सिर्फ 10 मुर्राह भैंस से बिज़नेस शुरू कर सिविल इंजीनियर ऐसे बना करोड़पति

 

एक सिविल इंजीनियर सात साल में करोड़पति बन गया। मुर्राह भैंस के दूध की बदौलत। सिर्फ दस मुर्राह भैंसों से कारोबार शुरू करने वाले सिविल इंजीनियर बलजीत सिंह रेढु के पास आज एक हजार से ज्यादा भैंसें हैं।आज सालाना 150 करोड़ टर्नओवर की कंपनी के मालिक हैं।

हरियाणा के जींद जिले में जन्मे 51 वर्षीय बलजीत बताते हैं कि उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई तो की किन्तु लक्ष्य एक सफल कारोबारी के रूप में पहचान बनाना था। इसी विचार के साथ उन्होंने मुर्गी पालन के लिए हैचरी बिज़नेस शुरू किया, फिर 2006 मे ब्लैक गोल्ड के नाम से पंजाब और हरियाणा में मशहूर 10 मुर्राह भैसों के साथ डेरी कारोबार की शुरुआत की।

बलजीत अपनी सफलता का सारा श्रेय इन मुर्राह भैसों को देते हैं, उनका मानना है कि लोग विदेशी नस्लों को महत्व देकर अपने ही देश की नस्लों को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं। आज मुर्राह भैंस की कीमत लाखों में है, स्वयं बलजीत ने दो महीने पहले मुर्राह भैंस की कटड़ी 11 लाख रुपए में बेचा। बलजीत इनके संरक्षण के लिए लगातार प्रयासरत है और इसमें सफल भी हुए है।

जमीन से जुड़े बलजीत का उद्देश्य अपने कारोबार में मुनाफा कमाने के साथ-साथ हरियाणा के अधिक से अधिक युवकों को रोज़गार मुहैया कराना है। इसी सोच के साथ उन्होंने जींद में ही एक मिल्क प्लांट लगाया है जिससे 14 हज़ार दूध उत्पादक उनसे जुड़े हैं।

किसानों को आधुनिक टेस्टिंग उपकरण के साथ उत्तम किस्म का चारा भी उपलब्ध कराया जाता है तथा 40-50 लोगों की टीम हर समय उपलब्ध रहती है जो कि हर तरह की जानकारी व सुविधा दूध उत्पादकों तक पहुँचाते हैं।

पूरे हरियाणा मे उनके 120 मिल्क बूथ हैं और 300 से ज्यादा मिल्क कलेक्शन सेंटर। इनके उत्पाद दूध, दही,पनीर,आइसक्रीम, घी, बटर और स्वीट्स बाजार में लक्ष्य फूड ब्रांड के नाम से जाने जाते हैं।

वर्तमान में कंपनी की उत्पादन क्षमता 1.5 लाख लीटर दूध प्रतिदिन की है। अपनी गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए कंपनी ने टेट्रापैक टेक्नोलॉजी से अपने उत्पादों को लैस किया है।

 

अपने कठिन परिश्रम के बल पर आज बलजीत के पास उनकी क्लाइंट लिस्ट मे बड़े-बड़े नाम शामिल हैं उनमे प्रमुख़ है मदर डेरी, गार्डन डेयरीज, ताज ग्रुप, द एरोमा, गोपाल स्वीट्स, सिंधी स्वीट्स और चण्डीगढ़ ग्रुप ऑफ़ कॉलेजेस।

रेढू ग्रुप के अंतर्गत रेढू हैचरीज प्राइवेट लिमिटेड,रेढू फार्म प्राइवेट लिमिटेड और जे एम मिल्स प्राइवेट लिमिटेड भी आते हैं। अपने दूध उत्पादों के अलावा बलजीत ने मुर्राह भैसों एवं होल्सटीन गायों का ब्रीडिंग केंद्र भी खोला है, जहां पर पैदा हुए उन्नत किस्म के कटड़ों एवं बछड़ो को देश भर में बेचा जाता है।

