इन तरीकों से पहचानें की ऊर्वरक (खाद ) असली है या नकली

कई बार किसान अपनी फसल में छिड़काव करने के लिए जो ऊर्वरक (खाद )लाते हैं वो अच्छा नहीं होता है, या नकली होता है। लेकिन किसानों को इसकी जानकारी नहीं होती है कि वो कैसे पहचानें कि ऊर्वरक असली है या नकली। इस लिए आज हम बताने जा रहे हैं कि किसान किस ऊर्वरक की गुणवत्ता को कैसे पहचान सकता है।

डीएपी

डीएपी असली है या नकली इसकी पहचान के लिए किसान डीएपी के कुछ दानों को हाथ में लेकर तम्बाकू की तरह उसमें चूना मिलाकर मसलने पर यदि उसमें से तेज गन्ध निकले, जिसे सूंघना मुश्किल हो जाये तो समझें कि ये डीएपी असली है।

किसान भाइयों डीएपी को पहचानने की एक और सरल विधि है। यदि हम डीएपी के कुछ दाने धीमी आंच पर तवे पर गर्म करें यदि ये दाने फूल जाते हैं तो समझ लें यही असली डीएपी है किसान भइयों डीएपी की असली पहचान है। इसके कठोर दाने ये भूरे काले एवं बादामी रंग के होते है। और नाखून से आसानी से नहीं टूटते हैं।

यूरिया

यूरिया के दाने सफेद चमकदार और लगभग समान आकार के कड़े दाने होते हैं। यह पानी में पूरी तरह से घुल जाती है तथा इसके घोल को छूने पर ठंढा लगता है। किसान यूरिया को तवे पर गर्म करने से इसके दाने पिघल जाते है यदि हम आंच तेज कर दें और इसका कोई अवशेष न बचे तो समझ लें यही असली यूरिया है।

पोटास

पोटाश की असली पहचान है इसका सफेद नमक तथा लाल मिर्च जैसा मिश्रण। पोटाश के कुछ दानों पर पानी की कुछ बूंदे डालें अगर ये आपस में नहीं चिपकते हैं तो समझ लें कि ये असली पोटाश है। एक बात और पोटाश पानी में घुलने पर इसका लाल भाग पानी में ऊपर तैरता रहता है।

सुपर फास्फेट

सुपर फास्फेट की असली पहचान है इसके सख्त दाने तथा इसका भूरा काला बादामी रंग। इसके कुछ दानों को गर्म करें यदि ये नहीं फूलते हैं तो समझ लें यही असली सुपर फास्फेट है। ध्यान रखें कि गर्म करने पर डीएपी के दाने फूल जाते हैं जबकि सुपर फास्फेट के नहीं।

इस प्रकार इसकी मिलावट की पहचान आसानी से की जा सकती है। सुपर फास्फेट नाखूनों से आसानी से नहीं टूटता है। इस दानेदार उर्वरक में मिलावट बहुधा डीएपी व एनपीके मिक्स्चर उर्वरकों के साथ की जान की आशंका रहती है।

जिंक सल्फेट

जिंक सल्फेट की असली पहचान ये है कि इसके दाने हल्के सफेद पीले तथा भूरे बारीक कण के आकार के होते हैं। किसान भाइयों जिंक सल्फेट में प्रमुख रूप से मैगनीशियम सल्फेट की मिलावट की जाती है। भौतिक रूप से सामान्य होने के कारण इसके असली व नकली की पहचान करना कठिन होता है।

किसान भाइयों एक बात और डीएपी के घोल मे जिंक सल्फेट का घोल मिलाने पर थक्केदार घना अवशेष बनाया जाता है। जबकि डीएपी के घोल में मैगनीशियम सल्फेट का घोल मिलाने पर ऐसा नही होता है। किसान भाइयों यदि हम जिंक सफेट के घोल मे पलती कास्टिक का घोल मिलायें तो सफेद मटमैला मांड जैसा अवशेष बनता है।

यदि इसमें गाढ़ा कास्टिक का घोल मिला दें तो ये अवशेष पूर्णतया घुल जाता है। किसान भाइयों इसी प्रकार यदि जिकं सल्फेट की जगह पर मैगनीशियम सल्फेट का प्रयोग किया जाय तो अवशेष नहीं घुलता है।

अब रसोई गैस की तरह राशन पर भी मिलेगी सब्सिडी, सरकार ला रही योजना

 

जल्द ही आपको रसोई गैस सब्सिडी की तरह अनाज की सब्सिडी भी मिला करेंगी। सरकार सब्सिडी वाले अनाज के सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए एलपीजी जैसी सब्सिडी ट्रांसफर मॉडल अपनाने की योजना बना रही है।

