आ गया बोलने वाला ट्रेक्टर अब बोल कर बताएगा अपना हाल

क्या होगा अगर आप का ट्रेक्टर बोलने लगे, जी हाँ यह सच हो चूका है अब ट्रेक्टर बोल कर अपनी जरूरत अपने मालिक को बताएगा। ट्रेक्टर बताएगा की उस को कब उसको तेल और सर्विस की जरूरत है ।अगर ट्रेक्टर गर्म हो रहा हो तो भी पता चल जायगा

यही नहीं अगर ट्रेक्टर चोरी हो जाए तो वो अपने मालिक को अपनी जगह बताएगा की वह कहाँ पर है । इतना ही नहीं और भी बहुत कुश बताएगा ।जो किसान ट्रेक्टर किराए पर देते है जा जिनके ड्राइवर ट्रेक्टर चलते है उन सब के लिए यह तकनीक बहुत ही लाभदायक है ।

यह सपना पूरा किया है न्यू हॉलैंड और जॉन डियर कंपनी ने । यहाँ न्यू हॉलैंड ट्रेक्टर कंपनी अपने ट्रैक्टर में sky watch तकनीक लांच की है ।वहीँ जॉन डियर कंपनी ने JDLINK तकनीक का अविष्कार क्या है । इन तकनीक में ट्रेक्टर में GPRS और GPS से काम करती है ।

इस तकनीक का फ़ायदा यह होता है की ट्रेक्टर में होने वाली कोई भी गड़बड़ी का पता पहले ही किसान को मिल जाती है । ट्रेक्टर इस बारे में जानकारी आप को SMS के जरिए आप के मोबाइल फ़ोन पर भेजता रहता है

यह तकनीक सिर्फ कुश चुने हुए मॉडल्स पर ही उपलब्द है जैसे न्यू हॉलैंड के 5500 और 3630 में और जॉन डियर कंपनी के 5045 डी , 5050 डी और सारे E मॉडल्स पर उपलब्द है ।नए ट्रैक्टर्स के इन मॉडल्स पर यह सुविधा फ्री में उपलब्द है लेकिन आप अपने पुराने ट्रेक्टर पर इस सुविधा का फ़ायदा उठाना चाहते है तो सिर्फ 18000 रु देकर इसे लगवा सकते है ।

यह तकनीक कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो देखें

आ गया 6750 रूपए कीमत का नैनो बायोगैस प्लांट

यह नैनो बायोगैस प्लांट (nano bio gas plant)बायोटेक इंडिया जो के केरला में है द्वारा त्यार क्या गया है । इसमें आप पशुओं का गोबर ,गली सड़ी सब्जियां ,या फिर कोई भी जैविक कचरा डाल सकते है ।

बायोटेक इंडिया की तरफ से नैनो बायोगैस प्लांट के दो मॉडल त्यार किए गए है । पहला मॉडल 45 लीटर का है और दूसरा मॉडल 160 लीटर का है । छोटा मॉडल 10 -20 लीटर गैस पैदा करता है जब की बड़ा मॉडल 30 – 50 लीटर बायोगैस पैदा करता है ।

दोनों मॉडल के ऊपर एक फ्लोटिंग टैंक है । जिसमे गैस भर जाने पर वो ऊपर आ जाता है । छोटे मॉडल का मूल्य 6750 रु और बड़े मॉडल का मूल्य 9950 रु है ।यह मॉडल इतने छोटे होते है के आप इन्हे अपनी रसोई में भी रख सकते है इसके इलावा आप इसको एक जगह से दूसरी जगह पर आसानी से ले कर जा सकते है ।

फ़िलहाल इन मॉडल को स्कूल,कॉलेज, यूनिवर्सिटी में बच्चों को जैविक ऊर्जा के बारे में जागरूक करने के लिए इस्तेमाल क्या जा रहा है । लेकिन आप इसे घर पर भी इस्तेमाल कर सकते है ।

इस दोनों नैनो मॉडल के इलावा भी बायोटेक कंपनी कुश बड़े मॉडल भी त्यार करती है जो इस से ज्यादा गैस पैदा कर सकते है और आपको किसी भी तरह की एलपीजी गैस की जरूरत नहीं पड़ती ।

 