बलजीत का सपना है जिसमे वह काफी हद तक कामयाब भी हुए है, कि वह मुर्राह भैंसो, डेरी फार्मिंग और हरियाणा को विश्व के मानचित्र पर इस प्रकार अंकित करे कि सम्पूर्ण विश्व में हरियाणा की संस्कृति दूध व दही के नाम से पहचानी जाए। कहते है न जब हौसले बुलंद हो तो सफलता को पंख लगते देर नहीं लगती। इसी कहावत को चरितार्थ कर दिखाया है बलजीत सिंह रेढू ने।

नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (एनडीडीबी) की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 2016-17 तक दूध की मांग 15.5 करोड़ टन पहुंचने की उम्मीद है। ऐसे में नए उद्यमियों के लिए इस क्षेत्र में अपार संभावनाएं है। आशा करते हैं कि बलजीत सिंह जैसे लोगों से सीख लेकर नई पीढ़ी के युवा इस क्षेत्र में सफलता का परचम लहरायेंगे।

यह चारा लगायें एक बार लगाने के बाद 5 साल हरा चारा पाएं

पशुपालकों को गर्मियों में हरे चारे की सबसे ज्यादा परेशानी होती है। बरसीम, मक्का, ज्वार जैसी फसलों से तीन-चार महीनों तक ही हरा चारा मिलता है। ऐसे में पशुपालकों को एक बार नेपियर घास लगाने पर चार-पांच साल तक हरा चारा मिल सकता है।

इसमें ज्यादा सिंचाई की जरूरत भी नहीं पड़ती है। गन्ने की तरह दिखने वाली नेपियर घास लगाने के महज 50 दिनों में विकसित होकर अगले चार से पांच साल तक लगातार दुधारू पशुओं के लिए पौष्टिक आहार की जरूरत को पूरा कर सकती है।

पशुपालन विभाग के उप निदेशक वीके सिंह नेपियर घास के बारे में बताते हैं, “प्रोटीन और विटामिन से भरपूर नेपियर घास पशुओं के लिए एक उत्तम आहार की जरूरत को पूरा करती है। दुधारू पशुओं को लगातार यह घास खिलाने से दूध उत्पादन में भी वृद्धि होती है और साथ ही रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है।

हाइब्रिड नेपियर की जड़ को तीन-तीन फीट की दूरी पर रोपित किया जाता है। इससे पहले खेत की जुताई और समतलीकरण करने के बाद घास की रोपायी की जाती है और रोपाई के बाद सिंचाई की जाती है।

घास रोपण के मात्र 50 दिनों बाद यह हरे चारे के रूप में विकसित हो जाती है। एक बार घास के विकसित होने के बाद चार से पांच साल तक इसकी कटाई की जा सकती है और पशुओं के आहार के रूप में प्रयोग की जा सकती है।

नेपियर घास का उत्पादन प्रति एकड़ लगभग 300 से 400 कुंतल होता है। इस घास की खासियत यह होती है कि इसे कहीं भी लगाया जा सकता है। एक बार घास की कटाई करने के बाद उसकी शाखाएं पुनः फैलने लगती हैं और 40 दिन में वह दोबारा पशुओं के खिलाने लायक हो जाती है।

प्रत्येक कटाई के बाद घास की जड़ों के आसपास हल्का यूरिया का छिड़काव करने से इसमें तेजी से बढ़ोतरी भी होती है। वैसे इसके बेहतर उत्पादन के लिए गोबर की खाद का छिड़काव भी किया जाना चाहिए।

अब फसल अवशेषों से बनेगा पशुओं के लिए पौष्टिक चारा 

फसलों की कटाई के बाद ज्यादातर किसान फसल अवशेषों को खेत में ही जला देते हैं, जिससे मिट्टी की सेहत पर असर पड़ता है।नरवाई में आग लगाने से मिट्टी की 6 इंच ऊपर की परत जो उपजाऊ व कृषि योग्य होती है वह कठोर हो जाती है।

