एमपी के दो कि‍सानों ने उगाई 50 लाख की अफीम, इस एक गलती से सब खत्‍म

अफीम के खेती बहुत ही फायदे का सौदा होती है, लेकि‍न तभी जब उसे सभी कानूनी औपचारि‍कताएं पूरी करने के बाद कि‍या जाए। वरना वह फसल अवैध हो जाती है। जानबूझकर या अनजाने में कानूनी मंजूरी लि‍ए बि‍ना इसकी खेती गैरकानूनी मानी जाती है।

मध्यप्रदेश के सतना जिले में सभापुर थाना क्षेत्र के रूइया गांव में सुरजीत सिंह और राजा सिंह ने करीब आधा एकड़ जमीन में अफीम की खेती की थी। बीते मंगलवार को पुलि‍स ने न केवल दोनों को गि‍रफ्तार कर लि‍या बल्‍कि उनकी करीब 50 लाख रुपए मूल्‍य की अफीम की फसल को जब्‍त कर लि‍या। अगर इन कि‍सानों ने केवल एक वि‍भाग से मंजूरी ले ली होती तो कोई इनकी फसल को हाथ नहीं लगाता।

नारकोटि‍क्‍स की मंजूरी जरूरी

अफीम की खेती भारत, चीन, एशिया माइनर, तुर्की आदि देशों में होती है। इसे पोस्‍त भी कहा जाता है। भारत में यूपी, मध्य प्रदेश एवं राजस्थान में कई कि‍सान इसकी खेती करते हैं। इसकी खेती बहुत फायदे का सौदा है इसीलि‍ए अब धीरे धीरे अफीम की खेती करने वालों की गि‍नती बढ़ रही है।

इसका इस्‍तेमाल दवाएं बनाने में होता है। मगर एक सच ये भी है कि‍ अफीम की खेती गैरकानूनी है। अगर कोई कि‍सान इसे बोना चाहता है तो उसे पहले आबकारी वि‍भाग से इसकी मंजूरी लेती होती है।

चाहि‍ए ऐसी जमीन

इसकी खेती के लिए 20-25 डिग्री सेल्सियम तापमान की आवश्यकता होती है। इसे सभी प्रकार की जमीन में उगाया जा सकता है। हालांकि उचित जल निकास एवं पर्याप्त जीवांश पदार्थ वाली मध्यम से गहरी काली मिट्टी जिसका पी.एच. मान 7 हो तथा जिसमें विगत 5-6 वर्षों से अफीम की खेती नहीं की जा रही हो जयादा उपयुक्त मानी जाती है।

जवाहर अफीम-16, जवाहर अफीम-539 एवं जवाहर अफीम-540 आदि मध्य प्रदेश के लिए अनुसंशित किस्में हैं । इसकी बुवाई अक्टूबर के अन्तिम सप्ताह से नवम्बर के दूसरे सप्ताह तक की जाती है।

पूसा में कृषि उन्नति मेला शुरू : जाने क्या है आपके लिए ख़ास

अगर आप आधुनिक खेती का बारीकियां सीखना चाहते हैं । नए तरीके के कृषि यंत्रों को चलाना सीखने के उत्सुक हैं, तो भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा में आज से शुरू हुए कृषि उन्नति मेले में ज़रूर जाएं।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा में कृषि उन्नति मेले की शुरूआत हो चुकी है। तीन दिवसीय इस मेले का उद्देश्य किसानों को आधुनिक कृषि प्रौद्योगिकियों के प्रति जागरुक करना और आधुनिक खेती में किसानों की भागीदारी बढ़ाना है। यह मेला 16 से 18 मार्च तक चलेगा।

आधुनिक कृषि तकनीकों में किसानों को जागरुक करने के लिए लगाए गए 600 से अधिक स्टॉल।
कृषि उन्नति मेले में देश के कई राज्यों से आ रहे किसानों के लिए 600 से अधिक स्टॉल लगाए गए हैं। किसानों को खेती संबंधी सभी जानकारियों के लिए हर एक स्टॉल पर खास तौर पर एक कृषि विशेषज्ञ मौजूद है। इसके अलावा आधुनिक खेती पर जानकारी करने वाले किसानों के खेती पर आधारित तरह – तरह के लिटरेचर उपलब्ध हैं।

