सोर ऊर्जा से इस किसान ने कीटों को भगाने के लिए खोजा अनोखा तरीका

पिछले कुछ सालों में कीटनाशकों के बढ़ते इस्तेमाल से पर्यावरण के लिए कई तरह के खतरे पैदा हो रहे हैं। इससे न सिर्फ अनाज ज़हरीला हो जाता है बल्कि इससे ग्राउंड वॉटर टेबल भी बिगड़ रही है।

आजकल देशभर के हज़ारों किसान इस बात को समझ चुके हैं कि रासायनिक कीटनाशकों और उर्वरकों के इस्तेमाल से पर्यावरण को कितना नुकसान हो रहा है और हमारी सेहत को भी खतरा है। इसी को देखते हुए वे अब इसके लिए नए और सुरक्षित तरीके खोज रहे हैं।

केरल के पलक्कड़ ज़िले के चित्तूर ब्लॉक में इलापुल्ली गांव के एक किसान ने अपने खेत से कीटों को भगाने का एक अनोखा तरीका खोजा है। चंद्रन नाम के इस किसान ने कीटों से छुटकारा पाने के लिए एक सस्ता और इको फ्रेंडली उपाय खोजा है जो सूर्य की रोशनी से काम करता है।

केरल के एक लोकल न्यूज़ पोर्टल मातृभूमि में छपी ख़बर के मुताबिक, चंद्रन अपने 6 एकड़ के खेत में धान की खेती करते हैं। वह यहां के कृषि विभाग द्वारा बताई जाने वाली तकनीकों के साथ अक्सर नए एक्सपेरिमेंट करते रहते हैं।

उन्होंने एक ऐसा सोलर लाइट ट्रैप बनाया है जो कीटों को मार देता है और किसी रासायनिक कीटनाशकी की ज़रूरत भी नहीं पड़ती। इस उपकरण को बनाने के लिए एक ट्राइपॉड के ऊपर एक कटोरी रखी और उसमें एक एलईडी बल्ब और सोलर पैनल लगाया गया।

इस उपकरण को चलाना बहुत ही आसान है। बल्ब से शाम को 6.30 से 9.30 बजे के बीच नीली रोशनी निकलती है जो कीटों को अपनी ओर आकर्षित करती है। बल्ब के ठीक नीचे एक ज़हर का ट्रैप है जो न सिर्फ इन कीटों को पकड़ लेता है बल्कि वे तुरंत मर भी जाते हैं।

ये मशीन सिर्फ उसी समय काम करती है जब कीटों का हमला खेत में सबसे ज्यादा होता है। 10 बजे के बाद ये मशीन काम नहीं करती ताकि खेत को फायदा पहुंचाने वाले कीटों को नुकसान न पहुंचे।ये मीशन सोलर एनर्जी की मदद से अपने आप काम करती है।

चंद्रन की बनाई इस मशीन से फसल की कीटों से रक्षा भी हो जाती है और वह रासायनिक कीटनाशकों से सुरक्षित भी रहती है। उनकी इस मशीन के फायदों को देखते हुए एलाप्पुल्ली के कई किसानों ने अपने खेतों में ये उपकरण लगाया है।

ये उपकरण पूरी तरह से ऑटोमैटिक है बस कटोरी में रखे पॉइज़न ट्रैप को दो दिनों में बदलने की ज़रूरत होती है। किसान एक खेत में एक से ज्यादा उपकरण लगा सकते हैं और इसकी जगह में भी बदलाव कर सकते हैं। एलाप्पुल्ली के कृषि भवन में फील्ड असिस्टेंट रजिता कहती हैं कि ये ट्रैप इको फ्रेंडली है और रासायनिक कीटनाशकों से अपनी फसल को बचाने का अच्छा उपाय भी।

अब हवा में भी उगेगा आलू

शिमला स्थित केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान ने हवा में आलू उगाने का कारनामा कर दिखाया है। संस्थान द्वारा बीते तीन सालों से किया जा रहा प्रयोग सफल साबित हुआ है।जिसके बाद संस्थान को यह आविष्कार करने में सफलता हाथ लगी है। संस्थान एरोपोनिक नामक नई तकनीक से बिना मिट्टी के हवा में आलू उगाने की यह विधि ईजाद की है।

आमतौर पर आलू जमीन के नीचे उगाया जाता है। एरोपोनिक नाम की नई तकनीक में आलू बिना मिट्टी के हवा में उगाया जाएगा, यानी कि एक थर्मोकोल लगे बॉक्स में छेद करके आलू के पौधे को डाला गया है। पौधे को इस तरह से बॉक्स में डाला गया है कि उसकी जड़े नीचे हवा में हो।