साथ ही मिट्टी में पड़े कार्बनिक पदार्थ, सूक्ष्म पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। मिट्टी में पाए जाने वाले सूक्ष्म जीवाणु जो उपज बढ़ाने में सहायक होते हैं वह नष्ट हो जाते हैं। भूमि का तापक्रम बढ़ने से आसपास के वातावरण पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। जैव विविधता भी बुरी तरह प्रभावित होती है। इस लिए किसानों को नरवाई को जलाकर नष्ट करने का प्रयास नहीं करना चाहिए।

अब विज्ञानकों ने एक ऐसी तकनीक का इज़ाद क्या जिस से फसल अवशेषों को जलने की जगह पर इस से पशुओं के लिए पौष्टिक चारा बन सकेगा । नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट ने नया तरीका निकाला है, जिसमें फसल अवशेष को अमोनिया से ट्रीट करके दुधारू पशुओं के लिए पौष्टिक आहार बनाया जा रहा है।

नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट करनाल के वैज्ञानिकों का कहना है यदि रिसर्च में सफलता मिली तो दूसरे चरण में इसकी गोलियां बनाई जाएगी। यह न केवल पौष्टिक होगी व इनके स्वाद के कारण पशुओं को खिला सकते हैं। इसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर भूसा अथवा अवशेषों के मुकाबले आसानी से ले जाना अासान होगा। इसे मवेशियों को खली की तरह खिलाया जा सकेगा।

दल के प्रमुख और पशु पोषण विभाग अध्यक्ष डॉ. त्यागी ने बताया, “अभी 100 गाय-भैंस को अमोनिया ट्रीटमेंट का पौष्टिक चारा दिया जा रहा है। इसके बाद उनके स्वास्थ्य पर नजर रखी जा रही है। दूध निकालकर रोजाना रीडिंग नोट की जा रही है। अभी तक दूध उत्पादन 10-15 फीसदी बढ़ा है। दूध की गुणवत्ता में भी सुधार हुआ है।”

पशुओं में थनों की सोजिश ठीक करने के घरेलू नुस्खे

भारत में थानों की सोजिश बहुत ही आम बीमारी है इसका मुख्या कारण पशु के शेड का गन्दा होना है क्योंकि जब भी पशु गन्दी जगह पर बैठता है तो गंदगी थानों के सुराख़ में चली जाती है ।जिस से उस में कीटाणु पनपने लग जाते है जो इन्फेक्शन का कारण बनते है इस लिए हमेशा पशु का शेड साफ सुथरा होना चाहिए ।डॉक्टरी इलाज से पहले हमें कुछ घरेलू इलाज प्रयोग करने चाहिए। आइये जानते हैं ऐसे कुछ घरेलू नुस्खों के बारे में।

1. सरसों के तेल से हवाने की मालिश करना: थनों की बीमारी होने की सूरत में पशु पालकों के द्वारा थोड़ा-सा सरसों का तेल गर्म पानी में डाल लिया जाता है और इस घोल से हवाने की मालिश की जाती है। सरसों के तेल में, सोजिश को कम करने के गुण पाये जाते हैं और यह खून के दौरों को बढ़ा कर जख्म के जल्दी ठीक होने में मदद करता है। इसके इलावा सरसों का तेल रोगाणु नाशक भी होता है।

2. हल्दी और सरसों के तेल के पेस्ट से हवाने की मालिश करना: पीसी हुई हल्दी को सरसों के तेल में मिलाकर पेस्ट बना लिया जाता है, सोजिश होने की सूरत में हवाने पर इसकी मालिश की जाती है। हल्दी और सरसों के तेल में रोगाणु नाशक हाने के साथ-साथ सोजिश कम करने की भी शक्ति होती है, इनका पेस्ट हवाने की सोजिश को हटाता है, जख्मों को ठीक करता है और रोगाणुओं को नष्ट करता है।

