सिर्फ 1000 रुपये खर्च कर उगाएं 400 Kg टमाटर, जानें किसने किया कमाल

गाजीपुर जिले के मिर्जापुर गांव निवासी पार्थ खेती में क्रांति लाने के लिए प्रयासरत हैं। पार्थ ने हाइड्रोपोनिक (बिना मिट्टी के खेती) तकनीक विकसित कर टमाटर की खेती कर मिसाल कायम की है। मौजूदा समय में गाजीपुर जिले में लगभग सभी घरों में उनके मॉडल से टमाटर की खेती हो रही है।

पार्थ को वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विवि में पढ़ाई के दौरान इस तकनीक के बारे में पता चला था। उन्होंने बताया कि विवि के हार्टीकल्चर विभाग के प्रोफेसर डॉ. डीआर सिंह व डॉ. पीयूष कांत सिंह ने उन्हें तकनीक के बारे में जानकारी देते हुए कहा था कि जोधपुर में सेंट्रल एरिड जोन रिसर्च इंस्टीट्यूट (साजरी) में यह तकनीक आई थी। साजरी में यह योजना सफल नहीं हो पाई, लेकिन पार्थ ने इस तकनीक का सफलतापूर्वक उपयोग कर बड़ी उपलब्धि हासिल की है।

राष्ट्रपति पुरस्कार से तीन बार हो चुके हैं सम्मानित

पार्थ को अब तक तीन बार राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। पहली बार 2007 में तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने उन्हें बेस्ट एनसीसी कैडेट ऑफ इंडिया के अवार्ड से सम्मानित किया था।

वहीं, दूसरी बार प्रतिभा पाटिल ने स्काउटिंग के लिए 2009 में सम्मानित किया। हाइड्रोपोनिक (बिना मिट्टी के खेती) तकनीक विकसित करने के लिए 2015 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी पार्थ को प्रेसिडेंट रोवर अवार्ड से सम्मानित कर चुके हैं।

गिनीज बुक ऑफ व‌र्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है नाम

गाजीपुर से दिल्ली (राजघाट) तक बिना रुके हुए 167 घंटे तक लगातार चलकर पार्थ अपना नाम गिनीज बुक ऑफ व‌र्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज करा चुके हैं। पार्थ की इस उपलब्धि पर तत्कालीन थलसेना अध्यक्ष जनरल दलवीर सिंह सुहाग ने उन्हें सम्मानित किया था। पार्थ की टीम में कुल दस युवा शामिल थे, जिन्होंने लगातार छह दिन तक यात्रा की थी।

इस तरह से की जाती है खेती

20-20 मीटर के छह पाइप को एक पिलर पर रख दिया जाता है। पिलर के एक तरफ दस फीट का गड्ढा खोदकर उसमें 100 लीटर का टैंक डाला जाता है। टैंक में न्यूट्रियेंट के 16 तत्वों से युक्त पानी मिलाया जाता है। पौधे को पाइप में लगा दिया जाता है, जहां तक पंप की सहायता से पानी पहुंचाया जाता है। पाइप में एक कीप लगा दी जाती है, जिसके जरिये बचे हुए पानी के वापस टैंक तक ले जाया जाता है। पूरी प्रक्रिया इसी तरह चलती रहती है।

खास बात यह है कि इस तकनीक के जरिये टमाटर का पौधा लौकी के पौधे से भी बड़ा होकर लगभग 60 मीटर तक का हो जाता है। एक हजार रुपये खर्च करके कम से कम चार सौ किलो टमाटर प्राप्त किया जा सकता है।

हाइड्रोपोनिक तकनीक पर लिख चुके हैं 18 किताब

पार्थ अब तक हाइड्रोपोनिक (बिना मिट्टी की खेती) तकनीक पर अठारह किताबों की श्रंखला लिख चुके हैं। खास बात यह है कि सभी किताबों का शीर्षक वेपन अगेंस्ट हंगर (भूख के खिलाफ हथियार) है। शीर्षक का उल्लेख करते हुए पार्थ ने बताया कि आज भी भारत के ग्रामीण इलाकों का गरीब भूखा सोता है।

तकनीक को लेकर आत्मविश्वास भरे लहजे में पार्थ ने बताया कि इसका सही तरीके से क्रियान्वयन होने पर देश में खेती के जरिये ही किसानों की आर्थिक समस्या दूर हो जाएगी और अन्नदाता को भूखे नहीं सोना पड़ेगा।

100 दिन में तैयार होने वाली कपास की नई किस्म विकसित

कपास की खेती के तैयार होने में लगने वाले अधिक समय और पानी की वजह इसकी खेती घट रही है, लेकिन केन्द्रीय कपास अनुसंधान संस्थान, नागपुर ने कपास की एक ऐसी नई किस्म विकसित की है जो मात्र 200 दिन में तैयार हो जाती है और इसमें बीमारियां भी नहीं लगती हैं।

