इस तरीके को अपनाकर आप लौकी की एक बेल से ले सकते है 800 लौकी

आज हम बात करेंगे लौकी के एक ही पौधे से ज्यादा से ज्यादा फल लेने के बारे में। औसतन एक पौधे (बेल) से 50-150 लौकियां निकलती हैं। लेकिन अगर थोड़ी मेहनत और तकनीकी की मदद ली जाए तो एक ही बेल से 800 तक लौकियां ली जा सकती हैं.. यानि आप का मुनाफा की गुना बढ़ जाएगा, जबकि लागत ज्यादा प्रभावित नहीं होगी।

लौकी की खेती करने वाले किसान इस तकनीक से लौकी की ज्यादा फसल उगाकर फायदा उठा सकते हैं। सभी तरह के सजीव में नर और मादा होते हैं। ऐसे ही सब्जियों में भी नर और मादा दो तरह के फूल होते हैं। लेकिन लौकी की बेल में नर फूल ही होते हैं। लौकी में एक विशेष तरह की तकनीकि का इस्तेमाल करने पर ही उसमें मादा फूल आते हैं और लौकी की एक बेल से लौकी का ज्यादा उत्पादन किया जा सकता है। इस तकनीकि का नाम है 3 ‘जी’।

ये है तरीका

लौकी की बेल की एक खासियत है कि उसकी बेल चाहे जितनी भी लंबी हो जाए उसमें नर ही फूल आते हैं। इसको रोकने के लिये एक नर फूल छोड़कर बाकी सारे नर फूल तोड़ दें। उसके कुछ दिनों के बाद उसी बेल में साइड से एक शाखा निकलने लगेगी अब उस शाखा में आने वाले जितने नर फूल हैं उनमें से एक को छोड़कर बाकी के सारे नर फूल तोड़ दें।

अब उस शाखा को किसी लकड़ी से बाध दीजिये ताकि वो चलती रहे। ध्यान रखें तीन से ज्यादा शाखाएं न होने दें। अब कुछ दिन के बाद बेल से तीसरी शाखा निकलने लगेगी। अब इस शाखा के हर पत्ते में मादा फूल आएगा। यही मादा फूल फल में बदल जाएगा। मादा फूल की पहचान के लिये बता दें कि ये कैप्सूल की लंबाई में होगा। इस तरीके को अपना कर लगभग 300 से 400 तक लौकी एक बेल में आएंगी।”

ये तरीका अपना कर कर सकते हैं 800 तक लौकी का उत्पादन

3 जी तकनीकि में कुछ एहतियात के साथ अगर लौकी की खेती करें तो एक बेल से लगभग 800 तक लौकी का भी उत्पादन किया जा सकता है। ये काफी हद तक मौसम पर भी निर्भर करता है। और 3 जी की प्रक्रिया को मचान पर करने से लगभग 800 तक की लौकी का उत्पादन कर सकते हैं। ध्यान रहे कि 20 लौकी के पौधे में ये प्रक्रिया अपनाने के बाद 21 वें पेड़ में कुछ नहीं किया जाएगा। इसके बाद 22 वें पेड़ से फिर से वहीं प्रक्रिया दोहराते रहिये। मान लीजिये कि एक हेक्टेयर में 500 लौकी के पौधे लगाए गए तो 20 पौधों के बाद 21 वें पौधे पर ये प्रक्रिया न अपनाएं उसके बाद 22 वें पेड़ से फिर से वो प्रक्रिया दोहराएं।

अगर चाहते हैं लौकी लगे देखने में अच्छी तो ये तरीका अपनाएं

इसके लिये जब लौकी छोटी हो तो उसे हार्ड पारदर्शी प्लास्टिक से बांध दीजिये। ध्यान रहे कि पॉलिथीन का साइज वही हो जो लौकी का है। मान लीजिये अगर लौकी का साइज दो फीट है तो पॉलिथीन की लंबाई भी दो फीट की होनी चाहिये। यहां पर ये भी ध्यान रखें कि पॉलिथीन दूसरे छोर से फटी होनी चाहिये। ताकि लौकी में वाष्पोत्सर्जन हो सके। इससे लौकी की क्वालिटी अच्छी रहेगी। इस क्रिया को अपनाने से लौकी अन्य लौकियों से ज्यादा आकर्षक लगेगी और किसान को कीमत भी अच्छी मिलेगी।

स्वाद पर असर

इस प्रयोग से अगर आप लौकी की खेती करते हैं तो लौकी के स्वाद में कोई परिवर्तन नहीं होता है। उसका स्वाद प्राकृतिक ही रहता है। वैसे तो लौकी हर मौसम में होती है। लेकिन रबी के मौसम में लौकी की खेती अच्छी होती है।

(3जी तकनीकी का वीडियो नीचे देखिए)

20 रुपए की ये शीशी किसानों को कर सकती है मालामाल, पढ़िए पूरी जानकारी

खेती-किसानी में सबसे ज्यादा पैसा उर्वरक पर खर्चा होता है। डीएपी यूरिया और दूसरे फर्टीलाइजर एक तरफ जहां काफी महंगे होते हैं वहीं इनके लगातार इस्तेमाल से जमीन की उर्वरा शक्ति भी घटती है। पहले की तरह किसान अब खेत में गोबर का कम इस्तेमाल करते हैं और फसलों को अवशेष (पुवाली आदि) खेत में नहीं छोड़ते, जिसके चलते जमीन में कार्बन तत्व घट रहे हैं।

