इस तकनीक से बिना फ्रिज और केमिकल से 9 महीने तक दूध नहीं होता है खराब

दूध को लेकर हमारी मां कुछ ज्यादा ही चिंता में रहती है।  दूध को फ्रिज में संजोकर रखा जाता है, बार-बार गर्म किया जाता है। पर क्या आपने कभी सोचा है आखिर दूध को लेकर इतना सतर्क क्यों रहते हैं?

दरअसल दूध में कई बैक्टीरिया मौजूद होते हैं, जिसके चलते उसे पीने योग्य बनाए रखने के लिए ये सारे जातन किए जाते हैं। अगर ऐसा न किया जाए तो दूध खराब हो जाता है।

अब भारत के हर गांव-कस्बे में तो फ्रिज है नहीं, जिसके चलते हमारे देश में कई टन दूध वेस्ट हो जाता है। दूसरी ओर दूध को बड़े शहरों तक पहुंचाने में हर दिन हजारों-लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं।

आखिर कौन-सी है ये तकनीक और किस तरह देश में दूध की क्रांति को बढ़ावा दे सकती है चलिए जानते हैं।

अल्ट्रा हाई टेम्परेचर प्रोसेसिंग

अल्ट्रा हाई टेम्परेचर प्रोसेस या ultra-pasteurization नाम की तकनीक दूध को लंबे समय तक बिना फ्रिज के स्टोर करने में मदद करती है। इस तकनीक में दूध को काफी हाई टेंपरेचर पर गर्म किया जाता है और फिर एकदम ठंडा किया जाता है। इसके बादि प्रोसेस्ड मिल्क को हर्मेटिकली सील्ड कंटेनर में बंद कर देते हैं। इससे दूध में मौजूद सभी बैक्टीरिया एक ही बार में खत्म हो जाते हैं।

6-9 महीनों तक नहीं होता खराब 

इस तरह प्रोसेस किए गए दूध की खासियत होती है कि वो लगभग 6 से 9 महीनों तक खराब नहीं होता। न ही इसे फ्रिज में रखने की जरुरत होती है यानी हर्मेटिकली सील्ड डिब्बे में बंद दूध को फ्रिज के बाहर ही कई महीनों तक रखा जा सकता है।

फ्रांस में प्रसिद्ध है ये तकनीक 

कहा जाता है कि इस तकनीक का ईजाद 70 के दशक में कर लिया गया था। और तभी से कुछ देशों में इसका उपयोग जारी है। आज फ्रांस में उपयोग किए जाने वाले दूध का लगभग 95% भाग अल्ट्रा हाई टेम्परेचर प्रोसेसिंग की मदद से स्टोर किया जाता है।

इस तरह हो सकती है भारत के लिए उपयोगी 

यूरोप की तरह ही भारत में भी ये तकनीक काफी मददगार हो सकती है। जैसा कि हमने ऊपर बताया इस तकनीक की मदद से स्टोर किया गया दूध कई महीनों तक खराब नहीं होता। तो जिन गांवों में फ्रिज या बिजली की समस्या हो वहां ये तकनीक काफी उपयोगी होगी। साथ ही मेट्रो सिटी में एक साथ कई दिनों का स्टाक पहुंचाकर, हर दिन दूध भेजने की ट्रांस्पोर्टेशन कॉस्ट कम की जा सकती है।

अभी क्या है भारत का हाल

फिलहाल भारत में सबसे ज्यादा यूएचटी दूध कर्नाटक राज्य में बिकता है। इसके बाद महाराष्ट्र और तमिलनाडु में इसकी बिक्री अधिक है। रिसर्च के अनुसार, पिछले कुछ सालों के मुकाबले 2017 में इसकी मांग बढ़ी है और 2023 तक भारत में यूएचटी मिल्क का मार्केट लगभग 156 बिलियन (15,600 करोड़ रुपयें) का हो सकता है।

 

सही तरह से विज्ञापन करने की जरुरत

आंकड़ों की मानें तो भारत में यूएचटी मिल्क की बिक्री धीरे-धीरे बढ़ रही है, लेकिन अधिकांश लोग इसकी उपयोगिता से अनजान हैं। अभी देश की ज्यादातर जनता इसे मात्र पैकेट वाले दूध के रूप में जानती है। ऐसे में लोगों को इस तकनीक के असल उपयोग और फायदों से अवगत करवाने की जरुरत है।

टेस्ट को लेकर कही जाती है ऐसी बातें 

हाई टेंपरेचर पर प्रोसेस्ड किए गए दूध के स्वाद को लेकर लोगों के बीच दो मत पाए जाते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि इसका स्वाद नार्मल दूध से काफी अलग होता है, वहीं कुछ लोगों के अनुसार दूध के स्वाद में कोई अंतर नहीं होता।

चाहे जो भी हो लेकिन दूध स्टोर करने की ये प्रोसेस निश्चित ही भारत के लिए काफी फायदेमंद साबित होगी। इससे दूध के वेस्टेज को तो कम किया ही जा सकता है, साथ ही साथ पैसों की बचत भी संभव है।

खेती के लिए बहुत ही उपयोगी है यह 12 प्रकार के जैविक टीके

 

आज कल खेती के लिए ज्यादतर रासयनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का प्रयोग ज्यादा क्या जा रहा है । जो एक बार तो असर करते है लेकिन लम्बे समय तक प्रयोग करने से वो मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को कम कर देते है ।साथ में धीरे धीरे इनका असर भी कम होने लग जाता है ऐसे में अगर आप जैविक टीकों का इस्तेमाल करेंगे तो आप की फसल उत्पादन तो बढ़ेगा ही साथ में इनका असर भी सालों साल चलेगा

