अमेरिका में प्‍याज की खेती : न पौध लगाने का झंझट, न खुदाई का चक्‍कर

प्‍याज दुनिया भर में खाया और बोया जाता है। हमारे यहां प्‍याज की खेती को काफी मेहनत की खेती माना जाता है क्‍योंकि इसमें काफी शारीरिक श्रम लगता है।

भारत में प्‍याज की पौध तैयार करने, रोपाई करने, निराई गुड़ाई करने, प्‍याज को उखाड़ने और उसकी छंटाई करने का काम किसान को हाथ से करना होता है। लेकिन अमेरिका में ये सब काम मशीनों से होता है।

190 देशों में उगाया जाता है प्‍याज

विश्‍व के 190 देशों में प्‍याज की खेती होती है। हर साल करीब 9 करोड़ 20 लाख एकड़ जमीन पर प्‍याज उगाया जाता है। अमेरिका में भी हर साल करीब सवा लाख एकड़ भूमि पर प्‍याज की खेती की जाती है। अमेरिका के बीस राज्‍यों में प्‍याज उगाया जाता है। विश्‍व के कुल प्‍याज उत्‍पादन का करीब 4 फीसदी प्‍याज अमेरिका पैदा करता है।

अमेरिका में बीज से ही सीधे प्‍याज पैदा किया जाता है। पहले पौध तैयार करके फिर उसकी रोपाई खेत में बहुत कम ही किसान करते हैं। ज्‍यादातर किसान बीज से सीधे बिजाई करते हैं। प्‍याज को बेड पर बोया जाता है। कुछ किसान नालियों से सिंचाई करते हैं तो कुछ टपका सिंचाई विधि का उपयोग करते हैं।

इस वीडियो में जानिए आप अमेरिका में प्‍याज की खेती 

https://youtu.be/q7Y42IdEhgw

1121 बासमती में तेज़ी का दौर जारी,यह चल रहे है भाव

लगता है अब बासमती के भाव 4000 रुपए क्विंटल पर ही जाकर दम लेंगे। पिछले तीन दिनों में बासमती 1121 के धान 150 रुपए तक चढ चुके हैं। शनिवार को हरियाणा की मंडियों में बासमती धान का ऊपर में भाव 3500 रुपए था जो कि आज बुधवार को 3650 रुपए हो चुका है।

डीपी के भाव भी 100 रुपए चढ़ चुके हैं। पीबी 1 भी पीछे नहीं है। शनिवार को इसका भाव जहां 3000 था वहीं बुधवार को हरियाणा की अधिकतर मंडियों में इसका भाव 3150 रुपए रहा।

हरियाणा बासमती धान भाव, 

बुधवार को टोहाना मंडी में बासमती 1121 3651, पीबी 1 3150, पूसा 1509 3300 और डीपी 1401 3425 रुपए क्विंटल बिका। निशिंग मंडी में बासमती 1121 3600, पूसा 1509 3300, सुगंध 2850, पीबी 1 3050 और बासमती 3700 रुपए क्विंटल बिका। तरावड़ी मंडी में बासमती 3690 और बासमती 1121 3600 रुपए बिका।

कैथल मंडी में आज बासमती 1121 का भाव ऊपर में 3650 रुपए रहा। चीका मंडी में बुधवार को बासमती 1121 धान के रेट 3700 रुपए तक लग गए। यहां आम भाव 3675 रुपए रहा। हांसी मंडी में बासमती 1121 3650, नरवाना में 3671, बरवाला में 3641 और उकलाना में 3650 रुपए क्विंटल का कारोबार रहा।

फतेहाबाद में बासमती 1121 3600, डीपी 1401 3438 और पीबी 1 3182 रुपए बिका। उचाना मंडी में बासमती 1121 का आज भाव 3631 रुपए रहा। उकलाना मंडी में बासमती 1121 3375 से 3630, डीपी 1401 3350 और पीबी 1 3100 रुपए बिका। सिरसा में डीपी 1401 3379 पीबी 1 3110 और 1121 3543 रुपए क्विंटल बिका।

रानियां मंडी में डीपी 1401 3420 रुपए बिका। जींद मंडी में बासमती 1121 3611 रुपए तक बिका। हांसी में 1509 3400 रुपए बिका। कुरुक्षेत्र में बासमती का रेट 3661 रुपए रहा। रतिया मंडी में पीबी 1 3141 और डीपी 1401 3447 रुपए बिका।

पंजाब बासमती धान भाव, 

पंजाब के अमृतसर में बुधवार को बासमती 1121 3490 रुपए बिका। मंडी कोटकपूरा में बासमती 1121 3480 रुपए बिका। यहां पर अब अन्‍य धान की आवक लगभग समाप्‍त हो चुकी है। फरीदकोट में बासमती 1121 का रेट 3490 रुपए रहा।

