जाने यूरिया के ईस्तमाल से पराली को प्रोटीन पशु खुराक बनाने का तरीका

पशुओं के लिए तूड़ी/पराली को यूरिया से उपचार करने का तरीका भैंसों/गायों के रोयों में स्थित सूक्ष्म जीव यूरिया को तोड़कर अपनी जीव प्रोटीन बनाने के लिए प्रयोग कर लेते हैं जो पशु की ज़रूरतों को पूरा करती है।

इसलिए पशुओं के वितरण में 1 प्रतिशत यूरिये का प्रयोग करने से वितरण में यूरिया अच्छी तरह मिक्स होना चाहिए और यूरिया की डलियां नहीं होनी चाहिए। पशुओं के चारे के लिए यदि तूड़ी/पराली को यूरिये से उपचार करके प्रयोग करते हैं तो तूड़ी/ पराली के खुराकी गुणों में वृद्धि की जा सकती है और उपचारित पराली को सूखे तौर पर प्रयोग करके पशुओं की खुराक में प्रोटीन की कमी को दूर भी किया जा सकता है।

यूरिये से कैसे उपचारित की जाये तूड़ी?

तूड़ी/पराली को यूरिये से उपचार करने के लिए 4 क्विंटल तूड़ी या कुतरी हुई पराली लें और इसे ज़मीन पर बिछा लें। फिर 14 किलो यूरिये को 200 लीटर पानी में घोल लें और तूड़ी/पराली पर छिड़क लें ताकि सारी तूड़ी/पराली गीली हो जाये।

अच्छी तरह मिलाने के बाद इसे दबाकर 9 दिनों के लिए रखें। 9 दिनों के बाद उपचारित की हुई तूड़ी तैयार हो जाती है। यह गुणकारी और नर्म हो जाती है।

किस तरह खिलानी है?

खिलाते समय तूड़ी को एक तरफ से ही खोलें और कुछ देर हवा लगने दें। यदि हवा नहीं लगवाते तो अमोनिया गैस जो बनी होती है वह पशु की आंखों में चुभने लगती है। फिर पशु को थोड़ा थोड़ा रिझाओ। उपचारित तूड़ी को प्रति 4 किलो के हिसाब से हरे चारे में मिलाकर बड़े पशुओं को खिलई जा सकती है।

नोट – इसका प्रयोग, घोड़े, सुअरों और 6 महीने से कम उम्र के पशुओं के लिए ना किया जाये

स्त्रोत – गुरू अंगद देव वैटनरी यूनिवर्सिटी, लुधियाना

ये है 6 लाख की गाय लक्ष्मी, हर रोज देती है 60 लीटर दूध

भारत दूध उत्पादन में विश्व में दूसरे नंबर पर है। यह इसलिए संभव हो पाया है क्योंकि लोग डेयरी उद्योग में लगातार प्रयासरत हैं। इसी तरह का एक उदाहरण हरियाणा के करनाल जिले के दादुपुर गांव का है।

यहां एक नेशनल अवार्डी गाय एक दिन में 60 लीटर दूध देती है। औसत निकाला जाए तो हर घंटे में लगभग ढाई लीटर दूध दे रही है।

ब्यूटी में है चैंपियन का जीत चुकी है खिताब

डेयरी चला रहे राजबीर आर्य बताते हैं कि होल्सटीन फ्रिसन नस्ल की इस गाय का नाम लक्ष्मी है। लक्ष्मी दूध देने में तो अव्वल है ही लेकिन इसने अपनी ब्यूटी के लिए भी राष्ट्रीय स्तर के पशु मेलों में इनाम जीते हैं। मुक्तसर पंजाब व राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान में ब्यूटी चैंपियन रह चुकी है।

ये है खुराक

लक्ष्मी हर रोज 50 किलोग्राम हरा चारा, 2 किलोग्राम सूखा तूड़ा और 14 किलो दाना खाती है। लक्ष्मी व अन्य पशुओं की देखभाल में 6 आदमी दिन-रात लगे रहते हैं। लक्ष्मी का जन्म राजबीर के घर ही हुआ था, जबकि इसकी मां को वे पंजाब से लेकर आए थे।

