इन आसान तरीकों से मिलेगा मोती की तरह साफ दूध

किसान भाइयों भारत दुनिया का कुल 18.43 फीसदी दुग्ध उत्पादन करता है. ये तो हम सभी लोग जानते है कि दूध में प्रोटीन, वसा व लैक्टोज पाया जाता है जो हमारी सेहत के लिए बहुत लाभदायक होता है. सबसे बड़ी समस्या आती है दूध को खराब होने से बचाना.

ज्यादा दूध उत्पादन के लिए अच्छी नस्ल के पशुओं को पाला जाता है, पर स्वच्छ दूध उत्पादन के बिना ज्यादा दूध देने वाले पशुओं को रखना भी बेकार है.

स्वच्छ दूध हासिल करने के लिए अच्छी नस्ल के पशुओं को रखने के साथ साथ उन को बीमारियों से बचाने और टीकाकरण कराने की जरूरत होती है, जिस से सभी पोषक तत्त्वों वाला दूध मिल सके.

अक्सर देखा जाता है कि कच्चा दूध जल्दी खराब होता है. खराब दूध अनेक तरह की बीमारियां पैदा कर सकता है, इसलिए दूध के उत्पादन, भंडारण व परिवहन में खास सावधानी बरतने की जरूरत होती है.

कच्चे दूध में हवा, दूध दुहने वाले गंदे उपकरणों, खराब चारा, पानी, मिट्टी व घास से पैदा होने वाले कीटाणुओं से खराबी आ सकती है. इस वजह से कम अच्छी क्वालिटी के दूध बाहरी देशों को नहीं बेच पाते हैं जबकि पश्चिमी देशों में इस की मांग बढ़ रही है.

वैसे, दूध में जीवाणुओं की तादाद 50,000 प्रति इक्रोलिटर या उस से कम होने पर दूध को अच्छी क्वालिटी का माना जाता है. दूध इन वजहों से खराब हो सकता है:

  • थनों में इंफैक्शन का होना.
  • पशुओं का बीमार होना.
  • पशुओं में दूध के उत्पादन से संबंधित कोई कमी होना.
  • हार्मोंस की समस्या.
  • पशुओं की साफसफाई न होना.
  • दूध दुहने का गलत तरीका.
  • दूध दुहने का बरतन और उसे धोने का गलत तरीका होना.
  • दूध जमा करने वाले बरतन का गंदा होना.
  • चारे व पानी का खराब होना.
  • थनों का साफ न होना.

स्वच्छ दूध उत्पादन के लिए ये सावधानियां बरतना जरूरी हैं:

  •  पशुओं का बाड़ा या पशुशाला और पशुओं के दुहने की जगह साफ हो. वहां मक्खियां, कीड़े, धूल न हो.
  • बीड़ी सिगरेट पीना सख्त मना हो. शेड पक्के फर्श वाले हों. टूटफूट नहीं होनी चाहिए. गोबर व मूत्र निकासी के लिए सही इंतजाम होना चाहिए. पशुओं को दुहने से पहले शेड को साफ और सूखा रखना चाहिए. शेड में साइलेज और गीली फसल नहीं रखनी चाहिए. इस से दूध में बदबू आ सकती है.
  • पशु को दुहने से पहले उस के थन और आसपास की गंदगी को अच्छी तरह साफ कर लेना चाहिए.
  • शेड में शांत माहौल होना चाहिए. सुबह और शाम गायभैंस के दुहने का तय समय होना चाहिए.
  • दूध दुहने वाला सेहतमंद व साफ सुथरा होना चाहिए. दुहने वाले को अपने हाथ में दस्ताने पहनने की सलाह दी जानी चाहिए. दस्ताने न होने पर हाथों को अच्छी तरह जीवाणुनाशक घोल से साफ करना चाहिए. उस के नाखून व बाल बड़े नहीं होने चाहिए.
  • दूध रखने वाले बरतन एल्युमिनियम, जस्ते या लोहे के बने होने चाहिए. दुधारू पशुओं के थनों को दूध दुहने से पहले व बाद में पोटैशियम परमैगनेट या सोडियम हाइपोक्लोराइड की एक चुटकी को कुनकुने पानी में डाल कर धोया जाना चाहिए और अच्छी तरह सुखाया जाना चाहिए.
  • दूध दूहने से पहले और बाद में दूध की केन को साफ कर लेना चाहिए. इन बरतनों को साफ करने के लिए मिट्टी या राख का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.

