किसान के बेटे ने बाइक के इंजन से बनाई फ्लाइंग मशीन

यदि हौंसला हो तो सपनों की उड़ान भरने के लिए पंख अपने आप लग जाते हैं. फिर उसके सामने बड़ी से बड़ी बाधा बहुत छोटी नजर आती हैं. ऐसा ही उदाहरण पेश किया है हिसार जिले के आदमपुर हल्के के गांव ढाणी मोहब्बतपुर निवासी बीटेक के छात्र कुलदीप टाक ने.

23 वर्षीय कुलदीप ने देसी जुगाड़ से उडऩे वाली अनोखी फ्लाइंग मशीन तैयार की है. ये मशीन 1 लीटर पेट्रोल में करीब 12 मिनट तक आसमान में उड़ती है. इसे पैराग्लाइडिंग फ्लाइंग मशीन या मिनी हैलीकॉप्टर का नाम दिया गया है.

कुलदीप ने 3 साल की कड़ी मेहनत के बाद पैराग्लाइडिंग फ्लाइंग मशीन को आसमान में उड़ाने में सफलता पाई है. मशीन दिखने में भले ही साधारण लगती हो, लेकिन ये उड़ान गजब की भरती है. ढाणी मोहब्बतपुर निवासी कुलदीप के पिता प्रहलाद सिंह टाक गांव में खेतीबाड़ी करते हैं. चंडीगढ़ से बीटेक की पढ़ाई पूरी करने के बाद अब कुलदीप इसी प्रोजेक्ट पर कार्य कर रहा है. फ्लाइंग मशीन को बनाने में गांव आर्यनगर निवासी सतीश कुमार का भी योगदान रहा.

टंकी फुल हो तो 1 घंटे की उड़ान

कुलदीप ने बताया कि मशीन को तैयार करने में करीब ढाई लाख रुपये का खर्च आया है. इस फ्लाइंग मशीन से किसी को खतरा नहीं है. मशीन में बाइक का 200CC इंजन लगाया गया है. इसके अलावा लकड़ी का पंखा लगा हैं, साथ ही साथ छोटे टायर लगाए हैं.

इसके ऊपर पैराग्लाइडर लगाया गया है जो उड़ान भरने और सेफ्टी के साथ लैंडिंग करवाने में सहायक है.फिलहाल इस मशीन में केवल 1 ही व्यक्ति बैठ सकता है, लेकिन कुलदीप ने दावा किया है कि कुछ ही माह में ये मशीन 2 लोगों को लेकर उड़ेगी, जिसमें सबसे पहले वो अपने पिता को बैठाएगा.

2 हजार फीट तक भरी उड़ान

यह मशीन 10 हजार फीट की ऊंचाई तक उड़ान भरने में सक्षम है. गांव चौधरीवाली से आसपास के गांवों में कुलदीप ने अब तक करीब 2 हजार फीट की ऊंचाई तक उड़ान भरी है. ये मशीन पेट्रोल से उड़ती है जिसमें 5-6 लीटर का टैंक है. पूरी फ्लाइंग मशीन में स्थानीय स्तर के सामान का प्रयोग किया गया है. यानी कुल मिलाकर इस मशीन की टंकी फुल होने के बाद आप 1 घंटे तक आसमान में उड़ सकते हैं.

पितो बोले, रातभर लगा रहता था बेटा

कुलदीप ने बताया कि उसके इस सपने को साकार करने में उसके परिवार का सबसे बड़ा योगदान है. उसके पिता प्रहलाद सिंह टाक और सहयोगी सतीश आर्यनगर ने भी उसकी मेहनत को हौसला दिया. पिता प्रहलाद सिंह खेत में रहते हैं. कुलदीप के पिता प्रहलाद सिंह टाक ने बताया कि उसका बेटा देर रात इस मशीन को बनाता रहता था.

उसके मना करने के बावजूद कुलदीप मशीन को पूरा करने में लगा रहा. करीब 6 माह पहले गोवा में पायलट की 3 माह ट्रेनिंग की थी. ट्रेनिंग पूरी होने के बाद भी कुलदीप का फ्लाइंग मशीन बनाने का जुनून कम नहीं हुआ. वहीं कुलदीप के सहयोगी सतीश आर्यनगर ने कहा कि उन्हें पूरा विश्वास था कि कुलदीप उन्हें हवा में जरूर सैर कराएगा.कुलदीप की मां कमला ने बताया कि बेटे को हवा में उड़ता देखकर बहुत खुशी हो रही है बेटे ने बड़े साल मेहनत की आखिर अब जा कर इसका फायदा मिला है.

पहले भी बनाया था एयरक्राफ्ट जो हो गया था क्षतिग्रस्त

सहयोगी सतीश ने बताया हालांकि इससे पहले भी उसने एक एयरक्राफ्ट तैयार किया था, लेकिन वो ट्रायल के दौरान पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया. इसके बावजूद भी उसने हिम्मत नहीं हारी. फिर से पैराग्लाडिंग फ्लाइंग मशीन बनाने का निर्णय लिया और आज वो इसमें कामयाब हो ही गया.