नील हरित शैवाल टीका: धान में काफी लाभकारी है। यह नत्रजन के अलावा जैविक कार्बन एवं पादप वृद्धि करने वाले पदार्थ भी उपलब्ध कराता है। एक एकड़ की धान की फसल को उपचारित करने के लिए 500 ग्राम का एक पैकेट टीका काफी है। 20 से 30 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर फसल में लाभ होता है।

अजोला टीका: यह एक आदर्श जैविक प्रणाली है। जो उष्ण दिशाओं में धान के खेत में वायुमंडलीय नत्रजन का जैविक स्थिरीकरण करता है। अजोला 25 से 30 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर प्रति फसल को योगदान करता है।

हरी खाद: साल में एक बार हरी खाद उगाकर खेत में जोतकर कार्बनिक अंश को बनाए रख सकते हैं। हरी खादों में दलहनी फसलों, वृक्षों की पत्तियां खरपतवारों को जोतकर उपयोग किया जाता है। एक दलहनी परिवार की फसल 10-25 टन हरी खाद पैदा करती है। इसके जोतने से 60 से 90 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर की दर से प्राप्त होती है।

ढैंचा: यह फसल 40 से 60 दिनों में जोतने लायक हो जाती है। यह 50 से 60 किलोग्राम नत्रजन की भी प्रति हेक्टेयर आपूर्ति करता है। बुवाई के लिए 30 से 40 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर डालें दो से तीन सिंचाई ही करनी पड़ती है। इसके अलावा नील हरित शैवाल टीका, आरबसक्ूयलर माइकोराजा न्यूट्रीलिंक टीका, सूबबूल आदि भी लाभकारी हैं।

कंपोस्ट टीका: इस टीके के प्रयोग से धान के पुआल का 6 से 9 सप्ताह के अंदर बहुत अच्छा कंपोस्ट बन जाता है। एक पैकेट के अंदर 500 ग्राम टीका होता है जो एक टन कृषि अवशेष को तेजी से सड़ाकर कंपोस्ट बनाने के लिए काफी है।

राइजोबियम टीका: राइजोबियम का टीका दलहनी, तिलहनी एवं चारे वाली फसलों में प्रयोग होता है। ये 50 से 100 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर का जैविक स्थिरीकरण कर सकते हैं। इससे 25 से 30 फीसदी फसल उत्पादन बढ़ता है।

एजोटोबैक्टर टीका: यह स्वतंत्र जीवी जीवाणु है। इसका प्रयोेग गेहूं, धान, मक्का, बाजरा आदि, टमाटर, आलू, बैंगन, प्याज, कपास सरसों आदि में करते हैं। 15 से 20 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर की बचत करता है। 10 से 20 प्रतिशत फसल बढ़ती है।

एजोस्पिरिलम टीका: इसका प्रयोग अनाज वाली फसलों में होता है। जैसे ज्वार, बाजरा, रागी, मोटे छोटे अनाजों एवं जई में होता है। चारे वाली फसलों पर भी लाभकारी होता है। 15 से 20 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर बचत करता है। फसल चारा उत्पादन बढ़ता है।

फास्फोरस विलयी जीवाणु टीका: फास्फोरस पौधों के लिए मुख्य पोषक तत्व है। इस टीके के प्रयोग से मृदा में मौजूद अघुलनशील फास्फोरस घुलनशील होकर पौधों को उपलब्ध हो जाता है

इस यंत्र से फसलों की हर जानकारी मिलेगी मोबाइल पर, पशु खेत में आने पर भी मिलेगा अलर्ट

एग्रीकल्चर प्रोटेक्शन सिस्टम (एपीएस) डिवाइस खेतों की निगहबानी करेगी। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि अब किसान के मोबाइल में उसका पूरा खेत होगा। खेत को किस उर्वरक की जरूरत है, फसल पर कीट पतंगों का हमला, आवारा पशुओं के खेत में आने पर एलर्ट करना, मिट्टी की आद्रता, पीएच वेल्यू और तापमान का पता बताने के साथ सिंचाई पूरी होने तक की जानकारी यह डिवाइस मोबाइल के जरिए किसान तक पहुंचाएगी।

यह डिवाइस चंदौली के बबुरी गांव निवासी मेरठ के आइआइएमटी विवि से इलेक्ट्रॉनिक एवं कम्यूनिकेशन में रिसर्च कर रहे संदीप वर्मा पुत्र संतोष कुमार ने प्रो-वीसी डॉ. दीपा शर्मा के निर्देशन और वीसी प्रो. योगेश मोहन गुप्ता के संरक्षण में तैयार की है। दो साल में कई बार परीक्षण कर इसमें सुधार करने के बाद जुलाई  में यह डिवाइस तैयार हुई। सूक्ष्म एवं लघु उद्योग भारत सरकार ने इसके लिए पांच लाख की फंडिंग भी की।

क्या है एपीएस डिवाइस

डिवाइस माइक्रो प्रोससर चिप बेस्ड है। इसमें ह्यूमेंडिटी सेंसर, रेन सेंसर, फायर सेंसर, टेंप्रेचर सेंसर, इरीगेशन सेंसर और मोशन सेंसर लगा है। यह सौर ऊर्जा और बिजली से संचालित है। ये सभी सेंसर खेत की हर हलचल पर नजर रखेंगे। एक एकड़ में यह काम करेगी। इससे ज्यादा क्षेत्रफल पर अतिरिक्त डिवाइस खेत में लगानी होगी।

इस तरह काम करेगी यह डिवाइस

सेंसर लगी डिवाइस खेत में होगी। जबकि कंट्रोलर नलकूप में। डिवाइस किसान के मोबाइल से कनेक्ट रहेगी। खेत में ट्यूबवेल चल रहा है और बारिश हो जाती है तो रेन सेंसर काम करते हुए ट्यूबवेल को बंद कर देगा। यदि बारिश नहीं हुई और मिट्टी सूखने लगी तो सेंसर मोटर को चालू कर देगा। इसमें वाटर लेबल तय करने का विकल्प रहेगा।

