आप की फसल में है किस पोषक तत्व की कमी, ऐसे पहचान करें

अधिक उत्पादन के लिए पोषक तत्वों की कमी को पहचान कर उन्हें सही करना प्रत्येक किसान का कर्तव्य होता है। किसान फसल के पौधों को देखकर कैसे पहचान सकते हैं कि फसल में किस पोषक तत्व की कमी है, जिससे किसान समय पर उसका उपचार कर सकें।

बोरान

बोरान की कमी से पौधे के सबसे ऊपर की पत्तियां पीली हो जाती हैं। कलियां सफेद या हल्के भूरे मृत ऊतक की तरह दिखाई देती हैं।

गंधक

गंधक की कमी से पत्तियां, शिराओं सहित गहरे हरे से पीले रंग में बदल जाती हैं तथा बाद में सफेद हो जाती हैं। इसकी कमी से सबसे पहले नई पत्तियां प्रभावित होती हैं।

मैगनीज

इसकी कमी से पत्तियों का रंग पीला-धूसर या लाल-धूसर हो जाता है तथा शिराएं हरी होती हैं। पत्तियों का किनारा और शिराओं का मध्य भाग पीला हो जाता है। पीली पत्तियां अपने सामान्य आकार में रहती हैं।

जस्ता

जस्ता की कमी से सामान्य तौर पर पत्तियों के शिराओं के मध्य पीले पन के लक्षण दिखाई देते हैं और पत्तियों का रंग कॉसा की तरह हो जाता है।

मैग्नीशियम

इसकी कमी से पत्तियों के आगे का हिस्सा गहरा हरा होकर शिराओं का मध्यभाग सुनहरा पीला हो जाता है और फिर किनारे से अन्दर की ओर लाल-बैंगनी रंग के धब्बे बन जाते हैं।

फास्फोरस

फास्फोरस की कमी से पौधों की पत्तियां छोटी रह जाती हैं और पौधों का रंग गुलाबी होकर गहरा हरा हो जाता है।

कैल्शियम

कैल्शियम की कमी से पौधे के सबसे ऊपर की पत्तियां प्रभावित होती हैं तथा देर से निकलती हैं। ऊपर की कलियां खराब हो जाती हैं। मक्के की नोचे चिपक जाती हैं।

लोहा

नई पत्तियों में तने के ऊपरी भाग पर सबसे पहले पिलेपन के लक्षण दिखाई देते हैं। शिराओं को छोड़कर पत्तियों का रंग एक साथ पीला हो जाता हैं। ये कमी होने पर भूरे रंग का धब्बा या मृत उतक के लक्षण प्रकट होते हैं।

तांबा

इसकी कमी से नई पत्तियां एक साथ गहरी पीले रंग की हो जती हैं तथा सूख कर गिरने लगती हैं। खाद्यान वाली फसलों में गुच्छों में वृद्धि होती है तथा शीर्ष में दाने नहीं होते हैं।

मालिब्डेनम

इसकी कमी से नई पत्तियां सूख जाती हैं, हल्के हरे रंग की हो जीती हैं, मध्य शिराओं को छोड़ कर पूरी पत्तियों पर सूखे धब्बे दिखाई देते हैं। नाईट्रोजन के उचिट ढंग से उपयोग न होने के कारण पुरानी पत्तियां पीली होने लगती हैं।

पोटैशियम

पोटैशियम की कमी से पुरानी पत्तियों का रंग पीला/भूरा हो जाता है और बाहरी किनारे कट-फट जाते हैं। मौटे आनाज जैसे – मक्का और ज्वार में ये लक्षण पत्तियों के आगे के हिस्से से शुरू होते हैं।

नाइट्रोजन

नाइट्रोजन की कमी से पौधे हल्के हरे रंग के या हल्के पीले रंग के होकर बौने रह जाते हैं। पुराई पत्तियां पहले पीली हो जाती हैं। मोटे अनाज वाली फसलों में पत्तियों का पीलापन आगे के हिस्से से शुरू होकर बीच के हिस्से तक फैल जाता है।

 

