राजस्थान के किसानो का इतना कर्जा होगा माफ़

राजस्थान में किसानों ने सरकार को झुकनें पर मजबूर कर दिया. राजस्थान सरकार ने राज्य के किसानों के 50 हजार तक के कर्ज माफी के लिए तैयार हो गई है. 13 दिन,13 घंटे के आंदोलन के बाद सरकार से अपनी 11 मांगों पर सहमति के बाद किसानों ने आधी रात को आन्दोलन खत्म किया.

11 मांगों को लेकर बनी सहमति

किसानों और सरकार के बीच 11 मांगों को लेकर बुधवार देर रात सहमति बनी. तीन दिन के चक्का जाम के बाद मंत्री समूह और किसान नेताओं के बीच जयपुर में हुई वार्ता में मंत्रियों ने रात करीब 12.30 बजे कर्ज माफी सहित 11 मांगों पर सहमति जताई.

गठित की जाएगी कमेटी

50 हजार रुपए तक का कर्ज माफ करने के निर्णय के लिए अन्य राज्यों द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया का अध्ययन के लिए कमेटी गठित की जाएगी. यह कमेटी एक महीने में रिपोर्ट पेश करेगी.

चक्काजाम हुआ खत्म

मांगों पर सरकार से सहमति बनने के बाद किसान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमराराम ने रात 12.50 बजे किसान कमेटियों से चक्का जाम खोलने का आह्वान किया. आंदोलन खत्म करने की घोषणा अमराराम साढ़े दस बजे सभा स्थल पर जाकर सीकर में की. इस बीच किसानों और पुलिस ने भी रोडसे बेरिकेड्स हटा लिए. इसके अलावा जिले सहित प्रदेशभर में हाईवे से किसानों ने चक्काजाम हटाना शुरू कर दिया. इसी के साथ 13 दिन से चल रहे किसान आंदोलन का भी समापन हो गया.

1 सिंतबर को हुआ था शुरु

उल्लेखनीय है कि कर्ज माफी सहित विभिन्न मागों को लेकर अखिल भारतीय किसान सभा द्वारा कृषि उपज मंडी में एक सितंबर को महापड़ाव शुरू किया गया था. किसानों के साथ दोपहर बुधवार 1.15 बजे से लेकर रात करीब 12.30 बजे तक वार्ता के चार दौर चले.

ग्रीन हाउस निर्माण की लागत और आमदनी

ग्रीनहाउस क्या है ? वास्तव में ग्रीन हाउस एक ऐसी निर्मित संरचना है जो पारदर्शी सामग्री से ढंकी होती है। ग्रीनहाउस सब्जियों और फुलों की वृद्धि के लिए नियंत्रित वातावरण की परिस्थितियां उपलब्ध कराता है। परंपरागत तरीके में खुली ज़मीन पर होने वाली खेती की तुलना में कम ज़मीन पर नियंत्रित खेती और अधिक उत्पादकता की वजह से भारत में इन दिनों ग्रीनहाउस की अवधारणा लोकप्रिय होती जा रही है।

ग्रीनहाउस खेती में आरंभिक निवेश लागत अधिक होती है। हालांकि ग्रीनहाउस संरचना के निर्माण के लिए लोन या सब्सिडी का विकल्प भी उपलब्ध है। आरंभिक स्तर पर लागत को कम करने के लिए कम लागत या कम प्रौद्योगिकी वाली ग्रीनहाउस संरचना के निर्माण का भी विकल्प उपलब्ध है जिसमें स्थानीय सामग्रियों मसलन बांस, लकड़ियों आदि का इस्तेमाल करके ग्रीनहाउस की सामान्य संरचना तैयार की जाती है।

इस लेख में हम उदाहरण के लिए निर्यात बाजार और घरेलु जरूरतों की पूर्ती के लिए गुलाब के फुलों के उत्पादन के मॉडल और उसके लिए तैयार की जाने वाली ग्रीनहाउस संरचना की लागत को सामने रख कर विचार करते हैं।