जडों पर न्यूट्रिन अमीडिया नामक छिड़काव किया गया है। विभिन्न तापमान के अनुरूप इन पौधों की जांच की गई। इस आलू को उगाने के लिए मिट्टी का प्रयोग नहीं किया गया। इसमें कीटनाशकों का प्रयोग न के बराबर हुआ है।

ऐरोपोनिक पद्धति से मिट्टी के बिना बीज आलू पैदा करने की तकनीक पर आधारित एरोपोनिक सुविधाओं से आलू की रोग रहित नई किस्में तैयार करने की तकनीक पर आधारित एरोपोनिक सुविधाओं से आलू को किसानों तक कम समय में पहुंचाने में मदद मिलेगी।

आमतौर पर जिस आलू के एक पौधे से सिर्फ पांच और 10 आलू पैदा होते थे, इस तकनीक की मदद से आलू के एक पौधे से 70 आलू का उत्पादन हो सकेगा। ऐसे में सात गुना ज्यादा आलू का उत्पादन संभव होगा । इस प्रकार इस तरिके से आलू का उत्पादन 7 गुना बढ़ जाता है । बहुत जल्द ये तकनीक किसानो के पास पहुंच जाएगी

महिला किसानों ने बनाया देसी कोल्ड स्टोर, ऐसे करता है काम

आलू-टमाटर जैसी सब्जियों को सड़क पर फेंकने को मजबूर किसानों के लिए बांस से बना देसी कोल्ड स्टोरेज किसी राहत से कम नहीं है। यह कोल्ड स्टोरेज हजारीबाग के टाटीझरिया प्रखंड की महिलाओं की देन है।

झारखंड के लगभग हर इलाके में कोल्ड स्टोरेज की समस्या आम है, देश के बाकी हिस्सों में भी स्थिति बहुत बेहतर नहीं है। फेडरेशन ऑफ कोल्ड स्टोरेज एसोसिएशन ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक कोल्ड स्टोरेज की उचित व्यवस्था नहीं होने से देश में 40 प्रतिशत फसल, सब्जियां, फल-फूल, दूध-मछली व अन्य उत्पाद बर्बाद हो जाते हैं।

टाटीझरिया प्रखंड के गांवों की महिलाओं ने बांस के बेंत से देसी कोल्ड स्टोरेज तैयार कर इस समस्या का हल ढूंढ लिया है। पहली बार बनाए गए इस तरह के कोल्ड स्टोरेज क्षेत्र के दर्जनों गांवों में खुशहाली का मंत्र लेकर आए हैं।

हजारीबाग का यह इलाका महिला समूहों द्वारा की जा रही सामूहिक खेती के कारण भी जाना जाता है। ऐसे में किसान महिलाओं द्वारा देसी कोल्ड स्टोरेज तैयार करना उनकी दोहरी उपलब्धि है।

खराब नहीं होगा आलू-प्याज

बांस के बेत से बने इस कोल्ड स्टोरेज की खासियत यह है कि इसमें पूरे एक सीजन तक आलू, प्याज, लहसुन आदि को सुरक्षित रख सकते हैं।

कम लागत में उत्पादों की बर्बादी रोककर बेहतर मुनाफा दिलाने वाला यह देसी कोल्ड स्टोरेज स्थानीय किसानों में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। टाटीझरिया प्रखंड के एक दर्जन गांवों में अब घर-घर ऐसे कोल्ड स्टोरेज बनाए जा रहे हैं। आलू-प्याज के इस सीजन में इसकी मांग भी खासी है।

देसी कोल्ड स्टोरेज की खासियत

  • यह पूरी तरह से सुरक्षित है। यह किसी भी हवादार कमरे में तैयार किया जा सकता है।
  • यह आलू-प्याज को नमी से बचाता है।
  • बांस में फंगस नहीं लगता है, यही वजह है कि सब्जियां सड़ती नहीं है।

बदलाव की कहानी लिख रहीं महिलाएं

कोल्ड स्टोरेज के इस देसी स्वरूप का मॉडल डिजिटल ग्रीन संस्था के डॉ. रवि ने तैयार किया है। इसे दिल्ली में भी प्रदर्शित किया गया था। वर्तमान में खैरा,अमनारी, फुरुका, बरकाखुर्द, रतनपुर सहित अन्य गांवों में 100 से अधिक कोल्ड स्टोरेज बन चुके हैं। सृजन फाउंडेशन द्वारा महिला किसानों को प्रशिक्षित किया जा रहा है।

झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसायटी भी अब इस अभियान से जुड़कर महिला स्वयं सहायता समूहों को प्रशिक्षण देकर ऐसे मॉडल बनवा रही है। इस मुहिम से जुड़कर ऐसे मॉडल तैयार करनेवाली महिलाएं अच्छी-खासी आमदनी भी पैदा रही हैं।

ये है सबसे पौष्टिक चारा ,एक बार लगाने पर पांच साल के लिए मिलेगा चारा


पशुपालकों को गर्मियों में हरे चारे की सबसे ज्यादा परेशानी होती है। बरसीम, मक्का, ज्वार जैसी फसलों से तीन-चार महीनों तक ही हरा चारा मिलता है। ऐसे में पशुपालकों को एक बार नेपियर घास लगाने पर चार-पांच साल तक हरा चारा मिल सकता है।

इसमें ज्यादा सिंचाई की जरूरत भी नहीं पड़ती है। गन्ने की तरह दिखने वाली नेपियर घास लगाने के महज 50 दिनों में विकसित होकर अगले चार से पांच साल तक लगातार दुधारू पशुओं के लिए पौष्टिक आहार की जरूरत को पूरा कर सकती है।

पशुपालन विभाग के उप निदेशक वीके सिंह नेपियर घास के बारे में बताते हैं, “प्रोटीन और विटामिन से भरपूर नेपियर घास पशुओं के लिए एक उत्तम आहार की जरूरत को पूरा करती है। दुधारू पशुओं को लगातार यह घास खिलाने से दूध उत्पादन में भी वृद्धि होती है और साथ ही रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है।

हाइब्रिड नेपियर की जड़ को तीन-तीन फीट की दूरी पर रोपित किया जाता है। इससे पहले खेत की जुताई और समतलीकरण करने के बाद घास की रोपायी की जाती है और रोपाई के बाद सिंचाई की जाती है। घास रोपण के मात्र 50 दिनों बाद यह हरे चारे के रूप में विकसित हो जाती है।

एक बार घास के विकसित होने के बाद चार से पांच साल तक इसकी कटाई की जा सकती है और पशुओं के आहार के रूप में प्रयोग की जा सकती है। नेपियर घास का उत्पादन प्रति एकड़ लगभग 300 से 400 कुंतल होता है। इस घास की खासियत यह होती है कि इसे कहीं भी लगाया जा सकता है।

एक बार घास की कटाई करने के बाद उसकी शाखाएं पुनः फैलने लगती हैं और 40 दिन में वह दोबारा पशुओं के खिलाने लायक हो जाती है। प्रत्येक कटाई के बाद घास की जड़ों के आसपास हल्का यूरिया का छिड़काव करने से इसमें तेजी से बढ़ोतरी भी होती है। वैसे इसके बेहतर उत्पादन के लिए गोबर की खाद का छिड़काव भी किया जाना चाहिए।

महिंद्रा ने किसानों के लिए लॉन्च की ‘माई एग्री गुरु’ एप,ऐसे करती है काम

महिंद्रा एंड महिंद्रा की पूर्ण स्वामित्व वाली अनुषंगी कंपनी महिंद्रा एग्री सॉल्यूशंस लिमिटेड (एमएएसएल) ने किसानों के लिए माई एग्री गुरु 2.0 को लॉन्च किए जाने की घोषणा की है। इस एप का नया वर्जन तकनीकी रूप से उन्नत है और किसानों के लिए डिजिटल एडवाइजरी प्लेटफॉर्म के रूप में काम करता है।

एप के नए वर्जन में एडवांस्ड टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर पर्सनलाइज्ड यूजर अनुभव देने का प्रयास किया गया है। इसे एक एडवांस्ड सोल्यूशन, जो चैटबॉट का इस्तेमाल करती है, के माध्यम से बढ़ावा दिया गया है। इन विशेषताओं के कारण एग्री गुरु को इसके मूल वर्जन का अपग्रेडेशन कहा जाता है।

महिंद्रा एग्री सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक और सीईओ अशोक शर्मा ने माई एग्री गुरु 2.0 के लांच के अवसर पर कहा, “एग्री गुरु 2.0 फसलों की उत्पादकता में सुधार सुनिश्चित करने के लिए किसानों को निजी सलाह देने वाली सेवा है। माई एग्री गुरु ने अब तक चार लाख से ज्यादा किसानों तक पहुंच बनाई है।

