यह है कंबाइन से काटी जाने वाली मूँग की किसम ,15 क्विंटल तक देती है उत्पादन

अक्सर किसानो को फसली विभिन्नता अपनाने के लिए उत्साहित किया जाता है । मुख्या किसान अनाज फैसले जैसे चावल,गेहूं ,मक्का अदि का उत्पादन ज्यादा करते है क्योंकि किसानो का मानना है की यह फसलें उत्पादन तो ज्यादा देती ही है साथ में इन्हे कंबाइन हर्वेस्टर से काटा जा सकता है । जिसमे लेबर का खर्च बहुत कम होता है और समय और मेहनत की भी बचत होती है ।

इस लिए किसान फसलें जैसे सोयाबीन,दालें अदि की बजाई के लिए परहेज करते है । लेकिन अब ऐसे किसानो को लिए एक ऐसी मूँग की किसम त्यार की गई है जिसे कंबाइन से काटा जा सकता है इस किसम को डा: वीरेंदर लाठर ( ICAR- Indian Agricultural Research Institute) द्वारा त्यार किया गया है इस किसम का नाम डा: लाठर मुँग (MDLS) है ।

इस किसम की प्रति एकड़ पैदावार जमीन के हिसाब से कम से कम 6 किवंतल प्रति एकड व् 15 किवांटल प्रति हैकटर है । ये फसल साल में दो बार लगाई जाती है । गर्मी की फसल यानि गर्मी शुरू होने से पहले लगाने पर यह 66 दिन व खारीफ फसल : 85 दिन में त्यार हो जाती है ।

अगर आप इसका बीज खरीदना चाहते है तो बीज के लिये सम्पर्क करे :-
सरदार जगदीप ढ़िलों ( M: 9915463033), गाव फुलेवाल 2 किलोमीटर कपूरथाला से , पंजाब.

मुनाफे की फसल: केला की जगह शुरू हुई ड्रैगन फ्रूट की खेती

आंधी-तूफान के साथ-साथ पनामा रोग के कारण केला की खेती किसानों के लिए मुफीद नहीं रही। नुकसान झेलने वाले किसान अब विकल्प के तौर पर ड्रैगन फ्रूट की खेती कर रहे हैं। पूर्णिया जिला में रूपौली प्रखंड अंतर्गत हरनाहा गांव के प्रगतिशील किसान विमल मंडल ने इसकी खेती की शुरुआत की है।

उनके पास दूसरे किसान भी ड्रैगन फ्रूट की खेती की जानकारी के लिए आते हैं। हालांकि अभी किसानों में इसके बाजार को लेकर आशंका है।

विमल मंडल ने बताया कि ड्रैगन फ्रूट का औषधीय महत्व है। इसमें कैल्शियम, फास्फोरस, विटामिन-ए की प्रचुर मात्रा पाई जाती है। मेट्रो सिटी में यह छह से आठ सौ रुपये प्रति किलो की दर से बिक रहा। स्थानीय बाजार में व्यापारी इसे दो सौ रुपये प्रति किलो की दर से खरीद रहे हैं। ड्रैगन फ्रूट की खेती में पहली बार प्रति एकड़ तीन लाख रुपये के करीब लागत आती है, लेकिन दूसरे साल से यह घटकर एक चौथाई रह जाती है। मुनाफा केले से कई गुना अधिक है।

एक कट्ठा में लगते हैं 40 पौधे जानकारी लेने पहुंचे मुखिया रामवती देवी सहित, पप्पू मंडल, महेंद्र मंडल, पिंटू यादव को विमल मंडल ने बताया कि दस कट्ठा जमीन में फसल उगाने के लिए नासिक से ड्रैगन फ्रूट के पौधे मंगवाए, जो 150 रुपये प्रति पौधा मिला। उसे दस फीट की दूरी पर लगाया। प्रति कट्ठा चालीस पौधे लगे। दो पौधों के बीच में आठ फीट लंबा सीमेंट का खंभा लगाया गया।

मई में इसमें फूल आया और फल भी लग गए। फूल लगने के 36 दिनों के बाद फल तैयार हो गया। एक पौधा से जून तक छह फल निकले। दिसंबर तक फल निकलता रहेगा। एक फल का वजन 200 से 400 ग्राम तक होता है।

