किसानो को बड़ी राहत, ट्रेक्टर और खाद की जीएसटी में मिली इतने फीसदी की छूट

जीएसटी काउंसिल ने किसानों को बड़ी राहत दी है. अब फर्टिलाइजर पर जीएसटी के तहत 12 फीसदी की बजाए 5 फीसदी टैक्स ही देना होगा. शुक्रवार को जीएसटी काउंसिल की बैठक में इस पर फैसला लिया गया. ट्रैक्‍टर के कल-पूर्जों पर भी टैक्‍स 28 फीसदी से कम करके 18 फीसदी कर दिया गया है.

अभी 8 फीसदी तक था टैक्‍स

फर्टिलाइजर पर 12 फीसदी टैक्‍स लगाए जाने पर कई राज्‍यों ने चिंता जताई थी. उनकी दलील थी कि इससे किसानों पर बोझ बढ़ेगा. जीएसटी लागू होने से पहले अभी तक खाद पर शून्‍य से लेकर 8 फीसदी तक टैक्‍स लगता था.

550 लाख टन खाद का होता है उपयोग

देश में हर साल करीब 22.4 करोड़ टन खाद्यान्‍न का उत्‍पादन होता है, जिसके लिए किसान करीब 550 लाख टन खाद का उपयोग करते हैं. अगर खाद पर 12 फीसदी टैक्‍स लगाया जाता तो 50 किलो के एक यूरिया बैग की कीमत में 35 रुपए का इजाफा हो जाता. लेकिन जीएसटी काउंसिल ने इसे कम करके किसानों को बड़ी राहत दी है.

ट्रैक्‍टर के कल-पूर्जों पर 18 फीसदी टैक्‍स

जीएसटी काउंसिल ने ट्रैक्‍टर के कल-पूर्जों पर भी कर की दर 28 फीसदी से कम करके 18 फीसदी कर दिया है. अभी तक इन पर 5 से लेकर 17 फीसदी के बीच कर लगता रहा था. जीएसटी काउंसिल ने इसे बढ़ाकर 18 फीसदी से 28 फीसदी कर दिया था. इस पर किसानों ने भारी चिंता जताई थी. देश में हर साल लगभग 6.5 लाख ट्रैक्‍टर की बिक्री होती है. सबसे अधिक बिक्री कॉम्‍पैक्‍ट ट्रैक्‍टर की होती है.

जाने क्या है चावल की उछलने वाली गेंद का सच्च

आजकल सोशल मीडिया पर प्लास्टिक के चावल होने का अफवाह फैला जा रहा है। विडियों में चावल का गेंद बनाकर उछाला जा रहा है जिससे काफी लोग उस विडियों को सच मान रहे है।

कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य निर्यात निर्यात एजेंसी (एपीईडीए) ने प्लास्टिक चावल के बारे में तेजी से फैल रही अफवाहों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। गौरतलब हो कि आजकल सोशल मीडिया पर प्लास्टिक के चावल होने का अफवाह फैला जा रहा है।

इस प्रकार के वीडियो और प्रेस रिपोर्ट भ्रामक हैं क्योंकि कई प्रकार के चावल की ऐसी प्रकृति होती है।
इस के लिए जब एपीईडीए ने असली चावल के साथ प्रयोग क्या तो हैरान कर देने वाली बात सामने आई ।असल में एपीईडीए ने दो तरह के चावल उबाल कर उनकी गेंद बनाई । एक तरह के चावल में कम स्टार्च था और दूसरे में ज्यादा स्टार्च था ।

जब कम स्टार्च वाले चावल की गेंद बनाई गई तो उसकी गेंद तो बन गई लेकिन वो उछल नहीं रही थी लेकिन ज्यादा स्टार्च वाले चावल की गेंद प्लास्टिक गेंद उछल भी रही थी । चावल की गेंद का उछलना उसका प्राकृतिक गुण है ।चावल की गेंद उछलेगी या नहीं ये बात उसमें पाए जाने वाले स्टार्च की मात्रा पर निर्भर करता है।

एपीईडीए ने कहा कि “सोशल मीडिया और मीडिया में सूचना का प्रसार किया जा रहा है, जिससे यह कहा गया है की सिर्फ प्लास्टिक वाले चावल की गेंद उछलती है वो गलत है । दरअसल ज्यादा स्टार्च वाले चावल की गेंद भी वैसे ही उछलती है जैसे प्लास्टिक की बनी हो ।”

