11वीं फेल किसान ने बनाया अपना मिल्क एटीएम

गुजरात के गिर सोमनाथ जिले के एक किसान हैं, नीलेश गुस्सर। 11वीं फेल नीलेश ने पिछले साल ऑटोमेटिक एटीएम मिल्क मशीन बनाई थीं। इस साल उन्होंने इसे और भी ज्यादा हाइटेक बना दिया है।

उन्होंने इस मशीन में बायोमीट्रिक फिंगरप्रिंटिंग, आईडी और पासवर्ड, प्रीपेड कार्ड जैसे फीचर जोड़ दिए हैं। अब इस मशीन से कैशलेस तरीके से दूध निकाला जा सकेगा। 28 साल के नीलेश ने पिछले साल 30 एटीम मिल्क मशीन किसानों को बेची थीं। इस मशीन में 20, 50 और 100 रुपये के नोटों से दूध निकाला जा सकता है।

इस मशीन से किसानों को काफी फायदा हो रहा है। वे किसान जो कॉओपरेटिव या दूध डेयरी को अपना दूध नहीं बेचना चाहते वे अपने मन मुताबिक दाम पर मिल्क एटीएम लगाकर दूध बेच रहे हैं। कॉओपरेटिव या डेयरी को दूध बेचने पर उन्हें बिचौलियों को कमीशन देना पड़ता है जिससे उन्हें नुकसान होता है।

गिर जिले के तलाला इलाके से 7 किलोमीटर स्थित गांव खिरधर के रहने वाले नीलेश ने पिछले साल मिल्क एटीएम मशीन बनाई थी। वे अब तक गुजरात के जामनगर, द्वारका, पोरबंदर जैसे इलाकों के साथ ही महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और तमिलनाडु के किसानों को लगभग 30 मशीनें बेच चुके हैं।

नीलेश ने बताया कि पहले उनके पास 6 गायें थीं। जिनका दूध निकालकर वे सहकारी मंडी में बेचने के लिए ले जाते थे, लेकिन उन्हें अच्छा दाम नहीं मिलता था। वे देखते थे कि उनसे तो सिर्फ 25 रुपये प्रति लीटर में दूध बेचा जा रहा है जबकि शहर में दूध 50 रुपये में मिलता है।

उन्होंने इसके बाद एटीएम मिल्क मशीन बनाने का फैसला कर लिया। इसके लिए उन्होंने इंटरनेट पर थोड़ा सा रिसर्च भी किया और मुंबई, राजकोट, अहमदाबाद से मशीन बनाने के पुर्जे मंगवाए। उन्होंने नोट के सेंसर और फिंगरप्रिंट की मशीन ताइवान से मंगवाई।

नीलेश ने हमसे बात करते हुए बताया, ‘मैं बिचौलियों का काम खत्म करना चाहता था। वे किसान और कस्टमर के बीच में आकर कमीशन खाते थे। जब मैं नजदीक की कॉओपरेटिव डेयरी में दूध बेचता था तो वहां भी मुझे दूध का सही दाम नहीं मिलता था।

इसलिए मैंने ये मशीन बनाई।’ आपको जानकर हैरानी होगी कि नीलेश 11वीं फेल हैं। उन्होंने कोई इंजीनियरिंग की ट्रेनिंग नहीं ली है। वे बताते हैं कि उन्हें मशीनों को बनाने का शौक रहा है। नीलेश बताते हैं कि इस मशीन की बदौलत किसान को दूध की डेढ़ गुना ज्यादा कीमत मिलती है। किसान सिर्फ एक साल में ही इस मशीन का दाम रिकवर कर सकते हैं।

बनकर तैयार है मिल्क एटीएम

जिन किसानों के पास तीन से ज्यादा गाय या भैंसे होती हैं उनके लिए ये मशीन काफी फायदेमंद है। नीलेश ने बताया, ‘इस बार मैंने मशीन को पूरी तरह से कैशलेस बना दिया है। अब मशीन में पैसे नहीं डालने पड़ेंगे। जिस भी ग्राहक को दूध लेना होगा उसे अपना फिंगरप्रिंट इस मशीन में रजिस्टर करवाना होगा उसके बाद वह एक निश्चित मात्रा में दूध निकाल सकेगा।’

इसके साथ ही यूजरनेम और पासवर्ड के जरिए भी प्रीपेड कार्ड द्वारा दूध निकाल सकेंगे। नीलेश ने इस तरह की अभी पांच कैशलेस मशीनें बनाई हैं। जिन्हें वे तमिलनाडु, उड़ीसा और राजस्थान के किसानों को बेच चुके हैं।

मशीन की कीमत 75 हजार से लेकर एक लाख रुपये तक है। इसमें 50 से लेकर 250 लीटर तक दूध स्टोर किया जा सकता है। इसमें फ्रिज के साथ ही पावर बैकअप की सुविधा भी है। जिससे लाइट चली जाने की स्थिति में दूध को खराब होने से बचाया जा सकेगा।

