जापान में ऐसे लगाई जाती है धान आप देख कर रह जाएंगे हैरान

जापान जैसे की आप को पता है एक छोटा सा देश है लेकिन टेक्नोलॉजी के मामले में उसने अपना लोहा सारी दुनिया में मनवाया है ।वैसे तो जापान इलेक्ट्रॉनिक्स सामान के लिए प्रसिद्ध है लेकिन यहाँ की खेती भी बहुत एडवांस है ।

आज हम आपको दिखायेंगे के जापान में धान की खेती कैसे की जाती है ।जापान की तकनीक हमारे भारत के मुकाबले में इतनी एडवांस है के हमें वैसे धान लगाने के लिए कम से कम 50 साल लग जायँगे ।

इसकी वजह यह है के यहाँ पर धान लगाने का सारा काम पौध त्यार करने से लेकर कटाई तक सारे का सारा काम मशीनो से ही किया जाता है जिस से वक़्त और मेहनत की बचत तो होती है । फसल की गुणवत्ता भी कई गुणा बढ़ जाती है।यहाँ पर कीट नाशक सप्रे करने का काम भी हेलीकॉप्टर से किया जाता है जिस से खर्च भी कम होता है और यह काम होता भी बड़ी तेज़ी से है ।

तो हम आपको एक वीडियो के जरिए धान लगाने की सारी तकनीक के बारे में बताते है ।

कोटा के किसान ने विकसित की आम की नई प्रजाति

फलों के राजा कहे जाने वाले आम का नाता हमारी सभ्यता से शुरू से ही रहा है। अमूमन गर्मी के सीजन में ही आम का उत्पादन होता है। लेकिन अब दिन-प्रतिदिन विज्ञान के बढ़ते कदम की वजह से आम का उत्पादन अन्य सीजनों में भी होने लगा है।

भारत में इस समय 1500 से अधिक आम की किस्में पाई जाती हैं। सभी किस्म अपने आप में अच्छा खासा महत्व रखती है। ऐसी ही एक किस्म खोज निकाली है कोटा के एक किसान ने। इन्होंने ऐसी प्रजाति विकसित की है जिसका साल के तीनों सीजन में उत्पादन होता है। यानी पूरे साल भर ये प्रजाति फल देती है, इसीलिए इसका नाम रखा गया है ‘सदाबहार।’

कोटा में बागवानी करने वाले गिरधरपुरा गांव के किसान किशन सुमन की बाग से उत्पादित होने वाला सदाबहार आम की कुछ खूबी अल्फांसो आम की तरह हैं। अल्फांसो भारत का सब से खास किस्म का आम है। इसे आम का सरताज कहा जाता है। बस इसी सरताज से मिलती जुलती चीजों जैसा सदाबहार आम है। आम की ये प्रजाति अपने आप में अलग तरीके की है।

गुलाब की खेती से किया परिवर्तन

किशन सुमन ने 1995 में गुलाब, मोगरा और मयूरपंखी (थूजा) की खेती शुरू की और तीन वर्षों तक फूलों की खेती करते रहे। इसी दौरान उन्होंने गुलाब के ऐसी किस्म को विकसित किया जिसमें एक ही पौधे मं सात रंग के फूल लगते हैं। उनके द्वारा उत्पादित इस किस्म का उन्हें अच्छा रिटर्न मिला। इसके बाद उन्होंने अन्य फसलों पर भी काम करना शुरू किया।

सुमन बताते हैं कि “मैंने सोचा है कि अगर मैं गुलाब की किस्म में परिवर्तन कर सकता हूं तो फिर आमों के साथ क्यों नहीं। मैंने विभिन्न किस्मों के आमों को इकठ‍्ठा किया और उन्हें पोषित किया। जब पौधे पर्याप्त बड़े हो गए, तो मैंने उन्हें रूटस्टॉक पर तैयार किया। इसके बाद फिर काफी हद तक परिवर्तन आया।

2000 में पहचान में आई किस्म

गुलाब किशन को कामयाबी 2000 में मिलती दिखी। उन्होंने अपने बगीचे में एक आम के पेड़ की पहचान की, जो तीन मौसमों में खिल गया था। जनवरी-फरवरी, जून-जुलाई और सितंबर-अक्टूबर। उन्होंने पांच पेड़ों को एक प्रयोग के तौर पर इस्तेमाल किया।

