DBT के सहारे कि‍सानों की इनकम दोगुना करेगी सरकार, जाने क्या है ये DBT

बजट 2018 के एलान के मुताबि‍क कि‍सानों को लागत का डेढ़ गुना एमएसपी दि‍लाने के लि‍ए सरकार डायरेक्‍ट बेनेफि‍ट ट्रांसफर का सहारा ले सकती है। इसमें आधार और 38 करोड़ जनधन एकाउंट की बड़ी भूमि‍का होगी। मुमकि‍न है कि‍ मार्च से पहले इसका एलान कर दि‍या जाएगा क्‍योंकि‍ मार्च – अप्रैल में ही रबी की फसलों का प्रोक्‍योरमेंट शुरू हो जाता है।

नीति‍ आयोग के सूत्रों के मुताबि‍क, कि‍सानों को बढ़ी हुई एमएसपी का पूरा लाभ दि‍लाने के लि‍ए सरकार डीबीटी यानी डायरेक्‍ट बेनेफि‍ट ट्रांसफर का सहारा ले सकती है। इसमें होगा ये कि अगर बाजार भाव एमएसपी से कम है तो इस अंतर का भुगतान सरकार डायरेक्‍ट कि‍सान के खाते में करेगी। इसे मध्‍यप्रदेश की भावांतर भुगतान योजना का एक्‍सपेंशन मान सकते हैं। वहां भी सरकार इसी तरह से कि‍सानों को एमएसपी का लाभ देती है।

फि‍लहाल यही ऑप्‍शन नजर आ रहा है

नीति‍ आयोग में लैंड पॉलि‍सी सेल के चेयरमैन डॉक्‍टर टी हक ने बताया कि इसके लि‍ए सरकार के पास फि‍लहाल जो ऑप्‍शन नजर आ रहे हैं उनमें सबसे फिजिबल ये है कि एमएसपी और मार्केट प्राइज के बीच जो अंतर आ रहा है उसका भुगतान सरकार करे। यह भुगतान डायरेक्‍ट कि‍सानों के खाते में कि‍या जा सकता है। फि‍लहाल जो तंत्र है उसमें फसलों का पूरा प्रोक्‍योरमेंट करना आसान नहीं है। इसलि‍ए मध्‍य प्रदेश की भावांतर योजना की तर्ज पर बजट के इस एलान को पूरा कि‍या जा सकता है।

सरकार खुद नहीं खरीद सकती

इसके अलावा दूसरा ऑप्‍शन ये है कि कुछ कमोडि‍टी जैसे दाल व रागी वगैरह को भी सरकार खरीदे और उसे पीडीएस के माध्‍यम से आगे भेजे। कर्नाटक ने इस दि‍शा में काफी काम कि‍या है। लेकि‍न फि‍लहाल ये उतना फि‍जिबल नहीं दि‍ख रहा। बड़े पैमाने पर खरीद करने के लि‍ए तंत्र उतना मजबूत नहीं है। सरकार खरीद भी लेगी तो रखेगी कहां। अभी इतनी स्‍टोरेज कैपेसि‍टी ही नहीं है।

अभी गेहूं और चावल को ही मैनेज करने में दिक्‍कते आ रही हैं। सब कमोडि‍टीज को खरीदना पॉसि‍बल नहीं होगा लेकि‍न दाल कुछ सेलेक्‍टेड कमोडिटीज को तो खरीद सकते हैं। वैसे थोड़ा ही सही मगर सरकार को इनकी दालों व मोटे अनाज की खरीदारी करनी चाहि‍ए। ऐसा करने से मार्केट प्राइस अपने आप ही बढ़ने लगता है, फि‍र एमएसपी के बराबर वैसे ही हो जाएगा।

6 फीसदी कि‍सान ही एमसपी का लाभ ले पाते हैं

एमएसपी तय करने का मकसद यही था कि‍ कि‍सानों को अपनी उपज का वाजि‍ब दाम मि‍ल सके, मगर न तो केंद्र और न ही राज्‍यों का तंत्र इतना दुरुस्‍त है कि सभी कि‍सानों तक इसका लाभ पहुंच सके। सरकारी आंकड़ों के मुताबि‍क, 6 फीसदी से भी कम कि‍सान एमएसपी का लाभ ले पाते हैं। इस तथ्‍य को ध्‍यान में रखते हुए ऐसा होना मुमकि‍न है कि‍ सरकार बाजार भाव और एमएसपी का अंतर सीधे कि‍सानों के खाते में ट्रांसफर करे।

किसान के दर तक जाएगा बाजार ,अब मंडी में अनाज बेचने की जरूरत नहीं

देश में 86 प्रतिशत से ज्यादा छोटे या सीमांत किसान हैं। इनके लिए मार्केट तक पहुंचना आसान नहीं है। इसलिए सरकार इन्हें में ध्यान रखकर इन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्माण करेगी।

किसानो को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने के लिए इसके लिए सरकार 22 हजार ग्रामीण हॉट को ग्रामीण कृषि बाजार में बदलेगी। इसकी घोषणा करते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा के बाजार अब किसानो के द्वार पर दस्तक देगा ।उन्हें उपज बेचने के लिए कही और नहीं जाना पड़ेगा ।

