110 दिन में तैयार होगी गेहूं की यह प्रजाति

रबी सीजन की फसलों बुवाई हो रही है. ऐसे में गेहूं का उत्पादन करने वाले कई राज्य हैं, जिनसे गेहूं की पैदावार की एक बड़ी हिस्सेदारी इन राज्यों की है. उत्तर प्रदेश गेहूं उत्पादन में एक बड़ा राज्य है इस राज्य के किसान प्रकाश रघुवंशी ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है.

उन्होंने गेहूं की दो देशी किस्मों को विकसित किया है. यह खोज वाराणसी जिले के कुदरत कृषि शोध संस्थान के प्रकाश रघुवंशी ने की है. गेहूं की इस किस्म का नाम कुदरत 8 और कुदरत विश्वनाथ है. यह दोनों बौनी प्रजातियाँ हैं.

इन प्रजातियों की लम्बाई लगभग 90 सेंटीमीटर और इसकी बाली की लम्बाई लगभग 20 सेंटीमीटर होती है. गेहूं की यह प्रजाति 110 दिन में तैयार हो जाती है. इसकी पैदावार 25-30 कुंतल प्रति एकड़ निकलती है. इस प्रजाति का दाना भी मोटा और चमकदार होता है.

इसकी पैदावार और गुणवत्ता को देखते हुए कई राज्यों में इसकी मांग बढ़ी है . गेहूं की यह प्रजाति ओलावृष्टि जैसी समस्याओं को आसानी से झेल सकती है. अभी तक प्रकाश सिंह कृषि फसलों की 300 से अधिक प्रजातियाँ विकसित कर चुके हैं .

ज्यादा मुनाफे के लिए करें ब्रोकली की खेती

ब्रोकोली की खेती ठीक फूलगोभी की तरह की जाती है। इसके बीज व पौधे देखने में लगभग फूल गोभी की तरह ही होते हैं। लेकिन इसका रंग हरा होता है इसलिए इसे हरी गोभी भी कहते है उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में जाड़े के दिनों में इन सब्जियों की खेती बड़ी सुगमता पूर्वक की जा सकती है जबकि हिमाचल प्रदेश , उत्तरांचल और जम्मू कश्मीर में में इनके बीज भी बनाए जा सकते है।

सब्जियों की पैदावार में भारत चीन के बाद दूसरे नंबर पर है। लेकिन आज भी हमारी ज्यादातर सब्जियों की कम उत्पादकता व कमजोर गुणवत्ता की । आगे आने वाले समय में सब्जियों का उत्पादन व विदेशों में उन की सप्लाई दोनों ही बढ़ सकते हैं।

इस तरह की सब्जियों में ब्रोकली का नाम बहुत मशहूर है. इस की खेती पिछले कुछ सालों से धीरेधीरे बड़े शहरों के आसपास कुछ किसान करने लगे हैं। बड़े महानगरों में इस सब्जी की मांग भी अब बढ़ने लगी है ।पांच सितारा होटलों व पर्यटक स्थानों पर इस सब्जी की मांग बहुत है और जो किसान इस की खेती कर के इस को सही बाजार में बेचते हैं, उन को इस की खेती से बहुत ज्यादा फायदा मिलता है।

ब्रोकोली की बाज़ार मांग

पांच सितारा होटल तथा पर्यटक स्थानों पर इस सब्जी की मांग बहुत है तथाजो किसान इसकी खेती करके इसको सही बाजार में बेचते हैं उनको इसकी खेती से बहुत अधिक लाभ मिलता है क्योंकि इसके भाव कई बार 30 से 50 रुपये प्रति कि.ग्रा. तक या इससे भी उपर मिल जाते हैं। यहां ये बताना उचित रहेगा कि ब्रोकोली की खेती करने से पहले इसको बेचने का किसान जरूर प्रबंध कर लें क्योकि यह अभी महानगरों, बड़े होटल तथा पर्यटक स्थानों तक ही सीमित है। साधारण, मध्यम या छोटे बाजारों में अभी तक ब्रोकोली की मांग नहीं है।

कृषकों के लिए ब्रोक्कोली की खेती के फायदे

बाजार में ब्रोक्कोली की कीमत सामान्य गोभी से कहीं ज्यादा है. बड़े शहरों में बाजारों इसकी कीमत 100 रुपये से लेकर 250 रुपये प्रति किलो होती है. बिहार, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा और झारखण्ड जैसे कई प्रदेशों में इसकी आयात दिल्ली और पुने जैसे बड़े शहरों से होने के कारण इसकी कीमत और बढ़ जाती है. तो छोटे शहरों के किसानों के पास अच्छा अवसर है की वो अपने लोकल मार्केट में ही अच्छे दामों पर ये फसल बेच सकते हैं. मांग बढ़ने पर निर्यात कर के आमदनी और बढ़ाई जा सकती है.

ब्रोक्कोली की खेती से कितनी आमदनी बन सकती है

यदि आपके पास 1 एकर प्लाट (43500 स्क्वायर फ़ीट) का क्षेत्र उपलब्ध है तो आप तक़रीबन 125000 से 150000 रुपये तक की आमदनी 3-4 महीने में हो सकती है.

