गर्मियों में इन बातों का रखे ध्यान, नहीं घटेगा दूध उत्पादन

गर्मियों का मौसम शुरू हो गया है। इस मौसम में ज्यादातर पशुपालक पशुओं के खान-पान पर ज्यादा ध्यान नहीं देते, जिससे दूध उत्पादन घट जाता है। इसलिए इस मौसम में पशुओं की विशेष देखभाल बहुत जरूरी है।

पशुचिकित्सक डॉ रुहेला बताती हैं “पशुओं को दिन में तीन से चार बार पानी पिलायें, उतनी बार ताजा पानी दें। सुबह और शाम नहलाना जरूरी है। गर्मियों में पशुओं का दूध घट जाता है इसलिए इनके खान-पान का विशेष ध्यान दें हरा चारा और मिनिरल मिक्चर दें इससे पशु का दूध उत्पादन नहीं घटेगा। इस मौसम पशुओं को गलाघोटू बीमारी का टीका लगवा लें। यह टीका नजदीकी पशुचिकित्सालय में दो रुपए लगता है।”

गर्मी के मौसम में हवा के गर्म थपेड़ों और बढ़े हुए तापमान से पशुओं में लू लगने का खतरा बढ़ जाता है। अधिक समय तक धूप में रहने पर पशुओं को सनस्ट्रोक बीमारी हो सकती है। इसलिए उन्हें किसी हवादार या छायादार जगह पर बांधे। इस मौसम में नवजात बच्चों की भी देखभाल जरूर करें। अगर पशुपालक उनका ढंग से ख्याल नहीं रखता है तो उसको आगे काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

इन बातों का रखें ध्यान

  • सीधे तेज धूप और लू से नवजात पशुओं को बचाने के लिए पशु आवास के सामने की ओर खस या जूट के बोरे का पर्दा लटका देना चाहिए ।
  • नवजात बच्चे के जन्म के तुरंत बाद उसकी नाक और मुंह से सारा म्यूकस (लेझा बेझा) बाहर निकाल देना चहिए।
  • यदि बच्चे को सांस लेने में ज्यादा दिक्कत हो तो उसके मुंह से मुंह लगा कर सांस प्रक्रिया को ठीक से काम करने देने में सहायता पहुंचानी चहिए।
  • नवजात बछड़े का नाभि उपचार करने के तहत उसकी नाभिनाल को शरीर से आधा इंच छोड़ कर साफ धागे से कस कर बांध देना चहिए।

  • बंधे स्थान के ठीक नीचे नाभिनाल को स्प्रिट से साफ करने के बाद नये और स्प्रिट की मदद से कीटाणु रहित किये हुए ब्लेड की मदद से काट देना चहिए। कटे हुई जगह पर खून बहना रोकने के लिए टिंक्चर आयोडीन दवा लगा देनी चहिए।
  • नवजात बछड़े को जन्म के आधे घंटे के अंदर खीस पिलाना बेहद जरूरी होता है। यह खीस बच्चे के भीतर बीमारियों से लड़ने में मदद करता है।
  • अगर कभी बच्चे को जन्म देने के बाद मां की मृत्यु हो जाती है तो कृत्रिम खीस का प्रयोग भी किया जा सकता है। इसे बनाने के लिए एक अंडे को फेंटने के बाद 300 मिलीलीटर पानी में मिला देते हैं । इस मिश्रण में 1/2 छोटा चम्मच अरेंडी का तेल और 600 मिली लीटर सम्पूर्ण दूध मिला देते हैं। इस मिश्रण को एक दिन में 3 बार 3-4 दिनों तक पिलाना चहिए।इसके बाद यदि संभव हो तो नवजात बछड़े/बछिया का नाप जोख कर लें। साथ ही यह भी ध्यान दें कि कहीं बच्चे में कोई असामान्यता तो नहीं है। इसके बाद बछड़े/बछिया के कान में उसकी पहचान का नंबर डाल दें।