ग्रीनहाउस संरचना के निर्माण में लगने वाली सामग्री निम्नलिखित हैं

ज़मीन खरीद की आवश्यकता (लोकेशन बहुत महत्वपूर्ण, स्थानीय बाज़ार के नजदीक जमीन लेना अच्छा विचार)
ग्रीनहाउस संरचना का निर्माण (सामग्रियों सहित)
संरचना में लगने वाली सामग्रियों की खरीद
सिंचाई में काम आने वाली सामग्रियों की खरीद
फर्टिलाइज़र से जुड़ी सामग्री की खरीद
ग्रेडिंग और पैकिंग के लिए जगह की खरीद
रेफ्रेजरेटेड वैन की खरीद
कार्यालय उपकरण की खरीद
निर्यात के लिए आवश्यक प्रौद्योगिकी की खरीद
इन सभी संसाधनों को तैयार करने के लिए लगने वाली मजदूरी
तकनीक से जुड़े श्रमिकों पर होने वाले खर्च
कीटनाशकों, ऊर्वरकों & प्रेजेर्वेटिव्स की खरीद की लागत

ग्रीन हाउस कृषि में दो प्रकार की लागत आती है

1) निश्चित लागत वाली सामग्री

स्थायी सामग्री की लागत उदाहरण के लिए जमीन की लागत, निर्माण सामग्री की लागत, सिंचाई सुविधा या अन्य जरूरी सामग्रियों की लागत

2) समय समय पर होने वाले खर्च या आवर्ती लागत

पौधों को लगाने में होने वाले खर्च, बुआई की लागत, रखरखाव और मजदूरों पर आने वाले खर्च, स्टोरेज, पैकिंग और ढुलाई पर होने वाले खर्च आदि आदि।

दोनों ही परिस्थितियों में आने वाले खर्च का एक प्रकार का लेखा जोखा नीचे दिया गया है। नीचे दिए गए ये खर्च एक हेक्टेयर के ग्रीन हाउस में गुलाब की खेती से जुड़ा है।

निवेशक के द्वारा लगाया जाने वाले प्रारंभिक निवेश

प्रोजेक्ट की कुल लागत का 25 फ़ीसदी उद्यमी की ओर से लगाया जाएगा
मूल धन और ब्याज सात साल में वापिस किए जाने हैं जिसमें पहले साल ब्याज औऱ दो साल तक मूल धन पर रोक रहेगी।

स्थायी लागत का वर्णन इस प्रकार है                                                               सम्मिलित सामग्री राशि (रुपये में)

ज़मीन & उसको तैयार करने का खर्च                                                                          4 लाख
ग्रीन हाउस की लागत                                                                                                    13 लाख
कोल्ड स्टोरेज की लागत                                                                                              10 लाख
ऑफिस एरिया की लागत                                                                                            2.5 लाख
ग्रेडिंग & पैकिंग की लागत                                                                                          5 लाख
रेफ्रिजरेडेट वैन की लागत                                                                                           1 लाख
जेनेरेटर सेट                                                                                                               2 लाख
फैक्स, टेलिफोन, कम्प्यूटर                                                                                     1 लाख
फर्नीचर की लागत                                                                                                      50 हजार
विधुत आपूर्ति की स्थापना का खर्च                                                                     2 लाख
जल आपूर्ति, ड्रीप सिंचाई & फागिंग मशीन की प्रणाली का खर्च                                          6 लाख
बुआई सामग्री & बुआई की लागत                                                                         30 लाख
कुल                                                                                                                       77 लाख

प्रोजेक्ट की आवर्ती लागत का ब्यौरा

संख्या सामग्री खर्च

इलेक्ट्रिसिटी चार्ज प्रति वर्ष                                                                                     6 लाख
खाद & फर्टीलाइजर की लागत                                                                              1 लाख
पौधों की सुरक्षा का खर्च                                                                                          1 लाख
प्रीजरवेटिव्स की लागत                                                                                        3 लाख
पैकिंग सामग्री की लागत                                                                                      2 लाख
हवाई माल ढुलाई का खर्च                                                                                  125 लाख
श्रमिकों का खर्च                                                                                                      3 लाख
कमीशन/इंश्योरेंस                                                                                                  15 लाख
वेतन कर्मचारियों का                                                                                              5 लाख
उपरी लागत                                                                                                            50 हजार
अन्य खर्च                                                                                                                 4 लाख
कुल आवर्ति लागत                                                                                              166.5 लाख

इस तरह से ग्रीन हाउस प्रोजेक्ट की लागत स्थायी और आवर्ती लागत मिला कर पहले साल में 2 करोड़ 43 लाख और 50 हजार रुपया आता है।