आप भी एक एकड़ में 1000 कुंतल उगाना चाहते हैं गन्ना तो अपनाएं ये तरीका

भारत के किसान हमेशा से ही अपनी फसल को लेकर चिंतित रहते हैं क्योंकि कभी उनकी फसल बर्बाद हो जाती है तो कभी उनकी फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पाता है। खासकर गन्ना किसानों को फसल का उचित मूल्य न मिल पाने के कारण ज्यादा तकलीफ में रहते हैं।

महाराष्ट्र के एक किसान सुरेश कबाडे (48 वर्ष) इन्हीं सब तकलीफों से दूर रहते हैं क्योंकि वे अनोखी विधि से एक एकड़ में एक हजार कुंतल गन्ने की पैदावार करते हैं साथ ही उनके उगाए हुए गन्ने की लम्बाई 19 फीट होती है। नौवीं पास सुरेश कबाडे अपने अनुभव और तकनीकी के सहारे खेती से साल में करोड़ों रुपये की कमाई भी करते हैं।

मुंबई से करीब 400 किलोमीटर दूर सांगली जिले की तहसील वाल्वा में कारनबाड़ी के सुरेश कबाडे (48 वर्ष) अपने खेतों में ऐसा करिश्मा कर रहे हैं कि महाराष्ट्र, कर्नाटक, यूपी तक के किसान उनका अनुसरण करते हैं। उनकी ईजाद तकनीकी का इस्तेमाल करने वालों में पाकिस्तान के भी कई किसान शामिल हैं। (देखिए वीडियो)

निकाल देते हैं गन्ने में निकलने वाला पहला पौधा

सुरेश कबाडे बताते हैं, “गन्ने के टीलस (पहला पौधा) एक एकड़ में 40 हजार से अधिक होने चाहिए। गन्ने के टीलस उगने के बाद हम लोग एक अनोखा तरीका अपनाते हैं। गन्ना खेतों में बोने के बाद उसमें निकलने वाला पहला टीलस हम तोड़कर निकाल देते हैं।”

सुरेश कबाडे आगे बताते हैं, “मदर टीलस निकालने से उसके साइड के टीलस अच्छे हो जाते हैं साथ ही उनकी लम्बाई में काफी वृद्धि होती है। एक एकड़ में एक हजार कुंतल गन्ने की पैदावार का लक्ष्य होता है। हमारे गन्ने की लंबाई 18 से 19 फीट तक होती है। जैविक तरीके से उगाए गए हमारे एक गन्ने में 44 से 54 कांडी (आंख) होती हैं। जिनके बीच की दूरी कम से कम छह इंच और अधिक से अधिक नौ इंच तक होती है।

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NEWS SOURCE – Gaonconnection News

गन्ने के क्षेत्र में चोखा मुनाफा लेने के लिए करें लेमन ग्रास की खेती

गन्ना की फसल वाली मिटटी पर लेमन घास मुनाफे का सौदा साबित हो सकती है। अलग-अलग किस्मों की घासवह उनसे निकलने वाले तेल को बेहतर आमदनी का जरिया बना बन सकते हैं।

दर्द निवारक औषधीय उत्पादों के साथ ही सौंदर्य प्रसाधनों में इस्तेमाल किए जाने वाले इन तेलों की बड़ी मांग है। इसके लिए पूरा शोधन संयत्र विकसित करते हुए वह आत्मनिर्भरता की डगर पर अग्रसर हैं।

उत्तर प्रदेश के गाँव मीठेपुर निवासी निवासी कर्मवीर (55 वर्ष) पेशे से शिक्षक हैं। गन्ना बेल्ट के रूप में पहचानी जाने वाली वेस्ट यूपी की धरती पर उन्होंने अपनी पैतृक कृषि भूमि को फिजूल समझी जाने वाली घास उगाकर सजाया है।

वह अलग-अलग किस्मों की घास उगा रहे रहे हैं। लीक से हटकर आगे बढ़ने के जुनून के बीच यही खेती अब उनके लिए बेहतर मुनाफे का पर्याय बन चुकी है।

