पुलिसवाले ने बनाया झूला पंप, अब बिना डीज़ल और बिजली के मुफत में होगी सिंचाई

महँगी होती बिजली रोज़ बढ़ते पेट्रॉल डीजल के दाम और खेती में बढ़ते लागत के बीच फसल की सिचाई करना किसानों की एक बड़ी समस्या है। लेकिन इन सब के बीच सिंचाई के लिए मोटर चलवाने की झंझट, बिजली की टेंशन, डीजल की झंझट, गैस के दाम और भी कई सारे लफड़े। अब सिंचाई को लेकर आप को भी मिल सकती है इन सभी झंझटों से फुर्सत। क्योंकि अब आ गया है झूला पंप, जिसे बनाया है बिहार के पूर्वी चम्पारण जिले के कल्‍याणपुर थाने में पदास्‍थापित जमादार मेंहीलाल यादव ने।

पंप से प्रति घंटे 10 हजार लीटर पानी निकाला जा सकता है। लागत बेहद कम है। इससे पहले गैस सिलेंडर से पानी निकालने की राह मेहीलाल ने निकाली थी। लेकिन, अब सामान्य ढंग से कम खर्च में पानी के इंतजाम का यंत्र तैयार किया है। उनके कार्य की सराहना कई स्तरों पर हुई है।

खगडिय़ा जिले के बापूनगर निवासी मेहीलाल यादव भागलपुर जिला बल में बहाल हुए। वर्ष 2007 में कटिहार जिले में तैनात थे। वहां किसानों को डीजल व पेट्रोल के लिए गैलन लेकर भटकते देखा। इस स्थिति से निजात दिलाने की सोची। आखिरकार बगैर ईंधन से संचालित झूला पंप का निर्माण किया। फिलहाल मेहसी लीची अनुसंधान केंद्र में एक झूला पंप उपयोग में है।

आती है 25 हजार की लागत

झूला पंप बनाने के लिए चापाकल के हेड, सेक्शन पाइप, साइकिल पाइप, वाशर, रॉड का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें करीब 25 हजार की लागत आती है। यह बगैर ईंधन संचालित होता है। किसी भी भूगर्भीय जलस्रोत से पंप को पाइप के सहारे बिल्कुल पंप सेट की तरह जोड़ झूले पर झूलना आरंभ कर देने पर पानी मिलता है।

इसके लिए दो लोगों की आवश्यकता होती है। लेकिन, एक आदमी है तो दूसरी तरफ ईंट या किसी अन्य वस्तु का भार देकर झूला जा सकता है। जैसा जल स्रोत होगा और जिस स्तर पर झूला चलेगा, उसी हिसाब से पानी निकलेगा।

सरकार के पत्र से बढ़ा उत्साह

सूबे के योजना व विकास विभाग के संयुक्त निदेशक डॉ. अरङ्क्षवद कुमार ने नवंबर 2015 में मेहीलाल को पत्र लिखकर स्टेट इनोवेशन काउंसिल द्वारा मुख्यमंत्री नवप्रवर्तन प्रोत्साहन योजना से वित्तीय सहायता प्रदान करने को कहा है।

इसके पहले केंद्र के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार डॉ. आर चिदंबरम ने 2007, पूर्णिया के तत्कालीन आयुक्त पंकज कुमार 2013 और कटिहार के तत्कालीन जिलाधिकारी व सांसद ने सम्मानित किया था। दो वर्ष पहले गणतंत्र दिवस की झांकी में झूला पंप हुआ था।

 झूला पंप कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो भी देखें

आ गई दाल-बाटी-चूरमा बनाने वाली मशीन, सिर्फ 1 घंटे में 500 लोगों का खाना होता है तैयार

मारवाड़ के पारम्परिक भोजन दाल-बाटी-चूरमा के बारे में कौन नहीं जनता यह राजस्थान के इलवा पुरे भारत में प्रसिद्ध है । लेकिन अब इसे बनाने के लिए अब मेहनत नहीं करनी पड़ेगी क्योंकि  दाल-बाटी-चूरमा बनाने के लिए अब मशीन भी आ गई है। यह किसी कंपनी ने नहीं बनाई बल्कि खेती के उपकरण रिपेयर करने वाले बैठवासिया निवासी कन्हैयालाल सुथार ने तैयार किया है। वह भी पुराने कल-पुर्जों से।

इस मशीन से दाल-बाटी बनाने में समय की बचत के साथ बड़ी संख्या में लोगों के लिए भोजन बनाया जाना संभव हुआ है। आमतौर पर जागरण,धार्मिक अनुष्ठान और गोठ में यहां यही भोजन बनाने की परंपरा है लेकिन बाटी कुछ ही लोग बना पाते हैं। धीरे-धीरे लोगों का रुझान दाल बाटी चूरमा से हटने लगा है। भोजन-महाप्रसादी में दूसरे व्यंजन बनाने लग गए हैं। ऐसे में यह मशीन इस परंपरा को आगे बढ़ाने में कारगर साबित होगी।