”युगांक” नामक कपास की इस नई किस्म के बार में जानकारी देते हुए केन्द्रीय कपास अनुसंधान संस्थान, नागपुर के निदेशक डा. केशव राज क्रांति ने बताया ” हमारे संस्थान के वैज्ञानिकों ने 9 साल की मेहनत के बाद कपास की ऐसी वेराइटी को डेवलप किया है जो मात्र 100 दिन में तैयार हो जाएगी। अभी तक कपास की कपास को तैयार होने में 230 से लेकर 260 दिन लगते है।’’

डा. केशव ने आगे बताया कि मेरे 25 साल के कॉटन वैज्ञानिक के रूप में अभी तक का सबसे महत्वपूर्ण अनुसंधान है। कपास की इस किस्म से सूखे की मार झेल रहे विर्दभ और तेलांगना के किसानों के साथ ही उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में किसान इसकी अच्छी खेती कर पाएंगे।”

डा. केशव राज क्रांति ने बताया कि दुनियाभर में कपास के बड़े उत्पादक देश आस्ट्रेलिया, ब्राजील, चीन और मेक्सिकों जैसे देशों में भी कपास की फसल 150 दिन में तैयार होती है, लेकिन भारत में इसकी खेती में बहुत समय लगता है। ऐसे में कपास की नई किस्म यहां के किसानों के लिए वरदान साबित होगी।

उन्होंने बताया कि केन्द्रीय कपास अनुसंधान संस्थान के क्राप इंप्रूवमेंट डिपार्टमेंट के वैज्ञानिक संतोष और धारवाड़ के प्रसिद्ध् कपास वैज्ञानिक एस.एस. पाटिल ने कपास की इस नई किस्म को विकसित करने में लगे थे। इसमें कपास किसानों के साथ नेटवर्क बनाकर काम किया गया। जिसका नतीजा है कि कपास की यह किस्म विकसित हो पाई है।

कपास की पूरी दुनिया में बढ़ती खपत के कारण इसे श्वेत स्वर्ण के नाम से जाना जाता है। इस नगदी फसल की खेती करके किसान आर्थिक रूप से मजबूत होते हैं लेकिन उत्तर प्रदेश में कपास की खेती लगातार घट रही है। स्थिति यह है कि इस प्रदेश में कभी 5 लाख हेक्टेयर में कपास की खेती होती थी जो घटकर अब मात्र 14 हजार हेक्टेयर ही रह गई है।

उतर प्रदेश में लगभग 5 लाख रूई गांठ की आवश्यकता हर साल होती है। ऐसे में प्रदेश में कपास उत्पादन को बढ़ावा देने की जरूरत है। जिसमं कपास की नई किस्म युगांक उत्तर प्रदेश में कपास की खेती को बढ़ावा देने में काम आ सकती है।

उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में पिछले कई सालों से पड़ता सूखा, गिरता भूमिगत जलस्तर, कपास की खेती को लेकर सरकारी उदासीनता के कारण प्रदेश में कपास की खेती घट गई है। स्थिति यह है प्रदेश के 18 मंडलों में से मात्र अलीगढ़ और आगरा मंडल में ही कपास की खेती हो रही है।

उत्तर प्रदेश के कृषि निदेशक ज्ञान सिंह ने बताया ” प्रदेश में कपास की खेती को बढ़ावा देने के लिए विभाग की तरफ से काम किया जा रहा है। भारत सरकार की तरफ से काटन टेक्नोलाजी मिशन की स्थापना, कपास की अच्छी किस्म और फसल सुरक्षा चक्र को अपनाकर किसान कपास की लाभकारी खेती कर सकते हैं।”

उत्तर प्रदेश में जायद सीजन की फसल कपास की बुआई अप्रैल के पहले सप्ताह से लेकर मई के आखिरी सप्ताह तक की जाती है। उत्तर प्रदेश के जो किसान कपास की खेती इस बार करना चाहते हैं उन्हें अभी से तैयारी करनी चाहिए।

कपास की खेती की जानकारी के लिए किसान केन्द्रीय कपास अनुसंधान संस्थान, नागपुर के वैज्ञानिकों से संपर्क कर सकते हैं। वैज्ञानिक किसानों को इस फसल से संबंधित सभी प्रकार की जानकारी देंगे, यह कहना है कपास अनुसंधान संस्थान के निदेशक डा. केशव राज क्रांति का।

ताईवानी तकनीक से ऐसे करें सब्जी की खेती 10 गुना अधिक होगा मुनाफा

चंदौली (जितेंद्र उपाध्याय)। सब्जी की आधुनिक खेती देखना है तो आपको बेदहां गांव आना होगा। चंदौली जिले में स्थित इस गांव के सुरेंद्र सिंह ने इस विधा में महारथ हासिल कर ली है। ताइवानी पद्धति से सब्जी उगाकर वे सामान्य की अपेक्षा दस गुना तक अधिक मुनाफा कमा रहे हैं।