लेमन, सिट्रोनेला, कैमोमिल समेत घास की कई अन्य किस्मों का भी वह उत्पादन कर रहे हैं। इनकी पत्तियों से निकलने वाले तेल का उपयोग विभिन्न औषधीय एवं सौंदर्य प्रसाधन से जुड़े उत्पादों में किया जा रहा है। इसके दम पर वह बेहतर मुनाफा कमा रहे हैं।

कर्मवीर बताते हैं,“ करीब छह माह में एक बीघा क्षेत्रफल में उगाई गई लेमन ग्रास की पत्तियों से 22 लीटर तक तेल निकलता है।जो बाजार में 950 से 1150 रुपए प्रति लीटर की दर पर आसानी से बिक जाता है। ठीक इसी तरह सिट्रोनेला घास के तेल की बाजार कीमत 1200 से 1400 रुपए प्रति लीटर है।फिलहाल, उनका उत्पादन बेहद सीमित मात्रा में है तो स्थानीय स्तर पर ही उनके तेल की बिक्री हो जाती है।

गाँव के अन्य किसानों से जब बात की गई तो हरिकेश (54वर्ष) बताते हैं,“ ये तो दिन-रात इसमें लगा रहता है। कई बार मन में आता है कि क्यों न वे भी घास की खेती कर लें, लेकिन मेहनत देखकर हिम्मत नहीं जुटा पाते।” इसी गाँव के निवासी किसान राममेहर सिंह (57वर्ष) बताते हैं,“ कर्मवीर के कहने पर उन्होंने इस बार घर में ही करीब 500 गज जमीन पर घास की दो किस्म उगाई हैं? देखते हैं क्या रिजल्ट आता है।”

भारत में इस जगह पर बनता है इंसान के मूत्र से यूरिया

इस बात पर सुनने में यकीन नहीं होगा लेकिन ये बात सच्च है । कर्णाटक के जिला बेल्लारी में बिना पानी वाले मूत्रालय बढ़ते फसलों के लिए खाद का एक स्रोत बन गए हैं। वाल्मीकि सर्किल में पायलट प्रोजेक्ट के तहत स्थापित किए गए मूत्रालय लोगों के लिए वरदान साबित हुए हैं। वहीं, बेल्लारी सिटी कारपोरेशन द्वारा मूत्र से यूरिया निकालने का एक स्रोत बन गया है।

बेल्लारी डीसी रामप्रसाद मनोहर ने कहा कि जिले में स्वच्छ बेल्लारी मिशन के तहत वाटरलेस मूत्रालयों को स्थापित किया गया था। ये यूरीनल्स टच फ्री हैं इसलिए इनसे बीमारी फैलने का जोखिम भी कम होता है।

उपायुक्त ने कहा कि मूत्र में नाइट्रोजन, पोटेशियम और फॉस्फेट शामिल होते हैं, इसका उपयोग कृषि उद्देश्य के लिए किया जाता है। पायलट आधार पर एक बिना पानी वाला मूत्रालय स्थापित किया गया था और अधिक संख्या में लोग इसे प्रयोग कर रहे हैं। हम यहां जमा हुए मूत्र से यूरिया भी निकाल रहे हैं।

कृषि वैज्ञानिकों ने यह प्रमाणित किया है कि मूत्र से निकाले जाने वाले कंपोस्ट का इस्तेमाल फसलों के लिए किया जा सकता है। इसकी सफलता से उत्साहित जिला प्रशासन शहर के भीड़-भाड़ वाले इलाकों में पांच और ऐसे ही मूत्रालय स्थापित करने की योजना बना रहा है। बाद में इसे जिले के अन्य स्थानों में भी लगाया जाएगा।

बेल्लारी सिटी कॉर्पोरेशन के कमिश्नर एमके नवलदी ने कहा कि एक पारंपरिक मूत्रालय को बनाने में करीब 50,000 रुपए का खर्च आता है। वहीं वॉटरलेस यूरीनल को स्थापित करने में 20,000 रुपए से लेकर 25,000 रुपए का खर्च आता है। 20 लीटर क्षमता के पानी के डिब्बे का इस्तेमाल मूत्र को जमा करने के लिए बेसिन की तरह किया जाता है।

