अब राजस्थान में भी होने लगी सेब की खेती

राजस्थान में शेखावटी का मौसम सेब की खेती के अनुकूल नहीं है। यहां धूलभरी आंधियां, गर्मी में 45 डिग्री के पार पारा और सर्दियों में हाड़ कंपाकंपा देने वाली सर्दी। इन चुनौतियों के बाद भी यहां सेब उगाने का प्रयास किया जा रहा हैं।सब कुछ ठीक रहा तो इस बार सितम्बर में सीकर की सेब खाने को मिल सकती है।

हिमाचल और कश्मीर की मुख्य उपज सेब की राजस्थान के सीकर में खेती का नवाचार बेरी गांव के किसान हरमन सिंह कर रहे है। वे नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन से जुड़े हैं। सिंह बताते हैं कि राजस्थान की धरती पर सेब की खेती के प्रयास नए तो नहीं हैं, लेकिन सफलता नहीं मिल पाई।

अब तीन साल बाद यह सफलता मिलने की उम्मीद है। बेरी गांव से पहले सेब की खेती का प्रयास जयपुर के दुर्गापुरा में भी किया गया। वहां सौ पौधे लगाए गए थे, लेकिन वे नष्ट हो गए। इसी तरह सीकर के ही दो अन्य जगहों पर भी यह प्रयास किया गया, लेकिन उनमें अंकुर नहीं फूट पाया। फिर बेरी में यह प्रयास किया गया। बेरी में इसमें सफलता मिलती नजर आ रही है।

खेती फलने लगी है और सितंबर यहां सेब की फसल मिल जाएगी। इस सफलता को लेकर अधिकारी भी उत्साहित हैं। इस बारे में राज्य सरकार के उद्यानिकी मुख्यालय, जयपुर ने भी सीकर के अधिकारियों ने भी सूचना मांगी है।

सेब की खेती करने के लिए सबसे जरूरी थी उसे गर्मी से बचान, इसके लिए पौधों की टहनियों की कटिंग खास तरह से की गई, बिल्कुल उसी तरह जिस तरह अनार की अंब्रेला कटिंग की जाती है।

जैविक खाद का उपयोग किया गया। ड्रिप सिंचाई तकनीक को छह माह तक  अपनाया गया। जिसका परिणाम है कि हिमाचल और कश्मीर में बहुतायत में उगने वाली सेब रेगिस्तान में भी मिल सकेगी।

किसानों के फायदे के लिए महाराष्ट्र सरकार ने किया ये फैसला

 

महाराष्ट्र सरकार ने किसानों के फायदे के लिए दूध का खरीद मूल्य प्रति लीटर 3 रुपए बढ़ाने का फैसला किया है। खुदरा बिक्री मूल्य फिलहाल अपरिवर्तित रखे गए हैं।

राज्य के डेयरी विकास मंत्री महादेव जांकर ने कहा, ‘नई दरें 21 जून से लागू होंगी लेकिन खुदरा ग्राहकों के लिए दूध की दरों में कोई बदलाव नहीं होगा।’ उन्होंने कहा कि दूध के दाम को बढ़ाने का फैसला एक समिति की सिफारिश पर किया गया है।

राज्य सरकार ने दूध के खरीद दाम के संशोधन के लिए इस समिति का गठन किया था।

जांकर ने कहा, ‘नई दरों के मुताबिक डेयरियां अब गाय दूध 24 रुपए प्रति लीटर के बजाय 27 रुपए प्रति लीटर की दर से खरीदेंगी।

इसी तरह, भैंस का दूध अब 33 रुपए प्रति लीटर के बजाय 35 रुपए प्रति लीटर की दर से खरीदा जाएगा।’

किसानो के लिए खुशखबरी इतने रुपए बड़ा धान और बाकी फसलों का मूल्य

मोदी सरकार ने पिछले तीन वर्ष के दौरान दलहनों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में करीब 80 रुपए प्रति क्विंटल की वृद्धि की है लेकिन धान और मक्का की कीमतों में यह वृद्धि एक सौ रुपये क्ल की ही बढोतरी हो पायी है ।