ट्रैक्टर से जोड़ने की भी सुविधा

कन्हैयालाल तिंवरी कस्बे में थ्रेशर मशीनों को ठीक करने का काम करते हैं। कई मशीनें खराब हो जाती है। उसके पार्ट्स को ढेर लग गया था। उनके दिमाग में आया कि क्यों न इन पार्ट्स से कुछ नया किया जाए। फिर क्या वे दाल बाटी चूरमा बनाने की मशीन के नवाचार में जुट गए। मशीन देखने में भारी-भरकम लगती है, लेकिन इसे पहियों पर भी इधर-उधर लाया-ले जाया सकता है। इसे ट्रैक्टर के पीछे जोड़कर लाने ले जाने में भी आसानी रहती है।

कन्हैयालाल बताते हैं कि क्षेत्र के कृषि फार्मों पर होने वाले जागरणों में वे जाते रहते हैं। वहां लोगों को दाल बाटी चूरमा बनाते देखा। एक बार बाटी सेखते हुए एक किसान के हाथ जल गए थे। तब लोगों ने कहा कि सब मशीनें आ गई, बाटी के लिए कोई मशीन नहीं आया। उस वक्त यह मशीन बनाने का आइडिया आया।

बाटी, दाल, चूरमा के लिए चार हिस्से

इस मशीन में चार भाग हैं, जिनमें से एक में सूखा आटा, पानी डाला जाता है। आटा मशीन गूंथ देती है। दूसरे भाग में बॉक्सनुमा ओवन है। इसमें 4 से 6 दराज है। इसमें बाटी भर दी जाती है। सबसे नीचे वाले भाग में कोयले जलाए जाते हैं। 20 मिनट की आंच से बाटी पक-कर तैयार हो जाती है। तीसरे भाग में चूरमा की मशीन है। अगले भाग में गैस भट्टी लगी है।

इस पर दाल बनाई जाती है। दो व्यक्ति 500 लोगों के लिए एक घंटे में दाल बाटी चूरमा तैयार कर सकते हैं। एक बार कोयला डालने के बाद गर्म होने में 10 मिनट लगते हैं। इसके बाद बाटी तैयार होनी शुरू हो जाती है। कोई ऑपरेटिंग सिस्टम नहीं है। बल्कि कोयले से ही बाटी पकती है। ट्रैक्टर द्वारा चूरमा मशीन चलाकर चूरमा बनाया जाता है।

डेढ़ दर्जन मशीनें लागत मूल्य पर दी

इन्होंने लगभग 15 धर्मस्थानों व संतों के यहां पर यह मशीन लागत कीमत पर बनाकर दी है।

News Source : दैनिक भास्कर

जाने प्रतीक की सफलता की पूरी कहानी

कई बार किस्मत ऐसे रंग दिखाती है इंसान को खुद भी यकीन नहीं होता ऐसा ही कुश हुआ उन्नीस वर्षीय प्रतीक के साथ । उत्तर प्रदेश स्थित बरेली के एक प्रॉपर्टी डीलर का बेटा प्रतीक बजाज, चार्टड अकाउंटेट बनकर अपने पिता के व्यापार में हाथ बंटाने के रास्ते पर आगे बढ़ रहे थे लेकिन नियति ने उनके लिए कोई और रास्ता चुना था।

साल 2015 की बात है प्रतीक न केवल अपनी पढ़ाई में अच्छा कर रहे थे बल्कि सीपीटी परीक्षा पास कर सीए में जाने की तैयारी भी कर रहे थे। हाल ही डेयरी फार्म की शुरूआत करने वाले उनके बड़े भाई इससे जुड़े प्रशिक्षण के लिए इज्जतनगर स्थित कृषि विज्ञान केंद्र जा रहे थे। प्रतीक उस वक्त खाली थे लिहाजा प्रशिक्षण के लिए जा रहे अपने बड़े भाई के साथ वह भी हो लिए जहां उन्हें वर्मीन कंपोस्ट के बारे में बुनियादी बातों की जानकारी मिली। उन्हें ये जानकारी इतनी रोचक लगी कि उन्होंने ये प्रशिक्षण पूरा करने का तय किया।

इस शुरूआती जानकारी के बाद प्रतीक को इस बात का आश्चर्य हुआ कि उनके भाई की डेयरी में गाय का गोबर और गौ मूत्र तो बर्बाद ही चला जाता है जबकि इनका बेहतरीन इस्तेमाल कंपोस्ट बनाने के लिए किया जा सकता है। उन्होंने इज्जतनगर स्थित कृषि विज्ञान केंद्र जाना जारी रखा और अपने हाथों से कंपोस्ट बनाने की विधि सिखने लगे।