ब्रोकोली के पौधे = 6000 कम से कम
पौधों का नुकसान = 1000 पौधे
स्वस्थ पौधे = 5000

मार्केट रेट के हिसाब से आप हर पौधे (या फूल) को 75 से 150 रुपये तक में बेच सकते हैं, क्यों कि हर पौधे का वजन 500 ग्राम से 1 किलो तक का होगा. मैं इस गणना के लिए 75 रुपये प्रति पीस भी मानू तो,

आमदनी = 5000 x 75 = 375000 रुपए
आपके खर्चे = 1 लाख से लेकर डेढ़ लाख तक (सिंचाई, बीज, कीटनाशक दवाइयाँ, ट्रांसपोर्टेशन, इत्यादि)
आपका कुल मुनाफा = 125000 से 175000 रुपये तक (केवल 3-4 महीने में)

लगाने का समय

उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में ब्रोकोली उगाने का उपयुक्त समय ठण्ड का मौसम होता है इसके बीज के अंकुरण तथा पौधों को अच्छी वृद्धि के लिए तापमान 20 -25 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए इसकी नर्सरी तैयार करने का समय अक्टूम्बर का दूसरा पखवाडा होता है पर्वतीय क्षेत्रों में क़म उचाई वाले क्षेत्रों में सितम्बर- अक्टूम्बर , मध्यम उचाई वाले क्षेत्रों में अगस्त सितम्बर , और अधिक़ उचाई वाले क्षेत्रों में मार्च- अप्रैल में तैयार की जाती है ।

बीज दर

गोभी की भांति ब्रोकली के बीज बहुत छोटे होते है। एक हेक्टेअर की पौध तैयार करने के लिये लगभग 375 से 400 ग्राम बीज पर्याप्त होता है ।

नर्सरी तैयार करना

ब्रोकोली की पत्ता गोभी की तरह पहले नर्सरी तैयार करते है और बाद में रोपण किया जाता है कम संख्या में पौधे उगाने के लिए 3 फिट लम्बी और 1 फिट चौड़ी तथा जमीन की सतह से 1.5 से. मी. ऊँची क्यारी में बीज की बुवाई की जाती है क्यारी की अच्छी प्रकार से तैयारी करके एवं सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाकर बीज को पंक्तियों में 4-5 से.मी. की दूरी पर 2.5 से.मी. की गहराई पर बुवाई करते है बुवाई के बाद क्यारी को घास – फूस की महीन पर्त से ढक देते है तथा समय-समय पर सिचाई करते रहते है जैसे ही पौधा निकलना शुरू होता है ऊपर से घास – फूस को हटा दिया जाता है नर्सरी में पौधों को कीटों से बचाव के लिए नीम का काढ़ा या गोमूत्र का प्रयोग करें ।

रोपाई

नर्सरी में जब पौधे 8-10 या 4 सप्ताह के हो जायें तो उनको तैयार खेत में कतार से कतार , पक्ति से पंक्ति में 15 से 60 से. मी. का अन्तर रखकर तथा पौधे से पौधे के बीच 45 सें०मी० का फ़सला देकर रोपाई कर दें । रोपाई करते समय मिट्टी में पर्याप्त नमी होनी चाहिए तथा रोपाई के तुरन्त बाद हल्की सिंचाई अवश्य करें ।

खाद और उर्वरक

रोपाई की अंतिम बार तैयारी करते समय प्रति 10 वर्ग मीटर क्षेत्रफल में 50 किलो ग्राम गोबर की अच्छे तरीके से सड़ी हुई खाद कम्पोस्ट खाद इसके अतिरिक्त 1 किलोग्राम नीम खली 1 किलोग्राम अरंडी की खली इन सब खादों को अच्छी तरह मिलाकर क्यारी में रोपाई से पूर्व समान मात्रा में बिखेर लें इसके बाद क्यारी की जुताई करके बीज की रोपाई करें ।

प्रजातियाँ

ब्रोकली की किस्मे मुख्यतया तीन प्रकार की होती है श्वेत , हरी व बैंगनी |

बैंगनी –इनमे हरे रंग की गंठी हुई शीर्ष वाली किस्मे अधिक पसंद की जाती है इनमे नाइन स्टार , पेरिनियल,इटैलियन ग्रीन स्प्राउटिंग,या केलेब्रस,बाथम 29 और ग्रीन हेड प्रमुख किस्मे है |

संकर किस्मों में- पाईरेट पेकमे ,प्रिमिय क्राप ,क्लीपर , क्रुसेर , स्टिक व ग्रीन सर्फ़ मुख्य है |

अभी हाल भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान क्षेत्रीय केंद्र कटराई द्वारा ब्रोकली की के.टी.एस.9 किस्म विकसित की गई है इसके पौधे मध्यम उचाई के ,पत्तियां गहरी हरी ,शीर्ष सख्त और छोटे तने वाला होता है | भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली ने हाल ही में पूसा ब्रोकोली 1 क़िस्म की खेती के लिये सिफ़ारिश की है तथा इसके बीज थोड़ी मात्रा में पूसा संस्थान क्षेत्रीय केन्द्र, कटराइन कुल्लू घाटी , हिमाचल प्रदेश से प्राप्त किये जा सकते हैं|

 

 

