सवाई घास उगाकर करें 1.20 लाख तक की कमाई, सरकार दे रही सब्सिडी

खादी एवं विलेज इंडस्‍ट्री कमीशन लोगों को सवाई घास उगाने और फाइबर बैन (प्‍लाई यार्न) मेकिंग यूनिट लगाने के लिए प्रेरित कर रहा है। इसके लिए कमीशन द्वारा सब्सिडी तक दी जा रही है।ऐसे में, यदि आपके पास जमीन है या आप जमीन किराये पर ले सकते हैं तो आप एक अच्‍छा खासा बिजनेस शुरू कर सकते हैं। इसके लिए केवीआईसी द्वारा लोन दिया जाता है और लोन पर सब्सिडी दी जाती है।

आज हम आपको बताएंगे कि कैसे आप यह बिजनेस शुरू कर सकते हैं। सबसे पहले जानिए, सवाई घास क्‍या होती है?

क्‍या है सवाई घास

सवाई घास उन इलाकों में उगती है, जहां का सालाना रैन फाल 30 से 60 इंच होती है। यह घास मिट्टी के क्षरण को रोकती है। इस घास को नवंबर में काटा जाता है, जब यह काफी लम्‍बी हो जाती है।

इस घास का इस्‍तेमाल रस्‍सी बनाने के लिए होता है। रस्‍सी इतनी मजबूत होती है कि इससे झूला और पुल तक बनाए जाते हैं। इसके अलावा इससे मेट, सोल, अपर्स के अलावा कई तरह की सजावटी और दैनिक रोजमर्रा की चीजें बनती हैं।

क्‍या है प्रोजेक्‍ट कॉस्‍ट

खादी एंड विलेज इंडस्‍ट्रीज कमीशन द्वारा ग्रामोद्योग रोजगार योजना के लिए तैयार किए प्रोजेक्‍ट प्रोफाइल के मुताबिक, आपके इस प्रोजेक्‍ट की कॉस्‍ट लगभग 80 हजार रुपए है। अगर आपके पास जमीन है तो आप मात्र 250 वर्ग फुट का कच्‍चा शेड बना सकते हैं।

इसके अलावा आपको बैन मेकिंग मशीन, हैमर और टूल्‍स लेने होंगे। इस पर लगभग 45 हजार रुपए खर्च होंगे, जबकि एक महीने की वर्किंग कैपिटल 35000 रुपए होगी। यानी कि प्रोजेक्‍ट कॉस्‍ट 80 हजार रुपए होगी।

कितना मिलेगा लोन

अगर आप इस प्रोजेक्‍ट रिपोर्ट के आधार पर प्रधानमंत्री रोजगार योजना के तहत लोन के लिए अप्‍लाई करते हैं तो आपको लगभग 72 हजार रुपए का लोन मिल सकता है।

यानी कि आपको केवल 10 फीसदी यानी 8000 रुपए लगाने होंगे। इस पर आपको 15 से 25 फीसदी तक सब्सिडी मिल जाएगी।

क्‍या होगी कमाई

खादी विलेज इंडस्‍ट्री कमीशन द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट के मुताबिक, आपका कुल कॉस्‍ट ऑफ प्रोडक्‍शन लगभग 1 लाख 78 हजार रुपए आएगा और अगर आपके द्वारा उगाई गई घास पूरी बिक जाती है तो आपकी प्रोजेक्‍टेड सेल्‍स 3 लाख रुपए होगी। यानी कि आपका ग्रोस सरप्‍लस 1 लाख 21 हजार रहेगी और आपकी नेक्‍ट इनकम 1 लाख 18 हजार रुपए हो सकती है।

राजस्थान में इस खेती से किसानों को हो रहा लाखों का मुनाफा

अनार में जो गुण है वो किसी और फल में नहीं है इसलिए कहावत भी है एक अनार सौ बीमार । अनार के इन्हीं गुणों का महत्व समझते हुए अब अलवर के किसान फसलों के बजाय अनार की खेती में रूचि लेने लगे हैं।

कम लागत मेें लगने वाले अनार से प्रतिवर्ष लाखों रुपए की कमाई हो रही है। पिछले तीन सालों में उद्यान विभाग करीब 60 हजार पौधे वितरित कर चुका है। यदि यही स्थिति रही तो वो दिन दूर नहीं जब अलवर का नाम अनार के खेती के लिए पहचाना जाएगा।

घरेलू खेती से कम हो गए अनार के दाम

आज से तीन साल पहले बाजार में अनार की कीमत 140 – 150 रुपए थी। महंगा होने के कारण आम आदमी को अनार नसीब नहीं हो पाता था। लेकिन जब अलवर जिले में अनार की खेती बढऩे के कारण अब घरेलू अनार बाजार में आया तो दाम भी 70 – 80 रुपए तक आ गए हैं।

तीन साल पहले तक मात्र 10 प्रतिशत ही किसान अनार की खेती करते थे, लेकिन अब करीब 50 प्रतिशत किसानों ने अनार के बाग लगा लिए हैं। एक बार पौधा लगने के बाद दूसरे साल ही फल दे देता है। एक पौधा करीब 25 साल तक फल देता है।प्रतिदिन अनार का जूस पीने से खून तो बढ़ता ही है। इसे प्रतिदिन खाने से शारीरिक सौंदर्य भी बढ़ता है।

