ये गाय 50 से 55 लीटर तक देती हैं दूध, यहां से ले सकते हैं इस नस्ल का सीमन

हरियाणा के लाला लाजपत राय पशु-चिकित्सा एंव पशु विज्ञान विश्वविद्यालय (लुवास) के वैज्ञानिकों ने तीन नस्लों के मेल से तैयार की गाय की नई प्रजाति ‘हरधेनु’ को रिलीज कर दिया है। इस समय इस नस्ल की लगभग 250 गाय फार्म में हैं। जहां से इस नस्ल के सांड का सीमन ले सकते है।

उत्तरी-अमेरीकी (होल्स्टीन फ्रीजन), देसी हरियाणा और साहीवाल नस्ल की क्रॅास ब्रीड गाय हरधेनु लगभग 50 से 55 लीटर तक दूध देने की क्षमता रखती है। हरधेनू प्रजाति के अंदर 62.5 प्रतिशत खून उत्तरी-अमेरिका नस्ल और 37.5 प्रतिशत खून हरियाणा और साहीवाल का है।

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लुवास विश्वविद्यालय के पशु आनुवांशिकी एवं प्रजनन विभागाध्यक्ष और इस शोध के वैज्ञानिक डॉ. बी.एल.पांडर ने बताते हैं, ”हरधेनु गाय स्थानीय नस्ल की अपेक्षा हर मामले में बेहतर गाय है और इससे पशुपालकों को काफी लाभ मिलेगा क्योंकि यह जल्दी बढ़ने वाली नस्ल है।” अन्य नस्लों की तुलना करते हुए डा. पांडर बताते हैं,”स्थानीय नस्ल औसतन लगभग 5-6 लीटर दूध रोजाना देती है, जबकि हरधेनु गाय औसतन लगभग 15-16 लीटर दूध प्रतिदिन देती है।”

1970 में हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। उस समय केंद्र सरकार की ओर से गाय की नस्ल सुधार के लिए ‘इवेलेशन ऑफ न्यू ब्रीड थ्रू क्रॉस ब्रीडिंग एंड सिलेक्शन’ को लेकर प्रोजेक्ट शुरु हुआ। 2010 में वेटनरी कॉलेज को अलग कर लुवास विश्वविद्यालय बनाया गया।

इस गाय की खुराक की जानकारी देते हुए पांडर बताते हैं,”एक दिन में लगभग 40-50 किलो हरा चारा और 4-5 किलो सूखा चारा खाती है।”

हरधेनु गाय के गुण

  • 20 महीने में प्रजनन के लिए विकसित हो जाती है जबकि स्थानीय नस्ल इसके लिए 36 महीने का समय लेती है।
  • हरधेनु 30 महीने की उम्र में ही बछड़े देना शुरू कर देती है, जबकि स्थानीय नस्ल 45 महीने में बछड़े देती है।
  • दूध देने की क्षमता और उसमें फैट की मात्रा भी अधिक है।
  • किसी भी तापमान में जीवित रह सकती है।

अगर आप इस गाय के नस्ल के सीमन को लेना चाहते है तो लाला लाजपत राय पशु विश्वविद्यालय में भी संपर्क कर सकते हैं–

  • 0166- 2256101
  • 0166- 2256065

300 रुपए लीटर बिक रहा इस पशु का दूध, दो महीने तक नहीं होता खराब

जिले के सादड़ी में 23 साल पहले देश की पहली कैमल मिल्क डेयरी की शुरुआत करने वाले लोकहित पशुपालक संस्था व केमल करिश्मा सादड़ी के निदेशक हनुवंत सिंह राठौड़ ने बताया कि सादड़ी और सावा की ढाणी के ऊंटों के दूध पर लंबे समय से शोध चल रहा है। खेजड़ी, बैर खाने से उनके शरीर में हाई प्रोटीन बनता है। इसके दूध में इंसुलिन और लो फेट है, इसलिए डायबिटीज और मंदबुद्धि बच्चों के इलाज के लिए बेहतर माना जा रहा है।

