सोने से भी महंगी है हिमालय की वायग्रा, एक किलो की कीमत 60 लाख रुपए से ज्‍यादा

यारसागुम्‍बा यानी गर्मी की घास। यह एक तरह की फफूंंद है। यह सोने से भी महंगी है। 1 किलो यारसागुम्‍बा की कीमत लगभग 1 लाख डॉलर यानी लगभग 65 लाख रुपए है। इसे हिमालय की वायग्रा भी कहा जाता है। लोगों का मानना है कि इससे अस्‍थमा कैंसर और खास तौर पर मर्दाना कमजोरी में फायदा होता है।

यारसागुम्‍बा सिर्फ हिमालय और तिब्‍बती पठार पर 3000 से 5000 मीटर की ऊंचाई पर मिलता है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हर साल मई से जून के माह में नेपाल के हजारों लोग पहाड़ की ओर चले जाते हैं। ये लोग यारसागुम्‍बा की तलाश में जाते हैं। ये लोग तीन हजार मीटर की ऊंचाई पर कैंप करके रहते हैं। पांच साल से यारसागुम्बा का व्यापार कर रहे कर्मा लांबा कहते हैं कि दूर दराज से गोरखा, धाधिंग, लामजुंग जि‍ले से लोग यहां यारसागुम्बा की तलाश में आते हैं।

मुश्किल जिंदगी जीते हैं यारसागुम्‍बा तलाशने वाले लोग

यारसागुम्‍बा की तलाश में आए लोग दो महीने तक बहुत मुश्किल जिंदगी जीते हैं। ये टेंट में रहते हैं। एक युवा दंपत्ति यहां तीन साल से आ रहा है। उनका कहना है कि पहले साल हमें एक भी यारसागुम्‍बा नहीं मिला था। फिर हमने उसकी डंठल को पहचानना सीखा। अब हम आसानी से रोज 10 से 20 यारसागुम्‍बा तलाश लेते हैं।

सुशीला और उनके पति की मई और जून के महीने में हर दिन यही दिनचर्या रहती है। यारसामगुम्बा के बदले जो पैसा उन्हें मिलता है उससे वो आसानी से आधा साल काट लेते हैं। पिछले साल उन्होंने दो हजार डॉलर कमाए थे। इस तरह से वे 2 माह में उतना कमा लेते हैं जितना वे छह माह में दूसरा काम करके कमाते।

यारसागुम्‍बा की उपलब्‍धता में आ रही है कमी

बढ़ती मांग और जलवायु परिवर्तन के असर की वजह से यारसागुम्‍बा की उपलब्‍धता में कमी आ रही है। नेपाल के मनांग क्षेत्र में 15 सालों से यारसागुम्बा तलाश रही सीता गुरुंग का कहना है कि पहले मैं हर दिन सौ यारसागुम्बा तक तलाश लेती थी लेकिन अब दिन भर में मुश्किल से दस-बीस ही मिल पाते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि ज्‍यादा मांग और जलवायु परिवर्तन की वजह से यारसागुम्बा की उपलब्धता में गिरावट आ रही है। सीता कहती हैं कि जब मुझे रोजाना सौ यारसागुम्बा मिलते थे तब कीमतें बहुत कम थीं। अब जब कीमतें बढ़ गई हैं तो बहुत कम यारसागुम्बा मिलते हैं।

यारसागुम्‍बा पर सरकार को रॉयल्‍टी चुकाते हैं लोग

नेपाल सेंट्रल बैंक के एक शोध के मुताबिक, जो लोग यारसागुम्बा तलाशते हैं उनकी सालाना आय का 56 फीसदी इसी से आता है। यारसागुम्बा की फसल काटने वाले सभी लोग सरकार को रॉयल्टी चुकाते हैं। साल 2014 में किए गए एक शोध के मुताबिक, यारसागुम्बा के कारोबार से नेपाल की अर्थव्यवस्था को 51 लाख रुपए की आमदनी हुई।

कई विशेषज्ञों का मानना है कि इस कैटरपिलर फफूंदी की तस्करी अन्य देशों में भी की जा रही है। 18 सालों से यारसागुम्बा का व्यापार कर रहे नागेंद्र बुद्धा थोकी कहते हैं कि इस व्यापार को इस तरह से रेगुलेट नहीं किया गया है जैसे इसे किया जाना चाहिए था। इसलिए यारसागुम्बा तलाशने वालों और सरकार की वास्तविक आय का पता करना मुश्किल हो जाता है।

ऐसे निकालें इंटरनेट से खसरा खतौनी

अगर आप को अपनी जमीन से संबंधित कोई कागजात चाहिए, जैसे खतरा खतौनी और नक्शा आदि तो तहसील कचहेरी जाना पड़ता है। लेकिन अगर आप इसमें लगने वाले समय और पैसे को बचाना चाहते हैं तो आपके पास दो विकल्प है।

पहला अपने घर के पास के जनसुविधा केंद्र में जाकर कुछ पैसे देकर इसे निकलवा सकते हैं, दूसरा की आप खुद भी इंटरनेट पर अपने राज्य की राजस्व विभाग संबंधी वेबसाइट पर जाकर खसरा-खतौनी निकाल सकते हैं। आज कल जमीन की रजिस्ट्री करानी हो या उस पर किसान क्रेडिट कार्ड बनवाना हो, या फिर कोई सरकारी योजना का लाभ लेना हो खसरा-खतौनी जरुरी है।

