अब भारत की देसी गाय भी देंगी एक दिन में 80 लीटर दूध

पशुपालन के क्षेत्र में सरकार को एक बड़ी कामयाबी मिली है। अब तक भारतीय पशुपालक का देसी नस्ल की गायों की ओर रूझान इसलिए कम था कि उनकी दूध उत्पादन क्षमता कम थी।

सरकार ने पशुपालकों की समस्या को समझा और भारतीय नस्ल की उत्पादन क्षमता को बढ़ाने के लिए अनेक कदम उठाएं हैं। इसी के अंतर्गत, देसी गायों की नस्ल सुधार के लिए अब सॉटेंड सेक्सड सीमन तकनीक का उपयोग मध्यप्रदेश में किया जाएगा।

इससे जहां दुधारू गाय की नस्ल में सुधार होगा तो वहीं उसका दूध उत्पादन भी बढ़ेगा।जिस से आप की देसी गाय भी 80 लीटर तक दूध दे सकेगी । देसी नस्ल की गायों में इस तकनीक के प्रयोग से केंद्र सरकार मादा अथवा नर बछड़े पैदा करने को लेकर अनुसंधान (रिसर्च) करवा रही है।

इसी क्रम में, मध्यप्रदेश में ज्यादा दूध देने वाली गायों की संख्या बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश राज्य पशुधन एवं कुक्कुट विकास निगम ने ब्राजील से गिर और जर्सी नस्ल के सांडों के आठ हजार सीमन डोज मंगवाए हैं।

पशुपालन विभाग की माने तो ब्राजील में गिर और जर्सी नस्ल की गाय 35-40 लीटर दूध एक समय में देती है। जबकि भारत में इन नस्लों की गायों से एक समय में अधिकतम पांच लीटर दूध ही मिलता है। राज्यों की गायों में दुग्ध उत्पादन की क्षमता बढ़ाने के लिए गिर और जर्सी नस्ल की सांड के आठ हजार सीमन डोज ब्राजील से मंगवाए हैं।

सरकार द्वारा ब्राजील नस्ल के सांड का सीमन सैंपल लेकर उसे देसी गाय में प्रत्यारोपित कराया गया है, जिसके बहुत अच्छे परिणाम आ रहे हैं। अब यह गाय प्रतिदिन एक समय में अधिकतम 40 लीटर दूध देगी। इस कार्यक्रम का लक्ष्य 2022 तक किसान की आमदनी को दुगुना करना है।

पशुपालन विभाग के डॉक्टरों की माने तो सीमन से अधिक पशुओं का गर्भाधान कराया जा सकता है। इसकी लागत भी अधिक नहीं आती है। यही कारण है कि सरकार ने सीमन लाने का फैसला किया है।

इस सीमन का उपयोग पशु चिकित्सालयों और कृत्रिम गर्भाधान क्लीनिकों द्वारा अधिक दूध देने वाली अच्छी गायों के गर्भाशय में स्थापित कर भ्रूण तैयार किए जाएंगे ताकि गायों में नस्ल सुधार किया जा सके। इसके बाद इन भ्रूणों को सामान्य गाय के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाएंगा। इससे गाय में नस्ल सुधार के साथ-साथ दूध उत्पादन भी बढ़ेगा।

 

 

ऐसे बनाएं घर पर साइलेज,पुरे साल के लिए हरे चारे की टेंशन ख़तम

अपने दुधारु पशुओं को पूरे साल हरा चारा उपलब्ध करा पाना पशुपालकों के लिए एक बड़ी चुनोती बनता जा रहा है। ऐसे में पशुपालक घर पर ही साइलेज बनाकर अपने पशुओं को पूरे साल हरा चारा उपलब्ध करा सकते है। इसके लिए सरकारी मदद भी मिलती है।साइलेज से पशुओं के दुग्ध उत्पादन भी अच्छा होता है।इसमें ज्यादा लागत भी नहीं आती है।

शुरुआत में पशु साइलेज ज्यादा नहीं खा पाता है लेकिन बार-बार देने से वह उसे चाव से खाने लगता है। जब चारे की कमी हो तो साइलेज खिलाकर पशुओं का दूध उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। पशु को साइलेज खिलाने के बाद बचे हुए हिस्से को भी हटा देना चाहिए। अगर भूसा दे रहे हो तो उस हिस्से को उस में मिलाकर दें।