नवजात बछड़े/बछिया का आहार

नवजात बछड़े को दिया जाने वाला सबसे पहला और सबसे जरूरी आहार है मां का पहला दूध यानी खीस। खीस का निर्माण मां के द्वारा बछड़े के जन्म से 3 से 7 दिन बाद तक किया जाता है और यह बछड़े के लिए पोषण और तरल पदार्थ का प्राथमिक स्रोत होता है।

यह बछड़े को आवश्यक प्रतिरोधक क्षमता भी उपलब्ध कराता है जो उसे संक्रामक रोगों और पोषण संबंधी कमियों का सामना करने की क्षमता देता है। यदि खीस उपलब्ध हो तो जन्म के बाद पहले तीन दिनों तक नवजात को खीस पिलाते रहना चाहिए।

जन्म के बाद खीस के अतिरिक्त बछड़े को 3 से 4 सप्ताह तक मां के दूध की आवश्यकता होती है। उसके बाद बछड़ा चारा-भूसा पचाने में सक्षम होता है। आगे भी बछड़े को दूध पिलाना पोषण की दृष्टि से अच्छा है लेकिन यह अनाज खिलाने की तुलना में महंगा होता है।

बछड़े को खिलाने के लिए इस्तेमाल होने वाले बर्तनों को अच्छी तरह साफ रखें। इन्हें और खिलाने में इस्तेमाल होने वाली अन्य वस्तुओं को साफ और सूखे स्थान पर रखें।

ये गाय 50 से 55 लीटर तक देती हैं दूध, यहां से ले सकते हैं इस नस्ल का सीमन

हरियाणा के लाला लाजपत राय पशु-चिकित्सा एंव पशु विज्ञान विश्वविद्यालय (लुवास) के वैज्ञानिकों ने तीन नस्लों के मेल से तैयार की गाय की नई प्रजाति ‘हरधेनु’ को रिलीज कर दिया है। इस समय इस नस्ल की लगभग 250 गाय फार्म में हैं। जहां से इस नस्ल के सांड का सीमन ले सकते है।

उत्तरी-अमेरीकी (होल्स्टीन फ्रीजन), देसी हरियाणा और साहीवाल नस्ल की क्रॅास ब्रीड गाय हरधेनु लगभग 50 से 55 लीटर तक दूध देने की क्षमता रखती है। हरधेनू प्रजाति के अंदर 62.5 प्रतिशत खून उत्तरी-अमेरिका नस्ल और 37.5 प्रतिशत खून हरियाणा और साहीवाल का है।

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लुवास विश्वविद्यालय के पशु आनुवांशिकी एवं प्रजनन विभागाध्यक्ष और इस शोध के वैज्ञानिक डॉ. बी.एल.पांडर ने बताते हैं, ”हरधेनु गाय स्थानीय नस्ल की अपेक्षा हर मामले में बेहतर गाय है और इससे पशुपालकों को काफी लाभ मिलेगा क्योंकि यह जल्दी बढ़ने वाली नस्ल है।” अन्य नस्लों की तुलना करते हुए डा. पांडर बताते हैं,”स्थानीय नस्ल औसतन लगभग 5-6 लीटर दूध रोजाना देती है, जबकि हरधेनु गाय औसतन लगभग 15-16 लीटर दूध प्रतिदिन देती है।”

1970 में हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। उस समय केंद्र सरकार की ओर से गाय की नस्ल सुधार के लिए ‘इवेलेशन ऑफ न्यू ब्रीड थ्रू क्रॉस ब्रीडिंग एंड सिलेक्शन’ को लेकर प्रोजेक्ट शुरु हुआ। 2010 में वेटनरी कॉलेज को अलग कर लुवास विश्वविद्यालय बनाया गया।

इस गाय की खुराक की जानकारी देते हुए पांडर बताते हैं,”एक दिन में लगभग 40-50 किलो हरा चारा और 4-5 किलो सूखा चारा खाती है।”

