मलचिंग तकनीक से खेती, आधे पानी से दोगुनी फसल

21वीं सदी में खेती की बात आते ही झट से आपके मन में सवाल आता है कि अब कौन सी तकनीक है जो खेतों में उत्पादन बढ़ा सकती है और किसान की जेब भर सकती है। नई तकनीकों की लंबी फेहरिस्त में इस बार किसानखबर.कॉम आपके लिए लेकर आया है प्लास्टिक मल्चिंग तकनीक (Plastic Mulching) की पूरी जानकारी।

प्लास्टिक मल्चिंग क्या है।

खेत में पौधों की जमीन को चारों तरफ से प्लास्टिक की एक फिल्म के जरिए सही ढंग से कवर करने (ढकने) की तकनीक को प्लास्टिक मल्चिंग कहते हैं। यह फिल्म कई साइज, क्वालिटी और कई रंगों में बाजार में मिलती है।

इस तकनीक का क्या फ़ायदा होता है।

अगर आप मिट्टी में कम नमी और मिट्टी के कटाव से परेशान हैं तो ये तकनीक आपके लिए बेहद ही कारगर साबित हो सकती है। इस तकनीक के जरिए खेत में पानी की नमी को बनाये रखने में तो मदद मिलती ही है साथ ही सूरज की तेज धूप के कारण मिट्टी से पानी सोख लेने की समस्या से भी निजात मिल जाती है।

इस तकनीक की मदद से खेत में मिटटी का कटाव रोकने के साथ साथ खतपतवार को भी सफलतापूर्वक रोका जा सकता है।

अगर आप बागवानी करते हैं तो फिर आपको प्लास्टिक मल्चिंग तकनीक से बागवानी में होने वाले खतपतवार को रोकने के अलावा पोधों को लम्बे समय तक सुरक्षित रखने में बहुत मदद मिलेगी। इसके अलावा जमीन के कठोर होने की परेशानी भी खत्म होती है और पौधों की जड़ों का विकास भी अच्छे से होता है।

कैसे होता है सब्जियों की फसल में प्लास्टिक मल्चिंग का इस्तेमाल

जिस खेत में सब्जी वाली फसल लगानी हें उसे पहले अच्छे से जुताई कर ले। इस बीच मिट्टी की जांच करवा लें। जांच की रिपोर्ट के हिसाब से जोते हुए खेत में गोबर की खाद उचित मात्रा में डाल दें। इसके बाद खेत में उठी हुई क्यारियां बनाएं। फिर उनके ऊपर ड्रिप सिचाई की पाइप लाइन को बिछाए।

सब्जियों की खेती के लिए 25 से 30 माइक्रोन लास्टिक मल्च फिल्म बेहतर होती है। इस फिल्म को उचित तरीके से बिछाते जाएं और फिल्म के दोनों किनारों को मिटटी की परत से दबाते जाएं। इसे आप ट्रैक्टर से चलने वाली मशीन से भी दबा सकते हैं।

इसके बाद आपको उस फिल्म पर गोलाई में पाइप से दो पौधों की बराबर दूरी तय करके छेद करने होंगे। फिर इन छेंदों बीज या नर्सरी में तैयार पौधों का रोपण करना होगा।

फल वाली फसल में कैसे होता है प्लास्टिक मल्चिंग का इस्तेमाल

फल वाले पौधों के लिए 100 माइक्रोन की लास्टिक की फिल्म मल्च अच्छी रहती है। अगर आपने खेत में फलदार पौधे लगाएं हैं तो फिर इसका इस्तेमाल वहां तक करिए जहां तक पौधे की छाव रहेगी। इसके लिए फिल्म मल्च की सही लम्बाई-चौड़ाई में काट लें। इसके बाद पौधों के नीचे के नीचे उग रही घास और खरपतवार को पूरी तरह हटा दें।

फिर सिंचाई का नली को सही ढंग से सेट करने के बाद 100 माइक्रोन की लास्टिक की फिल्म मल्च को पौधों के तने के आसपास अच्छे से लगाना होता है। इसके बाद उसके चारो कोनो को 6 से 8 इंच तक मिटटी की परत से ढकना जरूरी होगा।

प्लास्टिक मल्चिंग करते समय क्या सावधानियां बरतें।

  • प्लास्टिक फिल्म हमेशा सुबह या शाम के समय लगानी चाहिए।
  • फिल्म में ज्यादा तनाव यानी टाइट नहीं लगानी चाहिए। उसको थोड़ा ढीला छोड़ना चाहिए।
  • फिल्म में जो भी सल हो उसे निकलने के बाद ही मिटटी चढ़ावे।
  • फिल्म में छेद करते वक्त सावधानी से करें और सिचाई नली का ध्यान रख के लगाएं।
  • छेद एक जैसे हो और फिल्म न फटे।
  • मिटटी चढाने में दोनों साइड एक जैसी रखें
  • फिल्म की घड़ी (फोल्ड करना) हमेशा गोलाई में करें
  • फिल्म को फटने से बचाएं, ताकि उसका उपयोग दूसरी बार भी कर पाए और उपयोग होने के बाद उसे सुरक्षित रखें।

लागत कितनी आती है?

प्लास्टिक मल्चिंग की लागत कई बातों पर निर्भर करती है। जैसे क्यारियां का साइज क्या है और बाजार में फिल्म का मौजूदा रेट क्या है। रेट हर साल कम-ज्यादा होते रहते हैं। लेकिन फिर भी अगर औसत लागत की बात करें, तो औसत लागत प्रति बीघा लगभग 8 हजार रूपए तक आती है।

सरकारी अनुदाना मिलता है क्या?

देश की कई राज्य सरकारों ने प्लास्टिक मल्चिंग तकनीक का इस्तेमाल करने पर किसानों को अनुदान की सुविधा दे रखी है। मध्य प्रदेश सरकार प्लास्टिक मल्चिंग की लागत का 50 प्रतिशत या फिर अधिकतम 16 हजार रूपए प्रति हेक्टेयर का अनुदान दे रही है।

अब बाबा रामदेव ले के आ रहे है पतंजलि के आर्गनिक बीज, जाने क्या है खास ?