कृषि मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार 2015-16 में अरहर का न्यूनतम समर्थन मूल्य 4625 रुपए प्रति क्विंटल था जिसमें 200 रुपए बोनस भी शामिल था । अरहर की खेती को बढावा देने के उद्देश्य से सरकार ने 2016-17 में 425 रुपए प्रति क्विंटल का बोनस घोषित किया जिससे इसका न्यूनतम समर्थन मूल्य 5050 रुपए प्रति क्विंटल पहुंच गया ।

इस बार अरहर का न्यूनतम समर्थन मूल्य 5250 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है और इस पर 200 रुपए का बोनस भी घोषित किया गया है जिससे इसका न्यूनतम समर्थन मूल्य बढकर 5450 रुपए हो गया है।

वर्ष 2015-16 में मूंग का न्यूनतम समर्थन मूल्य 4650 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया था और इस पर 200 रुपए का बोनस भी दिया गया था जिससे इसका कुल मूल्य 4850 रुपए प्रति क्विंटल हो गया था ।

अगले वर्ष इस पर बोनस की राशि 425 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित की गयी जिससे न्यूनतम समर्थन मूल्य 5225 रुपए प्रति क्विंटल हो गया था। चालू वित्त वर्ष के दौरान मूंग का न्यूनतम समर्थन मूल्य 5375 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है और इस पर 200 रुपए का बोनस दिया गया है जिससे इसकी कुल कीमत 5575 रुपए प्रति क्विंटल हो गई है ।

रोज 33 किसान कर रहे है ख़ुदकुशी और किसान से जुड़े कारोबारी कमा रहे है करोड़ों

अब खेती करना बहुत मुश्किल हो गया है। पिछले 15 साल से हर बार नुकसान हो जाता है, इसलिए लगातार कर्ज में हैं। हालात इतने खराब हैं कि 10 साल (2001-2011) में देश में 90 लाख किसान कम हो गए हैं और 3.8 करोड़ खेतिहर मजदूर बढ़ गए हैं। वहीं, किसानी और खेती से जुड़े कारोबार तेजी से बढ़ रहे हैं। किसान को भले ही फायदा न हो रहा हो, लेकिन इनके जरिए कमाई करने वालों का कारोबार अच्छा चल रहा है। देश में पंपसेट, स्प्रिंकलर, पाइप और केबल का सालाना बिजनेस करीब एक लाख करोड़ रुपए का है। हर साल एवरेज 12000 किसान कर रहे खुदकुशी…

– हर साल किसान की खेती करने की लागत 7-8 फीसदी बढ़ गई है। जबकि इस साल पिछले चार साल की तुलना में अनाज और दालों की कीमतें सबसे नीचे चल रही हैं। वहीं दूसरी ओर खेती संबंधी तमाम कामों से जुड़ी कंपनियाें का लाभ हर साल करोड़ों रुपए में आ रहा है।
– केंद्र सरकार की ओर से मई में सुप्रीम कोर्ट में दी जानकारी के मुताबिक 2013 से लगातार हर साल एवरेज 12 हजार से ज्यादा किसान खुदकुशी कर रहे हैं। यानी रोजाना करीब 33 किसान।

किसानों के भरोसे चल रहे इन काराेबार में खूब मुनाफा:

1. फर्टिलाइजर

– सिर्फ तीन बड़ी कंपनियों की कमाई 1200 करोड़ रुपए
– देश में किसानों की हालत भले ही खराब हो, लेकिन फर्टिलाइजर की सबसे बड़ी तीन कंपनियों को 2016-17 के दौरान 1255.23 करोड़ का फायदा हुआ था। यह पिछले साल की तुलना में 37.45 फीसदी ज्यादा था। यानी साल दर साल इनकी आमदनी तो बढ़ रही है। सरकार इन्हें सब्सिडी भी देती है। इस बजट में 70 हजार करोड़ सब्सिडी का प्रावधान है।