इस तकनीक से गेहूं बोने पर कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी बेमौसम बारिश

खेती में पहली बार ये सिद्ध हुआ है कि ज़ीरो टिलेज तकनीक से गेहूं की बुआई करने पर उत्पादन बढ़ जाता है। ये तरीका खासतौर पर मौसम के बदलावों और अनियमितताओं से लड़ रहे छोटे किसानों के खेती में अच्छे भविष्य के लिए एक सशक्त विकल्प हो सकता है।

ज़ीरो टिलेज तकनीक में किसान धान की कटाई के बाद बिना खेत से खरपतवार हटाए और बिना जुताई किये सीधे नई फसल के बीज बो देता है।

इस तरीके की पुष्टि हरियाणा के करनाल में 200 छोटे-मंझोले किसानों के साथ खेती के शोध के बाद की गई। इन 200 किसानों ने ज़ीरो टिलेज तकनीक से खेती करके ये पाया कि पहले पारम्परिक तकनीक के मुकाबले गेंहू की उपज औसतन 16 प्रतिशत ज़्यादा हुई। इस तकनीक का दूसरा फायदा ये पाया गया कि मौसम की अनियमितताओं के चलते दिसम्बर-फरवरी के दौरान की बेमौसम बारिश की स्थिति में भी गेहूं खराब नहीं हुए।

पारंपरिक तरीके से गेंहू की खेती किसानों के लिए एक खर्चीला व्यवसाय बन चुका है। पारम्परिक तरीके से खेती का मतलब ये हुआ कि किसान धान की फसल हटने के बाद पहले मजदूर लगाकर खरपतवार खेत से हटाएं, फिर दो-तीन पर ट्रैक्टर किराए पर लेकर पूरे खेत की जुताई करें। फिर अकेले या मजदूरों के माध्यम से छिड़काव करके बीज की बुआई होती है। इन प्रक्रियाओं के बाद एक राउंड रोटरी से फिर जुताई करनी पड़ती है।

बेमौसम बारिश से नहीं पड़ेगा गेहूं को फर्क

ज़ीरो टिलेज तकनीक से गेहूं की खेती करने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें बेमौसम बारिश से फसल बर्बाद नहीं होती। हाल के कुछ वर्षों में विश्व भर के मौसम में आ रहे बदलावों का असर भारत की खेती पर भी पड़ा है। लगातार कुछ वर्षों से जनवरी से मार्च के दौरान होने वाली बारिश से देश की रबी की फसल में काफी नुकसान देखा गया है। लेकिन नई तकनीक गेहूं की फसल बर्बाद होने का ख़तरा कम हो जाता है।

‘पारम्परिक तरीके से बोए गए गेहूं के बीज तेज़ बारिश से पानी भर जाने पर खराब हो जाते हैं,” करनाल में हुई रिसर्च के मुखिया जीतेंद्र प्रकाश आर्यल ने बताया। जीतेंद्र की रिसर्च को गेहूं पर शोध करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था सीमिट ने अपनी पत्रिका में प्रकाशित किया है।

जीतेंद्र ने बताया कि ज़ीरों टिलेज तकनीक में होता यह है कि गेहूं को बिना जुताई सीधे धान के खरपतवार के साथ एक निश्चित गहराई पर बो दिया जाता है। बुवाई में खास तरह की मशीन का इस्तेमाल होता है। धान के खरपतवार बारिश होन की स्थिति में न सिर्फ बीजों की रक्षा करते हैं बल्कि पानी तेजी से सोखकर फसल को बचाते हैं।

विश्व की बड़ी आबादी को रोज़गार देने वाले गेहूं के लिए ज़रूरी है ये नई तकनीक

भारत में लगभग तीन करोड़ हेक्टेयर में गेहूं की खेती की जाती है। एशिया महाद्वीप के दक्षिणी भाग में गेहूं करोड़ों लोगों को रोज़ाना खाना उपलब्ध कराने के लिए ज़रूरी फसल है। इस फसल पर करोड़ों किसानों की कमाई भी निर्भर है।

इतनी ज़रूरी फसल को मौसम के बदलावों से बचाने की बहुत ज़रूरत है। शोध में प्रकाशित जानकारी के अनुसार एशिया महाद्वीप के दक्षिणी हिस्से में तापमान में वृद्धि हो रही है और बेमौसम बारिश स्थिति और खराब बना रही है।