पौधा उपलब्ध कराने वाले व्यवसायी ने 150 रुपये किलो की दर से फल को खरीद लिया है। केला में रासायनिक खाद और कीटनाशक का भरपूर उपयोग किया जाता है, जबकि ड्रैगन फ्रूट की खेती में इसका उपयोग नहीं होता। इस कारण इसका औषधीय और पादप गुण सुरक्षित रहता है।

‘ड्रैगन फ्रूट में औषधीय गुण होते हैं। इसमें कैल्शियम, फास्फोरस, विटामिन-ए और कैलोरी की प्रचुर मात्रा पाई जाती है। कम उपलब्धता के कारण इसकी कीमत अधिक मिलती है।’

12वीं के स्टूडेंट ने बनाया डिवाइस, किसान घर बैठे ऑपरेट कर सकते हैं खेतों में लगे वाटर पंप

दिल्ली के ईशान मल्होत्रा (17) ने प्लूटो नामक एक ऐसा डिवाइस बनाया है, जिसकी मदद से किसान घर बैठे खेतों में लगे वाटर पंप को ऑपरेट कर सकते हैं। वाटर पंप चालू और बंद करने के लिए उन्हें बार-बार खेतों में नहीं जाना पड़ेगा। डिवाइस की खास बात यह है कि इसे स्मार्टफोन के अलावा सामान्य फोन से भी ऑपरेट किया जा सकता है। तीन साल में 500 डिवाइस बनाकर ईशान 300 डिवाइस किसानों को मुफ्त में बांट चुके हैं।

एक डिवाइस बनाने में खर्चा आता है 700 रुपए

सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनने की ख्वाहिश रखने वाले ईशान जयपुर से 12वीं की पढ़ाई कर रहे हैं। एक डिवाइस बनाने में 700 रुपए खर्चा आता है। वह इसे इतने ही रुपए में किसानों को बेच देते हैं। इस डिवाइस को वाटर पंप के अंदर फिट किया जाता है।

इसमें ऐसी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जिसकी मदद से टेली कम्युनिकेशन के जरिए किसान वाटर पंप चालू या बंद कर सकते हैं। वाटर पंप चालू करने के लिए किसानों को अपने मोबाइल से 1111 और बंद करने के लिए 2222 नंबर डायल करना होगा।

शुरुआत में किसानों ने बनाया मजाक, फिर भी हार नहीं मानी

ईशान ने जून, 2015 में डिवाइस बनाने की शुरुआत की। उस वक्त उनकी उम्र 14 साल थी। जनवरी 2016 में पहला डिवाइस तैयार किया। डिवाइस लेकर जब वह किसानों के बीच पहुंचे तो उनका मजाक बनाया गया। ईशान ने किसानों की बातों को दरकिनार कर 2016-17 के बीच 500 डिवाइस बना डाले। काफी कोशिशों के बाद किसानों को डिवाइस की मदद से जब वाटर पंप ऑपरेट कर दिखाया, तब उन्हें विश्वास हुआ।

किसानों की परेशानी देख आया आइडिया

ईशान बताते हैं कि बचपन में वे किसानों की समस्याएं सुनते थे। किसानों को रोजाना सुबह-शाम घर से चार-पांच किमी पैदल चलकर खेतों में लगे वाटर पंप को चालू करने जाना पड़ता है। कई बार वहां पहुंचने पर लाइट चली जाती है। बारिश के दिनों में स्थिति बदतर हो जाती है और वाटर पंप चालू करने के दौरान किसानों को इलेक्ट्रिक शॉक लग जाता है।

किसानों की परेशानी देख ईशान ने एक ऐसा डिवाइस बनाने का फैसला किया। इसके जरिए वे देश के किसी भी कोने से वाटर पंप चालू कर सकें। डिवाइस बनाने के लिए ईशान ने क्राउड फंडिंग प्लेटफॉर्म इंपैक्ट गुरु के जरिए 1.30 लाख रुपए का फंड जुटाया।

जापान में ऐसे लगाई जाती है धान आप देख कर रह जाएंगे हैरान

जापान जैसे की आप को पता है एक छोटा सा देश है लेकिन टेक्नोलॉजी के मामले में उसने अपना लोहा सारी दुनिया में मनवाया है ।वैसे तो जापान इलेक्ट्रॉनिक्स सामान के लिए प्रसिद्ध है लेकिन यहाँ की खेती भी बहुत एडवांस है ।