इस पेड़ की अच्छी विकास आदत थी और इसमें गहरे हरे पत्ते थे। इन पेड़ों की एक खास बात यह भी थी कि इन पौधों में किसी भी प्रकार की बीमारी नहीं थी। धीरे-धीरे वे अपने क्षेत्र में प्रसिद्ध होते गए। हनी बी नेटवर्क के एक स्वयंसेवक सुंदरम वर्मा ने सुमन के नवाचार के बारे में जमीनी तकनीकी नवाचारियों और उत्कृष्ट पारंपरिक ज्ञान के लिए संस्थागत अंतरिक्ष, नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन (एनआईएफ) को सूचित किया।

इसके बाद एनआईएफ ने सदाबहार पौधे बेचने या उपहार देने के लिए कहा, मैंने उन्हें पौधे दिए। एनआईएफ ने मुझे ये सलाह दी कि अपनी किस्म को सत्यापित कराएं। वे कहते हैं कि उनकी सलाह मानते हुए अपनी किस्म को प्रमाणित करने के लिए मैंने 11 वर्षों तक देश के विभिन्न स्थानों पर जाकर अपनी किस्म के पौधे लगाए। वह कहते है कि एनआईएफ को “मैंने 2012 में 20 पौधों का उपहार दिया था। अब पेड़ फल दे रहा है और जब फल पकता है, त्वचा नारंगी रंग प्राप्त करती है, जबकि अंदरूनी फल गेरुआ रंग का होता है।

इन पुरस्कारों से किया जा चुका है सम्मानित

खास प्रकार की किस्म को विकसित करने वाले किशन सुमन को अब तक कई अवार्ड भी दिए जा चुके हैं। मार्च 2017 में सुमन को 9वीं द्विवार्षिक ग्रासरूट इनोवेशन और राष्ट्रपति भवन में आयोजित उत्कृष्ट पारंपरिक ज्ञान के दौरान फार्म इनोवेशन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था।

इनके फलों की तारीफ करते हुए हरदेव चौधरी कहते हैं कि सदाबाहर पूरे वर्ष खिलते हैं। फल का स्वाद मीठा होता है और एक बौने विविधता के रूप में विकसित होते हैं। वे कहते हैं कि आम की इस नस्ल को किचन ग्रार्डन में बर्तन में रखकर कुछ समय बाद उत्पादित किया जा सकता है।

वे कहते हैं कि मौजूदा किस्मों की स्थिति को देखते हुए इसकी क्षमता बड़ी है। ऑक्सीजन की अत्याधिक उपलब्धता होने के कारण ये उत्पादकों के लिए भी बेहद फायदेमंद हो सकता है। वे कहते हैं कि ये किस्म देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया का एकमात्र हाईब्रिड आम है जो कि साल में तीन बार फल देता है।

राष्ट्रपति भवन के मुगल गार्डन की शान बने है सदाबहार

किशन सुमन द्वारा उत्पादित की जा रही आम की ये किस्म अब राष्ट्रपति भवन के मुगल गार्डन की शान बन चुके हैं। सदाबार आम किस्म के यहां पर चार पौधे लगाए गए है। किशन के अनुसार उनके चार बीघा खेत में आम के 22 मदर प्लांट्स और 300 ग्राफ्टेड प्लांट्स लगे हुए हैं।

सदाबहार नाम की आम की यह किस्म रोग प्रतिरोधी है। बौनी किस्म होने से इसे गमले में भी लगाया जा सकता है। इसमें वर्ष भर नियमित रूप से फल आते हैं और ये सघन रोपण के लिए भी उपयुक्त है। जब से राष्ट्रपति भवन में सुमन के आमों को लगाया गया था, तब से उनकी लोकप्रियता और बढ़ गई है।

सुमन ने दिल्ली, राजस्थान, छत्तीसगढ़, गुजरात, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और तेलंगाना में नर्सरी और व्यक्तियों को 800 रुपये से अधिक, 800 रुपये के लिए उपलब्ध कराया है। सुमन ने कहा, “मुझे नाइजीरिया, पाकिस्तान, कुवैत, इराक, यूके और संयुक्त राज्य अमेरिका से भी लोग कॉल करके सदाबहार के बारे में पूछ रहे हैं।

सुमन के अनुसार एक पौधा लगभग 5 साल बाद फल देता है। मेरे लिए एक अच्छी बात यह है कि उत्पादक लंबे समय तक का इंतजार करते हैं लेकिन वे शिकायत नहीं करते हैं। ये सदाबार अन्य किस्मों से बहुत अलग है।