हरधेनु गाय के गुण

  • 20 महीने में प्रजनन के लिए विकसित हो जाती है जबकि स्थानीय नस्ल इसके लिए 36 महीने का समय लेती है।
  • हरधेनु 30 महीने की उम्र में ही बछड़े देना शुरू कर देती है, जबकि स्थानीय नस्ल 45 महीने में बछड़े देती है।
  • दूध देने की क्षमता और उसमें फैट की मात्रा भी अधिक है।
  • किसी भी तापमान में जीवित रह सकती है।

अगर आप इस गाय के नस्ल के सीमन को लेना चाहते है तो लाला लाजपत राय पशु विश्वविद्यालय में भी संपर्क कर सकते हैं–

  • 0166- 2256101
  • 0166- 2256065

300 रुपए लीटर बिक रहा इस पशु का दूध, दो महीने तक नहीं होता खराब

जिले के सादड़ी में 23 साल पहले देश की पहली कैमल मिल्क डेयरी की शुरुआत करने वाले लोकहित पशुपालक संस्था व केमल करिश्मा सादड़ी के निदेशक हनुवंत सिंह राठौड़ ने बताया कि सादड़ी और सावा की ढाणी के ऊंटों के दूध पर लंबे समय से शोध चल रहा है। खेजड़ी, बैर खाने से उनके शरीर में हाई प्रोटीन बनता है। इसके दूध में इंसुलिन और लो फेट है, इसलिए डायबिटीज और मंदबुद्धि बच्चों के इलाज के लिए बेहतर माना जा रहा है।

  •  सिंगापुर को ऊंटनी का दूध एक्सपोर्ट करने की तैयारी की जा रही है। जो 300 रुपए प्रति लीटर में बेचा जा रहा है। यह दूध दो महीने तक खराब नहीं होता।
  • राठौड़ ने बताया कि चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, सिरोही में 5-6 हजार लीटर दूध प्रतिदिन संग्रहित हो सकता है।
  • जिले में सावा की ढाणी की ऊंटनी का दूध विमंदित व कमजोर बच्चों के साथ गंभीर बीमारियों के उपचार में काम आ सकता है। इस संभावना से इजरायल के बाद अब जर्मनी में भी शोध शुरू हो गया है। नतीजा और सार्थक रहा तो मेवाड़ी ऊंटों के दूध की डिमांड पूरी दुनिया में बढ़ सकती है।
  • इसका खुलासा रविवार को यहां जिलास्तरीय पशु मेला व प्रदर्शनी में आए सावा की ढाणी के ऊंट पालक मुखिया देवीलाल रायका ने किया।

टाइफाइड में भी फायदेमंद

  •  उन्होंने बताया कि यह दूध बरसों से चाय के साथ बीमारियां में भी उपयोग लिया जा रहा है। शुगर, टीबी, दमा, सांस लेने में दिक्कत व हड्डियों को जोड़ने सहित टाइफाइड में भी फायदेमंद माना जाता है।
  •  27 साल से राजस्थान के ऊंटों पर शोध कर रही जर्मनी की डॉ. इल्से कोल्हर रोलेप्शन ने एक माह पूर्व सावा की ढाणी में इस दूध के सैंपल लेकर विदेश में भेजे। जर्मनी, सिंगापुर में शोध चल रहा है।

इजरायल की टीम भी सैंपल ले गई

  • छह माह पहले इजरायल की टीम भी सैंपल ले गई। जिनके अनुसार दिमागी रूप से कमजोर व 17 साल से कम उम्र के बच्चों का कद बढ़ाने में यह फायदेमंद साबित हो सकता है।
  •  पशुपालन विभाग के उपनिदेशक डॉ. ताराचंद मेहरड़ा ने बताया कि जिले में पशुगणना के अनुसार ऊंट की संख्या 2166 है। जबकि वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है।
  • देवीलाल रायका , गोविंदसिंह रेबारी ने कहा कि ऊंट खरीदने, बेचने पर प्रतिबंध है। मादा के लिए तो प्रतिबंध ठीक है, लेकिन नर ऊंट पर प्रतिबंध हटना चाहिए। सब्सिडी भी कम है। जंगलों या चारागाह भूमि पर भी इसे चरने नहीं दिया जाता है। ऊंटनी की संख्या कमी हो रही है।

