यहां से आधे दाम में खरीदें यूज्‍ड ट्रैक्‍टर

अच्‍छे मानसून की बदौलत मार्केट में ट्रैक्‍टर की डि‍मांड लगातार बढ़ रही है। भारतीय ट्रैक्‍टर इंडस्‍ट्री में 2018-19 में 8 से 10 फीसदी की बढ़ोतरी होगी बाजार में नए ट्रैक्‍टरों के साथ-साथ पुरानों की मांग भी है। एक अनुमान के मुताबि‍क, पुराने ट्रैक्‍टर की इंडस्‍ट्री करीब 5 लाख यूनि‍ट प्रतिवर्ष है। पुराने ट्रैक्‍टरों में सबसे ज्‍यादा मांग 30 से 50 एचपी की रहती है। वैसे भारत में 10एचपी से लेकर 90 एचपी तक के ट्रैक्‍टर बिकते हैं।

हम आपको एक ऐसे प्‍लेटफॉर्म के बारे में बता रहे हैं जहां पुराने ट्रैक्‍टर करीब आधी कीमत में मि‍ल सकते हैं। यहां बि‍कने के लि‍ए उपलब्‍ध ट्रैक्‍टरों की पूरी स्‍पेसिफि‍केशन और उनकी कीमत की रेंज दी गई है। खरीद पर फाइनेंस की सुवि‍धा भी उपलब्‍ध है। जो कि‍सान नया ट्रैक्‍टर अफोर्ड नहीं कर सकते वह पुराने पर वि‍चार कर सकते हैं।

Mahindra – MM 265 DI

  • मॉडल – MM 265 DI
  • मैन्‍युफैक्‍चरिंग – 2010
  • कीमत – 2,60,000 से 3,10,000
  • कहां – tractorbazar.com

Swaraj/PTL – PTL 733

  • मॉडल – PTL 733
  • मैन्‍युफैक्‍चरिंग – 2008
  • कीमत – 225,000 – 275,000 रुपए
  • कहां – tractorbazar.com

Massey/Tafe – MF 1035 DI

  • मॉडल – MF 1035 DI
  • मैन्‍युफैक्‍चरिंग – 2010
  • कीमत – 250,000 – 300,000
  • कहां – tractorbazar.com

Eicher – EIC 380

  • मॉडल – EIC 380
  • मैन्‍युफैक्‍चरिंग – 2011
  • कीमत – 250,000 – 300,000 रुपए
  • कहां – tractorbazar.com

Eicher – EIC 241

  • मॉडल – EIC 241
  • मैन्‍युफैक्‍चरिंग – 2012
  • कीमत – 180,000 – 230,000 रुपए
  • कहां – tractorbazar.com

सूखे इलाकों में पैसे कमाना है तो करें लेमनग्रास की खेती, खेती और बिक्री की पूरी जानकारी

एंटी आक्सीडेंट का सबसे बेहतर सोर्स लेमनग्रास में विटामिन सी भारी मात्रा में होता है। दुनिया की एक बड़ी आबादी इसकी चाय यानी लेमन-टी पीने लगी है। लेकिन लेमनग्रास ऑयल (तेल) का सबसे ज्यादा इस्तेमाल परफ्यूम और कास्मेटिक उद्योग में होता है। जैसे जैसे ये इंड्रस्ट्री बढ़ रही है लेमनग्रास की भी मांग बढ़ी है।

इसलिए किसानों के लिए ये फायदे का खेती बनती जा रही है। किसानों की आमदनी बढ़ाने की कवायद में जुटी सरकार पूरे देश में एरोमा मिशन के तहत इसकी खेती को बढ़ावा भी दे रही है, लेमनग्रास की खूबी ये है कि इसे सूखा प्रभावित इलाकों में भी लगाया जा सकता है। लेमनग्रास को नींबू घास, मालाबार या कोचिन घास भी कहते हैं। भारत समेत ये उन देशों में पाया जाता है जहां की जलवायु गर्म है।

भारत सालाना करीब 700 टन नींबू घास के तेल का उत्पादन करता है, जिसकी एक बड़ी मात्रा निर्यात की जाती है। भारत का लेमनग्रास तेल किट्रल की उच्च गुणवत्ता के चलते हमेशा मांग में रहता है। 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने के वादे को पूरा करने की कवायद में जुटी भारत सरकार ने एरोमा मिशन के तहत जिन औषधीय और सगंध पौधों की खेती का रकबा बढ़ा रही है उसमें एक लेनमग्रास भी है।

