एलोवेरा की खेती से 50 हजार इन्वेस्ट कर 10 लाख तक कमाने का मौका

एलोवेरा के नाम और इसके गुणों से आज लगभग हर कोई वाकिफ हो चुका है। देश के लघु उद्योगों व कंपनियों से लेकर बड़ी-बड़ी मल्टिनेशनल कंपनियां इसके नाम से प्रोडक्‍ट बेचकर करोड़ों कमा रही हैं। ऐसे में भी एलोवेरा के बिजनेस से 8 से 10 लाख रुपए की कमाई कर सकते हैं। इसके अलावा आप कमाई को 20 लाख रुपए से 1 करोड़ रुपए तक भी ले जा सकते हैं।

2 तरह से कर सकते हैं एलोवेरा का बिजनेस

एलोवेरा का बिजनेस दो तरीकों से किया जा सकता है। शुरूआत आप खेती से कर सकते हैं इस‍के लिए 1 हेक्‍टेयर जमीन में केवल 50 हजार रुपए खर्च कर आप 5 साल तक हर साल 8 से 10 लाख रुपए कमा सकते हैं। दूसरा एलोवेरा की प्रोसेसिंग यूनिट लगाकर जूस बेचकर मोटी कमाई कर सकते हैं। इसके लिए 6 से 7 लाख रुपए इन्‍वेस्‍टमेंट करना होगा और कमाई 20 लाख रुपए से 1 करोड़ रुपए तक हो सकती है।

एलोवेरा की खेती के एक हेक्‍टेयर खेत के मानक को समझा जा सकता है। खेत में एक बार प्‍लांटेशन करने के बाद आप 3 साल तक इसकी फसल ले सकते हैं। वर्तमान में आईसी111271, आईसी111269 और एएल-1 हाईब्रिड प्रजाति के एलोवेरा को देश के हर क्षेत्र में उगाया जा सकता है। इंडियन काउंसिल फॉर एग्रीकल्‍चर रिसर्च (आईसीएआर) के अनुसार एक हेक्‍टेयर में प्‍लांटेशन का खर्च लगभग 27500 रुपए आता है। जबकि, मजदूरी, खेत तैयारी, खाद आदि जोड़कर पहले साल यह खर्च 50000 रुपए पहुंच जाता है।

पहले ही साल होगी 10 लाख रुपए तक की कमाई…

एलोवेरा की एक हेक्‍टेयर में खेती से लगभग 40 से 45 टन मोटी पत्तियां प्राप्त होती हैं। मोटी पत्तियों की देश की विभिन्‍न मंडियों में कीमत लगभग 2000 से 2500 रुपए प्रति टन होती है।

इस हिसाब से यदि आप अपनी फसल को बेचते हैं तो आप आराम से 8 से 10 लाख रुपए कमा सकते हैं। इसके अलावा दूसरे और तीसरे साल में पत्तियां 60 टन तक हो जाती हैं। जबकि, चौथे और पांचवे साल में प्रोडक्‍टशन में लगभग 20 से 25 फीसदी की गिरावट आ जाती है।

जूस बनाकर कमाई को कर सकते हैं कई गुना ...

एलोवेरा की पत्तियां या तो आयुर्वेदिक कंपनियां खरीदती हैं या फिर देश की कृषि मंडियों में भी इसे बेचा जा सकता है। लेकिन, अगर आप खुद का जूस बिजनेस शुरू करना चाहते हैं तो आप 7 से 8 लाख रुपए के इन्‍वेस्‍टमेंट से इसे शुरू कर सकते हैं।

प्रतिदिन 150 लीटर जूस तैयार करने की क्षमता की मशीन की बाजार में कीमत लगभग 7 लाख रुपए है। एक लीटर जूस बनाने में लगभग 40 रुपए का खर्च आता है। यदि इस जूस को सीधे बिना किसी ब्रांड नेम के कंपनियों को सप्‍लाई करें तो इसका दाम 150 रुपए प्रति लीटर मिलता है। ऐसे में आप प्रतिदिन 22500 रुपए का जूस तैयार कर सकते हैं।

कौन खरीदेगा फसल 

एलोवेरा और तुलसी जैसी औषिधीय फसलों की कांट्रेक्‍ट फार्मिंग और प्री-ऑर्डर फार्मिंग निश्चित इनकम का साधन हो सकता है। आज के समय में हर्बल प्रोडक्‍ट बनाने वाली कई कंपनियां (पतंजलि, हिमालया, इपगा लैब आदि ) और थर्ड पार्टी फर्म बाय बैक गारंटी के साथ कांट्रेक्‍ट फार्मिंग करा रही हैं। इससे किसान को फसल के बिकने की चिंता तो होती ही नहीं है साथ ही साथ वह इन कंपनियों की ट्रेनिंग से बेहतर पैदावार भी ले सकते हैं।

राजस्‍थान की एक कंपनी ग्रो फरदर एक ऐसी कंपनी है जो देशभर के किसानों के साथ (जो इच्‍छुक हों) कांट्रेक्‍ट फार्मिंग कर रही है।

वर्तमान में कई वेबसाइट्स ऐसी हैं जिन पर बॉयर्स अपनी डिमांड भेजते हैं। इनमें एक्‍सपोर्ट इंडिया डॉट कॉम, ई-वर्ल्‍ड ट्रेड फेयर डॉट कॉम, गो फोर,अली बाबा,  वर्ल्‍ड बिजनेस आदि वेबसाइट्स हैं जिन पर विभिन्‍न औषिधीय फसलों की बॉयर्स की डिमांड हर समय रहती है।

