देश में इन 14 कीटनाशकों पर तत्काल प्रतिबंध, इनसे फैलता है कैंसर

केंद्र सरकार ने स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए खतरनाक 18 कीटनाशकों पर रोक लगा दी है। सरकार की ओर से गठित समिति ने अपनी सिफारिश में इन कीटनाशकों से होने वाले संभावित नुकसान पर प्रकाश डाला था, जिसके बाद केंद्र ने इन पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया।

इन कीटनाशकों के इस्तेमाल पर कई देशों ने पहले से ही पाबंदी लगा रखी है। सरकार ने बेनोमिल, कार्बाराइल, फेनारिमोल, मिथॉक्सी एथाइल मरकरी क्लोराइड, थियोमेटॉन सहित कुल 14 कीटनाशकों पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगाया है, जबकि एलाचलोर, डिचलोरवस, फोरेट और फोस्फामिडॉन देश में 2020 से प्रतिबंधित होंगे।

कीटनाशकों की समीक्षा के लिए गठित समिति ने 16 जुलाई को इस मुद्दे पर सरकार को रिपोर्ट सौंपी थी, जिसने सिफारिशों में कहा कि ये कीटनाशक लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए खतरनाक हैं। विभिन्न स्तरों पर इनका प्रयोग फसल को कैंसर कारक व विषैला बनाता है। इसी वजह से कई देशों ने इनके इस्तेमाल पर पूरी तरह से पाबंदी लगा रखा है। समिति ने कहा कि इन्हें प्रतिबंधित किया जाना ही उचित व्यवस्था होगी।

कंपनियां जारी करेंगी चेतावनी

केंद्र सरकार द्वारा जारी आदेश के अनुसार, जिन कीटनाशकों को तत्काल प्रभाव से प्रतिबंधित किया गया है, उनका निर्माण करने वाली कंपनियों को देशभर में मौजूद इन कीटनाशकों का इस्तेमाल रोकने के लिए चेतावनी जारी करनी होगी। उन्हें बाजार से अपना माल वापस लेना होगा। कंपनियों को चेतावनी में स्पष्ट करना होगा कि स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए खतरनाक होने के मद्देनजर इन कीटनाशकों का प्रयोग नहीं किया जाए।

सर्वोच्च न्यायालय का रुख सख्त

सर्वोच्च न्यायालय ने भी केंद्र को इन कीटनाशकों पर जल्द फैसला लेने के लिए कहा था। न्यायालय ने सरकार को दो महीने का वक्त दिया था। इससे पहले महाराष्ट्र में नवंबर 2017 में कीटनाशकों के इस्तेमाल से 50 से भी ज्यादा किसानों की मौत हो गई थी।

जानलेवा 66 कीटनाशकों का हो रहा इस्तेमाल

हाल में सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत पूछे गए एक सवाल के जवाब में सरकार ने स्पष्ट किया था कि देश में ऐसे 66 कीटनाशकों को इस्तेमाल में लाया जाता है, जो एक या उससे ज्यादा देशों में प्रतिबंधित हैं। इनमें 28 पर पहले ही रोक लगाई जा चुकी है।

राउंडअप का उपयोग करने वाले किसान को इस कारण मिलेगा 1,900 करोड़ रुपये का मुआवजा

अमरीका के सैन फ्रांसिस्को में एक माली ने एक बड़ी कंपनी के ख़िलाफ लगभग (1900 करोड़) 29 करोड़ डॉलर का मुकदमा जीत लिया है.डिवेन जॉनसन की ज़िंदगी में जीत की इस खुशी से पहले कैंसर आया जो उन्हें माली की नौकरी के दौरान हुआ.

कैंसर का पहला लक्षण दिखा लाल चकते के रूप में जो उनके लगभग 80 फ़ीसद शरीर में फैल गए थे. जॉनसन तब 42 साल के थे. साल 2012 में बेनिसिया के स्कूलों में माली का काम करने के दौरान उन्होंने पौधों में साल भर खरपतवार नाशक दवा लगाई. ये दवा थी- राउंडअप एंड रेंजर प्रो हर्बिसाइड जिसे मोन्सेंटो कंपनी बनाती है.

साल 2014 में पता चला कि उन्हें हॉजकिन लिम्फ़ोमा कैंसर है. कंपनी मोन्सेंटो के ख़िलाफ़ मुक़दमे के लिए उन्होंने साल 2015 में तैयारी शुरू की. जॉनसन का दावा इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर के शोध पर आधारित था

जिसमें राउंडअप हर्बिसाइड को कैंसर का कारण बताया गया है. इस हर्बिसाइड में ग्लाइफोसेट होता है जो कैंसर पैदा कर सकता है. ये एजेंसी विश्व स्वास्थ्य संगठन से संबद्ध है.

दुनिया की सबसे ताकतवर सब्जी है ये, खाएंगे तो शरीर बन जाएगा फौलादी

आजकल के दौर में जंक फूड का इतना क्रेज बढ़ चुका है कि लोग अपने शरीर को जरूरी ताकत देनी वाली सब्जी, दाल का सेवन कम ही करते हैं. लेकिन, बहुत कम लोग जानते हैं कि कुछ सबज्यिां ऐसी होती हैं, जिन्हें कुछ दिन खाने पर ही इसका फायदा मिल जाता है.