अच्छे दुग्ध उत्पादन के लिए दुधारु पशुओं के लिए पौष्टिक दाने और चारे के साथ हरा चारा खिलाना बहुत जरुरी है। हरे चारा पशुओं के अंदर पोषक तत्वों की कमी को पूरा करता है। एक दुधारू पशु जिस का औसत वजन 550 किलोग्राम हो, उसे 25 किलोग्राम की मात्रा में साइलेज खिलाया जा सकता है। भेड़-बकरियों को खिलाई जाने वाली मात्रा 5 किलोग्राम तक रखी जाती है।

साइलेज बनाने के लिए सरकार द्वारा यूरिया ट्रीटमेंट किट और साइलेज बनाने के लिए किट दी जाती है। अगर कोई पशुपालक साइलेज बनाना चाहता है तो उसका प्रशिक्षण भी ले सकता है। साइजेल बनाने लिए कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK Center) में भी प्रशिक्षण भी दिया जाता है।

पशुपालक इस तरह बना सकते है साइलेज

साइलेज बनाने के लिए जिस भी हरे चारे का इस्तेमाल आप कर रहे हो उसको 2 से 5 सेन्टीमीटर के टुकड़ों में काट कर कुटटी बना लेना चाहिए। ताकि ज्यादा से ज्यादा चारा साइलो पिट में दबा कर भरा जा सके। अब उस कुट्टी किए हुए चारे को दबा-दबा भर दें।

ताकि बरसात का पानी अंदर न जा सके। फिर इसके ऊपर पोलीथीन की शीट बिछाकर ऊपर से 18-20 सेमी मोटी मिट्टी की पर्त बिछा देनी चाहिए। इस परत को गोबर व चिकनी मिट्टी से लीप दिया जाता है और दरारें पड़ जाने पर उन्हें मिट्टी से बन्द करते रहना चाहिए ताकि हवा व पानी गड्ढे में न पहुंच सके।

लगभग 50 से 60 दिनों में यह साइलेज बनकर तैयार हो जाता है। गड्ढे को एक तरफ से खोलकर मिट्टी और पोलोथीन शीट हटाकर आवश्यकतानुसार पशु को खिलाया जा सकता है। साइलेज को निकालकर गड्ढे को फिर से पोलीथीन शीट और मिटटी से ढ़क देना चाहिए और धीरे-धीरे पशुओं केा इसका स्वाद लग जाने पर इसकी मात्रा 20-30 किलो ग्राम पति पशु तक बढ़ायी जा सकती है ।

किन-किन फसलों से बना सकते है साइलेज

साइलेज बनाने के लिए सभी घासों से या जिन फसलों में घुलनशील कार्बोहार्इडे्रटस अधिक मात्रा में होती हैं जैसे ज्वार मक्की, गिन्नी घास नेपियर सिटीरिया आदि से तैयार किया जा सकता है। साइलेज बनाते समय चारे में नमी की मात्रा 55 प्रतिशत तक होनी चाहिए।

साइलेज जिन गड्ढ़ों में भरा जाता है। उन गड्ढ़ों को साइलोपिटस कहते है। गड्ढा (साइलो) ऊंचा होना चाहिए और इसे काफी सख्त बना लेना चाहिए। साइलो के फर्श और दीवारें पक्की बनानी चाहिए और अगर पशुपालक पक्की नहीं कर सकता तो लिपाई भी कर सकता है।

इन बातों को रखें ध्यान

  • साइलेज बनाने के लिए जो यूरिया है उसको साफ पानी में और सही मात्रा के साथ बनाना चाहिए।
  • घोल में यूरिया पूरी तरह से घुल जाना चाहिए।
  • पूरी तरह जब तैयार हो जाए तभी पशुओं को साइलेज खिलाएं।
  • यूरिया के घोल का चारे के ऊपर समान रूप से छिड़काव करना चाहिए।

सबसे महंगी कॉफी ऐसे होती है तैयार, जानकर पीना छोड़ देंगे!

अगर आप कॉफी पीने के शौकिन है तो हमारी यह ख़बर आपको निराश कर सकती है। जी हां, दुनिया की सबसे मंहगी कॉफी ‘कोपी लुवाक’ जो पीने में तो बेहद टेस्टी लगती हैं लेकिन इसको बनाने की प्रक्रिया काफी हैरान कर देने वाली है।

कॉफी ‘कोपी लुवाक’ जिसका जायका लेने के लिए लोग दुनिया भर से इंडोनेशिया आते हैं। लोगों की मानें तो इस कॉफी को जो एक बार टेस्ट कर ले फिर उसे कोई और कॉफी रास नहीं आती।
इस कॉफी की कीमत €550 / US$700 प्रति किलोग्राम होती है। यानि के 42000 रूपए प्रति किल्लो ।जो आम कॉफी की तुलना में बहुत ही ज्यादा है ।