लेमनग्रास की खेती सूखा प्रभावित इलाकों जैसे मराठवाड़ा, विदर्भ और बुंदेलखंड तक में की जा रही है। सीमैप के गुणाभाग और शोध के मुताबिक एक हेक्टेयर लेमनग्रास की खेती में शुरु में 30000 से 40000 हजार की लागत आती है।

एक बार फसल लगाने के बाद साल में 3 से 4 कटाई ली जा सकती हैं, जिससे करीब 100-150 किलो तेल निकलता है। इस तरह से एक लाख से एक लाख 60 हजार तक आमदनी हो सकती है, खर्चा निकालने के बाद एक हेक्टेयर में किसान को प्रतिवर्ष 70 हजार से एक लाख 20 हजार तक का शुद्ध मुनाफा हो सकता है।

मेंथा और खस की तरह ही लेमनग्रास की पेराई होती है, और पेराई संयंत्र भी लगभग एक जैसा ही होता है। पत्तियां काटकर उन्हें टंकी में भरकर आसवन किया जाता है।

नर्सरी, रोपाई और निराई-गुड़ाई

लेमनग्रास की जड़ लगाई जाती है, जिसके लिए पहले नर्सरी तैयार की जाए तो लागत कम हो सकती है। अप्रैल से लेकर मई तक इसकी नर्सरी तैयार की जाती है, एक हेक्टेयर की नर्सरी के लिए लेमनग्रास के करीब 10 किलो बीज की आवश्यकता होगी। 55-60 दिन में नर्सरी रोपाई के लिए तैयार हो जाती है।

यानि जुलाई अगस्त में तैयार नर्सरी यानि स्लिप (जड़ समेत एक पत्ती) को कतार में 2-2 फीट की दूरी पर लगाना चाहिए। हर तरह की मिट्टी और जलवायु में पैदा होनी वाली इस फसल में गोबर की खाद और लकड़ी की राख सबसे ज्यादा फायदा करती है। लेमनग्रास को ज्यादा निराई गुड़ाई की जरुरत नहीं होती, साल में दो से तीन निराई गुड़ाई पर्याप्त हैं।

ज्यादा सूखे इलाकों में पूरे साल में 8-10 सिंचाई की जरुरत होगी। उत्तर प्रदेश में ऐसी फसलों पर शोध के लिए कन्नौज में सुगंध एवं सुरस विकास केंद्र (एफएफडीसी) है। यहां के अवर शोधकर्ता कमलेश कुमार ने पिछले दिनों गांव कनेक्शन को इसके फायदे गिनाते हुए बताया, इसकी पत्ती से लेमन-टी यानि नीबू चाय के साथ साबुन, निरमा, डिटर्जेंट, तेल, हेयर आयल, मच्छर लोशन, सिरदर्द की दवा व कास्मेटिक बनाने में भी प्रयोग किया जाता है।”

यूपी में सीतापुर जिले के बंभौरा गांव निवासी प्रगतिशील किसान हर्षचंद वर्मा के मुताबिक इसमें कीट-पतंगे रोग नहीं लगते हैं, लेकिन एक कोई रोक का प्रकोप दिखे तो नीम की पत्तियों को गोमूत्र में मिलाकर छिड़काव किया जा सकता है।

जानकारों के मुताबिक लेमग्रास का तेल जिस परफ्यूम,डियो या क्रीम आदि में पड़ा होता है उसके उपयोग से लोगों में ताजगी आ जाती है। चीन में कहीं-कहीं पर इसे सिरदर्द ,पेटदर्द में उपयोग करते हैं, इसके कुछ गुण मुंहासे ठीक करने में भी काम आते हैं। भारत में सर्दी जुखाम के दौरान काफी लोग इसका गाढ़ा पीते हैं।

उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक समेत कई राज्यों में इसकी बड़े पैमाने पर खेती हो रही है।

लेमनग्रास की खेती में कमाई और मुनाफे का गणित

  • प्रति हेक्टेयर सलाना लागत- 40,000 रुपए (सिंचाई समेत)
  • 30,000 रुपए (बिना सिंचाई)
  • कुल उत्पादन से कमाई- 1,60,000 रुपए (सिंचाई समेत)
  • 1,00,000 रुपए (बिना सिंचाई)
  • शुद्ध मुनाफा (सालाना) 1,20,000 रुपए (सिंचाई समेत)
  • 70.000 रुपए (बिना सिंचाई)

