सिर्फ C2 फार्मूला से मिल सकता है किसानो को लाभ

वित्त मंत्री अरुण जेटली के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) बढ़ाने के फॉर्मूले को एक्‍सपर्ट्स ने सि‍रे से खारि‍ज कर दि‍या। उनका कहना है कि‍ इसमें कुछ भी नया नहीं है। अभी जो MSP तय होती है वह भी तकरीबन इसी फॉर्मूले पर है। जब लागत की कैलकुलेशन ही सही नहीं होगी तो उस पर लाभ कैसे मि‍लेगा। स्‍थि‍ति‍ जस की तस है, जेटली का यह फॉर्मूला लाभकारी नहीं है।

दरअसल, विपक्ष और कृषि विशेषज्ञ सरकार से उत्पादन की कॉस्ट का फॉर्मूला बताने की मांग कर रहे थे। जेटली ने राज्यसभा में कहा कि सरकार एमएसपी तय करते समय ए2+एफएल (वास्तविक लागत और किसान परिवार के श्रम की लागत) का फॉर्मूला अपनाएगी।

उन्‍होंने बताया कि‍ किसानों को बीज, फर्टिलाइजर कॉस्ट, फैमिली लेबर की इनपुट वैल्यू जैसे फैक्टर्स को कैलकुलेट करके 50 फीसदी रिटर्न उपलब्ध कराएगी। इस आधार पर ही एमएसपी तय किया जाएगा, लेकि‍न कृषि‍ वि‍शेषज्ञों ने इसका वि‍रोध कि‍या है।

फॉर्मूले पर नहीं रि‍जल्‍ट पर बात करें

इंटरनेशनल एग्री बि‍जनेस एक्‍सपर्ट वि‍जय सरदाना कहते हैं कि हमें फॉर्मूले की बात नहीं कि‍सानों के वेलफेयर की बात करनी चाहि‍ए। मुद्दा ये है कि सरकार जो भी तरीका अपना रही है क्‍या उससे कि‍सानों को फायदा हो रहा है। अगर उससे कि‍सानों को फायदा ही नहीं हो रहा तो ये एक तरह की पॉलिटि‍क धोखाधड़ी है। फॉर्मूला तो कुछ भी हो सकता है। हमें उसका रि‍जल्‍ट देखना होगा।मकसद है कि‍सानों को गरीबी से बाहर नि‍कालना और मुझे इस बात पर संदेह है कि‍ इस फॉर्मूले से यह मकसद हासि‍ल हो पाएगा।

मान लें पंजाब का कि‍सान ईंधन, फर्टीलाइजर्स वगैरा पर खूब खर्च करता है और उसकी कॉस्‍ट 30 हजार रुपए आ गई तो क्‍या सरकार उसे 45 हजार रुपए देगी। वहीं ऑर्गेनि‍क खेती करने वाला कि‍सान फर्टीलाइजर्स वगैरा नहीं खरीदता। अगर सरकार के गणि‍त पर चलें तो उस कि‍सान की कॉस्‍ट तो बहुत कम रह जाएगी। फॉर्मूले केवल उलझाने के लि‍ए होते हैं।

प्रॉफिट बढ़ाने की बजाए लागत घटा दी

जय कि‍सान आंदोलन के राष्‍ट्रीय संयोजक अवि‍क साहा के मुताबि‍क, वि‍त्‍त मंत्री अरुण जेटली की इस घोषणा में कुछ भी नया नहीं है। अभी भी सभी प्रमुख फसलों का न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य देखें तो यह इसी फॉर्मूले के आसपास है जो जेटली अब बता रहे हैं, जब वह पहले लाभकारी नहीं था तो अब कैसे हो गया? लागत कैलकुलेट करने का तरीका ही सही नहीं है।

वहीं भारतीय किसान यूनियन के राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता धर्मेंद्र मलि‍क ने कहा कि‍ हमें पहले से ही इस बात पर संदेह था, आखि‍र सरकार ने वही कि‍या। जेटली ने अपने बजट भाषण में कहा था कि‍ सरकार ने रबी की फसलों की जो एमएसपी तय की है वह लागत का डेढ़ गुना है।

इस बार गेहूं की एमएसपी 1735 रुपए तय की गई है। वर्ष 2016-17 में यह 1625 रुपए थी। यानी केवल 6.8 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। क्‍या यही है लागत का डेढ़ गुना। उन्‍होंने कहा कि‍ कि‍सान नासमझ नहीं है। इस घोषणा को कोई अर्थ नहीं है। लागत कैलकुलेट करने का सरकार का तरीका ही पूरी तरह से अवैज्ञानि‍क है।