ये जमीन के वो कागज़ हैं जो न सिर्फ कई योजनाओं का लाभ दिलाने में मदद करते हैं बल्कि जमीन पर आप के मालिकाना हक का भी सबूत होती हैं। लेकिन इन्हें लेने के लिए लोगों को अक्सर बहुत परेशान होना पड़ता है। इंटरनेट से भूलेख निकलवाने की सुुविधा की राज्यों में है लेकिन कई लोगों को इस बारे में कोई जानकारी नहीं है कि ज़मीन के कागजा़त यानि भूलेख हासिल करने की प्रक्रिया अब बहुत आसान हो चुकी है।

इंटरनेट पर ही अब ये सारी जानकारियां मौजूद हैं। लोग इस तरह से अपना काफी समय और पैसा बचा सकते हैं,  देशभर में पढ़े जाने वाले सेक्शन ‘बात पते की’ में समझिए पूरा तरीका। (ये तरीके नीचे वीडियो में दिया गया है।)

कैसे मिलेगी जानकारी

  • उदाहरण के लिए अगर आपको उत्तर प्रदेश में जमीन से संबंधित कागज चाहिए तो सबसे पहले यूपी सरकार की वेबसाइट भूलेख http://upbhulekh.gov.in/ पर जाएं।
  • वेबसाइट के बाईं तरफ से चौथे ऑप्सन “खतौनी (अधिकार अभिलेख) की नकल देखें” पर क्लिक करें।
  • फिर आपके सामने एक छोटा से बॉक्स दिखेगा जिसमें आपको बांए तरफ एक छोटे से बॉक्स में दिए गए कोड को दाएं तरफ खाली बॉक्स में भरें। बॉक्स में दिए गए कोड को भरने के बाद ‘सबमिट’ बटन पर क्लिक करें।
  • अब आपके सामने एक नया पेज खुलकर आ जाएगा जिसमें जिलों के नाम लिखे होंगे।
  • अब आपको कॉलम में दिए गए जिलों में अपने जिले के नाम पर क्लिक करें।

  • जिले की सूची के बाद बनी तहसीलों की सूची से अपनी तहसील के नाम पर क्लिक करें।
  • इसके बाद सबसे दाईं ओर बनी सूची में अपने गाँव के नाम पर क्लिक करें और फिर उसके ठीक ऊपर लिखे आगे पर क्लिक करें।
  • अब एक नया पेज खुलेगा। अपनी खसरा खतौनी या खाता संख्या याद हो तो इस पेज पर इनके आगे बने गोलाकार बिंदुओं पर क्लिक करके खोजें पर क्लिक करें, आप चाहें तो अपने नाम से भी अपने भूलेख का खोज सकते हैं। खसरा संख्या और खाता संख्या के लिये दी गई जगह पर लिखने के लिए नीचे दिए गए अंकों वाले बॉक्स पर क्लिक करें और नाम से खोजने के लिये नीचे दिये गये अक्षरों पर क्लिक करके अपना नाम लिखें।
  • आपकी ज़मीन के भूलेख अब आपके सामने हैं। आप इसका प्रिंट आउट भी ले सकते हैं।

नोट : खसरा खतौनी निकालने का यह उदाहरण उत्तर प्रदेश भूलेख के लिए है। ऐसे ही आप भारत के किसी भी राज्य के भूलेख में जाकर अपने जमीन संबंधित कागजात डाउनलोड कर सकते हैं।

उदाहरण के लिए नीचे तीन राज्यों का का लिंक है.

हरियाणा से संबंधित जमीन के कागजात के लिए वहां की वेबसाइट हलरिस  हरियाणा  http://jamabandi.nic.in/land records/querylink.aspx पर क्लिक करें..

मध्य प्रदेश में जमीन, नक्शा और दूसरे कागजातों के लिए ये आयुक्त- भू-अभिलेख एवं बंदोबस्त, मध्य प्रदेश की वेबसाइट https://mpbhulekh.gov.in/Login.do# पर क्लिक करें..

बिहार के लोग जमीन संबंधित जानकारी के लिए यहां क्लिक करें.. http://164.100.150.10/biharbhumi/

कृत्रिम हाईड्रोजैल किसानों से धोखा, हर्बल हाईड्रोजैल कृषि की संजीवनी, हइड्रोजेल की मदद से सिर्फ एक सिंचाई से हो सकती है फसल

वर्षा आधारित कृषि व् गिरते जलस्तर की समस्या से जूझ रहे किसानों को राहत देने के नाम पर, कई प्राइवेट कम्पनियो के कृत्रिम रासायनिक हाईड्रोजैल(जलशक्ति, जेबा इत्यादि) बाजार में खूब बिक रहे है I इंडियन काउंसलिंग ऑफ एग्रीकल्चर रिर्सच (ICAR) ने भी पूसा हाईड्रोजैल नाम का एक कृत्रिम रासायनिक हाईड्रोजैल विकसित क़र, पिछले दस वर्ष से, उसे 1200-1500 रूपये प्रति किलो बेच रही हैI कृत्रिम रासायनिक हाईड्रोजैल के बारे में निम्नलिखित बड़े-2 झूठे दावे भी किये जा रहे है:-