लेमनग्रास के तेल का उपयोग

लेमनग्रास का सबसे ज्यादा उपयोग परफ्यूम उद्योग में होता है। इसके साथ ही, तेल, डिटर्जेट, वांशिग पाउडर, हेयर आयर मच्छर लोशन, कास्मेटिक, सिरदर्द की दवा समेत कई प्रोडक्ट में इस्तेमाल होता है

20 राज्यों में अलर्ट, अगले 96 घंटे आंधी-तूफान से लेकर भारी बारिश का अलर्ट

मौसम विभाग ने अगले 96 घंटे के लिए देशभर के 20 से ज्यादा राज्यों में मौसम को लेकर अलर्ट जारी किया है। अगले 96 घंटे देशभर में आंधी-तूफान, ओला गिरने से लेकर भारी बारिश का अलर्ट जारी किया गया है। यह अलर्ट 6 मई से लेकर 10 मई तक के लिए जारी हुआ है। मौसम विभाग के अनुसार मौसम की गतिविधियों से देशभर के 20 से ज्यादा राज्य प्रभावित होंगे।

6 मई के लिए अलर्ट

मौसम विभाग के मुताबिक 6 मई को आसाम, मेघालय, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा और केरल राज्य के इलाकों में भारी बारिश की चेतावनी है। वहीं, दिल्ली, हरियाणा, पश्चिमी यूपी, बिहार, झारखंड, ओडिशा, कर्नाटक और केरल में बिजली कड़कने के साथ धूलभरी आंधी की आशंका है। जम्मू एंड कश्‍मीर, पंजाब, वेस्ट बंगाल, सिक्किम और नॉर्थ ईस्ट के दूसरे इलाकों में ओला गिरने की भी आशंका जताई गई है।

7 मई के लिए अलर्ट

मौसम विभाग के मुताबिक 6 मई को आसाम, मेघालय, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा में भारी बारिश की चेतावनी है। जम्मू एंड कश्‍मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब में आंधी-तूफान के साथ ओलावृष्टि की आशंका है। वहीं, हरियाणा, दिल्ली के इलाकों में तेज आंधी आ सकती है। जबकि राजस्थान के कुछ इलाकों में धूलभरी आंधी की आशंका है।

8 मई के लिए अलर्ट

मौसम विभाग ने 8 मई के जो अलर्ट जारी किया है, उस हिसाब से कर्नाटक और केरल में भारी बारिश हो सकती है। पंजाब, पूर्वी यूपी, बिहार, वेस्ट बंगाल, तमिलनाड़, कर्नाटक और केरल सहित नॉर्थ ईस्ट के राज्यों में तेज हवा के साथ बिजली कड़कने की चेतावनी जारी हुई है। दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़ और जम्मू-कश्मीर में तूफान और आंधी की चेतावनी है। पश्चिमी राजस्थान में धूल का तूफान आने की चेतावनी भी जारी की गई है।

9 मई के लिए अलर्ट

पूर्वी यूपी, वेस्ट बंगाल, सिक्किम, तमिलनाडु, केरल सहित दक्षिण भारत के कुछ अलाकों में बिजली कड़कने के साथ तेज हवाएं चल सकती हैं। इसका असर 10 मई को भी दिख सकता है।

पालीहाउस तकनीक से मिलता है दोगुने से भी ज्यादा प्राफिट

किसान अब खेती में नई-नई टेक्नीक का इस्तेमाल करके अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। महासमुंद जिले के छपोराडीह गांव के 39 वर्षीय किसान गजानंद पटेल ही पॉली हाउस की खेती से काफी मुनाफा बढ़ा चुके हैं। इन्होंने फल और सब्जी की खेती से 4 एकड़ जमीन पर 40 लाख रुपए तक की सालाना कमाई की।

जबकि पहले ये महज 80 हजार रुपए सालाना कमा पाते थे। यह फायदा उन्हें पॉलीहाउस के कारण मिला। हम एग्रीकल्चर में आ रही नई टेक्नोलॉजी की सीरीज चला रहे हैं। इसमें हम नई-नई टेक्नोलॉजी की जानकारी आपको देंगे। आज जानिए पॉलीहाउस क्या होता है? और इसे आप कैसे कर सकते हैं?