इन स्टॉलों में खेती से जुड़ी आधुनिक प्रौद्योगिकियों समेत सूक्ष्म- सिंचाई, अपशिष्ट जल का इस्तेमाल और पशुपालन एवं मत्स्यपालन की प्रदर्शनी दिखाई गई है। मेले में किसानों की आय दोगुनी करने, सहकारी संगठनों आदि पर आधारित थीम पैवेलियन भी ।

कृषि उन्नति मेले में जाएं , तो इन चीज़ों पर ज़रूर डालें नज़र

  • फसल की उत्पादन तकनीकों का लाइव प्रदर्शन ज़रूर देखें।
  • इस्तेमाल न किए जाने वाले पानी का खेती में सफल प्रयोग करना ज़रूर सीखें।
  • माइक्रो एरिगेशन, वेस्ट वाटर यूटिलाइजेशन,पशुपालन(पशुधन, मछलियां आदि) का प्रदर्शन पर डालें नज़र।
  • मृदा और जल परिक्षण स्टॉल पर मुफ्त में ले मदद।
  • जैविक उर्वरक और कृषि रसायनों के बिक्री बिक्री केंद्रों को देखें।

  • सब्जियों और फूलों की फसलों को सुरक्षित रखने की तकनीकें ज़रूर सीखें।
  • आईसीएआर की तरफ से लगाए गए स्टॉल में आधुनिक कृषि यंत्रों को खुद से चलाकर देखिए।
  • खेती में सिंचाई की नई तकनीकों को ज़रूर समझें।
  • कृषि गोष्ठी में भाग अवश्य लें।
  • विभिन्न कृषि विषयों पर प्रदर्शित होने वाली फिल्मों को देखें।

भारत सरकार द्वारा आयोजित कृषि उन्नति मेला पूसा नई दिल्ली दिनांक 17 मार्च को 2:30 बजे से हॉल-1 में ई-राष्ट्रीय कृषि बाजार,मसौदा एपीएलएम अधिनियम, हॉल-2 में किसान उत्पादक संगठनका संविधान –भूमिका हॉल-3 में आय संवर्धन के लिए पशुधन और मात्स्यिकी प्रबंधन पर चर्चा होगी।

मार्च माह से 45 किलोग्राम की पैकिंग में बिकेगी यूरिया

खेतों में उर्वरकों के उपयोग को संतुलित करने के प्रयासों के तहत इस महीने से यूरिया को 50 किलोग्राम के बजाय 45 किलोग्राम की पैकिंग में बेचा जाएगा। सरकारी अधिसूचना के अनुसार 45 किलोग्राम की यूरिया की एक बोरी की कीमत 242 रुपए होगी। इसमें कर शामिल नहीं है। यह कीमत सरकार द्वारा तय 5,360 रुपए प्रति टन की कीमत पर आधारित है। यूरिया का उत्पादन खर्च करीब 16 हजार रुपए प्रति टन आता है।

भारत यूरिया का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है। देश का यूरिया उत्पादन कुल मांग 320 लाख टन से कम रहने के कारण करीब 50-70 लाख टन यूरिया का सालाना आयात करना पड़ता है। उल्लेखनीय है कि यूरिया सबसे आम उर्वरक है और इस पर सरकार बहुत अधिक सब्सिडी देती है। सरकार यूरिया पर सालाना 40,000 करोड़ रुपए की सब्सिडी देती है।

अधिसूचना के अनुसार, 45 किलो के बैग की बिक्री मार्च 1, 2018 से प्रभावी है। सरकार ने डीलरों को 25 किलो से कम मात्रा में यूरिया बेचने की भी अनुमति दी है। डीलर 2 किलो यूरिया पर 1.5 रुपए, प्रति 5 किग्रा 2.25 रुपए, 10 किलो पर 3.5 रुपए, 25 किलो पर 5 रुपए पैकिंग चार्ज ले सकते हैं।

केंद्र सरकार अधिकतम खुदरा मूल्य और उत्पादन लागत के बीच के अंतर का वहन करेगी। उर्वरक मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि कंपनियों को अगले दो महीनों में पुराने 50 किलोग्राम की पैकिंग वाले स्टॉक को बेचने की अनुमति दी गई है। अधिकारी ने कहा कि इसका मकसद यूरिया के उपयोग को कम करना और उर्वरकों के संतुलित उपयोग को प्रसारित करना है। चूंकि यूरिया सस्ता होता है, इसलिए किसान इसका बड़े पैमाने पर उपयोग करते हैं।

खीरा कक़डी आप को बना सकते हैं लखपति , जानिए क्यों और कैसे ?