इसकी एक वजह जैविक खरीदे से कंपोस्ट (खाद) बनाने में काफी समय लगता है। उर्वरक मंगाने में सरकार के भी डालर खर्च होते हैं इसलिए वो जैविक खेती और किसान खुद पर खाद बनाएं इसके लिए प्रेरित कर रही है।

भारत सरकार के कृषि विभाग के जैविक कृषि केंद्र ने भी एक वेस्ट डीकंपोजर बनाया है। राष्‍ट्रीय जैवि‍क खेती केंद्र ने इस तरह वेस्ट डीकंपोजर के 40 मिलीलीटर शीशी की कीमत 20 रुपए रखी है। संस्थान का दावा है इससे कुछ ही देर में कई सौ लीटर तरल खाद तैयार ( लिक्‍वि‍ड खाद) तैयार हो जाती है।

इसके अलावा आप इसकी मदद से घरेलू कचरे से कई एकड़ जमीन के लि‍ए बेहतरीन खाद भी तैयार कर सकते हैं। इसकी सबसे बड़ी खासि‍यत है कि‍ यह केवल 20 रुपए (40 मिलीलीटर) में आता है और दूसरी बात ये है कि‍ इसे कोई प्राइवेट कंपनी नहीं बल्‍कि‍ खुद सरकार दे रही है।

इसका इस्तेमाल करने के लिये दी जाती है ट्रेनिंग

इसका प्रयोग फसलों की सिंचाई, तैयार फसल में छिड़काव और बीजों के शोधन में किया जा सकता है। केंद्र सरकार न केवल इस प्रोडक्‍ट को उपलब्‍ध कराता है बल्‍कि‍ कि‍सानों को इसे यूज करने की ट्रेनिंग भी देता है। इसके लि‍ए बाकायदा वीडि‍यो भी बनाए गए हैं। खेतीबाड़ी में रासायनों के इस्‍तेमाल को कम करने के मकसद से ही इसका नि‍र्माण कि‍या गया है। केंद्र के मुताबि‍क, जि‍न भी कि‍सानों ने इसका इस्‍तेमाल कि‍या है, उनके न केवल पैसे बचे हैं बल्‍कि‍ अच्‍छा उत्‍पादन भी हासि‍ल कि‍या है।

देखिए पूरा वीडियो कैसे काम करती है ये ‘दवा’

कि‍सान उठा रहे हैं लाभ

केंद्र के नि‍देशक डॉक्‍टर कि‍शन चंद्रा ने इस संबंध में एक वीडि‍यो भी अपलोड कि‍या है, जि‍समें वह इसके फायदों के बारे में बता रहे हैं। चंद्रा कहते हैं कि‍ सभी कि‍सान बेधड़क इसका यूज कर सकते हैं। उन्‍होंने बताया कि‍ पहले इस तरह के फॉर्मूले को प्राइवेट इंडस्‍ट्री को बेच दि‍या जाता था और वह प्रोडक्‍ट बनाकर बाजार में लाते थे। मगर उसकी क्‍वालि‍टी सही नहीं होती थी इसलि‍ए इस बार सरकार ने यह फैसला लि‍या है कि‍ वेस्‍ट डीकंपोजर को सरकार खुद ही कि‍सानों तक पहुंचाएगी।

कि‍स तरह से काम करता है यह प्रोडक्‍ट

यह एक छोटी सी शीशी में होता है। इस्‍तेमाल करने के लि‍ए 200 लीटर पानी में 2 किलो गुड़ के साथ इसे डालकर अच्‍छे से मि‍ला दें। गर्मियों में दो दिन और सर्दियों में 4 दिन तक इसे रखें। इसके बाद यह यूज करने के लि‍ए तैयार हो जाता है। इस दौ सौ लीटर घोल से एक बाल्टी घोल को फिर 200 लीटर पानी में मिला लें। इस तरह यह घोल बनाते रहें और खेत की सिंचाई करते समय पानी में इस घोल को डालते रहें। ड्रिप सिंचाई के साथ भी इस घोल का प्रयोग कर सकते हैं। इससे पूरे खेत में यह फैल जाएगा। इसके अलावा फसलों की बीमारी को दूर करने के लिए हर एक महीने में एक बार वेस्‍ट डीकंपोजर का छिड़काव कर सकते हैं।

इस तरह से बनाएं खाद और बीजों का शोधन

कम्पोस्ट खाद बनाने के लिए 1 टन कूड़े-कचरे में 20 लीटर वेस्‍ट डीकंपोजर का तैयार घोल छिड़क दें। इसके ऊपर एक परत बिछा दें और फिर घोल का छिड़काव करें। फि‍र सब ढक कर छोड़ दें। तकरीबन 40 दिन में कम्पोस्ट खाद तैयार हो जाएगी। केंद्र से मि‍ली जानकारी के मुताबि‍क, एक शीशी से 20 किलो बीज का शोधन किया जा सकता है। एक शीशी डिकम्पोस्ट को 30 ग्राम गुड़ में मिला दें। यह मिश्रण 20 किलो बीज के लिए पर्याप्त है। शोधन के आधे घंटे बाद बीज की बुआई कर सकते हैं।

इस तरह से पाएं ये प्रोडक्‍ट

वेस्‍ट डीकंपोजर राष्‍ट्रीय जैवि‍ खेती केंद्र के सभी रीजनल सेंटर पर उपलब्‍ध है। यह गाजि‍याबाद, बंगलुरु, भुवनेश्‍वर, पंचकूला, इंम्‍फाल, जबलपुर, नागरपुर और पटना के रीजनल सेंटर से प्राप्‍त कि‍या जा सकता है