ऐसी ही एक सब्जी है कंटोला. यह दुनिया की सबसे ताकतवर सब्जी है. इसे औषधि के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है. इस सब्जी में इतनी ताकत होती है कि महज कुछ दिन के सेवन से ही आपका शरीर तंदुरुस्त बन जाता है या यूं कहें कि फौलादी बन जाता है. कंटोला को ककोड़े और मीठा करेला नाम से भी जाना जाता है.

कंटोला आमतौर पर मॉनसून के मौसम में भारतीय बाजारों में देखा जाता है. इसमें कई स्वास्थ्य लाभ है जिसकी वजह से इसकी खेती दुनियाभर में शुरू हो गई है. इसकी मुख्य रूप से भारत के पर्वतीय क्षेत्रों में खेती की जाती है.

यह सब्जी स्वादिष्ट होने के साथ-साथ प्रोटीन से भरपूर होती है. इसे रोज खाने से आपका शरीर ताकतवर बनता है. इसके लिए कहा जाता है कि इसमें मीट से 50 गुना ज्यादा ताकत और प्रोटीन होता है. कंटोल में मौजूद फाइटोकेमिकल्स स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में काफी मदद करता है. यह एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर सब्जी है. यह शरीर को साफ रखने में भी काफी सहायक है.

अगर आप भी अपनी रोजाना डाइट में इसे शामिल करते हैं तो दूसरे तत्वों और फाइबर की कमी को भी यह पूरी करती है. ककोड़े यानी मीठा करेला को सेहतमंद माना जाता है. आयुर्वेद में भी इसे सबसे ताकतवर सब्जी के रूप में माना गया है.

एंटी एलर्जिक : कंटोल में एंटी-एलर्जन और एनाल्जेसिक सर्दी खांसी से राहत प्रदान करने और इस रोकन में काफी सहायक है.

हाई ब्लड प्रेशर होगा दूर : कंटोला में मौजूद मोमोरडीसिन तत्व और फाइबर की अधिक मात्रा शरीर के लिए रामबाण हैं. मोमोरेडीसिन तत्व एंटीऑक्सीडेंट, एंटीडायबिटीज और एंटीस्टे्रस की तरह काम करता है और वजन और हाई ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखता है.

पाचन क्रिया होगी दुरुस्त : अगर आप इसकी सब्जी नहीं खाना चाहते तो अचार बनाकर भी सेवन कर सकते हैं. आयुर्वेद में कई रोगों के इलाज के लिए इसे औषधि के रूप में प्रयोग करते हैं. यह पाचन क्रिया को दुरुस्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

कैंसर से बचाए : कंटोला में में मौजूद ल्युटेन जैसे केरोटोनोइडस विभिन्न नेत्र रोग, हृदय रोग और यहां तक कि कैंसर की रोकथाम में सहायक है.

वजन घटाने में सक्षम: कंटोला में प्रोटीन और आयरन भरपूर होता है जबकि कैलोरी कम मात्रा में होती है. यदि 100 ग्राम कंटोला की सब्जी का सेवन करते हैं तो 17 कैलोरी प्राप्त होती है. जिससे वजन घटाने वाले लोगों के लिए यह बेहतर विकल्प है.

बासमती उगाने वाले किसानों के लिए चिंता की खबर, घटकर आधा हो सकता है मुनाफा

इस साल मानसून में खूब बारिश हो रही है। इस बारिश को धान के लिए वरदान लिए कहा जाता है। किसानों के चेहरे पर रौनक भी है। लेकिन चावल की सबसे बेहतरीन प्रजाति यानी बासमती पैदा करने वाले किसानों के लिए ये खबर निराश करने वाली हो सकती है।

अच्छे मुनाफे की बाट जोह रहे इन किसानों की उम्मीदों पर पानी फिर सकता है। खतरनाक रसायनों के अत्यधिक प्रयोग के कारण यूरोपियन संघ के बाद अब सऊदी अरब ने भी भारत से आयात होने वाले बासमती चावल पर कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है।

कुछ महीने पहले यूरोपीय संघ ने बासमती चावल में फंफूदीनाशक ट्रासाइक्लाजोल के लिए अवशेष सीमा कम कर 0.01 एमजी (मिलीग्राम) प्रति किलो निर्धारित किया था वहीं अब सऊदी फूड एंड ड्रग अथॉरिटी (SAUDA) ने नई गाइडलाइंस के तहत बासमती धान में कीटनाशकों के प्रयोग को 90 फीसदी तक कम करने को कहा है।

बाजार में अभी नई फसल नहीं आई है बावजूद इसके इसका असर दिखने लगा है। कृषि और प्रंसस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) के ताजा आंकड़ों के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2018-19 के पहले तीन महीनों अप्रैल से जून के दौरान बासमती चावल के निर्यात में सात फीसदी तक गिरावट दर्ज की गई है। बासमती धान की फसल अगले दो से तीन महीने में पककर तैयार हो जाएगी।

भारत पिछले पांच वर्षां से विश्व का सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश है, लेकिन निर्धारित अवशेष सीमा (एमआरएल) से अधिक कीटनाशकों के अवशेषों के पाए जाने के कारण पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका, यूरोप और ईरान जैसे बाजारों में निर्यातकों की परेशानी बढ़ गई है।