  • दूध दुहने से पहले थन से दूध की 2-4 बूंदों को बाहर गिरा देना चाहिए क्योंकि इस में बैक्टीरिया की तादाद ज्यादा होती है, जिस से पूरे दूध में इंफैक्शन हो सकता है.
  • दूध दुहते समय हाथ की विधि का इस्तेमाल करना चाहिए. अंगूठा मोड़ कर दूध दुहने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. इस से थन को नुकसान हो सकता है और उन में सूजन आ सकती है.
  • एक पशु का दूध 5-8 मिनट में दुह लेना चाहिए, क्योंकि दूध का स्राव औक्सीटोसिन नामक हार्मोन के असर पर निर्भर करता है. अगर दूध थन में छोड़ दिया जाता है तो यह इंफैक्शन की वजह बन सकता है.
  • दूध दुहने के 2 घंटे के भीतर दूध को घर के रेफ्रिजरेटर, वाटर कूलर या बल्क मिल्क कूलर का इस्तेमाल कर के 5 डिगरी सैल्सियस या इस से नीचे के तापमान में रखना चाहिए.
  • दूध के परिवहन के समय कोल्ड चेन में गिरावट को रोकने के लिए त तापमान बनाए रखा जाना चाहिए.
  • स्वास्थ्य केंद्रों पर पशुओं की नियमित जांच करा कर उन्हें बीमारी से मुक्त रखना चाहिए, वरना पशु के इस दूध से इनसान भी इंफैक्शन का शिकार हो सकता है.
  • पानी को साफ करने के लिए हाइपोक्लोराइड 50 पीपीएम की दर से इस्तेमाल किया जाना चाहिए. फर्श और दीवारों की सतह पर जमे दूध व गंदगी को साफ करते रहना चाहिए.
  • दूध दुहते समय पशुओं को न तो डराएं और न ही उसे गुस्सा दिलाएं.
  • दूध दुहते समय ग्वालों को दूध या पानी न लगाने दें. सूखे हाथों से दूध दुहना चाहिए.
  • एक ही आदमी दूध निकाले. उसे बदलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए.

  • दूध की मात्रा बढ़ाने या ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए इस में गैरकानूनी रूप से बैन की गई चीजों को मिलाना व इस की क्वालिटी के साथ छेड़छाड़ करना ही मिलावट कहलाता है. यह मिलावटी दूध सब के लिए नुकसानदायक होता है. पानी, नमक, चीनी, गेहूं, स्टार्च, वाशिंग सोड़ा, यूरिया, हाइड्रोजन पेराक्साइड वगैरह का इस्तेमाल दूध की मात्रा बढ़ाने व उसे खराब होने से बचाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जो गलत है

.दूध की मिलावट का कुछ सामान्य तरीकों से पता किया जा सकता है. जैसे दूध का खोया बना कर, दूध में हाथ डाल कर, जमीन पर गिरा कर, छान कर व चख कर. इस के अलावा वैज्ञानिक तरीके से भी दूध की मिलावट की जांच की जा सकती है.

जिन गायों को बेकार समझ लोगों ने छोड़ दिया, उन्‍हीं से यहाँ होती है लाखों की कमाई

दूध नहीं दे पाने की स्थिति में जिन गायों को किसानों और गौपालकों ने अनुपयोगी समझकर लावारिस भूखा-प्यासा भटकने के लिए छोड़ दिया था। अब उन्हीं गायों के गोबर और पेशाब से नगर निगम की लालटिपारा गौशाला में कैचुआ खाद, नैचुरल खाद और धूपबत्ती बनाई जा रही है।

वहीं पेशाब से कैमिकल रहित गोनाइल और कीटनाशक दवाईयां व मच्छर भगाने की धूपबत्ती तैयार की जा रही है। कीटनाशक दवाईयां खेती और बागवानी के लिए बेहद उपयोगी हैं। इससे नगर निगम को भी अभी तक करीब 3 लाख रुपये का आर्थिक लाभ हो चुका है।

गौमूत्र से बन रहा गौनाइल

प्रकृति में गाय के गोबर और पेशाब को सबसे पवित्र और शुद्ध माना जाता है। हिन्दू धर्म में गाय के पेशाब और गोबर का उपयोग पंचगव्य में किया जाता है, कहा जाता है कि इसके पीने से मनुष्य के सभी दोष दूर हो जाते हैं। नगर निगम की लालटिपारा गौशाला में करीब 6000 गाय हैं, इन गायों से प्रतिदिन नगर निगम को 60 हजार किलो गोबर मिलता है।

इस गोबर का नगर निगम ने कई तरह से उपयोग करना शुरू कर दिया है। वहीं गाय की पेशाब जिसका अभी तक कोई उपयोग नहीं होता था उससे वहां पर अब फिनाइल के स्थान पर गौनाइल बन रहा है, जो फिनाइल से भी बेहतर कार्य करता है। साथ ही पेशाब से बनने वाले कीटनाशकों का उपयोग खेती में किया जा रहा है। जिससे खेती को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों का खात्मा तो होता ही है साथ ही मनुष्य के स्वास्थ्य पर भी इसका कोई विपरित असर नहीं पड़ता।