क्या है पॉलीहाउस खेती

यह जैविक खेती का ही हिस्सा है। पॉलीहाउस में स्टील, लकड़ी, बांस या एल्युमीनियम की फ्रेम का स्ट्रेक्चर बनाया जाता है। खेती वाली जमीन को घर जैसे आकर में पारदर्शी पॉलीमर से ढक दिया जाता है। पॉलीहाउस के अंदर न बाहर की हवा जा सकती है न पानी। इस कारण कीड़े-मकोड़े का असर नहीं होता। टेंपरेचर भी जरूरत के मुताबिक कम-ज्यादा किया जाता है।

इस तरह मौसम पर निर्भरता पूरी तरह खत्म हो जाती है। कीटनाशक, खाद, सिंचाई ये सभी काम पॉलीहाउस के अंदर होते हैं। जो जितना जरूरी हो उतना ही डाला जाता है। सबकुछ नपा-तुला मिलने के कारण यह भी तय हो जाता है कि किस तारीख को कितनी फसल मिलेगी।

क्या है पॉलीहाउस खेती की खासियत

  •  पॉलीहाउस खेती में बिना मौसम की सब्जियां, फूल और फल उगाए जा सकते हैं।
  • इसमें पानी ड्रिप सिस्टम द्वारा दिया जाता है। इससे पारंपरिक खेती के मुकाबले पानी बहुत कम लगता है।
  • पारंपरिक खेती के बजाए इसमें लॉन्ग ड्यूरेशन तक फसल ली जा सकती है।
  • फसलों की गुणवत्ता भी अच्छी होती है।

कैसे कर सकते हैं पॉलीहाउस खेती

  • गवर्नमेंट पॉलीहाउस खेती करने पर सब्सिडी दे रही है।
  • आपको अपने जिले के कृषि विभाग में इसके लिए अप्लाई करना होगा।
  •  कृषि विभाग से अप्रूवल मिलने के बाद विभाग ही पॉलीहाउस के लिए नियुक्त कंपनी को किसान के पास भेजता है। (राज्यों के हिसाब से स्कीम अलग-अलग)

गवर्नमेंट देती है सब्सिडी

  • कंपनी पॉलीहाउस तैयार करती है। इसका 85 परसेंट बर्डन गवर्नमेंट और 15 परसेंट किसान को उठाना होता है।
  • पॉलीहाउस में टमाटर, ककड़ी, शिमला मिर्च, गोभी जैसी सब्जियां उगाई जा सकती हैं।

यहां 10 दिन का गाय का बच्चा दे रहा दूध

आपने गाय अथवा भैंस द्वारा एक से अधिक बच्चों को जन्म देने के वाकये तो खूब देखे और सुने होंगे। साथ ही ऐसे किस्से भी सुने होंगे कि महिला ने भी एक साथ कई बच्चों को जन्म दिया। लेकिन हम आपको एक ऐसी हकीकत से रूबरू कराने जा रहे हैं, जिसे सुनकर आप चौंक जाएंगे। हो सकता है एक बार आपको यकीन भी न हो पर जब आप आंखों से देखेंगे तो आपको विश्वास करना पड़ेगा।

जी हां शामली जनपद में एक नवजात गाय का बच्चा आजकल लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। दरअसल मामला यह है कि यह गाय का बच्चा पैदा होते ही दूध दे रहा है। जानकारी के मुताबिक गाय के मालिक सुबह-शाम बछिया का दूध निकाल रहे हैं।

इस उम्र में पशुओं के बच्चे ढंग से दूध पी भी नहीं पी पाते, उसी उम्र में गाय का यह बच्चा दूध दे रहा है। दूध देने वाला यह बच्चा क्षेत्र के लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ। शामली जिले और आसपास के इलाकों लोग इसे देखने के लिए आ रहे हैं। लेकिन डॉक्टरों ने अब बच्चे का दूध निकालने के लिए मना कर दिया है। उसके बावजुद भी ये बच्चा खूब सुर्खियां बटोर रहा है।

दरअसल शामली के कस्बा ऊन में किसान धर्म सिंह के घर गांव में एक गाय ने बच्चे को जन्म दिया। चमत्कार तब हुआ जब बच्चे के थनों में दूध उतर आया। मालिक ने उसका दूध निकाला तो गाय के बच्चे ने दूध देना शुरू कर दिया।आज इस बच्चे को पैदा हुए सात दिन हो गए है, जो अभी तक लगातार दूध दे रहा है।

हालांकि डॉक्टरों ने अब इसका दूध निकालने से मना कर दिया। डॉक्टरों का कहना है कि अगर इसका दूध इसी तरह से निकलता रहा तो एक दिन गाय का ये बच्चा मर जाएगा। वहीं कस्बे में गाय का ये बच्चा सुर्खियों में है और कस्बेवासी इसे भगवान का चमत्कार मान रहे हैं, जिसे दूर-दूर से लोग देखने के लिए आ रहे हैं और गाय का यह बच्चा लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

राजस्थान में होगी नारियल की खेती

कृषि के क्षेत्र में राजस्थान अपनी तकदीर और तस्वीर बदलने की कवायद कर रहा है. मरुभूमि राजस्थान में अब नारियल और सुपारी की भी खेती होगी. राज्य सरकार ने ना केवल इसकी तैयारी कर ली है बल्कि केरल से नारियल के 400 पौधे भी मंगवाये जा चुके हैं.

