जाने क्या है स्वामीनाथन रिपोर्ट और किसानो को इसका क्या लाभ होगा

किसानों की मांग है कि कृषि पर स्वामीनाथन कमीशन की सिफारिशों को लागू किया जाए। साल 2014 की स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को लागू करने का बीजेपी ने वादा किया था।

लेकिन एक आरटीआई के जवाब में केंद्र ने कहा कि  लागत मूल्य पर 50 फीसदी बढ़ोतरी से मंडी में दिक्कतें आ सकती है। लिहाजा इसे लागू करना अभी संभव नहीं है।

क्यों बना था स्वामीनाथन आयोग ?

अन्न की आपूर्ति को भरोसेमंद बनाने और किसानों की आर्थिक हालत को बेहतर करने, इन दो मकसदों को लेकर 2004 में केंद्र सरकार ने एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में नेशनल कमीशन ऑन फार्मर्स का गठन किया। इस आयोग ने अपनी पांच रिपोर्टें सौंपी। अंतिम व पांचवीं रिपोर्ट 4 अक्तूबर, 2006 में सौंपी गयी।

अयोग की सिफारिशों

अयोग की सिफारिशों में किसान आत्महत्या की समस्या के समाधान, राज्य स्तरीय किसान कमीशन बनाने, सेहत सुविधाएं बढ़ाने व वित्त-बीमा की स्थिति पुख्ता बनाने पर भी विशेष जोर दिया गया है। एमएसपी औसत लागत से 50 फीसदी ज्यादा रखने की सिफारिश भी की गई है ताकि छोटे किसान भी मुकाबले में आएं । मतलब की लागत का 50 फीसदी जोड़ कर एमएसपी रखना होगा ।

लागत से 50 फीसदी ज्यादा का मतलब यह होगा जैसे धान का समर्थन मूल्य अभी 1450 रु प्रति क्विंटल है और आपका इस पर लागत आती है 1300 रु तो अगर हम इसका 50 फीसदी जोड़े तो समर्थन मूल्य बनता है 1950 रु जो अब के समर्थन मूल्य से 650 रु ज्यादा होगा ।

इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि सस्ती दरों पर क्रॉप लोन मिले यानि ब्याज़ दर सीधे 4 प्रतिशत कम कर दी जाए। कर्ज उगाही में नरमी यानि जब तक किसान कर्ज़ चुकाने की स्थिति में न आ जाए तब तक उससे कर्ज़ न बसूला जाए।

उन्हें प्राकृतिक आपदाओं में बचाने के लिए कृषि राहत फंड बनाया जाए।और किसानो को फसल बीमा भी देना जरूरी होगा साथ ही आयोग ने कहा था कि किसानों के स्वास्थय को लेकर खास ध्यान देने की जरूरत है. इससे उनकी आत्महत्याओं में कमी आएगी.

इतने रुपया बढ़ सकता है खरीफ फसलों के समर्थन मूल्य

केंद्र सरकार जल्द ही खरीफ फसलों के समर्थन मूल्य का एलान कर सकती है। सूत्रों के मुताबिक चौदह फसलों का एम.एस.पी. बढ़ाने को लेकर मंजूरी मिल चुकी है।

लेकिन अगर किसानो की मांगो के हिसाब से देखा जाये तो लगता है ये समर्थन मूल्य बहुत कम है । ऐसे में किसानो का गुस्सा और बढ़ सकता है इस लिए  हो सकता है अब तक इस फैंसले को गुप्त रखा गया हो ।

खरीफ फसलों के समर्थन मूल्य का एलान कभी भी हो सकता है जिसमें कपास के एम.एस.पी. में 160 रुपए प्रति क्विंटल की बढ़त हो सकती है।इस बार फिर दालों की एम.एस.पी. में 400 रुपए क्विंटल के भारी बढ़त की संभावना है। साथ ही धान के एम.एस.पी. को 80 रुपए बढ़ाकर 1560-1590 रुपए करने की तैयारी है।