योग और आयुर्वेद के क्षेत्र में काम करने बाद पतंजलि योगपीठ पर देश में कृषि क्रांति करने की तैयारी में है। इसके लिए गेहूं और धान की नई प्रजाति का बीज तैयार कर लिया गया है।  इसके साथ ही सब्जियों के क्षेत्र में भी बड़ा काम शुरू हो चुका है। आर्गेनिक बीज उपलब्ध कराने के लिए उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश की कई जमीनों का उपयोग किया जा रहा है। कृषि कार्यों के लिए बाबा रामदेव ने करीब 500 एकड़ भूमि पर आर्गेनिक खेती शुरू कर दी है।

गौरतलब है कि बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण का उद्देश्य देश में रसायनिक खादों का उपयोग समाप्त कराना है। इस दिशा में एक लंबी कार्ययोजना भी तैयार की गई है। आचार्य बालकृष्ण मानते हैं कि इस कार्य में काफी समय लगेगा, लेकिन यह होकर रहेगा। उनका कहन है कि रसायनिक खादों से तैयार फल सब्जी और अनाज खा-खाकर पूरा देश बीमार हो गया है।

जब तक देश में कंपोस्ट खाद और गोबर खाद का प्रयोग होता था, असाध्य बीमारियां देश में नहीं आती थी।समय के साथ जमीन की उर्वरकता समाप्त होती चली गई। अब जमीनें भी जहर उगलने लगी हैं। आचार्य ने बताया कि इसे देखते हुए पतंजलि योगपीठ ने कृषि क्रांति की तैयारी की है। योजना है कि तमाम देश के किसानों को आर्गेनिक बीज उपलब्ध कराए जाएं। यह कार्य पतंजलि में पहले ही प्रारंभ हो चुका था।

बाबा रामदेव ने बताया कि देश में समय-समय पर खेती के क्षेत्र में नए प्रयोग होते रहे हैं। पतंजलि के वैज्ञानिकों ने गेहूं और धान की नई प्रजाति तैयार की है, जो अधिक उपज प्रदान करती है। इसके बीज कुछ क्षेत्रों में भेजे गए हैं।

योजना है कि बड़े पैमाने पर बीज तैयार कराए जाएं और फिर उनका वितरण देशभर के कृषि केंद्रों पर किया जाए। इन दिनों दो प्रदेशों की 500 एकड़ भूमि पर उन्नत फसल तैयार करने का काम चल रहा है। उन्होंने बताया कि बीज तैयार करने का काम देश के किसानों को भी सौंपा जाएगा। उद्देश्य है कि आर्गेनिक खाद से किसान अपना बीज स्वयं तैयार करें।

किसान ने बुलेट से बना डाला ट्रेक्टर, एक एकड़ से खर पतवार हटाने का खर्च मात्र 8 रूपए

रॉयल एन्फिल्‍ड बुलेट, भारत की पहली क्रूज बाईक जो लगभग हर युवा के दिल पर राज करती है। अब तक आपने बुलेट को सिर्फ सड़कों पर फर्राटा भरते ही देखा होगा। लेकिन, एक बुलेट ऐसी भी है जो खेतों में कमाल कर रही है। गुजरात के एक छोटे से किसान ने बुलेट को अब खेतों की रानी बना दिया है, जो खेती का लगभग हर काम कर रही है। बेहद कम पढ़े लिखे इस किसान मनसुखभाई जगानी के इस कारनामे का अमेरिका तक ने लोहा माना है और बुलेट सांटी नाम से उन्‍हें पेटेंट दिया है।

गुजरात के अमरेली ज़िले के मोटा देवाल्या गांव में एक गरीब किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले मनसुखभाई जगानी बहुत पढ़े लिखे नहीं हैं।उनके गांव में किसान कठिन संकट से गुजर रहे थे। गांव अकाल का सामना कर रहा था। पानी के संकट और बैलों की मौत से किसान खेती छोड़ने को मजबूर थे। संकट की इस घड़ी में बैलों की जगह पर ट्रैक्टर खरीदने का तो सवाल ही नहीं उठता।

इन्हीं परिस्थितियों में मनसुखभाई ने इलाके में तमाम किसानों की समस्याओं के सामाधान के लिए कुछ ऐसा बनाने की ठानी जो उन तमाम किसानों का सहारा बन सके।तकरीबन 4-5 सालों के परीक्षण के बाद साल 1994 में मनसुखभाई ने मोटरसाइकिल में लगने वाली खेती किसानी के लिए एक बहुपयोगी उपकरण तैयार किया। इन उपकरणों को 325 सीसी हार्सपावर वाली किसी भी मोटरसाइकिल के पिछले हिस्से में पिछले चक्के की जगह पर लगाया जा सकता है।

मनसुखभाई के इस ‘सुपर हल’ को उस इलाके में बुलेट सांटीके नाम से लोग जानते हैं। इस हल के जरिए खेती से जुड़ी विभिन्न गतिविधियां मसलन बुवाई, अंतर-संवर्धन, कीटनाशकों या किसी अन्य चीज के छिड़काव के लिए किया जा सकता है।

अपने इस बुलेट सांटी के बारे में बताते हुए मनसुखभाई कहते हैं ” बुलैट सांटी से किसानों को जबरदस्त फायदा हुआ। इस आविष्कार से किसानों को उत्पादन बढ़ाने में मदद मिली क्योंकि इसके बाद वो खेत जोतने के लिए मजदूरों या बैलों की चिंता से मुक्त हो गए।

बुलेट शांटी ने भारत और अमेरिका दोनों जगहों पर अपनी प्रौद्योगिकी के लिए पेटेंट हासिल किया बावजुद उसके व्यापक स्तर पर इसको विकसित करने में किसी कंपनी ने दिलचस्पी अब तक नहीं दिखाई है।

