बगीचे में काम करते वक़्त मिली ऐसी चीज़ के माली हो गया मालोमाल

किसकी किस्मत कब खुल जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। आपको भी जानकर विश्वास नहीं होगा कि काम करते वक्त उस माली को क्या मिला। दरअसल उस माली के हाथ ऐसी कीमती चीज लगी है जिससे उसकी किस्मत का पिटारा खुल सकता है।

हर दिन की तरह वह उस दिन भी मालिक के कहने पर बागीचे में काम करने गया, उसे नहीं पता था कि उसकी किस्मत खुलने वाली है। उसने काम शुरू किया और जैसे ही बागीचे के एक पुराने पेड़ (ओक) के पास जमी मिट्टी को साफ करने गया, उसे कीमती चीज मिली।

दरअसल वो आदमी ब्रिटेन का रहने वाला है, उसके मालिक ने अपना खेत और बागीचा उसके हवाले कर रखा है। जिसकी हर दिन की सफाई और देख रेख 60 साल का वो माली ही करता है जिसका नाम Steve Fletcher है।

पहले तो उसे लगा कि कोई फालतू चीज उसे मिली है लेकिन बाद में उसे सच्चाई पता चली।  जी हां, उसके हाथ ‘ब्लैक गोल्ड’ लगा है। दरअसल ये ब्लैक गोल्ड एक फंगस (कवक) का होता है। जिसकी कीमत भारतीय बाजार में लगभग 20 लाख रुपए है। अगली स्लाइड में जानिए क्या होता है ब्लैक गोल्ड।

एक तरह का फंगस जिसे ‘ब्लैक ट्रफल’ कहते हैं जिसे फ्रांस, जर्मनी, इटली और विदेशों में बड़ा चाव से लोग खाते हैं। इस ब्लैक ट्रफल को ब्लैक गोल्ड भी कहते हैं। ये बहुत कीमती होता है। इसे तरह तरह के खाद्य पद्वार्थ भी बनाए जाते हैं।

किसान जो सीड बाल से खेती कर कमा रहा है पचास लाख सालाना की कमाई

मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में मूल रूप से खोजनपुर गांव के रहने वाले राजू टाईटस ने पिछले 30 वर्षों से 12 एकड़ जमीन में न कभी हल चलाया और न ही मिट्टी के प्राकृतिक रूप से छेड़छाड़ की है। ये अपने खेतों में बाजार से खरीदी गयी खाद और कीटनाशक का इस्तेमाल नहीं करते हैं, बीजों की सीड बाँल बनाकर खेतों में बुआई करते हैं। इस खेती से राजू टाईटस सालाना पचास से साठ लाख की कमाई भी करते है।

बीजों को जब क्ले मिटटी की परत से 1/2 इंच से लेकर 1 इंच तक की गोल गोल गोलियां से सुरक्षित कर लिया जाता है उसे सीड बॉल कहते हैं।सीड बाँल बनाने के लिए अगर ये मिट्टी गीली है तो बीज के साइज के हिसाब से इसकी गोलियां बना लेते हैं उसके अन्दर बीज भी भर देते हैं, इन गोलियों को सूखा लेते हैं और बरसात आने पर अपने खेतों में फेंक देते हैं।

गर्मियों की छुट्टियों में आसपास के बच्चे खेल-खेल में ये सीड बाँल बनाने के लिए हमारे फॉर्म पर आ जाते हैं, ये बाँल साल भर तक खराब नहीं होती हैं और बीज सुरक्षित रहता है, बरसात से पहले इन बालों को बनाकर सुखाने के बाद इन्हें खेतों में बिखरा देते हैं, बीज चिड़ियां और चूहे नही खा सकते।

इस तरह से बोआई करने से एक एकड़ में लगभग 20 कुंतल की उपज हो जाती है जिससे चार पांच लाख की वार्षिक आय हो जाती है, अब तो कई जगह के किसान इसे देखने आते हैं, बकरी पालन भी किया है इससे शुद्ध दूध मिल जाता है और आसपास जमे खरपतवार ये साफ़ कर देती हैं।

