गाय जो रोजाना देती है 65 लीटर दूध,खुराक जानकर रह जाओगे हैरान

एक दिन में 65 लीटर दूध देने वाली गाय देखी है क्या आपने। अगर नहीं तो आज देख लीजिए। इसकी खुराक आपको हैरान कर देगी । हरियाणा दूध के लिए अपनी अलग पहचान रखता है। शायद हरियाणा कुलदीप जैसे कई डेयरी फार्मर की वजह से आज भी अपनी पहचान को बरकरार रख पाया है।

कुलदीप की एक गाय हर रोज 65 लीटर दूध देती है। गाय का नाम एंडेवर है। गाय एंडेवर 5 साल की है वह । हर रोज 65 लीटर दूध देती है। दूध दिन में तीन बार 8 घंटे के अंतराल के बाद निकाला जाता है। वे सुबह 5 बजे फिर दोपहर 1 बजे और रात को 9 बजे दूध निकालते हैं।

कुलदीप 27 साल के युवा हैं और पुश्तैनी बिजनेस संभाल रहे हैं। करनाल के दादूपुर गांव के डेयरी फार्मर कुलदीप ने बताया कि उसकी । गाय की नस्ल होल्सटीन फ्रीजन है, जो विदेशी यानी हॉलैंड की नस्ल है। गाय के लिए उन्होंने यूएसए से सीमन मंगाया था।

इन गायों की खुराक सुनेंगे तो आप यकीन नहीं कर पाएंगे, एक गाय को हर रोज 35 किलो साइलेज, 20 किलो हरा चारा, 12 किलो फीड, 5 किलो चने खा जाती है। इसके अलावा मौसमी सब्जियां मिलती हैं वो अलग।

वे अपनी तीन गायों का दूध बेचकर अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। उन्होंने अभी तक किसी गाय की कीमत नहीं लगवाई है।कुलदीप के पास 3 गाय 26 बार अलग-अलग जगह दूध देने की प्रतियोगिताओं में चैंपियन रह चुकी हैं।

अब मिल्क टेस्ट से ही पता चल जाएगा कि पशु गर्भ से है या नहीं

अब दुधारू पशुओं की गर्भावस्था मिल्क टेस्ट से ही एक महीना पहले पता चल जाएगी। इसके लिए कारगिल कंपनी ने बठिंडा में अपनी लेबोरेट्री स्थापित की है। यह डेयरी किसानों के लिए नई तकनीक लेकर आया है जिसमें दुधारू पशुओं की प्रेग्नेंसी के समय गाय में हार्मोन्स की जाँच करके उनके गर्भवास्था का पता लगाया जा सकता है।

इसे प्रेग्नेंसी के लिए मार्कर के तोर पर इस्तेमाल किया जायेगा। इस दिशा में कारगिल ने बठिंडा में एक मिल्क टेस्टिंग प्रयोगशाला की स्थापना की है जिसकी क्षमता हर साल 1 लाख सैम्पल का परीक्षण करने की है।

कारगिल की ओर से लाया गया मिल्क प्रेग्नेंसी टेस्ट प्रजजन के 28 दिनों पहले ही गर्भ अवस्था की स्थिति बता देता है जो की पारम्परिक पद्धति की तुलना में 1 महीना पहले है। इसके उत्पादक प्रजनन के लिए तैयार पशुओं की पहचान कर सकता है जिससे समय पर प्रजनन को सुनिचित किया जा सकता है।

60 दिनों तक इंतज़ार करने की जरूरत नहीं

पारंपरिक तौर पर किसानो को 60 दिनों तक इंतज़ार करने की जरूरत होती है और पशु चिकित्सक हाथ से इस बात की जाँच करता है की गाय गर्भवती है या नहीं इसमें अधिक समय लगता है और इसमें खर्च भी ज्यादा आता है।