एक करोड़ रुपए तक ऐसे करें कमाई…

इतना जूस बनाने आपको आधा टन पत्तियों की जरूरत होती है। यानी आप अपने एक हेक्‍टेयर के माल से 90 दिनों तक माल तैयार कर सकते हैं और आराम से 20 लाख रुपए कमा सकते हैं। इसके अलावा आप आसपास के किसानो से भी एलोवेरा पत्तियां खरीदकर जूस तैयार कर सकते हैं। इस तरह आप कमाई को 20 लाख रुपए तक ही सीमित न करके इसे 50 लाख या 1 करोड़ रुपए भी कर सकते हैं।

90 फीसदी तक मिलता है लोन

एलोवेरा जूस बनाने के प्‍लांट एसएमई श्रेणी में आता है। सरकार की तमाम योजनाओं में इसके बिजनेस के लिए सरकार 90 फीसदी तक लोन देती है। खादी ग्रामोद्योग लोन देने के बाद इस पर लगभग 25 फीसदी की सब्सिडी देता है। इसके अलावा 3 साल तक रक ब्‍याज मुक्‍त होती है।

73 वर्षीय एक बुज़ुर्ग किसान ने किया ऐसा कमाल जानकर हैरान रह जायंगे आप

छत्तीसगढ़ के 73 वर्षीय एक बुज़ुर्ग को खेती करने का शौक तो था लेकिन उनके पास खेती करने के लिए जमीन नहीं थी। सन 2004 में एफसीआई से रिटायर होने के बाद उस शख्स को खेती करना था लेकिन रिटायरमेंट से मिले पैसे इतने ज्यादा नहीं थे कि खेत खरीद सकें।

खेती के लिए ज़मीन तो नहीं थी, लेकिन खेती करने का जज़्बा तो उस बुर्जुग में कूट कूट कर भरा था। लिहाज़ा उन्होंने बड़ी योजनाबद्ध तरीके से उम्र के आखिरी पड़ाव पर भी एक जोखिम लेने का साहस लिया। उनका प्रयोग काम कर गया।

उन्होंने अपने घर की छत को ही खेत बना लिया। रायपुर से 45 किलोमीटर दूर महासमुंद में भागीरथी बिसई नाम के इस शख़्स ने अपने घर की छत पर ही धान की खेती कर के वैज्ञानिकों के तमाम दावों को चुनौती देकर हैरान कर दिया।

खेती करने के लिए उनके पास एक छत थी, ऐसे में सबसे पहले छत पर रेत और सीमेंट की ढलाई कराई, फ़िर लोहे की सरिया के साथ बांस की लकड़ी लगवाई, ताकि छत को नुकसान न पहुंचे।

रिटायरमेंट के बाद पहले घर की 100 वर्ग फुट छत पर धान बोया और ठीक ठाक तरीके से खेती कर उत्पादन भी लिया। प्रयोग सफल रहा। फिर घर को दो मंजिला किया। तीन हजार वर्गफीट की छत पर छह इंच मिट्‌टी की परत बिछाई। छत को मजबूती देने के लिए देशी नुस्खा अपनाया।

आशंका थी कि पानी छत के ढलाई के बेस तक पहुंचेगा। लोहे में जंग लग जाएगी। सीलन और जंग की वजह से छत गिर जाएगी। इसलिए लोहे की सरिया के साथ बांस की लकड़ी लगवाई। बांस जल्दी नहीं सड़ता है। नुस्खा काम कर गया।

भागीरथी दो क्विंटल धान की पैदावार ले रहे हैं। सब्जी और पेड़-पौधे की नर्सरी भी तैयार कर रहे हैं। पत्नी और बेटा भी भागीरथी की मदद करते हैं। वे कहते हैं कि हम सब मिलकर परिवार की जरूरत पूरी कर लेते हैं।

भारत में भले ही इस तरह का पहला प्रयोग हो, लेकिन हमारे पड़ोसी देश चीन में इस तरह का प्रयोग हो चुका है और वो सफ़ल भी रहा है।

बाबा रामदेव अब बैलों की मदद से बनाएंगे “पतंजलि” बिजली

देश में तेजी से बढ़ रही बाबा रामदेव और उनके सहयोगी आचार्य बालकृष्ण की कंज्यूमर गुड्स कंपनी पतंजलि रिन्यूएबल एनर्जी के एक अनूठे रूप: ‘बुल पावर’ पर काम कर रही है। बैल की खींचने की ताकत की मदद से इलेक्ट्रिसिटी जेनरेट करने के आइडिया पर डेढ़ वर्ष से अधिक की रिसर्च में कुछ शुरुआती सफलता मिली है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पशुओं को बूचड़खाने न भेजा जाए।

यह प्रयोग पतंजलि के मैनेजिंग डायरेक्टर और बड़े शेयरहोल्डर बालकृष्ण की पहल पर शुरू किया गया था। इसमें देश की एक प्रमुख मल्टीनैशनल ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर और एक तुर्की की कंपनी भी शामिल है।

इसका एक प्रोटोटाइप डिजाइन किया गया है और अधिक इलेक्ट्रिसिटी जेनरेट करने के लिए इसमें बदलाव किया जा रहा है। इस रिसर्च प्रॉजेक्ट की जानकारी रखने वालों ने बताया कि अभी तक एक टर्बाइन वाले इस डिजाइन से लगभग 2.5 किलोवॉट पावर मिल सकी है।

बालकृष्ण ने बताया, ‘ऐसे समय में जब बड़ी संख्या में बैलों को काटा जा रहा है, तो हम यह धारणा बदलना चाहते हैं कि बैल बहुत कीमती नहीं होते।’ उन्होंने इस बात को सही बताया कि पतंजलि हरिद्वार के अपने मुख्यालय में इस पर रिसर्च कर रही है।

उनका कहना था, ‘बैलों का सुबह खेतों में और शाम को इलेक्ट्रिसिटी जेनरेशन के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। प्राचीन समय में बैलों का इस्तेमाल हथियार ले जाने में किया जाता था। अगर टेक्नॉलजी की मदद से उनकी ताकत का अधिकतम इस्तेमाल किया जाए तो वे काफी उपयोगी हो सकते हैं।’