देश के लघु और सीमांत किसानों की मेहनत और बेहतर निर्यात नीति के कारण विश्व बाजार में खीरा और ककड़ी में निर्यात करने में देश अव्वल रहा है। देश ने वर्ष 2016-2017 के दौरान पूरे विश्व भर में 1,80,820.87 मीट्रिक टन खीरे और ककड़ी का निर्यात करके 942.72 करोड़ रुपए की कमाई की थी। बेल्जियम, रूस, फ्रांस और स्पेन जैसे देशों में भारतीय खीरा और ककड़ी की सबसे ज्यादा मांग है।

एपीडा के सलाहकार विनोद कुमार कौल बताते हैं, “भारत विश्व भर की बढ़ती हुई आवश्कता के लिए बेहतरीन खीरा-ककड़ी की कृषि, प्रसंस्करण और निर्यातकों के स्रोत के रूप में उभर कर रहा है।”

वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय भारत सरकार की तरफ से गठित कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण यानि एपीडा की रिपोर्ट के अनुसार देश में खीरा-ककड़ी की पैदावार लघु और सीमांत किसानों की देख-रेख में हो रही है। अभी देशभर में एक लाख से ज्यादा लघु और सीमांत किसान खीरा-ककड़ी उत्पादन के काम में लगे हुए हैं।

बनता जा रहा है सफल मॉडल

ककड़ी की खेती विशेष रूप से ”अनुबंध कृषि” के आधार पर की जा रही है। विश्व के बाजारों के लिए बहुत ही उच्च गुणवत्ता वाली ककड़ी का उत्पादन करने के लिए देश के किसानों को वैश्विक मानकों के अनुसार खेती करने के लिए कृषि विभाग की तरफ अनुबंध खेती के लिए सहायता दी जा रही है। खीरा और ककड़ी की खेती में यह एक सफल मॉडल बनता जा रहा है।

एक बड़ा खाद्य प्रसंस्करण उद्योग बना

भारत में ककड़ी की व्यावसायिक खेती, प्रसंस्करण और निर्यात की शुरुआत 1990 के दशक में हुई थी। दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य में एक मामूली शुरुआत हुई और बाद में तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के पड़ोसी राज्यों तक इसका विस्तार हुआ। शुरुआत में प्रसंस्कृत ककड़ी को थोक पैकिंग में निर्यात किया गया था और 2001 के बाद से इसे ” रेडी-टू-ईट जार” में निर्यात किया जा रहा है। भारत में आज ककड़ी का उद्योग पूरी तरह एक बड़ा खाद्य प्रसंस्करण उद्योग बन चुका है।

ककड़ी शब्द का प्रयोग चटपटे अचारी खीरे के लिए किया जाता है। ककड़ी और व्यवसायिक खीरा एक ही प्रजाति (कुकुमीज़ सेटिवस) के हैं, लेकिन यह अलग-अलग कृषि समूहों के अंतर्गत आते हैं। इस फसल की कटाई तब होती है जब इनकी लम्बाई 4 से 8 से.मी (1 से 3 इंच) की होती है।

SBI ने मौसम की जानकारी देने के नाम पर ऐसे लुटे देश भर के किसानो के 990 करोड़

बैंकों में जमा राशि अमूमन सुरक्षित मानी जाती है, लेकिन अब यहां भी सेंध लग गई है। देश के सबसे बडे़ सरकारी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआइ) ने केसीसी धारक किसानों के खातों से मौसम की जानकारी देने के नाम पर उनकी बिना सहमति के 990 करोड़  काट लिए।

पूरे देश में एक करोड़ एक लाख केसीसी धारक किसानों से 990 करोड़ रुपये काटे गए। इनमें सबसे ज्यादा मप्र के छह लाख किसानों के 60 करोड़ हैं। ये राशि ऐसी सुविधा के नाम पर वसूली गई है, जो केंद्र सरकार टोल-फ्री नंबर के जरिए पहले से ही किसानों को मुफ्त में उपलब्ध करा रही है।