अंडा ट्रे के इस्तेमाल से आप भी ऐसे ले सकते है सड़े हुए प्याज़ से मुनाफा

आपकी जेब ढीली कर देने वाली प्याज कभी-कभी कौड़ियों के दाम पर बिकने को मजबूर हो जाती है जिससे किसानों को काफी सही मुनाफा नहीं मिल पाता। किसानों को उनके प्याज की सही कीमत मिले इसके लिए राजविंदर सिंह राना ने एक नई तकनीक इजाद की है। राजविंदर पंजाब के लुधियाना जिले के मदियानी गांव में रहते हैं।

उन्होंने यह देखा कि कई बार जब प्याज हल्का सड़ने लगता हैं तो किसानों को उसका उचित मूल्य नहीं मिल पाता। राजविंदर ने समस्या का हल निकालने के लिए इस विषय शोध किया। उन्होंने ‘एग ट्रे’ में प्याज रखकर सप्ताह में दो बार पानी का छिड़काव किया। इसके बाद उससे हरी पत्ती वाला प्याज निकलने लगा।

राजविंदर बताते हैं कि एक किलो प्याज में जितने गुण पाए जाते हैं, उतने ही गुण एक हरे पत्ती वाले प्याज में पाए जाते हैं। वैसे तो इस इस तकनीक का इस्तेमाल हम उस समय कर सकते हैं जब हमारे पास मिट्टी का कोई साधन न हो लेकिन अभी मैंने इसका इस्तेमाल अपनी किचेन में किया है।

इस प्याज का इस्तेमाल हम रोजाना कर सकते हैं। ये वर्षों चलने वाली प्रक्रिया है, इससे हमारे घर में हल्का खराब हो रहा प्याज प्रयोग में आ जाएगा। राजविंदर आगे बताते हैं कि इस प्रक्रिया से किसानों के प्याज का उन्हें सही दाम भी मिलेगा। साथ ही अगर कोई इस हरे प्याज एग ट्रे को बाजार में बेचना चाहेगा तो उस समय बाजार भाव के हिसाब से 40-60 रुपए आसानी से कमाए जा सकते हैं।

आप भी अपनी रसोई में खाली एग ट्रे में घर में हल्के खराब हो रहे प्याज को एग ट्रे के खानों में भरकर रख सकते हैं। सप्ताह में दो बार हल्के पानी का इसमें छिड़काव करें। इसमें हर सप्ताह में दो बार पानी डालते रहें जिससे ये हरा बना रहेगा। इस तकनीक से घर में खराब हो रहे प्याज का हम सही से प्रयोग कर सकते हैं।

बोर कराने से पहले नारियल और अंडा टेस्ट से जाने जमीन में कहाँ है मीठा पानी

खेती के लिए सबसे जरूरी चीज़ होती है वो है पानी । लेकिन जमीन के अंदर मीठा पानी कहाँ मिलेगा ये पता लगाना काफी मुश्किल काम है । क्योंकि कई बार किसान ट्यूबवेल बोर करने पर बहुत सारा पैसा खर्च कर देता है लेकिन जा तो वहां पर पूरा पानी नहीं बनता जा फिर पानी बहुत ही खरा होता है जो फसलों के लिए बहुत ही नुकसानदायक होता है ।

ऐसे में बहुत से तरीकों है जिस के इस्तेमाल से ये पता लगाने की कोशिश की जाती है की आखिर खेत में मीठा पानी कहाँ मिल सकता है ।आज हम आपको ऐसे ही 2 तरीकों के बारे में बताएँगे जो भारत में बहुत प्रचलित है।

अंडे और नारियल के इस्तेमाल से -इस तरिके में एक अंडे जा नारियल को हथेली पर रख कर खेत में घुमा जाता है ।और जहाँ पर भी अंडा जा नारियल हथेली में ऊपर उठने लग जाता है तो समझा जाता है के वहां पर धरती के अंदर मीठा पानी है ।

अब इसके पीछे कोई वैज्ञानिक कारण है जा अन्धविश्वाश ये कहना मुश्किल है लेकिन इस विधि का इस्तेमाल करने वाले बताते है के ये तरीका काफी कामयाब है । हालाँकि की कुछ लोगों का मानना है के ये सब नारियल और अंडे के अंदर के पानी के कारण होता है जो उसे खड़ा कर देता है ।