आईए अब हम आपको बताते हैं कैसे बनाई जाती है दुनिया की सबसे महंगी कॉफी…

यह कॉफी किसी किसान के द्वारा खेतों में नहीं उगाई जाती बल्कि इस कॉफी का निर्माण जंगली रेड कॉफी बीन्स से होता है जो कि एशियन पाम सिवेट नाम के जानवर की पॉटी से निकलती है।यह जानवर पेड़ पर ही अपना आसियाना टिकाए रहता है। बेर खाने वाला यह जानवर बेर तो ज़रुर खाता है लेकिन यह पचा नहीं पाता।

आप सोच रहे होंगे एशियन पाम सिवेट के पेट में बेर ना पचने से कॉफी के तैयार होने से क्या लेना-देना… अब जो हम बताएंगे आप चौंक जाएंगे… दरअसल एशियन पाम सिवेट पेड़ो पर रहने वाला जानवर होता है जो कि बेरी खाता है लेकिन वो बेरी के बीजों को पचा नहीं पाता है और मल के जरिये उसे पेट से बाहर निकाल देता है जो कि बींस के रूप में वातावरण में आता है और इसी बींस को सुखाकर ‘कोपी लुवाक’ कॉफी बनायी जाती है, जो कि यह बहुत ज्यादा दुर्लभ होती है ।

पहले यह जानवर सिर्फ जंगल में मिलते थे और यह कॉफी बहुत ही दुर्लभ थी । लेकिन अब इसकी फार्मिंग होने लगी है लोग एशियन पाम सिवेट को अपने फार्म में उसका मल लेने के लिए पालते है।क्यों हैरान हो गए ना इस ख़बर को पढ़कर कि जिस कॉफी को सभी राजसी घरानों की पार्टी में शामिल किया जाता है वह ऐसे तैयार होता है।

सिर्फ 20 हजार में शुरू करें रानी मधुमक्खियों का कारोबार

सुनने में यह बात थोड़ी अजीब लगे कि एक शख्‍स ने 500-500 रुपए में एक-एक ‘रानी’ बेचकर करोड़ों रुपए का कारोबार खड़ा कर दिया। न तो अब राजा-रानी का दौर है, न ही कभी रानियां बिकती थींं, तो यह शख्‍स किस रानी का बिजनेस कर रहा है।

हकीकत यह है कि जिस एक रानी की बिक्री 500 रुपए में हो रही है वह मधुमक्खियों की रानी ‘क्‍वीन बी’ है और इनका बिजनेस करने वाला व्‍यक्ति है पंजाब के कपूरथला निवासी श्रवण सिंह चांडी। देश में शहद का सालाना कारोबार करीब 80 हजार टन का है।

ऐसे में आपके पास भी यह मौका है कि कम पैसे और थोड़ी जानकारी लेकर आप ‘रानी’ मधुमक्‍खी का व्‍यापार आप भी कर सकते हैं। आइए जानते हैं क्‍वीन-बी से जुड़े बिजनेस और इससे जुड़ी कुछ रोचक बातें…

45 दिन में तैयार होती है रानी

  • क्‍वीन-बी तैयार करने के लिए एक विशेष किट की जरूरत होती है, जो ब्रिटेन व यूएसए से इंपोर्ट की जाती है।
  • रानी मक्‍खी तैयार करने के लिए 45 दिन की प्रक्रिया होती है। सारी प्रक्रिया 69 डिग्री सेल्सियश तापमान पर होती है।
  • इस किट की ट्यूब्स में मधुमक्‍खी के छत्‍ते से रानी मक्‍खी का लारवा रखा जाता है।
  • एक दिन बाद इस ट्यूब में बारी-बारी से दस नर मधुमक्‍खी (ड्रोन) से ब्रीडिंग करानी होती है।
  • इस प्रक्रिया के दौरान खास तकनीक, ट्रेनिंग और टूल्‍स की भी आवश्‍यकता होती है, जिससे ब्रीडिंग में नुकसान न हो।
  • 45वें दिन रानी मक्‍खी तैयार हो जाती है। इसके बाद इसे शहद उत्‍पादन करने वालों को बेच दिया जाता है।

