सबसे महंगी कॉफी ऐसे होती है तैयार, जानकर पीना छोड़ देंगे!

अगर आप कॉफी पीने के शौकिन है तो हमारी यह ख़बर आपको निराश कर सकती है। जी हां, दुनिया की सबसे मंहगी कॉफी ‘कोपी लुवाक’ जो पीने में तो बेहद टेस्टी लगती हैं लेकिन इसको बनाने की प्रक्रिया काफी हैरान कर देने वाली है।

कॉफी ‘कोपी लुवाक’ जिसका जायका लेने के लिए लोग दुनिया भर से इंडोनेशिया आते हैं। लोगों की मानें तो इस कॉफी को जो एक बार टेस्ट कर ले फिर उसे कोई और कॉफी रास नहीं आती।
इस कॉफी की कीमत €550 / US$700 प्रति किलोग्राम होती है। यानि के 42000 रूपए प्रति किल्लो ।जो आम कॉफी की तुलना में बहुत ही ज्यादा है ।

आईए अब हम आपको बताते हैं कैसे बनाई जाती है दुनिया की सबसे महंगी कॉफी…

यह कॉफी किसी किसान के द्वारा खेतों में नहीं उगाई जाती बल्कि इस कॉफी का निर्माण जंगली रेड कॉफी बीन्स से होता है जो कि एशियन पाम सिवेट नाम के जानवर की पॉटी से निकलती है।यह जानवर पेड़ पर ही अपना आसियाना टिकाए रहता है। बेर खाने वाला यह जानवर बेर तो ज़रुर खाता है लेकिन यह पचा नहीं पाता।

आप सोच रहे होंगे एशियन पाम सिवेट के पेट में बेर ना पचने से कॉफी के तैयार होने से क्या लेना-देना… अब जो हम बताएंगे आप चौंक जाएंगे… दरअसल एशियन पाम सिवेट पेड़ो पर रहने वाला जानवर होता है जो कि बेरी खाता है लेकिन वो बेरी के बीजों को पचा नहीं पाता है और मल के जरिये उसे पेट से बाहर निकाल देता है जो कि बींस के रूप में वातावरण में आता है और इसी बींस को सुखाकर ‘कोपी लुवाक’ कॉफी बनायी जाती है, जो कि यह बहुत ज्यादा दुर्लभ होती है ।

पहले यह जानवर सिर्फ जंगल में मिलते थे और यह कॉफी बहुत ही दुर्लभ थी । लेकिन अब इसकी फार्मिंग होने लगी है लोग एशियन पाम सिवेट को अपने फार्म में उसका मल लेने के लिए पालते है।क्यों हैरान हो गए ना इस ख़बर को पढ़कर कि जिस कॉफी को सभी राजसी घरानों की पार्टी में शामिल किया जाता है वह ऐसे तैयार होता है।

पशुओं  के लिए घर पर त्यार करें यह दलिया, 100% दूध बढ़ने की है गरंटी

आज हम आपको एक ऐसा दलिया बनाना सिखएंगे जिस से आपके पशु की दूध देने की क्षमता बहुत बढ़ जाएगी और यह सस्ता है कोई महंगा नहीं है और इसको बनाने के लिए जो हर जगह मिल जाएगा ।

इसमें दो चीजें का ध्यान जरूर रखें एक इसके बनाने की विधि और दूसरा इसको देने का समय दोनों को ध्यान से समझें । दलिया बनाने के लिए सबसे पहले आपको चाहिए गेहूं का दलिया। गेहूं का दलिया आप मक्की का और चीज का भी ले सकते हैं लेकिन गर्मी में गेहूं का दलिया सबसे अच्छा रहता है और इसके साथ आपको चाहिए तारा मीरा अगर आपको मिलता है तो बहुत अच्छी बात है अगर नहीं मिलता है तो कोई बात नहीं है ।

इसके बाद आती है हमारी शक्कर की जगह गुड का इस्तेमाल कर सकते है लेकिन गर्मी में शक्कर सबसे अच्छी रहती है । इसके साथ आप सरसों का तेल और मीठा सोढा का इस्तेमाल करें मीठा सोढा पांचन शक्ति के लिए बहुत अच्छा होता है । इसके अलावा किसान इसमें हमारे कॉटन सीड और कैल्शियम आदि डाल सकते है ।

इसको बनाना कैसे है सबसे पहले आपको लेना है दलिया और इसमें आपको पानी डाल कर आग पर पका लेना है उसके बाद हम इसमें हम सबसे पहले शक्कर डालेंगे और इसके बाद किसान भाइयो सरसों का तेल डालना है जोकि आपको सौ ग्राम के लगभग लेना है अपने पशुओं के हिसाब से अगर आपका पशु ज्यादा बड़ा है भी या तो आप इसको ज्यादा भी ले सकते है ।