इस प्रोजेक्ट से होने वाले उत्पादन का ब्यौरा

  • प्रति हेक्टेयर गुलाब के पौधों की संख्या – साठ हजार
    प्रत्येक पौधे से मिलने वाले गुलाब की संख्या – 100 से 150
  • निर्यात की गुणवत्ता वाले गुलाब की संख्या – 60-100
  • अंतर्राष्ट्रीय बाजार में प्रति गुलाब मिलने वाली कीमत – 6-11 रुपया
  • प्रति एकड़ में निर्यात किए जा सकने लायक गुलाब की संख्या – साठ लाख गुलाब
  • निर्यात से होने वाली आमदनी – कम से कम तीन करोड़ रुपया सालाना
  • ये आमदनी ग्रीन हाउस की स्थिति और वर्तमान बाजार मूल्य के मुताबिक परिवर्तिनीय है।

महाराष्ट्र सरकार का बड़ा फैसला- किसानों का डेढ़ लाख तक का कर्ज माफ, लोन भरने वाले किसान को 25 फीसदी रिटर्न

फडणवीस ने कर्ज माफी का ऐलान करते हुए कहा कि किसानों का कर्ज माफ करने का बोझ हम कर पड़ेगा। इसके चलते हमें अपने खर्च में कटौती करनी होगी। उन्होंने सभी मंत्रियों और विधायकों से कर्ज माफी के समर्थन में अपनी एक महीने की सैलरी देने की भी अपील की है।

कर्ज के तले दबे किसानों को महाराष्ट्र सरकार ने बड़ी राहत प्रदान की है। महाराष्ट्र सरकार ने बड़ा फैसले लेते हुए किसानों के 34000 करोड़ के कर्ज माफी का शनिवार को ऐलान किया। इस बात की जानकारी खुद राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने दी। सीएम देवेंद्र फडणवीस ने किसानों के लिए 34 हजार करोड़ रुपये की कर्ज माफी का ऐलान करते हुए कहा कि हम 1.5 लाख रुपये तक के ऋण को पूरी तरह से माफ कर रहे हैं।

साथ ही उन्होंने कहा कि जिन किसानों ने अपने ऋण का नियमित रूप से भुगतान किया है, हम उन्हें 25% ऋण वापसी लाभ (loan return benefit) देंगे। राज्य के 90% किसानों के कर्ज माफी की घोषणा की। महाराष्ट्र सरकार के इस फैसले का फायदा राज्य के 89 लाख किसानों को होगा।

फडणवीस ने कर्ज माफी का ऐलान करते हुए कहा कि किसानों का कर्ज माफ करने का बोझ सरकार पर पड़ेगा। इसके चलते हमें अपने खर्च में कटौती करनी होगी। उन्होंने सभी मंत्रियों और विधायकों से कर्ज माफी के समर्थन में अपनी एक महीने की सैलरी देने की भी अपील की है।

महाराष्ट्र से पहले पंजाब और उत्तर प्रदेश की सरकारों ने भी कर्ज माफी का ऐलान किया था। किसानों के कर्ज माफ किए जाने की जानकारी सरकार की ओर से पहले भी दी गई थी।

बता दें कि महाराष्ट्र में किसान कर्ज माफी को लेकर 1 जून से हड़ताल पर है। इस दौरान कई किसानों की आत्यहत्या करने के मामले भी सामने आए। राज्य के किसान लंबे समय से कर्ज माफी की मांग कर रहे थे। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक, किसान आत्महत्याओं में 42% की बढ़ोतरी हुई है।

आत्महत्या के सबसे ज्यादा मामले महाराष्ट्र में सामने आए थे। 30 दिसंबर 2016 को जारी एनसीआरबी के रिपोर्ट ‘एक्सिडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड इन इंडिया 2015’ के मुताबिक साल 2015 में 12,602 किसानों और खेती से जुड़े मजदूरों ने आत्महत्या की।

इस तारिक को होगा देश का सबसे बड़ा किसान आंदोलन

अब तक किसान आंदोलन सिर्फ एक दो राज्यों में ही सीमित था लेकिन अब देश के किसान जल्द बड़े आंदोलन की तैयारी में हैं। इसके लिए देश के 62 किसान संगठन एक मंच पर आ गए हैं।