जाने कैसे इस किसान ने उगाई किसान ने उगाई आलू-गेहूं की अंतर फसल

कम बीज डालकर अधिक गेहूं उत्पादन लेने की तकनीक सुनी थी, लेकिन जब खेत में आजमाई तो कामयाब हो गए। यह उत्पादन लिया है करनाल जिला के गांव ब्रास निवासी किसान सुरजीत सिंह ने। उन्होंने गेहूं और आलू की फसल ली है। सबसे खास बात यह है कि किसी तरह की बीमारी भी नहीं लगी। यही नहीं वे पहले बासमती की एक किस्म भी खुद ईजाद कर चुके हैं और भारत के राष्ट्रपति द्वारा किसान को सम्मानित किया जा चुका है।

ये हुआ उत्पादन: किसान के अनुसार आलू और गेहूं की फसल उगाने में कुल खर्च प्रति एकड़ 8 हजार रुपए आया। आलू की किस्म हिमसोना उगाई। गेहूंऔर आलू दोनों मिलाकर 51400 रुपए का फसलों का उत्पादन हुआ।

सुरजीत सिंह के अनुसार जो किसान गेहूं की अगेती किस्म उगाते हैं वे आलू गेहूं साथ-साथ बिजाई कर सकते हैं। पहले गेहूं की कटाई होगी, फिर किसान आलू की फसल ले सकता है। कपास के नीचे आलू गेहूं की बिजाई भी ली जा सकती है। क्योंकि प्रदेश में करीब 6 लाख हेक्टेयर में कपास होती है। वर्ष 2008 में कपास की बासमती किस्म “सुरजीत बासमती” भी ईजाद कर चुके हैं।

यह कमजोर बंजर खारे पानी में आसानी से हो सकती है। किसान को इसके लिए सम्मान भी मिला। वे आज भी गेहूं-धान दलहनी फसलों का बीज खेत में तैयार करते हैं। दूर दराज से किसान उनके यहां आधुनिक खेती के तरीके सीखने के लिए आते हैं। सुरजीत बीए पास हैं। उनके पास एक बैंक से कॉल भी आया कि आप नौकरी ज्वाइन कर सकते हैं, लेकिन उन्होंने खेती को प्राथमिकता दी।

बकौल सुरजीत सिंह उन्होंने आलू बिजाई की मशीन से खेत में गेहूं की बिजाई की। प्रति एकड़ 100 किलोग्राम यूरिया 100 किलोग्राम डीएपी लिया। डीएपी के साथ 15 किलोग्राम गेहूं का बीज भी मिला दिया। एक खाने से आलू का बीज मशीन से खेत तक पहुंचता रहा, जबकि दूसरे से गेहंू का बीज और डीएपी खेत तक पहुंचा। मेढ के ऊपर आलू और दोनों ओर गेहूं की फसल उगी।

3 गुना उत्पादन लेने के लिए ऐसे करें श्रीविधि से गेहूं की बुआई

 

धान की तर्ज पर गेहूं की खेती भी किसान यदि एसआरआई पद्दति (आम बोलचाल की भाषा में श्रीविधि) से करें तो गेहूं के उत्पादन में ढाई से तीन गुना वृद्धि हो सकती है। इस विधि (System of Rice Intensification) से खेती करने पर गेहूं की खेती में लागत परंपरागत विधि की तुलना में आधी आती है। पूरी जानकारी नीचे ख़बर में है।

खेत की तैयारी

खेत की तैयारी सामान्य गेहूं की भांति ही करते हैं। खरपतवार व फसल अवशेष निकालकर खेत की तीन-चार बार जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा (महीन) कर लें। उसके बाद पाटा चलाकर खेत को समतल कर जलनिकासी का उचित प्रबंन्ध करें। यदि दीमक की समस्या है तो दीमक नाशक दवा का प्रयोग करना चाहिए। खेत में पर्याप्त नमी न होने पर बुवाई के पहले एक बार पलेवा करना चाहिए। किसानों को चाहिए खेत में छोटी-छोटी क्यारियां बना लें। इस तरह से सिंचाई समेत दूसरे कृषि कार्य आसानी से और कम लागत में हो सकेंगे।

बुवाई का समय

गेहूं की फसल से अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने में बुवाई का समय महत्वपूर्ण कारक है। समय से बहुत पहले या बहुत बाद में गेहूं की बुवाई करने से उपज पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। नवम्बर-दिसम्बर के मध्य में बुवाई संपन्न कर लेना चाहिए।

उन्नत किस्मों का चयन

गेहूं की अधिक उपज देने वाली किस्मों का चयन स्थानीय कृषि जलवायु एवं भूमि की दशा (सिंचित या असिंचित) के अनुसार करना चाहिए। क्षेत्र विशेष के लिए संस्तुत किस्मों के प्रमाणित बीज का ही प्रयोग करें।

बीज दर एवं बीज शोधन

उन्नत बौनी किस्मों के प्रमाणित बीज का चयन करें। बुआई के लिए प्रति एकड़ 10 किलोग्राम बीज का उपयोग करना चाहिए। सबसे पहले 20 लीटर पानी एक वर्तन (मिट्टी का पात्र-घड़ा, नांद आदि बेहतर) में गर्म (60 डिग्री सें. यानि गुनगुना होने तक) करें। अब चयनित बीजों को इस गर्म पानी में डाल दें। तैरने वाले हल्के बीजों को निकाल दें। अब इस पानी में 3 किलो केचुआ खाद, 2 किलो गुड़ एवं 4 लीटर देशी गौमूत्र मिलाकर बीज के साथ अच्छी प्रकार से मिलाएं। अब इस मिश्रण को 6-8 घंटे के लिए छोड़ दें। बाद में इस मिश्रण को जूट के बोरे में भरें, जिससे मिश्रण का पानी निथर जाए। इस पानी को एकत्रित कर खेत में छिड़कना लाभप्रद रहता है।