ये तकनीक कैसे काम करती है उसके लिए वीडियो भी देखें

पेड़ों को एक से दूसरी जगह लगा इस शख्स ने खड़ा किया 2.5 करोड़ का बिजनेस

हर दिन तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण में हमारे अंदर अक्सर एक सवाल उठता है कि हम शहर के विकास को प्राथमिकता दें या पेड़ों को बचाएं? क्या विकास और अच्छा पर्यावरण एक साथ नहीं मिल सकता? हैदराबाद के रहने वाले रामचंद्र अप्पारी के पास इस बात का जवाब है। उनका कहना है कि किसी भी अपार्टमेंट या फ्लाइओवर को बनाने के लिए पेड़ को काटने के बजाय उसे बचाया जा सकता है।

38 साल के रामचंद्र ने ग्रीन मॉर्निंग हॉर्टीकल्चर सर्विस प्राइवेट लिमिटेड नाम से एक कंपनी बनाई है जो पेड़ों के ट्रांसलोकेशन यानि एक जगह से हटाकर दूसरी जगह पर लगाने का काम करती है। ट्री ट्रांसलोकेशन एक प्रक्रिया है जिसमें पेड़ को काटने के बजाय उसे जड़ से उखाड़ लिया जाता है और फिर दूसरी जगह पर उसे जैसे का तैसा लगा दिया जाता है।

पुराना है तरीका

ट्री ट्रांसलोकेशन कोई नया तरीका नहीं है। मिस्र में 2000 ईसा पूर्व भी ये तरीका अपनाया जाता था रामचंद्र बताते हैं कि जिन पेड़ों को स्थानांतरित करना होता है उन्हें पहले छांट दिया जाता है। पेड़ की लगभग 80 फीसदी पत्तियां, तना और बाकी हिस्सा काटा जाता है।

इसके बाद पेड़ के चारो ओर एक खाई को खोदा जाता है। इस खाई की गहराई पेड़ की उम्र के हिसाब से तय होती है। इसके बाद पेड़ की जड़ों में कुछ केमिकल्स लगाए जाते हैं और उन्हें टाट के बोरे में लपेटा जाता है। इसके बाद क्रेन से वह पेड़ उठाया जाता है और उसे ट्रेलर पर रख दिया जाता है यहां से वह उस जगह पहुंचाया जाता है जहां उसे दोबारा लगाना हो।

इसके बाद पेड़ को फिर से एक खाई में रखा जाता है और उसमें केमिकल्स डाले जाते हैं। रामचंद्र बताते हैं कि उनकी कंपनी 90 प्रजातियों के 5000 पेड़ों को स्थानांतरित कर चुकी है। हर प्रजाति के लिए उसके बचने के चांसेज बराबर नहीं होते। मुलायम लकड़ी वाले पेड़ जैसे बरगद, पीपल, गुलमोहर आदि के बचने का चांस 90 फीसदी होता है वहीं कठोर लकड़ी वाले पेड़ जैसे नीम, इमली और सागौन आदि के पेड़ों के बचने का चांस 60 से 70 फीसदी तक होता है।

कितना होती है कमाई

कंपनी सरकारी संस्थानों के लिए काम तो करती है अगर कोई व्यक्तिगत रूप से ये काम कराना चाहे तो कंपनी उसके लिए भी तैयार रहती है। व्यक्तिगत रूप से काम कराने वाले ज्यादातर लोग पेड़ों को अपने फार्महाउस में ट्रांसलोकेट कराते हैं। पेड़ को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने और लगाने में क्या खर्च आएगा ये पेड़ के साइज़ पर निर्भर करता है। रामचंद्र बताते हैं कि इसकी शुरुआत 6 हज़ार रुपये से होती है लेकिन हम एक पेड़ के लिए 1.5 लाख रुपये भी चार्ज करते हैं।

ऐसा नहीं है कि ये कंपनी सिर्फ हैदराबाद में ही काम करती है। पेड़ों को ट्रांसलोकेट करने का काम दिल्ली, बेंगलुरू, विशाखापट्टनम और देश के बाकी कई शहरों में भी होता है।2009 में शुरू हुई उनकी कंपनी का बिजनेस अब करोड़ों में हो गया है। पिछले साल कंपनी का टर्न ओवर 2.5 करोड़ रुपए था। रामचंद्र कहते हैं कि टर्नओवर पर 25% तक प्रॉफिट हो जाता है। उनका दावा है कि इस तरह का बिजनेस देश में शुरू करने वाले वो पहले शख्स हैं।

