किसान ने तैयार किया कमाल का मिनी ट्रेक्टर, जाने इसमें क्या है खास

एक मिनी ट्रैक्टर जो जापान की नवीनतम तकनीक से काठियावाड़ी पाटीदार निलेशभाई भालाला द्वारा तैयार किया गया है, जिसमें एक आकर्षक डिजाइन है, इस ट्रेक्टर का नाम नैनो प्लस (Neno Plus) है ।

10 HP पावर वाला यह मिनी ट्रेक्टर एक छोटे किसान के सारे काम कर सकता है । ट्रेक्टर से आप जुताई ,बिजाई ,निराई गुड़ाई ,भार ढोना,कीटनाशक सप्रे आदि काम कर सकते है ।जो किसानों का काम आसान बना देती है।यह 2 मॉडल में आता है एक मॉडल में 3 टायर लगे होते है और दूसरे में 4 टायर लगे होते है ।

इसकी अनूठी कॉम्पैक्ट डिजाइन और एडजस्टेबल रियर ट्रैक चौड़ाई इसे दो फसल पंक्तियों के बीच और साथ ही इंटर कल्चर एप्लीकेशनों की किस्म के लिए बगीचों में संचालन के लिए आदर्श बनाता है।

यह किसानों द्वारा बड़े पैमाने पर कई एप्लीकेशनों के लिए प्रयोग किया जाता है जैसे कल्टीवेशन, बुवाई, थ्रेशिंग, स्प्रिंग संचालन के साथ ही ढुलाई। इसकी एक और खास बात यह है के इसके साथ आप स्कूटर का काम भी ले सकते है

अगर आप इस ट्रेक्टर को खरीदना चाहते है जा कोई और जानकारी लेना चाहते है तो इस नंबर (9979008604) पर संपर्क कर सकते है।

 

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एक साल में छह बार कटेगी गेहूं और सफेद चने की फसल, नई तकनीक का कमाल

ये खबर वाकई हैरान कर देने वाली है। एक ऐसी तकनीक खोज ली गई है, जिसकी बदौलत साल में 6 बार गेहूं, सफेद चने और जौ की फसल ली जा सकती है। इस तकनीक पर काम भी कि‍या जा चुका है। यह तकनीक नासा के उस प्रयोग से आई है, जि‍समें अंतरि‍क्ष में गेहूं उगाने की कोशि‍श की जा रही है। नासा के इसी एक्‍सपेरि‍मेंट से यह आइडि‍या मि‍ला,जि‍सके इस्‍तेमाल से फसलों का उत्‍पादन तीन गुना तक बढ़ाया जा सकता है।

यह तकनीक रेगुलर यूज में आने लगी तो हमारी बहुत बड़ी समस्‍या का हल नि‍कल जाएगा क्‍योंकि‍ एक अनुमान के मुताबि‍क, दुनि‍या को वर्ष 2050 में मौजूदा प्रोडक्‍शन से 60 से 80 फीसदी ज्यादा अनाज पैदा करना होगा।

तेजी से बढ़ेंगे पौधे

यूनिवर्सि‍टी ऑफ क्‍वींसलैंड (UQ) के सीनि‍यर रि‍सर्च फैलो ली हिक्‍की ने कहा, हमने सोचा कि क्‍यों न हम नासा की इस तकनीक का यूज धरती पर तेजी से पौधे उगाने के लि‍ए करें। इस तरह से हम पौधों के ब्रीडिंग प्रोग्राम को तेज कर देंगे।

नासा ने अंतरि‍क्ष में गेहूं उगाने का जो प्रयोग कि‍या था उसमें गेहूं पर लगातार रोशनी रखी गई, ताकि पौधे तेजी से बीज बनाने का काम शुरू कर दें। आगे पढ़ें

छह बार कटेगी फसल

उन्‍होंने कहा कि खासतौर से बनाए गए ग्‍लासहाउस में तेजी से ब्रीडिंग करने की इस तकनी की बदौलत गेहूं, सफेद चना और जौ की एक साल में छह बार खेती हो सकती है वहीं अन्‍य कुछ प्‍लांट की खेती 4 बार की जा सकती है। ये ग्‍लासहाउस सामान्‍य से काफी अलग होता है।

उन्‍होंने कहा कि‍ हमारे प्रयोग में यह बात सामने आई है कि‍ नि‍यंत्रि‍त मौसम में पौधों को लंबे समय तक रोशनी में रखने से पौधों की जो ग्रोथ हुई वह काफी अच्‍छी रही और कभी कभी तो सामान्‍य ग्‍लासहाउस में उगाए जाने वाले पौधों से भी बेहतर रही।