कम लागत वाली सांटी कृषि कार्य के लिए बेहद उपयोगी उपकरण है। एक एकड़ खेत की जुताई दो लीटर तेल के इस्तेमाल से इस उपकरण के जरिए महज आधे घंटे में हो जाती है। इसके जरिए एक एकड़ खेत से खर पतवार हटाने में मात्र 8 रूपए खर्च होते हैं।

ऐसे किसान जो कृषि कार्यों के लिए ट्रैक्टर नहीं खरीद सकते हैं उनके लिए इसकी कम लागत को देखते हुए बहुत ही उपयोगी उपकरण है। इस उपकरण की सबसे बड़ी खासियत ये है कि एक बार इसका कृषि उपयोग समाप्त हो जाने के बाद इसको सामान्य मोटरसाइकिल के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इस बहुउद्देशीय कृषि उपकरण सांटी की कीमत है मात्र 38,000 रूपए।

मनसुखभाई ने कुशल एवं सस्ती छिड़काव उपकरण बनाया है जिसको साइकिल पर लगा कर इस्तेमाल किया जाता है। ये छिड़काव उपकरण इस्तेमाल करने में आसान है क्योंकि इसकी उंचाई उपर नीचे की जा सकती है। अन्य छिड़काव उपकरण की तुलना में विभिन्न फसलों में उपयोग के दौरान किसानों को ये अधिक स्कोप (लचीलापन) देता है। ट्रेक्टर पर लगने वाले स्पेयर की तुलना में ये स्प्रेयर इस्तेमाल होने के लिए कम जगह घेरता है।

एक एकड़ खेत में इसके उपयोग में 45 मिनट का वक्त लगता है जिससे कि लागत भी कम आती है। बुलेट सांटी की तरह ही साइकिल का भी जब छिड़काव में इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है तब उसका साइकिल की तरह उपयोग किया जा सकता है। साइकिल को लगा कर स्पेयर की कीमत है 2200 रूपए।

तकरीबन 400 बुलेट सांटी बेच चुके मनसुखभाई कहते हैं “इस काम के लिए मुझे हर किसी से प्रशंसा मिली। इससे मुझे आगे और काम करने की प्रेरणा मिली। बुलेट सांटी से मुझे नया व्यापार मिला जिससे मुझे अच्छी आय हुई।”

पॉली हाउस में खेती ने बदली किसान की किस्मत जमीन अब उगल रही है सोना

कभी-कभी मौसम की बेरूखी और बढती लागत के चलते किसानों का खेती के प्रति कम होते मोह के बीच अत्याधुनिक पॉली हाऊस तकनीक से की जा खेती किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है। यही नहीं,आर्थिक रुप से बेहाल किसानों के लिए यह एक आशा की एक नई किरण के रूप में देखी जा रही है ।

उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के बख्तियारपुरा निवासी किसान सुरेश चन्द्र यादव ने एक एकड़ में पॉली हाउस तैयार कर नई तकनीक के जरिए मल्टी स्टार खीरा पैदा कर क्षेत्र में एक बड़े उत्पादक के रूप में अपनी पहचान बनाई है। श्री यादव इटावा के अलावा दिल्ली, पंजाब, हरियाणा में प्रतिदिन पांच से छह कुंतल खीरा भेजकर दस हजार रुपए से अधिक कमा रहे हैं । उनका कहना है यह खीरा नहीं उसके लिए हीरा बन गया है ।

सुरेश का कहना है कि उसके इस प्रयास को केन्द्र सरकार के राष्ट्रीय बागवानी मिशन से भरपूर सहयोग मिला । उसने पंजाब के एक पाली हाउस प्रोजेक्ट में बतौर मजदूर इस तकनीक को देखा और उसी समय तय कर लिया कि वह अपने जिले में पॉली हाउस तकनीक अपनायेगा।

सुरेश इटावा के किसानों के लिए एक मिसाल बन गया हैं। उसने बताया कि एक एकड़ जमीन पर उसने 42 लाख रुपए खर्च करके पाली हाउस लगवाया। सरकार से उसे 21 लाख रुपए सब्सिडी के रुप में मिल चुकी है। अब वह अन्य किसानों को भी इस तकनीकी के जरिए खेती के नए प्रयोग सिखा रहा हैं।

सुरेश ने गत वर्ष जून में पॉली हाउस प्रोजेक्ट के लिए आवेदन किया था। जिसके बाद उन्होंने अपनी जमीन पर इसके लिए महाराष्ट्र की एक कम्पनी से सम्पर्क किया था। दिसम्बर में तैयार हुए पाली हाउस में दस हजार मल्टी स्टार खीरा का बीज रोपा था। मल्टी स्टार खीरा के इन बीजों ने जनवरी में ही पांच फुट ऊंची बेल की शक्ल ले ली और फरवरी में अब तक वह दस कुंतल से अधिक खीरे को बाजार भाव पर बेच चुका हैं।

उसने बताया कि बगैर सीजन में होने वाले इस खीरे की फसल को केवल चार माह में ही फल देने लायक बनाया जा सकता है। इससे जहां उत्पादन बढ़ जाता है वहीं खीरे की गुणवत्ता भी बाजार के लिए आकर्षक होती है। पॉली हाउस का प्रयोग मुख्यता ग्रीन हाउस गैसों के प्रभाव को कम करने के लिए किया जाता है । श्री यादव का कहना है कि अशुद्ध वातावरण से दूर होने के कारण इस फसल में कीटनाशकों का प्रयोग भी नहीं किया जाता।

इसके अलावा तापमान के नियंत्रण और पेड़ों के सही विकास के लिए पूरे पॉली हाउस में तापमान नियंत्रक फोकर लगाए गए हैं। फव्वारेनुमा इस यंत्र से पाली हाउस का तापमान अधिक होने पर उसे नियंत्रित किया जा सकता है। इसके अलावा ड्रिप सिंचाई और पेड़ों की जड़ों तक यूरिया पहुंचाने के लिए भी एक व्यवस्थित पाइप यंत्र लगे हुए हैं।