उन्होंने 3 जुलाई को दिल्ली में जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन धरने का एलान कर दिया है। इसमें देश के कई राज्यों से हजारों किसानों के शिरकत करने का अनुमान है। दुर्दशा से नाराज किसान इस दौरान एक दिन नीति आयोग का घिराव कर विरोध दर्ज कराएंगे।

मध्य प्रदेश में आंदोलन के दौरान किसानों की पुलिस की गोली लगने से मौत के बाद भी पूरी तरह मांग नहीं माने जाने, महाराष्ट्र में आंदोलित किसानों को प्रताड़ित करने, उड़ीसा और आंध्र प्रदेश के किसानों की आवाज दबाने की कोशिश करने,

यूपी के किसानों के कर्ज माफ नहीं करने, हरियाणा और पंजाब के किसानों की पुरानी मांगों के साथ किसानों का फसली की जगह पूरे देश में सारा कर्ज माफ करने जैसे मुद्दों को लेकर किसान लामबंद हुए हैं।

देश के 62 किसान संगठनों ने एक किसान महासंघ गठित किया है। उसके सात संयोजक बनाए गए हैं।दो यूपी, एक हरियाणा, एक पंजाब, एक उड़ीसा। इसी तरह अन्य स्टेट से भी संयोजक बनाए गए हैं।

यूपी के संयोजक राष्ट्रीय किसान आंदोलन के नेता हरबीर सिंह निलोहा का कहना है कि देश के हर हिस्से में किसान परेशान है।आवाज उठाने के बाद भी उसे इंसाफ नहीं मिल रहा बल्कि गोली मारकर और लाठी फटकार कर दबाने की कोशिश की जा रही है। अब किसान झुकने वाला नहीं है।

एक बार लगाने पर कई साल तक हरा चारा देगी ये घास, अपने खेत में लगाने के लिए यहां करें संपर्क

आमतौर पर पशुपालक चारा खरीदने पर काफी पैसा खर्च कर देते है या फिर मेहनत कर हरा चारा उगाते है, लेकिन भारतीय पशु अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) ने पशुओं को पूरे वर्ष पौष्टिक एवं हरा चारा मिल सके इसके लिए बहुवर्षीय जिजुवा चारे की घास उगाई है जिसको गाय, भैंस, बकरी सभी बड़े पशु चाव से खाते है।डेयरी वाले किसानों के लिए ये काफी फायदेमंद हो सकती है।

पीलीभीत जिला मुख्यालय से लगभग 30 किमी दूर बिलसंडा ब्लॉक के भदेहीखजा गाँव में रहने वाले श्वेतांश सिंह (75 वर्ष) ने लगभग चौथाई बीघा में जिजुवा घास को बोया हुआ है। चारे की बजाय वह अपनी 21 गाय (साहीवाल और गिर) को जिजुवा घास खिलाते है।

श्वेतांश बताते हैं, “चारे की तरह इसको मशीन में काटना नहीं पड़ता है और केमिकल फर्टिलाइजर की भी जरुरत नहीं पड़ती है। एक साल हो गया इसको बोए अभी तक काटकर पशुओं को खिला रहे है।”

गुजरात की जिज्वा घास को उत्तर भारत की जलवायु में आसानी से उगाया जा सकता है। इस घास में अन्य घासों की अपेक्षा ज्यादा प्रोटीन होता है। इस घास को गाय, भैंस, भेड़, बकरी सभी पशु बड़े चाव से खाते है।

द्वारिका (राजकोट) में उगने वाली जिजुवा घास पर बंशी गौशाला(अहमदाबाद) के संचालक गोपाल भाई सुतालिया ने एक साल तक परीक्षण किया। उन्होंने 10-10 बीघे खेत में जिजुवा सहित करीब आधा दर्जन किस्म की घास उगाई और उनको खिलाने के लिए दुधारू पशुओं को खेतों में खुला छोड़ दिया। पाया गया कि पशुओं ने जिजुवा घास को अधिक पसंद किया।

“इस घास को लगाने से जो किसान बार-बार चारे की फसल लगाता है उसका जो खर्चा होता है वो खत्म हो जाता है। इस घास को अगर किसान एक बार बोता है तो पांच साल तक चारा मिल सकता है। मीठी होने के कारण पशु इसको ज्यादा खाते है।