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चावल पैदा करने वाला देश है. चीन चावल पैदा तो करता है लेकिन विश्व का सिर्फ 1.9 फीसदी चावल एक्सपोर्ट यानि बाहर भेजता है और भारत तो चीन से ना के बराबर चावल खरीदता है.इस लिए इस बात में कोई सचाई नहीं के भारत चीन में चीन के प्लास्टिक के चावल आ रहे है ।

अब बंटाई या ठेके पर ज़मीन देने वाले किसानो पर भी लगेगा 18% जी.ऐस.टी टेक्स

अगले महीने से लागू हो रही वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की नई कर व्यवस्था में खेत बंटाई या ठेके पर देने वालों को भी टैक्स चुकाना पड़ेगा। उन्हें इससे होने वाली आय पर 18 फीसदी जीएसटी देना होगा। जीएसटी की व्यवस्था में सिर्फ उन्हीं को राहत दी गई है जो जमीन का उपयोग अपने उपयोग या बिक्री के लिए फसल उगाने में करेंगे। खेती के लिए दूसरे को जमीन देने वाले को कारोबारी मानते हुए उसे 18 फीसदी के स्लैब में रखा गया है। उसे बकायदा जीएसटी के तहत रजिस्टर करना होगा और सभी तरह के जरूरी रिटर्न फाइल करने होंगे।

बंटाई पर देने वाले को इनपुट क्रेडिट की भी सुविधा नहीं

बंटाई पर देने वाले को इनपुट क्रेडिट की भी सुविधा नहीं होगी। ऐसे में इस बोझ का अधिकांश हिस्सा खेती करने वाले पर ही पड़ेगा जो पहले से ही बेहद दबाव में हैं। खेती में बढ़ते नुकसान को देखते हुए बहुत से लोग इन दिनों खुद दूसरा काम कर रहे हैं और अपनी जमीन अपने पड़ोसी, रिश्तेदार या किसी अन्य को दे रहे हैं। अपने साथ ही दूसरे के खेत में भी खेती करने को व्यक्ति इसलिए तैयार होता है क्योंकि इससे उसकी लागत थोड़ी कम हो जाती है। सिर्फ उनको छूट होगी जिनकी सालाना आमदनी 20 लाख से कम हो। 1,60,000 मासिक से ज्यादा की आय पर जीएसटी देनी होगी। उत्तर पूर्व के राज्यों के लिए यह सीमा 10 लाख सालाना है।

क्यों चिंताजनक

जमीन बंटाई पर देने वाला व्यक्तिया तो अपना काम छोड़ कर खेती करने को ही मजबूर होगा। या फिर इस टैक्स का पूरा या अधिकांश बोझ खेती करने वाले पर डालेगा।

सरकार की दलील

नीति आयोग के सदस्य प्रो. रमेश चंद्र ने बताया कि यह तभी लागू होगा जब उसकी आमदनी जीएसटी की सालाना छूट सीमा से ऊपर होगी। छोटी जोतों वाले इसमें नहीं आएंगे।

महाराष्ट्र सरकार का बड़ा फैसला- किसानों का डेढ़ लाख तक का कर्ज माफ, लोन भरने वाले किसान को 25 फीसदी रिटर्न

फडणवीस ने कर्ज माफी का ऐलान करते हुए कहा कि किसानों का कर्ज माफ करने का बोझ हम कर पड़ेगा। इसके चलते हमें अपने खर्च में कटौती करनी होगी। उन्होंने सभी मंत्रियों और विधायकों से कर्ज माफी के समर्थन में अपनी एक महीने की सैलरी देने की भी अपील की है।

कर्ज के तले दबे किसानों को महाराष्ट्र सरकार ने बड़ी राहत प्रदान की है। महाराष्ट्र सरकार ने बड़ा फैसले लेते हुए किसानों के 34000 करोड़ के कर्ज माफी का शनिवार को ऐलान किया। इस बात की जानकारी खुद राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने दी। सीएम देवेंद्र फडणवीस ने किसानों के लिए 34 हजार करोड़ रुपये की कर्ज माफी का ऐलान करते हुए कहा कि हम 1.5 लाख रुपये तक के ऋण को पूरी तरह से माफ कर रहे हैं।