2. पंप

कंपनियां 125 करोड़ के लाभ में, किसानों को महंगा लोन
– देश की तीन प्रमुख पंप सेट्स बनाने वाली कंपनियों का शुद्ध लाभ 2016-17 में 125.29 करोड़ रुपए हुआ। पंपसेट, स्प्रिंकलर, पाइप और केबल का बाजार सालाना करीब एक लाख करोड़ रुपए का है। कृषि उपकरण और ट्रैक्टर जैसी चीजों के लिए लोन 12% की दर पर मिलता है, जबकि कार के लिए 10% से कम पर ब्याज पर मिल जाता है।

3. पेस्टीसाइड्स

टॉप कंपनियों काे हुआ 900 करोड़ मुनाफा, 22% ज्यादा
– इस क्षेत्र की टॉप तीन कंपनियों ने 2016-17 में 895.89 करोड़ रुपए का शुद्ध लाभ कमाया। पिछले साल के मुकाबले यह 22.8 फीसदी अधिक था। पिछले फाइनेंशियल ईयर में इन्हीं कंपनियों ने 729.46 करोड़ रुपए का शुद्ध मुनाफा कमाया था। 2014-15 में ही देश इसका कारोबार 28,600 करोड़ रु. पहुंच गया था। जो 7.5 फीसदी से हर साल बढ़ रहा है।

4. बीज

– प्रमुख कंपनियों को 85 करोड़ का फायदा, टैक्स में भी छूट
– देश की बीज तैयार करने वाली तीन बड़ी कंपनियों को 2015-16 में 85.47 करोड़ रुपए का मुनाफा हुआ है। ब्रांडेड बीज कारोबार हर साल करीब 10% की रफ्तार से बढ़ रहा है। बीज का कारोबार 35 हजार करोड़ रुपए पर पहुंच गया है। किसान की फसलें सस्ती बिकती हैं, लेकिन बीज महंगा होता जा रहा है। सरकार बीज कंपनियों को टैक्स में भारी छूट भी देती है।

5. ट्रैक्टर्स

इन्होंने ट्रैक्टर बेचकर कमाया किसानों से 5300 करोड़
– देश में ट्रैक्टर बनाने वाली प्रमुख तीन कंपनियों की 2016-17 में कुल आय करीब 5300 करोड़ रुपए रही। इससे पहले के साल में यह करीब 4500 करोड़ रुपए थी। कंपनियों की आय करीब 17 फीसदी बढ़ी। देश में हर माह 50 लाख ट्रैक्टर बिक रहे हैं। जीएसटी लागू होने के बाद किसानों को प्रति ट्रैैक्टर करीब 30 हजार रुपए और चुकाने पड़ सकते हैं। सीआईआई के मुताबिक 2016-17 के दौरान देश में कुल 6,61,195 ट्रैक्टर बिके। अप्रैल 2017 में 54217 ट्रैक्टर खरीदे गए।

कर्ज ही नहीं, इन वजहों से भी खेती से हाथ खड़े कर रहे हैं किसान

पिछले कुछ दिनों से मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के किसान अपनी फसलों के बेहतर मूल्य और कर्ज माफी के लिए विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। हालांकि कृषि उत्पादों पर कम मूल्य और कर्ज का बढ़ता बोझ ही उनकी मुख्य समस्याएं नहीं हैं। दरअसल कृषि के ढांचे में ही कुछ ऐसी समस्याएं हैं, जिनका कर्ज माफी जैसे अस्थाई उपायों से समाधान नहीं हो सकता। कृषि क्षेत्र की वर्तमान हालत पर नाबार्ड के पूर्व चेयरमैन प्रकाश बक्शी कहते हैं, ‘ऐसा लगता है कि यह अव्यवस्था हाल ही में हुई गड़बड़ियों की वजह से पैदा हुई है, लेकिन इस समस्या की जड़ें काफी गहरी हैं।’ जानें, क्या हैं खेती की समस्याएं और क्या हो सकते हैं उनके समाधान…