आईवीआरआई ने फार्मर फर्स्ट प्रोगाम के अंतर्गत बरेली के अतरछेड़ी, निसोई और इस्माइलपुर समेत कई गाँव के किसानों को इस घास को दिया है। इससे पशुओं के दूध की गुणवत्ता भी अच्छी होती है।”ऐसा बताते हैं, बरेली स्थित आईवीआरआई के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. रणवीर सिंह।

डॉ सिंह आगे बताते हैं, “हमारा यही उद्देश्य है कि किसान के पास ऐसी चारे की फसल होनी चाहिए जो कम से कम खर्च में पूरे साल चारा दें, जो किसान इस घास को बोना चाहता हैं, वो जुलाई में इसकी रुट स्लिप बो सकता है, इसको साल भर पानी के निकास वाली जमीन में बोया जा सकता है।

जाड़ों के दिनों में(दिसंबर और जनवरी) इसकी बढ़वार कम होती है वरना बाकी दिनों में इसकी अच्छी फसल होती है। इस घास को किसान खेतों की मेड़ों पर और उचित पानी के निकास वाली उर्वर भूमि में लगा सकते है।

आईवीआरआई में जिज्वा घास के लिए संपर्क कर सकते है—

डॉ. रणवीर सिंह

0581-2303382

 

किसानों के फायदे के लिए महाराष्ट्र सरकार ने किया ये फैसला

 

महाराष्ट्र सरकार ने किसानों के फायदे के लिए दूध का खरीद मूल्य प्रति लीटर 3 रुपए बढ़ाने का फैसला किया है। खुदरा बिक्री मूल्य फिलहाल अपरिवर्तित रखे गए हैं।

राज्य के डेयरी विकास मंत्री महादेव जांकर ने कहा, ‘नई दरें 21 जून से लागू होंगी लेकिन खुदरा ग्राहकों के लिए दूध की दरों में कोई बदलाव नहीं होगा।’ उन्होंने कहा कि दूध के दाम को बढ़ाने का फैसला एक समिति की सिफारिश पर किया गया है।

राज्य सरकार ने दूध के खरीद दाम के संशोधन के लिए इस समिति का गठन किया था।

जांकर ने कहा, ‘नई दरों के मुताबिक डेयरियां अब गाय दूध 24 रुपए प्रति लीटर के बजाय 27 रुपए प्रति लीटर की दर से खरीदेंगी।

इसी तरह, भैंस का दूध अब 33 रुपए प्रति लीटर के बजाय 35 रुपए प्रति लीटर की दर से खरीदा जाएगा।’

किसानो के लिए खुशखबरी इतने रुपए बड़ा धान और बाकी फसलों का मूल्य

मोदी सरकार ने पिछले तीन वर्ष के दौरान दलहनों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में करीब 80 रुपए प्रति क्विंटल की वृद्धि की है लेकिन धान और मक्का की कीमतों में यह वृद्धि एक सौ रुपये क्ल की ही बढोतरी हो पायी है ।

कृषि मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार 2015-16 में अरहर का न्यूनतम समर्थन मूल्य 4625 रुपए प्रति क्विंटल था जिसमें 200 रुपए बोनस भी शामिल था । अरहर की खेती को बढावा देने के उद्देश्य से सरकार ने 2016-17 में 425 रुपए प्रति क्विंटल का बोनस घोषित किया जिससे इसका न्यूनतम समर्थन मूल्य 5050 रुपए प्रति क्विंटल पहुंच गया ।

इस बार अरहर का न्यूनतम समर्थन मूल्य 5250 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है और इस पर 200 रुपए का बोनस भी घोषित किया गया है जिससे इसका न्यूनतम समर्थन मूल्य बढकर 5450 रुपए हो गया है।

वर्ष 2015-16 में मूंग का न्यूनतम समर्थन मूल्य 4650 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया था और इस पर 200 रुपए का बोनस भी दिया गया था जिससे इसका कुल मूल्य 4850 रुपए प्रति क्विंटल हो गया था ।