होशंगाबाद जिले से डेढ़ किलोमीटर दूर ‘टाईटस फॉर्म’ के नाम से मशहूर इनके फॉर्म को सब जानते हैं। बिना रसायन 30 वर्षों से लगातार खेती कर रहे राजू बताते हैं के अगर हम प्रकृति के साथ छेड़छाड़ न करें तो हमे खेती करने में किसी भी प्रकार की कोई असुविधा नहीं होगी, जुताई करने से असंख्य जीवाणु तो नष्ट होते ही है साथ ही झाड़ियाँ भी काट देते हैं

झाड़ियाँ काटने से असंख्य जीव-जन्तु, कीड़े-मकोड़े मर जाते हैं, पेड़ो के साथ झाड़ियाँ और झाड़ियों के साथ घास और अनेक वनस्पतियां रहती हैं जो एक दूसरे की पूरक होती हैं, अगर हम जुताई नहीं करते हैं तो हमारे खेत असंख्य वनस्पतियों से भर जाते हैं, बकरी पालन करते हैं जिससे खरपतवार का नियंत्रण होता है।

 

 

जापान में ऐसे लगाई जाती है धान आप देख कर रह जाएंगे हैरान

जापान जैसे की आप को पता है एक छोटा सा देश है लेकिन टेक्नोलॉजी के मामले में उसने अपना लोहा सारी दुनिया में मनवाया है ।

वैसे तो जापान इलेक्ट्रॉनिक्स सामान के लिए प्रसिद्ध है लेकिन यहाँ की खेती भी बहुत एडवांस है । आज हम आपको दिखायेंगे के जापान में धान की खेती कैसे की जाती है ।

 

वहां की तकनीक हमारे भारत के मुकाबले में इतनी एडवांस है के हमें वैसे धान लगाने के लिए कम से कम 50 साल लग जायँगे ।

तो हम आपको एक वीडियो के जरिए धान लगाने की सारी तकनीक के बारे में बताते है ।

अब अंगूठे के निशान से मशीन बताएगी खाद की जरूरत

किसान अब अपनी मर्जी से रासायनिक खाद की खरीदी नहीं कर सकेंगे। किसी भी सरकारी समिति से खाद खरीदने पर किसानों का मशीन में थंब इंप्रेशन लिया जाएगा। मशीन बता देगा कि उस किसान को कौन सी और कितने खाद की जरूरत है। उससे अधिक खाद किसान को नहीं दिया जाएगा। किसानों का पूरा डेटा कंप्यूटर में फीड कर दिया गया है। इस तरह की पहल से किसान अधिक मात्रा में रासायनिक खाद का उपयोग नहीं कर पाएंगे।

किसानों का स्वाइल हेल्थ कार्ड बनाया जा रहा है। इस कार्ड में किसानों की पूरी जमीन का विवरण है, कितनी जमीन में खेती हो रही है और कितनी जमीन परिया है। जिन खेत में फसल बोई जा रही है उस खेते में कौन सी और कितनी खाद की जरूरत है, यह सब जानकारी कृषि विभाग के सिस्टम में अपलोड की जा रही है।

स्वाइल कार्ड को आधार कार्ड से लिंक करने के बाद यह सिस्टम शुरू हो जाएगा। किसान अब मनमाने तरीके से अधिक मात्रा में रासायनिक खाद का उपयोग नहीं कर पाएंगे। नियमित रूप से खाद का उपयोग होने से जमीन की उर्वरक क्षमता पर भी कोई असर नहीं पड़ेगा।

निजी दुकानों में पीओएस मशीन से होगी खरीदी

सहकारी समितियों के अलावा लाइसेंसी निजी दुकानों में भी पीओएस मशीन लगाई जाएगी। कृषि विभाग किसानों के खेतों की मिट्टी का सैंपल ले रहे हैं, जिसके आधार पर विभाग के पास यह डाटा है कि किसान के पास कितनी जमीन है और खेत की मिट़्टी में कौन से उर्वरक की कमी या अधिकता है।

ऐसे में किस खाद को कितनी मात्रा में डालना है, यह सब ऑनलाइन पता चल जाएगा। इससे निजी दुकानदार मनमाने तरीके से खाद नहीं बेच पाएंगे। इससे किसानों को रासायनिक खाद के लिए अधिक रुपए खर्च नहीं करना पड़ेगा और उनके पैसे बचेंगे। जिससे वे दूसरा काम कर सकेंगे।