तारामीरा भी आप 50 ग्राम तक इस्तेमाल कर सकते हैं कोई दिक्कत नहीं है ज्यादा भी कर लिया तो कोई प्रॉब्लम नहीं है यह पशु के लिए बहुत अच्छा है और इसके बाद सबसे जरूरी चीज आती है कि मीठा सोडा इसको इस्तेमाल करना अगर आपको इस्तेमाल करना है तो आप एक चम्मच दे सकते है लेकिन पशु को आपके पशु को दस्त वगैरह नहीं लगी होनी चाहिए ।

इस दलिया की पूरी जानकारी के लिए नीचे दिए हुए वीडियो को देखें ।

अब सिर्फ 7 दिन में घर पर त्यार करें पौष्टिक हाइड्रोपोनिक्स चारा

वैज्ञानिकों ने एेसा चारा उगाया है, जिसे खाकर पशु 15 से 20 फीसदी तक ज्यादा दूध देने लगेंगे। इस विधि को हाइड्रोपोनिक्स कहते हैं। इसे अपनाकर कम लागत में चारा तैयार किया जा सकता है।

पशुओं की अच्छी नस्ल होने के बाद भी उत्पादन कम रह जाता है। पशुओं के लिए उचित आहार का प्रबंधन कर उत्पादकता के साथ ही आर्थिक स्थिति में भी सुधार लाया जा सकता है। जिले में पानी की कमी के कारण हरा चारे की फसल नहीं ले पाते हैं।

हाइड्रोपोनिक्स विधि से कम पानी में हरा चारा तैयार किया जा सकता है। इस विधि में हम कम पानी में दुधारु पशुओं के लिए पौष्टिक हरा चारा तैयार करने की यह मशीन किसानों के प्रदर्शन के लिए स्थापित की है।

कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक पशुपालन डॉ.रुपेश जैन ने बताया हाइड्रोपोनिक्स विधि से मक्का, ज्वार, बाजरा से हरे चारे को तैयार किया जा सकता है। इस विधि से तैयार चारे में पौष्टिक तत्वों की मात्रा परंपरागत चारे की तुलना में ज्यादा होती है। इसमें जगह भी कम लगती है।

ऐसे बनाए हाइड्रोपोनिक्स चारा

इस विधि से हरे चारे को तैयार करने के लिए सबसे पहले मक्का, ज्वार व बाजरा के दानों को 24 घंटे के लिए पानी में भिगोकर रखा जाता है। इसके बाद जूट के बोरे में ढककर अंकुरण के लिए रखा जाता है। अंकुरण निकलने के बाद इसे हाइड्रोपोनिक्स मशीन की ट्रे (2 बाय 1.5 फीट) में बराबर मात्रा में फैलाया जाता है। चौथे से दसवें दिन तक इसमें वृद्धि होती है।

इस दौरान ट्रे में 7 दिनों तक फौव्वारा के द्वारा दिन में 8 से 10 बार सिंचाई की जाती है। दसवें दिन एक ट्रे में लगभग 10 किलो तक हरा चारा तैयार हो जाता है। चारे की हाइट भी 6 से 8 इंच तक की हो जाती है।

इस विधि से तैयार चारे को 15 से 20 किलो तक दूध देने वाले पशुओं को खिलाया जा सकता है। पशुओं को खिलाने से दूध उत्पादन में 15 से 20 प्रतिशत तक की वृद्धि के साथ ही दूध में वसा की 10 से 15 प्रतिशत बढ़ोतरी होती है।

18-20 हजार होंगे खर्च

इस विधि को अपनाने के ज्यादा रुपए भी नहीं चुकाने होंगे। 50 ट्रे वाली मशीन के लिए 18 से 20 हजार रुपए का खर्च आएगा। जिसमें 5 ट्रेे प्रतिदिन 50 किलो हरा चारा निकलेगा। इससे 5 पशुओं को आहार दिया जा सकता है।

परंपरागत तरीके से चारा तैयार करने में 25 से 30 लीटर पानी की खपत होती है। वहीं इस विधि को अपनाकर 2 से 3 लीटर प्रतिदिन पानी में ही सिंचाई हो जाएगी।

हाइड्रोपोनिक्स चारा त्यार करने की जानकारी के लिए वीडियो भी देखें

इस राज्य में दूध से महंगा बिक रहा है गौमूत्र, किसानों को बढ़ सकता है मुनाफा

किसानों के लिए डेयरी उद्दोग भी एक अच्छी आमदनी का जरिया बनता जा रहा है. पिछले कुछ वर्षों में किसानों के बीच डेयरी उद्दोग रफतार पकड़ता दिखाई दिया है.