सुरेश द्वारा लगाये गये इस पाली हाउस की फसलों में जहां एक बेल से 30 किलो खीरे का उत्पादन किया जाता है। वहीं गुणवत्ता के लिहाज से भी इस फसल को बेहतर माना जाता है । खेती के लिए इटावा की जलवायु वैसे तो काफी बेहतर मानी जाती है लेकिन पॉली हाउस के प्रयोग से किसान कम लागत में अधिक उत्पादन से अपनी कृषि आय को बढ़ा सकते हैं। फिलहाल जिले में यह पहला सफल प्रयोग है और इस प्रयोग के बाद अब बड़े पैमाने पर किसान इस योजना से जुडऩा चाह रहे हैं।

इटावा के जिला उधान अधिकारी राजेंद्र कुमार शाहू का कहना है कि जिला उद्यान कार्यालय में भी इसके लिए अब तक कुल 11 आवेदन आ चुके हैं । ऐसे में उम्मीद है कि आने वाले समय में किसानों के लिए यह तकनीक जहां आय के लिहाज से कारगर सिद्ध होगी वहीं दूसरी ओर आम जनता को भी इससे पूर्णतरू कीटनाशक मुक्त फलों व सब्जियों का स्वाद मिल सकेगा। गौरतलब है कि कृषि प्रधान देश कहे जाने वाले भारत में अब केवल 18 प्रतिशत लोग ही खेती पर निर्भर हैं ।

अन्नदाता की इस दुर्दशा का मुख्य कारण तेजी से बदलता मौसम और महंगी हो रही प्राचीन कृषि पद्धति है । बदलते दौर में अत्याधुनिक तकनीक के बल पर खेती का बदला स्वरूप एक बार फिर किसानों के लिए एक नई ऊर्जा की किरण लेकर आया । पाली हाउस के जरिए ग्रीन हाउस गैसों के प्रभाव को कम करके और बिना कीटनाशकों के प्रयोग से होने वाली उन्नत खेती आज किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है ।

11वीं पास किसान ने बनाई ऐसी मशीन अब गन्ना लगाना हुआ इतना आसान

वो किसान हैं, लेकिन लोग उनको इनोवेटर के तौर पर जानते हैं, वो ज्यादा पढ़े लिखे नहीं हैं लेकिन उन्होने वो ईजाद किया जिसका फायदा आज दुनिया भर के किसान उठा रहे हैं। मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर जिले के मेख गांव में रहने वाले रोशनलाल विश्वकर्मा ने पहले नई विधि से गन्ने की खेती कर उसकी लागत को कम और उपज को बढ़ाने का काम किया, उसके बाद ऐसी मशीन को ईजाद किया जिसका इस्तेमाल गन्ने की ‘कलम’ बनाने के लिए आज देश में ही नहीं दुनिया के दूसरे देशों में किया जा रहा है।

रोशनलाल विश्वकर्मा ने ग्यारवीं क्लास तक की पढ़ाई पास ही के एक गांव से की। परिवार का पुस्तैनी धंधा खेती था। लिहाजा वो भी इसी काम में जुट गए। खेती के दौरान उन्होने देखा कि गन्ने की खेती में ज्यादा मुनाफा है। लेकिन तब किसानों को गन्ना लगाने में काफी लागत आती थी इसलिए बड़े किसान ही अपने खेतों में गन्ने की फसल उगाते थे। तब रोशनलाल ने ठाना कि वो भी अपने दो-तीन एकड़ खेत में गन्ने की खेती करेंगे इसके लिए उन्होने नये तरीके से गन्ना लगाने का फैसला लिया।

रोशनलाल का कहना है कि “मेरे मन में ख्याल आया कि जैसे खेत में आलू लगाते हैं तो क्यों ना वैसे ही गन्ने के टुकड़े लगा कर देखा जाए।” उनकी ये तरकीब काम आ गई और ऐसा उन्होने लगातार 1-2 साल किया। जिसके काफी अच्छे परिणाम सामने आए।

इस तरह उन्होने कम लागत में ना सिर्फ गन्ने की कलम को तैयार किया बल्कि गन्ने की पैदावार आम उपज के मुकाबले 20 प्रतिशत तक ज्यादा हुई। इतना ही नहीं अब तक 1 एकड़ खेत में 35 से 40 क्विंटल गन्ना रोपना पड़ता था और इसके लिए किसान को 10 से 12 हजार रुपये तक खर्च करने पड़ते थे। ऐसे में छोटा किसान गन्ना नहीं लगा पाता था। लेकिन रोशनलाल की नई तरकीब से 1 एकड़ खेत में केवल 3 से 4 क्विंटल गन्ने की कलम लगाकर अच्छी फसल हासिल होने लगी।

इस तरह ना सिर्फ छोटे किसान भी गन्ना लगा सकते थे बल्कि उसके कई दूसरे फायदे भी नजर आने लगे। जैसे किसान का ट्रांसपोर्टेशन का खर्चा काफी कम हो गया था क्योंकि अब 35 से 40 क्विंटल गन्ना खेत तक ट्रैक्टर ट्रॉली में लाने ले जाने का खर्चा बच गया था। इसके अलावा गन्ने का बीज उपचार भी आसान और सस्ता हो गया था। धीरे धीरे आसपास के लोग भी इसी विधि से गन्ना लगाने लगे। जिसके बाद अब दूसरे राज्यों में भी इस विधि से गन्ना लगाया जा रहा है।