इस मौके पर विक्रम भंडारी का कहना है की ये पहली कम्पनी है और किसानो को देखते हुए इस टेक्नॉलाजी को लाया गया है। इससे पहले उन्होंने ग्लोबल टीम के साथ बात की फिर वह इस तकनीक को लेकर आये। अमृतसर में तकनीक शुरू करने के बाद इसे जीरा लुधियाना और बाकी पंजाब में भी इस तकनीक को लाया जायेगा।

एेसे कर सकते हैं परीक्षण

इसके लिए डेयरी किसानों को 300 रुपए की एक किट खरीदनी होगी। उसके बाद किट के जरिये मिल्क सेम्पल को उनकी लेबोरेट्री में भेज सकते है।

बटेर पालन कैसे करें और क्या है इसके फायदे जाने इस रिपोर्ट के जरिये

मूर्गी पालन के व्यवसाय से हमारे किसान भाई बखुबी परिचित होंगे। लेकिन आज हम आपकों बटेर पालन के बारे में जानकारी देने जा रहे है। जिस किसान के पास ज्यादा जमीन नही है वो कम लागत से होनेवाले इस व्यवसाय को कर सकते है। आपके आस पास खेत खलिहान में पाये जानेवाला बटेर मूर्गी पालन से बेहतर विकल्प बन सकता है।

प्राचिन काल से ही मांस खाने के शौकिन लोगों की बटेर पहली पसंद रहा है। बटेरों की घटती संख्या को देखते हुए सरकार ने इस पर कुछ साल तक प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन अब ये प्रतिंबध हटा दिया गया है। आज बटेर पालन गैर कानूनी नही है। सरकार इसे मूर्गी पालन के विकल्प के तौर पर देख रही है। कई मायनो में बटेर पालन मूर्गी पालन से लाभदायी है।

बटेर पालन की विशेषता

 

बटेर पालन का व्यवसाय मूर्गी पालन से मिलता झूलता है। लेकिन मूर्गी पालन से कम खर्च वाला और ज्यादा मुनाफा देनेवाला है। बटेर भोजन के रुप में प्राचिन काल से प्रचलित है। अपने स्वादिष्ट मांस और पौष्टिकता के मामले में बटेर मांसाहारी लोगों की पहली पसंद है। बटेर 5 हफ्ते में परिपक्व हो जाते है और बाजार में आसानी से बेचे जा सकता है। बटेर में रोग या बीमारी न के बराबर होती है। जिसकी वजह से बटेर पालनेवालों को इसका फायदा मिलता है। बटेर को कोई टीका या दवा देने की जरुरत नही है जिससे पालनेवालों के पैसे बचते है।

कैसे करें रखरखाव

  • बटेर को रखने के लिए अलग घर की जरुरत नही।
  • इसे घर की छत, आंगन या घर के पिछे के हिस्से में पाल सकते हैं।
  • मूर्गीयों के पालने की जगह में भी बटेर पाले जा सकते हैं। मूर्गीयों के लिए बनाएं गएं जालीदारपिंजड़े में या फिर मूर्गी फार्म में भी इसे रख सकते हैं।
  • बटेर पालने के लिए सबसे पहले जमीन के उपर लकडे का बुरादा या धान की भूसी को बिछा दें
  • उस बिछावन के उपर बटेर को रखें ताकि बटेर को बिमारी से बचाया जा सके
  • चारा के लिए बाजार में मिलनेवालें मूर्गी के दाने को ही इस्तमाल कर सकते है