नीलगाय को अपने खेतों से दूर रखने के लिए इस्तेमाल करें यह 10 परंपरागत नुस्ख़े

किसान नीलगाय के आतंक से परेशान हैं। हजारों रुपए की लागत और हड्डी तोड़ मेहनत से तैयार होती फसल को छुट्टा जानवर बर्बाद कर देते हैं, किसानों को सबसे अधिक नुकसान नीलगाय करती हैं। कई किसान रात-रात भर जागकर खेतों की रखवाली कर रहे हैं। इन छुट्टा जानवरों का असर खेती पर पड़ रहा है।

नीलगाय के आतंक से परेशान किसानों के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने कई घरेलू और परंपरागत नुस्ख़े बताए हैं जिससे काफी कम कीमत में किसानों को ऐसे पशुओं से आजादी मिल सकती है।

भारतीय गन्ना अऩुसंधान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक (कीट और फसल सुरक्षा) डॉ. कामता प्रसाद बताते हैं, परंपरागत तरीके किसानों को जरुर आज़माने चाहिए।

नीलगाय रोकने के लिए करें यह 15 उपाय

  1. नीलगाय को खेतों की ओर आने से रोकने के लिए 4 लीटर मट्ठे में आधा किलो छिला हुआ लहसुन पीसकर मिलाकर इसमें 500 ग्राम बालू डालें। इस घोल को पांच दिन बाद छिड़काव करें। इसकी गंध से करीब 20 दिन तक नीलगाय खेतों में नहीं आएगी। इसे 15 लीटर पानी के साथ भी प्रयोग किया जा सकता है।
  2. बीस लीटर गोमूत्र, 5 किलोग्राम नीम की पत्ती, 2 किग्रा धतूरा, 2 किग्रा मदार की जड़, फल-फूल, 500 ग्राम तंबाकू की पत्ती, 250 ग्राम लहसुन, 150 लालमिर्च पाउडर को एक डिब्बे में भरकर वायुरोधी बनाकर धूप में 40 दिन के लिए रख दें। इसके बाद एकलीटर दवा 80 लीटर पानी में घोलकर फसल पर छिड़काव करने से महीना भर तक नीलगाय फसलों को नुकसान नहीं पहुंचाती है। इससे फसल की कीटों से भी रक्षा होती है
  3. खेत के चारों ओर कंटीली तार, बांस की फंटियां या चमकीली बैंड से घेराबंदी करें।
  4. खेत की मेड़ों के किनारे पेड़ जैसे करौंदा, जेट्रोफा, तुलसी, खस, जिरेनियम, मेंथा, एलेमन ग्रास, सिट्रोनेला, पामारोजा का रोपण भी नीलगाय से सुरक्षा देंगे।
  5. खेत में आदमी के आकार का पुतला बनाकर खड़ा करने से रात में नीलगाय देखकर डर जाती हैं।
  6. नीलगाय के गोबर का घोल बनाकर मेड़ से एक मीटर अन्दर फसलों पर छिड़काव करने से अस्थाई रूप से फसलों की सुरक्षा की जा सकती है।
  7. एक लीटर पानी में एक ढक्कन फिनाइल के घोल के छिड़काव से फसलों को बचाया जा सकता है।
  8. गधों की लीद, पोल्ट्री का कचरा, गोमूत्र, सड़ी सब्जियों की पत्तियों का घोल बनाकर फसलों पर छिड़काव करने से नीलगाय खेतों के पास नहीं फटकती।
  9. देशी जीवनाशी मिश्रण बनाकर फसलों पर छिड़काव करने से नीलगाय दूर भागती हैं।
  10. कई जगह खेत में रात के वक्त मिट्टी के तेल की डिबरी जलाने से नीलगाय नहीं आती है।

मणिपुर के एक किसान ने धान की खेती में किया अनोखा कमाल

मणिपुर के एक किसान ने ऐसा कमाल कर दिखाया है। जिसपर यकीन कर पाना आसान नहीं है। 5 साल पहले 63 साल के  किसान देवकांत ने इम्फाल के अपने घर में चावल की 4 किस्मों की पैदावार शुरू की थी। और देखते ही देखते जैव विविधता को संजोने के माहिर पोतशंगबम देवकांत ने धान की सौ परंपरागत प्रजातियों की ऑर्गेनिक खेती कर एक नई मिसाल कायम कर ली।