एप के सबसे लोकप्रिय सेक्शन एग्री बज में अब तक 55,000 से अधिक संवाद दर्ज किये गये हैं। इस एप की आवाज को पहचानने और मशीन लर्निग तकनीक की मदद से किसानों के सवालों के जवाब तुरंत मिल जाते हैं। एप से किसानों को मंडी में चल रहे दामों की जानकारी मिलती है, जिससे उन्हें पता चलता है कि किस मंडी में वह अपनी फसल बेचकर ज्यादा से ज्यादा कमाई कर सकते हैं।”

फरवरी 2017 में लांच किया गया माई एग्री गुरु भारत का पहला समग्र डिजिटल ऐडवाइजरी प्लेटफॉर्म हैं, जो किसानों और विशेषज्ञों के बीच दोतरफा संवाद उपलब्ध कराता है। किसी दूसरे ऐप्स की तुलना में माई एग्री गुरु यह सुनिश्चित करता है कि किसानों को उनकी समस्या का सामाधान तुरंत मिल जाए।

माई एग्री गुरु को दूसरे ऐप से अलग करने वाला एक पहलू यह भी है कि इसमें मांग के आधार पर कंटेंट जेनरेट होता है। ऐप यूजर कम्युनिटी के बीच रोजाना होने वाले अनगिनत विचार-विमर्श का विश्लेषण कर दिलचस्पी के विषय तो पहचानता है और किसानों के सामने आने वाली चुनौतियों का समाधान सुनिश्चित करता है। माई एग्री गुरु 2.0 एप एंड्रॉयड फोन पर गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड किया जा सकता है। इस समय अंग्रेजी और हिंदी में मौजूद यह ऐप जल्द ही मराठी में उपलब्ध होगा।

खेती की इस नई तकनीक से खेतो में नहीं बेलों पर लटकेंगे अब तरबूज

तरबूज की खेती की नई तकनीक से बेलों पर भी उगाए जा सकेंगे। इससे किसानों की लागत कम लगेगी और पानी की भी बचत होगी।

खेती में नए प्रयोग होते रहते हैं, नई तकनीकी का इस्तेमाल कर न केवल खेती की लागत को कम किया जा रहा है वहीं उत्पादन में भी बढ़ोत्तरी हो रही है। ऐसा ही एक नया प्रयोग इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय ने तरबूज व खरबूज की खेती पर किया है।

इन दोनों की खेती आम तौर पर नदी के किनारे की जाती है लेकिन इसे आसान बनाने के लिए वैज्ञानिक एक अनोखा तरीका निकाल रहे हैं। ये फल अब जमीन पर न होकर बेलों पर लटकते हुए दिखेगें।

कम जगह और संसाधन की कमी के साथ-साथ पानी की उपयोगिता को देखते हुए वैज्ञानिकों ने इन फलों की खेती को आधुनिक तरीके से करने का फैसला किया है।

इस बारे में इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ जे एल शर्मा बताते हैं, “नई तकनीक से खेती की लागत भी कम होगी, वहीं इसका उत्पादन भी बढ़ाया जा सकता है। यहां आस पास के किसानों को इस नई पद्धति का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। इस नई तकनीक में पानी की खपत तो कम होगी ही साथ साथ उत्पादन में भी वृद्धि होगी।”

नदियों के किनारे उगाए जाने वाले इन फलों को अब किसान अपने खेतों में भी लग सकते हैं। जमीन में पड़े-पड़े कई बार फल खराब हो जाते थे लेकिन अब बेलों में इसकी संभावना कम रहेगी।

किसानों की आय में भी होग इजाफा

इस नई तकनीक से किसानों की आय में भी बढ़ोत्तरी होगी। डॉ शर्मा ने बताया कि आजकल लोग सेहत को लेकर जागरुक हो रहे हैं तो इसकी खेती किसानों के लिए फायदेमंद रहती हैं।

इसकी बाजार में भी अच्छी मांग रहती है गर्मियों में। अब नई तकनीक से कम लागत में उत्पादन भी बढ़ेगा तो इससे किसानों को और भी ज्यादा फायदा होगा। अब रायपुर में कई किसानों इस नई तकनीक की शुरुआत की भी है।