अब हाइड्रोजेल से सिर्फ एक सिंचाई से होगी फसल

इस हालात में खेती को अगर बचाना है तो ऐसे विकल्पों पर विचार करना होगा जिसमें सिंचाई में पानी की बर्बादी न हो और पूरी कवायद में hydrogel (हाइड्रोजेल) किसी चमत्कार से कम नहीं है।अब बार बार सिंचाई करने की जरूरत नहीं है क्योंकि सिर्फ एक बार सिंचाई करने पर इतना पानी सोख लेता है की बाद में सिंचाई की जरूरत ही नहीं रहती ।

दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) जिसे पूसा संस्थान भी कहा जाता है, के वैज्ञानिकों ने ही इस अद्र्घ-कृत्रिम हाइड्रोफिलिक पॉलिमर जेल का विकास किया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि इस जेल में कई ऐसी खासियत हैं जो जैव चिकित्सा में इस्तेमाल किए जाने वाले दूसरे तरल पदार्थों को अवशोषित करने वाले जेल से उसे अलग करती है।

इसे ‘पूसा हाइड्रोजेल’ नाम दिया गया है । इस तरह प्रति हेक्टेयर जमीन में केवल 2.5 से 3.75 किलो जेल डालने की जरूरत होती है। अब तक दुनिया में ऐसे जितने भी जेल तैयार किए गए हैं उनकी तकरीबन 10 किलो मात्रा एक हेक्टेयर जमीन में डालनी पड़ती है।

हाल ही में कृषि विज्ञानियों ने एक शोध किया है जिसमें पता चला है कि hydrogel (हाइड्रोजेल) की मदद से बारिश और सिंचाई के पानी को स्टोर कर रखा जा सकता है और इसका इस्तेमाल उस वक्त किया जा सकता है जब फसलों को पानी की जरूरत पड़ेगी।

hydrogel (हाइड्रोजेल) पोलिमर है जिसमें पानी को सोख लेने की अकूत क्षमता होती है और यह पानी में घुलता भी नहीं। hydrogel (हाइड्रोजेल) बायोडिग्रेडेबल भी होता है जिस कारण इससे प्रदूषण का खतरा भी नहीं रहता है।

शोधपत्र में कहा गया है कि hydrogel (हाइड्रोजेल) खेत की उर्वरा शक्ति को तनिक भी नुकसान नहीं पहुँचाता है और इसमें 400 गुना पानी सोख लेने की क्षमता होती है। शोधपत्र में कहा गया है कि एक एकड़ खेत में महज 1 से 2 किलोग्राम hydrogel (हाइड्रोजेल) ही पर्याप्त है।hydrogel (हाइड्रोजेल) 40 से 50 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी खराब नहीं होता है, इसलिये इसका इस्तेमाल ऐसे क्षेत्रों में किया जा सकता है, जहाँ सूखा पड़ता है।

शोधपत्र के अनुसार, खेतों में hydrogel (हाइड्रोजेल) का एक बार इस्तेमाल किया जाये, तो वह 2 से 5 वर्षों तक काम करता है और इसके बाद ही वह नष्ट हो जाता है लेकिन नष्ट होने पर खेतों की उर्वरा शक्ति पर कोई नकारात्मक असर नहीं डालता है, बल्कि समय-समय पर पानी देकर फसलों और खेतों को फायदा ही पहुँचाता है।

hydrogel (हाइड्रोजेल) का इस्तेमाल उस वक्त किया जा सकता है जब फसलें बोई जाती हैं। फसलों के साथ ही इसके कण भी खेतों में डाले जा सकते हैं।hydrogel (हाइड्रोजेल) के इस्तेमाल को लेकर कई प्रयोगशालाओं में व्यापक शोध किया गया है और इन शोधों के आधार पर ही यह शोधपत्र तैयार किया गया है।

शोधपत्र में कहा गया है कि मक्के, गेहूँ, आलू, सोयाबीन, सरसों, प्याज, टमाटर, फूलगोभी, गाजर, धान, गन्ने, हल्दी, जूट समेत अन्य फसलों में hydrogel (हाइड्रोजेल) का इस्तेमाल कर पाया गया कि इससे उत्पादकता तो बढ़ती है, लेकिन पर्यावरण और फसलों को किसी तरह का नुकसान नहीं होता है।

Hydrogel (हाइड्रोजेल) कैसे काम करता है ?

hydrogel (हाइड्रोजेल) अपने भार के मुकाबले 400 गुना से भी ज्यादा पानी को सोख सकते हैं. धीरे-धीरे जब इसके आसपास गर्मी बढ़ने लगती है, तो hydrogel (हाइड्रोजेल) तेजी से पानी छोडना शुरू करता है.

यह सोखे गये जल का 95 फीसदी तक वापस छोड़ता है. पानी को छोड़ने की प्रक्रिया के दौरान यह रीहाइड्रेट होगा और इसे स्टोर करने के लिए इस प्रक्रिया को फिर से दोहराया जा सकता है. इस प्रकार यह प्रक्रिया दो से पांच सालों तक जारी रह सकती है, जिस दौरान बायोडिग्रेडेबल hydrogel (हाइड्रोजेल) डिकंपोज होता रहेगा. यानी फसलों के लिए पानी की जरूरतों को पूरा करता रहेगा.