पैदावार इतनी है कि हर रोज 20 मजदूर लगाने पड़ते हैं। इससे स्थानीय लोगों को दैनिक रोजगार भी मुहैया हो गया है। बेदहां और मिर्जापुर के मड़िहान में इस पद्धति से की जा रही सब्जी की खेती अब पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय है।

कैसे करते हैं खेती :

खेत की अच्छी जोताई के बाद गीली भुरभुरी मिट्टी की मेड़ बनाकर उसमें चार-चार इंच की दूरी पर बीज डालते हैं। मेड़ को प्लास्टिक से ढक दिया जाता है। जैसे ही बीज अंकुरित होते हैं, प्लास्टिक में छेद कर पौधे बाहर निकल आते हैं। इस विधि में न तो ज्यादा पानी की जरूरत होती है और न ही ज्यादा लागत आती है। फसल में कीड़े भी नहीं लगते हैं। हां, ऊंचाई वाले खेत पर ही फसल उगाई जा सकती है।

बीज और प्लास्टिक ताइवान के :

हरी मिर्च, शिमला मिर्च, खरबूज, तरबूज, टमाटर, खीरा आदि के बीज वे ताइवान से मंगाते हैं। भारतीय बीजों की तुलना में ताइवान के बीज छह से सात गुना ज्यादा पैदावार देते हैं। एक बार तोड़ाई के बाद भी पौधे खड़े रहते हैं। छह माह की फसल में 12 बार तोड़ाई करते हैं।

एक हेक्टेयर में 50 हजार लागत :

हरी मिर्च को ही लें तो पारंपरिक विधि के मुकाबले इस विधि में इसकी लागत काफी कम आती है। एक हेक्टयर में 50 हजार लागत आती है पर मुनाफा चार लाख रुपये तक मिलता है। सुरेंद्र बताते हैं कि कभी कभी तो इतनी पैदावार हो जाती है कि कई मंडियों में फसल पहुंचानी पड़ती है। हर जिंस में मुनाफा करीब आठ से दस गुना तक होता है।

सिंचाई भी न के बराबर :

इस पद्धति में सिंचाई और उर्वरक की अधिक जरूरत नहीं पड़ती है। पानी में उर्वरक मिलाकर मेड़ों में डाल दिया जाए तो वह हर पौधे की जड़ में पहुंच जाता है। टपक विधि से भी सिंचाई करते हैं। पौधे के ऊपर पानी टपकाकर भी उनकी सिंचाई हो जाती है। प्लास्टिक से ढक दिए जाने के कारण नीचे से उत्पन्न होने वाली वाष्प सहायक साबित होती है।

प्लास्टिक के कई फायदे :

मेड़ों पर बिछाई गई प्लास्टिक से न तो घास पैदा होती है और न ही कीट पतंग फसल को नष्ट कर पाते हैं। घास प्लास्टिक के नीचे ही रहती है और पेड़ों तक नहीं पहुंच पाती। पौधों को बीमारी व कीटों से बचाने के लिए आर्गेनिक दवा का छिड़काव किया जाता है।

फसल से मिला बड़ा फायदा :

सुरेंद्र सिंह कहते हैं कि धान और गेहूं की फसल पैदा करते-करते थक गए थे। छह साल पूर्व किसान कॉल सेंटर, सब्जी अनुसंधान केंद्र व पूसा इंडस्ट्रीज में जाकर सब्जी की खेती की तकनीक देखी। वहां के सदस्य बने और अपने यहां शुरुआत की। उन्हें भरपूर लाभ मिलता है पर मंडियों में दस फीसद आढ़तिया शुल्क अनावश्यक लगता है। यह बंद होना चाहिए।

फसल में नहीं लगेंगे कीट पतंग, इस किसान ने खोजा अनोखा तरीका

अगर आप अपनी फसल में लगने वाले कीट-पतंग से परेशान हैं, तो मध्य प्रदेश के इस किसान से जरूर मिलिए। मध्य प्रदेश का ये किसान फसल में लगने वाले कीट-पतंगों के लिए बाजार नहीं जाता। अर्जुन पाटीदार घर पर ही कुछ देसी कीटनाशक दवाईयां बनाकर अपने फसलों में लगने वाले कीट-पतंग से छुटकारा पा लेते हैं।

“मैं कई वर्षों से बाजार नहीं गया हूँ, फसल में बीज से लेकर खाद, कीटनाशक दवाईयां सबकुछ घर पर ही बना लेता हूँ। मुझे लगता है, अगर किसान हर चीज बाजार से खरीदेगा तो उसकी लागत भी ज्यादा होगी और वो अपनी मिट्टी को भी बर्बाद कर देगा।”

ये कहना है किसान अर्जुन पाटीदार (35 वर्ष) का। वो आगे बताते हैं, “हमारे खेत में लगी कोई भी सब्जी या फल आप बिना धुले बेधड़क खा सकते हैं क्योंकि उसमे जहर नहीं होता है। हम अपने खाने में शुद्ध देसी चीजें खाते हैं जिसमें जहर नहीं होता है।”