लो टनल में ऐसे करें बे-मौसम सब्ज़ियों की खेती, कमाएं अधिक मुनाफा

बहुत कम लोग लो टनल  में खेती करने के बारे में जानते होंगे। यह खेती की एक ऐसी विधि है जिसके द्वारा किसान बे-मौसम सब्जियों की खेती कर सकते हैं, जिससे वो अधिक कमाई कर सकते हैं।

”इस तकनीक के जरिए किसान बे-मौसमी सब्जियां पैदा कर सकते हैं। इसमें सब्जियां उगाने पर सर्दी-गर्मी और बीमारियों का प्रभाव न के बराबर हो जाता है जिससे पैदावार भी काफी अच्छी होती है।” उद्यान विभाग के ज्वाइंट डायरेक्टर राघवेन्द्र प्रताप सिंह ने लो पॉली टनल विधि के बारे में बताया, ”बागवानी विभाग इस तकनीक को अपनाने वाले किसानों को प्रोत्साहित कर रहा है और लो पॉली-टनल बनाने पर सब्सिडी दे रहा है।”

उद्यान विभाग के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2016 में 27937 किसानों को लो पॉली टनल विधि के लिए सब्सिड़ी दी गई थी।

उन्होंने बताया, ”इस विधि से जब किसान सब्ज़ियों की खेती करते हैं बीजों का जमाव अच्छे से हो जाता है और एक महीने पहले सब्जिया आनी शुरू हो जाती हैं। इससे किसान को सब्ज़ियों के काफी अच्छे रेट मिल जाते हैं।” इसका लाभ यूपी के हर जिले के किसान ले सकते हैं।

पॉलीटनल तकनीक क्या हैं?

इस तकनीक में एक तरह से टनल (सुरंग) में सब्जियां पैदा की जाती हैं। लोहे के सरिये और पॉलीथिन शीट से छोटी व लंबी टनल बनाई जाती हैं। इन टनल में सब्जियों को बोने के बाद ड्रिप सिस्टम से सिंचाई की जाती है। टनल की मदद से सब्जी की फसल को ज्यादा गर्मी और सर्दी से बचाया जा सकता है। मौसम फसल के अनुकूल होने के बाद टनल को हटा दिया जाता है। इस तरह से किसान पॉली-टनल में अगेती फसल पैदा कर सकते हैं।

पॉलीटनल तकनीक से लाभ

  • पॉलीटनल तकनीक से वर्ष के किसी भी मौसम में चाहे अधिक गर्मी एवं ठंड हो उस समय भी सब्जियों की पौध सफलतापूर्वक तैयार की जा सकती है।
  • इस विधि से पौधे तैयार करने पर बीज का जमाव लगभग शत्-प्रतिषत होता है। जमाव के बाद पौधों का विकास समुचित ढंग से होता है ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पॉलीटनल के अन्दर का तापमान बीज के जमाव एवं पौधों के बढ़वार के लिए आदर्श होता है।
  • पॉलीटनल में पौध उगाने से बीज जमाव के बाद दिन में धूप के समय पॉलीथीन को हटा देते हैं, जिससे पौधों का धूप के सम्पर्क में आने से उनका कठोरीकरण होता है ऐसे पौधों को खेत में रोपाई करने से उनकी मृत्यु दर नहीं के बराबर होती है।
  • बीज का जमाव शीघ्र होने और पौधों का समुचित बढवार से पौध तेयार करने में समय कम लगता है।
  • पॉलीटनल तकनीक से पौध उगाने पर कीटों व बीमारियों का प्रकोप भी अपेक्षाकृत कम होता है।

ये है अरहर का पेड़,एक पेड़ से मिलती है 12 किल्लो तक दाल

सरकार का प्रयास है कि देश के हर व्यक्ति की थाली में दाल हो और इसके लिए कई स्तरों पर प्रयास भी हो रहे हैं। इसी बीच अगर दाल की एक ऐसी प्रजाति जिससे दाल के उत्पादन को कई गुना बढ़ाया जा सके, और वो प्रजाति अगर अरहर की हो तो ये काफी अच्छी ख़बर हो सकती है।

अरहर की दाल की खपत देश में सबसे ज़्यादा है और इस दाल में प्रोटीन की मात्रा भी काफी अधिक होती है। आमतौर पर अरहर के लगभग 4 – 5 फीट के झाड़ जैसे दिखने वाले पौधे होते हैं और हर पौधे में लगभग 5-6 शाखाएं होती हैं लेकिन क्या आपने ऐसा अरहर का पौधा देखा है जो पेड़ जैसा दिखता हो। जी हां, अरहर का पेड़।