अब इस मोबाइल ऐप से मिंटों में करें जमीन को नापने का मुश्किल काम

अगर आप अपने खेत ,प्लाट ,दुकान जा किसी और चीज जो नापना चाहते है तो आप सिर्फ एक मोबाइल के साथ कर सकते है और वो भी बहुत आसानी और सटीकता के साथ । बस उसके लिए आपके फ़ोन में मोबाइल इंटरनेट और जीपीएस सिस्टम होना चाहिए । जो की अब लगभग हर मोबाइल फ़ोन में होता ही है । जमीन को नापने के लिए बस आपको एक ऐप अपने फ़ोन पर करनी होगी और उसके बाद जिस जमीन को नापना है । उसके इर्द गिर्द चक्र लगाना है बस बाकि बाकि का काम ऐप ही करेगी ।

सबसे पहले Google Play Store पर जा कर “Distance and area measurement ” ऐप इंसटाल करो इस ऐप की रेटिंग 4.1 है जो काफी अच्छी है । उसके बाद इसका जीपीएस सिस्टम ऑन करें ।अब ऐप को OPEN करें ।

उसके बाद Distance : के लिए मीटर,फ़ीट ,यार्ड आदि में से चुने ,आप फ़ीट चुन सकते है क्यूंकि ज्यादतर हमारे ये ही इस्तेमाल होता है । अब अगर अपने अपने खेत का ज़मीन नापना है तो Area : के लिए acre चुने । एक और ऑप्शन Logging है जिसे Auto पर रहने दे ।

अब इसमें एक स्टार्ट का बटन दिया हुआ है उसको दबा कर जिस जमीन को नापना है उसके इर्द गिर्द पूरा एक चक्र लगायें । ध्यान रहे जिस जगह को नापना है उसके किनारों पर बिलकुल साथ साथ चलें नहीं तो एरिया ज्यादा आ ज्यागा । जहाँ से आप ने चलना शुरू क्या था वहां तक चक्र पूरा करें । बस जैसे ही आप चक्र पूरा करेंगे साथ की साथ आप को पता चल जायगा की टोटल एरिया कितना है ।

वैसे तो यह ऐप बहुत हद तक बिलकुल सही एरिया बताती है लेकिन कभी कभी इंटरनेट ठीक ना चलने के वजह से थोड़ी बहुत गड़बड़ हो जाती है इस लिए इस ऐप का का प्रयोग सिर्फ कच्चा अंदाज़ा लगाने के लिए करें । कल जब आप खेत जायेंगे तो इसका इस्तेमाल कर अपना खेत जरूर नाप के देखना ।

राजस्थान के किसान भी करने लगे केसर की खेती ,सरकार से माँगा सहयोग

जम्मू-कश्मीर जैसे ठंडे प्रदेश में पनपने वाली केसर की खेती शेखावाटी के धोरों में भी होने लगी है। केसर का जायका थोड़ा कड़वा जरूर होता है, लेकिन यही केसर शेखावाटी की धरा में नई खुशबू और मिठास घोल रही है। शेखावाटी में केसर की खेती की बात करना मजाक समझा जाता था, लेकिन केसर के जरिए किसानों की जिंदगी में नए रंग घोलने के लिए मोरारका फाउंडेशन आगे आया है।

फाउंडेशन के प्रयासों से आठ किसान प्रायोगिक तौर पर इसकी खेती करने लग गए है और यह खेती कुछ सफल भी होने लगी है। सबसे पहले चेलासी गांव के किसान मुरली धर सैनी ने इसकी खेती कर इसकी संभावना को मजबूती दी है। मोरारका हवेली में भी केसर की क्यारी तैयार की गई है। करीब नौ-दस में फूल भी खिले हैं। इन फूलों से केसर का उत्पादन होगा।

 

मोरारका फाउंडेशन के स्थानीय मैनेजर अनिल सैनी ने बताया कि कश्मीर से लाए प्रमाणित बीज से खेती शुरू की है गई। सर्दी का मौसम केसर की फसल के लिए सबसे उत्तम है। दिन में धूप खिलने और रात को सर्दी पड़ने से फूल ज्यादा आते हैं। केसर के फूलों को रात के अंधेरे में बंद कमरे में सुखाना पड़ता है। सुखाते समय भी फूलों की खास देखभाल करनी पड़ती है।

कृषि विभाग के अधिकारी इस बात का दावा करते हैं कि यहां पैदा होने वाली केसर की गुणवत्ता अच्छी नहीं हो सकती, क्योंकि श्रेष्ठ किस्म के लिए लम्बे समय तक शून्य से कम तापमान चाहिए। अनिल सैनी इस दावे को खारिज करते हैं। फिलहाल मोरारका हवेली, कल्याणपुरा के रामावतार बुगालिया, बलवंतपुरा फाटक के संजू सैनी, बड़ी झीगर के ओमप्रकाश पचार, बसावा के भानाराम सैनी, बलरिया का बास के नेमीचंद धायलों का बास के बलवीर सिंह केसर की खेती कर रहे हैं।

पायलट प्रोजेक्ट बनाकर सरकार के पास भेजा जाएगा

किसान केसर की खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकार से सहयोग मांग रहे हैं। पायलट प्रोजेक्ट बना सरकार के पास भेजा जाएगा। जैविक खेती करने वाले किसानों को शामिल किया जाएगा। सरकार की ओर से केसर के बीज खाद उपलब्ध कराई जाए तो इसकी खेती को बढ़ावा मिल सकता है।