मध्यप्रदेश के मंदसौर जिला मुख्यालय से 70 किलोमीटर दूर पूरब दिशा में गुराडिया प्रताप गाँव के प्रगतिशील किसान अर्जुन पाटीदार की तरह कई किसान हैं जो पूरी तरह से जैविक खेती करते हैं। यहां के किसानों का मानना है कि हमें अपनी फसलों की लागत कम करने के लिए और मिट्टी को बर्वाद करने से खुद बचाना है।

अगर हमें स्वस्थ्य रहना है तो खेत में जहर का छिड़काव बंद करना होगा। अर्जुन पाटीदार द्वारा बनाए कुछ देसी तरीके कोई भी किसान अपनी फसल में इस्तेमाल करके अपनी लागत बचा सकता है। अर्जुन जैविक खेती पर किसानों को प्रशिक्षित करने वाले ‘साकेत’ नाम के ग्रुप से जुड़े हुए हैं।

पांच पत्ती काढ़ा बनाने की विधी

किसी भी फसल में अगर कीट-पतंग लगने की शुरूवात हो गयी है तो पहली खुराक के रूप में पांच पत्ती का काढ़ा बनाकर छिड़काव किया जाता है। पांच प्रकार के पत्ते जिसमें नीम, आक, धतूरा, बेसरम, सीताफल की पत्तियों को पांच लीटर देसी गाय के गोमूत्र में भरकर मिट्टी के बर्तन में रख दें। इसे छानकर 200 लीटर पानी में मिलाकर एक एकड़ फसल में इसका छिड़काव करने से फसल में कीट-पतंग नहीं लगेंगे।

लहसुन आधारित जैविक कीटनाशक

लहसुन, अदरक, हींग का छिड़काव करने से कीटपतंग मरते नहीं हैं। इसके छिड़काव के बाद इसकी गंध से फसल में कीट पतंग लगते नहीं हैं।

दशपर्णी अर्क बनाने की विधि

दशपर्णी अर्क का उपयोग फसल में लगने वाले सभी प्रकार के रस चुसक और सभी इल्लियों के नियंत्रण के लिए किया जाता है। 200 लीटर पानी, दो किलो गाय का गोबर, 10 लीटर गोमूत्र, दो किलोग्राम करंज के पत्ते, दो किलोग्राम सीताफल के पत्ते, दो किलोग्राम धतूरा के पत्ते, दो किलोग्राम तुलसी के पत्ते, दो किलोग्राम पपीता के पत्ते, दो किलोग्राम गेंदा के पत्ते, दो किलोग्राम नीम के पत्ते, दो किलोग्राम बेल के पत्ते, दो किलोग्राम कनेर के पत्ते, 500 ग्राम तम्बाकू पीसकर या काटकर, 500 ग्राम लहसुन, 500 ग्राम पीसी हल्दी, 500 ग्राम तीखी हरी मिर्च, 200 ग्राम अदरक या सोंठ।

एक प्लास्टिक के बर्तन में सभी सामग्री मिलाकर जालीदार कपड़े से बांधकर 40 दिन छाया में रख दें। सुई की दिशा में सुबह शाम हिलातें रहें। इसका फसल में छिड़काव करने से रस चुसक और इल्लियाँ नहीं लगेंगी।

नीम आधारित कीटनाशक की निर्माण विधि

नीम आधारित कीटनाशक बनाने के लिए 10 लीटर गोमूत्र में 3 किलोग्राम नीम की पत्ती की चटनी, 2 किलोग्राम आक के पत्तों की चटनी, 2 किलोग्राम सीताफल पत्ते की चटनी, 2 किलोग्राम धतुरा के पत्ते की चटनी, 2 किलोग्राम बेशरम के पत्ते की चटनी को एक मिट्टी के बर्तन में डालकर आग में तबतक उबालें जबतक चार उबाले न आ जाएं।

आग से उतारकर 48 घंटे छाँव में ठंडा होने के लिए रख दें। इसके बाद कपड़े से छानकर 15 लीटर पानी में आधा से एक लीटर तक कीटनाशक मिलाकर स्प्रे करे।तनाछेदक कीटों से बचाव के लिए इसी में आधा किलोग्राम हरी तीखी मिर्च की चटनी और 500 ग्राम देसी लहसुन की चटनी मिलाकर कीटनाशक बनाये।

फफूंदनाशक दवा की निर्माण विधि

खट्टी छाछ में दो दिन के लिए एक तांबे का टुकड़ा डालकर रखा रहने दें, दो दिन बाद इस छाछ की आधा लीटर मात्रा को 15 लीटर पानी में खूब अच्छी तरह मिलाकर फसल में छिड़काव करें। इससे फसल में फफूंदनाशक नहीं लगेगी।