बटेर मांस और अंडे उत्पादन के लिए अच्छा स्त्रोत है

  • बटेर जल्द अंडे देती है। चूजे 6-7 हफ्ते में ही अंडे देने लगते है
  • मादा प्रतिशत 250 से 300 अंडे देती है। अंडे 10 से 15 ग्राम के वजन के होते है। अंडे दिखने में चितकबरे रंग के होते है।
  • इन अंडों की गांव में ही खपत हो सकती है
  • बटेर के अंडो में मूर्गीयों के अंडे से ज्यादा पोषक तत्व पाये जाते है। बटेर के अंडे में से विटामीन ए और प्रोटिन भरपुर मिलता है। बटेर के अंडो का बाजार मूल्य भी ज्यादा मिलता है। बटेर के अंडे खाने में स्वादिष्ट होते है। घर के लिए भी अंडा इस्तमाल कर कम पैसे में पोषक तत्व पा सकते है
  • मांस के लिए बटेर का उत्पादन कर सकते है। 45 दिनों में ही बटेर वयस्क हो जाते है। इसका वजन 200 से 250 ग्राम होता है। बाजार मूल्य 60 रुपये
    लागत और आमदनी

बटेर का आकार छोटा होता है इसलिए उसे जगह कम चाहिए यानि आपकी जगह का खर्चा कम

  • जहां आप 1000 मूर्गे पालते है वहां 6000 बटेर पाल सकते है
  • बटेर का चूजा कम दामों में मिलता है
  • अगर आपकों बटेर के लिए चूजा नही मिल रहा तो पटना वेटरनरी कॉलेज से संपर्क कर सकते है
  • दवा पर खर्च नही
  • इसे घर में पाला जाता है तो घर के शिक्षित बेरोजगार युवा और महिलाएं भी पाल सकती है
  • यानि कुल मिलाकर बटेर कम लागत में ज्यादा आमदनी करा सकता है।

विशेष ध्यान – बटेर के चूजे बहुत छोटे और नाजूक होते है। पहले हफ्ते में उनका विशेष ध्यान रखना पडता है। कड़ी ठंड या बहुत ज्यादा गर्मी में चूजे मर जाते है। पहले हफ्ते में मृत्यु दर अमुमु 2 से 3 प्रतिशत होती है। अगर पहला हफ्ता सही देखभाल से निकल गया तो दूसरे हफ्ते में मृत्यु दर कम हो जाती है।

21 करोड़ का सुल्तान, रोज खाता है 15 किलो, सेब-10 किलो गाजर

भारत में गायों की तरह ही सांड की काफी ज्यादा देखरेख की जाती. लेकिन हरियाणा का ये सांड अपने अजीबो गरीब शौक के लिए सोशल मीडीया पर खूब छाया हुआ है। तकरीबन 21 करोड़ का सांड रोजाना शाम को व्हिस्की पीता है लेकिन सांड की इस आदत से उसका मालिक बिल्कुल भी परेशान नहीं।

इस सांड का नाम ‘सुल्तान’ है और इसकी आदत पर उसके मालिक का कहना है कि वो शराब पीना काफी पसंद करता है और उसके ऐसा करने से उसे सुकून मिलता है।

ये है सुलतान की खुराक

  • नरेश ने बताया कि सुलतान का वजन 16.5 क्विंटल है। उसकी खुराक में 15 किलो सेब, 10 किलो गाजर और 10 किलो दूध शामिल है। इनके अलावा हरा चारा और 10 किलो दाना उसकी खुराक में शामिल है।
  • सुलतान की खुराक पर खास ध्यान रखा जाता है। नरेश का कहना है कि यदि खुराक पर ध्यान नहीं रखा गया तो उसकी सेहत पर इसका सीधा असर होगा।
  • खुराक के अलावा उसकी साफ सफाई पर विशेष ध्यान रखा जाता है, सुलतान रोज शैम्पू से नहाता है और तेल की मालिश कराता है।

शराब का शौकीन

वह कोई राजा महाराजा नहीं है लेकिन उसके शौक किसी राजा महाराजा से कम नहीं है। इक्कीस करोड़ रुपए कीमत का सुल्तान मात्र सात साल और 10 माह का है, लेकिन रोज शाम को खाने से पहले अलग-अलग ब्रांड की शराब पीता है।

