ऐसी निर्मित संरचना है जो पारदर्शी सामग्री से ढंकी होती है। ग्रीनहाउस सब्जियों और फुलों की वृद्धि के लिए नियंत्रित वातावरण की परिस्थितियां उपलब्ध कराता है। परंपरागत तरीके में खुली ज़मीन पर होने वाली खेती की तुलना में कम ज़मीन पर नियंत्रित खेती और अधिक उत्पादकता की वजह से भारत में इन दिनों ग्रीनहाउस की अवधारणा लोकप्रिय होती जा रही है।

ग्रीनहाउस खेती में आरंभिक निवेश लागत अधिक होती है। हालांकि ग्रीनहाउस संरचना के निर्माण के लिए लोन या सब्सिडी का विकल्प भी उपलब्ध है। आरंभिक स्तर पर लागत को कम करने के लिए कम लागत या कम प्रौद्योगिकी वाली ग्रीनहाउस संरचना के निर्माण का भी विकल्प उपलब्ध है जिसमें स्थानीय सामग्रियों मसलन बांस, लकड़ियों आदि का इस्तेमाल करके ग्रीनहाउस की सामान्य संरचना तैयार की जाती है।

इस लेख में हम उदाहरण के लिए निर्यात बाजार और घरेलु जरूरतों की पूर्ती के लिए गुलाब के फुलों के उत्पादन के मॉडल और उसके लिए तैयार की जाने वाली ग्रीनहाउस संरचना की लागत को सामने रख कर विचार करते हैं।

ग्रीनहाउस संरचना के निर्माण में लगने वाली सामग्री निम्नलिखित हैं

ज़मीन खरीद की आवश्यकता (लोकेशन बहुत महत्वपूर्ण, स्थानीय बाज़ार के नजदीक जमीन लेना अच्छा विचार)
ग्रीनहाउस संरचना का निर्माण (सामग्रियों सहित)
संरचना में लगने वाली सामग्रियों की खरीद
सिंचाई में काम आने वाली सामग्रियों की खरीद
फर्टिलाइज़र से जुड़ी सामग्री की खरीद
ग्रेडिंग और पैकिंग के लिए जगह की खरीद
रेफ्रेजरेटेड वैन की खरीद
कार्यालय उपकरण की खरीद
निर्यात के लिए आवश्यक प्रौद्योगिकी की खरीद
इन सभी संसाधनों को तैयार करने के लिए लगने वाली मजदूरी
तकनीक से जुड़े श्रमिकों पर होने वाले खर्च
कीटनाशकों, ऊर्वरकों & प्रेजेर्वेटिव्स की खरीद की लागत

ग्रीन हाउस कृषि में दो प्रकार की लागत आती है

1) निश्चित लागत वाली सामग्री

स्थायी सामग्री की लागत उदाहरण के लिए जमीन की लागत, निर्माण सामग्री की लागत, सिंचाई सुविधा या अन्य जरूरी सामग्रियों की लागत

2) समय समय पर होने वाले खर्च या आवर्ती लागत

पौधों को लगाने में होने वाले खर्च, बुआई की लागत, रखरखाव और मजदूरों पर आने वाले खर्च, स्टोरेज, पैकिंग और ढुलाई पर होने वाले खर्च आदि आदि।

दोनों ही परिस्थितियों में आने वाले खर्च का एक प्रकार का लेखा जोखा नीचे दिया गया है। नीचे दिए गए ये खर्च एक हेक्टेयर के ग्रीन हाउस में गुलाब की खेती से जुड़ा है।

निवेशक के द्वारा लगाया जाने वाले प्रारंभिक निवेश

प्रोजेक्ट की कुल लागत का 25 फ़ीसदी उद्यमी की ओर से लगाया जाएगा
मूल धन और ब्याज सात साल में वापिस किए जाने हैं जिसमें पहले साल ब्याज औऱ दो साल तक मूल धन पर रोक रहेगी।

स्थायी लागत का वर्णन इस प्रकार है                                                               सम्मिलित सामग्री राशि (रुपये में)

ज़मीन & उसको तैयार करने का खर्च                                                                          4 लाख
ग्रीन हाउस की लागत                                                                                                    13 लाख
कोल्ड स्टोरेज की लागत                                                                                              10 लाख
ऑफिस एरिया की लागत                                                                                            2.5 लाख
ग्रेडिंग & पैकिंग की लागत                                                                                          5 लाख
रेफ्रिजरेडेट वैन की लागत                                                                                           1 लाख
जेनेरेटर सेट                                                                                                               2 लाख
फैक्स, टेलिफोन, कम्प्यूटर                                                                                     1 लाख
फर्नीचर की लागत                                                                                                      50 हजार
विधुत आपूर्ति की स्थापना का खर्च                                                                     2 लाख
जल आपूर्ति, ड्रीप सिंचाई & फागिंग मशीन की प्रणाली का खर्च                                          6 लाख
बुआई सामग्री & बुआई की लागत                                                                         30 लाख
कुल                                                                                                                       77 लाख

प्रोजेक्ट की आवर्ती लागत का ब्यौरा

संख्या सामग्री खर्च

इलेक्ट्रिसिटी चार्ज प्रति वर्ष                                                                                     6 लाख
खाद & फर्टीलाइजर की लागत                                                                              1 लाख
पौधों की सुरक्षा का खर्च                                                                                          1 लाख
प्रीजरवेटिव्स की लागत                                                                                        3 लाख
पैकिंग सामग्री की लागत                                                                                      2 लाख
हवाई माल ढुलाई का खर्च                                                                                  125 लाख
श्रमिकों का खर्च                                                                                                      3 लाख
कमीशन/इंश्योरेंस                                                                                                  15 लाख
वेतन कर्मचारियों का                                                                                              5 लाख
उपरी लागत                                                                                                            50 हजार
अन्य खर्च                                                                                                                 4 लाख
कुल आवर्ति लागत                                                                                              166.5 लाख

इस तरह से ग्रीन हाउस प्रोजेक्ट की लागत स्थायी और आवर्ती लागत मिला कर पहले साल में 2 करोड़ 43 लाख और 50 हजार रुपया आता है।

इस प्रोजेक्ट से होने वाले उत्पादन का ब्यौरा

  • प्रति हेक्टेयर गुलाब के पौधों की संख्या – साठ हजार
    प्रत्येक पौधे से मिलने वाले गुलाब की संख्या – 100 से 150
  • निर्यात की गुणवत्ता वाले गुलाब की संख्या – 60-100
  • अंतर्राष्ट्रीय बाजार में प्रति गुलाब मिलने वाली कीमत – 6-11 रुपया
  • प्रति एकड़ में निर्यात किए जा सकने लायक गुलाब की संख्या – साठ लाख गुलाब
  • निर्यात से होने वाली आमदनी – कम से कम तीन करोड़ रुपया सालाना
  • ये आमदनी ग्रीन हाउस की स्थिति और वर्तमान बाजार मूल्य के मुताबिक परिवर्तिनीय है।