बेल पर इन फलों की खेती से मानव श्रम की भी जरुरत कम पड़ती है और फलो में लगने वाले कीट व बीमरियों का पता भी जल्दी चल जाता है, जिससे उनका उपचार समय पर हो जाता है।

जमीन पर पड़े फलों को एक एक करके देखना थोड़ा मुश्किल हो जाता है जिससे वो कीट लगने से खराब भी हो जाती हैं। इसके साथ ही फसल के तोड़ने और सही जगह पर पहुंचाने के लिए बेल विधि सबसे ज्यादा कारगर साबित होती है।

11वीं फेल किसान ने बनाया अपना मिल्क एटीएम

गुजरात के गिर सोमनाथ जिले के एक किसान हैं, नीलेश गुस्सर। 11वीं फेल नीलेश ने पिछले साल ऑटोमेटिक एटीएम मिल्क मशीन बनाई थीं। इस साल उन्होंने इसे और भी ज्यादा हाइटेक बना दिया है।

उन्होंने इस मशीन में बायोमीट्रिक फिंगरप्रिंटिंग, आईडी और पासवर्ड, प्रीपेड कार्ड जैसे फीचर जोड़ दिए हैं। अब इस मशीन से कैशलेस तरीके से दूध निकाला जा सकेगा। 28 साल के नीलेश ने पिछले साल 30 एटीम मिल्क मशीन किसानों को बेची थीं। इस मशीन में 20, 50 और 100 रुपये के नोटों से दूध निकाला जा सकता है।

इस मशीन से किसानों को काफी फायदा हो रहा है। वे किसान जो कॉओपरेटिव या दूध डेयरी को अपना दूध नहीं बेचना चाहते वे अपने मन मुताबिक दाम पर मिल्क एटीएम लगाकर दूध बेच रहे हैं। कॉओपरेटिव या डेयरी को दूध बेचने पर उन्हें बिचौलियों को कमीशन देना पड़ता है जिससे उन्हें नुकसान होता है।

गिर जिले के तलाला इलाके से 7 किलोमीटर स्थित गांव खिरधर के रहने वाले नीलेश ने पिछले साल मिल्क एटीएम मशीन बनाई थी। वे अब तक गुजरात के जामनगर, द्वारका, पोरबंदर जैसे इलाकों के साथ ही महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और तमिलनाडु के किसानों को लगभग 30 मशीनें बेच चुके हैं।

नीलेश ने बताया कि पहले उनके पास 6 गायें थीं। जिनका दूध निकालकर वे सहकारी मंडी में बेचने के लिए ले जाते थे, लेकिन उन्हें अच्छा दाम नहीं मिलता था। वे देखते थे कि उनसे तो सिर्फ 25 रुपये प्रति लीटर में दूध बेचा जा रहा है जबकि शहर में दूध 50 रुपये में मिलता है।

उन्होंने इसके बाद एटीएम मिल्क मशीन बनाने का फैसला कर लिया। इसके लिए उन्होंने इंटरनेट पर थोड़ा सा रिसर्च भी किया और मुंबई, राजकोट, अहमदाबाद से मशीन बनाने के पुर्जे मंगवाए। उन्होंने नोट के सेंसर और फिंगरप्रिंट की मशीन ताइवान से मंगवाई।

नीलेश ने हमसे बात करते हुए बताया, ‘मैं बिचौलियों का काम खत्म करना चाहता था। वे किसान और कस्टमर के बीच में आकर कमीशन खाते थे। जब मैं नजदीक की कॉओपरेटिव डेयरी में दूध बेचता था तो वहां भी मुझे दूध का सही दाम नहीं मिलता था।

इसलिए मैंने ये मशीन बनाई।’ आपको जानकर हैरानी होगी कि नीलेश 11वीं फेल हैं। उन्होंने कोई इंजीनियरिंग की ट्रेनिंग नहीं ली है। वे बताते हैं कि उन्हें मशीनों को बनाने का शौक रहा है। नीलेश बताते हैं कि इस मशीन की बदौलत किसान को दूध की डेढ़ गुना ज्यादा कीमत मिलती है। किसान सिर्फ एक साल में ही इस मशीन का दाम रिकवर कर सकते हैं।

बनकर तैयार है मिल्क एटीएम

जिन किसानों के पास तीन से ज्यादा गाय या भैंसे होती हैं उनके लिए ये मशीन काफी फायदेमंद है। नीलेश ने बताया, ‘इस बार मैंने मशीन को पूरी तरह से कैशलेस बना दिया है। अब मशीन में पैसे नहीं डालने पड़ेंगे। जिस भी ग्राहक को दूध लेना होगा उसे अपना फिंगरप्रिंट इस मशीन में रजिस्टर करवाना होगा उसके बाद वह एक निश्चित मात्रा में दूध निकाल सकेगा।’

