हर महीने में 45 हज़ार की कमाई करवाती यह गाय

जगराओंके गांव गिद्दड़विंडी के सुखदेव सिंह की होलिस्टन फ्रिसियन (एचएफ) नस्ल की गाय एक दिन में 12 किलो डाइट खाकर 45 लीटर दूध देती है। इस गाय का महीने का खर्च लगभग नौ हजार रुपए है, जबकि सुखदेव सिंह को हर महीने 45 हजार की कमाई करवा रही है। बद्दोवाल में लगे पशु धन मेले में गाय के दूध की मात्रा देख उसे फर्स्ट प्राइज मिला।

हालांकि अभी गाय ने 25 दिन पहले से ही दूध देना शुरू किया है। सुखदेव सिंह के मुताबिक 45 दिन पूरे होने के बाद उनकी गाय का दूध 50 लीटर से ज्यादा हो जाएगा। यही नहीं, दूसरे नंबर पर भी उनकी ही एचएफ गाय रही, जो रोजाना 44 लीटर दूध देती है।

सामान्यत: इतना दूध नहीं दे पाती इस नस्ल की गाय

सुखदेव सिंह ने कहा कि उन्होंने 2004 में गायों को पालने का काम शुरू किया था। अब उनके पास लगभग पौने दो सौ गाये हैं। सभी एचएफ नस्ल की हैं। इनसे सर्दियों में वो 1200 क्विंटल और गर्मियों में 1400 क्विंटल दूध बेचते हैं। दूध बेचने के लिए उन्होंने वेरका से एग्रीमेंट किया है जो 32 से 33 रुपए प्रति किलो में दूध खरीदते हैं। सुखदेव कहते हैं कि जर्सी गाय के मुकाबले एचएफ गायों के दूध में फैट कम होता है।

सुखदेव सिंह ने बताया कि इससे पहले उनके पास एचएफ गाय थी, जो डेली 52 लीटर दूध देती थी। यह गाय उन्होंने नवांशहर के आदमी को तीन लाख रुपए में बेची थी। इस गाय ने मुक्तसर मेले में पहला स्थान हासिल किया था।

गिद्दड़विंडी के सुखदेव सिंह बताते हैं कि वो गाय को दलिया, फीड, सोयाबीन, साइलेज, मक्की का चारा आदि खिलाते हैं। हर रोज गाय की डाइट लगभग 12 किलो हो जाती है। इस पर 300 रुपए खर्च होते हैं। वो गाय को बांधकर नहीं रखते।

एचएफ गाय मूल रूप से हॉलैंड में पाई जाती है। वहां से सीमन लाकर देश में इसकी नस्ल तैयार की गई है। ये गायें 30 लीटर तक दूध तो दे देती हैं, लेकिन 44 से 45 लीटर दूध देना अनोखी बात है। -डॉ.राजीव भंडारी, पशुपालन महकमा

10 लाख में बिकी महज दो साल की कटड़ी

हिसार के नारनौंद का सिंघवा गांव। मुर्राह नस्ल की भैंस के लिए देश ही नहीं, विदेश में भी चर्चित। यहां किसान पशुओं को शाही अंदाज में पालते हैं। पशुपालकों की मेहनत से यहां दूध की नदियां बहती हैं तो यहां भैंस की कीमत लग्जरी कार से भी अधिक आंकी जाती है।

सिंघवा में जसवंत की मुर्राह नस्ल की दो वर्षीय कटड़ी लक्ष्मी इस बार दस लाख रुपये में बिकी है, जो क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी हुई है। ऐसा पहली बार हुआ है जब कोई दो साल की कटड़ी इतनी महंगी बिकी हो।

सिंघवा निवासी जसवंत पुत्र रणबीर सिंह ने 2012 में महम से 70 हजार रुपये में एक मुर्राह नस्ल की भैंस खरीदी थी और उसका नाम गिन्नी रख दिया था। गिन्नी की देखरेख शाही तरीके से की गई तो गिन्नी ने भी जसवंत को गिन्नियों से मालामाल कर दिया। क्योंकि गिन्नी की कटड़ी लक्ष्मी मात्र दो वर्ष की हुई थी तो लक्ष्मी की सुंदरता को देखकर देश प्रदेश के अनेक व्यापारी उसको खरीदने के इच्छुक थे। आखिरकार लक्ष्मी को पूर्व मुख्यमंत्री के गाव साघी के किसान कृष्ण हुड्डा ने दस लाख रुपये में खरीद लिया। इतनी कीमत में कटड़ी बिकना एक अहम बात है।

व्यावसायिक पहलु : लागत 70 हजार, दो साल में मुनाफा 10 लाख

दुनिया में शायद ही कोई धंधा हो, जिसमें दो साल में 13 गुना मुनाफा होता हो, पर मुर्राह की खेती में ऐसा संभव है। सिंघवा के किसान इसे साबित भी कर रहे हैं। बात गिन्नी की हो या लक्ष्मी, किसानों की मेहनत से यहां भैंस के थन से दूध की धारा के साथ समृद्धि पैदा हो रही है।

लक्ष्मी की मा भी दिखा चुकी है अपना दम

लक्ष्मी की मा गिन्नी ने भी लगातार तीन बार राष्ट्रीय स्तर पर परचम लहराया है। उसने सन 2013 में इडियन नेशनल चैम्पियनशिप दूध प्रतियोगिता जोकि पंजाब के मुक्तसर में आयोजित की गई थी उसमें प्रथम स्थान, सन 2015 में राष्ट्रीय डेयरी मेला करनाल में भी दूध प्रतियोगिता में भी प्रथम, चैम्पियन भैंस मेला हिसार में भी दूध प्रतियोगिता में भी प्रथम स्थान प्राप्त कर आज भी अनेक प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर लाखों रुपए इनाम के जीत रही है।

भैंसों के दम पर है दर्जनों किसान लखपती

गाव सिंघवा में दर्जनों किसान मुर्राह नस्ल की भैंसों को पाल रहे है और उनको बेचकर लाखों रुपये मुनाफा कमा रहे है। सरकार ने इस गाव को आदर्श मुर्राह नस्ल गाव घोषित किया हुआ है। इस गाव के लोगों ने भैंसों के नाम महिलाओं के नाम पर जैसे लक्ष्मी, धन्नो, लाडो, रानी, पूजा, मोहिनी, गंगा, जूना, लखो इत्यादि रखे हुए है और यह भैंस अपना नाम सुनते ही मालिक के पास पहुच जाती है।

जाने किसका दूध है सबसे सेहतमंद – गाय का या भैंस का?

कुछ लोग कहते है कि भैंस का दूध ज्‍यादा लाभदायक होता है जबकि कुछ लोगों का मानना है कि गाय के दूध में ज्‍यादा पोषक तत्‍व होते हैं। हर प्रकार के दूध में पोषक तत्‍वों की भरमार होती है, बस उम्र और शरीर की आवश्‍यकता के हिसाब से इसका उपयोग किया जाता है।

आगे इस बारे में कुछ और कहने से पहले आपको गाय और भैंस के दूध में पोषक तत्‍वों की मात्रा के बारे में बताया जा रहा है, जो प्रति 100 मिली. में होती है:

भैंस:

कैलोरी – 97, प्रोटीन- 3.7 ग्राम, फैट 6.9 ग्राम, पानी- 84 प्रतिशत, लैक्‍टोस 5.2 ग्राम, खनिज लवण- 0.79 ग्राम

अगर आप अपना वजन और मासपेशियां बढाना चाहते हैं, तो भैंस का दूध आपके लिये अच्‍छा है। भैंस के दूध में गाय के मुकाबले अधिक प्रोटीन होता है, जो कि मासपेशियां बढाने में मददगार है। अगर आपको पाचन संबंधित समस्‍या है तो गाय के दूध का सेवन करें।