एसे कई उदाहरण देखन को मिले हैं जिसमें युवाओं ने मल्टीनेश्नल कंपनी की जॉब छोड़कर डेयरी उद्दोग को व्यवसाय के तौर पर अपनाया है. वहीं डेयरी किसान गायों के जरिए कई तरह से कमाई कर सकते हैं यह बात तो लगभग सभी डेयरी किसानों ने सुना है. और यह बात सच भी साबित हो रही है.

राजस्थान के डेयरी किसान अब गाय के दूध को नहीं बल्कि गौमूत्र को भी अपनी मुनाफे का जरिया बना रहे हैं… गौमूत्र की मांग इतनी ज्यादा बढ़ रही है कि किसान थोक बाजार में गिर और थारपारकर जैसी हाई ब्रीड गायों के मूत्र को बेचकर मुनाफा कमा रहे हैं.

किसान गौमूत्र को 15 से 30 रुपए प्रति लीटर पर बेच रहे हैं. वहीं राज्य में गाय के दूध की कीमत 22 से 25 रुपए प्रति लीटर ही है. किसान गौमूत्र उन किसानों को बेच रहे हैं जो किसान जैविक खेती करते हैं. किसान ऐसा मान रहे हैं कि जब से वह गौमूत्र बेच रहे हैं तब से उनकी कमाई लगभग 30 प्रतिशत बढ़ गई है.

जैविक खेती करने वाले किसान गौमूत्र का प्रयोग कीटनाशकों के विकल्प में करते हैं… इसके साथ ही लोग औषधिक उद्देश्यों और अनुष्ठानों में भी इसका उपयोग करते हैं. राज्य में ऐसे एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी भी हैं जो गौमूत्र का प्रयोग अपने ऑर्गेनिक फार्मिंग प्रोजेकेट के लिए करती हैं और लगभग हर महीने 300 से 500 लीटर गौमूत्र का प्रयोग करते हैं.

यह बकरी देती है गाय के बराबर दूध,जाने इस बकरी की पूरी जानकारी

अल्पाइन नस्ल माध्यम से बड़े आकार की बकरी है । अल्पाइन बकरी इसकी बहुत अच्छा दूध देने की क्षमता के लिए जाना जाता है। उनके पास सींग, सीधी प्रोफ़ाइल और कान खड़े हैं।

ਗਾਂ ਤੋਂ ਵੀ ਜ਼ਿਆਦਾ ਦੁੱਧ ਦਿੰਦੀ ਹੈ ਬੱਕਰੀ ਦੀ ਇਹ "ਅਲਪਾਇਨ" ਨਸਲ

Posted by ਪਸ਼ੂ ਪਾਲਣ ਅਤੇ ਸਹਾਇਕ ਧੰਦੇ on Friday, May 25, 2018

यह मुख्या रूप में फ्रांस की नस्ल है । इसका वजन लगभग 61 किलोग्राम (135 एलबीएस) होता है, और कंधे पर लगभग 76 सेमी (30 इंच) लंबा होता है।

अल्पाइन बकरियां सफेद या भूरे से भूरा और काले रंग तक हो सकती हैं। अल्पाइन बकरियां भारी मात्रा में दूध देती हैं। दूध को मक्खन , पनीर , आइसक्रीम या गाय के दूध से बने किसी अन्य डेयरी उत्पाद में बनाया जा सकता है ।

माल्टीज़ एक मूल्यवान दूध देने वाली नस्ल है; दूध में अत्यधिक “बकरी” गंध बिना सुखद स्वाद वाला होता है।यह नसल एक दिन में 5 से 10 लीटर से भी ज्यादा दूध दे सकती है । यह नसल अभी भारत में उपलब्ध नहीं है । लेकिन अगर इस नसल को भारत में लाया जाये तो यह भारत के किसानो के लिए वरदान साबित होगी ।

चारा मिलाने से डालने तक 4 लोगों का काम अकेले करती है यह मशीन

डेरी फार्मिंग में हर दिन नई से नई मशीन आ रही है जो डेरी के काम को और आसान कर रही है अब सिर्फ 2 -3 आदमी बड़े से बड़ा डेरी फार्म संभाल सकते है ।

