किसान ने जुगाड़ लगाकर देशी हल को ऐसे बना दिया आधुनिक सीड ड्रिल मशीन

बढ़ईगिरी का काम करने वाले 60 वर्षीय गंगा शंकर के पास खुद एक इंच भी जमीन नहीं है, दूसरे के खेत बटाई पर ले कर खेती करते हैं और उनके खेतों में हमेशा नए-नए प्रयोग करते रहते हैं। उन्हीं प्रयोगों का नतीजा है कि उन्होंने कबाड़ में पड़े साइकिल के पहिए और फ्रीव्हील को देशी हल में जोड़कर आधुनिक सीड ड्रिल मशीन में तब्दील कर दिया।

उत्तेर प्रदेश के रायबरेली जिले के बछरावां ब्लॉक से नौ किलोमीटर पश्चिम में एक छोटे से गाँव कुसेली खेड़ा में रहने वाले गंगा शंकर काका इन दिनों क्षेत्रीय ग्रामीणों के बीच चर्चा का विषय बने हुए हैं। शंकर काका बताते हैं, “हमारा पुश्तैनी काम बढ़ई का है,

लेकिन मुझे बचपन से ही खेती किसानी का शौक रहा है। खेती किसानी में रुचि के कारण मैं हमेशा किसान गोष्ठियों में जाया करता हूं। वहीं पर मुझे पता चला की फसल वैज्ञानिक पद्धति से क्रमबद्ध तरीके से बुवाई की जाए तो खाद बीज की लागत कम होगी और फसल की उपज भी बढ़ेगी।

” वह आगे बताते हैं, “मुझे क्रमबद्ध तरीके से फसल की बुवाई करनी थी और उसके लिए सीड ड्रिल मशीन चाहिए थी। पर मशीन खरीदने के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे और अगर मशीन खरीद भी ले तो उसे चलाने के लिए ट्रैक्टर कहां से लाऊंगा। इसी उधेड़-बुन में मुझे रात भर ठीक से नींद नहीं आई।

सुबह उठा और मायूस मन से अपने बैलों को चारा पानी देने लगा कि अचानक मेरी निगाहें पास में ही रखे हल पर पड़ी। मुझे मेरे हल में ही सीड ड्रिल मशीन दिखने लगी। मैंने फैसला किया कि मैं अपने देशी हल को आधुनिक सीड ड्रिल मशीन में बदल कर रहूंगा।

” मेरे पास एक फ़र वाला हल था जिस पर मैंने अपना पहला प्रयोग किया। प्रयोग के लिए मैंने कबाड़े में पड़ी साइकिल का पहिया और फ्रीवील निकाली और आटा चक्की पर गेहूं भरने वाले बॉक्स की तरह लकड़ी का एक छोटा सा बॉक्स बनाया।

कुछ महीनों के बाद मेरी देसी सीड ड्रिल मशीन तैयार हो गई और मैंने उसे परखने के लिए खेत में उतारा। पर कुछ समय बाद मुझे महसूस होने लगा कि यह मशीन अभी सही नहीं है। क्योंकि इसमें समय, बीज और मजदूरों की लागत ज्यादा आ रही थी। जिससे मैं संतुष्ट नहीं था।

पहले प्रयोग से संतुष्टि ना मिल पाने के बाद मैंने फैसला किया कि अगर फ़रो की संख्या बढ़ा दी जाए तो समय और मजदूरी दोनों की बचत होगी। मैं बाजार गया और तीन फ़र वाला हल खरीद कर लाया। उसके बाद सब कुछ वैसे ही करना था बस फ्रिवील की संख्या और बॉक्स का आकार बढ़ाना था।

लगभग एक वर्ष की कड़ी मेहनत के बाद मेरी तीन फ़र वाली सीड ड्रिल मशीन तैयार हो गई। जिसे मैंने अपने ट्रैक्टर रुपी बैलों पर खेत में उतारा। नतीजा संतुष्टि जनक मिला।

जाने कैसे काम करता है ड्रिप सिंचाई सिस्टम ,और किसानो के लिए क्यों जरूरी है

किसानों को ड्रिप सिंचाई को क्यों अपनाना चाहिए

ड्रिप सिंचाई व्यवस्था सिंचाई की एक उन्नत तकनीक है जो पानी की बचत करता है । इस विधि में पानी बूंद-बूंद करके पौधे या पेड़ की जड़ में सीधा पहुँचाया जाता है जिससे पौधे की जड़े पानी को धीरे-धीरे सोखते रहते है।इस विधि में पानी के साथ उर्वरको को भी सीधा पौध जड़ क्षेत्र में पहुँचाया जाता है जिसे फ्रटीगेसन कहते है ।

फ्रटीगेसन विधि से उर्वरक लगाने में कोई अतिरिक्त मानव श्रम का उपयोग नही होता है।अत% यह एक तकनीक है जिसकी मदद से कृषक पानी व श्रम की बचत तथा उर्वरक उपयोग दक्षता में सुधार कर सकता है।