गाय:

कैलोरी- 61, प्रोटीन- 3.2 ग्राम, फैट 3.4 ग्राम, पानी 90 प्रतिशत, लैक्‍टोस – 4.7 ग्राम, खनिज लवण- 0.72 ग्राम।

अगर आप अपना वजन घटाना चाहते है तो गाय का दूध ज्‍यादा फायदेमंद होता है। इसके 100 मिली. दूध में सिर्फ 61 कैलोरी होती है जबकि भैंस के 100 मिली. में 97 कैलोरी होती है। भैंस के दूध में (6.9 ग्राम वसा) गाय के दूध से (3.4 ग्राम वसा) ज्‍यादा वसा होता है।

सही कारण है कि नवजात बच्‍चों को गाय का दूध दिया जाता है क्‍योंकि यह आसानी से पच जाता है। जबकि भैंस का दूध भारी होता है और पचने में गाय के दूध की अपेक्षा अच्‍छा नहीं होता है क्‍योंकि इसमें पानी की मात्रा कम होती है।

यह किसान ज़मीन के छोटे से टुकड़े से कमाता है 30 लाख रुपये

क्या आप ने कभी सिर्फ एक कनाल में 30 लाख की कमाई की है ! सुनने में यह बात बड़ी अजीब लग सकती है लेकिन यह बात बिलकुल सच है । घर के पिछले हिस्से में आत्मनिर्भर फूड-चेन और महज ढाई एकड़ जमीन के मालिक दलविंदर सिंह एक बेहद सफल सूअर पालन केंद्र के जरिए सालाना करीब 30 लाख रुपये कमा लेते हैं, जो जमीन के इस छोटे से टुकड़े पर परंपरागत खेती से कभी संभव नहीं है।

किसान दलविंदर सिंह के लिए, जिनके पास पीढ़ियों से बंटती चली आ रही जो थोड़ी बहुत जमीन बची थी, उनके लिए फसल चक्र खेती विकल्प नहीं था। और इस बात को उन्होंने बहुत पहले ही भांप लिया था। इसी लिए साल 1980 में दलविंदर सिंह ने डेयरी व्यवसाय की ओर रुख कर लिया और साल 1990 में उन्हें दूसरा राज्य स्तरीय पुरस्कार भी मिला है ।

कुछ साल पहले पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) के वैज्ञानिकों द्वारा सूअर पालन के लिए एक कोशिश किए जाने को लेकर प्रोत्साहित किए जाने के बाद दलविंदर कुछ वक्त तक उलझन में रहे। उस दौर को याद करके दलविंदर बताते हैं, “सूअर को लेकर मेरे भी मन में वैसे ही विचार थे जैसा कि आपके भी मन में भी शायद हो कि वो गंदे होते हैं, गंदगी फैलाते हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि इसे खरीदेगा कौन?”

लेकिन साल 2010 में उस वक्त सब कुछ बदल गया जब दलविंदर ने रूपनगर स्थित किशनपुरा में अपने खेतों के दो कनाल हिस्से में 10 सू्अरों के साथ सूअर पालन का काम शुरू किया। वो बताते हैं, “सूअर बुद्धिमान जानवर होते है, कुत्ते से भी ज्यादा आज्ञाकारी होते हैं। सबसे ज्यादा हैरान करनेवाली बात ये है कि सूअर अपने आस-पास की जगह को साफ-सुथरा रखते हैं।

यहां सबसे अच्छी बात ये है कि दोनों ही तरह के सुअरों, छोटे और पूरी तरह व्यस्क सूअरों के लिए भारत में बड़ा बाजार है। शुरुआत में पंजाब से खरीदने वाले केरल, असम और नागालैंड के सूअर के व्यापारी इन्हें ट्रकों के जरिए ले जाते थे, लेकिन उसके बाद वो एक साथ मिलकर धंधा करने लगे और सूअर को ले जाने के लिए ट्रेन की बुकिंग करने लगे। बाजार में मांग इतनी अधिक है कि व्यापारी खुद सुअर पालकों को खोजते हुए आते हैं, हमें बेचने के लिए एक इंच भी नहीं हिलना पडता है।”

सुअर व्यवसाय का अंक-गणित

दूसरे धंधे के मुकाबले सूअर पालन शुरू करने का अर्थशास्त्र काफी सरल है। एक पूरी तरह व्यस्क सूअर आठ हजार में खरीदा जा सकता है। वो बताते हैं, “कोई भी व्यक्ति इस धंधे को एक नर और मादा सूअर से शुरू कर सकता है। पंजाब सरकार ने एक बड़ा सफेद यॉर्कशायर नस्ल विकसित किया है जिसे सरकारी केंद्रों से खरीदा जा सकता है। एक बार में आधा दर्जन के करीब सूअर के बच्चे पैदा होते हैं इसलिए पहले तीन महीने में ही आपके पास 10 सूअर हो जाएंगें।

सूअर का एक बच्चा करीब ढाई से तीन हजार रुपये में बिक जाता है और उससे थोड़ा और बड़ा सूअर का एक बच्चा 7 से 8 हजार में बिक जाता है। शुरुआत में पानी की आपूर्ति से जुड़े एक छोटे से शेड की जरुरत होती है जिसके लिए सरकार मोटी सब्सिडी देती है। बाद में इस शेड को और विस्तार किया जा सकता है।”

दलविंदर के पास अपने सूअर प्रजनन केंद्र में 50 सूअर है, जहां आधिकांश मादा सूअरों के साथ कुछ नर सूअर भी रखे जाते हैं और सूअर पालन केंद्र को सूअर के बच्चे बेचे जाते हैं। दलविंदर कहते हैं, “हम लोग सूअरों के प्रजनन के लिए प्राकृतिक तरीका अपनाते आये हैं लेकिन अब कृत्रिम गर्भाधान तरीका भी संभव हो गया है। सूअर की प्रजनन वृद्धि दर बहुत तेज है और एक साल में एक मादा सूअर तीन से चार बार बच्चा दे सकती है।” दलविंदर सिंह के फार्म में प्रति साल एक हजार सूअर पैदा हो रहे हैं जिससे वो करीब 28 से 30 लाख रुपये आसानी से कमा लेते हैं।

धंधे की लागत ज्यादा नहीं

सूअर पालन के क्षेत्र में मजदूरी का खर्च ज्यादा नहीं है। पूरे फार्म को दलविंदर अपने बेटे, जो अभी ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहे हैं, और एक सहायक की मदद से आसानी से चलाते हैं। वो बताते हैं, “फार्म पर हमेशा एक नौकर रहता है और दिन के वक्त हम लोग साथ रहते हैं। मैं सूअर का वैक्सीनेसन यानी प्रतिरक्षा का टीका खुद लगाते हैं, सहायक और मैं सूअर के होनेवाले बच्चे को संभालने के लिए प्रशिक्षित हैं। जब बच्चे छोटे रहते हैं तब हम उसके बाहरी दांत तोड़ देते हैं ताकि जब वो आपस में लड़ें तो एक-दूसरे को घायल ना कर सकें।

वहीं, सूअर को नहलाने और साफ करने का काम मेरा बेटा खुशी-खुशी कर लेता है”। वो ये भी बताते हैं, “सूअर से मिलनेवाले फायदे के साथ-साथ मैं अपने पास मौजुद पशुओं की संख्या कम करता जा रहा हूं और उसके बाद हम बहुत जल्द पूरी तर से सूअर पालन पर पर शिफ्ट हो जाएगे। और जल्द ही पशुओं को हटाने से खाली हुए जगहों का इस्तेमाल हम वयस्क, विकसित यानी मोटे सूअरों के विकास पर करेंगे”। मोटे और विकसित सूअर को खिलाने-पिलाने कोई परेशानी नहीं होती है और उनका घरेलू जूठन (हाउसहोल्ड वेस्ट) से भी काम चल जाता है।

