Alert ! देश के इन 21 राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट जारी

देश में जहां बारिश ने कई हिस्सों में भारी तबाही मचाई हुई है। वहीं कई हिस्से ऐसे भी हैं जहां या तो सूखा पड़ा है या फिर सामान्य से भी कम बारिश हुई है। अगर बारिश से मची भारी तबाही की बात करें तो केरल की स्थिति दयनीय है ।

यहां बीते 24 घंटे में बारिश और भूस्खलन से 26 मौतें हो चुकी हैं। इनमें 11 लोग इडुक्की जिले के हैं। मलबे से दो लोगों को जिंदा निकाला गया है। वहीं अमेरिका ने आज एक परामर्श जारी कर अपने नागरिकों से कहा कि वह बारिश और बाढ़ से जूझ रहे केरल की यात्रा पर जाने से बचें। वही दूसरी तरफ मौसम विभाग ने अगले तीन दिन तक 21 राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट जारी किया है।

उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, झारखंड, बिहार, पश्चिमी बंगाल, सिक्किम, मध्यप्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, नगालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और अंडमान निकोबार द्वीप समूह शामिल हैं। वहीं पूरे देश में अभी तक सामान्य से 10 फीसदी कम बारिश हुई है। 47 फीसदी हिस्सा ऐसा है जहां सामान्य बारिश हुई है। वहीं 39 फीसदी हिस्से में कम बारिश हुई है।

भारी बारिश के कारण कई नदियां उफान पर हैं जिस कारण राज्य के विभिन्न हिस्सों में कम से कम 24 बांधों को खोल दिया गया है। एशिया के सबसे बड़े अर्ध चंद्राकार बांध इडुक्की जलाशय से पानी छोड़े जाने से पहले रेड अलर्ट जारी कर दिया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केरल में भारी वर्षा एवं बाढ़ के आलोक में गुरुवार को मुख्यमंत्री पिनराई विजयन से बातचीत की और प्रभावित लोगों के लिए सभी संभव सहायता की पेशकश की।

जिन राज्यों ने बारिश ने भारी तबाही मचाई हुई है उनमें उत्तराखंड का भी नाम शामिल है। बारिश के कारण कैलाश मानसरोवर यात्रा प्रभावित हुई है। इस दौरान भूस्खलन आने से राज्य की 150 से अधिक सड़कें भी ब्लॉक हो चुकी हैं। जिस कारण चारधाम यात्रा रोकनी पड़ी। वहीं ऋषिकेश-यमुनोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग भी बीते एक सप्ताह से प्रभावित है। मौसम विभाग ने राज्य में अगले तीन दिनों में भारी बारिश का अनुमान जताया है।

एग्री बिजनेस के गुर के साथ ऑर्गेनिक फार्मिंग सीख ऐसे कमाए पैसा , सरकार दे रही है ट्रेनिंग, ऐसे करे अप्लाई

पिछले कुछ सालों में एग्री प्रोडक्‍ट्स (Agri Business) खासकर ऑर्गेनिक (Organic) की डिमांड काफी बढ़ी है। एक रिपोर्ट बताती है कि साल 2020 तक देश में ऑर्गेनिक मार्केट 12 हजार करोड़ रुपए को छू लेगा। देश ही नहीं, विदेशों में भी ऑर्गेनिक प्रोडक्‍ट्स की डिमांड बढ़ रही है। इसी संभावना को देखते हुए केंद्र सरकार द्वारा बेरोजगार युवाओं को एग्री बिजनेस के गुर सिखाए जा रहे हैं। इसमें,ऑर्गेनिक फार्मिंग की बारीकियां भी बताई जाएंगी।

आप भी दो दिन की यह ट्रेनिंग ले सकते हैं। ट्रेनिंग मिनिस्‍ट्री ऑफ स्किल डेवलपमेंट द्वारा संचालित निसबड इंस्‍टीट्यूट द्वारा दी जा रही है। इस दो दिन की ट्रेनिंग के लिए 7000 रुपए फीस ली जा रही है। आइए, आज आज हम आपको बताएंगे कि ऑर्गेनिक फार्मिंग क्‍या है और इसका बिजनेस कैसे किया जा सकता है।

क्‍या है ऑर्गेनिक फार्मिंग

ऑर्गेनिक फार्मिंग टॉक्सिक लोड कम करती है। हवा, पानी, मिट्टी से केमिकल को हटाकर फसल पैदा करने की प्रक्रिया को ऑर्गेनिक फार्मिंग कहा जाता है। जो इन्‍वायरमेंट फ्रेडली होती है, नेचर को नुकसान नहीं पहुंचाती और हमारे शरीर के लिए पूरी तरह फिट होती है।

पिछले कुछ सालों में हमारे देश वासी अपनी हेल्‍थ के प्रति काफी जागरूक हो गए हैं और ऐसे प्रोडक्‍ट्स को अपना रहे हैं, जो उनके शरीर के साथ-साथ इन्‍वायरमेंट को नुकसान नहीं पहुंचाते हों। हालांकि कैमिकल के इस्‍तेमाल से पैदा होने वाले फूड प्रोडक्‍ट्स सस्‍ते होते हैं। बावजूद इसके, जागरूकता के चलते ऑर्गेनिक फार्मिंग से पैदा प्रोडक्‍ट्स की डिमांड बढ़ रही है।

सरकार दे रही है ट्रेनिंग

सरकार ने देश में ऑर्गेनिक फार्मिंग बिजनेस को प्रमोट करने के लिए ट्रेनिंग प्रोग्राम तैयार किया है। केंद्र सरकार की मिनिस्‍ट्री ऑफ स्किल डेवलपमेंट के अंतर्गत चल रहे इंस्टिट्यूट निसबड ने यह प्रोग्राम तैयार किया है। निसबड द्वारा 18 व 19 अगस्‍त को इसकी ट्रेनिंग दी जाएगी। जिसकी फीस 7000 रुपए रखी गई है।