ड्रिप सिंचाई कम पानी की उपलब्धता वाले क्षेत्रों के लिए एक सफल तकनीक है। जिसमे स्थाई या अस्थाई ड्रिपर लाइन जो पौधे की जड़ के पास या निचे स्तिथ होते है ।आज के परिद्रश्य में पानी की कमी से हर देश, हर राज्य, हर क्षेत्र जूझ रहा है तथा समय के साथ यह समस्या विकराल होती जा रही है।

इसलिए जहाँ भी पानी का उपयोग होता है। वहाँ हमे जितना भी संभव हो इसकी बचत करनी चाहिए । पानी का अत्यधिक उपयोग कृषि में ही होता है। इसलिए इसकी सबसे अधिक बचत भी यहीं ही संभव है। और हमें इसे बचाना चाहिए । इस मुहीम में ड्रिप सिंचाई एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है अत% कृषको को इसे बड़े पैमाने पर अपनाना चाहिए।

ड्रिप सिंचाई में स्तेमाल होने वाले उपकरण तथा उनका कार्य

  • पंप:- पानी की आपूर्ति
  •  फिल्टर यूनिट:- पानी को छानने की व्यवस्था। जिससे की ड्रिप सिस्टम के कार्यकलाप में कोई बाधा उत्पन्न न हो । इसमें होते है, वाटर फिल्टर। बालू फिल्टर (बालू अलग करने के लिए) ।
  •  फ्रटीगेसन यूनिट:- सिंचाई वाले पानी में तरल खाद मिलाने की व्यवस्था।
  •  प्रेशर गेज:- ड्रिप सिस्टम में पानी का प्रेशर को इंगित करता है।
  •  मीटर:- ड्रिप सिस्टम में पानी के प्रवाह को इंगित करता है।
  •  मुख्य पाइप लाइन:- लेटरलस में पानी की सप्लाई करती है।
  •  लेटरल्स:- कम मोटाई वाली ट्यूब्स। ड्रीपर्स को पानी की सप्लाई करती है।
  •  ड्रीपर्स:- पानी को पौध जड़ क्षेत्र में बूंद-बूंद सप्लाई करते है।

अनुकूल ड्रिप सिंचाई व्यवस्था को इस्थापित करते वक्त कुछ तथ्यों का ध्यान रखना चाहिए, जैसे कि। भूमि स्थलाकृति। मिट्टी। पानी। फसल और कृषि जलवायु स्थिति इत्यादि । फव्वारा सिंचाई (स्प्रींल्कर सिंचाई व्यवस्था) व्यवस्था से तुलना करें तो ड्रिप सिंचाई ज्यादा फायदेमंद साबित होगी ।

ड्रिप सिंचाई के फायदे-

  • पानी उपलब्धता की समस्या से जूझ रहे इलाके के लिए फायदेमंद
  • फसल की बंपर पैदावार और वक्त से पहले फसल तैयार होने की संभावना बढ़ जाती है
  • सीमित इस्तेमाल की वजह से खाद और पोषक तत्वों के ह्रास को कम करता है
  • पानी का अधिकतम और बेहतरीन तरीके से इस्तेमाल
  • अंतरसांस्कृतिक या अंतरफसलीय कार्य को ड्रिप व्यवस्था आसान बनाता है
  • पौधे की जड़ तक पानी का वितरण एक समान और सीधे होता है
  • घास-फूस को बढ़ने और मिट्टी के कटाव को रोकता है
  • असमान आकार की भूमि या खेत में ड्रिप व्यवस्था का बहुत प्रभावकारी तरीके से इस्तेमाल हो सकता है

  • बिना किसी परेशानी के पुनरावर्तित अपशिष्ट पानी का इस्तेमाल किया जा सकता है
  • दूसरी सिंचाई तरीकों के मुकाबले इसमे मजदूरी का खर्च कम किया जा सकता है
  • पौधे और मिट्टी जनित बीमारियों के खतरे को भी कम करता है
  • इसका संचालन कम दबाव में भी किया जा सकता है जिससे ऊर्जा खपत में होनेवाले खर्च को भी कम किया जा सकता है
  • खेती किये जाने योग्य जमीन को बराबर किये जाने की भी जरूरत नहीं होती है
  • एक समान पानी वितरण होने से पौधे के जड़ क्षेत्र में एकसमान नमी की क्षमता को बनाए रखा जा सकता है
  • खाद या सूक्ष्म पोषक तत्वों को कम से कम क्षति पहुंचाए फर्टीगेशन (ड्रिप व्यवस्था के साथ खाद को सिंचाई वाले पानी के साथ प्रवाहित करना) किया जा सकता है
  • वॉल्व्स और ड्रिपर की सहायता से पानी के कम या ज्यादा प्रवाह को आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है
  • ड्रिप व्यवस्था की वजह से सिंचाई की बारंबरता में मिट्टी के प्रकार की भूमिका बिल्कुल नगण्य होती है
  • कुल मिलाकर ड्रिप व्यवस्था वक्त और धन दोनों की बचत करता है