जब वो पूरी तरह विकसित और बड़े हो जाते हैं तब उन्हें बेच दिया जाता है। वो बताते हैं, “प्रजनन केंद्र चलाने के मुकाबले मोटे सूअरों को पालने का धंधा ज्यादा आसान है और पूरे राज्य में आज इसी तरह का ट्रेंड चल रहा है” पंजाब में आज करीब 60 सूअर फार्म चल रहे हैं जिसके बूते यहां के किसान भव्य और बेहतरीन जिंदगी बिता रहे हैं।

सुनहरा मौका हाथ से न जाने दें

सूअर किसान संघ के सचिव दलविंदर चाहते हैं कि दूसरे सीमांत किसान भी सूअर पालन व्यवसाय की ओर रुख करें। वो बताते हैं, “जितनी जमीन मेरे पास है और उस पर जो कमाई होती उसकी कोई तुलना नहीं हो सकती है। दो एकड़ जमीन पर खेती करने से मैं एक साल में एक लाख रुपये कमा लेता। सूअर पालन को प्रोत्साहित करनेवाले सरकारी कार्यक्रम में जब मैं गया तो मैं अन्य किसानों को बताता हूं कि एक कनाल सूअर फार्मिंग से वो इतना कमा लेंगे जितना कि वो 42 एकड़ जमीन में खेती करने से कमा सकते हैं।”

हालांकि, सूअर पालन के धंधे में उतरनेवाले को दलविंदर सावधान करना नहीं भूलते हैं और कहते हैं कि इस धंधे में उतरने से पहले प्रशिक्षण बेहद जरूरी है। महज दसवीं पास दलविंदर ने खरार में स्थित सरकारी सूअर पालन केंद्र (पीएयू) के साथ-साथ गुवाहाटी और बरेली के संस्थान से प्रशिक्षण लिया है। सूअरों के टीकाकरण के साथ साथ उनके स्वास्थ्य पर लगातार नजर रखने की जरूरत होती है क्योंकि उनके मांस को खाया जाता है। इससे पहले की सुअर मानव खाद्य ऋंखला का हिस्सा बनें मैं ये सुनिश्चित करना चाहता हं कि वो पूरी तरह स्वस्थ हैं। लेकिन वहीं, चिंता की बात ये है कि ऐसे कई किसान हैं जो मोटे-तगड़े यानी वयस्क सूअर का कारोबार कर रहे हैं और वो भी बिना किसी प्रशिक्षण के, जो ठीक नहीं है”।

ये प्रशिक्षण का ही कमाल था कि उन्होंने गाय और जमीन को मिलाकर एक ऐसा फूड चेन तैयार कर लिया जिससे सूअर पालन के धंधे के लागत में भी कमी आई। अपना अनुभव बांटते हुए वो कहते हैं, “मेरे पास जो जमीन है मैं उसमें पशुचारे को पैदा करता हूं। इससे मेरे पास मौजुद 14 गायों की जरूरत पूरी हो जाती है। इनसे मुझे करीब 100 लीटर दूध मिल जाता है जिसे बेचने से इतनी आमदनी हो जाती है कि आसानी से सूअरों का चारा खरीद लेता हूं।

सूअर के अपशिष्ट को वापस खेत में डाल देते हैं जो पशुचारे के लिए ऊर्वरक का काम करता है। यह सब पर्याप्त होता है और मुझे बाजार से ऊर्वरक खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती है। जो कुछ भी मैं सूअर बेच कर कमाता हूं वो पूरा का पूरा शुद्ध मुनाफा होता है।”

सूअर पालन का अर्थशास्त्र

  • पूरी तरह विकसित सूअर की कीमत 8 हजार रुपये, महज एक नर और एक मादा से कोई भी इस धंधे को शुरु कर सकता है।
  • एक बार में छह या इससे ज्यादा सूअर के बच्चे पैदा होते हैं, इस तरह तीन महीने के अंदर 10 सूअर हो जाता है।
  • सूअर का एक बच्चा करीब ढाई हजार रुपये में बिकता है, पूर्ण विकसित सूअर आठ हजार रुपये में तक बिकता है।
  • दो एकड़ जमीन पर एक बार में 50 सूअर का पालन हो सकता है।
  • एक साल में एक हजार सूअर का उत्पादन कर 30 लाख रुपये कमाई की जा सकती है।

दूसरे से तुलना संभव नहीं

सूअर पालन किसान एसोसिएशन के सचिव दलविंदर सिंह कहते हैं, “सूअर पालन व्यवसाय की तुलना परंपरागत खेती-बाड़ी और उससे हासिल की गई आमदनी से बिल्कुल नहीं की जा सकती है।” वो यह भी बताते हैं, “एक एकड़ क्षेत्र में गेहूं-चावल की सालाना खेती से एक लाख 20 हजार

की आमदनी होती है। वहीं, अगर सूअर पालन का धंधा एक कनाल फार्म में अच्छी तरह से किया जाएगा तो वो 42 एकड़ की खेती के बराबर होता है।”

ऐसे शुरू करें अपना पोल्ट्री फार्म ,जाने इस बिज़नेस की हर बारीकी को

हमारे देश में पूरे साल अंडों की बहुत मांग रहती है और नेशनल इंस्टीट्यूट आफ न्यूट्रीशन की राय के तहत भी हर इनसान को 1 साल में 180 अंडे और 11 किलोग्राम चिकन मीट खाना चाहिए, जबकि हमारे देश में साल भर में हर इनसान केवल 53 अंडे और 2.5 किलोग्राम चिकन मीट ही खा पाता है. अब आप इस आंकड़े से ही अंदाजा लगा सकते हैं कि हमारे देश में पोल्ट्री इंडस्ट्री के विकास की कितनी गुंजाइश है.

गांव के बहुत से बेरोजगार नौजवान पोल्ट्री बिजनेस शुरू करना चाहते हैं, पर वे जानकारी न होने की वजह से इस कारोबार में हाथ डालने से घबराते हैं. कोई व्यक्ति इस काम में हाथ डाल भी देता है, तो पोल्ट्री बिजनेस की पूरी जानकारी नहीं होने की वजह से उस का पोल्ट्री कारोबार कामयाब नहीं होता. पोल्ट्री का बिजनेस शुरू करने से पहले इस बिजनेस की हर बारीकी को जान लेना चाहिए, जैसे कौन सी नस्ल (स्ट्रेन) को पाल कर कम खर्चे पर ज्यादा अंडे पैदा किए जा सकते हैं.

हमारे देश के गांवों में ज्यादातर किसान बैकयार्ड पोल्ट्री फार्मिंग कर के अंडे और चिकन मीट पैदा करते हैं, जिस का इस्तेमाल वे अपने परिवार के खाने में ही कर लेते हैं. अगर ये किसान अपनी बैकयार्ड पोल्ट्री फार्मिंग को कमर्शियल लेयर/ब्रायलर प्रोडक्शन की यूनिट में बदल दें, तो घर के खाने के अलावा कमाई का एक अच्छा जरीया बना सकते हैं.

किसानों के पास खुद की जमीन होती है और शेड बनाने में ज्यादा खर्च भी नहीं होता. अंडा एक बहुत ही पौष्टिक खाना है, सुबह नाश्ते में 1 या 2 अंडे खाए जाएं तो दोपहर तक भूख नहीं लगेगी यानी नुकसानदायक चीजें जैसे परांठे, ब्रेडपकौड़े, समोसे वगैरह खाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि आप को भूख नहीं लगेगी. वैसे भी ब्रेडपकौड़े व समोसे वगैरह हर इनसान को नुकसान पहुंचाते हैं. अगर इस की जगह अंडे खाए जाएं, तो शरीर को जरूरी विटामिन व मिनरल की पूर्ति कम दामों में होगी और सेहत भी अच्छी बनी रहेगी.