अब बीज एवं ठोस पदार्थ कबाविस्टीन 2-3 ग्राम प्रति किग्रा. या ट्राइकोडर्मा 7.5 ग्राम प्रति किग्रा. के साथ पीएसबी कल्चर 6 ग्राम और एजेटोबैक्टर कल्चर 6 ग्राम प्रति किग्रा बीज के हिसाब से उपचारित कर नम जूट बैग के ऊपर छाया में फैला देना चाहिए। लगभग 10-12 घंटों में बीज बुवाई के लिए तैयार हो जाते है।

इस समय तक बीज अंकुरित अवस्था में आ जाते हैं। इसी अंकुरित बीज को बोने के लिए इस्तेमाल करना है। इस प्रकार से बीजोपचार करने से बीज अंकुरण क्षमता और पौधों के बढ़ने की शक्ति बढ़ती है और पौधे तेजी से विकसित होते हैं, इसे प्राइमिंग भी कहते है। बीज उपचार के कारण जड़ में लगने वाले रोग की रोकथाम हो जाती है। नवजात पौधे के लिए गौमूत्र प्राकृतिक खाद का काम करता है।

बुवाई की विधि

जैसा की पहले बताया गया है की बुवाई के समय मृदा में पर्याप्त नमी होना आवश्यक है, क्योंकि बुवाई हेतु अंकुरित बीज का प्रयोग किया जाना है। सूखे खेत में पलेवा देकर ही बुवाई करना चाहिए। बीजों को कतार में 20 सेमी की दूरी में लगाया जाता है। इसके लिए देशी हल या पतली कुदाली की सहायता से 20 सेमी. की दूरी पर 3 से 4 सेमी. गहरी नाली बनाते है और इसमें 20 सेमी. की दूरी पर एक स्थान पर 2 बीज डालते है।

बुवाई के बाद बीज को हल्की मिट्टी से ढक देते हैं। बुवाई के 2-3 दिन में पौधे निकल आते हैं। खाली स्थान पर नया शोधित बीज लगाना अनिवार्य है, जिससे प्रति इकाई वांक्षित पादप संख्या स्थापित हो सके। कतार तथा बीज के मध्य वर्गाकार (20 x 20 सेमी.) की दूरी रखने से प्रत्येक पौधे के लिए पर्याप्त जगह मिलती है, जिससे उनमें आपस में पोषण, नमी व प्रकाश के लिए प्रतियोगिता नहीं होती है।

खाद एवं उर्वरक

बगैर जैविक खाद के लगातार रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग करते रहने से खेत की उपजाऊ क्षमता घटती है। इसलिए उर्वरकों के साथ जैविक खादों का समन्वित प्रयोग करना टिकाऊ फसलोत्पादन के लिए आवश्यक रहता है। प्रति एकड़ कम्पोस्ट या गोबर खाद (20 क्विंटल) या केचुआ खाद (4 क्विंटल) में ट्राइकोडर्मा मिलाकर एक दिन के लिए ढककर रखने के पश्चात खेत में मिलाना फायदेमंद रहता है।

आखिरी जुताई के पूर्व 30-40 किग्रा. डाय अमोनियम फास्फेट (डीएपी) और 15-20 किग्रा. म्यूरेट आफ पोटाश प्रति एकड़ की दर से खेत में छींटकर अच्छी तरह हल से मिट्टी में मिला देंना चाहिए। प्रथम सिंचाई के बाद 25-30 किग्रा. यूरिया एवं 4 क्विंटल वर्मी कम्पोस्ट को मिलाकर कतारों में देना चाहिए। तीसरी सिंचाई के पश्चात एवं गुड़ाई से पहले 15 किग्रा. यूरिया एवं 10 किग्रा पोटाश उर्वरक प्रति एकड़ की दर से कतारों में देना चाहिए।

सिंचाई प्रबंधन: पानी का सही इस्तेमाल

बुवाई के समय खेत में अंकुरण के लिए पर्याप्त नमी होना नितांत आवश्यक है क्योंकि इस विधि में अंकुरित बीज लगाया जाता है। बुवाई के 15-20 दिनों बाद गेहूं में प्रथम सिंचाई देना करना जरूरी है क्योंकि इसके बाद से पौधों में नई जड़ें आनी शुरू हो जाती हैं। भूमि में नमी की कमी से पौधों में नई जड़ें विकसित नहीं हो पाती है, जिसके फलस्वरूप पादप बढ़वार रूक सकती है।

बुवाई के 30-35 दिनों बाद दूसरी सिंचाई देना चाहिए, क्योंकि इसके बाद पौधों में नए कल्ले तेजी से आना शुरू होते हैं और नये कल्ले बनाने के लिए पौधों को पर्याप्त नमीं एवं पोषण की आवश्यकता रहती है। बुवाई के 40 से 45 दिनों के बाद तीसरी सिंचाई देना चाहिए, इसके बाद से पौधे तेजी से बड़े होते हैं साथ ही नए कल्ले भी आते रहते है। गेहूं की फसल में अगली सिंचाईयां भूमि एवं जलवायु अनुसार की जानी चाहिए। गेहूं में फूल आने के समय एवं दानों में दूध भरने के समय खेत में नमी की कमी नहीं रहनी चाहिए अन्यथा उपज में काफी कमी हो सकती है।