कृषि‍ विशेषज्ञ देविंदर शर्मा भी इस पर सवाल उठा चुके हैं। उन्‍होंने अपनी फेसबुक पोस्‍ट पर लि‍खा है कि‍ सरकार का यह दावा कि‍ वह कि‍सानों को लागत का डेढ़ गुना एमएसपी दे रही है, मुझे पि‍छले साल की एक फि‍ल्‍म की याद दि‍लाता है। जि‍सका शीर्षक है, ‘डोंट रेज़ द ब्रि‍ज, लोवर द रि‍वर’ यानी पुल की ऊंचाई बढ़ाने की बजाए नदी को और गहरा कर दि‍या जाए। फसलों की कीमत बढ़ाने की बजाए कि‍सानी की लागत की कैलकुलेशन को ही कम कर दि‍या जाए। 50 % लाभ का आभास कराया जाए, बाकी काम शोर मचाने वाले कर देंगे।

सरकार को क्‍या करना चाहिए था

जय कि‍सान आंदोलन के राष्‍ट्रीय संयोजक अवि‍क साहा का कहना है कि सरकार को अगर वाकई अपने बजट वादे को पूरा करना है तो A2+FL पर नहीं बल्‍कि C2 पर 50 फीसदी जोड़कर एमएसपी तय करनी चाहि‍ए। भले ही सरकार 50 फीसदी नहीं करती 40 ही करती मगर कॉस्‍ट सी2 रखती। धर्मेंद्र भी इससे हामी भरते हैं। वह कहते हैं कि‍ अगर सरकार सी2 के ऊपर कुछ प्रति‍शत बढ़ा कर एमएसपी तय करती है यह कि‍सानों के लि‍ए फायदेमंद होता।

अभी इस तरह से तय होती है लागत

अभी सरकार कमीशन फॉर एग्रीकल्‍चर कॉस्ट एंड प्राइज (CACP) की सिफारिशों के आधार पर एमएसपी तय करती है। वहीं सीएसीपी सरकार को सि‍फारि‍शें भेजने से पहले सभी राज्‍यो से सि‍फारि‍शें लेती है।

प्रोडक्‍शन की कॉस्‍ट नि‍कालने के तीन फॉर्मूले हैं – A2, A2+FL और C2.

A2 – कि‍सान की ओर से की गई सभी तरह की पेमेंट चाहे वो कैश में हो या कि‍सी वस्‍तु की शक्‍ल में, फर्टीलाइजर्स, कैमिकल, मजदूरों की मजदूरी, ईंधन, सिंचाई का खर्च सहि‍त अन्‍य खर्च जोड़े जाते हैं।

A2+FL – इसमें A2 के अलावा परि‍वार के सदस्‍यों द्वारा खेतीबाड़ी में की गई मेहतन का मेहनताना जोड़ा जाता है, जि‍से अनपेड फैमिली लेबर कहा जाता है।

C2 – लागत को कैलकुलेट करने का यह फार्मूला सबसे ज्‍यादा समग्र है। इसमें इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर कॉस्‍ट को भी जोड़ा जाता है। इसमें जमीन का कि‍राया व जमीन तथा खेतीबाड़ी के काम में लगी स्‍थाई पूंजी पर ब्‍याज को भी शामि‍ल कि‍या जाता है। यह कॉस्‍ट A2+FL के ऊपर जोड़ी जाती है।

यूरिया की खपत घटाने के लिए सरकार ने निकाला यह अनोखा जुगाड़

किसान यूरिया का कम उपयोग करें इसके लिए सरकार ने नई तरकीब निकाली है। अब यूरिया 50 किलो के बदले 45 किलो के बैग में मिलेगा। उर्वरक मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने यह जानकारी दी है। अधिकारी ने कहा कि यूरिया के 45 किग्रा के बैग की बिक्री 245 रुपए (टैक्स अलग से) में की जाएगी। ये अभी की 50 किग्रा के यूरिया की कीमत 268 रुपए (टैक्स अलग से) से कम होगी।

