ठंड लौटने से आई गेहूं उगाने वाले किसानो के लिए यह बड़ी खुशखबरी

मौसम में अचानक आए बदलाव की वजह से उत्‍तरी भारत के इलाकों में गेहूं की अच्‍छी पैदावार के आसार बन गए हैं। मौसम वि‍भाग के मुताबि‍क, अगले तीन से चार दि‍नों तक न्‍यूनतम तापमान में कोई कमी आने के आसार नहीं है।

जम्‍मू कश्‍मीर पर बने वेस्‍टर्न डि‍स्‍टरबेंस की वजह से जम्‍मू-कशमीर, हिमाचल प्रदेश और उत्‍तराखंड में बारि‍श और बर्फबारी के आसार हैं। वहीं उत्‍तर प्रदेश, हरि‍याणा, पंजाब और उत्‍तरी राजस्‍थान में ठंडी हवाएं चलेंगी। । मौसम वि‍भाग ने 13 फरवरी को उत्‍तर के मैदानी इलाकों और मध्‍य भारत में भी बारि‍श की संभावना जताई है। इस तरह के मौसमी हालात गेहूं के लि‍ए बहुत अच्‍छे रहते हैं।

फसल को मि‍ल जाएगा टाइम

इंडियन एग्रीकल्‍चर रि‍सर्च इंस्‍टीट्यूट में कृषि वैज्ञानि‍क डॉक्‍टर जे पी डबास के मुताबि‍क, गर्मी जि‍तना धीमी रफ्तार से आएगी उतना ही गेहूं के लि‍ए अच्‍छा रहेगा। अगर मौसम में अचानक कोई बदलाव आ जाए तो ये गेहूं के लि‍ए नुकसान दायक होता है। अगर अभी हल्‍की बारि‍श पड़ जाए तो ये और अच्‍छा होगा। इससे फसल को टाइम मि‍ल जाएगा और दानों का वजन बढ़ जाएगा।

3.3 करोड़ टन गेहूं की खरीद का लक्ष्‍य

अप्रैल में गेहूं की कटाई शुरू हो जाती है। इस साल सरकार ने 3.3 करोड़ टन गेहूं की खरीद का लक्ष्‍य रखा है। यह पि‍छले साल के मुकाबले करीब 43 फीसदी ज्‍यादा है। पिछले साल सरकार टारगेट से कम खरीद कर पाई थी।

पि‍छले साल गेहूं की कुल खरीद 2.296 करोड़ टन थी। वर्ष 2015-16 के रबी सीजन में पंजाब से 104.44 लाख टन और हरि‍याणा से 67.78 लाख टन गेहूं की खरीद की गई थी। सरकार ने इस बार गेहूं की एमएसपी 1735 और चने की एमएसपी और बोनस 4400 रुपए तय कि‍या है।

इस बार घटा है रकबा

हालांकि‍ इस बार गेहूं का रकबा घटा है। यह पि‍छले रबी सीजन के मुकाबले 5.38 फीसदी कम है। एग्रीकल्‍चर मि‍नि‍स्‍टरी की ओर से 2 फरवरी को जारी आंकड़ों के मुताबि‍क, अभी तक 300.70 हैक्‍टेयर इलाके में गेहूं की बुवाई हुई है, जबकि‍ बीते साल 317.82 हैक्‍टेयर में गेहूं की बुवाई हुई थी।

रात का तापमान 5 से 6 डिग्री उपयुक्‍त

गेहूं को शुरू में ठंडक की जरूरत पड़ती है। ज्‍यादा गर्मी होने पर गेहूं के बीज अंकुरि‍त होने में दि‍क्‍कत आती है। रबी के मौसम में रात में ठंडक बढ़ने से गेहूं, चना और सरसों को फायदा होता है। वहीं अगर रात का तापमान ज्‍यादा रहा तो इन फसलों को नुकसान होता है। रात में श्‍वसन (रेस्पिरेशन) की रफ्तार बढ़ जाती है। उसके लिए न्यूनतम तापमान 5 से 6 डिग्री होना चाहिए। वहीं दिन का तापमान 20-25 डिग्री होना चाहिए।

गेहूं में इसी समय लगती हैं यह बीमारियां, ऐसे सावधानी बरतें किसान

पूरे देश में रबी सीजन की बुवाई के जो सरकारी आंकड़े मिले हैं, उसके मुताबिक गेहूं की बुवाई 283.46 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है। अलग-अलग हिस्सों में गेहूं क्राउन रूट अवस्था में पहली सिंचाई भी शुरू हो चुकी है। गेहूं में इसी समय बीमारियां लगती हैं, ऐसे में किसानों को सिंचाई पर विशेष सावधानी बरतने की सलाह कृषि विभाग की तरफ से दी गई है।

मगर एक बात ध्यान रखें किसान

भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान के कृषि सलाहकार समिति के वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह जारी की है। सलाहकार समित के अध्यक्ष डॉ. आरके शर्मा बताते हैं, ”इस समय सुबह के समय धुंध कम दिखाई दे रही है।

दिन का अधिकतम तापमान सामान्य तौर पर जहां 20.3 डिग्री है, वहीं न्यूनतत तापमान सामान्यतया 7.7 डिग्री सेल्सियस है। ऐसे में किसान अपनी पहली सिंचाई जरूर कर लें, लेकिन ध्यान रहे यह सिंचाई हल्की हो।”

तब पहला खतरा शुरू होता है

डॉ. शर्मा आगे बताते हैं, “जिन गेहूं की बुवाई का 40 दिन हो गया है, उसमें नाइट्रोजन को किसान डालना शुरू कर दें। जिन जगहों पर 45 मिलीमीटर या उससे अधिक बारिश हुई हो, वहां के किसान अभी सिंचाई न करें।“ जिन किसानों ने गेहूं की बुवाई 40 दिन पहले की है उन गेहूं में कल्ले निकलना शुरू हो गया है। यह ही वह समय भी होता है जिसमें गेहूं में बीमारियों का पहला खतरा शुरू होता है।

पत्ती माहूं बीमारी की संभावना ज्यादा

इस बारे में जानकारी देते हुए भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान के कृषि वैज्ञानिक बीएस त्यागी ने बताया, ”तापमान में गिरावट होने से गेहूं में पत्ती माहूं, जिसे चापा भी कहते हैं, इस रोग के आने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए किसानों का सलाह दी जाती है कि इस समय गेहूं की पौधे की जांच नीचे से ऊपर तक अच्छी तरह से करें।”

ये गेहूं के पौधों को पहुंचाते हैं नुकसान

उन्होंने आगे बताया, “इस बीमारी से गेहूं को बचाने के लिए किसान क्यूनालफोस इसी नामक दवा की 400 मिली लीटर मात्रा को 200 से 250 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ की दर से छिड़ीकाव करें। गेहूं के खेत में यही वह समय होता है,