नीलेश ने सबसे पहले कच्छ के एक किसान वेलाजी भुइदिया को यह मशीन बेची थी। उन्होंने अपनी गायों का दूध बेचने के लिए मशीन खरीदी थी। इस मशीन को कहीं भी आसानी से ले जाया जा सकता है। अब वेलाजी दूसरी मशीन खरीदने की योजना बना रहे हैं।

किसान ने विकसित की वो तकनीक,जिससे हर घर कमा सकता है महीने के 50 हजार रु

तकनीकी के मामले में इजरायल दुनिया का सबसे हाईटेक देश माना जाता है। भारत समेत दुनिया के कई देश इस छोटे से देश से सीखने जाते हैं। लेकिन भारत का एक किसान है, इजरायल के लोग उससे सीखने आते हैं। इस किसान ने जो तकनीकी विकसित की है अब वो इजरायल में लागू की जा रही है।

इस हाईटेक तकनीकी का नाम ‘चोका सिस्टम’ है। यह एक ऐसी तकनीकी है जिसे देश के हर कोने, हर गांव का किसान अपने हिसाब से इस्तेमाल कर सकता है। शायद यही वजह है कि इजरायल में भी लोकप्रिय हो रही है। ये तकनीक है किसान को कमाई कराने की, उसे गांव में ही रोजगार देने, पानी बचाने की और जमीन को सही रखने की। इस किसान की माने तो यही तो तकनीकी है जिसके सहारे गायों को लाभकारी बनाने हुए उन्हें बचाया भी जा सकता है।

‘चोका सिस्टम’ की जिस गांव से शुरुआत हुई है वहां हर घर सिर्फ दूध के कारोबार से हर महीने 10 से 50 हजार रुपए कमाता है।इजरायल को ज्ञान देने वाले इस किसान का नाम है लक्ष्मण सिंह। 62 साल के लक्ष्णम सिंह राजस्थान के जयपुर से करीब 80 किलोमीटर दूर लाहोडिया गांव के रहने वाले हैं।

ये गांव कभी भीषण सूखे का शिकार था।गरीबी और जागरुकता की कमी के चलते यहां आए दिन लड़ाई दंगे होते रहते हैं, युवा गांव छोड़-छोड़ शहर में मजदूरी करने को मजबूर हो रहे थे।

करीब 40 साल पहले लक्ष्मण सिंह ने अपने गांव को बचाने के लिए मुहिम शुरु की। बदलाव रंग भी लाया कि आज इजरायल जैसा देश इस गांव का मुरीद है। आज लापोडि़या समेत राजस्थान के 58 गांव चोका सिस्टम की बदौलत तरक्की की ओर है। यहां पानी की समस्या काफी हद तक कम हुई है। किसान साल में कई फसलें उगाते हैं। पशुपालन करते हैं। और पैसा कमाते हैं। 350 घर वाले इस गांव में आज 2000 के करीब आबादी रहती है।

चोका सिस्टम से पशुओं को घास मिलती है और जलस्तर ठीक रहता है

गांव के विकास के लिए रुपयों की कम से कम जरुरत पड़े इसके लिए श्रमदान का सहारा लिया गया। गांव के लोगों को इससे जोड़ने के लिए 1977 में उन्होंने ग्राम विकास नवयुवक मंडल लापोडिया रखा। इस समूह को ये जिम्मेदारी दी गयी कि गांव के हर किसी व्यक्ति में ये भाव पैदा करना है कि वो अपने गांव का मजदूर नहीं बल्कि मालिक है।

ऐसे बनता है ‘चोका सिस्टम’

चोका सिस्टम हर पंचायत की सार्वजनिक जमीनों पर बनता है। एक ग्राम पंचायत में 400 से 1,000 बीघा जमीन खाली पड़ी रहती है, इस खाली जमीन में चोका सिस्टम ग्राम पंचायत की सहभागिता से बनाया जाता है। खाली पड़ी जमीन में जहां बरसात का नौ इंच पानी रुक सके वहां तीन चौड़ी मेड (दीवार) बनाते हैं, मुख्य मेड 220 फिट लम्बाई की होती है और दोनों साइड की दीवारे 150-150 फिट लम्बी होती हैं।

इस गांव में अब नहीं होती है अब कभी पानी की कमी

भूमि का लेवल नौ इंच का करते हैं जिससे नौ इंच ही पानी रुक सके इससे घास नहीं सड़ेगी। इससे ज्यादा अगर पानी रुका तो घास जमेगी नहीं। हर दो बीघा में एक चोका सिस्टम बनता है, एक हेक्टेयर में दो से तीन चोका बन सकते हैं। एक बारिश के बाद धामन घास का बीज इस चोका में डाल देते हैं इसके बाद ट्रैक्टर से दो जुताई कर दी जाती है।