कैसे हुई शुरुआत

रामचंद्र ने एग्रीकल्चर में मास्टर डिग्री ली है और एग्री बिजनेस में एमबीए किया है लेकिन कैंपस प्लेसमेंट में उनकी नौकरी एक प्राइवेट बैंक में लग गई। इस कंपनी में उन्होंने 4 साल काम किया लेकिन उनका मन यहां नहीं लगा। आठ साल तक एग्रीकल्चर की पढ़ाई करने के बाद उससे अलग कुछ करना उन्हें समझ नहीं आ रहा था, इसीलिए उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी।

2009 में रामचंद्र हैदराबाद से विजयवाड़ा जा रहे थे जब उन्होंने देखा कि एक सड़क का चौड़ीकरण किया जा रहा है, जिसमें कई पेड़ों को काट दिया गया। यहीं से उनके मन में आया कि इन पेड़ों को कटने से बचाने का कोई तो तरीका होगा। इसके बाद उन्होंने ट्रांसलोकेशन के बारे में पढ़ा और अपने ऑस्ट्रेलिया के एक दोस्त से इसके बारे में समझा।

लोहे की यह गाय कूड़ा और घास फूस खाकर देगी जैविक खाद

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) बरेली के वैज्ञानिकों ने आईआईटी रुड़की के साथ मिलकर एक मेकेनिकल काउ बनाई है। भले ही यह गाय की तरह न दिखे पर गाय की तरह खरपतवार खाती है और बदले में जैविक खाद देती है।

मशीन की संरचना गाय के पेट से मेल खाती है इसलिए इसका नाम मेकेनिकल काउ कंपोस्टिंग मशीन रखा गया है। आईवीआरआई के पशु आनुवांशिकी विभाग के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. रणवीर सिंह बताते हैं कि उन्होंने जयगोपाल वर्मीकल्चर तकनीक विकसित की थी। स्वदेशी प्रजाति के केंचुए जयगोपाल की मदद से जैविक खाद बनाने की प्रक्रिया 40 दिन हो गई।

इससे भी तेजी से खाद बनाने के बारे में शोध जारी थी। इस दौरान मेकेनिकल काउ कंपोस्टिंग मशीन का विचार आया। इसको लेकर आईआईटी रुड़की की मदद ली गई। मशीन तैयार होने के बाद से अब तक इसमें लगातार बेहतर रिजल्ट के लिए काम जारी है। मेकेनिकल काउ कंपोस्टिंग मशीन न्यूनतम सात दिन में यह खाद तैयार कर देती है।

रोज 100 किलो खरपतवार डालेंगे तो अगले सात दिनों के बाद से रोजाना 100 किलो खाद मिलनी शुरू हो जाएगी। 30 दिन में तैयार होते हैं सूक्ष्मजीवी, 7 से 10 दिन में बन जाती है खाद मैकेनिकल काउ कंपोस्टिंग मशीन से खाद बनाने से पहले सूक्ष्मजीवी विकसित करने में 40 से 50 दिन लगते हैं। रोटरी ड्रम में सूक्ष्मजीवीयों के विकास के बाद इसमें खरपतवार, सब्जियों के कचरे डाले जा सकते हैं।

साथ ही बीच बीच में गोबर, कूड़े, कचरे और पत्तियों को मिक्स कर उसपर सूक्ष्मजीवीयों का घोल डाला जाता है। मशीन के रोटरी ड्रम को दिन में कुछ मिनट के लिए घुमाना पड़ता है ताकि कूड़ा-कचरा आक्सीजन और सूक्ष्मजीवों के संपर्क में आ जाए। हर दिन 120 किलो कचरा डाला जा सकता है जिससे प्रतिदिन 100 किलो जैविक खाद निकाली जा सकती है।

गाय के पेट में मौजूद सूक्ष्मजीवी, मशीन में भी रहकर बनाते हैं खाद मैकेनिकल काउ कंपोस्टिंग मशीन का कांसेप्ट बिल्कुल गाय के पाचन तंत्र से मेल खाता है। जिस तरह गाय के पेट में कई भाग होते हैं उसी तरह से मैकेनिकल काऊ कंपोस्टिंग मशीन के रोटरी ड्रम में भी कई चरणों के खाद बनती है। बस मशीन को हर रोज कुछ मिनट के लिए घुमाना पड़ता है। यह मशीन एक कोण पर झुकी होती है।