खेत में कितने इंच पानी चाहिए इसे सेट करने पर जैसे ही खेत में पानी का तल उस पर पहुंचेगा मोटर बंद हो जाएगी। डिवाइस यह भी बताएगी कि खेत में कब और किस खाद की जरूरत है। खेत में रात्रि या दिन के समय जंगली जानवर आ गए तो मोशन सेंसर मोबाइल पर एलर्ट करेगा। खेत में यदि तार बिछाए गए हैं तो किसान उसमें करेंट एक्टिवेट कर सकेंगे।

क्या कहते हैं शोधार्थी संदीप वर्मा

उन्होंने अपने बारे में बताया, ‘गरीब घर में पैदा हुआ। करीब से खेती किसानी देखी है। बचपन से ही यह लक्ष्य रखा था कि खेती किसानी के लिए कुछ नया करूंगा। अपना विजन प्रो-वीसी डॉ. दीपा शर्मा को बताया। कुछ काम करके भी दिखाया।

उन्होंने कई बदलाव किए। पहली डिवाइस 2016 में तैयार हुई, लेकिन वह कारगर नहीं थी, 2017 में दो प्रयोग किए लेकिन जो चाहता था वैसा तैयार नहीं हुआ। जून 2018 में डिवाइस पूरी तरह से तैयार हो गई। इसका जुलाई में प्रयोग किया जो सफल रहा।

छत पर ऐसे उगाएं बिना मिट्टी से सब्‍जी,1 लाख के निवेश पर होगी 2 लाख तक कमाई

खेतों के घटते आकार और ऑर्गेनिक फूड प्रोडक्ट की बढ़त मांग के चलते अर्बन फार्मिंग में नई और कारगर तकनीकों का चलन बढ़ता जा रहा है। मांग पूरी करने के लिए कारोबारी और शहरी किसान छतों पर, पार्किंग में या फिर कहीं भी उपलब्ध सीमित जगह का इस्तेमाल पैदावार के लिए कर रहे हैं।

इन तकनीकों में फिलहाल जो तकनीक सबसे ज्यादा सफल है उसमें मिट्टी का इस्तेमाल ही नहीं होता। मिट्टी न होने से इसे छतों पर छोटी जगह में आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है। ये तकनीक इतनी सफल है कि सही जानकारी, सही सलाह से लगभग 1 लाख रुपए के खर्च से से आप घर बैठे सालाना 2 लाख रुपए तक की सब्जियां उगा सकते हैं।

मिट्टी के बिना अब छतों पर फार्मिंग

इस तकनीक को हाइड्रोपानिक्स कहा जाता है। इस तकनीक की खास बात यह है कि इसमें मिट्टी का इस्तेमाल बिल्कुल भी नहीं होता है। इससे पौधों के लिए जरूरी पोषक तत्वों को पानी के सहारे सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है।

क्या है हाइड्रपानिक्स तकनीक

हाइड्रपॉनिक्स तकनीक में सब्जियां बिना मिट्टी की मदद से उगाई जातीं हैं। इससे पौधों के लिए जरूरी पोषक तत्वों को पानी के सहारे सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है।

पौधे एक मल्टी लेयर फ्रेम के सहारे टिके पाइप में उगते हैं और इनकी जड़े पाइप के अंदर पोषक तत्वों से भरे पानी में छोड़ दी जाती हैं। मिट्टी न होने की वजह से न छतों पर भार बढ़ता है। वहीं बिल्कुल अलग सिस्टम होने की वजह से छत में कोई बदलाव भी नहीं करने पड़ते

कैसे बन सकता है गार्डेन

हाइड्रपानिक्स एक पौधों को उगाने का बिल्कुल नया तरीका है और इसे किसान या कारोबारी अलग अलग तरह से इस्तेमाल में ला सकते हैं। वहीं इस क्षेत्र में काम कर रही कई कंपनियां भी आपको शौकिया गार्डन से लेकर कमर्शियल फार्म तक स्थापित करने में मदद कर सकती हैं।

इस बारे में हाइड्रपानिक्स कंपनी ‘हमारी कृषि’ से बात की। कंपनी उपज के लिए तैयार फ्रेम और टावर गार्डेन ऑनलाइन बेच रही है। कंपनी के 2 मीटर ऊंचे टावर में 40 पौधे लगाने की जगह है। कंपनी के मुताबिक करीब 400 पौधे वाले 10 टावर की लागत 1 लाख के करीब है। इस कीमत में टावर, सिस्टम और जरूरी पोषक तत्व शामिल हैं।

कंपनी के मुताबिक अगर सिस्टम को सही ढंग से इस्तेमाल किया जाए तो इसके बाद सिर्फ बीज और न्यूट्रिएंट का ही खर्च आता है। ये 10 टावर आपकी छत के 150 से 200 वर्ग फुट एरिया में आसानी से खड़े हो जाएंगे। छोटी जगह पर रखे फ्रेम को नेट शेड और बड़े स्तर पर खेती के लिए पॉली हाउस बनाकर ढकने से मौसम से सुरक्षा मिलती है।

क्या है निवेश और कमाई का गणित

  • कंपनी हमारी कृषि को स्थापित करने वाले अभिषेक शर्मा के मुताबिक ये तकनीक लोगों को रोजगार देने का अच्छा जरिए हो सकती है, क्योंकि परंपरागत कृषि के मुकाबले इसके मार्जिन बेहतर हैं।
  • शर्मा के मुताबिक एक पॉड से साल भर में 5 किलो लेटिस (सलाद पत्ता) की उपज मिल सकी है। ऐसे में 10 टावर यानि 400 पॉड से 2000 किलो सालाना तक उपज मिल सकती है।
  • फिलहाल लेटिस की कीमत भारत में 180 रुपए किलो है, शर्मा के मुताबिक अगर थोक में 100 रुपए किलो भी मिलते हैं तो अच्छी कंडीशन में साल में 2 लाख रुपए की उपज संभव है।
  • वहीं उनके मुताबिक आम स्थितियों में आप आसानी से एक साल में अपना निवेश निकाल सकते हैं। अगले साल रिटर्न ज्यादा होगा क्योकिं आपको सिर्फ रखरखाव, बीज और न्यूट्रिएंट का खर्च ही करना है।
  • यानी आप अपनी छत के सिर्फ 150 से 200 वर्ग फुट के इस्तेमाल से एक साल में ही अपना एक लाख का निवेश निकाल कर प्रॉफिट में आ सकते हैं।