  •  सिंगापुर को ऊंटनी का दूध एक्सपोर्ट करने की तैयारी की जा रही है। जो 300 रुपए प्रति लीटर में बेचा जा रहा है। यह दूध दो महीने तक खराब नहीं होता।
  • राठौड़ ने बताया कि चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, सिरोही में 5-6 हजार लीटर दूध प्रतिदिन संग्रहित हो सकता है।
  • जिले में सावा की ढाणी की ऊंटनी का दूध विमंदित व कमजोर बच्चों के साथ गंभीर बीमारियों के उपचार में काम आ सकता है। इस संभावना से इजरायल के बाद अब जर्मनी में भी शोध शुरू हो गया है। नतीजा और सार्थक रहा तो मेवाड़ी ऊंटों के दूध की डिमांड पूरी दुनिया में बढ़ सकती है।
  • इसका खुलासा रविवार को यहां जिलास्तरीय पशु मेला व प्रदर्शनी में आए सावा की ढाणी के ऊंट पालक मुखिया देवीलाल रायका ने किया।

टाइफाइड में भी फायदेमंद

  •  उन्होंने बताया कि यह दूध बरसों से चाय के साथ बीमारियां में भी उपयोग लिया जा रहा है। शुगर, टीबी, दमा, सांस लेने में दिक्कत व हड्डियों को जोड़ने सहित टाइफाइड में भी फायदेमंद माना जाता है।
  •  27 साल से राजस्थान के ऊंटों पर शोध कर रही जर्मनी की डॉ. इल्से कोल्हर रोलेप्शन ने एक माह पूर्व सावा की ढाणी में इस दूध के सैंपल लेकर विदेश में भेजे। जर्मनी, सिंगापुर में शोध चल रहा है।

इजरायल की टीम भी सैंपल ले गई

  • छह माह पहले इजरायल की टीम भी सैंपल ले गई। जिनके अनुसार दिमागी रूप से कमजोर व 17 साल से कम उम्र के बच्चों का कद बढ़ाने में यह फायदेमंद साबित हो सकता है।
  •  पशुपालन विभाग के उपनिदेशक डॉ. ताराचंद मेहरड़ा ने बताया कि जिले में पशुगणना के अनुसार ऊंट की संख्या 2166 है। जबकि वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है।
  • देवीलाल रायका , गोविंदसिंह रेबारी ने कहा कि ऊंट खरीदने, बेचने पर प्रतिबंध है। मादा के लिए तो प्रतिबंध ठीक है, लेकिन नर ऊंट पर प्रतिबंध हटना चाहिए। सब्सिडी भी कम है। जंगलों या चारागाह भूमि पर भी इसे चरने नहीं दिया जाता है। ऊंटनी की संख्या कमी हो रही है।

ऊंटनी के दूध में कई विशेषताएं होती हैं। बच्चों के शारीरिक विकास में भी यह उपयोगी है। इस पर शोध हो चुका है। छह माह पूर्व इजरायल की टीम ने भी यहां ऊंटनी के दूध के लिए सैंपल लिए थे। जिले में भदेसर, बेगूं और गंगरार क्षेत्र में ऊंटपालन होता

सबसे ज्यादा ऊंटनी चित्तौड़गढ़ में

ऊंट पालक देवीलाल रायका , गोविंद सिंह रायका , अमरचंद, जगदीश, आदि ने कहा कि सरकार ने जयपुर में केमल दूध मिनी प्लांट लगाया है। जबकि चित्तौड़ जिले से एक हजार लीटर दूध प्रतिदिन संग्रहित हो सकता है। प्लांट यहीं लगना चाहिए था। राज्य में सबसे ज्यादा ऊंटनी चित्तौडग़ढ़, भीलवाड़ा में हैं।