5 लाख कीमत लगने पर लक्ष्मी को बेचने को तैयार नहीं है राजबीर

राजबीर बताते हैं कि जनवरी के महीने में बैंगलुरू से गाय खरीदने के लिए उसके फार्म पर लोग आए थे। उन्होंने इसकी कीमत 5 लाख रुपए लगाई थी। इस कीमत पर भी राजबीर ने गाय को नहीं बेचा।

डेयरी उद्योग के 15 लाख रुपए सालाना कमा रहे हैं राजबीर

डेढ़ एकड़ भूमि पर बने राजबीर के फार्म पर फिलहाल 75 गाय हैं। जिनमें से 60 होल्सटीन फ्रिसन, 10 जर्सी और 5 साहिवाल नस्ल की है। इस मौसम में हर रोज 800 लीटर दूध उत्पादन हो रहा है।

जिसमें से कुछ शहर में बेचने जाते हैं, बाकी को अमूल डेयरी भेजा जाता है। वे पिछले 18 वर्ष से डेयरी उद्योग से जुड़े हुए हैं। 1998 में मात्र 5 गाय से शुरूआत की थी। अब वे 15 लाख रुपए सालाना कमा रहे हैं।

जाने दूध में घी(फैट) बढाने का पक्का फार्मूला

गाय या भैंस के दूध की कीमत उसमें पाए जाने वाले घी की मात्रा पर निर्भर करती है। यदि घी अधिक तो दाम चोखा और घी कम तो दाम भी खोटा। ऐसे में पशुपालक अपने दुधारू पशु को हरे चारे और सूखे चारे का संतुलित आहार देकर दूध में घी की मात्रा को बढ़ा सकते हैं।

यूं तो हर पशु के दूध में घी की मात्रा निश्चित होती है। भैंस में 06 से 10 फीसदी और देशी गाय के दूध में 04 से 05 प्रतिशत फैट (वसा) होता है। होलस्टन फ्रीजियन संकर नस्ल की गाय में 3.5 प्रतिशत और जर्सी गाय में 4.2 प्रतिशत फैट होता है।

जाड़े के दिनों में पशु में दूध तो बढ़ जाता है, लेकिन दूध में घी की मात्रा कुछ कम हो जाती है। इसके विपरीत गर्मियों में दूध कुछ कम हो जाता है, पर उसमें घी बढ़ जाता है। पशु विशेषज्ञों को मानना है कि यदि पशुपालक थोड़ी से जागरूकता दिखाएं और कुछ सावधानियां बरतें तो दूध में घी की मात्रा बढ़ायी जा सकती है।


इसमें प्रमुख है पशु को दिया जाने वाला आहार। पशुपालक सोचते हैं कि हरा चारा खिलाने से दूध और उसमें घी की मात्रा बढ़ती है, लेकिन ऐसा नहीं है। हरे चारे से दूध तो बढ़ता है, लेकिन उसमें चर्बी कम हो जाती है।

इसके विपरीत यदि सूखा चारा/ भूसा खिलाया जाए तो दूध की मात्रा घट जाती है। इसलिए दुधारू जानवर को 60 फीसदी हरा चारा और 40 फीसदी सूखा चारा खिलाना चाहिए। इतना ही नहीं, पशु आहार में यकायक बदलाव नहीं करना चाहिए। दूध दोहन के समय भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि पूरा दूध निकाल लिया जाए।

बछड़ा/ पड़ा को आखिरी का दूध न पिलाएं, क्योंकि घी की मात्रा आखिरी दूध में सर्वाधिक होती है। दूध और घी की अच्छी मात्रा के लिए बुंदेलखंड के वातावरण में भदावरी प्रजाति की भैंस सर्वाधिक अच्छी मानी गई है। इसके अलावा सुरती प्रजाति का भी पालन किया जा सकता है।

गाय भैंस का दूध बढाने का रामबाण घरेलु उपाय

जो लोग गाय भैंस का अधिक दूध लेने के लिए उनको टीके लगाते हैं वो मानवता के सबसे बड़े दुश्मन हैं. वो कभी सुखी नहीं रह पाएंगे. वो दुसरो को ज़हर देते हैं तो भगवान् उनके घर भी कभी अमृत से नहीं भरेगा. वो ज़हर एक दिन उनको ले डूबेगा.