यह पहल सब्सिडी और खाद्य अनाज के शून्य रिसाव को भी सुनिश्चित करेगा। मंत्रालय ने हाल ही में रांची में जमीन की स्थिति का आकलन करने के लिए तीन प्रशिक्षुओं के आईएएस अधिकारियों को नियुक्त किया था, जहां एक पायलट को शुरू किया जा सकता है।अभी 81 करोड़ पहचाने गए लाभार्थियों को राशन दुकानों से 1-3 रुपए किलो प्रति किलोग्राम सब्सिडी मिल जाती है।

सरकार ने 23 करोड़ राशन कार्ड धारकों के आधार कार्डों को लगाने के लिए कई उपायों को अपनाया है, साथ ही सब्सिडी वाले खाद्यान्नों के मोड़ पर अंकुश लगाने के लिए उचित मूल्य की दुकानों (ईपीएस) मशीनों पर इलेक्ट्रानिक बिन्दु बिक्री (ई-पीओएस) स्थापित करने के अलावा कई तहर की स्कीमें बना रही है।

किसानों की उम्मीदों पर सरकार ने फेरा पानी, स्वामीनाथन रिपोर्ट पर दिआ यह जवाब

खरीफ की बुवाई में जी-जान से जुटे किसानों को उम्मीद थी कि इस बार सरकार उनकी मेहनत का उचित मूल्य देगी उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार आएगा लेकिन केन्द्र सरकार ने किसानों को उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। किसानों को फसल लागत मूल्य से 50 प्रतिशत अधिक न्यूनतम समर्थन मूल्य देने की स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को नकार दिया है।

लोकसभा में मंगलवार को कृषि राज्यमंत्री एसएस अहलूवालिया ने कहा कि फसल लागत पर कम से कम 50 फीसदी वृद्धि को निर्धारित करने से बाजार में विकृति आ सकती है। सरकार के इस फैसले से किसानों को झटका लगा है। भारतीय किसान यूनियन अध्यक्ष भानू प्रताप सिंह ने कहा ” देशभर में अपने हक के लिए आंदोलन कर रहे किसान सरकार के इस फैसले से निराश हैं।”

उन्होंने कहा कि घाटे का सौदा बनती जा रही खेती को लेकर सरकार का अगर यही रवैया रहा तो किसान खेती छोड़ने पर मजबूर हो जाएगा। किसानों की समस्यओं के अंत के लिए हाल ही में मंदसौर से दिल्ली तक किसान मुक्ति यात्रा निकालने वाले स्वराज इंडिया के संयोजक योगेन्द्र यादव ने कहा ” नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी ने किसानों को वादा किया था कि उनको फसलों की लागत पर 50 प्रतिशत का मुनाफा दिलाया जाएगा। उस हिसाब से देखें तो एक भी फसल में सरकार अपने वादे का आधा भी नहीं दे रही है। ”

उन्होंने कहा कि पिछले दिनों केन्द्र सरकार ने घोषणा कि खरीफ 2017-18 के लिए सब फसलों के दाम बढ़ा दिए गए हैं। धान का समर्थन मूल्य बढ़ाकर 1550 रुपए प्रति क्विंटल कर दिया गया है, जबकि अरहर-तुअर दाल के समर्थन मूल्य में 400 रुपए बढ़ाकर 5450 रुपए कर दिया गया है, लेकिन इसके पीछे जो सच है सरकार ने उसे छिपा लिया है। ”

धान की लागत 1484 रुपए है और अगर किसान को 1550 रुपए प्रति कुंतल का समर्थन मूल्य मिल भी जाए तो उसे सिर्फ 4 प्रतिशत बचत होगी। ” योगेन्द्र यादव ने कहा कि सरकार जिस तरह समर्थन मूल्य का फैसला करती है उस पर किसान संगठनों ने बार-बार सवाल उठाए हैं।

कृषि नीति विशेषज्ञ देविंदर शर्मा ने बताया ” सरकारों ने किसानों को उनके उचित आय से वंचित रखा है, जो किसानों का न्यूनतम समर्थन मूल्य से मिलता है। जब भी न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने की बात होती है, तब कहा जाता है कि इसकी जरूरत नहीं है, फसलों का मूल्य कम रखना चाहिए, नहीं तो खुदरा खाद्य कीमतों में वृद्धि होगी। यानी उपभोक्ताओं को सस्ता भोजन उपलब्ध कराने के लिए किसानों को गरीब रखा गया है। ”

देश में किसानों की समस्याओं और कृषि संकट के अंत को लेकर एक नीति बनाने के लेकर लगातार काम कर रहे कृषि नीति विशेषज्ञ रमनदीप सिंह मान ने बताया ” न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर केन्द्र से लेकर राज्य सराकरों का रवैया किसानों के हित में नहीं है। ” उन्होंने केन्द्र सरकार की तरफ से खरीफ सीजन 2017-18 के लिए जारी न्यूनतम समर्थन मूल्य से किसानों को कोई लाभ नहीं होगा, जबतक सरकार किसानों की आय को लेकर गंभीर होकर काम नहीं करती है।