कंपनियां तैयार

अधिकारी ने बताया कि योजना तैयार की जा रही है। कंपनियां इस परिवर्तन के लिए तैयार हैं। वे 45 किग्रा बैग होने की छपाई करेंगे। इसे अगले वर्ष से लागू किया जायेगा।उन्होंने कहा कि असल उद्देश्य यूरिया की खपत को कम करना तथा उर्वरकों के संतुलित इस्तेमाल को प्रोत्साहित करना है। चूंकि यूरिया अन्य उर्वरकों से सस्ता है, इसलिए व्यापक तौर पर इसका इस्तेमाल करते हैं। सरकार की ओर से इसको काफी सब्सिडी प्राप्त होती है तथा इसकी अधिकतम खुदरा कीमत अब 5,360 रुपए प्रति टन की है।

खपत कम करेंगे

अधिकारी ने ब्योरा दिया, यूरिया की खपत को घटाने के लिए हमने विभिन्न उपायों के बारे में सोचा। नीम लोपित यूरिया उनमें से एक था। जो हमने लागू किया है। अब हम 45 किग्रा के बैग के बारे में सोच रहे हैं। सामान्य तौर पर किसान प्रत्येक हेक्टेयर भूमि के लिए बैगों की संख्या के हिसाब से यूरिया का इस्तेमाल करते हैं। जब हमने किसानों को 50 किग्रा के बैग की संख्या को कम करने के लिए कहा, उन्होंने नहीं सुना। इसलिए हमने खपत को कम करने के लिए 45 किग्रा के बैग का इस्तेमाल करने का फैसला किया है।

40 हजार करोड़ है सबसिडी

अधिकारी ने कहा कि किसान 45 किग्रा का बैग खरीदेंगे और जितने बैग का वह पहले इस्तेमाल करते थे उतने का ही इस्तेमाल करेंगे। यह अप्रत्यक्ष रूप से खपत में 10 प्रतिशत की कमी करेगा। यूरिया की वार्षिक सब्सिडी करीब 40,000 करोड़ रुपए है। भारत में पिछले वर्ष से करीब 2.4 करोड़ टन यूरिया का उत्पादन हो रहा है जो 2.2 करोड़ टन की मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त है।

विदेशों में ऐसे होती है अफीम की खेती ,कंबाइन से कटवाते है फसल

अफीम की खेती करना भारत में गैर क़ानूनी है ।लेकिन मध्य प्रदेश ,राजस्थान और भारत के और कुश राज्यों में इसकी खेती के लिए सरकारी लाइसेंस मिलते है । इस अफीम को दवाई बनाने वाली कंपनी द्वारा इस्तेमाल क्या जाता है । दुनिआ में सबसे ज्यादा अफीम अफगानिस्तान में पैदा की जाती है  । यहाँ पर दुन्या की 90 % अफीम पैदा की जाती है ।अफीम की तासीर बहुत गर्म होती है | इसका अधिक सेवन करने से व्यक्ति का रंग सावंला हो जाता है |

लेकिन अफीम की खेती को चाहे भारत में हो या फिर अफगानिस्तान में अभी भी हजारों साल पुराने तरिके से इसकी खेती की जाती है ।जैसा की हम जानते है की अफीम हमे पोस्त के पौधे से प्राप्त होता है | पोस्त फूल देने वाला एक पौधा होता है | इसमें पहले फूल बनता है और फिर डोडा |भारत के किसान डोडा को चीरा लगा कर अफीम प्राप्त करते है |

लेकिन बहुत से देश ऐसे है जहाँ इसकी खेती बिलकुल नए तरिके से की जाती है ।नीदरलैंड में इसकी खेती बाकी फसलों की तरह ही की जाती है ।जैसे आम फसल बोई जाती है वैसे ही अफीम की फसल बोई जाती है और फिर पोस्त के डोडे को कंबाइन के साथ काट लिए जाता है ।

विदेशो में अफीम की खेती कैसे होती है इसके लिए ये निचे दी हुई वीडियो देखें

मोदी सरकार किसानो को देगी एक और झटका , इतने महंगे हो जाएंगे ट्रैक्‍टर

मोदी सरकार ने ट्रैक्‍टर को नॉन ट्रांसपोर्ट व्‍हीकल की कैटेगिरी से बाहर करने का निर्णय लिया है। मिनिस्‍ट्री ऑफ रोड एंड ट्रांसपोर्ट ने इस संबंध में ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी कर दिया है। एक्‍सपर्ट्स का कहना है कि इससे जहां ट्रेक्‍टर की कीमत बढ़ जाएगी, वहीं ट्रैक्‍टर मालिकों पर टैक्‍स का बोझ भी बढ़ जाएगा।