साथ ही उन्होंने कहा कि जिन किसानों ने अपने ऋण का नियमित रूप से भुगतान किया है, हम उन्हें 25% ऋण वापसी लाभ (loan return benefit) देंगे। राज्य के 90% किसानों के कर्ज माफी की घोषणा की। महाराष्ट्र सरकार के इस फैसले का फायदा राज्य के 89 लाख किसानों को होगा।

फडणवीस ने कर्ज माफी का ऐलान करते हुए कहा कि किसानों का कर्ज माफ करने का बोझ सरकार पर पड़ेगा। इसके चलते हमें अपने खर्च में कटौती करनी होगी। उन्होंने सभी मंत्रियों और विधायकों से कर्ज माफी के समर्थन में अपनी एक महीने की सैलरी देने की भी अपील की है।

महाराष्ट्र से पहले पंजाब और उत्तर प्रदेश की सरकारों ने भी कर्ज माफी का ऐलान किया था। किसानों के कर्ज माफ किए जाने की जानकारी सरकार की ओर से पहले भी दी गई थी।

बता दें कि महाराष्ट्र में किसान कर्ज माफी को लेकर 1 जून से हड़ताल पर है। इस दौरान कई किसानों की आत्यहत्या करने के मामले भी सामने आए। राज्य के किसान लंबे समय से कर्ज माफी की मांग कर रहे थे। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक, किसान आत्महत्याओं में 42% की बढ़ोतरी हुई है।

आत्महत्या के सबसे ज्यादा मामले महाराष्ट्र में सामने आए थे। 30 दिसंबर 2016 को जारी एनसीआरबी के रिपोर्ट ‘एक्सिडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड इन इंडिया 2015’ के मुताबिक साल 2015 में 12,602 किसानों और खेती से जुड़े मजदूरों ने आत्महत्या की।

जानो कैसे खाजू की खेती ने बदली आदिवासी किसानो की किस्मत

आम लोगों की पहुंच से दूर रहने वाला काजू यदि आदिवासी किसानों के घरों में बोरियों में रखा मिले तो चौंकना लाजिमी है। लेकिन यह हकीकत है और बैतूल जिले के शाहपुर ब्लाक में आने वाले ग्राम अड़माढाना के लगभग हर घर में एक- दो नहीं क्विंटलों से काजू भरा पड़ा है।

ड्राय फूड्स में सबसे मंहगा मिलने वाला काजू छोटे से गांव के हर घर में बाड़ी परियोजना के माध्यम से 6 साल पहले कराए गए पौधरोपण के कारण मिल रहा है। यह बात अलग है कि काजू की खेती से अपनी किस्मत संवरने की उम्मीद लगाए बैठे किसानों को इसे बेचने की कोई राह नहीं मिल पा रही है जिससे उन्हें खासा मुनाफा नहीं हो पा रहा है।

जिले के मौसम को देखते हुए काजू का उत्पादन किया जाना संभव है, इसी के चलते बाड़ी परियोजना की शुरूआत में किसानों को आम और काजू के पौधे देकर उनके खेतों में रोपे गए हैं। 6 साल बीत जाने के बाद काजू के पौधों में फूल और फल लगने शुरू हो गए।

अब तो यह हालत है कि हर किसान के पास अन्य फसलों की तरह ही काजू की भी उपज घर में भरी हुई है।ग्राम पंचायत देसावाड़ी के अंतर्गत आने वाले अड़माढाना के 70 वर्षीय किसान पांडे सलाम ने बताया कि उनके एक एकड़ खेत में काजू के 30 और आम के 20 पौधे लगाए थे। पांच साल बीतने के बाद ही काजू के पेड़ में फूल आने शुरू हो गए। पहले साल तो फल बेहद कम लग पाए थे लेकिन इस साल भरपूर उत्पादन मिला है।

एक पेड़ से 5 किलो काजू

ग्राम के रामजी पेन्द्राम ने बताया कि पहले तो यही लगा कि यहां बंजर जमीन में इतना मंहगा फल कैसे लग पाएगा। लेकिन दो साल से काजू की फसल अच्छी हो रही है। ठंड की शुरूआत के साथ ही पेड़ो में फूल लगने शुरू हो जाते हैं औ मार्च के महीने में फल लग जाते हैं। अप्रैल में इनके पक जाने पर तुड़ाई कर ली जाती है। हर पौधे से करीब 5 किलो काजू निकल जाते है।