इस पहल से खाद की नहीं हो सकेगी कालाबाजारी

हर साल सरकारी सब्सिडी से हजारों मैट्रिक टन यूरिया, डीएपी और अन्य खाद सोसायटियों में पहुंचती है। लेकिन कालाबाजारी के चलते किसानों का इसका पूरा लाभ नहीं मिलता है। इस प्रकार की गड़बड़ी को रोकने के लिए यह पहल किया जा रहा है। इसके लिए सभी सोसायटियों में पीओएस मशीन दी जाएगी।

इससे किसानों पर विभाग मॉनिटरिंग भी कर पाएगा कि उसने साल में कितनी बार खाद खरीदी है और कितनी जमीन है। अगर बार-बार खाद खरीद रहा है, तो उसका क्या उपयोग हो रहा है। इससे बड़े किसान खाद की कालाबाजारी नहीं कर पाएंगे।

अगर अच्छी फ़सल चाहिए, तो न जोतें खेत

कोई भी जंगल की ज़मीन को नहीं जोतता पर तो भी वहां पेड़-पौधे उगते हैं. संरक्षित खेती के तहत माना जाता है कि खेती के लिए ज़मीन जोतने की ज़रूरत नहीं खेत जोतने से ज़मीन सूख जाती है. कई फ़सलों में उनकी जड़ों को ज़मीन से पोषक तत्व लेने में रोक लगाती है और इससे मिट्टी के माइक्रोबियल गुणों पर भी असर पड़ता है.

इसलिए बोरलॉग इंस्टीट्यूट ऑफ़ साउथ एशिया भारत में कुछ बदलाव के साथ संरक्षित खेती की सलाह देता है.इस इंस्टीट्यूट का नाम नॉरमन बोरलॉग के नाम पर रखा गया है जिन्हें हरित क्रांति का जनक कहा जाता है.

इस इंस्टीट्यूट की शाखाएं लुधियाना, समस्तीपुर और जबलपुर में हैं.यह इंस्टीट्यूट उत्तरी-पश्चिमी भारत में जहां बाढ़ के पानी से सिंचाई होती है, बुआई से पहले लेज़र लेवलिंग की सलाह देता है ताकि थोड़े से पानी से बड़े खेत का काम चल जाए.

मगर मध्य भारत में जहां बड़े पैमाने पर सिंचाई के साधनों का इस्तेमाल होता है और ज़मीन की सतह लहरदार है, वहां लेज़र लेवलिंग की ज़रूरत नहीं है.संरक्षित खेती के तीन नियम हैं. पहला, बिल्कुल भी जुताई न करें या बहुत कम जुताई करें. दूसरा नियम कि पिछली फ़सल के डंठल खेत में ही छोड़ दें ताकि वह खेत की नमी बरकरार रखें और खेत में खरपतवार को दबाकर रखें और मिट्टी के जैविक गुण में इज़ाफ़ा करें.

 

तीसरे नियम के तहत मिट्टी में नाइट्रोज़न की मात्रा बढ़ाने के लिए फल लगने वाले फ़सलों की खेती की जाए. खेती का यह तरीका कम ख़र्चीला है क्योंकि इसमें जुताई की ज़रूरत नहीं पड़ती.मगर इसमें नए ज़माने के खरपतवार नाशकों की ज़रूरत पड़ती है जो अपने प्रभावों में मारक हों और मिट्टी में ज़्यादा दिनों तक जिसका असर न हो.

जिस हवा में हम सांस लेते हैं उसके लिए भी यह अच्छा है. छोटे-छोटे धूल के कण हवा को गंदा करते हैं. ठंड के दिनों में अलाव जलाने से यह प्रदूषण और भी बढ़ता है.

पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के खेतों में धान के पुआल जलाने के कारण इस तरह का प्रदूषण बढ़ता है.धान के पुआल में सिलिका ज़्यादा होता है, जिसे जानवर खाना पसंद नहीं करते. प्रतिबंध के बावजूद पूरे क्षेत्र में खेतों में अलाव जलाए जाते हैं. इसे अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के नक्शे में रेड स्पॉट के रूप में देखा जा सकता है.

अगर पुआल को खेत में ही छोड़ दें, तो प्रदूषण होने से बचाया जा सकता है.हरित क्रांति के दौरान भारत ने मिट्टी की गुणवत्ता को लेकर लापरवाही बरती क्योंकि उस वक़्त सारा ध्यान खाद्य सुरक्षा को लेकर था. लेकिन ये दोनों एक-दूसरे के विरोधाभासी नहीं हैं.