जब खेत में चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार जैसे बथुआ, खरबाथू, जंगली पालक, मैणा, मैथा, हिरनखुरी, कंडाई, कृष्णनील, प्याजी, चटरी और मटरी जैसे खरपतवार पर भी आते हैं। यह गेहूं के पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसे में गेहूं को इनसे बचाने के लिए किसान कारफेन्ट्राजोन दवा का छिड़काव करें।“

पीला रतुआ रोग हो तो यह दवा करें इस्तेमाल

गेहूं के पौधों में सिंचाई के समय का विशेष ध्यान रखना होता है। अगर सिंचाई के समय में किसान देरी या जल्दी कर देते हैं तो इससे गेहूं की उत्पादकता पर प्रभाव पड्ताक है। गेहूं फसलों के जानकार और कृषि वैज्ञानिक डॉ. अंकित झा बताते हैं,

“गेहूं के बुवाई के 60 से 65 दिन बाद पौधों में गांठे बनना शुरू होती है। इस समय गेहूं में तीसरी सिंचाई करनी चाहिए। पीला रतुआ रोग की भी इसी समय संभावना रहती है। ऐसे में इस समय गेहूं की फसल की विशेष निगरानी की जरुरत पड़ती है। अगर यह रोग किसी पौधे में दिखे तो प्रोपिकोनेजोल नामक दवा को लाकर छिड़काव करें।“

बुवाई कम होना खतरे की घंटी

रबी सीजन में इस बार पिछले साल के मुकाबले कम बुवाई होना कृषि विभाग के लिए खतरे की घंटी है। विभिन्न राज्यों से रबी सीजन की विभिन्न फसलों की बुवाई के जो आंकड़े अभी तक मिले हैं, उसके मुताबिक 586.37 लाख हेक्टेयर भूमि पर रबी की बुवाई की गई, जबकि पिछले वर्ष 2017 में इसी अवधि तक 587.62 लाख हेक्टे यर भूमि पर बुवाई की गई थी।

बंपर फसल के लिए ऐसे करें बेड विधि से चने की खेती

रबी फसलों का सीजन चल रहा है। इस सीजन में चने की बुवाई की जाती है। और आज हम आपको चने की खेती करने की एक ऐसी विधि के बारे में बताने जा रहे हैं जिससे न सिर्फ किसानों की लागत कम होगी बल्कि उसके साथ ही उत्पादन भी बढ़ेगा। मैं बात कर रहा हूं बेड विधि से चने की खेती के बारे में। मध्य प्रदेश के बुत से किसान इस विधि से खेती कर रहे हैं।

चना रबी ऋतु ने उगायी जाने वाली महत्वपूर्ण दलहन फसल है। विश्व के कुल चना उत्पादन का 70 प्रतिशत भारत में होता है। देश में कुल उगायी जाने वाली दलहन फसलों का उत्पादन लगभग 17.00 मिलियन टन प्रति वर्ष होता है। चने का उत्पादन कुल दलहन फसलों के उत्पादन का लगभग 45 प्रतिशत होता है।

मध्य प्रदेश के हरदा जिले के खिरकिया गाँव के किसान आशीष वर्मा ने बताया, ”बेड़ विधि से चने की खेती करने से कई तरह के फायदे होते हैं। बेड पर बोया गया चना नर्म जमीन पर रहता है जिससे पौधे का विकास अच्छे से होता है।

” उन्होंने बताया, ”इस विधि से खेती करने से अगर बारिश हो भी जाती है तो कोई नुकसान नहीं होता है। इसके साथ ही सिंचाई करने के लिए कम पानी की ज़रूरत पड़ती है। खरपतवार भी कम होता है।” चने की बुवाई अक्टूबर से नवंबर महीने में की जाती है, लेकिन चने की बिटकी किस्म की बुवाई अभी भी की जा सकती है।

देश में चने का सबसे अधिक उत्पादन मध्य प्रदेश में होता है। जो कुल चना उत्पादन का 25.3 प्रतिशत पैदा करता है।

”साधारण तरीके से चने की खेती करने से एक एकड़ में जहां 10 से 12 कुंतल उत्पादन होता है तो वहीं बेड़ विधि से खेती करने से प्रति एकड़ उत्पादन 14 से 16 कुंतल होता है,” आशीष ने बताया, ”बेड विधि से खेती करने के लिए सबसे पहले कल्टीवेटर की सहायता से खेत की जुताई करें फिर उसके बाद पाटा लगाकर खेत को बराबर कर दे।

इसके बाद पलेवा कर दें और फिर जब खेत बुवाई करने के लायक हो जाए तो चने की बुवाई कर दें।” आशीष 30 एकड़ जमीन पर खेती करते हैं, जिसमें से 7 एकड़ पर चने की खेती करते हैं। उन्होंने बताया कि बेड विधि से बुवाई करने से खरपतवार कम होता हैं और निराई गुड़ाई की जरूरत कम होती है।

सिर्फ दो सिंचाई में ही तैयार हो जाएगा यह गेहूं, एक हेक्टेयर में देगा 45 क्विंटल उत्पादन

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) इंदौर ने गेहूं की नई वैरायटी ईजाद की है। इसे प्रमाणित करने के लिए सेंट्रल वैरायटी रिलीज कमेटी (सीवीआरसी) में जमा किया गया है। खासियत यह है कि यह दो सिंचाई में पककर तैयार हो जाएगी। गेरुआ और करनाल बंट रोग कभी नहीं आएगा।दूसरा इसमें बीटा कैरोटीन, आयरन, जिंक व प्रोटीन भरपूर मात्रा में है, जो एनिमिया से बचाने के साथ मनुष्यों में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं।

गेहूं में मुख्य रूप से पीला रतुआ, गेरूआ रोग और काला कंडुआ (खुली कांगियारी) रोग होता है। यह रोग फफूंद के रूप में फैलता है। तापमान में वृद्धि के साथ-साथ गेहूं को पीला रतुआ रोग लग जाता है।यह खासकर पहाड़ी क्षेत्रों में फैलता है, लेकिन रोकथाम के अभाव में यह मैदानी क्षेत्रों में फैल जाता है। उपज प्रभावित होती है, इससे किसानों को नुकसान होने की आशंका बढ़ जाती है।

यह रोग कृषि वैज्ञानिकों के लिए चुनौती बन गई है, इससे निपटने के लिए कृषि महाविद्यालय जबलपुर ने गेहूं की ऐसी प्रजाति विकसित की है जो 105 दिन में पककर तैयार हो जाएगी।

आईएआरआई के प्रधान वैज्ञानिक एसवी सांई प्रसाद ने बताया कि इसमें बीटा कैरोटीन, आयरन 48.7 पाट्स पर मिलियन (पीपीपी), जिंक 43.7 पीपीपी व प्रोटीन अधिक मात्रा में है। ये तत्व मानव शरीर के लिए बहुत लाभदायक हैं। बीटा कैरोटीन सन बर्न कम करने और त्वचा को स्वस्थ रखने के लिए लाभदायक है।