बायोटेक इंडिया सारे भारत में होम डिलीवरी भी करती है जिसका कोई अलग से खर्चा नहीं लिया जाता । हर बायोगैस प्लांट के साथ एक चूल्हा और जरूरी सामान दिए जाता है ।

इस मॉडल और दूसरे मॉडल को आप ऑनलाइन इंटरनेट पर पैसे दे कर ले सकते है ।ज्यादा जानकारी के लिए बायोटेक इंडिया के वेबसाइट(biotech-india.org) पर चेक करें जा फोन 91-471-2331909 पर संपर्क करें ।इसके इलावा भी आप ई कॉमर्स वेब्सीटेस जैसे snapdeal ,Amazon India आदि वेब्सीटेस से भी मंगवा सकते है

ध्यान रहे यह सारी जानकारी इंटरनेट से ली गई है इस लिए कोई भी आर्डर करने से पहले अपनी तरफ से पूरी तसल्ली कर ले ।

नैनो बायोगैस कैसे काम  करता है वीडियो भी देखें 

किसान ने देसी जुगाड़ से बना लिया अपना कोल्ड स्टोर अब ख़राब नहीं होता प्याज

किसान रोहित पटेल मध्य प्रदेश के धार जिले के रहने वाले हैं। देशी तकनीक के जरिए रोहित पटेल ने प्याज स्टोरेज का ऐसा कारगर जुगाड़ निकाला है कि हर साल प्याज बेच कर ठीक ठाक लाभ कमा रहे हैं। कोल्ड स्टोरेज की वजह से रवि पटेल अपने प्याज खेत से निकालकर तुरंत नहीं बेचते, कुछ दिन

अपने देशी जुगाड़ तकनीक के कोल्ड स्टोरेज में रखकर प्याज के ठीक ठाक दाम मिलने का इंतजार करते हैं और फिर बेचते हैं। प्याज को खेत से निकालते ही 2 से 3 रुपए किलो के भाव पर बेचने के बजाय बारिश का मौसम बीत जाने के बाद रवि पटेल 30 से 35 रुपए किलो में बेच कर लाभ कमा रहे हैं। तीसरे साल भी उन्होंने प्याज का इसी तकनीक से स्टोरेज किया है।

दरअसल रोहित ने प्याज के कोल्ड स्टोरेज तैयार करने के लिए कोई भारी भरकम इंतजाम नहीं किया है। थोड़ा सा दीमाग लगा कर उन्होंने उपोयगी बंदोवस्त किया है। बंद कमरे में लोहे की जाली को जमीन से 8 इंच ऊंचा बिछा देते हैं रवि। ऐसा करने के लिए कुछ-कुछ दूरी पर दो-दो ईंटें रखते हैं।

उसके ऊपर प्याज का स्टोरेज करते हैं। लगभग 100 स्क्वेयर फीट की दूरी पर एक बिना पेंदे की कोठी रखते हैं। ड्रम के ऊपरी हिस्से में एग्जॉस्ट पंखे लगा देते हैं। पंखे की हवा जाली के नीचे से प्याज के निचले हिस्से से उठ कर ऊपर तक आती है। इससे पूरे प्याज में ठंडक रहती है। दोपहर में हवा गर्म होती है, इसलिए दिन की बजाय रातभर पंखे चलाते हैं।

पटेल ने इस तकनीक से 1000 क्विंटल प्याज का भंडारण किया है। 2000 क्विंटल और खेतों में हैं, जो इसी तरह भंडारण करने वाले हैं। पिछले साल उन्होंने बारिश बाद 200 क्विंटल प्याज 35 रु. किलो के भाव बेचे थे।

पटेल बताते हैं कि इस तकनीक से 80 फ़ीसदी तक प्याज को सड़ने से बचाया जा सकता है। रोहित के मुताबिक कोल्ड स्टोरेज तैयार करने से पहले जहां 10 प्याज खराब होते थे, तो अब 2 होते हैं। इसकी वजह बताते हुए रवि कहते हैं कि किसी प्याज में सड़न लगती थी, तो आसपास के प्याज खराब कर देता था। अब कोई प्याज सड़ता है तो पंखे की हवा से वहीं सूख जाता है।

अपनी जुगाड़ पर फुले नहीं समा रहे रोहित बतात हैं कि प्याज की फसल अमूमन मार्च-अप्रैल में निकलती है। इस समय आवक अधिक होने से प्याज का मंडी भाव 2 से 3 रु. किलो तक पहुंच जाता है। बारिश के बाद यही भाव 30 से 35 रु. किलो न्यूनतम होता है लेकिन प्याज गर्मी से जल्दी खराब होने के कारण इसका स्टोरेज किसान के लिए चुनौती होता है।