असल में मिट्टी की गुणवत्ता नज़रअंदाज करने से आगे खेती पर बुरा असर पड़ता है. भारत को बड़े पैमाने पर संरक्षित खेती अपनाने की ज़रूरत है.

नौकरी छोड़ 60 हज़ार की लागत से शुरू की मोती की खेती अब कमा रहा है लाखों

जब किसी में कुछ करने की चाह होती है तो वह छोटे कामों से भी अपनी पहचान बना लेते हैं। ऐसा ही कुछ गुड़गांव के फरूखनगर तहसील के गांव जमालपुर के रहने वाले विनोद कुमार ने कर दिखाया। विनोद ने इंजीनियर की नौकरी छोड़कर मोती की खेती शुरू की। जिससे वह 5 लाख रुपए सलाना कमा रहा है। इतना ही नहीं वह दूसरे किसानों को भी इस खेती का प्रशिक्षण दे रहा है।

27 वर्षीय विनोद कुमार का कहना है कि उन्होंने वर्ष 2013 में मानेसर पॉलिटेक्निक से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया। इसके बाद दो साल तक नौकरी की। उनके पिता भी किसान थे। प्राइवेट नौकरी के साथ थोड़ी रूचि खेती में भी थी। इंटरनेट पर खेती की नई-नई तकनीक के बारे में पढ़ते-पढ़ते मोती की खेती के बारे में पढ़ा।

कुछ जानकारी इंटरनेट से जुटाई तो पता चला कि कम पैसे और कम जगह में यह काम किया जा सकता है। मोती की खेती का प्रशिक्षण देने वाला देश का एक मात्र संस्थान सेंट्रल इंस्टिट्यूट ऑफ फ्रेश वॉटर एक्वाकल्चर (सीफा) भुवनेश्वर से मई 2016 में एक सप्ताह का प्रशिक्षण लिया और 20 गुणा 10 फुट एरिया में 1 हजार सीप के साथ मोती की खेती शुरू कर दी।

विनोद कुमार ने बताया कि यह खेती शुरू करने के लिए पानी के टैंक की जरूरत पड़ती है। मेरठ, अलीगढ़ व साउथ से 5 रुपए से 15 रुपए में सीप खरीदी जा सकती हैं। यह मछुआरों के पास मिलती है। इन सीप को 10 से 12 महीने तक पानी के टैंक में रखा जाता है। जब सीप का कलर सिल्वर हो जाता है तो मानो मोती तैयार हो गया है।

पूरा सैटअप खड़ा करने में लगभग 60 हजार रुपए खर्च आ जाता है। इस खेती में सबसे अहम काम सीप की सर्जरी करना है। इसके लिए ही विशेष प्रशिक्षण लेना पड़ता है। सीप के अंदर दो मोती पैदा हो सकते हैं। जैसी आकृति उसके अंदर रखी जाती है वैसा ही मोती पैदा हो जाता है। वे भगवान गणेश, शिव, 786 आदि के मोती भी पैदा करते हैं।

विनोद ने बताया कि मोती की कीमत उसकी क्वालिटी देकर तय की जाती है। एक मोती की कीमत 300 रुपए से शुरू होकर 1500 रुपए तक है। इसकी मार्केट सूरत, दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद और कलकत्ता में है। वे वर्ष 2016 से ही अलग-अलग जगह अपने मोती भेजते हैं। एक बार माल जाने लगे तो खरीदार खुद संपर्क में रहते हैं।

विदेशों में भी खासी मांग है लेकिन उसके लिए आपके पास पैदावार अधिक होनी चाहिए तभी एक्सपोर्ट का काम कर सकते हैं। वे खुद 2000 सीप के व्यवसाय से 5 लाख रुपए से ज्यादा की आमदनी ले रहे हैं। विनोद खुद भी किसानों को प्रशिक्षण देते हैं। किसान उनके पास इस खेती का प्रशिक्षण लेने के लिए आते हैं।

कम पानी में ज्यादा उत्पादन चाहिए तो लगाएं धान की यह किस्मे

 

धान की फसल को ज्यादा पानी वाली फसल माना जाता है और यह बिलकुल सच भी है लेकिन कुश ऐसी भी किस्मे है जिनके उपयोग से आप बहुत सारा पानी बचा सकते हो कुछ ऐसी ।