इस गड़बड़झाले का पर्दाफाश तब हुआ, जब विदिशा के नटेरन तहसील के नोराजखेड़ी गांव के किसान हजारीलाल शर्मा के पास बैंक से फोन आया, जिसमें उनके खाते से 990 रुपये की राशि मौसम की जानकारी के नाम पर काटने की जानकारी दी गई।

शर्मा ने लिखित शिकायत की, लेकिन बैंक प्रबंधन ने राशि वापस नहीं की। इस बारे में जब नटेरन एसबीआइ शाखा के मैनेजर बीएस बघेल से बात की गई तब पूरे गोलमाल का पता चला।

ये है 990 करोड़ का गणित एसबीआइ की वेबसाइट के अनुसार देशभर में उसके लगभग एक करोड़ एक लाख केसीसी धारक हैं। यदि एसबीआइ के एक करोड़ ग्राहक भी यह सुविधा हासिल करते हैं तो इसके लिए किसानों से करीब 990 करोड़ रुपये की राशि वसूली गई। आरएमएल के जरिए 500 ब्रांचों में उपलब्ध हो रही सुविधा एसबीआइ ने किसानों को मौसम एवं फसल की जानकारी दिलाने के लिए मुंबई की आरएमएल कंपनी से अनुबंध किया है।

आरएमएल के अनुसार 16 राज्यों में एसबीआइ की करीब 500 ब्रांचों में जुड़े ग्राहकों को कंपनी यह सुविधा दे रही है। अलग-अलग सेवाओं के अलग-अलग रेट तय हैं। इनमें 990 रुपये वार्षिक शुल्क वाली एसएमएस सेवा है।

3500 रुपए में सीखें ऑर्गेनिक फार्म बिजनेस, होगी अच्‍छी कमाई

पिछले कुछ सालों में ऑर्गेनिक प्रोडक्‍ट्स के प्रति भारतीयों का रूझान बढ़ा है, और हर साल ऑर्गेनिक प्रोडक्‍ट्स का बाजार बढ़ता जा रहा है। बल्कि विदेशों में भारतीय ऑर्गेनिक प्रोडक्‍ट्स की डिमांड बढ़ रही है। यही वजह है कि ऑर्गेनिक फार्मिंग का चलन भी बढ़ रहा है।

सरकार भी ऑर्गेनिक फार्मिंग को प्रमोट कर रही है। ऐसे समय में यदि आप भी ऑर्गेनिक फार्म बिजनेस शुरू करते हैं तो आपके लिए यह फायदेमंद हो सकता है। लेकिन आप सोच रहे होंगे कि ऑर्गेनिक फार्मिंग के बारे में जानकारी न होने के कारण कैसे आप यह बिजनेस शुरू कर सकते हैं तो परेशान न हों। आप मात्र 3500 रुपए फीस देकर ऑर्गेनिक फार्मिंग बिजनेस की बेसिक जानकारी ले सकते हैं।

आज हम आपको बताएंगे कि ऑर्गेनिक फार्म बिजनेस क्‍या है और कैसे आप इसकी ट्रेनिंग ले सकते हैं।

क्‍या है ऑर्गेनिक फार्मिंग

ऑर्गेनिक फार्मिंग टॉक्सिक लोड कम करती है। हवा, पानी, मिट्टी से कैमिकल को हटाकर फसल पैदा करने की प्रक्रिया को ऑर्गेनिक फार्मिंग कहा जाता है। जो इन्‍वायरमेंट फ्रेडली होती है, नेचर को नुकसान नहीं पहुंचाती और हमारे शरीर के लिए पूरी तरह फिट होती है।

क्‍यों है फायदेमंद

पिछले कुछ सालों में हमारे देश वासी अपनी हेल्‍थ के प्रति काफी जागरूक हो गए हैं और ऐसे प्रोडक्‍ट्स को अपना रहे हैं, जो उनके शरीर के साथ-साथ इन्‍वायरमेंट को नुकसान नहीं पहुंचाते हों। हालांकि कैमिकल के इस्‍तेमाल से पैदा होने वाले फूड प्रोडक्‍ट्स सस्‍ते होते हैं। बावजूद इसके, जागरूकता के चलते ऑर्गेनिक फार्मिंग से पैदा प्रोडक्‍ट्स की डिमांड बढ़ रही है।