आज हम आपको बताने जा रहें हैं गाय भैंस का दूध बढाने के रामबाण घरेलु उपाय. ये उपाय बिलकुल सरल है और आपको बहुत जल्दी ही इसके नतीजे भी मिलेंगे. ज़रूर जाने और अपनाएं.

सामग्री :-

  • 250 ग्राम गेहू दलिया,
  • 100 ग्राम गुड सर्बत(आवटी),
  • 50ग्राम मैथी ,
  • 1 कच्चा नारियल ,
  • 25-25 ग्राम जीरा व अजवाईन.

उपयोग:-

  • सबसे पहले दलिये ,मैथी व गुड को पका ले बाद मे उसमे नारियल को पिसकर डाल दे.ठण्डा होने पर खिलाये.
  • ये सामग्री 2 महीने तक केवल सुबह खाली पेट ही खिलाये.
  • इसे गाये को बच्चा देने से एक महीने पहले शूरू करना और बच्चा देने के एक महीने बाद तक देना.
  •  नोट :- 25-25 ग्राम अजवाईन व जीरा गाये के ब्याने के बाद केवल 3 दिन ही देना. बहुत अच्छा परिणाम ले सकते हे.
  • ब्याने के 21 दिन तक गाये को सामान्य खाना ही दे.
  •  गाये का बच्चा जब 3 महीने का हो जाये या जब गाये का दूध कम हो जाये तो उसे 30 gm/दिन जवस औषधि खिलाये दूध कम नही होगा।

4 लोग मिलकर निकाल पाते हैं इस गाय का दूध, जानिए क्या है वजह

भारत में गाय की पूजा की जाती है। इसके अलावा गाय भारत की अर्थव्यस्था की रीढ़ भी रही है। इसलिए यह बहुत उपयोगी पशु माना जाता है।बता दें गाय से व्यवसाय आज पूरी दुनिया में फैला है।

शहरीकरण की ओर बढ़ रहे भारत में आज भी गांव में लोग गाय पालना पसंद करते हैं क्योंकि उन्हें इससे शुद्ध दूध तो मिलता ही है साथ ही ये बड़ा आजीविका का साधन भी बन गया है। इसलिए लोग अब गाय खरीदने से पहले ये देखते हैं कि कौनसी नस्ल की गाय सबसे ज्यादा दूध देती है।

आज हम बात करेंगे ऐसी नस्ल वाली गाय की जो इतना दूध देती है कि उसे निकालने के लिए 4 लोगों की जरूरत पड़ती है। भारत की इस अनोखी गाय की नस्ल का नाम है ‘गीर’

एक रिपोर्ट के मुताबिक ये गाय प्रतिदिन 50 से 80 लीटर दूध देती है। इस गाय के नाम के साथ ‘गीर’ इसलिए जुड़ा क्योंकि ये गाय गुजरात के गीर में पाई जाती है। इस गोवंश का मूल स्थान काठियावाड़ बताया जाता है। इसकी दूध देने की क्षमता के कारण ये नस्ल विश्व विख्यात हो चुकी है। इसकी नस्ल आपको विश्व के कई देशों में देखने को मिल जाएगी।

पंजाब में एक ऐसी गाय आ चुकी है, जिसका दूध दोहने के लिए एक नहीं, दो नहीं, बल्कि 4 लोग लगते हैं। जी हां, यह बिल्कुल सच है क्योंकि यह गाय प्रति दिन 61 किलो दूध देती है। सबसे अधिक ब्रासिल और इजरायल के लोग इस नस्ल की गाय को पालना पसंद करते हैं।