निराई-गुड़ाई

सिंचित क्षेत्रों में गेहूं के खेत में लगातार नमी रहने के कारण खरपतवारों का अधिक प्रकोप होता है, जिससे उपज में काफी हानि होती है। इसके अलावा सिंचाई करने के पश्चात मृदा की एक कठोर परत निर्मित हो जाती है, जिससे भूमि में हवा का आवागमन तो अवरुद्ध होता ही है, पोषक तत्व व जल अवशोषण भी कम होता है। अतः खेत में सिंचाई उपरांत निंराई-गुड़ाई करना आवश्यक होता है। इसके बाद प्रथम सिंचाई के 2-3 दिन बाद पतली कुदाली या रोटोवीडर से मिट्टी को ढीला करें एवं खरपतवार भी निकालें।

अंतर्कर्षण से जड़ों को आवश्यक हवा, पानी और पोषक तत्व सुगमता से प्राप्त होते रहते हैं, जिससे पौधों का समुचित विकास होता है। दरअसल अंकुरण के बाद गेहूं के पौधों में सेमिनल जड़े निकलती हैं, जो पानी व भोजन की तलाश में मिट्टी में नीचे की ओर तेजी से बढ़ती है, यदि मिट्टी सख्त है तो वे ज्यादा नीचे तक नहीं जा पाती है और उनकी बढ़वार अवरूद्ध हो जाती है।

बुवाई के 20 दिन बाद मिट्टी की सतह के ठीक नीचे क्राउन जडें निकलती है जो पानी एवं भोजन की तलाश में चारों तरफ फैलती है। यदि मिट्टी सख्त है तो वे ज्यादा फैल नहीं सकती है, जिससे नन्हें पौधों को पर्याप्त भोजन व पानी नहीं मिलता है। गेहूं में दूसरी एवं तीसरी गुड़ाई क्रमशः 30-35 व 40-45 दिन पर सिंचाई के 2-3 दिन पश्चात करना चाहिए।

गेहूं की श्री विधि से लाभ

गेहूं सघनीकरण पद्धति (श्री विधि) से खेती करने पर परंपरागत विधि से प्राप्त 10-20 क्विंटल प्रति एकड़ की तुलना में 25 से 50 प्रतिशत अधिक उपज और आमदनी ली जा सकती है। परंपरागत विधि से गेहूं की खेती करने पर सामान्यत: पर किसानों को 40-60 किग्रा. प्रति एकड़ बीज लगता है, जबकि इस विधि में 10-15 किग्रा. प्रति एकड़ ही बीज लगता है। इस विधि में खाद-पानी की भी बचत होती है।

News Source -Gaonconnection News

पाना है ज्यादा फायदा तो ऐसे करें मटर की अगेती खेती

मटर की सब्जियों के रूप में हर साल बड़ी मांग रहती है, जिसको देखते हुए रबी सीजन की मुख्य दलहनी फसल मटर की अगेती प्रजातियों को सितंबर में बुवाई के लिए विकसित किया गया है। भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक बिजेन्द्र सिंह ने बताया ” दलहनी सब्जियों में मटर लोगों की पहली पसंद है, इससे जहां भोजन में प्रोटीन की जरूरत पूरी होती है वहीं इसकी खेती से भूमि की उर्वरा शक्ति में पर्याप्त वृद्धि होती है। किसान कम अवधि में तैयार होने वाली मटर की प्रजातियों की बुवाई सितंबर से अंतिम सप्ताह से लेकर अक्टूबर के मध्य तक कर सकते हैं। ”

उन्होंने बताया कि किसान मटर की अगेती किस्मों की खेती करके जहां सब्जियों में मटर की बढ़ी हुई मांग को पूरा कर सकते हैं वहीं इससे अपनी आमदनी भी बढ़ा सकते हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान ने मटर की अगेती प्रजाति की कई किस्मों को विकसित किया है।

जिसमें आजाद मटर-3, काशी नंदिनी, काशी मुक्ति, काशी उदय और काशी अगेती प्रमुख हैं। मटर की इन प्रजातियों की सबसे खास बात यह है कि यह 50 से लेकर 60 दिन में तैयार हो जाती है, जिससे खेत जल्दी खाली हो जाता और किसान दूसरी फसलों की बुवाई भी कर सकते हैं।

मटर की खेती के लिए दोमट और हल्की दोमट मिट्टी दोनों उपयुक्त हेाती है। मटर की बुवाई से पहले खेती की तैयारी के बारे में जानकारी देते हुए कृषि वैज्ञानिक डॉ. आर.के. सिंह ने बताया कि पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए और उसके बाद दो से लेकर तीन जुताई कल्टीवेटर से करनी चाहिए। बुवाई के लिए प्रति हेक्टेयर 80 से लेकर 100 किलोग्राम बीज की जरूतर पड़‍ती है बुवाई से पहले बीजोपचार करना जरूरी होता है।