तरनतारन मंडी में करीब 17 हजार बोरी आवक हुई। यहां कंबाइन से निकाले 1121 धान का भाव 3425 तक और हाथ वाले धन का भाव 3565 रुपए तक रहा। पूसा 1509 3150 रुपए तक बिका। गिद्दड़बाहा में डीपी 1401 कंबाइन से निकाले मीडियम क्‍वालिटी धान का रेट 3200 रुपए रहा।

कोटा, बूंदी और डबरा बासमती धान भाव, 

राजस्‍थान की बूंदी मंडी में पूसा 1121 3525, पूसा 1509 3285, और सुगंध 2850 रुपए बिका। कोटा मंडी में करीब 28000 बोरी धान की आवक बुधवार को हुई। यहां पर पूसा 1121 3483, पूसा 1509 3200, सुगंध 2865 और डीपी 2990 रुपए तक बिका। मध्‍यप्रदेश की डबरा मंडी में पूसा 1121 3500, पूसा 1509 3050, सुगंध 2675 रुपए बिका।

यूपी बासमती धान भाव, 

अलीगढ़ मंडी में पूसा 1121 ऊपर में 3481, सुगंध 2776 और पूसा 1509 3125 रुपए तक बिक गया। यूपी के बुलंदशहर में पूसा 1121 3450, सुगंध 2800 और पूसा 1509 3150 रुपए बिका। मैनपुरी में पूसा 1121 3101, सुगंध 2400, पूसा 1509 2800 हाइब्रिड 1360 रुपए क्विंटल बिका। बबई मंडी में पूसा 1121 3270 तक और पूसा 2780 रुपए तक बिका।

पानी की कमी से परेशान किसान ने किया केसर की खेती का रुख

क्षेत्र में पानी की कमी से भले ही किसान परेशान हो लेकिन राजस्थान के बसवा तहसील क्षेत्र के गांव झूथाहेड़ा में एक किसान ने इस परेशानी को दूर कर कम पानी व कम खर्च में अच्छा मुनाफा कमाने के लिए केसर की खेती को अपनाया है।

किसान को उम्मीद है कि इस खेती को करने के बाद उसे खर्च से तीन गुना मुनाफा मिलेगा। झूथाहेड़ा गांव निवासी किसान श्री मोहन मीना ने बताया कि उनके गांव सहित आसपास के क्षेत्र में वर्षों से पानी की कमी से किसान परेशान हैं।

फसलों में पानी की अधिकता को लेकर कई किसानों ने तो खेती बाड़ी भी करना बंद कर दिया हैं। ऐसे में उन्होंने जानकारी लेकर अपने आधा बीघा खेत में इस बार केसर की फसल की पैदावार की हैं।

किसान ने बताया कि इस फसल में पानी की आवश्यकता कम है। उनके द्वारा बीज लगाए गए थे जिस पर अब खेत में 720 केसर के पौधे उग आए है ।

उन्होंने बताया कि केसर के पौधों में 15-20 दिन के अंतराल में पानी देना पड़ता हैं। वर्तमान में पौधे बड़े हो गए है तथा उनमें डोडी भी उग आई हैं। 15 दिन बाद इसमें केसर आना शुरु हो जाएगी।

मुनाफा तीन गुना मिलने की उम्मीद

किसान ने बताया कि केसर की खेती में उन्होंने करीब ढाई लाख रुपए का खर्च आया हैं। लेकिन उन्हें उम्मीद है कि केसर को बेचने के दौरान तीन गुना मुनाफा मिलेगा। उन्होंने बताया कि केसर बेचने के लिए उन्होंने जम्मू में केसर का कारोबार करने वाले व्यापारियों से संपर्क किया था।

जहां व्यापारियों ने एक किलो केसर दो लाख रुपए में खरीदने का भरोसा दिलाया है। उन्होंने बताया कि उनको अपने खेत में करीब चार किलो केसर आने की उम्मीद है।

नेट बना सबसे बड़ा सहयोगी

किसान श्री मोहन मीना ने बताया कि पानी की कमी के कारण वह खेती करने को लेकर लंबे समय से परेशान था। एक दिन टेलीविजन पर उन्होंने केसर की खेती के बारे में देखा। इसके बाद उनके मन में केसर की खेती करने को लेकर उम्मीद जगी।

नेट पर केसर की खेती कैसे करते है इस बारे में जानकारी ली। इसके बाद जम्मू से बीज लाकर इस खेती को शुरु कर दिया। उन्होंने बताया कि अभी भी वे इस फसल में किसी प्रकार की परेशानी आने पर नेट पर सर्च कर उस परेशानी को दूर कर देते है।