बता दें गीर गाय सालाना 2000 से 6000 लीटर दूध देने की क्षमता रखती है। वहीं दूसरे नंबर पर आती है साहिवाल गाय जो 2000 से 4000 लीटर दूध देती है। तीसरे स्थान पर लाल सिंधी गाय है। हालांकि ये गाय भी 2000 से 4000 लीटर दूध देती है लेकिन पशु नस्ल जानने वाले इसे तीसरे स्थान पर ही आंकते हैं। चौथे स्थान पर राठी, पांचवे पर थरपार्कर और छठे स्थान पर कांक्रेज है।

पशु खरीदने जा रहे हैं तो रखें इन बातों का ध्यान ,नहीं तो हो सकते है ठगी का शिकार

ज्यादातर पशुपालक दूसरे राज्यों से महंगी कीमत पर दुधारू पशु तो खरीद लेते हैं। लेकिन बाद में पता चलता है कि दूध का उत्पादन उतना नहीं हो रहा जितना बिचौलिए या व्यापारी ने बताया था और कई बार पशु को कोई गंभीर बीमारी होती है जो कभी ठीक नहीं हो सकती ऐसे में पशुपालकों को आर्थिक नुकसान भी होता है।

ऐसे में आप निचे दी हुई बातों का ध्यान रख कर ठगी से बच सकते है और आपको सही नस्ल का पशु चुनने में भी आसानी होगी

शारीरिक बनावट : अच्छे दुधारू पशु का शरीर आगे से पतला और पीछे से चौड़ा होता है। उस के नथुने खुले हुए और जबड़े मजबूत होते हैं। उस की आंखें उभरी हुई, पूंछ लंबी और त्वचा चिकनी व पतली होती है। छाती का हिस्सा विकसित और पीठ चौड़ी होती है। दुधारू पशु की जांघ पतली और चौरस होती है और गर्दन पतली होती है। उस के चारों थन एकसमान लंबे, मोटे और बराबर दूरी पर होते हैं।

दूध उत्पादन कूवत : बाजार में दुधारू पशु की कीमत उस के दूध देने की कूवत के हिसाब से ही तय होती है, इसलिए उसे खरीदने से पहले 2-3 दिनों तक उसे खुद दुह कर देख लेना चाहिए. दुहते समय दूध की धार सीधी गिरनी चाहिए और दुहने के बाद थनों को सिकुड़ जाना चाहिए।

आयु : आमतौर पर पशुओं की बच्चा पैदा करने की क्षमता 10-12 साल की आयु के बाद खत्म हो जाती है। तीसरा चौथा बच्चा होने तक पशुओं के दूध देने की कूवत चरम पर होती है, जो धीरे धीरे घटती जाती है। दूध का कारोबार करने के लिए 2-3 दांत वाले कम आयु के पशु खरीदना काफी फायदेमंद होता है। पशुओं की उम्र का पता उन के दांतों की बनावट और संख्या को देख कर चल जाता है। 2 साल की उम्र के पशु में ऊपर नीचे मिला कर सामने के 8 स्थायी और 8 अस्थायी दांत होते हैं। 5 साल की उम्र में ऊपर और नीचे मिला कर 16 स्थायी और 16 अस्थायी दांत होते हैं। 6 साल से ऊपर की आयु वाले पशु में 32 स्थायी और 20 अस्थायी दांत होते हैं।

वंशावली : पशुओं की वंशावली का पता लगने से उन की नस्ल और दूध उत्पादन कूवत की सही परख हो सकती है। हमारे देश में पशुओं की वंशावली का रिकार्ड रखने का चलन नहीं है, पर बढि़या डेरी फार्म से पशु खरीदने पर उस की वंशावली का पता चल सकता है।

प्रजनन : सही दुधारू गाय या भैंस वही होती है, जो हर साल 1 बच्चा देती है। इसलिए पशु खरीदते समय उस का प्रजनन रिकार्ड जान लेना जरूरी है। प्रजनन रिकार्ड ठीक नहीं होने, बीमार और कमजोर होने से पाल नहीं खाने, गर्भपात होने, स्वस्थ बच्चा नहीं जनने, प्रसव में दिक्कतें होने जैसी परेशानियां सामने आ सकती हैं।