ऊंटनी के दूध में कई विशेषताएं होती हैं। बच्चों के शारीरिक विकास में भी यह उपयोगी है। इस पर शोध हो चुका है। छह माह पूर्व इजरायल की टीम ने भी यहां ऊंटनी के दूध के लिए सैंपल लिए थे। जिले में भदेसर, बेगूं और गंगरार क्षेत्र में ऊंटपालन होता

सबसे ज्यादा ऊंटनी चित्तौड़गढ़ में

ऊंट पालक देवीलाल रायका , गोविंद सिंह रायका , अमरचंद, जगदीश, आदि ने कहा कि सरकार ने जयपुर में केमल दूध मिनी प्लांट लगाया है। जबकि चित्तौड़ जिले से एक हजार लीटर दूध प्रतिदिन संग्रहित हो सकता है। प्लांट यहीं लगना चाहिए था। राज्य में सबसे ज्यादा ऊंटनी चित्तौडग़ढ़, भीलवाड़ा में हैं।

जाने यूरिया के ईस्तमाल से पराली को प्रोटीन पशु खुराक बनाने का तरीका

पशुओं के लिए तूड़ी/पराली को यूरिया से उपचार करने का तरीका भैंसों/गायों के रोयों में स्थित सूक्ष्म जीव यूरिया को तोड़कर अपनी जीव प्रोटीन बनाने के लिए प्रयोग कर लेते हैं जो पशु की ज़रूरतों को पूरा करती है।

इसलिए पशुओं के वितरण में 1 प्रतिशत यूरिये का प्रयोग करने से वितरण में यूरिया अच्छी तरह मिक्स होना चाहिए और यूरिया की डलियां नहीं होनी चाहिए। पशुओं के चारे के लिए यदि तूड़ी/पराली को यूरिये से उपचार करके प्रयोग करते हैं तो तूड़ी/ पराली के खुराकी गुणों में वृद्धि की जा सकती है और उपचारित पराली को सूखे तौर पर प्रयोग करके पशुओं की खुराक में प्रोटीन की कमी को दूर भी किया जा सकता है।

यूरिये से कैसे उपचारित की जाये तूड़ी?

तूड़ी/पराली को यूरिये से उपचार करने के लिए 4 क्विंटल तूड़ी या कुतरी हुई पराली लें और इसे ज़मीन पर बिछा लें। फिर 14 किलो यूरिये को 200 लीटर पानी में घोल लें और तूड़ी/पराली पर छिड़क लें ताकि सारी तूड़ी/पराली गीली हो जाये।

अच्छी तरह मिलाने के बाद इसे दबाकर 9 दिनों के लिए रखें। 9 दिनों के बाद उपचारित की हुई तूड़ी तैयार हो जाती है। यह गुणकारी और नर्म हो जाती है।

किस तरह खिलानी है?

खिलाते समय तूड़ी को एक तरफ से ही खोलें और कुछ देर हवा लगने दें। यदि हवा नहीं लगवाते तो अमोनिया गैस जो बनी होती है वह पशु की आंखों में चुभने लगती है। फिर पशु को थोड़ा थोड़ा रिझाओ। उपचारित तूड़ी को प्रति 4 किलो के हिसाब से हरे चारे में मिलाकर बड़े पशुओं को खिलई जा सकती है।

नोट – इसका प्रयोग, घोड़े, सुअरों और 6 महीने से कम उम्र के पशुओं के लिए ना किया जाये

