पशु खरीदने जा रहे हैं तो रखें इन बातों का ध्यान ,नहीं तो हो सकते है ठगी का शिकार

ज्यादातर पशुपालक दूसरे राज्यों से महंगी कीमत पर दुधारू पशु तो खरीद लेते हैं। लेकिन बाद में पता चलता है कि दूध का उत्पादन उतना नहीं हो रहा जितना बिचौलिए या व्यापारी ने बताया था और कई बार पशु को कोई गंभीर बीमारी होती है जो कभी ठीक नहीं हो सकती ऐसे में पशुपालकों को आर्थिक नुकसान भी होता है।

ऐसे में आप निचे दी हुई बातों का ध्यान रख कर ठगी से बच सकते है और आपको सही नस्ल का पशु चुनने में भी आसानी होगी

शारीरिक बनावट : अच्छे दुधारू पशु का शरीर आगे से पतला और पीछे से चौड़ा होता है। उस के नथुने खुले हुए और जबड़े मजबूत होते हैं। उस की आंखें उभरी हुई, पूंछ लंबी और त्वचा चिकनी व पतली होती है। छाती का हिस्सा विकसित और पीठ चौड़ी होती है। दुधारू पशु की जांघ पतली और चौरस होती है और गर्दन पतली होती है। उस के चारों थन एकसमान लंबे, मोटे और बराबर दूरी पर होते हैं।

दूध उत्पादन कूवत : बाजार में दुधारू पशु की कीमत उस के दूध देने की कूवत के हिसाब से ही तय होती है, इसलिए उसे खरीदने से पहले 2-3 दिनों तक उसे खुद दुह कर देख लेना चाहिए. दुहते समय दूध की धार सीधी गिरनी चाहिए और दुहने के बाद थनों को सिकुड़ जाना चाहिए।

आयु : आमतौर पर पशुओं की बच्चा पैदा करने की क्षमता 10-12 साल की आयु के बाद खत्म हो जाती है। तीसरा चौथा बच्चा होने तक पशुओं के दूध देने की कूवत चरम पर होती है, जो धीरे धीरे घटती जाती है। दूध का कारोबार करने के लिए 2-3 दांत वाले कम आयु के पशु खरीदना काफी फायदेमंद होता है। पशुओं की उम्र का पता उन के दांतों की बनावट और संख्या को देख कर चल जाता है। 2 साल की उम्र के पशु में ऊपर नीचे मिला कर सामने के 8 स्थायी और 8 अस्थायी दांत होते हैं। 5 साल की उम्र में ऊपर और नीचे मिला कर 16 स्थायी और 16 अस्थायी दांत होते हैं। 6 साल से ऊपर की आयु वाले पशु में 32 स्थायी और 20 अस्थायी दांत होते हैं।

वंशावली : पशुओं की वंशावली का पता लगने से उन की नस्ल और दूध उत्पादन कूवत की सही परख हो सकती है। हमारे देश में पशुओं की वंशावली का रिकार्ड रखने का चलन नहीं है, पर बढि़या डेरी फार्म से पशु खरीदने पर उस की वंशावली का पता चल सकता है।

प्रजनन : सही दुधारू गाय या भैंस वही होती है, जो हर साल 1 बच्चा देती है। इसलिए पशु खरीदते समय उस का प्रजनन रिकार्ड जान लेना जरूरी है। प्रजनन रिकार्ड ठीक नहीं होने, बीमार और कमजोर होने से पाल नहीं खाने, गर्भपात होने, स्वस्थ बच्चा नहीं जनने, प्रसव में दिक्कतें होने जैसी परेशानियां सामने आ सकती हैं।

ब्याने से पहले पशुओं की देखभाल और खुराक के संबंधी जानकारी जरूरी पढ़े

यह जानकारिया पशु के ब्याने से पहले पता होनी चाहिए

ब्याने से पहले दुधारू पशुओं की देखभाल और खुराक के संबंधी जानकारी होनी बहुत जरूरी है। पशुओं को अपने शरीर को सेहतमंद रखने के अलावा, दूध देने के लिए और अपने पेट में पल रहे कटड़े/ बछड़े की वृद्धि के लिए खुराक की जरूरत होती है।