सालभर इसमें पशुओं के चरने की घास रहती है। इस घास के बीज के अलावा देसी बबूल, खेजड़ी, बेर जैसे कई और पेड़ों के भी बीज डाल जाते हैं। चोका सिस्टम के आसपास कई नालियां बना दी जाती हैं। जिसमें बरसात का पानी रुक सके। जिससे मवेशी चोका में चरकर नालियों में पानी पी सकें।

ये है बैंगन नई किसम ‘डॉक्‍टर बैंगन’, एक सीज़न में देगी 1.5 लाख का मुनाफा

कृषि वैज्ञानिकों ने बैंगन की ऐसी किस्म विकसित की है जो न केवल बीमारियों से बचाएगी बल्कि बुढ़ापे को भी रोकेगी। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान पूसा ने बैंगन की एक नई किस्म पूसा हरा बैंगन-एक का विकास किया है, जिसमें भारी मात्रा में क्यूप्रेक, फ्रेक और फिनोर जैसे पोषक तत्व हैं जो इसे एंटीऑक्सीडेंट बनाते हैं।

इसके चलते यह बीमारियों से बचाने और बुढ़ापा रोकने में मददगार है।एंटीऑक्सीडेंट वह तत्व हैं जो हमारे शरीर को विषैले पदार्थों से बचाता है और यह ऊर्जा प्रदान करने के साथ ही कई प्रकार की बीमारियों से सुरक्षा प्रदान करता है।

संस्थान के सब्जी अनुसंधान से जुड़े वैज्ञानिक तुषार कांति बेहरा ने बताया कि नई किस्म में पूर्व की किस्मों की तुलना में रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक है, जिसके कारण इसमें कीटनाशकों का कम छिड़काव किया जाता है।

खरीफ के मौसम में हो सकती है खेती

हरे रंग के अंडाकार गोल बैंगन की यह पहली प्रजाति है, जिसकी खेती खरीफ मौसम में उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्र में की जा सकती है। इसकी एक विशेषता यह भी है कि इसे गमले में लगाया जा सकता है।

गोल हरे रंग के इसके फल पर हल्के बैंगनी रंग के धब्बे होते हैं और बाह्य दलपूंज कांटे रहित होते हैं । डॉक्‍टर बेहरा ने बताया कि बैंगन की नयी किस्म रोपायी के 55 से 60 दिनों में फलने लगता है।

खरीफ मौसम के दौरान बैंगन की इस किस्म की खेती से किसान प्रति हेक्टेयर एक से डेढ़ लाख रुपये तक कमा सकते हैं। इसमें बीमारियां कम लगती हैं जिसके कारण इसमें कीटनाशकों का कम इस्तेमाल किया जाता है। आगे पढ़ें कि‍तनी पैदावार हो सकती है

45 टन तक पैदावार

बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र, कर्नाटक,मध्य प्रदेश तथा आन्ध्र प्रदेश में बैंगन की व्यावसायिक पैमाने पर खेती की जाती है और किसान सालों भर इसकी फसल लेते हैं। खाड़ी तथा कुछ अन्य देशों को बैंगन का निर्यात भी किया जाता है।

देश में तीन लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में बैंगन की खेती की जाती है और इसका सालाना करीब 50 लाख टन उत्पादन होता है। इस बैंगन पैदावार काफी अधिक है। इसकी प्रति हेक्टेयर 45 टन तक पैदावार ली जा सकती है। इसके एक फल का औसत वजन 220 ग्राम है।

किसान की जेब और सरकार के गोदाम भरेंगी गेहूं की ये नई तीन किस्में

गेहूं की किस्में अब पहले की तरह सामान्य नहीं है, देश के कृषि वैज्ञानिकों ने प्रोटीन और पोषक तत्वों से भरपूर गेहूं की तीन नई किस्मों को तैयार किया है।

एक ओर, गेहूं की ये किस्में न सिर्फ खाद्यान्न उत्पादन में आत्मर्निभर बनाएंगी, बल्कि देश में कुपोषण की समस्या को दूर कर पाने में सक्षम रहेंगी। दूसरी ओर, इन किस्मों की उपज से न सिर्फ किसानों की जेब भर सकती हैं, बल्कि सरकार के खाद्यान्न गोदाम भी भर सकते हैं।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने गेहूं की एचडब्ल्यू 5207, एचआई 1612 और एचआई 8777 तीन नई किस्मों को विकसित किया है। गेहूं की पहले की किस्मों की अपेक्षा इन किस्मों में प्रोटीन और सूक्ष्म पोषक तत्व 15 प्रतिशत तक अधिक हैं।

संस्थान के वैज्ञानिकों ने इन किस्मों को कुपोषण को मिटाने और विशेषकर बच्चों और महिलाओं में खून व सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमियों को दूर करने के उद्देश्य से बनाया है।

“इन नई किस्मों में प्रोटीन के साथ-साथ आयरन, तांबा, जिंक और मैग्नीज भरपूर मात्रा में है। इन किस्मों से न सिर्फ रोटियां स्वादिष्ट बनती हैं, बल्कि ये बिस्कुट और पास्ता बनाने में भी उपयुक्त होंगी।”। आइये आपको बताते हैं गेहूं की इन तीन नई किस्मों के बारे में…