क्‍या मिलेगी ट्रेनिंग

  • ऑर्गेनिक फार्मिंग का सिद्धांत
  • ऑर्गेनिक एग्रीकल्‍चर का वर्तमान परिदृश्‍य
  •  ऑर्गेनिक फार्मिंग क्‍यों
  • ऑर्गेनिक फार्मिंग के फायदे
  •  पारंपरिक खेती को ऑर्गेनिक खेती में कैसे बदलें
  • इनपुट मैनेजमेंट
  • सीड एवं प्‍लांटिंग मैनेजमेंट
  •  ऑर्गेनिक फार्मिंग सर्टिफिकेशन कैसे हासिल करें
  •  न्‍यूट्रिशियन मैनेजमेंट
  • ऑफ फार्म टैक्‍नोलॉजी इनपुट
  • ऑर्गेनिक फील्‍ड एवं क्रॉप मैनेजमेंट

कैसे शुरू करें बिजनेस

आप ऑर्गेनिक फार्मिंग की बेसिक बातें सीखकर एग्री बिजनेस शुरू कर सकते हैं। ट्रेनिंग के दौरान एग्री बिजनेस के बारे में बताया जाएगा। जैसे कि –

  • स्‍टार्ट अप इंडिया मुहिम के तहत एग्री बिजनेस को कैसे जोड़ा जाए
  • एग्री एंटरप्रेन्‍योर कौन हो सकते हैं
  •  एग्री बिजनेस का ओवरव्‍यू, मार्केट साइज, संभावनाएं, डेयरी, ऑर्गेनिक फार्मिंग प्रोडक्‍ट्स, फूड प्रोसेसिंग, पॉल्‍यूटरी एवं सहायक मार्केट
  •  कैसे शुरू किया जाए एग्री बिजनेस
  • फार्म से रिटेल यूनिट तक सप्‍लाई चेन कैसे बनाएं
  • अपने प्रोडक्‍ट्स को बेचने के लिए सोशल मीडिया का इस्‍तेमाल कैसे करें
  • ऑर्गेनिक फूड प्रोडक्‍ट्स के लिए फॉरेन मार्केट तक कैसे पहुंच बनाएं
  • अपने बिजनेस का बढ़ाने के लिए सरकारी स्‍कीमों का लाभ कैसे लें।
  • इसके अलावा ट्रेनिंग के दौरान डेयरी बिजनेस की भी बारीकियां बताई जाएंगी।

कैसे करें अप्‍लाई

अगर आप इस ट्रेनिंग प्रोग्राम में शामिल होना चाहते हैं तो आप इस लिंक पर क्लिक करके रजिस्‍ट्रेशन संबंधी जानकारी ले सकते हैं या फार्म भर सकते हैं।

https://www.niesbud.nic.in/

किसानों की आमदनी बढ़ा रहें है ये 3 Mobile App ,ऐसे करें इस्‍तेमाल

किसानों को जितना नुकसान मौसम और सूखे से नहीं होता, उतना सही समय पर सही सूचना न मिलने से होता है। लेकिन अब बाजार में कई ऐसे ऐप आ गए हैं जिससे किसान खेती से जुड़ी हर जानकारी हो लेकर अपडेट रह सकते हैं। इसमें मौसम से लेकर मंडी तक का अपडेट रहता है। अगर किसान इन ऐप का इस्‍तेमाल करें तो न सिर्फ उनका नुकसान कम होगा बल्कि उनकी आमदनी भी बढ़ सकती है।

अच्‍छी फसल का फायदा भी नहीं ले पाते किसान

कई बार बाढ़ से तो कई बार सूखे से किसानों की फसल चौपट हो जाती है। लेकिन जब अच्‍छी फसल होती है, तो उस वर्ष फसल के दाम गिर जाते हैं। ऐसेे में भी कई बार किसान अच्‍छा फायदा नहीं ले पाते हैं। हालांकि किसान अगर इन ऐप का इस्‍तेमाल करें तो अपनी फसल की अच्‍छी कीमत घर बैठे पा सकता है।

मोबाइल ऐप दे रहे जानकारी

कई कंपनियों और स्‍टार्टअप ने मोबाइल ऐप तैयार किए हैं। यह किसानों से जुड़ी पूरी जानकारी दे रहे हैं। इसमें फसल का रेट कहां क्‍या है, यह जानकारी सबसे महत्‍वपूर्ण है। इससे किसान घर बैठे जानकारी कर सकता है कि उसकी फसल का सही रेट कहां मिल सकता है। इसके अलावा किसान यह भी जान सकता है कि कौन उस फसल को खरीदेगा।

मिलती हैं अन्‍य जानकारियां भीं

इन ऐप से आपको सरकारी की कृषि से जुड़ी सब्सिडी की जानकारी भी मिलती है। इस आधार पर भी आप अपनी पैदावार से ज्‍यादा फायदे में बदल सकते हैं। इसके अलावा मौसम की जानकारी भी आपको कौन सी फसल लगानी चाहिए, यह फैसला करने में मदद कर सकती है। इसके अलावा मिट्टी से जुड़ी जानकारी, फूड प्रोसेसिंग यूनिट, रिटेलर सहित एग्री मार्केटिंग की जानकारी भी मिल सकती है।

कई ऐप हैं बाजार में

IFFCO किसान संचार

IFFCO का ऐप किसान संचार के नाम से है। इससे अभी तक 40 लाख किसान जुड़ चुके हैं। इस एेप में फसलों सहित अन्‍य कृषि से जुड़ी चीजों के रेट, मौसम की भविष्‍यवाणी, मिट्टी के टेस्‍ट सहित जानवरों की देखरेख तक की जानकारी आसानी से ली जा सकती है। यह ऐप एयरटेल के सिम पर उपलब्‍ध है और इसके लिए कंपनी मामूली सा चार्ज लेती है।