यदि गाभिन पशु को आवश्यकतानुसार खुराक ना मिले, तो इनकी अगले ब्याने में दूध देने की क्षमता कम हो जाती है और कमज़ोर कटड़े/बछड़े पैदा होते हैं जो कि इन बीमारियों का अधिक शिकार होते हैं।

  • ब्याने से कुछ दिन पहले यदि आप पशु को सरसों का तेल देते हो तो प्रतिदिन 100 ग्राम से अधिक नहीं देना चाहिए।
  •  ब्याने से 4-5 दिन पहले पशुओं को कब्ज नहीं होनी चाहिए। यदि ऐसा हो तो अलसी का दलिया देना चाहिए।

  • यदि पशु खुले स्थान में हों, तो उन्हें ब्याने से 15 दिन पहले बाकी पशुओं से अलग कर दें और साफ सुथरे कीटाणु रहित कमरे में रखें।
  • पशु से अच्छा व्यवहार करना चाहिए और दौड़ाना नहीं चाहिए और ना ही ऊंची नीची जगहों पर जाने देना चाहिए।
  • गर्भावस्था के आखिरी महीने में दुधारू पशुओं के हवानों को हर रोज़ कुछ मिनटों के लिए अपने हाथ से सिरहाना चाहिए ताकि उन्हें इसकी आदत पड़ जाए।

  • इस तरह करने से इनके ब्याने के उपरांत दूध निकालना आसान हो जाता है।
    ब्याने वाले पशु को हर रोज़ दिन में 5-7 बार ध्यान से देखना चाहिए।
  • पशुओं को हर रोज़ धातुओं का चूरा 50-60 ग्राम और 20-30 ग्राम नमक आदि भी देना चाहिए।

तीन नस्लों के मेल से गाय की नई प्रजाति विकसित, देगी 55 लीटर तक दूध

वैज्ञानिकों ने तीन नस्लों के मेल से गाय की नई प्रजाति विकसित की है। इसे नाम दिया है ‘हरधेनू’। यह 50 से 55 लीटर तक दूध दे सकती है। 48 डिग्री तापमान में सामान्य रहती है। यह 18-19 महीने में प्रजनन करने के लिए सक्षम है। जबकि अन्य नस्ल करीब 30 माह का समय लेती है। ‘हरधेनू’ प्रजाति में 62.5% खून हॉलस्टीन व बाकी हरियाना व शाहीवाल नस्ल का है। यह कमाल किया हिसार के लुवास विवि के अनुवांशिकी एवं प्रजनन विभाग के वैज्ञानिकों ने।

कामधेनू की तर्ज पर नाम :डॉ. बीएल पांडर के अनुसार कामधेनू गाय का शास्त्रों में जिक्र है कि वह कामनाओं को पूर्ण करती है। इसी तर्ज पर ‘हरधेनू’ नाम रखा गया है। नाम के शुरुआत में हर लगने के कारण हरियाना की भी पहचान होगी।

पहले 30 किसानों को दी : वैज्ञानिकों ने पहले करीब 30 किसानों को इस नस्ल की गाय दीं। वैज्ञानिकों ने अब यह नस्ल रिलीज की है। अभी इस नस्ल की 250 गाय फार्म में हैं। कोई भी किसान वहां से इस नस्ल के सांड का सीमन ले सकता है।

जर्सी को पीछे छोड़ा :‘हरधेनू’ ने दूध के मामले में आयरलैंड की नस्ल ‘जर्सी’ को भी पीछे छोड़ दिया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि ‘जर्सी’ नस्ल की गाय आैसत 12 लीटर और अिधकतम 30 लीटर तक दूध दे सकती है। वहीं, ‘हरधेनू’ औसत 16 लीटर और अधिकतम 50 से 55 लीटर दूध दे सकती है।