डीजल नहीं हवा से चलता है ये इंजन, अनपढ़ दोस्तों ने 11 साल में किया तैयार

गाड़ियों के टायरों में हवा भरने वाले दो अनपढ़ दोस्तों ने कुछ अलग करने की ठानी तो हवा से चलने वाला इंजन ही बना दिया। 80 फीट की गहराई से इसी हवा के इंजन से पानी तक खींचा जाता है। 11 साल की मेहनत के बाद यह इंजन बनकर तैयार हुआ है। अब वे बाइक को हवा से चलाने के लिए एक प्रोजेक्ट बना रहे हैं।

दरअसल, राजस्थान के भरतपुर जिले में रूपवास के खेड़िया विल्लोज के रहने वाले अर्जुन कुशवाह और मिस्त्री त्रिलोकीचंद गांव में ही एक दुकान पर मोटर गाड़ियों के टायरों में हवा भरने का काम करते थे।

करीब 11 साल पहले जून में एक दिन ट्रक के टायरों की हवा जांच रहे थे तो उनका इंजन खराब हो गया। उसे सही कराने तक के लिए जेब में पैसे नहीं थे। इतने में ही इंजन का वॉल खुल गया और टैंक में भरी हवा बाहर आने लगी। इंजन का पहिया दवाब के कारण उल्टा चलने लगा। फिर यहीं से दोनों ने शुरू की हवा से इंजन चलाने के आविष्कार की कोशिश की। साल 2014 में वे इसमें सफल भी हो गए। आज वे इसी हवा के इंजन से खेतों की सिंचाई करते हैं।

11 साल में साढ़े तीन लाख रुपए किए खर्च

  • त्रिलोकीचंद ने बताया कि 11 साल से वे लगातार हवा के इंजन पर ही शोध कर रहे हैं। अब तक बहुत कुछ सीख चुके हैं ।
  •  इसे बनाने में करीब 3.5 लाख रुपए के उपकरण सामान ला चुके हैं। अब दुपहिया चौपहिया वाहनों को हवा से चलाने की योजना बना रहे हैं।

ऐसे बनाया 8 हॉर्स पावर का इंजन

अर्जुन कुशवाह ने बताया, ”चमड़े के दो फेफड़े बनाए। इसमें एक छह फुट और दूसरा ढाई फुट का। इसमें से एक बड़े फेफड़े इंजन के ऊपर लगाया। जबकि इंजन के एक पहिए में गाड़ी के तीन पटा दूसरे बड़े पहिए में पांच पटा लगाकर इस तरह सेट किया कि वह थोड़ा से धक्का देने पर भार के कारण फिरते ही रहें। पिस्टन वॉल तो लगाई ही नहीं है।

जब इंजन के पहिए को थोड़ा सा घुमाते हैं तो वह बड़े फेफड़े में हवा देता है। इससे छोटे फेफड़े में हवा पहुंचती है और इंजन धीरे-धीरे स्पीड पकड़ने लगता है। इससे इंजन से पानी खिंचता है। बंद करने के लिए पहिए को ही फिरने से रोकते हैं। हवा से चल नहीं जाए, इसके लिए लोहे की रॉड फंसाते हैं।

”इसे बनाने में करीब 3.5 लाख रुपए के उपकरण सामान ला चुके हैं।आज वे इसी हवा के इंजन से खेतों की सिंचाई करते हैं।

आ गया बर्षा पंप, अब सिंचाई के लिए न बिजली की जरूरत और न ही ईंधन की

खेती के लिए सबसे ज्यादा जरूरी क्या है ? आप कुछ देर के लिए सोचेंगे और कहेंगे सिंचाई की सुविधा, क्योंकि इसके बिना सारी तैयारियां अधूरी रह जाती है। और अगर हम आपको कहें कि सिंचाई के लिए हमारे पास एक ऐसा वाटर पंप है जो बिना बिजली और किसी ईंधन के ही चलती है तो क्या कहेंगे?

आज हम इसी खास तकनीक के बारे में बात करने जा रहे हैं जिसका विकास नीदरलैंड में हुआ है और जो हमारे पड़ोसी देश नेपाल में सफलतापूर्वक काम कर रहा है। इस तरह की तकनीक भारत के लिए भी वरदान साबित हो सकती है जहां आज भी चौबीस घंटे बिजली की बात तो छोड़ दीजिए कई जगहों पर तो बिजली पहुंचती भी नहीं है। ऐसे इलाकों के लिए यह तकनीक कृषि के लिए किसी वरदान से कम नहीं होगी। यह वाटर पंप जिस तकनीक पर काम करता है उसके लिए भारत की परिस्थिति बिल्कुल सही जगह है। तो चलिए अब विस्तार से इस खास तकनीक से लैस पंप के लिए बात करते हैं।