धूपबत्ती में आयुर्वेदिक औषधी और घी का उपयोग

नगर निगम की लालटिपारा गौशाला में बनाई जा रही धूपबत्ती में गाय का गोबर, लाल चंदन, नागरमोथा, जटामासी, कपूर काचरी, गौमूत्र और देशी घी डाला जाता है। इनको मिलाने के बाद इसे आकार देकर सूखने के लिए रखा जाता है।

गौनाइल ऐसे हो रही तैयार

गौनाइल बनाने के लिए गाय और बछियाओं का गौमूत्र एकत्रित किया जाता है, इसके बाद इसमें चीड़ का तेल और नीम मिलाया जाता है। इससे जहां भी पोछा लगाया जाता है वहां के कीटाणु खत्म हो जाते हैं।

सुगंधित व केमिकल रहित मच्छर भगाने वाली धूप

गोबर, गौमूत्र में जामारोजा, तुलसी, नीमगिरी, चीड़ का तेल, कपूर तेल, नीम तेल, नागरमोथा, मैंदा लकड़ी और रोहतक लकड़ी को मिलकर धूपबत्ती तैयार की जा रही है। बताया जाता है कि इसके जलाने से घर में सुगंध तो रहती ही है साथ ही मच्छर भी भाग जाते हैं।

कैचुआ खाद भी हो रही तैयार

गाय के गोबर से गौशाला में कैचुआ खाद भी तैयार की जा रही है, इस खाद को उद्यानों और किसानों को दिया जाएगा। गाय के गोबर को एकत्रित कर उसके स्ट्रक्चर बनाए गए हैं इन पर समय-समय पर पानी का छिड़काव किया जाता है। जब यह सूख जाता है तो इसे छान कर किसानों को जैविक खाद बेचने के लिए तैयार किया जा रहा है।

ताजे गोबर से बन रही गोबर गैस

गाय के ताजे गोबर से प्रदेश के सबसे बड़े गोबर गैस प्लांट से गैस तैयार हो रही है, इस गैस से गौशाला में कार्य करने वाले कर्मचारियों एवं गौशाला का भ्रमण करने के लिए आने वाले करीब 200 लोगों का भोजन तैयार होता है। वहीं इससे निकलने वाले गोबर को खाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

निगम आयुक्त विनोद शर्मा कहते हैं-

जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए गोबर गैस प्लांट और कैचुआ खाद को किसानों में बेचा जाता है। साथ ही गौनाइन का भी उत्पादन शुरू हो गया है जल्द ही इसे बड़े स्तर पर करने के लिए गौशाला में ही बाटलिंग प्लांट लगाया जाएगा। वहीं मार्केट में जल्द ही धूपबत्ती भी ला रहे हैं।

फैक्ट फाइल

  • वर्ष 2017-18 में किसानों को गौशाला से 2.5 लाख रुपये की खाद बेची गई।
  •  होली पर करीब 42 हजार रुपये के कण्डे बेचे गए, साथ ही श्मशान में भी अभी तक करीब 30 शवों का लकड़ी विहीन कण्डों से दाह संस्कार किया गया।
  • 40 हजार की अभी तक गौनाइल बिक चुकी है।
  • अभी तक करीब 10 हजार रुपये की धूपबत्ती बनायी जा चुकी है। इसे जल्द ही मार्केट में लाया जाएगा।

घर में जगह नहीं है तो अब पीजी (पेइंग गेस्ट) में पालें अपनी गाय-भैंस

हरियाणा सरकार अब राज्य में गाय-भैंसों के लिए पेइंग गेस्ट सुविधा यानी पीजी शुरू करने वाली है. यानी अगर आप शहर में रहते है जा फलैट में रहते है और आपके पास तबेले की सुविधा नहीं है, वो भी अब गाय-भैंस का पालन कर सकेंगे.

राज्य के कृषि मंत्री ओमप्रकाश धनखड़ ने कहा है कि गाय भैंस पीजी योजना उन लोगों के लिए शुरू की जाएगी, जो गाय भैंस पालना तो चाहते हैं लेकिन उनके पास तबेले की जगह नहीं है. हालांकि गाय भैंस पीजी योजना में शामिल होने के लिए एक पीजी फीस देनी होगी.

कृषि मंत्री के मुताबिक गाय भैंस पीजी योजना में शामिल होने वाले लोगों को जानवरों के लिए मनपसंद चारा चुनने की छूट भी दी जाएगी. ओम प्रकाश धनखड़ के मुताबिक गाय भैंस पीजी योजना शुरू होने के बाद लोग न केवल गाय की सेवा कर पाएंगे बल्कि उनको बदले में भी दूध की सुविधा भी मिलेगी.