ज़ाहिर है अपने जुगाड़ से रवि ने अपने लिए एक लाभकारी रास्ता तो तैयार कर लिया। जरा जोर आप भी लगाएंगे तो आप भी ऐसा कुछ कर पाएंगे। फिलहाल आप अपने प्याज को इस तरीके से सड़ने से बचाइए और बेहतर आमदनी का इंतजाम कीजिए।

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बेकार प्लास्टिक की बोतल से ऐसे बनायें चूहा पकड़ने का ट्रैप

चूहों की संख्या मई-जून माह में कम होती है, यही समय चूहा नियंत्रण अभियान के लिए सही समय होता है, यह अभियान सामूहिक रूप में चलाना चाहिए। चूहे खेत खलिहानो, घरों और गोदामों में अनाज खाने के साथ-साथ ही अपने मलमूत्र से अनाज बर्बाद कर देते हैं।

एक जोड़ी चूहा एक वर्ष में 800-1000 की संख्या में बढ़ जाते हैं,अगर चूहों के संख्या कम हो तो आप प्लास्टिक की बोतल का ट्रैप बना कर भी चूहों को पकड़ सकते है ।इस तरिके से आप को कोई खर्चा भी नहीं होगा और किसी खतरनाक दवाई की भी जरूरत नहीं पड़ेगी ।

इस तरीके से आप घर पर भी आसानी से चूहों को पकड़ सकते हैं। आज हम आपको बताते है कि कैसे आप घर पर चूहे पकड़ने की मशीन बना सकते है।

जरूरत का सामान

  • प्लास्टिक की बोतल
  • कैंची
  • स्टिकस
  • रबड़ बैंड
  • थ्रेड
  • यू क्लिप

बनाने का तरीका

  1. सबसे पहले प्लास्टिक की बोतल का ऊपरी हिस्सा कैंची से काट लें। ध्यान रखें कि उसे सिर्फ एक ही साइड से काटना है।
  2. अब बोतल के दोनों हिस्सों पर दो इंच के गेप से दाए और बाए साइड होल करके दो स्टिक्स आड़ी फंसा दें।
  3. ध्यान रखें कि ये दोनों स्टिक्स पैरेलर हो। अब इन दोनों स्टिक्स पर रबड़ बैंड दोनों ओर फंसा दें।
  4. अब एक मजबूत धागा लें और बोतल के मुंह में लगाकर ढक्कन बंद कर दें। इस बात का ध्यान रखें कि धागे की लंबाई इतनी होनी चाहिए कि उसेे खिंचने पर बोतल का कटा हिस्सा खुल सकें।
  5. अब यू क्लिप का किनारा सीधा करके उसमें खाने की चीज फंसा दें। इसे बोतल के अंदर हाथ डालकर तली से बाहर निकालें।
  6.  धागे के हिस्से पर नॉट बनाकर इस यू क्लिप के बाहर निकले नुकीले हिस्से पर लटका दें।

इस ट्रैप को कैसे बनाते है इसके लिए वीडियो देखें

बगीचे में काम करते वक़्त मिली ऐसी चीज़ के माली हो गया मालोमाल

किसकी किस्मत कब खुल जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। आपको भी जानकर विश्वास नहीं होगा कि काम करते वक्त उस माली को क्या मिला। दरअसल उस माली के हाथ ऐसी कीमती चीज लगी है जिससे उसकी किस्मत का पिटारा खुल सकता है।

हर दिन की तरह वह उस दिन भी मालिक के कहने पर बागीचे में काम करने गया, उसे नहीं पता था कि उसकी किस्मत खुलने वाली है। उसने काम शुरू किया और जैसे ही बागीचे के एक पुराने पेड़ (ओक) के पास जमी मिट्टी को साफ करने गया, उसे कीमती चीज मिली।

दरअसल वो आदमी ब्रिटेन का रहने वाला है, उसके मालिक ने अपना खेत और बागीचा उसके हवाले कर रखा है। जिसकी हर दिन की सफाई और देख रेख 60 साल का वो माली ही करता है जिसका नाम Steve Fletcher है।