आज हम आपको दिखायेंगे के जापान में धान की खेती कैसे की जाती है ।जापान की तकनीक हमारे भारत के मुकाबले में इतनी एडवांस है के हमें वैसे धान लगाने के लिए कम से कम 50 साल लग जायँगे ।

इसकी वजह यह है के यहाँ पर धान लगाने का सारा काम पौध त्यार करने से लेकर कटाई तक सारे का सारा काम मशीनो से ही किया जाता है जिस से वक़्त और मेहनत की बचत तो होती है । फसल की गुणवत्ता भी कई गुणा बढ़ जाती है।यहाँ पर कीट नाशक सप्रे करने का काम भी हेलीकॉप्टर से किया जाता है जिस से खर्च भी कम होता है और यह काम होता भी बड़ी तेज़ी से है ।

तो हम आपको एक वीडियो के जरिए धान लगाने की सारी तकनीक के बारे में बताते है ।

कीड़े-मकोड़े पकड़ने का मिला नया आइडिया, सालाना लाखों में कर रही कमाई

कीड़े-मकोड़े फसल की पैदावार को अत्यधिक क्षति पहुंचाते हैं जिससे न सिर्फ किसानों की मेहनत बर्बाद होती है, बल्कि उनको आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है। इन समस्याओं से निपटने के लिए किसान कीटनाशकों का प्रयोग करते हैं,

जिसका प्रतिकूल असर खेती पर पड़ता है और प्रोडक्शन घट जाता है। किसानों की इस समस्या से निजात दिलाने के लिए महाराष्ट्र के वर्धा की रहने वाली निलिशा जिभकाटे को एक नया आइडिया मिला और आज वो अपने खास आइडिया से सालाना लाखों में कमाई कर रही हैं।

क्या मिला नया आइडिया

निलिशा ने मनी भास्कर को बताया कि कीट-पतंगों का प्रकोप बढ़ जाता है, ऐसे में किसान कीटनाशक का प्रयोग करते हैं, जो कि फसल और पर्यावरण दोनों के लिए नुकसानदायक होता है। ऐसे में स्टिकी ट्रैप के इस्तेमाल से फसलों में होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है।

स्टिकी ट्रैप एक पीले रंग की शीट होती हैं जो फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए खेत में लगाई जाती है। इससे फसलों पर कीटों से रक्षा हो जाती है। एक ऐसी तकनीक है कि ये कीड़े खुद व खुद जाल में फंस जाएंगे।

कैसे करता है काम

हर कीट पीले रंग की ओर आकर्षित होता है। अब अगर उसी रंग की शीट पर कोई चिपचिपा पदार्थ लगाकर फसल की ऊंचाई से करीब एक फीट और ऊंचे पर टांग दिया जाए तो कीट रंग से आकर्षित होकर इस शीट पर चिपक जाता है।

फिर यह फसल को नुकसान नहीं पहुंचा पाते हैं। मकसद यह है कि कीड़ों से न सिर्फ फसलों की सुरक्षा हो, बल्कि रसायन का इस्तेमाल भी घटे व बंपर उत्पादन भी हो। इसका प्रयोग बेहद आसान व सस्ता है। यह हर मौसम के लिए कारगर है।

वैज्ञानिकों ने बनाया चलता-फिरता सौर कोल्ड स्टोरेज, अब नहीं खराब होंगी सब्जियां

भंडारण के अभाव में बड़ी मात्रा में फल और सब्जियां समय से पहले खराब हो जाती हैं। वैज्ञानिकों ने ऐसा कोल्ड स्टोरेज यूनिट बनायी है, जिसे किसान अपने यहां भी लगा सकता है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के कृषि इंजीनियरिंग विभाग के वैज्ञानिकों ने सौर ऊर्जा से संचालित मोबाइल कोल्ड-स्टोरेज यूनिट बनायी है, जो फल तथा सब्जियों को नष्ट होने से बचाने में मददगार हो सकती है।

इस कोल्ड-स्टोरेज को विकसित करने वाले वैज्ञानिक डॉ. पी.के. शर्मा ने बताते हैं, “सौर ऊर्जा से चलने वाले इस नए कोल्ड-स्टोरेज से बिजली की समस्या से जूझ रहे किसानों को सबसे अधिक राहत मिल सकती है।