2,000 करोड़ से कृषि बाजार और संरचना कोष का गठन होगा। ई-नैम(राष्ट्रीय कृषि बाजार ) को किसानों से जोड़ा गया है, ताकि किसानों को उनकी उपज का ज्यादा मूल्य मिल सके। 585 EMPC को ई-नैम के जरिए जोड़ा जाएगा। यह काम मार्च 2019 तक ही खत्म हो जाएगा।

कृषि उत्पादों के निर्यात को 100 अरब डॉलर के स्तर तक पहुंचाने का लक्ष्य भी सरकार ने रखा है। इन ग्रामीण मंडियों को मंडी कानून से छूट दी गई है । इन मंडियों में किसान अपनी उपज को सीधे बड़े उपभोक्ताओं और थोक खरीददारों को बेच सकते है । इस से पहले मंडी कानून के चलते यह सुविधा नहीं मिल पाती थी ।

बजट 2018: जानें सभी खास एलान

वि‍त्‍त मंत्री अरुण जेटली ने 2018-19 के बजट में एग्रीकल्‍चर और एलाइड सेक्‍टर के कई खास घोषणा कीं। जेटली ने बजट भाषण की शुरुआत में कहा कि‍ सरकार कि‍सानों के वि‍कास के लि‍ए प्रतिबद्ध है। प्रधानमंत्री मोदी ने 2022 तक कि‍सानों की आय दोगुनी करने का वादा कि‍या था और सरकार इसे पूरा करने की योजना पर तेजी से काम कर रही है।

लागत से कम से कम डेढ़ गुना ज्‍यादा होगी एमएसपी

इसके लि‍ए सरकार ने तय कि‍या है अब कि‍सानों को उनकी फसल जो दाम मि‍लेगा वह उनकी लागत का कम से कम डेढ़ गुना होगा। जेटली ने कहा कि सरकार ने रबी की फसलों के लि‍ए जो एमएसपी तय की है वही इसी फॉर्मूले पर है। इसके अलावा आगामी खरीफ की फसलों के लि‍ए भी सरकार ने यही तय कि‍या है कि सभी फसलों की एमएसपी लागत से कम से कम डेढ़ गुना ज्‍यादा होगी। जेटली ने कहा कि देश तरक्‍की कर रहा है उस तरक्‍की का फायदा कि‍सानों को भी दि‍या जाएगा।

जेटली ने कहा कि एमएसपी को बढ़ाना ही काफी नहीं है ये भी देखना होगा कि अगर बाजार में दाम एमएसपी से कम है तो या तो सरकार कि‍सानों से उनकी उपज खरीदे या कोई अन्‍य व्‍यवस्‍था करे। केंद्र नीति आयोग के साथ ऐसा सि‍स्‍टम बनाने पर चर्चा करेगा जि‍सकी बदौलत कि‍सानों को उनकी फसल का बैटर प्राइज मि‍ले।

बजट – 2018-19 एग्रीकल्‍चर के खास एलान

  •  2000 करोड़ से कृषि बाजार और संरचना कोष की स्‍थापना की जाएगी।
  • मौजूदा 22 हजार रूरल हाट को एग्रीकल्‍चर मार्केट के रूप में बदला जाएगा और इन्‍हें इलेक्‍ट्रॉनि‍क तरीके से ई नैम से जोड़ा जाएगा।
  • इसकी बदौलत छोटे कि‍सान भी अपनी उपज सीधे कंज्‍यूमर या व्‍यापारी को बेच सकेंगे।
  • खेतीबाड़ी के वि‍कास के लि‍ए ऑपरेशन ग्रीन शुरू कि‍या जाएगा और उसके लि‍ए 500 करोड़ का प्रावधान कि‍या गया है।
  • सरकार का मकसद एग्री एक्‍सपोर्ट को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का है।
  • 1290 करोड़ रुपए से राष्‍ट्रीय बांस मि‍शन बनाने का प्रस्‍ताव।
  • 2000 करोड़ से कृषि बाजार और संरचना कोष की स्‍थापना की जाएगी।
  • मछलीपालन और पशुपालन को प्रमोट करने व इन कामों में लगे लोगों के वेलफेयर के लि‍ए 10 हजार करोड़ के दो फंड बनाए जाएंगे।

  • इस बार कृषि लोन के लि‍ए 11 लाख करोड़ का लक्ष्‍य।
  • सरकार ने जैवि‍क खेती को बढ़ावा दि‍या है।
  • पशुपालन और मछली पालन के लिए भी मिलेगा किसान क्रेडिट कार्ड।
  • फार्म एक्सपोर्ट के लिए 42 मेगा फूड पार्क बनाए जाएंगे
  • फार्म कमोडिटीज के निर्यात के नियमों को उदार बनाया जाएगा
  • फूड प्रोसेसिंग सेक्टर के लिए 1400 करोड़ रुपए का आवंटन
  • दवाओं से जुड़ी फसलों के लिए 200 करोड़ रुपए का आवंटन
  • होर्टीकल्चर फसलों के लिए क्लस्टर बेस्ड मॉडल होगा डेवलप