पहली किस्म: एच डब्ल्यू 5207

गेहूं की एचडब्ल्यू 5207 किस्म को वैज्ञानिकों ने विशेषकर तमिलनाडु राज्य की भूमि के लिए विकसित किया गया है। लीफ रस्ट और स्टीम रस्ट प्रतिरोधी इस किस्म से कम सिंचाई में भी भरपूर पैदावार होती है। इस किस्म में भरपूर पोष्टिक तत्व भी हैं।

इसमें 11 प्रतिशत से अधिक प्रोटीन, उच्च लौह तत्व (53.1 पीपीएम), मैग्नीज (47.5 पीपीएम) और जिंक (46.3 पीपीएम) पाया जाता है। इस किस्म से औसतन 40.76 और अधिकतम 59.6 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पैदावार हो सकती है।

दूसरी किस्म: एच आई 8777

गेहूं की एचआई 8777 किस्म बारिश आधारित और प्रायद्वीप क्षेत्रों के लिए विकसित की गई किस्म है। यह किस्म भी लीफ रस्ट और स्टीम रस्ट प्रतिरोधी है। इस किस्म में प्रोटीन की मात्रा 14.3 प्रतिशत है, जबकि जिंक 43.6 पीपीएम और लौह तत्व 48.7 पीपीएम पाया जाता है।

ऐसे में इस किस्म में सामान्य गेहूं की किस्मों से इतर भरपूर पोषक तत्व मौजूद हैं। इस किस्म से किसान औसतन 18.5 कुंतल प्रति हेक्टेयर उत्पादन ले सकते हैं, जबकि अधिकतम 28.8 कुंतल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन होता है।

तीसरी किस्म:एचआई 1612

गेहूं की यह किस्म बिहार के अलावा पूर्वोत्तर के राज्यों के लिए विकसित की गई है। अच्छी पैदावार के लिए इस किस्म की समय से बुआई करनी पड़ती है। इस किस्म में प्रोटीन की मात्रा 11.5 प्रतिशत पाया जाता है, जबकि आयरन और जिंक समेत कई पोषक तत्वों की अच्छी मात्रा इस किस्म में मौजूद हैं।

इस किस्म की बड़ी विशेषता यह है कि सीमित सिंचाई में भी इस किस्म से औसतन 37.6 और अधिकतम 50.5 कुंतल प्रति हेक्टेयर होता है।

अब 55 दिन में तैयार होगी मूंग की ये नई किस्म

प्रदेश के ज्यादातर हिस्सों में किसान मूंग की खेती करते हैं, लेकिन कई बार पीला मोजैक रोग से फसल को भारी नुकसान होता है। ऐसे में मूंग की कल्याणी किस्म की खेती कर किसान नुकसान से बच सकते हैं।

वाराणसी के कुदरत कृषि शोध संस्था ने मूंग की नई किस्म विकसित की है। ये किस्म 55 दिन में पककर तैयार हो जाएगी। आमतौर पर मूंग की फसल 65-70 दिन में पकती है। इसकी खासियत यह है कि इसके लंबे गुच्छे रहेंगे, फली गहरे हरे रंग की होगी।

कुदरत कृषि शोध संस्था के किसान प्रकाश सिंह व रघुवंशी सिंह बताते हैं, “आमतौर पर मूंग की दूसरी किस्में साठ से सत्तर दिनों में तैयार होती हैं, लेकिन ये किस्म 50-55 दिनों में ही तैयार हो जाती है। ये कई तरह के रोग अवरोधी भी है, जिससे इसमें रोग लगने का भी खतरा नहीं रहता है।”

यह किस्म उत्तरप्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, हरियाणा, बंगाल, छत्तीसगढ़, पंजाब आदि राज्यों के लिए तैयार की है। इस किस्म में प्रति एकड़ छह-सात कुंतल उत्पादन होता है और बीज प्रति एकड़ छह किलो ही लगता है।

मूंग कल्याणी किस्म की बुवाई करने से जमीन की उर्वराशक्ति में बढ़ोत्तरी होती है। साथ ही फसल कटने के बाद हरी खाद भी तैयार हो जाती है। पीला मोजेक, चूर्णित आसिता रोग के प्रति सहनशील रहेगा।

बीजशोधन पांच ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से राइजोबियम कल्चर से बीज का शोधन करके ही बुवाई करनी चाहिए, शोधन के बाद बीज छाया में सुखाकर बुवाई करें।जायद सीजन में 25 से 30 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर बुवाई करनी चाहिए।

कतार से कतार की दूरी 20 से 25 सेमी पर रखें। जबकि खरीफ सीजन 15 से 20 किलो बीज प्रति हेक्टेयर। बुवाई जून-जुलाई में करें। कतार से कतार की दूरी 30 व पौधों की दूरी चार सेमी. रखना चाहिए।

