आ गया 6750 रूपए कीमत का नैनो बायोगैस प्लांट

यह नैनो बायोगैस प्लांट (nano bio gas plant)बायोटेक इंडिया जो के केरला में है द्वारा त्यार क्या गया है । इसमें आप पशुओं का गोबर ,गली सड़ी सब्जियां ,या फिर कोई भी जैविक कचरा डाल सकते है ।

बायोटेक इंडिया की तरफ से नैनो बायोगैस प्लांट के दो मॉडल त्यार किए गए है । पहला मॉडल 45 लीटर का है और दूसरा मॉडल 160 लीटर का है । छोटा मॉडल 10 -20 लीटर गैस पैदा करता है जब की बड़ा मॉडल 30 – 50 लीटर बायोगैस पैदा करता है ।

दोनों मॉडल के ऊपर एक फ्लोटिंग टैंक है । जिसमे गैस भर जाने पर वो ऊपर आ जाता है । छोटे मॉडल का मूल्य 6750 रु और बड़े मॉडल का मूल्य 9950 रु है ।यह मॉडल इतने छोटे होते है के आप इन्हे अपनी रसोई में भी रख सकते है इसके इलावा आप इसको एक जगह से दूसरी जगह पर आसानी से ले कर जा सकते है ।

फ़िलहाल इन मॉडल को स्कूल,कॉलेज, यूनिवर्सिटी में बच्चों को जैविक ऊर्जा के बारे में जागरूक करने के लिए इस्तेमाल क्या जा रहा है । लेकिन आप इसे घर पर भी इस्तेमाल कर सकते है ।

इस दोनों नैनो मॉडल के इलावा भी बायोटेक कंपनी कुश बड़े मॉडल भी त्यार करती है जो इस से ज्यादा गैस पैदा कर सकते है और आपको किसी भी तरह की एलपीजी गैस की जरूरत नहीं पड़ती ।

बायोटेक इंडिया सारे भारत में होम डिलीवरी भी करती है जिसका कोई अलग से खर्चा नहीं लिया जाता । हर बायोगैस प्लांट के साथ एक चूल्हा और जरूरी सामान दिए जाता है ।

इस मॉडल और दूसरे मॉडल को आप ऑनलाइन इंटरनेट पर पैसे दे कर ले सकते है ।ज्यादा जानकारी के लिए बायोटेक इंडिया के वेबसाइट(biotech-india.org) पर चेक करें जा फोन 91-471-2331909 पर संपर्क करें ।इसके इलावा भी आप ई कॉमर्स वेब्सीटेस जैसे snapdeal ,Amazon India आदि वेब्सीटेस से भी मंगवा सकते है

ध्यान रहे यह सारी जानकारी इंटरनेट से ली गई है इस लिए कोई भी आर्डर करने से पहले अपनी तरफ से पूरी तसल्ली कर ले ।

नैनो बायोगैस कैसे काम  करता है वीडियो भी देखें 

बेकार प्लास्टिक की बोतल से ऐसे बनायें चूहा पकड़ने का ट्रैप

चूहों की संख्या मई-जून माह में कम होती है, यही समय चूहा नियंत्रण अभियान के लिए सही समय होता है, यह अभियान सामूहिक रूप में चलाना चाहिए। चूहे खेत खलिहानो, घरों और गोदामों में अनाज खाने के साथ-साथ ही अपने मलमूत्र से अनाज बर्बाद कर देते हैं।

एक जोड़ी चूहा एक वर्ष में 800-1000 की संख्या में बढ़ जाते हैं,अगर चूहों के संख्या कम हो तो आप प्लास्टिक की बोतल का ट्रैप बना कर भी चूहों को पकड़ सकते है ।इस तरिके से आप को कोई खर्चा भी नहीं होगा और किसी खतरनाक दवाई की भी जरूरत नहीं पड़ेगी ।

इस तरीके से आप घर पर भी आसानी से चूहों को पकड़ सकते हैं। आज हम आपको बताते है कि कैसे आप घर पर चूहे पकड़ने की मशीन बना सकते है।