स्त्रोत – गुरू अंगद देव वैटनरी यूनिवर्सिटी, लुधियाना

ये है 6 लाख की गाय लक्ष्मी, हर रोज देती है 60 लीटर दूध

भारत दूध उत्पादन में विश्व में दूसरे नंबर पर है। यह इसलिए संभव हो पाया है क्योंकि लोग डेयरी उद्योग में लगातार प्रयासरत हैं। इसी तरह का एक उदाहरण हरियाणा के करनाल जिले के दादुपुर गांव का है।

यहां एक नेशनल अवार्डी गाय एक दिन में 60 लीटर दूध देती है। औसत निकाला जाए तो हर घंटे में लगभग ढाई लीटर दूध दे रही है।

ब्यूटी में है चैंपियन का जीत चुकी है खिताब

डेयरी चला रहे राजबीर आर्य बताते हैं कि होल्सटीन फ्रिसन नस्ल की इस गाय का नाम लक्ष्मी है। लक्ष्मी दूध देने में तो अव्वल है ही लेकिन इसने अपनी ब्यूटी के लिए भी राष्ट्रीय स्तर के पशु मेलों में इनाम जीते हैं। मुक्तसर पंजाब व राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान में ब्यूटी चैंपियन रह चुकी है।

ये है खुराक

लक्ष्मी हर रोज 50 किलोग्राम हरा चारा, 2 किलोग्राम सूखा तूड़ा और 14 किलो दाना खाती है। लक्ष्मी व अन्य पशुओं की देखभाल में 6 आदमी दिन-रात लगे रहते हैं। लक्ष्मी का जन्म राजबीर के घर ही हुआ था, जबकि इसकी मां को वे पंजाब से लेकर आए थे।

5 लाख कीमत लगने पर लक्ष्मी को बेचने को तैयार नहीं है राजबीर

राजबीर बताते हैं कि जनवरी के महीने में बैंगलुरू से गाय खरीदने के लिए उसके फार्म पर लोग आए थे। उन्होंने इसकी कीमत 5 लाख रुपए लगाई थी। इस कीमत पर भी राजबीर ने गाय को नहीं बेचा।

डेयरी उद्योग के 15 लाख रुपए सालाना कमा रहे हैं राजबीर

डेढ़ एकड़ भूमि पर बने राजबीर के फार्म पर फिलहाल 75 गाय हैं। जिनमें से 60 होल्सटीन फ्रिसन, 10 जर्सी और 5 साहिवाल नस्ल की है। इस मौसम में हर रोज 800 लीटर दूध उत्पादन हो रहा है।

जिसमें से कुछ शहर में बेचने जाते हैं, बाकी को अमूल डेयरी भेजा जाता है। वे पिछले 18 वर्ष से डेयरी उद्योग से जुड़े हुए हैं। 1998 में मात्र 5 गाय से शुरूआत की थी। अब वे 15 लाख रुपए सालाना कमा रहे हैं।

जाने दूध में घी(फैट) बढाने का पक्का फार्मूला

गाय या भैंस के दूध की कीमत उसमें पाए जाने वाले घी की मात्रा पर निर्भर करती है। यदि घी अधिक तो दाम चोखा और घी कम तो दाम भी खोटा। ऐसे में पशुपालक अपने दुधारू पशु को हरे चारे और सूखे चारे का संतुलित आहार देकर दूध में घी की मात्रा को बढ़ा सकते हैं।

यूं तो हर पशु के दूध में घी की मात्रा निश्चित होती है। भैंस में 06 से 10 फीसदी और देशी गाय के दूध में 04 से 05 प्रतिशत फैट (वसा) होता है। होलस्टन फ्रीजियन संकर नस्ल की गाय में 3.5 प्रतिशत और जर्सी गाय में 4.2 प्रतिशत फैट होता है।

जाड़े के दिनों में पशु में दूध तो बढ़ जाता है, लेकिन दूध में घी की मात्रा कुछ कम हो जाती है। इसके विपरीत गर्मियों में दूध कुछ कम हो जाता है, पर उसमें घी बढ़ जाता है। पशु विशेषज्ञों को मानना है कि यदि पशुपालक थोड़ी से जागरूकता दिखाएं और कुछ सावधानियां बरतें तो दूध में घी की मात्रा बढ़ायी जा सकती है।