फूल भी देते हैं मुनाफा

काजू के फूल के साथ ही फल भी लगा होता है। जब तुड़ाई की जाती है तो फल को अलग निकालकर फूल के हिस्से को भी सुरक्षित रख लिया जाता है। इस फूल का उपयोग फैनी बनाने में किया जाता है। काजू की फसल पैदा कर रहे किसान शिवकिशोर धुर्वे ने बताया कि जैसे-जैसे पेड़ बड़ा होगा उससे उत्पादन भी अधिक मिलेगा।

50 किसान कर रहे खेती

शाहपुर ब्लाक के ग्राम अड़माढाना में 50 किसानों के द्वारा 50 एकड़ में काजू के पौधे लगाए गए हैं। सभी के पास दो साल से काजू का उत्पादन हो रहा है। किसान मुन्न्ा सलाम ने बताया कि काजू की खेती में कोई खास मशक्कत नहीं करनी होती है। सप्ताह में एक दिन पौधों को पानी देकर महीने में एक बार वर्मी कम्पोस्ट डाला जाता है।

उत्पादन तो ले लिया बेचने का टेंशन

काजू उत्पादक किसानों ने इस साल भरपूर उपज तो ले ली है, लेकिन इसे बेचने के लिये कोई राह ही नहीं मिल पा रही है। बाजार उपलब्ध न होने के कारण यहां के किसान केवल आसपास के क्षेत्रों से जो लोग गांव पहुंचकर बाजार से कम दाम पर काजू खरीदकर ले जाते हैं उसी के भरोसे पर निर्भर हैं। किसानों का कहना है कि बाड़ी परियोजना के अधिकारियों से भी इसे बेचने की व्यवस्था करने के लिये कहा गया लेकिन उन्होंने भी कोई मदद नहीं की है।

एक्सपर्ट व्यू

जिले के वरिष्ठ उद्यान अधीक्षक एम आर साबले के मुताबिक जिले का मौसम काजू की फसल के अनुकूल तो नहीं है। इसकी फसल के लिये मौसम में आर्दत्रा और ठंड के साथ गर्मी भी जरूरी होती है। देसावाड़ी क्षेत्र में फसल हो रही है, इससे लग रहा है कि जिले में इसका उत्पादन अब संभव हो रहा है।

एक बार लगाने पर कई साल तक हरा चारा देगी ये घास, अपने खेत में लगाने के लिए यहां करें संपर्क

आमतौर पर पशुपालक चारा खरीदने पर काफी पैसा खर्च कर देते है या फिर मेहनत कर हरा चारा उगाते है, लेकिन भारतीय पशु अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) ने पशुओं को पूरे वर्ष पौष्टिक एवं हरा चारा मिल सके इसके लिए बहुवर्षीय जिजुवा चारे की घास उगाई है जिसको गाय, भैंस, बकरी सभी बड़े पशु चाव से खाते है।डेयरी वाले किसानों के लिए ये काफी फायदेमंद हो सकती है।

पीलीभीत जिला मुख्यालय से लगभग 30 किमी दूर बिलसंडा ब्लॉक के भदेहीखजा गाँव में रहने वाले श्वेतांश सिंह (75 वर्ष) ने लगभग चौथाई बीघा में जिजुवा घास को बोया हुआ है। चारे की बजाय वह अपनी 21 गाय (साहीवाल और गिर) को जिजुवा घास खिलाते है।

श्वेतांश बताते हैं, “चारे की तरह इसको मशीन में काटना नहीं पड़ता है और केमिकल फर्टिलाइजर की भी जरुरत नहीं पड़ती है। एक साल हो गया इसको बोए अभी तक काटकर पशुओं को खिला रहे है।”

गुजरात की जिज्वा घास को उत्तर भारत की जलवायु में आसानी से उगाया जा सकता है। इस घास में अन्य घासों की अपेक्षा ज्यादा प्रोटीन होता है। इस घास को गाय, भैंस, भेड़, बकरी सभी पशु बड़े चाव से खाते है।

