ये है अनार की सिंदूरी किसम,किसानो को कर रही है मालामाल

शेखावाटी के धोरों को सिन्दूरी अनार भा गया है। आबोहवा की अनुकूलता के कारण जिले में कई स्थानों पर सिन्दूरी अनार के पेड़ लहलहा रहे हंै। महज छह वर्षों में सीकर जिला प्रदेश में सिन्दूरी अनार के लिए प्रथम स्थान पर पहुंच गया है।

इसके साथ ही किसानों की तकदीर बदल गई है। इस समय जिले में करीब 1500 हैक्टेयर में सिन्दूरी अनार की खेती हो रही है। विशेषज्ञों की माने तो अगले दो वर्ष में सिन्दूरी अनार की खेती दो हजार हैक्टेयर में होने लगेगी।

तीन वर्ष में उत्पादन शुरू

राष्ट्रीय बागवानी मिशन योजना के तहत सीकर जिले में वर्ष 2008-09 में सिन्दूरी अनार की खेती शुरू हुई थी। सिन्दूरी अनार का पौधा तीन वर्ष में उपज देना शुरू कर देता है। सिन्दूरी अनार का बगीचा लगाने के लिए उद्यान विभाग की ओर से 30 हजार रुपए प्रति हैक्टेयर तक अनुदान दिया जाता है। अनार की अन्य किस्मो की बजाए सिन्दूरी अनार टिकाऊ, स्वादिष्ट व निर्यात योग्य होते हैं।

ऐसे होती है अनार की खेती

  • अनार के पौधों में लवण एवं क्षारीयता सहन करने की अच्छी क्षमता होती है। -6.5 से 7.5 पीएच मान, 900 ईसी/मिमी मृदा लवणता तथा 6.78 ईएसपी तक क्षारीयता वाली मिट्टी में भी इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है।
  • अनार की खेती के लिए गहरी बलुई दोमट भूमि सबसे उपयुक्त होती है, परन्तु क्षारीय भूमि में भी इसकी खेती की जा सकती है।
  • यही नहीं लवणीय पानी से सिंचाई करके भी अनार की अच्छी पैदावार ली जा सकती है।
  • शुष्क एवं अद्र्ध शुष्क क्षेत्र की जलवायु अनार उत्पादन के लिए अति उत्तम है।
  • फलों के विकास तथा पकने के समय गर्म एवं शुष्क जलवायु उपयुक्त होती है।
  • पूर्ण विकसित फलों में रंग तथा दानों में गहरा लाल रंग तथा मिठास के लिए अपेक्षाकृत कम तापमान की आवश्यकता होती है।
  • वातावरण तथा मृदा में नमी एवं तापमान में अत्यधिक उतार-चढ़ाव से फलों के फटने की समस्या बढ़ जाती है, जिससे उनकी गुणवत्ता पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है।

प्रदेश में होने लगे पौधे

सिन्दूरी अनार की किस्म मूलत: महाराष्ट्र इलाके की है। पौधे की मांग को देखते हुए उद्यान विभाग ने शुरुआती वर्षों में महाराष्ट्र के मालेगांव से सिन्दूरी अनार के पौधे मंगवाए। किसानों के रूझान को देखते हुए अब खेतों व सरकारी नर्सरियों में सिन्दूरी अनार की कलम से पौधे तैयार किए जाने लगे है।

किसानो ने RTI तहत मांगी थी ये जानकारी , विभाग ने 150 किलो कागज पर लिख भेजा जवाब

गेहूं और सरसों की खरीद से जुड़ी जानकारियां एवं किसानों को किए गए भुगतान के संबंध में मांगी गई आरटीआइ के बदले सिरसा के हैफेड विभाग ने 68,834 रुपये सूचना के बदले वसूल किए हैं। सूचना के 32017 पेज बनाए गए है। 32017 पेजों की सूचना के लिए एक ¨क्वटल साठ किलो कागज डाक विभाग के पास भेजा गया है।

दड़बा निवासी अनिल कस्वां ने सूचना उपायुक्त कार्यालय से मांगी कि सरसों व गेंहू की कितनी कितनी खरीद हुई। कितने किसानों ने फसल बेची और विभाग के पास किसानों को देने के लिए कब बजट पहुंचा। बैंक में किस खाते में कितने दिनों तक राशि रखी गई या अन्य खातों में रखी गई, उनकी जानकारी मांगी गई थी।

साथ ही उन किसानों की जानकारी भी मांगी गई, जिनके खातों में अभी तक राशि नही गई। उपायुक्त कार्यालय ने 25 जून 2018 को इस सूचना को हैफेड और फूड सप्लाई विभाग को भेज दिया और जानकारी उपलब्ध करवाने को कहा।