हमारे देश में अंडे पैदा करने के लिए बहुत सी मुरगियां यानी स्ट्रेन (ब्रीड) उपलब्ध हैं, पर हमारे देश की आबोहवा ऐसी नहीं है कि कोई भी स्ट्रेन कम खर्च पर ज्यादा अंडे पैदा करने की कूवत रखती हो. इसलिए ऐसी नस्ल का चुनाव करें जो आप के इलाके की आबोहवा में अच्छा उत्पादन कर सके. अंडे पैदा करने के लिए बीवी 300 स्ट्रेन और चिकन मीट पैदा करने के कोब्ब 400 स्ट्रेन बढि़या मानी गई हैं. ये दोनों स्ट्रेन हमारे देश के सभी राज्यों में गरमी, सर्दी व बरसात सभी मौसमों में कम खर्च पर ज्यादा उत्पादन देने की कूवत रखती हैं.

सामान्य मैनेजमेंट पर भी इन दोनों स्ट्रेनों में ज्यादा गरमी, ज्यादा बरसात, ज्यादा ठंड और ज्यादा नमी में मौत दर भी कम है. बीवी 300 मुरगी 18 हफ्ते की होने के बाद अंडे देना शुरू कर देती है और 80 हफ्ते तक 374 अंडे देती है. ये 374 अंडे पैदा करने के लिए (19 से 80 हफ्ते तक) यह मुरगी कुल 46.6 किलोग्राम दाना (फीड) खाती है और पहले दिन से ले कर 18 हफ्ते तक 5.60 किलोग्राम दाना खाती है. यह मुरगी अंडा देना शुरू करने के बाद 80 हफ्ते तक रोजाना औसतन 111 ग्राम दाना खाती है. पहले दिन से ले कर 18 हफ्ते तक डेप्लेशन यानी मोर्टेलिटी व कलिंग 3-4 फीसदी तक ही होती है और 19 हफ्ते से 80 हफ्ते तक डेप्लेशन 7 फीसदी तक होता है.

वेनकोब्ब 400 ब्रायलर दुनिया में जानीमानी कमर्शियल ब्रायलर की उम्दा स्ट्रेन (नस्ल) है. यह हमारे देश के सभी हिस्सों में अच्छे नतीजे देती है. ज्यादा गरमी और ठंड या बरसात के मौसम में इस स्ट्रेन में मोर्टेलिटी बहुत कम होती है और बढ़वार अच्छी होती है. बड़े पैमाने पर ब्रायलर फार्मिंग करने वाले किसान वेनकोब्ब 400 ब्रायलर को ही पालना पसंद करते हैं. वेनकोब्ब 400 ब्रायलर स्ट्रेन 35 दिनों में तकरीबन 3 किलोग्राम फीड खा कर 2 किलोग्राम तक यानी 1900-2000 ग्राम तक वजन हासिल करने की कूवत रखती है. फार्म पर मैनेजमेंट अच्छा हो तो 35 दिनों में केवल 2.75 फीसदी की मौत दर देखी गई है.

कमर्शियल लेयर (अंडे देने वाली मुरगी) को केज और डीपलिटर सिस्टम और कमर्शियल ब्रायलर को केवल डीपलिटर सिस्टम से पालते हैं. मुरगी पालने के शेड हमेशा साइंटिफिक स्टैंडर्ड के मुताबिक ही बनाने चाहिए. अगर आप ने पोल्ट्री शेड गलत दिशा और गलत तरीके से बना दिया है, तो आप का सारा पैसा बरबाद होगा ही और गलत तरीके से बनाए गए शेड में आप मुरगी से उस की कूवत के मुताबिक उत्पादन नहीं ले पाएंगे. गलत बने शेड में मुरगियों की मौतें भी ज्यादा होती हैं. मुरगियों को जंगली जानवरों, कुत्ते व बिल्ली वगैरह से बचाने के लिए शेड की चैन लिंक (जाली) अच्छी क्वालिटी की होनी चाहिए.

सर्दी के मौसम में शेड को गरम रखने और गरमी के मौसम में शेड को ठंडा रखने के लिए कूलर, पंखे, फागर वगैरह का भी इंतजाम रखें. शेड को थोड़ी ऊंचाई पर बनाएं जिस से बरसात का पानी शेड के अंदर नहीं घुसे. शेड के अंदर गरमीसर्दी के असर को कम करने के लिए शेड की छत पर 6 इंच मोटा थैच (घासफूस का छप्पर) डाल देना चाहिए. पर थैच को आग से बचाने के लिए शेड की छत पर स्प्रिंकलर लगा देना चाहिए ताकि जरूरत पड़ने पर उसे चलाया जा सके. शेड की छत पर थैच डालने पर गरमी के मौसम में शेड के अंदर 7-10 डिगरी तापमान कम हो जाता है. सर्दी के मौसम में भी थैच शेड के अंदर का तापमान ज्यादा नीचे तक नहीं जाने देता है.

चिकन मीट और अंडा उत्पादन के कुल खर्च का 60 से 70 फीसदी दाने पर खर्च होता है. इसलिए दाने की क्वालिटी एकदम अच्छी होनी चाहिए. पोल्ट्री फीड उम्र, स्ट्रेन, मौसम, प्रोडक्शन स्टेज, फीडिंग मैनेजमेंट वगैरह के पैमाने पर खरा उतारना चाहिए. पोल्ट्री फीड संतुलित नहीं है तो मुरगी कम अंडे पैदा करेगी और पोषक तत्त्व और विटामिन की कमी से होने वाली बीमारियां भी मुरगियों को होने लगेंगी, जैसे फैटी लिवर सिंड्रोम, पेरोसिस, डर्मेटाइटिस, रिकेट्स, कर्लटाय पेरालिसिस वगैरह. अंडे देने वाली मुरगी को लगातार अंडे देने के लिए 2500 से 2650 किलोग्राम कैलोरी वाले फीड की जरूरत होती है, उम्र और अंडे के वजन के मुताबिक ही फीड की कैलोरी तय की जाती है. 1 से 7 हफ्ते के चूजे को 2900 किलोग्राम कैलोरी का फीड, जबकि ग्रोवर को 2800 किलोग्राम कैलोरी का फीड देना चाहिए.

मुरगी दाने और फीड बनाने वाले इंग्रेडिएंट (मक्का वगैरह) में नमी कभी भी 10-11 फीसदी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए. अगर मक्के में नमी ज्यादा होती है, तो फंगस लग सकता है और फंगस लगा मक्का फीड में इस्तेमाल करने से उस में अफ्लाटाक्सिन (एक प्रकार का जहर) की मात्रा बढ़ जाएगी, जो मुरगी की इम्युनिटी (बीमारी झेलने की कूवत) को कमजोर कर देगी और मुरगी जल्द ही बीमारी की चपेट में आ जाएगी. बेहतर होगा कि पोल्ट्री फीड प्राइवेट कंपनी से खरीदा जाए ताकि फीड से जुड़ी किसी भी तरह की परेशानी से बचा जा सके.