बालकृष्ण ने बताया कि इस कदम का मकसद उन गरीबों की सहायता करना भी है जो इलेक्ट्रिसिटी पर खर्च नहीं कर सकते। उन्होंने कहा, ‘हम यह रिसर्च कर रहे हैं कि बैलों के इस्तेमाल से कैसे अधिक वॉट की पावर का उत्पादन किया जा सकता है, जिससे एक किसान इसका इस्तेमाल अपने घर में बिजली के लिए कर सके। हमें अभी तक अपनी इच्छा के मुताबिक परिणाम नहीं मिला है।’

ऐसे करें चीनी से 250 गुना ज्यादा मीठे स्टीविया की खेती

भारत में औषधीय पौधों की खेती का रकबा लगातार बढ़ता जा रहा है। मधुमेह और मोटापा आदि के उपचार में इस्तेमाल किए जाने वाले स्टीविया की खेती के लिए फरवरी-मार्च का समय सबसे उपयुक्त होता है।

स्टीविया चीनी से 250 गुना ज्यादा मीठा होता है, लेकिन इसमें कैलोरी शून्य होती है। बाज़ार में मिलने वाले रासायनिक मिठास वाले पदार्थों के ज्यादा इस्तेमाल से किडनी खराब होने को खतरा रहता है, जबकि स्टीविया के इस्तेमाल में ऐसा कोई डर नहीं है। आजकल स्टीविया की खेती का चलन तेजी से बढ़ा है। किसान इसकी खेती बड़ी मात्रा में कर रहे हैं।

स्टीविया का उपयोग आजकल चीनी की जगह खूब हो रहा है क्योंकि इसकी पत्तियां मीठी तो होती हैं, लेकिन इसमें कैलोरी की मात्रा न के बराबर होती है इसलिए इसे पारंपरिक चीनी से अच्छा माना जाता है। इन्हीं गुणों के कारण स्टीविया की खेती करने में किसान का काफी फायदा होता है।

जलवायु

स्टीविया की खेती सालभर की जा सकती है, बस इसे बरसात के मौसम में उगाने से बचना चाहिए। इसकी खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली जमीन होना आवश्यक है।

स्टीविया की किस्में

ऐसे तो स्टीविया की कई किस्में बाजार में मिल जाएंगी पर सीमैप ने स्टीविया की दो नई किस्में विकसित की हैं। इनके नाम हैं स्टीविया मीठी और स्टीविया मधु। ’ इसके अलावा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने भी स्टीविया की दो किस्में निकाली हैं जो बाजार में एमडीएस-13 और एमडीएस-14 के नाम से मिल जाती हैं।

रोपाई

स्टीविया वर्ष भर में कभी भी लगाई जा सकती है लेकिन उचित समय फरवरी-मार्च का महीना है। स्टीविया के पौधों की रोपाई मेड़ों पर की जाती है। इसके लिए 15 सेमी ऊंचाई के दो फीट चौड़े मेड़ बना लिए जाते है। उन पर कतार से कतार की दूरी 40 सेमी और पौधों में पौधे की दूरी 20-25 सेमी रखते हैं, दो मेड़ों के बीच 1.5 फीट की जगह नाली या रास्ते के रूप में छोड़ देते हैं।

खाद एवं उर्वरक

क्योंकि स्टीविया की पत्तियों का मनुष्य द्वारा सीधे उपभोग किया जाता है। इस कारण इसकी खेती में किसी भी प्रकार की रासायनिक खाद या कीटनाशी का प्रयोग नहीं करते हैं। एक एकड़ में इसकी फसल को तत्व के रूप में नाइट्रोजन ,फास्फोरस व पोटाश की मात्रा क्रमश: 110:45:45 किग्रा के अनुपात की आवश्यकता होती है। इसकी पूर्ति के लिए 70-80 कुंतल वर्मी कम्पोस्ट या 200 कुंतल सड़ी गोबर की खाद पर्याप्त रहती है।

सिंचाई

स्टीविया की फसल सूखा सहन नहीं कर पाती है। इसको लगातार पानी की आवश्यकता होती है, सर्दी के मौसम में 10 दिन के अन्तराल पर व गर्मियों में प्रति सप्ताह सिंचाई करनी चाहिए वैसे स्टीविया भी फसल में सिंचाई करने का सबसे उपयुक्त साधन िस्प्रंकुलरर्स या ड्रिप है।

खरपतवार नियंत्रण

सिंचाई के पश्चात खेत की निराई खेत की निराई-गुड़ाई करनी चाहिए जिससे भूमि भुरभुरी व खरपतवार रहित हो जाती है जो कि पौधों में वृद्धि के लिए लाभदायक होता है।

रोग एवं कीट नियंत्रण

स्टीविया की फसल में किसी भी प्रकार का रोग या कीड़ा नहीं लगता है। कभी-कभी पत्तियों पर धब्बे पड़ जाते है जो कि बोरान तत्व की कमी के लक्षण है। इसके नियंत्रण के लिए छह प्रतिशत बोरेक्स का छिड़काव किया जा सकता है। कीड़ों की रोकथाम के लिए नीम के तेल को पानी में घोलकर स्प्रे किया जा सकता है।

फूलों को तोड़ना

स्टीविया की पत्तियों में ही स्टीवियोसाइड पाये जाते हैं इसलिए पत्तों की मात्रा बढ़ायी जानी चाहिए और समय-समय पर फूलों को तोड़ देना चाहिए। अगर पौधे पर दो दिन फूल लगे रहें व उनको न तोड़ा जाए तो पत्तियों में स्टीवियोसाइड की मात्रा में 50 प्रतिशत तक की कमी हो सकती है।