मुर्रा भैंसों का कमाल : ठेकेदारी छोड़ ये आदमी अब हर साल कर रहा लाखों की कमाई

भोपाल (मध्यप्रदेश) रेलवे की ठेकेदारी छोड़कर दूध का व्यापार शुरू करने फैसला थोड़ा रिस्की ही कहा जा सकता है। वो भी तब जब ठेकेदारी से अच्छी कमाई हो रही हो, बिजनेस भी जमा जमाया हो, लेकिन रतलाम के मांगरोल निवासी अनिल सिसौदिया ने ये दिखा दिया कि जब आपके हौंसले बुलंद हो तो आप हर कमा में सफलता के झंडे गाड़ सकते हैं।

सिसौदिया ने साबित कर दिया कि बिजेनस अगर सही प्लान से किया जाए तो असफलता की संभावना कम ही हो जाती है। सिसौदिया इस समय दूध बाजार के स्थानीय ब्रांड बन गए हैं। बड़े आराम से हर महीने 70 से 80 हजार की कमाई हो रही है। सिसौदिया ने यह कमाल मुर्रा भैंसों की दम पर किया है।

उनका डेयरी फॉर्म मांगरोल में आधुनिक श्री सांई डेयरी के नाम से प्रसिद्ध हो चुका है। सिसौदिया ने बताया कि इस बिजनेस की शुरुआत उन्होंने 8 मुर्रा भैंसों से की और नौ माह में 30 मवेशियों को आधुनिक डेयरी फॉर्म तैयार है। सिसौदिया अपनी आधुनिकता के लिए आसपास के कई जिलों में लोकप्रिय हैं।

देशाटन से आया विचार

सिसौदिया बताते है कि जब वे रेलवे की ठेकेदारी कर रहे थे तो कई प्रदेशों में जाना होता था। पंजाब और हरियाणा के डेयरी बिजनेस ने मुझे काफी प्रभावित किया। तभी मैंने सोच लिया था कि दूध का व्यापार करना है। योजना बनाई और एक साल में डेयरी फॉर्म बन गया।

16 सितंबर 2016 से मैंने अपने डेयरी की शुरुआत की। 25 लाख रुपए लगाकर मैंने बिजनेस शुरू किया। इससे कम पैसे भी ये बिजनेस शुरू किया जा सकता है। पहले 8 मुर्रा भैंस हरियाणा से लेकर आया। अब मेरे पास 30 मवेशी हैं। एक भैंस की कीमत 90 से 1.5 लाख के बीच है। डेयरी में पूरा सिस्टम अत्याधुनिक है।

उच्च प्रजाति दुधारू पशु (मुर्रा बफेलो) द्वारा दूध में ज्यादा कैल्शियम और प्रोटीन होता है। मैंने शुरू से ही सोचा था कि अत्याधुनिक प्लांट ही बैठाना है और मैं इसमें सफल भी हुआ।

मशीनों से निकाल रहे दूध

डेयरी फॉर्म के संचालक सिसौदिया ने बताया कि दूध दुहने का पूरा काम मशीनों द्वारा किया जा रहा है। दूध निकालने से मात्र 2-3 घंटे के अंदर मिलावट रहित दूध एयर पाइट पैकिंग में ग्राहकों तक पहुंचाया जाता है।

कुछ ही दिनों में दोगुनी हुई मांग

इस बिजनेस की सफालता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कुछ ही दिनों में दूध की मांग दोगुनी हो गई। 250 से 300 लीटर दूध का उत्पादन प्रतिदिन हो रहा है। 500 से अधिक पैकेट शहर भेजे जा रहे हैं। सिसौदिया ने बताया बहुत जल्द वे गिर गाय का भी फॉर्म हाउस बनाने की तैयारी शुरू करेंगे।

साफ-सफाई कर रखा जाता है ध्यान

सिसौदिया बताते हैं कि सभी भैंसों को डेटॉल फ्लोरिंग-लाईजोल से सफाई की जाती है ताकि उनमें किसी प्रकार का इंफेक्शन न हो। पशु विशेषज्ञ नियमित पशुओं की जांच करते हैं। परिसर की भी विशेष सफाई की जाती है ताकि पूरा वातारण प्रदूषण मुक्त रहे। मवेशियों के लिए फोगर्स लगाए गए हैं।