ऐसे तैयार की नस्ल : हरियाना नस्ल की गाय के अंदर यूएसए व कनाडा की हॉलस्टीन और प्रदेश की शाहीवाल और हरियाना नस्ल का सीमन छोड़ा गया। तीन नस्लों के मेल से तैयार हुए गाय के बच्चे को ‘हरधेनू ‘ नाम दिया गया।

45 साल शोध :1970 में हरियाणा कृषि विवि की स्थापना हुई। तभी गाय की नस्ल सुधार के लिए ‘इवेलेशन ऑफ न्यू ब्रीड थ्रू क्राॅस ब्रीडिंग एंड सिलेक्शन’ को लेकर प्रोजेक्ट शुरू हुआ। 2010 में वेटनरी कॉलेज को अलग कर लुवास विश्वविद्यालय बनाया गया। शंकर नस्ल की गाय की नई प्रजाति ‘हरधेनू ‘ को लेकर चल रही रिसर्च का परिणाम 45 साल बाद अब सामने आया है।

 

पशुओं में आस करवाने के बावजूद भी गर्भ ना ठहरना की समस्या के कारण और इलाज ।

जिस गाभिन में तीन बार आस करवाने के बावजूद भी गर्भ नहीं ठहरता, वह रिपीटर करार दी जाती है। इस समस्या को अक्सर रिपीट ब्रीडर भी कहा जाता है। यह समस्या आजकल बहुत ज्यादा आ रही है। इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे कि बच्चेदानी में गांठ आदि।

किसान भाई यह नहीं देखते कि आस करवाते समय ताप 22 दिन बाद है या समय से पहले है या बाद में। यदि 17-18वें दिन बोलती है तो बीमारी और है यदि 26-28वें दिन बोलती है तो बीमारी और है। क्या बीमारी मिली।

क्या वैटरनी डॉक्टर आया और टीका लगाकर चला गया, क्या उसने पूछा कि पिछले महीने कब ताप में आई थी। बहुत सारी ऐसी जानकारियां होती हैं जिनका किसान भाइयों को खुद रिकॉर्ड रखना चाहिए जैसे कि ताप में आने का समय, कितने दिन बाद ताप में आई आदि।

बाकी आपको शायद पता ही हो कि तारें सिर्फ शीशे की तरह बनी होनी चाहिए। यदि तारें घुसमैली हों या तारों में छेद हो तो पशु को कभी नए दूध नहीं करवाना चाहिए। बल्कि एक अच्छे माहिर डॉक्टर से बच्चेदानी की जांच करवाके दवाई भरवा देनी चाहिए।

इसके अलावा गाभिनों के बार बार गर्भपात के कुछ अन्य कारण जैसे :

  •  जनन अंगों में जमांदरू नुक्स
  •  कम शारीरिक भार
  •  शरीर में हारमोन का संतुलन बिगड़ जाना
  •  गर्म वातावरण
  •  आस करवाने का प्रबंध
  •  ताप के लक्षणों और आस करवाने के सही समय की कम जानकारी

इलाज :
इस तरह की समस्या के इलाज के लिए कुछ इलाज आपसे शेयर कर रहे हैं जो कि पशु पलन क व्यवसाय में काफी महत्तवपूर्ण हैं।

  •  पहली बात आप पशु को संतुलित डाइट ज़रूर दें। जब आप पशु को क्रॉस करवायें उससे 5 मिनट के अंदर अंदर 125 ग्राम रसौद जो कि पंसारी की दुकान या आयुर्वेदिक सामान वाली दुकान से मिल जाएगी उसे पशु को दें।
  •  यदि तारें साफ आ रही हैं तो एक होमियोपैथिक दवाई को सीरिंज से सीधे मुंह के द्वारा पशु को दिन में तीन टाइम देते रहें।

USA की नौकरी छोड़ गांव में बकरियां पाल रहा है साइंटिस्ट, ऐसे कमा रहा है लाखों रुपए