फूलों की तुड़ाई, पौधों को खेत के रोपाई के 30, 45, 60, 75 और 90 दिन के पश्चात व प्रथम कटाई के समय की जानी चाहिए। फसल की पहली कटाई के पश्चात 40, 60 व 80 दिनों पर फूलों को तोड़ने की आवश्यकता होती है।

लाभ

वर्षभर में स्टीविया की तीन- चार कटाइयों में लगभग 70 कुंतल से 100 कुंतल सूखे पत्ते प्राप्त होते हैं। वैसे तो स्टीविया की पत्तियों का अन्तर्राष्ट्रीय बाजार भाव लगभग 300-400 रुपए प्रति किग्रा है लेकिन अगर स्टीविया की बिक्री दर रुपए 100 प्रति किग्रा मानी जाए तो कुल तीन वर्षों में लगभग एक एकड़ से पांच से छह लाख का शुद्ध लाभ प्राप्त किया जा सकता है।

 

किसानो की देसी जुगाड़ : देसी शराब के छिड़काव से पैदा की जा रही ज्यादा सब्जी

फसलोंकी ग्रोथ और पैदावार बढ़ाने के लिए अब किसानों ने नया तरीका ईजाद किया है। शेखावटी के किसान खेतों में कीटनाशक की बजाय देसी और अंग्रेजी शराब का छिड़काव कर रहे हैं। किसानों के अनुसार कीटनाशकों के दाम बहुत ज्यादा होने से फसलों को बचाने के लिए शराब का इस्तेमाल शुरू किया गया है।

इससे फसलों में ग्रोथ भी हो रही है और पैदावार भी बढ़ रही हैं। भास्कर ने झुंझुनूं, सीकर, चूरू जिलों के कई खेतों में पहुंचकर पांच दिन तक पड़ताल की। खेतों में किसान देसी अंग्रेजी शराब का छिड़काव करते हुए देखे गए।

इन क्षेत्रों में लहलहाती फसलों से उठती शराब की दुर्गंध से महसूस होता है कि फसलें शराब के नशे में झूम रही हैं। फल और सब्जियों पर तो आमतौर पर देशी शराब का छिड़काव किया जाता रहा है लेकिन अब फसलों पर देशी और अंग्रेजी शराब बहाई जा रही है।

कृषि विशेषज्ञ इस तरह के किसी भी साइंटिफिक रिसर्च से इनकार करते हैं लेकिन किसानों का तर्क है कि शराब फसल और सब्जियों के लिए महंगे कीटनाशकों से ज्यादा उपयोगी है।

पैदावार ज्यादा, कीट का डर नहीं

किसानोंका मानना है कि देशी और अंग्रेजी शराब के इस्तेमाल के बाद उनकी पैदावार में इजाफा हुआ है। झुंझुनूं जिले के भड़ौन्दा खुद गांव के किसान प्रदीप झाझड़िया का कहना है कि हम पिछले तीन साल से चने की खेती में कीटनाशक की जगह शराब का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसके कारण पैदावार में इजाफा हुआ है।

सीकर जिले के धर्मशाला गांव के किसान श्रवण कुमार के मुताबिक शराब के छिड़काव से तीसरे ही दिन सब्जियों के पौधों से पीलापन दूर होने लगता है उनकी ग्रोथ भी बड़ती है। कीट और अन्य बैक्टीरिया खत्म हो जाते हैं। फल बनने से पहले फूल सूखने की समस्या भी समाप्त हो जाती है। नए फूल और फल लगने लगते हैं।

आधा बीघा में काफी है 30 एमएल

किसानोंका तर्क है कि आधा बीघा खेत में 25-30 एमएल शराब काफी है। अधिकांश किसान 11 लीटर और 16 लीटर की स्प्रे मशीन में 100 एमएल तक देसी और अंग्रेजी शराब मिलाकर छिड़काव करते हैं। कई किसान प्रति बीघा करीब 150-200 एमएल शराब का इस्तेमाल करते हैं।

खेती में शराब के इस्तेमाल से शेखावाटी में इसकी खपत बढ़ गई है। भास्कर टीम ने 30 से ज्यादा शराब व्यवसायियों से बात की। इनका कहना था कि खेतों में किए जा रहे छिड़काव के बाद शराब की खपत बढ़ गई है।

इसलिए अपनाया जा रहा है यह तरीका

चनेकी फसल के लिए बाजार में कीटनाशक 500 से लेकर 7000 रुपए लीटर में बिक रहे हैं जबकि देसी शराब 80 रु. अंग्रेजी शराब 200 रु. लीटर में मिल जाती है। कीटनाशक माइक्रोन्यूट्रेंट (लिक्विड) 2000 रु. लीटर इममसीन बेनजॉएट 7000 रु. लीटर है। कमजोर फसल की ग्रोथ के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दवाई ‘मोनो’ एक एकड़ के लिए करीब 360 रुपए की आती है।

अब 2 किल्लो दहीं करेगी 25 किल्लो यूरिया का मुकाबला

रासायनिक उर्वरक व कीटनाशक से होनेवाले नुकसान के प्रति किसान सजग हो रहे हैं. जैविक तकनीक की बदौलत उत्तर बिहार के करीब 90 हजार किसानों ने यूरिया से तौबा कर ली है | इसके बदले दही का प्रयोग कर किसानों ने अनाज, फल, सब्जी के उत्पादन में 25 से 30 फीसदी बढ़ोतरी भी की है |

25 किलो यूरिया का मुकाबला दो किलो दही ही कर रहा है | यूरिया की तुलना में दही मिश्रण का छिड़काव ज्यादा फायदेमंद साबित हो रहा है | किसानों की माने, तो यूरिया से फसल में करीब 25 दिन तक व दही के प्रयोग से फसलों में 40 दिनों तक हरियाली रहती है|