सरकार बाकायदा गाय-भैंस पीजी केंद्रों में पीजी कर्मी भर्ती करेगी, जो जानवरों की देखभाल करने के बाद पीजी की सुविधा लेने वाले व्यक्ति के घर तक दूध पहुंचाएंगे.

कृषि मंत्री ने बताया कि अब हाइराइज बिल्डिंग में रहने वाले अपनी गाय -भैंस के शुद्ध दूध, दही और घी का स्वाद ले पांएगे . प्रदेश के हर जिले में दुधारू पशुअों के लिए डेयरी कांसेप्ट के सात छोटे-छोटे पीजी खोले जाएगें, जो लोग जगह की कमी की वजह से गाय भैंस नहीं पाल सकते वे लोग इन पीजी का फायदा उठा सकेंगे.

कड़कनाथ मुर्गे का मीट मोबाइल एप के माध्यम से सीधे आपके घर

किसान भाइयों आपने कड़कनाथ मुर्गे की खबर जरूर पढ़ी होगी. इस मुर्गे का अंडा व मीट काफी लोकप्रिय है मध्य प्रदेश में मशहूर इस कड़कनाथ मुर्गा अब इतना प्रसिद्ध हो गया कि सरकार ने लोगों को सीधे-सीधे इसे उपलब्ध कराने के लिए एक नया डिजिटल माध्यम अपनाते हुए एक एप्लीकेशन लाँच किया है.

यहाँ मध्य प्रदेश सरकार ने एक नया कदम उठाया है, अब सरकार उन लोगों को जो कड़कनाथ मुर्गा खाना चाहते हैं वह एक ऐप के जरिए कड़कनाथ मुर्गा उपलब्ध कराएगी. इसके लिए मध्य प्रदेश के सहकारिता मंत्री विश्वास नारंग ने एमपी कड़कनाथ ऐप की लाँच किया है जो यह सुविधा लोगों को घर बैठे पहुंचाएगी.

आप को बता दें कि यह कड़कनाथ मुर्गा मध्य प्रदेश में बहुत पाया जाता है बाजार में हजार रुपए किलो तक बिकता है. बाजार में इसकी मांग अधिक रहती है. इसके मीट में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है जबकि कोलेस्ट्राल व वसा काफी कम होता है जिससे यह स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है.

मध्य प्रदेश वासी इस ऐप के जरिए इस मुर्गे की उपलब्धता भी जान सकेंगे. वाकई यह रोचक तथ्य है कि एक नस्ल की कुछ खासियतों ने उसे इतना प्रसिद्ध बना दिया कि लोगों की जुबान पर उसका नाम है साथ ही मीट खाने के लिए लोग उतावले रहते हैं.

इतना ही नहीं आज एक प्रदेश सरकार ने इसका मीट की घर बैठे देने के लिए ऐप तक लाँच कर दिया ऐसे में उन लोगों के लिए यह एक अच्छी खबर है जो इस नस्ल का पालन कर रहें हैं.

अब गाय-भैंसों का भी बनेगा ‘आधार कार्ड’, ये है पूरी स्कीम

विशिष्ट पहचान संख्या आधार को लेकर देशभर में बहस जारी है. इस बीच केंद्र सरकार अब दुधारू गाय-भैंसों के लिए भी 12 अंकों की विशिष्ट पहचान संख्या जारी कर रही है. इसके इस्तेमाल से दुधारू गायों और भैंसों की पहचान और दुग्ध उत्पाद को बढ़ावा देने की योजना है.

इस संबंध में 9 करोड़ दुधारू मवेशियों की पहचान करने के लिए 148 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है. कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने सोमवार को लोकसभा में यह जानकारी दी. हिना गावित और पी आर सुंदरम के प्रश्न के लिखित उत्तर में कृषि मंत्री ने कहा कि इससे पशुओं के वैज्ञानिक प्रजनन, रोगों के फैलने पर नियंत्रण और दुग्ध उत्पादों के व्यापार में वृद्धि करने के उद्देश्य की प्राप्ति होगी.

राधा मोहन सिंह ने बताया कि राष्ट्रीय पशु उत्पादकता मिशन के ‘पशु संजीवनी’ घटक के तहत इसे लागू किया जा रहा है. सिंह ने कहा कि इसकी तकनीक के लिहाज से राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड पहले ही पशु स्वास्थ्य और उत्पादन संबंधी सूचना नेटवर्क (INAPH) विकसित कर चुका चुका है, जिसे 12 अंकीय विशिष्ट पहचान संख्या वाले पोलीयूरिथिन टैग का प्रयोग करके पशु पहचान संबंधी डाटा अपलोड करने के लिए राष्ट्रीय डाटाबेस के रूप में प्रयोग किया जा रहा है.