जरूरत का सामान

  • प्लास्टिक की बोतल
  • कैंची
  • स्टिकस
  • रबड़ बैंड
  • थ्रेड
  • यू क्लिप

बनाने का तरीका

  1. सबसे पहले प्लास्टिक की बोतल का ऊपरी हिस्सा कैंची से काट लें। ध्यान रखें कि उसे सिर्फ एक ही साइड से काटना है।
  2. अब बोतल के दोनों हिस्सों पर दो इंच के गेप से दाए और बाए साइड होल करके दो स्टिक्स आड़ी फंसा दें।
  3. ध्यान रखें कि ये दोनों स्टिक्स पैरेलर हो। अब इन दोनों स्टिक्स पर रबड़ बैंड दोनों ओर फंसा दें।
  4. अब एक मजबूत धागा लें और बोतल के मुंह में लगाकर ढक्कन बंद कर दें। इस बात का ध्यान रखें कि धागे की लंबाई इतनी होनी चाहिए कि उसेे खिंचने पर बोतल का कटा हिस्सा खुल सकें।
  5. अब यू क्लिप का किनारा सीधा करके उसमें खाने की चीज फंसा दें। इसे बोतल के अंदर हाथ डालकर तली से बाहर निकालें।
  6.  धागे के हिस्से पर नॉट बनाकर इस यू क्लिप के बाहर निकले नुकीले हिस्से पर लटका दें।

इस ट्रैप को कैसे बनाते है इसके लिए वीडियो देखें

आ गया यूरिया कैप्सूल, अब नहीं रहेगी धान में बार बार यूरिया डालने की जरूरत

धान की फसल में यूरिया खाद का इस्तेमाल कम से कम हो, इस तकनीक पर जिला कृषि विज्ञान केद्र के वैज्ञानिक पिछले दो साल से काम कर रहे हैं। यहां के कृषि वैज्ञानिक धान की खेती में यूरिया खाद की जगह यूरिया बैक्वेट नामक कैप्सूल खाद से खेती करने की प्रयोग कर रहे हैं। इसकी खासियत यह है कि फसल में दो- से तीन बार डालने की जरूरत नहीं है।

एक ही बार डालने के बाद फसल तैयार होते तक दोबारा डालना नहीं पड़ता। दूसरा फसल में जल्दी बीमारी नहीं लगती, जिससे बार-बार खाद डालने से बचत और दवाई का खर्च भी आधा हो जाता है। कृषि वैज्ञानिकों का दावा है कि इस तकनीक से खेती करने पर लागत से 20% तक कमी लाई जा सकती है। कृषि विज्ञान केंद्र जांजगीर के प्रभारी और मिट्टी वैज्ञानिक डॉ. केडी महंत यह नवाचार कर रहे हैं।

एक बार कर चुके हैं प्रयोग

पहली बार एक एकड़ की खेती में इसका प्रयोग केवीके में किया जा चुका है जो सफल रहा। इस खरीफ सीजन में फिर से 5 एकड़ में इस तकनीक से खेती करने की तैयारी हो चुकी है। अगले साल और बड़े क्षेत्र में किसानों के खेत में इसकी प्रदर्शनी लगाई जाएगी ताकि जिले के किसानों को इससे जोड़ा जा सके।

जिले में लिए यह क्यों जरूरी

नहरों से 92 % सिंचित होने से किसान धान की ही फसल ले रहे हैं। 60% किसान स्वर्णा धान ही लगाते हैं। यह 140 दिन की लंबी अवधि वाली फसल है जिससे खेत में पानी रखना पड़ता है। पानी और खाद के इस्तेमाल से मिट्टी अम्लीय हो चुकी है । केवीके के वैज्ञानिक मिट्टी की उर्वरा शक्ति बचाने की दिशा में काम कर रहे हैं।

100 किलो यूरिया खाद डालने पर 46% नाइट्रोजन ही मिलता है फसल को

कृषि विज्ञान केंद्र जांजगीर में यूरिया बैक्वेट कैप्सूल खाद

क्या है यूरिया बैक्वेट

यूरिया बैक्वेट कैप्सूल को यूरिया खाद और कुछ कैमिकल्स से बनाया है पर यूरिया की तुलना में यह 80% अधिक घुलनशील है और जड़ों में चला जाता है और असर फसल तैयार होने तक रहता है। जबकि सामान्य यूरिया खाद खेत में डालते के बाद तीन प्रकार से नष्ट हो जाता है। लिचिंग यानी पानी में बह जाने, उड़ जाने और ठोस होने से। आधा ही खाद पौधों को मिलता है।