हैफेड ने 16 जुलाई को आवेदक को पत्र भेज कर 68,834 रुपये जमा करवाने को कहा, जिसमें 32017 पेजों की सूचना तैयार किए जाने व 800 रुपये पोस्टल खर्च के बताए गए। प्रति पेज दो रुपये की दर से बताते हुए 19 जुलाई को डाक से सूचना भेजी गई, जिसके बाद शिकायतकर्ता की ओर से 30 जुलाई को बैंक के माध्यम से मांगी गई राशि जमा करवा दी गई।

विभागीय अधिकारियों ने सूचना भेज देने की जानकारी दे रहे हैं और एक् ¨क्वटल साठ किलो वजन की सूचना भेजी गई है। उधर डाक विभाग को इतनी अधिक मात्रा में डाक भेजने के लिए सिरसा से दड़बा के लिए गाड़ी भेजनी होगी। डाक विभाग के कर्मचारी ने बताया कि हैफेड की डाक दड़बा कलां के लिए आई है। स्पेशल गाड़ी भेजनी पड़ रही है। कर्मचारियों के अनुसार आरटीआइ में इतना अधिक वजनी सूचना भेजने का सिरसा का यह पहला मामला है।

मुझे तो अभी तक नहीं मिली डाक

आरटीआइ लगाने वाले अनिल कुमार ने बताया कि पिछले कुछ दिनों से हैफेड के अधिकारी सूचना उपलब्ध करवाने की बात कह रहे है परंतु उसे अभी तक सूचना नहीं मिली है। हालांकि यह जरूर बताया जा रहा है कि डाक से सूचना भेज रहे हैं। उसने यह भी बताया कि अभी भी किसानों को फसल बेचने का भुगतान प्राप्त नहीं हुआ है और वे इसकी सूची भी दे सकते हैं। सूचना नहीं सैकड़ों पेड़ काट दिए, चुप नहीं बैठूंगा

आरटीआइ कार्यकर्ता करतार ¨सह ने कहा कि बड़ी ही हैरानी वाली बात है कि जो जानकारी साफ्ट कॉपी में दी जा सकती थी, उसके लिए 96000 से अधिक पेज नष्ट कर दिया गया। जिसका मतलब है असंख्य पेड़ कट गए। क्योंकि सूचना देने से पूर्व एक कॉपी विभाग के पास रही होगी, एक आरटीआइ कार्यकर्ता को गई और एक उपायुक्त कार्यालय को भी गई होगी, क्योंकि आरटीआइ वहीं से आई थी।

अगर उपायुक्त कार्यालय को भी छोड़ दें तो भी 64000 पेज तो तैयार हुए हैं। इससे मंशा है कि अधिकारी किसी गलत नीयत को छिपाने के लिए असंख्य कागजात की राशि तैयार कर आवेदक को परेशान करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि मुख्य सचिव को पत्र लिख दिया है।

केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को भी जानकारी दी गई है और उन्होंने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायधीश को भी पत्र भेजकर कहा है कि आरटीआइ से आभास हो रहा है कि जो सूचना 50 से 100 पेज में तैयार की जा सकती थी उसके लिए 32000 पेज की सूचना गलत मंशा से तैयार की गई। सिरसा हैफेड का कैग से स्पेशल ऑडिट करवाया जाना चाहिए।

मौसम विभाग ने जारी की चेतावनी, केरल के बाद इन राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट

केरल में भारी बारिश और बाढ़ के चलते बीते नौ दिनों में 324 लोगों की जान चली गई है. अब तक दो लाख लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है. एनडीआरएफ और बचाव दल जी जान से बाढ़ में फंसे लोगों को बचाने की कोशिश में लगे हैं.

मौसम विभाग के मुताबिक, केरल से बारिश का खतरा अभी टला नहीं है. यहां आने वाले 48 घंटों में भारी से भारी बारिश की चेतावनी जारी की गई है. केरल में भीषण तबाही मचाने के बाद अब गुजरात और कर्नाटक में बारिश ने अपना तांडव दिखाना शुरू कर दिया है. गुजरात के कई इलाकों में शुक्रवार को भारी बारिश के चलते जलभराव की स्थिति पैदा हो गई थी. हालांकि यहां शनिवार को बारिश में कुछ कमी देखने को मिली है.