अमेरिका में जॉॅब करना हर किसी उच्चशिक्षित युवा का सपना होता है। कई युवा अमेरिका में जॉॅब के लिए प्रयास करते हैं। लेकिन महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले के साखखेर्डा गांव में रहने वाले एक युवा साइंटिस्ट ने अमेरिका की जॉॅब छोड़कर अपने गांव में बकरी पालन शुरू किया है। वह अब लाखों में कमा रहा है। साथ ही हजारों किसानों को मार्गदर्शन भी कर रहा है। उसका गोट फार्म देखने के लिए देशभर से हजारों लोग उसके गांव पहुंच रहे हैं।

किसानों हो रहा फायदा…

  • मूल रुप से चिखली तहसील के साखरखेर्डा गांव में रहने वाले डाॅ. अभिषेक भराड के पिता भागवत भराड सिंचाई विभाग में इंजीनियर थे।
  • उनका सपना था कि बेटा अच्छी पढ़ाई कर अच्छी सैलरी वाली नौकरी करें। अभिषेक ने उनका सपना पूरा किया और अमेरिका में अच्छी जॉॅब मिली।
  • डॉ. अभिषेक ने पंजाबराव देशमुख कृषि विद्यापीठ से 2008 में बीएससी करने के बाद अमेरिका से लुइसियाना स्टेट यूनिवर्सिटी से मास्टर्स (एमएस.) आणि डाक्टरेट (पीएचडी) पूरी की।
  • 2013 में अभिषेक को साइंटिस्ट के तौर पर लुइसियानाा यूनिवर्सिटी में नौकरी भी लग गई। उन्होंने दो साल तक नौकरी भी की।
  • उनका नौकरी में मन नही लगता था। इस बारे में उन्होंने अपने घरवालों से भी बात की। उन्होंने अपना इंडिया वापस लौटने का निर्णय उन्हें बताया।

घरवालों ने भी उनकी बात मानी। इसके बाद वे अपने गांव आए और घरवालों से कहा कि वे एग्री रिलेटेड बिजनेस शुरु करना चाहते हैं।

एेसे हुई शुरूआत

  • अभिषेक ने गोट फार्मिंग शुरु करने का फैसला किया। इसके लिए उन्होंने पिछले साल 20 एकड़ जमीन लीज पर ली।
  • वहीं एक गोट शेड भी किराए से लिया। साथ ही 120 बकरियां खरीदी। इसके लिए उन्हें 12 लाख रुपए इनवेस्ट करने पड़े।
  • एक साल के भीतर उनकी बकरियों की संख्या दोगुना से ज्यादा हो गई। अब उनके पास 350 बकरियां है।
  • पिछले साल उन्हें बकरियां बेच 10 लाख रुपए मिले थे। वहीं आगे बकरियों की संख्या बढ़ने पर मुनाफा और ज्यादा होगा।

कर रहे हैं आधुनिक खेती

  • डाॅ. अभिषेक भराड ने एग्री में पीएचडी की है। वे लुइसियानाा यूनिवर्सिटी में दो साल तक साइंटिस्ट के तौर पर काम कर चुके हैं।
  • इसलिए वे अपनी खेती में कुछ नया करना चाहते थे। उन्होंने ऑरगैनिक फार्मिंग शुरू की है। साथ ही देशी मुर्गीपालन शुरू किया है।

किसानों को हो रहा है फायदा

  • अभिषेक अपने साथ अन्य लोगों की भी तरक्की करना चाहते हैं। वे युवा किसानों को खेती को लेकर मार्गदर्शन करते हैं।
  • इसके लिए उन्होंने किसानों का एक ग्रुप बनाया है। ग्रुप के माध्यम से किसानों को लिए मुफ्त वर्कशॉप का आयोजन किया जाता है। महाराष्ट्र के कई किसानों का इससे फायदा हुआ है।

युवाओं को दी ये नसीहत

  • अभिषेक भराड ने बताया कि जिन युवाओं को अपनी क्षमता में विश्वास है उन्हें बिजनेस में आना चाहिए।
  • खुद के स्किल डेवलप कर अपना खुद का ब्रांड बनाना चाहिए। इससे किसी के सामने नौकरी मांगने की नौबत नहीं आएगी।