कृषि के क्षेत्र में राजस्थान एक और बड़ा नवाचार करने जा रहा है. आम तौर पर दक्षिण भारत के नम भूमि इलाके में पैदा होने वाले नारियल और सुपारी अब मरुभूमि राजस्थान में भी पैदा होंगे. प्रदेश की विषम परिस्थितियों के बावजूद में यह बड़ी पहल होने जा रही है. नारियल और सुपारी की खेती की तकनीक जानने के लिये पिछले दिनों अधिकारियों का एक दल केरल गया था जो वहां से प्रशिक्षण हासिल कर लौटा है.

केरल स्थित आईसीएआर के रिसर्च सेंटर से नारियल के 400 पौधे मंगलवार को ही राजस्थान लाये जा चुके हैं जिन्हें टोंक के थड़ोली स्थित सेंटर ऑफ एक्सीलेंस पर रोपा जाएगा. सुपारी के भी 400 पौधे करीब एक महीने बाद राजस्थान लाये जायेंगे.

कृषि मंत्री प्रभुलाल सैनी का कहना है कि शुरुआत में दो-दो हैक्टेयर क्षेत्र में नारियल और सुपारी की पैदावार की जायेगी. इसके लिये राजस्व विभाग द्वारा बीसलपुर के तल क्षेत्र टोंक के थलोड़ी में जमीन आवंटित की गई है. इस जमीन की चारदीवारी करवाई जाकर ट्यूबवेल, सोलर पम्प और ऑफिस आदि की स्वीकृतियां जारी कर दी गई है. इस नवाचार के लिये राज्य सरकार द्वारा 10 करोड़ का बजट उपलब्ध करवाया गया है.

आप भी कर सकते है वनीला की खेती ,बाजार में एक किलो की कीमत है 40000 रुपये

आप वनीला की खेती करके अच्छी कमाई कर सकते हैं। इस फल की कई देशों में काफी डिमांड है। भारतीय मसाला बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, पूरी दुनिया में जितनी भी आइस्क्रीम बनती है, उसमें से 40% वनीला फ्लेवर की होती हैं।

सिर्फ आइस्क्रीम ही नहीं बल्कि केक, कोल्ड ड्रिंक, परफ्यूम और दूसरे ब्यूटी प्रोडक्ट्स में भी इसका काफी यूज होता है। भारत में वनीला 3500 रुपए किलो तक बिका है। हालांकि इसकी डिमांड भारत के बजाए विदेशों में ज्यादा है। इसलिए माल विदेश भेजने पर बड़ा मुनाफा होता है। इंडिया में इसकी कीमत ऊपर-नीचे होती रहती है। आज हम बता रहे हैं आप कैसे वनीला की खेती कर कमाई कर सकते हैं।

40 हजार रुपए तक देना पड़ सकते हैं

भारत में 1 किलो वनीला खरीदने पर आपको 40 हजार रुपए तक देना पड़ सकते हैं। ब्रिटेन बाजार में 600 डॉलर प्रति किलो तक पहुंच गया है। भारत में इस समय चांदी 43,200 रुपए प्रति किलो की रेट से बिक रहा है तो ब्रिटेन के मार्केट में चांदी 530 डॉलर (35,500 रुपए) प्रति किलो के भाव से बिक रहा है।

फल से मिलते हैं बीज

मसाला बोर्ड के मुताबिक, वनीला आर्किड परिवार का मेम्बर है। यह एक बेल पौधा है, जिसका तना लंबा और बेलनकार होता है। इसके सुगंधित और कैप्सूल के जैसे होते हैं। फूल सुखाने पर खुशबूदार हो जाते हैं और एक फल से कई सारे बीज मिलते हैं।