पहले तो उसे लगा कि कोई फालतू चीज उसे मिली है लेकिन बाद में उसे सच्चाई पता चली।  जी हां, उसके हाथ ‘ब्लैक गोल्ड’ लगा है। दरअसल ये ब्लैक गोल्ड एक फंगस (कवक) का होता है। जिसकी कीमत भारतीय बाजार में लगभग 20 लाख रुपए है। अगली स्लाइड में जानिए क्या होता है ब्लैक गोल्ड।

एक तरह का फंगस जिसे ‘ब्लैक ट्रफल’ कहते हैं जिसे फ्रांस, जर्मनी, इटली और विदेशों में बड़ा चाव से लोग खाते हैं। इस ब्लैक ट्रफल को ब्लैक गोल्ड भी कहते हैं। ये बहुत कीमती होता है। इसे तरह तरह के खाद्य पद्वार्थ भी बनाए जाते हैं।

किसान जो सीड बाल से खेती कर कमा रहा है पचास लाख सालाना की कमाई

मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में मूल रूप से खोजनपुर गांव के रहने वाले राजू टाईटस ने पिछले 30 वर्षों से 12 एकड़ जमीन में न कभी हल चलाया और न ही मिट्टी के प्राकृतिक रूप से छेड़छाड़ की है। ये अपने खेतों में बाजार से खरीदी गयी खाद और कीटनाशक का इस्तेमाल नहीं करते हैं, बीजों की सीड बाँल बनाकर खेतों में बुआई करते हैं। इस खेती से राजू टाईटस सालाना पचास से साठ लाख की कमाई भी करते है।

बीजों को जब क्ले मिटटी की परत से 1/2 इंच से लेकर 1 इंच तक की गोल गोल गोलियां से सुरक्षित कर लिया जाता है उसे सीड बॉल कहते हैं।सीड बाँल बनाने के लिए अगर ये मिट्टी गीली है तो बीज के साइज के हिसाब से इसकी गोलियां बना लेते हैं उसके अन्दर बीज भी भर देते हैं, इन गोलियों को सूखा लेते हैं और बरसात आने पर अपने खेतों में फेंक देते हैं।

गर्मियों की छुट्टियों में आसपास के बच्चे खेल-खेल में ये सीड बाँल बनाने के लिए हमारे फॉर्म पर आ जाते हैं, ये बाँल साल भर तक खराब नहीं होती हैं और बीज सुरक्षित रहता है, बरसात से पहले इन बालों को बनाकर सुखाने के बाद इन्हें खेतों में बिखरा देते हैं, बीज चिड़ियां और चूहे नही खा सकते।

इस तरह से बोआई करने से एक एकड़ में लगभग 20 कुंतल की उपज हो जाती है जिससे चार पांच लाख की वार्षिक आय हो जाती है, अब तो कई जगह के किसान इसे देखने आते हैं, बकरी पालन भी किया है इससे शुद्ध दूध मिल जाता है और आसपास जमे खरपतवार ये साफ़ कर देती हैं।

होशंगाबाद जिले से डेढ़ किलोमीटर दूर ‘टाईटस फॉर्म’ के नाम से मशहूर इनके फॉर्म को सब जानते हैं। बिना रसायन 30 वर्षों से लगातार खेती कर रहे राजू बताते हैं के अगर हम प्रकृति के साथ छेड़छाड़ न करें तो हमे खेती करने में किसी भी प्रकार की कोई असुविधा नहीं होगी, जुताई करने से असंख्य जीवाणु तो नष्ट होते ही है साथ ही झाड़ियाँ भी काट देते हैं

झाड़ियाँ काटने से असंख्य जीव-जन्तु, कीड़े-मकोड़े मर जाते हैं, पेड़ो के साथ झाड़ियाँ और झाड़ियों के साथ घास और अनेक वनस्पतियां रहती हैं जो एक दूसरे की पूरक होती हैं, अगर हम जुताई नहीं करते हैं तो हमारे खेत असंख्य वनस्पतियों से भर जाते हैं, बकरी पालन करते हैं जिससे खरपतवार का नियंत्रण होता है।

 

 