मटर को बीज जनित रोगों से बचाव के लिए थीरम 2 ग्राम या मैकोंजेब 3 ग्राम को प्रति किलो बीज की दूर से शोधन करना चाहिए। बुवाई की विधि- सब्जी मटर के लिए अगेती प्रजाजि की मटर की बुवाई से 24 घंटे पहले बीज को पानी में भिगो लें फिर छाया में सुखाकर इसकी बुवाई करें। बुवाई करने में उर्वरक का प्रयोग करने में भी विशेष् ध्यान देना चाहिए। प्रति हेक्टेयर 20 किलोग्राम नाइट्रोजन डालना चाहिए।

क्या है मटर की अगेती प्रजातियों की विशेषता

काशी नंदिनी- इस प्रजाजि को गौतम कुल्लू, एम सिंह की टीम ने साल 2005 में विकसित किया था। जम्मू-कश्मीर, हिमांचल प्रदेश, उत्तरांचल, पंजाब,हरियाणा, उत्तर प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल में इसकी खेती की जाती है। इस किस्म से प्रति हेक्टेयर औसतन 110 से लेकर 120 कुंतल मटर का उत्पादन होता है।

काशी उदय- 2005 में विकसित की गई इस किस्म की यह विशेषता है कि इसकी फली की लंबाई 9 से लेकर 10 सेंटीमीटर होती है। इसकी उपज प्रति हेक्टेयर 105 कुंतल है। उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में इसकी अच्छे से खेती हो सकती है।

काशी मुक्ति- यह प्रजाति उत्तर प्रदेश, पंजाब,हरियाणा, बिहार और झारखंड के लिए उपयुक्त है। इसकी पैदावार प्रति हेक्टेयर 115 कुंतल होती है। इसकी फलिया काफी और दाने बड़े होते हैं। विदेशों में भी इसकी भारी मांग है।

काशी अगेती- वर्ष 2015 में राजेश कुमार सिंह, बी सिंह जैसे वैज्ञानिकों ने इस किस्मको विकसित किया था। यह 50 दिन में तैयार हो जाती है। इसकी फलियां सीधी और गहरी होती हैं। पौधे की लंबाई 58 से 61 सेंटीमीटर होती है। एक पौधे में 9 से लेकर 10 फलियां लगती हैं। प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 95 से 100 कुंतल होता है।

इसे नवंबर में बाेया जाता है और अप्रैल में इसकी कंबाइन से कटाई करते हैं

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के करनाल स्थित रीजनल सेंटर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. वीरेंद्र लाठर के अनुसार हरियाणा चना नंबर 5 (HC-5) किसानों के लिए वरदान बन सकता है। इसे गेहूं की तरह ही नवंबर में बाेया जाता है और अप्रैल के प्रथम सप्ताह में इसकी कंबाइन से कटाई कर सकते हैं। क्योंकि चने की फसल की लंबाई गेहूं की फसल की तरह होती है।

ऐसे में कंबाइन से कटाई में किसी तरह की दिक्कत नहीं होती। वैज्ञानिक के अनुसार नवंबर में बिजाई के दौरान प्रति एकड़ 20 किलोग्राम बीज की दरकार होती है। उत्पादन 9 से 10 क्विंटल तक होता है। चना 4500 से 5000 रुपए प्रति क्विंटल बाजार में आसानी से बिक जाता है। 100 चनों का वजन 16 ग्राम होता है। लंबाई गेहूं की फसल की तरह 85 सेंटीमीटर तक होती है।

परंपरागतखेती करने के वाले किसानों को कुछ अलग करने की जरुरत है, नहीं तो खेती घाटे का सौदा बनकर रह जाएगी। करनाल जिला के रंबा गांव में किसान ने 15 एकड़ में चने की फसल उगाई है। वे कंबाइन से चने की कटाई कराएंगे। चने की फसल लेते ही वे समर मूंग उगाएंगे। पंजाब के कपूरथला के किसानों का कहना है कि वे चने की बिजाई से खेत में खाद डालने की जरुरत नहीं पड़ती। यही नहीं जमीन की उपजाऊ शक्ति भी बेहतर बनी रहती है।

उत्पादन भी बेहतर मिलता है और बाजार में मांग के अनुसार ही वे चना उगा रहे हैं। कई ग्राहक तो ऐसे हैं जो खेत से ही चना खरीदकर ले जाते हैं। किसान का कहना है कि परंपरागत खेती करते रहे तो एक दिन खेती छोड़ने को मजबूर होना पड़ सकता है। इसलिए हर किसान को कुछ अलग करने की जरुरत है। यदि यह भी हो तो कम से कम दलहनी खेती कर भी खासा मुनाफा लिया जा सकता है।

रंबा गांव के प्रगतिशील किसान रघबिंद्र सिंह के अनुसार उन्होंने पहली बार 15 एकड़ में चना उगाया है। फसल बहुत अच्छी है। कुछ व्यापारी इसे कच्चा ही खरीदने आए थे, लेकिन उन्होंने नहीं दिया। चने में सबसे खास बात यह है कि इसकी ब्रांच नीचे की ओर नहीं होती। गेहूं की फसल की तरह कंबाइन इसे काट सकती है। कंबाइन सिस्टम में बदलाव की जरुरत नहीं।

अक्टूबर में लहसुन की खेती करें किसान

 

खेती को अगर बिजनेस मानकर किया जाए तो यह अधिकतम रिटर्न देने वाला साबित हो सकता है। यही कारण है कि इन दिनों युवाओं का रूझान भी खेती की ओर हो रहा है। बस जरूरत है फसलों के सही चुनाव की।