इन देशी नुस्खों द्वारा मिंटो में मरते है कीट

आधुनिक युग में कीटनाशकों का नाम मात्र भी इस्तेमाल न करते हुए खेतीबाड़ी करना थोड़ा कठिन है, लेकिन देशी तरीकों से खेतीबाड़ी में खर्च भी बहुत कम आता है।

यह देशी चीजें आप को आपके इर्द –गिर्द ही मिल जाती हैं, बगैर किसी भाग दौड़ के, चाहे आप की फसल सब्जी की हो या अनाज की फसल हो,बगैर किसी रसायन के तैयार की जा सकती है। जिससे मानव जीवन पर कोई भी दुष्प्रभाव नहीं होता है, तथा उसकी कीमत भी रासायनिक फसलों से ज़्यादा मिलती है।

देशी नुस्खा (क):- सफ़ेद फिटकरी-

जब भी कोई फसल ऊपर से लेकर नीचे तक सूखने लगती है, तो समझना चाहिए कि इसकी जड़ों पर फफूंद का हमला हो चुका है। इससे बचने के लिए खेत में पानी लगाते समय ट्यूबवेल के गड्ढे में 1 किलो ग्राम सफ़ेद फिटकरी का टुकड़ा रख दें और पानी देना शुरू कर दें। वह फिटकरीयुक्त पानीपौधों कि जड़ों में लग जाएगा तथा पौधे पुनः स्वस्थ हो जाएंगे।

देशी नुस्खा (ख):- उपले कि राख तथा बुझा चूना-

उपले या चूल्हे कि राख तथा बुझा चूना, एक किलो ग्राम प्रति 25 लीटर पानी में डाल कर 5-6 घंटे के लिए रख दें, तद्उपरांत इस घोल को जितनी भी बेल (जायद) प्रजाति कि फसलों जैसे:- कद्दू, खीरा, घिया, तोरी आदि पर, इसका छिड़काव करने से लाल सूड़ी, कीड़े-मकौड़ों से छुटकारा मिल जाएगा।

देशी नुस्खा (ग):- गोमूत्र, जंगली तंबाकू,ऑक, नीम के पत्ते तथा धतूरा:-

किसी भी प्रकार कि फसल के लिए कीटनाशक कि जगह इन पाँच चीजों (प्रति 500 ग्राम) का घोल बनाकर, इन सभी को 15-20 दिन के लिए एक बर्तन में (चाहे प्लास्टिक का टब या मिट्टी का घड़ा) 20-25 लीटर पानी डाल कर रख देतें हैं। बाद में इस घोल को कपड़े से छान कर किसी भी प्रकार कि फसल के लिए कीटनाशक की जगह छिड़काव कर सकतें हैं।

देशी नुस्खा (घ):- खट्टी लस्सी, गलगल और गोबर के उपले:-

खट्टी लस्सी दो किलो, गलगल (नींबू प्रजाति) एक, गोबर के उपले तीन किलो। उपले जीतने पुरानें होंगे उतना ही अच्छा होगा। इन उपलों को 6 दिन के लिए 10-12 लीटर पानी में डाल कर रख देना चाहिए।

उसके बाद इन उपलों को अलग निकाल दें, और उपले वाले पानी में दो किलो खट्टी लस्सी जो कि 15 दिन पुरानी हो तथा एक गलगल पीस कर या निचोड़ कर सारे घोल को कपड़े से छान कर एक घोलक तैयार करके,पीलिया रोग से ग्रसित फसल के ऊपर छिड़काव कर देंगे। कुछ दिनों के बाद फसल का रंग रूप देखने लायक होगा।

इस किसान ने खोजी गन्ना बुवाई की एक नई तकनीक जो बदल सकती है किसानों की किस्मत

उत्तर प्रदेश के एक किसान ने गन्ना बुवाई की एक नई तकनीक खोज निकाली है गन्ना किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है। इस विधि से गन्ने की बुवाई करने से न सिर्फ बीज कम लगता है बल्कि खाद, पानी और पेस्टीसाइड की मात्रा में भी तीन से चार गुना तक की कमी आती है। इस तकनीक का नाम है ‘वर्टिकल बेड प्लान्टेशन’।

यूपी के लखीमपुर खीरी के किसान जिले के शीतलापुर गाँव में रहने वाले युवा हाईटेक किसान दिल्जिन्दर सहोता इस तकनीक से खेती कर रहे हैं। ‘वर्टिकल बेड प्लान्टेशन’ यानी गन्ने की खड़ी गुल्ली (गन्ने का टुकड़ा) की बुआई।

‘वर्टिकल बेड प्लान्टेशन’ गन्ना बोआई की यूपी में अपनाई जा रही पारम्परिक तकनीक से बिल्कुल अलग है। ये दो उल्टी दिशाओं वाले कांसेप्ट हैं। किसानों को अपना माइंड सेट बदलना पड़ेगा।