द्वारिका (राजकोट) में उगने वाली जिजुवा घास पर बंशी गौशाला(अहमदाबाद) के संचालक गोपाल भाई सुतालिया ने एक साल तक परीक्षण किया। उन्होंने 10-10 बीघे खेत में जिजुवा सहित करीब आधा दर्जन किस्म की घास उगाई और उनको खिलाने के लिए दुधारू पशुओं को खेतों में खुला छोड़ दिया। पाया गया कि पशुओं ने जिजुवा घास को अधिक पसंद किया।

“इस घास को लगाने से जो किसान बार-बार चारे की फसल लगाता है उसका जो खर्चा होता है वो खत्म हो जाता है। इस घास को अगर किसान एक बार बोता है तो पांच साल तक चारा मिल सकता है। मीठी होने के कारण पशु इसको ज्यादा खाते है।

आईवीआरआई ने फार्मर फर्स्ट प्रोगाम के अंतर्गत बरेली के अतरछेड़ी, निसोई और इस्माइलपुर समेत कई गाँव के किसानों को इस घास को दिया है। इससे पशुओं के दूध की गुणवत्ता भी अच्छी होती है।”ऐसा बताते हैं, बरेली स्थित आईवीआरआई के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. रणवीर सिंह।

डॉ सिंह आगे बताते हैं, “हमारा यही उद्देश्य है कि किसान के पास ऐसी चारे की फसल होनी चाहिए जो कम से कम खर्च में पूरे साल चारा दें, जो किसान इस घास को बोना चाहता हैं, वो जुलाई में इसकी रुट स्लिप बो सकता है, इसको साल भर पानी के निकास वाली जमीन में बोया जा सकता है।

जाड़ों के दिनों में(दिसंबर और जनवरी) इसकी बढ़वार कम होती है वरना बाकी दिनों में इसकी अच्छी फसल होती है। इस घास को किसान खेतों की मेड़ों पर और उचित पानी के निकास वाली उर्वर भूमि में लगा सकते है।

आईवीआरआई में जिज्वा घास के लिए संपर्क कर सकते है—

डॉ. रणवीर सिंह

0581-2303382

 

अब राजस्थान में भी होने लगी सेब की खेती

राजस्थान में शेखावटी का मौसम सेब की खेती के अनुकूल नहीं है। यहां धूलभरी आंधियां, गर्मी में 45 डिग्री के पार पारा और सर्दियों में हाड़ कंपाकंपा देने वाली सर्दी। इन चुनौतियों के बाद भी यहां सेब उगाने का प्रयास किया जा रहा हैं।सब कुछ ठीक रहा तो इस बार सितम्बर में सीकर की सेब खाने को मिल सकती है।

हिमाचल और कश्मीर की मुख्य उपज सेब की राजस्थान के सीकर में खेती का नवाचार बेरी गांव के किसान हरमन सिंह कर रहे है। वे नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन से जुड़े हैं। सिंह बताते हैं कि राजस्थान की धरती पर सेब की खेती के प्रयास नए तो नहीं हैं, लेकिन सफलता नहीं मिल पाई।

अब तीन साल बाद यह सफलता मिलने की उम्मीद है। बेरी गांव से पहले सेब की खेती का प्रयास जयपुर के दुर्गापुरा में भी किया गया। वहां सौ पौधे लगाए गए थे, लेकिन वे नष्ट हो गए। इसी तरह सीकर के ही दो अन्य जगहों पर भी यह प्रयास किया गया, लेकिन उनमें अंकुर नहीं फूट पाया। फिर बेरी में यह प्रयास किया गया। बेरी में इसमें सफलता मिलती नजर आ रही है।

खेती फलने लगी है और सितंबर यहां सेब की फसल मिल जाएगी। इस सफलता को लेकर अधिकारी भी उत्साहित हैं। इस बारे में राज्य सरकार के उद्यानिकी मुख्यालय, जयपुर ने भी सीकर के अधिकारियों ने भी सूचना मांगी है।

सेब की खेती करने के लिए सबसे जरूरी थी उसे गर्मी से बचान, इसके लिए पौधों की टहनियों की कटिंग खास तरह से की गई, बिल्कुल उसी तरह जिस तरह अनार की अंब्रेला कटिंग की जाती है।

जैविक खाद का उपयोग किया गया। ड्रिप सिंचाई तकनीक को छह माह तक  अपनाया गया। जिसका परिणाम है कि हिमाचल और कश्मीर में बहुतायत में उगने वाली सेब रेगिस्तान में भी मिल सकेगी।