अगले वर्ष इस पर बोनस की राशि 425 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित की गयी जिससे न्यूनतम समर्थन मूल्य 5225 रुपए प्रति क्विंटल हो गया था। चालू वित्त वर्ष के दौरान मूंग का न्यूनतम समर्थन मूल्य 5375 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है और इस पर 200 रुपए का बोनस दिया गया है जिससे इसकी कुल कीमत 5575 रुपए प्रति क्विंटल हो गई है ।

रोज 33 किसान कर रहे है ख़ुदकुशी और किसान से जुड़े कारोबारी कमा रहे है करोड़ों

अब खेती करना बहुत मुश्किल हो गया है। पिछले 15 साल से हर बार नुकसान हो जाता है, इसलिए लगातार कर्ज में हैं। हालात इतने खराब हैं कि 10 साल (2001-2011) में देश में 90 लाख किसान कम हो गए हैं और 3.8 करोड़ खेतिहर मजदूर बढ़ गए हैं। वहीं, किसानी और खेती से जुड़े कारोबार तेजी से बढ़ रहे हैं। किसान को भले ही फायदा न हो रहा हो, लेकिन इनके जरिए कमाई करने वालों का कारोबार अच्छा चल रहा है। देश में पंपसेट, स्प्रिंकलर, पाइप और केबल का सालाना बिजनेस करीब एक लाख करोड़ रुपए का है। हर साल एवरेज 12000 किसान कर रहे खुदकुशी…

– हर साल किसान की खेती करने की लागत 7-8 फीसदी बढ़ गई है। जबकि इस साल पिछले चार साल की तुलना में अनाज और दालों की कीमतें सबसे नीचे चल रही हैं। वहीं दूसरी ओर खेती संबंधी तमाम कामों से जुड़ी कंपनियाें का लाभ हर साल करोड़ों रुपए में आ रहा है।
– केंद्र सरकार की ओर से मई में सुप्रीम कोर्ट में दी जानकारी के मुताबिक 2013 से लगातार हर साल एवरेज 12 हजार से ज्यादा किसान खुदकुशी कर रहे हैं। यानी रोजाना करीब 33 किसान।

किसानों के भरोसे चल रहे इन काराेबार में खूब मुनाफा:

1. फर्टिलाइजर

– सिर्फ तीन बड़ी कंपनियों की कमाई 1200 करोड़ रुपए
– देश में किसानों की हालत भले ही खराब हो, लेकिन फर्टिलाइजर की सबसे बड़ी तीन कंपनियों को 2016-17 के दौरान 1255.23 करोड़ का फायदा हुआ था। यह पिछले साल की तुलना में 37.45 फीसदी ज्यादा था। यानी साल दर साल इनकी आमदनी तो बढ़ रही है। सरकार इन्हें सब्सिडी भी देती है। इस बजट में 70 हजार करोड़ सब्सिडी का प्रावधान है।

2. पंप

कंपनियां 125 करोड़ के लाभ में, किसानों को महंगा लोन
– देश की तीन प्रमुख पंप सेट्स बनाने वाली कंपनियों का शुद्ध लाभ 2016-17 में 125.29 करोड़ रुपए हुआ। पंपसेट, स्प्रिंकलर, पाइप और केबल का बाजार सालाना करीब एक लाख करोड़ रुपए का है। कृषि उपकरण और ट्रैक्टर जैसी चीजों के लिए लोन 12% की दर पर मिलता है, जबकि कार के लिए 10% से कम पर ब्याज पर मिल जाता है।

3. पेस्टीसाइड्स

टॉप कंपनियों काे हुआ 900 करोड़ मुनाफा, 22% ज्यादा
– इस क्षेत्र की टॉप तीन कंपनियों ने 2016-17 में 895.89 करोड़ रुपए का शुद्ध लाभ कमाया। पिछले साल के मुकाबले यह 22.8 फीसदी अधिक था। पिछले फाइनेंशियल ईयर में इन्हीं कंपनियों ने 729.46 करोड़ रुपए का शुद्ध मुनाफा कमाया था। 2014-15 में ही देश इसका कारोबार 28,600 करोड़ रु. पहुंच गया था। जो 7.5 फीसदी से हर साल बढ़ रहा है।