खेती के लिए क्या हैं जरूरी बातें

  • वनीला की फसल को ह्यूमिडिटी, छाया और मध्यम तापमान की जरूरत होती है।
  • आप ऐसा वातावरण बना सकते हैं। शेड हाउस बनाकर फव्वारा विधि से ऐसा किया जा सकता है।
  • तापमान 25 से 35 C तक होना पैदावार के लिए सबसे अच्छा माना जाता है।
  • पेड़ों से छनकर जो रोशनी आती है वो वनीला की फसल के लिए ज्यादा अच्छी मानी जाती है।
  • आपके खेत में बहुत सारे पेड़ या बाग है तो आप इंटरकोर्प की तरह इसकी खेती आसानी से कर सकते हैं।
  • वनीला की फसल 3 साल बाद पैदावार देना शुरू करती है

कैसी होना चाहिए मिट्टी

  • वनीला की खेती के लिए मिट्टी भुरभुरी और जैविक पदार्थों से भरपूर होना चाहिए। आप एक्सपर्ट से जांच करवाकर यह पता कर सकते हैं कि आप जिस क्षेत्र वनीला लगाने जा रहे हैं, वहां की मिट्टी की क्वालिटी कैसी है।
  • वनीला की खेती में पानी का ठहराव नहीं होना चाहिए।
  • जमीन की ph 6.5 से 7.5 तक होनी चाहिए। इससे पहले मिट्टी की जांच करवानी चाहिए।
  • जांच में अगर जैविक पदार्थों की कमी पता चले तो गली सड़ी गोबर की खाद, केंचुए की खाद यहां डाली जा सकती है।

लगाने की क्या है प्रॉसेस

  • वनीला की बेल लगाने के लिए कटिंग या बीज दोनों का इस्तेमाल किया जा सकता है हालांकि बीज का इस्तेमाल ज्यादा नहीं किया जाता क्योंकि इसके दाने छोटे होते हैं और उगने में बहुत ज्यादा समय लगता है।
  • बेल लगाने के लिए मजबूत और स्वस्थ कटिंग को चुना जाता है।
  • जब वातावरण में नमी हो तब आप इसकी कटिंग को लगा सकते हैं। लगाने से पहले गड्ढे बनाकर उनमें पूरी तरह से गली सड़ी खाद डाली जाती है। कटिंग को मिट्टी में दबाने की जरूरत नहीं होती। सतह के ऊपर बस थोड़ी सी खाद और पत्तों से ढक दिया जाता है, कटिंग की दूरी 8 फिट रखी जाती है।
  • सहारे के लिए पेड़ या 7 फिट लम्बे लकड़ी या सीमेंट के पिलर लगाए जाते हैं। बेल को फैलने के लिए तार बांधी जाती है। खेत में लगा रहे हैं तो एक एकड़ में 2400 से 2500 बेल होना चाहिए।

फसल लगाने के बाद क्या करें

  • खेत में गोबर से तैयार खाद, केंचुए की खाद, नीम कके आदि डालते रहना चाहिए।
  • 2 दिन के अंतर से फव्वारा विधि या टपका विधि से पानी देना चाहिए।
  • खेत में एफवायएम, गोबर की खाद, केंचुए की खाद आदि डालते रहना चाहिए।
  • 1 किलो एनपीके को 100 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करना चाहिए।
  • बैल को तारों के ऊपर फैलाया जाता है। इसी ऊंचाई 150 सेमी से ज्यादा नहीं होना चाहिए।
  • फूल से लेकर फलियां पकने तक में 9 से 10 माह का समय लग जाता है।
  • वनिला को पूरी तरह पकाने के लिए क्युरिंग, स्वेटिंग, ड्राइंग और कंडिशनिंग की प्रॉसेस से निकलना होता है। इसके बाद वनीला तैयार होता है।

जीरो बजट खेती का कमाल, गेहूं उत्पादन से प्रति एकड हो रहा 46000 रु. का मुनाफा

राजस्थान की सीमा से सटे भिवानी के रेतीले इलाके में अब की बार प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों को रसायनिक खेती से कहीं ज्यादा फायदा मिला है। किसानों का कहना है कि अबकी बार उन्हें पुरानी देसी गेहूं की किस्म 306 के उत्पादन में प्रति एकड़ रसायनिक फसल के मुकाबले 5 से 6 हजार रुपए का फायदा होगा।