आवारा पशुओं को खेतों से दूर रखने के लिए अपनाएं यह 10 तरिके

भारत का हर एक किसान आवारा पशुओं के आतंक से परेशान हैं। हजारों रुपए की लागत और हड्डी तोड़ मेहनत से तैयार होती फसल को छुट्टा जानवर बर्बाद कर देते हैं, किसानों को सबसे अधिक नुकसान नीलगाय करती हैं। कई किसान रात-रात भर जागकर खेतों की रखवाली कर रहे हैं। इन छुट्टा जानवरों का असर खेती पर पड़ रहा है।

नीलगाय के आतंक से परेशान किसानों के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने कई घरेलू और परंपरागत नुस्ख़े बताए हैं जिससे काफी कम कीमत में किसानों को ऐसे पशुओं से आजादी मिल सकती है। गोमूत्र, मट्ठा और लालमिर्च समेत कई घरेलू चीजों से तैयार हर्बल घोल इस दिशा में कारगर साबित हो रहा है।

हर्बल घोल की गंध से नीलगाय,गाय और दूसरे जानवर 20-30 दिन तक खेत के आसपास नहीं फटकते हैं। कृषि के जानकार, वैज्ञानिक और केंद्रीय कृषि मंत्रालय द्वारा संचालित किसान कॉल सेंटर (1800-180-1551) के किसान सलाहकार किसानों को इऩ देसी नुस्ख़ों को आजमाने की सलाह दे रहे हैं।

नीलगाय झुंड में रहती हैं तो जितना ये फसलों को खाकर नुकसान करती हैं उससे ज्यादा इनके पैरों से नुकसान पहुंचता है। सरसों और आलू के पौधे एक बार टूट गए तो निकलना मुश्किल हो जाता है।

परंपरागत तरीके किसानों को जरुर आज़माने चाहिए। हालांकि लंबे समय के लिए ये कारगर नहीं है क्योंकि ये (नीलगाय) बहुत चालाक जानवर हैं तो बाड़ लगवाना सबसे बेहतर रहता है।

नीलगाय,गाय रोकने के लिए इस तरह बनायें हर्बल घोल

  • नीलगाय को खेतों की ओर आने से रोकने के लिए 4 लीटर मट्ठे में आधा किलो छिला हुआ लहसुन पीसकर मिलाकर इसमें 500 ग्राम बालू डालें। इस घोल को पांच दिन बाद छिड़काव करें। इसकी गंध से करीब 20 दिन तक नीलगाय खेतों में नहीं आएगी। इसे 15 लीटर पानी के साथ भी प्रयोग किया जा सकता है।
  • बीस लीटर गोमूत्र, 5 किलोग्राम नीम की पत्ती, 2 किग्रा धतूरा, 2 किग्रा मदार की जड़, फल-फूल, 500 ग्राम तंबाकू की पत्ती, 250 ग्राम लहसुन, 150 लालमिर्च पाउडर को एक डिब्बे में भरकर वायुरोधी बनाकर धूप में 40 दिन के लिए रख दें। इसके बाद एकलीटर दवा 80 लीटर पानी में घोलकर फसल पर छिड़काव करने से महीना भर तक नीलगाय फसलों को नुकसान नहीं पहुंचाती है। इससे फसल की कीटों से भी रक्षा होती है
  • खेत के चारों ओर कंटीली तार, बांस की फंटियां या चमकीली बैंड से घेराबंदी करें।
  • खेत की मेड़ों के किनारे पेड़ जैसे करौंदा, जेट्रोफा, तुलसी, खस, जिरेनियम, मेंथा, एलेमन ग्रास, सिट्रोनेला, पामारोजा का रोपण भी नीलगाय से सुरक्षा देंगे।
  • खेत में आदमी के आकार का पुतला बनाकर खड़ा करने से रात में नीलगाय देखकर डर जाती हैं।
  • नीलगाय के गोबर का घोल बनाकर मेड़ से एक मीटर अन्दर फसलों पर छिड़काव करने से अस्थाई रूप से फसलों की सुरक्षा की जा सकती है।
  • एक लीटर पानी में एक ढक्कन फिनाइल के घोल के छिड़काव से फसलों को बचाया जा सकता है।
  • गधों की लीद, पोल्ट्री का कचरा, गोमूत्र, सड़ी सब्जियों की पत्तियों का घोल बनाकर फसलों पर छिड़काव करने से नीलगाय खेतों के पास नहीं फटकती।
  • देशी जीवनाशी मिश्रण बनाकर फसलों पर छिड़काव करने से नीलगाय दूर भागती हैं।
  • कई जगह खेत में रात के वक्त मिट्टी के तेल की डिबरी जलाने से नीलगाय नहीं आती है।

अब आपके गांव के सरपंच नहीं कर सकेंगे गोलमाल

आज हम आप को एक  ऐसी सरकारी वेबसाइट (gov.in)  का लिंक बताने जा रहे है , जिसका उपयोग कर के आप अपने गांव , अपने मोहले और अपने देश के विकाश में मत्वपूर्ण  योगदान कर सकते है , यह पर आप देख सकते है की भररत सरकार  ने आप के गांव के निर्माण कार्यों के लिए कितना पैसा दिया है ( यह डाटा पूरी तरह से ऑथेंटिकेट है ), अगर आप को कोई अनियमितता लगती है तो इसकी शिकायत आप जनसुनवाई में सीधे कर सकते है