इन राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट

भारतीय मौसम विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक, अगले 4 दिनों में गुजरात के सौराष्ट्र और कच्छ, कर्नाटक, महाराष्ट्र के तटीय इलाकों, कोंकण, गोवा और लक्षद्वीप में भारी बारिश हो सकती है. इसके अलावा पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी मध्य प्रदेश, मध्य महाराष्ट्र और तेलंगाना के कुछ इलाकों में तेज बारिश हो सकती है.

जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़ और दिल्ली के कुछ इलाकों, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, असम और मेघालय और ओडिशा में बारिश हो सकती है.

कहां कितनी बारिश हुई

मौसम विभाग के मुताबिक, गुरुवार को अहमदाबाद में 9cm, उदयपुर में 6cm, सुरेंद्रनगर में 4cm बारिश रिकॉर्ड की गई. इसके अलावा पंजाब के लुधियाना और अंबाला में 2-2 Cm बारिश दर्ज की गई. बारिश के चलते गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश में तापमान में तीन से पांच डिग्री तक गिरावट देखी गई.

पंजाब बना चन्दन की खेती का हब, 30 रुपये का मिलता है पौधा , प्रति एकड़ होती है एक करोड़ तक की कमाई

दक्षिण भारत का एकाधिकार तोड़ अब पंजाब चंदन हब बनने की राह पर है। इसके लिए होशियारपुर का वन विभाग अग्रणी भूमिका अदा कर रहा है। होशियारपुर में स्थापित 1 लाख पौध की नर्सरी से चंदन के पौधों की सप्लाई हो रही है। वो दिन दूर नहीं जब धीरे-धीरे सूबा चंदन की खुशबू से महकेगा।

होशियारपुर से न केवल पंजाब के अन्य जिलों बल्कि पड़ोसी राज्यों हिमाचल प्रदेश, हरियाणा को भी पौधे सप्लाई हो रहे हैं। पंजाब चंदन की खेती के लिए हिमाचल प्रदेश का गुरु साबित होने जा रहा है। चंदन की खेती से किसान लाखों-करोड़ों रुपए कमा सकते हैं। इसकी खेती से सूबे में चंदन से संबंधित उद्योग भी प्रफुल्लित होगा।

पंजाब के उद्योग आैर वाणिज्य मंत्री सुन्दर शाम अरोड़ा ने कहा कि पंजाब सरकार चंदन से संबंधित उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है आैर करती रहेगी। उन्होंने कहा कि जहां किसान चंदन की खेती के साथ आर्थिक तौर पर मजबूत होंगे, वहीं उद्योग और व्यापार को बढ़ावा मिलेगा।

क्योंकि चंदन के तेल का दवा, धूप, अगरबत्ती, साबुन, परफ्यूम आदि में प्रयोग होता है। उन्होंने कहा कि उनके विभाग की तरफ से चंदन की प्रोसेसिंग के लिए उद्योग आैर चंदन उत्पादों की मार्केटिंग के लिए विशेष व्यापारिक सुविधाएं मुहैया करवाने जैसे कदम उठाए जाएंगे ताकि पंजाब चंदन की खेती और चंदन उत्पाद में अग्रणी प्रदेश बन सके।

चंदन का जनक बना कंडी क्षेत्र …तलवाड़ा, जनौड़ी और होशियारपुर स्थित वन विभाग की नर्सरियों में तैयार किए जा रहे चंदन के पौधे

डिप्टी कमिश्नर ईशा कालिया ने बताया कि इस समय तलवाड़ा, जनौड़ी और होशियारपुर स्थित वन विभाग की नर्सरियों में चंदन के पौधे तैयार किए जा रहे है। एक पौधे की कीमत 30 रुपए रखी गई है ताकि किसानों पर इन्हें लेने पर आर्थिक बोझ न पड़े।

विभाग की तरफ से अब तक 15 हजार से अधिक पौधे फाजिल्का, अबोहर, मुक्तसर, जालंधर, मोगा और हिमाचल प्रदेश सहित प्रदेश के अलग-अलग जिलों में सप्लाई किए गए हैं। विभाग के पास करीब सवा लाख चंदन के पौधे तैयार हैं। होशियारपुर के गांव बिछोही के प्रगतिशील किसान कमलजीत सिंह रंधावा ने 100 पौधे लगाए हैं और वह फसली चक्र में फंसे बाकी किसानों के लिए प्रेरणा स्रोत बने हैं।