ईरान ने बासमती के निर्यात से प्रतिबंध हटाया,कीमतों में आया जबरदस्त उछाल

बासमती की कीमत पिछले एक सप्ताह में लगभग चार प्रतिशत बढ़ी है। सकारात्मक खबर के कारण इसकी कीमतों में लगातार तेजी आ रही है। बासमती चावल की कीमत सप्ताहभर पहले 7500 (प्रति कुंटल) रुपए के आसपास थी, वो अब 7850 तक पहुंच गयी है।

बासमती को लेकर सकारात्मक खबर ये है कि ईरान इसके निर्यात से प्रतिबंध हटा लिया है। इससे व्यापारियाें आैर कुछ हद तक किसानों को भी लाभ मिलेगा। साथ में अगले के लिए भी किसानो को बासमती का अच्छा दाम मिलने की उम्मीद बढ़ गई है ।

भारतीय बासमती चावल के सबसे बड़े खरीददार ईरान ने इस पर लगाया बैन हटा लिया है। पिछले लगभग पांच माह से ईरान ने भारत से बासमती चावल खरीदने पर प्रतिबंध लगाया हुआ था। प्रतिबंध हटने से भारतीय घरेलू बाजार में बासमती चावल के दाम में बढोतरी होने की संभावना है।

भारत बासमती चावल का सबसे बड़ा निर्यातक

दुनिया के 70 प्रतिशत बासमती चावल की उपज भारत में ही होती है। भारत के बाद पाकिस्तान का नंबर आता है। भारत ही यूरोपीय संघ और शेष विश्व में बासमती चावल का सबसे बड़ा निर्यातक है। जिसमें प्रमुख रूप से सउदी अरब, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, इराक और कुवैत में बड़ी मात्रा में बासमती चावल गया था।

ईरान ने बासमती से प्रतिबंध हटाने की सैद्धांतिक सहमति आठ जनवरी को ही कर दी थी। अभी तक इस बारे में नोटिफिकेशन जारी नहीं किया गया है। एक्सपोर्टर्स और कंपनियों के पास ईरान से पूछताछ आने लगी हैं। कुछे ने तो कॉन्ट्रैक्ट साइन करना भी शुरू कर दिया है।

ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स के प्रेसिडेंट मोहिंदर पाल जिंदल ने कहा “ईरान से भारत के किसानों के लिए अच्छी खबर आयी है। हालांकि अभी ईरान की तरफ से इंडियन चावल के इंपोर्ट की इजाजत देने वाला नोटिफिकेशन नहीं आया है, लेकिन ये आने वाला है। क्योंकि हमारे पास आॅर्डर आ रहे हैं। ये कारोबारियों और एक्सपोर्टर्स के लिए अच्छी खबर है। मार्केट में बासमती चावल की मांग अब बढ़ेगी।”

ईरान में हर साल तीन मिलियन टन चावल की खपत है, जबकि उसका घरेलू उत्पादन 2.2 मिलियन टन है। कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक ईरान हर साल 10 लाख टन बासमती चावल का आयात (इंपोर्ट) करता है। इसमें से करीब 7 लाख टन बासमती चावल का आयात भारत से होता है। ऑयल इंडिया चावल एसोसिएशन के अध्यक्ष एमपी जिंदल बताते हैं “यह प्रतिबंध अस्थायी होता है। प्रतिबंध लगने सेचावल की कीमतों पर दबाव जरूर बढ़ता है।

हर साल जब फसल बाजार में आने वाली होती है तो ईरान अपने किसानों के फायदे के लिए इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ा देता है और आयात पर बैन लगा देता है। ईरान हर वर्ष इंपोर्ट डयूटी 40-50 फीसदी कर देता है। पिछले साल आयात पर प्रतिबंध लगा दिया था। अब प्रतिबंध हटने से किसानों को फायदा होगा और बासमती की कीमतों में तेजी आयेगी।

फरवरी – मार्च में करें इन 10 सब्जियों की बुवाई मिलेगी अच्छी पैदावार

फरवरी महीने से जायद की फसलों की बुवाई का समय शुरू हो जाएगा। इन फसलों की बुवाई फरवरी महीने में शुरू होती है और मार्च तक चलती है। इस समय बोने पर ये फसलें अच्छी पैदावार देती हैं। इस मौसम में खीरा, ककड़ी, करेला, लौकी, तोरई, पेठा, पालक, फूलगोभी, बैंगन, भिण्‍डी, अरबी जैसी सब्ज़ियों की बुवाई करनी चाहिए।

खीरा

खीरे की खेती के लिए खेत में क्यारियां बनाएं। इसकी बुवाई लाइन में ही करें। लाइन से लाइन की दूरी 1.5 मीटर रखें और पौधे से पौधे की दूरी 1 मीटर। बुवाई के बाद 20 से 25 दिन बाद निराई – गुड़ाई करना चाहिए। खेत में सफाई रखें और तापमान बढ़ने पर हर सप्ताह हल्की सिंचाई करें। खेत से खरपतवार हटाते रहें।

ककड़ी

ककड़ी की बुवाई के लिए एक उपयुक्त समय फरवरी से मार्च ही होता है लेकिन अगेती फसल लेने के लिए पॉलीथीन की थैलियों में बीज भरकर उसकी रोपाई जनवरी में भी की जा सकती है। इसके लिए एक एकड़ भूमि में एक किलोग्राम बीज की ज़रूरत होती है। इसे लगभग हर तरह की ज़मीन में उगाया जा सकता है।