कृषि विज्ञान केंद्र जांजगीर के प्रभारी और मिट्टी वैज्ञानिक डॉ. केडी महंत ने बताया कि धान की फसल के लिए नाइट्रोजन सबसे जरूरी पोषक तत्व है। इसकी पूर्ति यूरिया खाद से होती है, लेकिन 100 किलो यूरिया खाद डालने पर मात्र 46% नाइट्रोजन ही मिलता है, किसान को तीन से चार बार तक यूरिया डालना पड़ता है।

यूरिया बैक्वेट से किसान को दो फायदे

20 फीसदी पैसे की बचत

इससे किसान को अधिक खाद खरीदना नहीं पड़ेगा। कृषि वैज्ञानिक अभी दावा कर रहे हैं कि इससे किसान को खाद और दवा में खर्च होने वाले राशि में 20 फीसदी तक ही बचत हो सकती है। एक किलो यूरिया बैक्वेट कैप्सूल में डेढ़ रुपए में तैयार हो जाता है जिससे यह किसानों को अभी मिलने वाले यूरिया खाद की कीमत में ही मिलेगा।

कतार बोनी 

केडी महंत ने बताया कि चार पौधों में बीच में यूरिया बैक्वेट का एक कैप्सूल डाल दिया जाता है। इसके लिए कतार बोनी करनी होती है। धान की फसल लगाने से हफ्ते दिन से 15 दिन के बीच ही यह काम करना होता है। इसके बाद फसल तैयार होने तक यूरिया देने की जरूरत नहीं होती। पिछले साल एक एकड़ में किए प्रयोग में उत्पादन में कहीं कोई कमी नहीं आई। कतार बोनी से किसी प्रकार की बीमारी भी नहीं लगी थी।

एलोवेरा की खेती से 50 हजार इन्वेस्ट कर 10 लाख तक कमाने का मौका

एलोवेरा के नाम और इसके गुणों से आज लगभग हर कोई वाकिफ हो चुका है। देश के लघु उद्योगों व कंपनियों से लेकर बड़ी-बड़ी मल्टिनेशनल कंपनियां इसके नाम से प्रोडक्‍ट बेचकर करोड़ों कमा रही हैं। ऐसे में भी एलोवेरा के बिजनेस से 8 से 10 लाख रुपए की कमाई कर सकते हैं। इसके अलावा आप कमाई को 20 लाख रुपए से 1 करोड़ रुपए तक भी ले जा सकते हैं।

2 तरह से कर सकते हैं एलोवेरा का बिजनेस

एलोवेरा का बिजनेस दो तरीकों से किया जा सकता है। शुरूआत आप खेती से कर सकते हैं इस‍के लिए 1 हेक्‍टेयर जमीन में केवल 50 हजार रुपए खर्च कर आप 5 साल तक हर साल 8 से 10 लाख रुपए कमा सकते हैं। दूसरा एलोवेरा की प्रोसेसिंग यूनिट लगाकर जूस बेचकर मोटी कमाई कर सकते हैं। इसके लिए 6 से 7 लाख रुपए इन्‍वेस्‍टमेंट करना होगा और कमाई 20 लाख रुपए से 1 करोड़ रुपए तक हो सकती है।

एलोवेरा की खेती के एक हेक्‍टेयर खेत के मानक को समझा जा सकता है। खेत में एक बार प्‍लांटेशन करने के बाद आप 3 साल तक इसकी फसल ले सकते हैं। वर्तमान में आईसी111271, आईसी111269 और एएल-1 हाईब्रिड प्रजाति के एलोवेरा को देश के हर क्षेत्र में उगाया जा सकता है। इंडियन काउंसिल फॉर एग्रीकल्‍चर रिसर्च (आईसीएआर) के अनुसार एक हेक्‍टेयर में प्‍लांटेशन का खर्च लगभग 27500 रुपए आता है। जबकि, मजदूरी, खेत तैयारी, खाद आदि जोड़कर पहले साल यह खर्च 50000 रुपए पहुंच जाता है।

पहले ही साल होगी 10 लाख रुपए तक की कमाई…

एलोवेरा की एक हेक्‍टेयर में खेती से लगभग 40 से 45 टन मोटी पत्तियां प्राप्त होती हैं। मोटी पत्तियों की देश की विभिन्‍न मंडियों में कीमत लगभग 15000 से 25000 रुपए प्रति टन होती है।

इस हिसाब से यदि आप अपनी फसल को बेचते हैं तो आप आराम से 8 से 10 लाख रुपए कमा सकते हैं। इसके अलावा दूसरे और तीसरे साल में पत्तियां 60 टन तक हो जाती हैं। जबकि, चौथे और पांचवे साल में प्रोडक्‍टशन में लगभग 20 से 25 फीसदी की गिरावट आ जाती है।

जूस बनाकर कमाई को कर सकते हैं कई गुना ...