किसान बताते हैं कि आम, लीची, गेहूं, धान व गन्ना में प्रयोग सफल हुआ है| फसल को पर्याप्त मात्रा में लंबे समय तक नाइट्रोजन व फॉस्फोरस की आपूर्ति होती रहती है| केरमा के किसान संतोष कुमार बताते हैं कि वे करीब दो वर्षों से इसका प्रयोग कर रहे हैं| काफी फायदेमंद साबित हुआ है|

लीची व आम का होता है अधिक उत्पादन

इस मिश्रण का प्रयोग आम व लीची में मंजर आने से करीब 15-20 दिनों पूर्व इसका प्रयोग करें. एक लीटर पानी में 30 मिलीलीटर दही के मिश्रण डाल कर घोल तैयार बना लें | इससे पौधों की पत्तियों को भीगों दें | 15 दिन बाद दोबारा यही प्रयोग करना है |

इससे लीची व आम के पेड़ों को फॉस्फोरस व नाइट्रोजन की सही मात्रा मिलती है | मंजर को तेजी से बाहर निकलने में मदद मिलती है | सभी फल समान आकार के होते हैं | फलों का झड़ना भी इस प्रयोग से कम हो जाता है|

एेसे तैयार होता दही का मिश्रण

देशी गाय के दो लीटर दूध का मिट्टी के बरतन में दही तैयार करें | तैयार दही में पीतल या तांबे का चम्मच, कलछी या कटोरा डुबो कर रख दें| इसे ढंक कर आठ से 10 दिनों तक छोड़ देना है | इसमें हरे रंग की तूतिया निकलेगी | फिर बरतन को बाहर निकाल अच्छी तरह धो लें | बरतन धोने के दौरान निकले पानी को दही में मिला मिश्रण तैयार कर लें |दो किलो दही में तीन लीटर पानी मिला कर पांच लीटर मिश्रण बनेगा|

इस दौरान इसमें से मक्खन के रूप में कीट नियंत्रक पदार्थ निकलेगा | इसे बाहर निकाल कर इसमें वर्मी कंपोस्ट मिला कर पेड़-पौधों की जड़ों में डाल दें | ध्यान रहे इसके संपर्क में कोई बच्चा न जाये | इसके प्रयोग से पेड़-पौधों से तना बेधक (गराड़)और दीमक समाप्त हो जायेंगे | पौधा निरोग बनेगा |

जरूरत के अनुसार से दही के पांच किलो मिश्रण में पानी मिला कर एक एकड़ फसल में छिड़काव होगा | इसके प्रयोग से फसलों में हरियाली के साथ-साथ लाही नियंत्रण होता है | फसलों को भरपूर मात्रा में नाइट्रोजन व फॉस्फोरस मिलता होता है | इससे पौधे अंतिम समय तक स्वस्थ रहते हैं|

बोले किसान

सकरा के इनोवेटिव किसान सम्मान विजेता दिनेश कुमार ने बताया, मक्का, गन्ना, केला, सब्जी, आम-लीची सहित सभी फसलों में यह प्रयोग सफल हुआ है| आत्मा हितकारिणी समूह के 90 हजार किसान यह प्रयोग कर रहे हैं| इसके बाद मुजफ्फरपुर, वैशाली के साथ-साथ दिल्ली की धरती पर इसे उतारा है|

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने मार्च 2017 में इनोवेटिव किसान सम्मान से सम्मानित किया| मुजफ्फरपुर के किसान भूषण सम्मान प्राप्त सतीश कुमार द्विवेदी कहते हैं, जिन खेतों में कार्बनिक तत्व मौजूद होते हैं, उनमें इस प्रयोग से फसलों का उत्पाद 30 फीसदी अधिक होता है. इस मिश्रण में मेथी का पेस्ट या नीम का तेल मिला कर छिड़काव करने से फसलों पर फंगस नहीं लगता है. इसके प्रयोग से नाइट्रोजन की आपूर्ति, शत्रु कीट से फसलों की सुरक्षा व मित्र कीटों की रक्षा एक साथ होती है|

दूध उत्पादकों को तोहफा:आ गई बिना बिजली के दूध ठंडा करने वाली मशीन

अमेरिका से आए दो आदमियों ने भारत के दूध उत्पादक किसानों की एक बहुत बड़ी समस्या सुलझा दी। भारतीय दूध उत्पादक प्रतिदिन करीब 10 करोड़ लीटर से ज्यादा दूध का उत्पादन करते हैं।

इस दूध को ठंडा कर पाने की सुविधा गाँवों में बसे अधिकतर उत्पादकों के पास नहीं होती। इसलिए कई बार गाँव से दूर स्थित कलेक्शन सेंटर या शहरी प्रोसेसिंस यूनिट तक भेजते-भेजते दूध खराब हो जाता है और उत्पादक को एक भी पैसा नहीं मिलता।

अमेरिकी आविष्कारकों सोरिन ग्रामा और सैम व्हाइट ने जब भारत के लोगों की इस समस्या को समझा तो एक चिलिंग यूनिट यानि दूध ठंडा करने की मशीन का आविष्कार किया।थर्मल बैटरी से चलने वाली ये मशीन गाँव की आती-जाती बिजली में भी आसानी से चार्ज होकर चल जाती है।

 

प्रोमीथियन पावर सिस्टम कंपनी के तहत बनाई गई इस मशीन का जब इन आविष्कारकों ने गाँवों में पाइलट परीक्षण किया तो उत्पादकों के साथ उन्हें सफलता मिली। वर्तमान समय में देशभर में करीब 200 ऐसी चिलिंग यूनिट ग्रामीण दूध उत्पादक इस्तेमाल कर रहे हैं।

खास तरह की बैटरी का इस्तेमाल

 