ये है खासियत

अरहर के इस पौधे का तना कुछ मोटा होता है और एक पेड़ में लगभग 60 शाखाएं होती हैं। इन शाखाओं पर फलियों के गुच्छे होते हैं जिनमें अधिक संख्या में फलिया होती हैं। कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर के प्रोफेसर डॉ. गजेंद्र सिंह तोमर बताते हैं, ”छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर के गाँव गगोली में कई खेतों की मेढ़ों पर इस अरहर के पेड़ देखने को मिल जाते हैं।

” वह बताते हैं कि अरहर के इस पौधे में 8 से 12 किलोग्राम दाना निकल आता है। इसका दाना कुछ मोटा, बड़ा और चमकीला होता है। इसकी फलियां 2 – 3 बार तोड़ी जा सकती हैं। फसल के परिपक्व होने का समय जनवरी से अप्रैल के बीच का होता है।

है बहुवर्षीय फसल

डॉ. तोमर बताते हैं कि यह अरहर की बहुवर्षीय फसल होती है। जुलाई-अगस्त में खरीफ की फसल की बुवाई के समय इसका बीज डाल देना चाहिए। पौधे से पौधे की दूरी लगभग 2 से 3 मीटर होनी चाहिए। फसल 6 महीने में तैयार हो जाती है।

एक पेड़ से दो से तीन बार फलियों को तोड़ा जा सकता है। गर्मी तेज़ होने पर यह पौधा सूखने लगता है। उस वक्त इसके तने को ज़मीन से 4 से 5 इंच छोड़कर काट देना चाहिए और समय – समय पर एक-दो गिलास पानी डालते रहना चाहिए जिससे ये सूखे नहीं।

सघनीकरण विधि से अरहर की खेती करने से ज्यादा पैदावार होगी

जब बारिश होती है तो ये पौधा फिर से हरा होने लगता है और फिर धीरे -धीरे बड़ा होकर इसमें फलियां आने लगती हैं। एक पौधे की उम्र लगभग 3 से 4 साल होती है। इसके बाद दोबारा बीज डालकर इसे लगाया जा सकता है। इस फसल में बस 2 से 3 बार कीटनाशकों का छिड़काव करने की ज़रूरत पड़ती है।

अरहर का पौधा बहुवर्षीय होता है या अगर पानी-खाद देते रहे तो चार पांच साल तक चलता रहता है। छत्तीसगढ़ की अरहर की किस्म भी कोई जंगली किस्म होगी जिसे किसानों ने मेड़ों पर अरहर के पौधे लगाए हैं।

डॉ. पुरुषोत्तम, वैज्ञानिक, भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान

अब भारत में करें काले टमाटर की खेती ,शुगर के मरीजों के लिए है रामबाण

आगर आपसे कोई पूछे कि क्या आपने काले टमाटर के बारे में सुना है, तो ज्यादातर लोगों का जवाब नहीं में होगा। अपने आप में खास इस टमाटर को काफी पसंद किया जा रहा है और अब इसके बीज भारत में भी उपलब्ध हैं। अंग्रेजी में इसे इंडि‍गो रोज़ टोमेटो कहा जाता है। पहली बार भारत में काले टमाटर की खेती होने जा रही है।

हिमांचल प्रदेश के सोलन जिले के ठाकुर अर्जुन चौधरी बीज विक्रेता हैं। अर्जुन चौधरी के पास काले टमाटर के बीज उपलब्द हैं। उन्होंने बताया, ”मैने काले टमाटर के बीज ऑस्ट्रेलिया से मंगवाए हैं। इसकी खेती भी लाल टमाटर की तरह ही होती है। इसके लिए कुछ अलग से करने की जरूरत नहीं होगी।” उन्होंने ने बताया, ”अभी तक भारत में काले टमाटर की खेती नहीं की जाती है, इस वर्ष पहली बार इसकी खेती की जाएगी।” काले टमाटर के बीज का एक पैकेट जिसमें 130 बीज होते हैं 110 रुपए का मिलता है।

यह टमाटर भारत में पहली बार उगया जाएगा।

काला टमाटर की नर्सरी सबसे पहले ब्रिटेन में तैयार की गई थी, लेकिन आब इसके बीज भारत में भी उपल्बध हैं। किसान इसके बीज ऑनलाइन भी खरीद सकते हैं।

अर्जुन चौधरी ने इसकी खासियत बताते हुए कहा, ”इसकी खास बात यह है कि इसकों शुगर और दिल के मरीज भी खा सकते हैं।” यह बाहर से काला और अंदर से लाल होता है। इसको कच्‍चा खाने में न ज्यादा खट्टा है न ज्यादा मीठा, इसका स्वाद नमकीन जैसा है।