RML एजीटेक

इस ऐप से अभी तक 12 लाख किसान जुड़ चुके हैं। इस ऐप में फसलों के दाम के अलावा उसके भाव का ट्रेंड, फसल के ट्रेंड के अलावा फसल की सुरक्षा की जानकारी दी जाती है। हालांकि यह ऐप फ्री है, लेकिन इसके कुछ फीचर के इस्‍तेमाल के लिए पैसे देने पड़ते हैं।

वोडा किसान मित्र

इस ऐप में मंडियों का भाव, सरकारी सब्सिडी सहित अन्‍य जानकारी और मौसम की जानकारी मिलती है। इसके अलावा किसानों से जुड़ी कई अन्‍य जानकारी भी मिलती हैं। यह ऐप वोडा के कनेक्‍शन के साथ मिलता है। इसके लिए 9 रुपए की फीस ली जाती है।

फोन पर भी जानकारी लेने का विकल्‍प

कई ऐप ऐसे भी हैं जो फोन पर भी जानकारी लेने का विकल्‍प देते हैं।

IARI M-Krishi

इस एेप से अभी तक करीब 50 हजार किसान जुड़ चुके हैं। इस ऐप के माध्‍यम किसान SMS से जानकारी ले सकते हैं। अगर किसी किसान को लगता है कि उसे और जानकारी की जरूरत है, तो वह ऐप से जुड़े कॉलसेंटर से फोन करके और जानकारी ले सकता है। इसमें देशभर में लगने वाले किसान मेलों की जानकारी भी दी जाती है। यह ऐप बिल्‍कुल फ्री है।

क्रोपिन (CROPIN)

इस ऐप से करीब 5 लाख किसान फायदा उठा रहे हैं। इस ऐप से कृषि कारोबार से जुड़ी जानकारी दी जाती है। इस ऐप को लाने वाली कंपनी ने करीब 120 बड़ी कंपनियों से समझौता किया है, जो कृषि कारोबार से जुड़ी हैं। यह ऐप फ्री में डाउनलोड किया जा सकता है, इस ऐप के कुछ फीचर का इस्‍तेमाल फीस देने के बाद ही किया जा सकता है।

HANDYGO

इस ऐप से अभी तक करीब 30 लाख किसान जुड़े हैं। इस ऐप में किसानों को IVRS मॉडल से कॉल करके जानकारी की सुविधा मिलती है। इसमें किसान कृषि से जुड़ी जानकारी के अलावा मौसम, बीज और फसल सुरक्षा की जानकारी ले सकते हैं। इस एेप से जुड़े कॉल सेंटर पर फोन करने पर 1 से लेकर 2 रुपए प्रति मिनट का चार्ज देना पड़ता है।

मेंथा किसानों की बल्ले-बल्ले, इतने रुपए किलो में बिका तेल

मौजूदा सीजन मेंथा किसानों के लिए कमाई वाला साबित हो रहा है। इस पेराई सीजन में मेंथा की कीमतें 1600 रुपए प्रति किलो तक पहुंच चुकी हैं। पिछले 15 दिनों से ये कीमतें 1400 से 1600 रुपए के बीच बनी हुई हैं। मेंथा से इस साल हुई आय से न सिर्फ अगले वर्ष मेंथा का रकबा बढ़ेगा, बल्कि इस वर्ष आलू की फसल ज्यादा बोई जाएगी।

“ये सीजन मेंथा के लिए बहुत अच्छा गया है। जिन किसानों ने सीमैप या दूसरी उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल किया है, उनका उत्पादन प्रति एकड़ 60 किलो तक उत्पादन हुआ है, अगर 1500 रुपए का भी रेट मिला तो करीब 90 हजार रुपए मिले, जिसमें से अगर 31,250 रुपए की लागत निकाल दें तो भी करीब 58000 रुपए का किसानों को शुद्ध मुनाफा होने की उम्मीद है।”

डॉ. सौदान सिंह कहते हैं। डॉ. सिंह मेंथा की नई किस्में और तकनीकी विकसित करने वाली सरकारी संस्था सीमैप में मुख्य वैज्ञानिक हैं। यूपी, बिहार, उत्तराखंड और पंजाब समेत कई राज्यों में इस बार मेंथा की फसल ली गई। मेंथा के गढ़ यूपी के बाराबंकी समेत कई जिलों में किसान पहली चक्र की कटाई कर दूसरे की तैयारी में लगे हुए। मेंथा की रोपाई फरवरी-मार्च में की जाती है।

जिससे 90 दिन में पहली कटाई हो जाती है। मेंथा की सूखी पत्तियों का आसवन कर तेल निकाला जाता है। एक मोटे अनुमान के मुताबिक दुनिया में प्रति वर्ष करीब 40,000 टन तेल की मांग है, जबकि भारत में अभी भी सिर्फ 25,000 टन का उत्पादन हो रहा है, जिसका सीधा मतलब है कि आगे बहुत संभावनाएं हैं। भारत दुनिया में प्राकृतिक मेंथा का सबसे बड़ा निर्यातक बनकर उभरा है।

सीमैप के एक और वरिष्ठ वैज्ञानिक संजय सिंह के मुताबिक, “इस बार सीमैप द्वारा दी गई जड़ों और किसानों के पास की पौध के आसार पर करीब 2 लाख 80 हजार हेक्टेयर में मेंथा की बुआई हुई थी, अगले साल ये आंकड़ा साढ़े तीन लाख हेक्टेयर को पार कर सकता है। जर्मनी में सिंथेटिक मेंथा बनाने वाली फर्म इस सीजन भी चालू नहीं हो पाई है। जिसके चलते प्राकृतिक मेंथा की मांग बढ़ी है।”