बिजली की बचत के साथ-साथ इससे कृषि उत्पादों के खराब होने की समस्या दूर होगी।कोल्ड-स्टोरेज के भीतर निम्न तापमान और उच्च सापेक्ष आर्द्रता के कारण टमाटर जैसे उत्पादों को बीस दिन तक ताजा बनाए रखा जा सकता है। इसके अलावा अन्य सब्जियों और फलों, जैसे- पालक, शिमला मिर्च, ककड़ी, लौकी, तोरई और पपीते को भी बीस दिनों तक सुरक्षित रख सकते हैं।”

न्यूनतम लागत पर फलों और सब्जियों के लंबे समय तक भंडारण के लिए बनाए गए इस कोल्ड-स्टोरेज की भंडारण क्षमता 4.85 घनमीटर है। इसमें 1000 किलोग्राम फल तथा सब्जियों का भंडारण इसमें किया जा सकता है।

इसकी लंबाई 1.83 मीटर, चौड़ाई 1.34 मीटर और ऊंचाई 1.98 मीटर है। इसे गैल्वनी कृत लोहे, पॉली-कार्बोनेट और प्लाईवुड की चादरों और ग्लास-वूल से बनाया गया है। इस कोल्ड-स्टोरेज में 40 क्रेट्स हैं और प्रत्येक क्रेट में 25 किलोग्राम फल और सब्जियां रखे जा सकते हैं।

इस कोल्ड-स्टोरेज में लगे पहियों द्वारा इसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर आसानी से ले जाया जा सकता है। इसमें सौर ऊर्जा चालित 0.8 टन का एक एयर कंडीशनर लगाया गया है, जिससे कोल्ड-स्टोरेज के भीतर का तापमान 9.5 से 11 डिग्री सेल्सियस और आर्द्रता 73 से 92 प्रतिशत तक बनी रहती है।

यह एयरकंडीशनर एक सौर फोटो वोल्टिक सिस्टम द्वारा चलाया जाता है। इस सिस्टम को कुल आठ सौर पैनलों, एक सौर इन्वर्टर और चार बैटरियों वाले एक बैटरी-बैंक को मिलाकर बनाया गया है। इसे इस तरह तैयार किया गया है, जिससे दिन में अधिक से अधिक सौर ऊर्जा का उपयोग किया जा सके।

डॉ. शर्मा के अनुसार, “सौर संचालित शीत कोल्ड-स्टोरेज का निर्माण भारत में अभी प्रयोगात्मक चरण में है। फिलहाल उपलब्ध शीत भंडारण ज्यादातर सुविधाएं बिजली चालित हैं। इनका उपयोग एक निश्चित तापमान पर सीमित उत्पादों जैसे- आलू, संतरा, सेब, अंगूर, अनार, फूलों इत्यादि के भंडारण के लिए ही हो पाता है। इससे फलों व सब्जियों की गुणवत्ता, ताजगी और जीवन अवधि बनाए रखने में मदद मिलेगी। किसानों और छोटे सब्जी तथा फल-विक्रेताओं की आय भी बढ़ेगी।”

भारत विश्व में फल और सब्जियों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। लेकिन, पर्याप्त शीत भंडारण सुविधाएं नहीं होने से 30 से 35 प्रतिशत फल और सब्जियां लोगों तक पहुंचने से पहले ही खराब हो जाती हैं। किसानों को फलों और सब्जियों को तुरंत बाजार ले जाकर बेचने और गुणवत्ता खराब होने का नियमित दबाव बना रहता है।

इस नए कोल्ड-स्टोरेज के उपयोग से किसान उत्तम गुणवत्ता की भंडारण सुविधाओं का लाभ छोटे स्तर पर अपनी आवश्यकतानुसार उठा सकेंगे। अध्ययनकर्ताओं के अनुसार, उनके द्वारा बनाए गए इस कोल्ड स्टोरेज की लागत लगभग 1.72 लाख रुपये तक हो सकती है।

इसमें 1000 किलोग्राम फलों तथा सब्जियों को भंडारित करने की लागत प्रतिदिन 6.07 रुपये आती है। सिर्फ बिजली के खर्च की बचत से ही नौ सालों में इस कोल्ड-स्टोरेज की लागत निकल आती है। अध्ययनकर्ताओं में डॉ. पी.के. शर्मा के अलावाडॉ. एच.एस. अरुण कुमार भी शामिल थे।