जाने यूरिया के ईस्तमाल से पराली को प्रोटीन पशु खुराक बनाने का तरीका

पशुओं के लिए तूड़ी/पराली को यूरिया से उपचार करने का तरीका भैंसों/गायों के रोयों में स्थित सूक्ष्म जीव यूरिया को तोड़कर अपनी जीव प्रोटीन बनाने के लिए प्रयोग कर लेते हैं जो पशु की ज़रूरतों को पूरा करती है।

इसलिए पशुओं के वितरण में 1 प्रतिशत यूरिये का प्रयोग करने से वितरण में यूरिया अच्छी तरह मिक्स होना चाहिए और यूरिया की डलियां नहीं होनी चाहिए। पशुओं के चारे के लिए यदि तूड़ी/पराली को यूरिये से उपचार करके प्रयोग करते हैं तो तूड़ी/ पराली के खुराकी गुणों में वृद्धि की जा सकती है और उपचारित पराली को सूखे तौर पर प्रयोग करके पशुओं की खुराक में प्रोटीन की कमी को दूर भी किया जा सकता है।

यूरिये से कैसे उपचारित की जाये तूड़ी?

तूड़ी/पराली को यूरिये से उपचार करने के लिए 4 क्विंटल तूड़ी या कुतरी हुई पराली लें और इसे ज़मीन पर बिछा लें। फिर 14 किलो यूरिये को 200 लीटर पानी में घोल लें और तूड़ी/पराली पर छिड़क लें ताकि सारी तूड़ी/पराली गीली हो जाये।

अच्छी तरह मिलाने के बाद इसे दबाकर 9 दिनों के लिए रखें। 9 दिनों के बाद उपचारित की हुई तूड़ी तैयार हो जाती है। यह गुणकारी और नर्म हो जाती है।

किस तरह खिलानी है?

खिलाते समय तूड़ी को एक तरफ से ही खोलें और कुछ देर हवा लगने दें। यदि हवा नहीं लगवाते तो अमोनिया गैस जो बनी होती है वह पशु की आंखों में चुभने लगती है। फिर पशु को थोड़ा थोड़ा रिझाओ। उपचारित तूड़ी को प्रति 4 किलो के हिसाब से हरे चारे में मिलाकर बड़े पशुओं को खिलई जा सकती है।

नोट – इसका प्रयोग, घोड़े, सुअरों और 6 महीने से कम उम्र के पशुओं के लिए ना किया जाये

स्त्रोत – गुरू अंगद देव वैटनरी यूनिवर्सिटी, लुधियाना

पशुओं को चॉकलेट खिलाकर बढ़ा रहे दूध उत्पादन,ऐसे करें त्यार

अक्सर बच्चों और युवाओं को तो आपने चॉकलेट खाते देखा होगा लेकिन प्रदेश के कुछ जिलों के पशुपालक अपने पशुओं को एक खास तरह की चॉकलेट खिला रहे है। यह चॉकलेट खासकर पशुओं के लिए बनाया गया है जिसे खाकर पशुओं में दूध उत्पादन बढ़ रहा है।

शाहजहांपुर जिले से लगभग 20 किलोमीटर दूर निगोही ब्लॉक के छतैनी गाँव में रहने वाले कृष्ण कुमार मिश्रा (35 वर्ष) पिछले आठ वर्षों से आधुनिक डेयरी चला रहे है। कृष्ण कुमार अपने पशुओं को चॉकलेट खिलाकर अच्छा दूध उत्पादन कर रहे है। कृष्ण बताते हैं, चॉकलेट खिलाने से पशुओं का पेट तो नहीं भरता है लेकिन पशुओं में जो न्यूट्रीशियन की कमी को पूरा करता है।