जबकि मध्यप्रदेश में खेती होने वाले सोयाबीन की एम.एस.पी. को करीब 6.5 फीसदी बढ़ाकर 2900 रुपए करने की तैयारी है

जाने कैसे सरकार की यूरिया सबसिडी बचाने की योजना से किसानो को होगा नुकसान

सरकार ने यूरिया की खपत में कटौती का एक नया रास्ता ढूंढा है, जो वार्षिक 6000-7000 करोड़ रुपए की सबसिडी को बचाने में मदद कर सकता है। अगले 6 महीनों में सभी यूरिया बैग 50 की बजाय 45 किलो में उपलब्ध होंगे।

उर्वरक मंत्रालय का मानना है कि इसके परिणामस्वरूप किसान अगर 2 बैग यूरिया जिसका वजन 90 किलो होगा, का प्रयोग करेंगे। इससे उपभोग के पैटर्न में एक महत्वपूर्ण बदलाव आएगा और महंगी यूरिया आयात में तेज गिरावट आएगी। सरकार ने 2017-18 में यूरिया आयात के लिए 14,000 करोड़ रुपए अलग रखे हैं।

इसका किसानो को नुकसान यह हो सकता है जैसे किसी किसान को अपने खेत के लिए 100 किल्लो यूरिया चाहिए होती थी अब उसे 2 की जगह 3 बैग यूरिया की जरूरत पड़ेगी लेकिन तीसरा बैग सबसिडी के बिना पुरे मूल्य पर ही मिलेगा जिस से किसानो को काफी नुकसान हो सकता है ।

सरकार ने चालू वित्त वर्ष में उर्वरक सबसिडी के लिए 70,000 करोड़ रुपए का बजट दिया है और खजाने पर भारी बोझ को कम करने के लिए कई समाधान मांगे हैं। सूत्रों ने बताया कि कृषि मंत्रालय द्वारा किए गए विश्लेषण में यह संकेत दिया गया है कि यूरिया का उपयोग प्रति एकड़ 4-6 प्रतिशत तक कम हो गया है।

अधिकारियों ने कहा कि यूरिया खपत में कुल कमी मिट्टी पोषक तत्व की 100 प्रतिशत नीम कोटिंग के कारण हो सकती है। एक अधिकारी ने कहा, ‘‘एक निर्णय ने औद्योगिक गतिविधियों के लिए अत्यधिक सबसिडी वाले यूरिया का उतार-चढ़ाव बंद कर दिया है।’’ यद्यपि भारत ने 2016-17 में 24.2 मिलियन टन यूरिया का उत्पादन किया था लेकिन घरेलू मांग को पूरा करने के लिए उसे 8 मिलियन टन आयात करना पड़ा था।

सरकार ने 2022 तक उत्पादन बढ़ाने के लिए बंद यूरिया निर्माण संयंत्रों को पुनर्जीवित करने के लिए काम शुरू कर दिया है ताकि उर्वरक आयात करने की कोई आवश्यकता न पड़े।

इन तीन राज्यो में फैला किसान आंदोलन, लोग दोगुने दाम पे खरीद रहे है दूध और सब्जी

अहमदनगर के पुंटांबा गांव से शुरू हुआ 200 किसानों का छोटा सा आंदोलन महाराष्ट्र के साथ-साथ मध्यप्रदेश और गुजरात में भी जोर पकड़ने लगा है। मालवा और निमाड़ क्षेत्र में हड़ताल के दूसरे दिन शुक्रवार को दूध और सब्जी की किल्लत हो गई। शहरों में बंदी का दूध बंटना भी बंद है, क्योंकि गांवों से दूध यहां पहुंच ही नहीं पा रहा है। किसानों को सब्जी उत्पादक और दूध विक्रेताओं का भी साथ मिल गया है।

उधर उज्जैन सब्जी मंडी में पुलिए के साए में सब्जियों की बिक्री हुई। लोगों को दो गुना दाम पर सब्जी और दूध खरीदना पड़ी। किसानों के हंगामें के बाद पुलिस ने यह व्यवस्था की थी। भोपाल में दूध विक्रेताओं ने हड़ताल का समर्थन नहीं किया, राजधानी में सभी स्थानों दूध मिला।