कृषि मंत्री ने बताया कि निविदा के आधार पर इस पोलीयूरिथिन टैग की कीमत 8 से 12 रुपये प्रति टैग है. नौ करोड़ दुधारू पशुओं की पहचान करने और उन्हें नकुल स्वास्थ्य पत्र (स्वास्थ्य कार्ड) जारी करने के लिए पशु संजीवनी घटक के तहत 148 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है. इस घटक के कार्यान्वयन के लिए राज्यों को केंद्रीय हिस्से के रूप में 75 करोड़ रुपये की राशि पहले ही जारी की जा चुकी है.

ये है दुनिया की सबसे महंगी गाय,9700 लीटर देती है दूध

गाय का दूध काफी फायदेमंद माना जाता है। बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी को गाय का दूध पीने की सलाह दी जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं एक गाय कितना दूध दे सकती है, शायद 2 लीटर, 4 लीटर या आप कहेंगे ज्यादा से ज्यादा 10 लीटर ।

लेकिन आज जिस गाय के बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं वह कोई साधारण गाय नही है. वह 10-20 नहीं 100-200 भी नहीं बल्कि 9700 लीटर दूध देती है. जी हां, यह हैरानी की बात तो है लेकिन सच है। ये गाय अपने एक सीजन में इतनी तादाद में दूध देती है।

उत्तरी अमेरिका में पाई जाने वाली इस गाय का नाम ईस्टसाइड लेविसडेल गोल्ड मिस्सी है. गाय की इस प्रजाति की संख्या बहुत कम है. जानकारी के मुताबिक एक सीमित समय में यह गाय 9700 लीटर दूध दे देती है. यह गाय सिर्फ सबसे ज्यादा दूध ही नहीं देती बल्की सबसे महंगी भी है. रिपोर्ट्स की मानें तो इस गाय की कीमत 22 करोड़ रुपए है।

मिस्सी की नीलामी में इसकी कीमत 3.23 मिलियन डॉलर तक लग चुकी है। नीलामी में शामिल हर व्यक्ति की चाहत यही होती है कि वो इस गाय को खरीदे। वहीं आपको बता दें कि पिछले 30-40 सालों में इस नस्ल की गायों में भारी बढ़ोत्तरी हुई है, जिसके कारण अमरीका और कनाडा में दूध उत्पादन में वृद्धि देखने को मिल रही है।

गाय-भैंस को गाभिन करने का सही समय जानने के लिए इस्तेमाल करें यह यंत्र

ज्यादातर पशुपालकों को पता ही नहीं होता है कि गाय-भैंस को गाभिन कराने का सही समय क्या है, लेकिन भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) ने एक यंत्र क्रिस्टोस्कोप तैयार किया है, जिसके द्वारा पशुपालक आसानी ये पता लगा सकते है कि गाय-भैंस को गाभिन करने का सही समय क्या है।

“अधिकतर किसान को गाय-भैंस के गर्मी में आने के लक्षण को नहीं पहचान पाते है और गाभिन करवा देते है, लेकिन गर्भ ठहरता नहीं है, जिससे किसान को आर्थिेक नुकसान होता है। यह यंत्र गाय-भैंस के सही मदकाल की सटीक जानकारी देता है।

क्रिस्टोस्कोप बाजारों में भी उपलब्ध है। श्लेष्मा (म्यूकस) को यंत्र के ऊपरी हिस्से में डालकर स्कोप से देखने पर ही गाय या भैंस का मदकाल पता चल जाएगा।” ऐसा बताते हैं, भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ हरेंद्र कुमार।

हर पशु का एक मदचक्र होता है। गाय-भैंसों में यह लगभग 21 दिन का है। मदचक्र पूरा होने पर मदकाल आता है। यह दो से तीन दिन तक चलता है। मदकाल में अलग-अलग समय पर गाय और भैंसों के शरीर में बनने वाले स्लेश्मा यानी म्यूकस से ही उनके गर्भधारण की संभावना घटती-बढ़ती है।

क्रिस्टोस्कोप में लिए श्लेष्मा के फर्न पैटर्न की मात्रा ज्यादा मिली तो कृत्रिम गर्भाधान कराने पर गर्भ टहरने की संभावना ज्यादा और फर्न पैटर्न कम होने पर संभावना कम हो जाएगी।