आईवीआरआई ने विकसित की है पशुओं के लिए चॉकलेट

बरेली के इज्ज़तनगर में स्थित भारतीय पशुचिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) द्वारा पशुओं के लिए ये चॉकलेट विकसित की गई थी। इस चॉकलेट को यूरिया मोलासिस मिनिरल ब्लॉक के नाम से जाना जाता है। पशुओं के शरीर में होने वाली खनिज और पोषण तत्वों की पूर्ति के लिए इस चॉकलेट को बनाया गया है। इस चॉकलेट से पशुओं की प्रजनन क्षमता का भी विकास होता है।

आईवीआरआई के न्यूट्रीशियन विभाग के विभागध्यक्ष डॉ. पुतान सिंह बताते हैं,” इस चॉकलेट को बनाने के लिए गेहूं का चोकर(चावल),खल (सरसो,ज्वार),यूरिया, खनिज लवण (कैल्शियम, फास्फोरस, मैग्नीशियम, जिंक, कॉपर आदि) नमक का प्रयोग किया गया है। वो आगे बताते हैं,”एक वयस्क पशु एक दिन में लगभग 500-600 ग्राम की मात्रा में इसका सेवन करें। इस चॉकलेट को जुगाली करने वाले पशु खा सकते है।

500-600 ग्राम चॉकलेट पशुओं के लिए पर्याप्त बता रहे हैं पशुवैज्ञानिक

पशुओं की इस चॉकलेट को बनाने के लिए मशीन भी बनाई गई है, जिससे एक दिन में करीब 150 से चॉकलेट बनाई जा सकती है। आईवीआरआई में चॉकलेट बनाने की ट्रेनिंग भी दी जाती है। इसको सीखकर पशुपालक रोजगार के तौर पर भी अपना सकते हैं। इस चॉकलेट को बनाने के लिए आप सीतापुर जिले के कृषि विज्ञान केंद्र-2 में भी संपर्क कर सकते है।

आईवीआरआई के सेवानिवृत डॉ. ब्रजलाल इस चॉकलेट के बारे में बताते हैं, ”अगर कोई पशु दीवार और ईंट चाटता है तो यह चॉकलेट उसको रोकती है। ये चॉकलेट हरे चारे की कमी को भी पूरा करता है।’यह पशुओं के पाचन तंत्र को ठीक करता है और दूध उत्पादन को भी बढ़ता है।

ये है 6 लाख की गाय लक्ष्मी, हर रोज देती है 60 लीटर दूध

भारत दूध उत्पादन में विश्व में दूसरे नंबर पर है। यह इसलिए संभव हो पाया है क्योंकि लोग डेयरी उद्योग में लगातार प्रयासरत हैं। इसी तरह का एक उदाहरण हरियाणा के करनाल जिले के दादुपुर गांव का है।

यहां एक नेशनल अवार्डी गाय एक दिन में 60 लीटर दूध देती है। औसत निकाला जाए तो हर घंटे में लगभग ढाई लीटर दूध दे रही है।

ब्यूटी में है चैंपियन का जीत चुकी है खिताब

डेयरी चला रहे राजबीर आर्य बताते हैं कि होल्सटीन फ्रिसन नस्ल की इस गाय का नाम लक्ष्मी है। लक्ष्मी दूध देने में तो अव्वल है ही लेकिन इसने अपनी ब्यूटी के लिए भी राष्ट्रीय स्तर के पशु मेलों में इनाम जीते हैं। मुक्तसर पंजाब व राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान में ब्यूटी चैंपियन रह चुकी है।

ये है खुराक

लक्ष्मी हर रोज 50 किलोग्राम हरा चारा, 2 किलोग्राम सूखा तूड़ा और 14 किलो दाना खाती है। लक्ष्मी व अन्य पशुओं की देखभाल में 6 आदमी दिन-रात लगे रहते हैं। लक्ष्मी का जन्म राजबीर के घर ही हुआ था, जबकि इसकी मां को वे पंजाब से लेकर आए थे।