कम लागत में ज्यादा मुनाफा लेने के लिए ऐसे करें सहजन की खेती

सहजन की खेती कम समय में मुनाफे का सौदा साबित होने वाली फसल है। कम लागत में तैयार होने वाली इस फसल की खासियत ये है कि इसकी एक बार बुवाई के बाद चार साल तक बुवाई नहीं करनी पड़ती है।

गुजरात के मोरबी जिले से पूरब दिशा से 30 किलोमीटर दूर चूपनी गाँव में किसान प्रतिवर्ष 200 से 250 एकड़ खेत में सहजन की खेती करते हैं।

यहां के किसान पिछले 6 वर्षों से सहजन की खेती कर रहे हैं। उन्होंने इसकी शुरूआत एक एकड़ खेत से की थी और इसके बढ़ते मुनाफे को देखकर अब 250 एकड़ सहजन की खेती की जा रही है। सहजन 300 रोगों की रोकथाम कर सकता है |

चूपनी गाँव में रहने वाले किसान रवि सारदीय (42 वर्ष) बताते हैं, “मैं पिछले तीन साल से सहजन की खेती कर रहा हूं। इसके एक एकड़ में खेती से किसान एक लाख से ज्यादा मुनाफा सिर्फ 10 महीने में कमा सकते हैं। ”

रवि सारदीय ने सहजन की एक नई प्रजाति की खोज की है जिसका नाम है “ज्योति-1” है। इस प्रजाति को लगाने से एक पौधे में 700 फलियां लगती हैं, जबकि दूसरी प्रजाति में सिर्फ 250 ही फलियां लगती हैं |

रवि सारदीय आगे बताते हैं, “एक एकड़ खेत में सहजन के 250 ग्राम बीज की जरूरत होती है,लाइन से लाइन की दूरी 12 फिट और प्लांट से प्लांट की दूरी 7 फिट रखी जाती है, एक एकड़ खेत में 518 पौधे लगाए जाते हैं |

अप्रैल महीने में बुवाई के बाद सितम्बर महीने में फलियां बाजार में बिकनी शुरू हो जाती हैं। ”

गर्मी के मौसम में 10 रुपए किलो और सर्दियों के मौसम में 40 रुपए किलो के हिसाब से बिकती हैं। बारिश के मौसम को छोड़कर सहजन के पेड़ में दो बार फलियां लगती हैं और एक बार सहजन लगाने के बाद 4 साल तक लगातार पैदावार होती है। एक पौधे में लगभग 20 किलो तक सहजन की फलियां लगती हैं।

गोरखपुर में राष्ट्रीय बागवानी शोध एवं विकास संस्थान (एनएचआरडीएफ) के उप निदेशक डॉ रजनीश मिश्र बताते हैं, “करीब पांच हजार साल पहले आयुर्वेद ने सहजन की जिन खूबियों को पहचाना था, आधुनिक विज्ञान में वे साबित हो चुकी हैं।”

देश के अपेक्षाकृत प्रगतिशील दक्षिणी भारत के राज्यों आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और कर्नाटक में इसकी खेती होती है। तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय ने पीकेएम-1 और पीकेएम-2 नाम से दो प्रजातियां विकसित की हैं।”

औषधीय गुणों से भरपूर

डॉ रजनीश मिश्र ने बताया कि सहजन को अंग्रेजी में ड्रमस्टिक कहा जाता है। इसका वनस्पति नाम मोरिंगा ओलिफेरा है। फिलीपीन्स,मैक्सिको, श्रीलंका, मलेशिया आदि देशों में भी सहजन का उपयोग बहुत अधिक किया जाता है।

दक्षिण भारत में व्यंजनों में इसका उपयोग खूब किया जाता है। सेंजन, मुनगा या सहजन आदि नामों से जाना जाने वाला सहजन औषधीय गुणों से भरपूर है।

इसके अलग-अलग हिस्सों में 300 से अधिक रोगों के रोकथाम के गुण हैं। इसमें 92 तरह के मल्टीविटामिन्स, 46 तरह के एंटी आक्सीडेंट गुण, 36 तरह के दर्द निवारक और 18 तरह के एमिनो एसिड मिलते हैं।

पशुओं के चारे के रूप में उपयोगी

चारे के रूप में इसकी पत्तियों के प्रयोग से पशुओं के दूध में डेढ़ गुना और वजन में एक तिहाई से अधिक की वृद्धि की रिपोर्ट है। कुपोषण, एनीमिया (खून की कमी) में सहजन फायेदमंद होता है।