भूमि की तैयारी के समय गोबर की खाद डालें व खेत की तीन से चार बार जुताई करके सुहागा लगाएं। ककड़ी की बीजाई 2 मीटर चौड़ी क्यारियों में नाली के किनारों पर करनी चाहिए। पौधे से पौधे का अंतर 60 सेंटीमीटर रखें। एक जगह पर दो – तीन बीज बोएं। बाद में एक स्थान पर एक ही पौधा रखें।

करेला

हल्की दोमट मिट्टी करेले की खेती के लिए अच्छी होती है। करेले की बुवाई दो तरीके से की जाती है – बीज से और पौधे से। करेले की खेती के लिए 2 से 3 बीज 2.5 से 5 मीटर की दूरी पर बोने चाहिए। बीज को बोने से पहले 24 घंटे तक पानी में भिगो लेना चाहिए इससे अंकुरण जल्दी और अच्छा होता है। नदियों के किनारे की ज़मीन करेले की खेती के लिए बढ़िया रहती है। कुछ अम्लीय भूमि में इसकी खेती की जा सकती है। पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें इसके बाद दो – तीन बार हैरो या कल्टीवेटर चलाएं।

लौकी

लौकी की खेती कर तरह की मिट्टी में हो जाती है लेकिन दोमट मिट्टी इसके लिए सबसे अच्छी होती है। लौकी की खेती के लिए एक हेक्टेयर में 4.5 किलोग्राम बीज की ज़रूरत होती है। बीज को खेत में बोने से पहले 24 घंटे पानी में भिगोने के बाद टाट में बांध कर 24 घंटे रखें। करेले की तरह लौकी में भी ऐसा करने से बीजों का अंकुरण जल्दी होता है।

लौकी के बीजों के लिए 2.5 से 3.5 मीटर की दूरी पर 50 सेंटीमीटर चौड़ी व 20 से 25 सेंटीमीटर गहरी नालियां बनानी चाहिए। इन नालियों के दोनों किनारे पर गरमी में 60 से 75 सेंटीमीटर के फासले पर बीजों की बुवाई करनी चाहिए। एक जगह पर 2 से 3 बीज 4 सेंटीमीटर की गहराई पर बोएं।

भिंडी

भिंडी की अगेती किस्म की बुवाई फरवरी से मार्च के बीच करते हैं। इसकी खेती हर तरह की मिट्टी में हो जाती है। भिंडी की खेती के लिए खेत को दो-तीन बार जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा कर लेना चाहिए और फिर पाटा चलाकर समतल कर लेना चाहिए। बुवाई कतारों में करनी चाहिए। कतार से कतार दूरी 25-30 सेमी और कतार में पौधे की बीच की दूरी 15-20 सेमी रखनी चाहिए। बोने के 15-20 दिन बाद पहली निराई-गुड़ाई करना जरुरी रहता है। खरपतवार नियंत्रण के लिए रासायनिक का भी प्रयोग किया जा सकता है।

तोरई

हल्की दोमट मिट्टी तोरई की सफल खेती के लिए सबसे अच्छी मानी जाती है। नदियों के किनारे वाली भूमि इसकी खेती के लिए अच्छी रहती है। इसकी बुवाई से पहले, पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें इसके बाद 2 से 3 बार बार हैरो या कल्टीवेटर चलाएं। खेत कि तैयारी में मिट्टी भुरभुरी हो जानी चाहिए। तोरई में निराई ज़्यादा करनी पड़ती है।

इसके लिए कतार से कतार की दूरी 1 से 1.20 मीटर और पौधे से पौधे की दूरी एक मीटर होनी चाहिए। एक जगह पर 2 बीज बोने चाहिए। बीज को ज़्यादा गहराई में न लगाएं इससे अंकुरण पर फर्क पड़ता है। एक हेक्टेयर ज़मीन में 4 से 5 किलोग्राम बीज लगता है।

पालक

पालक के लिए बलुई दोमट या मटियार मिट्टी अच्छी होती है लेकिन ध्यान रहे अम्लीय ज़मीन में पालक की खेती नहीं होती है। भूमि की तैयारी के लिए मिट्टी को पलेवा करके जब वह जुताई योग्य हो जाए तब मिट्टी पलटने वाले हल से एक जुताई करना चाहिए, इसके बाद 2 या 3 बार हैरो या कल्टीवेटर चलाकर मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए।

साथ ही पाटा चलाकर भूमि को समतल करें। पालक की खेती के लिए एक हेक्टेयर में 25 से 30 किलोग्राम बीज की ज़रूरत होती है। बुवाई के लिए कतार से कतार की दूरी 20 से 25 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 20 सेंटीमीटर रखना चाहिए। पालक के बीज को 2 से 3 सेन्टीमीटर की गहराई पर बोना चाहिए, इससे अधिक गहरी बुवाई नहीं करनी चाहिए।

अरबी

अरबी की खेती के लिए रेतीली दोमट मिट्टी अच्छी रहती है। इसके लिए ज़मीन गहरी होनी चाहिए। जिससे इसके कंदों का समुचित विकास हो सके। अरबी की खेती के लिए समतल क्यारियां बनाएं। इसके लिए कतार से कतार की दूरी 45 सेमी. व पौधे से पौधे की दूरी 30 सेमी होनी चाहिए। इसकी गांठों को 6 से 7 सेंटीमीटर की गहराई पर बो दें।