वर्तमान समय में देवकांत सिर्फ धान की दुलर्भ प्रजातियों की ही खेती नहीं करते हैं, बल्कि यह प्रजातियां औषधीय गुणों से भी भरपूर होती हैं। उनमें से सबसे मशहूर है  “चखाओ पोरेटन” नाम का काला चावल। इस काले चावल के औषधीय गुणों से वायरल फीवर, नजला, डेंगू, चिकनगुनिया और कैंसर जैसे रोग तक ठीक हो जाते हैं। देवकांत को उनके इस अनोखे काम के लिए 2012 में पीपीवीएफआरए संरक्षण अवार्ड (प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वैराइटीज एंड फारमर्स राइट्स एक्ट) भी मिल चुका है।

जुनून और लग्न से हासिल किया मुकाम

मणिपुर के 63 वर्षीय पोतशंगबम देवकांत ने अपने जुनून और लग्न के साथ एक दो नहीं बल्कि 165 तरह के चावलों की किस्मों की खोज कर डाली है। 5 साल पहले पी देवकांत ने इम्फाल के अपने घर में चावल की खेती अपने शौक के लिए शुरु की थी। लेकिन उनका यह जुनून बन गई यह वह खुद भी नहीं जानतें।

देवकांत धान की पारंपरिक किस्मों की तलाश में मणिपुर की पहाड़ियों पर बसे दूरदराज के गांवों की खाक छानते नजर आते हैं। देवकांत को धान की कई किस्मों के बीज मिले, हालांकि कई किस्मों के बीज अब तक वह नहीं जुटा पाए हैं। इस उम्र में भी धान को लेकर देवकांत का जज्बा कम नहीं है और उन्होंने जितनी हो सके, उतनी किस्मों के बीज इकट्ठा करने की ठानी है।

जलवायु नहीं करती सपोर्ट

मणिपुर के पहाड़ी इलाकों की जलवायु एक जैसी नहीं है, हर इलाके की जलवायु अलग किस्म को सपोर्ट करती है। धान की प्रजातियों के लिए मणिपुर बहुत ही समृद्ध राज्य है। अपने हरे-भरे खेतों में देवकांत ने धान की 25 प्रजातियों को उगाया है। हालांकि उन्होंने अब तक सौ देसी प्रजातियों को संरक्षित किया है। आयुर्वेदिक गुणों से भरपूर इन प्रजातियों को देश भर में उगाया जा सकता है।

इम्फाल के गांव में उनका धान का खेत प्रयोग करने की जगह का रूप ले चुका है। देवकांत को उनके इस अनोखे काम के लिए 2012 में पीपीवीएफआरए संरक्षण अवार्ड (प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वैराइटीज एंड फारमर्स राइट्स एक्ट) भी मिल चुका है।

धान की दुर्लभ प्रजातियों का संरक्षण

देवकांत ने पांच बेहद दुलर्भ, आयुर्वेदिक गुणों से भरपूर और पौष्टिक प्रजातियों को भी संरक्षित किया है, जिसमें चखाओ पोरेटन नाम का काला चावल भी शामिल है। उन्होंने कम पानी में उपजने वाले सफेद चावल के साथ ही भूरे चावल और काले चावल की कई प्रजातियों का प्रचार-प्रसार भी किया है।

अब हिरा रेन गन से जब चाहे खेत में बारिश होगी

भारत की खेती मानसून पर निर्भर है देशभर में मानसून की रफ्तार को लेकर कयास लगते रहते हैं कि मानसून समय पर पहुंचेगा या नहीं। लेकिन इसके उल्ट हिरा रेन गन से अब जब चाहो तब बारिश होगी।

चौकिए मत…! हिरा रेन गन लगाने के बाद सिंचाई के लिए प्रबंधन को न तो नहर की आवश्यकता होती है और न ही बारिश के लिए आसमान का मुंह ताकना होगा। रेन गन से आप जब चाहो बारिश की बौछारें पैदा कर सकेंगा। रेन गन से पानी की खपत कम हो जाती है ।