फसलों और दूध के उचित दाम दिलाने की मांग को लेकर हड़ताल के पहले दिन अंचल में गुरुवार को किसानों का गुस्सा फूट पड़ा। जगह-जगह सब्जी और उपज लाने से लोगों को रोका गया। सड़कों पर दूध बहा दिया गया। शाजापुर में किसानों ने एबी रोड पर आलू-प्याज फेंक जाम लगा दिया। पुलिस पर पथराव भी किया, इससे एसडीओपी सहित 8 पुलिसकर्मियों को चोटें आई हैं।

कर्जमुक्ति की प्रमुख मांग को लेकर आंदोलन कर रहे किसान आंदोलन में जारी हिंसा को देखते हुए प्रशासन ने अलग-अलग इलाकों में धारा 144 लागू की. ये इलाके नासिक और अहमदनगर जिले में प्रमुखता से हैं।

नासिक में कुछ किसानों को हिरासत में भी लिया गया है । गुरुवार को शुरू हुआ आंदोलन अब विदर्भ में भी फैलता दिख रहा है। कई हिस्सों में किसानों ने कृषि उत्पादों को सड़क पर फेंक दिया. बुलडाणा में किसानों ने दूध से होली खेली. यह दूध डेयरी को जाना था।

आंदोलनकारियों ने गुरुवार को प्रमुखता से यह कोशिश की कि मुम्बई, पुणे को होने वाली कृषि उत्पाद की आपूर्ति रोक दी जाए, जिसका असर शुक्रवार को दिख रहा है. एशिया की सबसे बड़ी नवी मुंबई मंडी में केवल 146 गाड़ियां सब्जी-फल ले कर पहुंची हैं, जबकि पुणे में दूध संकलन 50 फीसदी घट गया है।

इस बीच, सामाजिक कार्यकर्ता अण्णा हजारे ने किसानों के आंदोलन का समर्थन करते हुए सरकार से मध्यस्थता का प्रस्ताव रखा है, जबकि राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस कह चुके हैं कि सरकार किसानों से बात करने के लिए तैयार है. मुख्यमंत्री का आरोप है कि विपक्ष किसान आंदोलन को हिंसक बना रहा है.

 

 

जीएसटी टेक्स लागू होने से इतने रुपए बढ़ सकते है यूरिया के दाम

देश में गुड्स एंड सर्विस टैक्स यानी जीएसटी एक जुलाई से लागू हो रहा है । जैसे बाकी उद्योगों पर इसका असर पड़ेगा वैसे ही खेती पर इसका असर पड़ेगा ।

लेकिन अफ़सोस की बात है के जीएसटी पास होने के बाद सबसे पहले उर्वरकों पर लगने वाली टेक्स बढ़ जायगी जिस से सभी जरूरी उर्वरकों की कीमत भी काफी बढ़ जायगी ।अब सोचने की बात यह है के पहले से मंदी की मार झेल रहा किसान अब ये नए खर्चे कैसे झेल पाएगा

जीएसटी काउंसिल ने जीएसटी व्यवस्था में उर्वरकों पर लगने वाली टैक्स दर 12% तय की है जबकि अभी ये 4% से 8% टैक्स दायरे में आते हैं।

माना जा रहा है कि इससे सामान्य तौर पर इस्तेमाल होने वाले उर्वरकों और माइक्रोन्यूट्रिएंट्स के दाम बढ़ जाएंगे। बतौर रिपोर्ट्स, यूरिया के दाम प्रति टन ₹300-₹400 तक बढ़ सकते हैं।

अब किसान भी करेंगे हड़ताल ! एक जून से शुरू होगा महाराष्ट्र के किसानो का हड़ताल

महाराष्ट्र के विभिन्न किसान संगठनों की समन्वयन समिति किसान क्रांति ने आज कहा कि अपनी समस्याओं की ओर राज्य सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए वह एक जून से राज्य-व्यापी किसान हड़ताल पर अटल है।

