मोती की खेती से महज 2 लाख की इंन्‍वेस्‍ट से हर महीने होगी 1 लाख रुपए से अधिक की कमाई

बहुत से उद्योगों में मोती की खेती भी एक बढ़िया और कम पैसे लगा के शुरू करने वाला उद्योग है । अगर आप छोटे से इन्‍वेस्‍टमेंट से लाखों कमाना चाहते हैं तो आपके लिए मोती की खेती एक बेहतर विकल्‍प हो सकती है।

मोती की मांग इन दिनों घरेलू और अंतर्राष्‍ट्रीय बाजार में काफी अधिक है, इसलिए इसके अच्‍छे दाम भी मिल रहे हैं। आप महज 2 लाख रुपए के इंन्‍वेस्‍ट से इससे करीब डेढ़ साल में 20 लाख रुपए यानी हर महीने 1 लाख रुपए  से अधिक की कमाई कर सकते हैं।

कैसे करते हैं मोती की खेती

मोती की खेती के लिए सबसे अनुकूल मौसम शरद ऋतु यानी अक्टूबर से दिसंबर तक का समय माना जाता है। कम से कम 10 गुणा 10 फीट या बड़े आकार के तालाब में मोतियों की खेती की जा सकती है। मोती संवर्धन के लिए 0.4 हेक्टेयर जैसे छोटे तालाब में अधिकतम 25000 सीप से मोती उत्पादन किया जा सकता है।

खेती शुरू करने के लिए किसान को पहले तालाब, नदी आदि से सीपों को इकट्ठा करना होता है या फिर इन्हे खरीदा भी जा सकता है।इसके लिए स्‍ट्रक्‍चर सेटअप पर खर्च होंगे 10 से 12 हजार रुपए, वाटर ट्रीटमेंट पर 1000 रुपए और 1000 रुपए के आपको इंस्‍ट्रयूमेंट्स खरीदने होंगे।

इसके बाद प्रत्येक सीप में छोटी-सी शल्य क्रिया के बाद इसके भीतर चार से छह मिमी व्यास वाले साधारण या डिजायनदार बीड जैसे गणेश, बुद्ध, पुष्प आकृति आदि डाले जाते हैं। फिर सीप को बंद किया जाता है। इन सीपों को नायलॉन बैग में 10 दिनों तक एंटी-बायोटिक और प्राकृतिक चारे पर रखा जाता है। रोजाना इनका निरीक्षण किया जाता है और मृत सीपों को हटा लिया जाता है।

अब इन सीपों को तालाबों में डाल दिया जाता है। इसके लिए इन्हें नायलॉन बैगों में रखकर (दो सीप प्रति बैग) बांस या बोतल के सहारे लटका दिया जाता है और तालाब में एक मीटर की गहराई पर छोड़ दिया जाता है।

प्रति हेक्टेयर 20 हजार से 30 हजार सीप की दर से इनका पालन किया जा सकता है। अन्दर से निकलने वाला पदार्थ बीड के चारों ओर जमने लगता है जो अन्त में मोती का रूप लेता है। लगभग 8-10 माह बाद सीप को चीर कर मोती निकाल लिया जाता है।

कम लागत में ज्यादा मुनाफा

एक सीप लगभग 20 से 30 रुपए की आती है। बाजार में एक मिमी से 20 मिमी सीप के मोती का दाम करीब 300 रूपये से लेकर 1500 रूपये होता है। आजकल डिजायनर मोतियों को खासा पसन्द किया जा रहा है जिनकी बाजार में अच्छी कीमत मिलती है। भारतीय बाजार की अपेक्षा विदेशी बाजार में मोतियों का निर्यात कर काफी अच्छा पैसा कमाया जा सकता है। सीप से मोती निकाल लेने के बाद सीप को भी बाजार में बेंचा जा सकता है।