जोत छोटी होती गई और समस्या बढ़ती रही
पीढ़ी दर पीढ़ी खेती के विभाजित होने से खेतों का आकार घटता जा रहा है। खेतों का आकार छोटा होने से कृषि उत्पादन और फसलों से होने वाली बचत में कमी आ रही है। 1970-71 में 7 करोड़ किसानों के पास 16 करोड़ हेक्टेयर जमीन थी। इन किसानों में से 4.9 करोड़ किसान छोटे और सीमांत किसान थे, जिनके पास 2 हेक्टेयर तक की खेती थी। 2010-11 में किसानों की संख्या लगभग दोगुनी होकर 13.8 करोड़ तक पहुंच गई, जबकि छोटे और सीमांत किसानों की संख्या भारी उछाल के साथ 17.7 करोड़ हो गई। इन आंकड़ो से खेतों के विभाजन की दर को आसानी से समझा जा सकता है। इस दर के साथ 2040 तक भूस्वामियों की संख्या 18.6 करोड़ हो जाएगी।

छोटे खेत क्यों हैं घाटे का सौदा?
छोटे खेत वाले किसानों के पास खेती के पर्याप्त साधन, सिंचाई की व्यवस्था आदि का अभाव होता है और इस सब के लिए उन्हें बड़े किसानों पर निर्भर रहना पड़ता है। वहीं, बड़े किसानों की संख्या भी समय के साथ घट रही है। ऐसे में छोटे किसानों के लिए खेती के साधन जुटाना बेहद मुश्किल होता जा रहा है। इसके अलावा क्रय-विक्रय में छोटे किसानों की मोलभाव क्षमता भी कम होती है। ऐसे में जैसे-जैसे खेतों का आकार छोटा होता जा रहा है, किसानों को होने वाला फायदा भी कम होता जा रहा है। हर 5 साल में कृषि क्षेत्र में 1 करोड़ छोटे किसान जुड़ रहे हैं। अगर यह दर बरकरार रही तो आने वाले समय में कृषि क्षेत्र के हालात बेकाबू हो सकते हैं।

लैंड लीज पॉलिसी बदलना जरूरी

यदि सरकार ऐग्रिकल्चर लैंड लीज पॉलिसी में सुधार करती है और जमीन के मालिकाना हक से जुड़े कानून को बदलती है तो छोटे किसान लंबे समय तक अपनी जमीन को बटाई या फिर लीड पर दे सकेंगे। फिलहाल इस नियम के चलते छोटे किसान जमीन का मालिकाना हक गंवाने के डर से खेती लीज पर नहीं देते। यदि लैंड को लीज पर देना वैध हो जाए तो छोटे किसान अपनी जमीन पर खेती के प्रति आकर्षित होंगे।

किसानों के लिए विकल्पों की तलाश जरूरी
खेती अकेले किसानों और ग्रामीण मजदूरों को रोजगार नहीं दे सकती है। सरकार को खेती से जुड़े लोगों को दूसरे व्यवसायों में अवसर देने के उपाय करने होंगे। ऐसे लोगों में वैकल्पिक स्किल्स पैदा करने और रोजगार के अवसर मुहैया कराने होंगे। यही नहीं ऐसे लोगों को अस्थायी रोजगार देने पर भी फोकस करना होगा।

जीएसटी बिल से इतने रुपए बढ़ जायगी ट्रेक्टर की कीमत

पूरे देश में जहां एक ओर किसान कर्ज माफी को लेकर आंदोलन कर रहे हैं दूसरी ओर उनके ऊपर एक और आफत आने जा रही है। यह नई आफत है जीएसटी की मार। जीएसटी के चलते ट्रैक्टर के इनपुट कास्ट में 25 हजार रुपये की बढ़ोत्तरी होने जा रही है।वस्तु एवं सेवाकर (जीएसटी) के प्रभाव से किसान भी अछूते नहीं रहेंगे। आधुनिक खेती में अहम बन चुके ट्रैक्टर पार्टस भी महंगे हो जाएंगे। इसके चलते अब किसानों को ट्रैक्टर खरीदना महंगा पड़ेगा।