एलोवेरा की पत्तियां या तो आयुर्वेदिक कंपनियां खरीदती हैं या फिर देश की कृषि मंडियों में भी इसे बेचा जा सकता है। लेकिन, अगर आप खुद का जूस बिजनेस शुरू करना चाहते हैं तो आप 7 से 8 लाख रुपए के इन्‍वेस्‍टमेंट से इसे शुरू कर सकते हैं।

प्रतिदिन 150 लीटर जूस तैयार करने की क्षमता की मशीन की बाजार में कीमत लगभग 7 लाख रुपए है। एक लीटर जूस बनाने में लगभग 40 रुपए का खर्च आता है। यदि इस जूस को सीधे बिना किसी ब्रांड नेम के कंपनियों को सप्‍लाई करें तो इसका दाम 150 रुपए प्रति लीटर मिलता है। ऐसे में आप प्रतिदिन 22500 रुपए का जूस तैयार कर सकते हैं।

कौन खरीदेगा फसल 

एलोवेरा और तुलसी जैसी औषिधीय फसलों की कांट्रेक्‍ट फार्मिंग और प्री-ऑर्डर फार्मिंग निश्चित इनकम का साधन हो सकता है। आज के समय में हर्बल प्रोडक्‍ट बनाने वाली कई कंपनियां (पतंजलि, हिमालया, इपगा लैब आदि ) और थर्ड पार्टी फर्म बाय बैक गारंटी के साथ कांट्रेक्‍ट फार्मिंग करा रही हैं। इससे किसान को फसल के बिकने की चिंता तो होती ही नहीं है साथ ही साथ वह इन कंपनियों की ट्रेनिंग से बेहतर पैदावार भी ले सकते हैं।

राजस्‍थान की एक कंपनी ग्रो फरदर एक ऐसी कंपनी है जो देशभर के किसानों के साथ (जो इच्‍छुक हों) कांट्रेक्‍ट फार्मिंग कर रही है।

वर्तमान में कई वेबसाइट्स ऐसी हैं जिन पर बॉयर्स अपनी डिमांड भेजते हैं। इनमें एक्‍सपोर्ट इंडिया डॉट कॉम, ई-वर्ल्‍ड ट्रेड फेयर डॉट कॉम, गो फोर,अली बाबा,  वर्ल्‍ड बिजनेस आदि वेबसाइट्स हैं जिन पर विभिन्‍न औषिधीय फसलों की बॉयर्स की डिमांड हर समय रहती है।

एक करोड़ रुपए तक ऐसे करें कमाई…

इतना जूस बनाने आपको आधा टन पत्तियों की जरूरत होती है। यानी आप अपने एक हेक्‍टेयर के माल से 90 दिनों तक माल तैयार कर सकते हैं और आराम से 20 लाख रुपए कमा सकते हैं। इसके अलावा आप आसपास के किसानो से भी एलोवेरा पत्तियां खरीदकर जूस तैयार कर सकते हैं। इस तरह आप कमाई को 20 लाख रुपए तक ही सीमित न करके इसे 50 लाख या 1 करोड़ रुपए भी कर सकते हैं।

90 फीसदी तक मिलता है लोन

एलोवेरा जूस बनाने के प्‍लांट एसएमई श्रेणी में आता है। सरकार की तमाम योजनाओं में इसके बिजनेस के लिए सरकार 90 फीसदी तक लोन देती है। खादी ग्रामोद्योग लोन देने के बाद इस पर लगभग 25 फीसदी की सब्सिडी देता है। इसके अलावा 3 साल तक रक ब्‍याज मुक्‍त होती है।