आज हम जिस मशीन की बात कर रहे है वो भी 4 काम कर देती है ।इस मशीन का नाम JF Mix 2000 है यह मशीन काटने और मिक्सिंग करने का काम करती है ।

यह मशीन भूसे को फीड के साथ अपने आप ही मिक्स कर देती है और उसके बाद इस मशीन की सहयता से आप पशुओं को चारा सीधे ही उनकी नांद में डाल सकते है ।

यह मशीन वहां पर ज्यादा कामयाब है जहाँ पर काफी ज्यादा पशु होते है और लेबर की कमी हो । इस मशीन को ट्रेक्टर के साथ चलाया जाता है और आप इस मशीन को कहीं भी लेकर जा सकते है । इस मशीन को खरीदने के लिए आप नीचे दी हुए नंबर पर क्लिक करें ।

और ज्यादा जानकारी के लिए वीडियो देखें

आज ही करें यह काम आपका पशु देने लगेगा 10% अधिक दूध

गाय को रहने के लिए साफ-सुथरा स्थान और आराम से बैठने के लिए गद्देदार बिछावन मिलने से वह खुश होती है और दस प्रतिशत अधिक दूध दे सकती है जिससे किसानों की आय काफी बढ़ सकती है।वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि मनुष्य की तरह दुधारू पशु भी सर्दी-गर्मी एवं सुख-दुख का अनुभव करते हैं।

गाय को गद्देदार बिछावन पर आराम करने की सुविधा मिलने पर उसमें दूध उत्पादन की क्षमता दस प्रतिशत तक बढ़ सकती है। रबड़ की सीट या गद्देदार बिछावन मिलने पर गाय अधिक समय तक आराम करती है जिससे उसके शरीर में खून का संचार 25 से 30 प्रतिशत बढ़ जाता है जिसकी वजह से दूध का उत्पादन बढ़ता है।

एक लीटर दूध पैदा करने के लिए लगभग 500 लीटर खून को अयन की दुग्ध ग्रंथियों से गुजरना पड़ता है। एक गाय एक दिन में अपने आराम के लिए 10 से 15 बार बैठती या खड़ी होती है। यदि गाय गद्देदार बिछावन मिलने पर एक बार में एक मिनट ही अधिक आराम करे तो दिन भर में उसे कम से कम दस मिनट अधिक आराम का समय मिल जाता है।

आराम की अवधि के दौरान उसमें खून का दौरा सवा गुणा बढ़ जाता है। इस प्रकार उसे एक साल में 60 घंटे अधिक आराम मिल सकता है। गाय अधिक समय तक आराम करती है जिससे प्रति घंटे 1.7 किलोग्राम अधिक दूध मिल सकता है अर्थात 60 घंटे में 102 किलोग्राम दूध का उत्पादन बढ़ सकता है।

राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान, करनाल के वरिष्ठ वैज्ञानिक अश्विनी कुमार राय ने अपने अध्ययन में कहा है कि गाय कंक्रीट के बने फर्श पर नहीं बैठना चाहती है। इस पर बैठना उसके लिए कष्टदायक है। वह नर्म मुलायम बिस्तर पर बैठना अधिक पसंद करती है। गाय एक दिन में करीब 12 घंटे बैठना पसंद करती है।

आराम की जगह साफ-सुथरी और सूखी हो तो इससे पशुओं में चर्मरोग नहीं होता है। गाय के बैठने के स्थान पर बालू का प्रयोग किया जा सकता है या फिर धान के पुआल से उसका गद्देदार बिछावन तैयार किया जा सकता है। गाय जितना अधिक समय तक आराम में रहती है उसकी मांसपेशियां स्वस्थ रहती है क्योंकि इस दौरान उसे पर्याप्त मात्रा में रक्त और आवश्यक पोषण मिलता है।

वैज्ञानिक दुधारू पशुओं को अधिक आराम देने के लिए ग्रूमिंग ब्रश के प्रयोग की सलाह देते हैं। ऐसे ब्रश के उपयोग से पशुओं को अधिक आराम मिलता है। रक्त का संचार बढ़ता है। इससे उनमें तनाव नहीं होता है और दूध का उत्पादन बढ़ जाता है। गाय को जब एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जाता है तो सफर के कारण उसमें तनाव हो जाता है जिससे दूध उत्पादन में कमी आती है। दूध दुहने वाले व्यक्ति के बदलने पर भी दूध उत्पादकता में कमी आ सकती है।