ट्रैक्टर पर पहले कोई ड्यूटी नहीं लगती थी इसे अब 12 फीसदी के दायरे में रखा गया है। वहीं एसोसिएशन की मांग है कि कंपोनेंट ड्यूटी को 28 फीसदी की जगह रखा जाए। ऐसा करने से ट्रैक्टर पर पड़ने जा रहे 25 हजार रुपये के बोझ से बचा जा सकेगा। किसानों की कर्ज माफी आंदोलन के बाद यह बड़ा मुद्दा हो सकता है।

हाल ही में 66 आइटम पर जीएसटी के रेट रिलीज किए गए हैं जो कि 18 फीसदी के दायरे में आएंगे। इसके लागू करने में 28 फीसदी की इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर और 18 फीसदी का आउटपुट वास्तव में राहत कम दे रहा बल्कि मुसीबत ज्यादा ला रहा है।

इसके चलते प्रति ट्रैक्टर को बनाने में कीमत 25 हजार रुपये तक बढ़ जाएगा। जिसके वजह से ट्रैक्टर इंडस्‍ट्री पर 1600 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार आएगा। यह जानकारी ट्रैक्टर मैन्यूफैक्चरर एसोसिएशन के द्वारा एक रिलीज के जरिए जारी की गई है।

एसोसिएशन के मुताबिक कई कृषि संबंधी उपकरणों पर राहत है लेकिन ट्रैक्टर के अधिकतर पुर्जों जैसे की इंजन ट्रांसमिशन व अन्‍य उपकरण जीएसटी के 28 फीसदी के दायरे में आते हैं जिसके वजह से ट्रैक्टर की कीमत में बढ़ोत्तरी होनी तय है।

एसोसिएशन ने इसके तहत मांग की है कि ट्रैक्टर में प्रयोग होने वाले हर उपकरण को जीसएटी के 18 फीसदी के दायरे में ही रखा जाना चाहिए। क्योंकि सिर्फ एप्लीकेशन को टैक्स के कम स्लैब में रखकर किसानों को मदद नहीं की जा सकती।

 

आ गया बर्षा पंप, अब सिंचाई के लिए न बिजली की जरूरत और न ही ईंधन की

खेती के लिए सबसे ज्यादा जरूरी क्या है ? आप कुछ देर के लिए सोचेंगे और कहेंगे सिंचाई की सुविधा, क्योंकि इसके बिना सारी तैयारियां अधूरी रह जाती है। और अगर हम आपको कहें कि सिंचाई के लिए हमारे पास एक ऐसा वाटर पंप है जो बिना बिजली और किसी ईंधन के ही चलती है तो क्या कहेंगे?

आज हम इसी खास तकनीक के बारे में बात करने जा रहे हैं जिसका विकास नीदरलैंड में हुआ है और जो हमारे पड़ोसी देश नेपाल में सफलतापूर्वक काम कर रहा है। इस तरह की तकनीक भारत के लिए भी वरदान साबित हो सकती है जहां आज भी चौबीस घंटे बिजली की बात तो छोड़ दीजिए कई जगहों पर तो बिजली पहुंचती भी नहीं है। ऐसे इलाकों के लिए यह तकनीक कृषि के लिए किसी वरदान से कम नहीं होगी। यह वाटर पंप जिस तकनीक पर काम करता है उसके लिए भारत की परिस्थिति बिल्कुल सही जगह है। तो चलिए अब विस्तार से इस खास तकनीक से लैस पंप के लिए बात करते हैं।

 

बर्षा पंप से किसानों के खेतों में होगी वर्षा

हाल में नीदरलैंड के शोधकर्ताओं ने खेतों में सिंचाई को बेहद आसान बनाने के लिए एक नया सिंचाई पंप विकसित किया है। यह एक ऐसा बर्षा पंप है, जिसके लिए किसानों को बिजली या ईंधन का खर्च भी नहीं उठाना पड़ेगा।