बर्षा पंप से किसानों के खेतों में होगी वर्षा

हाल में नीदरलैंड के शोधकर्ताओं ने खेतों में सिंचाई को बेहद आसान बनाने के लिए एक नया सिंचाई पंप विकसित किया है। यह एक ऐसा बर्षा पंप है, जिसके लिए किसानों को बिजली या ईंधन का खर्च भी नहीं उठाना पड़ेगा।

बस किसानों को इस पंप को नहर या नदी में रखना होगा और इसके सहारे किसान आसानी से अपने आस-पास के खेतों में सिंचाई कर सकेंगे। किसानों के लिए यह एक तरह का बिल्कुल नया उपकरण है, जिसके इस्तेमाल से किसानों को सिंचाई संबंधी एक बड़ी समस्या दूर हो सकेगी।

किसानों के लिए सिंचाई बड़ी समस्या

अपने खेतों में सिंचाई के लिए किसानों को बड़ी मुश्किल उठानी पड़ती है। एक तरफ जहां कुछ किसान आस-पास की नदियों, नालों या नहर में सिंचाई पाइप लगाकर डीजल पंप के जरिये अपने खेतों की सिंचाई करते देखे जा सकते हैं, वहीं दूसरी ओर किसान अन्य जटिल तरीकों से खेतों से सिंचाई की व्यवस्था करते हैं, ताकि अपने खेतों में सही स्थिति और समय पर रोपाई कर सकें।

असल में बर्षा पंप का निर्माण नीदरलैंड की कंपनी क्यूस्टा ने किया है। इस बर्षा पंप के लिए यूरोपीय संस्था क्लाईमेट केवाईसी की ओर से यूरोप की इस साल की सबसे बड़ी तकनीकि खोज का अवॉर्ड दिया गया है।

शोधकर्ताओं की मानें तो यह एक तरह का बिल्कुल नया उपकरण है और विकासशील देशों में यह तकनीक बहुत कारगार साबित होगी। चूंकि पहला बर्षा पंप इस साल नेपाल में लगाया गया है और नेपाल में बारिश को बर्षा कहा जाता है। इसलिए इस पंप का नाम बर्षा रखा गया है।

ऐसे चलता है बर्षा पंप

असल में यह पंप पानी की लहरों से चलता है। लहरों से टकराकर बर्षा पंप का एक बड़ा सा पहिया घूमता है और इससे वायु का दबाव बनता है। इस वायु के दबाव की वजह से ही पानी को एक नली के जरिये किसानों के खेतों तक पहुंचा देता है।

ऐसे में नदी, नहर या नालों में पानी की लहर की गति ही इस पंप के लिए कारगार होती है और जितनी तेज पानी की रफ्तार होगी, उतनी दूर तक किसानों के खेत तक पानी पहुंच सकेगा। सबसे बड़ी बात यह है कि प्रदूषण न फैलाने की वजह से यह बर्षा पंप पर्यावरण के भी अनुकूल है। अब एशिया में ही नहीं, बल्कि लैटिन अमेरिका और अफ्रीका में इस बर्षा पंप के निर्माण की तैयारी शुरू की जा रही है।

शोधकर्ताओं की मानें तो इस बर्षा पंप के जरिए फसल का उत्पादन 5 गुना तक बढ़ाया जा सकता है। यह पंप एक लीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से पानी छोड़ता है। पानी की रफ्तार अच्छी होने पर इस पंप के जरिये 82 फीट की ऊंचाई तक भी पानी को पहुंचाया जा सकेगा। सबसे अच्छी बात यह है कि एक साल में ही इस पंप की पूरी लागत वसूल हो जाएगी।

बर्षा पंप कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो भी देखें

यह मशीन करती है गेहूं की नई तकनीक से बुवाई ,कम पानी में होती है अधिक सिंचाई

समय के साथ-साथ खेती में आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। अभी भी बहुत से किसान गेहूं की बुवाई बीज को हाथों से छिड़क कर ही करते हैं, लेकिन आज के समय ऐसी मशीन आ गई है जिससे किसान गेहूं की बुवाई कर सकते हैं, जिससे न सिर्फ समय की बचत होती है बल्कि इससे कई और फायदे भी होते हैं। आइये हम आपको बताते हैं कि ट्रैक्टर चालित रेज्ड बेड सीड ड्रिल से गेहूं की बुवाई कैसे होती है और इसके क्या फायदे हैं।