छह महीने के बाद प्रतीक ने अपने अभिभावकों से सीए की पढ़ाई छोड़ने और वर्मीन कंपोस्ट बनाने की अपनी इच्छा जताई। आश्चर्य की बात नहीं थी कि उनके पिता ने उनकी इस इच्छा को स्वीकार नहीं किया। लेकिन प्रतीक ने जब पहली बार वर्मीन कंपोस्ट बनाया और उसको बेचा तब उनके पिता को अपने बेटे की इस जुनून को स्वीकार करना ही पड़ा।

प्रतीक अपने इस फैसले के बारे में कहते हैं, “मैं दस घंटे की पढ़ाई करके सीए तो बना जाता लेकिन उसमें मुझे खुशी नहीं मिलती। यहां मैं अपनी इकाई में खुशी-खुशी 24 घंटे काम करता हूं और काम से ब्रेक भी नहीं लेता। आपको जीवन में एक जुनून पैदा करना पड़ता है और अगर आप उस जुनून को ही अपना कैरियर बना लेते हैं तब आपका काम आपको आनंद देता है”।

प्रतीक के इस नए जुनून पर परिवार की सहमति मिलने के बाद परधोली गांव में उन्होंने सात बीघे जमीन खरीदी और जून 2015 में उन्होंने वर्मीनकंपोस्ट की अपनी इकाई की शुरूआत की। तब से लेकर अब तक उन्होंने पीछे मुढ़ कर नहीं देखा। अपने इस काम को शुरू करने वक्त प्रतीक के दिल में देश की अपशिष्ट प्रबंधन की समस्या को हल करने के साथ साथ किसानों की मदद करने का जज्बा था।

उन्होंने कंपोस्ट निर्माण की तकनीक के साथ ढेरों प्रयोग किए और मंदिरों से निकलने वाले फुलों के कचरे, सब्जियों के थोक बाजार से निकलने वाले कचरे या चीनी मिल से निकलने वाले कचरों का अपने कंपोस्ट निर्माण के लिए इस्तेमाल किया। अपने वर्मीन कंपोस्ट में उन्होंने रोग प्रतिरोधक गुणों से युक्त नीम लेपन भी किया।

जल्द ही प्रतीक ने कुछ और जमीन खरीदा और अपने बनाए वर्मीन कंपोस्ट, मैन्योर और रासायन मुक्त कीटनाशकों की मदद से जैविक खेती की शुरूआत की। अपने इस खेती के दौरान उन्होंने पाया कि अगर कुछ निश्चित मात्रा में गौ मूत्र और नीम का इस्तेमाल किया जाए तो उत्पादन को प्रभावित किए बगैर खेतों के कंपोस्ट की जरूरत आधी रह जाती है।

यही नहीं इस प्रक्रिया से खेतों में कीड़ों और कीटों का हमला भी कम तुलनात्मक रूप से कम हो जाता है जिससे उपज की गुणवत्ता ज्यादा बेहतर हो पाती है। अपने परीक्षण में उन्होंने ये भी पाया कि इस कंपोस्ट का इस्तेमाल करने पर जमीन अधिक उपजाऊ होती है।यही नहीं प्रतीक किसानों को वर्मीन कंपोस्ट का प्रशिक्षण भी मुफ्त उपलब्ध कराते हैं।

प्रतीक का दावा है कि रासायनिक उर्वरकों में प्रति एकड़ किसानों को 4500 रुपये खर्च करने पड़ते हैं जबकि उनके जैविक खाद और कंपोस्ट खेतों को इतना उपजाऊ बना देते हैं कि किसानों को यूरिया या अन्य रासायनिक खाद या कीटनाशक कभी खरीदने की जरूरत ही नहीं पड़ती।

किसानों को कंपोस्ट और जैविक खाद बनाने में प्रति एकड़ सिर्फ 1000 रूपये खर्च करने पड़ते हैं जिससे अंतत उनकी आमदनी में ही इजाफा होता है। इससे भी बड़ी बात ये कि जैविक रूप से उपजाए उत्पाद की बाजार में उंची कीमत मिलती है। प्रतीक कहते हैं, “मैं अपने जैविक गेंहू की फसल को सामान्य गेंहू की तुलना में दुगुनी कीमत पर बाजार में बेचता हूं। इससे एक बात तो बिल्कुल स्पष्ट है कि अगर आप जैविक रूप से उपजाते हैं तो आपकी लागत तो न्यूनतम होगी ही आपको मुनाफा अधिकतम होगा”।

बाइस वर्षीय प्रतीक अब अपने नोएडा, गाजियाबाद, बरेली, शाहजहांपुर और उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के इसी तरह के कई अन्य शहरों में स्थित बड़े बड़े नर्सरी को अपने कंपोस्ट बेचते हैं। आस पास के शहरों में वो घर-घर जाकर भी अपने कंपोस्ट की ‘ये लो खाद’ ब्रांड नाम से बिक्री करते हैं।वर्मी कंपोस्ट की आपूर्ति कर उनकी कंपनी सालाना 12 लाख रुपये की आमदनी हासिल कर रही है।