गेहूं जैसी फसल पर रात के तापमान में एक डिग्री सेल्सियस का अंतर भी उपज में 6 प्रतिशत तक प्रभाव डालता है। ऐसे में गेहूं की फसल को मौसम के बदलावों से बचाने के लिए इस तरह की नई तकनीकों को अपनाना किसानों के लिए ज़रूरी होता जा रहा है।इस मशीन की कीमत 35000 से शुरू हो जाती है यह मशीन बहुत आम है इस लिए आप इस मशीन को कहीं से भी खरीद सकते है ।

यह मशीन कैसे काम करती है उसके लिए वीडियो देखें

अब सिर्फ 7 दिन में घर पर त्यार करें पौष्टिक हाइड्रोपोनिक्स चारा

वैज्ञानिकों ने एेसा चारा उगाया है, जिसे खाकर पशु 15 से 20 फीसदी तक ज्यादा दूध देने लगेंगे। इस विधि को हाइड्रोपोनिक्स कहते हैं। इसे अपनाकर कम लागत में चारा तैयार किया जा सकता है।

पशुओं की अच्छी नस्ल होने के बाद भी उत्पादन कम रह जाता है। पशुओं के लिए उचित आहार का प्रबंधन कर उत्पादकता के साथ ही आर्थिक स्थिति में भी सुधार लाया जा सकता है। जिले में पानी की कमी के कारण हरा चारे की फसल नहीं ले पाते हैं।

हाइड्रोपोनिक्स विधि से कम पानी में हरा चारा तैयार किया जा सकता है। इस विधि में हम कम पानी में दुधारु पशुओं के लिए पौष्टिक हरा चारा तैयार करने की यह मशीन किसानों के प्रदर्शन के लिए स्थापित की है।

कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक पशुपालन डॉ.रुपेश जैन ने बताया हाइड्रोपोनिक्स विधि से मक्का, ज्वार, बाजरा से हरे चारे को तैयार किया जा सकता है। इस विधि से तैयार चारे में पौष्टिक तत्वों की मात्रा परंपरागत चारे की तुलना में ज्यादा होती है। इसमें जगह भी कम लगती है।

ऐसे बनाए हाइड्रोपोनिक्स चारा

इस विधि से हरे चारे को तैयार करने के लिए सबसे पहले मक्का, ज्वार व बाजरा के दानों को 24 घंटे के लिए पानी में भिगोकर रखा जाता है। इसके बाद जूट के बोरे में ढककर अंकुरण के लिए रखा जाता है। अंकुरण निकलने के बाद इसे हाइड्रोपोनिक्स मशीन की ट्रे (2 बाय 1.5 फीट) में बराबर मात्रा में फैलाया जाता है। चौथे से दसवें दिन तक इसमें वृद्धि होती है।

इस दौरान ट्रे में 7 दिनों तक फौव्वारा के द्वारा दिन में 8 से 10 बार सिंचाई की जाती है। दसवें दिन एक ट्रे में लगभग 10 किलो तक हरा चारा तैयार हो जाता है। चारे की हाइट भी 6 से 8 इंच तक की हो जाती है।

इस विधि से तैयार चारे को 15 से 20 किलो तक दूध देने वाले पशुओं को खिलाया जा सकता है। पशुओं को खिलाने से दूध उत्पादन में 15 से 20 प्रतिशत तक की वृद्धि के साथ ही दूध में वसा की 10 से 15 प्रतिशत बढ़ोतरी होती है।

18-20 हजार होंगे खर्च

इस विधि को अपनाने के ज्यादा रुपए भी नहीं चुकाने होंगे। 50 ट्रे वाली मशीन के लिए 18 से 20 हजार रुपए का खर्च आएगा। जिसमें 5 ट्रेे प्रतिदिन 50 किलो हरा चारा निकलेगा। इससे 5 पशुओं को आहार दिया जा सकता है।

परंपरागत तरीके से चारा तैयार करने में 25 से 30 लीटर पानी की खपत होती है। वहीं इस विधि को अपनाकर 2 से 3 लीटर प्रतिदिन पानी में ही सिंचाई हो जाएगी।

हाइड्रोपोनिक्स चारा त्यार करने की जानकारी के लिए वीडियो भी देखें

आ गया मेगा टी अब ट्रेक्टर से पांच गुना कम कीमत पर करें ट्रैक्टर के सारे काम

बहुत से किसान हर साल इस लिए खेती करना छोड़ देते है क्यूंकि उनके पास खेती करने के लिए जरूरी साधन नहीं होते । एक किसान के लिए सबसे जरूरी चीज ट्रेक्टर होता है लेकिन ट्रेक्टर महंगा होने के कारण हर किसान इसे खरीद नहीं पता ।

ऐसे किसानो के लिए किर्लोस्कर कंपनी ने मेगा टी पेश क्या है । जिसकी कीमत तो ट्रेक्टर के मुकाबले कम है लेकिन यह ट्रेक्टर वाले सारे काम कर देता है । इस मशीन से आप जुताई ,बिजाई ,निराई गुड़ाई ,भार ढोना,कीटनाशक सप्रे आदि काम कर सकते है ।जो किसानों का काम आसान बना देती है।इसकी कीमत तकरीबन 1 लाख 40 हजार है।