सरकार दे रही है ट्रेनिंग

सरकार ने देश में ऑर्गेनिक फार्मिंग बिजनेस को प्रमोट करने के लिए ट्रेनिंग प्रोग्राम तैयार किया है। केंद्र सरकार की मिनिस्‍ट्री ऑफ स्किल डेवलपमेंट के अंतर्गत चल रहे इंस्टिट्यूट निसबड ने यह प्रोग्राम तैयार किया है। निसबड द्वारा 28 अप्रैल को इसकी ट्रेनिंग दी जाएगी। जिसकी फीस 3540 रुपए रखी गई है।

क्‍या मिलेगी ट्रेनिंग –

  • ऑर्गेनिक फार्मिंग एंटरप्राइजेज कैसे बनाएं
  • ऑर्गेनिक फूड प्रोडक्‍ट्स के लिए पोटेंशियल मार्केट की पहचान कैसे करें –
  • ऑर्गेनिक फार्मिंग सर्टिफिकेशन कैसे हासिल करें
  • फार्म से रिटेल यूनिट तक सप्‍लाई चेन कैसे बनाएं
  •  अपने प्रोडक्‍ट्स को बेचने के लिए सोशल मीडिया का इस्‍तेमाल कैसे करें
  •  ऑर्गेनिक फूड प्रोडक्‍ट्स के लिए फॉरेन मार्केट तक कैसे पहुंच बनाएं
  •  अपने बिजनेस का बढ़ाने के लिए सरकारी स्‍कीमों का लाभ कैसे लें।

कैसे करें अप्‍लाई

अगर आप इस ट्रेनिंग प्रोग्राम में शामिल होना चाहते हैं तो आप इस लिंक पर क्लिक करके रजिस्‍ट्रेशन संबंधी जानकारी ले सकते हैं या फार्म भर सकते हैं।

https://www.niesbud.nic.in/docs/entrepreneurship-training-in-organic-farming-business-28-apr-2018.pdf

अब राजस्थान में भी होने लगी सेब की खेती

राजस्थान में शेखावटी का मौसम सेब की खेती के अनुकूल नहीं है। यहां धूलभरी आंधियां, गर्मी में 45 डिग्री के पार पारा और सर्दियों में हाड़ कंपाकंपा देने वाली सर्दी। इन चुनौतियों के बाद भी यहां सेब उगाने का प्रयास किया जा रहा हैं।सब कुछ ठीक रहा तो इस बार सितम्बर में सीकर की सेब खाने को मिल सकती है।

हिमाचल और कश्मीर की मुख्य उपज सेब की राजस्थान के सीकर में खेती का नवाचार बेरी गांव के किसान हरमन सिंह कर रहे है। वे नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन से जुड़े हैं। सिंह बताते हैं कि राजस्थान की धरती पर सेब की खेती के प्रयास नए तो नहीं हैं, लेकिन सफलता नहीं मिल पाई।


अब तीन साल बाद यह सफलता मिलने की उम्मीद है। बेरी गांव से पहले सेब की खेती का प्रयास जयपुर के दुर्गापुरा में भी किया गया। वहां सौ पौधे लगाए गए थे, लेकिन वे नष्ट हो गए। इसी तरह सीकर के ही दो अन्य जगहों पर भी यह प्रयास किया गया, लेकिन उनमें अंकुर नहीं फूट पाया। फिर बेरी में यह प्रयास किया गया। बेरी में इसमें सफलता मिलती नजर आ रही है।

खेती फलने लगी है और सितंबर यहां सेब की फसल मिल जाएगी। इस सफलता को लेकर अधिकारी भी उत्साहित हैं। इस बारे में राज्य सरकार के उद्यानिकी मुख्यालय, जयपुर ने भी सीकर के अधिकारियों ने भी सूचना मांगी है।

सेब की खेती करने के लिए सबसे जरूरी थी उसे गर्मी से बचान, इसके लिए पौधों की टहनियों की कटिंग खास तरह से की गई, बिल्कुल उसी तरह जिस तरह अनार की अंब्रेला कटिंग की जाती है।