ट्रैक्टर चालित रेज्ड बेड सीड ड्रिल मशीन (Raised Bed Seed Drill Machine) मिट्टी उठा कर बुवाई करने की तकनीक पर आधारित है। इसमें मिट्टी उठाने के लिये रिजर तथा बेड बनाने के लिये बेड शेपर लगे होते हैं। रेजर बनने वाली नाली (बरे) की चौड़ाई घटाई-बढ़ाई जा सकती है। मशीन के अगले भाग में लगे रेजर मिट्टी उठाने के लिये का कार्य करते हैं, फरो ओपनर इस उठी हुई मिट्टी पर बुवाई करता हैं, तथा बेड शेपर उस उठी हुई मिट्टी को रूप देते हैं।इस प्लांटर के द्वारा बेड पर दो या तीन लाइन बीज एवं खाद की बुवाई की जाती है।

इस तकनीक से बुवाई करने से फसल वर्षा के पानी का भरपूर उपयोग करती है तथा सिंचाई की स्थिति में काफी कम पानी लगता है तथा कार्य जल्दी पूरा हो जाता है। इस मशीन के द्वारा 25 प्रतिशत खाद एवं बीज की बचत होती है। इस पद्धति से बुवाई करने से 4 एकड़ की सिंचाई करने में जितना पानी लगता है उतने ही पानी से 6 से 8 एकड़ की सिंचाई की जा सकती है।इस प्लांटर के द्वारा बुवाई करने के बाद निकाई गुड़ाई आसानी से की जा सकती है।

साथ ही इस विधि से गेहूं की बुवाई करने से आप ज्यादा उत्पादन ले सकते है और नदीन भी बहुत कम उगते है । रेज्ड बेड सीड ड्रिल से सिर्फ गेहूं ही नहीं और भी बहुत सारी फसलें जैसे मक्का ,सोयबीन,दालें आदि की बुवाई कर सकते है । बहुत सारी कंपनी यह मशीन बनाती है आप किसी भी बुवाई मशीन त्यार करने वाली वर्कशाप पर पता कर सकते है ।

यह मशीन कैसे बिजाई करती है उसके लिए वीडियो देखें

अब इस मशीन से दो मिंट में जाने अपने खेत की फसल का हाल

इंसान के पास अपने शरीर का बुखार चैक करने के लिए थर्मामीटर और डायबीटिज चैक करने वाली मशीन भी है। शरीर में कैल्सियम की कमी है ये पता करने वाली मशीनें भी है। लेकिन खेत में खड़ी फसल को किस चीज की जरूरत है, क्या उसे खांसी हुई है या बुखार यानी उसे पानी की जरूरत है अभी या फिर किसी दवा की, इसे जांचने वाली मशीन की तलाश किसानों को लंबे समय से थी।

ऐसी ही एक छोटी सी मशीन को इस्तेमाल कर हरियाणा के किसान लवप्रीत सिंह फसल को होने वाले नुकसान से आसानी से बच जाते हैं और ज्यादा पैदावार कर ज्यादा कमाई कर रहे हैं।

बुआई और रोपाई के समय ही खेतों को पानी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। लेकिन तब बरसात नहीं होती। फिर जब फसल की कटाई का वक्त आता है, तो अनचाही बरसात सब बर्बाद कर देती है। सालों से किसान को इसी समस्या का सामना करना पड़ता आ रहा है।

लेकिन हरियाणा के किसान लवप्रीत सिंह को परेशानी से बच जाते हैं। दरअसल, ग्रीन सीकर जैसे छोटे गैजेट्स फसलों के लिए सेंसर की तरह काम करते हैं। लवप्रीत इसी मशीन का इस्तेमाल करते हैं। वो जैसे ही इस मशीन को खेत में खड़ी फसल के किसी भी हिस्से पर ले जाते हैं, तो मशीन से लाल रंग की तरंगे यानी रोशनी निकलती है।

फसल का स्वास्थ्य जांचने वाली मशीन

ये तरंगे पौधों से टकराकर खत्म हो जाती हैं, लेकिन खत्म होने से पहले वो मशीन को बता देती हैं कि फसल को किस चीज की अभी कमी है। इसी मदद से लवप्रीत खेत की मिट्टी में नाइट्रोजन की स्थिति का भी पता तुरंत लगा लेते हैं।

किसान लवप्रीत अपने 50 एकड़ के खेत की फसलों के लिए ऐसी कई नई तकनीक वाली मशीनें इस्तेमाल करते हैं। यह उनमें से एक है।

लवप्रीत के मुताबिक तकनीक की वजह से वो मौसम की बेहतर भविष्यवाणी जान लेते हैं। जिसकी वजह से वो बीजारोपण करने के सही समय और कीटनाशकों के छिकड़ने के समय की सही योजना आसानी से पहले ही बना लेते हैं।

लेकिन पहले ऐसा नहीं हो पाता था। इस वजह से उनको पहले मजदूरों पर अधिक खर्च करना पड़ता था। फिर गलत समय पर बरसात, फसल को बर्बाद कर दिया करती थी।

बाकी किसान छोटी जोत वाले हैं इसलिए वो 40 हजार रूपए की कीमत वाली ग्रीनसीकर मशीन को नहीं खरीद पाते। ऐसे में लोकर कृषि समितियों ने इनको खरीद लिया है और वो अब बाकी छोटे किसानों को इसे फ्री में इस्तेमाल करने देती है ताकि किसान को फायदा हो सके। ऐसे करता है काम