यह बाहर से काला और अंदर से लाल होता है।

”यह टमाटर गर्म क्षेत्रों के लिए अच्छे से उगाया जा सकता है। ठंढे क्षेत्रों में इसे पकने में दिक्कत होती है,” अर्जुन चौधरी बताते हैं, ”क्योंकि यह टमाटर भारत में पहली बार उगया जा रहा है इस लिए इसके रेट भी अच्छे मिलेंगे।”

इसको पकने में करीब चार महीने का समय लगता है।

उन्होंने बताया कि जनवरी महीने में इसकी नर्सरी की बुवाई की जा सकती है और मार्च के अंत तक इसकी नर्सरी की रोपाई की जा सकती है। यहा टमाटर लाल टमाटर के मुकाबले थोड़ा देर से होता है। लाल टमाटर करीब तीन महीने में पक कर निकलना शुरू हो जाता है और इसको पकने में करीब चार महीने का समय लगता है।

शुगर के मरीजों के लिए है रामबाण

अगर आप शुगर से लड़कर थक चुके हैं तो काला टमाटर आपके लिए रामबाण साबित हो सकता है। इस टमाटर को जेनेटिक म्यूटेशन के द्वारा बनाया गया है। काले टमाटर में फ्री रेडिकल्स से लड़ने की क्षमता होती है। फ्री रेडिकल्स बहुत ज्यादा सक्रिय सेल्स होते हैं जो स्वस्थ सेल्स को नुकसान पहुंचाते हैं। इस तरह ये टमाटर कैंसर से रोकथाम करने में सक्षम है।

ये टमाटर आंखों के लिए भी बहुत फायदेमंद हैं। ये शरीर की विटामिन ए और विटामिन सी की जरुरत को पूरा करता है। विटामिन ए आंखों के लिए बहुत फायदेमंद होता है।अगर आप नियमित रूप से काले टमाटरों का सेवन करते हैं तो आप दिल से जुड़ी बीमारियों से भी बचे रह सकते हैं। इसमें पाया जाने वाले एंथोसाइनिन आपको हार्ट अटैक से बचाता है और आपके दिल को सुरक्षा प्रदान करता है।

बाजार में मिलने वाले नकली दूध की आसानी से ऐसे करें पहचान

आज के समय में बाजारों में नकली चीजों की भरमार है और इन्हीं चीजों के इस्तेमाल से हमारी जिंदगी बीमारियों से घिर गई है. आपको शायद न पता हो, लेकिन इन मिलावट वाली चीजों के इस्तेमाल से कम उम्र में ही जानलेवा बीमारियां पैदा हो जाती हैं.

आज के समय में चाहे आप हरी सब्जियां ले रहे हों, फल खरीद रहे हों या फिर दूध हीं क्यों ना ले रहे हों, कोई भी चीज आपको असली नहीं मिलेगी. लेकिन हमारी मजबूरी है कि हमें ये सारी चीजें खरीदनी पड़ती हैं और इस्तेमाल करनी पड़ती हैं. यूं तो इन चीजों के असली और नकली होने की पहचान करना थोड़ा कठिन होता है, फिर भी हम आपको नकली दूध की पहचान का आसान तरीका बता रहे हैं.

ऐसे जान सकते हैं आप असली और नकली दूध का फर्क

  • नकली दूध की पहचान करने के लिए उसे सूंघें. अगर आपको लगता है कि दूध से साबुन जैसी महक आ रही है, तो दूध सिंथेटिक यानी की नकली है. जबकि असली दूध से ऐसी कोई गंध नहीं आती.
  • आपको बता दें कि दूध असली है तो उसका स्वाद मीठा होगा, लेकिन अगर नकली दूध है तो इसका स्वाद मीठा नहीं बल्कि कड़वा होगा.
  •  दूध में पानी की मिलावट की पहचान आप इस तरह से कर सकते हैं. दूध की कुछ बूंदें फर्श पर गिरा कर देखें, अगर दूध बहने लगता है और सफेद धार का निशान बनता है, तो दूध में पानी की कोई मिलावट नहीं है.

  •  हम आपको ये भी बता दें कि असली दूध को अगर आप अपने हाथों में लेकर रगड़ेंगे तो उसमें कोई चिकनाहट नहीं होगी. लेकिन अगर आपक नकली दूध को रगड़ेंगे तो डिटरजेंट जैसी चिकनाहट महसूस होगी.
  •  असली दूध को जब आप उबालेंगे तो उसका रंग नहीं बदलेगा. जबकि नकली दूध को उबालने पर उसका रंग हल्का पीला पड़ जाता है.