ऐसे होती है इजराइल में खेती जान कर आप रह जाओगे हैरान

दुनिया में सबको भरपेट खाना मिले और जो खेतों में उगाया जा रहा है उसे सुरक्षित रखा जा सके ये बहुत बड़ी समस्या है। अकेले भारत में हर साल बिना रखरखाव के अरबों रुपये का अन्न बर्बाद हो जाता है।

कभी सूखे से बिना पानी फसलें सूख जाती हैं तो कभी बाढ़ के सैलाब में खेत के खेत बर्बाद हो जाते हैं। जैसे-जैसे आबादी बढ़ रही है, वैसे-वैसे मांग भी बढ़ रही है। ऐसे में खेती और खाद्य सुरक्षा जरूरी होता जा रही है।

भारत ही नहीं दुनिया का लगभग हर देश इन समस्याओं से जूझ रहा है। लेकिन युवा किसानों का देश कहे जाने वाले इजरायल ने खेती से जुड़ी कई समस्याओं पर न सिर्फ विजय पाई है बल्कि दुनिया के सामने खेती को फायदे का सौदा बनाने के उदाहरण रखे हैं।

1950 से हरित क्रांति के बाद इस देश ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। इजरायल ने केवल अपने मरुस्थलों को हराभरा किया, बल्कि अपनी खोजों को चैनलों और एमएएसएचएवी (MASHAV, विदेश मामलों का मंत्रालय) के माध्यमों से प्रसारित किया ताकि अन्य देशों के लोग भी इसका लाभ उठा पाएं। इजरायल-21 सी न्यूज पार्टल ने ऐसे की कुछ प्रमुख मुद्दों को उठाया है जिससे अन्न उत्पादन और उसके रखरखाव के लिए पूरे विश्व में इजरायल की तूती बोल रही है।

1-टपकन सिंचाई (ड्रिप इरगेशन)- पानी और पैसा दोनों बचाइए

इस मामले कोई आधुनिक और ज्यादा कारगर खोज अभी तक नहीं हो पाई है। इजरायल में भी ये प्रथा पहले से ही अस्तित्व में थी। इजरायल की वाटर इंजीनियर सिम्चा ब्लास ने इस पद्धति में नई क्रांति ला दी।

सिम्चा ने खोज की कि अगर ड्रिप को धीमा और संतुलित कर दिया जाए तो उत्पादन क्षमता बढ़ सकती है। उन्होंने ऐसे ट्यूब का निर्माण किया, जिससे पानी की मात्रा कम होकर गिरने लगी, ये ज्यादा कारगर साबित हुआ। इस पद्धति पर उन्होंने काम शुरू किया इससे संबंधित फर्म भी बनाया।

इजरायल की ये टपका सिंचाई विधि अब कई देशों में इस्तेमाल की जा रही है। इस विधि से इजरायल से बाहर लगभग 700 ऐसे किसान परिवार हैं जो साल में अब तीन फसलें पैदा कर रहे हैं जो कि पहले एक बार ही होता।

2-अन्न कोष- सुरक्षित रखे जा सकते हैं अनाज

इजरायल ने एक ऐसे अन्न कोष का निर्माण किया है जिसमें किसान कम खर्चों में ही अपनी फसल को ताजा और सुरक्षित रख सकते हैं।

इंटरनेशनल फूड टेक्नोलॉजी कंसलटेंट प्रोफेसर श्लोमो नवार्रो ने इस बड़े बैग को बनाया है। ये बैग हवा और पानी, दोनों से सुरक्षित रहेगा।

बैग का प्रयोग पूरे अफ्रीका के साथ-साथ कई सम्पन्न देशों में किया जा रहा है। पाकिस्तान ने भी इस बैग के लिए इजरायल के साथ समझौता किया है।

50 प्रतिशत से ज्यादा फसलें उत्पादन के बाद कीड़े और फफूंद की वजह से खराब हो जाती हैं। ऐसे में ये बैग उपज की सुरक्षा के लिए कारगार साबित हो रहा है। भीषण गर्मी और सीलने होने के बाद भी इस बैग में रखी फसलें सुरक्षित रहती हैं।

3- जैविक कीट नियंत्रण- शत्रु कीटों पर हमला, मित्र कीटों का संरक्षण

बायो-बी नामक कंपनी ने ऐसे कीट नियंत्रक दवा का निर्माण किया है जिसके छिड़काव से कीड़े तो दूर रहते हैं लेकिन इससे मक्खी और भौरों को कोई नुकसान नहीं होता। कंपनी परागण के लिए भौरों का भी प्रयोग करती है।

ऐसे में परागण की प्रक्रिया प्रभावित नहीं होती। कंपनी के मैनेजर डॉ शीमोन ने बताया कि हमारी कंपनी कीटनाशक दवाओं की बिक्री के मामले प्रमुख कंपनियों में से एक है।