3. काली मिर्च ग्लो और गुड़ खिलाना : काली मिर्च को पीस कर उस में ग्लो मिलाकर, गुड़ में डालकर जानवर को खिला दिया जाता है। ग्लो और काली मिर्च में सोजिश हटाने के गुण होते हैं इसलिए इनका मिश्रण लेवे की सोजिश में सहायक होता है।

4. लहसुन खिलाना :पशुओं को समय समय पर लहसुन खिलाया जा सकता है। लहसुन में जीवाणु नाशक, कीटाणु नाशक, रोगाणु नाशक गुण होते हैं जो लेवे की सोजिश होने से रोकता है।

5. एक अन्य उपाय अनुसार 100 ग्राम मीठा सोडा, 100 ग्राम नींबू का अर्क, 100 ग्राम जौं खार, 50 ग्राम काली मिर्च, 250 ग्राम देसी घी, 1 किलो गुड़ चीनी और 100 ग्राम कलमी शोरा लेकर सभी को मिलाकर दिन में दो बार पशु को दिया जाता है।

पशु के हवाने व थनों की सफाई रखनी चाहिए और साफ सुथरे व सूखे तथा नर्म स्थान पर बांधना चाहिए। दूध निकालने वाले व्यक्ति के हाथ भी साफ होने चाहिए।अंगूठे के दबाव से दूध नहीं निकालना चाहिए। थनों में दूध ज़्यादा समय तक नहीं रहने देना चाहिए।

पशुओं को हीट में लाने के लिए करें इन घरेलु नुख्सों का प्रयोग

कई बार किसान भाईओं को अपने पशओं को हीट मैं लाने मैं काफी दिक्कत आती है | कई बार पशुओं के डॉक्टर को दिखाने पर भी कोई फ़ायदा नहीं होता उल्टा जो पैसे का नुक्सान होता है वो अलग आज हम आपको कुश घरेलू नुक्से बतायंगे जिनको इस्तेमाल कर आप अपने पशुओं को हीट में ला सकते है |

पशुओं को गुड़ देना:- थोड़ी मात्रा में दिया गया गुड़ पशुओं के पेट में सूक्ष्मजीवों के बढ़ने और पाचन शक्ति बढ़ाने में सहायक होता है| इससे पशु की भूख बढ़ जाती है| गुड़ ऊर्जा देने के साथ साथ भूख भी बढ़ाता है इसलिए जरूरी तत्वों की पूर्ति में सहायक होता है जिससे पशु हीट में आ जाता है| पर कोशिश करें की ज्यादा मात्रा में एवं लगातार गुड़ न दें क्योंकि ज्यादा मात्रा में दिया गया गुड़ पशु के लिए परेशानी का कारन बन सकता है|

पशुओं को बिनौले खिलाना:- पशुओं को हीट में लाने के लिए बिनौले दिए जाते हैं क्योंकि इनकी तासीर गरम होने की वजह से पशु जल्दी बोल पड़ता है और नए दूध हो जाता है| पर बिनौले हमेशा उबाल कर ही देने चाहियें क्योंकि कच्चे बिनौलों में गोसीपोल नाम का जहर होता है जिससे पशु को नुकसान भी हो सकता है|

गुड़ और तारामीरा तेल का मिश्रण देना:-अपने पशुओं को गुड़ एवं तारामीरा तेल का मिश्रण लगभग आधा किल्लो से एक किलो 5 – 7 दिनों तक देना चाहिए| कई बार इस मिश्रण में थोड़ा नमक भी मिला लिया जाता है यां कुछ लोग सौंफ, अजवाइन, सौंठ और गुड़ का काहड़ा बना कर भी पशुओं को देते हैं|