इन किस्मो की खास बात यह है की समय पर अच्छी बरिश न भी हो तो किसानों को परेशान होने की जरूरत नहीं है। किसान अगर सतर्कता से काम लें तो वह सूखे की स्थिति से निपट सकते हैं।इन किस्मों को सिंचाई की भी काफी कम जरूरत पड़ती है ।

धान की इन किस्मों में पूसा सुगंध-5, पूसा बासमती-1121, पूसा-1612, पूसा बासमती-1509, पूसा-1610 आदि शामिल हैं। धान की यह प्रजातियाँ लगभग चार माह में पैदावार दे देती हैं।

जुलाई माह में भी पर्याप्त बारिश नहीं होती है तो भी धान की इन किस्मो की पौध जुलाई में तैयार करके अगस्त में रोपाई की जा सकती है।

कम बरसात वाले क्षेत्रों में सरसों की पैदावार लेना भी एक अच्छा विकल्प साबित हो सकता है। इसकी फसल को अगस्त और सितम्बर के दौरान लगाकर कम बारिश और सिंचाई की सुविधाओं की कमी के बावजूद अच्छी पैदावार की जा सकती है।

वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि किसान विकल्प के तौर पर एक और प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। इस प्रौद्योगिकी के अनुसार धान की बुवाई गेहूँ की तरह खेतों में की जा सकती है। पौध तैयार करने की जरूरत नहीं है।

जहाँ सिंचाई सुविधाओं का अभाव है और बरसात भी कम होती हो वहाँ ड्रिप सिंचाई, फव्वारा सिंचाई, पॉली हाउस तथा नेट हाउस जैसी आधुनिक सिंचाई तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। इन आधुनिक तकनीकों का प्रयोग कर कम सिंचाई के बावजूद अच्छी फसलें तैयार की जा सकती हैं। इन तकनीकों के इस्तेमाल के लिये सरकारें भी अनुदान देकर प्रोत्साहित करती हैं।

मौजूदा खेती की तुलना में सिर्फ दस प्रतिशत खर्च में ऐसे करें जीरो बजट खेती

जीरो बजट प्राकृतिक खेती देसी गाय के गोबर एवं गौमूत्र पर आधारित है। एक देसी गाय के गोबर एवं गौमूत्र से एक किसान तीस एकड़ जमीन पर जीरो बजट खेती कर सकता है। देसी प्रजाति के गौवंश के गोबर एवं मूत्र से जीवामृत, घनजीवामृत तथा जामन बीजामृत बनाया जाता है। इनका खेत में उपयोग करने से मिट्टी में पोषक तत्वों की वृद्धि के साथ-साथ जैविक गतिविधियों का विस्तार होता है।

जीवामृत का महीने में एक अथवा दो बार खेत में छिड़काव किया जा सकता है।जबकि बीजामृत का इस्तेमाल बीजों को उपचारित करने में किया जाता है। इस विधि से खेती करने वाले किसान को बाजार से किसी प्रकार की खाद और कीटनाशक रसायन खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती है। फसलों की सिंचाई के लिये पानी एवं बिजली भी मौजूदा खेती-बाड़ी की तुलना में दस प्रतिशत ही खर्च होती है ।

सफल उदहारण

गाय से प्राप्त सप्ताह भर के गोबर एवं गौमूत्र से निर्मित घोल का खेत में छिड़काव खाद का काम करता है और भूमि की उर्वरकता का ह्रास भी नहीं होता है। इसके इस्तेमाल से एक ओर जहां गुणवत्तापूर्ण उपज होती है, वहीं दूसरी ओर उत्पादन लागत लगभग शून्य रहती है। राजस्थान में सीकर जिले के एक प्रयोगधर्मी किसान कानसिंह कटराथल ने अपने खेत में प्राकृतिक खेती कर उत्साह वर्धक सफलता हासिल की है । श्री सिंह के मुताबिक इससे पहले वह रासायिक एवं जैविक खेती करता था, लेकिन देसी गाय के गोबर एवं गोमूत्र आधारित जीरो बजट वाली प्राकृतिक खेती कहीं ज्यादा फायदेमंद साबित हो रही है।