आज इसी तरह की एक फसल की जानकारी दे रहे हैं जिसकी खेती आपको महज 6 महीने में लाखों की इनकम करा सकती है।किसानों के लिए अक्टूबर का महीना लहसुन की खेती के लिए उपयुक्त माना जाता है। इस मौसम में लहसुन का कंद निर्माण बेहतर होता है।

इसकी खेती के लिए दोमट भूमि अच्छी रहती है।लहसुन जितना आपके खाने को लजीज बनाता है उतनी ही इसकी खेती आपकी जेब को भी मजबूत कर सकती है। इसकी खेती पर महज 50 हजार रुपए खर्च कर आप इससे 8 से 12 लाख रुपए तक कमा सकते हैं। आइए आपको बताते हैं लहसुन की आधुनिक खेती और इससे होने वाले लाभ को….

लहसुन की विभिन्न किस्में

इन दिनों लहसुन की जी-1 और जी-17 प्रजाति प्रमुख हैं। जी-17 का प्रयोग ज्‍यादातर हरियाणा और उत्‍तर प्रदेश के किसान कर रहे हैं। यह दोनों प्रजातियां ही 160 से 180 दिनों में पककर तैयार हो जाती हैं। इसके बाद अप्रैल-मई महीने में इसकी खुदाई होती है। एक हेक्‍टेयर में लगभग 8 से 9 टन पैदावार आसानी से हो जाती है।इसके इलावा प्रमुख किस्मे निचे दी हुई है

टाइप 56-4:लहसुन की इस किस्म का विकास पंजाब कृषि विश्वविद्यालय की ओर से किया गया है। इसमें लहसुन की गांठे छोटी होती हैं और सफेद होती हैं। प्रत्येक गांठ में 25 से 34 पुत्तियां होती हैं। इस किस्म से किसान को प्रति हेक्टेयर 15 से 20 टन तक उपज मिलती है।

आईसी 49381:इस किस्म का विकास भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की ओर से किया गया है। इस किस्म से लहसुन की फसल 160 से 180 दिनों में तैयार हो जाती है। इस किस्म से किसानों को अधिक उपज मिलती है।

सोलन:लहसुन की इस किस्म का विकास हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय की ओर से किया गया है। इस किस्म में पौधों की पत्तियां काफी चौड़ी व लंबी होती हैं और रंग गहरा होता है। इसमें प्रत्येक गांठ में चार ही पुत्तियां होती हैं और काफी मोटी होती हैं। अन्य किस्मों की तुलना में यह अधिक उपज देने वाली किस्म है।

एग्री फाउंड व्हाईट (41 जी):लहसुन की इस किस्म में भी फसल 150 से 160 दिनों में तैयार हो जाती है। इस किस्म से लहसुन की उपज 130 से 140 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। यह किस्म गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक आदि प्रदेशों के लिए अखिल भारतीय समन्वित सब्जी सुधार परियोजना के द्वारा संस्तुति की जा चुकी है।

यमुना (-1 जी) सफेद: लहसुन की यह किस्म संपूर्ण भारत में उगाने के लिए अखिल भारतीय सब्जी सुधार परियोजना के द्वारा संस्तुति की जा चुकी है। इस किस्म में फसल से 150 से 160 दिनों में तैयार हो जाती है और प्रति हेक्टेयर उपज 150 से 175 क्विंटल होती है।

यमुना सफेद 2 (जी 50): यह किस्म मध्य प्रदेश के लिए उत्तम पाई जाती है। इस किस्म में 160 से 170 दिन फसल तैयार हो जाती है और प्रति हेक्टेयर उपज 150 से 155 क्विंटल तक होती है। यह किस्म बैंगनी धब्बा और झुलसा रोग के प्रति सहनशील होती है।

जी 282:इस किस्म में शल्क कंद सफेद और बड़े आकार के होते हैं। इसके साथ ही 140 से 150 दिनों में फसल तैयार हो जाती है। इस किस्म में किसान को 175 से 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज मिल जाती है।

आईसी 42891:लहसुन की इस किस्म का विकास भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान, नई दिल्ली की ओर से किया गया है। यह किस्म किसानों को अधिक उपज देती है और फसल 160-180 दिन में तैयार हो जाती है।

मिट्टी और जलवायु

जैसा कि आपको पहले बताया जा चुका है कि लहसुन की खेती के लिए मध्यम ठंडी जलवायु उपयुक्त होती है। इसके साथ ही दोमट मिट्टी, जिसमें जैविक पदार्थों की मात्रा अधिक हो, लहसुन की खेती के लिए सबसे अच्छी है।

खेती की तैयारी

खेत में दो या तीन गहरी जुताई करें। इसके बाद खेत को समतल कर क्यारियां और सिचांई की नालियां बना लें। बता दें कि लहसुन की अधिक उपज के लिए डेढ़ से दो क्विंटल स्वस्थ कलियां प्रति एकड़ लगती हैं।