रोशनलाल यहीं नहीं रूके उन्होने देखा कि हाथ से गन्ने की कलम बनाने का काम काफी मुश्किल है इसलिए उन्होने ऐसी मशीन के बारे में सोचा जिससे ये काम सरल हो जाए। इसके लिए उन्होने कृषि विशेषज्ञों और कृषि विज्ञान केंद्र की सलाह भी ली। ये खुद ही लोकल वर्कशॉप और टूल फैक्ट्रीज में जाते और मशीन बनाने के लिए जानकारियां इकट्ठा करने लगे। आखिरकार वो ‘शुगरकेन बड चिपर’ मशीन ईजाद करने में सफल हुए। सबसे पहले उन्होने हाथ से चलाने वाली मशीन को विकसित किया।

जिसका वजन केवल साढ़े तीन किलोग्राम के आसपास है और इससे एक घंटे में 3सौ से 4सौ गन्ने की कलम बनाई जा सकती हैं। धीरे धीरे इस मशीन में भी सुधार आता गया और इन्होने हाथ की जगह पैर से चलने वाली मशीन बनानी शुरू की। जो एक घंटे में 8सौ गन्ने की कलम बना सकती है।

आज उनकी बनाई मशीनें मध्यप्रदेश में तो बिक ही रही है इसके अलावा ये महाराष्ट्र, यूपी, उड़ीसा, कर्नाटक, हरियाणा और दूसरे कई राज्यों में भी बिक रही है। उनकी मशीन की डिमांड ना सिर्फ देश में बल्कि अफ्रीका के कई देशों में भी खूब है। आज रोशनलाल की बनाई मशीन के विभिन्न मॉडल 15 सौ रुपये से शुरू होते हैं।

इधर रोशनलाल की बनाई मशीन किसानों के बीच हिट साबित हो रही थी तो दूसरी ओर कई शुगर फैक्ट्री और बड़े फॉर्म हाउस भी उनसे बिजली से चलने वाली मशीन बनाने की मांग करने लगे। जिसके बाद उन्होने बिजली से चलने वाली मशीन बनाई जो एक घंटे में दो हजार से ज्यादा गन्ने की कलम बना सकती है। अब इस मशीन का इस्तेमाल गन्ने की नर्सरी बनाने में होने लगा है। इस कारण कई लोगों को रोजगार भी मिलने लगा है।

धुन के पक्के रोशनलाल यहीं नहीं रूके अब उन्होने ऐसी मशीन को विकसित किया है जिसके इस्तेमाल से आसानी से गन्ने की रोपाई भी की जा सकती है। इस मशीन को ट्रेक्टर के साथ जोड़कर 2-3 घंटे में एक एकड़ खेत में गन्ने की रोपाई की जा सकती है।

जहां पहले इस काम के लिए ना सिर्फ काफी वक्त लगता था बल्कि काफी संख्या में मजदूरों की जरूरत भी पड़ती थी। ये मशीन निश्चित दूरी और गहराई पर गन्ने की रोपाई का काम करती है। इसके अलावा खाद भी इसी मशीन के जरिये खेत तक पहुंच जाती है।

रोशनलाल ने इस मशीन की कीमत 1लाख 20 हजार रुपये तय की है जिसके बाद बाद विभिन्न कृषि विज्ञान केंद्र और शुगर मिल ने इस मशीन को खरीदने में दिलचस्पी दिखाई है। साथ ही उन्होने इस मशीन के पेटेंट के लिए आवेदन किया हुआ है।

अपनी उपलब्धियों के बदौलत रोशनलाल ना सिर्फ विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके हैं बल्कि खेती के क्षेत्र में बढिया खोज के लिए उनको राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका है।

धान उत्पादन के लिए श्री पद्धति का करें प्रयोग, 300 प्रतिशत तक ज्यादा होगा उत्पादन

मेडागास्कर विधि धान उत्पादन की एक तकनीक है जिसके द्वारा पानी के बहुत कम प्रयोग से भी धान का बहुत अच्छा उत्पादन सम्भव होता है। इसे सघन धान प्रनाली (System of Rice Intensification-SRI या श्री पद्धति) के नाम से भी जाना जाता है।

जहां पारंपरिक तकनीक में धान के पौधों को पानी से लबालब भरे खेतों में उगाया जाता है, वहीं मेडागास्कर तकनीक में पौधों की जड़ों में नमी बरकरार रखना ही पर्याप्त होता है, लेकिन सिंचाई के पुख्ता इंतजाम जरूरी हैं, ताकि जरूरत पड़ने पर फसल की सिंचाई की जा सके। सामान्यत: जमीन पर दरारें उभरने पर ही दोबारा सिंचाई करनी होती है।

इस तकनीक से धान की खेती में जहां भूमि, श्रम, पूंजी और पानी कम लगता है, वहीं उत्पादन 300 प्रतिशत तक ज्यादा मिलता है। इस पद्धति में प्रचलित किस्मों का ही उपयोग कर उत्पादकता बढाई जा सकती है।

खेत की तैयारी

सर्व प्रथम हमे अपने खेत को अच्छी तरह तैयार कर लेना चाहिये इसके लिए खेत की तीन से चार बार अच्छी तरह जुताई करके उसमें 100 से 120 कुनतल गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर की दर डालते है।

धान के पौध की नर्सरी तैयार करना इसके लिए आवश्यक भू की दो से तीन बार सिचाई करके नर्सरी वाले भू भाग की गर्मी निकाल देते है। तथा खेत में सडी हुई गोबर की खाद डाल कर अच्छी तरह मिअ्टी में मिला देते है। फिर दो गुणे एक मीटर की बीज सैया सीड बेड 20 सेन्टी मीटर ऊची मेंढ के साथ तैयार कर लेते है।

इसके उपरान्त उस भू भाग पर पहले से गौ मूत्र गुड व कार्बोन्डाजिम से उपचारित व 36 घंण्टे भीगोये हुए अंकुरित बीज को पहले से नमी युक्त भू भाग पर बराबर बुआई कर देते है। इसके बाद उस बीज को ढकने के लिए 5 सेन्टीमीटर मोटी अच्छी तरह से सडी हुई गोबर की खाद ऊपर से श्राूर-भूरा देते है। क्योकि श्री विधि में 12 से 15 दिन के पौध की आवश्यकता पडती है।