कंपोस्ट की विधि के बारे में जानने के लिए आप भी प्रतीक बजाज से उनके इस मेल आईडी sehyogibiotech@gmail.com के लिए संपर्क कर सकते हैं।

खेतों में 19 फीट का गन्ना उगाता है ये किसान , लेता है 1000 कुंटल तक गन्ने की पैदावार

भारत के किसान हमेशा से ही अपनी फसल को लेकर चिंतित रहते हैं और चिंतित हों भी क्यों न! कभी उनकी फसल बर्बाद हो जाती है तो कभी उनकी फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पाता।

खासतौर गन्ना किसान अपनी फसल का उचित मूल्य न मिल पाने के कारण ज्यादा तकलीफ में रहते हैं।  वह हर वक्त यही सोचता रहता है कि काश इस बार की फसल से वो इतना कमा सके कि पिछली फसल के लिए लिया गया कर्ज वापिस कर सके।

लेकिन मुंबई से करीब 400 किलोमीटर दूर सांगली जिले की तहसील वाल्वा में कारनबाड़ी के सुरेश की कहानी कुछ और है।

गन्ने की पैदावार कर सबको कर दिया चकिंत 

यह किसान अन्य किसानों की तुलना में ज्यादा पैसा कमा रहा है और वो भी महज अपने खेतों में थोड़ा सा बदलाव करने के बाद। इन्होंने अपने खेत में बदलाव किया और फिर पहले से ज्यादा खेती से मुनाफा होने लगा। आज आलम यह है कि यह किसान अब करोड़ों रूपये कमा रहा है।

सुरेश अपने खेतों में ऐसा करिश्मा कर रहे हैं कि महाराष्ट्र, कर्नाटक, यूपी तक के किसान उनका अनुसरण करते हैं। उनकी ईजाद तकनीकी का इस्तेमाल करने वालों में पाकिस्तान के भी कई किसान शामिल हैं।

करोड़ों में कर रहे है कमाई

सुरेश गन्ने से सलाना 50-70 लाख की कमाई करते हैं, जबकि हल्दी और केले को मिलाकर वो साल में एक करोड़ से ज्यादा का काम करते हैं। पिछले वर्ष उन्होंने एक एकड़ गन्ना बीज के लिए 2 लाख 80 हजार में बेचा था। 2016 में एक एकड गन्ने का बीज वो 3 लाख 20 हजार में भी बेच चुके हैं। लेकिन कुछ साल पहले तक वो भी उन्हीं पऱेशान किसानों में शामिल थे जो भरपूर पैसे लगाने के बावजूद बेहतर उत्पादन नहीं ले पाते थे।

खेती में किए कुछ बदलाव

सुरेश नौंवी पास हैं लेकिन खेती को किसी वैज्ञानिक की तरह करते हैं। अच्छी वैरायटी (किस्म) के गन्ने की बुआई के लिए वो अप्रैल-मई से लेकर जुलाई तक खेत तैयार करते हैं। 15 अगस्त से ट्रे में बड (अंकुर) उगाना शुरु कर देते हैं, जिसके बाद 15 सितंबर से खेत में निश्चित दूरी प्लांटेशन कर देते हैं। “अब मैं टिशू कल्चर से भी गन्ना उगाने लगाने लगा हूं। मेरे एरिया में केले का टिशू कल्चर बनाने वाले वाली फर्म है मैं उससे अपने खेत में सबसे बढ़िया एक गन्ने से टिशू बनवाना हूं, जिससे तीन साल तक फसल लेता हूं।”

वो बताते हैं किसी भी फसल के लिए जमीन और अच्छा बीज होने बहुत अहम होते हैं, “मैं इन दोनों को काफी अहमियत देता हूं। मैं अपने बीज खुद तैयार करता हूं, बेहतर तरीके से खेतों की जुताई, खाद पानी का इंतजाम करता हूं।” सुरेश बीज के लिए खेत में 9-11 महीने फसल रखते हैं तो मिल के लिए 18 महीने तक गन्ना खेत में रखते हैं। वो कहते हैं किसान को पेड़ी का गन्ना नहीं बोना चाहिए। महाराष्ट्र में तमाम किसान उनकी तकनीकि अपना रहे हैं।

पूरे खेत से चुने हुए 100 गन्नों में से एक से बनता है टिशु कल्चर

टिशु कल्चर यानि एक किसी पौधे के ऊतक अथवा कोशिशाएं प्रयोगशाला की विशेष परिस्थितियों में रखी जाती हैं, जिनमें खुद रोग रहित बढ़ने और अपने समान दूसरे पौधे पैदा करने की क्षमता होती है। सुरेश अपने पूरे खेत से 100 अच्छे (मोटे, लंबे और रोगरहित) गन्ने चुनते हैं, उनमें 10 वो स्थानीय लैब ले जाते हैं, जहां वैज्ञानिक एक गन्ना चुनते हैं और उससे एक साल में टिशु बनाकर देते हैं।