क्यों ये तकनीक है फायदे का सौदा

  • इस तकनीक के जरिए नियंत्रित माहौल में खेती होती है, इसलिए अक्सर किसान हाइड्रपानिक्स की वजह से ऐसे सब्जियों का उत्पादन करते हैं जिसकी मार्केट कीमत ज्यादा होती है।
  • इस तकनीक में पानी, फर्टिलाइजर और कीटनाशक की खपत भी 50 से 80 फीसदी तक घट जाती है।
  • हमारी कृषि में छपे एक आर्टिकल के मुताबिक इस तकनीक से पैदावार 3 से 5 गुना तक बढ़ जाती है।
  • इस तकनीक में शुरुआती खर्च ज्यादा होता है। हालांकि बाद में लागत काफी कम होने से प्रॉफिट बढ़ जाता है।
  • नेट शेड या पॉलिहाउस की वजह से मौसम का असर इन फसलों पर काफी कम हो जाता है।

कैसे इस तकनीक से खड़ा कर सकते हैं कारोबार

  • इस तकनीक के जरिए अपनी छत पर खुद के लिए ताजी ऑर्गेनिक सब्जियां उगाई जा सकती हैं।
  • वहीं आप इसे अपने कारोबार में बदल सकते हैं। इस्राइल, दक्षिण अफ्रीका और साउदी अरब जैसे देश जहां जगह या पानी की कमी है, वहां ये तकनीक सफल कारोबार में बदल चुकी है।
  • इन देशों में किसान अपने घरों की छत के साथ साथ मॉल, ऑफिस की छतों पर गार्डन स्थापित कर रहे हैं। वहीं कई लोग आपस में मिल कर अपनी-अपनी छतों पर सब्जिया उगा रहे हैं।
  • वहीं आप इस तकनीक को सीख कर अपनी कंपनी स्थापित कर सकते हैं या फिर किसी स्थापित कंपनी के साथ जुड़ कर दूसरे लोगों को उनके ऑर्गेनिक फार्म या गार्डन स्थापित करने में मदद कर सकते हैं।

क्या हैं इस कारोबार में ध्यान देने वाली बातें

  • किसानों को पॉलिहाउस या नेट शेड पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ सकता है। सिस्टम का खर्च वन टाइम है लेकिन शेड के रखरखाव का खर्च लागत बढ़ा सकता है। खेत जितना बड़ा होगा ये खर्च उतना ज्यादा होगा।
  • वहीं अभिषेक ने साफ कहा कि फसल पर तापमान, कीट जैसी कई बातों का असर पड़ता है। ऐसे में उपज के लिए खेती की बेसिक जानकारी और उस हिसाब से पौधों की देखभाल और बदलाव करने पड़ते रहते हैं।
  • रिटर्न इस बात से निर्भर होता है कि आप जो उगा रहे हैं उसकी क्वालिटी और मार्केट में उसकी कीमत क्या है। बेहतर कीमत के लिए मार्केटिंग स्किल्स भी चाहिए
  • इस काम में खेती से जुड़े अपने जोखिम बने रहते हैं, लेकिन परंपरागत खेती के मुकाबले इसके जोखिम काफी कम हैं और मार्जिन ऊंचा है।

अब जानवर नहीं पहुंचा सकेंगे नुकसान क्योंकि अब पल्स मशीन करेगी फसल की रखवाली

अब किसानों को फसल की रखवाली के लिए रातभर जागने की मजबूरी नहीं रहेगी। न ही फसल को जंगली जानवर नुकसान पहुंचा सकेंगे। फसल रक्षक पल्स मशीन फसलों की सुरक्षा करेगी। यह मशीन पंत विवि के किसान मेले में किसानों के लिए उपलब्ध हो सकेगी।

12 वोल्ट की बैटरी से संचालित इस मशीन के झटकों से हाथी, नील गाय, जंगली सुअर, हिरन, गीदड़, सेही, बंदर, सांड आदि जानवर फसल के करीब नहीं फटक सकेंगे।

खास बात यह है कि इस मशीन के करंट से जानवर या अंजाने में इंसान के छू लेने पर मौत होने जैसी कोई नौबत नहीं आएगी। एक बार फिर बता दे इस से किसी को कोई जानलेवा नुकसान नहीं होता ।

क्योंकि बैटरी का करंट होने के चलते इसमें अर्थिग होने की नौबत नहीं आती है। इस मशीन को घरों या फार्म हाउस के आसपास भी लगाया जा सकता है। जिससे कि बंदर नुकसान न पहुंचा सकें।

ऐसे करती है मशीन काम

छोटी सी इस मशीन को 12 वोल्ट की मशीन से करंट दिया जाता है। इसके बाद इस मशीन को खेतों के चारों ओर लगाए गए क्लच वायर से जोड़ दिया जाता है। तार की कीमत 160 रुपये प्रति किलो है, जबकि एक किलो में 75 मीटर लंबी तार आ जाती है। मशीन की कीमत नौ हजार रुपये है।

ये है मशीन की क्षमता

  • बैटरी एक बार चार्ज करने पर 24 घंटे चलती है
  • यह मशीन एक मिनट में 75 बार झटके देकर फसल की रखवाली करती है।
  • इसके करंट से कोई भी जानवर या आदमी नहीं मरेगा।