प्रति हेक्टेयर चंदन के करीब 532 पौधे लगाए जा सकते हैं

डीएफओ कुलराज सिंह ने बताया कि प्रति हेक्टेयर चंदन के करीब 532 पौधे लगाए जा सकते हैं। एक पौधे के साथ 20 किलो अंदरुनी लकड़ी (हार्टवुड) मिलती है और 7वें साल में हार्टवुड तैयार होनी शुरू हो जाती है। यह लकड़ी बाजार में 4 से 8 हजार रुपए प्रति किलो के हिसाब से बिक जाती है।

चंदन के पौधे से चार साल बाद ही बीज मिलने शुरू हो जाते हैं, जिससे किसान की अच्छी आय हो जाती है। करीब 14 साल तक इसकी अंदरूनी लकड़ी तैयार हो जाती है और इससे किसान प्रति हेक्टेयर 2.25 करोड़ तक आय ले सकता है।

चंदन का तेल करीब पौने तीन लाख रुपए लीटर बिकता है। चंदन की अंतरराष्ट्रीय बाजारा में भी काफी मांग है। वन विभाग की ओर से न सिर्फ किसानों को चंदन के पौधे दिए जा रहे हैं बल्कि इसकी खेती की जानकारी भी दी जा रही है ताकि इसकी खेती को कामयाब बनाया जा सके।

दूसरे पौधों से लेता है खुराक, 14 साल लगते हैं तैयार होने में, पेड़ की कीमत करीब डेढ़ लाख

डीसी ईशा कालिया ने बताया कि चंदन का पौधा लगभग 14 साल में तैयार हो जाता है। इस समय चंदन के पेड़ की कीमत करीब डेढ़ लाख रुपए तक है। चंदन के पौधे की खास बात यह है कि यह पैरासाइटिक प्लांट है। भाव यह कि यह अपनी खुराक दूसरे पौधे से लेता है।

इसको तैयार होने में समय लगता है, इसलिए किसान इसके साथ-साथ डेक, आम, आंवला लगा सकते हैं। कम समय के अंतराल में किसानों को आय शुरू हो जाती है। उन्होंने कहा कि सूबे में वन क्षेत्र बढ़ाने में किसान सहयोग दे सकते हैं। इसके साथ ही उन्हें इससे आया का अतिरिक्त साधन मिलेगा।

सर्वे के मुताबिक किसानों की आमदनी में बढ़ोतरी,इस राज्य का किसान है सबसे अमीर

राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण बैंक (नाबार्ड) के सर्वे के मुताबिक 2012-13 से 2015-16 के बीच देश के किसानों की आमदनी में बढ़ोतरी हुई है। हर तीसरे साल होने वाले अखिल भारतीय समावेश सर्वेक्षण (एनएएफआईएस) के आधार पर नाबार्ड ने कहा है कि 2015-16 में किसानों की मासिक आय 2012-13 के 6,426 रुपये से बढ़कर 8,059 रुपये हो गई।

इस सर्वेक्षण के मुताबिक, 2015-16 के दौरान देश में ग्रामीण परिवार की औसत मासिक आय 8,059 रुपये थी, जबकि उसका औसत खर्च 6,646 रुपये था। इस लिहाज से हर महीने इन परिवारों को 1,413 रुपये की बचत होती है।

पंजाब, हरियाणा और केरल में रहने वाले ग्रामीण परिवार की मासिक आय देश में सबसे ज्यादा क्रमश: 23,133 रुपये, 18,496 रुपये और 16,927 रुपये हो गई है जबकि 2012-13 में इन राज्यों में मासिक आय क्रमश:18,059 रुपये, 14,434 रुपये और 11,888 रुपये थी। अभी भी पंजाब का किसान देश के बाकि किसानो के मुकाबले सबसे अमीर है ।

ताजा सर्वे के अनुसार, उत्तर प्रदेश इस मामले में सबसे नीचे है। उत्तर प्रदेश के गांवों में रहने वाले परिवारों की औसत मासिक आय महज 6,668 रुपये ही है जबकि वर्ष 2012-13 में राज्य के परिवारों की मासिक आय 4,923 रुपये ही थी।

सर्वे में कहा गया है कि आंध्रप्रदेश के किसान की कमाई सबसे कम है आंध्रप्रदेश में आमदनी की तुलना में मंहगाई अधिक होने से ग्रामीण परिवार एक महीने में महज 95 रुपये ही बचा पता है। बिहार के ग्रामीण परिवार की एक माह की बचत 262 रुपये और उत्तर प्रदेश के गांव में रहने वाला परिवार एक महीने में 315 रुपये बचा पाता है।

देश में इन 14 कीटनाशकों पर तत्काल प्रतिबंध, इनसे फैलता है कैंसर

केंद्र सरकार ने स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए खतरनाक 18 कीटनाशकों पर रोक लगा दी है। सरकार की ओर से गठित समिति ने अपनी सिफारिश में इन कीटनाशकों से होने वाले संभावित नुकसान पर प्रकाश डाला था, जिसके बाद केंद्र ने इन पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया।