  • एक ग्राम पूसा हाईड्रोजैल 500 ग्राम पानी अवशौषित करता है। इससे सिंचाई में पानी की 40 प्रतिशत तक बचत होती है। जो सिर्फ एक सिंचाई में फसलों को तैयार करेगा और जड़ों के पास पानी को सोखकर लंबे समय तक, पौधों को पानी की कमी भी नहीं होने देगा तथा बारिश व् सिंचाई के पानी को स्टोर करता है
  • पूसा हाईड्रोजैल एक एकड़ खेत में महज 1-2 किलोग्राम पर्याप्त है जो 2-5 वर्षों
    तक काम करता है ।
  • पूसा हाईड्रोजैल के इस्तेमाल से, मक्के, गेहूँ, आलू, सोयाबीन, सरसों, प्याज,
    टमाटर, धान, फूलगोभी, गाजर, गन्ने, हल्दी, जूट समेत अन्य फसलों में उत्पादकता बढ़ती है ।
  • पूसा हाईड्रोजैल, खाद के साथ तालमेल बिठा क़र, जमीन की सेहत सुधारने में भी
    मदद करता है।

अब अगर वैज्ञानिक सोच के साथ, पूसा हाईड्रोजैल और प्राइवेट कम्पनियो के हाईड्रोजैल के बारे में ऊपरलिखित झूठे दावों को परखा जाये, तो निष्कर्ष निकलता है की, कृत्रिम रासायनिक हाईड्रोजैल किसानों से सरासर धोखा है।

जिसे किसान भाई व् कोई भी वैज्ञानिक सोच का व्यक्ति अपने घर पर आसानी से परख सकता है जैसा की लेखक ने चित्र-1 में दिखाया है बाजार से दस ग्राम, ज़ेबा हाईड्रोजैल, पूसा हाईड्रोजैल और हर्बल हाईड्रोजैल (गूंद कतीरा-Tragacanth Gum) खरीद क़र ले आईये।

घर पर तीन कांच के गिलास ले और उन मे दो-2 ग्राम की दर से,एक गिलास में ज़ेबा हाईड्रोजैल, दूसरे में पूसा हाईड्रोजैल, तीसरे में हर्बल हाईड्रोजैल डाल क़र तीन चौथाई साफ पानी से भर दी जीये। आप देखेंगे की, ज़ेबा हाईड्रोजैल ने पांच मिनट में , पूसा हाईड्रोजैल ने 30 मिनट में, और हर्बल हाईड्रोजैल ने 60 मिनट में गिलास के सारे पानी को सोख कर, जैल में प्रवृतीत कर दिया।

अब सभी गिलास में दो-2 ग्राम की दर से जिप्सम पाऊडर ऊपर से छिड़क दीजिये। आप को जानकर आश्चर्य होगा की जिप्सम पाऊडर की रासायनिक क्रिया से, ज़ेबा जैल एक मिनट में, पूसा जैल 10 मिनट में, दूध की तरह फट कर, पानी में बदल जाता है

जब की हर्बल हाईड्रोजैल पर जिप्सम की रासायनिक क्रिया का कोई असर नहीं होता उसका जैल अपने स्वाभाविक रूप में ही रहता है।

इस साधारण से प्रयोग से ये साबित होता है की कृत्रिम रासायनिक हाईड्रोजैल कृषि उदेश्यो के लिये उपयुक्त तकनीक नहीं है कियोकि जिप्सम के रसायनिक तत्व लगभग सभी प्रकार की भूमि में मौजूद होते है शुष्क व् रेतली भूमि से तो जिप्सम को

निकाल कर व्यवसायिक व् औधोगिक कार्यो के लिये इस्तेमाल किया ही जाता है जबकि किसान सिचित भूमि में जिप्सम को खाद व् छारीय भूमि मिट्टी संशोधन के लिये वर्षो से  करते रहे है।

जबकि हर्बल हाईड्रोजैल (गूंद कतीरा-Tragacanth Gum) सभी प्रकार की भूमि के लिये उपयुक्त पाया गया है और आर्थिक रूप से सस्ता विकल्प ( सिर्फ दो सो रुपये प्रति किलो ग्राम) होने के साथ, पर्यावरण हितेषी भी है जिससे सिचाई पानी की बचतके साथ फसलों की लागत में भी बचत होती है ।

हरियाणा के रेतीले इलाके के गांव लिसना जिला रेवाड़ी के प्रगतिशील किसान श्री मनोज कुमार ने हर्बल हाईड्रोजैल लेपित बीज तकनीक अपनाकर अपने खेतो पर वर्षा आधारित धान सफलतापूर्वक उगा कर एक नयी मिसाल कायम की है । प्राकृतिक हाईड्रोजैल का प्रयोग सभी सभ्यताओं में आयुर्वेदिक चिकित्सा, कृषि इत्यादि कार्यो में आदि काल से हो रहा है।