और जानकारी के लिए निचे दिए हुए नंबर और पते पर संपर्क करें

Ring Road Chamunda Dham colony,BIJNOR (UTTAR PRADESH)PIN-246701
EMAIL : nidhipulsmachine@gmail.com
Mobile No:9012384699, 8859595976

आप भी कर सकते है हींग की खेती ,एक किल्लो की कीमत है 35000

देश में खेती को लेकर पहले कई प्रयोग किए जा चुके हैं और कई प्रयोगों में भारत को सफलता हासिल हो चुकी है. इसी के साथ देश को खेती की क्षेत्र में एक और सफलता हासिल हुई है. देश में पहली बार हिंग की खेती में सफलता दिखाई दे रही है. भारत में अभी तक हिंग की खेती संभव नहीं हो सकी थी या फीर यूं कहें की यहां एक ग्राम भी हिंग की उत्पादन नहीं हो सकी थी.

हींग की खपत हमारे देश में लगभग 40 प्रतिशत है. यह शायद थोड़ी अजीब भी है की जिस देश में हींग की खपत इतनी ज्यादा है उस देश में इसकी खेती नहीं होती और इसे दूसरे देश से आयात करना पड़ता है. वहीं हींग का बाजार भाव 35000 रुपए प्रति किलो ग्राम है.

इन देशों में होती है हींग की खेती

हिंग एक सौंफ प्रजाति का पौधा है और इसकी लम्बाई 1 से 1.5 मीटर तक होती है. इसकी खेती जिन देशों में प्रमुख तौर पर होती हैं वो है अफगानिस्तान, ईरान, तुर्कमेनिस्तान और ब्लूचिस्तान.

कब और कहां कर सकते हैं हींग की खेती

हींग की खेती के लिए 20 से 30 डिग्री सेल्सियस का तापमान उपयुक्त होता है. भारत में यह तापमान पहाड़ी क्षेत्रों में होता है और इन क्षेत्रों में इसकी खेती आसानी से की जा सकती है. अन्य शब्दों में कहें तो इसकी खेती के लिए न ज्यादा ठण्ड और न ही ज्यादा गर्मी की आवश्यक्ता होती है.

महत्वपूर्ण जानकारी

हींग की खेती के लिए ऐसी जमीन उपयुक्त मानी जाती है जिसमें रेत, मिठ्ठी के ठेले व चिकनी अधिक हो. इसके साथ ही सूरज की धूप सीधे उस जगह पड़नी चाहिए जहां इसकी खेती की जा रही है. जहां छाया पड़ती हो वहां पर इसे नहीं उगाया जा सकता है. पौधों के बीच में 5 फीट की दूरी का होना आवश्यक है.

हींग की खेती की प्रकिया

हींग के बीज को पहले ग्रीन हाऊस में 2-2 फीट की दूरी से बोया जाता है. पौध निकलने पर इसे फिर 5-5 फीट की दूरी पर लगाया जाता है. हाथ लगाकर जमीन की नमी को देख कर ही इसमें पानी का छिड़काव किया जा सकता है, अधिक पानी पौधे को नुकसान पहुंचा सकता है.

पौधों को नमी के लिए गीली घास का भी प्रयोग किया जा सकता है, एक खास बात यह है कि हींग पौधे को पेड़ बनने के लिए 5 वर्ष का समय लगता है. इसकी जड़ों व सीधे तनों से गौंद निकाला जाता है.

हींग के प्रकार और कुछ अन्य जानकारी

हींग मुख्य: दो प्रकार की होती हैं दुधिया सफेद जिसे काबूली सुफाइद बोला जाता है और दूसरी लाल हींग. सल्फर के मौजूद होने के कारण इसकी गंध बहुत तीखी होती है. इसके भी तीन रूप होते है टिमर्स, मास और पेस्ट. यह गोल, पतला राल शुद्ध रूप में होता है जोकि 30 मि.मि. का होता है यह भूरा और फीका पीला होता है. सफेद व पीला पानी में घुलनशील है. जबकि गहरे व काले रंग वाला तेल में ही घुलता है, स्टार्च व गोंद मिला कर ईट के रूप में बेचा जाता है.

भारत में कहां हो रही है हींग की खेती ?

भारत में हिंग की खेती की शुरुआत हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति से हुई है. इंडियन कॉफी बोर्ड के सदस्य डॉ.विक्रम शर्मा और हिमाचल सरकार के वजह से संभव हो पाया है. डॉ. शर्मा ने इसके बीज को इरान और तुर्की से मंगाकर यहां इसकी बीज तैयारल की है.

इसके साथ ही पहांड़ी इलाकों में रह रहे किसानों के लिए अच्छी खबर यह है की वहां के किसान आसानी से हींग की खेती कर सकते हैं. भारत में अभी तक हिंग की खेती संभव नहीं हो सकी थी या फीर यूं कहें की यहां एक ग्राम भी हिंग की उत्पादन नहीं हो सकी थी.