कोटा के किसान ने विकसित की आम की नई प्रजाति

फलों के राजा कहे जाने वाले आम का नाता हमारी सभ्यता से शुरू से ही रहा है। अमूमन गर्मी के सीजन में ही आम का उत्पादन होता है। लेकिन अब दिन-प्रतिदिन विज्ञान के बढ़ते कदम की वजह से आम का उत्पादन अन्य सीजनों में भी होने लगा है।

भारत में इस समय 1500 से अधिक आम की किस्में पाई जाती हैं। सभी किस्म अपने आप में अच्छा खासा महत्व रखती है। ऐसी ही एक किस्म खोज निकाली है कोटा के एक किसान ने। इन्होंने ऐसी प्रजाति विकसित की है जिसका साल के तीनों सीजन में उत्पादन होता है। यानी पूरे साल भर ये प्रजाति फल देती है, इसीलिए इसका नाम रखा गया है ‘सदाबहार।’

कोटा में बागवानी करने वाले गिरधरपुरा गांव के किसान किशन सुमन की बाग से उत्पादित होने वाला सदाबहार आम की कुछ खूबी अल्फांसो आम की तरह हैं। अल्फांसो भारत का सब से खास किस्म का आम है। इसे आम का सरताज कहा जाता है। बस इसी सरताज से मिलती जुलती चीजों जैसा सदाबहार आम है। आम की ये प्रजाति अपने आप में अलग तरीके की है।

गुलाब की खेती से किया परिवर्तन

किशन सुमन ने 1995 में गुलाब, मोगरा और मयूरपंखी (थूजा) की खेती शुरू की और तीन वर्षों तक फूलों की खेती करते रहे। इसी दौरान उन्होंने गुलाब के ऐसी किस्म को विकसित किया जिसमें एक ही पौधे मं सात रंग के फूल लगते हैं। उनके द्वारा उत्पादित इस किस्म का उन्हें अच्छा रिटर्न मिला। इसके बाद उन्होंने अन्य फसलों पर भी काम करना शुरू किया।

सुमन बताते हैं कि “मैंने सोचा है कि अगर मैं गुलाब की किस्म में परिवर्तन कर सकता हूं तो फिर आमों के साथ क्यों नहीं। मैंने विभिन्न किस्मों के आमों को इकठ‍्ठा किया और उन्हें पोषित किया। जब पौधे पर्याप्त बड़े हो गए, तो मैंने उन्हें रूटस्टॉक पर तैयार किया। इसके बाद फिर काफी हद तक परिवर्तन आया।

2000 में पहचान में आई किस्म

गुलाब किशन को कामयाबी 2000 में मिलती दिखी। उन्होंने अपने बगीचे में एक आम के पेड़ की पहचान की, जो तीन मौसमों में खिल गया था। जनवरी-फरवरी, जून-जुलाई और सितंबर-अक्टूबर। उन्होंने पांच पेड़ों को एक प्रयोग के तौर पर इस्तेमाल किया।

इस पेड़ की अच्छी विकास आदत थी और इसमें गहरे हरे पत्ते थे। इन पेड़ों की एक खास बात यह भी थी कि इन पौधों में किसी भी प्रकार की बीमारी नहीं थी। धीरे-धीरे वे अपने क्षेत्र में प्रसिद्ध होते गए। हनी बी नेटवर्क के एक स्वयंसेवक सुंदरम वर्मा ने सुमन के नवाचार के बारे में जमीनी तकनीकी नवाचारियों और उत्कृष्ट पारंपरिक ज्ञान के लिए संस्थागत अंतरिक्ष, नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन (एनआईएफ) को सूचित किया।

इसके बाद एनआईएफ ने सदाबहार पौधे बेचने या उपहार देने के लिए कहा, मैंने उन्हें पौधे दिए। एनआईएफ ने मुझे ये सलाह दी कि अपनी किस्म को सत्यापित कराएं। वे कहते हैं कि उनकी सलाह मानते हुए अपनी किस्म को प्रमाणित करने के लिए मैंने 11 वर्षों तक देश के विभिन्न स्थानों पर जाकर अपनी किस्म के पौधे लगाए। वह कहते है कि एनआईएफ को “मैंने 2012 में 20 पौधों का उपहार दिया था। अब पेड़ फल दे रहा है और जब फल पकता है, त्वचा नारंगी रंग प्राप्त करती है, जबकि अंदरूनी फल गेरुआ रंग का होता है।