हालांकि मौसम की बेरुखी के चलते उत्पादन पर असर पड़ा है। संजय सिंह के मुताबिक कई राज्यों के शुरुआती दिनों में 10 फीसदी तक तेल कम निकला है। मेंथा कल्टीवेशन और प्रोडक्शन से जुड़ी फर्म एग्रीबिजनेस सिस्टम इंटरनेशनल में शुभ मिंट प्रोजेक्ट के प्रोजेक्ट मैनेजर अभिजीत शर्मा गांव कनेक्शन को बताते हैं,

“जिन किसानों ने जून से पहले पेराई की, उनमें तेल कम निकला है, क्योंकि पुरवा हवाओं के चलते पर्याप्त गर्मी नहीं थी। उसके बाद का उत्पादन अच्छा रहा, जो हमारे किसानों के बीच भी 60-62 किलो प्रति एकड़ तक गया है।” मेंथा का उत्पादन उसकी अच्छी किस्म की पौध और नई तकनीकों और वैज्ञानिक सलाहों पर निर्भर करता है। पुरानी जड़ों से पौध तैयार करने, जलभराव, वक्त पर सिंचाई और रोग का निदान न करने पर ये उत्पादन 40 से 50 किलो या उससे कम प्रति एकड़ उत्पादन होता है।

मेंथा का तेल उसकी पत्तियों की सतह पर उपस्थित ग्रंथियों में होता है। करीब 85-90 दिन की फसल तेज गर्मी होने पर ये तेल जमीन से पत्तियों में जमा हो जाता है। कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक मेंथा ऐसी फसल है, जिसमें अच्छे उत्पादन के लिए जरूरी है कि पेराई से पहले पौधों को (तनाव) टेंशन हों, जिसके लिए तेज गर्मी और सिंचाई का न होना अच्छा माहौल होता है।

इसीलिए पेराई से एक हफ्ते पहले से सिंचाई बंद कर दी जाती है। बाराबंकी के जिला उद्यान अधिकारी महेंद्र कुमार बताते हैं, “इस बार जिले में करीब 80 लाख हेक्टेयर में मेंथा था, मेंथा के सीजन में यहां ज्यादातर जगह मेंथा होता है।

किसानों को इसका अच्छा लाभ हुआ है, लेकिन सामान्य पेराई टंकियों के चलते कई हादसे हुए हैं, इसलिए मेरी किसान भाइयों से अपील है कि अगली बार अच्छी गुणवत्ता वाले पेराई संयंत्र लगवाएं, जिसमें सेफ्टी वाल्व हो, ताकि हादसे का डर न रहे, दूसरा आधुनिक संयंत्र से 10-15 फीसदी तेल ज्यादा निकलता है।” मेंथा के तेल में हुए मुनाफे से न सिर्फ आगामी वर्ष में मेंथा रकबा बढ़ने की उम्मीद है, बल्कि इससे आलू का भी रकबा बढ़ेगा।

किसानों में मेंथा काटकर खेत तैयार कर आलू बोएंगे और फिर अगैती आलू की फसल निकालकर मेंथा। सीमैप के वैज्ञानिक डॉ. सैदान सिंह गांव कनेक्शन को बताते हैं, “90-100 दिनों में किसान को औसतन प्रति हेक्टेयर पौने दो लाख तक मुनाफा हुआ है। जो किसी फसल के अनुपात में काफी ज्यादा है। इसलिए पहले आलू और फिर मेंथा का रकबा बढ़ना लगभग तय है, अभी किसान नर्सरी के लिए पौधों के लिए दौड़भाग कर रहे हैं।”

आप भी ऐसे कर सकते हैं चंदन की खेती, एक किलो लकड़ी की कीमत है 6000 रुपए

चंदन की खेती आपको शेयर मार्केट या मच्यूल फंड से भी ज्यादा इनकम दे सकती है वो भी गारंटी आैर बिना रिस्क के। इसके लिए कम से कम 20 साल जमीन बाउंड करके चलना पड़ेगा क्योंकि सागवान की तरह ही चंदन के पेड़ को तैयार होने में 15 से 20 साल लग जाते हैं।

कर्नाटक में तो इसके भरपूर जंगल हैं लेकिन धीरे-धीरे इसे आैर किसान भी उगाने लगे हैं। गुजरात के भरूच के एक किसान ने 10 लाख लगाकर चंदन की खेती स्टार्ट की थी। 15 से 20 साल में उसने 15 करोड़ की कमाई की थी।

यानी इस हिसाब से प्रति 1 लाख रु का इन्वेस्टमेंट करके 1.5 करोड़ रु का रिटर्न मिला। इसकी लकड़ी 6000 रुपए किलो तक बिक जाती है। आप भी चंदन की खेती कर लाखों-करोड़ों रुपए कमा सकते हैं। यह सामान्य तापमान में पैदा हो सकता है।

चंदन 6000 रुपए किलो बिकता है यानी आम लकड़ी से 15000% ज्यादा

खेती – नर्सरी से पौधे लाकर या फिर बीज डालकर चंदन की खेती की जा सकती है। चंदन का पेड़ लाल दोमट मिट्टी में अच्छा उगता है। यह चट्टानी मैदान, पथरीली मिट्टी में भी हो सकता हैं। गिली मिट्टी में इसकी ग्रोथ कम होती है।

बुवाई- मानसून में इसके पेड़ तेजी से ग्रोथ करते हैं, लेकिन गर्मियों में इन्हें इरीगेशन (सिंचाई) की जरूरत होती है।