रेन गन सिस्टम लगने के बाद पानी की खपत 10 गुना कम हो जाती है। हिरा रेन गन से आप फसल को जितना चाहे, जब चाहे, नियंत्रित पानी देने की व्यवस्था होती है ।

रेन गन की इस्तमाल कहाँ क्या जा सकता है

  • गन्ने, मुँगफली,बाजरा,गेहूँ, चने और दालो की खेती में प्रयोग होता है ।
  • इनका उपयोग चाय बागान,कॉफी पौधकरन में भी किया जाता है ।
  • धूल दमन, हरी चराई, खेल के मैदान और गोल्फ कोर्स में इस्तेमाल होता है ।

हिरा रेन गन के दो मॉडल आते है जिनकी विशेषता निचे लिखी हुई है

पेंग्विन 

  • नोजल (मिमी) 12×4
  • प्रेशर (प्रेशर/ सेमी²) 4
  • रेडीअस (मीटर) 26
  • डिस्चार्ज (लिटर मिनट) 211

पेलिकन 

  • नोजल (मिमी) 14×5
  • प्रेशर (प्रेशर/ सेमी²) 4
  • रेडीअस (मीटर) 26
  • डिस्चार्ज (लिटर मिनट) 277

हिरा रेन गन के दोनों मॉडल की कीमत

  • पेंगुइन रेन गन = 2200 Rs. और स्टैंड = 2000 Rs.
  • पेलिकन रेन गन = 3300 Rs.और स्टैंड = 2500 Rs

भविष्य में इस तरह की अलग – अलग जानकारी इस तरह ही अलग – अलग तरीको से देते जाएगे तो आप हमसे जानकारी पाने के लिए हमसे जुड़ सकते हें.

और ज्यादा जानकारी के लिए निचे दिए हुए नंबर पर संपर्क करें

हिरा अॅग्रो कॅाल सेंटर से 7741903237 / 9370722722  संपर्क करे.

रेन गन कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो भी देखें

मिट्टी के बिना खेती, अब घर पर ही पैदा होंगी फल-सब्जियां

खेती का भविष्य

जिला बागवानी अधिकारी दीन मोहम्मद खान ने बताया कि यह खेती का भविष्य है। इस विधि में मिट्टी की जगह नारियल फाइबर को पोट्स में भरा जाता है अौर नियंत्रित वातावरण में तरल पोषक तत्व प्रदान किए जाते हैं। वहीं इस परियोजना से जुड़े किसान ध्रुव कुमार का कहना है कि हमें उर्वरकों और कीटनाशकों की आवश्यकता नहीं है क्योंकि एक नियंत्रित वातावरण में सब्जियां उगाई जाती हैं। हम पराबैंगनी किरणों से सब्जियों को बचाने के लिए एक पॉलिथीन शीट का उपयोग करते हैं।

तीन दोस्तों ने किया कमाल 

इस प्रोजेक्ट को 2015 में तीन दोस्तों रुपेश सिंगल, अविनाश गर्ग अौर विनय जैन ने सेटअप किया। ये तीनों आई.टी प्रोफैशनल हैं। नियंत्रित वातावरण के लिए इन तीनों ने इनडोर खेती तकनीक का प्रयोग किया। इस तकनीक द्वारा टमाटर, यूरोपियन खीरा, चेरी टमाटर, तुलसी आदि की खेती की। अविनाश का कहना है कि हमने हमारे खेतों में दो रिवर्स ऑस्मोसिस (आरओ) जल संयंत्र स्थापित किए हैं। संयंत्र की क्षमता 2,000 लीटर/घंटा है। हमने कृषि उत्पादन के लिए भारी मात्रा में उत्पादन के लिए आरओ जल का उपयोग करने का निर्णय लिया है और इसके लिए पौधों को आवश्यक मात्रा में आवश्यक पोषक तत्व और खनिज सही अनुपात में मिलना अनिवार्य हैं।

 