अब अंगूठे के निशान से मशीन बताएगी खाद की जरूरत

किसान अब अपनी मर्जी से रासायनिक खाद की खरीदी नहीं कर सकेंगे। किसी भी सरकारी समिति से खाद खरीदने पर किसानों का मशीन में थंब इंप्रेशन लिया जाएगा। मशीन बता देगा कि उस किसान को कौन सी और कितने खाद की जरूरत है। उससे अधिक खाद किसान को नहीं दिया जाएगा। किसानों का पूरा डेटा कंप्यूटर में फीड कर दिया गया है। इस तरह की पहल से किसान अधिक मात्रा में रासायनिक खाद का उपयोग नहीं कर पाएंगे।

किसानों का स्वाइल हेल्थ कार्ड बनाया जा रहा है। इस कार्ड में किसानों की पूरी जमीन का विवरण है, कितनी जमीन में खेती हो रही है और कितनी जमीन परिया है। जिन खेत में फसल बोई जा रही है उस खेते में कौन सी और कितनी खाद की जरूरत है, यह सब जानकारी कृषि विभाग के सिस्टम में अपलोड की जा रही है।

स्वाइल कार्ड को आधार कार्ड से लिंक करने के बाद यह सिस्टम शुरू हो जाएगा। किसान अब मनमाने तरीके से अधिक मात्रा में रासायनिक खाद का उपयोग नहीं कर पाएंगे। नियमित रूप से खाद का उपयोग होने से जमीन की उर्वरक क्षमता पर भी कोई असर नहीं पड़ेगा।

निजी दुकानों में पीओएस मशीन से होगी खरीदी

सहकारी समितियों के अलावा लाइसेंसी निजी दुकानों में भी पीओएस मशीन लगाई जाएगी। कृषि विभाग किसानों के खेतों की मिट्टी का सैंपल ले रहे हैं, जिसके आधार पर विभाग के पास यह डाटा है कि किसान के पास कितनी जमीन है और खेत की मिट़्टी में कौन से उर्वरक की कमी या अधिकता है।

ऐसे में किस खाद को कितनी मात्रा में डालना है, यह सब ऑनलाइन पता चल जाएगा। इससे निजी दुकानदार मनमाने तरीके से खाद नहीं बेच पाएंगे। इससे किसानों को रासायनिक खाद के लिए अधिक रुपए खर्च नहीं करना पड़ेगा और उनके पैसे बचेंगे। जिससे वे दूसरा काम कर सकेंगे।

इस पहल से खाद की नहीं हो सकेगी कालाबाजारी

हर साल सरकारी सब्सिडी से हजारों मैट्रिक टन यूरिया, डीएपी और अन्य खाद सोसायटियों में पहुंचती है। लेकिन कालाबाजारी के चलते किसानों का इसका पूरा लाभ नहीं मिलता है। इस प्रकार की गड़बड़ी को रोकने के लिए यह पहल किया जा रहा है। इसके लिए सभी सोसायटियों में पीओएस मशीन दी जाएगी।

इससे किसानों पर विभाग मॉनिटरिंग भी कर पाएगा कि उसने साल में कितनी बार खाद खरीदी है और कितनी जमीन है। अगर बार-बार खाद खरीद रहा है, तो उसका क्या उपयोग हो रहा है। इससे बड़े किसान खाद की कालाबाजारी नहीं कर पाएंगे।

अगर अच्छी फ़सल चाहिए, तो न जोतें खेत

कोई भी जंगल की ज़मीन को नहीं जोतता पर तो भी वहां पेड़-पौधे उगते हैं. संरक्षित खेती के तहत माना जाता है कि खेती के लिए ज़मीन जोतने की ज़रूरत नहीं खेत जोतने से ज़मीन सूख जाती है. कई फ़सलों में उनकी जड़ों को ज़मीन से पोषक तत्व लेने में रोक लगाती है और इससे मिट्टी के माइक्रोबियल गुणों पर भी असर पड़ता है.

इसलिए बोरलॉग इंस्टीट्यूट ऑफ़ साउथ एशिया भारत में कुछ बदलाव के साथ संरक्षित खेती की सलाह देता है.इस इंस्टीट्यूट का नाम नॉरमन बोरलॉग के नाम पर रखा गया है जिन्हें हरित क्रांति का जनक कहा जाता है.

इस इंस्टीट्यूट की शाखाएं लुधियाना, समस्तीपुर और जबलपुर में हैं.यह इंस्टीट्यूट उत्तरी-पश्चिमी भारत में जहां बाढ़ के पानी से सिंचाई होती है, बुआई से पहले लेज़र लेवलिंग की सलाह देता है ताकि थोड़े से पानी से बड़े खेत का काम चल जाए.