सुरेश बताते हैं, इसके लिए करीब 8 हजार रुपये मैं लेब को देता हूं, वो जो पौधे बनाकर देते हैं, जिसे एफ 1 कहा जाता है से पहले साल में कम उत्पादन होता है लेकिन दूसरे साल के एफ-2 पीरियड और तीसरे एफ-3 में बहुत अच्छा उत्पादन होता है। इसके बाद मैं उस गन्ने को दोबारा बीज नहीं बनाता। टिशू कल्चर से उगाए गए गन्ने की पेड़ी में खरपतवार नहीं होता है।

सहजन की खेती से 10 महीने में कमायें एक लाख

सहजन की खेती लगाने के 10 महीने बाद एक एकड़ में किसान एक लाख रुपए कमा सकते हैं। कम लागत में तैयार होने वाली इस फसल की खासियत ये है कि इसकी एक बार बुवाई के बाद चार साल तक बुवाई नहीं करनी पड़ती है। साथ ही सहजन एक औषधीय फसल है।

गुजरात के मोरबी जिले से पूरब दिशा से 30 किलोमीटर दूर चूपनी गाँव में किसान प्रतिवर्ष 200 से 250 एकड़ खेत में सहजन की खेती करते हैं। यहां के किसान पिछले छह वर्षों से सहजन की खेती कर रहे हैं। उन्होंने इसकी शुरुआत एक एकड़ खेत से की थी और इसके बढ़ते मुनाफे को देखकर अब 250 एकड़ में सहजन की खेती की जा रही है। सहजन कमाई के साथ ही 300 रोगों की रोकथाम कर सकता है।

चूपनी गाँव में रहने वाले किसान रवि सारदीय (42 वर्ष) बताते हैं, “मैं पिछले तीन साल से सहजन की खेती कर रहा हूं। इसके एक एकड़ में खेती से किसान एक लाख से ज्यादा मुनाफा सिर्फ 10 महीने में कमा सकते हैं।” रवि सारदीय ने सहजन की एक नई प्रजाति की खोज की है, जिसका नाम है “ज्योति-1” है। इस प्रजाति को लगाने से एक पौधे में 700 फलियां लगती हैं, जबकि दूसरी प्रजाति में सिर्फ 250 ही फलियां लगती हैं।

रवि सारदीय आगे बताते हैं, “एक एकड़ खेत में सहजन के 250 ग्राम बीज की जरूरत होती है, लाइन से लाइन की दूरी 12 फिट और प्लांट से प्लांट की दूरी 7 फिट रखी जाती है, एक एकड़ खेत में 518 पौधे लगाए जाते हैं। अप्रैल महीने में बुवाई के बाद सितम्बर महीने में फलियां बाजार में बिकनी शुरू हो जाती हैं।” गर्मी के मौसम में 10 रुपए किलो और सर्दियों के मौसम में 40 रुपए किलो के हिसाब से बिकती हैं। बारिश के मौसम को छोड़कर सहजन के पेड़ में दो बार फलियां लगती हैं।

पशुओं के चारे के रूप में उपयोगी

चारे के रूप में इसकी पत्तियों के प्रयोग से पशुओं के दूध में डेढ़ गुना और वजन में एक तिहाई से अधिक की वृद्धि की रिपोर्ट है। कुपोषण, एनीमिया (खून की कमी) में सहजन फायेदमंद होता है।

औषधीय गुणों से भरपूर

डॉ. रजनीश मिश्र ने बताया कि सहजन को अंग्रेजी में ड्रमस्टिक कहा जाता है। इसका वनस्पति नाम मोरिंगा ओलिफेरा है। फिलीपीन्स, मैक्सिको, श्रीलंका, मलेशिया आदि देशों में भी सहजन का उपयोग बहुत अधिक किया जाता है। दक्षिण भारत में व्यंजनों में इसका उपयोग खूब किया जाता है। सेंजन, मुनगा या सहजन आदि नामों से जाना जाने वाला सहजन औषधीय गुणों से भरपूर है। इसके अलग-अलग हिस्सों में 300 से अधिक रोगों के रोकथाम के गुण हैं। इसमें 92 तरह के मल्टीविटामिन्स, 46 तरह के एंटी आक्सीडेंट गुण, 36 तरह के दर्द निवारक और 18 तरह के एमिनो एसिड मिलते हैं।

गर्मी में भी बंपर उत्पादन देगी गेहूं की यह नई किस्म

करनाल: भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (PUSA) ने गेहूं की पांच व जौ की तीन किस्में रिलीज की हैं। इसमें गेहूं की डीबीडब्ल्यू-173 गर्मी में भी बंपर उत्पादन देगी। शोध में एक हेक्टेयर में इसका उत्पादन 70 क्विंटल तक आया है। इस किस्म के लिए हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के ऊना जिला अनुकूल है।