मिनिस्‍ट्री ऑफ रोड एंड ट्रांसपोर्ट ने एक ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया है। इसमें कहा गया है कि सेंट्रल मोटर व्‍हीकल रूल्‍स 1989 में संशोधन किया जा रहा है और नया रूल सेंट्रल मोटर व्‍हीकल (अमेंडमेंट) रूल्‍स 2017 के नाम से जाना जाएगा।

रूल्‍स्‍ा 1989 के मुताबिक एग्रीकल्‍चर ट्रैक्‍टर को एक नॉन ट्रांसपोर्ट व्‍हीकल माना जाता है। लेकिन नए रूल्‍स में संशोधन करते हुए कहा गया है कि इस लाइन को हटा दिया जाए। यानी कि एग्रीकल्‍चर ट्रैक्‍टर को नॉन ट्रांसपोर्ट व्‍हीकल की कैटेगिरी से हटा दिया जाए। मिनिस्‍ट्री ने इस अमेंडमेंट को लेकर लोगों से सुझाव और आपत्तियां मांगी हैं, जो 27 अक्‍टूबर से पहले मिनिस्‍ट्री को भेजनी होगी।

इतने महंगे हो जाएंगे ट्रैक्‍टर

सिंह ने बताया कि अब तक ट्रैक्‍टर को फार्मिंग इक्विपमेंट माना जाता है और खरीदते वक्‍त ट्रैक्‍टर पर 12 फीसदी जीएसटी लगता है, लेकिन अब इन्‍हें टेम्‍पो, ट्रक की कैटेगिरी में डाला जाता है तो उस पर 28 फीसदी जीएसटी लगेगा। इससे ट्रैक्‍टर 16 फीसदी महंगे हो सकते हैं।

जिस से एक लाख के पीछे 16 हज़ार रुपये और देने पड़ेंगे । सिंह के मुताबिक, अब तक ट्रैक्‍टर पर रोड टैक्‍स में भी छूट है, लेकिन ट्रांसपोर्ट व्‍हीकल की कैटेगिरी में आने के बाद ट्रैक्‍टर मालिकों से भी रोड टैक्‍स वसूला जाएगा। इससे उन पर टैक्‍स का बोझ बढ़ जाएगा।

सरकार टेक्स बढ़ने की बड़ी वजह हर राज्‍य में ट्रैक्‍टर का कॉमर्शियल इस्‍तेमाल हो रहा है। कंस्‍ट्रक्‍शन सेक्‍टर में सामान की ढुलाई में ट्रैक्‍टर ट्रॉली का लगातार इस्‍तेमाल होता रहा है।

राजस्थान के किसानो का इतना कर्जा होगा माफ़

राजस्थान में किसानों ने सरकार को झुकनें पर मजबूर कर दिया. राजस्थान सरकार ने राज्य के किसानों के 50 हजार तक के कर्ज माफी के लिए तैयार हो गई है. 13 दिन,13 घंटे के आंदोलन के बाद सरकार से अपनी 11 मांगों पर सहमति के बाद किसानों ने आधी रात को आन्दोलन खत्म किया.

11 मांगों को लेकर बनी सहमति

किसानों और सरकार के बीच 11 मांगों को लेकर बुधवार देर रात सहमति बनी. तीन दिन के चक्का जाम के बाद मंत्री समूह और किसान नेताओं के बीच जयपुर में हुई वार्ता में मंत्रियों ने रात करीब 12.30 बजे कर्ज माफी सहित 11 मांगों पर सहमति जताई.

गठित की जाएगी कमेटी

50 हजार रुपए तक का कर्ज माफ करने के निर्णय के लिए अन्य राज्यों द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया का अध्ययन के लिए कमेटी गठित की जाएगी. यह कमेटी एक महीने में रिपोर्ट पेश करेगी.

चक्काजाम हुआ खत्म

मांगों पर सरकार से सहमति बनने के बाद किसान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमराराम ने रात 12.50 बजे किसान कमेटियों से चक्का जाम खोलने का आह्वान किया. आंदोलन खत्म करने की घोषणा अमराराम साढ़े दस बजे सभा स्थल पर जाकर सीकर में की. इस बीच किसानों और पुलिस ने भी रोडसे बेरिकेड्स हटा लिए. इसके अलावा जिले सहित प्रदेशभर में हाईवे से किसानों ने चक्काजाम हटाना शुरू कर दिया. इसी के साथ 13 दिन से चल रहे किसान आंदोलन का भी समापन हो गया.