प्रोमीथियन पावर कंपनी के चिलर में लगी थर्मल बैटरी एक ऐसी तकनीक का इस्तेमाल करती है जिसमें वो बिजली नहीं ऊर्जा बचाती है। इसकी बैटरी में एक पदार्थ होता है जो ठोस से तरल और फिर तरल से ठोस होकर रूप बदलता है।

इस पूरी चिलिंग यूनिट को तीन मुख्य भागों को मिलाकर बनाया जाता है। इसमें एक टैंक होता है जिसमें दूध भरा जा सके। एक थर्मल बैटरी और एक कंप्रेसर होता है।एक चिलिंग यूनिट को करीब 20 किसान आसानी से इस्तेमाल कर सकते हैं।

कैसे काम करती है यूनिट

इस यूनिट के साथ लगा एक कंट्रोल पैनल दूध के तापमान के आधार पर ये संकेत भेजता है कि सिस्टम को शुरू कर देना है। सौर ऊर्जा या फिर कुछ घंटों आई बिजली से ही यूनिट का कंप्रेसर बैटरी को चालू कर देता है जिससे बर्फ जम जाती है। इस बर्फ की ठंडक को दूध को ठंडा करने के लिए धीरे-धीरे भेजा जाता है।

आवश्यक तामपान पर पहुंचते ही दूध को ठंडक भेजना बंद कर दिया जाता है।अब एक बार दूध ठंडा हो जाने के बाद उसे आराम से बर्तनों में भरकर एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है।

और ज्यादा जानकारी के लिए निचे दिए हुए नंबर और पते पर संपर्क करें

Address: Survey 25 2K,, Tathawade Rd, Ravet,
Tathawade, Pune, Maharashtra 411033
Phone: 020 3267 8042

मोती की खेती से महज 2 लाख की इंन्‍वेस्‍ट से हर महीने होगी 1 लाख रुपए से अधिक की कमाई

बहुत से उद्योगों में मोती की खेती भी एक बढ़िया और कम पैसे लगा के शुरू करने वाला उद्योग है । अगर आप छोटे से इन्‍वेस्‍टमेंट से लाखों कमाना चाहते हैं तो आपके लिए मोती की खेती एक बेहतर विकल्‍प हो सकती है।

मोती की मांग इन दिनों घरेलू और अंतर्राष्‍ट्रीय बाजार में काफी अधिक है, इसलिए इसके अच्‍छे दाम भी मिल रहे हैं। आप महज 2 लाख रुपए के इंन्‍वेस्‍ट से इससे करीब डेढ़ साल में 20 लाख रुपए यानी हर महीने 1 लाख रुपए  से अधिक की कमाई कर सकते हैं।

कैसे करते हैं मोती की खेती

मोती की खेती के लिए सबसे अनुकूल मौसम शरद ऋतु यानी अक्टूबर से दिसंबर तक का समय माना जाता है। कम से कम 10 गुणा 10 फीट या बड़े आकार के तालाब में मोतियों की खेती की जा सकती है। मोती संवर्धन के लिए 0.4 हेक्टेयर जैसे छोटे तालाब में अधिकतम 25000 सीप से मोती उत्पादन किया जा सकता है।

खेती शुरू करने के लिए किसान को पहले तालाब, नदी आदि से सीपों को इकट्ठा करना होता है या फिर इन्हे खरीदा भी जा सकता है।इसके लिए स्‍ट्रक्‍चर सेटअप पर खर्च होंगे 10 से 12 हजार रुपए, वाटर ट्रीटमेंट पर 1000 रुपए और 1000 रुपए के आपको इंस्‍ट्रयूमेंट्स खरीदने होंगे।

इसके बाद प्रत्येक सीप में छोटी-सी शल्य क्रिया के बाद इसके भीतर चार से छह मिमी व्यास वाले साधारण या डिजायनदार बीड जैसे गणेश, बुद्ध, पुष्प आकृति आदि डाले जाते हैं। फिर सीप को बंद किया जाता है। इन सीपों को नायलॉन बैग में 10 दिनों तक एंटी-बायोटिक और प्राकृतिक चारे पर रखा जाता है। रोजाना इनका निरीक्षण किया जाता है और मृत सीपों को हटा लिया जाता है।

अब इन सीपों को तालाबों में डाल दिया जाता है। इसके लिए इन्हें नायलॉन बैगों में रखकर (दो सीप प्रति बैग) बांस या बोतल के सहारे लटका दिया जाता है और तालाब में एक मीटर की गहराई पर छोड़ दिया जाता है।

प्रति हेक्टेयर 20 हजार से 30 हजार सीप की दर से इनका पालन किया जा सकता है। अन्दर से निकलने वाला पदार्थ बीड के चारों ओर जमने लगता है जो अन्त में मोती का रूप लेता है। लगभग 8-10 माह बाद सीप को चीर कर मोती निकाल लिया जाता है।

कम लागत में ज्यादा मुनाफा

एक सीप लगभग 20 से 30 रुपए की आती है। बाजार में एक मिमी से 20 मिमी सीप के मोती का दाम करीब 300 रूपये से लेकर 1500 रूपये होता है। आजकल डिजायनर मोतियों को खासा पसन्द किया जा रहा है जिनकी बाजार में अच्छी कीमत मिलती है। भारतीय बाजार की अपेक्षा विदेशी बाजार में मोतियों का निर्यात कर काफी अच्छा पैसा कमाया जा सकता है। सीप से मोती निकाल लेने के बाद सीप को भी बाजार में बेंचा जा सकता है।

सीप द्वारा कई सजावटी सामान तैयार किये जाते है। सीपों से कन्नौज में इत्र का तेल निकालने का काम भी बड़े पैमाने पर किया जाता है। जिससे सीप को भी स्थानीय बाजार में तत्काल बेचा जा सकता है। सीपों से नदीं और तालाबों के जल का शुद्धिकरण भी होता रहता है जिससे जल प्रदूषण की समस्या से काफी हद तक निपटा जा सकता है।