पांचवी पास महिला आज करती हैं 56 हजार लीटर दूध का कारोबार

हमारे आस-पास कई ऐसे लोग हैं, जिन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि कामयाबी के लिए बड़ी डिग्रियों की जरूरत नहीं होती। जरूरत होती है, तो सिर्फ लगन और सच्ची मेहनत की। आज हम आपको एक ऐसी महिला की कहानी बताने जा रहे हैं, जो गाँव में रहने के बाद भी बाकी महिलाओं के लिए मिसाल बन चुकी हैं। लखनऊ की बिटाना देवी ने सीमित संसाधन में अपनी कामयाबी की जो कहानी लिखी है वह सच में बेहद प्रेरणादायक है।

बिटाना की शादी सिर्फ 15 साल की उम्र में ही हो गयी थी, शिक्षा के नाम पर उनके पास सिर्फ पिता का आर्शीवाद था। शादी में पिता से भेंट स्वरुप मिले एक गाय और एक भैंस ही उनकी कमाई का एकमात्र जरिया था। अपनी गायों और बछड़ों को बच्चों जैसा प्यार देकर बिटाना आज एक सफल डेयरी फर्म की संचालिका हैं।

गांव में रहने वाली औरतों को लोग अक्सर असहाय समझते हैं। परन्तु पांचवी पास बिटाना देवी ने इस मिथ को गलत ठहरा दिया। उन्होंने महिला सशक्तिकरण की एक नई परिभाषा गढ़ते हुए दूसरी ग्रामीण महिलाओं को भी नई राह दिखाई है। निगोहां के मीरकनगर गांव से ताल्लुकात रखने वाली बिटाना ने अपने पिता के भेंट स्वरुप दिए गाय और भैंस का दूध बेचना प्रारंभ किया।

गाय और भैंस का दूध बेंचकर उसने एक गाय खरीद ली। सीमित संसाधनों के बीच दूध बेचकर अर्जित कमाई से वो निरंतर दुधारू मवेशियों की संख्या बढ़ाती चलीं गईं। साल 1996 में उन्होंने दुग्ध उत्पादन का व्यवसाय शुरू किया। धीरे-धीरे उन्होंने इस कारोबार में एक वर्चस्व स्थापित किया और 2005 से लगातार 10 बार सर्वाधिक दुग्ध उत्पादन के लिए गोकुल पुरूस्कार भी जीत रहीं।

अपने घर का खर्च भी वो अपने कमाए हुए पैसे से ही चलाती है। इन्हें देखकर और भी महिलाएं प्रेरित हुई और दुग्ध उत्पादन का व्यवसाय शुरू किया। इस समय बिटाना के पास 40 दुधारू पशु हैं। बिटाना रोज सुबह 5 बजे उठकर जानवरों को चारा पानी देती है, उनका दूध निकालती हैं और डेरी तक दूध पहुँचाने का काम भी वह स्वयं करती हैं।

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि इन्होंने साल 2014-2015 में कुल 56,567 लीटर दूध का उत्पादन किया। धीरे-धीरे बिटाना ने इसे व्यापार बना लिया, लगभग 155 लीटर दूध रोजाना पराग डेयरी को सप्लाई करती हैं। वर्तमान में उनके फार्म से रोजाना 188 लीटर दूध का उत्पादन होता है। उनके प्रयासों को देखते उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें गोकुल पुरस्कार से भी सम्मानित किया है। बिटाना बताती हैं कि औपचारिक रूप से उन्होंने साल 1985 से इस काम की शुरूआत की थी।

दरअसल आज लाखों का कारोबार करने वाली बिटाना को शुरुआती समय में आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा था लेकिन उन्होंने कठिन मेहनत के दम पर परिस्थितियों को बदल कर रख दिया और एक सफल उद्यमी के रूप में हमारे सामने खड़ी हैं।

News Source- hindi.kenfolios.com

अब सिर्फ 7 दिन में घर पर त्यार करें पौष्टिक हाइड्रोपोनिक्स चारा

वैज्ञानिकों ने एेसा चारा उगाया है, जिसे खाकर पशु 15 से 20 फीसदी तक ज्यादा दूध देने लगेंगे। इस विधि को हाइड्रोपोनिक्स कहते हैं। इसे अपनाकर कम लागत में चारा तैयार किया जा सकता है।