कृत्रिम रासायनिक हाईड्रोजैल का प्रयोग भी लगभग सौ साल से चिकित्सा, प्रसाधन सामग्री, सैनिटरी नेपकिन, कृषि कार्यो के लिये पूरी दुनिया में हो रहा है। इस लिये हाईड्रोजैल कोई नया अविष्कार नहीं है जैसा की कुछ वैज्ञानिक व् प्राइवेट कंपनी अपने हाईड्रोजैल को बेचने के लालच में बढ़ा-चढ़ा क़र प्रसारित कर रही है।

कृषि में कृत्रिम रासायनिक हाईड्रोजैल के प्रयोग को लेकर दुनिया भर के पर्यावरणविद्ध बार-2 चेतावनी जारी करते रहे है कियोकि इस के निर्माण में उपयोग होने वाले पादर्थो से पर्यावरण दूषित होने और जीवो में कैंसर होने का खतरा बना रहता है। इस लिये कृषि कार्य के लिये प्राकृतिक हाईड्रोजैल के उपयोग की सलाह हमेशा दी जाती है ।

अब ऑनलाइन अपने उत्पाद बेच सकेंगे किसान, लॉन्च हुआ ये ऐप

उर्वरक निर्माता कंपनी इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर्स कोऑपरेटिव (इफ्को) ने किसानों के लिए ई-कॉमर्स प्लेटफार्म की शुरुआत की है. करीब 80 करोड़ की लागत और सिंगापुर बेस्ड कंपनी आईमंडी की साझेदारी से इफ्को ने ये प्लेटफार्म शुरू किया है. इसके लिए IFFCO iMandi नाम से ऐप और वेब पोर्टल शुरू किया गया है.

इफ्को ने एक बयान जारी कर बताया कि तकरीबन साढ़े पांच करोड़ किसान उसके इस नये ऐप इफ्को आईमंडी से फायदा उठा सकेंगे. इसके साथ ही इफ्को ने एक वेब पोर्टल की शुरुआत भी की.

इस सौदे के लिए इफ्को की सहयोगी इकाई इफ्को ई-बाजार लिमिटेड ने सिंगापुर की आईमंडी प्राइवेट लिमिटेड में 26 फीसदी हिस्सेदारी खरीदी है. बाकी 74 फीसदी हिस्सेदारी आई-टेक होल्डिंग्स एवं अन्य निवेशकों के पास है.

इस मौके पर कंपनी के प्रबंध निदेशक यूएस अवस्थी ने कहा कि देश भर में किसानों के बीच ऑनलाइन और डिजिटल लेन-देन के उपयोग का प्रचार-प्रसार करने के बाद इफ्को आईमंडी ऐप की शुरुआत कर रहा है. यह किसानों के लिए कृषि उत्पादों, उपभोक्ता उत्पादों (एफएमसीजी), इलेक्ट्रॉनिक्स, ऋण और बीमा आदि की खरीद के लिए वन स्टॉप शॉप होगा.

आईमंडी प्राइवेट लिमिटेड के संस्थापक वीके अग्रवाल ने इस मौके पर कहा कि इफ्को और आईमंडी इस बात को लेकर काफी आश्वस्त है कि भारतीय सहकारी डिजिटल प्लेटफार्म के माध्यम से हर एक घर और गांव में बड़े पैमाने पर सामाजिक बदलाव लाने में मदद मिलेगी. इसके साथ ही डिजिटल समावेशी तकनीक के चलते एक करोड़ लोग सशक्त हो सकेंगे.

अगले 48 घंटे में इन 10 राज्यों में भारी बारिश की चेतावनी, 6 राज्यों में अलर्ट

13 जुलाई यानी शुक्रवार को इंतजार के बाद दिल्ली-एनसीआर और लखनऊ में अच्छी बारिश से मौसम सुहाना हो गया है। IMD की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक, अगले 24 घंटों में दिल्ली-एनसीआर सहित उत्तर भारत के कुछ राज्यों में अच्छी बारिश होने के संकेत हैं।

वहीं मौसम विभाग ने अगले 48 घंटों में देशभर के 10 राज्यों में भारी बारिश की चेतावनी दी है। वहीं, 6 राज्यों के अलग-अलग इलाकों में अलर्ट भी जारी किया है।

13 से 14 जुलाई को कैसा रहेगा मानसून

  • 13 से 14 जुलाई के दौरान गुजरात, कोंकण और गोवा में भारी से बहुत भारी बारिश का अनुमान है।
  • उत्तराखंड, पूर्वी राजस्थान, पूर्वी मध्‍य प्रदेश, छत्तीसगढ़, सौराष्‍ट्र, महाराष्‍ट्र, तेलंगाना, कोस्टल कर्नाटक और केरल में भारी से भारी बारिश हो सकती है।
  • हिमांचल, दिल्ली, एनसीआर, चंडीगढ़, पंजरब, हरियाणा और ओडिशा में इन 24 घंटों में अच्छी बारिश होने का अनुमान है।