बैंगन

इसकी नर्सरी फरवरी में तैयार की जाती है और बुवाई अप्रैल में की जाती है। बैंगन की खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है। नर्सरी में पौधे तैयार होने के बाद दूसरा महत्वपूर्ण कार्य होता है खेत को तैयार करना। मिट्टी परीक्षण करने के बाद खेत में एक हेक्टेयर के लिए 4 से 5 ट्रॉली पक्का हुआ गोबर का खाद् बिखेर दे। बैंगन की खेती के लिए दो पौधों और दो कतार के बीच की दूरी 60 सेंटीमीटर होनी ही चाहिए।

पेठा

पेठा कद्दू की खेती के लिए दोमट व बलुई दोमट मिट्टी सब से अच्छी मानी जाती है। इसके अलावा यह कम अम्लीय मिट्टी में आसानी से उगाया जा सकता है। पेठा की बुवाई से पहले खेतों की अच्छी तरह से जुताई कर के मिट्टी को भुरभुरी बना लेना चाहिए और 2-3 बार कल्टीवेटर से जुताई कर के पाटा लगाना चाहिए। इसके लिए एक हेक्टेयर में 7 से 8 किग्रा बीज की ज़रूरत होती है।

इसकी बुवाई के लिए लगभग 15 हाथ लंबा का एक सीधा लकड़ी का डंडा ले लेते हैं, इस डंडे में दो-दो हाथ की दूरी पर फीता बांधकर निशान बना लेते हैं जिससे लाइन टेढ़ी न बने। दो हाथ की दूरी पर लम्बाई और चौड़ाई के अंतर पर गोबर की खाद का सीधे लाइन में गोबर की खाद घुरवा बनाते हैं जिसमे पेठे के सात से आठ बीजे गाड़ देते हैं अगर सभी जम गए तो बाद में तीन चार पौधे छोड़कर सब उखाड़ कर फेंक दिए जाते हैं।

अमेरिका में प्‍याज की खेती : न पौध लगाने का झंझट, न खुदाई का चक्‍कर

प्‍याज दुनिया भर में खाया और बोया जाता है। हमारे यहां प्‍याज की खेती को काफी मेहनत की खेती माना जाता है क्‍योंकि इसमें काफी शारीरिक श्रम लगता है।

भारत में प्‍याज की पौध तैयार करने, रोपाई करने, निराई गुड़ाई करने, प्‍याज को उखाड़ने और उसकी छंटाई करने का काम किसान को हाथ से करना होता है। लेकिन अमेरिका में ये सब काम मशीनों से होता है।

190 देशों में उगाया जाता है प्‍याज

विश्‍व के 190 देशों में प्‍याज की खेती होती है। हर साल करीब 9 करोड़ 20 लाख एकड़ जमीन पर प्‍याज उगाया जाता है। अमेरिका में भी हर साल करीब सवा लाख एकड़ भूमि पर प्‍याज की खेती की जाती है। अमेरिका के बीस राज्‍यों में प्‍याज उगाया जाता है। विश्‍व के कुल प्‍याज उत्‍पादन का करीब 4 फीसदी प्‍याज अमेरिका पैदा करता है।

अमेरिका में बीज से ही सीधे प्‍याज पैदा किया जाता है। पहले पौध तैयार करके फिर उसकी रोपाई खेत में बहुत कम ही किसान करते हैं। ज्‍यादातर किसान बीज से सीधे बिजाई करते हैं। प्‍याज को बेड पर बोया जाता है। कुछ किसान नालियों से सिंचाई करते हैं तो कुछ टपका सिंचाई विधि का उपयोग करते हैं।

इस वीडियो में जानिए आप अमेरिका में प्‍याज की खेती 

https://youtu.be/q7Y42IdEhgw

1121 बासमती में तेज़ी का दौर जारी,यह चल रहे है भाव

लगता है अब बासमती के भाव 4000 रुपए क्विंटल पर ही जाकर दम लेंगे। पिछले तीन दिनों में बासमती 1121 के धान 150 रुपए तक चढ चुके हैं। शनिवार को हरियाणा की मंडियों में बासमती धान का ऊपर में भाव 3500 रुपए था जो कि आज बुधवार को 3650 रुपए हो चुका है।

डीपी के भाव भी 100 रुपए चढ़ चुके हैं। पीबी 1 भी पीछे नहीं है। शनिवार को इसका भाव जहां 3000 था वहीं बुधवार को हरियाणा की अधिकतर मंडियों में इसका भाव 3150 रुपए रहा।

हरियाणा बासमती धान भाव, 

बुधवार को टोहाना मंडी में बासमती 1121 3651, पीबी 1 3150, पूसा 1509 3300 और डीपी 1401 3425 रुपए क्विंटल बिका। निशिंग मंडी में बासमती 1121 3600, पूसा 1509 3300, सुगंध 2850, पीबी 1 3050 और बासमती 3700 रुपए क्विंटल बिका। तरावड़ी मंडी में बासमती 3690 और बासमती 1121 3600 रुपए बिका।