कैलिफोर्निया में पैदा होने वाले 60 फीसदी स्ट्राबेरी पर 1990 से इसी दवा का छिड़काव किया जा रहा है, और इसके प्रयोग के बाद से पैदावार में 75 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है। बायो बी की दवा और भौरों का प्रयोग इस समय 32 देशों में किया जा रहा है, जिसमें जापान और चिली भी शामिल हैं।

4-डेयरी फार्मिंग

होफ हैशरोन डेयरी फार्म (Hof Hashron), एसएई एफिकिम (SAE Afikim) और एससीआर प्रीसाइज डेयरी फार्म (SCR Precies Dairy Farming) ने मवेशियों के झुंड प्रबंधन की नई तकनीकी ईजाद की और इसका प्रयोग अपने डेयरी उत्पादन में बखूबी कर रहे हैं।

एसएई एफिकिम वियतनाम में चल रहे उस पांच साल के प्रोजेक्ट का भी हिस्सा है जिसका लक्ष्य 5 लाख मिलियन डेयरी फार्म का है, जो दुनिया का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट है। प्रोजेक्ट के चैनल में 30 हजार गायों को जोड़ा जा चुका है, कार्यक्षेत्र 12 राज्यों में फैला हुआ है।

इसके माध्यम से प्रतिदिन 3 लाख लीटर दूध की सप्लाई की जा रही है। चायना ने इससे प्रभावित होकर इससे संबधित मंत्रालयों को लोगों को इजरायल भेजता है और कहता है कि इजराय से सीखने लायक है कि कैसे दुग्ध उत्पादन बढ़ाया जाए।

5- हवा से निचोड़ रहे पानी की हर बूंद (ओस की बूंदों से सिंचाई)

ताल-या वाटर टेक्नोलाजी ने दोबारा प्रयोग में लिए जाने वाले ऐसे प्लास्टिक ट्रे का निर्माण किया है जिससे हवा से ओस की बूंदे एकत्र की जा सकती है।

दांतेदार आकार का ये ट्रे प्लास्टिक को रीसाइकिल करके बनाया जाता है। इसमें यूवी फिल्टर और चूने का पत्थर लगाकर पेड़ों के आसपास इसे लगाया जाता है।

रात को ये ट्रे ओस की बूंदों को साख लेता है और बूंदों को पौधों की जड़ों तक पहुंचाता है। इसके निर्माता अवराहम तामिर बताते हैं ट्रे कड़ी धूप से भी पौधों को बचाता है। इस विधि से पौधों की 50 प्रतिशत पानी की जरूरत पूरी हो जाती है।

6-रेगिस्तान में पालते हैं मछली

मछलियों को अत्यधिक पकड़ाजाना खाद्य सुरक्षा के लिए चिंता का विषय बन जाता है, वो भी ऐसे में जब मछली ही हजारों लोगों के लिए प्रोटीन का मुख्य जरिया हो। इजरायल में भी ऐसी समस्या थी।

लेकिन अब इजरायल में अब कहीं भी मछलियां मिल जाती है। इसे संभव बनाया जीएफए (ग्रो फिश एनव्हेयर) के एडवांस्ड तकनीकी ने।

इजरायल के जीरो डिस्चार्ज सिस्टम ने मछली पालन के लिए बिजली और मौसम की बाध्यता को खत्म कर दिया। बिजली और मौसम मछली पालन के लिए बड़ी समस्या बन रहे थे। इस तकनीकी में एक ऐसा टैंकर बनाया जाता है जिनपर इस समस्याओं का असर नहीं पड़ता। अमेरिका में इस तकनीकी का प्रयोग बड़ी संख्या में किया जा रहा है।

किसानो को बड़ी राहत, ट्रेक्टर और खाद की जीएसटी में मिली इतने फीसदी की छूट

जीएसटी काउंसिल ने किसानों को बड़ी राहत दी है. अब फर्टिलाइजर पर जीएसटी के तहत 12 फीसदी की बजाए 5 फीसदी टैक्स ही देना होगा. शुक्रवार को जीएसटी काउंसिल की बैठक में इस पर फैसला लिया गया. ट्रैक्‍टर के कल-पूर्जों पर भी टैक्‍स 28 फीसदी से कम करके 18 फीसदी कर दिया गया है.

अभी 8 फीसदी तक था टैक्‍स

फर्टिलाइजर पर 12 फीसदी टैक्‍स लगाए जाने पर कई राज्‍यों ने चिंता जताई थी. उनकी दलील थी कि इससे किसानों पर बोझ बढ़ेगा. जीएसटी लागू होने से पहले अभी तक खाद पर शून्‍य से लेकर 8 फीसदी तक टैक्‍स लगता था.