500 रुपए में बिकती है एक रानी

  • क्‍वीन-बी ब्रीडर श्रवण सिंह चांडी के अनुसार रानी मधुमक्खी कायापार शहद प्रोडक्शन से कहीं अधिक लाभदायक है।
  • कृत्रिम रूप से तैयार की गई रानी की अलग पहचान होती है इसके सिर पर एक टैग लगा होता है।
  • एक बॉक्स से शहद उत्पादन से एक साल में 2 से 3 हजार रुपए एक साल में कमाए जा सकते हैं लेकिन क्वीन से लाखों।
  • एक ब्रीड बॉक्स में 45 दिनों में 300 रानी मधुमक्खियां बनाई जा सकती हैं। एक मधुमक्खी की कीमत 500 रुपए से भी ज्यादा होती है।
  • केवल 45 दिनों बाद ही एक ब्रीड बॉक्स से 1.5 लाख रुपए तक कमाए जा सकते हैं। जबकि, शहद उत्पादन में ज्यादा वक्त लगता है।
  • शहद की अधिक कीमत के चलते एक मक्खी की कीमत 800 रुपए तक हो जाती है।

एक्‍स्‍पोर्ट भी करते हैं रानी को

  • श्रवण सिंह चांडी देश के सबसे बड़े क्‍वीन-बी ब्रीडर्स हैं। इनका शहर उत्पादन का भी बहुत बड़ा काम है।
  • इन्हें क्वीन ब्रीड उत्पादन के लिए पंजाब और भारत सरकार की ओर से कई अवार्ड भी मिल चुके हैं।
  • चांडी हर साल 5 करोड़ रुपए से अधिक कमाते हैं। घरेलू सप्लाई के अलावा ये रानी मक्ख्यिां एक्सपोर्ट भी करते हैं।
  • वर्तमान में ये प्रोग्रेसिव बी कीपर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष हैं और कई जगह ट्रेनिंग सेंटर भी चलाते हैं।

80 हजार मक्खियों पर चलता है राज

  • शहद उत्पादन करने वाले एक बॉक्स या छत्ते में 80 हजार तक मधुमक्खियां होती हैं, इनमें सिर्फ एक रानी मक्खी होती है।
  • छत्ते में एक रानी के अलावा ड्रोन, नर्स और वर्कर होते हैं। जिनका अलग-अलग काम बंंटा हुआ होता है।
  • एक रानी मक्खी की उम्र 5 साल होती है, जबकि वर्कर 45 दिन और ड्रोन मक्खियां 3 महीने तक जीती हैं।
  • रानी मक्खी का काम नर मधुमक्खी के साथ संपर्क में आकर सिर्फ बच्चे पैदा करना होता है।
  • रानी मक्खी के शरीर से एक खास खुशबूदार पदार्थ का रिसाव होता है जिससे उस छत्ते के सभी वर्कर शाम को छत्ते पर वापस आ जाते हैं।
  • छत्ते में एक नर्स मधुमक्खी भी होती है जिसका काम मरी हुई मक्खियों को निकालना और बच्चों को भोजन देना होता है।

20 हजार में शुरू कर सकते हैं काम

  • आप भी रानी मधमक्खियों का कारोबार कर सकते हैं इसके लिए शुरुआत में सिर्फ 20 हजार रुपए की जरूरत होगी।
  • 30 मधुमक्खियों को बनाने के लिए किट सिर्फ 45 डॉलर में इंपोर्ट की जा सकती है।
    इन दिनों किट कई ऑनलार्इन साइट्स पर भी उपलब्ध है, लेकिन इससे पहले आप किसी विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें ले।
  • इसके अलावा पंजाब एग्रीकल्चर युनिवर्सिटी समेत देश के कई युनिवर्सिटी इसकी ट्रेनिंग भी देते हैं।
    3400 करोड़ रुपए का है कारोबाद…
  • भारत में शहद का कारोबार करीब 3400 करोड़ रुपए का है। इसमें रॉ और प्रोसेस हनी शामिल है।
  • देश में करीब 2.5 लाख किसान बी किपिंग यानि मधुमक्खी पालन करते हैं।
  • सबसे ज्यादा मधुमक्खी पालक 33000 पंजाब राज्य में हैं। इसके अलावा उत्तर प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र गुजरात आदि राज्य आते हैं।
  • भारत का औसत रॉ शहद उत्पादन 15.32 किलोग्राम प्रतिवर्ष प्रति कॉलोनी या बॉक्स है। जबकि, पंजाब का 35 किलोग्राम है।
  • पुरी दुनिया में औसत उत्पादकता में पंजाब सबसे उपर है, दुनिया का औसत उत्पादन 28 किलोग्राम है।

 

सिर्फ 10 मुर्राह भैंस से बिज़नेस शुरू कर सिविल इंजीनियर ऐसे बना करोड़पति

 

एक सिविल इंजीनियर सात साल में करोड़पति बन गया। मुर्राह भैंस के दूध की बदौलत। सिर्फ दस मुर्राह भैंसों से कारोबार शुरू करने वाले सिविल इंजीनियर बलजीत सिंह रेढु के पास आज एक हजार से ज्यादा भैंसें हैं।आज सालाना 150 करोड़ टर्नओवर की कंपनी के मालिक हैं।