किसानों के फायदे के लिए महाराष्ट्र सरकार ने किया ये फैसला

 

महाराष्ट्र सरकार ने किसानों के फायदे के लिए दूध का खरीद मूल्य प्रति लीटर 3 रुपए बढ़ाने का फैसला किया है। खुदरा बिक्री मूल्य फिलहाल अपरिवर्तित रखे गए हैं।

राज्य के डेयरी विकास मंत्री महादेव जांकर ने कहा, ‘नई दरें 21 जून से लागू होंगी लेकिन खुदरा ग्राहकों के लिए दूध की दरों में कोई बदलाव नहीं होगा।’ उन्होंने कहा कि दूध के दाम को बढ़ाने का फैसला एक समिति की सिफारिश पर किया गया है।

राज्य सरकार ने दूध के खरीद दाम के संशोधन के लिए इस समिति का गठन किया था।

जांकर ने कहा, ‘नई दरों के मुताबिक डेयरियां अब गाय दूध 24 रुपए प्रति लीटर के बजाय 27 रुपए प्रति लीटर की दर से खरीदेंगी।

इसी तरह, भैंस का दूध अब 33 रुपए प्रति लीटर के बजाय 35 रुपए प्रति लीटर की दर से खरीदा जाएगा।’

किसानो के लिए खुशखबरी इतने रुपए बड़ा धान और बाकी फसलों का मूल्य

मोदी सरकार ने पिछले तीन वर्ष के दौरान दलहनों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में करीब 80 रुपए प्रति क्विंटल की वृद्धि की है लेकिन धान और मक्का की कीमतों में यह वृद्धि एक सौ रुपये क्ल की ही बढोतरी हो पायी है ।

कृषि मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार 2015-16 में अरहर का न्यूनतम समर्थन मूल्य 4625 रुपए प्रति क्विंटल था जिसमें 200 रुपए बोनस भी शामिल था । अरहर की खेती को बढावा देने के उद्देश्य से सरकार ने 2016-17 में 425 रुपए प्रति क्विंटल का बोनस घोषित किया जिससे इसका न्यूनतम समर्थन मूल्य 5050 रुपए प्रति क्विंटल पहुंच गया ।

इस बार अरहर का न्यूनतम समर्थन मूल्य 5250 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है और इस पर 200 रुपए का बोनस भी घोषित किया गया है जिससे इसका न्यूनतम समर्थन मूल्य बढकर 5450 रुपए हो गया है।

वर्ष 2015-16 में मूंग का न्यूनतम समर्थन मूल्य 4650 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया था और इस पर 200 रुपए का बोनस भी दिया गया था जिससे इसका कुल मूल्य 4850 रुपए प्रति क्विंटल हो गया था ।

अगले वर्ष इस पर बोनस की राशि 425 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित की गयी जिससे न्यूनतम समर्थन मूल्य 5225 रुपए प्रति क्विंटल हो गया था। चालू वित्त वर्ष के दौरान मूंग का न्यूनतम समर्थन मूल्य 5375 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है और इस पर 200 रुपए का बोनस दिया गया है जिससे इसकी कुल कीमत 5575 रुपए प्रति क्विंटल हो गई है ।

रोज 33 किसान कर रहे है ख़ुदकुशी और किसान से जुड़े कारोबारी कमा रहे है करोड़ों

अब खेती करना बहुत मुश्किल हो गया है। पिछले 15 साल से हर बार नुकसान हो जाता है, इसलिए लगातार कर्ज में हैं। हालात इतने खराब हैं कि 10 साल (2001-2011) में देश में 90 लाख किसान कम हो गए हैं और 3.8 करोड़ खेतिहर मजदूर बढ़ गए हैं। वहीं, किसानी और खेती से जुड़े कारोबार तेजी से बढ़ रहे हैं। किसान को भले ही फायदा न हो रहा हो, लेकिन इनके जरिए कमाई करने वालों का कारोबार अच्छा चल रहा है। देश में पंपसेट, स्प्रिंकलर, पाइप और केबल का सालाना बिजनेस करीब एक लाख करोड़ रुपए का है। हर साल एवरेज 12000 किसान कर रहे खुदकुशी…