अब घर बैठे मंगाएं खेती का सामान, इफको ने शुरू की फ्री होम डिलीवरी सेवा

पिज्जा-बर्गर की तर्ज पर अब खेती के लिए खाद-बीज जैसी जरूरी वस्तुएं भी घर बैठे उपलब्ध हो जाएंगी। किसान को खाद या खेती से जुड़ी अन्य जरूरी वस्तुओं के लिए दुकान तक नहीं जाना होगा। ये सभी समान उन्हें घर बैठे ही उपलब्ध कराए जाएंगे।

किसानों के लिए ये शुरुआत की है दुनिया की सबसे बड़ी उर्वरक सहकारी कम्पनी इफको ने। इफको के इंडियन को-ऑपरेटिव डिजिटल प्लेटफॉर्म ने देशभर में कृषि संबंधित अपने इनपुट के लिए मुफ्त डोर-स्टेप डिलीवरी सेवा की शुरुआत की है। जिसके तहत देश के दूर-दराज के हिस्सों के किसानों को बगैर वितरण शुल्क के पांच किलोग्राम तक की पैकेजिंग के कृषिगत इनपुट मिल सकेंगे।

मिलेंगे जरूरी उत्पाद

दुनिया की सबसे बड़ी उर्वरक सहकारी, इफको ने अपने डिजिटल मंच इंडियन को-ऑपरेटिव डिजिटल प्लेटफॉर्म (आईसीडीपी) के माध्यम से अपने कृषिगत इनपुट को घर-घर तक पहुंचाने की सेवा शुरु करने की घोषणा की है। इसका मकसद नवीनतम तकनीकी साधनों से एक सक्षम आपूर्ति श्रृंखला तंत्र की सह-क्रिया द्वारा ग्रामीण भारत तक आधुनिक ई-कॉमर्स के लाभ और अनुभव को पहुंचाना है।

किसानों को अब आवश्यक कृषिगत इनपुट की पूरी श्रृंखला मिलेगी, जैसे पानी में घुलनशील उर्वरक, कृषि-रसायन, जैव-उर्वरक, बीज, पौधों को विकसित करने वाले संरक्षक और अन्य कृषि आधारित उत्पाद। ये उत्पाद पांच किलोग्राम तक की पैकिंग में उपलब्ध होंगे। बगैर किसी अतिरिक्त मूल्य के किसानों तक पहुंचाए जाएंगे।

पारंपरिक उर्वरकों, जैसे यूरिया, डीएपी, एनपीके, इत्यादि ऑनलाइन नहीं बेचे जाएंगे। इस उद्योग-जगत में अपनी तरह की पहली पहल आईसीडीपी ने की है। वह दूर-दराज के उन ग्रामीण क्षेत्रों तक वितरण सेवाएं उपलब्ध कराएगी, जहां ई-कॉमर्स के अग्रणी किरदार मौजूदा परिदृश्य में अपने सामान नहीं पहुंचा पाते हैं।

दूरदराज के किसान होंगे लाभान्वित

इफको के प्रबंध निदेशक डॉक्टर यू एस अवस्थी ने कहा कि इफको में हम लगातार किसानों को सेवायें देने का प्रयास करते हैं। कृषि-वाणिज्य को सरल बनाने के लिए अपने मजबूत ग्रामीण नेटवर्क के जरिये नई व निशुल्क आपूर्ति की सेवा देने की घोषणा कर हम बहुत प्रसन्न हैं। किसान हमारे डिजिटल मंच से कृषिगत इनपुट को सिर्फ एक क्लिक के जरिये खरीद पाएंगे। इस दिशा में आईसीडीपी काम कर रही है। इसका उद्देश्य है कि ज्यादा से ज्यादा किसान डिजिटलीकरण का लाभ उठाएं।

हमने किसानों के बीच प्रशिक्षण और जागरूकता-निर्माण अभियान भी शुरू किया, जहां वे ऑनलाइन व डिजिटल भुगतान गेटवे के उपयोग के बारे में सीख सकते हैं। यहां उन्हें कैशलेस रहने के लाभ की शिक्षा भी मिलेगी। इससे आगे जाते हुए, हमारी योजना यह है कि इस मंच को एक सफल डिजिटल बाजार में बदल दें, जहां किसान और सहकारी समितियां, दोनों अपने उत्पाद ऑनलाइन खरीद-बेच सकें । हमें उम्मीद है कि यह पहल दूर-दराज के किसानों को लाभ पहुंचाएगी और इस क्षेत्र की बाधाओं को स्थायी तौर पर खत्म करेगी।