आगे से खरपतवार डाली जाती है और पीछे से खाद निकलती है। डा. रणवीर बताते हैं कि दिन में एक बार मशीन को तीन मिनट के लिए घुमाते हैं सर्दियों में भी ड्रम का तापमान 70 डिग्री तक होता है रोटरी ड्रम में मौजूद माइक्रोआर्गनिज्म (जीवाणु और सूक्ष्मजीवी) की वजह से सर्दियों में भी जब तापमान छह डिग्री तक पहुंच जाता है, ड्रम के बीच के भाग का तापमान 70 डिग्री होता है।

डॉ. रणवीर कहते हैं कि यह सूक्ष्मजीवीयों की ओर से जारी अपघटन प्रक्रिया के कारण होता है। सबसे खास खाद की क्वालिटी है। इसमें कुल नाइट्रोजन 2.6 फीसदी और फासफोरस 6 ग्राम प्रति किलो होता है। अब किसानों को दी जा रही है ट्रेनिंग डॉ. रणवीर सिंह ने कहा कि केंद्र सरकार जैविक खेती को बढ़ावा दे रही है।

जैविक खाद बनाने के लिए किसानों को सब्सिडी भी दी जा रही है। ऐसे में मेकेनिकल काउ कंपोस्टिंग मशीन काफी कारगर होगी। यह मशीन 2014 में तैयार की गई थी और तब से इस मशीन को और बेहतर बनाने पर शोध चन रहा है।

अब मशीन रोजाना 100 किलो खाद मिलती है वहीं किसान इसका छोटा प्रतिरुप भी बनवा सकते हैं। जैविक खाद को लेकर किसानों को लगातार जागरुक किया जा रहा है। किसान चाहे तो इसे समूह में मिलकर तैयार करा सकते हैं।

पौधों को जल्दी बड़ा करने के लिए ऐसे करें डिस्प्रीन का प्रयोग

दोस्तों आप ने एस्प्रिन का पौधों पर इस्तेमाल सुना ही होगा आज हम आपको बताएँगे की सच्च में एस्प्रिन डालने से पौधे तेज़ी से बढ़ते है जा नहीं। उसके लिए हम एक छोटा सा प्रयोग करेंगे ।

इसमें हम दो गमले लेंगे । एक गमले में हम बीज डिस्प्रीन में भिगो कर लगाएंगे और दूसरी तरफ पानी में भिगो कर लगाएंगे । भारत में एस्प्रिन की टेबलेट अब डिस्प्रीन के नाम से मिलती है ।

डिस्प्रीन को पानी में घोलने के बाद उसमे बीज कुछ घंटो के लिए भिगो कर लगाना है । बीज लगाने के बाद आप देख सकते है की कैसे डिस्प्रीन में भिगो कर लगाने वाले बीज बड़ी तेज़ी से बढ़ते है और दूसरे गमले वाले बीज बहुत धीरे ग्रोथ करते है तो इस से ये साबित होता है की एस्प्रिन पौधों की ग्रोथ के बढ़ाती है ।

वीडियो भी देखें

इसके इलावा कई बार होता है कि हमारे बगीचे के पौधों में फंगस लग जाती है जिसके कारण पौधे मुरझा जाते हैं व उनकी चमक भी खो जाती है । इस कमी को दूर करने के लिए आप एक गैलन पानी में एक डिस्प्रीन मिला दें जिसके कारण पौधों में फंगस नहीं लगेगा और आपके बगीचे की ताजगी बरकरार रहेगी।

सोर ऊर्जा से इस किसान ने कीटों को भगाने के लिए खोजा अनोखा तरीका

पिछले कुछ सालों में कीटनाशकों के बढ़ते इस्तेमाल से पर्यावरण के लिए कई तरह के खतरे पैदा हो रहे हैं। इससे न सिर्फ अनाज ज़हरीला हो जाता है बल्कि इससे ग्राउंड वॉटर टेबल भी बिगड़ रही है।

आजकल देशभर के हज़ारों किसान इस बात को समझ चुके हैं कि रासायनिक कीटनाशकों और उर्वरकों के इस्तेमाल से पर्यावरण को कितना नुकसान हो रहा है और हमारी सेहत को भी खतरा है। इसी को देखते हुए वे अब इसके लिए नए और सुरक्षित तरीके खोज रहे हैं।