बस किसानों को इस पंप को नहर या नदी में रखना होगा और इसके सहारे किसान आसानी से अपने आस-पास के खेतों में सिंचाई कर सकेंगे। किसानों के लिए यह एक तरह का बिल्कुल नया उपकरण है, जिसके इस्तेमाल से किसानों को सिंचाई संबंधी एक बड़ी समस्या दूर हो सकेगी।

किसानों के लिए सिंचाई बड़ी समस्या

अपने खेतों में सिंचाई के लिए किसानों को बड़ी मुश्किल उठानी पड़ती है। एक तरफ जहां कुछ किसान आस-पास की नदियों, नालों या नहर में सिंचाई पाइप लगाकर डीजल पंप के जरिये अपने खेतों की सिंचाई करते देखे जा सकते हैं, वहीं दूसरी ओर किसान अन्य जटिल तरीकों से खेतों से सिंचाई की व्यवस्था करते हैं, ताकि अपने खेतों में सही स्थिति और समय पर रोपाई कर सकें।

असल में बर्षा पंप का निर्माण नीदरलैंड की कंपनी क्यूस्टा ने किया है। इस बर्षा पंप के लिए यूरोपीय संस्था क्लाईमेट केवाईसी की ओर से यूरोप की इस साल की सबसे बड़ी तकनीकि खोज का अवॉर्ड दिया गया है।

शोधकर्ताओं की मानें तो यह एक तरह का बिल्कुल नया उपकरण है और विकासशील देशों में यह तकनीक बहुत कारगार साबित होगी। चूंकि पहला बर्षा पंप इस साल नेपाल में लगाया गया है और नेपाल में बारिश को बर्षा कहा जाता है। इसलिए इस पंप का नाम बर्षा रखा गया है।

ऐसे चलता है बर्षा पंप

असल में यह पंप पानी की लहरों से चलता है। लहरों से टकराकर बर्षा पंप का एक बड़ा सा पहिया घूमता है और इससे वायु का दबाव बनता है। इस वायु के दबाव की वजह से ही पानी को एक नली के जरिये किसानों के खेतों तक पहुंचा देता है।

ऐसे में नदी, नहर या नालों में पानी की लहर की गति ही इस पंप के लिए कारगार होती है और जितनी तेज पानी की रफ्तार होगी, उतनी दूर तक किसानों के खेत तक पानी पहुंच सकेगा। सबसे बड़ी बात यह है कि प्रदूषण न फैलाने की वजह से यह बर्षा पंप पर्यावरण के भी अनुकूल है। अब एशिया में ही नहीं, बल्कि लैटिन अमेरिका और अफ्रीका में इस बर्षा पंप के निर्माण की तैयारी शुरू की जा रही है।

शोधकर्ताओं की मानें तो इस बर्षा पंप के जरिए फसल का उत्पादन 5 गुना तक बढ़ाया जा सकता है। यह पंप एक लीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से पानी छोड़ता है। पानी की रफ्तार अच्छी होने पर इस पंप के जरिये 82 फीट की ऊंचाई तक भी पानी को पहुंचाया जा सकेगा। सबसे अच्छी बात यह है कि एक साल में ही इस पंप की पूरी लागत वसूल हो जाएगी।

मोदी सरकार की तरफ से किसानो को बहुत बड़ी राहत

किसानों का कर्ज़ माफ करने के लिए मोदी सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है। मोदी सरकार ने किसानों को राहत देते हुए कहा है कि अब किसानों को सिर्फ 4 फीसदी की दर से कर्ज मिलेगा।

इस प्रस्ताव की मंजूरी आज दिल्ली में हुई कैबिनेट मीटिंग में मिला। सरकार ने किसानों को राहत देते हुए इसके लिए 19 हजार करोड़ रुपए का बजट भी निर्धारित किया है।