यह है कंबाइन से काटी जाने वाली मूँग की किसम ,15 क्विंटल तक देती है उत्पादन

अक्सर किसानो को फसली विभिन्नता अपनाने के लिए उत्साहित किया जाता है । मुख्या किसान अनाज फैसले जैसे चावल,गेहूं ,मक्का अदि का उत्पादन ज्यादा करते है क्योंकि किसानो का मानना है की यह फसलें उत्पादन तो ज्यादा देती ही है साथ में इन्हे कंबाइन हर्वेस्टर से काटा जा सकता है । जिसमे लेबर का खर्च बहुत कम होता है और समय और मेहनत की भी बचत होती है ।

इस लिए किसान फसलें जैसे सोयाबीन,दालें अदि की बजाई के लिए परहेज करते है । लेकिन अब ऐसे किसानो को लिए एक ऐसी मूँग की किसम त्यार की गई है जिसे कंबाइन से काटा जा सकता है इस किसम को डा: वीरेंदर लाठर ( ICAR- Indian Agricultural Research Institute) द्वारा त्यार किया गया है इस किसम का नाम डा: लाठर मुँग (MDLS) है ।

इस किसम की प्रति एकड़ पैदावार जमीन के हिसाब से कम से कम 6 किवंतल प्रति एकड व् 15 किवांटल प्रति हैकटर है । ये फसल साल में दो बार लगाई जाती है । गर्मी की फसल यानि गर्मी शुरू होने से पहले लगाने पर यह 66 दिन व खारीफ फसल : 85 दिन में त्यार हो जाती है ।

अगर आप इसका बीज खरीदना चाहते है तो बीज के लिये सम्पर्क करे :-
सरदार जगदीप ढ़िलों ( M: 9915463033), गाव फुलेवाल 2 किलोमीटर कपूरथाला से , पंजाब.

मुनाफे की फसल: केला की जगह शुरू हुई ड्रैगन फ्रूट की खेती

आंधी-तूफान के साथ-साथ पनामा रोग के कारण केला की खेती किसानों के लिए मुफीद नहीं रही। नुकसान झेलने वाले किसान अब विकल्प के तौर पर ड्रैगन फ्रूट की खेती कर रहे हैं। पूर्णिया जिला में रूपौली प्रखंड अंतर्गत हरनाहा गांव के प्रगतिशील किसान विमल मंडल ने इसकी खेती की शुरुआत की है।

उनके पास दूसरे किसान भी ड्रैगन फ्रूट की खेती की जानकारी के लिए आते हैं। हालांकि अभी किसानों में इसके बाजार को लेकर आशंका है।

विमल मंडल ने बताया कि ड्रैगन फ्रूट का औषधीय महत्व है। इसमें कैल्शियम, फास्फोरस, विटामिन-ए की प्रचुर मात्रा पाई जाती है। मेट्रो सिटी में यह छह से आठ सौ रुपये प्रति किलो की दर से बिक रहा। स्थानीय बाजार में व्यापारी इसे दो सौ रुपये प्रति किलो की दर से खरीद रहे हैं। ड्रैगन फ्रूट की खेती में पहली बार प्रति एकड़ तीन लाख रुपये के करीब लागत आती है, लेकिन दूसरे साल से यह घटकर एक चौथाई रह जाती है। मुनाफा केले से कई गुना अधिक है।

एक कट्ठा में लगते हैं 40 पौधे जानकारी लेने पहुंचे मुखिया रामवती देवी सहित, पप्पू मंडल, महेंद्र मंडल, पिंटू यादव को विमल मंडल ने बताया कि दस कट्ठा जमीन में फसल उगाने के लिए नासिक से ड्रैगन फ्रूट के पौधे मंगवाए, जो 150 रुपये प्रति पौधा मिला। उसे दस फीट की दूरी पर लगाया। प्रति कट्ठा चालीस पौधे लगे। दो पौधों के बीच में आठ फीट लंबा सीमेंट का खंभा लगाया गया।

मई में इसमें फूल आया और फल भी लग गए। फूल लगने के 36 दिनों के बाद फल तैयार हो गया। एक पौधा से जून तक छह फल निकले। दिसंबर तक फल निकलता रहेगा। एक फल का वजन 200 से 400 ग्राम तक होता है।