कई बार गाय के बछड़े को उससे अलग करने पर वह तनाव में आ जाती है और इससे दूध उत्पादन कम हो सकता है। अच्छी बात यह कि गाय को चराने से उसका व्यायाम हो जाता है जिससे उसमें रक्त संचार बढ़ जाता है। इस दौरान उसे ताजी हवा और धूप मिलती है जिससे उसकी त्वचा साफ और चमकदार बनी रहती है। त्वचा साफ रहने पर परजीवियों का संक्रमण नहीं होता है और वह खुश रहती है जिससे अधिक दूध का उत्पादन हो सकता है ।

इस जुगाड़ से पशुओं को अपने आप खुरली (नांद) पर मिलता है पानी ,जाने पूरी तकनीक

सभी किसान भाईओं को पता है के किसी भी पशु को एक लीटर दूध पैदा करने के लिए कम से कम 3 लीटर पानी की जरूरत पड़ती है।

ज्यादतर किसान पशुओं को 2 से 3 बार पानी पानी पिलाते है लेकिन एक बार में पशु से ज्यादा पानी नहीं पी सकता इस लिए एक दो बार ज्यादा पानी पिलाने से अच्छा है के पशु अपनी जरूरत के हिसाब से पानी पी ले । इसका सीधा संबंध आप को पता चलेगा के पशु दे दूध देने की मात्रा में काफी इज़ाफ़ा होगा ।

लेकिन अब सवाल उठता है के पशु को बार बार पानी कौन पिलायेगा । इसका उतर है पशु खुद क्यूंकि अब एक ऐसा जुगाड़ आ गया है जिस से पशु की खुरली(नांद) के पास में लगा सकते है और जिसमे हमेशा पानी रहता है ।

जब भी पानी कम हो जाए इसमें अपने आप पानी भर जाता है । इसका एक फ़ायदा यह भी है के अगर आप किसी रिश्तेदारी में भी चले जाते है वहां पर पशुओं को पानी पिलाने की चिंता नहीं रहती इनको अपने आप ही पानी मिलता रहता है ।

इस पानी वाली छोटी टंकी को स्टील से बनाया जाता है । इसमें एक नल से पानी डाला जाता है ।इसमें वही सिस्टम लगा होता है जो हमारे पानी वाले कूलर में होता है । जैसे ही पानी कम होता है ये सिस्टम नल को खोल देता है जिस से पानी अपने आप आने लगता है इस सिस्टम को कोई भी बना सकता है यह कोई ज्यादा महंगा जुगाड़ नहीं है । कोई भी किसान इसको अपने घर पर त्यार कर सकता है ।

और ज्यादा जानकारी के लिए निचे दी हुई वीडियो जरूर देखें

कमाल की है यह दूध दुहने वाली मशीन, एक मिंट में निकलती है 2 लीटर दूध

देश के तमाम ग्रामीण इलाकों में गाय या भैंस का दुध दुहने में हाथों का इस्तेमाल किया जाता है और सदियों से यही पारंपरिक तरीका अपनाया जा रहा है। लेकिन जब से डेयरी फार्मिंग की नई-नई तकनीकें सामने आई हैं पारंपरिक तरीके पीछे छूटते जा रहे हैं। मिल्किंग मशीन यानी दूध दुहने की मशीन ने डेयरी फार्मिंग और पशुपालन की दुनिया में क्रांति ला दी है।

मशीन से दुध निकालना काफी सरल है और इससे दूध का उत्पादन भी 15 फीसदी तक बढ़ जाता है। मशीन से दूध निकालने की शुरुआत डेनमार्क और नीदरलैंड से हुई और आज यह तकनीक दुनिया भर में इस्तेमाल की जा रही है। आजकल डेरी उद्योग से जुड़े अनेक लोग पशुओं से दूध निकालने के लिए मशीन का सहारा ले रहे हैं।

पशुओं का दूध दुहने वाली मशीन को मिल्किंग मशीन के नाम से जानते हैं। इस मशीन से दुधारू पशुओं का दूध बड़ी ही आसानी से निकाला जा सकता है। इससे पशुओं के थनों को कोई नुकसान नहीं होता है। इससे दूध की गुणवत्ता बनी रहती है और उस के उत्पादन में बढ़ोतरी होती है। यह मशीन थनों की मालिश भी करती और दूध निकालती है।

इस मशीन से गाय को वैसा ही महसूस होता है, जैसे वह अपने बच्चे को दूध पिला रही हो। शुरुआत में गाय मशीन को लेकर दिक्कत कर सकती है लेकिन धीरे-धीरे इसे आदत हो जाती है और फिर मशीन से दूध दुहने में कोई दिक्कत नहीं होती।

मशीन से मिलता है स्वच्छ दूध

मिल्किंग मशीन से दूध निकालने से लागत के साथ-साथ समय की भी बचत होती है और दूध में किसी प्रकार की गंदगी नहीं आती। इस से तिनके, बाल, गोबर और पेशाब के छींटों से बचाव होता है। पशुपालक के दूध निकालते समय उन के खांसने व छींकने से भी दूध का बचाव होता है। दूध मशीन के जरीए दूध सीधा थनों से बंद डब्बों में ही इकट्ठा होता है.