सीप द्वारा कई सजावटी सामान तैयार किये जाते है। सीपों से कन्नौज में इत्र का तेल निकालने का काम भी बड़े पैमाने पर किया जाता है। जिससे सीप को भी स्थानीय बाजार में तत्काल बेचा जा सकता है। सीपों से नदीं और तालाबों के जल का शुद्धिकरण भी होता रहता है जिससे जल प्रदूषण की समस्या से काफी हद तक निपटा जा सकता है।

कहां ले सकते हैं प्रशिक्षण

सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ फ्रेश वॉटर एक्वाकल्चर, भुवनेश्वर (ओड़ीसा) में मोती की खेती का प्रशिक्षण दिया जाता है। यह संस्थान ग्रामीण नवयुवकों, किसानों एवं छात्र-छात्राओँ को मोती उत्पादन पर तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान करता है। किसान हेल्प भी किसानों और छात्र-छात्राओँ को मोती उत्पादन पर तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान करता है। ये संस्था हापुड़ में प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रही है।

चित्रकूट जिले के कृषि विज्ञान केन्द्र, गनिवां में भी मोती की खेती का प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाया जा रहा है। कृषि विज्ञान केन्द्र के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. नरेन्द्र सिंह बताते हैं, “ग्रामीण नवयुवक, किसान इसका प्रशिक्षण ले सकते हैं। हमने यहां पर सीपी पालन शुरु भी कर दिया है।”

गूंद कतीरा लेप से आधी सिंचाई में ही पक गया धान

खाद-लागत में पक गया धान, कोई अजूबा नहीं, परंतु सच्चाई है। जो संभव हुआ डॉ. वीरेंद्र सिंह लाठर, प्रधान वैज्ञानिक भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान,क्षेत्रीय स्टेशन करनाल द्वारा विकसित हर्बल हाइड्रोजेल गूंद कतीरा लेप बीज तकनीक को सीधी बिजाई धान में अपनाने से। यह सेक्टर -2 शहर करनाल में पांच एकड़ और हरियाणा पंजाब में सैकड़ों एकड़ खेतों पर तैयार की गई है।

तकनीक से धान की फसल सिर्फ 5-6 सिंचाई, 50 किलो डीएपी और 60-70 किलो यूरिया प्रति एकड़ से तैयार हो गई और अब तक सिर्फ 6000 रुपए प्रति एकड़ की लागत आई है। जबकि परंपरागत रोपाई धान पद्धति में 20-25 सिंचाई की जरूरत होती है और रोपाई तक की लागत ही 6000 रुपए प्रति एकड़ से ज्यादा हो जाती है और इतनी ही लागत रोपाई के बाद भी करनी पड़ती है।

नई तकनीक में रोपाई के लिए मजदूरों पर निर्भरता से किसानों को राहत मिलती है। क्योंकि धान की सीधी बिजाई, गेहूं दूसरी फसलों की तरह, खेत में पलेवा कर के बीज ड्रिल से की जाती है। उससे भी बड़ा फायदा, नयी तकनीक धान ग्रीन हाउस गैस (मीथेन वगैरह) पर्यावरण में कम छोड़ कर, पर्यावरण संरक्षण में भी बड़ा फायदा करती है। किसानों को इस तकनीक को अपनाना चाहिए, इससे काफी हद तक पानी की बचत की जा सकती है।

मशीन से मिलाकर सुखाएं: नईबीज लेपित तकनीक के उपयोग में आने वाली सारी सामग्री (गूंद-कतीरा, गुड़, कीकर-बबूल की गूंद) इंसानों के खाद्य पदार्थ है जो गावो, शहरों की दुकानों पर सस्ते भाव (250 रुपए प्रति किलो) में आसानी से मिल जाते हैं।

नई बीज तकनीक हर्बल हाइड्रोजल पर आधारित है जिसमे गूंद कतीरा लेपित बीज की बिजाई की जाती है जिससे सभी फसलों के पौधों जड़ें में जल्दी सूखा नहीं आता और सिंचाई की जरूरत कम रह जाती है फसलोंमें खरपतवार अन्य बीमारियां-कीड़े भी कम आते हैं और यह संभव हुआ,