ब्याने से पहले पशुओं की देखभाल और खुराक के संबंधी जानकारी जरूरी पढ़े

यह जानकारिया पशु के ब्याने से पहले पता होनी चाहिए

ब्याने से पहले दुधारू पशुओं की देखभाल और खुराक के संबंधी जानकारी होनी बहुत जरूरी है। पशुओं को अपने शरीर को सेहतमंद रखने के अलावा, दूध देने के लिए और अपने पेट में पल रहे कटड़े/ बछड़े की वृद्धि के लिए खुराक की जरूरत होती है।

यदि गाभिन पशु को आवश्यकतानुसार खुराक ना मिले, तो इनकी अगले ब्याने में दूध देने की क्षमता कम हो जाती है और कमज़ोर कटड़े/बछड़े पैदा होते हैं जो कि इन बीमारियों का अधिक शिकार होते हैं।

  • ब्याने से कुछ दिन पहले यदि आप पशु को सरसों का तेल देते हो तो प्रतिदिन 100 ग्राम से अधिक नहीं देना चाहिए।
  •  ब्याने से 4-5 दिन पहले पशुओं को कब्ज नहीं होनी चाहिए। यदि ऐसा हो तो अलसी का दलिया देना चाहिए।

  • यदि पशु खुले स्थान में हों, तो उन्हें ब्याने से 15 दिन पहले बाकी पशुओं से अलग कर दें और साफ सुथरे कीटाणु रहित कमरे में रखें।
  • पशु से अच्छा व्यवहार करना चाहिए और दौड़ाना नहीं चाहिए और ना ही ऊंची नीची जगहों पर जाने देना चाहिए।
  • गर्भावस्था के आखिरी महीने में दुधारू पशुओं के हवानों को हर रोज़ कुछ मिनटों के लिए अपने हाथ से सिरहाना चाहिए ताकि उन्हें इसकी आदत पड़ जाए।

  • इस तरह करने से इनके ब्याने के उपरांत दूध निकालना आसान हो जाता है।
    ब्याने वाले पशु को हर रोज़ दिन में 5-7 बार ध्यान से देखना चाहिए।
  • पशुओं को हर रोज़ धातुओं का चूरा 50-60 ग्राम और 20-30 ग्राम नमक आदि भी देना चाहिए।

तीन नस्लों के मेल से गाय की नई प्रजाति विकसित, देगी 55 लीटर तक दूध

वैज्ञानिकों ने तीन नस्लों के मेल से गाय की नई प्रजाति विकसित की है। इसे नाम दिया है ‘हरधेनू’। यह 50 से 55 लीटर तक दूध दे सकती है। 48 डिग्री तापमान में सामान्य रहती है। यह 18-19 महीने में प्रजनन करने के लिए सक्षम है। जबकि अन्य नस्ल करीब 30 माह का समय लेती है। ‘हरधेनू’ प्रजाति में 62.5% खून हॉलस्टीन व बाकी हरियाना व शाहीवाल नस्ल का है। यह कमाल किया हिसार के लुवास विवि के अनुवांशिकी एवं प्रजनन विभाग के वैज्ञानिकों ने।

कामधेनू की तर्ज पर नाम :डॉ. बीएल पांडर के अनुसार कामधेनू गाय का शास्त्रों में जिक्र है कि वह कामनाओं को पूर्ण करती है। इसी तर्ज पर ‘हरधेनू’ नाम रखा गया है। नाम के शुरुआत में हर लगने के कारण हरियाना की भी पहचान होगी।

पहले 30 किसानों को दी : वैज्ञानिकों ने पहले करीब 30 किसानों को इस नस्ल की गाय दीं। वैज्ञानिकों ने अब यह नस्ल रिलीज की है। अभी इस नस्ल की 250 गाय फार्म में हैं। कोई भी किसान वहां से इस नस्ल के सांड का सीमन ले सकता है।