 

इस तरीके को अपनाकर आप लौकी की एक बेल से ले सकते है 800 लौकी

आज हम बात करेंगे लौकी के एक ही पौधे से ज्यादा से ज्यादा फल लेने के बारे में। औसतन एक पौधे (बेल) से 50-150 लौकियां निकलती हैं। लेकिन अगर थोड़ी मेहनत और तकनीकी की मदद ली जाए तो एक ही बेल से 800 तक लौकियां ली जा सकती हैं.. यानि आप का मुनाफा की गुना बढ़ जाएगा, जबकि लागत ज्यादा प्रभावित नहीं होगी।

लौकी की खेती करने वाले किसान इस तकनीक से लौकी की ज्यादा फसल उगाकर फायदा उठा सकते हैं। सभी तरह के सजीव में नर और मादा होते हैं। ऐसे ही सब्जियों में भी नर और मादा दो तरह के फूल होते हैं। लेकिन लौकी की बेल में नर फूल ही होते हैं। लौकी में एक विशेष तरह की तकनीकि का इस्तेमाल करने पर ही उसमें मादा फूल आते हैं और लौकी की एक बेल से लौकी का ज्यादा उत्पादन किया जा सकता है। इस तकनीकि का नाम है 3 ‘जी’।

ये है तरीका

लौकी की बेल की एक खासियत है कि उसकी बेल चाहे जितनी भी लंबी हो जाए उसमें नर ही फूल आते हैं। इसको रोकने के लिये एक नर फूल छोड़कर बाकी सारे नर फूल तोड़ दें। उसके कुछ दिनों के बाद उसी बेल में साइड से एक शाखा निकलने लगेगी अब उस शाखा में आने वाले जितने नर फूल हैं उनमें से एक को छोड़कर बाकी के सारे नर फूल तोड़ दें।

अब उस शाखा को किसी लकड़ी से बाध दीजिये ताकि वो चलती रहे। ध्यान रखें तीन से ज्यादा शाखाएं न होने दें। अब कुछ दिन के बाद बेल से तीसरी शाखा निकलने लगेगी। अब इस शाखा के हर पत्ते में मादा फूल आएगा। यही मादा फूल फल में बदल जाएगा। मादा फूल की पहचान के लिये बता दें कि ये कैप्सूल की लंबाई में होगा। इस तरीके को अपना कर लगभग 300 से 400 तक लौकी एक बेल में आएंगी।”

ये तरीका अपना कर कर सकते हैं 800 तक लौकी का उत्पादन

3 जी तकनीकि में कुछ एहतियात के साथ अगर लौकी की खेती करें तो एक बेल से लगभग 800 तक लौकी का भी उत्पादन किया जा सकता है। ये काफी हद तक मौसम पर भी निर्भर करता है। और 3 जी की प्रक्रिया को मचान पर करने से लगभग 800 तक की लौकी का उत्पादन कर सकते हैं। ध्यान रहे कि 20 लौकी के पौधे में ये प्रक्रिया अपनाने के बाद 21 वें पेड़ में कुछ नहीं किया जाएगा। इसके बाद 22 वें पेड़ से फिर से वहीं प्रक्रिया दोहराते रहिये। मान लीजिये कि एक हेक्टेयर में 500 लौकी के पौधे लगाए गए तो 20 पौधों के बाद 21 वें पौधे पर ये प्रक्रिया न अपनाएं उसके बाद 22 वें पेड़ से फिर से वो प्रक्रिया दोहराएं।

अगर चाहते हैं लौकी लगे देखने में अच्छी तो ये तरीका अपनाएं

इसके लिये जब लौकी छोटी हो तो उसे हार्ड पारदर्शी प्लास्टिक से बांध दीजिये। ध्यान रहे कि पॉलिथीन का साइज वही हो जो लौकी का है। मान लीजिये अगर लौकी का साइज दो फीट है तो पॉलिथीन की लंबाई भी दो फीट की होनी चाहिये। यहां पर ये भी ध्यान रखें कि पॉलिथीन दूसरे छोर से फटी होनी चाहिये। ताकि लौकी में वाष्पोत्सर्जन हो सके। इससे लौकी की क्वालिटी अच्छी रहेगी। इस क्रिया को अपनाने से लौकी अन्य लौकियों से ज्यादा आकर्षक लगेगी और किसान को कीमत भी अच्छी मिलेगी।

स्वाद पर असर

इस प्रयोग से अगर आप लौकी की खेती करते हैं तो लौकी के स्वाद में कोई परिवर्तन नहीं होता है। उसका स्वाद प्राकृतिक ही रहता है। वैसे तो लौकी हर मौसम में होती है। लेकिन रबी के मौसम में लौकी की खेती अच्छी होती है।

(3जी तकनीकी का वीडियो नीचे देखिए)