इस प्रकार धान की नर्सरी तैयार करने पर पौध की जड उखडने व क्षतिग्ररूत होने का खतरा नही रहता। नर्सरी वाले खेत में ऊपर से हल्की-हल्की सिचाई करते रहना चाहिये। श्री विधि से धान की फसल हेतु 6 से 7 किलोगाम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से आवश्यकता पडती है। जो सामान्य विधि की लगभग आधी रहती है।

पौध की रोपाई के लिए खेत तैयार करना

इसके लिए खेत में पानी लगाकर डीएपी खाद व क्लोरो पायरिफास कीट नाशक दवा डाल कर अच्छी तरह पलेवा या मडाई करते है। अब खेत में 20 गुणे 20 सेन्टी मीटर के दूरी पर 12 से 15 दिन के आयु वाले पौध की रोपाई करते है।

धान की रोपाई के एक सप्ताह बाद से खेत में 3 सेन्टी मीटर पानी की नमी सत्त या लगातार बनाये रखते है। तथा प्रत्तेक दो सिचाई के बाद कोनोबिडर मिट्टी पलटने वाला हल द्ध से पौधो के लाइनो के बीच खाली स्थान पर चलाकर मिट्टी पलटते रहते है। खाद एंव उर्वरक श्री विधि से धान की फसल में खाद सामान्य विधि की अपेक्षा आधी खाद प्रत्तेक बार डालते है।

क्योकि खाद पानी में घुल कर पौधो की ज डमें पहुंचने के बाद नीचे चली जाती है। जो पौधो के लिए अप्राप्य व बेकार हो जाती है। इसके लिए खाद को आधी मात्रा में बार-बार डालते रहना चाहिये जिससे पौधो की जड तक खाद लगातार पहुंचती रहे।

जिससे पौधे दूगने रफ्तार से बृद्धि कर सके। कोनोबिडर से मिट्टी पलटते रहने पर पौधौ की जडो में वायु संचार बना रहता है। तथा कल्ले सामान्य विधि की अपेक्षा तीन गुना अधिक निकलते है। जो हमें लगभग 80 प्रतिशत तक अधिक उत्पादन देने में सहायक होते है।

73 वर्षीय एक बुज़ुर्ग किसान ने किया ऐसा कमाल जानकर हैरान रह जायंगे आप

छत्तीसगढ़ के 73 वर्षीय एक बुज़ुर्ग को खेती करने का शौक तो था लेकिन उनके पास खेती करने के लिए जमीन नहीं थी। सन 2004 में एफसीआई से रिटायर होने के बाद उस शख्स को खेती करना था लेकिन रिटायरमेंट से मिले पैसे इतने ज्यादा नहीं थे कि खेत खरीद सकें।

खेती के लिए ज़मीन तो नहीं थी, लेकिन खेती करने का जज़्बा तो उस बुर्जुग में कूट कूट कर भरा था। लिहाज़ा उन्होंने बड़ी योजनाबद्ध तरीके से उम्र के आखिरी पड़ाव पर भी एक जोखिम लेने का साहस लिया। उनका प्रयोग काम कर गया।

उन्होंने अपने घर की छत को ही खेत बना लिया। रायपुर से 45 किलोमीटर दूर महासमुंद में भागीरथी बिसई नाम के इस शख़्स ने अपने घर की छत पर ही धान की खेती कर के वैज्ञानिकों के तमाम दावों को चुनौती देकर हैरान कर दिया।

खेती करने के लिए उनके पास एक छत थी, ऐसे में सबसे पहले छत पर रेत और सीमेंट की ढलाई कराई, फ़िर लोहे की सरिया के साथ बांस की लकड़ी लगवाई, ताकि छत को नुकसान न पहुंचे।

रिटायरमेंट के बाद पहले घर की 100 वर्ग फुट छत पर धान बोया और ठीक ठाक तरीके से खेती कर उत्पादन भी लिया। प्रयोग सफल रहा। फिर घर को दो मंजिला किया। तीन हजार वर्गफीट की छत पर छह इंच मिट्‌टी की परत बिछाई। छत को मजबूती देने के लिए देशी नुस्खा अपनाया।

आशंका थी कि पानी छत के ढलाई के बेस तक पहुंचेगा। लोहे में जंग लग जाएगी। सीलन और जंग की वजह से छत गिर जाएगी। इसलिए लोहे की सरिया के साथ बांस की लकड़ी लगवाई। बांस जल्दी नहीं सड़ता है। नुस्खा काम कर गया।

भागीरथी दो क्विंटल धान की पैदावार ले रहे हैं। सब्जी और पेड़-पौधे की नर्सरी भी तैयार कर रहे हैं। पत्नी और बेटा भी भागीरथी की मदद करते हैं। वे कहते हैं कि हम सब मिलकर परिवार की जरूरत पूरी कर लेते हैं।

भारत में भले ही इस तरह का पहला प्रयोग हो, लेकिन हमारे पड़ोसी देश चीन में इस तरह का प्रयोग हो चुका है और वो सफ़ल भी रहा है।

बाबा रामदेव अब बैलों की मदद से बनाएंगे “पतंजलि” बिजली

देश में तेजी से बढ़ रही बाबा रामदेव और उनके सहयोगी आचार्य बालकृष्ण की कंज्यूमर गुड्स कंपनी पतंजलि रिन्यूएबल एनर्जी के एक अनूठे रूप: ‘बुल पावर’ पर काम कर रही है। बैल की खींचने की ताकत की मदद से इलेक्ट्रिसिटी जेनरेट करने के आइडिया पर डेढ़ वर्ष से अधिक की रिसर्च में कुछ शुरुआती सफलता मिली है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पशुओं को बूचड़खाने न भेजा जाए।

यह प्रयोग पतंजलि के मैनेजिंग डायरेक्टर और बड़े शेयरहोल्डर बालकृष्ण की पहल पर शुरू किया गया था। इसमें देश की एक प्रमुख मल्टीनैशनल ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर और एक तुर्की की कंपनी भी शामिल है।