इस गेहूं में गेरुआ व करनाल बंट रोग की आशंका भी कम रहती है।आईएआरआई ने वाराणसी वर्कशॉप में एचआई 8777 वैरायटी आइडेंटिफाइड की थी। इसे पूसा बीट 8777 नाम दिया गया। इसे आईएआरआई ने सीवीआरसी को भेजा है। अन्य गेहूं की अपेक्षा यह किस्म चमकदार और आकर्षक है।

वैज्ञानिक एके सिंह ने बताया पूसा 8777 समुद्र तटीय क्षेत्रों जैसे कर्नाटक व महाराष्ट्र में भी अच्छी पैदावार देगी। वहीं मध्यप्रदेश के ऐसे किसान जिनके पास पानी की कमी है वे एक या दो बार की सिंचाई में 40 से 45 क्विंटल पैदावार ले सकते हैं। इस फसल को 105 दिन में काटा जा सकता है।

जेडब्लू (एमपी) 3288 : ये किस्म वर्षा आधारित या सीमित सिंचाई में खेती के लिए उपयुक्त है। दाने बड़े होते है। पौधा झुकता नहीं है तथा इसके दाने छिंटकते नहीं है। कई कल्ले देती है। गेरूआ रोग के प्रतिरोधी तथा 2 सिंचाई मे उपज 45-47 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन होता है।

जेडब्लू (एमपी) 3173 : आंशिक सिंचाई मे खेती करने योग्य है। गर्मी के प्रति सहनशील, गेरूआ रोग के प्रतिरोधी, मोटे दानों वाली है। एक-दो सिंचाई में 45-47 क्विंटल उत्पादन होता है। सूखे तथा गेरुआ रोग के प्रति रोधी, चपाटी बनाने के लिए उत्तम है।

जेडब्लू (एमपी) 3211 : सूखे तथा गेरूआ रोग के प्रतिरोधी, चपाती बनाने के लिए उत्तम, एक-दो सिंचाई में पक जाती है। 40-45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन होता है।

नर्मदा 4: यह पिसी सरबती किस्म, काला और भूरा गेरूआ निरोधक है। यह असिंचित एवं सीमित सिंचाई क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। इसके पकने का समय 125 दिन हैं। पैदावार 12-19 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। दाना सरबती चमकदार होता है। यह चपाती बनाने के लिए विशेष उपयुक्त है।

एनपी-404 : यह काला और भूरा गेरूआ निरोधक कठिया किस्म असिंचित दशा के लिए उपयुक्त है। यह 135 दिन मे पककर तैयार होती है। पैदावार 10 से 11 क्विंटल प्रति हेक्टयर होती है। दाना बड़ा, कड़ा और सरबती रंग का होता है।

मेघदूत : यह काला और भूरा गेरूआ निरोधक कठिया जाति असिंचित अवस्था के लिए उपयुक्त है। पकने का समय 135 दिन है। पैदावार 11 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। इसका दाना एनपी 404 से कड़ा होता है। हाइब्रिड 65: यह पिसिया किस्म है, जो भूरा गेरूआ निरोधक है। यह 130 दिन में पकती है। इसकी पैदावार असिंचित अवस्था में 13 से 19.क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। इसका दाना, सरबती, चमकदार, 1000 बीज का भार 42 ग्राम होता है।

मुक्ता: यह पिसिया किस्म है जो भूरा गेरूआ निरोधक है। असिंचित अवस्था के लिये उपयुक्त है। यह 130 दिन में पकती है। इसकी पैदावार 13-15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। इसका दाना सरबती लम्बा और चमकदार होता है।

गेहूं की उन्नत किस्मों की विशेषताएं

ऐसे फैलता है ये रोग

पीला रतुआ, गेरूआ रोग और काला कंडुआ (खुली कांगियारी) गेहूं की फसल में फंफूद के रूप में फैलता है। रोग के प्रकोप से गेहूं की पत्तियों पर छोटे-छोटे अंडाकार फफोलो बन जाते हैं। ये पत्तियों की शिराओं के साथ रेखा सी बनाते हैं। रोगी पत्तियां पीली पड़कर सूख जाती हैं।

यह गेहूं लोगों के लिए भी फायदेमंद

बीटा कैरोटीन एक एंटी ऑक्सीडेंट और इम्यून सिस्टम बूस्टर के रूप में काम करता है। यह शरीर को नुकसान पहुंचाने वाले मुक्त कणों (फ्री रेडिकल्स) से रक्षा करता है और इम्यून सिस्टम (रोग प्रतिरोधक क्षमता) को मजबूत बनाता है। यह विटामिन-ए का अच्छा स्रोत है, जो त्वचा में सूर्य से होने वाले नुकसान को कम करता है। वहीं आयरन की कमी को दूर कर नवजात, किशोरों व गर्भवतियों में होने वाली खून की कमी को दूर करता है।.

“गेहू को लम्बे समय तक परम्परागत तरीके से सुरक्षित कैसे रखे, जानिए”

मित्रों अभी गेंहू की फसल खेतो में तैयार हो गयी है। यदि हमें इसे लंबे समय तक भंडारण कर के सुरक्षित रखना हे तो कुछ परम्परागत और घरेलू तरीके बताने जा रहा हूँ।
ताकि गेहू को लंबे तरीके तक सुरक्षित रह सके।

गेहू के ख़राब होने के कारण:-

  • कच्ची गेहू की बालियों को का काटना
  • कवक का लगना
  • किट भृग और पतंग आटा घुन
  • चूहे के द्वारा

दोस्तों सबसे पहले जब भी हम खेत में फसल से गेहू को निकाले तब सबसे कोशिश करे की पूर्ण रूप से सूखे हो ।
यहाँ पर एक और परम्परागत बात बताना चाहुगा जो मुझे मेरे परिवार के बुर्जगो ने बतायी है की कभी भी रस के दिनों में गेहू कटाई ना करें और ना ही भंडारण करें
रस के दिनों का मतलब होता है। माह में जो तिथियाँ होती है जैसे ग्यारस,तेरस,चोहदस आदि जिनके पीछे रस लगा हो ।
इन दिनों को छोड़कर कटाई और भण्डारण करने पर गेहू को लंबे समय तक सुरक्षित रहता है ये मैने खुद भी प्रयोग कर के देखा है।
अब हम जानेंगे कैसे गेहू को परम्परागत तरीकों से ज्यादा समय तक सुरक्षित रखे।

 धुप में सुखा कर:-

  • यह एक बहुत सरल और अच्छी विधि हे। इसमे गेहू को धुप में फैला कर अच्छे से 1और 2 दिन तक सुखा लेने से कीटो में होने वाली प्रजनन क्रिया रुक जाती है। यदि आप अप्रैल मई में तेज़ धूप में सुखाते है तो और ज्यदा लाभ मिलता है।

 नीम की पत्तियों से :-

  • नीम में बहुत ही औषोधीय गुण होते है। नीम की पत्तियो को छाव में सुखाकर उन्हें गेहू के साथ मिलाकर अनाज की पेंटी में रख देते हे तो काफी समय तक वो कीटो और कवक से गेहू को सुरक्षित रखता है।
  • ज्यदातर ग्रामीण इसी विधि का उपयोग करते है।