14 से 15 जुलाई को कैसा रहेगा मानसून

  • 14 से 15 जुलाई के दौरान भी गुजरात, कोंकण और गोवा में भारी से बहुत भारी बारिश का अनुमान है।
  • 14 से 15 जुलाई के दौरान पूर्वी मध्‍य प्रदेश, छत्तीसगढ़, सौराट्र, कच्छ, मध्‍य महाराष्‍ट्र, कोस्टल कनाटक, इंटीरियर कर्नाटक और केरल में भारी से भारी बारिश का अनुमान है।
  • वहीं, उत्तराखंड, ओडिशा, पश्चिमी मध्‍य प्रदेश, विदर्भ और तेलंगाना में भारी बारिश हो सकती है।

इन राज्यों में अलर्ट

मौसम विभाग की वेबसाइट के अनुसार उत्तराखंड, मध्‍य प्रदेश, पूर्वी व उत्तरी गुजरात, केरल, महाराष्‍ट्र, केरल और तेलंगाना में भारी बारिश को लेकर ऑरेंज या रेड अलर्ट जारी किया गया है।

कैंसर व एड्स से लड़ेगा हरियाणा कृषि विवि का उगाया खास शिटाके मशरुम

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (एचएयू) के विशेषज्ञों ने मशरूम की प्रजाति उगाई है जाे कैंसर और एड्स जैैसे भयानक रोगों से लड़ेगा। एचएयू के विशेषज्ञों के साथ मिलकर हरियाणा के किसानों ने इस शिटाके मशरूम का सस्ता उत्पादन शुरू किया है।

यह मशरूम कैंसर की दवा लैंटाइनन का मुख्य स्रोत है। शिटाके रिच एंटीऑक्सीडेंट का स्रोत होने के कारण शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है, जिससे एड्स व कैंसर जैसी बीमारियों को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।

एचएयू के विज्ञानियों ने इस मशरूम के उत्पादन की सस्ती और आसान तकनीक ईजाद की है ताकि कम आय वाले किसान भी इसका उत्पादन कर न सिर्फ अच्छी कमाई कर सकें और स्वस्थ भारत मुहिम में भी हिस्सेदार बनें। एचएयू के प्रमुख विज्ञानी डॉ. सुरजीत सिंह ने बताया कि आम तौर पर छह से नौ माह में तैयार होने वाले इस शिटाके मशरूम को एचएयू के विज्ञानियों ने महज 90 दिनों में इसके उत्पादन का तरीका ईजाद किया है।

बता दें कि दिल्ली व अन्य बड़े शहरों में इस रोग प्रतिरोधक मशरूम की काफी डिमांड है। फिलहाल शिटाके मशरूम की मांग को कुछ हद तक हिमाचल प्रदेश पूरा कर रहा है। हिमाचल के किसान करीब दो हजार रुपये किलो के दाम में इसे बेचते हैं और इससे यह मध्य वर्ग की पहुंच से दूर हो जाता है।

इस प्रकार उगा सकते हैं यह खास मशरूम

  • इस मशरूम को एक झोपड़ी में भी उगाया जा सकता है। जिस स्थान पर यह मशरूम लगाना है उस कमरे की नमी 90 फीसद होनी चाहिए। इसके लिए कमरे में पानी का छिड़काव किया जा सकता है।
  • सबसे पहले लकड़ी के बुरादे को एक लिफाफे में एकत्रित करना है। उसके बाद आटो क्लेव मशीन से 121 डिग्री तापमान देकर इस बुरादे को रोगाणु रहित किया जाता है। एक घंटे तक इस बुरादे को गर्मी दी जाती है।
  • इसके बाद इस बुरादे को ठंडा करके इसमें शिटाके मशरूम का बीज लगाया जाता है। बीज लगाने के बाद नमी का विशेष तौर पर ध्यान रखना चाहिए। 70 से 90 दिन में यह मशरूम तैयार हो जाती है। शिटाके मशरूम का बीज एचएयू में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। विशेषज्ञों की मानें तो एक किलो मशरूम का उत्पादन लागत करीब 150 रुपये आएगी।

मार्केट में आसानी से उपलब्ध है ऑटो क्लेव मशीन

ऑटो क्लेव मशीन मार्केट में आसानी से मिल जाती है। इसकी छोटी मशीन की कीमत डेढ़ लाख से शुरू है। इसी मशीन के जरिये लकड़ी के बुरादे को रोगाणु रहित किया जाता है। यह प्रेशर कुकर की तरह काम करती है।

सर्दी में उगा सकते हैं किसान

डॉ. सुरजीत सिंह ने बताया कि आमतौर पर यह मशरूम ठंडे इलाकों में पैदा होती है। हरियाणा के किसान सर्दियों में इसे लगा सकते हैं। दिसंबर में इसकी खेती शुरू करें तो मार्च तक यह तैयार हो जाती है। अभी बाजार में मशरूम की जो प्रजातियां मौजूद हैं उनकी लागत इस मशरूम से अधिक है।

जैविक खेती या उत्पाद का प्रमाणपत्र लेने का तरीका, ऑर्गेनिक सर्टिफिकेट देने वाली एजेंसियां के नाम और नंबर भी जानिए