मिल्किंग मशीन के बारे में जानकारी

मिल्किंग मशीन कई तरह की होती है। जो डेयरी किसान अपनी डेयरी में पांच लेकर पचास गाय या भैंस पालते हैं उनके लिए ट्रॉली बकेट मिल्किंग मशीन पर्यापप्त है। ये मशीन दो तरह की होती सिंगल बकेट और डबल बकेट। सिंगल बकेट मिल्किंग मशीन से 10 से 15 पशुओं का दूध आसानी से दुहा जा सकता है वहीं डबल बकेट मिल्किंग मशीन से 15 से चालीस पशुओं के लिए पर्याप्त है।

ट्रॉली लगी होने के कारण इस मशीन को फार्म में एक जगह से दूसरी जगह ले जाना सुविधाजनक होता है। दिल्ली-एनसीआर में डेयरी फार्म के उपकरण बनाने वाली कंपनी के सेल्स हेड और आधुनिक डेयरी फार्मिंग के जानकार रोविन कुमार ने बताया कि मशीन से दूध दुहने से पशु और पशुपालक दोनों को ही आराम होता है।

उन्होंने बताया कि मशीन के अंदर लगे सेंसर गाय के थनों में कोई दिक्कत नहीं होने देते और निर्वाध रूप से दूध निकलने देते हैं। उन्होंने बताया कि मशीन से दूध दुहने में 4 से 5 मिनट का वक्त लगता है, जिसमें कुल दूध का साठ फीसदी दूध शुरुआत के दो मिनट में निकल आता है और बाकी का बाद में।

आपको बता मिल्किंग मशीन  की कीमत 26000 रुपए  है । दिल्ली-एनसीआर में इन मशीनों को बनाने वाली कई कंपनियां हैं और पशुपालकों को ये मशीन आसानी से उपलब्ध है। लेकिन घबराने की जरूरत नहीं बगैर ट्राली के भी ये मशीने उपलब्ध हैं और रेट भी काफी कम हैं।

फिक्स टाइप मिल्किंग मशीन

फिक्स टाइप मिल्किंग मशीन को फार्म के एक हिस्से में स्थापित किया जाता है। इसमें जरूरत के हिसाब से एक से लेकर तीन बकेट तक बढ़ाया जा सकता है। इस मशीन के रखरखाव में खर्चा कम आता है और एक-एक कर पशुओं को मशीन के पास दुहने के लिये लाया जाता है। ये मशीन 15 से 40 पशुओँ वाले डेयरी फार्म के लिए पर्याप्त है।

मशीन से भैंस का दूध दुहना भी आसान

रोविन कुमार ने बताया की गाय और भैंस दोनों के थनों में थोड़ा अंतर होता है, मशीन में थोड़ा सा बदलाव कर इससे भैंस का दूध भी आसानी से दुहा जा सकता है। भैंस का दूध निकालने के लिए मशीन के क्लस्टर बदलने होते हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, पंजाब, बिहार में मिल्किंग मशीन का प्रचल तेजी से बढ़ता जा रहा है। और लोग पारंकपरिक तरीके के बजाए मशीन के जरिए दूध दुहने को तवज्जो दे रहे हैं।

उत्पादन ज्यादा और लागत कम

एक और अहम बात है मशीन द्वारा दूध दुहने से दूध की मात्रा में 10 से 15 फीसदी बढ़ोतरी हो जाती है। मशीन मिल्किंग द्वारा दूध की उत्पादन लागत में काफी कमी तो आती ही है, साथ-साथ समय की भी बचत होती है। यानी परेशानी भी कम और दूध भी ज्यादा। इसकी सहायता से पूर्ण दुग्ध-दोहन संभव है जबकि परम्परागत दोहन पद्धति में दूध की कुछ मात्रा अधिशेष रह जाती है।

मशीन द्वारा लगभग 1.5 से 2.0 लीटर तक दूध प्रति मिनट दुहा जा सकता है. इसमें न केवल ऊर्जा की बचत होती है बल्कि स्वच्छ दुग्ध दोहन द्वारा उच्च गुणवत्ता का दूध मिलता है। इन मशीनों का रखरखाव भी बेहद सरल है, सालभर के मेंटिनेंस का खर्चा मात्र 300 रुपये आता है।