यही नहीं कुछ के यहां तो प्रति एकड़ 20 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन हुआ है। इसके दाम भी 4 से 5 हजार रुपए प्रति क्विंटल आसानी से मिल रहे हैं, जबकि रसायनिक उर्वरकों पर आधारित गेहूं के दाम केवल 1735 रुपए प्रति क्विंटल हैं। इसी प्रकार प्राकृतिक खाद द्वारा उगाए गए आलू भी 40 से 50 रुपए प्रति किलोग्राम मिल रहा है, जबकि साधारण आलू 15 से 20 रुपए किलो मिल रहा है।

आचार्य देवव्रत व सुभाष पालेकर की प्रेरणा से हो रही खेती

महाराष्ट्र में जीरो बजट खेती के जनक सुभाष पालेकर से प्रेरणा लेकर लाखों किसानों ने प्राकृतिक खाद का इस्तेमाल किया है। वहीं हरियाणा में हजारों किसानों ने राज्यपाल आचार्य देवव्रत के आह्वान पर जीरो बजट खेती शुरू की है। हाल ही में रोहतक व जींद की जेल में आचार्य देवव्रत ने प्राकृतिक खाद के जरिए दर्जनों एकड़ में खेती की शुरूआत करवाई थी।

राज्यपाल द्वारा ही रोहतक के प्राचीन वैश्य गोशाला व भिवानी की पतराम गेट स्थित गोशाला में भी प्राकृतिक खाद का उत्पादन शुरू करवाया गया। इसके अलावा प्रदेश में एक दर्जन जगहों पर प्राकृतिक खाद तैयार किया जा रहा है। रोहतक स्थित एमडीयू में आने वाले दिनों में सैकंडों एकड़ भूमि पर प्राकृतिक खाद का इस्तेमाल कर सब्जियां व अनाज उगाने की योजना तैयार की गई है। ये सब्जियां व अनाज न केवल विश्वविद्यालय कैम्पस में रहने वाले स्टाफ को रियायती दरों में दी जाएंगी और प्रयोग यहां रहने वाले छात्र करेंगे।

भिवानी महापंचायत कर रही घनामृत खाद का उत्पादन

भिवानी महापंचायत की देखरेख में स्थानीय पतराम गेट स्थित गोशाला में अब तक 3 हजार से अधिक किसानों को प्राकृतिक खाद यानी घनामृत मुफ्त वितरीत किया जा चुका है। महापंचायत के संरक्षक बृजलाल सर्राफ का कहना है कि जहर मुक्त व जीरो बजट खेती को बढ़ावा देने के लिए महापंचायत हर प्रकार के सहयोग के लिए तैयार है।

दो गुना तक फायदा

सामान्य गेहूं की खेती के लिए प्रति एकड़ कुल खर्च करीब 9850 रु. आता है। उत्पादन 20 क्विंटल होता है जिससे करीब 35000 रु. मिलते हैं और इस प्रकार एक किसान को प्रति एकड़ लगभग 25 हजार रु. की बचत होती है। वहीं एक एकड़ में प्राकृतिक रूप से देसी गेहूं के उत्पाद पर कुल खर्च करीब 9300 रु. आता है। एक एकड़ में उत्पादन 14 क्विंटल का होता है और लगभग मूल्य 4000 हजार रु. प्रति क्विंटल के हिसाब से कीमत 56000 रु. मिलती है। यानी लगभग 46 हजार रु. की बचत होती है।

एप्पल से उलट है एप्पल वुड यानी बेल की खेती

इंग्लिश में एप्पलवुड के नाम से मशहूर बिल की खेती के लिए एप्पल की खेती से उल्ट मौसम चाहिए। यानी सेब की फसल तभी होती है जब माइनस में टेंपरेचर हो आैर बेल जितनी गर्मी पड़ेगी उतना ही मीठा होगा।

सनौर इलाके के कई किसानों ने बिल के पेड़ लगा रखे हैं जो इनसे बिना किसी लागत मोटा मुनाफा कमा रहे हैं। इसकी खेती पूरे उतर भारत में की जाती है क्योंकि यह हर तरह की मिट्‌टी में पैदा हो जाता है।

किसान बिक्रमजीत सिंह ने बताया कि इसकी खेती ज्यादातर दोमट मिट्टी में की जाती है। इसके लिए पीएच मान 8.00 से 8.50 के बीच होना चाहिए। किसानों ने बताया की वह काफी समय से बिल की खेती करते आ रहे हैं और यह सर्दी-गर्मी दोनों मौसम में हो सकता है।