पशुओं की अच्छी नस्ल होने के बाद भी उत्पादन कम रह जाता है। पशुओं के लिए उचित आहार का प्रबंधन कर उत्पादकता के साथ ही आर्थिक स्थिति में भी सुधार लाया जा सकता है। जिले में पानी की कमी के कारण हरा चारे की फसल नहीं ले पाते हैं।

हाइड्रोपोनिक्स विधि से कम पानी में हरा चारा तैयार किया जा सकता है। इस विधि में हम कम पानी में दुधारु पशुओं के लिए पौष्टिक हरा चारा तैयार करने की यह मशीन किसानों के प्रदर्शन के लिए स्थापित की है।

कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक पशुपालन डॉ.रुपेश जैन ने बताया हाइड्रोपोनिक्स विधि से मक्का, ज्वार, बाजरा से हरे चारे को तैयार किया जा सकता है। इस विधि से तैयार चारे में पौष्टिक तत्वों की मात्रा परंपरागत चारे की तुलना में ज्यादा होती है। इसमें जगह भी कम लगती है।

ऐसे बनाए हाइड्रोपोनिक्स चारा

इस विधि से हरे चारे को तैयार करने के लिए सबसे पहले मक्का, ज्वार व बाजरा के दानों को 24 घंटे के लिए पानी में भिगोकर रखा जाता है। इसके बाद जूट के बोरे में ढककर अंकुरण के लिए रखा जाता है। अंकुरण निकलने के बाद इसे हाइड्रोपोनिक्स मशीन की ट्रे (2 बाय 1.5 फीट) में बराबर मात्रा में फैलाया जाता है। चौथे से दसवें दिन तक इसमें वृद्धि होती है।

इस दौरान ट्रे में 7 दिनों तक फौव्वारा के द्वारा दिन में 8 से 10 बार सिंचाई की जाती है। दसवें दिन एक ट्रे में लगभग 10 किलो तक हरा चारा तैयार हो जाता है। चारे की हाइट भी 6 से 8 इंच तक की हो जाती है।

इस विधि से तैयार चारे को 15 से 20 किलो तक दूध देने वाले पशुओं को खिलाया जा सकता है। पशुओं को खिलाने से दूध उत्पादन में 15 से 20 प्रतिशत तक की वृद्धि के साथ ही दूध में वसा की 10 से 15 प्रतिशत बढ़ोतरी होती है।

18-20 हजार होंगे खर्च

इस विधि को अपनाने के ज्यादा रुपए भी नहीं चुकाने होंगे। 50 ट्रे वाली मशीन के लिए 18 से 20 हजार रुपए का खर्च आएगा। जिसमें 5 ट्रेे प्रतिदिन 50 किलो हरा चारा निकलेगा। इससे 5 पशुओं को आहार दिया जा सकता है।

परंपरागत तरीके से चारा तैयार करने में 25 से 30 लीटर पानी की खपत होती है। वहीं इस विधि को अपनाकर 2 से 3 लीटर प्रतिदिन पानी में ही सिंचाई हो जाएगी।

हाइड्रोपोनिक्स चारा त्यार करने की जानकारी के लिए वीडियो भी देखें

हर महीने में 45 हज़ार की कमाई करवाती यह गाय

जगराओंके गांव गिद्दड़विंडी के सुखदेव सिंह की होलिस्टन फ्रिसियन (एचएफ) नस्ल की गाय एक दिन में 12 किलो डाइट खाकर 45 लीटर दूध देती है। इस गाय का महीने का खर्च लगभग नौ हजार रुपए है, जबकि सुखदेव सिंह को हर महीने 45 हजार की कमाई करवा रही है। बद्दोवाल में लगे पशु धन मेले में गाय के दूध की मात्रा देख उसे फर्स्ट प्राइज मिला।