गुड़+सरसों के तेल और तिल का मिश्रण देना- इस नुस्खे अनुसार एक पाव गुड़ एवं समान मात्रा में तिल ले कर उसमे लगभग 100 मिलीलीटर तेल डाल कर मिला लिया जाता है फिर इस मिश्रण को पीस कर 4 से 5 दिनों तक पशुओं को खिलाया जाता है|गुड़, सरसों के तेल एवं तिल में बाईपास प्रोटीन होता है इसलिए जब ये सरे तत्व मिल जाएँ तो पशु के गर्भ धारण करने की सम्भावना बढ़ जाती है|

जाने इस डेयरी में क्या है खास जो अमिताभ बच्चन से लेकर अंबानी तक पीते हैं इसका दूध

पुणे के मंचर में चल रही इस डेयरी का दूध अंबानी परिवार, अमिताभ बच्चन, सचिन तेंडुलकर जैसी सेलिब्रिटी तक पीते हैं। यह कोई छोटी-मोटी डेरी नहीं है। 27 एकड़ में फैले एक फार्म में इसका पूरा सेटअप लगा है।

इसमें 3500 गाय हैं। 75 कर्मचारी यहां काम करते हैं। इस डेरी के 12 हजार से ज्‍यादा कस्टमर्स हैं और यहां के दूध की कीमत भी कम नहीं है। यहां का दूध 80 रुपए लीटर बिकता है।

इस फार्म के ऑनर देवेंद्र शाह को देश सबसे बड़ा ग्वाला कहा जाता हैं। वे पहले कपड़े का धंधा करते थे, बाद में दूध के बिजनेस में आ गए। प्राइड ऑफ काउ प्रोडक्ट 175 कस्टमर्स के साथ शुरू किया था।

इनके मुंबई और पूना में 12 हजार से ज्यादा कस्टमर है। इनमें कई सेलेब्स भी शामिल हैं। कई बॉलीवुड से लेकर हाई प्रोफाइल बिजनेसमैन भी शामिल है।

यहां गायों को मिलता है आरो का पानी

गायों को पीने के लिए आरो का पानी दिया जाता है। मौसम को ध्यान में रखकर डॉक्टर चेकअप के बाद गायों को खाना दिया जाता है। दूध निकालने के समय रोटरी में जब तक गाय रहती है तब तक जर्मन तकनीक से उसकी मसाज की जाती है।

2-3 बार सफाई का काम

गायों के लिए बिछाया गया रबर मैट दिन में 3 बार धोया जाता है। यहां 54 लीटर तक दूध देने वाली गाय है। पुराने कस्टमर की रेफरेंस के बिना नहीं बनता नया कस्टमर। हर साल 7-8 हजार पर्यटक डेयरी फार्म घूमने आते है।

दूध निकालने में लगता हाथ

गाय का दूध निकालने से लेकर पैकिंग तक का पूरा काम ऑटोमैटिक होता है। फार्म में दाखिल होने से पहले पैरों पर पाउडर से डिसइंफेक्शन करना जरूरी है। दूध निकालने से पहले हर गाय का वजन और तापमान चेक किया जाता है।

बीमार गाय को डॉक्टर के पास भेजा जाता है। दूध सीधा पाइपों के जरिए साइलोज में और फिर पॉश्चुराइज्ड होकर बोतल में बंद हो जाता है। एक बार में 50 गाय का दूध निकाला जाता है जिसमें सात मिनट लगते हैं।

आ गया ब्राजील का कैक्टस अब बंजर भूमि में भी मवेशियों को मिलेगा चारा

कैक्टस एक ऐसा पौधा है जो हर तरह की बंजर और ज़मीन में उग सकता है ।और सोचो अगर इसके इस्तेमाल से पशुआ का चारा बन जाये तो कभी भी कहीं ही चारे की कमी नहीं आयगी। आने वाले दिनों में सूखे क्षेत्र और बंजर जमीन का उपयोग कैक्टस के उत्पादन के लिए किया जा सकेगा। मवेशियों को चारे के लिए कैक्टस की 24 प्रजातियों का उपयोग किसान कर सकेंगे। कैक्टस ब्राजील में पाया जाता है जहां से अब इसे इकार्डा सेंटर लाया गया है।