इन क्षेत्रों में किए गए शोध के बाद आए सफल परिणाम के बाद इस वेरायटी को रिलीज कर दिया गया है। इसके अलावा पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा व असम के क्षेत्र के लिए एचआइ-1612, डीबीडब्ल्यू-168, यूएएस-375 और एचआइ-8777 को रिलीज किया गया है। इसके अलावा जौ की डीडब्ल्यूआरबी-137, आरडी-2899 और आरडी-2907 की किस्म रिलीज की गई है।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

संस्थान के निदेशक डॉ. ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि इन वेरायटी के रिलीज होने के बाद इनका सीड तैयार किया जाएगा। उसके बाद यह मार्केट में उपलब्ध होगी। किसी भी वेरायटी को रिलीज करने के बाद पूर्ण रूप से किसानों तक लाने के लिए करीब दो साल लग जाते हैं, क्योंकि किसानों की डिमांड के अनुसार बीज तैयार किया जाता है। डीबीडब्ल्यू 173 की बिजाई नवंबर के आखिरी सप्ताह से लेकर दिसंबर के दूसरे सप्ताह तक की जा सकती है। यह फसल 118 से 120 दिन में तैयार हो जाती है।

पर्यावरण के गर्म मिजाज से लड़ेगी नई किस्म

कई वेरायटी में यह देखने में आया है कि मार्च माह में जब तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है तो दाना पिचकना शुरू हो जाता है, लेकिन डीबीडब्ल्यू 173 में ऐसा नहीं होगा। यह किस्म दो से चार डिग्री सेल्सियस अधिक तापमान को भी सहन कर सकेगी। इसके अलावा इसमें रोग प्रतिरोधक क्षमता भी अन्य किस्मों से ज्यादा है। इसमें आयरन की मात्र 41 पीपीएम यानि पार्ट्स पर मिलियन है।

(दैनिक जागरण से साभार)

सोनीपत के इंजीनियर ने बनाई ईंट बनाने की मशीन , 120 मज़दूरों का काम करती है अकेले

सोनीपत में 10वीं पास सतीश नाम के युवा ने एक ऐसी मशीन का आविष्कार किया है, जो 120 मज़दूरों का काम अकेले ही कर लेती है। ये ईंट बनाने की मशीन है।

गांव लडरावन निवासी सतीश ने अपने इस आविष्कार से भट्टा उद्योग में एक नयी मिसाल पेश की है। दरअसल, सतीश गांव फिरोजपुर बांगड में लगाए अपने ईंट के भट्टे पर काम करने वाले मज़दूरों से काफी परेशान थे। वो पैसे लेने के बाद भी भट्टे पर काम करने नहीं आते थे। इसी के चलते सतीश के दिमाग में ऐसी मशीन बनाने का आइडिया आया और फिर उस पर सतीश ने काम करना शुरू किया।

सतीश ने साल 2007 में मशीन बनाने के लिए अलग-अलग जगह से पुर्जे और उपकरण लाकर मशीन बनाना शुरू कर दिया। मशीन बनाने में लाखों रुपये लगने के बाद भी सतीश की कोशिशें नाकाम होती रही लेकिन सतीश ने कभी हार नहीं मानी।

सतीश के हौंसलों को देखते हुए उसके चचेरे भाई राजेश, विकास, प्रवेश, राकेश और उसके दोस्तों ने उसका साथ देना शुरू किया। भाई और दोस्तों के सहयोग ने सतीश का मनोबल इतना बढ़ा दिया कि इन सब ने मिलकर ईंट बनाने वाली मशीन का आविष्कार कर डाला।

सतीश मशीन के बारे में बात करते हुए कहते हैं, “ये मशीन ईंट-भट्टे पर एक दिन में काम करने वाले 120 मज़दूरों के बराबर काम करती है। यह मशीन आसानी से ईंटें बना देती है। बी एम एम नाम की यह मशीन एक मिनट में 150 ईंटें बनाती है। दिन भर में इस मशीन से करीब 40000 ईंटें बनाई जाती है।

वहीं इस मॉडल के अलावा बी एम एम-300 मशीन भी तैयार की गई है, जो एक मिनट में 300 ईंटें तैयार करती है। यह मशीन दिनभर में करीब 85000 ईंटें तैयार करती है। इस मशीन से ईंट-भट्टों पर मज़दूरो की आ रही किल्लत को काफी हद तक खत्म कर दिया है।”

मशीन बनाने में सहयोगी इंजीनियर पंकज राणा कहते हैं कि ये मशीन सतीश की 8 सालों की मेहनत का फल है। मशीन पर आने वाली लागत को देखते हुए सतीश ने गांव के अपने मकान और पुश्तैनी जायदाद को दांव पर लगा दिया था।

लेकिन इतने सालों की मेहनत का फल 2013 में तीन मशीनें तैयार कर मिला। मशीन बनाने के हमारे जुनून को देखते हुए सभी लोगों ने हमें पागल कहना शुरू कर दिया था लेकिन अब सब लोग हमारी तारीफ करते नहीं थकते।