पहली सिचाई देर से लगने लगाने पर, जो खरीफ फसलों(धान वगैरह) में बिजाई के 15-20 दिनों रबी फसलों (गेहूं वगैरह) में 40-50 दिनों की बाद की जाती है और बिजाई के तुरंत बाद एक लीटर प्रति एकड़ की दर से पेंडामेथलींन / स्टोम्प 200 लीटर पानी में छिड़काव करने के कारण से, सीधी बिजाई धान में बिजाई के बाद की सिंचाई 12-15 दिनों के अंतर पर और वर्षा गीला-सूखा चक्कर के आधार पर करनी होती है।

नई तकनीक मे 50 किलो बीज के लिए, एक लीटर उबलते पानी मे 250 ग्राम गुड़ और 100 ग्राम बबूल की गोंद डाल कर, एक तार की चासनी बनाये।

फिर इस चासनी को ठंडा छान कर, बीजों पर छिड़क कर हाथ से बीजों को चिपचिपा बनाएं।

तब चिपचिपे बीजों पर 10 प्रतिशत(10 किलो बीज पर एक किलो गूंद कतीरे पाउडर-चूरा ग्रेड/पशुओं वाला) छिड़क कर हाथ घुमाने वाली

चावल और मछली की एक साथ खेती से आप ले सकते है दोगुना लाभ

खेत में चावल और मछलियों का पालन एक साथ करें – ये सुनकर पहले तो आप भरोसा नहीं करेंगे। फिर जब भरोसा करेंगे तो मन में सवाल जरूर आएगा कि कैसे होता है ये, क्या है फायदा और कैसे मछलियां के पालन से चावल की फसल की लागत कम हो जाती है, जबकि उत्पादन कम नहीं होता।

भारत के पूर्वी राज्यों में साल 2010 के बाद धान के खेत से मुनाफा बढ़ाने के लिए एक नई तकनीक अपनाने की शुरूआत हुई थी वो है धान के खेत में मछली पालना। लेकिन ये तकनीक किसानों के बीच अभी ज्यादा मशहूर नहीं हो पाई है।

खेती की ये तकनीक कोई बहुत कठिन नहीं, करना बस इतना होता है कि धान के पानी भरे खेत में जल्दी बढ़ने वाली मछलियों के बीज डाल देने होते हैं। इससे धान की फसल के साथ ही मछलियां भी बाज़ार में बेचने को तैयार हो जाती हैं, यानि दोहरा मुनाफा।

देश के लगभग 04 करोड़ दस लाख हेक्टेयर ज़मीन पर धान की खेती होती है, लेकिन इसमें से धान के साथ मछली उत्पादन करने वाली तकनीक से एक लाख हेक्टेयर से भी कम हिस्सा ही प्रभावित हो पाया है। कारण यह है कि किसान इस विदेशी तकनीक को अच्छी तरह समझ नहीं पाते।

दरअसल इस तकनीक की शुरुआत चीन, फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे धान उत्पादक बड़े राज्यों से हुई थी। इन देशों के किसानों ने वैज्ञानिकों द्वारा सुझाई गई इस तकनीक को हाथों हाथ लिया।

किसानों को चावल और मछली पालन के फायदे-

  • चावल-मछली की खेती से किसान मुख्य फसल के साथ-साथ अतिरिक्त आमदनी प्राप्त कर सकता है
  • धान(चावल) को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़े को चावल-मछली की खेती नियंत्रित करता है
  • चावल-मछली की खेती फसल के फेल हो जाने के खतरे को कम करता है
  • चावल-मछली की खेती घास-फूस पर रोक लगाने में उपयोगी
  • चावल-मछली की खेती चावल की उपज को बढ़ाती है क्योंकि मछलियां मिट्टी के पोषक तत्वों को जगा देती हैं जो चावल की खेती के लिए सहायक होती है।