उत्तरा फीड कंपनी देश में बड़े पैमाने पर उम्दा क्वालिटी का पोल्ट्री फीड बेचती है. इस कंपनी की सेल्स टीम से संपर्क कर के फीड खरीदें. मुरगियों के लिए रोशनी सब से खास चीज है. अंडे देने वाली कमर्शियल मुरगी को 16 घंटे लाइट देते हैं और चूजे को ब्रूडिंग के दौरान 24 घंटे, ग्रोवर/पुलेट को 12 घंटे लाइट (नेचुरल लाइट) देते हैं. लाइट मौसम व स्ट्रेन वगैरह पर निर्भर करती है और इसी आधार पर ही लाइट का मैनेजमेंट करते हैं. कमर्शियल लेवल पर पीली, लाल, आरेंज रंग की लाइट से अच्छे नतीजे मिलते हैं. ब्रायलर को 24 घंटे लाइट दी जाती है. लाइट देने में किसी तरह की कोई कंजूसी न करें. लाइट 1 वाट प्रति 4 वर्ग फुट के हिसाब से दें. अपने फार्म की मुरगियों (फ्लाक) को समय पर टीके दें. सामान्य वैक्सीनेशन शिड्यूल इलाके और फार्म के मुताबिक पोल्ट्री चूजा बेचने वाली कंपनी से लें और उसे अपनाएं.

फार्म की मुरगियों से लगातार अच्छे अंडे लेने और उन को बीमारी से बचाने के लिए पानी भी सब से अहम चीज है. फार्म की मुरगियों को हमेशा ताजा व साफ पानी यानी जो इनसानों के लिए भी पीने लायक हो, देना चाहिए. ई कोलाई, साल्मोनेला बैक्टीरिया, पीएच, हार्डनेस, कैल्शियम वगैरह की जांच के लिए पानी की जांच समयसमय पर कराते रहें. अगर जांच में पानी में कोई कमी मिलती है, तो उसे फौरन दुरुस्त करें. सब से अच्छा होगा कि पोल्ट्री फार्म पर आरओ प्लांट लगा कर मुरगियों को उस का पानी दें, इस से मुरगियों की अंडा पैदा करने की कूवत में काफी इजाफा होगा और वे ज्यादा अंडे देंगी और पानी से जुड़ी बीमारियों से भी बची रहेंगी. 3000 लीटर प्रति घंटा आरओ का पानी तैयार करने के लिए आरओ प्लांट पर तकरीबन 5-6 लाख रुपए का खर्च आएगा.

फार्म पर नया फ्लाक डालने से पहले फार्म और शेड की साफसफाई तय मानकों के अनुसार करना जरूरी होता है. शेड के सभी उपकरण (दानेपानी के बरतन, परदे, ब्रूडर, केज) व परदे वगैरह को अच्छी तरह साफ करना चाहिए. पहले फ्लाक के पंख, खाद, फीड बैग वगैरह को जला दें. शेड को साफ पानी से अच्छी तरह धो कर साफ करने के बाद शेड और उपकरणों की सफाई के लिए डिसइन्फेक्टेंट का इस्तेमाल करें. शेड की छत, पिलर वगैरह पर वाइट वाश (चूना) करने के बाद फिर से डिसइन्फेक्टेंट का स्प्रे करें.शेड का फर्श पक्का है तो उसे अच्छी तरह से लोहे के ब्रश से रगड़ कर साफ करें और फिर उस की साफ पानी से अच्छी तरह सफाई कर के उस पर 10 फीसदी वाले फार्मलीन के घोल का छिड़काव करें. खाली शेड में एक्स 185 डिसइन्फेक्टेंट की 4 मिलीलीटर मात्रा 1 लीटर पानी में घोल कर 25 वर्ग फुट रकबे में अच्छी तरह छिड़काव करें. शेड का फर्श कच्चा हो तो शेड के फर्श की 2 इंच तक मिट्टी की परत खरोंच कर निकाल दें और उस जगह पर दूसरे खेत की साफ ताजी मिट्टी डाल दें. अगर पिछले फ्लाक में किसी खास बीमारी का हमला हुआ था, तो पोल्ट्री कंपनी के टेक्निकल डाक्टर से शेड की सफाई का शेड्यूल लें और उसी के अनुसार ही शेड की साफसफाई करें.

फार्म पर बायो सिक्योरिटी अपनाएं मतलब फार्म पर बाहर के किसी भी शख्स को न आने दें.आप के फार्म पर बायोसिक्योरिटी जितनी अच्छी होगी तो फार्म की मुरगियों को बीमारी लगने की संभावना उतनी ही कम होगी. इसलिए बायोसिक्योरिटी बनाए रखने के लिए फार्म के गेट पर फुटबाथ बनाएं. सभी वर्कर, सुपरवाइजर, डाक्टर, विजिटर को नहला कर और फार्म के कपड़े पहना कर ही फार्म में घुसने दें. जंगली पक्षी भी बायोसिक्योरिटी को तोड़ते हैं और फार्म पर बीमारी फैलाने में खास रोल अदा करते हैं. इसलिए फार्म पर लगे पेड़ों पर अगर जंगली पक्षियों का बसेरा है, तो उन को खत्म कर दें. अपने मुरगी फार्म से अच्छा मुनाफा कमाने के लिए सभी मुरगीपालकों को बायोसिक्योरिटी पर ज्यादा से ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है. फार्म माइक्रो लेवल पर साइंटिफिक मैनेजमेंट अपनाना जरूरी है, तब जा कर पोल्ट्री फार्म से अच्छे मुनाफेकी उम्मीद की जा सकती है. बीवी 300 और कोब्ब 400 के 1 दिन के चूजे, दाना, दवा, वैक्सीन वगैरह खरीदने के लिए

इन कंपनियों में संपर्क करें :

  •  वैंकीस इंडिया लिमिटेड.
  •  वेंकटेश्वर रिसर्च एंड ब्रीडिंग फार्म प्राइवेट लिमिटेड.
  •  बीवी बायो कार्प प्राइवेट लिमिटेड.
  •  उत्तरा फूड्स एंड फीड प्राइवेट लिमिटेड.

ध्यान देने लायक बातें:

अंडों को लंबे समय तक खाने लायक बनाए रखने के लिए उन्हें फ्रिज में रखें. अंडे से बनी डिश को फौरन खा कर खत्म कर दें. अंडे से बनी डिश को फ्रिज में कतई स्टोर न करें. वर्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन और पान अमेरिका हेल्थ आर्गनाइजेशन की सलाह के मुताबिक अंडे रोज खाने चाहिए. अंडे में सभी जरूरी न्यूट्रिएंट्स जैसे आयरन और जिंक वगैरह अच्छी मात्रा में मौजूद होते हैं.

पोल्ट्री फार्म ऐसे शुरू करें:

पोल्ट्री फार्म खोलने से पहले पोल्ट्री एक्सपर्ट से सलाहमशवरा करें. इस के नफेनुकसान पर गौर करें. तैयार माल को बेचने की पहले से प्लानिंग तैयार करें. पोल्ट्री एक्सपर्ट या पोल्ट्री चूजादाना बेचने वाली कंपनी के टेक्निकल सर्विस के डाक्टर से बात कर के ट्रेनिंग लें और उन्हीं की देखरेख में ब्रायलर फार्म चलाएं. अगर इस काम को बड़े लेवल पर करना हो, तो प्रोजेक्ट बना कर बैंक से लोन ले सकते हैं. प्रोजेक्ट बनाने में पोल्ट्री कंपनी के टेक्निकल डाक्टर और बैंक के एग्रीकल्चर डेवलपमेंट अफसर से मदद लें.
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कम लागत में ज्यादा मुनाफे के लिए करें बटेर पालन

बटेर पक्षी का नाम सुनते ही मांस खाने वालों के मुंह में पानी आ जाता है। इसके मांस के लिए लोग पैसों की परवाह नहीं करते। मांस व अंडा उत्पादन के क्षेत्र में भी बटेर पालन कर बहुत लाभ कमाया जा सकता है। जापानी नस्लों के विकास के साथ ही बटेर पालन अब व्यवसाय के रूप में देश के कई हिस्सों में तेजी से फैल रहा है। अपार संभावनाओं से भरे पूर्वाचल में व्यवसाय के रूप में इसका विकास होना अभी बाकी है।