इसका एक प्रोटोटाइप डिजाइन किया गया है और अधिक इलेक्ट्रिसिटी जेनरेट करने के लिए इसमें बदलाव किया जा रहा है। इस रिसर्च प्रॉजेक्ट की जानकारी रखने वालों ने बताया कि अभी तक एक टर्बाइन वाले इस डिजाइन से लगभग 2.5 किलोवॉट पावर मिल सकी है।

बालकृष्ण ने बताया, ‘ऐसे समय में जब बड़ी संख्या में बैलों को काटा जा रहा है, तो हम यह धारणा बदलना चाहते हैं कि बैल बहुत कीमती नहीं होते।’ उन्होंने इस बात को सही बताया कि पतंजलि हरिद्वार के अपने मुख्यालय में इस पर रिसर्च कर रही है।

उनका कहना था, ‘बैलों का सुबह खेतों में और शाम को इलेक्ट्रिसिटी जेनरेशन के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। प्राचीन समय में बैलों का इस्तेमाल हथियार ले जाने में किया जाता था। अगर टेक्नॉलजी की मदद से उनकी ताकत का अधिकतम इस्तेमाल किया जाए तो वे काफी उपयोगी हो सकते हैं।’

बालकृष्ण ने बताया कि इस कदम का मकसद उन गरीबों की सहायता करना भी है जो इलेक्ट्रिसिटी पर खर्च नहीं कर सकते। उन्होंने कहा, ‘हम यह रिसर्च कर रहे हैं कि बैलों के इस्तेमाल से कैसे अधिक वॉट की पावर का उत्पादन किया जा सकता है, जिससे एक किसान इसका इस्तेमाल अपने घर में बिजली के लिए कर सके। हमें अभी तक अपनी इच्छा के मुताबिक परिणाम नहीं मिला है।’

ऐसे करें चीनी से 250 गुना ज्यादा मीठे स्टीविया की खेती

भारत में औषधीय पौधों की खेती का रकबा लगातार बढ़ता जा रहा है। मधुमेह और मोटापा आदि के उपचार में इस्तेमाल किए जाने वाले स्टीविया की खेती के लिए फरवरी-मार्च का समय सबसे उपयुक्त होता है।

स्टीविया चीनी से 250 गुना ज्यादा मीठा होता है, लेकिन इसमें कैलोरी शून्य होती है। बाज़ार में मिलने वाले रासायनिक मिठास वाले पदार्थों के ज्यादा इस्तेमाल से किडनी खराब होने को खतरा रहता है, जबकि स्टीविया के इस्तेमाल में ऐसा कोई डर नहीं है। आजकल स्टीविया की खेती का चलन तेजी से बढ़ा है। किसान इसकी खेती बड़ी मात्रा में कर रहे हैं।

स्टीविया का उपयोग आजकल चीनी की जगह खूब हो रहा है क्योंकि इसकी पत्तियां मीठी तो होती हैं, लेकिन इसमें कैलोरी की मात्रा न के बराबर होती है इसलिए इसे पारंपरिक चीनी से अच्छा माना जाता है। इन्हीं गुणों के कारण स्टीविया की खेती करने में किसान का काफी फायदा होता है।

जलवायु

स्टीविया की खेती सालभर की जा सकती है, बस इसे बरसात के मौसम में उगाने से बचना चाहिए। इसकी खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली जमीन होना आवश्यक है।

स्टीविया की किस्में

ऐसे तो स्टीविया की कई किस्में बाजार में मिल जाएंगी पर सीमैप ने स्टीविया की दो नई किस्में विकसित की हैं। इनके नाम हैं स्टीविया मीठी और स्टीविया मधु। ’ इसके अलावा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने भी स्टीविया की दो किस्में निकाली हैं जो बाजार में एमडीएस-13 और एमडीएस-14 के नाम से मिल जाती हैं।

रोपाई

स्टीविया वर्ष भर में कभी भी लगाई जा सकती है लेकिन उचित समय फरवरी-मार्च का महीना है। स्टीविया के पौधों की रोपाई मेड़ों पर की जाती है। इसके लिए 15 सेमी ऊंचाई के दो फीट चौड़े मेड़ बना लिए जाते है। उन पर कतार से कतार की दूरी 40 सेमी और पौधों में पौधे की दूरी 20-25 सेमी रखते हैं, दो मेड़ों के बीच 1.5 फीट की जगह नाली या रास्ते के रूप में छोड़ देते हैं।

खाद एवं उर्वरक

क्योंकि स्टीविया की पत्तियों का मनुष्य द्वारा सीधे उपभोग किया जाता है। इस कारण इसकी खेती में किसी भी प्रकार की रासायनिक खाद या कीटनाशी का प्रयोग नहीं करते हैं। एक एकड़ में इसकी फसल को तत्व के रूप में नाइट्रोजन ,फास्फोरस व पोटाश की मात्रा क्रमश: 110:45:45 किग्रा के अनुपात की आवश्यकता होती है। इसकी पूर्ति के लिए 70-80 कुंतल वर्मी कम्पोस्ट या 200 कुंतल सड़ी गोबर की खाद पर्याप्त रहती है।

सिंचाई

स्टीविया की फसल सूखा सहन नहीं कर पाती है। इसको लगातार पानी की आवश्यकता होती है, सर्दी के मौसम में 10 दिन के अन्तराल पर व गर्मियों में प्रति सप्ताह सिंचाई करनी चाहिए वैसे स्टीविया भी फसल में सिंचाई करने का सबसे उपयुक्त साधन िस्प्रंकुलरर्स या ड्रिप है।

खरपतवार नियंत्रण

सिंचाई के पश्चात खेत की निराई खेत की निराई-गुड़ाई करनी चाहिए जिससे भूमि भुरभुरी व खरपतवार रहित हो जाती है जो कि पौधों में वृद्धि के लिए लाभदायक होता है।