फसल को वायरस से ऐसे बचाएं

पौधों को वायरस के संक्रमण से बचाने के लिए पूरे फसल चक्र में तीन बार एक लीटर देशी गाय के दूध में 15 लीटर पानी, 50 ग्राम हल्दी प्रति टंकी के हिसाब से स्प्रे करें। इसके अलावा पानी में हींग, हल्दी मिलकर फसल की जड़ों में ड्रिन्चिग करने से वायरस नहीं लगेगा।

फेरोमेन ट्रैप और स्ट्रिकी ट्रैप से फसल में नहीं लगते कीट पतंग

प्रभावी कीट नियंत्रण के लिए स्वनिर्मित लाईट ट्रैप, फेरोमेन ट्रैप और स्ट्रिकी ट्रैप का उपयोग करने से फसल में कीट नहीं आते हैं। फेरोमेन ट्रैप में मादा का लेप करने से इसकी गंध से कीट मर जाते हैं। एक एकड़ में 10 फेरोमेन ट्रैप या फिर 10 पीले रंग के स्ट्रिकी ट्रैप में गिरीस का लेप लगाने से कीट उसी स्ट्रिकी ट्रैप में चिपक जायेंगे।

किसान ने तैयार किया कमाल का मिनी ट्रेक्टर, जाने इसमें क्या है खास

एक मिनी ट्रैक्टर जो जापान की नवीनतम तकनीक से काठियावाड़ी पाटीदार निलेशभाई भालाला द्वारा तैयार किया गया है, जिसमें एक आकर्षक डिजाइन है, इस ट्रेक्टर का नाम नैनो प्लस (Neno Plus) है ।

10 HP पावर वाला यह मिनी ट्रेक्टर एक छोटे किसान के सारे काम कर सकता है । ट्रेक्टर से आप जुताई ,बिजाई ,निराई गुड़ाई ,भार ढोना,कीटनाशक सप्रे आदि काम कर सकते है ।जो किसानों का काम आसान बना देती है।यह 2 मॉडल में आता है एक मॉडल में 3 टायर लगे होते है और दूसरे में 4 टायर लगे होते है ।

इसकी अनूठी कॉम्पैक्ट डिजाइन और एडजस्टेबल रियर ट्रैक चौड़ाई इसे दो फसल पंक्तियों के बीच और साथ ही इंटर कल्चर एप्लीकेशनों की किस्म के लिए बगीचों में संचालन के लिए आदर्श बनाता है।

यह किसानों द्वारा बड़े पैमाने पर कई एप्लीकेशनों के लिए प्रयोग किया जाता है जैसे कल्टीवेशन, बुवाई, थ्रेशिंग, स्प्रिंग संचालन के साथ ही ढुलाई। इसकी एक और खास बात यह है के इसके साथ आप स्कूटर का काम भी ले सकते है

अगर आप इस ट्रेक्टर को खरीदना चाहते है जा कोई और जानकारी लेना चाहते है तो इस नंबर (9979008604) पर संपर्क कर सकते है।

 

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एक साल में छह बार कटेगी गेहूं और सफेद चने की फसल, नई तकनीक का कमाल

ये खबर वाकई हैरान कर देने वाली है। एक ऐसी तकनीक खोज ली गई है, जिसकी बदौलत साल में 6 बार गेहूं, सफेद चने और जौ की फसल ली जा सकती है। इस तकनीक पर काम भी कि‍या जा चुका है। यह तकनीक नासा के उस प्रयोग से आई है, जि‍समें अंतरि‍क्ष में गेहूं उगाने की कोशि‍श की जा रही है। नासा के इसी एक्‍सपेरि‍मेंट से यह आइडि‍या मि‍ला,जि‍सके इस्‍तेमाल से फसलों का उत्‍पादन तीन गुना तक बढ़ाया जा सकता है।

यह तकनीक रेगुलर यूज में आने लगी तो हमारी बहुत बड़ी समस्‍या का हल नि‍कल जाएगा क्‍योंकि‍ एक अनुमान के मुताबि‍क, दुनि‍या को वर्ष 2050 में मौजूदा प्रोडक्‍शन से 60 से 80 फीसदी ज्यादा अनाज पैदा करना होगा।

तेजी से बढ़ेंगे पौधे

यूनिवर्सि‍टी ऑफ क्‍वींसलैंड (UQ) के सीनि‍यर रि‍सर्च फैलो ली हिक्‍की ने कहा, हमने सोचा कि क्‍यों न हम नासा की इस तकनीक का यूज धरती पर तेजी से पौधे उगाने के लि‍ए करें। इस तरह से हम पौधों के ब्रीडिंग प्रोग्राम को तेज कर देंगे।

नासा ने अंतरि‍क्ष में गेहूं उगाने का जो प्रयोग कि‍या था उसमें गेहूं पर लगातार रोशनी रखी गई, ताकि पौधे तेजी से बीज बनाने का काम शुरू कर दें। आगे पढ़ें