मशीन की जानकारी

  • मॉडल – मेगा-टी (15 HP) हैंडल स्टार्ट
  • लंबाई – 2950 mm. चौड़ाई – 950 mm. ऊंचाई – 1300 mm.
  • इंजन का वजन – 138 किलोग्राम
  • इंजन की ऑयल कैपेसटी – 3.5 लीटर
  • प्रकार- वाटर कूल्ड डीजल इंजन
  • Rated RPM – 2000
  • ब्लेडों की संख्या – 20
  • गिअर – 6 आगे, 2 रिवर्स

यह मशीन कैसे काम करता है इसके लिए वीडियो भी देखें

कहीं भी उगाएं बटन मशरूम, एक सीजन में 3 लाख तक कमाने का मौका

अगर खेतीबाड़ी के जरि‍ए अच्‍छी कमा ई करने के तरीका खोज रहे हैं तो बटन मशरूम की खेती एक अच्‍छा ऑप्‍शन हो सकता है। यह मशरूम की ही एक कि‍स्‍म होता है, मगर इसमें मि‍नरल्स और वि‍टामि‍न खूब होते हैं। इसकी खासि‍यत ये है कि‍ आप एक झोंपड़ी में भी इसकी फायदेमंद खेती कर सकते हैं। मशरूम अपने हेल्थ बेनेफि‍ट्स की वजह से लगातार पॉपुलर हो रही है। फुटकर में इसका रेट 300 से 350 रुपए कि‍लो है।

बड़े शहरों में तो यह इसी रेट में मि‍लता है। थोक का रेट इससे करीब 40% तक कम होता है। कई लोगों ने पारंपरि‍क खेती को छोड़कर मशरूम उगाना शुरू कर दि‍या है और अब अच्‍छी खासी कमाई कर रहे हैं। जैसे गोरखपुर के कि‍सान राहुल सिंह।

 उपज और मुनाफे का गणि‍त

राहुल हर साल 4 से 5 क्विंटल कंपोस्‍ट बनाकर उसपर बटन मशरूम की खेती करते हैं। इतनी कंपोस्‍ट पर करीब 2000 कि‍लो मशरूम पैदा हो जाता है। एक क्विंटल कम्पोस्ट में डेढ़ किलो बीज लगते हैं। इसकी बाजार में कीमत 200 से 250 रुपए होती है। मशरूम का थोक रेट 150 से 200 रुपए कि‍लो है।

अब 2000 कि‍लो मशरूम अगर 150 रुपए एक कि‍लो के हि‍साब से भी बि‍कती है तो करीब 3 लाख रुपए मि‍लते हैं। इसमें से 50 हजार रुपए लागत के तौर पर नि‍काल दें तो भी ढाई लाख रुपए बचते हैं, हालांकि‍ इसकी लागत 50 हजार से कम ही आती है। प्रति‍ वर्ग मीटर 10 कि‍लोग्राम मशरूम आराम से पैदा हो जाता है।

इस तरह होती है खेती

  • मशरूम अक्‍टूबर-नवंबर में लगाई जाती है और पूरी सर्दी इसका उत्‍पादन होता रहता है।
  • राहुल करीब 40 बाई 30 फुट की झोंपड़ी में खेती करते हैं। इसमें वह तीन तीन फुट चौड़ी रैक बनाकर मशरूम उगाते हैं।
  • इसके लि‍ए आपको कंपोस्‍ट तैयार करना होता है। आप इस काम के लि‍ए धान की पुआल का यूज कर सकते हैं। सबसे पहले धान की पुआल को भि‍गो दें और एक दि‍न बाद इसमें डीएपी, यूरि‍या, पोटाश व गेहूं का चोकर, जि‍प्‍सम, कैल्‍शि‍यम और कार्बो फ्यूराडन मि‍ला कर सड़ने के लि‍ए छोड़ दें।
  • उसे करीब 30 दि‍न के लि‍ए छोड़ दें। हर 4 से 5 दि‍न पर इसे पलटते रहें और आधा महीना हो जाने पर इसमें नीम की खली और गुड़ का पाक या शीरा मि‍ला दें।
  • एक महीना बीत जाने के बाद एक बार फि‍र से बावि‍स्‍टीन और फार्मोलीन छि‍ड़ने के बाद इसे कि‍सी ति‍रपाल से 6 घंटों के ढक दि‍या जाता है। अब आपका कंपोस्‍ट तैयार हो गया।