किसानों की आय दोगुनी करने का हिस्सा

इफको आंवला के मीडिया प्रभारी विनीत शुक्ला ने बताया कि प्रधानमंत्री की डिजिटल पहल और कैशलेस मुहिम के अनुरूप, इफको ने एक नया पोर्टल शुरू किया है- इंडियन को-ऑपरेटिव डिजिटल प्लेटफॉर्म www-iffcobazar-in इस पोर्टल का लक्ष्य किसानों या उपभोक्ताओं और इफको तथा इसकी समूह कंपनियों के बीच संवाद और कारोबार के लिए एक डिजिटल मंच प्रदान करना है।

इफको के इंडियन को-ऑपरेटिव डिजिटल प्लेटफॉर्म (आईसीडीपी) का लक्ष्य एक डिजिटल मंच पर देश की सभी सहकारी समितियों और किसानों को एक साथ लाना और उन्हें आपस में जोड़ना है। यह पोर्टल 13 प्रमुख भारतीय भाषाओं में उपलब्ध है और इसमें 2.5 करोड़ की मेंबरशिप है।

इफको ग्रामीण..क्षेत्रों में किसानों को बाकी दुनिया से जोड़ने के लिए प्रेरित करने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इंडियन को-ऑपरेटिव डिजिटल प्लेटफॉर्म खेती-किसानी के सभी पहलुओं में किसानों को लाभ पहुंचाने में जुटी है और उन्हें एक अधिक जागरूक जीवन देने में मदद करती है। यह किसानों की आय दोगुना करने के इफको के 2020 दृष्टिकोण का हिस्सा है।

आलू-टमाटर 4 रु और प्याज-गोभी 5 रु. किलो से कम बिके तो सरकार करेगी भरपाई

हरियणा में शनिवार से भावांतर भरपाई योजना की शुरुआत हो गई। इसके तहत राज्य सरकार ने पहले चरण में आलू-टमाटर के लिए 400 रु. प्रति क्विंटल (4 रु. किलो), फूलगोभी-प्याज के लिए 500 रु. प्रति क्विंटल (5 रु. किलो) न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय किया है। अगर किसान की फसल तय एमएसपी से कम दाम पर बिकती है तो उसकी भरपाई राज्य सरकार करेगी।

इसके लिए अलग से फंड तैयार किया जाएगा। करनाल के गांव गांगर में सीएम मनोहर लाल ने भावांतर भरपाई ई-पोस्टल लॉन्च किया। सीएम ने कहा कि सरकार चाहती है कि किसान को प्रति एकड़ सालाना एक लाख रुपए तक आय हो। सरकार इस ओर आगे बढ़ रही है। कांग्रेस ने 4-5 रु. किलो के रेट नाकाफी बताए।

पंजीकरण (रजिस्टर) होने पर कर सकेंगे अपील

आलू की फसल के लिए के लिए 15 जनवरी तक, प्याज की फसल के लिए 25 मार्च तक, टमाटर की फसल के लिए 25 मार्च और फूलगोभी की फसल के लिए 25 जनवरी तक अपील की जा सकेगी।

किसान को फसल जे-फार्म के जरिए बेचनी होगी। बिक्री का विवरण बीबीवाई पोर्टल पर अपलोड करना होगा। इसकी सुविधा सभी मार्केटिंग कमेटी में होगी। बिक्री के तय समय में किसान को तय रेट से कम भाव मिलता है तो वह भरपाई के लिए पात्र होगा। भरपाई की राशि किसान के खाते में 15 दिन में जमा कर दी जाएगी।

औसत दैनिक थोक मूल्य मंडी बोर्ड की ओर से निर्धारित मंडियों के दैनिक भाव के आधार पर तय किया जाएगा। किसान को यदि भाव एमएसपी से अधिक भी मिलता है तो भी मंडी के अधिकारी से जे-फार्म चढ़वाना होगा, अन्यथा किसान को अगले वर्ष पंजीकृत नहीं किया जाएगा।

किसान को योजना का लाभ लेने के लिए बिजाई के समय ही मार्केटिंग बोर्ड की वेबसाइट पर बागवानी भावांतर योजना पोर्टल के माध्यम से पंजीकरण कराना होगा। उद्यान विभाग का अधिकारी किसान का क्षेत्र देखेंगे। हर जिले में डीसी के नेतृत्व में गठित कमेटी किसान की फसल का मूल्यांकन करेगी। इसके बाद किसान के पास एसएमएस भेजा जाएगा। पंजीकरण निशुल्क होगा। पंजीकरण किए जाने की शिकायत किसान कर सकेगा।

योजना का उद्देश्य मंडी में सब्जी फल की कम कीमत के दौरान निर्धारित सरंक्षित मूल्य द्वारा जोखिम को कम करना है। किसान को फसल का इतना भाव तो मिलना ही चाहिए, जितना खर्च आया है। इन चार फसलों के 400 से 500 रुपए जो भाव तय किए हैं, उसके अनुसार किसान को प्रति एकड़ 48 से 56 हजार रुपए मिल जाएंगे।

इस खेती के दौरान पत्नी से अलग सोते है किसान ,नहीं तो हो जाता है नुकसान

क्या गृहस्थ और ब्रह्मचर्य जीवन का कोई मेल है? इस सवाल का सहज सा जवाब होगा नहीं. मगर झारखंड के पूर्वी सिंहभूम ज़िले के गुड़ाबांदा प्रखंड के सैकड़ों किसान पीढ़ियों से ऐसी दोनों तरह की ज़िंदगी के साथ तालमेल बिठा कर जीवन-बसर करते आ रहे हैं.