कैथल मंडी में आज बासमती 1121 का भाव ऊपर में 3650 रुपए रहा। चीका मंडी में बुधवार को बासमती 1121 धान के रेट 3700 रुपए तक लग गए। यहां आम भाव 3675 रुपए रहा। हांसी मंडी में बासमती 1121 3650, नरवाना में 3671, बरवाला में 3641 और उकलाना में 3650 रुपए क्विंटल का कारोबार रहा।

फतेहाबाद में बासमती 1121 3600, डीपी 1401 3438 और पीबी 1 3182 रुपए बिका। उचाना मंडी में बासमती 1121 का आज भाव 3631 रुपए रहा। उकलाना मंडी में बासमती 1121 3375 से 3630, डीपी 1401 3350 और पीबी 1 3100 रुपए बिका। सिरसा में डीपी 1401 3379 पीबी 1 3110 और 1121 3543 रुपए क्विंटल बिका।

रानियां मंडी में डीपी 1401 3420 रुपए बिका। जींद मंडी में बासमती 1121 3611 रुपए तक बिका। हांसी में 1509 3400 रुपए बिका। कुरुक्षेत्र में बासमती का रेट 3661 रुपए रहा। रतिया मंडी में पीबी 1 3141 और डीपी 1401 3447 रुपए बिका।

पंजाब बासमती धान भाव, 

पंजाब के अमृतसर में बुधवार को बासमती 1121 3490 रुपए बिका। मंडी कोटकपूरा में बासमती 1121 3480 रुपए बिका। यहां पर अब अन्‍य धान की आवक लगभग समाप्‍त हो चुकी है। फरीदकोट में बासमती 1121 का रेट 3490 रुपए रहा।

तरनतारन मंडी में करीब 17 हजार बोरी आवक हुई। यहां कंबाइन से निकाले 1121 धान का भाव 3425 तक और हाथ वाले धन का भाव 3565 रुपए तक रहा। पूसा 1509 3150 रुपए तक बिका। गिद्दड़बाहा में डीपी 1401 कंबाइन से निकाले मीडियम क्‍वालिटी धान का रेट 3200 रुपए रहा।

कोटा, बूंदी और डबरा बासमती धान भाव, 

राजस्‍थान की बूंदी मंडी में पूसा 1121 3525, पूसा 1509 3285, और सुगंध 2850 रुपए बिका। कोटा मंडी में करीब 28000 बोरी धान की आवक बुधवार को हुई। यहां पर पूसा 1121 3483, पूसा 1509 3200, सुगंध 2865 और डीपी 2990 रुपए तक बिका। मध्‍यप्रदेश की डबरा मंडी में पूसा 1121 3500, पूसा 1509 3050, सुगंध 2675 रुपए बिका।

यूपी बासमती धान भाव, 

अलीगढ़ मंडी में पूसा 1121 ऊपर में 3481, सुगंध 2776 और पूसा 1509 3125 रुपए तक बिक गया। यूपी के बुलंदशहर में पूसा 1121 3450, सुगंध 2800 और पूसा 1509 3150 रुपए बिका। मैनपुरी में पूसा 1121 3101, सुगंध 2400, पूसा 1509 2800 हाइब्रिड 1360 रुपए क्विंटल बिका। बबई मंडी में पूसा 1121 3270 तक और पूसा 2780 रुपए तक बिका।

पानी की कमी से परेशान किसान ने किया केसर की खेती का रुख

क्षेत्र में पानी की कमी से भले ही किसान परेशान हो लेकिन राजस्थान के बसवा तहसील क्षेत्र के गांव झूथाहेड़ा में एक किसान ने इस परेशानी को दूर कर कम पानी व कम खर्च में अच्छा मुनाफा कमाने के लिए केसर की खेती को अपनाया है।

किसान को उम्मीद है कि इस खेती को करने के बाद उसे खर्च से तीन गुना मुनाफा मिलेगा। झूथाहेड़ा गांव निवासी किसान श्री मोहन मीना ने बताया कि उनके गांव सहित आसपास के क्षेत्र में वर्षों से पानी की कमी से किसान परेशान हैं।

फसलों में पानी की अधिकता को लेकर कई किसानों ने तो खेती बाड़ी भी करना बंद कर दिया हैं। ऐसे में उन्होंने जानकारी लेकर अपने आधा बीघा खेत में इस बार केसर की फसल की पैदावार की हैं।

किसान ने बताया कि इस फसल में पानी की आवश्यकता कम है। उनके द्वारा बीज लगाए गए थे जिस पर अब खेत में 720 केसर के पौधे उग आए है ।

उन्होंने बताया कि केसर के पौधों में 15-20 दिन के अंतराल में पानी देना पड़ता हैं। वर्तमान में पौधे बड़े हो गए है तथा उनमें डोडी भी उग आई हैं। 15 दिन बाद इसमें केसर आना शुरु हो जाएगी।

मुनाफा तीन गुना मिलने की उम्मीद

किसान ने बताया कि केसर की खेती में उन्होंने करीब ढाई लाख रुपए का खर्च आया हैं। लेकिन उन्हें उम्मीद है कि केसर को बेचने के दौरान तीन गुना मुनाफा मिलेगा। उन्होंने बताया कि केसर बेचने के लिए उन्होंने जम्मू में केसर का कारोबार करने वाले व्यापारियों से संपर्क किया था।