इस तरह बि‍छाएं कंपोस्‍ट

  • पहले नीचे गोबर की खाद और मि‍ट्टी को बराबर मात्रा में मि‍लाकर करीब डेढ़ इंच मोटी परत बि‍छाई जाती है। इसके ऊपर कंपोस्‍ट की दो से तीन इंच मोची परत चढ़ाएं।
  • इसके ऊपर कंपोस्‍ट की दो तीन इंच मोटी परत चढ़ाएं और उसके ऊपर मशरूम के बीज समान मात्रा में फैला दें। फि‍र इसके ऊपर एक दो इंच मोटी कंपोस्‍ट की परत और चढ़ा दें।
  • झोंपड़ी में नमी का स्‍तर बना रहना चाहि‍ए और स्‍प्रे से मशरूम पर दि‍न में दो से तीन बार छि‍ड़काव होना चाहि‍ए। झोंपड़ी का तापमान 20 डि‍ग्री बना रहे।
  • सभी एग्रीकल्‍चर यूनि‍वर्सि‍टी और कृषि‍ अनुसंधान केंद्रों में मशरूम के खेती की ट्रेनिंग दी जाती है। अगर आप इसी बड़े पैमाने पर खेती करने की योजना बना रहे हैं तो बेहतर होगा एक बार इसकी सही ढंग से ट्रेनिंग जरूर लें।

News Source: Money Bhaskar News

पंजाब में भी किसानो ने शुरू की काले चावल की खेती

भारत में धान की खेती बहुत बड़े क्षेत्र में होती है पर कभी आप ने काले चावल (काले धान) की खेती की है । आपके लिए बेशक यह हैरानी की बात होगी लेकिन आसाम के जिला गोलपुर में यह एक आम बात है यहाँ पर 200 से ज्यादा किसान काले धान की खेती कर लाखों रुपए की कमाई कर रहे है ऐसा इस लिए है जहाँ पर आम चावल की कीमत 15 से 80 रु किल्लो तक होती है वहीँ काले चावल की कीमत 200 से 500 रु किल्लो तक होती है ।

भारत में सब से पहले काले चावल की खेती आसाम के नौजवान किसान उपेन्दर राबा ने 2011 में शुरू की जो की गांव आमगुरीपारा,जिला गोलपुरा ,आसाम का रहने वाला है इस किसान को कृषि विज्ञानं केंदर ने काले चावल की खेती करने के लिए प्रेरित क्या था ।

पर आस पास के किसानो को शुरू में उपेन्दर पर यकीन नहीं था ।लेकिन जब उपेन्दर का प्रयोग पहले ही साल कामयाब रहा तो बाक़ी किसानो ने भी काले चावल की खेती करना शुरू कर दिया क्योंकि इसमें मुनाफा कई गुना ज्यादा था ।

आसाम की सरकार भी किसानो को काले चावल की जैविक खेती करने के लिए उत्शहित कर रही है क्योंकि जहाँ आम साधारण काले चावल की कीमत 200 से 250 रु किल्लो है वहीँ ऑर्गनिक काले चावल की कीमत 500 रु किल्लो है ।

काले चावल की खेती की भारत में अभी तक शुरुआत है उम्मीद है धीरे धीरे यह खेती पुरे भारत में होने लगेगी और बाक़ी किसानो को भी इसका लाभ मिल सकेगा ।अगर आप इसकी खेती करना चाहते है तो इसका बीज ऑनलाइन मिल जाता है । और इसे आप ऑनलाइन ही बेच भी सकते है ।बहुत से व्यापारी इसकी कॉन्ट्रैक्ट खेती भी करवाते है

पंजाब में भी किसानो ने शुरू की काले चावल की खेती

पंजाब के जिला फ़िरोज़पुर के गांव माना सिंह वाला में इस साल पहली बार पंजाब के कुश किसानो ने काले चावल की खेती की ।अभी उनको मार्किट में 500 रुपये किल्लो तक की पेशकश मिल रही है । पंजाब में इस चावल की प्रति एकड़ 15 से 20 कुंतल निकलने की सम्भावना है। पंजाब के तीन किसानो ने मिल कर 35 एकड़ में काले धान की पहली बार खेती की और उन्हें काफी अच्छे नतीजे मिल रहे है ।

किसान जसविंदर सिंह बताते है की वो इसका बीज मिजोरम से लाए है इस बार इस धान की ऊंचाई 7 फ़ीट तक हो गई है और इसके लिए किसी भी तरह की खाद डालने की जरूरत नहीं है ।अभी चावल त्यार भी नहीं हुआ और बहुत से दुकानदार इसका बीज बनाने के लिए किसनो को मुंह मांगी कीमत देने के लिए त्यार है ।

काले चावल का इतिहास

विभिन्न पोषक तत्वों से भरपूर, काले चावल का इतिहास काफी संपन्न और रोमांचक है.एशिया महाद्वीप में चावल प्रमुख रूप से खाया जाता है. पुराने समय में चीन के एक बेहद छोटे हिस्से में काले चावलों की खेती की जाती थी और ये चावल सिर्फ और सिर्फ राजा के लिए हुआ करते थे.