सरकार देती है सब्सिडी

अनार का बाग लगाने के लिए उद्यान विभाग शर्तो के अनुसार सब्सिडी देता है। एक किसान को 24 हजार रुपए की सब्सिडी दी जाती है। जो कि तीन किश्तों में दी जाती है। पहली किश्त में 60 प्रतिशत, द्वितीय में 20 प्रतिशत व तृतीय में भी 20 प्रतिशत सब्सिडी दी जाती है।

राजस्थान में अभी तक जयपुर, सीकर, पाली, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, झालावाड, जालोर आदि जगहों के नाम ही अनार की खेती के लिए जाने जाते थे। अब इसमें अलवर का नाम भी शामिल हो गया है। अलवर में टिश्यू कल्चर वाले अनार के पौधे लगाए जा रहे हैं। वर्तमान में अलवर जिले में किशनगढ़बास, राजगढ़, मुंडावर, बहरोड, तिजारा व उमरैण में अनार की खेती बहुतायत में हो रही है।

मांग बढऩे से बढ़ा रूझान

घरेलू व विदेशी बाजार में अनार की मांग बढऩे के कारण किसानों का रूझान अनार की खेती की तरफ बढ़ा है। किसानों को सरकार सब्सिडी भी दे रही है। उत्पादकता बढ़ाने के लिए समय समय पर प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। तीन सालों में 60 हजार अनार के पौधे वितरित किए जा चुके हैं।

15 हजार लगाकर किसान ने कमाए 3 लाख रु., आप भी कर सकते हैं तुलसी की खेती

औषधीय गुणों से भरपूर तुलसी का पौधा अधिकांश घरों में होता है। इसकी पूजा भी की जाती है। आप चाहें तो तुलसी की खेती कर मोटी कमाई भी कर सकते हैं। कॉस्मेटिक्स प्रोडक्ट्स के साथ ही दवाई बनाने वाली कंपनियों को इसकी जरूरत होती है।

उज्जैन के एक किसान ने 10 बीघा जमीन में 10 किलो बीज की बुवाई की थी। लागत का खर्चा 15 हजार रुपए आया और मुनाफा ढाई लाख रुपए से ज्यादा का रहा। आप भी चाहें तो तुलसी की खेती कर अच्छी कमाई कर सकते हैं।

3 माह में फसल हो जाती है तैयार

  • किसान अनोखीलाल पाटीदार ने 10 बीघा खेत में तुलसी की खेती की। 10 बीघा जमीन में फसल 3 माह में तैयार हो गई।
  • 1 बीघा पर खर्चा 1500 रुपए आया। इस तरह से 10 बीघा जमीन पर फसल लगाने पर कुल लागत 15 हजार रुपए आई।
  • किसान ने फसल को 3 लाख रुपए में बेचा। इस तरह 2 लाख 85 हजार रुपए की कमाई हुई।

कब करें खेती?

  • जुलाई तुलसी के पौधे को खेत में लगाने का सबसे सही समय होता है।
  • पौधे 45 गुणा 45 सेंटीमीटर के डिस्टेंस पर लगाए जाना चाहिए।
  • वहीं RRLOC 12 और RRLOC 14 किस्म के पौधे 50 गुणा 50 सेंटीमीटर के डिस्टेंस पर लगने चाहिए।
  • पौधों को लगाने के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करना जरूरी है।
  • हफ्ते में कम से कम एक बार या जरूरत के अनुसार पानी देना होता है।
  • एक्सपर्ट्स के अनुसार, कटाई से 10 दिन पहले सिंचाई देना बंद कर देना चाहिए।

गोबर खाद डालना फायदेमंद

  • 200 से 250 क्विंटल गोबर की खाद या कम्पोस्ट को जुताई के समय खेत में बराबर मात्रा में डालना चाहिए।
  • इसके बाद ही जुताई करना चाहिए। इससे खाद अच्छी तरह से मिट्टी में मिल जाती है।
  • खेत में आखिरी जुताई करते समय 100 किलोग्राम यूरिया, 500 किलोग्राम सुपर फास्फेट और 125 किलो म्यूरेट ऑफ पोटाश को एक हेक्टेयर के हिसाब से भूमि में मिला दें।
  • यूरिया की खाद को ऐसे डालना चाहिए जिससे यह पौधे की पत्तियों पर न जाए।

कब होती है कटाई

  • जब पौधों की पत्तियां हरे रंग की होने लगती हैं, तभी इनकी कटाई शुरू की जाती है। सही समय पर कटाई करना जरूरी है। ऐसा न करने पर तेल की मात्रा पर इसका असर होता है।
  • पौधे पर फूल आने के कारण भी तेल मात्रा कम हो जाती है, इसलिए जब पौधे पर फूल आना शुरू हो जाएं, तब इनकी कटाई शुरू कर देना चाहिए।
  • जल्दी नई शाखाएं आ जाएं, इसलिए कटाई 15 से 20 मीटर ऊंचाई से करनी चाहिए।

कितना आता है खर्चा

  • 1 बीघा जमीन पर खेती करते हैं तो 1 किलो बीज की जरूरत होगी। 10 बीघा जमीन पर 10 किलो बीज लगेंगे। इसकी कीमत 3 हजार रुपए के करीब होगी।
  • 10 से 15 हजार रुपए की खाद लगेगी।
  • सिंचाई का इंतजाम करना होगा।
  • एक सीजन में 8 क्विंटल तक पैदावार होती है। मार्केट में इसका प्राइस ढाई से 3 लाख रुपए तक है।
  • मंडी में 30 से 40 हजार रुपए प्रति क्विंटल के भाव तक तुलसी के बीज बिक जाते हैं।