पैक ढांचे की सफाई और कीटाणु नष्ट कर के:-

अधिकतर खाने के लिए गेहू को बंद पेटी या घर में बनी दी वालों की पेटी में रखा जाता है। जब भी आप उसमे अनाज भरे पहले उसे अच्छे से साफ कर ले पुराने अनाज के दाने निकाल ले उसे कुछ दिन ख़ाली रखे ताकि नमी नष्ट हो जाये फिर उसमे नीम के तेल का दिया लगा कर पैक कर दे ताकि उसमे सारे कीटाणु नष्ट हो जाये उसके बाद उस दिए को निकाल ले फिर भंडारण करे।

माचिस की डिब्बियों का उपयोग:-

अनाज की पेंटी के मध्य और ऊपरी सतह पर 5 या 7 माचिस की डिब्बिया रख दी जाती हे । जिससे माचिस की तिल्लीयो में फास्फोरस लगा होने से कीटो की व्रद्धि रुक जाती हे यह उपयोग खाने वाले गेहू के लिए सीमित मात्रा में ही करना चाहिए ।

 लहसुन के द्वारा :-

लहसुन की तीव्र गन्ध से कीड़े अनाज के पास नही आ पाते हे आप लसुन के गुच्छओ को सतह पर रख सकते है।

 हल्दी मिला कर:-

  • गेहू में हल्दी मिला कर भी लंबे समय तक उसे सुरक्षित रख सकते हे उसके लिए 100किलो गेहू में 2 से  किलो तक हल्दी काफी होती हे ।और खाने के हिसाब से भी सुरक्षित होती हे।
  • ये सारी विधिया गेहू को खाने के लिए इस्तेमाल करने के लिए पारम्परिक तरीके है । ताकि किसी भी प्रकार का नुक्सान ना हो ।

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देश में पहली बार उगेगा काला गेहूं ,दुगनी कीमत पर बिकेगा बाजार में

सात साल की रिसर्च के बाद नेशनल एग्री फूड बायोटेक्नोलाॅजी इंस्टीट्यूट (एनएबीआई) मोहाली ने ब्लैक व्हीट का पेटेंट करा लिया है। नाम दिया है ‘नाबी एमजी)। काले, नीले और जामुनी रंग में मिलने वाली ये गेहूं आम गेहूं से कहीं ज्यादा पौष्टिक है।

ये कैंसर, डायबिटीज, तनाव, मोटापा और दिल की बीमारियों की रोकथाम में मददगार साबित होगी। रोजाना खा सकते हैं। देश में पहली दफा ये पंजाब में उगाई जाएगी। हालांकि ट्रायल के तौर पर किसानों के जरिए इसका 850 क्विंटल उत्पादन किया जा चुका है। किसानों को भी इसका आम गेहूं के मुकाबिले दोगुना दाम मिलेगा। मोहाली में 2010 से चल रही रिसर्च साइंटिस्ट डाॅ. मोनिका गर्ग के नेतृत्व में की गई है।

शरीर से फ्री रेडिकल्स बाहर करता है

ब्लैक व्हीट में एंथोसाइनिन नामक पिग्मेंट आम गेहूं से काफी ज्यादा होता है। आम गेहूं में जहां एंथोसाइनिन की मात्रा 5 से 15 पास प्रति मिलियन (पीपीएम) होती है, वहीं ब्लैक व्हीट में 40 से 140 पीपीएम पाई जाती है। एंथोसाइनिन ब्लू बेरी जैसे फलों की तरह सेहत लाभ प्रदान करता है। एंथोसाइनिन एक एंटीआॅक्सीडेंट का भी काम करता है। यह शरीर से फ्री रेडिकल्स निकालकर हार्ट, कैंसर, डायबिटीज, मोटापा और अन्य बीमारियों की रोकथाम करता है। इसमें जिंक की मात्रा भी अधिक है।

कंपनियों से होगा करार

एनएबीआई ने ब्लैक व्हीट की मार्केटिंग के लिए बैंकिंग और मिलंग समेत कई बड़ी कंपनियों से करार करने की कार्रवाई शुरू कर दी है। डॉ. मोनिका गर्ग ने बताया, इसे उगाने के इच्छुक किसानों के लिए एनएबीआई जल्द ही वेबसाइट लांच करेगी। इस वेबसाइट पर किसान अप्लाई कर सकेंगे, जिन्हें बीज व अन्य सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी। किसानों की फसल भी एनएबीआई ही खरीदेगी।

ट्रायल पर 850 क्विंटल उगाई, किसानों को मिलेगा दोगुना रेट

टल उगाई, किसानों को मिलेगा दोगुना रेटएनएबीआई ने इसका उत्पादन गर्मी और सर्दी दोनों मौसम में किया है। सर्दी में यह फसल मोहाली के खेतों में उगाई गई, जबकि गर्मी में हिमाचल और केलोंग लाहौल स्पिति में। साइंटिस्ट डाॅ. मोनिका गर्ग ने बताया, इस साल विभिन्न किसानों के खेतों में 850 क्विंटल ब्लैक व्हीट उगाई है।

इसकी औसत उपज प्रति एकड़ 13 से 17 क्विंटल रही। सामान्य गेहूं की औसत उपज पंजाब में प्रति एकड़ करीब 18 से 20 क्विंटल है। किसानों को आम गेहूं मंडियों में बेचने पर न्यूनतम समर्थन मूल्य करीब 1625 रुपए प्रति क्विंटल मिलता है। जबकि ब्लैक व्हीट का रेट 3250 रुपए दिया गया है।

दोगुनी कमाई करने के लिए ऐसे करें मिर्च की उन्नत खेती

मिर्च भारत के अनेक राज्यों में पहाड़ी व मैदानी क्षेत्रों में फल के लिए उगायी जाती है।  मिर्चों में तीखापन या तेज़ी ओलियोरेजिल कैप्सिसिन नामक एक उड़नशील एल्केलॉइड के कारण तथा उग्रता कैप्साइसिन नामक एक रवेदार उग्र पदार्थ के कारण होती है।  भारत में मिर्च का प्रयोग हरी मिर्च की तरह एवं मसाले के रूप में किया जाता है।  इसे सब्जियों और चटनियों में डाला जाता है।

मिर्च के सुखाए हुए फलों में 0.16 से 0.39 प्रतिशत तक था सूखे बीजों में 26.1 प्रतिशत तेल पाया जाता है।  बाजार में आमतौर पर मिलने वाली मिर्चो में कैप्सीसिन की केवल 0.1 प्रतिशत मात्रा पायी जाती है।  मिर्च में अनेक औषधीय गुण भी होते हैं।  एक एस्कार्बिक अम्ल, विटामिन-सी की धनी होती है।