20 रुपए की ये शीशी किसानों को कर सकती है मालामाल, पढ़िए पूरी जानकारी

खेती-किसानी में सबसे ज्यादा पैसा उर्वरक पर खर्चा होता है। डीएपी यूरिया और दूसरे फर्टीलाइजर एक तरफ जहां काफी महंगे होते हैं वहीं इनके लगातार इस्तेमाल से जमीन की उर्वरा शक्ति भी घटती है। पहले की तरह किसान अब खेत में गोबर का कम इस्तेमाल करते हैं और फसलों को अवशेष (पुवाली आदि) खेत में नहीं छोड़ते, जिसके चलते जमीन में कार्बन तत्व घट रहे हैं।

इसकी एक वजह जैविक खरीदे से कंपोस्ट (खाद) बनाने में काफी समय लगता है। उर्वरक मंगाने में सरकार के भी डालर खर्च होते हैं इसलिए वो जैविक खेती और किसान खुद पर खाद बनाएं इसके लिए प्रेरित कर रही है।

भारत सरकार के कृषि विभाग के जैविक कृषि केंद्र ने भी एक वेस्ट डीकंपोजर बनाया है। राष्‍ट्रीय जैवि‍क खेती केंद्र ने इस तरह वेस्ट डीकंपोजर के 40 मिलीलीटर शीशी की कीमत 20 रुपए रखी है। संस्थान का दावा है इससे कुछ ही देर में कई सौ लीटर तरल खाद तैयार ( लिक्‍वि‍ड खाद) तैयार हो जाती है।

इसके अलावा आप इसकी मदद से घरेलू कचरे से कई एकड़ जमीन के लि‍ए बेहतरीन खाद भी तैयार कर सकते हैं। इसकी सबसे बड़ी खासि‍यत है कि‍ यह केवल 20 रुपए (40 मिलीलीटर) में आता है और दूसरी बात ये है कि‍ इसे कोई प्राइवेट कंपनी नहीं बल्‍कि‍ खुद सरकार दे रही है।

इसका इस्तेमाल करने के लिये दी जाती है ट्रेनिंग

इसका प्रयोग फसलों की सिंचाई, तैयार फसल में छिड़काव और बीजों के शोधन में किया जा सकता है। केंद्र सरकार न केवल इस प्रोडक्‍ट को उपलब्‍ध कराता है बल्‍कि‍ कि‍सानों को इसे यूज करने की ट्रेनिंग भी देता है। इसके लि‍ए बाकायदा वीडि‍यो भी बनाए गए हैं। खेतीबाड़ी में रासायनों के इस्‍तेमाल को कम करने के मकसद से ही इसका नि‍र्माण कि‍या गया है। केंद्र के मुताबि‍क, जि‍न भी कि‍सानों ने इसका इस्‍तेमाल कि‍या है, उनके न केवल पैसे बचे हैं बल्‍कि‍ अच्‍छा उत्‍पादन भी हासि‍ल कि‍या है।

देखिए पूरा वीडियो कैसे काम करती है ये ‘दवा’

कि‍सान उठा रहे हैं लाभ

केंद्र के नि‍देशक डॉक्‍टर कि‍शन चंद्रा ने इस संबंध में एक वीडि‍यो भी अपलोड कि‍या है, जि‍समें वह इसके फायदों के बारे में बता रहे हैं। चंद्रा कहते हैं कि‍ सभी कि‍सान बेधड़क इसका यूज कर सकते हैं। उन्‍होंने बताया कि‍ पहले इस तरह के फॉर्मूले को प्राइवेट इंडस्‍ट्री को बेच दि‍या जाता था और वह प्रोडक्‍ट बनाकर बाजार में लाते थे। मगर उसकी क्‍वालि‍टी सही नहीं होती थी इसलि‍ए इस बार सरकार ने यह फैसला लि‍या है कि‍ वेस्‍ट डीकंपोजर को सरकार खुद ही कि‍सानों तक पहुंचाएगी।

कि‍स तरह से काम करता है यह प्रोडक्‍ट

यह एक छोटी सी शीशी में होता है। इस्‍तेमाल करने के लि‍ए 200 लीटर पानी में 2 किलो गुड़ के साथ इसे डालकर अच्‍छे से मि‍ला दें। गर्मियों में दो दिन और सर्दियों में 4 दिन तक इसे रखें। इसके बाद यह यूज करने के लि‍ए तैयार हो जाता है। इस दौ सौ लीटर घोल से एक बाल्टी घोल को फिर 200 लीटर पानी में मिला लें। इस तरह यह घोल बनाते रहें और खेत की सिंचाई करते समय पानी में इस घोल को डालते रहें। ड्रिप सिंचाई के साथ भी इस घोल का प्रयोग कर सकते हैं। इससे पूरे खेत में यह फैल जाएगा। इसके अलावा फसलों की बीमारी को दूर करने के लिए हर एक महीने में एक बार वेस्‍ट डीकंपोजर का छिड़काव कर सकते हैं।