प्रति सप्ताह में छ: दिन शाम के खाने से पहले शराब पीता है लेकिन मंगलवार का दिन सुल्तान का ड्राई डे होता है। हरियाणा के कैथल जिले में मुर्रा नस्ल का भैंसा सुल्तान इन दिनों शराब का शौकीन हो गया है।

सुल्तान की उम्र आठ साल की भी नहीं है और अब से पांच साल पहले नरेश ने उसे रोहतक से 2 लाख 40 हजार रुपए में खरीदा था। एक विदेशी ने पिछले दिनों इसकी कीमत 21 करोड़ रुपए लगाई थी। सुबह के नाश्ते में सुल्तान देशी घी का मलीदा और दूध पीता है।

 

सुल्तान सोमवार को ब्लैक डॉग, बुधवार को 100 पाइपर, गुरुवार को बेलेनटाइन, शनिवार को ब्लैकलेबल या शिवास रीगल, रविवार को टीचर्स पीता है। कैथल के बूढ़ाखेड़ा गांव के रहने वाले सुल्तान के मालिक नरेश ने बताया कि वे सीमन बढ़ाने के लिए सुल्तान को शराब पिलाते हैं।यह दवाई की तरह दी जाती है। सुल्तान सालभर में 30 हजार सीमन (वीर्य) की डोज देता है जो 300 रुपए प्रति डोज बिकती है।

कूलर-पंखों में रहता है सुलतान

  •  सुलतान को गर्मी से बचाने के लिए उसके पास पंखे और कूलर लगाए जाते हैं। गर्मी के दिनों में सुबह और शाम दो बार उसे नहलाया जाता है।
  •  दो मजदूर दिनभर उसकी देखभाल में लगाए जाते हैं, जो उसके खाने पीने के अलावा साफ सफाई और मालिश आदि करते हैं।
  •  हरियाणा के कैथल जिले के रहने वाले नरेश बैनिवाल ने बताया कि सुलतान नेशनल लेवल पर अवॉर्ड जीत चुका है। उसका यह भैंसा मुर्रा नस्ल का है।

इस हिसाब से वह सालाना 90 लाख रुपए कमा लेता है। सुल्तान वर्ष 2013 में हुई राष्ट्रीय पशु सौंदर्य प्रतियोगिता में झज्जर, करनाल और हिसार में राष्ट्रीय विजेता भी रह चुका है।

राजस्थान के पुष्कर मेले में एक पशु प्रेमी ने सुल्तान की कीमत 21 करोड़ रुपए लगाई थी, लेकिन नरेश ने कहा कि सुल्तान उसका बेटा है और कोई अपना बेटा कैसे बेच सकता है।

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मोती की खेती से महज 2 लाख की इंन्‍वेस्‍ट से हर महीने होगी 1 लाख रुपए से अधिक की कमाई

बहुत से उद्योगों में मोती की खेती भी एक बढ़िया और कम पैसे लगा के शुरू करने वाला उद्योग है । अगर आप छोटे से इन्‍वेस्‍टमेंट से लाखों कमाना चाहते हैं तो आपके लिए मोती की खेती एक बेहतर विकल्‍प हो सकती है।

मोती की मांग इन दिनों घरेलू और अंतर्राष्‍ट्रीय बाजार में काफी अधिक है, इसलिए इसके अच्‍छे दाम भी मिल रहे हैं। आप महज 2 लाख रुपए के इंन्‍वेस्‍ट से इससे करीब डेढ़ साल में 20 लाख रुपए यानी हर महीने 1 लाख रुपए  से अधिक की कमाई कर सकते हैं।

कैसे करते हैं मोती की खेती

मोती की खेती के लिए सबसे अनुकूल मौसम शरद ऋतु यानी अक्टूबर से दिसंबर तक का समय माना जाता है। कम से कम 10 गुणा 10 फीट या बड़े आकार के तालाब में मोतियों की खेती की जा सकती है। मोती संवर्धन के लिए 0.4 हेक्टेयर जैसे छोटे तालाब में अधिकतम 25000 सीप से मोती उत्पादन किया जा सकता है।