सतीश का कहना है कि अब इस मशीन की डिमांड दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। मशीन के आविष्कार का पेटेंट करा लिया गया है। मशीन के पार्ट्स अब जर्मन और इटली से मंगाये जाते हैं। अब तक हम करीब 25 मशीनें बेच चुके हैं। हरियाणा, यूपी, बिहार, तमिलनाडु, राजस्थान, बिहार और कर्नाटक के अलावा पड़ोसी देश नेपाल में भी हम इस मशीन की सप्लाई कर चुके हैं।

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यह मशीन कैसे काम करती है उसके लिए वीडियो देखें

साइकिल के पहिए में से जंगली जानवरों को भागने के लिए किसान ने बनया अनोखा जुगाड़

मध्यप्रदेश समेत देश में नील गाय, जंगली जानवर खेतों में खड़ी फसलों को नष्ट कर देते हैं। किसानों के लिए जंगली जानवर हमेशा चिंता का विषय बना रहता है। ऐसे में प्रदेश सरकार ने सोलर पॉवर फेंसिंग मशीन योजना लेकर आई है,

लेकिन प्रदेश के कुछ किसानों के पास सोलर पॉवर फेंसिंग लगाने के लिए पर्याप्त रुपए नहीं रहते हैं, इस कारण वे इसे लगाने में समर्थ रहते हैं, लेकिन धार जिले के खिलेड़ी गांव के किसान विनोद खोकर ने एक नया नवाचार किया है। उन्होंने एक ऐसा यंत्र बनाया है, जिसकी आवाज से जंगली जानवर भाग जाए।

हवा चलित पंखे लगने के बाद खेत के आसपास अब कोई नहीं आता

किसान विनोद खोखर ने खेत में मक्का लगा रखी है। इसमें अब भुट्‌टे भी आ गए हैं। ऐसे में जंगली जानवर रात और दिन फसल को नुकसान पहुंचाने खेतों में घुस जाते हैं, ये हवा चलित पंखे लगने के बाद खेत के आसपास कोई नहीं आता है।

किसान खोखर ने भंगार को ऐसा निर्मित किया है, जिससे वह उपयोगी यंत्र बन सके। उन्होंने भंगार में रखी साइकिल का पहिया और एक्सल लिया।

पुराने कूलर की पंखुड़ी के ठीक पीछे एक डिब्बा लगाकर उसे नट से पैक कर दिया। जिससे वह चलित हवा पंखा तैयार कर इसे खेत में लगाया। जैसे ही तेज हवा चलती है तो पंखा चलता है तो नट डिब्बे से टकराते रहते हैं और जोर-जोर से आवाज आती है।

आवाज आने से खेतों में फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले पक्षी और खासकर घोड़ा भाग जाते हैं। यानी भंगार के सामान से तैयार यह पंखे खेत में कांग भगोड़ा की काम कर रहे है।

अनचाही गाजर घास का इस्तेमाल करके अब आप बना सकेंगे खाद

काफी वक्त पहले कांग्रेस की सत्ता में रहते वक्त मैक्सिको से आए गेहूं के बीज के साथ आए गाजर घास के बीज किसानों के लिए आज तक मुसीबत बने हैं। इससे फसलों को काफी नुकसान हो रहा है।

इस घास को खत्म करने के समय—समय पर कई तरीके आए लेकिन सभी इतने कारगर साबित नहीं हुए हैं। इसको देखते हुए कृषि वैज्ञानिकों ने इस घास का इस्तेमाल खाद बनाने के लिए करने में सबसे अच्छा बताया है।

रेलवे लाइन के किनारे और खेतों के किनारे निकलने वाली अनचाही गाजर घास उगी रहती है। गाजर घास फसलों के अलावा मनुष्यों और पशुओं के लिए भी गम्भीर समस्या है। इस खरपतवार के सम्पर्क में आने से एग्जिमा, एलर्जी, बुखार, दमा व नजला जैसी बीमारियां हो जाती हैं। इसे खाने से पशुओं में कई रोग हो जाते हैं।अगर गाय या भैंस इसे खा लेती हैं तो उनके थनों में सूजन आ जाती है और पशुओं के मरने का भी खतरा होता है।

जी हाँ आप ने सही पढ़ा अब आप इस घास का इस्तेमाल करके आप खाद बना सकते हैं। इतना ही नहीं यदि आप अपने खेत में गाजर घास से बनी खाद डालते हैं तो आपको दूसरी कोई खाद डालने की जरूरत नहीं पड़ेगी। वहीं कृषि वैज्ञानिक गाजर घास की खाद को फसलों के लिए फायदेमंद भी बता रहे हैं।