हालांकि अभी गाय ने 25 दिन पहले से ही दूध देना शुरू किया है। सुखदेव सिंह के मुताबिक 45 दिन पूरे होने के बाद उनकी गाय का दूध 50 लीटर से ज्यादा हो जाएगा। यही नहीं, दूसरे नंबर पर भी उनकी ही एचएफ गाय रही, जो रोजाना 44 लीटर दूध देती है।

सामान्यत: इतना दूध नहीं दे पाती इस नस्ल की गाय

सुखदेव सिंह ने कहा कि उन्होंने 2004 में गायों को पालने का काम शुरू किया था। अब उनके पास लगभग पौने दो सौ गाये हैं। सभी एचएफ नस्ल की हैं। इनसे सर्दियों में वो 1200 क्विंटल और गर्मियों में 1400 क्विंटल दूध बेचते हैं। दूध बेचने के लिए उन्होंने वेरका से एग्रीमेंट किया है जो 32 से 33 रुपए प्रति किलो में दूध खरीदते हैं। सुखदेव कहते हैं कि जर्सी गाय के मुकाबले एचएफ गायों के दूध में फैट कम होता है।

सुखदेव सिंह ने बताया कि इससे पहले उनके पास एचएफ गाय थी, जो डेली 52 लीटर दूध देती थी। यह गाय उन्होंने नवांशहर के आदमी को तीन लाख रुपए में बेची थी। इस गाय ने मुक्तसर मेले में पहला स्थान हासिल किया था।

गिद्दड़विंडी के सुखदेव सिंह बताते हैं कि वो गाय को दलिया, फीड, सोयाबीन, साइलेज, मक्की का चारा आदि खिलाते हैं। हर रोज गाय की डाइट लगभग 12 किलो हो जाती है। इस पर 300 रुपए खर्च होते हैं। वो गाय को बांधकर नहीं रखते।

एचएफ गाय मूल रूप से हॉलैंड में पाई जाती है। वहां से सीमन लाकर देश में इसकी नस्ल तैयार की गई है। ये गायें 30 लीटर तक दूध तो दे देती हैं, लेकिन 44 से 45 लीटर दूध देना अनोखी बात है। -डॉ.राजीव भंडारी, पशुपालन महकमा

10 लाख में बिकी महज दो साल की कटड़ी

हिसार के नारनौंद का सिंघवा गांव। मुर्राह नस्ल की भैंस के लिए देश ही नहीं, विदेश में भी चर्चित। यहां किसान पशुओं को शाही अंदाज में पालते हैं। पशुपालकों की मेहनत से यहां दूध की नदियां बहती हैं तो यहां भैंस की कीमत लग्जरी कार से भी अधिक आंकी जाती है।

सिंघवा में जसवंत की मुर्राह नस्ल की दो वर्षीय कटड़ी लक्ष्मी इस बार दस लाख रुपये में बिकी है, जो क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी हुई है। ऐसा पहली बार हुआ है जब कोई दो साल की कटड़ी इतनी महंगी बिकी हो।

सिंघवा निवासी जसवंत पुत्र रणबीर सिंह ने 2012 में महम से 70 हजार रुपये में एक मुर्राह नस्ल की भैंस खरीदी थी और उसका नाम गिन्नी रख दिया था। गिन्नी की देखरेख शाही तरीके से की गई तो गिन्नी ने भी जसवंत को गिन्नियों से मालामाल कर दिया। क्योंकि गिन्नी की कटड़ी लक्ष्मी मात्र दो वर्ष की हुई थी तो लक्ष्मी की सुंदरता को देखकर देश प्रदेश के अनेक व्यापारी उसको खरीदने के इच्छुक थे। आखिरकार लक्ष्मी को पूर्व मुख्यमंत्री के गाव साघी के किसान कृष्ण हुड्डा ने दस लाख रुपये में खरीद लिया। इतनी कीमत में कटड़ी बिकना एक अहम बात है।

व्यावसायिक पहलु : लागत 70 हजार, दो साल में मुनाफा 10 लाख

दुनिया में शायद ही कोई धंधा हो, जिसमें दो साल में 13 गुना मुनाफा होता हो, पर मुर्राह की खेती में ऐसा संभव है। सिंघवा के किसान इसे साबित भी कर रहे हैं। बात गिन्नी की हो या लक्ष्मी, किसानों की मेहनत से यहां भैंस के थन से दूध की धारा के साथ समृद्धि पैदा हो रही है।