इसमें प्रमुख है पशु को दिया जाने वाला आहार। पशुपालक सोचते हैं कि हरा चारा खिलाने से दूध और उसमें घी की मात्रा बढ़ती है, लेकिन ऐसा नहीं है। हरे चारे से दूध तो बढ़ता है, लेकिन उसमें चर्बी कम हो जाती है।

इसके विपरीत यदि सूखा चारा/ भूसा खिलाया जाए तो दूध की मात्रा घट जाती है। इसलिए दुधारू जानवर को 60 फीसदी हरा चारा और 40 फीसदी सूखा चारा खिलाना चाहिए। इतना ही नहीं, पशु आहार में यकायक बदलाव नहीं करना चाहिए। दूध दोहन के समय भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि पूरा दूध निकाल लिया जाए।

बछड़ा/ पड़ा को आखिरी का दूध न पिलाएं, क्योंकि घी की मात्रा आखिरी दूध में सर्वाधिक होती है। दूध और घी की अच्छी मात्रा के लिए बुंदेलखंड के वातावरण में भदावरी प्रजाति की भैंस सर्वाधिक अच्छी मानी गई है। इसके अलावा सुरती प्रजाति का भी पालन किया जा सकता है।

गाय भैंस का दूध बढाने का रामबाण घरेलु उपाय

जो लोग गाय भैंस का अधिक दूध लेने के लिए उनको टीके लगाते हैं वो मानवता के सबसे बड़े दुश्मन हैं. वो कभी सुखी नहीं रह पाएंगे. वो दुसरो को ज़हर देते हैं तो भगवान् उनके घर भी कभी अमृत से नहीं भरेगा. वो ज़हर एक दिन उनको ले डूबेगा.

आज हम आपको बताने जा रहें हैं गाय भैंस का दूध बढाने के रामबाण घरेलु उपाय. ये उपाय बिलकुल सरल है और आपको बहुत जल्दी ही इसके नतीजे भी मिलेंगे. ज़रूर जाने और अपनाएं.

सामग्री :-

  • 250 ग्राम गेहू दलिया,
  • 100 ग्राम गुड सर्बत(आवटी),
  • 50ग्राम मैथी ,
  • 1 कच्चा नारियल ,
  • 25-25 ग्राम जीरा व अजवाईन.

उपयोग:-

  • सबसे पहले दलिये ,मैथी व गुड को पका ले बाद मे उसमे नारियल को पिसकर डाल दे.ठण्डा होने पर खिलाये.
  • ये सामग्री 2 महीने तक केवल सुबह खाली पेट ही खिलाये.
  • इसे गाये को बच्चा देने से एक महीने पहले शूरू करना और बच्चा देने के एक महीने बाद तक देना.
  •  नोट :- 25-25 ग्राम अजवाईन व जीरा गाये के ब्याने के बाद केवल 3 दिन ही देना. बहुत अच्छा परिणाम ले सकते हे.
  • ब्याने के 21 दिन तक गाये को सामान्य खाना ही दे.
  •  गाये का बच्चा जब 3 महीने का हो जाये या जब गाये का दूध कम हो जाये तो उसे 30 gm/दिन जवस औषधि खिलाये दूध कम नही होगा।

4 लोग मिलकर निकाल पाते हैं इस गाय का दूध, जानिए क्या है वजह

भारत में गाय की पूजा की जाती है। इसके अलावा गाय भारत की अर्थव्यस्था की रीढ़ भी रही है। इसलिए यह बहुत उपयोगी पशु माना जाता है।बता दें गाय से व्यवसाय आज पूरी दुनिया में फैला है।

शहरीकरण की ओर बढ़ रहे भारत में आज भी गांव में लोग गाय पालना पसंद करते हैं क्योंकि उन्हें इससे शुद्ध दूध तो मिलता ही है साथ ही ये बड़ा आजीविका का साधन भी बन गया है। इसलिए लोग अब गाय खरीदने से पहले ये देखते हैं कि कौनसी नस्ल की गाय सबसे ज्यादा दूध देती है।