दोगुनी कमाई

हरी मिर्च की खेती से किसान लागत की तुलना में दोगुनी कमाई कर सकते हैं। शर्त यह है कि वे कृषि जलवायु क्षेत्र के अनुसार उन्नत प्रजातियों का प्रयोग करने के साथ ही फसल सुरक्षा के उचित उपाय करें।

फैजाबाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय से संबद्ध कृषि विज्ञान केंद्र बेलीपार के सब्जी वैज्ञानिक डा.एसपी सिंह के अनुसार प्रति एकड़ खेती की लागत करीब 35-40 हजार रुपये आती है। इतने रकबे में करीब 60 क्विंटल तक उपज संभव है। बाजार में यह 20 रुपये प्रति किग्रा के भाव से भी बिके, तो भी किसान को करीब एक लाख 20 हजार रुपये मिलेंगे। 40 हजार की लागत निकालने के बाद भी करीब दो गुने का लाभ होगा

जलवायु

मिर्च गर्म और आर्द्र जलवायु में भली-भाँति उगती है।  लेकिन फलों के पकते समय शुष्क मौसम का होना आवश्यक है।  गर्म मौसम की फ़सल होने के कारण इसे उस समय तक नहीं उगाया जा सकता, जब तक कि मिट्टी का तापमान बढ़ न गया हो और पाले का प्रकोप टल न गया हो।  बीजों का अच्छा अंकुरण 18-30 डि सें. ग्रे. तापामन पर होता है।

यदि फूलते समय और फल बनते समय भूमि में नमी की कमी हो जाती है, तो फलियाँ, फल व छोटे फल गिरने लगते हैं।  मिर्च के फूल व फल आने के लिए सबसे उपयुक्त तापमान 25-30 डि सें. ग्रे. है. तेज़  मिर्च अपेक्षाकृत अधिक गर्मी सह लेती है।  फूलते समय ओस गिरना या तेज़  वर्षा होना फ़सल के लिए नुकसानदाई होता है।  क्योंकि इसके कारण फूल व छोटे फल टूट कर गिर जाते हैं |

क़िस्में

पूसा ज्वाला : इसके पौधे छोटे आकार के और पत्तियॉ चौड़ी होती हैं।  फल 9-10 सें०मी० लम्बे ,पतले, हल्के हरे रंग के होते हैं जो पकने पर हल्के लाल हो जाते हैं।  इसकी औसम उपज 75-80 क्विंटल  प्रति  हेक्टेअर , हरी मिर्च के लिए तथा 18-20 क्विंटल  प्रति  हेक्टेअर सूखी मिर्च के लिए होती है।

पूसा सदाबाहर : इस क़िस्म के पौधे सीधे व लम्बे ; 60 – 80 सें०मी० होते हैं।  फल 6-8 सें मी. लम्बे, गुच्छों में , 6-14 फल  प्रति  गुच्छा में आते हैं तथा सीधे ऊपर की ओर लगते हैं पके हुए फल चमकदार लाल रंग ले लेते है।  औसत पैदावार 90-100 क्विंटल, हरी मिर्च के लिए तथा 20 क्विंटल प्रति  हेक्टेअर , सूखी मिर्च के लिए होती है।  यह क़िस्म मरोडिया, लीफ कर्लद्ध और मौजेक रोगों के लिए प्रतिरोधी है।

नर्सरी प्रबन्ध

नर्सरी बैंगन व टमाटर की तरह ही तैयारी की जाती है नर्सरी के लिए मिट्टी हल्की , भुरभुरी व पानी को जल्दी सोखने वाली होनी चाहिए।  पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्वों का होना भी जरूरी है।  नर्सरी में पर्याप्त मात्रा में धूप का आना भी जरूरी है।  नर्सरी को पाले से बचाने के लिए , नवम्बर-दिसम्बर बुआई में पानी का अच्छा प्रबन्ध होना चाहिए ।  नर्सरी की लम्बाई 10-15 फुट तथा चौड़ाई 2.3-3 फुट से अधिक नहीं होनी चाहिए क्योंकि निराई व अन्य कार्ये में कठिनाई आती है।  नर्सरी की उंचाई 6 इंच या आधा फीट रखनी चाहिए।  बीज की बुआई कतारों में करें।  कतारों का फासला 5-7 सें०मी० रखा जाता है।  पौध लगभग 6 सप्ताह में तैयार हो जाती है।

मृदा एवं खेती की तैयारी

मिर्च यद्यपि अनेक प्रकार की मिट्टियों में उगाई जा सकती है, तो भी अच्छी जल निकास व्यवस्था वाली कार्बनिक तत्वों से युक्त दुमट मिट्टियाँ इसके लिए सर्वेतम होती हैं। जहाँ फ़सल काल छोटा है, वहां बलुई तथा बलुई दोमट मिट्टयों को प्राथमिकता दी जाती है।  बरसाती फ़सल भारी तथा अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी में बोई जानी चाहिए।

जमीन पांच-छः बार जोत कर व पाटा फेर कर समतल कर ली जाती है।  गोबर की सड़ी हुई खाद 300-400 क्विंटल, जुताई के समय मिला देनी चाहिए।  खेती की ऊपरी मिट्टी को महीन और समतल कर लिया जाना चाहिए तथा उचित आकार की क्यारियां बना लेते हैं।

बीज-दर

एक से डेढ़ किलोग्राम अच्छी मिर्च का बीज लगभग एक हेक्टेअर में रोपने लायक पर्याप्त पौध बनाने के लिए काफ़ी होता है।

निराई-गुड़ाई

पौधों की वृद्धि की आरम्भिक अवस्था में खरपतवारो पर नियंत्रण पाने के लिए दो तीन बाद निराई करना आवश्य होता है।  पौध रोपण के दो या तीन सप्ताह बाद मिट्टी चढाई जा सकती है।

सिंचाई

पहली सिंचाई पौध प्रतिरोपण के तुरन्त बाद की जाती है।  बाद में गर्म मौसम में हर पाँच-सात दिन तथा सर्दी में 10-12 दिनों के अन्तर पर फ़सल को सींचा जाता है।

बुआई

मैदानी और पहाड़ी ,दोनो ही इलाकों में मिर्च बोने के लिए सर्वोतम समय अप्रैल-जून तक का होता है।  बडे फलों वाली क़िस्में मैदानी में अगस्त से सितम्बर तक या उससे पूर्व जून-जुलाई में भी बोई जा सकती है।  पहाडों में इसे अप्रैल से मई के अन्त तक बोया जा सकता है।

उत्तर भारत में जहां सिंचाई की सुविधाएं उपलब्ध हैं, मिर्च का बीज मानसून आने से लगभग 6 सप्ताह पूर्व बोया जता है और मानसून आने के साथ-साथ इसकी पौध खेतों में प्रतिरोपित कर दी जाती है।  इसके अलावा दूसरी फ़सल के लिए बुआई जाता नवम्बर-दिसम्बर में की जाती है और फ़सल मार्च से मई तक ली जाती है।