जैविक खाद का उपयोग किया गया। ड्रिप सिंचाई तकनीक को छह माह तक  अपनाया गया। जिसका परिणाम है कि हिमाचल और कश्मीर में बहुतायत में उगने वाली सेब रेगिस्तान में भी मिल सकेगी।

23 फरवरी के लिए मौसम विभाग की चेतावनी

भारतीय मौसम विभाग ने दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब समेत पूरे उत्तर भारत के लिए चेतावनी जारी की है। इसके अलावा मध्य प्रदेश, मध्य महाराष्ट्र, विदर्भ और मराठवाड़ा के लिए भी चेतावनी जारी की गई है।

मौसम विभाग ने उत्तर भारत के पहाड़ी राज्यों में बर्फबारी और ओले गिरने की आशंका जताई है साथ में मैदीनी राज्यों में आंधी तूफ़ान के साथ ओले गिरने की चेतावनी जारी की है।

ज्ञात हो की फिलहाल पंजाब, हरयाणा, राजस्थान और मध्य प्रदेश में मुख्यतः सरसों और गेहूं की फसलों की कटाई जोरों पर है, जबकि महाराष्ट्र में चने के अलावा अन्य रबी दलहनों के साथ-साथ अनाज की कटाई हो रहा है और ऐसे में यदि ओला वृष्टि होती है तो फसलों को नुकसान होने के साथ-साथ कटाई में भी देरी हो सकती है।

23 फरवरी के लिए मौसम विभाग की चेतावनी

मौसम विभाग के मुताबिक 23 फरवरी के दिन पश्चिम मध्य प्रदेश और उत्तर मध्य महाराष्ट्र में कुछेक जगहों पर आंधी तूफ़ान के साथ ओले गिरने की चेतावनी दी है।

24-25 फरवरी को इन राज्यों पर दिखेगा ज्यादा असर

24 फरवरी के दिन जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में पहाड़ी क्षेत्रों में कुछेक जगहों पर बर्फबारी की चेतावनी है। इसके अलावा पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पश्चिम मध्य प्रदेश, मराठवाड़ा में कुछेक जगहों पर गरज के साथ ओले गिर सकते हैं।

सरकार ने जारी की नई “ई-नाम” ऐप,ऐसे करेगी किसानो की मदद

कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने किसानों के उत्पादों को बेहतर बाजार मूल्य दिलाने के लिए 6 नए फीचर से युक्त राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम) मोबाइल ऐप को बुधवार को यहां जारी किया।

सिंह ने कहा कि इस ऐप को इस प्रकार से तैयार किया गया है जिससे किसान घर बैठे अपने उत्पाद के बाजार मूल्य की नवीनतम जानकारी प्राप्त कर सकेंगे तथा बाजार में पंजीयन भी करा सकेंगे।

उन्होंने कहा कि ई-नाम वैबसाइट हिन्दी, अंग्रेजी, गुजराती, मराठी, तमिल, तेलुगु, बंगला और उडिय़ा भाषा में उपलब्ध है तथा इसमें अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को भी जोड़ा जाएगा।

ई-नाम पोर्टल में एम.आई.एस. डैशबोर्ड, व्यापारियों को भीम ऐप द्वारा भुगतान की सुविधा, मोबाइल भुगतान की सुविधा आदि को शामिल किया गया है ।

खेती से जुड़े बिजनेस से करें कमाई, सरकार दे रही है 8000 रुपए में ट्रेनिंग

आप अगर नया बिजनेस शुरू करने की सोच रहे हैं या आपको लगता है कि एग्री प्रोडक्‍ट्स का बिजनेस करना फायदे का सौदा साबित हो सकता है, लेकिन आपको इस बिजनेस के बारे में कोई जानकारी नहीं है तो आपके पास अच्‍छा मौका है कि आप एग्री बिजनेस पर हो रहे एंटरप्रेन्‍योरशिप डेवलपमेंट प्रोग्राम में हिस्‍सा ले सकें।

सरकार के मिनिस्‍ट्री ऑफ स्किल डेवलपमेंट के अधीन नेशनल इंस्टिट्यूट फॉर एंटरप्रेन्‍योरशिप एंड स्‍मॉल बिजनेस डेवलपमेंट (निसबड) द्वारा खेती से जुड़े अलग- अलग तरह के बिजनेस के बारे में ट्रेनिंग ले सकें। आप को इस ट्रेनिंग प्रोग्राम के दौरान एग्री बिजनेस से जुड़ी छोटी से छोटी जानकारी दी जाएगी।