इस पर शोध किए जा रहे हैं। इकार्डा सेंटर इंटरनेशनल सेंटर फार एग्रीकल्चर रिसर्च इन द ड्राय एरिया के वैज्ञानिक शोघ कार्य में जुटे हुए हैं। यहां पर 24 सितंबर 2014 को ब्राजील से कैक्टस मंगाया गया था। यहां पर 24 पैड मंगाए गए थे जिनमें से ओरेला डे एलीफेंटा मेक्सीकाना प्रुमख हैं। अब यह 3 एकड़ के रकबे में लगा है।

अन्य कामों में भी होता है उपयोग

इकार्डा सेंटर के फार्म मैनेजर विवेक सिंह तोमर ने बताया 24 किस्मों पर शोध चल रहा है। चारे की ये उत्तम किस्में हैं। दो साल पहले ब्राजील से इसे लाया गया था। इस साल इसके पौधों की ऊंचाई दो फीट और चौड़ाई डेढ़ फीट तक हो गई है। बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों के लिए भी उपयोगी होगा।

इससे ये होते हैं फायदे

कैक्टस बंजर भूमि पर भी हो सकता है। इसके लिए पानी होना लाजमी नहीं है। यह बिना पानी के ही बेहतर उत्पादन देता है। ये चारे के काम आता है। पशु पालकों को इसकी 24 किस्में मिल पाएंगी। इसका उपयोग औषधियों के निर्माण में भी होता है। खासकर सौंदर्य प्रसाधन के लिए इसका उपयोग होता है। इसका गूदा चाॅकलेट बनाने के काम भी आता है। इसका उपयोग पेय प्रदार्थों के लिए भी होता है। मवेशियों के दूध के उत्पादन की क्षमता भी बढ़ जाती है।

ऐसे शुरू करें अपना खुद का डेयरी फार्म

आजकल डेयरी फार्म का कारोबार शुरू कर के कोई बेरोजगार या किसान खासी कमाई कर सकता है| पारंपरिक खेती से ऊब चुके या घाटा उठा चुके किसानों के लिए डेयरी फार्म सौगात की तरह है|

सब से खास बात यह है कि सरकार और कई संस्थाएं इस कारोबार को चालू करने के लिए कई तरह की सुविधाएं मुहैया करा रही हैं, जिस का फायदा उठा कर खुद की माली हालत को सुधारा जा सकता है और कुछ जरूरतमंदों को रोजगार भी दिया जा सकता है| इस कारोबार की खास बात यह है कि कम से कम 2 गायों से भी डेयरी फार्म की शुरुआत की जा सकती है|

लघु डेयरी फार्म : उन्नत नस्ल की 2 गायों के साथ लघु डेयरी फार्म शुरू किया जा सकता है| इस पर कुल खर्च 1 लाख 10 हजार रुपए होता है, जिस में 65 फीसदी यानी 70 हजार 850 रुपए बैंक से कर्ज मिल सकता है और लागत का 25 फीसदी यानी 27 हजार 250 रुपए गव्य विकास निदेशालय की ओर से मुहैया कराए जाते हैं|

फार्म शुरू करने वाले को अपनी जेब से करीब 11 हजार रुपए लगाने होंगे| चारा, दाना, पशु बीमा और इलाज पर हर साल करीब 65 हजार रुपए खर्च होते हैं और बैंक कर्ज चुकाने में हर साल 20 हजार रुपए खर्च होंगे| दूध और बछियाबछड़े बेच कर सवा लाख रुपए तक की कमाई हो सकती है| इस में चारा और लोन चुकाने का खर्च घटा दिया जाए तो सालाना 42 हजार रुपए का शुद्ध मुनाफा हो जाता है|