डॉ हरेंद्र बताते हैं, “यह हेडी टूल यंत्र है। इस यंत्र को पेटेंट कराकर निजी कंपनियों को दे दिया है। कोई भी किसान इसको खरीद सकता है। उन्हें किसी अस्पताल में जाने में जाने की जरूरत नहीं होगी। बरेली आस-पास के क्षेत्र के लोग इसका इस्तेमाल भी कर रहे है। उनके कृत्रिम गर्भाधान की सफलता की दर लगभग सतर फीसद तक बढ़ गई है। अभी यह औसत महज तीस फीसद तक थी।”

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मदकाल के गलत समय कृत्रिम गर्भाधान कराने से किसानों का पशुओं के खान-पान में धन और समय दोनों खराब होता है। सही समय पर गर्भधारण न हो पाने से दुग्ध उत्पादन भी नहीं हो पाता। दो से तीन बार मदकाल निकल जाने पर गायें या भैंस बांझ भी हो जाती है।

इस यंत्र की जानकारी के लिए आप इस नंबर पर संपर्क कर सकते है:

  • भारतीय पशु अनुसंधान संस्थान
  • डॉ हरेंद्र प्रसाद
  • प्रधान वैज्ञानिक
  • 09411631354

गर्मियों में इन बातों का रखे ध्यान, नहीं घटेगा दूध उत्पादन

गर्मियों का मौसम शुरू हो गया है। इस मौसम में ज्यादातर पशुपालक पशुओं के खान-पान पर ज्यादा ध्यान नहीं देते, जिससे दूध उत्पादन घट जाता है। इसलिए इस मौसम में पशुओं की विशेष देखभाल बहुत जरूरी है।

पशुचिकित्सक डॉ रुहेला बताती हैं “पशुओं को दिन में तीन से चार बार पानी पिलायें, उतनी बार ताजा पानी दें। सुबह और शाम नहलाना जरूरी है। गर्मियों में पशुओं का दूध घट जाता है इसलिए इनके खान-पान का विशेष ध्यान दें हरा चारा और मिनिरल मिक्चर दें इससे पशु का दूध उत्पादन नहीं घटेगा। इस मौसम पशुओं को गलाघोटू बीमारी का टीका लगवा लें। यह टीका नजदीकी पशुचिकित्सालय में दो रुपए लगता है।”

गर्मी के मौसम में हवा के गर्म थपेड़ों और बढ़े हुए तापमान से पशुओं में लू लगने का खतरा बढ़ जाता है। अधिक समय तक धूप में रहने पर पशुओं को सनस्ट्रोक बीमारी हो सकती है। इसलिए उन्हें किसी हवादार या छायादार जगह पर बांधे। इस मौसम में नवजात बच्चों की भी देखभाल जरूर करें। अगर पशुपालक उनका ढंग से ख्याल नहीं रखता है तो उसको आगे काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

इन बातों का रखें ध्यान

  • सीधे तेज धूप और लू से नवजात पशुओं को बचाने के लिए पशु आवास के सामने की ओर खस या जूट के बोरे का पर्दा लटका देना चाहिए ।
  • नवजात बच्चे के जन्म के तुरंत बाद उसकी नाक और मुंह से सारा म्यूकस (लेझा बेझा) बाहर निकाल देना चहिए।
  • यदि बच्चे को सांस लेने में ज्यादा दिक्कत हो तो उसके मुंह से मुंह लगा कर सांस प्रक्रिया को ठीक से काम करने देने में सहायता पहुंचानी चहिए।
  • नवजात बछड़े का नाभि उपचार करने के तहत उसकी नाभिनाल को शरीर से आधा इंच छोड़ कर साफ धागे से कस कर बांध देना चहिए।

  • बंधे स्थान के ठीक नीचे नाभिनाल को स्प्रिट से साफ करने के बाद नये और स्प्रिट की मदद से कीटाणु रहित किये हुए ब्लेड की मदद से काट देना चहिए। कटे हुई जगह पर खून बहना रोकने के लिए टिंक्चर आयोडीन दवा लगा देनी चहिए।
  • नवजात बछड़े को जन्म के आधे घंटे के अंदर खीस पिलाना बेहद जरूरी होता है। यह खीस बच्चे के भीतर बीमारियों से लड़ने में मदद करता है।
  • अगर कभी बच्चे को जन्म देने के बाद मां की मृत्यु हो जाती है तो कृत्रिम खीस का प्रयोग भी किया जा सकता है। इसे बनाने के लिए एक अंडे को फेंटने के बाद 300 मिलीलीटर पानी में मिला देते हैं । इस मिश्रण में 1/2 छोटा चम्मच अरेंडी का तेल और 600 मिली लीटर सम्पूर्ण दूध मिला देते हैं। इस मिश्रण को एक दिन में 3 बार 3-4 दिनों तक पिलाना चहिए।इसके बाद यदि संभव हो तो नवजात बछड़े/बछिया का नाप जोख कर लें। साथ ही यह भी ध्यान दें कि कहीं बच्चे में कोई असामान्यता तो नहीं है। इसके बाद बछड़े/बछिया के कान में उसकी पहचान का नंबर डाल दें।