मिल्किंग मशीनों पर मिलती है सब्सिडी

कई राज्य सरकार मिल्किंग मशीनों की खरीद पर सब्सिडी भी दे रही है और बैंकों से इन्हें खरीदने के लिए लोन भी मिल रहा है। पशुपालकों को इसके लिए अपने जिले के पशुपालन अधिकारी और बैंकों के कृषि और पशुपालन विभाग के अफसरों से संपर्क करना चाहिए।

मशीन से दूध दुहने के दौरान बरतें सावधानी

अगर पशु के पहले ब्यांत से ही मशीन से दूध निकालेंगे तो पशु को मशीन से दूध निकलवाने की आदत हो जाएगी। शुरुआत में मशीन द्वारा दूध दुहते समय पशु को पुचकारते हुए उस के शरीर पर हाथ घुमाते रहना चाहिए, ताकि वह अपनापन महसूस करे। दूध दुहने वाली मशीन को पशुओं के आसपास ही रखना चाहिए ताकि वे उसे देख कर उस के आदी हो जाएं, वरना वे अचानक मशीन देख कर घबरा सकते हैं या उसकी आवाज से बिदक सकते हैं।

ज्यादा जानकारी के लिए आप निचे दिए पते पर संपर्क करें

Address: No.57, 3rd A Cross,
1st Main, Havanoor Extension,
Nagasandra Post, Hesaraghatta Main Road,
Bengaluru, Karnataka 560073

Phone: 094818 65059

इन आसान तरीकों से मिलेगा मोती की तरह साफ दूध

किसान भाइयों भारत दुनिया का कुल 18.43 फीसदी दुग्ध उत्पादन करता है. ये तो हम सभी लोग जानते है कि दूध में प्रोटीन, वसा व लैक्टोज पाया जाता है जो हमारी सेहत के लिए बहुत लाभदायक होता है. सबसे बड़ी समस्या आती है दूध को खराब होने से बचाना.

ज्यादा दूध उत्पादन के लिए अच्छी नस्ल के पशुओं को पाला जाता है, पर स्वच्छ दूध उत्पादन के बिना ज्यादा दूध देने वाले पशुओं को रखना भी बेकार है.

स्वच्छ दूध हासिल करने के लिए अच्छी नस्ल के पशुओं को रखने के साथ साथ उन को बीमारियों से बचाने और टीकाकरण कराने की जरूरत होती है, जिस से सभी पोषक तत्त्वों वाला दूध मिल सके.

अक्सर देखा जाता है कि कच्चा दूध जल्दी खराब होता है. खराब दूध अनेक तरह की बीमारियां पैदा कर सकता है, इसलिए दूध के उत्पादन, भंडारण व परिवहन में खास सावधानी बरतने की जरूरत होती है.

कच्चे दूध में हवा, दूध दुहने वाले गंदे उपकरणों, खराब चारा, पानी, मिट्टी व घास से पैदा होने वाले कीटाणुओं से खराबी आ सकती है. इस वजह से कम अच्छी क्वालिटी के दूध बाहरी देशों को नहीं बेच पाते हैं जबकि पश्चिमी देशों में इस की मांग बढ़ रही है.

वैसे, दूध में जीवाणुओं की तादाद 50,000 प्रति इक्रोलिटर या उस से कम होने पर दूध को अच्छी क्वालिटी का माना जाता है. दूध इन वजहों से खराब हो सकता है:

  • थनों में इंफैक्शन का होना.
  • पशुओं का बीमार होना.
  • पशुओं में दूध के उत्पादन से संबंधित कोई कमी होना.
  • हार्मोंस की समस्या.
  • पशुओं की साफसफाई न होना.
  • दूध दुहने का गलत तरीका.
  • दूध दुहने का बरतन और उसे धोने का गलत तरीका होना.
  • दूध जमा करने वाले बरतन का गंदा होना.
  • चारे व पानी का खराब होना.
  • थनों का साफ न होना.