इसके साथ ही यूजरनेम और पासवर्ड के जरिए भी प्रीपेड कार्ड द्वारा दूध निकाल सकेंगे। नीलेश ने इस तरह की अभी पांच कैशलेस मशीनें बनाई हैं। जिन्हें वे तमिलनाडु, उड़ीसा और राजस्थान के किसानों को बेच चुके हैं।

मशीन की कीमत 75 हजार से लेकर एक लाख रुपये तक है। इसमें 50 से लेकर 250 लीटर तक दूध स्टोर किया जा सकता है। इसमें फ्रिज के साथ ही पावर बैकअप की सुविधा भी है। जिससे लाइट चली जाने की स्थिति में दूध को खराब होने से बचाया जा सकेगा।

नीलेश ने सबसे पहले कच्छ के एक किसान वेलाजी भुइदिया को यह मशीन बेची थी। उन्होंने अपनी गायों का दूध बेचने के लिए मशीन खरीदी थी। इस मशीन को कहीं भी आसानी से ले जाया जा सकता है। अब वेलाजी दूसरी मशीन खरीदने की योजना बना रहे हैं।

किसान ने विकसित की वो तकनीक,जिससे हर घर कमा सकता है महीने के 50 हजार रु

तकनीकी के मामले में इजरायल दुनिया का सबसे हाईटेक देश माना जाता है। भारत समेत दुनिया के कई देश इस छोटे से देश से सीखने जाते हैं। लेकिन भारत का एक किसान है, इजरायल के लोग उससे सीखने आते हैं। इस किसान ने जो तकनीकी विकसित की है अब वो इजरायल में लागू की जा रही है।

इस हाईटेक तकनीकी का नाम ‘चोका सिस्टम’ है। यह एक ऐसी तकनीकी है जिसे देश के हर कोने, हर गांव का किसान अपने हिसाब से इस्तेमाल कर सकता है। शायद यही वजह है कि इजरायल में भी लोकप्रिय हो रही है। ये तकनीक है किसान को कमाई कराने की, उसे गांव में ही रोजगार देने, पानी बचाने की और जमीन को सही रखने की। इस किसान की माने तो यही तो तकनीकी है जिसके सहारे गायों को लाभकारी बनाने हुए उन्हें बचाया भी जा सकता है।

‘चोका सिस्टम’ की जिस गांव से शुरुआत हुई है वहां हर घर सिर्फ दूध के कारोबार से हर महीने 10 से 50 हजार रुपए कमाता है।इजरायल को ज्ञान देने वाले इस किसान का नाम है लक्ष्मण सिंह। 62 साल के लक्ष्णम सिंह राजस्थान के जयपुर से करीब 80 किलोमीटर दूर लाहोडिया गांव के रहने वाले हैं।

ये गांव कभी भीषण सूखे का शिकार था।गरीबी और जागरुकता की कमी के चलते यहां आए दिन लड़ाई दंगे होते रहते हैं, युवा गांव छोड़-छोड़ शहर में मजदूरी करने को मजबूर हो रहे थे।

करीब 40 साल पहले लक्ष्मण सिंह ने अपने गांव को बचाने के लिए मुहिम शुरु की। बदलाव रंग भी लाया कि आज इजरायल जैसा देश इस गांव का मुरीद है। आज लापोडि़या समेत राजस्थान के 58 गांव चोका सिस्टम की बदौलत तरक्की की ओर है। यहां पानी की समस्या काफी हद तक कम हुई है। किसान साल में कई फसलें उगाते हैं। पशुपालन करते हैं। और पैसा कमाते हैं। 350 घर वाले इस गांव में आज 2000 के करीब आबादी रहती है।

चोका सिस्टम से पशुओं को घास मिलती है और जलस्तर ठीक रहता है

गांव के विकास के लिए रुपयों की कम से कम जरुरत पड़े इसके लिए श्रमदान का सहारा लिया गया। गांव के लोगों को इससे जोड़ने के लिए 1977 में उन्होंने ग्राम विकास नवयुवक मंडल लापोडिया रखा। इस समूह को ये जिम्मेदारी दी गयी कि गांव के हर किसी व्यक्ति में ये भाव पैदा करना है कि वो अपने गांव का मजदूर नहीं बल्कि मालिक है।