इन पुरस्कारों से किया जा चुका है सम्मानित

खास प्रकार की किस्म को विकसित करने वाले किशन सुमन को अब तक कई अवार्ड भी दिए जा चुके हैं। मार्च 2017 में सुमन को 9वीं द्विवार्षिक ग्रासरूट इनोवेशन और राष्ट्रपति भवन में आयोजित उत्कृष्ट पारंपरिक ज्ञान के दौरान फार्म इनोवेशन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था।

इनके फलों की तारीफ करते हुए हरदेव चौधरी कहते हैं कि सदाबाहर पूरे वर्ष खिलते हैं। फल का स्वाद मीठा होता है और एक बौने विविधता के रूप में विकसित होते हैं। वे कहते हैं कि आम की इस नस्ल को किचन ग्रार्डन में बर्तन में रखकर कुछ समय बाद उत्पादित किया जा सकता है।

वे कहते हैं कि मौजूदा किस्मों की स्थिति को देखते हुए इसकी क्षमता बड़ी है। ऑक्सीजन की अत्याधिक उपलब्धता होने के कारण ये उत्पादकों के लिए भी बेहद फायदेमंद हो सकता है। वे कहते हैं कि ये किस्म देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया का एकमात्र हाईब्रिड आम है जो कि साल में तीन बार फल देता है।

राष्ट्रपति भवन के मुगल गार्डन की शान बने है सदाबहार

किशन सुमन द्वारा उत्पादित की जा रही आम की ये किस्म अब राष्ट्रपति भवन के मुगल गार्डन की शान बन चुके हैं। सदाबार आम किस्म के यहां पर चार पौधे लगाए गए है। किशन के अनुसार उनके चार बीघा खेत में आम के 22 मदर प्लांट्स और 300 ग्राफ्टेड प्लांट्स लगे हुए हैं।

सदाबहार नाम की आम की यह किस्म रोग प्रतिरोधी है। बौनी किस्म होने से इसे गमले में भी लगाया जा सकता है। इसमें वर्ष भर नियमित रूप से फल आते हैं और ये सघन रोपण के लिए भी उपयुक्त है। जब से राष्ट्रपति भवन में सुमन के आमों को लगाया गया था, तब से उनकी लोकप्रियता और बढ़ गई है।

सुमन ने दिल्ली, राजस्थान, छत्तीसगढ़, गुजरात, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और तेलंगाना में नर्सरी और व्यक्तियों को 800 रुपये से अधिक, 800 रुपये के लिए उपलब्ध कराया है। सुमन ने कहा, “मुझे नाइजीरिया, पाकिस्तान, कुवैत, इराक, यूके और संयुक्त राज्य अमेरिका से भी लोग कॉल करके सदाबहार के बारे में पूछ रहे हैं।

सुमन के अनुसार एक पौधा लगभग 5 साल बाद फल देता है। मेरे लिए एक अच्छी बात यह है कि उत्पादक लंबे समय तक का इंतजार करते हैं लेकिन वे शिकायत नहीं करते हैं। ये सदाबार अन्य किस्मों से बहुत अलग है।

अंडा ट्रे के इस्तेमाल से आप भी ऐसे ले सकते है सड़े हुए प्याज़ से मुनाफा

आपकी जेब ढीली कर देने वाली प्याज कभी-कभी कौड़ियों के दाम पर बिकने को मजबूर हो जाती है जिससे किसानों को काफी सही मुनाफा नहीं मिल पाता। किसानों को उनके प्याज की सही कीमत मिले इसके लिए राजविंदर सिंह राना ने एक नई तकनीक इजाद की है। राजविंदर पंजाब के लुधियाना जिले के मदियानी गांव में रहते हैं।

उन्होंने यह देखा कि कई बार जब प्याज हल्का सड़ने लगता हैं तो किसानों को उसका उचित मूल्य नहीं मिल पाता। राजविंदर ने समस्या का हल निकालने के लिए इस विषय शोध किया। उन्होंने ‘एग ट्रे’ में प्याज रखकर सप्ताह में दो बार पानी का छिड़काव किया। इसके बाद उससे हरी पत्ती वाला प्याज निकलने लगा।