कैसे जाने की कोई जैविक खाद या कीटनाशक पूर्णता जैविक है और उसकी सत्यता कितनी सत्य है। ऐसे में जैविक खेती के मापदंडों को लागू करवाने के लिए हमारी केंद्र सरकार का विभाग केंद्रीय आयात निर्यात नियंत्रण बोर्ड एपीडा इसके लिए सक्षम एजेंसी है और एपीडा ने भारत भर में 30 एजेंसियों को इसके लिए नियुक्त किया हुआ है।

किसी भी खाद्य पदार्थ या फर्टिलाइजर या कीटनाशी के जैविक होने के लिए इन 30 संस्थाओं में से किसी एक से सर्टिफिकेशन होना जरूरी है तभी उस उत्पाद को जैविक माना जाएगा तो कोई भी किसान भाई कोई भी खाद्य पदार्थ जैविक खाद जैविक कीटनाशक खरीदते समय उस पर इन 30 एजेंसियों में से किसी एक का नाम ,मोनो ,होलोग्राम जरूर देख मैंने मेरे फॉर्म कुशल मंगल जैविक फॉर्म करताज जिला नरसिंहपुर मध्य प्रदेश 487110 मोबाइल 94254 48313 का सर्टिफिकेशन MPSOCA से करवाया हुआ है हम इन सभी 30 एजेंसियों के नाम तथा लोगो आप सभी को बता रहे है।

जिसमें आपको सही जैविक उत्पाद पहचानने में मदद मिले सभी किसान भाइयों के पास हर एक-दो दिन में कोई ना कोई जैविक खाद का दावा करने वाला व्यक्ति पहुंचता है उससे यह जरूर पूछें कि आपका उत्पाद किस सर्टिफिकेशन एजेंसी से सर्टिफाइड है सर्टिफिकेशन और सर्टिफाइड को बेहतर तरीके से समझना बहुत जरूरी है उनकी लिस्ट आपके सामने प्रस्तुत है।

ऑर्गेनिक सर्टिफिकेट देने वाली एजेंसियां

  • BUREAU VARITAS CERTIFICATION INDIA
  • ECOCERT
  • IMO CONTROL
  • INDOCERT
  • LACON QUALITY CERTIFICATION
  • ONECERT ASIA AGRI CERTIFICATION
  • SGS INDIA
  • CONTROL UNION CERTIFICATION
  • UTTARANCHAL STATE ORGANIC CERTIFICATION AGENCY
  • APOF ORGANIC CERTIFICATION AGENCY

  • RAJASTHAN ORGANIC CERTIFICATION AGENCY
  • VEDIC ORGANIC CERTIFICATION AGENCY
  • INDIAN SOCIETY FOR CERTIFICATION OF ORGANIC
  • PRODUCTS
  • FOODCERT INDIA
  • ADITI ORGANIC CERTIFICATIONS
  • CHHATTISGARH CERTIFICATION SOCIETY
  • TAMIL NADU ORGANIC CERTIFICATION DEPARTMENT
  • INTERTEK INDIA
  • MADHYA PRADESH STATE ORGANIC CERTIFICATION AGENCY

  • ODISHA STATE ORGANIC CERTIFICATION AGENCY
  • NATURAL ORGANIC CERTIFICATION AGRO
  • FAIRCERT CERTIFICATION SERVICES
  • GUJARAT ORGANIC PRODUCTS CERTIFICATION AGENCY
  • UTTAR PRADESH STATE ORGANIC CERTIFICATION AGENCY
  • KARNATAKA STATE ORGANIC CERTIFICATION AGENCY (KSOCA)
  • SIKKIM STATE ORGANIC CERTIFICATION AGENCY (SSOCA)
  • Global Certification Society
  • GREENCERT

बिओसॉलूशन्स साथ में दिए गए फोटो में सभी एजेंसियों के सक्षम अधिकारी के फोन नंबर ईमेल एड्रेस आदि दिए गए हैं आप उनसे भी बात करके प्रोडक्ट आदि की सत्यता की जांच कर सकते हैं ।

इस पोस्ट को डालने का उद्देश्य मात्र यह है कि किसानों को कदम कदम पर बेवकूफ बनाने के लिए गिरोह घूम रहे हैं यदि आप इस दिशा में काम कर रहे हैं तो पूरी जानकारी अपने पास अपने फोन आदि में हमेशा सुरक्षित रखें।

जिससे सही प्रोडक्ट आदि की तकदीर की जा सके, पहला जो प्रथम होलोग्राम है वह एपीडा का है आखरी में एक ही चित्र में जो छोटे-छोटे होलोग्राम बने हुए हैं वह कुछ देसी और कुछ विदेशी सर्टिफिकेशन एजेंसियों के होलोग्राम है जो कि भारत में भी काम कर रहे हैं जिनके प्रोडक्ट और सर्टिफिकेशन भारत में हमें देखने को मिलते हैं।

88 साल की उम्र में भारतीय कि‍सान ने खरीदी Mercedes-Benz, पूरा कि‍या बचपन का सपना

आप अपनी सपनों की कार के लि‍ए क्या 80 साल तक इंतजार कर सकते हैं। शायद नहीं लेकिन भारत के एक किसान ने ऐसा किया है। तमि‍लनाडु के कि‍सान एच. देवराजन (उम्र 88 साल) ने हाल ही में मर्सडीज-बेंज बी-क्‍लास को खरीदा है।