छह बार कटेगी फसल

उन्‍होंने कहा कि खासतौर से बनाए गए ग्‍लासहाउस में तेजी से ब्रीडिंग करने की इस तकनी की बदौलत गेहूं, सफेद चना और जौ की एक साल में छह बार खेती हो सकती है वहीं अन्‍य कुछ प्‍लांट की खेती 4 बार की जा सकती है। ये ग्‍लासहाउस सामान्‍य से काफी अलग होता है।

उन्‍होंने कहा कि‍ हमारे प्रयोग में यह बात सामने आई है कि‍ नि‍यंत्रि‍त मौसम में पौधों को लंबे समय तक रोशनी में रखने से पौधों की जो ग्रोथ हुई वह काफी अच्‍छी रही और कभी कभी तो सामान्‍य ग्‍लासहाउस में उगाए जाने वाले पौधों से भी बेहतर रही।

लो टनल में ऐसे करें बे-मौसम सब्ज़ियों की खेती, कमाएं अधिक मुनाफा

बहुत कम लोग लो टनल  में खेती करने के बारे में जानते होंगे। यह खेती की एक ऐसी विधि है जिसके द्वारा किसान बे-मौसम सब्जियों की खेती कर सकते हैं, जिससे वो अधिक कमाई कर सकते हैं।

”इस तकनीक के जरिए किसान बे-मौसमी सब्जियां पैदा कर सकते हैं। इसमें सब्जियां उगाने पर सर्दी-गर्मी और बीमारियों का प्रभाव न के बराबर हो जाता है जिससे पैदावार भी काफी अच्छी होती है।” उद्यान विभाग के ज्वाइंट डायरेक्टर राघवेन्द्र प्रताप सिंह ने लो पॉली टनल विधि के बारे में बताया, ”बागवानी विभाग इस तकनीक को अपनाने वाले किसानों को प्रोत्साहित कर रहा है और लो पॉली-टनल बनाने पर सब्सिडी दे रहा है।”

उद्यान विभाग के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2016 में 27937 किसानों को लो पॉली टनल विधि के लिए सब्सिड़ी दी गई थी।

उन्होंने बताया, ”इस विधि से जब किसान सब्ज़ियों की खेती करते हैं बीजों का जमाव अच्छे से हो जाता है और एक महीने पहले सब्जिया आनी शुरू हो जाती हैं। इससे किसान को सब्ज़ियों के काफी अच्छे रेट मिल जाते हैं।” इसका लाभ यूपी के हर जिले के किसान ले सकते हैं।

पॉलीटनल तकनीक क्या हैं?

इस तकनीक में एक तरह से टनल (सुरंग) में सब्जियां पैदा की जाती हैं। लोहे के सरिये और पॉलीथिन शीट से छोटी व लंबी टनल बनाई जाती हैं। इन टनल में सब्जियों को बोने के बाद ड्रिप सिस्टम से सिंचाई की जाती है। टनल की मदद से सब्जी की फसल को ज्यादा गर्मी और सर्दी से बचाया जा सकता है। मौसम फसल के अनुकूल होने के बाद टनल को हटा दिया जाता है। इस तरह से किसान पॉली-टनल में अगेती फसल पैदा कर सकते हैं।

पॉलीटनल तकनीक से लाभ

  • पॉलीटनल तकनीक से वर्ष के किसी भी मौसम में चाहे अधिक गर्मी एवं ठंड हो उस समय भी सब्जियों की पौध सफलतापूर्वक तैयार की जा सकती है।
  • इस विधि से पौधे तैयार करने पर बीज का जमाव लगभग शत्-प्रतिषत होता है। जमाव के बाद पौधों का विकास समुचित ढंग से होता है ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पॉलीटनल के अन्दर का तापमान बीज के जमाव एवं पौधों के बढ़वार के लिए आदर्श होता है।
  • पॉलीटनल में पौध उगाने से बीज जमाव के बाद दिन में धूप के समय पॉलीथीन को हटा देते हैं, जिससे पौधों का धूप के सम्पर्क में आने से उनका कठोरीकरण होता है ऐसे पौधों को खेत में रोपाई करने से उनकी मृत्यु दर नहीं के बराबर होती है।
  • बीज का जमाव शीघ्र होने और पौधों का समुचित बढवार से पौध तेयार करने में समय कम लगता है।
  • पॉलीटनल तकनीक से पौध उगाने पर कीटों व बीमारियों का प्रकोप भी अपेक्षाकृत कम होता है।

ये है अरहर का पेड़,एक पेड़ से मिलती है 12 किल्लो तक दाल

सरकार का प्रयास है कि देश के हर व्यक्ति की थाली में दाल हो और इसके लिए कई स्तरों पर प्रयास भी हो रहे हैं। इसी बीच अगर दाल की एक ऐसी प्रजाति जिससे दाल के उत्पादन को कई गुना बढ़ाया जा सके, और वो प्रजाति अगर अरहर की हो तो ये काफी अच्छी ख़बर हो सकती है।