किसानो ने कहा के अब वो सिर्फ अपने लिए ही फसल बोयेंगे। शहर में दूध,सब्ज़ी,फल बेचना बांध, मंडियों में जाना बंध ।किसानो की मुख्या मांगे है स्वामीनाथन रिपोर्ट लागु करना , किसानों का कर्ज़ा माफ़ करना, नि:शुल्क बिजली आपूर्ति की मांग हर फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करना और फसल को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ही उठाना इत्यादि

किसान क्रांति के प्रवक्ता धनंजय धोरडे ने पीटीआई से कहा, अहमदनगर जिले से पुंताम्बा में किसानों के 200 से ज्यादा प्रतिनिधि एकत्र हुए और प्रदर्शन जारी रखने का फैसला लिया।

धोरडे ने कहा, पहले ही अहमदनगर, नासिक और औरंगाबाद जिले के 40 गांवों के विभिन्न ग्राम पंचायतों से समर्थन जुटा रहे 2000 से अधिक किसानों ने घोषणा कर दी है कि 31 मई तक उनकी मांगे नहीं माने जाने पर वह अपने उत्पाद बाजार में नहीं बेचेंगे।

आज की बैठक में शामिल हुए एक किसान कार्यकर्ता का दावा है कि मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस अहमदनगर में भाजपा से जुड़े कुछ किसानों को मंत्रालय में बैठक के लिए बुलाकर किसान समुदाय को बांट रहे हैं।

कार्यकर्ता ने कहा, मुख्यमंत्री ने हाल ही में भाजपा से जुड़े कुछ किसानों के साथ मंत्रालय में बैठक की थी, जिसके बाद उन्होंने प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन वापस लेने की घोषणा की थी।उन्होंने कहा, यह उन किसानों के बीच फूट डालने का प्रयास है जो दूध और सब्जी सहित अपने उत्पाद शहरी बाजार में नहीं बेचने पर अटल हैं।

धोरडे ने कहा, हड़ताल के दौरान बाजार में कोई कृषि उत्पाद नहीं बेचा जाएगा और नाहीं किसी नये फसल की बुआई होगी।

फसलों से दीमक के सफाए के लिए करें इन देसी तरीकों का प्रयोग

सबसे अधिक कृषि फसलों का नुकसान दीमक करती है। इसे नष्ट करने के लिए किसान कीटनाशक और खतरनाक रसायनों का प्रयोग करते हैं। बावजूद इसके दीपक पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हो पाता। दीमक अपना प्रकोप जमीन के अंदर से ही शुरू कर देती है।

फसल तैयार होने तक दीमक उसका पीछा नहीं छोड़ती। फसल तैयार होते ही दीपक उसे चट कर जाती है। पौधा सूखकर नष्ट हो जाता है। जहरीले कृषि रसायन भी दीमक पर प्रभावी असर नहीं दिखा पाते हैं। लेकिन निचे लिखे हुए देसी जुगाड़ से हम अपने खेतों को पूरी तरह से दीमक मुकत कर सकते है ।

खेत में सूखी लकड़ी गाडकर

फसलों को दीमक से बचाने के लिए सफेदे, यूकलिप्टस या अन्य सूखी लकड़ी के दो फुट लम्बे दो इंच मोटे टुकडों को फसल के बीच में जगह-जगह रखने पर फसल को दीमक नहीं लगती है।

सफेदे की लकड़ी को दीमक ज्यादा लगती हैं इसलिए विभिन्न स्थानों पर रखे इस लकड़ी के टुकडों में दीमक लग जाने से फसल बच जाती है।

सफेदे के टुकडे़ खरीदने के लिए एक बार करीब तीन सौ रूपये खर्च होते हैं जो तीन फसलों तक काम आते है।कृषि विज्ञानियों ने भी वर्षों तक प्रयोग करने के बाद दीमक से बचाव का यह प्रभावी उपाय माना हैं।