कैसे बेचें माल

  • आप मंडी एजेंट्स के जरिए अपना माल बेच सकते हैं।
  • सीधे मंडी में जाकर भी खरीददारों से संपर्क कर सकते हैं।
  • कॉन्ट्रेक्ट फॉर्मिंग करवाने वाली दवा कंपनियों या एजेंसियों के जरिए खेती करें और इन्हें ही माल बेचें।

9 तरह के एग्री बि‍जनेस से पैसा कमाना सि‍खा रही है सरकार, 7000 रुपए में ट्रेनिंग

एग्री प्रोडक्‍ट्स का बिजनेस करना फायदे का सौदा साबित हो सकता है। हालांकि‍ इसमें सफल वही होता है, जि‍से इसकी जानकारी हो। अगर आपको खेतीबाड़ी की बेसिक जानकारी है और गांव में कुछ कनेक्‍शंस हैं तो आप और अच्‍छे ढंग से इस तरह का बि‍जनेस कर सकते हैं। आपके पास अच्‍छा मौका है कि आप एग्री बिजनेस पर हो रहे एंटरप्रेन्‍योरशिप डेवलपमेंट प्रोग्राम में हिस्‍सा ले सकें।

आप सरकार की मिनिस्‍ट्री ऑफ स्किल डेवलपमेंट के अधीन नेशनल इंस्टिट्यूट फॉर एंटरप्रेन्‍योरशिप एंड स्‍मॉल बिजनेस डेवलपमेंट (निसबड) द्वारा खेती से जुड़े अलग- अलग तरह के बिजनेस के बारे में ट्रेनिंग ले सकते हैं। आपको इस ट्रेनिंग प्रोग्राम के दौरान एग्री बिजनेस से जुड़ी छोटी से छोटी जानकारी दी जाएगी। आज हम अपको बताएंगे कि निसबड किस-किस तरह की ट्रेनिंग देगा और आप कैसे इस ट्रेनिंग प्रोग्राम में शामिल हो सकते हैं।

कैसे करें ऑर्गेनिक फार्मिंग

निसबड द्वारा ऑर्गेनिक फार्मिंग के बारे में पूरी जानकारी दी जाएगी, जैसे कि क्‍या है ऑर्गेनिक फार्मिंग, इसके फायदे क्‍या हैं, ऑर्गेनिक फार्मिंग की मार्केट क्‍या है, किस तरह की टैक्‍नोलॉजी का इस्‍तेमाल होता है, न्‍यूट्रीशन मैनेजमेंट क्‍या है, आर्गेनिक फार्मिंग की मैथेडोलॉजी, क्‍वालिटी अश्‍योरेंस, नेशनल प्रोग्राम ऑन ऑर्गेनिक प्रोडक्‍शन, ऑनलाइन सेल्‍स मॉडल, इको टूरिज्‍म, सरकार की स्‍कीम और सपोर्ट सिस्‍टम, भारत सरकार के असिस्‍टेंस प्रोग्राम आदि की जानकारी दी जाएगी।

कैसे करें डेयरी बिजनेस

इसी दौरान आपको डेयरी बिजनेस के बारे में भी ट्रेनिंग दी जाएगी। इसमें डेयरी लगाने से लेकर चलाने तक की पूरी गाइडेंस दी जाएगी। साथ ही, आपको सरकार के सपोर्ट सिस्‍टम और स्‍कीम के साथ साथ लोन स्‍कीम की भी जानकारी दी जाएगी। डेयरी बिजनेस में सफल स्‍टार्ट-अप्‍स के बारे में भी केस स्‍टडी के बारे में निसबड द्वारा बताया जाएगा।

कैसे करें फूड प्रोसेसिंग बिजनेस

निसबड के इस एंटरप्रेन्‍योरशिप डेवलपमेंट प्रोग्राम के दौरान आपको फूड प्रोसेसिंग बिजनेस के अलग-अलग मॉडल के बारे में भी बताया जाएगा। जैसे कि – फूड प्रोसेसिंग के एवेन्‍यू, छोटा फूड प्रोसेसिंग प्‍लांट कैसे लगाएं, फूड प्रोसेसिंग ब्रांड कैसे क्रिएट किया जाए, सरकार की सपोर्ट स्‍कीम, सक्‍सेसफुल स्‍टार्ट अप्‍स की केस स्‍टडी के बारे में जानकारी दी जाएगी।

इसके अलावा आपको कोल्‍ड स्‍टोरेज चेन खोलने के फायदे, तरीके और सरकारी स्‍कीम के बारे में भी ट्रेनिंग दी जाएगी। यहां यह उल्‍लेखनीय है कि देश में कोल्‍ड स्‍टोरेज चेन की सख्‍त जरूरत है और सरकार भी प्रमोट कर रही है। आप कोल्‍ड स्‍टोरेज चेन शुरू करने के बारे में सोच सकते हैं।

इन बिजनेस के भी लें सकेंगे ट्रेनिंग

  • ग्रीन हाउस
  • अरोमेटिक ऑयल
  • फ्लोरीकल्‍चर
  • फ्रूट कल्‍टीवेशन
  • पॉल्‍यूटरी एंड फिशरी

कैसे करें अप्‍लाई

यह दो दिन का ट्रेनिंग प्रोग्राम है। जो 16 व 17 जून को निसबड के नोएडा सेक्‍टर 62 स्थित सेंटर में होगा। इस प्रोग्राम की फीस 7000 रुपए है।