खाद एवं उर्वरक

गोबर की सड़ी हुई खाद लगभग 300-400 क्विंटल जुताई के समय गोबर मृदा में मिला देना चाहिए रोपाई से पहले 150 किलोग्राम यूरिया ,175 किलोग्राम सिंगल सुपर फ़ॉस्फ़ेट तथा 100 किलोग्राम म्यूरिएट ऑफ पोटाश तथा 150 किलोग्राम यूरिया बाद में लगाने की सिफारिश की जाती है।  यूरिया उर्वरक फूल आने से पहले अवश्य दे देना चाहिए।

पौध संरक्षण

आर्द्रगलन रोग  यह रोग ज्यादातर नर्सरी की पौध में आता है।  इस रोग में सतह , ज़मीन के पास द्धसे हुआ तना गलने लगता है तथा पौध मर जाती है।  इस रोग से बचाने के लिए बुआई से पहले बीज का उपचार फफंदूनाशक दवा कैप्टान 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से करना चाहिए।  इसके अलावा कैप्टान 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर सप्ताह में एक बार नर्सरी में छिड़काव किया जाना चाहिए।

एन्थ्रेक्नोज रोग  इस रोग में पत्तियों और फलों में विशेष आकार के गहरे, भूरे और काले रंग के घब्बे पड़ते है।  इसके प्रभाव से पैदावार बहुत घट जाती है इसके बचाव के लिए वीर एम-45 या बाविस्टन नामक दवा 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव  करना चाहिए।

मरोडिया लीफ कर्ल रोग  यह मिर्च की एक भंयकर बीमारी है।  यह रोग बरसात की फ़सल में ज्यादातर आता है।  शुरू में पत्ते मुरझा जाते है।  एवं वृद्धि रुक जाती है।  अगर इसके समय रहते नहीं नियंत्रण किया गया हो तो ये पैदावार को भारी नकुसान पहुँचाता है।  यह एक विषाणु रोग है जिसका कोई दवा द्धारा नित्रंयण नहीं किया जा सकता है।

यह रोग विषाणु, सफेद मक्खी से फैलता है।  अतः इसका नियंत्रण भी सफेद मक्खी से छुटकारा पा कर ही किया जा सकता है।  इसके नियंत्रण के लिए रोगयुक्त पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर दें तथा 15 दिन के अतंराल में कीटनाशक रोगर या मैटासिस्टाक्स 2 मि०ली० प्रति ली की दर से छिड़काव करें।  इस रोग की प्रतिरोधी क़िस्में जैसे-पूसा ज्वाला, पूसा सदाबाहर और पन्त सी-1 को लगाना चाहिए।

मौजेक रोग  इस रोग में हल्के पीले रंग के घब्बे पत्तों पर पड़ जाते है।  बाद में पत्तियाँ पूरी तरह से पीली पड़ जाती है।  तथा वृद्धि रुक जाती है।  यह भी एक विषाणु रोग है जिसका नियंत्रण मरोडिया रोग की तरह ही है।

थ्रिप्स एवं एफिड  ये कीट पत्तियों से रस चूसते है और उपज के लिए हानिकारक होते है।  रोगर या मैटासिस्टाक्स 2 मि. ली.  प्रति ली. पानी में घोल बनाकर छिड़काव करने से इनका नियंत्रण किया जा सकता है।

उपज

सिंचित क्षेत्रों में हरी मिर्च की औसत पैदावार लगभग 80-90 क्विंटल प्रति  हेक्टेअर और सूखें फल की उपज 18-20 क्विंटल प्रति  हेक्टेअर होती है।

अच्छी आमदनी के लिए नवंबर में ऐसे करें अजवाइन की उन्नत खेती

यह धनिया कुल (आबेलीफेरा) की एक महत्वपूर्ण मसाला फसल है। इसका वानस्पतिक नाम टेकिस्पर्मम एम्मी है तथा अंग्रेजी में यह बिशप्स वीड के नाम से जाना जाता है। अजवाइन के पौधे के प्रत्येक भाग को औषधी के रूप में काम में लाया जाता हैं।

अजवाइन पेट के वायुविकार, पेचिस, बदहजमी, हैजा, कफ, ऐंठन जैसी समस्याओं और सर्दी जुखाम आदि के लिए काम में लिया जाता हैं, तथा गले में खराबी, आवाज फटने, कान दर्द, चर्म रोग, दमा आदि रोगों की औषधी बनाने के काम में लिया जाता हैं।

जलवायु

उत्तरी अमेरिका, मिस्त्र ईरान, अफगानिस्तान तथा भारत में महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, मध्य्प्रदेश, उत्तरप्रदेश, पंजाब, तमिलनाडु, बिहार, आंध्रप्रदेश तथा राजस्थान के कुछ हिसों में अजवाइन की व्यावसायिक खेती की जाती हैं। अजवाइन की बुवाई के समय मौसम शुष्क होना चाहिए। अत्यधिक गर्म एवं ठंडा मौसम इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं होता हैं। अजवाइन पाले को कुछ स्तर तक सहन कर सकती हैं।

अजवाइन की उन्नत खेती

राजस्थान राज्य में इसकी खेती 15483 हेक्टेयर क्षेत्र में की जाती हैं जिससे 5450 टन उत्पादन एवं 352 की.ग्रा. प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती हैं (वर्ष 2009-10 के अनुसार)। इसकी खेती मुख्यतः चित्तौडगढ, उदयपुर, झालावाड़, राजसमंद, भीलवाड़ा एवं कोटा में की जाती हैं।

अजवाइन कम लागत की मसाला फसल हैं तथा इसका उत्पादन बढ़ाने के लिए यदि उन्नत तकनीकी से खेती की जाये तो इसके उत्पादन एवं गुणवत्ता दोनों में वृद्धि की जा सकती हैं। इसके लिए ध्यान देने योग्य बिंदुओं का विवरण इस प्रकार से हैं:-

उन्नत किस्में

  • लाम सलेक्शन-1 – 135 से 145 दिन में पक कर तैयार होने वाली इस किस्म की औसत उपज 8-9 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती हैं।
  • लाम सलेक्शन-2 -इसके पौधे झाड़ीदार होते हैं इसकी औसत उपज 10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती हैं।
  • आर.ए. 1-80 -यह किस्म 170-180 दिन में पककर तैयार हो जाती हैं। दाने बारीक़ परन्तु अधिक सुगंधित होते हैं इसमें 10-11 क्विंटल/हेक्टेयर तक उपज प्राप्त होती हैं। इस किस्म पर सफेद चूर्णिल आसिता रोग का प्रकोप अधिक रहता हैं।

भूमि

अजवाइन एक रबी की मसाला फसल हैं। इसकी खेती के लिए अच्छे जल निकास वाली दोमट मिटटी सर्वोत्तम होती हैं। सामान्यतः बलुई दोमट मिटटी जिसका पि.एच. मान 6.5 से 8.2 तक है, में अजवाइन सफलतापूर्वक उगाई जा सकती हैं। जहां भूमि में नमी कम हो वहां सिंचाई की व्यवस्था आवश्यक हैं।