1 सिंतबर को हुआ था शुरु

उल्लेखनीय है कि कर्ज माफी सहित विभिन्न मागों को लेकर अखिल भारतीय किसान सभा द्वारा कृषि उपज मंडी में एक सितंबर को महापड़ाव शुरू किया गया था. किसानों के साथ दोपहर बुधवार 1.15 बजे से लेकर रात करीब 12.30 बजे तक वार्ता के चार दौर चले.

ग्रीन हाउस निर्माण की लागत और आमदनी

ग्रीनहाउस क्या है ? वास्तव में ग्रीन हाउस एक ऐसी निर्मित संरचना है जो पारदर्शी सामग्री से ढंकी होती है। ग्रीनहाउस सब्जियों और फुलों की वृद्धि के लिए नियंत्रित वातावरण की परिस्थितियां उपलब्ध कराता है। परंपरागत तरीके में खुली ज़मीन पर होने वाली खेती की तुलना में कम ज़मीन पर नियंत्रित खेती और अधिक उत्पादकता की वजह से भारत में इन दिनों ग्रीनहाउस की अवधारणा लोकप्रिय होती जा रही है।

ग्रीनहाउस खेती में आरंभिक निवेश लागत अधिक होती है। हालांकि ग्रीनहाउस संरचना के निर्माण के लिए लोन या सब्सिडी का विकल्प भी उपलब्ध है। आरंभिक स्तर पर लागत को कम करने के लिए कम लागत या कम प्रौद्योगिकी वाली ग्रीनहाउस संरचना के निर्माण का भी विकल्प उपलब्ध है जिसमें स्थानीय सामग्रियों मसलन बांस, लकड़ियों आदि का इस्तेमाल करके ग्रीनहाउस की सामान्य संरचना तैयार की जाती है।

इस लेख में हम उदाहरण के लिए निर्यात बाजार और घरेलु जरूरतों की पूर्ती के लिए गुलाब के फुलों के उत्पादन के मॉडल और उसके लिए तैयार की जाने वाली ग्रीनहाउस संरचना की लागत को सामने रख कर विचार करते हैं।

ग्रीनहाउस संरचना के निर्माण में लगने वाली सामग्री निम्नलिखित हैं

ज़मीन खरीद की आवश्यकता (लोकेशन बहुत महत्वपूर्ण, स्थानीय बाज़ार के नजदीक जमीन लेना अच्छा विचार)
ग्रीनहाउस संरचना का निर्माण (सामग्रियों सहित)
संरचना में लगने वाली सामग्रियों की खरीद
सिंचाई में काम आने वाली सामग्रियों की खरीद
फर्टिलाइज़र से जुड़ी सामग्री की खरीद
ग्रेडिंग और पैकिंग के लिए जगह की खरीद
रेफ्रेजरेटेड वैन की खरीद
कार्यालय उपकरण की खरीद
निर्यात के लिए आवश्यक प्रौद्योगिकी की खरीद
इन सभी संसाधनों को तैयार करने के लिए लगने वाली मजदूरी
तकनीक से जुड़े श्रमिकों पर होने वाले खर्च
कीटनाशकों, ऊर्वरकों & प्रेजेर्वेटिव्स की खरीद की लागत

ग्रीन हाउस कृषि में दो प्रकार की लागत आती है

1) निश्चित लागत वाली सामग्री

स्थायी सामग्री की लागत उदाहरण के लिए जमीन की लागत, निर्माण सामग्री की लागत, सिंचाई सुविधा या अन्य जरूरी सामग्रियों की लागत

2) समय समय पर होने वाले खर्च या आवर्ती लागत

पौधों को लगाने में होने वाले खर्च, बुआई की लागत, रखरखाव और मजदूरों पर आने वाले खर्च, स्टोरेज, पैकिंग और ढुलाई पर होने वाले खर्च आदि आदि।

दोनों ही परिस्थितियों में आने वाले खर्च का एक प्रकार का लेखा जोखा नीचे दिया गया है। नीचे दिए गए ये खर्च एक हेक्टेयर के ग्रीन हाउस में गुलाब की खेती से जुड़ा है।

निवेशक के द्वारा लगाया जाने वाले प्रारंभिक निवेश

प्रोजेक्ट की कुल लागत का 25 फ़ीसदी उद्यमी की ओर से लगाया जाएगा
मूल धन और ब्याज सात साल में वापिस किए जाने हैं जिसमें पहले साल ब्याज औऱ दो साल तक मूल धन पर रोक रहेगी।