यूरोप की तरह सऊदी अरब ने भी कीटनाशकों के प्रयोग के लिए नई गाइडलाइन जारी कर दी है जिसके बाद से भारतीय ट्रेडिंग कंपनियों पर संकट आ गया है। यूरोपियन संघ ने आयात किए जाने वाले बासमती में मिलने वाले फंगेसाइड केमिकल (ट्राइसाइक्लोजाल) की मात्रा 1 पीपीएम से घटाकर 0.01 पीपीएम कर दिया था और अब सउदी अरब भी ऐसा करने जा रहा है।

“बासमती चावल में निर्यात सौदे कम होने के कारण धान की मांग कम हो गई है। जैसी खबरें आ रही हैं, उसके अनुसार तो आने वाले समय में मांग और घट सकती है।

यदि यह रोक जारी रहती है तो बासमती से प्रति क्विंटल औसतन 3500 रुपए तक कमाने वाले किसान को इसका आधा दाम भी मिलना मुश्किल हो जाएगा क्योंकि इस धान का भाव निर्यात पर निर्भर करता है। इस रोक के बाद अब यूरोप में पाकिस्तान के चावल की दखल बढ़ सकती है। भारत बासमती चावल का सबसे बड़ा निर्यातक है।

बासमती चावल के बड़े किसान अमृतसर के हरवंश सिंह कहते हैं “हमें दवाओं के बारे में सही जानकारी ही नहीं है। यूरोपिय संघ के रोक के बाद सऊदी का ये फैसला हम जैसे किसानों के लिए बहुत परेशानी खड़ी करे वाला है। दाम सही नहीं मिला तो हमारे यहां के किसानों को किसी और फसल की ओर ध्यान देना पड़ेगा।

एक्सपोर्ट में बड़ी गिरावट

भारत बासमती चावल का सबसे बड़ा निर्यातक है।  जहरीले कीटनाशकों के प्रयोग के कारण निर्यात में लगातार कमी दर्ज की जा रही है। चालू वित्त वर्ष 2018-19 के पहले तीन महीनों अप्रैल से जून के दौरान बासमती चावल के निर्यात में मात्रा के हिसाब से 7 फीसदी की गिरावट आई है।

बासमती चावल बेचने वाले देश के बड़े बासमती चावल निर्यातकों में शुमार कोहिनूर फूड्स के संयुक्त प्रबंध निदेशक गुरनाम अरोड़ा ने को बताया “निर्यात में कमी आ रही है। हम किसानों को कीटनाशकों के बारे में जानकारी भी दे रहे हैं। ये उनके हित में ही है। नई फसल आने में अभी समय है। ऐसे में हम लगातार यूरोपीय संघ और सऊदी अरब के अधिकारियों से बात कर रहे हैं।

हो सकता है कि आने वाले समय में समस्या का समाधान भी हो जाए। लेकिन अब समय आ गया है कि किसान मानकों के अनुसार ही कीटनाशकों का प्रयोग करें, वरना नुकसान बढ़ता ही जाएगा लेकिन अब चीन भी भारतीय बासमती चावल भारत से आयात करने जा रहा है, ऐसे में स्थिति में थोड़ा सुधार हो सकता है।”

ऐसे में किसानों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे अगर पेस्टीसाइड का प्रयोग कम कर देंगे तो पैदावार घट सकती है। ऐसे में उनके पास विकल्प कम बचते हैं। इस बारे में गुरनाम अरोड़ा ने कहा कि हम किसानों को कुछ मुआवजा भी देने की बात कर रहे हैं, ताकि उनके घाटे को कम किया जा सके।

Alert ! देश के इन 21 राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट जारी

देश में जहां बारिश ने कई हिस्सों में भारी तबाही मचाई हुई है। वहीं कई हिस्से ऐसे भी हैं जहां या तो सूखा पड़ा है या फिर सामान्य से भी कम बारिश हुई है। अगर बारिश से मची भारी तबाही की बात करें तो केरल की स्थिति दयनीय है ।

यहां बीते 24 घंटे में बारिश और भूस्खलन से 26 मौतें हो चुकी हैं। इनमें 11 लोग इडुक्की जिले के हैं। मलबे से दो लोगों को जिंदा निकाला गया है। वहीं अमेरिका ने आज एक परामर्श जारी कर अपने नागरिकों से कहा कि वह बारिश और बाढ़ से जूझ रहे केरल की यात्रा पर जाने से बचें। वही दूसरी तरफ मौसम विभाग ने अगले तीन दिन तक 21 राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट जारी किया है।

उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, झारखंड, बिहार, पश्चिमी बंगाल, सिक्किम, मध्यप्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, नगालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और अंडमान निकोबार द्वीप समूह शामिल हैं। वहीं पूरे देश में अभी तक सामान्य से 10 फीसदी कम बारिश हुई है। 47 फीसदी हिस्सा ऐसा है जहां सामान्य बारिश हुई है। वहीं 39 फीसदी हिस्से में कम बारिश हुई है।