स्वादिष्ट मांस के रूप में बटेर को बड़े ही चाव से पसंद किया जाता है। इस दिशा में ढाई दशक के लंबे प्रयास के बाद बटेर के इस पालतू प्रजाति का विकास मांस व अंडा उत्पादन के लिए किया गया है। बटेर पालन के लिए मुख्य रूप से फराओ, इग्लिस सफेद, कैरी उत्तम, कैरी उज्जवल, कैरी श्वेता, कैरी पर्ल व कैरी ब्राउन की जापानी नस्लें हैं। शीघ्र बढ़वार, अधिक अंडे उत्पादन, प्रस्फुटन में कम दिन सहित तत्कालिक वृद्धि के कारण यह व्यवसाय का रूप तेजी से पकड़ता जा रहा है।

वर्ष भर के अंतराल में ही मांस के लिए बटेर की 8-10 उत्पादन ले सकते हैं। चूजे 6 से 7 सप्ताह में ही अंडे देने लगते हैं। मादा प्रतिवर्ष 250 से 300 अंडे देती है। 80 प्रतिशत से अधिक अंडा उत्पादन 9-10 सप्ताह में ही शुरू हो जाता है। इसके चूजे बाजार में बेचने के लिए चार से पांच सप्ताह में ही तैयार हो जाते हैं। एक मुर्गी रखने के स्थान में ही 10 बटेर के बच्चे रखे जा सकते हैं। हेचरी में 35 से 40 दिनों में बटेर खाने लायक हो जाता है। एक अंडा पांच रुपए में बिकता है। बटेर तीन-चार सौ ग्राम का हो जाता है तो 120 रुपए जोड़ा बिकता है। प्रति बटेर 15 से 20 रुपए बचत होती है।

इसके साथ ही रोग प्रतिरोधक होने के चलते इनकी मृत्यु भी कम होती है। इन सबसे महत्वपूर्ण यह है कि बटेर को किसी भी प्रकार के रोग निरोधक टीका लगाने की जरूरत नहीं होती है। एक किलोग्राम बटेर का मांस उत्पादन करने के लिए दो से ढाई किलोग्राम राशन की आवश्यकता होती है। बटेर के अंडे का भार उसके शरीर का ठीक आठ प्रतिशत होता है जबकि मुर्गी व टर्की के तीन से एक प्रतिशत ही होता है।

कृषि विज्ञान केंद्र पिलखी के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा.वीके सिंह बताते हैं कि विदेशों में बटेर उत्पादन एक विकसित व्यवसाय का रूप ले चुका है। भारत में इसका विकास धीरे-धीरे हो रहा है। फूड के रूप में मुर्गी दाना ही देते हैं। फॉर्म के बीट से तैयार खाद का उपयोग खेत में करने पर पैदावार भी अच्छी होती है।इसको व्यवसायिक रूप देकर बटेर उत्पादन कर इस दिशा में अच्छी आय कमा सकते हैं।

जाने कैसे खूब कमाई करा रहा काले मांस वाला कड़कनाथ

काले रंग की इस कड़कनाथ मुर्गी का एक अंडा 50 रुपये तक में बि‍कता है। मुर्गी और मुर्गे की कीमत भी बॉयलर के मुकाबले करीब दोगुनी है। यह मुर्गा दरअसल अपने स्वाद और सेहतमंद गुणों के लि‍ए मशहूर है। कड़कनाथ भारत का एकमात्र काले मांस वाला चिकन है।

शोध के अनुसार, इसके मीट में सफेद चिकन के मुकाबले कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम होता है और अमीनो एसिड का स्तर ज्यादा होता है। मूलरूप से कड़कनाथ मध्य प्रदेश के झबुआ जिले का मुर्गा है मगर अब पूरे देश में यह मि‍ल जाता है।

महाराष्‍ट्र, आंध्रपेदश, तमि‍लनाडु सहि‍त कई राज्‍यों में लोगों इससे अच्‍छा कमा रहे हैं। कुछ जरूरी बातों का ध्‍यान रख इसे कहीं भी पाला जा सकता है। कड़कनाथ मुर्गे की मांग पूरे देश में होने लगी है। डि‍पार्टमेंट ऑफ एनि‍मल हस्‍बेंड्री, महाराष्‍ट्र के मुताबि‍क, इसका रखरखाव और मुर्गों के मुकाबले आसान होता है।

इसका मीट और अंडा बॉयलर तो दूर की बात देसी मुर्ग से भी कहीं ज्‍यादा महंगा बि‍कता है। फुटकर बाजार में इसके मीट का रेट 300 से लेकर 450 रुपये होता है। जि‍न इलाकों में यह मौजूद नहीं वहां इसके एक अंडे की कीमत 25 रुपये तक चली जाती है। अगर आप ऑनलाइन इसका अंडा खोजेंगे तो 50 रुपये तक दाम रखा गया है। हालांकि‍ ग्रामीण इलाकों में इतना दाम नहीं मि‍लता। इसके एक दि‍न के चूजे की कीमत 70 रुपये के आसपास होती है।

साउथ एशि‍या प्रो पुअर लाइव स्‍टॉक पॉलि‍सी प्रोग्राम के तहत की गई एक स्‍टडी के मुताबि‍क, जहां 6 महीने का देसी मुर्गा 80 से 90 रुपये में बि‍कता है वहीं कड़कनाथ की कीमत 100 से 150 रुपये होती है। वहीं 12 महीने के देसी मुर्गे की कीमत 150 से 200 रुपये होती है वहीं कड़कनाथ की कीमत 250 से 300 रुपये होती है। यह इनके थोक दाम हैं।

कैसे करें इसका पालन

  • अगर आप 100 चि‍कन रख रहे हैं तो आपको 150 वर्ग फीट जगह की जरूरत होगी। हजार चि‍कन रख रहे हैं तो करीब 1500 वर्ग फीट जगह की जरूरत होगी।
  • चूजों और मुर्गि‍यों को अंधेरे में या रात में खाना नहीं देना चाहि‍ए। मुर्गी के शेड में प्रतिदिन तकरीबन घंटे प्रकाश की आवश्यकता होती है।
  • फार्म बनाते गांव या शहर से बाहर मेन रोड से दूर हो, पानी व बिजली की पर्याप्त व्यवस्था हो। फार्म हमेशा ऊंचाई वाले स्थान पर बनाएं ताकि आस-पास जल जमाव न हो।
  • दो पोल्ट्री फार्म एक-दूसरे के करीब न हों। मध्य में ऊंचाई 12 फीट व साइड में 8 फीट हो।
    चौड़ाई अधिकतम 25 फीट हो तथा शेड का अंतर कम से कम 20 फीट होना चाहिए। फर्श पक्का होना चाहिए।
  • एक शेड में हमेशा एक ही ब्रीड के चूजे रखने चाहिए। पानी पीने के बर्तन दो से तीन दि‍न में जरूर साफ करें।
  • फार्म में ताजी हवा आती रहने से बीमारि‍यां नहीं लगतीं।

कहां से पा सकते हैं

इसके लि‍ए आप इंडि‍या मार्ट पर मौजूद सैलर्स से कॉन्‍टेक्‍ट कर उनसे मोलभाव कर सकते हैं। इसके अलावा इंटरनेट पर खोजेंगे तो कई ऐसे पोल्‍ट्री फार्म मि‍ल जाएंगे जो फार्म खोलने के लि‍ए चूजे और अंडे बेचते हैं।