स्थायी लागत का वर्णन इस प्रकार है                                                               सम्मिलित सामग्री राशि (रुपये में)

ज़मीन & उसको तैयार करने का खर्च                                                                          4 लाख
ग्रीन हाउस की लागत                                                                                                    13 लाख
कोल्ड स्टोरेज की लागत                                                                                              10 लाख
ऑफिस एरिया की लागत                                                                                            2.5 लाख
ग्रेडिंग & पैकिंग की लागत                                                                                          5 लाख
रेफ्रिजरेडेट वैन की लागत                                                                                           1 लाख
जेनेरेटर सेट                                                                                                               2 लाख
फैक्स, टेलिफोन, कम्प्यूटर                                                                                     1 लाख
फर्नीचर की लागत                                                                                                      50 हजार
विधुत आपूर्ति की स्थापना का खर्च                                                                     2 लाख
जल आपूर्ति, ड्रीप सिंचाई & फागिंग मशीन की प्रणाली का खर्च                                          6 लाख
बुआई सामग्री & बुआई की लागत                                                                         30 लाख
कुल                                                                                                                       77 लाख

प्रोजेक्ट की आवर्ती लागत का ब्यौरा

संख्या सामग्री खर्च

इलेक्ट्रिसिटी चार्ज प्रति वर्ष                                                                                     6 लाख
खाद & फर्टीलाइजर की लागत                                                                              1 लाख
पौधों की सुरक्षा का खर्च                                                                                          1 लाख
प्रीजरवेटिव्स की लागत                                                                                        3 लाख
पैकिंग सामग्री की लागत                                                                                      2 लाख
हवाई माल ढुलाई का खर्च                                                                                  125 लाख
श्रमिकों का खर्च                                                                                                      3 लाख
कमीशन/इंश्योरेंस                                                                                                  15 लाख
वेतन कर्मचारियों का                                                                                              5 लाख
उपरी लागत                                                                                                            50 हजार
अन्य खर्च                                                                                                                 4 लाख
कुल आवर्ति लागत                                                                                              166.5 लाख

इस तरह से ग्रीन हाउस प्रोजेक्ट की लागत स्थायी और आवर्ती लागत मिला कर पहले साल में 2 करोड़ 43 लाख और 50 हजार रुपया आता है।

इस प्रोजेक्ट से होने वाले उत्पादन का ब्यौरा

  • प्रति हेक्टेयर गुलाब के पौधों की संख्या – साठ हजार
    प्रत्येक पौधे से मिलने वाले गुलाब की संख्या – 100 से 150
  • निर्यात की गुणवत्ता वाले गुलाब की संख्या – 60-100
  • अंतर्राष्ट्रीय बाजार में प्रति गुलाब मिलने वाली कीमत – 6-11 रुपया
  • प्रति एकड़ में निर्यात किए जा सकने लायक गुलाब की संख्या – साठ लाख गुलाब
  • निर्यात से होने वाली आमदनी – कम से कम तीन करोड़ रुपया सालाना
  • ये आमदनी ग्रीन हाउस की स्थिति और वर्तमान बाजार मूल्य के मुताबिक परिवर्तिनीय है।

महाराष्ट्र सरकार का बड़ा फैसला- किसानों का डेढ़ लाख तक का कर्ज माफ, लोन भरने वाले किसान को 25 फीसदी रिटर्न

फडणवीस ने कर्ज माफी का ऐलान करते हुए कहा कि किसानों का कर्ज माफ करने का बोझ हम कर पड़ेगा। इसके चलते हमें अपने खर्च में कटौती करनी होगी। उन्होंने सभी मंत्रियों और विधायकों से कर्ज माफी के समर्थन में अपनी एक महीने की सैलरी देने की भी अपील की है।

कर्ज के तले दबे किसानों को महाराष्ट्र सरकार ने बड़ी राहत प्रदान की है। महाराष्ट्र सरकार ने बड़ा फैसले लेते हुए किसानों के 34000 करोड़ के कर्ज माफी का शनिवार को ऐलान किया। इस बात की जानकारी खुद राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने दी। सीएम देवेंद्र फडणवीस ने किसानों के लिए 34 हजार करोड़ रुपये की कर्ज माफी का ऐलान करते हुए कहा कि हम 1.5 लाख रुपये तक के ऋण को पूरी तरह से माफ कर रहे हैं।