अरहर की दाल की खपत देश में सबसे ज़्यादा है और इस दाल में प्रोटीन की मात्रा भी काफी अधिक होती है। आमतौर पर अरहर के लगभग 4 – 5 फीट के झाड़ जैसे दिखने वाले पौधे होते हैं और हर पौधे में लगभग 5-6 शाखाएं होती हैं लेकिन क्या आपने ऐसा अरहर का पौधा देखा है जो पेड़ जैसा दिखता हो। जी हां, अरहर का पेड़।

ये है खासियत

अरहर के इस पौधे का तना कुछ मोटा होता है और एक पेड़ में लगभग 60 शाखाएं होती हैं। इन शाखाओं पर फलियों के गुच्छे होते हैं जिनमें अधिक संख्या में फलिया होती हैं। कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर के प्रोफेसर डॉ. गजेंद्र सिंह तोमर बताते हैं, ”छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर के गाँव गगोली में कई खेतों की मेढ़ों पर इस अरहर के पेड़ देखने को मिल जाते हैं।

” वह बताते हैं कि अरहर के इस पौधे में 8 से 12 किलोग्राम दाना निकल आता है। इसका दाना कुछ मोटा, बड़ा और चमकीला होता है। इसकी फलियां 2 – 3 बार तोड़ी जा सकती हैं। फसल के परिपक्व होने का समय जनवरी से अप्रैल के बीच का होता है।

है बहुवर्षीय फसल

डॉ. तोमर बताते हैं कि यह अरहर की बहुवर्षीय फसल होती है। जुलाई-अगस्त में खरीफ की फसल की बुवाई के समय इसका बीज डाल देना चाहिए। पौधे से पौधे की दूरी लगभग 2 से 3 मीटर होनी चाहिए। फसल 6 महीने में तैयार हो जाती है।

एक पेड़ से दो से तीन बार फलियों को तोड़ा जा सकता है। गर्मी तेज़ होने पर यह पौधा सूखने लगता है। उस वक्त इसके तने को ज़मीन से 4 से 5 इंच छोड़कर काट देना चाहिए और समय – समय पर एक-दो गिलास पानी डालते रहना चाहिए जिससे ये सूखे नहीं।

सघनीकरण विधि से अरहर की खेती करने से ज्यादा पैदावार होगी

जब बारिश होती है तो ये पौधा फिर से हरा होने लगता है और फिर धीरे -धीरे बड़ा होकर इसमें फलियां आने लगती हैं। एक पौधे की उम्र लगभग 3 से 4 साल होती है। इसके बाद दोबारा बीज डालकर इसे लगाया जा सकता है। इस फसल में बस 2 से 3 बार कीटनाशकों का छिड़काव करने की ज़रूरत पड़ती है।

अरहर का पौधा बहुवर्षीय होता है या अगर पानी-खाद देते रहे तो चार पांच साल तक चलता रहता है। छत्तीसगढ़ की अरहर की किस्म भी कोई जंगली किस्म होगी जिसे किसानों ने मेड़ों पर अरहर के पौधे लगाए हैं।

डॉ. पुरुषोत्तम, वैज्ञानिक, भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान

अब भारत में करें काले टमाटर की खेती ,शुगर के मरीजों के लिए है रामबाण

आगर आपसे कोई पूछे कि क्या आपने काले टमाटर के बारे में सुना है, तो ज्यादातर लोगों का जवाब नहीं में होगा। अपने आप में खास इस टमाटर को काफी पसंद किया जा रहा है और अब इसके बीज भारत में भी उपलब्ध हैं। अंग्रेजी में इसे इंडि‍गो रोज़ टोमेटो कहा जाता है। पहली बार भारत में काले टमाटर की खेती होने जा रही है।

हिमांचल प्रदेश के सोलन जिले के ठाकुर अर्जुन चौधरी बीज विक्रेता हैं। अर्जुन चौधरी के पास काले टमाटर के बीज उपलब्द हैं। उन्होंने बताया, ”मैने काले टमाटर के बीज ऑस्ट्रेलिया से मंगवाए हैं। इसकी खेती भी लाल टमाटर की तरह ही होती है। इसके लिए कुछ अलग से करने की जरूरत नहीं होगी।” उन्होंने ने बताया, ”अभी तक भारत में काले टमाटर की खेती नहीं की जाती है, इस वर्ष पहली बार इसकी खेती की जाएगी।” काले टमाटर के बीज का एक पैकेट जिसमें 130 बीज होते हैं 110 रुपए का मिलता है।

यह टमाटर भारत में पहली बार उगया जाएगा।

काला टमाटर की नर्सरी सबसे पहले ब्रिटेन में तैयार की गई थी, लेकिन आब इसके बीज भारत में भी उपल्बध हैं। किसान इसके बीज ऑनलाइन भी खरीद सकते हैं।