सिंचाई – इसमें ड्रिप प्रॉसेस से इरीगेशन किया जाता है। चंदन के पेड़ को 5 से 50 डिग्री सेल्सियस टेम्प्रेचर वाले इलाके में लगाना सही माना जाता है। इसके लिए 7 से 8.5 पीएच वाली मिट्टी परफेक्ट होती है। यानी पंजाब में किसान इसकी खेती का एक्सपेरिमेंट कर सकते हैं। एक एकड़ में औसत 400 पेड़ लगाए जा सकते हैं।

एक पेड़ की जड़ से 3 लीटर तक निकलता है तेल

कितने समय में बढ़ते हैं पेड़-चंदन लगाने के बाद 5वें साल से लकड़ी रसदार बनना शुरू हो जाती है। 12 से 15 साल के बीच यह बिकने के लिए तैयार हो जाता है। चंदन के पेड़ की जड़ से सुगंधित प्रोडक्ट्स बनते हैं। इसलिए पेड़ को काटने के बजाए जड़ से ही उखाड़ा जाता है।

उखाड़ने के बाद इसे टुकड़ों में काटा जाता है। ऐसा करके रसदार लकड़ी को कर लिया जाता है। एवरेज कंडीशन में एक चंदन के पेड़ से करीब 40 किलो तक अच्छी लकड़ी निकल जाती है। चंदन के पेड़ में सबसे महंगी चीज इसका तेल होता है।

एक पेड़ की जड़ से करीब पौने 3 लीटर तक तेल निकलता है। चंदन की खेती को बढ़ावा देने के लिए कई प्रदेशों में यह प्रावधान किया गया है कि चंदन उगाने वाले किसान उसे काट सकेंगे लेकिन इसकी परमिशन लेनी जरूरी होगी।

इन्वेस्टमेंट – एक पौधा 40-50 रुपए में मिलता है। एक एकड़ में 400 पेड़ पर 20 हजार खर्च होंगे। चंदन के पेड़ों का इंश्योरेंस भी करवाया जाता है, क्योंकि इन पेड़ों के चोरी का डर होता है। आप खुद भी इसकी देखरेख कर सकते हैं। इन सबके अलावा सिंचाई पर भी खर्च करना होगा।

देश के इन हिस्सों में भारी बारिश की चेतावनी, आंधी-तूफान का भी अलर्ट

मौसम विभाग ने दिल्ली-एनसीआर समेत देश के कई राज्यों में भारी बारिश और आंधी-तूफान की चेतावनी जारी की है। मौसम विभाग के मुताबिक, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, कर्नाटक, कोंकण समेत आंध्र प्रदेश के तटीय इलाकों में भी भारी बारिश का अनुमान है।

बात सिर्फ उत्तर प्रदेश की करें तो अगले तीन घटों में भारी बारिश और आंधी-तूफान की चेतावनी जारी की है। मौसम विभाग के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के मेरठ, बागपत, हापुड़, बुलंदशहर और अमरोहा जिले से सटे इलाकों में भारी बारिश होगी। साथ ही बारिश के साथ थंडरस्टॉर्म की भी संभावना व्यक्त की गई है।

मौसम विभाग ने के मुताबिक, आज यानी 22 जुलाई को उत्तराखंड में भारी बारिश होने की आशंका है। मौसम विभाग के मुताबिक आज पंजाब, हिमाचल प्रदेश, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, विदर्श, छत्तीसगढ़, ओडिशा, कर्नाटक और केरल के भी तमाम इलाकों में बारिश हो सकती है। वहीं मौसम विभाग का कहना है कि 23 जुलाई को भी उत्तराखंड, पश्चिमी मध्य प्रदेश, मध्य महाराष्ट्र, कोंकण, गोवा, कर्नाटक और केरल में बारिश होने की संभावना है।

इसके अलावा जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मराठवाड़ा के तमाम इलाकों में भी बारिश होने की उम्मीद है। 24 और 25 जुलाई को भी उत्तराखंड, गोवा, कोंकण, कर्नाटक, केरल, जम्मू-कश्मीर और गुजरात के कुछ इलाकों में बारिश हो सकती है।

आपको बता दें कि आज शनिवार को दिल्ली एनसीआर में जमकर बारिश हुई। शनिवार को हुई भारी बारिश से लोगों को तेज गर्मी और उमस से राहत मिल गई है। तापमान में भी गिरावट आई है। गौरतलब है कि पिछले सप्ताह मुंबई में भी भारी बारिश देखने को मिली थी।

सोने से भी महंगी है हिमालय की वायग्रा, एक किलो की कीमत 60 लाख रुपए से ज्‍यादा

यारसागुम्‍बा यानी गर्मी की घास। यह एक तरह की फफूंंद है। यह सोने से भी महंगी है। 1 किलो यारसागुम्‍बा की कीमत लगभग 1 लाख डॉलर यानी लगभग 65 लाख रुपए है। इसे हिमालय की वायग्रा भी कहा जाता है। लोगों का मानना है कि इससे अस्‍थमा कैंसर और खास तौर पर मर्दाना कमजोरी में फायदा होता है।

यारसागुम्‍बा सिर्फ हिमालय और तिब्‍बती पठार पर 3000 से 5000 मीटर की ऊंचाई पर मिलता है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हर साल मई से जून के माह में नेपाल के हजारों लोग पहाड़ की ओर चले जाते हैं। ये लोग यारसागुम्‍बा की तलाश में जाते हैं। ये लोग तीन हजार मीटर की ऊंचाई पर कैंप करके रहते हैं। पांच साल से यारसागुम्बा का व्यापार कर रहे कर्मा लांबा कहते हैं कि दूर दराज से गोरखा, धाधिंग, लामजुंग जि‍ले से लोग यहां यारसागुम्बा की तलाश में आते हैं।