ऐसे बनता है ‘चोका सिस्टम’

चोका सिस्टम हर पंचायत की सार्वजनिक जमीनों पर बनता है। एक ग्राम पंचायत में 400 से 1,000 बीघा जमीन खाली पड़ी रहती है, इस खाली जमीन में चोका सिस्टम ग्राम पंचायत की सहभागिता से बनाया जाता है। खाली पड़ी जमीन में जहां बरसात का नौ इंच पानी रुक सके वहां तीन चौड़ी मेड (दीवार) बनाते हैं, मुख्य मेड 220 फिट लम्बाई की होती है और दोनों साइड की दीवारे 150-150 फिट लम्बी होती हैं।

इस गांव में अब नहीं होती है अब कभी पानी की कमी

भूमि का लेवल नौ इंच का करते हैं जिससे नौ इंच ही पानी रुक सके इससे घास नहीं सड़ेगी। इससे ज्यादा अगर पानी रुका तो घास जमेगी नहीं। हर दो बीघा में एक चोका सिस्टम बनता है, एक हेक्टेयर में दो से तीन चोका बन सकते हैं। एक बारिश के बाद धामन घास का बीज इस चोका में डाल देते हैं इसके बाद ट्रैक्टर से दो जुताई कर दी जाती है।

सालभर इसमें पशुओं के चरने की घास रहती है। इस घास के बीज के अलावा देसी बबूल, खेजड़ी, बेर जैसे कई और पेड़ों के भी बीज डाल जाते हैं। चोका सिस्टम के आसपास कई नालियां बना दी जाती हैं। जिसमें बरसात का पानी रुक सके। जिससे मवेशी चोका में चरकर नालियों में पानी पी सकें।

ये है बैंगन नई किसम ‘डॉक्‍टर बैंगन’, एक सीज़न में देगी 1.5 लाख का मुनाफा

कृषि वैज्ञानिकों ने बैंगन की ऐसी किस्म विकसित की है जो न केवल बीमारियों से बचाएगी बल्कि बुढ़ापे को भी रोकेगी। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान पूसा ने बैंगन की एक नई किस्म पूसा हरा बैंगन-एक का विकास किया है, जिसमें भारी मात्रा में क्यूप्रेक, फ्रेक और फिनोर जैसे पोषक तत्व हैं जो इसे एंटीऑक्सीडेंट बनाते हैं।

इसके चलते यह बीमारियों से बचाने और बुढ़ापा रोकने में मददगार है।एंटीऑक्सीडेंट वह तत्व हैं जो हमारे शरीर को विषैले पदार्थों से बचाता है और यह ऊर्जा प्रदान करने के साथ ही कई प्रकार की बीमारियों से सुरक्षा प्रदान करता है।

संस्थान के सब्जी अनुसंधान से जुड़े वैज्ञानिक तुषार कांति बेहरा ने बताया कि नई किस्म में पूर्व की किस्मों की तुलना में रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक है, जिसके कारण इसमें कीटनाशकों का कम छिड़काव किया जाता है।

खरीफ के मौसम में हो सकती है खेती

हरे रंग के अंडाकार गोल बैंगन की यह पहली प्रजाति है, जिसकी खेती खरीफ मौसम में उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्र में की जा सकती है। इसकी एक विशेषता यह भी है कि इसे गमले में लगाया जा सकता है।

गोल हरे रंग के इसके फल पर हल्के बैंगनी रंग के धब्बे होते हैं और बाह्य दलपूंज कांटे रहित होते हैं । डॉक्‍टर बेहरा ने बताया कि बैंगन की नयी किस्म रोपायी के 55 से 60 दिनों में फलने लगता है।

खरीफ मौसम के दौरान बैंगन की इस किस्म की खेती से किसान प्रति हेक्टेयर एक से डेढ़ लाख रुपये तक कमा सकते हैं। इसमें बीमारियां कम लगती हैं जिसके कारण इसमें कीटनाशकों का कम इस्तेमाल किया जाता है। आगे पढ़ें कि‍तनी पैदावार हो सकती है

45 टन तक पैदावार

बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र, कर्नाटक,मध्य प्रदेश तथा आन्ध्र प्रदेश में बैंगन की व्यावसायिक पैमाने पर खेती की जाती है और किसान सालों भर इसकी फसल लेते हैं। खाड़ी तथा कुछ अन्य देशों को बैंगन का निर्यात भी किया जाता है।