इन कीटनाशकों के इस्तेमाल पर कई देशों ने पहले से ही पाबंदी लगा रखी है। सरकार ने बेनोमिल, कार्बाराइल, फेनारिमोल, मिथॉक्सी एथाइल मरकरी क्लोराइड, थियोमेटॉन सहित कुल 14 कीटनाशकों पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगाया है, जबकि एलाचलोर, डिचलोरवस, फोरेट और फोस्फामिडॉन देश में 2020 से प्रतिबंधित होंगे।

कीटनाशकों की समीक्षा के लिए गठित समिति ने 16 जुलाई को इस मुद्दे पर सरकार को रिपोर्ट सौंपी थी, जिसने सिफारिशों में कहा कि ये कीटनाशक लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए खतरनाक हैं। विभिन्न स्तरों पर इनका प्रयोग फसल को कैंसर कारक व विषैला बनाता है। इसी वजह से कई देशों ने इनके इस्तेमाल पर पूरी तरह से पाबंदी लगा रखा है। समिति ने कहा कि इन्हें प्रतिबंधित किया जाना ही उचित व्यवस्था होगी।

कंपनियां जारी करेंगी चेतावनी

केंद्र सरकार द्वारा जारी आदेश के अनुसार, जिन कीटनाशकों को तत्काल प्रभाव से प्रतिबंधित किया गया है, उनका निर्माण करने वाली कंपनियों को देशभर में मौजूद इन कीटनाशकों का इस्तेमाल रोकने के लिए चेतावनी जारी करनी होगी। उन्हें बाजार से अपना माल वापस लेना होगा। कंपनियों को चेतावनी में स्पष्ट करना होगा कि स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए खतरनाक होने के मद्देनजर इन कीटनाशकों का प्रयोग नहीं किया जाए।

सर्वोच्च न्यायालय का रुख सख्त

सर्वोच्च न्यायालय ने भी केंद्र को इन कीटनाशकों पर जल्द फैसला लेने के लिए कहा था। न्यायालय ने सरकार को दो महीने का वक्त दिया था। इससे पहले महाराष्ट्र में नवंबर 2017 में कीटनाशकों के इस्तेमाल से 50 से भी ज्यादा किसानों की मौत हो गई थी।

जानलेवा 66 कीटनाशकों का हो रहा इस्तेमाल

हाल में सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत पूछे गए एक सवाल के जवाब में सरकार ने स्पष्ट किया था कि देश में ऐसे 66 कीटनाशकों को इस्तेमाल में लाया जाता है, जो एक या उससे ज्यादा देशों में प्रतिबंधित हैं। इनमें 28 पर पहले ही रोक लगाई जा चुकी है।

राउंडअप का उपयोग करने वाले किसान को इस कारण मिलेगा 1,900 करोड़ रुपये का मुआवजा

अमरीका के सैन फ्रांसिस्को में एक माली ने एक बड़ी कंपनी के ख़िलाफ लगभग (1900 करोड़) 29 करोड़ डॉलर का मुकदमा जीत लिया है.डिवेन जॉनसन की ज़िंदगी में जीत की इस खुशी से पहले कैंसर आया जो उन्हें माली की नौकरी के दौरान हुआ.

कैंसर का पहला लक्षण दिखा लाल चकते के रूप में जो उनके लगभग 80 फ़ीसद शरीर में फैल गए थे. जॉनसन तब 42 साल के थे. साल 2012 में बेनिसिया के स्कूलों में माली का काम करने के दौरान उन्होंने पौधों में साल भर खरपतवार नाशक दवा लगाई. ये दवा थी- राउंडअप एंड रेंजर प्रो हर्बिसाइड जिसे मोन्सेंटो कंपनी बनाती है.

साल 2014 में पता चला कि उन्हें हॉजकिन लिम्फ़ोमा कैंसर है. कंपनी मोन्सेंटो के ख़िलाफ़ मुक़दमे के लिए उन्होंने साल 2015 में तैयारी शुरू की. जॉनसन का दावा इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर के शोध पर आधारित था

जिसमें राउंडअप हर्बिसाइड को कैंसर का कारण बताया गया है. इस हर्बिसाइड में ग्लाइफोसेट होता है जो कैंसर पैदा कर सकता है. ये एजेंसी विश्व स्वास्थ्य संगठन से संबद्ध है.