स्वच्छ दूध उत्पादन के लिए ये सावधानियां बरतना जरूरी हैं:

  •  पशुओं का बाड़ा या पशुशाला और पशुओं के दुहने की जगह साफ हो. वहां मक्खियां, कीड़े, धूल न हो.
  • बीड़ी सिगरेट पीना सख्त मना हो. शेड पक्के फर्श वाले हों. टूटफूट नहीं होनी चाहिए. गोबर व मूत्र निकासी के लिए सही इंतजाम होना चाहिए. पशुओं को दुहने से पहले शेड को साफ और सूखा रखना चाहिए. शेड में साइलेज और गीली फसल नहीं रखनी चाहिए. इस से दूध में बदबू आ सकती है.
  • पशु को दुहने से पहले उस के थन और आसपास की गंदगी को अच्छी तरह साफ कर लेना चाहिए.
  • शेड में शांत माहौल होना चाहिए. सुबह और शाम गायभैंस के दुहने का तय समय होना चाहिए.
  • दूध दुहने वाला सेहतमंद व साफ सुथरा होना चाहिए. दुहने वाले को अपने हाथ में दस्ताने पहनने की सलाह दी जानी चाहिए. दस्ताने न होने पर हाथों को अच्छी तरह जीवाणुनाशक घोल से साफ करना चाहिए. उस के नाखून व बाल बड़े नहीं होने चाहिए.
  • दूध रखने वाले बरतन एल्युमिनियम, जस्ते या लोहे के बने होने चाहिए. दुधारू पशुओं के थनों को दूध दुहने से पहले व बाद में पोटैशियम परमैगनेट या सोडियम हाइपोक्लोराइड की एक चुटकी को कुनकुने पानी में डाल कर धोया जाना चाहिए और अच्छी तरह सुखाया जाना चाहिए.
  • दूध दूहने से पहले और बाद में दूध की केन को साफ कर लेना चाहिए. इन बरतनों को साफ करने के लिए मिट्टी या राख का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.

  • दूध दुहने से पहले थन से दूध की 2-4 बूंदों को बाहर गिरा देना चाहिए क्योंकि इस में बैक्टीरिया की तादाद ज्यादा होती है, जिस से पूरे दूध में इंफैक्शन हो सकता है.
  • दूध दुहते समय हाथ की विधि का इस्तेमाल करना चाहिए. अंगूठा मोड़ कर दूध दुहने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. इस से थन को नुकसान हो सकता है और उन में सूजन आ सकती है.
  • एक पशु का दूध 5-8 मिनट में दुह लेना चाहिए, क्योंकि दूध का स्राव औक्सीटोसिन नामक हार्मोन के असर पर निर्भर करता है. अगर दूध थन में छोड़ दिया जाता है तो यह इंफैक्शन की वजह बन सकता है.
  • दूध दुहने के 2 घंटे के भीतर दूध को घर के रेफ्रिजरेटर, वाटर कूलर या बल्क मिल्क कूलर का इस्तेमाल कर के 5 डिगरी सैल्सियस या इस से नीचे के तापमान में रखना चाहिए.
  • दूध के परिवहन के समय कोल्ड चेन में गिरावट को रोकने के लिए त तापमान बनाए रखा जाना चाहिए.
  • स्वास्थ्य केंद्रों पर पशुओं की नियमित जांच करा कर उन्हें बीमारी से मुक्त रखना चाहिए, वरना पशु के इस दूध से इनसान भी इंफैक्शन का शिकार हो सकता है.
  • पानी को साफ करने के लिए हाइपोक्लोराइड 50 पीपीएम की दर से इस्तेमाल किया जाना चाहिए. फर्श और दीवारों की सतह पर जमे दूध व गंदगी को साफ करते रहना चाहिए.
  • दूध दुहते समय पशुओं को न तो डराएं और न ही उसे गुस्सा दिलाएं.
  • दूध दुहते समय ग्वालों को दूध या पानी न लगाने दें. सूखे हाथों से दूध दुहना चाहिए.
  • एक ही आदमी दूध निकाले. उसे बदलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए.

  • दूध की मात्रा बढ़ाने या ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए इस में गैरकानूनी रूप से बैन की गई चीजों को मिलाना व इस की क्वालिटी के साथ छेड़छाड़ करना ही मिलावट कहलाता है. यह मिलावटी दूध सब के लिए नुकसानदायक होता है. पानी, नमक, चीनी, गेहूं, स्टार्च, वाशिंग सोड़ा, यूरिया, हाइड्रोजन पेराक्साइड वगैरह का इस्तेमाल दूध की मात्रा बढ़ाने व उसे खराब होने से बचाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जो गलत है

.दूध की मिलावट का कुछ सामान्य तरीकों से पता किया जा सकता है. जैसे दूध का खोया बना कर, दूध में हाथ डाल कर, जमीन पर गिरा कर, छान कर व चख कर. इस के अलावा वैज्ञानिक तरीके से भी दूध की मिलावट की जांच की जा सकती है.