खेती शुरू करने के लिए किसान को पहले तालाब, नदी आदि से सीपों को इकट्ठा करना होता है या फिर इन्हे खरीदा भी जा सकता है।इसके लिए स्‍ट्रक्‍चर सेटअप पर खर्च होंगे 10 से 12 हजार रुपए, वाटर ट्रीटमेंट पर 1000 रुपए और 1000 रुपए के आपको इंस्‍ट्रयूमेंट्स खरीदने होंगे।

इसके बाद प्रत्येक सीप में छोटी-सी शल्य क्रिया के बाद इसके भीतर चार से छह मिमी व्यास वाले साधारण या डिजायनदार बीड जैसे गणेश, बुद्ध, पुष्प आकृति आदि डाले जाते हैं। फिर सीप को बंद किया जाता है। इन सीपों को नायलॉन बैग में 10 दिनों तक एंटी-बायोटिक और प्राकृतिक चारे पर रखा जाता है। रोजाना इनका निरीक्षण किया जाता है और मृत सीपों को हटा लिया जाता है।

अब इन सीपों को तालाबों में डाल दिया जाता है। इसके लिए इन्हें नायलॉन बैगों में रखकर (दो सीप प्रति बैग) बांस या बोतल के सहारे लटका दिया जाता है और तालाब में एक मीटर की गहराई पर छोड़ दिया जाता है।

प्रति हेक्टेयर 20 हजार से 30 हजार सीप की दर से इनका पालन किया जा सकता है। अन्दर से निकलने वाला पदार्थ बीड के चारों ओर जमने लगता है जो अन्त में मोती का रूप लेता है। लगभग 8-10 माह बाद सीप को चीर कर मोती निकाल लिया जाता है।

कम लागत में ज्यादा मुनाफा

एक सीप लगभग 20 से 30 रुपए की आती है। बाजार में एक मिमी से 20 मिमी सीप के मोती का दाम करीब 300 रूपये से लेकर 1500 रूपये होता है। आजकल डिजायनर मोतियों को खासा पसन्द किया जा रहा है जिनकी बाजार में अच्छी कीमत मिलती है। भारतीय बाजार की अपेक्षा विदेशी बाजार में मोतियों का निर्यात कर काफी अच्छा पैसा कमाया जा सकता है। सीप से मोती निकाल लेने के बाद सीप को भी बाजार में बेंचा जा सकता है।

सीप द्वारा कई सजावटी सामान तैयार किये जाते है। सीपों से कन्नौज में इत्र का तेल निकालने का काम भी बड़े पैमाने पर किया जाता है। जिससे सीप को भी स्थानीय बाजार में तत्काल बेचा जा सकता है। सीपों से नदीं और तालाबों के जल का शुद्धिकरण भी होता रहता है जिससे जल प्रदूषण की समस्या से काफी हद तक निपटा जा सकता है।

कहां ले सकते हैं प्रशिक्षण

सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ फ्रेश वॉटर एक्वाकल्चर, भुवनेश्वर (ओड़ीसा) में मोती की खेती का प्रशिक्षण दिया जाता है। यह संस्थान ग्रामीण नवयुवकों, किसानों एवं छात्र-छात्राओँ को मोती उत्पादन पर तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान करता है। किसान हेल्प भी किसानों और छात्र-छात्राओँ को मोती उत्पादन पर तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान करता है। ये संस्था हापुड़ में प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रही है।

चित्रकूट जिले के कृषि विज्ञान केन्द्र, गनिवां में भी मोती की खेती का प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाया जा रहा है। कृषि विज्ञान केन्द्र के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. नरेन्द्र सिंह बताते हैं, “ग्रामीण नवयुवक, किसान इसका प्रशिक्षण ले सकते हैं। हमने यहां पर सीपी पालन शुरु भी कर दिया है।”