खुशखबरी ! दुनिया के बाजार में अब कहीं भी फसल बेच सकेंगे भारत के किसान

भारत के किसानों की अब दुनिया के बाजार में सीधी पहुंच होगी। सरकार ने कृषि उत्पाद के निर्यात के लिए देश के 50 जिलों की पहचान की है। इन जिलों में 20 कृषि आइटम के क्लस्टर विकसित किए जाएंगे। क्लस्टर में खेती के साथ उत्पादित वस्तुओं को निर्यात के लायक बनाने की सारी सुविधाएं होंगी। मतलब, क्लस्टर के निकलने के बाद ये कृषि उत्पाद सीधे निर्यात के लिए पोर्ट पर जाएंगे।

2020 तक कृषि निर्यात को 60 अरब डॉलर करने का लक्ष्य

वाणिज्य मंत्रालय ने कृषि निर्यात को 2020 तक 60 अरब डॉलर करने का लक्ष्य रखा है। अभी कृषि निर्यात 31 अरब डालर का है। विश्व भर में होने वाले कृषि निर्यात कारोबार में भारत की हिस्सेदारी सिर्फ 2.2 फीसदी है।

20 कृषि उत्पादों पर होगा फोकस

वाणिज्य मंत्रालय के मुताबिक क्लस्टरों में 20 कृषि उत्पादों की खेती की जाएगी। खेती निर्यात बाजार को ध्यान में रखकर की जाएगी। चिन्हित उत्पादों में

अंगूर, अनानास, केला, सेब, लीची, संतरा, गुलाबी प्याज, प्याज, आलू, टमाटर, चाय, कॉफी, मिर्च, अदरक, पुदीना, हल्दी, जीरा,मेथी, रबर व समुद्री उत्पाद शामिल हैं। क्लस्टर विकसित करने के लिए राज्य सरकार की भी मदद ली जाएगी। क्लस्टर में शामिल किसानों को सरकार की तरफ से इंसेंटिव भी दिए जाएंगे। हालांकि इंसेंटिव का मैकेनिज्म राज्य सरकार से परामर्श के बाद तैयार किया जाएगा।

सभी इलाके में होंगे कृषि निर्यात क्लस्टर

वाणिज्य मंत्रालय के मुताबिक क्लस्टर देश के सभी इलाके नार्थ, वेस्ट, ईस्ट, वेस्ट व सेंट्रल में स्थित होंगे। वाणिज्य मंत्रालय के मुताबिक प्याज के लिए मध्य प्रदेश व महाराष्ट्र में क्लस्टर विकसित किए जाएंगे।

मध्य प्रदेश के इंदौर, सागर व दामोह तो महाराष्ट्र के नासिक में प्याज के लिए क्लस्टर विकसित किए जाएंगे। आलू के निर्यात के लिए उत्तर प्रदेश के आगरा, फर्रुखाबाद, पंजाब के जालंधर, कपूरथला,होशियारपुर, नवांशहर, गुजरात के बनस्कंथा, सबरकंथा तो मध्य प्रदेश के इंदौर व ग्वालियर में कल्स्टर तैयार होंगे।

टमाटर के निर्यात के लिए मध्य प्रदेश के शहडोल, कर्नाटक के कोलार, आंध्र प्रदेश में करनूल तो उत्तरांचल में रूद्रपुर में क्लस्टर विकसित किए जाएंगे। मेथी के निर्यात के लिए राजस्थान के सीकर व बीकानेर को चिन्हित किया गया है। लीची के निर्यात के लिए बिहार के मुजफ्फरपुर तो जीरा निर्यात के लिए गुजरात के मेहसाना व बनसकंथा चिन्हित किए गए हैं।

निजी कंपनियां भी होंगी सहभागी

मंत्रालय के अधिकारी ने बताया कि कृषि निर्यात क्लस्टर विकसित करने में निजी कंपनियों को भी सहभागी बनाया जा सकता है। क्लस्टर में निर्यात सुविधा स्थापित करने में निजी कंपनियां अपना योगदान दे सकती है।

वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक कृषि निर्यात में 52 फीसदी योगदान मांस, चावल व समुद्री उत्पाद का है। वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2013 में भारत का कृषि निर्यात 36 अरब डॉलर का था जबकि वर्ष 2017 में कृषि निर्यात घटकर 31 अरब डॉलर का रह गया।

दुनिया की सबसे ताकतवर सब्जी है ये, खाएंगे तो शरीर बन जाएगा फौलादी

आजकल के दौर में जंक फूड का इतना क्रेज बढ़ चुका है कि लोग अपने शरीर को जरूरी ताकत देनी वाली सब्जी, दाल का सेवन कम ही करते हैं. लेकिन, बहुत कम लोग जानते हैं कि कुछ सबज्यिां ऐसी होती हैं, जिन्हें कुछ दिन खाने पर ही इसका फायदा मिल जाता है.