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आज हम अपको बताएंगे कि निसबड किस-किस तरह की ट्रेनिंग देगा और आप कैसे इस ट्रेनिंग प्रोग्राम में शामिल हो सकते हैं।

कैसे करें ऑर्गेनिक फार्मिंग

निसबड द्वारा ऑर्गेनिक फार्मिंग के बारे में पूरी जानकारी दी जाएगी, जैसे कि क्‍या है ऑर्गेनिक फार्मिंग, इसके फायदे क्‍या हैं, ऑर्गेनिक फार्मिंग की मार्केट क्‍या है, किस तरह की टैक्‍नोलॉजी का इस्‍तेमाल होता है, न्‍यूट्रेशन मैनेजमेंट क्‍या है, आर्गेनिक फार्मिंग की मैथोलॉजी, क्‍वालिटी अश्‍योरेंस, नेशनल प्रोग्राम ऑन ऑर्गेनिक प्रोडक्‍शन, ऑनलाइन सेल्‍स मॉडल, इको टूरिज्‍म, सरकार की स्‍कीम और सपोर्ट सिस्‍टम, भारत सरकार का असिस्‍टेंस प्रोग्राम आदि की जानकारी दी जाएगी।

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कैसे करें डेयरी बिजनेस

इसी दौरान आपको डेयरी बिजनेस के बारे में भी ट्रेनिंग दी जाएगी। इसमें डेयरी लगाने से लेकर चलाने तक की पूरी गाइडेंस दी जाएगी। साथ ही, आपको सरकार के सपोर्ट सिस्‍टम और स्‍कीम के साथ साथ लोन स्‍कीम की भी जानकारी दी जाएगी। डेयरी बिजनेस में सफल स्‍टार्ट-अप्‍स के बारे में भी केस स्‍टडी के बारे में निसबड द्वारा बताया जाएगा।

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कैसे करें फूड प्रोसेसिंग बिजनेस

निसबड के इस एंटरप्रेन्‍योरशिप डेवलपमेंट प्रोग्राम के दौरान आपको फूड प्रोसेसिंग बिजनेस के अलग-अलग मॉडल के बारे में भी बताया जाएगा। जैसे कि – फूड प्रोसेसिंग के एवेन्‍यू, छोटा फूड प्रोसेसिंग प्‍लांट कैसे लगाएं, फूड प्रोसेसिंग ब्रांड कैसे क्रिएट किया जाए, सरकार की सपोर्ट स्‍कीम, सक्‍सेसफुल स्‍टार्ट अप्‍स की केस स्‍टडी के बारे में जानकारी दी जाएगी।

कैसे खोलें कोल्‍ड स्‍टोरेज चेन

इसके अलावा आपको कोल्‍ड स्‍टोरेज चेन खोलने के फायदे, तरीके और सरकारी स्‍कीम के बारे में भी ट्रेनिंग दी जाएगी। यहां यह उल्‍लेखनीय है कि देश में कोल्‍ड स्‍टोरेज चेन की सख्‍त जरूरत है और सरकार भी प्रमोट कर रही है। आप कोल्‍ड स्‍टोरेज चेन शुरू करने के बारे में सोच सकते हैं।

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इन बिजनेस के भी लें सकेंगे ट्रेनिंग

  • ग्रीन हाउस
  • अरोमेटिक ऑयल
  • फ्लोरीकल्‍चर
  • फ्रूट कल्‍टीवेशन
  • पॉल्‍यूटरी एंड फिशरी

कैसे करें अप्‍लाई

यह दो दिन का ट्रेनिंग प्रोग्राम है। जो 24 व 25 फरवरी को निसबड के नोएडा सेक्‍टर 62 स्थित सेंटर में होगा। इस प्रोग्राम की फीस 8000 रुपए है। अगर आप हिस्‍सा लेना चाहते हैं तो इस लिंक पर क्लिक करके रजिस्‍ट्रेशन फॉर्म डाउनलोड कर सकते हैं।
http://niesbud.nic.in/docs/edp-on-agriculture-business-24-feb-to-25-feb-2018.pdf