मुश्किल जिंदगी जीते हैं यारसागुम्‍बा तलाशने वाले लोग

यारसागुम्‍बा की तलाश में आए लोग दो महीने तक बहुत मुश्किल जिंदगी जीते हैं। ये टेंट में रहते हैं। एक युवा दंपत्ति यहां तीन साल से आ रहा है। उनका कहना है कि पहले साल हमें एक भी यारसागुम्‍बा नहीं मिला था। फिर हमने उसकी डंठल को पहचानना सीखा। अब हम आसानी से रोज 10 से 20 यारसागुम्‍बा तलाश लेते हैं।

सुशीला और उनके पति की मई और जून के महीने में हर दिन यही दिनचर्या रहती है। यारसामगुम्बा के बदले जो पैसा उन्हें मिलता है उससे वो आसानी से आधा साल काट लेते हैं। पिछले साल उन्होंने दो हजार डॉलर कमाए थे। इस तरह से वे 2 माह में उतना कमा लेते हैं जितना वे छह माह में दूसरा काम करके कमाते।

यारसागुम्‍बा की उपलब्‍धता में आ रही है कमी

बढ़ती मांग और जलवायु परिवर्तन के असर की वजह से यारसागुम्‍बा की उपलब्‍धता में कमी आ रही है। नेपाल के मनांग क्षेत्र में 15 सालों से यारसागुम्बा तलाश रही सीता गुरुंग का कहना है कि पहले मैं हर दिन सौ यारसागुम्बा तक तलाश लेती थी लेकिन अब दिन भर में मुश्किल से दस-बीस ही मिल पाते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि ज्‍यादा मांग और जलवायु परिवर्तन की वजह से यारसागुम्बा की उपलब्धता में गिरावट आ रही है। सीता कहती हैं कि जब मुझे रोजाना सौ यारसागुम्बा मिलते थे तब कीमतें बहुत कम थीं। अब जब कीमतें बढ़ गई हैं तो बहुत कम यारसागुम्बा मिलते हैं।

यारसागुम्‍बा पर सरकार को रॉयल्‍टी चुकाते हैं लोग

नेपाल सेंट्रल बैंक के एक शोध के मुताबिक, जो लोग यारसागुम्बा तलाशते हैं उनकी सालाना आय का 56 फीसदी इसी से आता है। यारसागुम्बा की फसल काटने वाले सभी लोग सरकार को रॉयल्टी चुकाते हैं। साल 2014 में किए गए एक शोध के मुताबिक, यारसागुम्बा के कारोबार से नेपाल की अर्थव्यवस्था को 51 लाख रुपए की आमदनी हुई।

कई विशेषज्ञों का मानना है कि इस कैटरपिलर फफूंदी की तस्करी अन्य देशों में भी की जा रही है। 18 सालों से यारसागुम्बा का व्यापार कर रहे नागेंद्र बुद्धा थोकी कहते हैं कि इस व्यापार को इस तरह से रेगुलेट नहीं किया गया है जैसे इसे किया जाना चाहिए था। इसलिए यारसागुम्बा तलाशने वालों और सरकार की वास्तविक आय का पता करना मुश्किल हो जाता है।

ऐसे निकालें इंटरनेट से खसरा खतौनी

अगर आप को अपनी जमीन से संबंधित कोई कागजात चाहिए, जैसे खतरा खतौनी और नक्शा आदि तो तहसील कचहेरी जाना पड़ता है। लेकिन अगर आप इसमें लगने वाले समय और पैसे को बचाना चाहते हैं तो आपके पास दो विकल्प है।

पहला अपने घर के पास के जनसुविधा केंद्र में जाकर कुछ पैसे देकर इसे निकलवा सकते हैं, दूसरा की आप खुद भी इंटरनेट पर अपने राज्य की राजस्व विभाग संबंधी वेबसाइट पर जाकर खसरा-खतौनी निकाल सकते हैं। आज कल जमीन की रजिस्ट्री करानी हो या उस पर किसान क्रेडिट कार्ड बनवाना हो, या फिर कोई सरकारी योजना का लाभ लेना हो खसरा-खतौनी जरुरी है।

ये जमीन के वो कागज़ हैं जो न सिर्फ कई योजनाओं का लाभ दिलाने में मदद करते हैं बल्कि जमीन पर आप के मालिकाना हक का भी सबूत होती हैं। लेकिन इन्हें लेने के लिए लोगों को अक्सर बहुत परेशान होना पड़ता है। इंटरनेट से भूलेख निकलवाने की सुुविधा की राज्यों में है लेकिन कई लोगों को इस बारे में कोई जानकारी नहीं है कि ज़मीन के कागजा़त यानि भूलेख हासिल करने की प्रक्रिया अब बहुत आसान हो चुकी है।

इंटरनेट पर ही अब ये सारी जानकारियां मौजूद हैं। लोग इस तरह से अपना काफी समय और पैसा बचा सकते हैं,  देशभर में पढ़े जाने वाले सेक्शन ‘बात पते की’ में समझिए पूरा तरीका। (ये तरीके नीचे वीडियो में दिया गया है।)

कैसे मिलेगी जानकारी

  • उदाहरण के लिए अगर आपको उत्तर प्रदेश में जमीन से संबंधित कागज चाहिए तो सबसे पहले यूपी सरकार की वेबसाइट भूलेख http://upbhulekh.gov.in/ पर जाएं।
  • वेबसाइट के बाईं तरफ से चौथे ऑप्सन “खतौनी (अधिकार अभिलेख) की नकल देखें” पर क्लिक करें।
  • फिर आपके सामने एक छोटा से बॉक्स दिखेगा जिसमें आपको बांए तरफ एक छोटे से बॉक्स में दिए गए कोड को दाएं तरफ खाली बॉक्स में भरें। बॉक्स में दिए गए कोड को भरने के बाद ‘सबमिट’ बटन पर क्लिक करें।
  • अब आपके सामने एक नया पेज खुलकर आ जाएगा जिसमें जिलों के नाम लिखे होंगे।
  • अब आपको कॉलम में दिए गए जिलों में अपने जिले के नाम पर क्लिक करें।