मगर मध्य भारत में जहां बड़े पैमाने पर सिंचाई के साधनों का इस्तेमाल होता है और ज़मीन की सतह लहरदार है, वहां लेज़र लेवलिंग की ज़रूरत नहीं है.संरक्षित खेती के तीन नियम हैं. पहला, बिल्कुल भी जुताई न करें या बहुत कम जुताई करें. दूसरा नियम कि पिछली फ़सल के डंठल खेत में ही छोड़ दें ताकि वह खेत की नमी बरकरार रखें और खेत में खरपतवार को दबाकर रखें और मिट्टी के जैविक गुण में इज़ाफ़ा करें.

 

तीसरे नियम के तहत मिट्टी में नाइट्रोज़न की मात्रा बढ़ाने के लिए फल लगने वाले फ़सलों की खेती की जाए. खेती का यह तरीका कम ख़र्चीला है क्योंकि इसमें जुताई की ज़रूरत नहीं पड़ती.मगर इसमें नए ज़माने के खरपतवार नाशकों की ज़रूरत पड़ती है जो अपने प्रभावों में मारक हों और मिट्टी में ज़्यादा दिनों तक जिसका असर न हो.

जिस हवा में हम सांस लेते हैं उसके लिए भी यह अच्छा है. छोटे-छोटे धूल के कण हवा को गंदा करते हैं. ठंड के दिनों में अलाव जलाने से यह प्रदूषण और भी बढ़ता है.

पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के खेतों में धान के पुआल जलाने के कारण इस तरह का प्रदूषण बढ़ता है.धान के पुआल में सिलिका ज़्यादा होता है, जिसे जानवर खाना पसंद नहीं करते. प्रतिबंध के बावजूद पूरे क्षेत्र में खेतों में अलाव जलाए जाते हैं. इसे अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के नक्शे में रेड स्पॉट के रूप में देखा जा सकता है.

अगर पुआल को खेत में ही छोड़ दें, तो प्रदूषण होने से बचाया जा सकता है.हरित क्रांति के दौरान भारत ने मिट्टी की गुणवत्ता को लेकर लापरवाही बरती क्योंकि उस वक़्त सारा ध्यान खाद्य सुरक्षा को लेकर था. लेकिन ये दोनों एक-दूसरे के विरोधाभासी नहीं हैं.

असल में मिट्टी की गुणवत्ता नज़रअंदाज करने से आगे खेती पर बुरा असर पड़ता है. भारत को बड़े पैमाने पर संरक्षित खेती अपनाने की ज़रूरत है.

नौकरी छोड़ 60 हज़ार की लागत से शुरू की मोती की खेती अब कमा रहा है लाखों

जब किसी में कुछ करने की चाह होती है तो वह छोटे कामों से भी अपनी पहचान बना लेते हैं। ऐसा ही कुछ गुड़गांव के फरूखनगर तहसील के गांव जमालपुर के रहने वाले विनोद कुमार ने कर दिखाया। विनोद ने इंजीनियर की नौकरी छोड़कर मोती की खेती शुरू की। जिससे वह 5 लाख रुपए सलाना कमा रहा है। इतना ही नहीं वह दूसरे किसानों को भी इस खेती का प्रशिक्षण दे रहा है।

27 वर्षीय विनोद कुमार का कहना है कि उन्होंने वर्ष 2013 में मानेसर पॉलिटेक्निक से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया। इसके बाद दो साल तक नौकरी की। उनके पिता भी किसान थे। प्राइवेट नौकरी के साथ थोड़ी रूचि खेती में भी थी। इंटरनेट पर खेती की नई-नई तकनीक के बारे में पढ़ते-पढ़ते मोती की खेती के बारे में पढ़ा।

कुछ जानकारी इंटरनेट से जुटाई तो पता चला कि कम पैसे और कम जगह में यह काम किया जा सकता है। मोती की खेती का प्रशिक्षण देने वाला देश का एक मात्र संस्थान सेंट्रल इंस्टिट्यूट ऑफ फ्रेश वॉटर एक्वाकल्चर (सीफा) भुवनेश्वर से मई 2016 में एक सप्ताह का प्रशिक्षण लिया और 20 गुणा 10 फुट एरिया में 1 हजार सीप के साथ मोती की खेती शुरू कर दी।