भारी बारिश के कारण कई नदियां उफान पर हैं जिस कारण राज्य के विभिन्न हिस्सों में कम से कम 24 बांधों को खोल दिया गया है। एशिया के सबसे बड़े अर्ध चंद्राकार बांध इडुक्की जलाशय से पानी छोड़े जाने से पहले रेड अलर्ट जारी कर दिया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केरल में भारी वर्षा एवं बाढ़ के आलोक में गुरुवार को मुख्यमंत्री पिनराई विजयन से बातचीत की और प्रभावित लोगों के लिए सभी संभव सहायता की पेशकश की।

जिन राज्यों ने बारिश ने भारी तबाही मचाई हुई है उनमें उत्तराखंड का भी नाम शामिल है। बारिश के कारण कैलाश मानसरोवर यात्रा प्रभावित हुई है। इस दौरान भूस्खलन आने से राज्य की 150 से अधिक सड़कें भी ब्लॉक हो चुकी हैं। जिस कारण चारधाम यात्रा रोकनी पड़ी। वहीं ऋषिकेश-यमुनोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग भी बीते एक सप्ताह से प्रभावित है। मौसम विभाग ने राज्य में अगले तीन दिनों में भारी बारिश का अनुमान जताया है।

एग्री बिजनेस के गुर के साथ ऑर्गेनिक फार्मिंग सीख ऐसे कमाए पैसा , सरकार दे रही है ट्रेनिंग, ऐसे करे अप्लाई

पिछले कुछ सालों में एग्री प्रोडक्‍ट्स (Agri Business) खासकर ऑर्गेनिक (Organic) की डिमांड काफी बढ़ी है। एक रिपोर्ट बताती है कि साल 2020 तक देश में ऑर्गेनिक मार्केट 12 हजार करोड़ रुपए को छू लेगा। देश ही नहीं, विदेशों में भी ऑर्गेनिक प्रोडक्‍ट्स की डिमांड बढ़ रही है। इसी संभावना को देखते हुए केंद्र सरकार द्वारा बेरोजगार युवाओं को एग्री बिजनेस के गुर सिखाए जा रहे हैं। इसमें,ऑर्गेनिक फार्मिंग की बारीकियां भी बताई जाएंगी।

आप भी दो दिन की यह ट्रेनिंग ले सकते हैं। ट्रेनिंग मिनिस्‍ट्री ऑफ स्किल डेवलपमेंट द्वारा संचालित निसबड इंस्‍टीट्यूट द्वारा दी जा रही है। इस दो दिन की ट्रेनिंग के लिए 7000 रुपए फीस ली जा रही है। आइए, आज आज हम आपको बताएंगे कि ऑर्गेनिक फार्मिंग क्‍या है और इसका बिजनेस कैसे किया जा सकता है।

क्‍या है ऑर्गेनिक फार्मिंग

ऑर्गेनिक फार्मिंग टॉक्सिक लोड कम करती है। हवा, पानी, मिट्टी से केमिकल को हटाकर फसल पैदा करने की प्रक्रिया को ऑर्गेनिक फार्मिंग कहा जाता है। जो इन्‍वायरमेंट फ्रेडली होती है, नेचर को नुकसान नहीं पहुंचाती और हमारे शरीर के लिए पूरी तरह फिट होती है।

पिछले कुछ सालों में हमारे देश वासी अपनी हेल्‍थ के प्रति काफी जागरूक हो गए हैं और ऐसे प्रोडक्‍ट्स को अपना रहे हैं, जो उनके शरीर के साथ-साथ इन्‍वायरमेंट को नुकसान नहीं पहुंचाते हों। हालांकि कैमिकल के इस्‍तेमाल से पैदा होने वाले फूड प्रोडक्‍ट्स सस्‍ते होते हैं। बावजूद इसके, जागरूकता के चलते ऑर्गेनिक फार्मिंग से पैदा प्रोडक्‍ट्स की डिमांड बढ़ रही है।

सरकार दे रही है ट्रेनिंग

सरकार ने देश में ऑर्गेनिक फार्मिंग बिजनेस को प्रमोट करने के लिए ट्रेनिंग प्रोग्राम तैयार किया है। केंद्र सरकार की मिनिस्‍ट्री ऑफ स्किल डेवलपमेंट के अंतर्गत चल रहे इंस्टिट्यूट निसबड ने यह प्रोग्राम तैयार किया है। निसबड द्वारा 18 व 19 अगस्‍त को इसकी ट्रेनिंग दी जाएगी। जिसकी फीस 7000 रुपए रखी गई है।

क्‍या मिलेगी ट्रेनिंग

  • ऑर्गेनिक फार्मिंग का सिद्धांत
  • ऑर्गेनिक एग्रीकल्‍चर का वर्तमान परिदृश्‍य
  •  ऑर्गेनिक फार्मिंग क्‍यों
  • ऑर्गेनिक फार्मिंग के फायदे
  •  पारंपरिक खेती को ऑर्गेनिक खेती में कैसे बदलें
  • इनपुट मैनेजमेंट
  • सीड एवं प्‍लांटिंग मैनेजमेंट
  •  ऑर्गेनिक फार्मिंग सर्टिफिकेशन कैसे हासिल करें
  •  न्‍यूट्रिशियन मैनेजमेंट
  • ऑफ फार्म टैक्‍नोलॉजी इनपुट
  • ऑर्गेनिक फील्‍ड एवं क्रॉप मैनेजमेंट