देश में तीन लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में बैंगन की खेती की जाती है और इसका सालाना करीब 50 लाख टन उत्पादन होता है। इस बैंगन पैदावार काफी अधिक है। इसकी प्रति हेक्टेयर 45 टन तक पैदावार ली जा सकती है। इसके एक फल का औसत वजन 220 ग्राम है।

किसान की जेब और सरकार के गोदाम भरेंगी गेहूं की ये नई तीन किस्में

गेहूं की किस्में अब पहले की तरह सामान्य नहीं है, देश के कृषि वैज्ञानिकों ने प्रोटीन और पोषक तत्वों से भरपूर गेहूं की तीन नई किस्मों को तैयार किया है।

एक ओर, गेहूं की ये किस्में न सिर्फ खाद्यान्न उत्पादन में आत्मर्निभर बनाएंगी, बल्कि देश में कुपोषण की समस्या को दूर कर पाने में सक्षम रहेंगी। दूसरी ओर, इन किस्मों की उपज से न सिर्फ किसानों की जेब भर सकती हैं, बल्कि सरकार के खाद्यान्न गोदाम भी भर सकते हैं।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने गेहूं की एचडब्ल्यू 5207, एचआई 1612 और एचआई 8777 तीन नई किस्मों को विकसित किया है। गेहूं की पहले की किस्मों की अपेक्षा इन किस्मों में प्रोटीन और सूक्ष्म पोषक तत्व 15 प्रतिशत तक अधिक हैं।

संस्थान के वैज्ञानिकों ने इन किस्मों को कुपोषण को मिटाने और विशेषकर बच्चों और महिलाओं में खून व सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमियों को दूर करने के उद्देश्य से बनाया है।

“इन नई किस्मों में प्रोटीन के साथ-साथ आयरन, तांबा, जिंक और मैग्नीज भरपूर मात्रा में है। इन किस्मों से न सिर्फ रोटियां स्वादिष्ट बनती हैं, बल्कि ये बिस्कुट और पास्ता बनाने में भी उपयुक्त होंगी।”। आइये आपको बताते हैं गेहूं की इन तीन नई किस्मों के बारे में…

पहली किस्म: एच डब्ल्यू 5207

गेहूं की एचडब्ल्यू 5207 किस्म को वैज्ञानिकों ने विशेषकर तमिलनाडु राज्य की भूमि के लिए विकसित किया गया है। लीफ रस्ट और स्टीम रस्ट प्रतिरोधी इस किस्म से कम सिंचाई में भी भरपूर पैदावार होती है। इस किस्म में भरपूर पोष्टिक तत्व भी हैं।

इसमें 11 प्रतिशत से अधिक प्रोटीन, उच्च लौह तत्व (53.1 पीपीएम), मैग्नीज (47.5 पीपीएम) और जिंक (46.3 पीपीएम) पाया जाता है। इस किस्म से औसतन 40.76 और अधिकतम 59.6 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पैदावार हो सकती है।

दूसरी किस्म: एच आई 8777

गेहूं की एचआई 8777 किस्म बारिश आधारित और प्रायद्वीप क्षेत्रों के लिए विकसित की गई किस्म है। यह किस्म भी लीफ रस्ट और स्टीम रस्ट प्रतिरोधी है। इस किस्म में प्रोटीन की मात्रा 14.3 प्रतिशत है, जबकि जिंक 43.6 पीपीएम और लौह तत्व 48.7 पीपीएम पाया जाता है।

ऐसे में इस किस्म में सामान्य गेहूं की किस्मों से इतर भरपूर पोषक तत्व मौजूद हैं। इस किस्म से किसान औसतन 18.5 कुंतल प्रति हेक्टेयर उत्पादन ले सकते हैं, जबकि अधिकतम 28.8 कुंतल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन होता है।

तीसरी किस्म:एचआई 1612

गेहूं की यह किस्म बिहार के अलावा पूर्वोत्तर के राज्यों के लिए विकसित की गई है। अच्छी पैदावार के लिए इस किस्म की समय से बुआई करनी पड़ती है। इस किस्म में प्रोटीन की मात्रा 11.5 प्रतिशत पाया जाता है, जबकि आयरन और जिंक समेत कई पोषक तत्वों की अच्छी मात्रा इस किस्म में मौजूद हैं।

इस किस्म की बड़ी विशेषता यह है कि सीमित सिंचाई में भी इस किस्म से औसतन 37.6 और अधिकतम 50.5 कुंतल प्रति हेक्टेयर होता है।