अगर आप हिस्‍सा लेना चाहते हैं तो इस लिंक पर क्लिक करके रजिस्‍ट्रेशन फॉर्म डाउनलोड कर सकते हैं।

http://niesbud.nic.in/docs/EDP-on-agri-business-16%20June-to-17-June-2018.pdf

किसानों को मिलेंगे 27 लाख सोलर पंप, मिलेंगे ये फायदे

ऊर्जा मंत्री आरके सिंह ने कहा कि कुसुम योजना के तहत 27.50 लाख सोलर पंप किसानों को मुहैया कराए जाएंगे। आगामी जुलाई से कुसुम योजना की शुरुआत होगी। उन्होंने कहा कि किसानों को सस्ती बिजली की जरूरत है, डीजल से पंप चलाना किसानों के लिए तर्कसंगत नहीं है।

उन्होंने बताया कि सरकार एक अप्रैल 2019 से सातों दिन 24 घंटे बिजली आपूर्ति करने को लेकर प्रतिबद्ध है और उसके लिये रूपरेखा तैयार की जा चुकी है। इसके अलावा, सभी गांवों को बिजली सुविधा उपलब्ध कराने के बाद अब इस साल दिसंबर तक बिजली से वंचित सभी परिवारों को बिजली कनेक्शन उपलब्ध करा दिया जाएगा।

मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार अभी करीब 3.13 करोड़ परिवार बिजली से वंचित हैं। सिंह ने बताया कि बीते चार साल में कुल विद्युत उत्पादन क्षमता में रिकार्ड एक लाख मेगावाट से अधिक की वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि पिछली सरकारों की 48 साल की तुलना में मौजूदा सरकार ने 48 महीने में जो उपलब्धियां हासिल की हैं, वह आंखें खोलने वाली है।

सिंह ने कहा कि पूर्व सरकारों में जहां क्षमता में सालाना औसतन 4,800 मेगावाट का इजाफा हुआ। वहीं हमने हर वर्ष 24,000 मेगावाट क्षमता जोड़े। पारेषण क्षमता में हमने हर साल 25,000 सर्किट किलोमीटर (सीकेएम) क्षमता सृजित की जबकि पिछली सरकारों में यह 3,400 सीकेएम थी।

2,630 से बढ़कर 22,000 मेगावाट हुआ सौर ऊर्जा उत्पादन

उन्होंने कहा कि पिछले चार साल में एक लाख मेगावाट बिजली क्षमता जोड़ी गयी और एक लाख सर्किट किलोमीटर अंतर-राज्यीय पारेषण क्षमता सृजित हुई। मार्च 2018 में कुल उत्पादन क्षमता 3,44,000 मेगावाट पहुंच गयी जो मार्च 2014 में 2,43,029 मेगावाट थी। पिछले साल सितंबर के अंतिम में सौभाग्य योजना शुरू किये जाने के बाद से अब तक लगभग 67.34 लाख घरों को बिजली पहुंचायी गयी है।

मंत्री ने बताया कि पिछले साल के मुकाबले कोयला आपूर्ति में 14 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाल रहे सिंह ने कहा कि अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में भी हमारी क्षमता पिछले चार साल में दोगुनी होकर 70,000 मेगावाट पहुंच गयी है।

सौर ऊर्जा उत्पादन क्षमता 2013-14 के 2,630 मेगावाट से बढ़कर मार्च 2018 में 22,000 मेगावाट तथा पवन ऊर्जा इसी अवधि में 21,000 मेगावाट से बढ़कर 34,000 मेगावाट पहुंच गयी है। सरकार ने 2022 तक अक्षय ऊर्जा स्रोतों से 1,75,000 मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता का लक्ष्य रखा है।

किसानों को डेढ़ गुना एमएसपी से खुश करने की तैयारी में सरकार, आज लग सकती है मुहर

दस दिनों की हड़ताल पर गए किसानों को खुश करने के लिए केंद्र सरकार बुधवार को डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का ऐलान कर सकती है। कैबिनेट बैठक में कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) की सिफारिशों पर मुहर लग सकती है। सीएसीपी ने पिछले साल की तुलना में प्रति क्विंटल 80 से 400 रुपये तक एमएसपी बढ़ाने को कहा है।

कृषि मंत्रालय को भेजी गई सीएसीपी की सिफारिशों में दालों और अनाज की एमएसपी में 40 से 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की सिफारिश की गई है। सूत्र बताते हैं कि मंत्रालय ने सीएसीपी की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है, हालांकि उसमें मामूली बदलाव किए गए हैं।

इसमें ज्यादातर फसलों की एमएसपी को 50 प्रतिशत तक बढ़ाया गया है जबकि कुछेक में बढ़त का प्रतिशत कम है। इसकी वजह सीएसीपी द्वारा कुछेक अनाज के एमएसपी में बढ़ोतरी को पिछले साल की तुलना में 40 प्रतिशत से कम रखा जाना था। माना जा रहा है कि यह अनाज ज्वार, बाजरा, मक्का और रागी समेत अन्य हैं।

सूत्र बताते है कि मंत्रालय ने नीति आयोग के कृषि विशेषज्ञों से इस पर विचार-विमर्श कर राय भी ली है। इसके बाद ही मंत्रालय ने कैबिनेट नोट जारी किया है जिस पर बुधवार को विचार-विमर्श किया जाएगा। याद रहे कि आयोग द्वारा खरीफ फसल में सरकार को लागत का डेढ़ गुना एमएसपी मुहैया कराने का खर्च 1.12 लाख करोड़ रुपये बताया गया था।