कैसे शुरू करें बिजनेस

आप ऑर्गेनिक फार्मिंग की बेसिक बातें सीखकर एग्री बिजनेस शुरू कर सकते हैं। ट्रेनिंग के दौरान एग्री बिजनेस के बारे में बताया जाएगा। जैसे कि –

  • स्‍टार्ट अप इंडिया मुहिम के तहत एग्री बिजनेस को कैसे जोड़ा जाए
  • एग्री एंटरप्रेन्‍योर कौन हो सकते हैं
  •  एग्री बिजनेस का ओवरव्‍यू, मार्केट साइज, संभावनाएं, डेयरी, ऑर्गेनिक फार्मिंग प्रोडक्‍ट्स, फूड प्रोसेसिंग, पॉल्‍यूटरी एवं सहायक मार्केट
  •  कैसे शुरू किया जाए एग्री बिजनेस
  • फार्म से रिटेल यूनिट तक सप्‍लाई चेन कैसे बनाएं
  • अपने प्रोडक्‍ट्स को बेचने के लिए सोशल मीडिया का इस्‍तेमाल कैसे करें
  • ऑर्गेनिक फूड प्रोडक्‍ट्स के लिए फॉरेन मार्केट तक कैसे पहुंच बनाएं
  • अपने बिजनेस का बढ़ाने के लिए सरकारी स्‍कीमों का लाभ कैसे लें।
  • इसके अलावा ट्रेनिंग के दौरान डेयरी बिजनेस की भी बारीकियां बताई जाएंगी।

कैसे करें अप्‍लाई

अगर आप इस ट्रेनिंग प्रोग्राम में शामिल होना चाहते हैं तो आप इस लिंक पर क्लिक करके रजिस्‍ट्रेशन संबंधी जानकारी ले सकते हैं या फार्म भर सकते हैं।

https://www.niesbud.nic.in/

किसानों की आमदनी बढ़ा रहें है ये 3 Mobile App ,ऐसे करें इस्‍तेमाल

किसानों को जितना नुकसान मौसम और सूखे से नहीं होता, उतना सही समय पर सही सूचना न मिलने से होता है। लेकिन अब बाजार में कई ऐसे ऐप आ गए हैं जिससे किसान खेती से जुड़ी हर जानकारी हो लेकर अपडेट रह सकते हैं। इसमें मौसम से लेकर मंडी तक का अपडेट रहता है। अगर किसान इन ऐप का इस्‍तेमाल करें तो न सिर्फ उनका नुकसान कम होगा बल्कि उनकी आमदनी भी बढ़ सकती है।

अच्‍छी फसल का फायदा भी नहीं ले पाते किसान

कई बार बाढ़ से तो कई बार सूखे से किसानों की फसल चौपट हो जाती है। लेकिन जब अच्‍छी फसल होती है, तो उस वर्ष फसल के दाम गिर जाते हैं। ऐसेे में भी कई बार किसान अच्‍छा फायदा नहीं ले पाते हैं। हालांकि किसान अगर इन ऐप का इस्‍तेमाल करें तो अपनी फसल की अच्‍छी कीमत घर बैठे पा सकता है।

मोबाइल ऐप दे रहे जानकारी

कई कंपनियों और स्‍टार्टअप ने मोबाइल ऐप तैयार किए हैं। यह किसानों से जुड़ी पूरी जानकारी दे रहे हैं। इसमें फसल का रेट कहां क्‍या है, यह जानकारी सबसे महत्‍वपूर्ण है। इससे किसान घर बैठे जानकारी कर सकता है कि उसकी फसल का सही रेट कहां मिल सकता है। इसके अलावा किसान यह भी जान सकता है कि कौन उस फसल को खरीदेगा।

मिलती हैं अन्‍य जानकारियां भीं

इन ऐप से आपको सरकारी की कृषि से जुड़ी सब्सिडी की जानकारी भी मिलती है। इस आधार पर भी आप अपनी पैदावार से ज्‍यादा फायदे में बदल सकते हैं। इसके अलावा मौसम की जानकारी भी आपको कौन सी फसल लगानी चाहिए, यह फैसला करने में मदद कर सकती है। इसके अलावा मिट्टी से जुड़ी जानकारी, फूड प्रोसेसिंग यूनिट, रिटेलर सहित एग्री मार्केटिंग की जानकारी भी मिल सकती है।

कई ऐप हैं बाजार में

IFFCO किसान संचार

IFFCO का ऐप किसान संचार के नाम से है। इससे अभी तक 40 लाख किसान जुड़ चुके हैं। इस एेप में फसलों सहित अन्‍य कृषि से जुड़ी चीजों के रेट, मौसम की भविष्‍यवाणी, मिट्टी के टेस्‍ट सहित जानवरों की देखरेख तक की जानकारी आसानी से ली जा सकती है। यह ऐप एयरटेल के सिम पर उपलब्‍ध है और इसके लिए कंपनी मामूली सा चार्ज लेती है।