केरल के पलक्कड़ ज़िले के चित्तूर ब्लॉक में इलापुल्ली गांव के एक किसान ने अपने खेत से कीटों को भगाने का एक अनोखा तरीका खोजा है। चंद्रन नाम के इस किसान ने कीटों से छुटकारा पाने के लिए एक सस्ता और इको फ्रेंडली उपाय खोजा है जो सूर्य की रोशनी से काम करता है।

केरल के एक लोकल न्यूज़ पोर्टल मातृभूमि में छपी ख़बर के मुताबिक, चंद्रन अपने 6 एकड़ के खेत में धान की खेती करते हैं। वह यहां के कृषि विभाग द्वारा बताई जाने वाली तकनीकों के साथ अक्सर नए एक्सपेरिमेंट करते रहते हैं।

उन्होंने एक ऐसा सोलर लाइट ट्रैप बनाया है जो कीटों को मार देता है और किसी रासायनिक कीटनाशकी की ज़रूरत भी नहीं पड़ती। इस उपकरण को बनाने के लिए एक ट्राइपॉड के ऊपर एक कटोरी रखी और उसमें एक एलईडी बल्ब और सोलर पैनल लगाया गया।

इस उपकरण को चलाना बहुत ही आसान है। बल्ब से शाम को 6.30 से 9.30 बजे के बीच नीली रोशनी निकलती है जो कीटों को अपनी ओर आकर्षित करती है। बल्ब के ठीक नीचे एक ज़हर का ट्रैप है जो न सिर्फ इन कीटों को पकड़ लेता है बल्कि वे तुरंत मर भी जाते हैं।

ये मशीन सिर्फ उसी समय काम करती है जब कीटों का हमला खेत में सबसे ज्यादा होता है। 10 बजे के बाद ये मशीन काम नहीं करती ताकि खेत को फायदा पहुंचाने वाले कीटों को नुकसान न पहुंचे।ये मीशन सोलर एनर्जी की मदद से अपने आप काम करती है।

चंद्रन की बनाई इस मशीन से फसल की कीटों से रक्षा भी हो जाती है और वह रासायनिक कीटनाशकों से सुरक्षित भी रहती है। उनकी इस मशीन के फायदों को देखते हुए एलाप्पुल्ली के कई किसानों ने अपने खेतों में ये उपकरण लगाया है।

ये उपकरण पूरी तरह से ऑटोमैटिक है बस कटोरी में रखे पॉइज़न ट्रैप को दो दिनों में बदलने की ज़रूरत होती है। किसान एक खेत में एक से ज्यादा उपकरण लगा सकते हैं और इसकी जगह में भी बदलाव कर सकते हैं। एलाप्पुल्ली के कृषि भवन में फील्ड असिस्टेंट रजिता कहती हैं कि ये ट्रैप इको फ्रेंडली है और रासायनिक कीटनाशकों से अपनी फसल को बचाने का अच्छा उपाय भी।

अब हवा में भी उगेगा आलू

शिमला स्थित केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान ने हवा में आलू उगाने का कारनामा कर दिखाया है। संस्थान द्वारा बीते तीन सालों से किया जा रहा प्रयोग सफल साबित हुआ है।जिसके बाद संस्थान को यह आविष्कार करने में सफलता हाथ लगी है। संस्थान एरोपोनिक नामक नई तकनीक से बिना मिट्टी के हवा में आलू उगाने की यह विधि ईजाद की है।

आमतौर पर आलू जमीन के नीचे उगाया जाता है। एरोपोनिक नाम की नई तकनीक में आलू बिना मिट्टी के हवा में उगाया जाएगा, यानी कि एक थर्मोकोल लगे बॉक्स में छेद करके आलू के पौधे को डाला गया है। पौधे को इस तरह से बॉक्स में डाला गया है कि उसकी जड़े नीचे हवा में हो।

जडों पर न्यूट्रिन अमीडिया नामक छिड़काव किया गया है। विभिन्न तापमान के अनुरूप इन पौधों की जांच की गई। इस आलू को उगाने के लिए मिट्टी का प्रयोग नहीं किया गया। इसमें कीटनाशकों का प्रयोग न के बराबर हुआ है।