अगर आप इस मुर्गी का बड़े पैमाने पर पालन करने जा रहे हैं तो बेहतर होगा कि‍सी पोल्‍ट्री फार्म में जाकर चीजों को समझें या फि‍र अपने इलाके के मुर्गी पालन केंद्र में जाकर इसकी ट्रेनिंग लें।

मिलिए कैथल के ‘डेयरी के सुल्तान’ बलिंदर ढुल से, डेयरी फार्म से हर महीने 1.5 लाख की कमाई

व्यवसायिक डेयरी फार्मिंग एक ऐसा काम है जिसमें लाखों रुपये की कमाई की जा सकती है। कैथल के युवा और प्रगतिशील डेयरी किसान बलिंदर ढुल ने ऐसा कर के दिखाया है। कैथल में अपनी जमीन पर पेशेवर तरीके से डेयरी फार्मिंग कर बलिंदर ना सिर्फ अच्छी-खासी कमाई कर रहे हैं बल्कि इलाके के युवाओं के लिए एक मिसाल भी बन गए हैं। आज डेयरी के सुल्तान में हम हरियाणा के 28 वर्षीय बलिंदर ढुल की सफलता की कहानी लेकर आए हैं, इनकी सफलता से डेयरी व्यवसाय में आने की सोच रहे युवाओं को जरूर प्रेरण मिलेगी।

24 साल की उम्र में 7 भैंस से शुरू किया डेयरी फार्म

बात साल 2012-13 की है जब कैथल जिले के हरसोला गांव के रहने वाले बलिंदर ढुल बीए (इकॉनामिक्स) करने के बाद एमए की पढ़ाई कर रहे थे। उनके सभी दोस्त सरकारी नौकरी की तैयारी में लगे थे लेकिन बलिंदर के मन में कुछ अपना काम करने का विचार चल रहा था। आखिर काफी सोचने के बाद उन्होंने अपने गांव में ही डेयरी फार्मिंग करने की ठानी, क्योंकि उनके घर में हमेशा से पशु पालने की परंपरा थी और उन्होंने इसी बिजनेस में किस्मत आजमाने का फैसला किया।

कैथल से 8 किलोमीटर दूर हरसोला गांव में बलिंदर की 8 एकड़ खेती की जमीन थी, जहां उनके पिता खेती किया करते थे। बस बलिंदर ने इसी जमीन पर डेयरी फार्म खोलने का फैसला कर लिया। बलिंदर ने कैथल के कृषि ज्ञान केंद्र से डेयरी फार्मिंग की ट्रेनिंग ली और फरवरी 2014 में 7 मुर्रा भैंस के साथ एक एकड़ जमीन पर डेयरी फार्म शुरू कर दिया। युवा बलिंदर ने जब डेयरी फार्म खोला तो रिश्तेदार ही नहीं पड़ोसियों ने उसकी काफी आलोचना की, लेकिन इरादे के पक्के बलिंदर ने किसी की नहीं सुनी और पूरी मेहनत के साथ डेयरी फार्म को बढ़ाने में लगे रहे।

आज हैं बलिंदर के फार्म में 80 से ज्यादा गाय और भैंस

युवा बलिंदर की मेहनत का ही नतीजा था कि धीरे-धीरे उनका डेयरी फार्म प्रगति करने लगा और उसके शुद्ध दूध की डिमांड बढ़ने लगी। जैसे-जैसे कमाई बढ़ी बलिंदर का जोश भी बढ़ता गया और उन्होंने पशुओं की संख्या बढ़ाना शुरू कर दिया। आज बलिंदर के फार्म में 30 अच्छी नस्ल की मुर्रा भैंस हैं, जिनमें से बीस भैंस दूध देती हैं, जबकि 30 हॉलिस्टियन फ्रीशियन और साहीवाल नस्ल की गाय हैं, जिनमें से 20 गाय इस वक्त दूध दे रही हैं। बाकी गाय और भैंस अभी ड्राई हैं। इसके साथ ही बलिंदर के डेयरी फार्म में बड़ी संख्या में अच्छी नस्ल की बछड़ियों की भी है, जो कुछ महीनों में तैयार होकर दूध देने लगेंगी।

फार्म में रोजाना होता है 300 लीटर दूध का उत्पादन

बलिंदर के डेयरी फार्म में आज रोजाना 300 लीटर दूध का उत्पादन होता है, जबकि सर्दियों के समय में दूध का उत्पादन 400 लीटर प्रतिदिन तक पहुंच जाता है। डेयरी टुडे से बातचीत में बलिंदर ने बताया कि वो अपने फार्म में पशुओं की काफी देखभाल करते हैं। पशुओं को क्या खिलाना है, कब खिलाना है उसका पूरा ध्यान रखा जाता है। पशुओँ के लिए हरा चारा वो अपने खेत में ही उगाते हैं साथ ही पशुओं के लिए दाना भी खुद तैयार करवाते हैं।

बलिंदर के मुताबिक पशुओं के दाने में सरसों की खली, बिनौला, सोयाबीन, मक्का, गेहूं, मिनरल मिक्सर समेत 17 चीजें मिलाते हैं। इस दाने को खाने से जहां गाय और भैंस सेहतमंद रहते हैं वहीं दुग्ध का उत्पादन भी बढ़ जाता है। बलिंदर ने बताया कि वो पशुओं के स्वास्थ्य की देखभाल पर भी खासा ध्यान देते हैं। सरकारी अस्पताल के चिकित्सक से संपर्क में तो रहते ही हैं साथ ही उन्होंने एक निजी पशु चिकित्सक को भी पशुओं की देखभाल के लिए रखा है, जो रोजाना पशुओं के स्वास्थ्य का चेकअप करता है। पशुओं को रखने के लिए काफी बड़े क्षेत्र में शेड बना हुआ है, उन्होंने बताया कि पशुओं को सिर्फ मिल्किंग और चारा खिलाने के लिए बांधा जाता है बाकी वक्त गाय और भैंस पूरे फार्म में खुले घूमते रहते हैं।

दूध बेचकर हर महीने कमाते हैं 1.5 लाख रुपये

बलिंदर ने बताया कि उनके फार्म में औसतन 300 लीटर दूध का रोजाना उत्पादन होता है। बलिंदर खुद ही दूध की मार्केटिंग करते हैं। इसके लिए उन्होंने कैथल शहर में कई हलवाइयों से कॉट्रैक्ट कर रखा है। बलिंदर ज्यादातर दूध इन्हीं हलवाइयों को बेच देते हैं साथ ही कुछ दूध वो सीधे ग्राहकों को उनके घरों तक पहुंचाते हैं। बलिंदर के डेयरी फार्म में रोजाना भैंस का 130 लीटर और गाय का 170 लीटर दूध होता है।

बाजार में भैंस का दूध 50 रुपये जबकि गाय का 40 रुपये प्रति लीटर बिकता है। बलिंदर के मुताबिक हर महीने करीब दो से ढाई लाख रुपये का खर्चा होता है, इस प्रकार उन्हें करीब डेढ़ लाख रुपये महीने की बचत हो जाती है। बलिंदर ने अपने फार्म पर चार लोगों को नौकरी पर रखा है साथ ही उनका छोटा भाई जसविंदर ढुल भी हर काम में पूरी मदद करता है। डेयरी फार्म में गायों का दूध मशीन से दुहा जाता है जबकि भैंस का दूध हाथ से दुहा जाता है।

News Source – Dairy Today 

अब भारत की देसी गाय भी देंगी एक दिन में 80 लीटर दूध

पशुपालन के क्षेत्र में सरकार को एक बड़ी कामयाबी मिली है। अब तक भारतीय पशुपालक का देसी नस्ल की गायों की ओर रूझान इसलिए कम था कि उनकी दूध उत्पादन क्षमता कम थी।