Step 1 .  सर्वप्रथम नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

http://www.planningonline.gov.in/ReportData.do?ReportMethod=getAnnualPlanReport

Step 2  .आप होनी सुबिधा के अनुसार अपनी भाषा चुन सकते है , अभी यहाँ पर इंग्लिश,हिंदी और पंजाबी का ऑप्शन है। …इमेज देखें

Step 3  .यहाँ पर आप अपना योजना बर्ष और अपने राज्य  का नाम चुन कर GET REPORT पर क्लिक करें , इसके  बाद आप से योजना इकाई के बारे में पूछेगा , For Example अगर आप को ये देखना है की आप के गांव  में इस बर्ष कितना पैसा सरकार  की तरफ से आया है तो आप GRAM PANCHYAT का ऑप्शन चुनेँगे

Step 4 . उसके बाद आप से ये पूछा जायेगा की आप किस जिला पंचायत में रहते है, आप अपने जिले का नाम सेलेक्ट कर लेंगे

Step 5  . जिला पंचायत सेलेक्ट करने के बाद आप अपने जनपद पंचायत  या ब्लॉक का नाम सेलेक्ट कर लेंगे, For Example – अगर मुझे ये देखना है की 2017-2018 में मेरे गांव में किस मद में सरकार ने  कितना पैसा दिया है ,

Step 6  .जनपद पंचायत के बाद आप से ग्राम PANCHYAT का नाम पुछा  जायेगा , उसके बाद आप GET REPORT पर क्लिक करेंगे।

यहाँ पर आप के सामने आप के गाँव / मोहल्ले / बार्ड में अभी तक कितना पैसा आया है  और आप के मुखिया( ग्राम PANCHYAT प्रद्यान), आप के बार्ड के मेंबर ने कितना काम किया है और सरकार से कितना पैसा लिया है, इसकी पूरी जानकारी ले सकते है, यदि आप को कुछ ऐसा डेटा मिलता  है जो आप को सही नहीं लगता है तो इसकी शिकायत आप जनसुनवाई पर जा कर कर सकते है , जहा पर आप के शिकायत पर सीधे मुखयमंती की सीधे नजर रहेगी

अब हमको जागरूक होने की जरूरत है। सभी जानकारियां सरकार ने ऑनलाइन वेबसाइट पे उपलब्ध करा दी है बस हमें उन्हें जानने की जरूरत है, यदि हर गांव के सिर्फ 2-3 युवा ही इस जानकारी को अपने गांव के लोगो को बताने लगे, समझ लो 50% भ्रष्टाचार तो ऐसे ही कम हो जाएगा।

इसलिए आपसे गुजारिश है कि आप अपने गांव में वर्ष 2016-17 मे हुए कार्यो को जरूर देखें और इस लिंक को देश के हर गांव तक भेजने की कोशिश करे ताकि गांव के लोग अपना अधिकार पा सके।

हल्दी की इस नई किस्म से पूरे साल किसान कर सकते हैं हल्दी की खेती

अभी तक ज्यादातर किसान खरीफ में हल्दी की बुवाई करते हैं, लेकिन अब हल्दी की नई किस्म प्रजाति एनडीएच-98 देश के सभी तरह के जलवायु  में साल भर की जा सकती है।

डॉ. विक्रमा प्रसाद पांडेय बताते हैं, “राजस्थान में आयोजित एक कार्यक्रम में हल्दी की ये किस्म रिलीज की गई थी, ये प्रजाति शोध निदेशालय के अंर्तगत सब्जी विज्ञान विभाग में विकसित की गई है, इस प्रजाति को विकसित किए जाने से तीन साल पहले तक अखिल भारतीय स्तर के प्रोजेक्ट मैनेजर की देखरेख में कई प्रदेशों में इस किस्म पर शोध किया गया है।”

हल्दी की नई किस्म एनडीएच-98 इजाद की गई थी।, ये किस्म सभी तरह की जलवायु में उगायी जा सकती है साथ ही इसकी खेती देश के सभी प्रदेशों में की जा सकती है। यह गुणवत्ता व मात्रा में भी दूसरी किस्मों के मुकाबले ज्यादा बेहतर है।

वैज्ञानिकों द्वारा बताए गए तरीकों से अगर हल्दी की खेती की जाए तो किसानों को अच्छे फसल की प्राप्ति हो सकती है। वैज्ञानिकों द्वारा बताए गए तरीकों से अगर हल्दी की खेती की जाए तो किसानों को अच्छे फसल की प्राप्ति हो सकती है।

हल्दी की सफल खेती के लिए उचित फसल चक्र को अपनाना जरूरी होता है। इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि हल्दी की खेती लगातार उसी जमीन पर न की जाए। क्योंकि यह फसल जमीन से ज्यादा से ज्यादा पोषक तत्वों को खींचती है, जिससे दूसरे साल उसी जमीन में इसकी खेती नहीं करें तो ज्यादा अच्छा होगा।

जिन किसानों के पास सिंचाई की सुविधा है वो अप्रैल के दूसरे पखवाड़े से अगस्त के प्रथम सप्ताह तक हल्दी को लगा सकते हैं। जिनके पास सिंचाई सुविधा का अभाव है वे मानसून की बारिश शुरू होते ही हल्दी लगा सकते हैं। जमीन अच्छी तरह से तैयार करने के बाद पांच-सात मीटर, लंबी तथा दो-तीन मीटर चौड़ी क्यारियां बनाकर 30 से 45 सेमी कतार से कतार और 20-25 सेमी पौध से पौध की दूरी रखते हुए चार-पांच सेमी गहराई पर कंदों को लगाना चाहिए।