इस नक्सल प्रभावित इलाके के तसर (रेशम) कीट का पालन करने वाले शादीशुदा किसान साल में दो बार करीब दो-दो महीने के लिए ब्रह्मचर्यों जैसी ज़िंदगी गुज़ारते हैं. इस दौरान ये मुख्य रूप से अर्जुन और आसन के पेड़ों पर पल रहे तसर के कीड़ों को चींटियों, तसर के कीटों को खाने वाले दूसरे कीड़ों और पक्षियों से बचाते हैं.

गुड़ाबांदा प्रखंड के अर्जुनबेड़ा गांव के करीब पचास साल के सुरेश महतो के मौसमी ब्रह्मचर्य के दिन अब खत्म होने को हैं.

वो बताते हैं, ”तसर की खेती के समय हम लोग बीवी के साथ नहीं सोते हैं. वो हमें छुएगी नहीं, वो भी अलग रहेगी और हम लोग भी अलग रहेंगे. तब उसके हाथ का बना खाना भी नहीं खाते हैं.”

इसके पीछे की वजह सुरेश ये बताते हैं, ”हम लोग जो खेती करती हैं उसमें अगर उसके (पत्नी के) साथ सो जाएंगे तो इधर खेती में बीमारी लग जाएगी. यही नियम है इसका.”

‘नियम’ और भी हैं

ब्रह्मचर्य के अलावा भी ये किसान कुछ और ‘नियमों’ का पालन करते हैं. जैसा कि अर्जुनबेड़ा गांव के ही नित्यानंद महतो बताते हैं, ”कीड़ों की रखवाली करने स्नान करके जाते हैं. रखवाली के दौरान किसी को शौच लगा तो वह शौच के बाद फिर से नहाता है. कीड़े बीमार पड़ जाएं तो पूजा-पाठ करते हैं और फल (कोनून) तैयार होने के बाद बकरे की बलि देते हैं.”

एक जनवरी से पूरे देश में किसानों के सीधे खाते में जाएगी खाद सब्सिडी

एक जनवरी से पूरे देश में किसानों के सीधे खाते में जाएगी खाद सब्सिडीएक जनवरी से पूरे देश में किसानों के सीधे खाते में जाएगी खाद सब्सिडीनये वर्ष में किसानों को खाद की सब्सिडी अब सीधे उनके खाते में जमा होगी। सभी राज्यों में इसकी तैयारियां अंतिम चरण में हैं।

नये वर्ष में किसानों को खाद की सब्सिडी अब सीधे उनके खाते में जमा होगी। सभी राज्यों में इसकी तैयारियां अंतिम चरण में हैं। केंद्र सरकार पिछले सालभर से राज्यों के सहयोग से इसे पूरा करने की कवायद में जुटी है।

उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ समेत सभी खाद्यान्न उत्पादक राज्यों में इसे लागू करने के लिए पहले ही टाइम टेबल जारी कर दिया गया था। फर्टिलाइजर पर किसानों को मिलने वाली सब्सिडी में चोरी को लेकर लगातार सवाल खड़े होते रहे हैं।

इससे निपटने के लिए सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग का फैसला लेते हुए पहले चरण में 14 राज्यों के 17 जिलों में इसे लागू किया था। उसके उत्साहजनक नतीजों के मद्देनजर सरकार अब पूरे देश में इसे लागू करने का फैसला किया है। विभिन्न राज्यों में यह व्यवस्था लागू करने के लिए किसानों के बैंक खाते, उनकी जमीन का ब्यौरा और उनके आधार से जोड़ने का काम पूरा हो चुका है।

  • सभी राज्यों में तैयारियां पूरी, यूपी व बिहार में एक जनवरी से चालू
  • फर्टिलाइजर की दुकानों से अंगुली निशान से मिलेगी खाद
  • पायलट परियोजना की सफलता के बाद पूरे देश में लागू होगी योजना

मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक समूचे देश में इसे व्यापकता से लागू करने के लिए राज्यों के सहयोग से प्वाइंट आफ सेल ( पॉस ) मशीनें लगाई जाने लगी हैं। इन मशीनों को फर्टिलाइजर ( खाद ) की दुकानों पर लगाने का काम संबंधित फर्टिलाइजर कंपनियां कर रही हैं।