इस तरह से बनाएं खाद और बीजों का शोधन

कम्पोस्ट खाद बनाने के लिए 1 टन कूड़े-कचरे में 20 लीटर वेस्‍ट डीकंपोजर का तैयार घोल छिड़क दें। इसके ऊपर एक परत बिछा दें और फिर घोल का छिड़काव करें। फि‍र सब ढक कर छोड़ दें। तकरीबन 40 दिन में कम्पोस्ट खाद तैयार हो जाएगी। केंद्र से मि‍ली जानकारी के मुताबि‍क, एक शीशी से 20 किलो बीज का शोधन किया जा सकता है। एक शीशी डिकम्पोस्ट को 30 ग्राम गुड़ में मिला दें। यह मिश्रण 20 किलो बीज के लिए पर्याप्त है। शोधन के आधे घंटे बाद बीज की बुआई कर सकते हैं।

इस तरह से पाएं ये प्रोडक्‍ट

वेस्‍ट डीकंपोजर राष्‍ट्रीय जैवि‍ खेती केंद्र के सभी रीजनल सेंटर पर उपलब्‍ध है। यह गाजि‍याबाद, बंगलुरु, भुवनेश्‍वर, पंचकूला, इंम्‍फाल, जबलपुर, नागरपुर और पटना के रीजनल सेंटर से प्राप्‍त कि‍या जा सकता है

अब हाइड्रोजेल से सिर्फ एक सिंचाई से होगी फसल

इस हालात में खेती को अगर बचाना है तो ऐसे विकल्पों पर विचार करना होगा जिसमें सिंचाई में पानी की बर्बादी न हो और पूरी कवायद में hydrogel (हाइड्रोजेल) किसी चमत्कार से कम नहीं है।अब बार बार सिंचाई करने की जरूरत नहीं है क्योंकि सिर्फ एक बार सिंचाई करने पर इतना पानी सोख लेता है की बाद में सिंचाई की जरूरत ही नहीं रहती ।

दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) जिसे पूसा संस्थान भी कहा जाता है, के वैज्ञानिकों ने ही इस अद्र्घ-कृत्रिम हाइड्रोफिलिक पॉलिमर जेल का विकास किया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि इस जेल में कई ऐसी खासियत हैं जो जैव चिकित्सा में इस्तेमाल किए जाने वाले दूसरे तरल पदार्थों को अवशोषित करने वाले जेल से उसे अलग करती है।

इसे ‘पूसा हाइड्रोजेल’ नाम दिया गया है । इस तरह प्रति हेक्टेयर जमीन में केवल 2.5 से 3.75 किलो जेल डालने की जरूरत होती है। अब तक दुनिया में ऐसे जितने भी जेल तैयार किए गए हैं उनकी तकरीबन 10 किलो मात्रा एक हेक्टेयर जमीन में डालनी पड़ती है।

हाल ही में कृषि विज्ञानियों ने एक शोध किया है जिसमें पता चला है कि hydrogel (हाइड्रोजेल) की मदद से बारिश और सिंचाई के पानी को स्टोर कर रखा जा सकता है और इसका इस्तेमाल उस वक्त किया जा सकता है जब फसलों को पानी की जरूरत पड़ेगी।

hydrogel (हाइड्रोजेल) पोलिमर है जिसमें पानी को सोख लेने की अकूत क्षमता होती है और यह पानी में घुलता भी नहीं। hydrogel (हाइड्रोजेल) बायोडिग्रेडेबल भी होता है जिस कारण इससे प्रदूषण का खतरा भी नहीं रहता है।

शोधपत्र में कहा गया है कि hydrogel (हाइड्रोजेल) खेत की उर्वरा शक्ति को तनिक भी नुकसान नहीं पहुँचाता है और इसमें 400 गुना पानी सोख लेने की क्षमता होती है। शोधपत्र में कहा गया है कि एक एकड़ खेत में महज 1 से 2 किलोग्राम hydrogel (हाइड्रोजेल) ही पर्याप्त है।hydrogel (हाइड्रोजेल) 40 से 50 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी खराब नहीं होता है, इसलिये इसका इस्तेमाल ऐसे क्षेत्रों में किया जा सकता है, जहाँ सूखा पड़ता है।