हरियाणा के जींद जिले में जन्मे 51 वर्षीय बलजीत बताते हैं कि उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई तो की किन्तु लक्ष्य एक सफल कारोबारी के रूप में पहचान बनाना था। इसी विचार के साथ उन्होंने मुर्गी पालन के लिए हैचरी बिज़नेस शुरू किया, फिर 2006 मे ब्लैक गोल्ड के नाम से पंजाब और हरियाणा में मशहूर 10 मुर्राह भैसों के साथ डेरी कारोबार की शुरुआत की।

बलजीत अपनी सफलता का सारा श्रेय इन मुर्राह भैसों को देते हैं, उनका मानना है कि लोग विदेशी नस्लों को महत्व देकर अपने ही देश की नस्लों को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं। आज मुर्राह भैंस की कीमत लाखों में है, स्वयं बलजीत ने दो महीने पहले मुर्राह भैंस की कटड़ी 11 लाख रुपए में बेचा। बलजीत इनके संरक्षण के लिए लगातार प्रयासरत है और इसमें सफल भी हुए है।

जमीन से जुड़े बलजीत का उद्देश्य अपने कारोबार में मुनाफा कमाने के साथ-साथ हरियाणा के अधिक से अधिक युवकों को रोज़गार मुहैया कराना है। इसी सोच के साथ उन्होंने जींद में ही एक मिल्क प्लांट लगाया है जिससे 14 हज़ार दूध उत्पादक उनसे जुड़े हैं।

किसानों को आधुनिक टेस्टिंग उपकरण के साथ उत्तम किस्म का चारा भी उपलब्ध कराया जाता है तथा 40-50 लोगों की टीम हर समय उपलब्ध रहती है जो कि हर तरह की जानकारी व सुविधा दूध उत्पादकों तक पहुँचाते हैं।

पूरे हरियाणा मे उनके 120 मिल्क बूथ हैं और 300 से ज्यादा मिल्क कलेक्शन सेंटर। इनके उत्पाद दूध, दही,पनीर,आइसक्रीम, घी, बटर और स्वीट्स बाजार में लक्ष्य फूड ब्रांड के नाम से जाने जाते हैं।

वर्तमान में कंपनी की उत्पादन क्षमता 1.5 लाख लीटर दूध प्रतिदिन की है। अपनी गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए कंपनी ने टेट्रापैक टेक्नोलॉजी से अपने उत्पादों को लैस किया है।

 

अपने कठिन परिश्रम के बल पर आज बलजीत के पास उनकी क्लाइंट लिस्ट मे बड़े-बड़े नाम शामिल हैं उनमे प्रमुख़ है मदर डेरी, गार्डन डेयरीज, ताज ग्रुप, द एरोमा, गोपाल स्वीट्स, सिंधी स्वीट्स और चण्डीगढ़ ग्रुप ऑफ़ कॉलेजेस।

रेढू ग्रुप के अंतर्गत रेढू हैचरीज प्राइवेट लिमिटेड,रेढू फार्म प्राइवेट लिमिटेड और जे एम मिल्स प्राइवेट लिमिटेड भी आते हैं। अपने दूध उत्पादों के अलावा बलजीत ने मुर्राह भैसों एवं होल्सटीन गायों का ब्रीडिंग केंद्र भी खोला है, जहां पर पैदा हुए उन्नत किस्म के कटड़ों एवं बछड़ो को देश भर में बेचा जाता है।

बलजीत का सपना है जिसमे वह काफी हद तक कामयाब भी हुए है, कि वह मुर्राह भैंसो, डेरी फार्मिंग और हरियाणा को विश्व के मानचित्र पर इस प्रकार अंकित करे कि सम्पूर्ण विश्व में हरियाणा की संस्कृति दूध व दही के नाम से पहचानी जाए। कहते है न जब हौसले बुलंद हो तो सफलता को पंख लगते देर नहीं लगती। इसी कहावत को चरितार्थ कर दिखाया है बलजीत सिंह रेढू ने।

नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (एनडीडीबी) की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 2016-17 तक दूध की मांग 15.5 करोड़ टन पहुंचने की उम्मीद है। ऐसे में नए उद्यमियों के लिए इस क्षेत्र में अपार संभावनाएं है। आशा करते हैं कि बलजीत सिंह जैसे लोगों से सीख लेकर नई पीढ़ी के युवा इस क्षेत्र में सफलता का परचम लहरायेंगे।