सरकार ने पशुपालकों की समस्या को समझा और भारतीय नस्ल की उत्पादन क्षमता को बढ़ाने के लिए अनेक कदम उठाएं हैं। इसी के अंतर्गत, देसी गायों की नस्ल सुधार के लिए अब सॉटेंड सेक्सड सीमन तकनीक का उपयोग मध्यप्रदेश में किया जाएगा।

इससे जहां दुधारू गाय की नस्ल में सुधार होगा तो वहीं उसका दूध उत्पादन भी बढ़ेगा।जिस से आप की देसी गाय भी 80 लीटर तक दूध दे सकेगी । देसी नस्ल की गायों में इस तकनीक के प्रयोग से केंद्र सरकार मादा अथवा नर बछड़े पैदा करने को लेकर अनुसंधान (रिसर्च) करवा रही है।

इसी क्रम में, मध्यप्रदेश में ज्यादा दूध देने वाली गायों की संख्या बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश राज्य पशुधन एवं कुक्कुट विकास निगम ने ब्राजील से गिर और जर्सी नस्ल के सांडों के आठ हजार सीमन डोज मंगवाए हैं।

पशुपालन विभाग की माने तो ब्राजील में गिर और जर्सी नस्ल की गाय 35-40 लीटर दूध एक समय में देती है। जबकि भारत में इन नस्लों की गायों से एक समय में अधिकतम पांच लीटर दूध ही मिलता है। राज्यों की गायों में दुग्ध उत्पादन की क्षमता बढ़ाने के लिए गिर और जर्सी नस्ल की सांड के आठ हजार सीमन डोज ब्राजील से मंगवाए हैं।

सरकार द्वारा ब्राजील नस्ल के सांड का सीमन सैंपल लेकर उसे देसी गाय में प्रत्यारोपित कराया गया है, जिसके बहुत अच्छे परिणाम आ रहे हैं। अब यह गाय प्रतिदिन एक समय में अधिकतम 40 लीटर दूध देगी। इस कार्यक्रम का लक्ष्य 2022 तक किसान की आमदनी को दुगुना करना है।

पशुपालन विभाग के डॉक्टरों की माने तो सीमन से अधिक पशुओं का गर्भाधान कराया जा सकता है। इसकी लागत भी अधिक नहीं आती है। यही कारण है कि सरकार ने सीमन लाने का फैसला किया है।

इस सीमन का उपयोग पशु चिकित्सालयों और कृत्रिम गर्भाधान क्लीनिकों द्वारा अधिक दूध देने वाली अच्छी गायों के गर्भाशय में स्थापित कर भ्रूण तैयार किए जाएंगे ताकि गायों में नस्ल सुधार किया जा सके। इसके बाद इन भ्रूणों को सामान्य गाय के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाएंगा। इससे गाय में नस्ल सुधार के साथ-साथ दूध उत्पादन भी बढ़ेगा।

 

 

ऐसे बनाएं घर पर साइलेज,पुरे साल के लिए हरे चारे की टेंशन ख़तम

अपने दुधारु पशुओं को पूरे साल हरा चारा उपलब्ध करा पाना पशुपालकों के लिए एक बड़ी चुनोती बनता जा रहा है। ऐसे में पशुपालक घर पर ही साइलेज बनाकर अपने पशुओं को पूरे साल हरा चारा उपलब्ध करा सकते है। इसके लिए सरकारी मदद भी मिलती है।साइलेज से पशुओं के दुग्ध उत्पादन भी अच्छा होता है।इसमें ज्यादा लागत भी नहीं आती है।

शुरुआत में पशु साइलेज ज्यादा नहीं खा पाता है लेकिन बार-बार देने से वह उसे चाव से खाने लगता है। जब चारे की कमी हो तो साइलेज खिलाकर पशुओं का दूध उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। पशु को साइलेज खिलाने के बाद बचे हुए हिस्से को भी हटा देना चाहिए। अगर भूसा दे रहे हो तो उस हिस्से को उस में मिलाकर दें।

अच्छे दुग्ध उत्पादन के लिए दुधारु पशुओं के लिए पौष्टिक दाने और चारे के साथ हरा चारा खिलाना बहुत जरुरी है। हरे चारा पशुओं के अंदर पोषक तत्वों की कमी को पूरा करता है। एक दुधारू पशु जिस का औसत वजन 550 किलोग्राम हो, उसे 25 किलोग्राम की मात्रा में साइलेज खिलाया जा सकता है। भेड़-बकरियों को खिलाई जाने वाली मात्रा 5 किलोग्राम तक रखी जाती है।

साइलेज बनाने के लिए सरकार द्वारा यूरिया ट्रीटमेंट किट और साइलेज बनाने के लिए किट दी जाती है। अगर कोई पशुपालक साइलेज बनाना चाहता है तो उसका प्रशिक्षण भी ले सकता है। साइजेल बनाने लिए कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK Center) में भी प्रशिक्षण भी दिया जाता है।

पशुपालक इस तरह बना सकते है साइलेज

साइलेज बनाने के लिए जिस भी हरे चारे का इस्तेमाल आप कर रहे हो उसको 2 से 5 सेन्टीमीटर के टुकड़ों में काट कर कुटटी बना लेना चाहिए। ताकि ज्यादा से ज्यादा चारा साइलो पिट में दबा कर भरा जा सके। अब उस कुट्टी किए हुए चारे को दबा-दबा भर दें।

ताकि बरसात का पानी अंदर न जा सके। फिर इसके ऊपर पोलीथीन की शीट बिछाकर ऊपर से 18-20 सेमी मोटी मिट्टी की पर्त बिछा देनी चाहिए। इस परत को गोबर व चिकनी मिट्टी से लीप दिया जाता है और दरारें पड़ जाने पर उन्हें मिट्टी से बन्द करते रहना चाहिए ताकि हवा व पानी गड्ढे में न पहुंच सके।

लगभग 50 से 60 दिनों में यह साइलेज बनकर तैयार हो जाता है। गड्ढे को एक तरफ से खोलकर मिट्टी और पोलोथीन शीट हटाकर आवश्यकतानुसार पशु को खिलाया जा सकता है। साइलेज को निकालकर गड्ढे को फिर से पोलीथीन शीट और मिटटी से ढ़क देना चाहिए और धीरे-धीरे पशुओं केा इसका स्वाद लग जाने पर इसकी मात्रा 20-30 किलो ग्राम पति पशु तक बढ़ायी जा सकती है ।

किन-किन फसलों से बना सकते है साइलेज

साइलेज बनाने के लिए सभी घासों से या जिन फसलों में घुलनशील कार्बोहार्इडे्रटस अधिक मात्रा में होती हैं जैसे ज्वार मक्की, गिन्नी घास नेपियर सिटीरिया आदि से तैयार किया जा सकता है। साइलेज बनाते समय चारे में नमी की मात्रा 55 प्रतिशत तक होनी चाहिए।

साइलेज जिन गड्ढ़ों में भरा जाता है। उन गड्ढ़ों को साइलोपिटस कहते है। गड्ढा (साइलो) ऊंचा होना चाहिए और इसे काफी सख्त बना लेना चाहिए। साइलो के फर्श और दीवारें पक्की बनानी चाहिए और अगर पशुपालक पक्की नहीं कर सकता तो लिपाई भी कर सकता है।

इन बातों को रखें ध्यान

  • साइलेज बनाने के लिए जो यूरिया है उसको साफ पानी में और सही मात्रा के साथ बनाना चाहिए।
  • घोल में यूरिया पूरी तरह से घुल जाना चाहिए।
  • पूरी तरह जब तैयार हो जाए तभी पशुओं को साइलेज खिलाएं।
  • यूरिया के घोल का चारे के ऊपर समान रूप से छिड़काव करना चाहिए।