किसानों को मौजूदा समय में 9 प्रतिशत की ब्याज दर पर कर्ज मिलता था अब छोटे कर्जों पर यानी 3 लाख तक के कर्जों पर किसानों को 4 प्रतिशत के ब्याज दर पर कर्ज मिलेगा और कर्ज पर 5 प्रतिशत ब्याज का भुगतान सरकार चुकाएगी। सरकार अधिकतम 3 लाख रूपए तक के कर्ज़ 5 प्रतिशत की छूट मिलेगी।

स्वामिनाथन आयोग ने सिफारिश की थी कि किसानों को उनकी फ़सलों के दाम उसकी लागत में कम से कम 50 प्रतिशत जोड़ के दिया जाना चाहिए और ऐसे समय पर केन्द्र सरकार के इस फैसले के बाद लगता है कि किसान स्वामिनाथन रिपोर्ट को ध्यान में ले रही है।

मौजूदा समय में देश के कई प्रदेशों में किसान कर्ज़माफी को लेकर आंदोलन कर रहें हैं। ऐसे में ये खबर किसानों के लिए बड़ी राहत है।बता दें कि जिन राज्यों में सरकार ने कर्ज माफ किया है उन राज्यों की सरकार के ऊपर पहले से ही कर्ज है चाहे वो महाराष्ट्र हो या पंजाब।

ऐसे में ये तो साफ है कि किसानों की कर्जमाफी सरकार के साथ-साथ आम आदमी की भी जेब पर भारी पड़ेगी। देखना ये है कि इससे देश की अर्थव्यवस्था और महंगाई पर क्या असर पड़ेगा।

कमाई में चपरासी से भी पीछे हैं देश के किसान

देश का किसान हमारे लिए अन्न, फल और सब्जियां उगाता है इसके बावजूद देश का किसान सरकार और बैंकों के सामने कर्ज के लिए हाथ फैलाने को मजबूर है. देश के ज्यादातर किसान कमाई के मामले में सरकारी चपरासी से भी पीछे हैं. आज बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने कहा कि देश में किसान की आमदनी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से भी कम है.


किसान की आय पर क्या है जमीनी हकीकत?

किसान जगदीश ठाकुर  के पास 60 बीघा खेत है जिसमें आलू, सोयाबीन और प्याज की खेती होती है. जमीन के हिसाब से जगदीश ठाकुर बड़े किसानों की श्रेणी में आते हैं. अगर आपको लग रहा है कि बड़े किसान होने की वजह से जगदीश की जिंदगी आराम से कट रही होगी तो ऐसा नहीं है.

जगदीश ठाकुर ने बताया, ”पिछले साल बहुत नुकसान हुआ, फसल के दाम तक नहीं मिल पाए. फसल निकालने के बाद आलू का दाम नहीं मिला. आलू के बाद प्याज लगाया प्याज अब फेंक रहे हैं. एक कट्टे में 60-70 किलो प्याज आता है, 600-700 कट्टे प्याज के फेंकना पड़ा.”

बड़े किसान होने के बावजूद जगदीश ठाकुर बैंक और साहूकारों के कर्ज के बोझ तले दबे हैं. उनकी महीने की कोई फिक्स इनकम नहीं है. जबकि उसी गांव के तिलक पाटीदार प्राइवेट नौकरी करते हैं. महीने में 15 हजार रुपये तक कमा लेते हैं. तिलक के पिता किसान हैं लेकिन वो घटती कमाई की वजह से खेती नहीं करना चाहते हैं.

किसानों की और नौकरीपेशा की आय पर क्या कहते हैं आंकड़े

देश में किसानों और नौकरीपेशा के बीच आमदनी का अंतर इतना ज्यादा है कि अब युवा धीरे-धीरे खेती से दूर हो रहे हैं. 2016 के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक देश के 17 राज्यों के किसानों की सालाना औसत कमाई 20 हजार रुपये है. यानी महीने में 1700 रुपये से भी कम. जबकि ग्रुप डी के एक कर्मचारी की महीने की औसत कमाई करीब 24 हजार रुपये है.