साथ ही उन्होंने कहा कि जिन किसानों ने अपने ऋण का नियमित रूप से भुगतान किया है, हम उन्हें 25% ऋण वापसी लाभ (loan return benefit) देंगे। राज्य के 90% किसानों के कर्ज माफी की घोषणा की। महाराष्ट्र सरकार के इस फैसले का फायदा राज्य के 89 लाख किसानों को होगा।

फडणवीस ने कर्ज माफी का ऐलान करते हुए कहा कि किसानों का कर्ज माफ करने का बोझ सरकार पर पड़ेगा। इसके चलते हमें अपने खर्च में कटौती करनी होगी। उन्होंने सभी मंत्रियों और विधायकों से कर्ज माफी के समर्थन में अपनी एक महीने की सैलरी देने की भी अपील की है।

महाराष्ट्र से पहले पंजाब और उत्तर प्रदेश की सरकारों ने भी कर्ज माफी का ऐलान किया था। किसानों के कर्ज माफ किए जाने की जानकारी सरकार की ओर से पहले भी दी गई थी।

बता दें कि महाराष्ट्र में किसान कर्ज माफी को लेकर 1 जून से हड़ताल पर है। इस दौरान कई किसानों की आत्यहत्या करने के मामले भी सामने आए। राज्य के किसान लंबे समय से कर्ज माफी की मांग कर रहे थे। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक, किसान आत्महत्याओं में 42% की बढ़ोतरी हुई है।

आत्महत्या के सबसे ज्यादा मामले महाराष्ट्र में सामने आए थे। 30 दिसंबर 2016 को जारी एनसीआरबी के रिपोर्ट ‘एक्सिडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड इन इंडिया 2015’ के मुताबिक साल 2015 में 12,602 किसानों और खेती से जुड़े मजदूरों ने आत्महत्या की।

इस तारिक को होगा देश का सबसे बड़ा किसान आंदोलन

अब तक किसान आंदोलन सिर्फ एक दो राज्यों में ही सीमित था लेकिन अब देश के किसान जल्द बड़े आंदोलन की तैयारी में हैं। इसके लिए देश के 62 किसान संगठन एक मंच पर आ गए हैं।

उन्होंने 3 जुलाई को दिल्ली में जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन धरने का एलान कर दिया है। इसमें देश के कई राज्यों से हजारों किसानों के शिरकत करने का अनुमान है। दुर्दशा से नाराज किसान इस दौरान एक दिन नीति आयोग का घिराव कर विरोध दर्ज कराएंगे।

मध्य प्रदेश में आंदोलन के दौरान किसानों की पुलिस की गोली लगने से मौत के बाद भी पूरी तरह मांग नहीं माने जाने, महाराष्ट्र में आंदोलित किसानों को प्रताड़ित करने, उड़ीसा और आंध्र प्रदेश के किसानों की आवाज दबाने की कोशिश करने,

यूपी के किसानों के कर्ज माफ नहीं करने, हरियाणा और पंजाब के किसानों की पुरानी मांगों के साथ किसानों का फसली की जगह पूरे देश में सारा कर्ज माफ करने जैसे मुद्दों को लेकर किसान लामबंद हुए हैं।

देश के 62 किसान संगठनों ने एक किसान महासंघ गठित किया है। उसके सात संयोजक बनाए गए हैं।दो यूपी, एक हरियाणा, एक पंजाब, एक उड़ीसा। इसी तरह अन्य स्टेट से भी संयोजक बनाए गए हैं।

यूपी के संयोजक राष्ट्रीय किसान आंदोलन के नेता हरबीर सिंह निलोहा का कहना है कि देश के हर हिस्से में किसान परेशान है।आवाज उठाने के बाद भी उसे इंसाफ नहीं मिल रहा बल्कि गोली मारकर और लाठी फटकार कर दबाने की कोशिश की जा रही है। अब किसान झुकने वाला नहीं है।

एक बार लगाने पर कई साल तक हरा चारा देगी ये घास, अपने खेत में लगाने के लिए यहां करें संपर्क

आमतौर पर पशुपालक चारा खरीदने पर काफी पैसा खर्च कर देते है या फिर मेहनत कर हरा चारा उगाते है, लेकिन भारतीय पशु अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) ने पशुओं को पूरे वर्ष पौष्टिक एवं हरा चारा मिल सके इसके लिए बहुवर्षीय जिजुवा चारे की घास उगाई है जिसको गाय, भैंस, बकरी सभी बड़े पशु चाव से खाते है।डेयरी वाले किसानों के लिए ये काफी फायदेमंद हो सकती है।