एक जून से दस दिनों की हड़ताल पर गए किसानों की मांगों में कर्ज माफी, डेढ़ गुना एमएसपी मुहैया कराना और स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करना है। केंद्र ने किसान हड़ताल को अब तक तव्वजो नहीं दी है, बल्कि केंद्र और भाजपा शासित राज्य में मंत्रियों ने इसे राजनीति से प्रेरित करार दिया है।

कृषि मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक सरकार का इरादा किसानों से बजट में किए गए वादे को पूरा करना है। वह उस दिशा में बढ़ रही है और जल्द ही खरीद पर डेढ़ गुना एमएसपी किसानों को मिलेगा। सीएसीपी ने ने अरहर, उड़द की एमएसपी प्रति क्विंटल 400 रुपये बढ़ाने की सिफारिश की है।

सीएसीपी ने मूंग पर 350 रुपये, धान (सामान्य व ग्रेड ए) पर प्रति क्विंटल 80 रुपये, ज्वार (हाइब्रिड, मलडांडी) पर 75 रुपये, बाजरा पर 95 रुपये, मक्का पर 60 रुपये और रागी पर 175 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी करने को कहा है। गौरतलब है कि सीएसीपी ने सिफारिशों में बढ़ोतरी का आकलन पिछले साल के एमएसपी के आधार पर किया है।

पहली ही फसल में किसान ने खजूर की खेती से कमाए 4 लाख रु

इराक से शुरू हुई खजूर की खेती अब मिस्र, लीबिया, पाकिस्तान, यूएसए, सूडान,सऊदी अरब और भारत तक में होती है। भारत खूजर के सबसे बड़े इम्पोर्टर देशों में से भी एक है। खजूर का इस्तेमाल अचार, जूस, चीनी, स्टार्च, छुहारा और शराब बनाने में भी किया जाता है। इसकी हर एक चीज काम की है।

खजूर की गुठली से पोल्ट्री आहार तैयार किया जाता है। इसकी पत्तियों से टोकरियां, कागज, रस्सी और झाड़ू बनाई जाती है। कई बीमारियों में भी खजूर दवा की तरह काम करता है। इस तरह से खजूर की खेती करना भी काफी फायदे का सौदा है। इसकी कई तरह की किस्म होती हैं।

राजस्थान के बाड़मेर जिले के चाइटन तहसील के आलमसर गांव के किसान सादुलाराम सियोल ने पहले ही साल में खूजर की खेती कर साढ़े तीन लाख रुपए कमाए थे। आज हम बता रहे हैं आप कैसे खजूर की खेती कर लाखों रुपए कमा सकते हैं।

50 साल से भी ज्यादा होती है लाइफ

  • खजूर के पेड़ सालों तक लगे होते हैं, इनकी लाइफ 50 साल से भी ज्यादा होती है ऐसे में जरूरी है कि इनके बीच में प्रॉपर स्पेस रखा जाए।
  • इन पेड़ों की अच्छी ग्रोथ के लिए हर रो (पंक्ति) के बीच 8 मीटर तक का डिस्टेंस रखा जाता है।
  • प्रति हेक्टेयर इसके करीब 160 प्लांट लगाए जाते हैं।

जमीन को कैसे तैयार करें

  • जिस जमीन पर खेती करना है उसकी 2 से 3 बार जुताई जरूरी होती है। बाद में मिट्टी को एक लेवल में करना होता है।
  • इसके लिए खोदे गए गड्ढों को करीब 2 हफ्ते तक ओपन रखने की सलाह दी जाती है।
  • जुलाई से सितंबर का टाइम प्लांटिंग के लिए बेस्ट होता है।
  • यदि जमीन में इरिगेशन की फेसिलिटी है तो फार्मर खजूर के प्लांट के बीच वाली जगह में दूसरी फसलें भी लगा सकते हैं। जैसे काला चना, हरा चना, मसूर, पपीता या सब्जियां भी उगा सकते हैं।

कितना पानी देना जरूरी

  • पेड़ों को कितना पानी देना है यह एरिया की क्लाइमेट कंडीशन और मिट्टी की मॉइश्चर होल्ड करने की कैपेसिटी पर डिपेंड करता है।
  • पेड़ों में लगातार मॉइश्चर बने रहना चाहिए लेकिन पानी ठहरना नहीं चाहिए। बारिश के मौसम में अलग से पानी देने की कोई जरूरत नहीं होती।
  • भारी बारिश से पानी जम जाए तो उसका निकलना सही होता है, वरना यह प्लांट को डैमेज कर सकता है।
  • हर साल 5 से 6 बार सिंचाई पर्याप्त होती है। प्लांटिंग के तुरंत बाद फ्रिक्वेंट इरिगेशन की जरूरत होती है।

अच्छी क्वालिटी के लिए क्या करना जरूरी

  • अच्छी क्वालिटी के लिए ओर्गेनिक फर्टिलाइजर्स का यूज करना चाहिए। इससे खजूर की पैदावार भी बढ़ती है।
  • केमिकल फर्टिलाइजर N: P: K को 30:20:50 के रेशो में अप्लाई करना चाहिए। यह मार्च और अप्रैल के महीने में यूज करना चाहिए।
  • इंडिया में ‘N’ का रिकमंडेड डोज 1.40kg/ट्री है। एक एडल्ट ट्री को 600ग्राम ‘N’, 100 ग्राम ‘P’ और 75 ग्राम ‘K’ की जरूरत हर साल होती है।
  • खजूर में मादा पौधों के बीच में 10 फीसदी नर पौधे होने चाहिए।