वहीं सरकारी कर्मचारियों का वेतन हर साल बढ़ता है और हर 10 साल बाद नया वेतनमान लागू होता है जबकि किसानों की आमदनी इतनी रफ्तार से नहीं बढ़ती. उल्टा अगर प्रकृति ने निगाहें तिरछी कर ली किसानों को जेब से ही नुकसान उठाना पड़ जाता है.

1970 से 2015 के बीच गेहूं का खरीद मूल्य सिर्फ 19 गुना बढ़ा है. जबकि इसी दौरान सरकारी कर्मचारी का वेतन 150 गुना तक बढ़ गया है. कॉलेज के प्रोफेसर का वेतन 170 गुना और स्कूल शिक्षक का वेतन 320 गुना तक बढ़ गया. प्रधानमंत्री मोदी साल 2022 तक किसानों की आमदनी बढ़ाकर दोगुना करना चाहते हैं लेकिन किसानों की कमाई के हालात देखकर ऐसा दूर-दूर तक मुमकिन नहीं लगता.

 

समर्थन मूल्य के नीचे कृषि उत्पादों की खरीद मानी जाएगी अपराध

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किसानों के समर्थन में शुरू किया उपवास 28 घंटों बाद खत्म कर दिया। इस दौरान सीएम ने ऐलान किया कि केन्द्र द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के नीचे कृषि उत्पादों की खरीद को मध्यप्रदेश में आपराधिक कृत्य माना जाएगा।

इस दौरान सीएम ने यह भी घोषणा की कि खेती जमीन किसान की सहमति के बिना अधिग्रहित नहीं की जाएगी। पिछले कई दिनों से किसानों के आंदोलन का सामना कर रहे शिवराज सिंह चौहान ने 28 घंटे बाद रविवार को नारियल पानी पीकर अपना उपवास खत्म किया। सीएम ने कहा कि उन्होंने 2002 में सब्मिट की गई स्वामीनाथन कमिटी की रिपोर्ट पढ़ी, इसके आधार पर वह कई फैसले लेंगे। राज्य सरकार सभी म्यूनिसिपल इलाकों में ‘किसान बाजार’ खोलेगी। इसके अलावा दूध खरीदने के लिए अमूल डेयरी कॉपरेटिव्स की प्रणाली अपनाएगी।

उन्होंने ऐलान किया कि खसरा की कॉपी किसान को उसके घर पर पहुंचाई जाएगी। सीएम ने कहा, ‘किसानों को अब खसरा की कॉपी के लिए अधिकारियों और दफ्तरों के चक्कर नहीं काटने होंगे।’ अपना उपवास खत्म करने के बाद चौहान ने कहा कि वह एसी कमरों में बैठने वाले सीएम नहीं हैं।

उन्होंने कहा, ‘जब-जब किसानों पर संकट आया, मैं मंत्रालय, सीएम हाउस से निकलकर खेतों तक गया।’ सीएम ने अपने संबोधन में भारतीय किसान संघ जैसे संगठनों को साथ देने के लिए शुक्रिया भी कहा। गौरतलब है कि एमपी में किसान आंदोलन के शुरुआती दिनों में सीएम से आश्वासन मिलने के बाद भारतीय किसान यूनियन ने अपना आंदोलन वापस ले लिया था।

मध्यप्रदेश के सीएम ने एक बार फिर मध्य प्रदेश में हिंसक प्रदर्शन करने वालों को अराजक तत्व कहा। शिवराज सिंह ने कहा कि कोई भी किसान दूध नहीं फेंक सकता। दूध फेंकने का काम अराजक तत्वों का है। उन्होंने मंदसौर घटना की उच्चस्तरीय जांच करा दोषियों पर कार्रवाई की बात कही, साथ ही कहा कि निर्दोष किसानों को चिंता करने की जरूरत नहीं है।