गुल्ली विधि प्लान्टेशन में खेत मे पहले बेड बनाए जाते हैं, फिर बेड के एक सिरे पर विशेष प्रकार से एक-एक आंख की खड़ी गुल्ली काटकर लगाई जाती है।जेट एयरवेज में नौकरी छोड़ अपनी मिट्टी से जुड़े युवा और हाईटेक किसान दिल्जिन्दर कहते हैं, ”खेती में लागत बढ़ती जा रही है ऐसे में किसान इनपुट कास्ट कम करके ही अपनी बचत को बढ़ा सकते हैं।”

गुल्ली विधि में खाद कम से कम, पानी 75 प्रतिशत कम और बीज में सबसे बड़ी बचत होती है। आम किसान बैलों से एक एकड़ में आम तौर पर 25 से 35 कुन्तल तक बीज प्रयोग करते। ट्रेंच विधि से और भी ज्यादा बीज लगता है। पर इस विधि से मात्र चार से पांच कुन्तल बीज में एक एकड़ खेत की बोआई हो जाती है। सर्दियों की बोआई तो दो से तीन कुन्तल गन्ने के बीज से ही हो सकती।

दिल्जिन्दर मुस्कुराते हुए कहते हैं ये बात आम किसान के सामने कहेंगे तो वो हंसेगा। पर ये 100 फीसदी सच है। चार पांच कुन्तल में एक एकड़ गन्ने की बिजाई। ‘खड़ी गुल्ली विधि’ में धूप और पानी का मैनेजमेंट बड़ा जरूरी है। गन्ने की फसल सी-4 टाइप की फसल है सो धूप इसके लिए पूरी मिलनी जरूरी है।

दिल्जिन्दर कहते हैं हम इसे फगवाड़ा मेथड या अवतार सिंह मेथड भी कहते हैं। हमने भी ये विधि पंजाब के किसान अवतार सिंह से ही सीखी। इसके बाद आजमाई और आज पूरी तरह से मुतमुईन हूँ।

‘वर्टिकल बेड प्लान्टेशन’ की इस विधि के बारे में पंजाब के किसान अवतार सिंह कहते हैं, ”ये कुदरती खेती है। गन्ना जब ऊपर की ओर बढ़ता है तो हम उसे लिटा के क्यों बोते हैं। गुरु ग्रन्थ साहिब में पंच तत्वों से शरीर बनने की बात कही गई। ये विधि भी उसी पर आधारित है। पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि और वायु। जिसमें से हम सिर्फ जल का प्रबंधन कर सकते ये ही हमारे हाथ में है। गुल्ली विधि भी इन्हीं पंचतत्वों के आधार पर ही बोई जाती है। इसे हम नेचुरल खेती भी कह सकते।

दिल्जिन्दर सहोता गुल्ली विधि के बारे में बड़ी ही विश्वास के साथ बताते हैं, ”एक एकड़ में लाइन टू लाइन दूरी के आधार पर बीज कम या ज्यादा हो जाता। अगर साढ़े चार बाई दो फीट पर बोते हैं, तो एक एकड़ में करीब चार हजार गुल्ली लगेगी। अगर एक आंख से दस गन्ने स्वस्थ निकल आए तो एकड़ में 40 हजार गन्ने हो जाते है।

चालीस हजार गन्ने चार सौ कुन्तल हो गए, हिसाब साफ है।” दिल्जिन्दर कहते हैं कि अगर गन्ने का वजन बढ़ता है, अगर डेढ़ किलो का हो गया तो छः सौ कुन्तल, दो किलो का गन्ना हो गया तो आठ सौ कुन्तल पैदावार हो सकती है। सबसे अच्छी बात इस विधि में ये है कि आप एक गुल्ली यानी आंख से कितने गन्ने लेना चाहते हो ये आप पर निर्भर करता है। जितने चाहिए उसके बाद मिट्टी चढ़ा दीजिए। टिलरिंग बन्द हो जाएगी।

यूपी में अभी आम गन्ना किसान बीज, खाद पेस्टिसाइड अंधाधुंध डालते गन्ने को बड़ा करने के लिए। लेकिन वर्टिकल बेड प्लान्टेशन में गन्ने को बढ़ाया नहीं जाता। बल्कि उसकी मोटाई बढाई जाती। गन्ना गठीला होगा तो स्वस्थ होगा। मिट्टी चढ़ी होगी तो गिरेगा भी कम।

दिल्जिन्दर कहते हैं, ”अगर हम चार कुन्तल में चार सौ और ज्यादा उत्पादन ले सकते तो फिर खेत मे 30-40 कुन्तल बीज क्यों झोंकना। खर्चो में कटौती करके ही किसान इनपुट लागत बचा सकता है।

वर्टिकल बड का कॉन्सेप्ट दिल्जिन्दर को पंजाब से मिला है। पर दिल्जिन्दर कहते है। करने में डर लग रहा था। विश्वास नहीं हो रहा था कि एक गन्ने के अखुए से 30, 40, 50 तक गन्ने लिए जा सकते हैं, पर किया तो रिजल्ट सामने हैं। मुझे लगता पानी खाद से लेकर बीज की इतनी बड़ी बचत किसी और विधि में होती होगी? 25 से 30 कुन्तल बीज भी बच गया तो किसान के करीब नौ हजार रुपए बच गए। अभी हम चार-पांच फीट पर गन्ना बो रहे पर आगे लाइन टू लाइन दूरी छः आठ फीट भी करेंगे।