इसके सेंसर में लाल इंफ्रारेड लाइट लगी होती है जो पौधे के ऊपर पढ़ने वाले हर प्रकार के प्रकाश का का विश्लेषण कर पौधे के बारे में जानकारी हांसिल करती है ।सेंसर अपनी रिपोर्ट इस यंत्र की ऐल.सी.डी स्क्रीन पर देता है । जो NDVI (रीडिंग 0.00 से 0.99) स्क्रीन पर दिखाई देती है ।

रीडिंग के हिसाब से हम पौधे की सेहत के बारे में जान सकते है । इसको Connected Farm™ scout ऐप के साथ कनेक्ट किआ जा सकता है जिस से अगर कोई घर से दूर भी हो तो भी अपने खेत के बारे में जानकारी हांसिल कर सकता है ।

कृषि यंत्रों पर सब्सिडी चाहिए तो पढ़े ये लेख…

किसानों की आय को बढाने के लिए वैसे तो हर कोई प्रयास कर रहा है. फिर चाहे सरकारी तंत्र हो या फिर निजी क्षेत्र की कंपनिया हो सभी किसानों की आय को बढाने के लिए प्रयास कर रहे हैं. लेकिन किसानों की आय बढाने के लिए जरुरी है उनके पास आधुनिक कृषि यंत्रों का होना. जो कंपनियां कृषि के अच्छे कृषि यन्त्र बना रही है, वो थोड़े महंगे होने की वजह से किसान उनको आसानी से नहीं खरीद पाता है. क्योंकि जब भी किसान उस कृषि यंत्र को खरीदने की सोचता है तो उससे पहले अपनी जेब देखता है.

लेकिन इन बड़ी कृषि मशीनों पर सरकार की और से अनुदान भी दिया जा रहा है, ताकि किसान अच्छे कृषि यंत्रों को आसानी से खरीद सके. लेकिन अधिकतर किसान इससे अनभिज्ञ है. उसको पता ही नहीं है कि सरकार द्वारा कृषि यंत्रो पर कोई अनुदान भी दिया जा रहा है या नहीं. और जिनको पता है वो किसान यह नहीं जानते की उनको किससे संपर्क करना है. बहरहाल इसके दो तरीके है जिससे किसानों को कृषि मशीनरी पर अनुदान की पूरी जानकारी उपलब्ध हो सकती है.

सरकारी तरीका :

यदि कोई किसान नया कृषि यन्त्र खरीदना चाहता है सबसे वो सबसे पहले तो यह सुनिश्चित करले कि उसको किस कंपनी का कृषि यन्त्र खरीदना है. उसके बाद किसान उस कृषि यंत्र पर अनुदान की जानकारी के लिए अपने जिले या ब्लाकस्तर के कृषि कार्यालय पर संपर्क करे. वहां से अनुदान की पूरी प्रक्रिया को समझे. उसके बाद ही उस कृषि यंत्र को ख़रीदे. यदि कोई भी कृषि अधिकारी जानकारी देने में जरा भी आनाकानी करता है तो इसके लिए जिलास्तर पर कृषि अधिकारीयों से मुलाकात कर किसान अपनी समस्या बता सकते है. किसान को कृषि यंत्रों के विषय में पूरी जानकारी जिला और ब्लाकस्तर कृषि कार्यालय पर आसानी से मिल जाएगी.

कृषि यंत्र डीलर द्वारा जानकारी :

नकारी:यदि किसान किसी भी यन्त्र को खरीदने की योजना बना रहा है. इसके लिए किसान को चाहिए की वो किसी अधिकृत कृषि यंत्र डीलर से ही ख़रीदे. इससे किसान को फायदा होगा. सबसे पहले सरकार द्वारा कृषि यंत्रों पर दी जाने वाली अनुदान राशी के विषय में किसान को सही जानकारी उस डीलर के पास से मिलेगी. दूसरा वह उत्पाद जो किसान खरीद रहा है. वह गुणवत्ता वाला होगा और उत्पाद की सही जानकारी के साथ लम्बे समय तक उसकी सर्विस की वारंटी भी मिलेगी.