अब सिर्फ 7 दिन में घर पर त्यार करें पौष्टिक हाइड्रोपोनिक्स चारा

वैज्ञानिकों ने एेसा चारा उगाया है, जिसे खाकर पशु 15 से 20 फीसदी तक ज्यादा दूध देने लगेंगे। इस विधि को हाइड्रोपोनिक्स कहते हैं। इसे अपनाकर कम लागत में चारा तैयार किया जा सकता है।

पशुओं की अच्छी नस्ल होने के बाद भी उत्पादन कम रह जाता है। पशुओं के लिए उचित आहार का प्रबंधन कर उत्पादकता के साथ ही आर्थिक स्थिति में भी सुधार लाया जा सकता है। जिले में पानी की कमी के कारण हरा चारे की फसल नहीं ले पाते हैं।

हाइड्रोपोनिक्स विधि से कम पानी में हरा चारा तैयार किया जा सकता है। इस विधि में हम कम पानी में दुधारु पशुओं के लिए पौष्टिक हरा चारा तैयार करने की यह मशीन किसानों के प्रदर्शन के लिए स्थापित की है।

कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक पशुपालन डॉ.रुपेश जैन ने बताया हाइड्रोपोनिक्स विधि से मक्का, ज्वार, बाजरा से हरे चारे को तैयार किया जा सकता है। इस विधि से तैयार चारे में पौष्टिक तत्वों की मात्रा परंपरागत चारे की तुलना में ज्यादा होती है। इसमें जगह भी कम लगती है।

ऐसे बनाए हाइड्रोपोनिक्स चारा

इस विधि से हरे चारे को तैयार करने के लिए सबसे पहले मक्का, ज्वार व बाजरा के दानों को 24 घंटे के लिए पानी में भिगोकर रखा जाता है। इसके बाद जूट के बोरे में ढककर अंकुरण के लिए रखा जाता है। अंकुरण निकलने के बाद इसे हाइड्रोपोनिक्स मशीन की ट्रे (2 बाय 1.5 फीट) में बराबर मात्रा में फैलाया जाता है। चौथे से दसवें दिन तक इसमें वृद्धि होती है।

इस दौरान ट्रे में 7 दिनों तक फौव्वारा के द्वारा दिन में 8 से 10 बार सिंचाई की जाती है। दसवें दिन एक ट्रे में लगभग 10 किलो तक हरा चारा तैयार हो जाता है। चारे की हाइट भी 6 से 8 इंच तक की हो जाती है।

इस विधि से तैयार चारे को 15 से 20 किलो तक दूध देने वाले पशुओं को खिलाया जा सकता है। पशुओं को खिलाने से दूध उत्पादन में 15 से 20 प्रतिशत तक की वृद्धि के साथ ही दूध में वसा की 10 से 15 प्रतिशत बढ़ोतरी होती है।

18-20 हजार होंगे खर्च

इस विधि को अपनाने के ज्यादा रुपए भी नहीं चुकाने होंगे। 50 ट्रे वाली मशीन के लिए 18 से 20 हजार रुपए का खर्च आएगा। जिसमें 5 ट्रेे प्रतिदिन 50 किलो हरा चारा निकलेगा। इससे 5 पशुओं को आहार दिया जा सकता है।

परंपरागत तरीके से चारा तैयार करने में 25 से 30 लीटर पानी की खपत होती है। वहीं इस विधि को अपनाकर 2 से 3 लीटर प्रतिदिन पानी में ही सिंचाई हो जाएगी।

हाइड्रोपोनिक्स चारा त्यार करने की जानकारी के लिए वीडियो भी देखें

गाजर घास से ऐसे त्यार करें यूरिया जैसी ताकतवर खाद

गाजर घास का वैज्ञानिक नाम पार्थेनियम हिस्टोफोरस है, इसमें प्रचुर मात्रा में नाइट्रोजन होती है। वैसे तो इसका पौधा इंसानों ही नहीं, जानवरों को भी कई तरह के रोग दे सकता है लेकिन इसके पौधे से अच्छी किस्म की कंपोस्ट खाद भी बनाई जा सकती है। यूपी समेत देश के अलग-अलग कृषि विज्ञान केंद्रों में इसके उपयोग के तरीके सिखाए जा रहे हैं।

इसी बीच कुछ किसानों ने इसके तरल खाद बनानी भी शुरू कर दी है। मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के करताज में रहने वाले प्रगतिशील किसान राकेश दुबे ने गोमूत्र और गाजर खास के स्वरस से तरल खाद बनानी शुरू की है, जो यूरिया का अच्छा विकल्प बन रही है।

राकेश दुबे बताते हैं, “कांग्रेस या गाजर खास किसानों को एलर्जी समेत कई बीमारियां दे रही है, इसकी रोकथाम भी बहुत मुश्किल है, खासकर जैविक खेती करने वाले किसान काफी परेशान रहते हैं, मगर ये किसान गाजर घास और गोमूत्र के स्वरस के जरिए अच्छी जैविक खाद बना सके हैं,

जो गेहूं, मक्का से लेकर कई फसलों में काम आएगी। जहर मुक्त खेती में नाइट्रोजन की आपूर्ति हमेशा समस्या रही है। कुछ किसान आंवला और मट्टा मिलाकर छिड़काव करते हैं, कुछ घनजीवामृत से लेकर वेस्टडीकंपोजर तक। लेकिन राकेश दुबे अब गाजर घास का रस छिड़क रहे हैं।

देश के अलग-अलग हिस्सों के किसान भी गाजर घास का सदुपयोग कर सकें, इसके लिए राकेश दुबे ने स्वरस बनाने का एक वीडियो और पूरी जानकारी सोशल मीडिया पर शेयर की है। जिसमें बनाने की पूरी विधि और छिड़काव के तरीके बताए गए हैं।

गाजर स्वरस बनाने की विधि आठ एकड़ मक्के के लिए राकेश दुबे की विधि:

30 किलो गाजर घास को बारीक काटकर 60 किलो गौमूत्र में मिला दिया। फिर उसमें 100 फिटकरी को 3-4 लीटर के गोमूत्र में घोलकर अच्छी तरह मिलाने के बाद गोमूत्र और गाजर घास वाले ड्रम में डाल देंगे। फिर इसे पूरे 3 दिन के लिए ड्रम में रख दिया जाएगा और जिसे समय-समय पर चलाना पड़ेगा। बाद में इसे महीन कपड़े से छानकर अलग कर लिया जाएगा। जिसे बाद फसल पर छिड़काव किया जा सकता है।