नवजात बछड़े/बछिया का आहार

नवजात बछड़े को दिया जाने वाला सबसे पहला और सबसे जरूरी आहार है मां का पहला दूध यानी खीस। खीस का निर्माण मां के द्वारा बछड़े के जन्म से 3 से 7 दिन बाद तक किया जाता है और यह बछड़े के लिए पोषण और तरल पदार्थ का प्राथमिक स्रोत होता है।

यह बछड़े को आवश्यक प्रतिरोधक क्षमता भी उपलब्ध कराता है जो उसे संक्रामक रोगों और पोषण संबंधी कमियों का सामना करने की क्षमता देता है। यदि खीस उपलब्ध हो तो जन्म के बाद पहले तीन दिनों तक नवजात को खीस पिलाते रहना चाहिए।

जन्म के बाद खीस के अतिरिक्त बछड़े को 3 से 4 सप्ताह तक मां के दूध की आवश्यकता होती है। उसके बाद बछड़ा चारा-भूसा पचाने में सक्षम होता है। आगे भी बछड़े को दूध पिलाना पोषण की दृष्टि से अच्छा है लेकिन यह अनाज खिलाने की तुलना में महंगा होता है।

बछड़े को खिलाने के लिए इस्तेमाल होने वाले बर्तनों को अच्छी तरह साफ रखें। इन्हें और खिलाने में इस्तेमाल होने वाली अन्य वस्तुओं को साफ और सूखे स्थान पर रखें।

ये गाय 50 से 55 लीटर तक देती हैं दूध, यहां से ले सकते हैं इस नस्ल का सीमन

हरियाणा के लाला लाजपत राय पशु-चिकित्सा एंव पशु विज्ञान विश्वविद्यालय (लुवास) के वैज्ञानिकों ने तीन नस्लों के मेल से तैयार की गाय की नई प्रजाति ‘हरधेनु’ को रिलीज कर दिया है। इस समय इस नस्ल की लगभग 250 गाय फार्म में हैं। जहां से इस नस्ल के सांड का सीमन ले सकते है।

उत्तरी-अमेरीकी (होल्स्टीन फ्रीजन), देसी हरियाणा और साहीवाल नस्ल की क्रॅास ब्रीड गाय हरधेनु लगभग 50 से 55 लीटर तक दूध देने की क्षमता रखती है। हरधेनू प्रजाति के अंदर 62.5 प्रतिशत खून उत्तरी-अमेरिका नस्ल और 37.5 प्रतिशत खून हरियाणा और साहीवाल का है।

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लुवास विश्वविद्यालय के पशु आनुवांशिकी एवं प्रजनन विभागाध्यक्ष और इस शोध के वैज्ञानिक डॉ. बी.एल.पांडर ने बताते हैं, ”हरधेनु गाय स्थानीय नस्ल की अपेक्षा हर मामले में बेहतर गाय है और इससे पशुपालकों को काफी लाभ मिलेगा क्योंकि यह जल्दी बढ़ने वाली नस्ल है।” अन्य नस्लों की तुलना करते हुए डा. पांडर बताते हैं,”स्थानीय नस्ल औसतन लगभग 5-6 लीटर दूध रोजाना देती है, जबकि हरधेनु गाय औसतन लगभग 15-16 लीटर दूध प्रतिदिन देती है।”

1970 में हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। उस समय केंद्र सरकार की ओर से गाय की नस्ल सुधार के लिए ‘इवेलेशन ऑफ न्यू ब्रीड थ्रू क्रॉस ब्रीडिंग एंड सिलेक्शन’ को लेकर प्रोजेक्ट शुरु हुआ। 2010 में वेटनरी कॉलेज को अलग कर लुवास विश्वविद्यालय बनाया गया।

इस गाय की खुराक की जानकारी देते हुए पांडर बताते हैं,”एक दिन में लगभग 40-50 किलो हरा चारा और 4-5 किलो सूखा चारा खाती है।”

हरधेनु गाय के गुण

  • 20 महीने में प्रजनन के लिए विकसित हो जाती है जबकि स्थानीय नस्ल इसके लिए 36 महीने का समय लेती है।
  • हरधेनु 30 महीने की उम्र में ही बछड़े देना शुरू कर देती है, जबकि स्थानीय नस्ल 45 महीने में बछड़े देती है।
  • दूध देने की क्षमता और उसमें फैट की मात्रा भी अधिक है।
  • किसी भी तापमान में जीवित रह सकती है।