भुट्टे की गिण्डयों से दीमक प्रबन्धन

आवश्यक सामग्री: मक्का भुट्टे की गिण्डयां (8-10) मिट्टी का घड़ा (मटका) , सूती कपड़ा

विधि:मक्का के भुट्टे से दाने निकलने के बाद जो गिण्डयां बचती हैं, उन्हें (8-10) गिण्ड़ी एक मिट्टी से निर्मित घडे़ में एकत्रित कर लें। इस घड़े को खेत में इस प्रकार गाड़े कि घड़े का मुंह जमीन से एक इंच ऊपर निकलें।घडे के मुंह पर छिद्रदार सूती कपड़ा बांधें।

कुछ दिनों में ही आप देखेंगें कि घड़े में दीमक भर गयी हैं। इसके बाद घडे़ को बाहर निकालकर गरम करेंताकि दीमक मर जाये।इस प्रकार के घड़े को खेत में 100-100 मीटर की दूरी पर गाढ़ दें तथा करीब 3-4 बार गिण्डिया बदलकर यह क्रिया दोहराने से खेत की पूरी दीमक समाप्त हो जायेगी।

ये फार्मूले भी है कारगर

जिन खेतों में दीमक की अधिक समस्या होती है वहां बुवाई के पूर्व 2 लीटर देशी गाय के मठ्ठे में चने के दाने के बराबर 6 हींग के टुकडे़ पीसकर घोलने के बाद, उस घोल को ठीक तरह से पूरे खेत पर छिड़ककर दो घंटे के बाद बुवाई करनी चाहिए।

मिट्टी का तेल या केरोसिन तेल से बीजों का उपचार करके बुवाई में प्रयोग करें। यह शत् प्रतिशत सफल प्रयोग है। इस विधि से फसल काटने तक दीमक का प्रकोप नहीं होगा। जले हुये आॅयल से बीजोपचार करने से भी दीमक के प्रकोप से बचा जा सकता है।

मिट्टी का तसला लें, जिसमें ताजा गोबर भरकर खेत के बीचों बीच जमीन के लेबल में शाम के समय गाड़ दें। गोबर दीमक का प्रिय भोजन होता है, खेत की सभी दीमक गोबर खाने तसले में जाएंगी और सुबह सूर्योदय होने से पहले वहां से उठाकर किसी दूसरी जगह नष्ट कर दें। इस तरह 4-5 दिन करने से खेत से दीमक का प्रकोप खत्म हो जायेगा।

किसानो के लिए खुशखबरी इस साल जमकर बरसेंगे बादल

भारत मौसम विज्ञान विभाग ने कहा कि इस वर्ष मानसून के सामान्य रहने तथा पूरे 100 फीसद बारिश होने की संभावना है। पहले 96 प्रतिशत वर्षा का पूर्वानुमान लगाया गया था। अगर मौसम विभाग का अनुमान सही रहता है, तो आर्थिक विकास की संभावनाएं बढ़ जाएंगी।

भारत मौसम विज्ञान विभाग के महानिदेशक केजे रमेश ने कहा कि एल-नीनो प्रभाव की आशंका कम होने के साथ ही मानसून बेहतर होने की संभावनाएं बढ़ गयी हैं। उन्‍होंने कहा कि एल-नीनो में तात्कालीक बदलावों से संकेत मिलता है कि इस वर्ष मानसून सामान्य रहेगा और दीर्घावधिक औसत में 100 प्रतिशत तक जा सकता है।

एल-नीनो प्रशांत महासागर में जलधाराओं के गर्म होने से जुड़ा मौसमी प्रभाव है। शुरुआती पूर्वानुमान में मौसम विभाग ने कहा था कि दीर्घावधिक औसत में मानसून 96 प्रतिशत रहने की संभावना है जो सामान्य के आसपास है।

केजे रमेश ने कहा, ‘हालात अच्छे के लिए बदल गए हैं। हमने मार्च के मौसम को देखकर ये अनुमान लगाया था कि 96 फीसद वर्षा हो सकती है। लेकिन अब बदलाव हुए हैं, जो हमारे पक्ष में हैं।’ इस अनुमान से लगता है कि ये साल किसानों के लिए अच्‍छा रहने वाला है।

धर, मानसून पूर्व हुई तेज बारिश और आंधी के चलते बिहार के तापमान में गिरावट दर्ज की गई है. यहां आसमानी बिजली से 7 लोगों की मौत हो गई. इसके अलावा करीब 8 लोगों के भी बारिश और तूफान के कारण हताहत होने के समाचार हैं.