कैसे की जाती है खेती

इस खेती में मिट्टी के स्थान पर नारियल के अवशेष का प्रयोग होता है और इसे छोटे-छाटे बैगों में डालकर पोली हाऊस में सब्जी के पौधे उगाए जाते हैं। नारियल के इस अवशेष को खेती के लिए लगातार तीन साल तक प्रयोग किया जा सकता है। इस तकनीक से लगातार 7 महीनों तक सब्जियों का उत्पादन होता है। बिना मिट्टी के खेती करने का तरीका हाइड्रोपोनिक्स कहलाता है। इसमें फसलें उगाने के लिए द्रव्य पोषण या पौधों को दिए जाने वाले खनिज पहले ही पानी में मिला दिए जाते हैं।

हाइड्रोपोनिक जैविक खेती के लाभ 

हाइड्रोपोनिक जैविक खेती के कई लाभ हैं। इस खेती के लिए कम पानी के साथ-साथ बहुत कम जगह की आवश्यकता होती है और यहां तक कि खिड़कियां, बालकनियों, छतों पर भी इस तकनीक से सब्जियां उगाई जा सकती हैं । सबसे अहम बात इस इस तकनीक से सुरक्षित अौर अच्छी फसलों का उत्पादन होता है। इस तकनीक से उगाई गई फसल कीटनाशकों से मुक्त होती है और पैदावार अधिकतम पोषक तत्वों के साथ बेहतर गुणवत्ता वाली होती है ।

हाइड्रोपोनिक जैविक खेती में कुछ कमियां

इस तकनीक के जहां फायदे हैं वहीं कुछ कमियां भी हैं। हर कोई हाइड्रोपोनिक खेती पर होने वाले खर्चों को हैंडल नहीं कर सकता। इसे अच्छी देखभाल और रख रखाव की आवश्यता होती है।

बहरहाल अब लोग पारंपरिक खेती को छोड़ आधुनिक तरीकों से फसलों को उगाने में लग गए हैं। इस तकनीक से फसलों को खेतों के बजाय बहुमंजिला इमारतों में उगाया जाएगा जहां कम मिट्टी औऱ पानी से अच्छी फसलों का उत्पादन होगा।

जापान के इस वैज्ञानिक के फार्मूले से आप कर सकते है सूखे खेत में धान की खेती

अगर आप सोचते है के धान की खेती के लिए बहुत ज्यादा पानी की जरूरत होती है तो आप गलत सोच रहे है ।आप सूखे खेत में भी धान की खेती कर सकते है । ऐसा संभव किया था जापान के शिकोकु द्वीप पर रहने वाले मासानोबू फुकुओका (1913-2008) एक किसान और दार्शनिक ने अपने जीवन के अगले पैंसठ सालों तक उन्होंने प्राकृतिक खेती को समृद्ध बनाने में लगा दिए।

वो अपने खेत की जुताई नहीं करते, कोई रासायनिक उर्वरक या खाद का इस्तेमाल नहीं करते, और एशिया के तकरीबन सभी भागों में धान की खेती करने वाले किसानों की तरह वो अपने धान के खेत में पानी भी नहीं भरते और तब भी उनके खेतों का उत्पादन जापान के इसी तरह के अन्य खेतों के उत्पादन से ज्यादा या तकरीबन बराबर होता था।

मासानोबू ने कहते थे की उनके पड़ोसी के खेत में चावल के पौधे की ऊंचाई अगस्त के महीने में उनकी कमर तक या उससे ऊफर तक आ जाती थी। जबकि उनके खुद के खेत में ये ऊंचाई करीब आधी ही रहती थी। लेकिन फिर भी वो खुश रहते थे क्योंकि उनको मालूम होता था कि उनका कम ऊंचाई वाला पौधा बाकियों के बराबर या ज्यादा पैदावार देगा।

मासानोबू के मुताबिक आमतौर पर साइज में बड़े पौधे से अगर 1 हजार किलो पुआल निकलता है तो करीब 500 से 600 किलो चावल का उत्पादन होता है। जबकि मासानोबू की तकनीक में 1 हजार किलो पुआल से 1 हजार किलो ही चावल निकलता है। फसल अच्छी रहने पर ये 1200 किलो तक चला जाता है।