राजविंदर बताते हैं कि एक किलो प्याज में जितने गुण पाए जाते हैं, उतने ही गुण एक हरे पत्ती वाले प्याज में पाए जाते हैं। वैसे तो इस इस तकनीक का इस्तेमाल हम उस समय कर सकते हैं जब हमारे पास मिट्टी का कोई साधन न हो लेकिन अभी मैंने इसका इस्तेमाल अपनी किचेन में किया है।

इस प्याज का इस्तेमाल हम रोजाना कर सकते हैं। ये वर्षों चलने वाली प्रक्रिया है, इससे हमारे घर में हल्का खराब हो रहा प्याज प्रयोग में आ जाएगा। राजविंदर आगे बताते हैं कि इस प्रक्रिया से किसानों के प्याज का उन्हें सही दाम भी मिलेगा। साथ ही अगर कोई इस हरे प्याज एग ट्रे को बाजार में बेचना चाहेगा तो उस समय बाजार भाव के हिसाब से 40-60 रुपए आसानी से कमाए जा सकते हैं।

आप भी अपनी रसोई में खाली एग ट्रे में घर में हल्के खराब हो रहे प्याज को एग ट्रे के खानों में भरकर रख सकते हैं। सप्ताह में दो बार हल्के पानी का इसमें छिड़काव करें। इसमें हर सप्ताह में दो बार पानी डालते रहें जिससे ये हरा बना रहेगा। इस तकनीक से घर में खराब हो रहे प्याज का हम सही से प्रयोग कर सकते हैं।

बोर कराने से पहले नारियल और अंडा टेस्ट से जाने जमीन में कहाँ है मीठा पानी

खेती के लिए सबसे जरूरी चीज़ होती है वो है पानी । लेकिन जमीन के अंदर मीठा पानी कहाँ मिलेगा ये पता लगाना काफी मुश्किल काम है । क्योंकि कई बार किसान ट्यूबवेल बोर करने पर बहुत सारा पैसा खर्च कर देता है लेकिन जा तो वहां पर पूरा पानी नहीं बनता जा फिर पानी बहुत ही खरा होता है जो फसलों के लिए बहुत ही नुकसानदायक होता है ।

ऐसे में बहुत से तरीकों है जिस के इस्तेमाल से ये पता लगाने की कोशिश की जाती है की आखिर खेत में मीठा पानी कहाँ मिल सकता है ।आज हम आपको ऐसे ही 2 तरीकों के बारे में बताएँगे जो भारत में बहुत प्रचलित है।

अंडे और नारियल के इस्तेमाल से -इस तरिके में एक अंडे जा नारियल को हथेली पर रख कर खेत में घुमा जाता है ।और जहाँ पर भी अंडा जा नारियल हथेली में ऊपर उठने लग जाता है तो समझा जाता है के वहां पर धरती के अंदर मीठा पानी है ।

अब इसके पीछे कोई वैज्ञानिक कारण है जा अन्धविश्वाश ये कहना मुश्किल है लेकिन इस विधि का इस्तेमाल करने वाले बताते है के ये तरीका काफी कामयाब है । हालाँकि की कुछ लोगों का मानना है के ये सब नारियल और अंडे के अंदर के पानी के कारण होता है जो उसे खड़ा कर देता है ।

ये तकनीक कैसे काम करती है उसके लिए वीडियो भी देखें

पेड़ों को एक से दूसरी जगह लगा इस शख्स ने खड़ा किया 2.5 करोड़ का बिजनेस

हर दिन तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण में हमारे अंदर अक्सर एक सवाल उठता है कि हम शहर के विकास को प्राथमिकता दें या पेड़ों को बचाएं? क्या विकास और अच्छा पर्यावरण एक साथ नहीं मिल सकता? हैदराबाद के रहने वाले रामचंद्र अप्पारी के पास इस बात का जवाब है। उनका कहना है कि किसी भी अपार्टमेंट या फ्लाइओवर को बनाने के लिए पेड़ को काटने के बजाय उसे बचाया जा सकता है।

38 साल के रामचंद्र ने ग्रीन मॉर्निंग हॉर्टीकल्चर सर्विस प्राइवेट लिमिटेड नाम से एक कंपनी बनाई है जो पेड़ों के ट्रांसलोकेशन यानि एक जगह से हटाकर दूसरी जगह पर लगाने का काम करती है। ट्री ट्रांसलोकेशन एक प्रक्रिया है जिसमें पेड़ को काटने के बजाय उसे जड़ से उखाड़ लिया जाता है और फिर दूसरी जगह पर उसे जैसे का तैसा लगा दिया जाता है।