लग्‍जरी कार ब्रांड के डीलरशि‍प नेटवर्क मर्सडीज-बेंज ट्रांस कार इंडि‍या ने एच. देवराजन के बारे में वीडि‍यो यूट्यूब पर जारी किया है। देवराजन ने कहा कि‍ जब वह 8 साल के थे तब उन्‍होंने पहली बार इस ब्रांड को देखा था और तभी से वह इससे प्‍यार करने लगे।

ब्रांड का नाम नहीं जानते थे

देवराजन ने कहा कि‍ मैं साइकि‍ल से चलता था। जब मैं आठ साल का था, तब मैंने पहली बार मर्सडीज-बेंज कार देखी। मैं ब्रांड का नाम नहीं जानता चाहता था, लेकि‍न मुझे उसके logo से प्यार हो गया। अपने 16 भाई-बहनों में अकेले वहीं हैं जि‍न्‍होंने अपने सपने को पूरा कि‍या। उन्‍होंने कहा कि‍ मेरा सपना पूरा हो गया।

मर्सडीज के logo का केक

ट्रांस कार इंडि‍या के स्‍टाफ ने उनके ‘लाइफटाइम अचि‍व्‍मेंट’ को सेलिब्रेट करने के लि‍ए आईकॉनि‍क मर्सडीज logo के साथ केक भी दि‍या। देवराजन ने कहा कि‍ मैं अपनी पत्‍नी के 100 फीसदी सपोर्ट का कर्जदार हूं। मैं ट्रांस कार इंडि‍या की टीम के सपोर्ट का भी शुक्रि‍या अदा करता हूं।

मर्सडीज-बेंज बी-क्‍लास के बारे में

मर्सडीज-बेंज बी-क्‍लास एमपीवी और हैचबैक के बीच की क्रॉसओवर व्‍हीकल है, जो कि‍ ज्‍यादातर भारतीय परि‍वारों की जरूरतों को पूरा करती है। यह ऊंची डि‍जाइन के साथ हाई रूफ वाली कार है जि‍समें आसानी से उम्रदार लोग बैठ सकते हैं। साथ ही, इसके काफी स्‍पेस भी मि‍लता है।

तमि‍लनाडु में बी-क्‍लास की एक्‍स-शोरूम कीमत 32 लाख रुपए से शुरू होती है। यह कार पेट्रोल और डीजल दोनों इंजन ऑप्‍शन के साथ बेची जाती है। यह कार केवल ऑटोमैटि‍क ट्रांसमि‍शन के साथ ही आती है।

इस बार गेहूं से भी महंगा बिकेगा धान ,केंद्र सरकार इतने रु बढ़ा सकती है धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य

सरकार 2019 के आम चुनाव से पहले किसानों को लुभाने के लिए धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को बढ़ाने पर विचार कर रही है। सूत्रों के मुताबिक सरकार 2018-19 फसल वर्ष (जुलाई-जून) के लिए प्रमुख खरीफ फसल धान के एमएसपी को 13 फीसदी बढ़ाकर 1,750 रुपये प्रति क्विंटल कर सकती है। देश में गर्मियों में बोए जाने वाले फसलों को खरीफ फसल कहा जाता है। उन्होंने कहा कि अन्य 13 खरीफ फसलों के एमएसपी में भी भारी वृद्धि की जा सकती है।

इस मामले में इसी सप्ताह फैसला लिया जा सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले सप्ताह कहा था कि मंत्रिमंडल आगामी बैठक में एमएसपी को बढ़ाकर उत्पादन लागत का कम से कम डेढ़ गुना करने की मंजूरी देगा। सूत्रों के मुताबिक 2018-19 फसल वर्ष के लिए कॉमन ग्रेड धान के एमएसपी में प्रति क्विंटल करीब 200 रुपये बढ़ोतरी करने का प्रस्ताव है।

चालू फसल वर्ष के लिए धान का एमएसपी कॉमन ग्रेड के लिए 1,550 रुपये प्रति क्विंटल और ए ग्रेड किस्म के लिए 1,590 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है। आम तौर पर बुआई शुरू होने से ठीक पहले एमएसपी की घोषणा की जाती है। खरीफ फसलों की बुआई दक्षिण-पश्चिम मानसून के आगमन के साथ शुरू होती है और कटाई अक्तूबर से शुरू होती है।

खरीफ फसलों की बुआई शुरू हो चुकी है। सूत्रों के मुताबिक सरकार ने खरीफ फसलों के एमएसपी की घोषणा में इसलिए देरी की है, क्योंकि वह राजकोष पर भारी बोझ को देखते हुए इतने बड़े राजनीति फैसले को लेने या न लेने पर मंथन कर रही है।

सूत्रों ने कहा कि बंपर उत्पादन के कारण अधिकतर फसलों की कीमत गिरने से किसानों के लिए बढ़ रही मुसीबत को देखते हुए कृषि मंत्रालय ने सरकारी परामर्शदाता निकाय सीएसीपी की सिफारिश के मुकाबले अधिक कीमत दिए जाने का प्रस्ताव रखा है। इस साल के आम बजट में सरकार ने घोषणा की थी कि वह उत्पादन लागत का कम से कम डेढ़ गुना समर्थन मूल्य निर्धारित करेगी। 2014 के आम चुनाव में यह भाजपा का चुनावी वादा था।