प्रति टंकी (20 लीटर वाली) में 2 लीटर गाजर घास स्वरस मिलाना है। इसे सुबह 10 बजे से पहले ही खेतों में छिड़काव करना चाहिए क्योंकि नाइट्रोजन उठाने और स्टोमेटा खुलने का ये उपयुक्त समय होता है।

एक एकड़ की विधि:

चार किलो गाजर घास, 8 लीटर गोमूत्र और 10 ग्राम फिटकरी के जरिए आप स्वरस बना सकते हैं

पाया जाता है विषाक्त रसायन

गाजर घास में रेस्क्युपटरपिन नामका विषाक्त रसायन पाया जाता है। जो फसलों की अंकुरण क्षमता पर विपरीत असर डालता है। इसे पराकरण अगर फसलों में ज्यादा पड़ जाएं तो उनमें दाना बनने की क्षमता कम हो जाती है। इनका दुष्प्रभाव इतना ज्यादा होता है कि दहलनी फसलों में नाइट्रोजन सोखने की जो क्षमता होती है ये उसे भी प्रभावित करते हैं। इसके संपर्क में आने पर किसानों को एग्जिमा, एलर्जी, बुखार और नजला जैसी बीमारियां हो जाती है।

अगर पशु इनके लपेटे में आ जाएं तो या दूसरी घास के साथ इसे खा जाएं तो उनके थनों और नथुनों में सूजन आ सकता है, समस्या ज्यादा गंभीर होने पर मौत भी हो सकती है।

रासायनिक तरीकों से रोकथाम के उपाय

गाजर घास को खत्म करना थोड़ा मुश्किल है लेकिन लगातार अगर कोशिश की जाए तो इसे नष्ट कर सकते है। सबसे जरुरी है इसके पौधों में फूल आने से पहले इन्हें काटकर जलाया जाए। या फिर उनकी खाद बनाई। तीसरा तरीका है।

खरपतवार नाशक का छिड़काव करें? गाजर घास के ऊपर 20 प्रतिशत साधारण नमक का घोल बनाकर छिड़काव करें। हर्बीसाइड जैसे शाकनाशी रसायनों में ग्लाईफोसेट, 2, 4-डी, मेट्रीब्युजिन, एट्राजीन, सिमेजिन, एलाक्लोर और डाइयूरान आदि प्रमुख हैं। अगर घास कुल की वनस्पतियों को बचाते हुए केवल गाजर घास को ही नष्ट करना है तो मेट्रीब्युजिन का उपयोग करना चाहिए।

मैक्सिकन बीटल (जाइगोग्रामा बाईकोलोराटा) जो इस खरपतवार को बहुत मजे से खाता है, इसके ऊपर छोड़ देना चाहिए। इस कीट के लार्वा और वयस्क पत्तियों को चटकर गाजर घास को सुखाकर मार देते हैं।

ज्यादा जानकारी के लिए वीडियो देखे

गाजर घास से कंपोस्ट बनाने के उपाय

जौनपुर के बक्शा कृषि विज्ञान केन्द्र के कृषि वैज्ञानिक डॉ. संदीप कन्नोजिया हैं,”इस घास से यदि किसान खाद बना लें तो उनकी परेशानी का हल निकल आएगा। गाजर घास से खाद बनाने के लिए किसानों को एक गड्ढा खोदना होता है। गड्ढे की लम्बाई 12 फीट, चौड़ाई चार फीट और घहराई पांच फीट होनी चाहिए। इस गड्ढे में नौ इंच चौड़ी की दीवार बनानी होगी। इसे सीधा जोड़ेंगे। जब तीन स्टेप तीन रदृा ईंट रखने के बाद सात इंच चारों ओर जाली बनाई जाएगी।

इसी तरह ईंट की जोड़ाई सीधी और जालीदार करते रहेंगे। इसके बाद सूखी गाजर घास को अलग और हरी गाजर घास को अलग रख लेंगे। छह इंच तक हरा और सूखा वाला डंठल नीचे भर देंगे। इसके बाद 5 किलो गोबर पानी में ढीला घोलकर इसमें डाल देंगे। साथ में 2 इंच मिट्टी भी डालेंगे। भराई करने के बाद उसके ऊपर से मुलायम वाला डंठल डाला जाएगा। फिर पांच किलो गोबर पानी के साथ मिक्स करके तर करेंगे। इसी तरह गड्ढे को उपर तक भरना होगा।”. संदीप कन्नोजिया कहते हैं, “गाजर घास से बनी 20 टन खाद एक हेक्टेयर खेत के लिए मुफीद है।

news sources: gaonconnection.

गन्ने की 25% ज्यादा पैदवार के लिए गन्ने के साथ ऐसे उगाएं चना

गन्ने-चने की शरदकालीन मिश्रित खेती से श्री भगत सिंह (M: 9466941251) गांव कहानगड़- शाहबाद जिला कुरूक्षेत्र (हरिय़ाना ) ने पिछले तीन सालो मे अपनी आमदनी को दुगना कर दिखाया है !

शरदकालीन बीजाई मे (अक्तुबर माह) गन्ने की पैदवार लगभग 25% ज्यादा होती हैं ! पर किसान गेहू की फसल के लालच मे, गन्ने की बीजाई अप्रेल मे देर से करते हैं !

यह फसल भगत सिंह ने 4 एकड़ में उगाई है। चना बैड पर तीन लाइन में है, चौथी नाली में गन्ने की फसल अक्टूबर अंत में बिजाई की गई। मार्च के प्रथम सप्ताह में चने का छोलिया होगा, चने की फसल के साथ गन्ने का उत्पादन होगा।

क्या होता है फायदा:

किसान के अनुसार सर्दकालीन गन्ने की खेती दो साल से कर रहे है। इससे 25 फीसदी अधिक पैदावार होती है। यही नहीं धरती की उर्वरा शक्ति भी खूब बनी रहती है। गन्ने में पानी हलका नालियाें में ही देते हैं।

इसका समाधान हैं गन्ने- चने की शरदकालीन मिश्रित खेती, ज़िसे चने की सीधी बढवार वाली किसम HC-5 ने ज्यादा आसान कर दिया हैं ! क्योंकि किसान को गन्ने की फसल के पूरी पैदवार के साथ , 8 किवटल प्रति एंकड़ चने की फसल भी मिलती हैं और ज़मीन की उपजाऊ शक्ती भी बनी रहती हैं !