मिनी डेयरी फार्म : उन्नत किस्म की 5 गायों से मिनी डेयरी फार्म लगाया जा सकता है| इस में करीब 2 लाख 70 हजार रुपए की लागत आती है, जिस में 65 फीसदी यानी 1 लाख 75 हजार रुपए बैंक से कर्ज और 25 फीसदी यानी 67 हजार रुपए विभाग से अनुदान के रूप में आसानी से हासिल किए जा सकते हैं|

डेयरी फार्म लगाने वाले को कुल लागत का 10 फीसदी यानी करीब 27 हजार रुपए का जुगाड़ करना पड़ेगा| मिनी डेयरी फार्म से हर साल करीब 90 हजार रुपए की शुद्ध कमाई की जा सकती है| गायों को खिलाने, इलाज और बीमा वगैरह पर सालाना 1 लाख 90 हजार रुपए और बैंक का कर्ज चुकाने में करीब 46 हजार रुपए खर्च हो जाएंगे|

मिडी डेयरी फार्म : उन्नत नस्ल की 10 गायों से मिडी डेयरी फार्म खोला जा सकता है| इसे खोलने पर कुल 5 लाख 50 हजार रुपए का खर्च बैठता है| जिस में 70 फीसदी यानी 3 लाख 85 हजार रुपए बैंक से कर्ज मिल सकता है| और लागत का 20 फीसदी यानी 1 लाख 10 हजार रुपए गव्य विकास निदेशालय की ओर से मुहैया कराए जाते हैं| फार्म शुरू करने वालों को अपनी जेब से करीब 55 हजार रुपए लगाने पड़ते हैं|

चारा, दाना, मजदूरी, पशु बीमा और इलाज पर हर साल करीब 3 लाख 67 हजार रुपए खर्च होते हैं और बैंक कर्ज चुकाने में हर साल 1 लाख 8 हजार रुपए खर्च हो जाएंगे| दूध व बछियाबछड़े बेच कर 6 लाख 37 हजार रुपए तक की कमाई हो सकती है| इस में चारा और लोन चुकाने का खर्च घटा दिया जाए तो सालाना 1 लाख 62 हजार रुपए का शुद्ध मुनाफा हो जाएगा|

व्यावसायिक डेयरी फार्म : इस दर्जे का डेयरी फार्म शुरू करने में करीब 15 लाख रुपए की लागत आएगी| इस के लिए कम से कम उन्नत नस्ल की 20 गायों की जरूरत पड़ती है| इस के लिए लागत का 75 फीसदी यानी साढ़े 10 लाख रुपए बैंक कर्ज और 15 फीसदी यानी करीब 2 लाख रुपए विभागीय अनुदान के रूप में हासिल किए जा सकते हैं|

हर साल गायों को खिलाने, इलाज कराने, बीमा और मजदूरी वगैरह पर साढ़े 7 लाख रुपए और बैंक का लोन चुकाने पर 2 लाख 70 हजार रुपए खर्च हो जाएंगे| दूध व बछियाबछड़े बेच कर 12 लाख 75 हजार रुपए फार्म मालिक के हाथ में आएंगे और सारा खर्च काट कर 1 साल में 2 लाख 70 हजार रुपए की शुद्ध कमाई होगी|

 

 

 

गाय जो रोजाना देती है 65 लीटर दूध,खुराक जानकर रह जाओगे हैरान

एक दिन में 65 लीटर दूध देने वाली गाय देखी है क्या आपने। अगर नहीं तो आज देख लीजिए। इसकी खुराक आपको हैरान कर देगी । हरियाणा दूध के लिए अपनी अलग पहचान रखता है। शायद हरियाणा कुलदीप जैसे कई डेयरी फार्मर की वजह से आज भी अपनी पहचान को बरकरार रख पाया है।