सरकार द्वारा किन कृषि यंत्रों पर है सब्सिडी :

वैसे तो लगभग सभी कृषि यंत्रों पर सरकार द्वारा सब्सिडी दी जाती है. लेकिन यह राज्य सरकार पर भी निर्भर करता है कि वो किन कृषि यंत्रों पर सब्सिडी दे रही है. किसान सरकार द्वारा मैनुअल स्प्रेयर्स, पावर नैपसेक स्पेयर्स, मल्टीक्राप प्लांटर, सीडड्रिल, रोटावेटर, जीरोटिल मल्टीक्राप प्लांटर, पंपसेट, मल्टीक्राप थ्रेसर, रिज फैरो प्लांटर, ट्रैक्टर माऊंड स्पेयर्स, स्प्रिंकलर सेट, बखारी, एचडीपीई पाइप, पीवीसी पाइप, एचडीपीई लैमिनेटेड पाइप, बड़े तिरपाल, छोटा तिरपाल जैसे कृषि यंत्रों पर अनुदान पा सकते हैं।

सरकार द्वारा कितनी सब्सिडी दी जाती है :

सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी राज्य सरकारों पर निर्भर करती है. क्योंकि हर एक राज्य के कृषि विभाग की अलग योजना है जिसके हिसाब से अनुदान दिया जाता है. वैसे ज्यादातर राज्यों में 30 प्रतिशत से 50 प्रतिशत का अनुदान कृषि यंत्रों पर दिया जाता है.

किसान के बेटे ने पिता के लिए बनाया Remote से चलने वाला ट्रैक्टर

भारत में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, ये बात अक्सर लोग कहते हैं, साथ ही ये भी कहा जाता है कि भारत में प्रतिभाओं को उचित मंच नहीं मिल पाता है। उसके बाद भी अक्सर आप देखते होंगे कि प्रतिभा अपने आप चमक बिखेर देती है। कुछ बड़ा या फिर नया करने के लिए जरूरी नहीं कि आप किसी बड़े संस्थान में पढ़ाई करें, जो काम आईआईटी के छात्र नहीं कर सकते हैं वो काम एक किसान के बेटे ने कर दिखाया है। उसकी प्रतिभा का डंका आज पूरे देश में बज रहा है।

राजस्थान के बारां जिले के बमोरीकलां गांव में एक किसान के बेटे ने जो कारनामा किया है उस से उसके पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो गया है। 19 साल का ये युवक लगातार नए आविष्कार करने में लगा रहता है। उस ने अब जो चीज तैयार की है उस से खेती काफी आसान हो सकती है। छोटी सी उम्र में इस युवक ने अपनी बुद्धि के बल पर 27 से अधिक आविष्कार किए हैं। इस लड़के का नाम योगेश कुमार है। इसके आविष्कार देख कर आईआईटी में पढ़ने वाले लोग भी हैरान हैं। योगेश नागर फिलहाल मैथ्स से बीएससी कर रहा है। वो फर्स्ट ईयर का स्टूडेंट है।

योगेश के पिता राम बाबू नागर 15 बीघा जमीम पर खेती करते हैं. इसी से परिवार का खर्चा चलता है। अपने पिता की मुश्किलों को देख कर योगेश ने कुछ ऐसा करने की ठानी जिस से उनका काम आसान हो जाए, इसके लिए वो लगातार काम कर रहा था। उसके पिता को ट्रैक्टर चलाते समय पीठ में दर्द की शिकायत होती थी। पिता की तकलीफ को दूर करने के लिए योगेश ने रिमोट ऑपरेटिव सिस्टम डेवलप किया है। इससे खेत में एक जगह बैठकर रिमोट से ट्रैक्टर चलाकर जुताई की जा सकती है। बिना ड्राइवर के ट्रैक्टर को चलता देखकर गांव वाले भी हैरान रह जाते हैं।

अब योगेश के पिता का काम काफी आसान हो गया है। वो एक जगह खड़े हो कर ट्रैक्टर चलाते हैं। इस से उनका समय भी बचता है और पीठ दर्द की शिकायत से भी मुक्ति मिल गई है। योगेश के इस आविष्कार से गांव के लोग भी हैरान हैं, उनका कहना है कि योगेश में बहुत प्रतिभा है, उसे सही मार्गदर्शन मिले तो वो भारत का नाम रोशन कर सकता है। अब योगेश की चर्चा पूरे देश में हो रही है। रिमोट से ट्रैक्टर चला कर योगेश ने वो कारनामा किया जिस से भारत के किसानों की काफी मदद हो सकती है।अब योगेश को उम्मीद है कि उनके पिता को खेती के दौरान आने वाली समस्याओं का सामना नहीं करकना पड़ेगा।

वीडियो भी देखें

यह एक पावर टिलर करता है खेती के 10 तरह के काम

पावर टिलर खेतीबारी की एक ऐसी मशीन है, जिस का इस्तेमाल खेत की जुताई से ले कर फसल की कटाई तक किया जाता है। इस के इस्तेमाल से खेतीबारी के अनेक काम आसानी से किए जा सकते हैं।

तकनीक

इस मशीन से खरपतवार का निबटान, सिंचाई, फसल की कटाई, मड़ाई और ढुलाई का काम भी लिया जाता है। इस के अलावा इस मशीन का बोआई और उस के बाद के कामों में भी खासा इस्तेमाल होता है।

इस तरह के कामों के लिए पहले कई मजदूर खेत में लगाने पड़ते थे, लेकिन पावर टिलर के प्रयोग से कम लागत और कम समय में सभी काम आसानी से खत्म हो जाते हैं।