एमएसपी बढ़ाए जाने के विरोध में हैं विशेषज्ञ

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि धान के एमएसपी में बड़ी बढ़ोतरी करने से भारत का चावल उत्पादन और बढ़ सकता है, जो फसल वर्ष 2017-18 में 11.1 करोड़ टन के सर्वकालिक ऊपरी स्तर पर पहुंच चुका है और उत्पादन घरेलू मांग से काफी अधिक है। धान की खेती को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए। चावल उत्पादन बढ़ने से सरकार की खरीद बढ़ेगी, जिससे खाद्य सब्सिडी खर्च भी बढ़ेगा।

गुलाब की खेती से गुलाबी हुए काश्तकारों के चेहरे, कर रहे इतनी कमा

गुलाब की खेती चमोली जिले के चीन सीमा से लगे जोशीमठ ब्लॉक के ग्रामीणों के लिए आर्थिकी का सबल जरिया बन गई है। यात्रा सीजन होने के कारण एक-एक गुलाब सौ-सौ रुपये तक में बिक रहा है। साथ ही गुलाब के तेल से भी ग्रामीणों की अच्छी आमदनी हो रही है। अब तक ग्रामीण गुलाब का तेल बेचकर तीन लाख रुपये की कमाई कर चुके हैं।

जोशीमठ ब्लॉक के भोटिया जनजाति बहुत ग्रामीण क्षेत्रों में लोग अन्य फसलों के साथ गुलाब की खेती पर विशेष ध्यान दे रहे हैं। असल में यह नकदी फसल बाहुल्य क्षेत्र है। लोग यहां आलू, राजमा व चौलाई की खेती के अलावा सेब, आड़ू, खुबानी, पुलम आदि की बागवानी भी करते हैं।

गांवों के जंगल से सटे होने के कारण फसलों को जंगली जानवर तबाह कर देते हैं। रही-सही कसर पूरी कर देता है मौसम। ऐसे में फसल का दो तिहाई हिस्सा भी बामुश्किल काश्तकारों को मिल पाता है। इसी को देखते हुए काश्तकारों ने गुलाब की खेती शुरू की है।

उन्होंने गुलाब के पौधे खेतों के चारों ओर लगाए हैं और बीच में बोई जाती हैं नकदी फसलें। गुलाब के पौधों पर कांटे होने के कारण यह घेरबाड़ का काम भी कर रहे हैं। अच्छी बात यह है कि गुलाब को बाजार भी हाथोंहाथ मिल रहा है।

एक साल में 35 क्विंटल गुलाब जल

ग्रामीण गुलाब से तेल भी निकाल रहे हैं। सगंध पौधा केंद्र सेलाकुई (देहरादून) की ओर से काश्तकारों को 13 आसवन संयंत्र निश्शुल्क दिए गए हैं। इनसे काश्तकारों ने इस साल 35 क्विंटल गुलाब जल तैयार किया है। सौंदर्य प्रसाधन से जुड़ी कंपनियां काश्तकारों से सीधे गुलाब जल खरीद रही है। साथ ही स्थानीय बाजार में भी गुलाब जल की खासी मांग है। बदरीनाथ व हेमकुंड साहिब आने वाले यात्री गुलाब जल को हाथोंहाथ खरीद रहे हैं।

गुणवत्ता में उत्तम दमिश्क, हिमरोज व नूरजहां

क्षेत्र में समुद्रतल से 5000 फीट की ऊंचाई पर उगने वाले दमिश्क, हिमरोज व नूरजहां प्रजाति का गुलाब उगाया जा रहा है। गुलाब की ये प्रजातियां हर्बल के साथ ही उच्च गुणवत्ता वाली भी मानी जाती हैं। इनका एक पौधा 15 साल तक फूल देता है।

इन गांवों में हो रही गुलाब की खेती

जोशीमठ ब्लॉक के द्वींग, तपोण, सलूड़, सुनील, परसारी, मेरग, तपोवन, लाता आदि गांवों में गुलाब की खेती हो रही है। इन गांवों की देखादेखी अब अन्य गांवों के लोग भी गुलाब उगा रहे हैं।

बना रहे हैं गुलाब तेल

परसारी निवासी किसान नरेंद्र सिंह बिष्ट के मुताबिक गुलाब की खेती हमारे लिए वरदान साबित हो रही है। मैं अब तक चार क्विंटल गुलाब जल का उत्पादन कर चुका हूं। इसके अलावा संयंत्र से गुलाब का तेल भी बनाया है। इससे मुझे एक लाख रुपये की आमदनी हुई है।

वहीं, सगंध पौधा केंद्र सेलाकुई देहरादून के वैज्ञानिक सुनील साह के अनुसार काश्तकार गुलाब की खेती कर हजारों बेहतर मुनाफा कमा रहे हैं। गुलाब जल के साथ-साथ गुलाब के तेल का उत्पादन भी काश्तकार करने लगे हैं।