RML एजीटेक

इस ऐप से अभी तक 12 लाख किसान जुड़ चुके हैं। इस ऐप में फसलों के दाम के अलावा उसके भाव का ट्रेंड, फसल के ट्रेंड के अलावा फसल की सुरक्षा की जानकारी दी जाती है। हालांकि यह ऐप फ्री है, लेकिन इसके कुछ फीचर के इस्‍तेमाल के लिए पैसे देने पड़ते हैं।

वोडा किसान मित्र

इस ऐप में मंडियों का भाव, सरकारी सब्सिडी सहित अन्‍य जानकारी और मौसम की जानकारी मिलती है। इसके अलावा किसानों से जुड़ी कई अन्‍य जानकारी भी मिलती हैं। यह ऐप वोडा के कनेक्‍शन के साथ मिलता है। इसके लिए 9 रुपए की फीस ली जाती है।

फोन पर भी जानकारी लेने का विकल्‍प

कई ऐप ऐसे भी हैं जो फोन पर भी जानकारी लेने का विकल्‍प देते हैं।

IARI M-Krishi

इस एेप से अभी तक करीब 50 हजार किसान जुड़ चुके हैं। इस ऐप के माध्‍यम किसान SMS से जानकारी ले सकते हैं। अगर किसी किसान को लगता है कि उसे और जानकारी की जरूरत है, तो वह ऐप से जुड़े कॉलसेंटर से फोन करके और जानकारी ले सकता है। इसमें देशभर में लगने वाले किसान मेलों की जानकारी भी दी जाती है। यह ऐप बिल्‍कुल फ्री है।

क्रोपिन (CROPIN)

इस ऐप से करीब 5 लाख किसान फायदा उठा रहे हैं। इस ऐप से कृषि कारोबार से जुड़ी जानकारी दी जाती है। इस ऐप को लाने वाली कंपनी ने करीब 120 बड़ी कंपनियों से समझौता किया है, जो कृषि कारोबार से जुड़ी हैं। यह ऐप फ्री में डाउनलोड किया जा सकता है, इस ऐप के कुछ फीचर का इस्‍तेमाल फीस देने के बाद ही किया जा सकता है।

HANDYGO

इस ऐप से अभी तक करीब 30 लाख किसान जुड़े हैं। इस ऐप में किसानों को IVRS मॉडल से कॉल करके जानकारी की सुविधा मिलती है। इसमें किसान कृषि से जुड़ी जानकारी के अलावा मौसम, बीज और फसल सुरक्षा की जानकारी ले सकते हैं। इस एेप से जुड़े कॉल सेंटर पर फोन करने पर 1 से लेकर 2 रुपए प्रति मिनट का चार्ज देना पड़ता है।

मेंथा किसानों की बल्ले-बल्ले, इतने रुपए किलो में बिका तेल

मौजूदा सीजन मेंथा किसानों के लिए कमाई वाला साबित हो रहा है। इस पेराई सीजन में मेंथा की कीमतें 1600 रुपए प्रति किलो तक पहुंच चुकी हैं। पिछले 15 दिनों से ये कीमतें 1400 से 1600 रुपए के बीच बनी हुई हैं। मेंथा से इस साल हुई आय से न सिर्फ अगले वर्ष मेंथा का रकबा बढ़ेगा, बल्कि इस वर्ष आलू की फसल ज्यादा बोई जाएगी।

“ये सीजन मेंथा के लिए बहुत अच्छा गया है। जिन किसानों ने सीमैप या दूसरी उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल किया है, उनका उत्पादन प्रति एकड़ 60 किलो तक उत्पादन हुआ है, अगर 1500 रुपए का भी रेट मिला तो करीब 90 हजार रुपए मिले, जिसमें से अगर 31,250 रुपए की लागत निकाल दें तो भी करीब 58000 रुपए का किसानों को शुद्ध मुनाफा होने की उम्मीद है।”

डॉ. सौदान सिंह कहते हैं। डॉ. सिंह मेंथा की नई किस्में और तकनीकी विकसित करने वाली सरकारी संस्था सीमैप में मुख्य वैज्ञानिक हैं। यूपी, बिहार, उत्तराखंड और पंजाब समेत कई राज्यों में इस बार मेंथा की फसल ली गई। मेंथा के गढ़ यूपी के बाराबंकी समेत कई जिलों में किसान पहली चक्र की कटाई कर दूसरे की तैयारी में लगे हुए। मेंथा की रोपाई फरवरी-मार्च में की जाती है।

जिससे 90 दिन में पहली कटाई हो जाती है। मेंथा की सूखी पत्तियों का आसवन कर तेल निकाला जाता है। एक मोटे अनुमान के मुताबिक दुनिया में प्रति वर्ष करीब 40,000 टन तेल की मांग है, जबकि भारत में अभी भी सिर्फ 25,000 टन का उत्पादन हो रहा है, जिसका सीधा मतलब है कि आगे बहुत संभावनाएं हैं। भारत दुनिया में प्राकृतिक मेंथा का सबसे बड़ा निर्यातक बनकर उभरा है।