देश में खाद बेचने वाली दुकानों पर कुल ढाई लाख पॉस मशीनों की जरुरत है। इसमें से अब तक कुल लगभग डेढ़ लाख दुकानों पर मशीनें लगाई जा चुकी हैं। विभिन्न राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में एक सितंबर 2017 से इस दिशा में डीबीटी योजना चालू कर दी गई है।फर्टिलाइजर मंत्रालय ने इस योजना को प्रारंभ करने के लिए हर राज्य को उसकी सुविधा के अनुसार तिथि का निर्धारण कर दिया है।

डीबीटी की शुरुआत दिल्ली प्रदेश में एक सितंबर 2017 को चालू कर दी गई थी, जबकि मिजोरम, दमन व दीव, दादरा नगर हवेली, मणिपुर, नागालैंड, गोवा व पुडुचेरी में यह योजना एक अक्तूबर को प्रारंभ हो गई। राजस्थान, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, अंडमान व निकोबार, असम और त्रिपुरा में योजना को एक नवंबर से शुरु किया गया है।

देश की खाद्य सुरक्षा में अहम भूमिका निभाने वाली राज्य आंध्र प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में खाद की सब्सिडी सीधे खाते में जमा कराने की योजना एक दिसंबर 2017 को चालू हो गई है। जबकि गेहूं का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश, बिहार, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और तमिलनाडु में एक जनवरी 2018 को यह योजना शुरु की जाएगी। इसी तरह गुजरात व हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने की वजह से यहां तैयारियां हो जाने के बावजूद इसे एक जनवरी से शुरु किया जाएगा।

गर्मी में बिना AC नहीं सोती यह डेढ़ करोड़ की गोड़ी,जाने इसकी खुराक और बाकि जानकारी

बड़वानी और महाराष्ट्र बॉर्डर के खेतिया-सारंगखेड़ा में अश्व मेले में आई करीब पांच साल की घोड़ी पद्मा लोगों के दिलों पर छा गई है। इंदौर के दतोदा की घोड़ी पद्मा के मालिक बालकृष्ण चंदेल ने बताया वे पद्मा को रोजाना 10 लीटर दूध, मिनरल पानी, 2 किलो चना, 5 किलो गेहूं की चापड़ व स्वाद अनुसार हरी घास खिलाते हैं। हर दिन उसे शैम्पू से नहलाया जाता है। गर्मियों में अगर AC कमरे में नहीं सुलाओ तो बैचेन रहती है।

दतोदा में रहने वाले बालकृष्ण चंदेल की घोड़ी पद्मा पुष्कर मेले में छाई हुई थी। इस घोड़ी ने तो सीएम वसुंधरा राजे सिंधिया को भी दिल जीत लिया था। पद्मा को खरीदने के लिए एक शख्स ने 72 लाख की बोली लगा दी थी, हालांकि उस समय चंदेल अपनी इस लाड़ली घोड़ी को 1.5 करोड़ से कम में बेचने के लिए तैयार नहीं थे।

घोड़ी मालिक का दावा है कि पद्मा की कीमत 2 करोड़ तक लग चुकी है, लेकिन वे इसे 10 करोड़ में भी बेचना नहीं चाहते हैं। उनके अनुसार अब तक कई ईनाम अपने नाम कर चुकी पद्मा की कद-काठी व नस्ल महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक की वंशज जैसी मानी जाती है।

छह फ़ीट ऊंची है पद्मा

करीब पांच साल की पद्मा का कद लगभग 6 फ़ीट है। चंदेल ने चार साल पहले आगरा के एक किसान से पद्मा को छह लाख रुपए में खरीदा था। चंदेल का पूरा परिवार पद्मा की देखरेख करता है। पद्मा को रोज़ 10 लीटर गाय का दूध पिलाते हैं। रोज उसको आधा किलो काजू और बादाम भी खिलाते हैं। चंदेल के मुताबिक़ पद्मा को नहाने का बहुत शौक है। जब तक उसे शैंपू से नहलाया ना जाए, तब तक वह सवारी के लिए तैयार नहीं होती।

वसुंधरा ने पहनाई थी माला, खरीदना चाहती थी पद्मा को

चंदेल बताते हैं कि पुष्कर मेले में पद्मा सबके आकर्षण का केंद्र थी। मेले का निरीक्षण करने आईं राजस्थान की सीएम वसुंधरा भी उसे देख काफी खुश हुईं। वसुंधरा जी का कहना था कि यदि पद्मा का रंग ब्राउन होता तो वे उसे तुरंत खरीद लेती। चंदेल बताते हैं कि एक ग्राहक तो पद्मा को खरीदने के लिए 72 लाख रुपए लेकर आ भी आ गया था, लेकिन  हम पद्मा को बेचना नहीं चाहते थे, इसलिए हमने उसकी कीमत डेढ़ करोड़ रखी थी।