बेकार प्लास्टिक की बोतल से ऐसे बनायें चूहा पकड़ने का ट्रैप

चूहों की संख्या मई-जून माह में कम होती है, यही समय चूहा नियंत्रण अभियान के लिए सही समय होता है, यह अभियान सामूहिक रूप में चलाना चाहिए। चूहे खेत खलिहानो, घरों और गोदामों में अनाज खाने के साथ-साथ ही अपने मलमूत्र से अनाज बर्बाद कर देते हैं।

एक जोड़ी चूहा एक वर्ष में 800-1000 की संख्या में बढ़ जाते हैं,अगर चूहों के संख्या कम हो तो आप प्लास्टिक की बोतल का ट्रैप बना कर भी चूहों को पकड़ सकते है ।इस तरिके से आप को कोई खर्चा भी नहीं होगा और किसी खतरनाक दवाई की भी जरूरत नहीं पड़ेगी ।

इस तरीके से आप घर पर भी आसानी से चूहों को पकड़ सकते हैं। आज हम आपको बताते है कि कैसे आप घर पर चूहे पकड़ने की मशीन बना सकते है।

जरूरत का सामान

  • प्लास्टिक की बोतल
  • कैंची
  • स्टिकस
  • रबड़ बैंड
  • थ्रेड
  • यू क्लिप

बनाने का तरीका

  1. सबसे पहले प्लास्टिक की बोतल का ऊपरी हिस्सा कैंची से काट लें। ध्यान रखें कि उसे सिर्फ एक ही साइड से काटना है।
  2. अब बोतल के दोनों हिस्सों पर दो इंच के गेप से दाए और बाए साइड होल करके दो स्टिक्स आड़ी फंसा दें।
  3. ध्यान रखें कि ये दोनों स्टिक्स पैरेलर हो। अब इन दोनों स्टिक्स पर रबड़ बैंड दोनों ओर फंसा दें।
  4. अब एक मजबूत धागा लें और बोतल के मुंह में लगाकर ढक्कन बंद कर दें। इस बात का ध्यान रखें कि धागे की लंबाई इतनी होनी चाहिए कि उसेे खिंचने पर बोतल का कटा हिस्सा खुल सकें।
  5. अब यू क्लिप का किनारा सीधा करके उसमें खाने की चीज फंसा दें। इसे बोतल के अंदर हाथ डालकर तली से बाहर निकालें।
  6.  धागे के हिस्से पर नॉट बनाकर इस यू क्लिप के बाहर निकले नुकीले हिस्से पर लटका दें।

इस ट्रैप को कैसे बनाते है इसके लिए वीडियो देखें

इस देसी जुगाड़ ने दिलाया फसल को नीलगाय और कीट-पतंगों से छुटकारा

“खेत में हर दिन नीलगाय आने से फसलों का बहुत नुकसान होता था, रोशनी को देखकर नीलगाय खेत में नहीं आती है, इसलिए मैंने ढिबरी (दीपक) का एक देसी तरीका अपने खेत में लगाया। इसकी रोशनी से नीलगाय और कीट-पतंग फसल को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं।” ये कहना है लखीमपुर के किसान गुड्डू कुमार (41 वर्ष) का।

गुड्डू द्वारा अपने खेत में रात के समय ढिबरी जलाने वाला तरीका इसलिए कारगार है क्योंकि किसानों का मानना है कि अगर रात के समय खेतों में रोशनी रहती हैं तो नीलगाय खेत में इस डर से नहीं आती है क्योंकि उसे लगता है खेत में कोई बैठा है। गुड्डू उत्तरप्रदेश के लखीमपुर जिला मुख्यालय से 35 किलोमीटर दूर मितौली ब्लॉक के मैनहन गाँव के रहने वाले हैं।

गुड्डू अपने देशी तरीके का अनुभव साझा करते हुए बताते हैं, “ खेत में कीटपतंगों को रोकने के लिए बाजार से दवा डाल-डालकर परेशान हो गया था। दवा बहुत महंगी मिलती थी, जो खेत के उपजाऊंपन को तो कम कर ही रही थी, साथ ही इसे खाकर हम बीमार भी पड़ रहे थे। नीलगाय तो जिस खेत में घुस जाती वो पूरी फसल को ही बर्बाद करके निकलती।”

वो आगे बताते हैं, “कुछ साल पहले मैंने अपने धान के खेत में एक टीन के डिब्बे में एक गोला करके उसके अन्दर ढिबरी जलाकर, बांस के एक डंडे में लगाकर खेत के एक कोने पर लगा दिया। इसकी रोशनी से धान की पूरी फसल में न तो नीलगाय आयी और न ही कीट-पतंग लगें। इस साल भी मैंने गन्ने के खेत में इस यंत्र को लगाया था,