कहां ले सकते हैं प्रशिक्षण

सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ फ्रेश वॉटर एक्वाकल्चर, भुवनेश्वर (ओड़ीसा) में मोती की खेती का प्रशिक्षण दिया जाता है। यह संस्थान ग्रामीण नवयुवकों, किसानों एवं छात्र-छात्राओँ को मोती उत्पादन पर तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान करता है। किसान हेल्प भी किसानों और छात्र-छात्राओँ को मोती उत्पादन पर तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान करता है। ये संस्था हापुड़ में प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रही है।

चित्रकूट जिले के कृषि विज्ञान केन्द्र, गनिवां में भी मोती की खेती का प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाया जा रहा है। कृषि विज्ञान केन्द्र के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. नरेन्द्र सिंह बताते हैं, “ग्रामीण नवयुवक, किसान इसका प्रशिक्षण ले सकते हैं। हमने यहां पर सीपी पालन शुरु भी कर दिया है।”

गूंद कतीरा लेप से आधी सिंचाई में ही पक गया धान

खाद-लागत में पक गया धान, कोई अजूबा नहीं, परंतु सच्चाई है। जो संभव हुआ डॉ. वीरेंद्र सिंह लाठर, प्रधान वैज्ञानिक भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान,क्षेत्रीय स्टेशन करनाल द्वारा विकसित हर्बल हाइड्रोजेल गूंद कतीरा लेप बीज तकनीक को सीधी बिजाई धान में अपनाने से। यह सेक्टर -2 शहर करनाल में पांच एकड़ और हरियाणा पंजाब में सैकड़ों एकड़ खेतों पर तैयार की गई है।

तकनीक से धान की फसल सिर्फ 5-6 सिंचाई, 50 किलो डीएपी और 60-70 किलो यूरिया प्रति एकड़ से तैयार हो गई और अब तक सिर्फ 6000 रुपए प्रति एकड़ की लागत आई है। जबकि परंपरागत रोपाई धान पद्धति में 20-25 सिंचाई की जरूरत होती है और रोपाई तक की लागत ही 6000 रुपए प्रति एकड़ से ज्यादा हो जाती है और इतनी ही लागत रोपाई के बाद भी करनी पड़ती है।

नई तकनीक में रोपाई के लिए मजदूरों पर निर्भरता से किसानों को राहत मिलती है। क्योंकि धान की सीधी बिजाई, गेहूं दूसरी फसलों की तरह, खेत में पलेवा कर के बीज ड्रिल से की जाती है। उससे भी बड़ा फायदा, नयी तकनीक धान ग्रीन हाउस गैस (मीथेन वगैरह) पर्यावरण में कम छोड़ कर, पर्यावरण संरक्षण में भी बड़ा फायदा करती है। किसानों को इस तकनीक को अपनाना चाहिए, इससे काफी हद तक पानी की बचत की जा सकती है।

मशीन से मिलाकर सुखाएं: नईबीज लेपित तकनीक के उपयोग में आने वाली सारी सामग्री (गूंद-कतीरा, गुड़, कीकर-बबूल की गूंद) इंसानों के खाद्य पदार्थ है जो गावो, शहरों की दुकानों पर सस्ते भाव (250 रुपए प्रति किलो) में आसानी से मिल जाते हैं।

नई बीज तकनीक हर्बल हाइड्रोजल पर आधारित है जिसमे गूंद कतीरा लेपित बीज की बिजाई की जाती है जिससे सभी फसलों के पौधों जड़ें में जल्दी सूखा नहीं आता और सिंचाई की जरूरत कम रह जाती है फसलोंमें खरपतवार अन्य बीमारियां-कीड़े भी कम आते हैं और यह संभव हुआ,

पहली सिचाई देर से लगने लगाने पर, जो खरीफ फसलों(धान वगैरह) में बिजाई के 15-20 दिनों रबी फसलों (गेहूं वगैरह) में 40-50 दिनों की बाद की जाती है और बिजाई के तुरंत बाद एक लीटर प्रति एकड़ की दर से पेंडामेथलींन / स्टोम्प 200 लीटर पानी में छिड़काव करने के कारण से, सीधी बिजाई धान में बिजाई के बाद की सिंचाई 12-15 दिनों के अंतर पर और वर्षा गीला-सूखा चक्कर के आधार पर करनी होती है।

} नई तकनीक मे 50 किलो बीज के लिए, एक लीटर उबलते पानी मे 250 ग्राम गुड़ और 100 ग्राम बबूल की गोंद डाल कर, एक तार की चासनी बनाये।

}फिर इस चासनी को ठंडा छान कर, बीजों पर छिड़क कर हाथ से बीजों को चिपचिपा बनाएं।

}तब चिपचिपे बीजों पर 10 प्रतिशत(10 किलो बीज पर एक किलो गूंद कतीरे पाउडर-चूरा ग्रेड/पशुओं वाला) छिड़क कर हाथ घुमाने वाली

चावल और मछली की एक साथ खेती से आप ले सकते है दोगुना लाभ

खेत में चावल और मछलियों का पालन एक साथ करें – ये सुनकर पहले तो आप भरोसा नहीं करेंगे। फिर जब भरोसा करेंगे तो मन में सवाल जरूर आएगा कि कैसे होता है ये, क्या है फायदा और कैसे मछलियां के पालन से चावल की फसल की लागत कम हो जाती है, जबकि उत्पादन कम नहीं होता।

भारत के पूर्वी राज्यों में साल 2010 के बाद धान के खेत से मुनाफा बढ़ाने के लिए एक नई तकनीक अपनाने की शुरूआत हुई थी वो है धान के खेत में मछली पालना। लेकिन ये तकनीक किसानों के बीच अभी ज्यादा मशहूर नहीं हो पाई है।