अब होती है हार्वेस्टिंग

  • खजूर प्लांटिंग के 6 से 7 साल में हार्वेस्टिंग के लिए तैयार हो जाते हैं। वैरायटी के हिसाब से खजूर अलग-अलग स्टेज में तोड़े जाते हैं। इसलिए हार्वेस्टिंग लोकल डिमांड पर भी डिपेंड करती है।
  • खजूर की पैदावार मिट्टी और क्लाइमेट पर डिपेंड करती है। 10 साल पुराना पेड़ हर साल 50 से 60 किलो खजूर देता है। साल दर साल इसकी खपत बढ़ती है। 15 साल तक एक पेड़ 80 किलो तक फल देता है।

विदर्भ के किसान की कहानी

68 साल के सवी थंगवाल विदर्भ के किसान हैं। जब खराब खेती से परेशान होकर विदर्भ के किसान आत्महत्या तक करने पर मजबूर हो गए थे तब थंगवाल ने एक अलग राह खोजी। उन्होंने ट्रेडीशनल खेती न करते हुए खजूर की खेती शुरू की। उन्होंने 2 एकड़ जमीन में खूजर के 130 प्लांट लगाए। एक प्लांट की कॉस्ट 6 हजार रुपए आई।

3 साल के बाद ही प्लांट में फ्रूट्स आना शुरू हो गए। चौथे साल 25 से 30 किलो खजूर प्रति पेड़ से प्राप्त होने लगे। खजूर बाजार में 300 रुपए किलो तक बिके। जिससे थंगवाल को बड़ा प्रॉफिट हुआ। अब उन्होंने 25 एकड़ जमीन में 300 प्लांट लगाए हैं। हर पेड़ से 100 किलो तक खजूर मिल रहा है। वे कहते हैं कि एक प्लांट को लगाने का खर्चा भी अब 3600 रुपए तक आ चुका है।

कितनी हुई इनकम

  • एक प्लांट की लागत 6 हजार रुपए।
  • इसी तरह 130 प्लांट की लागत 7 लाख 80 हजार रुपए।
  • एक प्लांट से 30 किलो खजूर एक सीजन में।
  • इसी तरह 130 प्लांट से 3900 किलो खजूर मिले।
  • एक किलो खजूर की कीमत 300 रुपए किलो।
  • इसी तरह 3900 किलो खजूर की कीमत 11 लाख 70 हजार रुपए।
  • इस तरह किसान को एक सीजन में ही 3 लाख 90 हजार रुपए का मुनाफा हुआ।
  • अगले सीजन से इसमें लागत की रकम भी नहीं जुड़ेगी और सौ प्रतिशत मुनाफा होगा।

कांट्रैक्ट खेती के लिए सरकार ने दी मंजूरी

कसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने के लिए सरकार ने एक और कानूनी सुधार की ओर कदम बढ़ाया है। कांट्रैक्ट खेती (ठेके पर खेती कानून) के मॉडल कानून को सरकार ने मंगलवार को हरी झंडी दे दी। राज्यों के कृषि मंत्रियों के राष्ट्रीय सम्मेलन में कांट्रैक्ट खेती के प्रावधानों पर राज्यों ने भी मोटे तौर पर अपनी सहमति दी है।

मॉडल कांट्रैक्ट कृषि कानून में कई अहम प्रावधान हुए हैं, जिसमें किसानों अथवा भूस्वामियों के हितों को सर्वोपरि रखा गया है। सम्मेलन में हुई चर्चा के दौरान कांट्रैक्ट कृषि उपज को कृषि उत्पाद विपणन कानून (मंडी कानून) के दायरे से अलग रखने पर आम राय बनी है। कोई भी थोक खरीद करने वाला उपभोक्ता सीधे खेत पर खरीद कर सकता है।

सम्मेलन में सभी राज्यों को मॉडल कानून सौंप दिया गया है। चर्चा के दौरान राज्यों को अपनी सुविधा के अनुसार प्रावधानों में संशोधन करने की छूट दी गई है, लेकिन कानून में किसानों के हितों के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता है। कांट्रैक्ट खेती के उत्पादों के मूल्य निर्धारण में पूर्व, वर्तमान और आगामी पैदावार को करार में शामिल किया जाएगा।

किसान और संबंधित कंपनी के बीच होने वाले करार के बीच प्रशासन तीसरा पक्ष होगा। ठेका खेती में भूमि पर कोई स्थायी निर्माण करना संभव नहीं होगा। छोटे व सीमांत किसानों को एकजुट करने को किसान उत्पादक संगठनों, कंपनियों को प्रोत्साहित किया जाएगा।

ठेका खेती से संबंधित विवादों के त्वरित निपटान के लिए सुगम और सामान्य विवाद निपटान तंत्र का गठन किया जाएगा। ठेका खेती के उत्पादों पर फसल बीमा के प्रावधान लागू किए जाएंगे। सम्मेलन में केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह के साथ कृषि राज्यमंत्री कृष्णाराज, गजेंद्र सिंह शेखावत, पुरुषोत्तम रुपाला और नीति आयोग के सदस्य प्रोफेसर रमेश चंद्र ने हिस्सा लिया।

आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड समेत कई राज्यों के कृषि मंत्रियों ने इसमें हिस्सा लिया।ठेका खेती में मॉडल कानून के लिए पिछले डेढ़ सालों से कवायद चल रही थी। रेनफेड प्राधिकरण के सीईओ डॉ. अशोक दलवई ने कानून का ब्योरा तैयार किया है।

लोगों की राय लेने के बाद इसे संशोधित कर राज्यों के समक्ष पेश किया गया। वैसे ठेका खेती को पहले ही कानूनी मान्यता मिली हुई थी, लेकिन बदली हुई परिस्थितियों में यह कामयाब नहीं है। इसके लागू होने के बाद किसानों को आमदनी बढ़ाने में मदद मिलेगी।

आप भी करें चंदन की खेती, 15 साल में होगी 15 करोड़ की कमाई

चंदन की खेती आपको कम इन्वेस्टमेंट में करोड़पति तक बना सकती है। यह एक लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट है। चंदन के पेड़ या बीज 15 से 20 सालों में तैयार होते हैं। तब इसका रिटर्न मिलता है। इसकी खेती में सरकार या बाकी प्राइवेट स्कीम में मिलने वाले रिटर्न से भी ज्यादा फायदा मिलता है।

पिछले दिनों गुजरात के भरूच के एक किसान ने 10 लाख लगाकर चंदन की खेती स्टार्ट की थी। 15 से 20 साल में इस खेती से उस किसान ने 15 करोड़ की कमाई की थी। यानी इस हिसाब से प्रति 1 लाख रु का इन्वेस्टमेंट करके 1.5 करोड़ रु का रिटर्न मिला। प्रतिशत में ये रिटर्न 1500% का हुआ।

चंदन की लकड़ी 6 से 7 हजार रुपए किलो बिकती है। कई बार इसके 10 हजार रु तक भी मिल जाते हैं। इन सबके बीच आज हम बता रहे हैं चंदन की खेती कैसे की जा सकती है और इससे कितनी कमाई हो सकती है। आप भी चंदन की खेती कर लाखों-करोड़ों रुपए कमा सकते हैं।

कैसे होती है चंदन की खेती

  • नर्सरी से पौधे लाकर या फिर बीज डालकर चंदन की खेती की जा सकती है।
  • चंदन का पेड़ लाल दोमट मिट्टी में अच्छा उगता है। ये पेड़ चट्टानी मैदान, पथरीली मिट्टी, चूनेदार मिट्टी को भी सहन कर सकते हैं। मिनरल्स और गिली मिट्टी में इसकी ग्रोथ तेजी से नहीं हो पाती।

कब होता है बेस्ट टाइम

  • अप्रैल-मई के महीने में बुवाई (Sowing) के लिए जमीन तैयार की जाती है। बुवाई से पहले एक गहरी जुताई (Tillage) करवाना होती है।
  • 2 से 3 बार खेत को जोता जाता है। वहीं क्यारियों के बीच 30 से 40 सेमी की दूरी भी रखनी होती है।
  • मानसून में इसके पेड़ तेजी से ग्रोथ करते हैं, लेकिन गर्मियों में इन्हें इरीगेशन (सिंचाई) की जरूरत होती है।

इरीगेशन कैसे करना चाहिए

  • इसमें ड्रिप प्रॉसेस से इरीगेशन किया जाता है। ताकि पानी भी कम लगे और जरूरत के मुताबिक सिंचाई भी हो सके।
  • हालांकि, सिंचाई मिट्टी में मॉइश्चर होल्ड करने की कैपेसिटी और मौसम पर भी काफी डिपेंड करती है।
  • चंदन के पेड़ को 5 से 50 डिग्री सेल्सियस टेम्प्रेचर वाले इलाके में लगाना सही माना जाता है।
  • इसके लिए 7 से 8.5 पीएच वाली मिट्टी परफेक्ट होती है।
  • एक एकड़ में औसत 400 पेड़ लगाए जा सकते हैं।

कितना करना पड़ेगा इन्वेस्टमेंट

  • इन्वेस्टमेंट की बात करें, तो चंदन का एक पौधा 40-50 रु का पड़ता है। एक एकड़ जमीन में एवरेज 400 पेड़ लगाए जा सकते हैं। यानी 20 हजार का ये खर्चा।
  • 40 से 50 हजार रुपए खाद में भी खर्च होंगे।
  • इसके बाद आपको 40 से 50 हजार रुपए जाली लगाने में खर्च करने होंगे। ताकि चंदन के पौधे सुरक्षित रहें।

  • चंदन के पेड़ों का इंश्योरेंस भी करवाया जाता है, क्योंकि इन पेड़ों के चोरी का डर होता है। चोरी होने पर इंश्योरेंस कंपनी से आप पैसा ले सकेंगे।
  • सिक्योरिटी के लिए गार्ड अपॉइंट करना होगा। या फिर आप खुद भी इसकी देखरेख कर सकते हैं।
  • इन सबके अलावा सिंचाई पर भी खर्च करना होगा।

 कितने समय में बढ़ते हैं पेड़

  • चंदन लगाने के बाद 5वें साल से लकड़ी रसदार बनना शुरू हो जाती है। 12 से 15 साल के बीच यह बिकने के लिए तैयार हो जाता है।
  • चंदन के पेड़ की जड़ से सुगंधित प्रोडक्ट्स बनते हैं। इसलिए पेड़ को काटने के बजाए जड़ से ही उखाड़ा जाता है।
  • उखाड़ने के बाद इसे टुकड़ों में काटा जाता है। ऐसा करके रसदार लकड़ी को कर लिया जाता है।
  • एवरेज कंडीशन में एक चंदन के पेड़ से करीब 40 किलो तक अच्छी लकड़ी निकल जाती है।