दिल दहला देने वाला आंकड़ा ,भारत में हर साल 12,000 किसान कर रहे हैं आत्महत्या

सरकार 2013 से किसानों की आत्महत्या के आंकड़े जमा कर रही है. इसके मुताबिक हर साल 12 हजार किसान अपनी जिंदगी खत्म कर रहे हैं. कर्ज में डूबे और खेती में हो रहे घाटे को किसान बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं.

सरकार के अनुसार 2015 में कृषि क्षेत्र से जुड़े कुल 12,602 लोगों ने आत्महत्या की. इनमें 8,007 किसान-उत्पादक थे जबकि 4,595 लोग कृषि संबंधी श्रमिक के तौर पर काम कर रहे थे. 2015 में भारत में कुल 1,33,623 आत्महत्याओं में से अपनी जान लेने वाले 9.4 प्रतिशत किसान थे.

2015 में सबसे ज्यादा 4,291 किसानों ने महाराष्ट्र में आत्महत्या की जबकि 1,569 आत्महत्याओं के साथ कर्नाटक इस मामले में दूसरे स्थान पर है. इसके बाद तेलंगाना (1400), मध्य प्रदेश (1,290), छत्तीसगढ़ (954), आंध्र प्रदेश (916) और तमिलनाडु (606) का स्थान आता है. 2014 में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 12,360 और 2013 में 11,772 थी.

 

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जेएस खेहर की अध्यक्षता में तीन जजों वाली एक बेंच किसानों की स्थिति और उसमें सुधार की कोशिशों से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई कर रही है. इसी के दौरान सरकार ने ये आंकड़े पेश किए हैं. यह याचिका सिटिजन रिसोर्स एंड एक्शन इनीशिएटिव की तरफ से दायर की गई है

पिछले एक दशक के दौरान किसानों की आत्महत्या के हजारों मामले सामने आये हैं. अधिकतर किसानों ने कीटनाशक पीकर तो कुछ ने फांसी लगाकर अपनी जान दे दी. किसानों पर सबसे अधिक मार बेमौसम बारिश और सूखे से पड़ती है और कई बार दाम गिरने से भी इनकी कमाई पर असर पड़ता है.

किसानों की बदहाली की एक तस्वीर पिछले दिनों दिल्ली में भी दिखाई दी तमिलनाडु से आए किसानों ने अपने विरोध प्रदर्शन से तरीकों से सबका ध्यान खींचा.

खेती पर इनकम टैक्स लगाने के पक्ष में सरकार!

नीति आयोग ने आज ग्रोथ पर 15 साल का रोडमैप पेश किया है। इसमें खेती से कमाई को इनकम टैक्स के दायरे में लाने की बात कही गई है। नीति आयोग खेती पर टैक्स के पक्ष में है। सरकार जल्द ही इस बारे में फैसला ले सकती है।

उधर नीति आयोग के सदस्य विवेक देबरॉय ने सीएनबीसी-आवाज से एक्सक्लूसिव बातचीत में कहा कि खेती से होने वाली आय पर इनकम टैक्स लगना चाहिए। हालांकि खेती से एक सीमा से ज्यादा आमदनी पर इनकम टैक्स लगाना चाहिए।

उन्होंने आगे कहा कि टैक्स की दर और आमदनी की दर वही हो जो शहरों के लोगों की आमदनी पर लगती है लेकिन खेती से होने वाली आमदनी का आकलन एक साल की बजाय लंबे समय सीमा के आधार पर करना चाहिए।