चने की ह्च सी -5 ( HC-5) किसम के बीज के लिये सम्पर्क करे : श्री जगदीप सिंह ढ़िल्लों, पंजाब ( 9915463033) य़ा श्री राजिन्द्र पवार मध्य प्रदेश ( 9907236006)

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किसान के बेटे ने बाइक के इंजन से बनाई फ्लाइंग मशीन

यदि हौंसला हो तो सपनों की उड़ान भरने के लिए पंख अपने आप लग जाते हैं. फिर उसके सामने बड़ी से बड़ी बाधा बहुत छोटी नजर आती हैं. ऐसा ही उदाहरण पेश किया है हिसार जिले के आदमपुर हल्के के गांव ढाणी मोहब्बतपुर निवासी बीटेक के छात्र कुलदीप टाक ने.

23 वर्षीय कुलदीप ने देसी जुगाड़ से उडऩे वाली अनोखी फ्लाइंग मशीन तैयार की है. ये मशीन 1 लीटर पेट्रोल में करीब 12 मिनट तक आसमान में उड़ती है. इसे पैराग्लाइडिंग फ्लाइंग मशीन या मिनी हैलीकॉप्टर का नाम दिया गया है.

कुलदीप ने 3 साल की कड़ी मेहनत के बाद पैराग्लाइडिंग फ्लाइंग मशीन को आसमान में उड़ाने में सफलता पाई है. मशीन दिखने में भले ही साधारण लगती हो, लेकिन ये उड़ान गजब की भरती है. ढाणी मोहब्बतपुर निवासी कुलदीप के पिता प्रहलाद सिंह टाक गांव में खेतीबाड़ी करते हैं. चंडीगढ़ से बीटेक की पढ़ाई पूरी करने के बाद अब कुलदीप इसी प्रोजेक्ट पर कार्य कर रहा है. फ्लाइंग मशीन को बनाने में गांव आर्यनगर निवासी सतीश कुमार का भी योगदान रहा.

टंकी फुल हो तो 1 घंटे की उड़ान

कुलदीप ने बताया कि मशीन को तैयार करने में करीब ढाई लाख रुपये का खर्च आया है. इस फ्लाइंग मशीन से किसी को खतरा नहीं है. मशीन में बाइक का 200CC इंजन लगाया गया है. इसके अलावा लकड़ी का पंखा लगा हैं, साथ ही साथ छोटे टायर लगाए हैं.

इसके ऊपर पैराग्लाइडर लगाया गया है जो उड़ान भरने और सेफ्टी के साथ लैंडिंग करवाने में सहायक है.फिलहाल इस मशीन में केवल 1 ही व्यक्ति बैठ सकता है, लेकिन कुलदीप ने दावा किया है कि कुछ ही माह में ये मशीन 2 लोगों को लेकर उड़ेगी, जिसमें सबसे पहले वो अपने पिता को बैठाएगा.

2 हजार फीट तक भरी उड़ान

यह मशीन 10 हजार फीट की ऊंचाई तक उड़ान भरने में सक्षम है. गांव चौधरीवाली से आसपास के गांवों में कुलदीप ने अब तक करीब 2 हजार फीट की ऊंचाई तक उड़ान भरी है. ये मशीन पेट्रोल से उड़ती है जिसमें 5-6 लीटर का टैंक है. पूरी फ्लाइंग मशीन में स्थानीय स्तर के सामान का प्रयोग किया गया है. यानी कुल मिलाकर इस मशीन की टंकी फुल होने के बाद आप 1 घंटे तक आसमान में उड़ सकते हैं.

पितो बोले, रातभर लगा रहता था बेटा

कुलदीप ने बताया कि उसके इस सपने को साकार करने में उसके परिवार का सबसे बड़ा योगदान है. उसके पिता प्रहलाद सिंह टाक और सहयोगी सतीश आर्यनगर ने भी उसकी मेहनत को हौसला दिया. पिता प्रहलाद सिंह खेत में रहते हैं. कुलदीप के पिता प्रहलाद सिंह टाक ने बताया कि उसका बेटा देर रात इस मशीन को बनाता रहता था.

उसके मना करने के बावजूद कुलदीप मशीन को पूरा करने में लगा रहा. करीब 6 माह पहले गोवा में पायलट की 3 माह ट्रेनिंग की थी. ट्रेनिंग पूरी होने के बाद भी कुलदीप का फ्लाइंग मशीन बनाने का जुनून कम नहीं हुआ. वहीं कुलदीप के सहयोगी सतीश आर्यनगर ने कहा कि उन्हें पूरा विश्वास था कि कुलदीप उन्हें हवा में जरूर सैर कराएगा.कुलदीप की मां कमला ने बताया कि बेटे को हवा में उड़ता देखकर बहुत खुशी हो रही है बेटे ने बड़े साल मेहनत की आखिर अब जा कर इसका फायदा मिला है.

पहले भी बनाया था एयरक्राफ्ट जो हो गया था क्षतिग्रस्त

सहयोगी सतीश ने बताया हालांकि इससे पहले भी उसने एक एयरक्राफ्ट तैयार किया था, लेकिन वो ट्रायल के दौरान पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया. इसके बावजूद भी उसने हिम्मत नहीं हारी. फिर से पैराग्लाडिंग फ्लाइंग मशीन बनाने का निर्णय लिया और आज वो इसमें कामयाब हो ही गया.