हालांकि आज इस पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबंध नहीं है लेकिन फिर भी सफेद और ब्राउन रास की तुलना में इसकी खेती बहुत कम ही होती है. अौर कम ही लोग इसके बारे में जानते हैं. जबकि यह अन्य चावलों की तुलना में ज्यादा सेहत के लिए ज्यादा फायदेमंद होते हैं.

काले चावल खाने के फायदे:

जैसा कि हम आपको पहले ही बता चुके हैं काले चावल को उसके पोषक गुणों के कारण जाना जाता है. काले चावल एंटी-ऑक्सीडेंट के गुणों से भरपूर होते हैं. बता दें कि एंटी-ऑक्सीडेंट्स हमारे शरीर में मौजूद विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में सहायक होते हैं. हालां‍कि कॉफी और चाय में भी एंटी-ऑक्सीडेंट पाए जाते हैं लेकिन काले चावल में इसकी मात्रा सर्वाधिक होती है. इससे ये बॉडी को डि‍टॉक्स करते हैं जिससे कई तरह की बीमारियां और सेहत संबंधी परेशानि‍यां दूर रहती हैं. इस लिए इसे कैंसर के इलाज के लिए सब से ज्यादा उपयोगी बना जाता है

कबाड़ से तैयार किया ट्रैक्टर, इंजन ऑटो का और टायर मारुति के

अाम तौर पर एक ट्रैक्टर एक लीटर डीजल में 12 किलोमीटर दौड़ता है। लेकिन हरियाणा के हिसार के मिस्त्री कृष्ण जांगड़ा ने ऐसा ट्रैक्टर तैयार किया है, जो एक लीटर में 22 किलोमीटर दौड़ता है। इसकी स्पीड 50 किलोमीटर प्रति घंटा है।

खास बात है कि इस छुटकू ट्रैक्टर की सामने आैर पीछे दोनों तरफ की स्पीड की एवरेज भी एक समान है। कृष्ण को इसे तैयार करने में डेढ़ महीना ही लगा।यह ट्रैक्टर 100 रुपये के खर्च में ही एक एकड़ गेहूं की कटाई कर देता है।

कृष्ण का मिनी ट्रैक्टर लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। मात्र 45 हजार रुपए की लागत से तैयार इस मिनी ट्रैक्टर में पीटीओ सिस्टम सहित वे सभी खासियत हैं जो नामी कंपनियों के बड़े ट्रैक्टरों में होती है।

कबाड़ के सामान से बनाया जुगाड़

कृष्ण का कहना है कि मिनी ट्रैक्टर में इंजन पुराने ऑटो का लगाया गया है, वहीं टायर और स्टेयरिंग मारुति कार के हैं। अन्य स्पेयर पार्ट्स भी कबाड़ से ही एकत्रित किए गए हैं।

तीन घंटे में करेगा एक एकड़ फसल की कटाई

मिनी ट्रैक्टर मात्र तीन घंटे में एक एकड़ की गेहूं की फसल की कटाई कर देता है। तीन घंटे में केवल 100 रुपए का डीजल खर्च होता है। कृष्ण का कहना है कि बड़े ट्रैक्टरों से एक एकड़ की गेहूं की कटाई पर करीब 300 से 400 रुपए प्रति एकड़ के तेल का खर्च हो जाता है। छोटी रिपर मशीन भी कृष्ण ने खुद ही तैयार की है।

अधिक जानकारी के लिए वीडियो देखें :

एलोवेरा की खेती का पूरा गणित समझने के लिए फोटो पर क्लिक करें

एलोवेरा की खेती से किसान ने साल भर में कमाए करोड़ों रुपए… ऐलोवेरा की खेती मतलब कमाई पक्की। ऐसी ख़बरें अक्सर सोशल साइट्स और व्हॉट्सऐप ग्रुप पर वायरल होती रहती हैं। ऐसा नहीं है कि एलोवेरा से किसान कमाई नहीं कर रहे हैं लेकिन इस खेती के लिए कुछ जानकारियां होना जरूरी हैं, वर्ना फायदे की जगह नुकसान हो सकता है।

गांव कनेक्शन जब एलोवेरा से संबंधित कोई ख़बर प्रकाशित करता है सैकड़ों किसान फोन और मैसेज कर उस बारे में जानकारी मांगते हैं, क्योंकि लोगों तक सही जानकारी नहीं पहुंच पाती है। पिछले कुछ वर्षों में एलोवेरा के प्रोडक्ट की संख्या तेजी से बढ़ी है।

कॉस्मेटिक, ब्यूटी प्रोडक्ट्स से लेकर खाने-पीने के हर्बल प्रोडक्ट और अब तो टेक्सटाइल इंडस्ट्री में इसकी मांग बढ़ी है। मांग को देखते हुए किसान इस खेती के फायदे समझाने और इसकी प्रोसेसिंग यूनिट लगाने के लिए लखनऊ के सीमैप में पिछले दिनों देशभर के युवाओं को ट्रेनिंग दी गई। इनमें एलोवेरा की खेती करने वाले बड़े किसान, इंजीनियरिंग और प्रबंधन की डिग्री पाने वाले युवा भी शामिल थे।

केंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान (सीमैप) में ट्रेनिंग देने वाले प्रमुख वैज्ञानिक सुदीप टंडन ने गांव कनेक्शन को बताया, जिस तरह से एलोवेरा की मांग बढ़ती जा रही है ये किसानों के लिए बहुत फायदे का सौदा है। इसकी खेती कर और इसके प्रोडक्ट बनाकर दोनों तरह से अच्छी कमाई की जा सकती है। लेकिन इसके लिए थोड़ी सवाधानियां बरतनी होंगी। किसानों को चाहिए कि वो कंपनियों से कंट्रैक्ट कर खेती करें और कोशिश करें की पत्तियों की जगह इसका पल्प बेंचे।’

सुदीप टंडन ने न सिर्फ इसकी पूरी प्रक्रिया गांव कनेक्शन के साथ साझा की बल्कि ऐसे किसानों से भी मिलवाया जो इसकी खेती कर मुनाफा कमा रहे हैं। करीब 25 वर्षों से गुजरात के राजकोट में एलोवेरा और दूसरी औषधीय फसलों की खेती कर रहे हरसुख भाई पटेल (60 वर्ष ) बताते हैं, “एलोवेरा की एक एकड़ खेती से आसानी से 5- 7 लाख रुपए कमाए जा सकते हैं। वर्ष 2002 में गुजरात में इसकी बड़े पैमाने पर खेती हुई लेकिन खरीदार नहीं मिले। इसके बाद मैंने रिलायंस कंपनी सेकरार किया।

शुरू में उन्हें पत्तियां बेचीं लेकिन बाद में पल्प बेचने लगा। आजकल मेरा रामदेव की पतंजलि से करार है और रोजाना 5000 किलो पल्प का आर्डर है। इसलिए मैं दूसरी जगहों पर भी इसकी संभावनाएं तलाश रहा हूं। वो आगे बताते है , ‘किसान अगर थोड़ा जागरूक हो तो पत्तियों की जगह उसका पल्प निकालकर बेचें। पत्तियां जहां 5-7 रुपए प्रति किलो में बिकती है वहीं पल्प 20-30 रुपए में जाता है।

इंजीनियरिंग के बाद कई वर्षों तक आईटी क्षेत्र की बड़ी कंपनी में काम कर चुकीं बेंगलुरु की रहने वाली आंचल जिंदल एलोवेरा की प्रोसेसिंग यूनिट लगाने के लिए सीमैप में चार दिन की विशेष ट्रेनिंग करने आईं थीं, गांव कनेकशन से बात करते हुए वो बताती हैं, ऐलोवेरा जादुई पौधा है। इसके कारोबार में बहुत संभावनाएं हैं, क्योंकि आजकल हर चीज़ में इसका उपयोग हो रहा है। अब मैं यूपी के बरेली में शिफ्ट हो गई हूं और कोशिश कर रही हूं कि एलोवेरा का उद्योग लगाऊं।

आंचल की तरह ही महाराष्ट्र के विदर्भ के रहने वाले आदर्श पाल अंतरिक्ष विज्ञान में पढ़ाई कर चुके हैं लेकिन आजकल वो खेती में फायदे का सौदा देख रहे हैं। वो बताते हैं, पैर जमीन पर होने चाहिए, मेरे पास खेती नहीं है इसलिए किसानों के साथ कांट्रैक्ट फार्मिंग (समझौता पर खेत लेकर खेती) करता हूं। पंतजलि के प्रोडक्ट की लोकप्रियता के बाद संभावनाएं अब और बढ़ गई हैं।

(साभार-गांव कनेक्शन)

देखें कैसे इजरायल में दीवारों पर उगाई जाती है सब्जियां

इजरायली कंपनी ग्रीनवॉल के संस्थापक टिकाऊ व स्वतंत्र खाद्य उत्पादन की खास पद्धति वर्टिकल गार्डन को बाजार में उतारने की तैयारी में हैं। इस पद्धति से बहुमंजिला इमारतों के लोग दीवारों पर चावल, मक्का और गेहूं सहित किसी भी फसल का उत्पादन कर सकते हैं।

ग्रीनवॉल कंपनी की स्थापना साल 2009 में इंजीनियर व गार्डेनिंग के पायोनिर गाइ बारनेस ने की थी। अब इस कंपनी ने एक आधुनिक प्रौद्योगिकी का विकास किया है, जिसके तहत इमारतों के अंदर और बाहर दोनों तरफ से दीवारों के साथ एक ऊंचे गार्डन की परिकल्पना की गई है,

जो कि पारंपरिक गार्डन की तुलना में कम जगह में तैयार किया जा सकता है। ग्रीनवॉल इस पद्धति से खेती के लिए उपजाऊ मिट्टी उपलब्ध कराती है, जो कि किसी भी पौधों के विकास के लिए सक्षम है।

यह सिस्टम कैसे काम करता है?