550 लाख टन खाद का होता है उपयोग

देश में हर साल करीब 22.4 करोड़ टन खाद्यान्‍न का उत्‍पादन होता है, जिसके लिए किसान करीब 550 लाख टन खाद का उपयोग करते हैं. अगर खाद पर 12 फीसदी टैक्‍स लगाया जाता तो 50 किलो के एक यूरिया बैग की कीमत में 35 रुपए का इजाफा हो जाता. लेकिन जीएसटी काउंसिल ने इसे कम करके किसानों को बड़ी राहत दी है.

ट्रैक्‍टर के कल-पूर्जों पर 18 फीसदी टैक्‍स

जीएसटी काउंसिल ने ट्रैक्‍टर के कल-पूर्जों पर भी कर की दर 28 फीसदी से कम करके 18 फीसदी कर दिया है. अभी तक इन पर 5 से लेकर 17 फीसदी के बीच कर लगता रहा था. जीएसटी काउंसिल ने इसे बढ़ाकर 18 फीसदी से 28 फीसदी कर दिया था. इस पर किसानों ने भारी चिंता जताई थी. देश में हर साल लगभग 6.5 लाख ट्रैक्‍टर की बिक्री होती है. सबसे अधिक बिक्री कॉम्‍पैक्‍ट ट्रैक्‍टर की होती है.

जाने क्या है चावल की उछलने वाली गेंद का सच्च

आजकल सोशल मीडिया पर प्लास्टिक के चावल होने का अफवाह फैला जा रहा है। विडियों में चावल का गेंद बनाकर उछाला जा रहा है जिससे काफी लोग उस विडियों को सच मान रहे है।

कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य निर्यात निर्यात एजेंसी (एपीईडीए) ने प्लास्टिक चावल के बारे में तेजी से फैल रही अफवाहों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। गौरतलब हो कि आजकल सोशल मीडिया पर प्लास्टिक के चावल होने का अफवाह फैला जा रहा है।

इस प्रकार के वीडियो और प्रेस रिपोर्ट भ्रामक हैं क्योंकि कई प्रकार के चावल की ऐसी प्रकृति होती है।
इस के लिए जब एपीईडीए ने असली चावल के साथ प्रयोग क्या तो हैरान कर देने वाली बात सामने आई ।असल में एपीईडीए ने दो तरह के चावल उबाल कर उनकी गेंद बनाई । एक तरह के चावल में कम स्टार्च था और दूसरे में ज्यादा स्टार्च था ।

जब कम स्टार्च वाले चावल की गेंद बनाई गई तो उसकी गेंद तो बन गई लेकिन वो उछल नहीं रही थी लेकिन ज्यादा स्टार्च वाले चावल की गेंद प्लास्टिक गेंद उछल भी रही थी । चावल की गेंद का उछलना उसका प्राकृतिक गुण है ।चावल की गेंद उछलेगी या नहीं ये बात उसमें पाए जाने वाले स्टार्च की मात्रा पर निर्भर करता है।

एपीईडीए ने कहा कि “सोशल मीडिया और मीडिया में सूचना का प्रसार किया जा रहा है, जिससे यह कहा गया है की सिर्फ प्लास्टिक वाले चावल की गेंद उछलती है वो गलत है । दरअसल ज्यादा स्टार्च वाले चावल की गेंद भी वैसे ही उछलती है जैसे प्लास्टिक की बनी हो ।”

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चावल पैदा करने वाला देश है. चीन चावल पैदा तो करता है लेकिन विश्व का सिर्फ 1.9 फीसदी चावल एक्सपोर्ट यानि बाहर भेजता है और भारत तो चीन से ना के बराबर चावल खरीदता है.इस लिए इस बात में कोई सचाई नहीं के भारत चीन में चीन के प्लास्टिक के चावल आ रहे है ।

अब बंटाई या ठेके पर ज़मीन देने वाले किसानो पर भी लगेगा 18% जी.ऐस.टी टेक्स

अगले महीने से लागू हो रही वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की नई कर व्यवस्था में खेत बंटाई या ठेके पर देने वालों को भी टैक्स चुकाना पड़ेगा। उन्हें इससे होने वाली आय पर 18 फीसदी जीएसटी देना होगा। जीएसटी की व्यवस्था में सिर्फ उन्हीं को राहत दी गई है जो जमीन का उपयोग अपने उपयोग या बिक्री के लिए फसल उगाने में करेंगे। खेती के लिए दूसरे को जमीन देने वाले को कारोबारी मानते हुए उसे 18 फीसदी के स्लैब में रखा गया है। उसे बकायदा जीएसटी के तहत रजिस्टर करना होगा और सभी तरह के जरूरी रिटर्न फाइल करने होंगे।