पौधा उपलब्ध कराने वाले व्यवसायी ने 150 रुपये किलो की दर से फल को खरीद लिया है। केला में रासायनिक खाद और कीटनाशक का भरपूर उपयोग किया जाता है, जबकि ड्रैगन फ्रूट की खेती में इसका उपयोग नहीं होता। इस कारण इसका औषधीय और पादप गुण सुरक्षित रहता है।

‘ड्रैगन फ्रूट में औषधीय गुण होते हैं। इसमें कैल्शियम, फास्फोरस, विटामिन-ए और कैलोरी की प्रचुर मात्रा पाई जाती है। कम उपलब्धता के कारण इसकी कीमत अधिक मिलती है।’

12वीं के स्टूडेंट ने बनाया डिवाइस, किसान घर बैठे ऑपरेट कर सकते हैं खेतों में लगे वाटर पंप

दिल्ली के ईशान मल्होत्रा (17) ने प्लूटो नामक एक ऐसा डिवाइस बनाया है, जिसकी मदद से किसान घर बैठे खेतों में लगे वाटर पंप को ऑपरेट कर सकते हैं। वाटर पंप चालू और बंद करने के लिए उन्हें बार-बार खेतों में नहीं जाना पड़ेगा। डिवाइस की खास बात यह है कि इसे स्मार्टफोन के अलावा सामान्य फोन से भी ऑपरेट किया जा सकता है। तीन साल में 500 डिवाइस बनाकर ईशान 300 डिवाइस किसानों को मुफ्त में बांट चुके हैं।

एक डिवाइस बनाने में खर्चा आता है 700 रुपए

सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनने की ख्वाहिश रखने वाले ईशान जयपुर से 12वीं की पढ़ाई कर रहे हैं। एक डिवाइस बनाने में 700 रुपए खर्चा आता है। वह इसे इतने ही रुपए में किसानों को बेच देते हैं। इस डिवाइस को वाटर पंप के अंदर फिट किया जाता है।

इसमें ऐसी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जिसकी मदद से टेली कम्युनिकेशन के जरिए किसान वाटर पंप चालू या बंद कर सकते हैं। वाटर पंप चालू करने के लिए किसानों को अपने मोबाइल से 1111 और बंद करने के लिए 2222 नंबर डायल करना होगा।

शुरुआत में किसानों ने बनाया मजाक, फिर भी हार नहीं मानी

ईशान ने जून, 2015 में डिवाइस बनाने की शुरुआत की। उस वक्त उनकी उम्र 14 साल थी। जनवरी 2016 में पहला डिवाइस तैयार किया। डिवाइस लेकर जब वह किसानों के बीच पहुंचे तो उनका मजाक बनाया गया। ईशान ने किसानों की बातों को दरकिनार कर 2016-17 के बीच 500 डिवाइस बना डाले। काफी कोशिशों के बाद किसानों को डिवाइस की मदद से जब वाटर पंप ऑपरेट कर दिखाया, तब उन्हें विश्वास हुआ।

किसानों की परेशानी देख आया आइडिया

ईशान बताते हैं कि बचपन में वे किसानों की समस्याएं सुनते थे। किसानों को रोजाना सुबह-शाम घर से चार-पांच किमी पैदल चलकर खेतों में लगे वाटर पंप को चालू करने जाना पड़ता है। कई बार वहां पहुंचने पर लाइट चली जाती है। बारिश के दिनों में स्थिति बदतर हो जाती है और वाटर पंप चालू करने के दौरान किसानों को इलेक्ट्रिक शॉक लग जाता है।

किसानों की परेशानी देख ईशान ने एक ऐसा डिवाइस बनाने का फैसला किया। इसके जरिए वे देश के किसी भी कोने से वाटर पंप चालू कर सकें। डिवाइस बनाने के लिए ईशान ने क्राउड फंडिंग प्लेटफॉर्म इंपैक्ट गुरु के जरिए 1.30 लाख रुपए का फंड जुटाया।

जापान में ऐसे लगाई जाती है धान आप देख कर रह जाएंगे हैरान

जापान जैसे की आप को पता है एक छोटा सा देश है लेकिन टेक्नोलॉजी के मामले में उसने अपना लोहा सारी दुनिया में मनवाया है ।वैसे तो जापान इलेक्ट्रॉनिक्स सामान के लिए प्रसिद्ध है लेकिन यहाँ की खेती भी बहुत एडवांस है ।