वर्टिकल प्लांटिंग सिस्टम के तहत पौधों को स्मॉल मॉड्युलर यूनिट में सघन रूप से लगाया जाता है। पौधे बाहर न गिरे, इसकी व्यवस्था की जाती है। इस पॉट को गार्डन की डिजाइन में बदलाव लाने या इसे रिफ्रेश करने के लिए निकाला या बदला जा सकता है।

प्रत्येक पौधे को कंप्यूटर की सहायता से विशेष पद्धति के जरिए पानी पहुंचाया जाता है। जब इन पौधों पर अनाज उगने का समय होता है तो पॉट में तैयार इन हरित दीवारों को कुछ अवधि के लिए नीचे उतार लिया जाता है और उसे जमीन पर क्षैतिज रूप से रखा जाता है।

दीवारों पर लगाई गई फसलों की सिंचाई के लिए ग्रीनवॉल इजरायली कंपनी नेताफिम द्वारा विकसित बूंद-बूंद सिंचाई पद्धिति का इस्तेमाल करती है। ग्रीनवॉल ने दीवारों पर खेती के लिए मॉनिटर, सेंसर और कंट्रोल सिस्टम को इजरायली वॉटर-मैनेजमेंट कंपनी गैलकॉन की सहायता से विकसित किया है।

डीएपी खाद का नया भरोसेमंद एवं सस्ता विकल्प – प्रोम (PROM)

किसी भी फसल के उत्पादन मे फॉस्फेट तत्व का प्रमुख योगदान रहता है। भारत मे डीएपी फास्फेटिक खादो का राजा है। भारत मे दूसरे हरित क्रान्ति की आवश्यकता को देखते हुये, ये बहुत आवश्यक हो जाता है कि महंगे रसायनिक खादो का विकल्प तलाशा जाये.

रसायनिक खादो के अंधाधुन प्रयोग से जहा एक तरफ खेती की लागत भी बड़ती जा रही है, वही दूसरी तरफ भूमि तथा उपभोक्ताऔ के स्वास्थ पर प्रतिकूल असर हो रहा है। इसी को ध्यान मे रखते हुये नया उत्पाद विकसित किया गया है जिसमे कार्बनिक खाद के साथ-साथ रॉक फास्फेट का महीन पिसा चूर्ण भी मिला है जिसका नाम है प्रोम (PROM).

प्रोम क्या है

प्रोम (PROM) खाद, फॉस्फेट रिच ऑरगेनिक मैन्योर (Phosphate Rich Organic Manure) नाम का संक्षिप्त रूप है, जिसमे विभिन्न फास्फोरस युक्त कार्बिनिक पदार्थो जैसे गोबर खाद, फसल अपशिष्ट, चीनी मिल का प्रेस मड, जूस उद्योग का अपशिष्ट पदार्थ, विभिन्न प्रकार की खली, ऊन के कारखानो का अपशिष्ट पदार्थ आदि को रॉक फॉस्फेट के महीन कणो के साथ कम्पोस्टिगं कर के बनाया जाता है। भारत सरकार के कृषि एवं सहकारिता मंत्रालय ने प्रोम को फर्टीलाइजर कन्ट्रोल आर्डर मे शामिल कर लिया है।

प्रोम मे 3 तत्व प्रमुख रूप मे होते है 

फास्फोरस- 10.4 प्रतिशत, कार्बन- 7.9 प्रतिशत व नाइट्रोजन- 0.4 प्रतिशत
फासफोरस की पूर्ती के लिये एक बैग डीएपी के स्थान पर लगभग 4.5 बैग प्रोम के लगते है।

प्रोम खाद के फायदे

प्रोम, डीएपी का विकल्प है जो मिट्टी को नरम बनाने के साथ साथ पोषक तत्वो की उपलब्धता लंबे समय तक बनाये रखता है। प्रोम, फास्फोरस की उपलब्धता पहली फसल के बाद लगने वाली दूसरी फसल तक भी उसी क्षमता के साथ बनाये रखता है जैसा कि पहली फसल के साथ।

प्रोम मे कार्बनिक खाद होने के कारण लीचिंग और रनऑफ के जरिये फास्फोरस की बर्बादी कम होती है। प्रोम मे कई प्रकार के सूक्ष्म पोषक तत्व जैसे कोबाल्ट, कॉपर और जिंक जैसे तत्व भी होते है। प्रोम लवणीय व क्षारिय भूमि मे भी प्रभावी रूप मे काम करता है जबकि डीएपी ऐसी भूमि मे काम नही करता है।