लक्ष्मी की मा भी दिखा चुकी है अपना दम

लक्ष्मी की मा गिन्नी ने भी लगातार तीन बार राष्ट्रीय स्तर पर परचम लहराया है। उसने सन 2013 में इडियन नेशनल चैम्पियनशिप दूध प्रतियोगिता जोकि पंजाब के मुक्तसर में आयोजित की गई थी उसमें प्रथम स्थान, सन 2015 में राष्ट्रीय डेयरी मेला करनाल में भी दूध प्रतियोगिता में भी प्रथम, चैम्पियन भैंस मेला हिसार में भी दूध प्रतियोगिता में भी प्रथम स्थान प्राप्त कर आज भी अनेक प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर लाखों रुपए इनाम के जीत रही है।

भैंसों के दम पर है दर्जनों किसान लखपती

गाव सिंघवा में दर्जनों किसान मुर्राह नस्ल की भैंसों को पाल रहे है और उनको बेचकर लाखों रुपये मुनाफा कमा रहे है। सरकार ने इस गाव को आदर्श मुर्राह नस्ल गाव घोषित किया हुआ है। इस गाव के लोगों ने भैंसों के नाम महिलाओं के नाम पर जैसे लक्ष्मी, धन्नो, लाडो, रानी, पूजा, मोहिनी, गंगा, जूना, लखो इत्यादि रखे हुए है और यह भैंस अपना नाम सुनते ही मालिक के पास पहुच जाती है।

जाने किसका दूध है सबसे सेहतमंद – गाय का या भैंस का?

कुछ लोग कहते है कि भैंस का दूध ज्‍यादा लाभदायक होता है जबकि कुछ लोगों का मानना है कि गाय के दूध में ज्‍यादा पोषक तत्‍व होते हैं। हर प्रकार के दूध में पोषक तत्‍वों की भरमार होती है, बस उम्र और शरीर की आवश्‍यकता के हिसाब से इसका उपयोग किया जाता है।

आगे इस बारे में कुछ और कहने से पहले आपको गाय और भैंस के दूध में पोषक तत्‍वों की मात्रा के बारे में बताया जा रहा है, जो प्रति 100 मिली. में होती है:

भैंस:

कैलोरी – 97, प्रोटीन- 3.7 ग्राम, फैट 6.9 ग्राम, पानी- 84 प्रतिशत, लैक्‍टोस 5.2 ग्राम, खनिज लवण- 0.79 ग्राम

अगर आप अपना वजन और मासपेशियां बढाना चाहते हैं, तो भैंस का दूध आपके लिये अच्‍छा है। भैंस के दूध में गाय के मुकाबले अधिक प्रोटीन होता है, जो कि मासपेशियां बढाने में मददगार है। अगर आपको पाचन संबंधित समस्‍या है तो गाय के दूध का सेवन करें।

गाय:

कैलोरी- 61, प्रोटीन- 3.2 ग्राम, फैट 3.4 ग्राम, पानी 90 प्रतिशत, लैक्‍टोस – 4.7 ग्राम, खनिज लवण- 0.72 ग्राम।

अगर आप अपना वजन घटाना चाहते है तो गाय का दूध ज्‍यादा फायदेमंद होता है। इसके 100 मिली. दूध में सिर्फ 61 कैलोरी होती है जबकि भैंस के 100 मिली. में 97 कैलोरी होती है। भैंस के दूध में (6.9 ग्राम वसा) गाय के दूध से (3.4 ग्राम वसा) ज्‍यादा वसा होता है।

सही कारण है कि नवजात बच्‍चों को गाय का दूध दिया जाता है क्‍योंकि यह आसानी से पच जाता है। जबकि भैंस का दूध भारी होता है और पचने में गाय के दूध की अपेक्षा अच्‍छा नहीं होता है क्‍योंकि इसमें पानी की मात्रा कम होती है।