कैसे बनाई जा सकती है खाद

कृषि वैज्ञानिक के अनुसार गाजर घास से खाद बनाने के लिए किसानों को एक गड्ढा खोदना होता है। गड्ढे की लम्बाई 12 फीट, चौड़ाई चार फीट और घहराई पांच फीट होनी चाहिए। इस गड्ढे में नौ इंच चौड़ी की दीवार बनानी होगी। इसे सीधा जोड़ेंगे। जब तीन स्टेप तीन रदृा ईंट रखने के बाद सात इंच चारों ओर जाली बनाई जाएगी। इसी तरह ईंट की जोड़ाई सीधी और जालीदार करते रहेंगे। इसके बाद सूखी गाजर घास को अलग और हरी गाजर घास को अलग रख लेंगे।

छह इंच तक हरा और सूखा वाला डंठल नीचे भर देंगे। इसके बाद 5 किलो गोबर पानी में ढीला घोलकर इसमें डाल देंगे। साथ में 2 इंच मिट्टी भी डालेंगे। भराई करने के बाद उसके उपर से मुलायम वववावला डंठल डाला जाएगा। फिर पांच किलो गोबर पानी के साथ मिक्स करके तर करेंगे। इसी तरह गड्ढे को उपर तक भरना होगा।

खाद बनाने का दूसरा तरीका

गाजर घास से खाद बनाने का दो तरीका है। दूसरा तरीका यह है कि आपको चार गड्ढे खोदने होते हैं। सबकी एक दूसरे से दूरी डेढ़ फीट की होनी चाहिए। खाद बनाने की पहले वाली विधि की ही तरह पहले गड्ढे में घास और गोबर की भराई कर दी जाए। जब मैटेरियल अच्छी तरह सड़ जाए तो पहले वाले गड्डे से मैटेरियल निकाल दूसरे में डाल देना चाहिए।

फिर दूसरे का मैटेरियल निकाल कर तीसरे और पहले इसी तरह चौथे में डाल देना चाहिए। यह प्रक्रिया पहले, दूसरे तीसरे और चौथे गड्ढे में चलेगी और फिर खाद तैयार हो जाएगी। कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिक डॉ. संदीप कन्नोजिया कहते हैं, “गाजर घास से बनी 20 टन खाद एक हेक्टेयर खेत के लिए मुफीद है।

सिर्फ 2200 रू की लगत मैं साइकिल को ही बना डाला स्प्रे मशीन, 45 मिनट में ही 1 एकड़ में स्प्रे

जरूरत अविष्कार की जननी है, ये बात सभी मानते हैं। गुजरात में भी एक किसान की जरूरत ने एक नई सस्ती, टिकाऊ और तेजी से काम करने वाली मशीन को जन्म दिया है, जिसका फायदा अब किसानों को खूब हो रहा है।

40 साल के मनसुखभाई जगानी छोटे किसान हैं और गुजरात के अमरेली जिले के रहने वाले हैं। मनसुखभाई प्राथमिक स्तर से आगे नहीं पढ़े हैं। जबरदस्त आर्थिक तंगी के दिनों में मनसुखभाई ने मजदूर के तौर पर भी काम किया है।

22 साल पहले उन्होंने गांव वापस लौटकर मरम्मत और निर्माण का छोटा सा काम शुरु किया और खेती के काम आने वाले औजार बनाने लगे।इस काम में हुनर हासिल करने के बाद अब मनसुखभाई ने फसलों पर स्प्रे करने वाली एक आसान और बेहद सस्ती मशीन बना डाली।इससे ना केवल काम बहुत तेजी से होता है बल्कि लागत भी कई गुना बच जाती है।

मनसुखभाई ने साईकिल में भई स्प्रे मशीन को कुछ इस तरह जोड़ दिया जिससे स्प्रे करने वाले व्यक्ति के शरीर कोई थकावट नहीं होती। साथ ही स्प्रे के दौरान निकलने वाले रासायनिक पदार्थ से शरीर को भी नुकसान का खतरा काफी कम हो जाता है।

मनसुखभाई ने साइकिल के सेंट्रल स्प्रोकेट को पिछले पहिये और पिछले पहिये को सेंट्रल स्प्रोकेट से बदल दिया।उन्होंने पैडल्स को सेंट्रल स्प्रोकेट से हटा दिया। पैडल्स की जगह उन्होंने दोनों तरफ से पिस्टन रॉड लगा दिए। दोनों तरफ से ये पिस्टन रॉड पीतल के कीलेंडर से जुड़े हुए हैं।

30 लीटर का PVC स्टोरेज का एक टैंक उन्होंने साइकिल के कैरियर पर रख दिया, जो कि कीलेंडर पंप से जुड़ा हुआ था। बैलेंस बनाने के लिए उन्होंने साइकिल के कैरियर के दोनों तरफ 4 फुट लंबा छिड़काव करने वाला एक नोज़ल भी लगा दिया।

8 दिनों की मेहनत के बाद मनसुखभाई जबरदस्त ढंग से काम करने वाली स्प्रे मशीन बनाने में सफल हो गए। साईकिल स्प्रे मशीन से 1 एकड़ खेत में छिड़काव करने में 45 मिनट का वक्त लगता है। इसकी लागत 2200 रूपए हैं। इसमें साईकिल की कीमत नहीं जोड़ी गई है।

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