देश भर में आसानी से उगाई जा सकती है यह किस्म

डॉ. विक्रमा प्रसाद पांडेय बताते हैं, “शोध में पाया गया है कि ये देशभर में उगाने के सही किस्म है और देश भर में आसानी से उगाई जा सकती है, इसका उत्पादन प्रति हेक्टेयर 300-400 टन आसानी से हो जाता है, ये गुणवत्ता में भी दूसरी किस्मों के मुकाबले बेहतर है।” इस हल्दी की प्रजाति में पीलापन श्रेष्ठ स्तर तक पांच प्रतिशत और लीफ ऑयल की मात्रा एक से दो प्रतिशत मिली। बिहार और नरेंद्र देव कृषि विश्वविद्यालय के कृषि विज्ञान केंद्रों के फार्म में इसका उत्पादन भी शुरू किया गया है।

किसान ने निकाली एक ऐसी स्कीम के पैसे भी बच गए और लेबर भी फ्री

यह कहानी सबक देती है कि हमारे पास जितने भी सीमित संसाधन हैं, उन्हीं का सही इस्तेमाल करके हम न केवल कामयाबी हासिल कर सकते हैं, बल्कि दूसरों के लिए भी मॉडल स्थापित कर सकते हैं। इसके लिए जरूरत होती है सही नेतृत्व और टीम वर्क की।

बेंगलुरु से करीब 100 किलोमीटर दूर एक जगह है मांड‍या। पिछले साल जुलाई की बात है, यहां गन्ने की खेती करने वाले 20 से ज्यादा किसानाें ने मौत को गले लगा लिया। इन किसानों की आत्महत्या की वजह यह नहीं थी कि खेती नहीं हुई, वजह थी वह भारी कर्ज जो उन्होंने कभी लिया था और अब बढ़ते-बढ़ते इतना हो चुका था कि उसे चुकाना उनके वश की बात नहीं रही थी। फसल की सही कीमत न मिलना, भारी स्टॉक और सही सलाह के अभाव में ये किसान हालात के सामने हार चुके थे।

इधर, मांडया से हजारों मील दूर बैठा एक शख्स इन हालात से दुखी था। वह रोजाना मांडया में किसानों की आत्महत्या की खबरें सुनता और मन मसोस कर रह जाता। कैलिफोर्निया में आईटी प्रोफेशनल मधुचंद्रन चिक्कादैवेया मांडया में ही जन्मे थे। उनका संबंध भी किसान परिवार से है, उनका बचपन 300 एकड़ में फैली बेंगलुरु एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के प्रांगण में बीता था, उनके पिता यहां वाइस चांसलर थे।

वर्ष 2014 में उन्होंने अपनी नौकरी से त्यागप्ात्र दे दिया और मांडया लौट आए। मधु कहते हैं- मेरा एक ही मकसद था, मांडया के किसानों को बचाना, उनकी मदद करना। उनके मुताबिक देश के हालात ऐसे हैं कि किसान अपनी खेती को छोड़कर छोटे-मोटे काम-धंधों के लिए शहर की तरफ दौड़ रहे हैं, ऐसा इसलिए है क्योंकि खेती अब फायदे की चीज नहीं रही।

मधु कहते हैं, जब मैं मांडया आया तो मैंने पाया कि यहां किसान आर्गेनिक तरीके से खेती कर रहे हैं, लेकिन समस्या यह थी कि यहां कोई बेहतर मार्केट नहीं थी और न ही किसानों को गाइड करने वाला। तब हमने पहला काम यही किया- मंडया आर्गेनिक फार्मर्स को-ऑपरेटिव सोसायटी स्थापित की।

मधु ने अपने दोस्तों, पूर्व सहयोगियों के साथ मिलकर करीब 1 करोड़ रुपये जुटा कर इस सोसायटी का गठन किया, उन्हें सरकार से मंजूरी लेने और आर्गेनिक मांडया नाम से एक ब्रांड शॉप खोलने में 8 महीने का समय लगा। इस ब्रांड के जरिये किसान अपने आर्गेनिक फल-सब्िजयों को बेचते हैं। मधु के मुताबिक हमने बेंगलुरु-मैसूर हाईवे पर आर्गेनिक मांडया नाम से इस शॉप को स्थापित किया है। मेरा मकसद था कि एक किसान सीधे अपने ग्राहक से बात कर सके, उसकी जरूरत को समझ सके वहीं एक ग्राहक किसान की मेहनत को जान सके। हाईवे पर शॉप स्थापित करने का फायदा यह हुआ कि वहां से गुजरने वाले लोग उन आर्गेनिक फल-सब्जियों को खरीदने लगे। किसानों को वहां से कहीं और नहीं जाना पड़ा। इसकी कामयाबी के बाद एक आर्गेनिक रेस्टोरेंट खोल दिया गया।

क्या है फार्म शेअर (farm share)प्रोग्राम

मधु कहते हैं, लोग आर्गेनिक पदार्थों से जुड़ते हुए हिचकते हैं,हमारे लिए यह बेहद जरूरी था कि हम लोगों को बताएं कि आर्गेनिक खाद्य पदार्थों का सेवन ही क्यों जरूरी है। इसके लिए हमने लोगों को मांडया में बुलाकर उन्हें इस काम से जोड़ने की सोची। जिन लोगों की खेती में रुचि है या जो प्रकृति के साथ रहकर अपना समय बीताना चाहते हैं, उन्हें आमंत्रित किया गया। मधुचंद्रन का यह आइडिया काम कर गया है, चार महीनों के अंदर उनकी सोसायटी ने एक करोड़ रुपये का बिजनेस किया है, किसानों की आर्थिक स्थिति सुधर गई है, वे अपने कर्ज चुका पा रहे हैं, उनकी जिंदगी में बदलाव आ गया है।