बंटाई पर देने वाले को इनपुट क्रेडिट की भी सुविधा नहीं

बंटाई पर देने वाले को इनपुट क्रेडिट की भी सुविधा नहीं होगी। ऐसे में इस बोझ का अधिकांश हिस्सा खेती करने वाले पर ही पड़ेगा जो पहले से ही बेहद दबाव में हैं। खेती में बढ़ते नुकसान को देखते हुए बहुत से लोग इन दिनों खुद दूसरा काम कर रहे हैं और अपनी जमीन अपने पड़ोसी, रिश्तेदार या किसी अन्य को दे रहे हैं। अपने साथ ही दूसरे के खेत में भी खेती करने को व्यक्ति इसलिए तैयार होता है क्योंकि इससे उसकी लागत थोड़ी कम हो जाती है। सिर्फ उनको छूट होगी जिनकी सालाना आमदनी 20 लाख से कम हो। 1,60,000 मासिक से ज्यादा की आय पर जीएसटी देनी होगी। उत्तर पूर्व के राज्यों के लिए यह सीमा 10 लाख सालाना है।

क्यों चिंताजनक

जमीन बंटाई पर देने वाला व्यक्तिया तो अपना काम छोड़ कर खेती करने को ही मजबूर होगा। या फिर इस टैक्स का पूरा या अधिकांश बोझ खेती करने वाले पर डालेगा।

सरकार की दलील

नीति आयोग के सदस्य प्रो. रमेश चंद्र ने बताया कि यह तभी लागू होगा जब उसकी आमदनी जीएसटी की सालाना छूट सीमा से ऊपर होगी। छोटी जोतों वाले इसमें नहीं आएंगे।

महाराष्ट्र सरकार का बड़ा फैसला- किसानों का डेढ़ लाख तक का कर्ज माफ, लोन भरने वाले किसान को 25 फीसदी रिटर्न

फडणवीस ने कर्ज माफी का ऐलान करते हुए कहा कि किसानों का कर्ज माफ करने का बोझ हम कर पड़ेगा। इसके चलते हमें अपने खर्च में कटौती करनी होगी। उन्होंने सभी मंत्रियों और विधायकों से कर्ज माफी के समर्थन में अपनी एक महीने की सैलरी देने की भी अपील की है।

कर्ज के तले दबे किसानों को महाराष्ट्र सरकार ने बड़ी राहत प्रदान की है। महाराष्ट्र सरकार ने बड़ा फैसले लेते हुए किसानों के 34000 करोड़ के कर्ज माफी का शनिवार को ऐलान किया। इस बात की जानकारी खुद राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने दी। सीएम देवेंद्र फडणवीस ने किसानों के लिए 34 हजार करोड़ रुपये की कर्ज माफी का ऐलान करते हुए कहा कि हम 1.5 लाख रुपये तक के ऋण को पूरी तरह से माफ कर रहे हैं।

साथ ही उन्होंने कहा कि जिन किसानों ने अपने ऋण का नियमित रूप से भुगतान किया है, हम उन्हें 25% ऋण वापसी लाभ (loan return benefit) देंगे। राज्य के 90% किसानों के कर्ज माफी की घोषणा की। महाराष्ट्र सरकार के इस फैसले का फायदा राज्य के 89 लाख किसानों को होगा।

फडणवीस ने कर्ज माफी का ऐलान करते हुए कहा कि किसानों का कर्ज माफ करने का बोझ सरकार पर पड़ेगा। इसके चलते हमें अपने खर्च में कटौती करनी होगी। उन्होंने सभी मंत्रियों और विधायकों से कर्ज माफी के समर्थन में अपनी एक महीने की सैलरी देने की भी अपील की है।

महाराष्ट्र से पहले पंजाब और उत्तर प्रदेश की सरकारों ने भी कर्ज माफी का ऐलान किया था। किसानों के कर्ज माफ किए जाने की जानकारी सरकार की ओर से पहले भी दी गई थी।

बता दें कि महाराष्ट्र में किसान कर्ज माफी को लेकर 1 जून से हड़ताल पर है। इस दौरान कई किसानों की आत्यहत्या करने के मामले भी सामने आए। राज्य के किसान लंबे समय से कर्ज माफी की मांग कर रहे थे। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक, किसान आत्महत्याओं में 42% की बढ़ोतरी हुई है।

आत्महत्या के सबसे ज्यादा मामले महाराष्ट्र में सामने आए थे। 30 दिसंबर 2016 को जारी एनसीआरबी के रिपोर्ट ‘एक्सिडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड इन इंडिया 2015’ के मुताबिक साल 2015 में 12,602 किसानों और खेती से जुड़े मजदूरों ने आत्महत्या की।