4. बीज

– प्रमुख कंपनियों को 85 करोड़ का फायदा, टैक्स में भी छूट
– देश की बीज तैयार करने वाली तीन बड़ी कंपनियों को 2015-16 में 85.47 करोड़ रुपए का मुनाफा हुआ है। ब्रांडेड बीज कारोबार हर साल करीब 10% की रफ्तार से बढ़ रहा है। बीज का कारोबार 35 हजार करोड़ रुपए पर पहुंच गया है। किसान की फसलें सस्ती बिकती हैं, लेकिन बीज महंगा होता जा रहा है। सरकार बीज कंपनियों को टैक्स में भारी छूट भी देती है।

5. ट्रैक्टर्स

इन्होंने ट्रैक्टर बेचकर कमाया किसानों से 5300 करोड़
– देश में ट्रैक्टर बनाने वाली प्रमुख तीन कंपनियों की 2016-17 में कुल आय करीब 5300 करोड़ रुपए रही। इससे पहले के साल में यह करीब 4500 करोड़ रुपए थी। कंपनियों की आय करीब 17 फीसदी बढ़ी। देश में हर माह 50 लाख ट्रैक्टर बिक रहे हैं। जीएसटी लागू होने के बाद किसानों को प्रति ट्रैैक्टर करीब 30 हजार रुपए और चुकाने पड़ सकते हैं। सीआईआई के मुताबिक 2016-17 के दौरान देश में कुल 6,61,195 ट्रैक्टर बिके। अप्रैल 2017 में 54217 ट्रैक्टर खरीदे गए।

कर्ज ही नहीं, इन वजहों से भी खेती से हाथ खड़े कर रहे हैं किसान

पिछले कुछ दिनों से मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के किसान अपनी फसलों के बेहतर मूल्य और कर्ज माफी के लिए विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। हालांकि कृषि उत्पादों पर कम मूल्य और कर्ज का बढ़ता बोझ ही उनकी मुख्य समस्याएं नहीं हैं। दरअसल कृषि के ढांचे में ही कुछ ऐसी समस्याएं हैं, जिनका कर्ज माफी जैसे अस्थाई उपायों से समाधान नहीं हो सकता। कृषि क्षेत्र की वर्तमान हालत पर नाबार्ड के पूर्व चेयरमैन प्रकाश बक्शी कहते हैं, ‘ऐसा लगता है कि यह अव्यवस्था हाल ही में हुई गड़बड़ियों की वजह से पैदा हुई है, लेकिन इस समस्या की जड़ें काफी गहरी हैं।’ जानें, क्या हैं खेती की समस्याएं और क्या हो सकते हैं उनके समाधान…

जोत छोटी होती गई और समस्या बढ़ती रही
पीढ़ी दर पीढ़ी खेती के विभाजित होने से खेतों का आकार घटता जा रहा है। खेतों का आकार छोटा होने से कृषि उत्पादन और फसलों से होने वाली बचत में कमी आ रही है। 1970-71 में 7 करोड़ किसानों के पास 16 करोड़ हेक्टेयर जमीन थी। इन किसानों में से 4.9 करोड़ किसान छोटे और सीमांत किसान थे, जिनके पास 2 हेक्टेयर तक की खेती थी। 2010-11 में किसानों की संख्या लगभग दोगुनी होकर 13.8 करोड़ तक पहुंच गई, जबकि छोटे और सीमांत किसानों की संख्या भारी उछाल के साथ 17.7 करोड़ हो गई। इन आंकड़ो से खेतों के विभाजन की दर को आसानी से समझा जा सकता है। इस दर के साथ 2040 तक भूस्वामियों की संख्या 18.6 करोड़ हो जाएगी।

छोटे खेत क्यों हैं घाटे का सौदा?
छोटे खेत वाले किसानों के पास खेती के पर्याप्त साधन, सिंचाई की व्यवस्था आदि का अभाव होता है और इस सब के लिए उन्हें बड़े किसानों पर निर्भर रहना पड़ता है। वहीं, बड़े किसानों की संख्या भी समय के साथ घट रही है। ऐसे में छोटे किसानों के लिए खेती के साधन जुटाना बेहद मुश्किल होता जा रहा है। इसके अलावा क्रय-विक्रय में छोटे किसानों की मोलभाव क्षमता भी कम होती है। ऐसे में जैसे-जैसे खेतों का आकार छोटा होता जा रहा है, किसानों को होने वाला फायदा भी कम होता जा रहा है। हर 5 साल में कृषि क्षेत्र में 1 करोड़ छोटे किसान जुड़ रहे हैं। अगर यह दर बरकरार रही तो आने वाले समय में कृषि क्षेत्र के हालात बेकाबू हो सकते हैं।