कुलदीप की एक गाय हर रोज 65 लीटर दूध देती है। गाय का नाम एंडेवर है। गाय एंडेवर 5 साल की है वह । हर रोज 65 लीटर दूध देती है। दूध दिन में तीन बार 8 घंटे के अंतराल के बाद निकाला जाता है। वे सुबह 5 बजे फिर दोपहर 1 बजे और रात को 9 बजे दूध निकालते हैं।

कुलदीप 27 साल के युवा हैं और पुश्तैनी बिजनेस संभाल रहे हैं। करनाल के दादूपुर गांव के डेयरी फार्मर कुलदीप ने बताया कि उसकी । गाय की नस्ल होल्सटीन फ्रीजन है, जो विदेशी यानी हॉलैंड की नस्ल है। गाय के लिए उन्होंने यूएसए से सीमन मंगाया था।

इन गायों की खुराक सुनेंगे तो आप यकीन नहीं कर पाएंगे, एक गाय को हर रोज 35 किलो साइलेज, 20 किलो हरा चारा, 12 किलो फीड, 5 किलो चने खा जाती है। इसके अलावा मौसमी सब्जियां मिलती हैं वो अलग।

वे अपनी तीन गायों का दूध बेचकर अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। उन्होंने अभी तक किसी गाय की कीमत नहीं लगवाई है।कुलदीप के पास 3 गाय 26 बार अलग-अलग जगह दूध देने की प्रतियोगिताओं में चैंपियन रह चुकी हैं।

अब मिल्क टेस्ट से ही पता चल जाएगा कि पशु गर्भ से है या नहीं

अब दुधारू पशुओं की गर्भावस्था मिल्क टेस्ट से ही एक महीना पहले पता चल जाएगी। इसके लिए कारगिल कंपनी ने बठिंडा में अपनी लेबोरेट्री स्थापित की है। यह डेयरी किसानों के लिए नई तकनीक लेकर आया है जिसमें दुधारू पशुओं की प्रेग्नेंसी के समय गाय में हार्मोन्स की जाँच करके उनके गर्भवास्था का पता लगाया जा सकता है।

इसे प्रेग्नेंसी के लिए मार्कर के तोर पर इस्तेमाल किया जायेगा। इस दिशा में कारगिल ने बठिंडा में एक मिल्क टेस्टिंग प्रयोगशाला की स्थापना की है जिसकी क्षमता हर साल 1 लाख सैम्पल का परीक्षण करने की है।

कारगिल की ओर से लाया गया मिल्क प्रेग्नेंसी टेस्ट प्रजजन के 28 दिनों पहले ही गर्भ अवस्था की स्थिति बता देता है जो की पारम्परिक पद्धति की तुलना में 1 महीना पहले है। इसके उत्पादक प्रजनन के लिए तैयार पशुओं की पहचान कर सकता है जिससे समय पर प्रजनन को सुनिचित किया जा सकता है।

60 दिनों तक इंतज़ार करने की जरूरत नहीं

पारंपरिक तौर पर किसानो को 60 दिनों तक इंतज़ार करने की जरूरत होती है और पशु चिकित्सक हाथ से इस बात की जाँच करता है की गाय गर्भवती है या नहीं इसमें अधिक समय लगता है और इसमें खर्च भी ज्यादा आता है।

इस मौके पर विक्रम भंडारी का कहना है की ये पहली कम्पनी है और किसानो को देखते हुए इस टेक्नॉलाजी को लाया गया है। इससे पहले उन्होंने ग्लोबल टीम के साथ बात की फिर वह इस तकनीक को लेकर आये। अमृतसर में तकनीक शुरू करने के बाद इसे जीरा लुधियाना और बाकी पंजाब में भी इस तकनीक को लाया जायेगा।

एेसे कर सकते हैं परीक्षण

इसके लिए डेयरी किसानों को 300 रुपए की एक किट खरीदनी होगी। उसके बाद किट के जरिये मिल्क सेम्पल को उनकी लेबोरेट्री में भेज सकते है।