रोग एवं कीट नियंत्रण

स्टीविया की फसल में किसी भी प्रकार का रोग या कीड़ा नहीं लगता है। कभी-कभी पत्तियों पर धब्बे पड़ जाते है जो कि बोरान तत्व की कमी के लक्षण है। इसके नियंत्रण के लिए छह प्रतिशत बोरेक्स का छिड़काव किया जा सकता है। कीड़ों की रोकथाम के लिए नीम के तेल को पानी में घोलकर स्प्रे किया जा सकता है।

फूलों को तोड़ना

स्टीविया की पत्तियों में ही स्टीवियोसाइड पाये जाते हैं इसलिए पत्तों की मात्रा बढ़ायी जानी चाहिए और समय-समय पर फूलों को तोड़ देना चाहिए। अगर पौधे पर दो दिन फूल लगे रहें व उनको न तोड़ा जाए तो पत्तियों में स्टीवियोसाइड की मात्रा में 50 प्रतिशत तक की कमी हो सकती है।

फूलों की तुड़ाई, पौधों को खेत के रोपाई के 30, 45, 60, 75 और 90 दिन के पश्चात व प्रथम कटाई के समय की जानी चाहिए। फसल की पहली कटाई के पश्चात 40, 60 व 80 दिनों पर फूलों को तोड़ने की आवश्यकता होती है।

लाभ

वर्षभर में स्टीविया की तीन- चार कटाइयों में लगभग 70 कुंतल से 100 कुंतल सूखे पत्ते प्राप्त होते हैं। वैसे तो स्टीविया की पत्तियों का अन्तर्राष्ट्रीय बाजार भाव लगभग 300-400 रुपए प्रति किग्रा है लेकिन अगर स्टीविया की बिक्री दर रुपए 100 प्रति किग्रा मानी जाए तो कुल तीन वर्षों में लगभग एक एकड़ से पांच से छह लाख का शुद्ध लाभ प्राप्त किया जा सकता है।

 

किसानो की देसी जुगाड़ : देसी शराब के छिड़काव से पैदा की जा रही ज्यादा सब्जी

फसलोंकी ग्रोथ और पैदावार बढ़ाने के लिए अब किसानों ने नया तरीका ईजाद किया है। शेखावटी के किसान खेतों में कीटनाशक की बजाय देसी और अंग्रेजी शराब का छिड़काव कर रहे हैं। किसानों के अनुसार कीटनाशकों के दाम बहुत ज्यादा होने से फसलों को बचाने के लिए शराब का इस्तेमाल शुरू किया गया है।

इससे फसलों में ग्रोथ भी हो रही है और पैदावार भी बढ़ रही हैं। भास्कर ने झुंझुनूं, सीकर, चूरू जिलों के कई खेतों में पहुंचकर पांच दिन तक पड़ताल की। खेतों में किसान देसी अंग्रेजी शराब का छिड़काव करते हुए देखे गए।

इन क्षेत्रों में लहलहाती फसलों से उठती शराब की दुर्गंध से महसूस होता है कि फसलें शराब के नशे में झूम रही हैं। फल और सब्जियों पर तो आमतौर पर देशी शराब का छिड़काव किया जाता रहा है लेकिन अब फसलों पर देशी और अंग्रेजी शराब बहाई जा रही है।

कृषि विशेषज्ञ इस तरह के किसी भी साइंटिफिक रिसर्च से इनकार करते हैं लेकिन किसानों का तर्क है कि शराब फसल और सब्जियों के लिए महंगे कीटनाशकों से ज्यादा उपयोगी है।

पैदावार ज्यादा, कीट का डर नहीं

किसानोंका मानना है कि देशी और अंग्रेजी शराब के इस्तेमाल के बाद उनकी पैदावार में इजाफा हुआ है। झुंझुनूं जिले के भड़ौन्दा खुद गांव के किसान प्रदीप झाझड़िया का कहना है कि हम पिछले तीन साल से चने की खेती में कीटनाशक की जगह शराब का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसके कारण पैदावार में इजाफा हुआ है।

सीकर जिले के धर्मशाला गांव के किसान श्रवण कुमार के मुताबिक शराब के छिड़काव से तीसरे ही दिन सब्जियों के पौधों से पीलापन दूर होने लगता है उनकी ग्रोथ भी बड़ती है। कीट और अन्य बैक्टीरिया खत्म हो जाते हैं। फल बनने से पहले फूल सूखने की समस्या भी समाप्त हो जाती है। नए फूल और फल लगने लगते हैं।

आधा बीघा में काफी है 30 एमएल

किसानोंका तर्क है कि आधा बीघा खेत में 25-30 एमएल शराब काफी है। अधिकांश किसान 11 लीटर और 16 लीटर की स्प्रे मशीन में 100 एमएल तक देसी और अंग्रेजी शराब मिलाकर छिड़काव करते हैं। कई किसान प्रति बीघा करीब 150-200 एमएल शराब का इस्तेमाल करते हैं।

खेती में शराब के इस्तेमाल से शेखावाटी में इसकी खपत बढ़ गई है। भास्कर टीम ने 30 से ज्यादा शराब व्यवसायियों से बात की। इनका कहना था कि खेतों में किए जा रहे छिड़काव के बाद शराब की खपत बढ़ गई है।

इसलिए अपनाया जा रहा है यह तरीका

चनेकी फसल के लिए बाजार में कीटनाशक 500 से लेकर 7000 रुपए लीटर में बिक रहे हैं जबकि देसी शराब 80 रु. अंग्रेजी शराब 200 रु. लीटर में मिल जाती है। कीटनाशक माइक्रोन्यूट्रेंट (लिक्विड) 2000 रु. लीटर इममसीन बेनजॉएट 7000 रु. लीटर है। कमजोर फसल की ग्रोथ के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दवाई ‘मोनो’ एक एकड़ के लिए करीब 360 रुपए की आती है।