सीमैप के एक और वरिष्ठ वैज्ञानिक संजय सिंह के मुताबिक, “इस बार सीमैप द्वारा दी गई जड़ों और किसानों के पास की पौध के आसार पर करीब 2 लाख 80 हजार हेक्टेयर में मेंथा की बुआई हुई थी, अगले साल ये आंकड़ा साढ़े तीन लाख हेक्टेयर को पार कर सकता है। जर्मनी में सिंथेटिक मेंथा बनाने वाली फर्म इस सीजन भी चालू नहीं हो पाई है। जिसके चलते प्राकृतिक मेंथा की मांग बढ़ी है।”

हालांकि मौसम की बेरुखी के चलते उत्पादन पर असर पड़ा है। संजय सिंह के मुताबिक कई राज्यों के शुरुआती दिनों में 10 फीसदी तक तेल कम निकला है। मेंथा कल्टीवेशन और प्रोडक्शन से जुड़ी फर्म एग्रीबिजनेस सिस्टम इंटरनेशनल में शुभ मिंट प्रोजेक्ट के प्रोजेक्ट मैनेजर अभिजीत शर्मा गांव कनेक्शन को बताते हैं,

“जिन किसानों ने जून से पहले पेराई की, उनमें तेल कम निकला है, क्योंकि पुरवा हवाओं के चलते पर्याप्त गर्मी नहीं थी। उसके बाद का उत्पादन अच्छा रहा, जो हमारे किसानों के बीच भी 60-62 किलो प्रति एकड़ तक गया है।” मेंथा का उत्पादन उसकी अच्छी किस्म की पौध और नई तकनीकों और वैज्ञानिक सलाहों पर निर्भर करता है। पुरानी जड़ों से पौध तैयार करने, जलभराव, वक्त पर सिंचाई और रोग का निदान न करने पर ये उत्पादन 40 से 50 किलो या उससे कम प्रति एकड़ उत्पादन होता है।

मेंथा का तेल उसकी पत्तियों की सतह पर उपस्थित ग्रंथियों में होता है। करीब 85-90 दिन की फसल तेज गर्मी होने पर ये तेल जमीन से पत्तियों में जमा हो जाता है। कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक मेंथा ऐसी फसल है, जिसमें अच्छे उत्पादन के लिए जरूरी है कि पेराई से पहले पौधों को (तनाव) टेंशन हों, जिसके लिए तेज गर्मी और सिंचाई का न होना अच्छा माहौल होता है।

इसीलिए पेराई से एक हफ्ते पहले से सिंचाई बंद कर दी जाती है। बाराबंकी के जिला उद्यान अधिकारी महेंद्र कुमार बताते हैं, “इस बार जिले में करीब 80 लाख हेक्टेयर में मेंथा था, मेंथा के सीजन में यहां ज्यादातर जगह मेंथा होता है।

किसानों को इसका अच्छा लाभ हुआ है, लेकिन सामान्य पेराई टंकियों के चलते कई हादसे हुए हैं, इसलिए मेरी किसान भाइयों से अपील है कि अगली बार अच्छी गुणवत्ता वाले पेराई संयंत्र लगवाएं, जिसमें सेफ्टी वाल्व हो, ताकि हादसे का डर न रहे, दूसरा आधुनिक संयंत्र से 10-15 फीसदी तेल ज्यादा निकलता है।” मेंथा के तेल में हुए मुनाफे से न सिर्फ आगामी वर्ष में मेंथा रकबा बढ़ने की उम्मीद है, बल्कि इससे आलू का भी रकबा बढ़ेगा।

किसानों में मेंथा काटकर खेत तैयार कर आलू बोएंगे और फिर अगैती आलू की फसल निकालकर मेंथा। सीमैप के वैज्ञानिक डॉ. सैदान सिंह गांव कनेक्शन को बताते हैं, “90-100 दिनों में किसान को औसतन प्रति हेक्टेयर पौने दो लाख तक मुनाफा हुआ है। जो किसी फसल के अनुपात में काफी ज्यादा है। इसलिए पहले आलू और फिर मेंथा का रकबा बढ़ना लगभग तय है, अभी किसान नर्सरी के लिए पौधों के लिए दौड़भाग कर रहे हैं।”

आप भी ऐसे कर सकते हैं चंदन की खेती, एक किलो लकड़ी की कीमत है 6000 रुपए

चंदन की खेती आपको शेयर मार्केट या मच्यूल फंड से भी ज्यादा इनकम दे सकती है वो भी गारंटी आैर बिना रिस्क के। इसके लिए कम से कम 20 साल जमीन बाउंड करके चलना पड़ेगा क्योंकि सागवान की तरह ही चंदन के पेड़ को तैयार होने में 15 से 20 साल लग जाते हैं।

कर्नाटक में तो इसके भरपूर जंगल हैं लेकिन धीरे-धीरे इसे आैर किसान भी उगाने लगे हैं। गुजरात के भरूच के एक किसान ने 10 लाख लगाकर चंदन की खेती स्टार्ट की थी। 15 से 20 साल में उसने 15 करोड़ की कमाई की थी।

यानी इस हिसाब से प्रति 1 लाख रु का इन्वेस्टमेंट करके 1.5 करोड़ रु का रिटर्न मिला। इसकी लकड़ी 6000 रुपए किलो तक बिक जाती है। आप भी चंदन की खेती कर लाखों-करोड़ों रुपए कमा सकते हैं। यह सामान्य तापमान में पैदा हो सकता है।