खेती की तैयारी

खेत तैयार करने के लिए मिटटी पलटने वाले हल से जुताई करें तथा इसके बाद 2 जुताई देशी हल से कर खेत को भली-भांति तैयार करें। अजवाइन का बीज बारीक़ होता हैं। अतः खेत की मिट्टी को अच्छी तरह भरभूरा होने तक जुताई करें।

खाद एवं उर्वरक

अजवाइन की भरपूर पैदावार लेने के लिए 15-20 दिन पूर्व 20-25 टन सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट प्रति हेक्टेयर की दर से अच्छी तरह मिलाए। उर्वरक के रूप में इस फसल को 20 किग्रा. नत्रजन, 30 किग्रा फास्फोरस एवं 20 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से देवें। फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा एवं नत्रजन की आधी मात्रा बुवाई से पूर्व खेत में डाल देवें। नत्रजन की शेष आधी मात्रा बुवाई के लगभग 25-30 दिन बाद खड़ी फसल में देवें।

बीज दर एवं बुवाई

अजवाइन की बुवाई का उचित समय सितम्बर से नवम्बर होता है। इसे छिड़काव या क़तर विधि से बोया जाता है। एक हेक्टेयर के लिए 4-5 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। छिड़काव विधि के लिए बीजों को इसकी बीज दर से आठ से दस गुना बारीक छनि हुई मिट्टी के साथ मिलाकर बुवाई करे इससे बीज दर सही रखने में मदद मिलती है। कतारों में बुवाई करना ज्यादा उपयुक्त है। इस विधि में कतार से कतार की दुरी 30-40 से.मी. तथा पौधे से पौधे की दुरी 15-25 से.मी. रखें। इसमें बीजों का अंकुरण 10-15 दिनों में पूर्ण होता है।

सिंचाई एवं निराई-गुड़ाई

अजवाइन की फसल काफी हद तक सूखा सहन कर सकती है। इसका सिंचित और असिंचित दोनों ही परीस्थितियों में उत्पादन किया जा सकता है। सामान्यतया अजवाइन के लिए 2-5 सिंचाई की आवश्यकता होती है। जब पौधे 15-20 से.मी. तक बड़े हो जाये तब पौधों की छंटाई करके पौधे से पौधे की दुरी में पर्याप्त अंतर रखें। फसल में जल निकासी की भी उचित व्यवस्था करे ताकि पौधों को उचित बढ़वार के लिए पर्याप्त स्थान एवं वातावरण मिल सके।

फसल कटाई एवं उपज

कटाई की उपयुक्त अवस्था में फसल पीली पड़ जाती है तथा दाने सुखकर भूरे रंग के हो जाते है। अजवाइन की फसल लगभग 140-150 दिन में पककर तैयार हो जाती है। कटाई पश्चात फसल को खलिहान में सुखावें तथा बाद में गहाई और औसाई की जाय। साफ बीजों को 5-6 दिन सूखा कर बोरों में भर कर भंडारण करे।

 

उपज

सामन्यतः एक हेक्टेयर में अजवाइन की उपज 10-12 क्विंटल तक की पैदावार प्राप्त होती है। अजवाइन बहुउपयोगी होने के साथ विदेशों में विक्रय कर विदेशी मुद्रा कमाने का अच्छा स्रोत है।अजवाइन का एक क्विंटल का भाव 10000 से 12000 होता है जिस से आप को एक हेक्टेयर से एक लाख से ज्यादा की आमदन हो जाती है ।

अगर किसान भाई अजवाइन की खेती संबंधित मुख्य बिंदुओं को ध्यान में रखकर खेती करें तो अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है। साथ ही वह कम लागत में अधिक मुनाफा प्राप्त कर सकते है।

मैदानी इलाकों में सर्दी में करें स्ट्रॉबेरी की खेती

अभी तक स्ट्रॉबेरी की खेती ठंडे प्रदेशों में की जाती थी, लेकिन हरियाणा के किसान इसके लिए अनुकूल भूमि और वातावरण न होते हुए भी स्ट्राबेरी की खेती कर रहे हैं। यही नहीं स्ट्राबेरी के साथ मिर्च की भी खेती सहफसल लेकर दोगुना फायदा हो रहा है।

हरियाणा के महेन्द्रगढ़ जिले के डिंगरोता गाँव के किसान अनिल बलोठिया (35 वर्ष) पिछले दो साल स्ट्राबेरी की खेती कर रहे हैं। दो साल पहले हिसार में उन्होंने स्ट्रॉबेरी की खेती के बारे में जानकारी मिली, उसके बाद इंटरनेट से सारी जानकारी इकट्ठा की।

वहां जाकर उन्होंने इसकी खेती शुरु कर दी। किसान अनिल बलोठिया बताते हैं, “दो साल पहले हिसार में एक किसान को स्ट्रॉबेरी की खेती करते देखा था, फिर वहीं से मैंने भी सोच लिया कि अपने गाँव में जाकर स्ट्राबेरी की खेती करूंगा। इंटरनेट की जानकारी लेने के बाद अपने गाँव में खेती शुरु कर दी है।”

महेन्द्रगढ़ के अलावा हिसार जिला धीरे-धीरे स्ट्रॉबेरी का हब बनता जा रहा है। यहां के कई गाँवों में स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे हैं। यहां के किसानों के लिए दूसरी फसलों के मुकाबले यह फायदे की फसल साबित हो रही है। खेती में ज्यादा मुनाफा देख दूसरे जिलों के किसान भी यहां पर जमीन ठेके पर लेकर स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे हैं।

अनिल स्ट्रॉबेरी के साथ ही मिर्च के पौधे भी लगा देते हैं। अनिल बताते हैं, “हम पहले स्ट्रॉबेरी के पौधे लगा देते हैं, जब पौधे पूरी तरह से तैयार हो जाते हैं तो उसी के साथ ही मिर्च के पौधे लगा देते हैं। स्ट्राबेरी आठ महीने की फसल होती है और मिर्च दस महीने की होती है।”

डेढ़ एकड़ स्ट्रॉबेरी की फसल में चार-पांच लाख की लागत आती है। पैदावार होने के बाद खर्च निकालकर सात-आठ लाख का फायदा हो जाता है। वहीं मिर्च से भी दो-तीन लाख की आमदनी हो जाती है। ऐसे में मिर्च और स्ट्राबेरी दोनों को बेचकर दस लाख तक आमदनी हो जाती है। स्ट्रॉबेरी की फसल खत्म होते होते मिर्च में फल लगने लगते हैं।

यहाँ बिकती है फसल

यहां से तैयार स्ट्रॉबेरी पैक करके दिल्ली भेज देते हैं, दिल्ली में इसकी बहुत बड़ी मार्किट है । इसका इस्तमाल टाफी ,कैंडी और बहुत सी खाने वाली चीजों में होता है । इसके इलवा साउथ इंडिया में भी इसकी मंडी है । अगर आप किसी बड़े शहर में रहते है तो खुद भी पैकेट बना कर सेल कर सकते है जिस से आप का मुनाफा कई गुना बढ़ जाता है ।अनिल बताते हैं, “स्ट्रॉबेरी पचास रुपए किलो से लेकर छह सौ रुपए किलो तक बिक जाती है। डेढ़ एकड़ में दो किलो वजन की पचास हजार ट्रे पैदा हो जाती है।”