इसके लिए उन्होंने “फार्म शेअर” नाम का प्रोग्राम शुरू किआ जिसमे वह शहर में रहने वाले परिवारों को 35000 \ रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से जमीन मुहैया करवाते है।यहाँ पर लोग खुद के लिए और परिवार के लिए आधे से 2 एकड़ तक जमीन किराये पर लेते है  ।उनकी मदद के लिए एक गांव का एक किसान हर वक़्त उनके साथ रहता है और खेतीबाड़ी में शहरी परिवार की मदद करता है ।

तीन महीने बाद परिवार की मर्जी हो तो वो उत्पाद बाजार में बेच सकता है और अगर चाहे तो अपने लिए भी रख सकता है । इस प्रोग्राम की खासियत यह है यहाँ पर लोग ख़ुशी -ख़ुशी काम करते है जिस के लिए खेत एक मौजमस्ती और पिकनिक मानाने की जगह बन गया है ।

मधुचंद्रन का यह आइडिया काम कर गया है, चार महीनों के अंदर उनकी सोसायटी ने एक करोड़ रुपये का बिजनेस किया है, किसानों की आर्थिक स्थिति सुधर गई है, वे अपने कर्ज चुका पा रहे हैं, उनकी जिंदगी में बदलाव आ गया है।

40 हज़ार रुपये /किल्लो वाली केसर ने किसान को कर दिया मालोमाल

27 साल के संदेश पाटिल ने केवल ठंडे मौसम में फलने-फूलने वाली केसर की फसल को महाराष्ट्र के जलगांव जैसे गर्म इलाके में उगाकर लोगों को हैरत में डाल दिया है। उन्होंने मेडिकल की पढ़ाई छोड़कर जिद के बलबूते अपने खेतों में केसर की खेती करने की ठानी और अब वे हर महीने लाखों का मुनाफा भी कमा रहे हैं। इसके लिए उन्होंने लोकल और ट्रेडिशनल फसल के पैटर्न में बदलाव किए।

इंटरनेट से ली खेती की जानकारी

  • जलगांव जिले के मोरगांव खुर्द में रहने वाले 27 साल के संदेश पाटिल ने मेडिकल ब्रांच के बीएएमएस में एडमिशन लिया था, लेकिन इसमें उनका मन नहीं लगा।
  • उनके इलाके में केला और कपास जैसी लोकल और पारंपरिक फसलों से किसान कुछ खास मुनाफा नहीं कमा पाते थे।
  • इस बात ने संदेश को फसलों में एक्सपेरिमेंट करने के चैलेजिंग काम को करने इंस्पायर किया।
  • इसके बाद उन्होंने सोइल फर्टिलिटी की स्टडी की। उन्होंने मिट्टी की उर्वरक शक्ति (फर्टिलिटी पावर) को बढ़ाकर खेती करने के तरीके में एक्सपेरिमेंट करने की सोची।
  • इसके लिए उन्होंने राजस्थान में की जा रही केसर की खेती की जानकारी इंटरनेट से ली।

 

पिता और चाचा ही थे उनके खिलाफ

  • सारी जानकारी जुटाकर संदेश ने इस बारे में अपनी फैमिली में बात की। शुरुआत में उनके परिवार में उनके पिता और चाचा ही उनके खिलाफ थे।
  • लेकिन संदेश अपने फैसले पर कायम रहे। आखिरकार उनकी जिद और लगन को देखते हुए घरवालों ने उनकी बात मान ली।
  • इसके बाद उन्होंने राजस्थान के पाली शहर से 40 रुपए के हिसाब से 9.20 लाख रुपए के 3 हजार पौधे खरीदे आैर इन पौधों को उन्होंने अपनी आधा एकड़ जमीन में रोपा।
  • संदेश ने अमेरिका के कुछ खास इलाकों और इंडिया के कश्मीर घाटी में की जाने वाली केसर की खेती को जलगांव जैसे इलाकों में करने का कारनामा कर दिखाया है।

दूसरे किसान भी ले रहे दिलचस्पी

  • संदेश पाटिल ने अपने खेतों में जैविक खाद का इस्तेमाल किया। मई 2016 में संदेश ने 15.5 किलो केसर का प्रोडक्शन किया।
  • इस फसल के उन्हें 40 हजार रुपए किलो के हिसाब से कीमत मिली। इस तरह टोटल 6.20 लाख रुपए की पैदावार हुई।
  • पौधों, बुआई, जुताई और खाद पर कुल 1.60 लाख की लागत को घटाकर उन्होंने साढ़े पांच महीने में 5.40 लाख रुपए का नेट प्रॉफिट कमाया।
  • मुश्किल हालात में भी संदेश ने इस नमुमकिन लगने वाले काम को अंजाम दिया।
  • जिले के केन्हाला, रावेर, निभोंरा, अमलनेर, अंतुर्की, एमपी के पलासुर गांवों के 10 किसानों ने संदेश पाटिल के काम से मोटीवेट होकर केसर की खेती करने का फैसला किया है।

News Source- Dainik Bhasker News