पुराना है तरीका

ट्री ट्रांसलोकेशन कोई नया तरीका नहीं है। मिस्र में 2000 ईसा पूर्व भी ये तरीका अपनाया जाता था रामचंद्र बताते हैं कि जिन पेड़ों को स्थानांतरित करना होता है उन्हें पहले छांट दिया जाता है। पेड़ की लगभग 80 फीसदी पत्तियां, तना और बाकी हिस्सा काटा जाता है।

इसके बाद पेड़ के चारो ओर एक खाई को खोदा जाता है। इस खाई की गहराई पेड़ की उम्र के हिसाब से तय होती है। इसके बाद पेड़ की जड़ों में कुछ केमिकल्स लगाए जाते हैं और उन्हें टाट के बोरे में लपेटा जाता है। इसके बाद क्रेन से वह पेड़ उठाया जाता है और उसे ट्रेलर पर रख दिया जाता है यहां से वह उस जगह पहुंचाया जाता है जहां उसे दोबारा लगाना हो।

इसके बाद पेड़ को फिर से एक खाई में रखा जाता है और उसमें केमिकल्स डाले जाते हैं। रामचंद्र बताते हैं कि उनकी कंपनी 90 प्रजातियों के 5000 पेड़ों को स्थानांतरित कर चुकी है। हर प्रजाति के लिए उसके बचने के चांसेज बराबर नहीं होते। मुलायम लकड़ी वाले पेड़ जैसे बरगद, पीपल, गुलमोहर आदि के बचने का चांस 90 फीसदी होता है वहीं कठोर लकड़ी वाले पेड़ जैसे नीम, इमली और सागौन आदि के पेड़ों के बचने का चांस 60 से 70 फीसदी तक होता है।

कितना होती है कमाई

कंपनी सरकारी संस्थानों के लिए काम तो करती है अगर कोई व्यक्तिगत रूप से ये काम कराना चाहे तो कंपनी उसके लिए भी तैयार रहती है। व्यक्तिगत रूप से काम कराने वाले ज्यादातर लोग पेड़ों को अपने फार्महाउस में ट्रांसलोकेट कराते हैं। पेड़ को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने और लगाने में क्या खर्च आएगा ये पेड़ के साइज़ पर निर्भर करता है। रामचंद्र बताते हैं कि इसकी शुरुआत 6 हज़ार रुपये से होती है लेकिन हम एक पेड़ के लिए 1.5 लाख रुपये भी चार्ज करते हैं।

ऐसा नहीं है कि ये कंपनी सिर्फ हैदराबाद में ही काम करती है। पेड़ों को ट्रांसलोकेट करने का काम दिल्ली, बेंगलुरू, विशाखापट्टनम और देश के बाकी कई शहरों में भी होता है।2009 में शुरू हुई उनकी कंपनी का बिजनेस अब करोड़ों में हो गया है। पिछले साल कंपनी का टर्न ओवर 2.5 करोड़ रुपए था। रामचंद्र कहते हैं कि टर्नओवर पर 25% तक प्रॉफिट हो जाता है। उनका दावा है कि इस तरह का बिजनेस देश में शुरू करने वाले वो पहले शख्स हैं।

कैसे हुई शुरुआत

रामचंद्र ने एग्रीकल्चर में मास्टर डिग्री ली है और एग्री बिजनेस में एमबीए किया है लेकिन कैंपस प्लेसमेंट में उनकी नौकरी एक प्राइवेट बैंक में लग गई। इस कंपनी में उन्होंने 4 साल काम किया लेकिन उनका मन यहां नहीं लगा। आठ साल तक एग्रीकल्चर की पढ़ाई करने के बाद उससे अलग कुछ करना उन्हें समझ नहीं आ रहा था, इसीलिए उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी।

2009 में रामचंद्र हैदराबाद से विजयवाड़ा जा रहे थे जब उन्होंने देखा कि एक सड़क का चौड़ीकरण किया जा रहा है, जिसमें कई पेड़ों को काट दिया गया। यहीं से उनके मन में आया कि इन पेड़ों को कटने से बचाने का कोई तो तरीका होगा। इसके बाद उन्होंने ट्रांसलोकेशन के बारे में पढ़ा और अपने ऑस्ट्रेलिया के एक दोस्त से इसके बारे में समझा।