खासतौर से पहाड़ी इलाकों में खेती के काम के लिए यह मशीन काफी कारगर है।आज अनेक कंपनियां पावर टिलर बना रही?हैं। उन्हीं में से एक वीएसटी शक्ति 130 डि पावर टिलर के बारे में जानकारी दी जा रही है :

वीएसटी शक्ति 130 डि – पावर टिलर

यह वीएसटी शक्ति द्वारा बनाया गया पावर टिलर है। इस से खेतों, बागानों व लाइनों में होने वाली फसलों की गुड़ाई आदि की जाती?है। यह पहाड़ी इलाकों में खेतों की जुताई करने वाला खास यंत्र है।

खासीयत : यह काफी हलका और चेन रहित होता है। यह चलने में बेहद आसान है।इसका आकार 2720 ​​x 865 x 1210 मिमी होता है और वजन (इंजन और ट्रांसमिशन रोटरी के साथ) 405 किलोग्राम होता है। इसका 4 स्ट्रोक सिंगल सिलेंडर इंजन 13HP की पावर पैदा करता है।इसमें आगे के लिए 6 गेअर और रिवर्स के लिए 2 गेअर होते है ।

इस मॉडल की कीमत 165000 के करीब है इसके बाकि मॉडल की कीमत मॉडल के हिसाब से कम जा ज्यादा हो सकती है ।

इस से आप क्या-क्या मशीने चला सकते है वो निचे देखें

आज किसान पावर टिलर के साथ अन्य यंत्रों को जोड़ कर खेती के कई काम आसानी से कर रहे?हैं। यह एक ऐसी खास मशीन है, जिस से अन्य यंत्रों को जोड़ कर खेती के तमाम काम लिए जा सकते हैं।

1.पानी का पंप

Water Pump

 

2.थ्रेशर

अक्षीय फ्लो थ्रेशर

3.रीपर

काटनेवाला

4.बैल प्रकार इंटर कल्टीवेटर

Bullock Type Inter Cultivator

4.बीज ड्रिल

ये सभी मशीने इस टिलर के साथ जुड़ सकती है किसान अपनी जरूरत के हिसाब से इन में से कोई भी मशीन खरीद सकता है लेकिन हर मशीन की अलग किमत होती है

अधिक जानकारी के लिए Toll Free फोन नंबर : 18004190136 और मोबाइल नंबरों 080 – 28510805 / 06/ 07 व 080 – 67141111 पर बात कर सकते हैं।

यह पावर टिलर कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो भी देखें

यह है टॉप 5 मिनी ट्रेक्टर जाने कीमत और दूसरी जानकारी

भारत में करीब 85 प्रतिशत परिवार कुल खेती योग्य जमीन के करीब 36 प्रतिशत भाग में खेती करते हैं। छोटे किसानों की औसत जोत एक हेक्टेयर से अधिक की नहीं होती है।

इसलिए औसत किसान के लिए 35 एचपी या इससे अधिक के मानक ट्रैक्टर का इस्तेमाल करते हुए मशीनीकृत खेती करना काफी मुश्किल होता है जिसके कारण खेती में उत्पादकता और खेत की प्रति इकाई उपज प्रभावित होती है।

इस लिए किसानो के लिए 10 से 12 एचपी की क्षमता के ट्रैक्टर ऐसे छोटे और टुकड़ों में बंटे खेतों के लिए उपयुक्त होते हैं । आज हम आपको टॉप ट्रेक्टर कम्पनिओं द्वारा निर्मित कुश मिनी ट्रैक्टरों के बारे में बताएँगे जिसको छोटा किसान आसानी से खरीद सकता है ।

1. स्वराज 717

  • पावर – 17 HP
  • सिलिंडर – 1
  • गेअर – 6 आगे 3 रिवर्स
  • कीमत – 2.50 लाख

2. कप्तान 200DI

  • पावर – 20 HP
  • सिलिंडर – 1
  • गेअर – 8 आगे 2 रिवर्स
  • कीमत – 4 लाख

3. सोनालिका गरडेंटरक 20

 

  • पावर – 20 HP
  • सिलिंडर – 3
  • गेअर – 6 आगे 2 रिवर्स
  • कीमत – 3 लाख

4. महिंद्रा युवराज 215

  • पावर – 15 HP
  • सिलिंडर – 1
  • गेअर – 6 आगे 3 रिवर्स
  • कीमत – 2 लाख

5. EICHER 241 मिनी ट्रेक्टर  

 

  • पावर – 25 HP
  • सिलिंडर – 1
  • गेअर – 5 आगे 1 रिवर्स
  • कीमत – 4.41 लाख

नोट: इन सभी ट्रेक्टर की कीमत की जानकारी इंटरनेट से ली गई है जो आपके इलाके के हिसाब से कम जा ज्यादा हो सकती है