खेती की ये तकनीक कोई बहुत कठिन नहीं, करना बस इतना होता है कि धान के पानी भरे खेत में जल्दी बढ़ने वाली मछलियों के बीज डाल देने होते हैं। इससे धान की फसल के साथ ही मछलियां भी बाज़ार में बेचने को तैयार हो जाती हैं, यानि दोहरा मुनाफा।

देश के लगभग 04 करोड़ दस लाख हेक्टेयर ज़मीन पर धान की खेती होती है, लेकिन इसमें से धान के साथ मछली उत्पादन करने वाली तकनीक से एक लाख हेक्टेयर से भी कम हिस्सा ही प्रभावित हो पाया है। कारण यह है कि किसान इस विदेशी तकनीक को अच्छी तरह समझ नहीं पाते।

दरअसल इस तकनीक की शुरुआत चीन, फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे धान उत्पादक बड़े राज्यों से हुई थी। इन देशों के किसानों ने वैज्ञानिकों द्वारा सुझाई गई इस तकनीक को हाथों हाथ लिया।

किसानों को चावल और मछली पालन के फायदे-

  • चावल-मछली की खेती से किसान मुख्य फसल के साथ-साथ अतिरिक्त आमदनी प्राप्त कर सकता है
  • धान(चावल) को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़े को चावल-मछली की खेती नियंत्रित करता है
  • चावल-मछली की खेती फसल के फेल हो जाने के खतरे को कम करता है
  • चावल-मछली की खेती घास-फूस पर रोक लगाने में उपयोगी
  • चावल-मछली की खेती चावल की उपज को बढ़ाती है क्योंकि मछलियां मिट्टी के पोषक तत्वों को जगा देती हैं जो चावल की खेती के लिए सहायक होती है।

किसानों को चावल और मछली पालन के नुकसान-

  • चावल और मछली की खेती में नियंत्रित तरीके से कीटनाशक के इस्तेमाल की आवश्यकता होती है
  • सिर्फ धान(चावल) की खेती के मुलाबले इस एकीकृत चावल और मछली वाली व्यवस्था में ज्यादा पानी की जरूरत पड़ती है
  • इस व्यवस्था में चावल की पैदावार कम होती है क्योंकि जरूरी धान की फसल से करीब 45 सेमी नीचे क्यारियां(ट्रेन्चेज) बनाने की जरूरत पड़ती है, जिसकी वजह से धान की उपज का क्षेत्र कम हो जाता है, जिससे कम पैदावार होती है। क्यारियों की खुदाई की वजह से पानी को निकालने में परेशानी होती है।
  • सिर्फ चावल की खेती के मुकाबले धान के खेतों में मछली उत्पादन के कार्य के लिए ज्यादा निवेश की जरूरत पड़ सकती है।
  • सिर्फ धान की खेती के मुकाबले चावल और मछली की खेती में ज्यादा श्रम की आवश्यकता होती है।

चावल और मछली की खेती के लिए उपयुक्त जगह कौन सी है

  • धान के खेत में चावल और मछली की खेती के लिए जगह का चुनाव बेहद अहम भूमिका निभाता है।आप हर जगह पर इसकी खेती नहीं कर सकते
  • करीब 70 से 80 सेमी की बारिश की जरूरत होती है जो इस तरह की एकीकृत व्यवस्था के लिए आदर्श होता है।
  • चावल और मछली की खेती में उच्च पानी की वहन क्षमता और एक समान क्षेत्र वाली मिट्टी को प्रमुखता दी जाती है।
  • एकीकृत फसल व्यवस्था के लिए जगह के चुनाव में अच्छी पानी निकासी की व्यवस्था भी प्रमुख तत्वों में से एक है जिस पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
  • जगह का चुनाव बाढ़ प्रभावित इलाके से हटकर होना चाहिए नहीं तो यहां की मछलियां निकल कर भाग सकती हैं।
  • एकीकृत चावल और मछली उत्पादन के लिये मछली का उपयुक्त प्रकार कौन सा है –

धान की तैयारी, चावल और मछली की खेती का प्रबंधन-

अगर आप धान की खेती के साथ मछली उत्पादन करना चाहते हैं तो पारंपरिक चावल के खेत में कुछ बदलाव करने होंगे, जैसे कि अच्छा मछली आश्रय और कटाई के क्षेत्र में बदलाव करने होंगे। इस तरह के धान के खेत के लिए गहरी खाइयां(ट्रेंचेज), नहर या हौज की जरूरत होती है। चावल के खेत में ये गहरी खाइयां अच्छी और सफल चावल-मछली खेती के लिए अच्छे मौके देती है। ज

ब पानी का स्तर कम हो, गलियारा में भोजन की तलाश, मछली इकट्ठा करने के आसान उपाय जब चावल के खेत सूखे हैं, ऐसे में यह सब काफी मददगार साबित होता है। जब बात चावल की प्रजाति की बात आती है तो धान और मछली की खेती में गहरी पानी की किस्म (प्रकार) सबसे बेहतर होता है।

गहरी खाइयां को 0.5 मीटर गहरा और कम से कम एक मीटर चौड़ा बनाया जाना चाहिए। इस बात को सुनिश्चित किया जाना चाहिए की गहरी खाइयां धान के पौधे से 10 मीटर के दायरे में हो। चावल की अच्छी पैदावार के लिए इस बात को सुनिश्चित करें कि गहरी खाइयां धान के क्षेत्र से 10 फीसदी से ज्यादा ना हो।

मछली के भंडारण के बाद 10 से 15 सेमी पानी की गहराई सुनिश्चित की जानी चाहिए ताकि मछली के जीवन को पक्का किया जा सके। चावल-मछली की खेती में दूसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि खेत का पानी विषैले तत्वों (कीटनाशक पदार्थ) से दूर रहना चाहिए।