  • जिले की सूची के बाद बनी तहसीलों की सूची से अपनी तहसील के नाम पर क्लिक करें।
  • इसके बाद सबसे दाईं ओर बनी सूची में अपने गाँव के नाम पर क्लिक करें और फिर उसके ठीक ऊपर लिखे आगे पर क्लिक करें।
  • अब एक नया पेज खुलेगा। अपनी खसरा खतौनी या खाता संख्या याद हो तो इस पेज पर इनके आगे बने गोलाकार बिंदुओं पर क्लिक करके खोजें पर क्लिक करें, आप चाहें तो अपने नाम से भी अपने भूलेख का खोज सकते हैं। खसरा संख्या और खाता संख्या के लिये दी गई जगह पर लिखने के लिए नीचे दिए गए अंकों वाले बॉक्स पर क्लिक करें और नाम से खोजने के लिये नीचे दिये गये अक्षरों पर क्लिक करके अपना नाम लिखें।
  • आपकी ज़मीन के भूलेख अब आपके सामने हैं। आप इसका प्रिंट आउट भी ले सकते हैं।

नोट : खसरा खतौनी निकालने का यह उदाहरण उत्तर प्रदेश भूलेख के लिए है। ऐसे ही आप भारत के किसी भी राज्य के भूलेख में जाकर अपने जमीन संबंधित कागजात डाउनलोड कर सकते हैं।

उदाहरण के लिए नीचे तीन राज्यों का का लिंक है.

हरियाणा से संबंधित जमीन के कागजात के लिए वहां की वेबसाइट हलरिस  हरियाणा  http://jamabandi.nic.in/land records/querylink.aspx पर क्लिक करें..

मध्य प्रदेश में जमीन, नक्शा और दूसरे कागजातों के लिए ये आयुक्त- भू-अभिलेख एवं बंदोबस्त, मध्य प्रदेश की वेबसाइट https://mpbhulekh.gov.in/Login.do# पर क्लिक करें..

बिहार के लोग जमीन संबंधित जानकारी के लिए यहां क्लिक करें.. http://164.100.150.10/biharbhumi/

कृत्रिम हाईड्रोजैल किसानों से धोखा, हर्बल हाईड्रोजैल कृषि की संजीवनी, हइड्रोजेल की मदद से सिर्फ एक सिंचाई से हो सकती है फसल

वर्षा आधारित कृषि व् गिरते जलस्तर की समस्या से जूझ रहे किसानों को राहत देने के नाम पर, कई प्राइवेट कम्पनियो के कृत्रिम रासायनिक हाईड्रोजैल(जलशक्ति, जेबा इत्यादि) बाजार में खूब बिक रहे है I इंडियन काउंसलिंग ऑफ एग्रीकल्चर रिर्सच (ICAR) ने भी पूसा हाईड्रोजैल नाम का एक कृत्रिम रासायनिक हाईड्रोजैल विकसित क़र, पिछले दस वर्ष से, उसे 1200-1500 रूपये प्रति किलो बेच रही हैI कृत्रिम रासायनिक हाईड्रोजैल के बारे में निम्नलिखित बड़े-2 झूठे दावे भी किये जा रहे है:-

  • एक ग्राम पूसा हाईड्रोजैल 500 ग्राम पानी अवशौषित करता है। इससे सिंचाई में पानी की 40 प्रतिशत तक बचत होती है। जो सिर्फ एक सिंचाई में फसलों को तैयार करेगा और जड़ों के पास पानी को सोखकर लंबे समय तक, पौधों को पानी की कमी भी नहीं होने देगा तथा बारिश व् सिंचाई के पानी को स्टोर करता है
  • पूसा हाईड्रोजैल एक एकड़ खेत में महज 1-2 किलोग्राम पर्याप्त है जो 2-5 वर्षों
    तक काम करता है ।
  • पूसा हाईड्रोजैल के इस्तेमाल से, मक्के, गेहूँ, आलू, सोयाबीन, सरसों, प्याज,
    टमाटर, धान, फूलगोभी, गाजर, गन्ने, हल्दी, जूट समेत अन्य फसलों में उत्पादकता बढ़ती है ।
  • पूसा हाईड्रोजैल, खाद के साथ तालमेल बिठा क़र, जमीन की सेहत सुधारने में भी
    मदद करता है।

अब अगर वैज्ञानिक सोच के साथ, पूसा हाईड्रोजैल और प्राइवेट कम्पनियो के हाईड्रोजैल के बारे में ऊपरलिखित झूठे दावों को परखा जाये, तो निष्कर्ष निकलता है की, कृत्रिम रासायनिक हाईड्रोजैल किसानों से सरासर धोखा है।

जिसे किसान भाई व् कोई भी वैज्ञानिक सोच का व्यक्ति अपने घर पर आसानी से परख सकता है जैसा की लेखक ने चित्र-1 में दिखाया है बाजार से दस ग्राम, ज़ेबा हाईड्रोजैल, पूसा हाईड्रोजैल और हर्बल हाईड्रोजैल (गूंद कतीरा-Tragacanth Gum) खरीद क़र ले आईये।

घर पर तीन कांच के गिलास ले और उन मे दो-2 ग्राम की दर से,एक गिलास में ज़ेबा हाईड्रोजैल, दूसरे में पूसा हाईड्रोजैल, तीसरे में हर्बल हाईड्रोजैल डाल क़र तीन चौथाई साफ पानी से भर दी जीये। आप देखेंगे की, ज़ेबा हाईड्रोजैल ने पांच मिनट में , पूसा हाईड्रोजैल ने 30 मिनट में, और हर्बल हाईड्रोजैल ने 60 मिनट में गिलास के सारे पानी को सोख कर, जैल में प्रवृतीत कर दिया।