अब गन्ना लम्बा हो गया है इसलिए हटा दिया है।” गुड्डू की तरह अगर कोई भी किसान इस यंत्र को अपने खेत में लगाते हैं तो वो फसल के नुकसान से तो बचेंगे ही साथ ही कीटनाशक के इस्तेमाल से भी बच जायेंगे। जिससे उन्हें पैसे की बचत, खेत की मिट्टी और किसान की सेहत दोनों बेहतर होगी।

“बहुत से कीट जो फसल को नुकसान पहुंचाते हैं, इस यंत्र को लगाने से वो कीट फसल को नुकसान पहुंचाने की बजाए इस यंत्र की तरफ आकर्षित हो जाते हैं, या फिर जहाँ यह यंत्र लगा होता है उससे दूर भागते हैं। मिट्टी का तेल फेरोमोन की तरह काम करता है, इसलिए ढिबरी की रोशनी के अलावा इसके तेल की गंध से भी कीटों को आकर्षित या अनाकर्षित करती है।” वो आगे बताते हैं, “इस वजह से ज्यादातर कीट इस यंत्र के आसपास मंडराते हैं और ढिबरी की लौ में या तो मर जाते हैं या फिर इसी यंत्र के आसपास रहते हैं, जिस वजह से फसल को नुकसान नहीं पहुंचता है।”

गुड्डू बताते हैं, “हर शाम ढिबरी में मिट्टी का तेल भरकर रख देते थे, महीने में तीन से चार लीटर तेल खर्च होता है। धान के अलावा किसी भी सब्जी वाली फसल या फिर किसी भी फसल में इस ढिबरी को लगाया जा सकता है। ढिबरी, टीन के डिब्बे और मिट्टी के तेल के अलावा इसमें कोई भी खर्चा नहीं है।”

बारिश के मौसम में रात के अँधेरे में हमारे घरों में जहाँ रोशनी जल रही होती हैं, वहां कीट-पतंगों की भरमार होती है। पहले के बुजुर्ग थाली में पानी भरकर रख देते थे जिससे कीट प्रकाश की तरफ आकर्षित होते थे और उस पानी में गिर जाते थे। जिससे उनके पंख भीग जाते थे, और वह उड़ने में अक्षम हो जाते थे। ज्यादातर कीट पतंगे दीपक की लौ में जलकर मर भी जाते थे। इस तरह ग्रामीणों के भोजन में ये कीट पतंग नही गिरते थे। ये उनके द्वारा अपनाया गया देशी तरीका था जो बहुत ही कारगार था।

फसल की बीमारी की फोटो खींचे ,यह ऐप एक मिंट में बताएगी ईलाज

अगर आप घर पर तरह तरह के फूलों और बागवानी पौधे उगाना पसंद करते हैं, तो प्लांटिक्स ऐप आपके गार्डेन की और भी अच्छी तरह से देखभाल करने में आपकी मदद कर सकती है।बागवानी फसलों में सबसे अधिक खतरा कीटों का होता है।

फलों व फूलों के पौधों में कई तरह के कीड़े लग जाते हैं, जिनकी पहचान न हो पाने से किसानों को काफी नुकसान सहना पड़ता है। बागवानी फसलों को कीटों के बचाने के लिए प्लांटिक्स ऐप में एक बहुत ही अच्छा फीचर है।

अगर आपके बगीचे या फिर खेत में लगे पौधों में आपको किसी कीट का प्रकोप नज़र आता है, पर आप उसे पहचान नहीं पा रहे हैं, तो आप प्लांटिक्स ऐप पर जाकर उस पौधे के सबसे अधिक प्रकोप वाले हिस्से की तस्वीर खीच लें।

 

खीची गई तस्वीर को ऐप में लगा सेंसर सिस्टम पहचान लेगा और आपको यह बता देगा कि पौधे में कौन सा कीट लगा है। इससे साथ साथ ऐप में उस कीट से पौधे को बचाने का तरीका भी बताया जाता है, जो आपकी फसल में होने वाले नुकसान को कम करने में कारगर साबित होगा।

प्लांटिक्स ऐप में बागवानी और कृषि से संबंधित फसलों की एक ई-लाइब्रेरी का भी ऑप्शन है। आप इसकी मदद से तरह तरह की फसलों में लगने वाले कीट व उनके जैविक व रासायनिक उपचारों की जानकारी भी ले सकते हैं।

कैसे डॉउनलोड करें प्लांटिक्स ऐप

प्लांटिक्स ऐप गूगल प्ले स्टोर पर नि:शुल्क उपलब्ध है, इसे डाउनलोड करने के लिए आप किसी भी एंड्रॉइड फोन में गूगल प्ले स्टोर पर जाकर Plantix – grow smart मोबाइल ऐप को डाउनलोड कर सकते हैं।

यह ऐप कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो भी देखें