– हर साल किसान की खेती करने की लागत 7-8 फीसदी बढ़ गई है। जबकि इस साल पिछले चार साल की तुलना में अनाज और दालों की कीमतें सबसे नीचे चल रही हैं। वहीं दूसरी ओर खेती संबंधी तमाम कामों से जुड़ी कंपनियाें का लाभ हर साल करोड़ों रुपए में आ रहा है।
– केंद्र सरकार की ओर से मई में सुप्रीम कोर्ट में दी जानकारी के मुताबिक 2013 से लगातार हर साल एवरेज 12 हजार से ज्यादा किसान खुदकुशी कर रहे हैं। यानी रोजाना करीब 33 किसान।

किसानों के भरोसे चल रहे इन काराेबार में खूब मुनाफा:

1. फर्टिलाइजर

– सिर्फ तीन बड़ी कंपनियों की कमाई 1200 करोड़ रुपए
– देश में किसानों की हालत भले ही खराब हो, लेकिन फर्टिलाइजर की सबसे बड़ी तीन कंपनियों को 2016-17 के दौरान 1255.23 करोड़ का फायदा हुआ था। यह पिछले साल की तुलना में 37.45 फीसदी ज्यादा था। यानी साल दर साल इनकी आमदनी तो बढ़ रही है। सरकार इन्हें सब्सिडी भी देती है। इस बजट में 70 हजार करोड़ सब्सिडी का प्रावधान है।

2. पंप

कंपनियां 125 करोड़ के लाभ में, किसानों को महंगा लोन
– देश की तीन प्रमुख पंप सेट्स बनाने वाली कंपनियों का शुद्ध लाभ 2016-17 में 125.29 करोड़ रुपए हुआ। पंपसेट, स्प्रिंकलर, पाइप और केबल का बाजार सालाना करीब एक लाख करोड़ रुपए का है। कृषि उपकरण और ट्रैक्टर जैसी चीजों के लिए लोन 12% की दर पर मिलता है, जबकि कार के लिए 10% से कम पर ब्याज पर मिल जाता है।

3. पेस्टीसाइड्स

टॉप कंपनियों काे हुआ 900 करोड़ मुनाफा, 22% ज्यादा
– इस क्षेत्र की टॉप तीन कंपनियों ने 2016-17 में 895.89 करोड़ रुपए का शुद्ध लाभ कमाया। पिछले साल के मुकाबले यह 22.8 फीसदी अधिक था। पिछले फाइनेंशियल ईयर में इन्हीं कंपनियों ने 729.46 करोड़ रुपए का शुद्ध मुनाफा कमाया था। 2014-15 में ही देश इसका कारोबार 28,600 करोड़ रु. पहुंच गया था। जो 7.5 फीसदी से हर साल बढ़ रहा है।

4. बीज

– प्रमुख कंपनियों को 85 करोड़ का फायदा, टैक्स में भी छूट
– देश की बीज तैयार करने वाली तीन बड़ी कंपनियों को 2015-16 में 85.47 करोड़ रुपए का मुनाफा हुआ है। ब्रांडेड बीज कारोबार हर साल करीब 10% की रफ्तार से बढ़ रहा है। बीज का कारोबार 35 हजार करोड़ रुपए पर पहुंच गया है। किसान की फसलें सस्ती बिकती हैं, लेकिन बीज महंगा होता जा रहा है। सरकार बीज कंपनियों को टैक्स में भारी छूट भी देती है।

5. ट्रैक्टर्स

इन्होंने ट्रैक्टर बेचकर कमाया किसानों से 5300 करोड़
– देश में ट्रैक्टर बनाने वाली प्रमुख तीन कंपनियों की 2016-17 में कुल आय करीब 5300 करोड़ रुपए रही। इससे पहले के साल में यह करीब 4500 करोड़ रुपए थी। कंपनियों की आय करीब 17 फीसदी बढ़ी। देश में हर माह 50 लाख ट्रैक्टर बिक रहे हैं। जीएसटी लागू होने के बाद किसानों को प्रति ट्रैैक्टर करीब 30 हजार रुपए और चुकाने पड़ सकते हैं। सीआईआई के मुताबिक 2016-17 के दौरान देश में कुल 6,61,195 ट्रैक्टर बिके। अप्रैल 2017 में 54217 ट्रैक्टर खरीदे गए।