आज हम आपको दिखायेंगे के जापान में धान की खेती कैसे की जाती है ।जापान की तकनीक हमारे भारत के मुकाबले में इतनी एडवांस है के हमें वैसे धान लगाने के लिए कम से कम 50 साल लग जायँगे ।

इसकी वजह यह है के यहाँ पर धान लगाने का सारा काम पौध त्यार करने से लेकर कटाई तक सारे का सारा काम मशीनो से ही किया जाता है जिस से वक़्त और मेहनत की बचत तो होती है । फसल की गुणवत्ता भी कई गुणा बढ़ जाती है।यहाँ पर कीट नाशक सप्रे करने का काम भी हेलीकॉप्टर से किया जाता है जिस से खर्च भी कम होता है और यह काम होता भी बड़ी तेज़ी से है ।

तो हम आपको एक वीडियो के जरिए धान लगाने की सारी तकनीक के बारे में बताते है ।

कीड़े-मकोड़े पकड़ने का मिला नया आइडिया, सालाना लाखों में कर रही कमाई

कीड़े-मकोड़े फसल की पैदावार को अत्यधिक क्षति पहुंचाते हैं जिससे न सिर्फ किसानों की मेहनत बर्बाद होती है, बल्कि उनको आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है। इन समस्याओं से निपटने के लिए किसान कीटनाशकों का प्रयोग करते हैं,

जिसका प्रतिकूल असर खेती पर पड़ता है और प्रोडक्शन घट जाता है। किसानों की इस समस्या से निजात दिलाने के लिए महाराष्ट्र के वर्धा की रहने वाली निलिशा जिभकाटे को एक नया आइडिया मिला और आज वो अपने खास आइडिया से सालाना लाखों में कमाई कर रही हैं।

क्या मिला नया आइडिया

निलिशा ने मनी भास्कर को बताया कि कीट-पतंगों का प्रकोप बढ़ जाता है, ऐसे में किसान कीटनाशक का प्रयोग करते हैं, जो कि फसल और पर्यावरण दोनों के लिए नुकसानदायक होता है। ऐसे में स्टिकी ट्रैप के इस्तेमाल से फसलों में होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है।

स्टिकी ट्रैप एक पीले रंग की शीट होती हैं जो फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए खेत में लगाई जाती है। इससे फसलों पर कीटों से रक्षा हो जाती है। एक ऐसी तकनीक है कि ये कीड़े खुद व खुद जाल में फंस जाएंगे।

कैसे करता है काम

हर कीट पीले रंग की ओर आकर्षित होता है। अब अगर उसी रंग की शीट पर कोई चिपचिपा पदार्थ लगाकर फसल की ऊंचाई से करीब एक फीट और ऊंचे पर टांग दिया जाए तो कीट रंग से आकर्षित होकर इस शीट पर चिपक जाता है।

फिर यह फसल को नुकसान नहीं पहुंचा पाते हैं। मकसद यह है कि कीड़ों से न सिर्फ फसलों की सुरक्षा हो, बल्कि रसायन का इस्तेमाल भी घटे व बंपर उत्पादन भी हो। इसका प्रयोग बेहद आसान व सस्ता है। यह हर मौसम के लिए कारगर है।

वैज्ञानिकों ने बनाया चलता-फिरता सौर कोल्ड स्टोरेज, अब नहीं खराब होंगी सब्जियां

भंडारण के अभाव में बड़ी मात्रा में फल और सब्जियां समय से पहले खराब हो जाती हैं। वैज्ञानिकों ने ऐसा कोल्ड स्टोरेज यूनिट बनायी है, जिसे किसान अपने यहां भी लगा सकता है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के कृषि इंजीनियरिंग विभाग के वैज्ञानिकों ने सौर ऊर्जा से संचालित मोबाइल कोल्ड-स्टोरेज यूनिट बनायी है, जो फल तथा सब्जियों को नष्ट होने से बचाने में मददगार हो सकती है।

इस कोल्ड-स्टोरेज को विकसित करने वाले वैज्ञानिक डॉ. पी.के. शर्मा ने बताते हैं, “सौर ऊर्जा से चलने वाले इस नए कोल्ड-स्टोरेज से बिजली की समस्या से जूझ रहे किसानों को सबसे अधिक राहत मिल सकती है।