डेढ़ एकड़ में 35 से 40 हजार पौधे लगते हैं, मिर्च में अलग से कोई खर्च नहीं लगता है। इसके पौधे हिमाचल से लाए जाते हैं, लेकिन अब अनिल नर्सरी यहीं पर तैयार करते हैं। किस्म के हिसाब से प्रति पौधा 10 रुपए से लेकर 30 रुपए तक के बीच पड़ते हैं। रोपाई का काम अक्टूबर-नवंबर में किया जाता है। जनवरी और फरवरी माह में यह तैयार होकर फल दे देती है।

कैसे होती है खेती

यह पौधा दोमट मिटटी में ही लगाया जा सकता है। पौध लगाने के बाद 20 दिन तक फव्वारा लगाया जाता है।रोपाई का काम अक्टूबर-नवंबर में किया जाता है। जनवरी और फरवरी माह में यह तैयार होकर फल दे देती है।

हिमाचल से आते हैं पौधे

इसके पौधे हिमाचल से लाए जाते हैं। वैरायटी के अनुसार प्रति पौधा 10 रुपए से लेकर 30 रुपए तक के बीच पड़ता है।स्ट्रॉबेरी में स्वीट चार्ली और विंटर डाउन कीमती वैरायटी में गिनी जाती है।जबकि काडलर, रानिया, मोखरा समेत कई वैरायटियां स्ट्रॉबेरी की होती हैं।

अच्छे मुनाफे के लिए इस समय और ऐसे करें टमाटर की खेती

ये मौसम टमाटर की फसल लगाने के लिए सही होता है, वैसे तो टमाटर की खेती साल भर की जाती है, लेकिन इस समय टमाटर की खेती कर किसान अच्छी आमदनी कमा सकते हैं।

कृषि विज्ञान केन्द्र अंबेडकरनगर के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ़ रवि प्रकाश मौर्या बताते हैं, “किसान समय से टमाटर की नर्सरी तैयार कर टमाटर की खेती कर सकता है, इस समय ट्रे में नर्सरी तैयार कर सकते हैं, इसमे जल्दी पौध तैयार होती है और पौधे समान्य तरीके से उगाए पौधों से ज्यादा रोग प्रतिरोधी भी होते हैं। इसलिए समय से खेत तैयार कर पौध लगा लें।”

टमाटर का पौधा ज्यादा ठण्ड और उच्च नमी को बर्दाश्त नहीं कर पाता है। विपरीत मौसम की वजह से इसकी खेती बुरी तरह प्रभावित होती है। बीज के विकास, अंकुरण, फूल आना और फल होने के लिए अलग-अलग मौसम की व्यापक विविधता चाहिए। 10 डिग्री सेंटीग्रेड से कम तापमान और 38 डिग्री सेंटीग्रेड से ज्यादा तापमान पौधे के विकास को धीमा कर देते हैं।

टमाटर पौध की तैयारी

पौध की तैयारी के लिए जीवांशयुक्त बलुवर दोमट मिट्टी की जरुरत होती है। स्वस्थ और मजबूत पौध तैयार करने के लिए 10 ग्राम डाई अमोनियम फास्फेट और 1.5-2.0 किग्रा. सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति वर्ग मीटर की दर से लगाना चाहिए। क्यारियों की लंबाई लगभग तीन मीटर, चौड़ाई लगभग एक औ भूमि की सतह से उचाई कम से कम 25-30 सेमी. रखना उचित होता होता है। इस प्रकार की ऊंची क्यारियों में बीज की बुवाई पंक्तियों में करना चाहिए, जिनकी आपसी दूरी पांच-छह सेमी. रखना चाहिए, जबकि पौध से पौध की दूरी दो-तीन सेमी. रखना चाहिए।

बुवाई के बाद क्यारियों को सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट से ढक दें। इसके बाद फुहारे से हल्की सिचाई करें। अब इन क्यारियों को घास-फूस या सरकंडे के आवरण से ढ़क दें। आवश्यकतानुसार हल्की सिंचाई करते रहें। बुवाई के 20-05 दिनों बाद पौध रोपाई योग्य तैयार हो जाती है।

टमाटर की किस्में

  • सामान्य किस्में: पूसा गौरव, पूसा शीतल, सालेनागोला, साले नबड़ा, वी.एल.टमाटर-1, आजाद टी-2, अर्का विकास, अर्का सौरभ,पंत टी -3
  • संकर किस्में: रुपाली, नवीन, अविनाश-2, पूसा हाइब्रिड-4, मनीशा, विशाली, पूसा हाइब्रिड-2, रक्षिता, डी.आर.एल-304, एन.एस. 852, अर्कारक्षक, अर्का सम्राट, अर्का अनन्या

बीज की मात्रा

  • सामान्य किस्में: 500 ग्राम प्रति हेक्टेयर

संकर किस्में: 200-250 ग्राम प्रति हेक्टेयर

टमाटर बीज का चयन

बीज उत्पादन के बाद खराब और टूटे बीज छांट लिया जाता है। बुवाई वाली बीज हर तरह से उत्तम किस्म की होनी चहिये| आकार में एक समान, मजबूत और जल्द अंकुरन वाली बीज को बुवाई के लिए चुना जाता है। विपरीत मौसम को भी सहनेवाली एफ-1 जेनरेशन वाली हाइब्रिड बीज जल्दी और अच्छी फसल देती है।

मिट्टी का चयन

खनिजीय मिट्टी और बलुई मिट्टी में टमाटर की खेती अच्छी होती है, लेकिन पौधों के लिए सबसे अच्छी बलुई मिट्टी होती है| अच्छी फसल के लिए मिट्टी की गहराई 15-20 सेमी होनी चाहिए।

टमाटर पौध की रोपाई

जब पौध में चा-छह पत्तियां आ जाए और ऊंचाई लगभग 20-25 सेमी. हो जाए तब पौध रोपाई के लिए तैयार समझना चाहिए। रोपाई के तीन-चा दिन पहले पौधशाला की सिंचाई बन्द कर देनी चाहिए। जाड़े के मौसम पौध को पाला से बचने के लिए क्यारियों को पालीथीन चादर की टनेल बनाकर ऊपर से ढक देना चाहिए।

उर्वरक देने की विधि

नत्रजन की आधी मात्रा तथा फासफोरस और पोटाश की पूरी मात्रा खेत की अंतिम जुताई के समय मिलानी चाहिए। गोबर की खाद की संपूर्ण मात्रा रोपाई से 15-20 दिन पहले ही मिलानी चाहिए। नत्रजन की शेष मात्रा सिंचित दशा में खरपतवार नियंत्रण के पश्चात रोपाई के 30-35 दिन बाद देनी चाहिए।