अब सभी गिलास में दो-2 ग्राम की दर से जिप्सम पाऊडर ऊपर से छिड़क दीजिये। आप को जानकर आश्चर्य होगा की जिप्सम पाऊडर की रासायनिक क्रिया से, ज़ेबा जैल एक मिनट में, पूसा जैल 10 मिनट में, दूध की तरह फट कर, पानी में बदल जाता है

जब की हर्बल हाईड्रोजैल पर जिप्सम की रासायनिक क्रिया का कोई असर नहीं होता उसका जैल अपने स्वाभाविक रूप में ही रहता है।

इस साधारण से प्रयोग से ये साबित होता है की कृत्रिम रासायनिक हाईड्रोजैल कृषि उदेश्यो के लिये उपयुक्त तकनीक नहीं है कियोकि जिप्सम के रसायनिक तत्व लगभग सभी प्रकार की भूमि में मौजूद होते है शुष्क व् रेतली भूमि से तो जिप्सम को

निकाल कर व्यवसायिक व् औधोगिक कार्यो के लिये इस्तेमाल किया ही जाता है जबकि किसान सिचित भूमि में जिप्सम को खाद व् छारीय भूमि मिट्टी संशोधन के लिये वर्षो से  करते रहे है।

जबकि हर्बल हाईड्रोजैल (गूंद कतीरा-Tragacanth Gum) सभी प्रकार की भूमि के लिये उपयुक्त पाया गया है और आर्थिक रूप से सस्ता विकल्प ( सिर्फ दो सो रुपये प्रति किलो ग्राम) होने के साथ, पर्यावरण हितेषी भी है जिससे सिचाई पानी की बचतके साथ फसलों की लागत में भी बचत होती है ।

हरियाणा के रेतीले इलाके के गांव लिसना जिला रेवाड़ी के प्रगतिशील किसान श्री मनोज कुमार ने हर्बल हाईड्रोजैल लेपित बीज तकनीक अपनाकर अपने खेतो पर वर्षा आधारित धान सफलतापूर्वक उगा कर एक नयी मिसाल कायम की है । प्राकृतिक हाईड्रोजैल का प्रयोग सभी सभ्यताओं में आयुर्वेदिक चिकित्सा, कृषि इत्यादि कार्यो में आदि काल से हो रहा है।

कृत्रिम रासायनिक हाईड्रोजैल का प्रयोग भी लगभग सौ साल से चिकित्सा, प्रसाधन सामग्री, सैनिटरी नेपकिन, कृषि कार्यो के लिये पूरी दुनिया में हो रहा है। इस लिये हाईड्रोजैल कोई नया अविष्कार नहीं है जैसा की कुछ वैज्ञानिक व् प्राइवेट कंपनी अपने हाईड्रोजैल को बेचने के लालच में बढ़ा-चढ़ा क़र प्रसारित कर रही है।

कृषि में कृत्रिम रासायनिक हाईड्रोजैल के प्रयोग को लेकर दुनिया भर के पर्यावरणविद्ध बार-2 चेतावनी जारी करते रहे है कियोकि इस के निर्माण में उपयोग होने वाले पादर्थो से पर्यावरण दूषित होने और जीवो में कैंसर होने का खतरा बना रहता है। इस लिये कृषि कार्य के लिये प्राकृतिक हाईड्रोजैल के उपयोग की सलाह हमेशा दी जाती है ।

अब ऑनलाइन अपने उत्पाद बेच सकेंगे किसान, लॉन्च हुआ ये ऐप

उर्वरक निर्माता कंपनी इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर्स कोऑपरेटिव (इफ्को) ने किसानों के लिए ई-कॉमर्स प्लेटफार्म की शुरुआत की है. करीब 80 करोड़ की लागत और सिंगापुर बेस्ड कंपनी आईमंडी की साझेदारी से इफ्को ने ये प्लेटफार्म शुरू किया है. इसके लिए IFFCO iMandi नाम से ऐप और वेब पोर्टल शुरू किया गया है.

इफ्को ने एक बयान जारी कर बताया कि तकरीबन साढ़े पांच करोड़ किसान उसके इस नये ऐप इफ्को आईमंडी से फायदा उठा सकेंगे. इसके साथ ही इफ्को ने एक वेब पोर्टल की शुरुआत भी की.

इस सौदे के लिए इफ्को की सहयोगी इकाई इफ्को ई-बाजार लिमिटेड ने सिंगापुर की आईमंडी प्राइवेट लिमिटेड में 26 फीसदी हिस्सेदारी खरीदी है. बाकी 74 फीसदी हिस्सेदारी आई-टेक होल्डिंग्स एवं अन्य निवेशकों के पास है.

इस मौके पर कंपनी के प्रबंध निदेशक यूएस अवस्थी ने कहा कि देश भर में किसानों के बीच ऑनलाइन और डिजिटल लेन-देन के उपयोग का प्रचार-प्रसार करने के बाद इफ्को आईमंडी ऐप की शुरुआत कर रहा है. यह किसानों के लिए कृषि उत्पादों, उपभोक्ता उत्पादों (एफएमसीजी), इलेक्ट्रॉनिक्स, ऋण और बीमा आदि की खरीद के लिए वन स्टॉप शॉप होगा.

आईमंडी प्राइवेट लिमिटेड के संस्थापक वीके अग्रवाल ने इस मौके पर कहा कि इफ्को और आईमंडी इस बात को लेकर काफी आश्वस्त है कि भारतीय सहकारी डिजिटल प्लेटफार्म के माध्यम से हर एक घर और गांव में बड़े पैमाने पर सामाजिक बदलाव लाने में मदद मिलेगी. इसके साथ ही डिजिटल समावेशी तकनीक के चलते एक करोड़ लोग सशक्त हो सकेंगे.