बिजली की बचत के साथ-साथ इससे कृषि उत्पादों के खराब होने की समस्या दूर होगी।कोल्ड-स्टोरेज के भीतर निम्न तापमान और उच्च सापेक्ष आर्द्रता के कारण टमाटर जैसे उत्पादों को बीस दिन तक ताजा बनाए रखा जा सकता है। इसके अलावा अन्य सब्जियों और फलों, जैसे- पालक, शिमला मिर्च, ककड़ी, लौकी, तोरई और पपीते को भी बीस दिनों तक सुरक्षित रख सकते हैं।”

न्यूनतम लागत पर फलों और सब्जियों के लंबे समय तक भंडारण के लिए बनाए गए इस कोल्ड-स्टोरेज की भंडारण क्षमता 4.85 घनमीटर है। इसमें 1000 किलोग्राम फल तथा सब्जियों का भंडारण इसमें किया जा सकता है।

इसकी लंबाई 1.83 मीटर, चौड़ाई 1.34 मीटर और ऊंचाई 1.98 मीटर है। इसे गैल्वनी कृत लोहे, पॉली-कार्बोनेट और प्लाईवुड की चादरों और ग्लास-वूल से बनाया गया है। इस कोल्ड-स्टोरेज में 40 क्रेट्स हैं और प्रत्येक क्रेट में 25 किलोग्राम फल और सब्जियां रखे जा सकते हैं।

इस कोल्ड-स्टोरेज में लगे पहियों द्वारा इसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर आसानी से ले जाया जा सकता है। इसमें सौर ऊर्जा चालित 0.8 टन का एक एयर कंडीशनर लगाया गया है, जिससे कोल्ड-स्टोरेज के भीतर का तापमान 9.5 से 11 डिग्री सेल्सियस और आर्द्रता 73 से 92 प्रतिशत तक बनी रहती है।

यह एयरकंडीशनर एक सौर फोटो वोल्टिक सिस्टम द्वारा चलाया जाता है। इस सिस्टम को कुल आठ सौर पैनलों, एक सौर इन्वर्टर और चार बैटरियों वाले एक बैटरी-बैंक को मिलाकर बनाया गया है। इसे इस तरह तैयार किया गया है, जिससे दिन में अधिक से अधिक सौर ऊर्जा का उपयोग किया जा सके।

डॉ. शर्मा के अनुसार, “सौर संचालित शीत कोल्ड-स्टोरेज का निर्माण भारत में अभी प्रयोगात्मक चरण में है। फिलहाल उपलब्ध शीत भंडारण ज्यादातर सुविधाएं बिजली चालित हैं। इनका उपयोग एक निश्चित तापमान पर सीमित उत्पादों जैसे- आलू, संतरा, सेब, अंगूर, अनार, फूलों इत्यादि के भंडारण के लिए ही हो पाता है। इससे फलों व सब्जियों की गुणवत्ता, ताजगी और जीवन अवधि बनाए रखने में मदद मिलेगी। किसानों और छोटे सब्जी तथा फल-विक्रेताओं की आय भी बढ़ेगी।”

भारत विश्व में फल और सब्जियों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। लेकिन, पर्याप्त शीत भंडारण सुविधाएं नहीं होने से 30 से 35 प्रतिशत फल और सब्जियां लोगों तक पहुंचने से पहले ही खराब हो जाती हैं। किसानों को फलों और सब्जियों को तुरंत बाजार ले जाकर बेचने और गुणवत्ता खराब होने का नियमित दबाव बना रहता है।

इस नए कोल्ड-स्टोरेज के उपयोग से किसान उत्तम गुणवत्ता की भंडारण सुविधाओं का लाभ छोटे स्तर पर अपनी आवश्यकतानुसार उठा सकेंगे। अध्ययनकर्ताओं के अनुसार, उनके द्वारा बनाए गए इस कोल्ड स्टोरेज की लागत लगभग 1.72 लाख रुपये तक हो सकती है।

इसमें 1000 किलोग्राम फलों तथा सब्जियों को भंडारित करने की लागत प्रतिदिन 6.07 रुपये आती है। सिर्फ बिजली के खर्च की बचत से ही नौ सालों में इस कोल्ड-स्टोरेज की लागत निकल आती है। अध्ययनकर्ताओं में डॉ. पी.के. शर्मा के अलावाडॉ. एच.एस. अरुण कुमार भी शामिल थे।