जर्सी को पीछे छोड़ा :‘हरधेनू’ ने दूध के मामले में आयरलैंड की नस्ल ‘जर्सी’ को भी पीछे छोड़ दिया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि ‘जर्सी’ नस्ल की गाय आैसत 12 लीटर और अिधकतम 30 लीटर तक दूध दे सकती है। वहीं, ‘हरधेनू’ औसत 16 लीटर और अधिकतम 50 से 55 लीटर दूध दे सकती है।

ऐसे तैयार की नस्ल : हरियाना नस्ल की गाय के अंदर यूएसए व कनाडा की हॉलस्टीन और प्रदेश की शाहीवाल और हरियाना नस्ल का सीमन छोड़ा गया। तीन नस्लों के मेल से तैयार हुए गाय के बच्चे को ‘हरधेनू ‘ नाम दिया गया।

45 साल शोध :1970 में हरियाणा कृषि विवि की स्थापना हुई। तभी गाय की नस्ल सुधार के लिए ‘इवेलेशन ऑफ न्यू ब्रीड थ्रू क्राॅस ब्रीडिंग एंड सिलेक्शन’ को लेकर प्रोजेक्ट शुरू हुआ। 2010 में वेटनरी कॉलेज को अलग कर लुवास विश्वविद्यालय बनाया गया। शंकर नस्ल की गाय की नई प्रजाति ‘हरधेनू ‘ को लेकर चल रही रिसर्च का परिणाम 45 साल बाद अब सामने आया है।

 

पशुओं में आस करवाने के बावजूद भी गर्भ ना ठहरना की समस्या के कारण और इलाज ।

जिस गाभिन में तीन बार आस करवाने के बावजूद भी गर्भ नहीं ठहरता, वह रिपीटर करार दी जाती है। इस समस्या को अक्सर रिपीट ब्रीडर भी कहा जाता है। यह समस्या आजकल बहुत ज्यादा आ रही है। इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे कि बच्चेदानी में गांठ आदि।

किसान भाई यह नहीं देखते कि आस करवाते समय ताप 22 दिन बाद है या समय से पहले है या बाद में। यदि 17-18वें दिन बोलती है तो बीमारी और है यदि 26-28वें दिन बोलती है तो बीमारी और है। क्या बीमारी मिली।

क्या वैटरनी डॉक्टर आया और टीका लगाकर चला गया, क्या उसने पूछा कि पिछले महीने कब ताप में आई थी। बहुत सारी ऐसी जानकारियां होती हैं जिनका किसान भाइयों को खुद रिकॉर्ड रखना चाहिए जैसे कि ताप में आने का समय, कितने दिन बाद ताप में आई आदि।

बाकी आपको शायद पता ही हो कि तारें सिर्फ शीशे की तरह बनी होनी चाहिए। यदि तारें घुसमैली हों या तारों में छेद हो तो पशु को कभी नए दूध नहीं करवाना चाहिए। बल्कि एक अच्छे माहिर डॉक्टर से बच्चेदानी की जांच करवाके दवाई भरवा देनी चाहिए।

इसके अलावा गाभिनों के बार बार गर्भपात के कुछ अन्य कारण जैसे :

  •  जनन अंगों में जमांदरू नुक्स
  •  कम शारीरिक भार
  •  शरीर में हारमोन का संतुलन बिगड़ जाना
  •  गर्म वातावरण
  •  आस करवाने का प्रबंध
  •  ताप के लक्षणों और आस करवाने के सही समय की कम जानकारी

इलाज :
इस तरह की समस्या के इलाज के लिए कुछ इलाज आपसे शेयर कर रहे हैं जो कि पशु पलन क व्यवसाय में काफी महत्तवपूर्ण हैं।

  •  पहली बात आप पशु को संतुलित डाइट ज़रूर दें। जब आप पशु को क्रॉस करवायें उससे 5 मिनट के अंदर अंदर 125 ग्राम रसौद जो कि पंसारी की दुकान या आयुर्वेदिक सामान वाली दुकान से मिल जाएगी उसे पशु को दें।
  •  यदि तारें साफ आ रही हैं तो एक होमियोपैथिक दवाई को सीरिंज से सीधे मुंह के द्वारा पशु को दिन में तीन टाइम देते रहें।