बेल से ऐसे बढ़ाइए पैसों की बेल

किस्में…बेल की दो किस्में हैं। एक हाईब्रिड और दूसरी देशी। देशी किस्म को देर होने में लंबा समय लगता है मगर हाईब्रिड तीन साल में तैयार हो जाती है। पके हुए बेल के बीज से भी पौध तैयार की जा सकती है। किसान ओमप्रकाश ने बताया की यह नर्सरी में मिल जाता है। बेल की बिजाई बारिश के दिनों में की जानी चाहिए।

बीमारियां…गांव मसीगन के ओम प्रकाश और बिक्रमजीत ने बताया कि वह लंबे समय से बेल की खेती करते आ रहे हैं। बेल में लैमन वटर फ्लाई, कीट, लीफ माईनर तथा तना सड़न गमोसिया आदी रोग लगते हैं।

औषधीय गुण…बेल के सेवन से बवासीर, दस्त खत्म होते हैं, भूख बढ़ती है। यह कब्ज की समस्या भी दूर करता है। बिल का शरबत नियमित रूप से रात को सेवन करना चाहिए इससे पेट की सभी समस्याएं दूर होती हैं। शुगर की समस्या में पत्तों का चूर्ण सेवन किया जाए तो लाभदायक होता है।

फल व फूल… बेल लगाने के बाद एक वर्ष के बाद अप्रैल-मई में फूल आते हैं। पर फल लगना काफी देर बाद शुरू होता है। बिल की खासियत यह है कि यह तुड़ाई के दो महीने तक खराब नहीं होता। तुड़ाई के बाद भी फल लगते रहते हैं।

नाबार्ड के सहयोग से ये किसान कर रहे नेपाली सतावर की खेती

किसान अब फसल चक्र में परिवर्तन करने लगे हैं। 6 गांव के 150 किसानों ने पहले आलू की खेती कर रहे थे, लेकिन मौसम की वजह से नुकसान हो गया। अब किसानों ने पायलेट प्रोजेक्ट बनाकर औषधीय पौधों की खेती शुरू की है। जिसमें सफलता मिलने लगी है। पहली बार 20 एकड़ में नेपाली सतावर की खेती कर रहे हैं। आगे 100 एकड़ में खेती करने का लक्ष्य बनाया है। किसानों के प्रयास को देखते हुए डाबर कंपनी ने औषधीय पौधों को खरीदने के लिए अनुबंध भी कर लिया है।

कोरबा ब्लाक के किसानों ने मिलकर जय मां सर्वमंगला उत्पादक संघ बनाया था। जिसमें 13 गांव के 541 किसान शामिल हैं। केराकछार, ठाकुरखेता, पतरापाली, मुढुनारा व सरदुकला के किसानों ने जब सतावर के पौधे लगाए तो डर बना हुआ था कि यहां का वातावरण में तैयार होगा कि नहीं लेकिन सफलता मिल गई। अभी खेत में पौधे लहलहा रहे हैं। साथ ही प्रयोग के तौर पर 5 एकड़ में श्योनाक, पाढ़ल, बेल व गम्भारी की भी खेती कर रहे हैं।

उत्पादक संघ के अध्यक्ष गोविंद सिंह राठिया ने बताया कि और भी किसानों को औषधीय पौधे की खेती के लिए प्रेरित किया जा रहा है। इसमें नाबार्ड का भी काफी सहयोग रहा है। डाबर कंपनी ने कुछ और पौधों की खेती करने सलाह दी है। लेकिन पहले शुरूआत सतावर से ही की गई है।

बाजार में 250 से 400 रुपए किलो:

नेपाली सतावर का मार्केट में प्रोसेसिंग के बाद 250 से 400 रुपए किलो है। यह फसल डेढ़ साल में तैयार हो जाता है। नगदी फसल में किसानों को बेहतर आय होने की संभावना है। पौधे तैयार होने के बाद नुकसान होने का खतरा भी नहीं रहता है।

किसानों ने ग्राम केराकछार में 20 टन क्षमता का कोल्ड स्टोरेज बनाने का निर्णय लिया है। इसके लिए उद्यान व कृषि विभाग भी सहयोग कर रही है। स्टोरेज में वनौषधियों के साथ ही जैविक खेती से तैयार फसल को भी रखेंगे ताकि बाजार में अच्छी कीमत मिल सके।

वनांचल में 400 से अधिक औषधीय पौधों को पहचान की गई है। लेकिन जिन पौधों की डिमांड है उसका कलेक्शन भी करेंगे। इसमें 10 प्रकार के पौधे शामिल हैं। केवाच के पौधे बहुतायत है। इसका फल औषधी के रूप में उपयोग होता है। इसी तरह बेल भी मिल जाता है।