ये है पद्मा की खुराक…

  • 10 लीटर दूध रोज
  • 05 किलो गेहूं चापड़ी
  • 02 किलो चना
  • 4.6 वर्ष आयु
  • 70 इंच ऊंचाई
  • 850 किलो वजन

मेले में खास

सारंगखेड़ा में एकमुखी गुरुदत्त भगवान का मंदिर है। इस मंदिर के पास ही अश्व मेला लगा है। इसमें 80 गांव के लोग आ रहे हैं। मेले में बड़ी-बड़ी पालकियां, सर्कस, पार्क, बच्चाें व ग्रामीणों के मनोरंजन के साधन हैं।

काले गेहूं की खेती होती है, लेकिन बाकी सच्चाई भी जान लीजिए

पिछले कुछ महीनों से सोशल मीडिया में काले गेहूं को लेकर लगातार ख़बरें शेयर हो रही हैं। जिसमें ये कहा जा रहा है भारत में पहली बार काले गेहूं की खेती हो रही है और ये सामान्य गेहूं के मुकाबले न सिर्फ कई गुना महंगा बिकता है बल्कि इसमें कैंसर और डायबिटीज समेत कई बीमारियों से लड़ने की क्षमता होती है।

लेकिन यह पूरा सच नहीं है। आज आप को बताते हैं, ये गेहूं कहां पैदा होता है, इसका रंग काला क्यों होता है, क्या काले रंग के अलावा भी किसी रंग का गेहूं होता है और इसके चिकित्सकीय गुण क्या हैं ?

सोशल मीडिया में वायरल होने वाली इस पोस्ट में दावा किया गया था कि, सात बरसों के रिसर्च के बाद गेहूं की इस नई किस्म को पंजाब के मोहाली स्थित नैशनल एग्री फूड बायोटेक्नॉलजी इंस्टीट्यूट या नाबी ने विकसित किया है। नाबी के पास इसका पेटेंट भी है।

इस गेहूं की खास बात यह है कि इसका रंग काला है। वायरल हो रही पोस्ट में कहा गया है कि काले गेहूं में कैंसर, डायबिटीज, तनाव, दिल की बीमारी और मोटापे जैसी बीमारियों की रोकथाम करने की क्षमता है।

इस दावे की जांच के लिए जब न्यूज चैनल एबीपी के प्रतिनिधि मोहाली स्थित नाबी पहुंचे तो वहां उन्होंने इस गेहूं की फसल देखी। उन्होंने पाया कि शुरू में इसकी बालियां भी आम गेहूं जैसी हरी होती हैं, पकने पर दानों का रंग काला हो जाता है।

ज्यादा जानकारी के लिए जब नाबी की साइंटिस्ट और काले गेहूं की प्रोजेक्ट हेड डॉ. मोनिका गर्ग से बातचीत की तो उन्होंने बताया कि नाबी ने काले के अलावा नीले और जामुनी रंग के गेहूं की किस्म भी विकसित की है।

काले रंग की वजह एंथोसाएनिन

इस गेहूं के अनोखे रंग के बारे में पूछने पर डॉ. गर्ग ने बताया कि फलों, सब्जियों और अनाजों के रंग उनमें मौजूद प्लांट पिगमेंट या रंजक कणों की मात्रा पर निर्भर होते हैं। काले गेहूं में एंथोसाएनिन नाम के पिगमेंट होते हैं।

एंथोसाएनिन की अधिकता से फलों, सब्जियों, अनाजों का रंग नीला, बैंगनी या काला हो जाता है। एंथोसाएनिन नेचुरल एंटीऑक्सीडेंट भी है। इसी वजह से यह सेहत के लिए फायदेमंद माना जाता है। आम गेहूं में एंथोसाएनिन महज 5पीपीएम होता है, लेकिन काले गेहूं में यह 100 से 200 पीपीएम के आसपास होता है।

एंथोसाएनिन के अलावा काले गेहूं में जिंक और आयरन की मात्रा में भी अंतर होता है। काले गेहूं में आम गेहूं की तुलना में 60 फीसदी आयरन ज्यादा होता है। हालांकि, प्रोटीन, स्टार्च और दूसरे पोषक तत्व समान मात्रा में होते हैं।

सेहत के लिए है फायदेमंद

तब क्या काला गेहूं खाने से कैंसर, डायबिटीज जैसी बीमारियां नहीं होतीं। इस पर डॉ. गर्ग का कहना है, चूहों पर किए गए प्रयोगों में देखा गया कि ब्लड कॉलस्ट्रॉल और शुगर कम हुआ, वजन भी कम हुआ लेकिन इंसानों पर भी यह इतना ही कारगर होगा यह नहीं कहा जा सकता।