अगर आप इस गाय के नस्ल के सीमन को लेना चाहते है तो लाला लाजपत राय पशु विश्वविद्यालय में भी संपर्क कर सकते हैं–

  • 0166- 2256101
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300 रुपए लीटर बिक रहा इस पशु का दूध, दो महीने तक नहीं होता खराब

जिले के सादड़ी में 23 साल पहले देश की पहली कैमल मिल्क डेयरी की शुरुआत करने वाले लोकहित पशुपालक संस्था व केमल करिश्मा सादड़ी के निदेशक हनुवंत सिंह राठौड़ ने बताया कि सादड़ी और सावा की ढाणी के ऊंटों के दूध पर लंबे समय से शोध चल रहा है। खेजड़ी, बैर खाने से उनके शरीर में हाई प्रोटीन बनता है। इसके दूध में इंसुलिन और लो फेट है, इसलिए डायबिटीज और मंदबुद्धि बच्चों के इलाज के लिए बेहतर माना जा रहा है।

  •  सिंगापुर को ऊंटनी का दूध एक्सपोर्ट करने की तैयारी की जा रही है। जो 300 रुपए प्रति लीटर में बेचा जा रहा है। यह दूध दो महीने तक खराब नहीं होता।
  • राठौड़ ने बताया कि चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, सिरोही में 5-6 हजार लीटर दूध प्रतिदिन संग्रहित हो सकता है।
  • जिले में सावा की ढाणी की ऊंटनी का दूध विमंदित व कमजोर बच्चों के साथ गंभीर बीमारियों के उपचार में काम आ सकता है। इस संभावना से इजरायल के बाद अब जर्मनी में भी शोध शुरू हो गया है। नतीजा और सार्थक रहा तो मेवाड़ी ऊंटों के दूध की डिमांड पूरी दुनिया में बढ़ सकती है।
  • इसका खुलासा रविवार को यहां जिलास्तरीय पशु मेला व प्रदर्शनी में आए सावा की ढाणी के ऊंट पालक मुखिया देवीलाल रायका ने किया।

टाइफाइड में भी फायदेमंद

  •  उन्होंने बताया कि यह दूध बरसों से चाय के साथ बीमारियां में भी उपयोग लिया जा रहा है। शुगर, टीबी, दमा, सांस लेने में दिक्कत व हड्डियों को जोड़ने सहित टाइफाइड में भी फायदेमंद माना जाता है।
  •  27 साल से राजस्थान के ऊंटों पर शोध कर रही जर्मनी की डॉ. इल्से कोल्हर रोलेप्शन ने एक माह पूर्व सावा की ढाणी में इस दूध के सैंपल लेकर विदेश में भेजे। जर्मनी, सिंगापुर में शोध चल रहा है।

इजरायल की टीम भी सैंपल ले गई

  • छह माह पहले इजरायल की टीम भी सैंपल ले गई। जिनके अनुसार दिमागी रूप से कमजोर व 17 साल से कम उम्र के बच्चों का कद बढ़ाने में यह फायदेमंद साबित हो सकता है।
  •  पशुपालन विभाग के उपनिदेशक डॉ. ताराचंद मेहरड़ा ने बताया कि जिले में पशुगणना के अनुसार ऊंट की संख्या 2166 है। जबकि वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है।
  • देवीलाल रायका , गोविंदसिंह रेबारी ने कहा कि ऊंट खरीदने, बेचने पर प्रतिबंध है। मादा के लिए तो प्रतिबंध ठीक है, लेकिन नर ऊंट पर प्रतिबंध हटना चाहिए। सब्सिडी भी कम है। जंगलों या चारागाह भूमि पर भी इसे चरने नहीं दिया जाता है। ऊंटनी की संख्या कमी हो रही है।

ऊंटनी के दूध में कई विशेषताएं होती हैं। बच्चों के शारीरिक विकास में भी यह उपयोगी है। इस पर शोध हो चुका है। छह माह पूर्व इजरायल की टीम ने भी यहां ऊंटनी के दूध के लिए सैंपल लिए थे। जिले में भदेसर, बेगूं और गंगरार क्षेत्र में ऊंटपालन होता

सबसे ज्यादा ऊंटनी चित्तौड़गढ़ में

ऊंट पालक देवीलाल रायका , गोविंद सिंह रायका , अमरचंद, जगदीश, आदि ने कहा कि सरकार ने जयपुर में केमल दूध मिनी प्लांट लगाया है। जबकि चित्तौड़ जिले से एक हजार लीटर दूध प्रतिदिन संग्रहित हो सकता है। प्लांट यहीं लगना चाहिए था। राज्य में सबसे ज्यादा ऊंटनी चित्तौडग़ढ़, भीलवाड़ा में हैं।