चंदन 6000 रुपए किलो बिकता है यानी आम लकड़ी से 15000% ज्यादा

खेती – नर्सरी से पौधे लाकर या फिर बीज डालकर चंदन की खेती की जा सकती है। चंदन का पेड़ लाल दोमट मिट्टी में अच्छा उगता है। यह चट्टानी मैदान, पथरीली मिट्टी में भी हो सकता हैं। गिली मिट्टी में इसकी ग्रोथ कम होती है।

बुवाई- मानसून में इसके पेड़ तेजी से ग्रोथ करते हैं, लेकिन गर्मियों में इन्हें इरीगेशन (सिंचाई) की जरूरत होती है।

सिंचाई – इसमें ड्रिप प्रॉसेस से इरीगेशन किया जाता है। चंदन के पेड़ को 5 से 50 डिग्री सेल्सियस टेम्प्रेचर वाले इलाके में लगाना सही माना जाता है। इसके लिए 7 से 8.5 पीएच वाली मिट्टी परफेक्ट होती है। यानी पंजाब में किसान इसकी खेती का एक्सपेरिमेंट कर सकते हैं। एक एकड़ में औसत 400 पेड़ लगाए जा सकते हैं।

एक पेड़ की जड़ से 3 लीटर तक निकलता है तेल

कितने समय में बढ़ते हैं पेड़-चंदन लगाने के बाद 5वें साल से लकड़ी रसदार बनना शुरू हो जाती है। 12 से 15 साल के बीच यह बिकने के लिए तैयार हो जाता है। चंदन के पेड़ की जड़ से सुगंधित प्रोडक्ट्स बनते हैं। इसलिए पेड़ को काटने के बजाए जड़ से ही उखाड़ा जाता है।

उखाड़ने के बाद इसे टुकड़ों में काटा जाता है। ऐसा करके रसदार लकड़ी को कर लिया जाता है। एवरेज कंडीशन में एक चंदन के पेड़ से करीब 40 किलो तक अच्छी लकड़ी निकल जाती है। चंदन के पेड़ में सबसे महंगी चीज इसका तेल होता है।

एक पेड़ की जड़ से करीब पौने 3 लीटर तक तेल निकलता है। चंदन की खेती को बढ़ावा देने के लिए कई प्रदेशों में यह प्रावधान किया गया है कि चंदन उगाने वाले किसान उसे काट सकेंगे लेकिन इसकी परमिशन लेनी जरूरी होगी।

इन्वेस्टमेंट – एक पौधा 40-50 रुपए में मिलता है। एक एकड़ में 400 पेड़ पर 20 हजार खर्च होंगे। चंदन के पेड़ों का इंश्योरेंस भी करवाया जाता है, क्योंकि इन पेड़ों के चोरी का डर होता है। आप खुद भी इसकी देखरेख कर सकते हैं। इन सबके अलावा सिंचाई पर भी खर्च करना होगा।

देश के इन हिस्सों में भारी बारिश की चेतावनी, आंधी-तूफान का भी अलर्ट

मौसम विभाग ने दिल्ली-एनसीआर समेत देश के कई राज्यों में भारी बारिश और आंधी-तूफान की चेतावनी जारी की है। मौसम विभाग के मुताबिक, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, कर्नाटक, कोंकण समेत आंध्र प्रदेश के तटीय इलाकों में भी भारी बारिश का अनुमान है।

बात सिर्फ उत्तर प्रदेश की करें तो अगले तीन घटों में भारी बारिश और आंधी-तूफान की चेतावनी जारी की है। मौसम विभाग के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के मेरठ, बागपत, हापुड़, बुलंदशहर और अमरोहा जिले से सटे इलाकों में भारी बारिश होगी। साथ ही बारिश के साथ थंडरस्टॉर्म की भी संभावना व्यक्त की गई है।

मौसम विभाग ने के मुताबिक, आज यानी 22 जुलाई को उत्तराखंड में भारी बारिश होने की आशंका है। मौसम विभाग के मुताबिक आज पंजाब, हिमाचल प्रदेश, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, विदर्श, छत्तीसगढ़, ओडिशा, कर्नाटक और केरल के भी तमाम इलाकों में बारिश हो सकती है। वहीं मौसम विभाग का कहना है कि 23 जुलाई को भी उत्तराखंड, पश्चिमी मध्य प्रदेश, मध्य महाराष्ट्र, कोंकण, गोवा, कर्नाटक और केरल में बारिश होने की संभावना है।

इसके अलावा जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मराठवाड़ा के तमाम इलाकों में भी बारिश होने की उम्मीद है। 24 और 25 जुलाई को भी उत्तराखंड, गोवा, कोंकण, कर्नाटक, केरल, जम्मू-कश्मीर और गुजरात के कुछ इलाकों में बारिश हो सकती है।

आपको बता दें कि आज शनिवार को दिल्ली एनसीआर में जमकर बारिश हुई। शनिवार को हुई भारी बारिश से लोगों को तेज गर्मी और उमस से राहत मिल गई है। तापमान में भी गिरावट आई है। गौरतलब है कि पिछले सप्ताह मुंबई में भी भारी बारिश देखने को मिली थी।