5 लाख कीमत लगने पर लक्ष्मी को बेचने को तैयार नहीं है राजबीर

राजबीर बताते हैं कि जनवरी के महीने में बैंगलुरू से गाय खरीदने के लिए उसके फार्म पर लोग आए थे। उन्होंने इसकी कीमत 5 लाख रुपए लगाई थी। इस कीमत पर भी राजबीर ने गाय को नहीं बेचा।

डेयरी उद्योग के 15 लाख रुपए सालाना कमा रहे हैं राजबीर

डेढ़ एकड़ भूमि पर बने राजबीर के फार्म पर फिलहाल 75 गाय हैं। जिनमें से 60 होल्सटीन फ्रिसन, 10 जर्सी और 5 साहिवाल नस्ल की है। इस मौसम में हर रोज 800 लीटर दूध उत्पादन हो रहा है।

जिसमें से कुछ शहर में बेचने जाते हैं, बाकी को अमूल डेयरी भेजा जाता है। वे पिछले 18 वर्ष से डेयरी उद्योग से जुड़े हुए हैं। 1998 में मात्र 5 गाय से शुरूआत की थी। अब वे 15 लाख रुपए सालाना कमा रहे हैं।

जाने दूध में घी(फैट) बढाने का पक्का फार्मूला

गाय या भैंस के दूध की कीमत उसमें पाए जाने वाले घी की मात्रा पर निर्भर करती है। यदि घी अधिक तो दाम चोखा और घी कम तो दाम भी खोटा। ऐसे में पशुपालक अपने दुधारू पशु को हरे चारे और सूखे चारे का संतुलित आहार देकर दूध में घी की मात्रा को बढ़ा सकते हैं।

यूं तो हर पशु के दूध में घी की मात्रा निश्चित होती है। भैंस में 06 से 10 फीसदी और देशी गाय के दूध में 04 से 05 प्रतिशत फैट (वसा) होता है। होलस्टन फ्रीजियन संकर नस्ल की गाय में 3.5 प्रतिशत और जर्सी गाय में 4.2 प्रतिशत फैट होता है।

जाड़े के दिनों में पशु में दूध तो बढ़ जाता है, लेकिन दूध में घी की मात्रा कुछ कम हो जाती है। इसके विपरीत गर्मियों में दूध कुछ कम हो जाता है, पर उसमें घी बढ़ जाता है। पशु विशेषज्ञों को मानना है कि यदि पशुपालक थोड़ी से जागरूकता दिखाएं और कुछ सावधानियां बरतें तो दूध में घी की मात्रा बढ़ायी जा सकती है।


इसमें प्रमुख है पशु को दिया जाने वाला आहार। पशुपालक सोचते हैं कि हरा चारा खिलाने से दूध और उसमें घी की मात्रा बढ़ती है, लेकिन ऐसा नहीं है। हरे चारे से दूध तो बढ़ता है, लेकिन उसमें चर्बी कम हो जाती है।

इसके विपरीत यदि सूखा चारा/ भूसा खिलाया जाए तो दूध की मात्रा घट जाती है। इसलिए दुधारू जानवर को 60 फीसदी हरा चारा और 40 फीसदी सूखा चारा खिलाना चाहिए। इतना ही नहीं, पशु आहार में यकायक बदलाव नहीं करना चाहिए। दूध दोहन के समय भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि पूरा दूध निकाल लिया जाए।

बछड़ा/ पड़ा को आखिरी का दूध न पिलाएं, क्योंकि घी की मात्रा आखिरी दूध में सर्वाधिक होती है। दूध और घी की अच्छी मात्रा के लिए बुंदेलखंड के वातावरण में भदावरी प्रजाति की भैंस सर्वाधिक अच्छी मानी गई है। इसके अलावा सुरती प्रजाति का भी पालन किया जा सकता है।

डेढ़ लाख की मशीन से किसान घर पर त्यार कर सकते है फीड (पशु आहार)