यह चारा लगायें एक बार लगाने के बाद 5 साल हरा चारा पाएं

पशुपालकों को गर्मियों में हरे चारे की सबसे ज्यादा परेशानी होती है। बरसीम, मक्का, ज्वार जैसी फसलों से तीन-चार महीनों तक ही हरा चारा मिलता है। ऐसे में पशुपालकों को एक बार नेपियर घास लगाने पर चार-पांच साल तक हरा चारा मिल सकता है।

इसमें ज्यादा सिंचाई की जरूरत भी नहीं पड़ती है। गन्ने की तरह दिखने वाली नेपियर घास लगाने के महज 50 दिनों में विकसित होकर अगले चार से पांच साल तक लगातार दुधारू पशुओं के लिए पौष्टिक आहार की जरूरत को पूरा कर सकती है।

पशुपालन विभाग के उप निदेशक वीके सिंह नेपियर घास के बारे में बताते हैं, “प्रोटीन और विटामिन से भरपूर नेपियर घास पशुओं के लिए एक उत्तम आहार की जरूरत को पूरा करती है। दुधारू पशुओं को लगातार यह घास खिलाने से दूध उत्पादन में भी वृद्धि होती है और साथ ही रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है।

हाइब्रिड नेपियर की जड़ को तीन-तीन फीट की दूरी पर रोपित किया जाता है। इससे पहले खेत की जुताई और समतलीकरण करने के बाद घास की रोपायी की जाती है और रोपाई के बाद सिंचाई की जाती है।

घास रोपण के मात्र 50 दिनों बाद यह हरे चारे के रूप में विकसित हो जाती है। एक बार घास के विकसित होने के बाद चार से पांच साल तक इसकी कटाई की जा सकती है और पशुओं के आहार के रूप में प्रयोग की जा सकती है।

नेपियर घास का उत्पादन प्रति एकड़ लगभग 300 से 400 कुंतल होता है। इस घास की खासियत यह होती है कि इसे कहीं भी लगाया जा सकता है। एक बार घास की कटाई करने के बाद उसकी शाखाएं पुनः फैलने लगती हैं और 40 दिन में वह दोबारा पशुओं के खिलाने लायक हो जाती है।

प्रत्येक कटाई के बाद घास की जड़ों के आसपास हल्का यूरिया का छिड़काव करने से इसमें तेजी से बढ़ोतरी भी होती है। वैसे इसके बेहतर उत्पादन के लिए गोबर की खाद का छिड़काव भी किया जाना चाहिए।

अब फसल अवशेषों से बनेगा पशुओं के लिए पौष्टिक चारा 

फसलों की कटाई के बाद ज्यादातर किसान फसल अवशेषों को खेत में ही जला देते हैं, जिससे मिट्टी की सेहत पर असर पड़ता है।नरवाई में आग लगाने से मिट्टी की 6 इंच ऊपर की परत जो उपजाऊ व कृषि योग्य होती है वह कठोर हो जाती है।

साथ ही मिट्टी में पड़े कार्बनिक पदार्थ, सूक्ष्म पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। मिट्टी में पाए जाने वाले सूक्ष्म जीवाणु जो उपज बढ़ाने में सहायक होते हैं वह नष्ट हो जाते हैं। भूमि का तापक्रम बढ़ने से आसपास के वातावरण पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। जैव विविधता भी बुरी तरह प्रभावित होती है। इस लिए किसानों को नरवाई को जलाकर नष्ट करने का प्रयास नहीं करना चाहिए।

अब विज्ञानकों ने एक ऐसी तकनीक का इज़ाद क्या जिस से फसल अवशेषों को जलने की जगह पर इस से पशुओं के लिए पौष्टिक चारा बन सकेगा । नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट ने नया तरीका निकाला है, जिसमें फसल अवशेष को अमोनिया से ट्रीट करके दुधारू पशुओं के लिए पौष्टिक आहार बनाया जा रहा है।

नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट करनाल के वैज्ञानिकों का कहना है यदि रिसर्च में सफलता मिली तो दूसरे चरण में इसकी गोलियां बनाई जाएगी। यह न केवल पौष्टिक होगी व इनके स्वाद के कारण पशुओं को खिला सकते हैं। इसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर भूसा अथवा अवशेषों के मुकाबले आसानी से ले जाना अासान होगा। इसे मवेशियों को खली की तरह खिलाया जा सकेगा।

दल के प्रमुख और पशु पोषण विभाग अध्यक्ष डॉ. त्यागी ने बताया, “अभी 100 गाय-भैंस को अमोनिया ट्रीटमेंट का पौष्टिक चारा दिया जा रहा है। इसके बाद उनके स्वास्थ्य पर नजर रखी जा रही है। दूध निकालकर रोजाना रीडिंग नोट की जा रही है। अभी तक दूध उत्पादन 10-15 फीसदी बढ़ा है। दूध की गुणवत्ता में भी सुधार हुआ है।”