जहां व्यापारियों ने एक किलो केसर दो लाख रुपए में खरीदने का भरोसा दिलाया है। उन्होंने बताया कि उनको अपने खेत में करीब चार किलो केसर आने की उम्मीद है।

नेट बना सबसे बड़ा सहयोगी

किसान श्री मोहन मीना ने बताया कि पानी की कमी के कारण वह खेती करने को लेकर लंबे समय से परेशान था। एक दिन टेलीविजन पर उन्होंने केसर की खेती के बारे में देखा। इसके बाद उनके मन में केसर की खेती करने को लेकर उम्मीद जगी।

नेट पर केसर की खेती कैसे करते है इस बारे में जानकारी ली। इसके बाद जम्मू से बीज लाकर इस खेती को शुरु कर दिया। उन्होंने बताया कि अभी भी वे इस फसल में किसी प्रकार की परेशानी आने पर नेट पर सर्च कर उस परेशानी को दूर कर देते है।

अब घर बैठे मंगाएं खेती का सामान, इफको ने शुरू की फ्री होम डिलीवरी सेवा

पिज्जा-बर्गर की तर्ज पर अब खेती के लिए खाद-बीज जैसी जरूरी वस्तुएं भी घर बैठे उपलब्ध हो जाएंगी। किसान को खाद या खेती से जुड़ी अन्य जरूरी वस्तुओं के लिए दुकान तक नहीं जाना होगा। ये सभी समान उन्हें घर बैठे ही उपलब्ध कराए जाएंगे।

किसानों के लिए ये शुरुआत की है दुनिया की सबसे बड़ी उर्वरक सहकारी कम्पनी इफको ने। इफको के इंडियन को-ऑपरेटिव डिजिटल प्लेटफॉर्म ने देशभर में कृषि संबंधित अपने इनपुट के लिए मुफ्त डोर-स्टेप डिलीवरी सेवा की शुरुआत की है। जिसके तहत देश के दूर-दराज के हिस्सों के किसानों को बगैर वितरण शुल्क के पांच किलोग्राम तक की पैकेजिंग के कृषिगत इनपुट मिल सकेंगे।

मिलेंगे जरूरी उत्पाद

दुनिया की सबसे बड़ी उर्वरक सहकारी, इफको ने अपने डिजिटल मंच इंडियन को-ऑपरेटिव डिजिटल प्लेटफॉर्म (आईसीडीपी) के माध्यम से अपने कृषिगत इनपुट को घर-घर तक पहुंचाने की सेवा शुरु करने की घोषणा की है। इसका मकसद नवीनतम तकनीकी साधनों से एक सक्षम आपूर्ति श्रृंखला तंत्र की सह-क्रिया द्वारा ग्रामीण भारत तक आधुनिक ई-कॉमर्स के लाभ और अनुभव को पहुंचाना है।

किसानों को अब आवश्यक कृषिगत इनपुट की पूरी श्रृंखला मिलेगी, जैसे पानी में घुलनशील उर्वरक, कृषि-रसायन, जैव-उर्वरक, बीज, पौधों को विकसित करने वाले संरक्षक और अन्य कृषि आधारित उत्पाद। ये उत्पाद पांच किलोग्राम तक की पैकिंग में उपलब्ध होंगे। बगैर किसी अतिरिक्त मूल्य के किसानों तक पहुंचाए जाएंगे।

पारंपरिक उर्वरकों, जैसे यूरिया, डीएपी, एनपीके, इत्यादि ऑनलाइन नहीं बेचे जाएंगे। इस उद्योग-जगत में अपनी तरह की पहली पहल आईसीडीपी ने की है। वह दूर-दराज के उन ग्रामीण क्षेत्रों तक वितरण सेवाएं उपलब्ध कराएगी, जहां ई-कॉमर्स के अग्रणी किरदार मौजूदा परिदृश्य में अपने सामान नहीं पहुंचा पाते हैं।

दूरदराज के किसान होंगे लाभान्वित

इफको के प्रबंध निदेशक डॉक्टर यू एस अवस्थी ने कहा कि इफको में हम लगातार किसानों को सेवायें देने का प्रयास करते हैं। कृषि-वाणिज्य को सरल बनाने के लिए अपने मजबूत ग्रामीण नेटवर्क के जरिये नई व निशुल्क आपूर्ति की सेवा देने की घोषणा कर हम बहुत प्रसन्न हैं। किसान हमारे डिजिटल मंच से कृषिगत इनपुट को सिर्फ एक क्लिक के जरिये खरीद पाएंगे। इस दिशा में आईसीडीपी काम कर रही है। इसका उद्देश्य है कि ज्यादा से ज्यादा किसान डिजिटलीकरण का लाभ उठाएं।

हमने किसानों के बीच प्रशिक्षण और जागरूकता-निर्माण अभियान भी शुरू किया, जहां वे ऑनलाइन व डिजिटल भुगतान गेटवे के उपयोग के बारे में सीख सकते हैं। यहां उन्हें कैशलेस रहने के लाभ की शिक्षा भी मिलेगी। इससे आगे जाते हुए, हमारी योजना यह है कि इस मंच को एक सफल डिजिटल बाजार में बदल दें, जहां किसान और सहकारी समितियां, दोनों अपने उत्पाद ऑनलाइन खरीद-बेच सकें । हमें उम्मीद है कि यह पहल दूर-दराज के किसानों को लाभ पहुंचाएगी और इस क्षेत्र की बाधाओं को स्थायी तौर पर खत्म करेगी।