ऐरोपोनिक पद्धति से मिट्टी के बिना बीज आलू पैदा करने की तकनीक पर आधारित एरोपोनिक सुविधाओं से आलू की रोग रहित नई किस्में तैयार करने की तकनीक पर आधारित एरोपोनिक सुविधाओं से आलू को किसानों तक कम समय में पहुंचाने में मदद मिलेगी।

आमतौर पर जिस आलू के एक पौधे से सिर्फ पांच और 10 आलू पैदा होते थे, इस तकनीक की मदद से आलू के एक पौधे से 70 आलू का उत्पादन हो सकेगा। ऐसे में सात गुना ज्यादा आलू का उत्पादन संभव होगा । इस प्रकार इस तरिके से आलू का उत्पादन 7 गुना बढ़ जाता है । बहुत जल्द ये तकनीक किसानो के पास पहुंच जाएगी

महिला किसानों ने बनाया देसी कोल्ड स्टोर, ऐसे करता है काम

आलू-टमाटर जैसी सब्जियों को सड़क पर फेंकने को मजबूर किसानों के लिए बांस से बना देसी कोल्ड स्टोरेज किसी राहत से कम नहीं है। यह कोल्ड स्टोरेज हजारीबाग के टाटीझरिया प्रखंड की महिलाओं की देन है।

झारखंड के लगभग हर इलाके में कोल्ड स्टोरेज की समस्या आम है, देश के बाकी हिस्सों में भी स्थिति बहुत बेहतर नहीं है। फेडरेशन ऑफ कोल्ड स्टोरेज एसोसिएशन ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक कोल्ड स्टोरेज की उचित व्यवस्था नहीं होने से देश में 40 प्रतिशत फसल, सब्जियां, फल-फूल, दूध-मछली व अन्य उत्पाद बर्बाद हो जाते हैं।

टाटीझरिया प्रखंड के गांवों की महिलाओं ने बांस के बेंत से देसी कोल्ड स्टोरेज तैयार कर इस समस्या का हल ढूंढ लिया है। पहली बार बनाए गए इस तरह के कोल्ड स्टोरेज क्षेत्र के दर्जनों गांवों में खुशहाली का मंत्र लेकर आए हैं।

हजारीबाग का यह इलाका महिला समूहों द्वारा की जा रही सामूहिक खेती के कारण भी जाना जाता है। ऐसे में किसान महिलाओं द्वारा देसी कोल्ड स्टोरेज तैयार करना उनकी दोहरी उपलब्धि है।

खराब नहीं होगा आलू-प्याज

बांस के बेत से बने इस कोल्ड स्टोरेज की खासियत यह है कि इसमें पूरे एक सीजन तक आलू, प्याज, लहसुन आदि को सुरक्षित रख सकते हैं।

कम लागत में उत्पादों की बर्बादी रोककर बेहतर मुनाफा दिलाने वाला यह देसी कोल्ड स्टोरेज स्थानीय किसानों में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। टाटीझरिया प्रखंड के एक दर्जन गांवों में अब घर-घर ऐसे कोल्ड स्टोरेज बनाए जा रहे हैं। आलू-प्याज के इस सीजन में इसकी मांग भी खासी है।

देसी कोल्ड स्टोरेज की खासियत

  • यह पूरी तरह से सुरक्षित है। यह किसी भी हवादार कमरे में तैयार किया जा सकता है।
  • यह आलू-प्याज को नमी से बचाता है।
  • बांस में फंगस नहीं लगता है, यही वजह है कि सब्जियां सड़ती नहीं है।

बदलाव की कहानी लिख रहीं महिलाएं

कोल्ड स्टोरेज के इस देसी स्वरूप का मॉडल डिजिटल ग्रीन संस्था के डॉ. रवि ने तैयार किया है। इसे दिल्ली में भी प्रदर्शित किया गया था। वर्तमान में खैरा,अमनारी, फुरुका, बरकाखुर्द, रतनपुर सहित अन्य गांवों में 100 से अधिक कोल्ड स्टोरेज बन चुके हैं। सृजन फाउंडेशन द्वारा महिला किसानों को प्रशिक्षित किया जा रहा है।

झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसायटी भी अब इस अभियान से जुड़कर महिला स्वयं सहायता समूहों को प्रशिक्षण देकर ऐसे मॉडल बनवा रही है। इस मुहिम से जुड़कर ऐसे मॉडल तैयार करनेवाली महिलाएं अच्छी-खासी आमदनी भी पैदा रही हैं।