पशुओं में थनों की सोजिश ठीक करने के घरेलू नुस्खे

भारत में थानों की सोजिश बहुत ही आम बीमारी है इसका मुख्या कारण पशु के शेड का गन्दा होना है क्योंकि जब भी पशु गन्दी जगह पर बैठता है तो गंदगी थानों के सुराख़ में चली जाती है ।जिस से उस में कीटाणु पनपने लग जाते है जो इन्फेक्शन का कारण बनते है इस लिए हमेशा पशु का शेड साफ सुथरा होना चाहिए ।डॉक्टरी इलाज से पहले हमें कुछ घरेलू इलाज प्रयोग करने चाहिए। आइये जानते हैं ऐसे कुछ घरेलू नुस्खों के बारे में।

1. सरसों के तेल से हवाने की मालिश करना: थनों की बीमारी होने की सूरत में पशु पालकों के द्वारा थोड़ा-सा सरसों का तेल गर्म पानी में डाल लिया जाता है और इस घोल से हवाने की मालिश की जाती है। सरसों के तेल में, सोजिश को कम करने के गुण पाये जाते हैं और यह खून के दौरों को बढ़ा कर जख्म के जल्दी ठीक होने में मदद करता है। इसके इलावा सरसों का तेल रोगाणु नाशक भी होता है।

2. हल्दी और सरसों के तेल के पेस्ट से हवाने की मालिश करना: पीसी हुई हल्दी को सरसों के तेल में मिलाकर पेस्ट बना लिया जाता है, सोजिश होने की सूरत में हवाने पर इसकी मालिश की जाती है। हल्दी और सरसों के तेल में रोगाणु नाशक हाने के साथ-साथ सोजिश कम करने की भी शक्ति होती है, इनका पेस्ट हवाने की सोजिश को हटाता है, जख्मों को ठीक करता है और रोगाणुओं को नष्ट करता है।

3. काली मिर्च ग्लो और गुड़ खिलाना : काली मिर्च को पीस कर उस में ग्लो मिलाकर, गुड़ में डालकर जानवर को खिला दिया जाता है। ग्लो और काली मिर्च में सोजिश हटाने के गुण होते हैं इसलिए इनका मिश्रण लेवे की सोजिश में सहायक होता है।

4. लहसुन खिलाना :पशुओं को समय समय पर लहसुन खिलाया जा सकता है। लहसुन में जीवाणु नाशक, कीटाणु नाशक, रोगाणु नाशक गुण होते हैं जो लेवे की सोजिश होने से रोकता है।

5. एक अन्य उपाय अनुसार 100 ग्राम मीठा सोडा, 100 ग्राम नींबू का अर्क, 100 ग्राम जौं खार, 50 ग्राम काली मिर्च, 250 ग्राम देसी घी, 1 किलो गुड़ चीनी और 100 ग्राम कलमी शोरा लेकर सभी को मिलाकर दिन में दो बार पशु को दिया जाता है।

पशु के हवाने व थनों की सफाई रखनी चाहिए और साफ सुथरे व सूखे तथा नर्म स्थान पर बांधना चाहिए। दूध निकालने वाले व्यक्ति के हाथ भी साफ होने चाहिए।अंगूठे के दबाव से दूध नहीं निकालना चाहिए। थनों में दूध ज़्यादा समय तक नहीं रहने देना चाहिए।

पशुओं को हीट में लाने के लिए करें इन घरेलु नुख्सों का प्रयोग

कई बार किसान भाईओं को अपने पशओं को हीट मैं लाने मैं काफी दिक्कत आती है | कई बार पशुओं के डॉक्टर को दिखाने पर भी कोई फ़ायदा नहीं होता उल्टा जो पैसे का नुक्सान होता है वो अलग आज हम आपको कुश घरेलू नुक्से बतायंगे जिनको इस्तेमाल कर आप अपने पशुओं को हीट में ला सकते है |

पशुओं को गुड़ देना:- थोड़ी मात्रा में दिया गया गुड़ पशुओं के पेट में सूक्ष्मजीवों के बढ़ने और पाचन शक्ति बढ़ाने में सहायक होता है| इससे पशु की भूख बढ़ जाती है| गुड़ ऊर्जा देने के साथ साथ भूख भी बढ़ाता है इसलिए जरूरी तत्वों की पूर्ति में सहायक होता है जिससे पशु हीट में आ जाता है| पर कोशिश करें की ज्यादा मात्रा में एवं लगातार गुड़ न दें क्योंकि ज्यादा मात्रा में दिया गया गुड़ पशु के लिए परेशानी का कारन बन सकता है|