किसानों की आय दोगुनी करने का हिस्सा

इफको आंवला के मीडिया प्रभारी विनीत शुक्ला ने बताया कि प्रधानमंत्री की डिजिटल पहल और कैशलेस मुहिम के अनुरूप, इफको ने एक नया पोर्टल शुरू किया है- इंडियन को-ऑपरेटिव डिजिटल प्लेटफॉर्म www-iffcobazar-in इस पोर्टल का लक्ष्य किसानों या उपभोक्ताओं और इफको तथा इसकी समूह कंपनियों के बीच संवाद और कारोबार के लिए एक डिजिटल मंच प्रदान करना है।

इफको के इंडियन को-ऑपरेटिव डिजिटल प्लेटफॉर्म (आईसीडीपी) का लक्ष्य एक डिजिटल मंच पर देश की सभी सहकारी समितियों और किसानों को एक साथ लाना और उन्हें आपस में जोड़ना है। यह पोर्टल 13 प्रमुख भारतीय भाषाओं में उपलब्ध है और इसमें 2.5 करोड़ की मेंबरशिप है।

इफको ग्रामीण..क्षेत्रों में किसानों को बाकी दुनिया से जोड़ने के लिए प्रेरित करने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इंडियन को-ऑपरेटिव डिजिटल प्लेटफॉर्म खेती-किसानी के सभी पहलुओं में किसानों को लाभ पहुंचाने में जुटी है और उन्हें एक अधिक जागरूक जीवन देने में मदद करती है। यह किसानों की आय दोगुना करने के इफको के 2020 दृष्टिकोण का हिस्सा है।

आलू-टमाटर 4 रु और प्याज-गोभी 5 रु. किलो से कम बिके तो सरकार करेगी भरपाई

हरियणा में शनिवार से भावांतर भरपाई योजना की शुरुआत हो गई। इसके तहत राज्य सरकार ने पहले चरण में आलू-टमाटर के लिए 400 रु. प्रति क्विंटल (4 रु. किलो), फूलगोभी-प्याज के लिए 500 रु. प्रति क्विंटल (5 रु. किलो) न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय किया है। अगर किसान की फसल तय एमएसपी से कम दाम पर बिकती है तो उसकी भरपाई राज्य सरकार करेगी।

इसके लिए अलग से फंड तैयार किया जाएगा। करनाल के गांव गांगर में सीएम मनोहर लाल ने भावांतर भरपाई ई-पोस्टल लॉन्च किया। सीएम ने कहा कि सरकार चाहती है कि किसान को प्रति एकड़ सालाना एक लाख रुपए तक आय हो। सरकार इस ओर आगे बढ़ रही है। कांग्रेस ने 4-5 रु. किलो के रेट नाकाफी बताए।

पंजीकरण (रजिस्टर) होने पर कर सकेंगे अपील

आलू की फसल के लिए के लिए 15 जनवरी तक, प्याज की फसल के लिए 25 मार्च तक, टमाटर की फसल के लिए 25 मार्च और फूलगोभी की फसल के लिए 25 जनवरी तक अपील की जा सकेगी।

किसान को फसल जे-फार्म के जरिए बेचनी होगी। बिक्री का विवरण बीबीवाई पोर्टल पर अपलोड करना होगा। इसकी सुविधा सभी मार्केटिंग कमेटी में होगी। बिक्री के तय समय में किसान को तय रेट से कम भाव मिलता है तो वह भरपाई के लिए पात्र होगा। भरपाई की राशि किसान के खाते में 15 दिन में जमा कर दी जाएगी।

औसत दैनिक थोक मूल्य मंडी बोर्ड की ओर से निर्धारित मंडियों के दैनिक भाव के आधार पर तय किया जाएगा। किसान को यदि भाव एमएसपी से अधिक भी मिलता है तो भी मंडी के अधिकारी से जे-फार्म चढ़वाना होगा, अन्यथा किसान को अगले वर्ष पंजीकृत नहीं किया जाएगा।

किसान को योजना का लाभ लेने के लिए बिजाई के समय ही मार्केटिंग बोर्ड की वेबसाइट पर बागवानी भावांतर योजना पोर्टल के माध्यम से पंजीकरण कराना होगा। उद्यान विभाग का अधिकारी किसान का क्षेत्र देखेंगे। हर जिले में डीसी के नेतृत्व में गठित कमेटी किसान की फसल का मूल्यांकन करेगी। इसके बाद किसान के पास एसएमएस भेजा जाएगा। पंजीकरण निशुल्क होगा। पंजीकरण किए जाने की शिकायत किसान कर सकेगा।

योजना का उद्देश्य मंडी में सब्जी फल की कम कीमत के दौरान निर्धारित सरंक्षित मूल्य द्वारा जोखिम को कम करना है। किसान को फसल का इतना भाव तो मिलना ही चाहिए, जितना खर्च आया है। इन चार फसलों के 400 से 500 रुपए जो भाव तय किए हैं, उसके अनुसार किसान को प्रति एकड़ 48 से 56 हजार रुपए मिल जाएंगे।