अर्जुन चौधरी ने इसकी खासियत बताते हुए कहा, ”इसकी खास बात यह है कि इसकों शुगर और दिल के मरीज भी खा सकते हैं।” यह बाहर से काला और अंदर से लाल होता है। इसको कच्‍चा खाने में न ज्यादा खट्टा है न ज्यादा मीठा, इसका स्वाद नमकीन जैसा है।

यह बाहर से काला और अंदर से लाल होता है।

”यह टमाटर गर्म क्षेत्रों के लिए अच्छे से उगाया जा सकता है। ठंढे क्षेत्रों में इसे पकने में दिक्कत होती है,” अर्जुन चौधरी बताते हैं, ”क्योंकि यह टमाटर भारत में पहली बार उगया जा रहा है इस लिए इसके रेट भी अच्छे मिलेंगे।”

इसको पकने में करीब चार महीने का समय लगता है।

उन्होंने बताया कि जनवरी महीने में इसकी नर्सरी की बुवाई की जा सकती है और मार्च के अंत तक इसकी नर्सरी की रोपाई की जा सकती है। यहा टमाटर लाल टमाटर के मुकाबले थोड़ा देर से होता है। लाल टमाटर करीब तीन महीने में पक कर निकलना शुरू हो जाता है और इसको पकने में करीब चार महीने का समय लगता है।

शुगर के मरीजों के लिए है रामबाण

अगर आप शुगर से लड़कर थक चुके हैं तो काला टमाटर आपके लिए रामबाण साबित हो सकता है। इस टमाटर को जेनेटिक म्यूटेशन के द्वारा बनाया गया है। काले टमाटर में फ्री रेडिकल्स से लड़ने की क्षमता होती है। फ्री रेडिकल्स बहुत ज्यादा सक्रिय सेल्स होते हैं जो स्वस्थ सेल्स को नुकसान पहुंचाते हैं। इस तरह ये टमाटर कैंसर से रोकथाम करने में सक्षम है।

ये टमाटर आंखों के लिए भी बहुत फायदेमंद हैं। ये शरीर की विटामिन ए और विटामिन सी की जरुरत को पूरा करता है। विटामिन ए आंखों के लिए बहुत फायदेमंद होता है।अगर आप नियमित रूप से काले टमाटरों का सेवन करते हैं तो आप दिल से जुड़ी बीमारियों से भी बचे रह सकते हैं। इसमें पाया जाने वाले एंथोसाइनिन आपको हार्ट अटैक से बचाता है और आपके दिल को सुरक्षा प्रदान करता है।

बाजार में मिलने वाले नकली दूध की आसानी से ऐसे करें पहचान

आज के समय में बाजारों में नकली चीजों की भरमार है और इन्हीं चीजों के इस्तेमाल से हमारी जिंदगी बीमारियों से घिर गई है. आपको शायद न पता हो, लेकिन इन मिलावट वाली चीजों के इस्तेमाल से कम उम्र में ही जानलेवा बीमारियां पैदा हो जाती हैं.

आज के समय में चाहे आप हरी सब्जियां ले रहे हों, फल खरीद रहे हों या फिर दूध हीं क्यों ना ले रहे हों, कोई भी चीज आपको असली नहीं मिलेगी. लेकिन हमारी मजबूरी है कि हमें ये सारी चीजें खरीदनी पड़ती हैं और इस्तेमाल करनी पड़ती हैं. यूं तो इन चीजों के असली और नकली होने की पहचान करना थोड़ा कठिन होता है, फिर भी हम आपको नकली दूध की पहचान का आसान तरीका बता रहे हैं.

ऐसे जान सकते हैं आप असली और नकली दूध का फर्क

  • नकली दूध की पहचान करने के लिए उसे सूंघें. अगर आपको लगता है कि दूध से साबुन जैसी महक आ रही है, तो दूध सिंथेटिक यानी की नकली है. जबकि असली दूध से ऐसी कोई गंध नहीं आती.
  • आपको बता दें कि दूध असली है तो उसका स्वाद मीठा होगा, लेकिन अगर नकली दूध है तो इसका स्वाद मीठा नहीं बल्कि कड़वा होगा.
  •  दूध में पानी की मिलावट की पहचान आप इस तरह से कर सकते हैं. दूध की कुछ बूंदें फर्श पर गिरा कर देखें, अगर दूध बहने लगता है और सफेद धार का निशान बनता है, तो दूध में पानी की कोई मिलावट नहीं है.

  •  हम आपको ये भी बता दें कि असली दूध को अगर आप अपने हाथों में लेकर रगड़ेंगे तो उसमें कोई चिकनाहट नहीं होगी. लेकिन अगर आपक नकली दूध को रगड़ेंगे तो डिटरजेंट जैसी चिकनाहट महसूस होगी.
  •  असली दूध को जब आप उबालेंगे तो उसका रंग नहीं बदलेगा. जबकि नकली दूध को उबालने पर उसका रंग हल्का पीला पड़ जाता है.