10 लाख से बनाए 15 करोड़ रुपए…

  • गुजरात के भरुच के पास अलपा गांव में रहने वाले अल्पेश पटेल ने मीडिया के साथ अपने चंदन की खेती के एक्सपीरियंस को शेयर किया था।
  • 2003 में जब गुजरात सरकार ने राज्य के किसानों को चंदन की खेती की इजाजत दी तो चंदन की खेती का जोखिम उठाने को कोई तैयार नहीं था।
  • अल्पेश ने करीब 5 एकड़ जमीन पर 1 हजार चंदन के पेड़ लगा दिए। शुरुआत में फसल खराब हो गई। हालांकि अल्पेश ने हार नहीं मानी।
  • 10 लाख रुपए के इन्वेस्टमेंट से शुरू हुई उनकी खेती 15 साल बाद करीब 15 करोड़ रुपए तक पहुंच गई। उन्हें चंदन की खेती से 150 गुना तक का फायदा हुआ। उन्हें राज्य में सर्वश्रेष्ठ किसान का अवॉर्ड भी मिल चुका है।

सबसे महंगा तेल बिकता है

  • चंदन के पेड़ में सबसे महंगी चीज इसका तेल होता है। एक पेड़ की जड़ से करीब पौने 3 लीटर तक तेल निकलता है। बाजार में चंदन के तेल का भाव 2 लाख रुपए लीटर तक है।
  • चंदन की खेती को बढ़ावा देने के लिए कई प्रदेशों में यह प्रावधान किया गया है कि अपने खेत में व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए चंदन उगाने वाले किसान उसे काट भी सकेंगे।

कितनी होती है कमाई

  • भारतीय चंदन की खुशबू बाकी देशों के चंदन से 1 से 6 प्रतिशत ज्यादा होती है। इस वजह से भी डिमांड इंटरनेशनल मार्केट में ज्यादा है।
  • रसदार लकड़ी वाला भारतीय चंदन 6 से 7 हजार रुपए प्रति किलो बिकता है। सूखी लकड़ी वाला चंदन 2 से 3 हजार रुपए किलो तक बिकता है।
  • चंदन के 1 पेड़ से लगभग 20 से 40 तक किलो लकड़ी मिल जाती है। बाजार में यह 6 से 7 हजार रुपए किलो तक बिकती है।
  • 7 हजार को हिसाब मानें तो एक पेड़ से पौने तीन लाख रुपए तक की लकड़ी मिल जाती है। एक एकड़ में औसत 400 पेड़ लगते हैं। इस हिसाब से 11 करोड़ रुपए से भी ज्यादा की कमाई इससे की जा सकती है।
  • चंदन के पेड़ में लगभग 2 लीटर तेल निकलता है। तेल के अलावा इसके बीज, सूखी हुई लकड़ी भी महंगे दामों में बिकती हैं।
  • चंदन का इस्तेमाल इत्र, औषधी, धूप, ब्यूटी प्रोडक्ट आदि में किया जाता है।

कम पानी में ज्यादा उत्पादन चाहिए तो लगाएं धान की यह किस्मे

धान की फसल को ज्यादा पानी वाली फसल माना जाता है और यह बिलकुल सच भी है लेकिन कुश ऐसी भी किस्मे है जिनके उपयोग से आप बहुत सारा पानी बचा सकते हो कुछ ऐसी ।

इन किस्मो की खास बात यह है की समय पर अच्छी बरिश न भी हो तो किसानों को परेशान होने की जरूरत नहीं है। किसान अगर सतर्कता से काम लें तो वह सूखे की स्थिति से निपट सकते हैं।इन किस्मों को सिंचाई की भी काफी कम जरूरत पड़ती है ।

धान की इन किस्मों में पूसा सुगंध-5, पूसा बासमती-1121, पूसा-1612, पूसा बासमती-1509, पूसा-1610 आदि शामिल हैं। धान की यह प्रजातियाँ लगभग चार माह में पैदावार दे देती हैं।

जुलाई माह में भी पर्याप्त बारिश नहीं होती है तो भी धान की इन किस्मो की पौध जुलाई में तैयार करके अगस्त में रोपाई की जा सकती है।

कम बरसात वाले क्षेत्रों में सरसों की पैदावार लेना भी एक अच्छा विकल्प साबित हो सकता है। इसकी फसल को अगस्त और सितम्बर के दौरान लगाकर कम बारिश और सिंचाई की सुविधाओं की कमी के बावजूद अच्छी पैदावार की जा सकती है।

वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि किसान विकल्प के तौर पर एक और प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। इस प्रौद्योगिकी के अनुसार धान की बुवाई गेहूँ की तरह खेतों में की जा सकती है। पौध तैयार करने की जरूरत नहीं है।

जहाँ सिंचाई सुविधाओं का अभाव है और बरसात भी कम होती हो वहाँ ड्रिप सिंचाई, फव्वारा सिंचाई, पॉली हाउस तथा नेट हाउस जैसी आधुनिक सिंचाई तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। इन आधुनिक तकनीकों का प्रयोग कर कम सिंचाई के बावजूद अच्छी फसलें तैयार की जा सकती हैं। इन तकनीकों के इस्तेमाल के लिये सरकारें भी अनुदान देकर प्रोत्साहित करती हैं।