प्राकृतिक खेती के सूत्रधार महाराष्ट्र के सुभाष पालेकर की मानें तो जैविक खेती के नाम पर जो लिखा और कहा जा रहा है, वह सही नहीं है। जैविक खेती रासायनिक खेती से भी खतरनाक है तथा विषैली और खर्चीली साबित हो रही है। उनका कहना है कि वैश्विक तापमान वृद्धि में रासायनिक खेती और जैविक खेती एक महत्वपूर्ण यौगिक है। वर्मीकम्पोस्ट का जिक्र करते हुये वे कहते हैं…यह विदेशों से आयातित विधि है और इसकी ओर सबसे पहले रासायनिक खेती करने वाले ही आकर्षित हुये हैं, क्योंकि वे यूरिया से जमीन के प्राकृतिक उपजाऊपन पर पड़ने वाले प्रभाव से वाकिफ हो चुके हैं।

आयातित केंचुआ या देसी केंचुआ?

वर्मीकम्पोस्ट खाद बनाने में इस्तेमाल किये जाने वाले आयातित केंचुओं को भूमि के उपजाऊपन के लिये हानिकारक मानने वाले श्री पालेकर बताते है कि दरअसल इनमें देसी केचुओं का एक भी लक्षण दिखाई नहीं देता। आयात किया गया यह जीव केंचुआ न होकर आयसेनिया फिटिडा नामक जन्तु है, जो भूमि पर स्थित काष्ट पदार्थ और गोबर को खाता है।

जबकि हमारे यहां पाया जाने वाला देशी केंचुआ मिट्टी एवं इसके साथ जमीन में मौजूद कीटाणु एवं जीवाणु जो फसलों एवं पेड़- पौधों को नुकसान पहुंचाते है, उन्हें खाकर खाद में रूपान्तरित करता है। साथ ही जमीन में अंदर बाहर ऊपर नीचे होता रहता है, जिससे भूमि में असंख्यक छिद्र होते हैं, जिससे वायु का संचार एवं बरसात के जल का पुर्नभरण हो जाता है । इस तरह देसी केचुआ जल प्रबंधन का सबसे अच्छा वाहक है । साथ ही खेत की जुताई करने वाले “हल “ का काम भी करता है ।

सफलता की शुरुआत

जीरो बजट प्राकृतिक खेती जैविक खेती से भिन्न है तथा ग्लोबल वार्मिंग और वायुमंडल में आने वाले बदलाव का मुकाबला एवं उसे रोकने में सक्षम है । इस तकनीक का इस्तेमाल करने वाला किसान कर्ज के झंझट से भी मुक्त रहता है । प्राप्त जानकारी के अनुसार अब तक देश में करीब 40 लाख किसान इस विधि से जुड़े हुये आयातित ।

प्राइवेट नौकरी छोड़ कर शुरू की केले की खेती ने बदली किसानो की किस्मत

बिहार के युवा इन दिनों प्राइवेट नौकरी छोड़कर अब केले की खेती करने में लगे हैं। इतना ही नहीं आर्थिक तंगी से जूझ रहे इन युवा किसानों की किस्मत केले की खेती ने चमका दी है। कम लागत में अधिक मुनाफे की इस खेती से आज किसान संपन्न हो रहे हैं।

दो दर्जन से अधिक गांवों में किसान केले की खेती कर रहे हैं। खास बात यह है कि इन किसानों को उद्यान विभाग से कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता। केले की पौध तैयार कर जून-जुलाई और मार्च में दो से ढाई मीटर की दूरी पर बोआई करते हैं।

एक बार फसल बोने के बाद तीन किटंग दो वर्ष में लेते हैं। पहली बार की बोआई में खर्च थोड़ा ज्यादा आता है और समय भी अधिक लगता है। इसके बाद दो-दो पौध जड़ से ही तैयार कर लेते हैं।

एक कटता है तो दूसरा तैयार हो जाता है। केले के बीच में हल्दी, अदरक, सरसों, मसूर, बकला, उड़द आदि की फसल बोकर किसान दोहरा लाभ लेते हैं। एक वर्ष में चार बार पानी चलाना पड़ता है।

एक एकड़ में 18 सौ पौधे

तीन तरह के केले की पौध बिहार के हाजीपुर और गोरखपुर के पीपीगंज क्षेत्र से मंगाते हैं। एक एकड़ में 17 सौ से 18 सौ पौधों को लगाया जाता है।