पशुओं को बिनौले खिलाना:- पशुओं को हीट में लाने के लिए बिनौले दिए जाते हैं क्योंकि इनकी तासीर गरम होने की वजह से पशु जल्दी बोल पड़ता है और नए दूध हो जाता है| पर बिनौले हमेशा उबाल कर ही देने चाहियें क्योंकि कच्चे बिनौलों में गोसीपोल नाम का जहर होता है जिससे पशु को नुकसान भी हो सकता है|

गुड़ और तारामीरा तेल का मिश्रण देना:-अपने पशुओं को गुड़ एवं तारामीरा तेल का मिश्रण लगभग आधा किल्लो से एक किलो 5 – 7 दिनों तक देना चाहिए| कई बार इस मिश्रण में थोड़ा नमक भी मिला लिया जाता है यां कुछ लोग सौंफ, अजवाइन, सौंठ और गुड़ का काहड़ा बना कर भी पशुओं को देते हैं|

गुड़+सरसों के तेल और तिल का मिश्रण देना- इस नुस्खे अनुसार एक पाव गुड़ एवं समान मात्रा में तिल ले कर उसमे लगभग 100 मिलीलीटर तेल डाल कर मिला लिया जाता है फिर इस मिश्रण को पीस कर 4 से 5 दिनों तक पशुओं को खिलाया जाता है|गुड़, सरसों के तेल एवं तिल में बाईपास प्रोटीन होता है इसलिए जब ये सरे तत्व मिल जाएँ तो पशु के गर्भ धारण करने की सम्भावना बढ़ जाती है|

जाने इस डेयरी में क्या है खास जो अमिताभ बच्चन से लेकर अंबानी तक पीते हैं इसका दूध

पुणे के मंचर में चल रही इस डेयरी का दूध अंबानी परिवार, अमिताभ बच्चन, सचिन तेंडुलकर जैसी सेलिब्रिटी तक पीते हैं। यह कोई छोटी-मोटी डेरी नहीं है। 27 एकड़ में फैले एक फार्म में इसका पूरा सेटअप लगा है।

इसमें 3500 गाय हैं। 75 कर्मचारी यहां काम करते हैं। इस डेरी के 12 हजार से ज्‍यादा कस्टमर्स हैं और यहां के दूध की कीमत भी कम नहीं है। यहां का दूध 80 रुपए लीटर बिकता है।

इस फार्म के ऑनर देवेंद्र शाह को देश सबसे बड़ा ग्वाला कहा जाता हैं। वे पहले कपड़े का धंधा करते थे, बाद में दूध के बिजनेस में आ गए। प्राइड ऑफ काउ प्रोडक्ट 175 कस्टमर्स के साथ शुरू किया था।

इनके मुंबई और पूना में 12 हजार से ज्यादा कस्टमर है। इनमें कई सेलेब्स भी शामिल हैं। कई बॉलीवुड से लेकर हाई प्रोफाइल बिजनेसमैन भी शामिल है।

यहां गायों को मिलता है आरो का पानी

गायों को पीने के लिए आरो का पानी दिया जाता है। मौसम को ध्यान में रखकर डॉक्टर चेकअप के बाद गायों को खाना दिया जाता है। दूध निकालने के समय रोटरी में जब तक गाय रहती है तब तक जर्मन तकनीक से उसकी मसाज की जाती है।

2-3 बार सफाई का काम

गायों के लिए बिछाया गया रबर मैट दिन में 3 बार धोया जाता है। यहां 54 लीटर तक दूध देने वाली गाय है। पुराने कस्टमर की रेफरेंस के बिना नहीं बनता नया कस्टमर। हर साल 7-8 हजार पर्यटक डेयरी फार्म घूमने आते है।

दूध निकालने में लगता हाथ

गाय का दूध निकालने से लेकर पैकिंग तक का पूरा काम ऑटोमैटिक होता है। फार्म में दाखिल होने से पहले पैरों पर पाउडर से डिसइंफेक्शन करना जरूरी है। दूध निकालने से पहले हर गाय का वजन और तापमान चेक किया जाता है।

बीमार गाय को डॉक्टर के पास भेजा जाता है। दूध सीधा पाइपों के जरिए साइलोज में और फिर पॉश्चुराइज्ड होकर बोतल में बंद हो जाता है। एक बार में 50 गाय का दूध निकाला जाता है जिसमें सात मिनट लगते हैं।