पर यह तो तय है कि अपनी एंटीऑक्सीडेंट खूबियों की वजह से इंसानों के लिए भी यह फायदेमंद साबित होगा। नाबी इसके बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए कंपनियों से करार कर रहा है।

कुछ वेबसाइट बेच रही हैं काले गेहूं का आटा

देखने में आया है कि कुछ ई कॉमर्स वेबसाइट काले गेहूं का आटा बेच रही हैं। इसकी कीमत साइट पर 2 हजार रुपये प्रति किलो से 4 हजार रुपये प्रति किलो तक बताई गई है। साथ ही इनमें बीमारियां दूर करने वाले वे सभी दावे भी किए गए हैं जो सोशल मीडिया में वायरल हो रहे हैं।

काला चावल भी होता है

गेहूं ही नहीं काला चावल भी होता है। इंडोनेशिअन ब्लैक राइस और थाई जैसमिन ब्लैक राइस इसकी दो जानीमानी वैरायटी हैं। म्यामांर और मणिपुर के बॉर्डर पर भी ब्लैक राइस या काला चावल उगाया जाता है। इसका नाम है चाक-हाओ। इसमें भी एंथोसाएनिन की मात्रा ज्यादा होती है।

50 हजार प्रति क्विंटल के भाव से बिकी ये खास सोयाबीन

सोयाबीन की विशेष किस्म ‘करुणे’ यहां 50 हजार रुपए क्विंटल में बिकी। इसे जापान से आए दल ने खरीदा जबकि इन दिनों सामान्य सोयाबीन का भाव 28 सौ से तीन हजार स्र्पए प्रति क्विंटल चल रहा है।

दरअसल इतना अधिक दाम मिलने की वजह इस सोयाबीन का खास होना है। हरी सब्जी के रूप में उपयोग की जाने वाली यह सोयाबीन पचने में आसान होती है और कुपोषण के लिए भी लाभदायक मानी गई है। इस किस्म की विदेशों में अच्छी मांग है और जापान इसका प्रमुख खरीदार है। इसकी पैदावार 5 से 6 क्विंटल बीघा बताई जाती है।

कृषि विज्ञान केंद्र की वैज्ञानिक रेखा तिवारी ने बताया कि करुणे नई किस्म की सोयाबीन है, जो हरी सब्जी के रूप में उपयोग होती है। शुरुआत में बिजवार (बीज तैयार करने) के लिए जिले में 10 किसानों को 400 ग्राम से एक किलो तक दिया है और उत्पादन विधि भी बताई है। कम पानी में इसका अधिक उत्पादन लिया जा सकता है।

अक्टूबर अंत में जवाहरलाल नेहरू एवं राजमाता सिंयिा कृषि विवि के संयुक्त तत्वावान में जापानी दल ‘जायका प्रोजेक्ट’ के सिलसिले में उज्जैन आया था। उन्हें जिले के उन्नात कृषक निहालसिंह के खेत में करुणे सोयाबीन का अवलोकन करवाया था। दल को यह काफी पसंद आया, वे एक क्विंटल सोयाबीन खरीदकर ले गए।

80 दिन में होती है तैयार

जिले के ग्राम चिंतामन जवासिया के उन्न्त किसान निहालसिंह आंजना ने तीन साल पहले 400 ग्राम बीज बोकर शुरुआत की थी, जो अब तीन क्विंटल तक पहुंच चुकी है। उन्होंने बताया कि इसे खेतों की मेड़ पर रोपा जाता है। जैविक खाद और दवा का उपयोग किया जाता है।

करीब 60 दिन में हरी फली तैयार हो जाती है, जो हरे मटर की तरह सब्जी में काम आती है। 80 दिन में फसल पककर तैयार हो जाती है। वर्तमान में बिजवार के रूप में यह 500 रुपए किलो तक बिक रहा है। विभिन्न क्षेत्रों के किसान इसे ले जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि जापानी दल ने 50 हजार रुपए में एक क्विंटल सोयाबीन उनसे खरीदा था।

अधिक फाइबर व कम वसा के कारण सुपाच्य

कृषि वैज्ञानिक रेखा तिवारी के अनुसार करुणे सोयाबीन में फाइबर अधिक होता है, इसलिए ये सुपाच्य है। इसमें वसा (फेट ) भी कम होता है। इसके विपरीत पीली सोयाबीन में अपेक्षाकृत वसा अधिक और फाइबर कम होता है। जापानी लोग खाने में सब्जियों का इस्तेमाल अधिक करते हैं। करुणे सोयाबीन भी सब्जी में उपयोग के लिए ही खरीदी है।