जानो कैसे खाजू की खेती ने बदली आदिवासी किसानो की किस्मत

आम लोगों की पहुंच से दूर रहने वाला काजू यदि आदिवासी किसानों के घरों में बोरियों में रखा मिले तो चौंकना लाजिमी है। लेकिन यह हकीकत है और बैतूल जिले के शाहपुर ब्लाक में आने वाले ग्राम अड़माढाना के लगभग हर घर में एक- दो नहीं क्विंटलों से काजू भरा पड़ा है।

ड्राय फूड्स में सबसे मंहगा मिलने वाला काजू छोटे से गांव के हर घर में बाड़ी परियोजना के माध्यम से 6 साल पहले कराए गए पौधरोपण के कारण मिल रहा है। यह बात अलग है कि काजू की खेती से अपनी किस्मत संवरने की उम्मीद लगाए बैठे किसानों को इसे बेचने की कोई राह नहीं मिल पा रही है जिससे उन्हें खासा मुनाफा नहीं हो पा रहा है।

जिले के मौसम को देखते हुए काजू का उत्पादन किया जाना संभव है, इसी के चलते बाड़ी परियोजना की शुरूआत में किसानों को आम और काजू के पौधे देकर उनके खेतों में रोपे गए हैं। 6 साल बीत जाने के बाद काजू के पौधों में फूल और फल लगने शुरू हो गए।

अब तो यह हालत है कि हर किसान के पास अन्य फसलों की तरह ही काजू की भी उपज घर में भरी हुई है।ग्राम पंचायत देसावाड़ी के अंतर्गत आने वाले अड़माढाना के 70 वर्षीय किसान पांडे सलाम ने बताया कि उनके एक एकड़ खेत में काजू के 30 और आम के 20 पौधे लगाए थे। पांच साल बीतने के बाद ही काजू के पेड़ में फूल आने शुरू हो गए। पहले साल तो फल बेहद कम लग पाए थे लेकिन इस साल भरपूर उत्पादन मिला है।

एक पेड़ से 5 किलो काजू

ग्राम के रामजी पेन्द्राम ने बताया कि पहले तो यही लगा कि यहां बंजर जमीन में इतना मंहगा फल कैसे लग पाएगा। लेकिन दो साल से काजू की फसल अच्छी हो रही है। ठंड की शुरूआत के साथ ही पेड़ो में फूल लगने शुरू हो जाते हैं औ मार्च के महीने में फल लग जाते हैं। अप्रैल में इनके पक जाने पर तुड़ाई कर ली जाती है। हर पौधे से करीब 5 किलो काजू निकल जाते है।

फूल भी देते हैं मुनाफा

काजू के फूल के साथ ही फल भी लगा होता है। जब तुड़ाई की जाती है तो फल को अलग निकालकर फूल के हिस्से को भी सुरक्षित रख लिया जाता है। इस फूल का उपयोग फैनी बनाने में किया जाता है। काजू की फसल पैदा कर रहे किसान शिवकिशोर धुर्वे ने बताया कि जैसे-जैसे पेड़ बड़ा होगा उससे उत्पादन भी अधिक मिलेगा।

50 किसान कर रहे खेती

शाहपुर ब्लाक के ग्राम अड़माढाना में 50 किसानों के द्वारा 50 एकड़ में काजू के पौधे लगाए गए हैं। सभी के पास दो साल से काजू का उत्पादन हो रहा है। किसान मुन्न्ा सलाम ने बताया कि काजू की खेती में कोई खास मशक्कत नहीं करनी होती है। सप्ताह में एक दिन पौधों को पानी देकर महीने में एक बार वर्मी कम्पोस्ट डाला जाता है।

उत्पादन तो ले लिया बेचने का टेंशन

काजू उत्पादक किसानों ने इस साल भरपूर उपज तो ले ली है, लेकिन इसे बेचने के लिये कोई राह ही नहीं मिल पा रही है। बाजार उपलब्ध न होने के कारण यहां के किसान केवल आसपास के क्षेत्रों से जो लोग गांव पहुंचकर बाजार से कम दाम पर काजू खरीदकर ले जाते हैं उसी के भरोसे पर निर्भर हैं। किसानों का कहना है कि बाड़ी परियोजना के अधिकारियों से भी इसे बेचने की व्यवस्था करने के लिये कहा गया लेकिन उन्होंने भी कोई मदद नहीं की है।

एक्सपर्ट व्यू

जिले के वरिष्ठ उद्यान अधीक्षक एम आर साबले के मुताबिक जिले का मौसम काजू की फसल के अनुकूल तो नहीं है। इसकी फसल के लिये मौसम में आर्दत्रा और ठंड के साथ गर्मी भी जरूरी होती है। देसावाड़ी क्षेत्र में फसल हो रही है, इससे लग रहा है कि जिले में इसका उत्पादन अब संभव हो रहा है।