शोधपत्र के अनुसार, खेतों में hydrogel (हाइड्रोजेल) का एक बार इस्तेमाल किया जाये, तो वह 2 से 5 वर्षों तक काम करता है और इसके बाद ही वह नष्ट हो जाता है लेकिन नष्ट होने पर खेतों की उर्वरा शक्ति पर कोई नकारात्मक असर नहीं डालता है, बल्कि समय-समय पर पानी देकर फसलों और खेतों को फायदा ही पहुँचाता है।

hydrogel (हाइड्रोजेल) का इस्तेमाल उस वक्त किया जा सकता है जब फसलें बोई जाती हैं। फसलों के साथ ही इसके कण भी खेतों में डाले जा सकते हैं।hydrogel (हाइड्रोजेल) के इस्तेमाल को लेकर कई प्रयोगशालाओं में व्यापक शोध किया गया है और इन शोधों के आधार पर ही यह शोधपत्र तैयार किया गया है।

शोधपत्र में कहा गया है कि मक्के, गेहूँ, आलू, सोयाबीन, सरसों, प्याज, टमाटर, फूलगोभी, गाजर, धान, गन्ने, हल्दी, जूट समेत अन्य फसलों में hydrogel (हाइड्रोजेल) का इस्तेमाल कर पाया गया कि इससे उत्पादकता तो बढ़ती है, लेकिन पर्यावरण और फसलों को किसी तरह का नुकसान नहीं होता है।

Hydrogel (हाइड्रोजेल) कैसे काम करता है ?

hydrogel (हाइड्रोजेल) अपने भार के मुकाबले 400 गुना से भी ज्यादा पानी को सोख सकते हैं. धीरे-धीरे जब इसके आसपास गर्मी बढ़ने लगती है, तो hydrogel (हाइड्रोजेल) तेजी से पानी छोडना शुरू करता है.

यह सोखे गये जल का 95 फीसदी तक वापस छोड़ता है. पानी को छोड़ने की प्रक्रिया के दौरान यह रीहाइड्रेट होगा और इसे स्टोर करने के लिए इस प्रक्रिया को फिर से दोहराया जा सकता है. इस प्रकार यह प्रक्रिया दो से पांच सालों तक जारी रह सकती है, जिस दौरान बायोडिग्रेडेबल hydrogel (हाइड्रोजेल) डिकंपोज होता रहेगा. यानी फसलों के लिए पानी की जरूरतों को पूरा करता रहेगा.

अब इस मोबाइल ऐप से मिंटों में करें जमीन को नापने का मुश्किल काम

अगर आप अपने खेत ,प्लाट ,दुकान जा किसी और चीज जो नापना चाहते है तो आप सिर्फ एक मोबाइल के साथ कर सकते है और वो भी बहुत आसानी और सटीकता के साथ । बस उसके लिए आपके फ़ोन में मोबाइल इंटरनेट और जीपीएस सिस्टम होना चाहिए । जो की अब लगभग हर मोबाइल फ़ोन में होता ही है । जमीन को नापने के लिए बस आपको एक ऐप अपने फ़ोन पर करनी होगी और उसके बाद जिस जमीन को नापना है । उसके इर्द गिर्द चक्र लगाना है बस बाकि बाकि का काम ऐप ही करेगी ।

सबसे पहले Google Play Store पर जा कर “Distance and area measurement ” ऐप इंसटाल करो इस ऐप की रेटिंग 4.1 है जो काफी अच्छी है । उसके बाद इसका जीपीएस सिस्टम ऑन करें ।अब ऐप को OPEN करें ।

उसके बाद Distance : के लिए मीटर,फ़ीट ,यार्ड आदि में से चुने ,आप फ़ीट चुन सकते है क्यूंकि ज्यादतर हमारे ये ही इस्तेमाल होता है । अब अगर अपने अपने खेत का ज़मीन नापना है तो Area : के लिए acre चुने । एक और ऑप्शन Logging है जिसे Auto पर रहने दे ।

अब इसमें एक स्टार्ट का बटन दिया हुआ है उसको दबा कर जिस जमीन को नापना है उसके इर्द गिर्द पूरा एक चक्र लगायें । ध्यान रहे जिस जगह को नापना है उसके किनारों पर बिलकुल साथ साथ चलें नहीं तो एरिया ज्यादा आ ज्यागा । जहाँ से आप ने चलना शुरू क्या था वहां तक चक्र पूरा करें । बस जैसे ही आप चक्र पूरा करेंगे साथ की साथ आप को पता चल जायगा की टोटल एरिया कितना है ।

वैसे तो यह ऐप बहुत हद तक बिलकुल सही एरिया बताती है लेकिन कभी कभी इंटरनेट ठीक ना चलने के वजह से थोड़ी बहुत गड़बड़ हो जाती है इस लिए इस ऐप का का प्रयोग सिर्फ कच्चा अंदाज़ा लगाने के लिए करें । कल जब आप खेत जायेंगे तो इसका इस्तेमाल कर अपना खेत जरूर नाप के देखना ।