किसानों को चावल और मछली पालन के नुकसान-

  • चावल और मछली की खेती में नियंत्रित तरीके से कीटनाशक के इस्तेमाल की आवश्यकता होती है
  • सिर्फ धान(चावल) की खेती के मुलाबले इस एकीकृत चावल और मछली वाली व्यवस्था में ज्यादा पानी की जरूरत पड़ती है
  • इस व्यवस्था में चावल की पैदावार कम होती है क्योंकि जरूरी धान की फसल से करीब 45 सेमी नीचे क्यारियां(ट्रेन्चेज) बनाने की जरूरत पड़ती है, जिसकी वजह से धान की उपज का क्षेत्र कम हो जाता है, जिससे कम पैदावार होती है। क्यारियों की खुदाई की वजह से पानी को निकालने में परेशानी होती है।
  • सिर्फ चावल की खेती के मुकाबले धान के खेतों में मछली उत्पादन के कार्य के लिए ज्यादा निवेश की जरूरत पड़ सकती है।
  • सिर्फ धान की खेती के मुकाबले चावल और मछली की खेती में ज्यादा श्रम की आवश्यकता होती है।

चावल और मछली की खेती के लिए उपयुक्त जगह कौन सी है

  • धान के खेत में चावल और मछली की खेती के लिए जगह का चुनाव बेहद अहम भूमिका निभाता है।आप हर जगह पर इसकी खेती नहीं कर सकते
  • करीब 70 से 80 सेमी की बारिश की जरूरत होती है जो इस तरह की एकीकृत व्यवस्था के लिए आदर्श होता है।
  • चावल और मछली की खेती में उच्च पानी की वहन क्षमता और एक समान क्षेत्र वाली मिट्टी को प्रमुखता दी जाती है।
  • एकीकृत फसल व्यवस्था के लिए जगह के चुनाव में अच्छी पानी निकासी की व्यवस्था भी प्रमुख तत्वों में से एक है जिस पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
  • जगह का चुनाव बाढ़ प्रभावित इलाके से हटकर होना चाहिए नहीं तो यहां की मछलियां निकल कर भाग सकती हैं।
  • एकीकृत चावल और मछली उत्पादन के लिये मछली का उपयुक्त प्रकार कौन सा है –

धान की तैयारी, चावल और मछली की खेती का प्रबंधन-

अगर आप धान की खेती के साथ मछली उत्पादन करना चाहते हैं तो पारंपरिक चावल के खेत में कुछ बदलाव करने होंगे, जैसे कि अच्छा मछली आश्रय और कटाई के क्षेत्र में बदलाव करने होंगे। इस तरह के धान के खेत के लिए गहरी खाइयां(ट्रेंचेज), नहर या हौज की जरूरत होती है। चावल के खेत में ये गहरी खाइयां अच्छी और सफल चावल-मछली खेती के लिए अच्छे मौके देती है। ज

ब पानी का स्तर कम हो, गलियारा में भोजन की तलाश, मछली इकट्ठा करने के आसान उपाय जब चावल के खेत सूखे हैं, ऐसे में यह सब काफी मददगार साबित होता है। जब बात चावल की प्रजाति की बात आती है तो धान और मछली की खेती में गहरी पानी की किस्म (प्रकार) सबसे बेहतर होता है।

गहरी खाइयां को 0.5 मीटर गहरा और कम से कम एक मीटर चौड़ा बनाया जाना चाहिए। इस बात को सुनिश्चित किया जाना चाहिए की गहरी खाइयां धान के पौधे से 10 मीटर के दायरे में हो। चावल की अच्छी पैदावार के लिए इस बात को सुनिश्चित करें कि गहरी खाइयां धान के क्षेत्र से 10 फीसदी से ज्यादा ना हो।

मछली के भंडारण के बाद 10 से 15 सेमी पानी की गहराई सुनिश्चित की जानी चाहिए ताकि मछली के जीवन को पक्का किया जा सके। चावल-मछली की खेती में दूसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि खेत का पानी विषैले तत्वों (कीटनाशक पदार्थ) से दूर रहना चाहिए।