पीलीभीत जिला मुख्यालय से लगभग 30 किमी दूर बिलसंडा ब्लॉक के भदेहीखजा गाँव में रहने वाले श्वेतांश सिंह (75 वर्ष) ने लगभग चौथाई बीघा में जिजुवा घास को बोया हुआ है। चारे की बजाय वह अपनी 21 गाय (साहीवाल और गिर) को जिजुवा घास खिलाते है।

श्वेतांश बताते हैं, “चारे की तरह इसको मशीन में काटना नहीं पड़ता है और केमिकल फर्टिलाइजर की भी जरुरत नहीं पड़ती है। एक साल हो गया इसको बोए अभी तक काटकर पशुओं को खिला रहे है।”

गुजरात की जिज्वा घास को उत्तर भारत की जलवायु में आसानी से उगाया जा सकता है। इस घास में अन्य घासों की अपेक्षा ज्यादा प्रोटीन होता है। इस घास को गाय, भैंस, भेड़, बकरी सभी पशु बड़े चाव से खाते है।

द्वारिका (राजकोट) में उगने वाली जिजुवा घास पर बंशी गौशाला(अहमदाबाद) के संचालक गोपाल भाई सुतालिया ने एक साल तक परीक्षण किया। उन्होंने 10-10 बीघे खेत में जिजुवा सहित करीब आधा दर्जन किस्म की घास उगाई और उनको खिलाने के लिए दुधारू पशुओं को खेतों में खुला छोड़ दिया। पाया गया कि पशुओं ने जिजुवा घास को अधिक पसंद किया।

“इस घास को लगाने से जो किसान बार-बार चारे की फसल लगाता है उसका जो खर्चा होता है वो खत्म हो जाता है। इस घास को अगर किसान एक बार बोता है तो पांच साल तक चारा मिल सकता है। मीठी होने के कारण पशु इसको ज्यादा खाते है।

आईवीआरआई ने फार्मर फर्स्ट प्रोगाम के अंतर्गत बरेली के अतरछेड़ी, निसोई और इस्माइलपुर समेत कई गाँव के किसानों को इस घास को दिया है। इससे पशुओं के दूध की गुणवत्ता भी अच्छी होती है।”ऐसा बताते हैं, बरेली स्थित आईवीआरआई के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. रणवीर सिंह।

डॉ सिंह आगे बताते हैं, “हमारा यही उद्देश्य है कि किसान के पास ऐसी चारे की फसल होनी चाहिए जो कम से कम खर्च में पूरे साल चारा दें, जो किसान इस घास को बोना चाहता हैं, वो जुलाई में इसकी रुट स्लिप बो सकता है, इसको साल भर पानी के निकास वाली जमीन में बोया जा सकता है।

जाड़ों के दिनों में(दिसंबर और जनवरी) इसकी बढ़वार कम होती है वरना बाकी दिनों में इसकी अच्छी फसल होती है। इस घास को किसान खेतों की मेड़ों पर और उचित पानी के निकास वाली उर्वर भूमि में लगा सकते है।

आईवीआरआई में जिज्वा घास के लिए संपर्क कर सकते है—

डॉ. रणवीर सिंह

0581-2303382

 

किसानों के फायदे के लिए महाराष्ट्र सरकार ने किया ये फैसला

 

महाराष्ट्र सरकार ने किसानों के फायदे के लिए दूध का खरीद मूल्य प्रति लीटर 3 रुपए बढ़ाने का फैसला किया है। खुदरा बिक्री मूल्य फिलहाल अपरिवर्तित रखे गए हैं।

राज्य के डेयरी विकास मंत्री महादेव जांकर ने कहा, ‘नई दरें 21 जून से लागू होंगी लेकिन खुदरा ग्राहकों के लिए दूध की दरों में कोई बदलाव नहीं होगा।’ उन्होंने कहा कि दूध के दाम को बढ़ाने का फैसला एक समिति की सिफारिश पर किया गया है।

राज्य सरकार ने दूध के खरीद दाम के संशोधन के लिए इस समिति का गठन किया था।

जांकर ने कहा, ‘नई दरों के मुताबिक डेयरियां अब गाय दूध 24 रुपए प्रति लीटर के बजाय 27 रुपए प्रति लीटर की दर से खरीदेंगी।

इसी तरह, भैंस का दूध अब 33 रुपए प्रति लीटर के बजाय 35 रुपए प्रति लीटर की दर से खरीदा जाएगा।’