विनोद कुमार ने बताया कि यह खेती शुरू करने के लिए पानी के टैंक की जरूरत पड़ती है। मेरठ, अलीगढ़ व साउथ से 5 रुपए से 15 रुपए में सीप खरीदी जा सकती हैं। यह मछुआरों के पास मिलती है। इन सीप को 10 से 12 महीने तक पानी के टैंक में रखा जाता है। जब सीप का कलर सिल्वर हो जाता है तो मानो मोती तैयार हो गया है।

पूरा सैटअप खड़ा करने में लगभग 60 हजार रुपए खर्च आ जाता है। इस खेती में सबसे अहम काम सीप की सर्जरी करना है। इसके लिए ही विशेष प्रशिक्षण लेना पड़ता है। सीप के अंदर दो मोती पैदा हो सकते हैं। जैसी आकृति उसके अंदर रखी जाती है वैसा ही मोती पैदा हो जाता है। वे भगवान गणेश, शिव, 786 आदि के मोती भी पैदा करते हैं।

विनोद ने बताया कि मोती की कीमत उसकी क्वालिटी देकर तय की जाती है। एक मोती की कीमत 300 रुपए से शुरू होकर 1500 रुपए तक है। इसकी मार्केट सूरत, दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद और कलकत्ता में है। वे वर्ष 2016 से ही अलग-अलग जगह अपने मोती भेजते हैं। एक बार माल जाने लगे तो खरीदार खुद संपर्क में रहते हैं।

विदेशों में भी खासी मांग है लेकिन उसके लिए आपके पास पैदावार अधिक होनी चाहिए तभी एक्सपोर्ट का काम कर सकते हैं। वे खुद 2000 सीप के व्यवसाय से 5 लाख रुपए से ज्यादा की आमदनी ले रहे हैं। विनोद खुद भी किसानों को प्रशिक्षण देते हैं। किसान उनके पास इस खेती का प्रशिक्षण लेने के लिए आते हैं।

कम पानी में ज्यादा उत्पादन चाहिए तो लगाएं धान की यह किस्मे

 

धान की फसल को ज्यादा पानी वाली फसल माना जाता है और यह बिलकुल सच भी है लेकिन कुश ऐसी भी किस्मे है जिनके उपयोग से आप बहुत सारा पानी बचा सकते हो कुछ ऐसी ।

इन किस्मो की खास बात यह है की समय पर अच्छी बरिश न भी हो तो किसानों को परेशान होने की जरूरत नहीं है। किसान अगर सतर्कता से काम लें तो वह सूखे की स्थिति से निपट सकते हैं।इन किस्मों को सिंचाई की भी काफी कम जरूरत पड़ती है ।

धान की इन किस्मों में पूसा सुगंध-5, पूसा बासमती-1121, पूसा-1612, पूसा बासमती-1509, पूसा-1610 आदि शामिल हैं। धान की यह प्रजातियाँ लगभग चार माह में पैदावार दे देती हैं।

जुलाई माह में भी पर्याप्त बारिश नहीं होती है तो भी धान की इन किस्मो की पौध जुलाई में तैयार करके अगस्त में रोपाई की जा सकती है।

कम बरसात वाले क्षेत्रों में सरसों की पैदावार लेना भी एक अच्छा विकल्प साबित हो सकता है। इसकी फसल को अगस्त और सितम्बर के दौरान लगाकर कम बारिश और सिंचाई की सुविधाओं की कमी के बावजूद अच्छी पैदावार की जा सकती है।

वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि किसान विकल्प के तौर पर एक और प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। इस प्रौद्योगिकी के अनुसार धान की बुवाई गेहूँ की तरह खेतों में की जा सकती है। पौध तैयार करने की जरूरत नहीं है।

जहाँ सिंचाई सुविधाओं का अभाव है और बरसात भी कम होती हो वहाँ ड्रिप सिंचाई, फव्वारा सिंचाई, पॉली हाउस तथा नेट हाउस जैसी आधुनिक सिंचाई तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। इन आधुनिक तकनीकों का प्रयोग कर कम सिंचाई के बावजूद अच्छी फसलें तैयार की जा सकती हैं। इन तकनीकों के इस्तेमाल के लिये सरकारें भी अनुदान देकर प्रोत्साहित करती हैं।