खेती बाड़ी के साथ-साथ किसान पशुपालन से अपनी आय को बढ़ाने का प्रयास करता है। पशुओं को खिलाने के लिए किसान बाजार से पशु आहार खरीदता है। जो उसे काफी महंगा पड़ता है। एक तरीके से किसान पशु आहार पर होने वाला खर्च बचा सकता है साथ ही मुनाफा भी कमा सकता है।

किसानों को पशु आहार पर होने वाले खर्च को बचाने के साथ ही किसानों की आय में अतिरिक्त वद्धि कैसे हो इस बारे में केंद्रीय बकरी अनुसंधान केंद्र मथुरा (सीआईआरजी) के बकरी पोषण विभाग के वैज्ञानिक डॉ. रवींद्र कुमार बता रहे हैं।

डॉ. रवींद्र कुमार बताते हैं, “पशु आहार पशुओं के स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है। ज्यादातर किसान पशु आहार बाजार से लाते हैं जो काफी महंगा पड़ता है। किसान फीड प्लेटिंग मशीन लगाकर घर पर पैलेट फीड (पशु आहार) बना सकते हैं और बाजार में बेच कर मुनाफा भी कमा सकते हैं।”

डॉ. रवींद्र कुमार आगे बताते हैं, “गाँव में किसान एक समूह बना कर फीड प्लेटिंग मशीन लगा सकते हैं। फीड प्लेटिंग मशीन एक दिन में 10 कुंतल पैलेट फीड तैयार करता है। किसानों का समूह पैलेट फीड को अपने पशुओं को खिलाने में प्रयोग करने के साथ-साथ बेच भी सकते हैं। जिससे अलग से मुनाफा कमा सकते हैं।

फीड प्लेटिंग मशीन लगभग डेढ़ लाख की आती है इसलिए किसानों का एक समूह इसे ले सकता है। जिससे एक किसान पर भार भी नहीं पड़ता है। फीड प्लेटिंग मशीन का रख रखाव भी बड़ा सरल है। इस मशीन की डाइ 10 वर्ष एक बार बदलवानी पड़ती है। ये मशीन किसान पंजाब, इंदौर में आसानी से मिलती है।”

एक घंटे में एक कुंतल पैलेट फीड का होता है प्रोडक्शन

फीड प्लेटिंग मशीन को एक दिन में 10 घंटे चलाया जा सकता है। प्रतिघंटे यह मशीन एक कुंतल पैलेट फीड का प्रोडक्शन करती है। यानी एक दिन में 10 कुंतल पैलेट फीड का उत्पादन होता है।

इस तरह से बनता है पैलेट फीड

फीड प्लेटिंग मशीन से पैलेट फीड बनाने में 40 प्रतिशत दाना (मक्का, खली, चोकर, चूनी, नमक, मिनरल मिक्चर) और बाकी का 60 प्रतिशत सूखा चारा (भूसा, पैरा, सूखी पत्ती) होता है। दाने में 57 प्रतिशत मक्का, 20 प्रतिशत मूंगफली की खली, 20 प्रतिशत चोकर, 2 प्रतिशत मिनरल मिक्चर, 1 प्रतिशत नमक होना चाहिए। सूखे चारे में गेहूं का भूसा, सूखी पत्ती, धान का भूसा, उरद कर भूसा या अरहर का भूसा होना चाहिए।

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गाय भैंस का दूध बढाने का रामबाण घरेलु उपाय

जो लोग गाय भैंस का अधिक दूध लेने के लिए उनको टीके लगाते हैं वो मानवता के सबसे बड़े दुश्मन हैं. वो कभी सुखी नहीं रह पाएंगे. वो दुसरो को ज़हर देते हैं तो भगवान् उनके घर भी कभी अमृत से नहीं भरेगा. वो ज़हर एक दिन उनको ले डूबेगा.

आज हम आपको बताने जा रहें हैं गाय भैंस का दूध बढाने के रामबाण घरेलु उपाय. ये उपाय बिलकुल सरल है और आपको बहुत जल्दी ही इसके नतीजे भी मिलेंगे. ज़रूर जाने और अपनाएं.