ऐसी ही एक सब्जी है कंटोला. यह दुनिया की सबसे ताकतवर सब्जी है. इसे औषधि के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है. इस सब्जी में इतनी ताकत होती है कि महज कुछ दिन के सेवन से ही आपका शरीर तंदुरुस्त बन जाता है या यूं कहें कि फौलादी बन जाता है. कंटोला को ककोड़े और मीठा करेला नाम से भी जाना जाता है.

कंटोला आमतौर पर मॉनसून के मौसम में भारतीय बाजारों में देखा जाता है. इसमें कई स्वास्थ्य लाभ है जिसकी वजह से इसकी खेती दुनियाभर में शुरू हो गई है. इसकी मुख्य रूप से भारत के पर्वतीय क्षेत्रों में खेती की जाती है.

यह सब्जी स्वादिष्ट होने के साथ-साथ प्रोटीन से भरपूर होती है. इसे रोज खाने से आपका शरीर ताकतवर बनता है. इसके लिए कहा जाता है कि इसमें मीट से 50 गुना ज्यादा ताकत और प्रोटीन होता है. कंटोल में मौजूद फाइटोकेमिकल्स स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में काफी मदद करता है. यह एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर सब्जी है. यह शरीर को साफ रखने में भी काफी सहायक है.

अगर आप भी अपनी रोजाना डाइट में इसे शामिल करते हैं तो दूसरे तत्वों और फाइबर की कमी को भी यह पूरी करती है. ककोड़े यानी मीठा करेला को सेहतमंद माना जाता है. आयुर्वेद में भी इसे सबसे ताकतवर सब्जी के रूप में माना गया है.

एंटी एलर्जिक : कंटोल में एंटी-एलर्जन और एनाल्जेसिक सर्दी खांसी से राहत प्रदान करने और इस रोकन में काफी सहायक है.

हाई ब्लड प्रेशर होगा दूर : कंटोला में मौजूद मोमोरडीसिन तत्व और फाइबर की अधिक मात्रा शरीर के लिए रामबाण हैं. मोमोरेडीसिन तत्व एंटीऑक्सीडेंट, एंटीडायबिटीज और एंटीस्टे्रस की तरह काम करता है और वजन और हाई ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखता है.

पाचन क्रिया होगी दुरुस्त : अगर आप इसकी सब्जी नहीं खाना चाहते तो अचार बनाकर भी सेवन कर सकते हैं. आयुर्वेद में कई रोगों के इलाज के लिए इसे औषधि के रूप में प्रयोग करते हैं. यह पाचन क्रिया को दुरुस्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

कैंसर से बचाए : कंटोला में में मौजूद ल्युटेन जैसे केरोटोनोइडस विभिन्न नेत्र रोग, हृदय रोग और यहां तक कि कैंसर की रोकथाम में सहायक है.

वजन घटाने में सक्षम: कंटोला में प्रोटीन और आयरन भरपूर होता है जबकि कैलोरी कम मात्रा में होती है. यदि 100 ग्राम कंटोला की सब्जी का सेवन करते हैं तो 17 कैलोरी प्राप्त होती है. जिससे वजन घटाने वाले लोगों के लिए यह बेहतर विकल्प है.

बासमती उगाने वाले किसानों के लिए चिंता की खबर, घटकर आधा हो सकता है मुनाफा

इस साल मानसून में खूब बारिश हो रही है। इस बारिश को धान के लिए वरदान लिए कहा जाता है। किसानों के चेहरे पर रौनक भी है। लेकिन चावल की सबसे बेहतरीन प्रजाति यानी बासमती पैदा करने वाले किसानों के लिए ये खबर निराश करने वाली हो सकती है।

अच्छे मुनाफे की बाट जोह रहे इन किसानों की उम्मीदों पर पानी फिर सकता है। खतरनाक रसायनों के अत्यधिक प्रयोग के कारण यूरोपियन संघ के बाद अब सऊदी अरब ने भी भारत से आयात होने वाले बासमती चावल पर कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है।

कुछ महीने पहले यूरोपीय संघ ने बासमती चावल में फंफूदीनाशक ट्रासाइक्लाजोल के लिए अवशेष सीमा कम कर 0.01 एमजी (मिलीग्राम) प्रति किलो निर्धारित किया था वहीं अब सऊदी फूड एंड ड्रग अथॉरिटी (SAUDA) ने नई गाइडलाइंस के तहत बासमती धान में कीटनाशकों के प्रयोग को 90 फीसदी तक कम करने को कहा है।