क्या है फार्मूला

  • दरअसल, अगर आप चावल के पौधे को सूखे खेत में उगाते हैं तो ये ज्यादा ऊंचे नहीं हो पाते। कम ऊंचाई का फायदा मिलता है। इससे सूरज की रोशनी पौधे के हर हिस्से पर पड़ती है। पौधे के पत्ते से लेकर जड़ तक सूरज की रोशनी जाती है।
  • 1 वर्ग इंच की पत्ती से 6 दाने पैदा होने की संभावता ज्यादा बन जाती है। जबकि पौधे के सबसे ऊपरी हिस्से पर आने 3-4 वाली पत्तियों से ही करीब 100 दाने आ जाते हैं।
  • मासानोबू बीज को थोड़ी ज्यादा गहराई में बोते थे, जिससे 1 वर्ग गज में करीब 20 से 25 पौधे उगते हैं। इनसे करीब 250 से लेकर 300 तक दानों का उत्पादन हो जाता है।
  • खेत में पानी नहीं भरने से पौधे की जड़ ज्यादा मजबूत होती है। इससे बिमारियों और कीड़ों से लड़ने में पौधे को काफी मदद मिलती है।
  • जून महीने में मासानोबू करीब 1 हफ्ते के लिए खेत में पानी को जाने से रोक देते हैं। इसका फायदा ये मिलता है कि खेत के खतरपतवार पानी की कमी की वजह से जल्दी मर जाते हैं। इसका फायदा ये होता है कि इससे चावल के अंकुर ज्यादा अच्छे से स्थापित हो पाते हैं।
  • मासानोबू, मौसम के शुरु में सिंचाई नहीं करते। अगस्त के महीने में थोड़ा थोड़ा पानी जरूर देते हैं लेकिन उस पानी को वो खेत में रूकने नहीं देते।
  • इस सबसे बावजूद उनकी इस तकनीक से चावल की पैदावार कम नहीं होती।

आ गया बोलने वाला ट्रेक्टर अब बोल कर बताएगा अपना हाल

क्या होगा अगर आप का ट्रेक्टर बोलने लगे, जी हाँ यह सच हो चूका है अब ट्रेक्टर बोल कर अपनी जरूरत अपने मालिक को बताएगा। ट्रेक्टर बताएगा की उस को कब उसको तेल और सर्विस की जरूरत है ।अगर ट्रेक्टर गर्म हो रहा हो तो भी पता चल जायगा

यही नहीं अगर ट्रेक्टर चोरी हो जाए तो वो अपने मालिक को अपनी जगह बताएगा की वह कहाँ पर है । इतना ही नहीं और भी बहुत कुश बताएगा ।जो किसान ट्रेक्टर किराए पर देते है जा जिनके ड्राइवर ट्रेक्टर चलते है उन सब के लिए यह तकनीक बहुत ही लाभदायक है ।

यह सपना पूरा किया है न्यू हॉलैंड और जॉन डियर कंपनी ने । यहाँ न्यू हॉलैंड ट्रेक्टर कंपनी अपने ट्रैक्टर में sky watch तकनीक लांच की है ।वहीँ जॉन डियर कंपनी ने JDLINK तकनीक का अविष्कार क्या है । इन तकनीक में ट्रेक्टर में GPRS और GPS से काम करती है ।

इस तकनीक का फ़ायदा यह होता है की ट्रेक्टर में होने वाली कोई भी गड़बड़ी का पता पहले ही किसान को मिल जाती है । ट्रेक्टर इस बारे में जानकारी आप को SMS के जरिए आप के मोबाइल फ़ोन पर भेजता रहता है

यह तकनीक सिर्फ कुश चुने हुए मॉडल्स पर ही उपलब्द है जैसे न्यू हॉलैंड के 5500 और 3630 में और जॉन डियर कंपनी के 5045 डी , 5050 डी और सारे E मॉडल्स पर उपलब्द है ।नए ट्रैक्टर्स के इन मॉडल्स पर यह सुविधा फ्री में उपलब्द है लेकिन आप अपने पुराने ट्रेक्टर पर इस सुविधा का फ़ायदा उठाना चाहते है तो सिर्फ 18000 रु देकर इसे लगवा सकते है ।

यह तकनीक कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो देखें