सामग्री :-

  • 250 ग्राम गेहू दलिया,
  • 100 ग्राम गुड सर्बत(आवटी),
  • 50ग्राम मैथी ,
  • 1 कच्चा नारियल ,
  • 25-25 ग्राम जीरा व अजवाईन.

उपयोग:-

  • सबसे पहले दलिये ,मैथी व गुड को पका ले बाद मे उसमे नारियल को पिसकर डाल दे.ठण्डा होने पर खिलाये.
  • ये सामग्री 2 महीने तक केवल सुबह खाली पेट ही खिलाये.
  • इसे गाये को बच्चा देने से एक महीने पहले शूरू करना और बच्चा देने के एक महीने बाद तक देना.
  •  नोट :- 25-25 ग्राम अजवाईन व जीरा गाये के ब्याने के बाद केवल 3 दिन ही देना. बहुत अच्छा परिणाम ले सकते हे.
  • ब्याने के 21 दिन तक गाये को सामान्य खाना ही दे.
  •  गाये का बच्चा जब 3 महीने का हो जाये या जब गाये का दूध कम हो जाये तो उसे 30 gm/दिन जवस औषधि खिलाये दूध कम नही होगा।

4 लोग मिलकर निकाल पाते हैं इस गाय का दूध, जानिए क्या है वजह

भारत में गाय की पूजा की जाती है। इसके अलावा गाय भारत की अर्थव्यस्था की रीढ़ भी रही है। इसलिए यह बहुत उपयोगी पशु माना जाता है।बता दें गाय से व्यवसाय आज पूरी दुनिया में फैला है।

शहरीकरण की ओर बढ़ रहे भारत में आज भी गांव में लोग गाय पालना पसंद करते हैं क्योंकि उन्हें इससे शुद्ध दूध तो मिलता ही है साथ ही ये बड़ा आजीविका का साधन भी बन गया है। इसलिए लोग अब गाय खरीदने से पहले ये देखते हैं कि कौनसी नस्ल की गाय सबसे ज्यादा दूध देती है।

आज हम बात करेंगे ऐसी नस्ल वाली गाय की जो इतना दूध देती है कि उसे निकालने के लिए 4 लोगों की जरूरत पड़ती है। भारत की इस अनोखी गाय की नस्ल का नाम है ‘गीर’

एक रिपोर्ट के मुताबिक ये गाय प्रतिदिन 50 से 80 लीटर दूध देती है। इस गाय के नाम के साथ ‘गीर’ इसलिए जुड़ा क्योंकि ये गाय गुजरात के गीर में पाई जाती है। इस गोवंश का मूल स्थान काठियावाड़ बताया जाता है। इसकी दूध देने की क्षमता के कारण ये नस्ल विश्व विख्यात हो चुकी है। इसकी नस्ल आपको विश्व के कई देशों में देखने को मिल जाएगी।

पंजाब में एक ऐसी गाय आ चुकी है, जिसका दूध दोहने के लिए एक नहीं, दो नहीं, बल्कि 4 लोग लगते हैं। जी हां, यह बिल्कुल सच है क्योंकि यह गाय प्रति दिन 61 किलो दूध देती है। सबसे अधिक ब्रासिल और इजरायल के लोग इस नस्ल की गाय को पालना पसंद करते हैं।

बता दें गीर गाय सालाना 2000 से 6000 लीटर दूध देने की क्षमता रखती है। वहीं दूसरे नंबर पर आती है साहिवाल गाय जो 2000 से 4000 लीटर दूध देती है। तीसरे स्थान पर लाल सिंधी गाय है। हालांकि ये गाय भी 2000 से 4000 लीटर दूध देती है लेकिन पशु नस्ल जानने वाले इसे तीसरे स्थान पर ही आंकते हैं। चौथे स्थान पर राठी, पांचवे पर थरपार्कर और छठे स्थान पर कांक्रेज है।