आज हम बात करेंगे ऐसी नस्ल वाली गाय की जो इतना दूध देती है कि उसे निकालने के लिए 4 लोगों की जरूरत पड़ती है। भारत की इस अनोखी गाय की नस्ल का नाम है ‘गीर’

एक रिपोर्ट के मुताबिक ये गाय प्रतिदिन 50 से 80 लीटर दूध देती है। इस गाय के नाम के साथ ‘गीर’ इसलिए जुड़ा क्योंकि ये गाय गुजरात के गीर में पाई जाती है। इस गोवंश का मूल स्थान काठियावाड़ बताया जाता है। इसकी दूध देने की क्षमता के कारण ये नस्ल विश्व विख्यात हो चुकी है। इसकी नस्ल आपको विश्व के कई देशों में देखने को मिल जाएगी।

पंजाब में एक ऐसी गाय आ चुकी है, जिसका दूध दोहने के लिए एक नहीं, दो नहीं, बल्कि 4 लोग लगते हैं। जी हां, यह बिल्कुल सच है क्योंकि यह गाय प्रति दिन 61 किलो दूध देती है। सबसे अधिक ब्रासिल और इजरायल के लोग इस नस्ल की गाय को पालना पसंद करते हैं।

बता दें गीर गाय सालाना 2000 से 6000 लीटर दूध देने की क्षमता रखती है। वहीं दूसरे नंबर पर आती है साहिवाल गाय जो 2000 से 4000 लीटर दूध देती है। तीसरे स्थान पर लाल सिंधी गाय है। हालांकि ये गाय भी 2000 से 4000 लीटर दूध देती है लेकिन पशु नस्ल जानने वाले इसे तीसरे स्थान पर ही आंकते हैं। चौथे स्थान पर राठी, पांचवे पर थरपार्कर और छठे स्थान पर कांक्रेज है।

पशु खरीदने जा रहे हैं तो रखें इन बातों का ध्यान ,नहीं तो हो सकते है ठगी का शिकार

ज्यादातर पशुपालक दूसरे राज्यों से महंगी कीमत पर दुधारू पशु तो खरीद लेते हैं। लेकिन बाद में पता चलता है कि दूध का उत्पादन उतना नहीं हो रहा जितना बिचौलिए या व्यापारी ने बताया था और कई बार पशु को कोई गंभीर बीमारी होती है जो कभी ठीक नहीं हो सकती ऐसे में पशुपालकों को आर्थिक नुकसान भी होता है।

ऐसे में आप निचे दी हुई बातों का ध्यान रख कर ठगी से बच सकते है और आपको सही नस्ल का पशु चुनने में भी आसानी होगी

शारीरिक बनावट : अच्छे दुधारू पशु का शरीर आगे से पतला और पीछे से चौड़ा होता है। उस के नथुने खुले हुए और जबड़े मजबूत होते हैं। उस की आंखें उभरी हुई, पूंछ लंबी और त्वचा चिकनी व पतली होती है। छाती का हिस्सा विकसित और पीठ चौड़ी होती है। दुधारू पशु की जांघ पतली और चौरस होती है और गर्दन पतली होती है। उस के चारों थन एकसमान लंबे, मोटे और बराबर दूरी पर होते हैं।

दूध उत्पादन कूवत : बाजार में दुधारू पशु की कीमत उस के दूध देने की कूवत के हिसाब से ही तय होती है, इसलिए उसे खरीदने से पहले 2-3 दिनों तक उसे खुद दुह कर देख लेना चाहिए. दुहते समय दूध की धार सीधी गिरनी चाहिए और दुहने के बाद थनों को सिकुड़ जाना चाहिए।