खेती के पीछे किसानों का आकर्षण लाजमी है। केला की खेती नगदी व्यवसाय है। व्यापारी खेत से ही केला खरीदकर ले जाते हैं। इस खेती से बड़ी संख्या में किसान जहां आत्मनिर्भर हुए हैं, वहीं उनकी आर्थिक तंगी भी दूर हुई है।

इनकी चमकी किस्मत

ततायार के शिव बरन कुशवाहा के दो लड़के संजय कुशवाहा और सत्यप्रकाश कुशवाहा महानगरों में रहकर प्राईवेट नौकरी करते थे। वे चार साल से केले की खेती में जुटे हैं। केले की खेती के मुनाफे ने उन्हें महानगर जाने रोक दिया है। इनके अलावा दर्जनों ऐसे किसान हैं, जो पूरी तरह केले की खेती में रमे हैं।
ऐसे होती है केले की खेती

केले का पौधा जुलाई माह में दो से ढाई मीटर की दूरी पर लगाया जाता है, इस के लिए मई में ही खेत में पौधा लगाने के लिए एक फीट गड्डा तैयार कर उसमें गोबर की खाद डाल दी जाती है। जिसे जुलाई तक खुला रखा जाता है, ताकि उसे खूब लू लग जाये।

एक बार फसल लग जाने के बाद इसकी तीन साल तक पेडी की जाती है। एक एकड जमीन में 1250 पौधे लागए जाते हैं। ज्यादा बारिश भी फसल को नुकसान नहीं पहुचाती है, बल्कि उसे फायदा ही पहुंचाती है। इस फसल में दवाओं के स्प्रे थोड़े से ही करने पडते है। केले की फसल 13 से 15 माह में तैयार हो जाती है। एक एकड जमीन में तीन क्विंटल से साढे तीन क्विंटल तक केला निकल आता है। बरहाल किसान केले की खेती से खुश है।

परंपरागत खेती में हो रहा है घाटा

बता दें कि रामपुर जिले के किसान मुख्य रूप से धान, गेंहू, गन्ना और मेंथा की खेती करते रहें हैं, लेकिन पिछले कुछ सालों से मौसम की मार कहे या सरकार की उदासीनता जिसकी वजह से किसान घाटे में जी रहें हैं।

गेंहू और धान की फसलों में लागत ज्यादा और कीमत कम मिल रही है। इसकी वजह से किसान कर्ज के बोझ में दब रहें हैं। ऐसे हालात में किसान दूसरे विकल्प तलाश रहे थे। जिसे केले की खेती ने पूरा किया है। किसानों को केले की खेती से काफी फायदा हो रहा है।

मलचिंग तकनीक से खेती, आधे पानी से दोगुनी फसल

21वीं सदी में खेती की बात आते ही झट से आपके मन में सवाल आता है कि अब कौन सी तकनीक है जो खेतों में उत्पादन बढ़ा सकती है और किसान की जेब भर सकती है। नई तकनीकों की लंबी फेहरिस्त में इस बार किसानखबर.कॉम आपके लिए लेकर आया है प्लास्टिक मल्चिंग तकनीक (Plastic Mulching) की पूरी जानकारी।

प्लास्टिक मल्चिंग क्या है।

खेत में पौधों की जमीन को चारों तरफ से प्लास्टिक की एक फिल्म के जरिए सही ढंग से कवर करने (ढकने) की तकनीक को प्लास्टिक मल्चिंग कहते हैं। यह फिल्म कई साइज, क्वालिटी और कई रंगों में बाजार में मिलती है।

इस तकनीक का क्या फ़ायदा होता है।

अगर आप मिट्टी में कम नमी और मिट्टी के कटाव से परेशान हैं तो ये तकनीक आपके लिए बेहद ही कारगर साबित हो सकती है। इस तकनीक के जरिए खेत में पानी की नमी को बनाये रखने में तो मदद मिलती ही है साथ ही सूरज की तेज धूप के कारण मिट्टी से पानी सोख लेने की समस्या से भी निजात मिल जाती है।

इस तकनीक की मदद से खेत में मिटटी का कटाव रोकने के साथ साथ खतपतवार को भी सफलतापूर्वक रोका जा सकता है।