बाजार में अभी नई फसल नहीं आई है बावजूद इसके इसका असर दिखने लगा है। कृषि और प्रंसस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) के ताजा आंकड़ों के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2018-19 के पहले तीन महीनों अप्रैल से जून के दौरान बासमती चावल के निर्यात में सात फीसदी तक गिरावट दर्ज की गई है। बासमती धान की फसल अगले दो से तीन महीने में पककर तैयार हो जाएगी।

भारत पिछले पांच वर्षां से विश्व का सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश है, लेकिन निर्धारित अवशेष सीमा (एमआरएल) से अधिक कीटनाशकों के अवशेषों के पाए जाने के कारण पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका, यूरोप और ईरान जैसे बाजारों में निर्यातकों की परेशानी बढ़ गई है।

यूरोप की तरह सऊदी अरब ने भी कीटनाशकों के प्रयोग के लिए नई गाइडलाइन जारी कर दी है जिसके बाद से भारतीय ट्रेडिंग कंपनियों पर संकट आ गया है। यूरोपियन संघ ने आयात किए जाने वाले बासमती में मिलने वाले फंगेसाइड केमिकल (ट्राइसाइक्लोजाल) की मात्रा 1 पीपीएम से घटाकर 0.01 पीपीएम कर दिया था और अब सउदी अरब भी ऐसा करने जा रहा है।

“बासमती चावल में निर्यात सौदे कम होने के कारण धान की मांग कम हो गई है। जैसी खबरें आ रही हैं, उसके अनुसार तो आने वाले समय में मांग और घट सकती है।

यदि यह रोक जारी रहती है तो बासमती से प्रति क्विंटल औसतन 3500 रुपए तक कमाने वाले किसान को इसका आधा दाम भी मिलना मुश्किल हो जाएगा क्योंकि इस धान का भाव निर्यात पर निर्भर करता है। इस रोक के बाद अब यूरोप में पाकिस्तान के चावल की दखल बढ़ सकती है। भारत बासमती चावल का सबसे बड़ा निर्यातक है।

बासमती चावल के बड़े किसान अमृतसर के हरवंश सिंह कहते हैं “हमें दवाओं के बारे में सही जानकारी ही नहीं है। यूरोपिय संघ के रोक के बाद सऊदी का ये फैसला हम जैसे किसानों के लिए बहुत परेशानी खड़ी करे वाला है। दाम सही नहीं मिला तो हमारे यहां के किसानों को किसी और फसल की ओर ध्यान देना पड़ेगा।

एक्सपोर्ट में बड़ी गिरावट

भारत बासमती चावल का सबसे बड़ा निर्यातक है।  जहरीले कीटनाशकों के प्रयोग के कारण निर्यात में लगातार कमी दर्ज की जा रही है। चालू वित्त वर्ष 2018-19 के पहले तीन महीनों अप्रैल से जून के दौरान बासमती चावल के निर्यात में मात्रा के हिसाब से 7 फीसदी की गिरावट आई है।

बासमती चावल बेचने वाले देश के बड़े बासमती चावल निर्यातकों में शुमार कोहिनूर फूड्स के संयुक्त प्रबंध निदेशक गुरनाम अरोड़ा ने को बताया “निर्यात में कमी आ रही है। हम किसानों को कीटनाशकों के बारे में जानकारी भी दे रहे हैं। ये उनके हित में ही है। नई फसल आने में अभी समय है। ऐसे में हम लगातार यूरोपीय संघ और सऊदी अरब के अधिकारियों से बात कर रहे हैं।

हो सकता है कि आने वाले समय में समस्या का समाधान भी हो जाए। लेकिन अब समय आ गया है कि किसान मानकों के अनुसार ही कीटनाशकों का प्रयोग करें, वरना नुकसान बढ़ता ही जाएगा लेकिन अब चीन भी भारतीय बासमती चावल भारत से आयात करने जा रहा है, ऐसे में स्थिति में थोड़ा सुधार हो सकता है।”

ऐसे में किसानों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे अगर पेस्टीसाइड का प्रयोग कम कर देंगे तो पैदावार घट सकती है। ऐसे में उनके पास विकल्प कम बचते हैं। इस बारे में गुरनाम अरोड़ा ने कहा कि हम किसानों को कुछ मुआवजा भी देने की बात कर रहे हैं, ताकि उनके घाटे को कम किया जा सके।