आयु : आमतौर पर पशुओं की बच्चा पैदा करने की क्षमता 10-12 साल की आयु के बाद खत्म हो जाती है। तीसरा चौथा बच्चा होने तक पशुओं के दूध देने की कूवत चरम पर होती है, जो धीरे धीरे घटती जाती है। दूध का कारोबार करने के लिए 2-3 दांत वाले कम आयु के पशु खरीदना काफी फायदेमंद होता है। पशुओं की उम्र का पता उन के दांतों की बनावट और संख्या को देख कर चल जाता है। 2 साल की उम्र के पशु में ऊपर नीचे मिला कर सामने के 8 स्थायी और 8 अस्थायी दांत होते हैं। 5 साल की उम्र में ऊपर और नीचे मिला कर 16 स्थायी और 16 अस्थायी दांत होते हैं। 6 साल से ऊपर की आयु वाले पशु में 32 स्थायी और 20 अस्थायी दांत होते हैं।

वंशावली : पशुओं की वंशावली का पता लगने से उन की नस्ल और दूध उत्पादन कूवत की सही परख हो सकती है। हमारे देश में पशुओं की वंशावली का रिकार्ड रखने का चलन नहीं है, पर बढि़या डेरी फार्म से पशु खरीदने पर उस की वंशावली का पता चल सकता है।

प्रजनन : सही दुधारू गाय या भैंस वही होती है, जो हर साल 1 बच्चा देती है। इसलिए पशु खरीदते समय उस का प्रजनन रिकार्ड जान लेना जरूरी है। प्रजनन रिकार्ड ठीक नहीं होने, बीमार और कमजोर होने से पाल नहीं खाने, गर्भपात होने, स्वस्थ बच्चा नहीं जनने, प्रसव में दिक्कतें होने जैसी परेशानियां सामने आ सकती हैं।

ब्याने से पहले पशुओं की देखभाल और खुराक के संबंधी जानकारी जरूरी पढ़े

यह जानकारिया पशु के ब्याने से पहले पता होनी चाहिए

ब्याने से पहले दुधारू पशुओं की देखभाल और खुराक के संबंधी जानकारी होनी बहुत जरूरी है। पशुओं को अपने शरीर को सेहतमंद रखने के अलावा, दूध देने के लिए और अपने पेट में पल रहे कटड़े/ बछड़े की वृद्धि के लिए खुराक की जरूरत होती है।

यदि गाभिन पशु को आवश्यकतानुसार खुराक ना मिले, तो इनकी अगले ब्याने में दूध देने की क्षमता कम हो जाती है और कमज़ोर कटड़े/बछड़े पैदा होते हैं जो कि इन बीमारियों का अधिक शिकार होते हैं।

  • ब्याने से कुछ दिन पहले यदि आप पशु को सरसों का तेल देते हो तो प्रतिदिन 100 ग्राम से अधिक नहीं देना चाहिए।
  •  ब्याने से 4-5 दिन पहले पशुओं को कब्ज नहीं होनी चाहिए। यदि ऐसा हो तो अलसी का दलिया देना चाहिए।

  • यदि पशु खुले स्थान में हों, तो उन्हें ब्याने से 15 दिन पहले बाकी पशुओं से अलग कर दें और साफ सुथरे कीटाणु रहित कमरे में रखें।
  • पशु से अच्छा व्यवहार करना चाहिए और दौड़ाना नहीं चाहिए और ना ही ऊंची नीची जगहों पर जाने देना चाहिए।
  • गर्भावस्था के आखिरी महीने में दुधारू पशुओं के हवानों को हर रोज़ कुछ मिनटों के लिए अपने हाथ से सिरहाना चाहिए ताकि उन्हें इसकी आदत पड़ जाए।

  • इस तरह करने से इनके ब्याने के उपरांत दूध निकालना आसान हो जाता है।
    ब्याने वाले पशु को हर रोज़ दिन में 5-7 बार ध्यान से देखना चाहिए।
  • पशुओं को हर रोज़ धातुओं का चूरा 50-60 ग्राम और 20-30 ग्राम नमक आदि भी देना चाहिए।