अगर आप बागवानी करते हैं तो फिर आपको प्लास्टिक मल्चिंग तकनीक से बागवानी में होने वाले खतपतवार को रोकने के अलावा पोधों को लम्बे समय तक सुरक्षित रखने में बहुत मदद मिलेगी। इसके अलावा जमीन के कठोर होने की परेशानी भी खत्म होती है और पौधों की जड़ों का विकास भी अच्छे से होता है।

कैसे होता है सब्जियों की फसल में प्लास्टिक मल्चिंग का इस्तेमाल

जिस खेत में सब्जी वाली फसल लगानी हें उसे पहले अच्छे से जुताई कर ले। इस बीच मिट्टी की जांच करवा लें। जांच की रिपोर्ट के हिसाब से जोते हुए खेत में गोबर की खाद उचित मात्रा में डाल दें। इसके बाद खेत में उठी हुई क्यारियां बनाएं। फिर उनके ऊपर ड्रिप सिचाई की पाइप लाइन को बिछाए।

सब्जियों की खेती के लिए 25 से 30 माइक्रोन लास्टिक मल्च फिल्म बेहतर होती है। इस फिल्म को उचित तरीके से बिछाते जाएं और फिल्म के दोनों किनारों को मिटटी की परत से दबाते जाएं। इसे आप ट्रैक्टर से चलने वाली मशीन से भी दबा सकते हैं।

इसके बाद आपको उस फिल्म पर गोलाई में पाइप से दो पौधों की बराबर दूरी तय करके छेद करने होंगे। फिर इन छेंदों बीज या नर्सरी में तैयार पौधों का रोपण करना होगा।

फल वाली फसल में कैसे होता है प्लास्टिक मल्चिंग का इस्तेमाल

फल वाले पौधों के लिए 100 माइक्रोन की लास्टिक की फिल्म मल्च अच्छी रहती है। अगर आपने खेत में फलदार पौधे लगाएं हैं तो फिर इसका इस्तेमाल वहां तक करिए जहां तक पौधे की छाव रहेगी। इसके लिए फिल्म मल्च की सही लम्बाई-चौड़ाई में काट लें। इसके बाद पौधों के नीचे के नीचे उग रही घास और खरपतवार को पूरी तरह हटा दें।

फिर सिंचाई का नली को सही ढंग से सेट करने के बाद 100 माइक्रोन की लास्टिक की फिल्म मल्च को पौधों के तने के आसपास अच्छे से लगाना होता है। इसके बाद उसके चारो कोनो को 6 से 8 इंच तक मिटटी की परत से ढकना जरूरी होगा।

प्लास्टिक मल्चिंग करते समय क्या सावधानियां बरतें।

  • प्लास्टिक फिल्म हमेशा सुबह या शाम के समय लगानी चाहिए।
  • फिल्म में ज्यादा तनाव यानी टाइट नहीं लगानी चाहिए। उसको थोड़ा ढीला छोड़ना चाहिए।
  • फिल्म में जो भी सल हो उसे निकलने के बाद ही मिटटी चढ़ावे।
  • फिल्म में छेद करते वक्त सावधानी से करें और सिचाई नली का ध्यान रख के लगाएं।
  • छेद एक जैसे हो और फिल्म न फटे।
  • मिटटी चढाने में दोनों साइड एक जैसी रखें
  • फिल्म की घड़ी (फोल्ड करना) हमेशा गोलाई में करें
  • फिल्म को फटने से बचाएं, ताकि उसका उपयोग दूसरी बार भी कर पाए और उपयोग होने के बाद उसे सुरक्षित रखें।

लागत कितनी आती है?

प्लास्टिक मल्चिंग की लागत कई बातों पर निर्भर करती है। जैसे क्यारियां का साइज क्या है और बाजार में फिल्म का मौजूदा रेट क्या है। रेट हर साल कम-ज्यादा होते रहते हैं। लेकिन फिर भी अगर औसत लागत की बात करें, तो औसत लागत प्रति बीघा लगभग 8 हजार रूपए तक आती है।

सरकारी अनुदाना मिलता है क्या?

देश की कई राज्य सरकारों ने प्लास्टिक मल्चिंग तकनीक का इस्तेमाल करने पर किसानों को अनुदान की सुविधा दे रखी है। मध्य प्रदेश सरकार प्लास्टिक मल्चिंग की लागत का 50 प्रतिशत या फिर अधिकतम 16 हजार रूपए प्रति हेक्टेयर का अनुदान दे रही है।