पांचवी पास महिला आज करती हैं 56 हजार लीटर दूध का कारोबार

हमारे आस-पास कई ऐसे लोग हैं, जिन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि कामयाबी के लिए बड़ी डिग्रियों की जरूरत नहीं होती। जरूरत होती है, तो सिर्फ लगन और सच्ची मेहनत की। आज हम आपको एक ऐसी महिला की कहानी बताने जा रहे हैं, जो गाँव में रहने के बाद भी बाकी महिलाओं के लिए मिसाल बन चुकी हैं। लखनऊ की बिटाना देवी ने सीमित संसाधन में अपनी कामयाबी की जो कहानी लिखी है वह सच में बेहद प्रेरणादायक है।

बिटाना की शादी सिर्फ 15 साल की उम्र में ही हो गयी थी, शिक्षा के नाम पर उनके पास सिर्फ पिता का आर्शीवाद था। शादी में पिता से भेंट स्वरुप मिले एक गाय और एक भैंस ही उनकी कमाई का एकमात्र जरिया था। अपनी गायों और बछड़ों को बच्चों जैसा प्यार देकर बिटाना आज एक सफल डेयरी फर्म की संचालिका हैं।

गांव में रहने वाली औरतों को लोग अक्सर असहाय समझते हैं। परन्तु पांचवी पास बिटाना देवी ने इस मिथ को गलत ठहरा दिया। उन्होंने महिला सशक्तिकरण की एक नई परिभाषा गढ़ते हुए दूसरी ग्रामीण महिलाओं को भी नई राह दिखाई है। निगोहां के मीरकनगर गांव से ताल्लुकात रखने वाली बिटाना ने अपने पिता के भेंट स्वरुप दिए गाय और भैंस का दूध बेचना प्रारंभ किया।

गाय और भैंस का दूध बेंचकर उसने एक गाय खरीद ली। सीमित संसाधनों के बीच दूध बेचकर अर्जित कमाई से वो निरंतर दुधारू मवेशियों की संख्या बढ़ाती चलीं गईं। साल 1996 में उन्होंने दुग्ध उत्पादन का व्यवसाय शुरू किया। धीरे-धीरे उन्होंने इस कारोबार में एक वर्चस्व स्थापित किया और 2005 से लगातार 10 बार सर्वाधिक दुग्ध उत्पादन के लिए गोकुल पुरूस्कार भी जीत रहीं।

अपने घर का खर्च भी वो अपने कमाए हुए पैसे से ही चलाती है। इन्हें देखकर और भी महिलाएं प्रेरित हुई और दुग्ध उत्पादन का व्यवसाय शुरू किया। इस समय बिटाना के पास 40 दुधारू पशु हैं। बिटाना रोज सुबह 5 बजे उठकर जानवरों को चारा पानी देती है, उनका दूध निकालती हैं और डेरी तक दूध पहुँचाने का काम भी वह स्वयं करती हैं।

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि इन्होंने साल 2014-2015 में कुल 56,567 लीटर दूध का उत्पादन किया। धीरे-धीरे बिटाना ने इसे व्यापार बना लिया, लगभग 155 लीटर दूध रोजाना पराग डेयरी को सप्लाई करती हैं। वर्तमान में उनके फार्म से रोजाना 188 लीटर दूध का उत्पादन होता है। उनके प्रयासों को देखते उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें गोकुल पुरस्कार से भी सम्मानित किया है। बिटाना बताती हैं कि औपचारिक रूप से उन्होंने साल 1985 से इस काम की शुरूआत की थी।

दरअसल आज लाखों का कारोबार करने वाली बिटाना को शुरुआती समय में आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा था लेकिन उन्होंने कठिन मेहनत के दम पर परिस्थितियों को बदल कर रख दिया और एक सफल उद्यमी के रूप में हमारे सामने खड़ी हैं।

News Source- hindi.kenfolios.com