लैंड लीज पॉलिसी बदलना जरूरी

यदि सरकार ऐग्रिकल्चर लैंड लीज पॉलिसी में सुधार करती है और जमीन के मालिकाना हक से जुड़े कानून को बदलती है तो छोटे किसान लंबे समय तक अपनी जमीन को बटाई या फिर लीड पर दे सकेंगे। फिलहाल इस नियम के चलते छोटे किसान जमीन का मालिकाना हक गंवाने के डर से खेती लीज पर नहीं देते। यदि लैंड को लीज पर देना वैध हो जाए तो छोटे किसान अपनी जमीन पर खेती के प्रति आकर्षित होंगे।

किसानों के लिए विकल्पों की तलाश जरूरी
खेती अकेले किसानों और ग्रामीण मजदूरों को रोजगार नहीं दे सकती है। सरकार को खेती से जुड़े लोगों को दूसरे व्यवसायों में अवसर देने के उपाय करने होंगे। ऐसे लोगों में वैकल्पिक स्किल्स पैदा करने और रोजगार के अवसर मुहैया कराने होंगे। यही नहीं ऐसे लोगों को अस्थायी रोजगार देने पर भी फोकस करना होगा।

जीएसटी बिल से इतने रुपए बढ़ जायगी ट्रेक्टर की कीमत

पूरे देश में जहां एक ओर किसान कर्ज माफी को लेकर आंदोलन कर रहे हैं दूसरी ओर उनके ऊपर एक और आफत आने जा रही है। यह नई आफत है जीएसटी की मार। जीएसटी के चलते ट्रैक्टर के इनपुट कास्ट में 25 हजार रुपये की बढ़ोत्तरी होने जा रही है।वस्तु एवं सेवाकर (जीएसटी) के प्रभाव से किसान भी अछूते नहीं रहेंगे। आधुनिक खेती में अहम बन चुके ट्रैक्टर पार्टस भी महंगे हो जाएंगे। इसके चलते अब किसानों को ट्रैक्टर खरीदना महंगा पड़ेगा।

ट्रैक्टर पर पहले कोई ड्यूटी नहीं लगती थी इसे अब 12 फीसदी के दायरे में रखा गया है। वहीं एसोसिएशन की मांग है कि कंपोनेंट ड्यूटी को 28 फीसदी की जगह रखा जाए। ऐसा करने से ट्रैक्टर पर पड़ने जा रहे 25 हजार रुपये के बोझ से बचा जा सकेगा। किसानों की कर्ज माफी आंदोलन के बाद यह बड़ा मुद्दा हो सकता है।

हाल ही में 66 आइटम पर जीएसटी के रेट रिलीज किए गए हैं जो कि 18 फीसदी के दायरे में आएंगे। इसके लागू करने में 28 फीसदी की इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर और 18 फीसदी का आउटपुट वास्तव में राहत कम दे रहा बल्कि मुसीबत ज्यादा ला रहा है।

इसके चलते प्रति ट्रैक्टर को बनाने में कीमत 25 हजार रुपये तक बढ़ जाएगा। जिसके वजह से ट्रैक्टर इंडस्‍ट्री पर 1600 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार आएगा। यह जानकारी ट्रैक्टर मैन्यूफैक्चरर एसोसिएशन के द्वारा एक रिलीज के जरिए जारी की गई है।

एसोसिएशन के मुताबिक कई कृषि संबंधी उपकरणों पर राहत है लेकिन ट्रैक्टर के अधिकतर पुर्जों जैसे की इंजन ट्रांसमिशन व अन्‍य उपकरण जीएसटी के 28 फीसदी के दायरे में आते हैं जिसके वजह से ट्रैक्टर की कीमत में बढ़ोत्तरी होनी तय है।

एसोसिएशन ने इसके तहत मांग की है कि ट्रैक्टर में प्रयोग होने वाले हर उपकरण को जीसएटी के 18 फीसदी के दायरे में ही रखा जाना चाहिए। क्योंकि सिर्फ एप्लीकेशन को टैक्स के कम स्लैब में रखकर किसानों को मदद नहीं की जा सकती।