ऐसे करें बुवाई और सिंचाई

अधिक उपज के लिए किसानों को बुवाई के लिए डबलिंग विधि का उपयोग करना चाहिए। क्यारी में कतारों की दूरी 15 सेंटीमीटर तक होनी चाहिए। वहीं, दो पौधों के बीच की दूरी 7.5 सेंटीमीटर होनी चाहिए। वहीं किसानों को बोने की गहराई 5 सेंटीमीटर तक रखनी चाहिए। जबकि सिंचाई के लिए लहसुन की गांठों के अच्छे विकास के लिए 10 से 15 दिनों का अंतर होना चाहिए।

कितना आता है खर्च

एक हेक्‍टेयर में लगता है 12 हजार रुपए का बीज लहसुन की खेती के लिए नवंबर महीना मुफीद रहता है। इसकी खेती भारत के लगभग हर हिस्‍से में की जाती है.लेकिन, इसके लिए उत्‍तर प्रदेश, उत्‍तराखंड, हरियाणा, पंजाब और मध्‍य प्रदेश का मौसम बहुत ही उपयुक्‍त माना जाता है। एक एकड़ खेती में लगभग 5 हजार रुपए का बीज (लहसुन की गांठ) लगता है।

जबकि, एक हेक्‍टेयर को अगर मॉडल मानकर चलें तो 12 हजार से 13 हजार रुपए का बीज पर्याप्‍त होता है। छह महीने में खाद, पानी, मजदूरी आदि कुल सब मिलाकर 50 से 60 हजार रुपए खर्च आ जाता है।

7 से 8 लाख रुपए होती है इनकम

लहसुन का प्रयोग ज्‍यादातर मसालों और आयुर्वेदिक दवाओं में होता है। ऐसे में इसकी ज्‍यादा मांग रहती है। वर्तमान में दिल्‍ली आजादपुर मंडी.की ही अगर बात करें तो इसके दाम 120 से 150 रुपए प्रति किलोग्राम तक चल रहे हैं।

इस तरह अगर आप एक हेक्‍टेयर में 8 टन यानि 8000 किलोग्राम लहसुन भी मानकर चलें तो आपको मंडी से 100 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से भी 8 लाख रुपए प्राप्‍त होंगे। इसमें से अगर आप पैदावार, खुदाई और ढुलाई का खर्च एक लाख रुपए भी निकाल लें तो 7 लाख रुपए की बचत होती है। पिछले दिनों लहसुन प्रमुख बाजारों में 450 रुपए प्रति किलोग्राम तक भी बिका है।

प्रोसेस कर बेच सकते हैं

लहसुन इसमें अगर आप इनकम को बढ़ाना चाहते हैं तो इसे प्रोसेस कर भी बेच सकते हैं। शुरुआत में आप महज 10 फीसदी उत्‍पादन को ही प्रोसस कर बेचे तो आपको कुल उत्‍पादन के लाभ का 50 फीसदी तक प्राप्‍त हो सकता है। बिजनौर उत्‍तर प्रदेश के नीरज अहलावत ने पिछले दिनों सिर्फ 1 क्विंटल गार्लिक को प्रोसस (पेस्‍ट और मसाला तैयार करना) 1.5 लाख रुपए में बेचा है।

ऐसे करें जीरे की उन्नत खेती

जलवायु- जीरे की फसल को शुष्क एवं साधारण ठंडे मौसम की आवश्यकता होती है। बीज पकने के समय शुष्क एवं साधारण गर्म मौसम जीरे की फसल के लिए अच्छा रहता है। अधिक वायुमण्डलीय नमी, रोग व कीड़ों को पनपाने में सहायक होती है तथा जीरे की फसल पाला सहन करने में असमर्थ होती है।

उपयुक्त किस्में- आर.जेड. – 19, आर.जेड. – 209, आर.जेड़. – 223, गुजरात जीरा -4 (जी.सी-4)

भूमि तथा भूमि की तैयारी – जीवांश युक्त दोमट मिट्टी जिसमें जल निकास की उचित व्यवस्था हो जीरे की खेती के लिए उपयुक्त होती है। बुवाई से पूर्व यह आवश्यक है कि खेत की तैयारी ठीक तरह की जाये इसके लिये खेत को अच्छी तरह से जोत कर उसकी मिट्टी को भुरभुरी बना लिया जाए।

खाद एवं उर्वरक – जीरे की अच्छी पैदावार लेने के लिये 10 टन प्रति हेक्टेयर के हिसाब से जुताई से पहले गोबर की अच्छी तरह से सड़ी हुई खाद खेत में बिखेर कर मिला देना चाहिये। एक औसत उर्वर भूमि में 30 किलो नत्रजन एवं 20 किलो फास्फोरस प्रति हैक्टेयर की दर से दें।

फास्फोरस की पूरी मात्रा बुवाई पूर्व आखिरी जुताई के समय भूमि में मिला देना चाहिये एवं नत्रजन की आधी मात्रा बुवाई के 30-35 दिन बाद एवं शेष 15 किलो नत्रजन बुवाई के 60 दिन बाद सिंचाई के साथ दे। बुवाई के समय 20 किलो प्रति हैक्टेयर गंधक खेत में डालें।

बीजदर व बीजोपचार – जीरे का 12 किलोग्राम बीज एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए पर्याप्त है। बीज जनित रोगों से बचाव के लिए बुवाई से पूर्व जीरे के बीज को 2 ग्राम कार्बेण्डाजिम 50 डब्ल्यू.पी. प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित कर बोना चाहिए।

बुवाई का समय व तरीका- जीरे की बुवाई मध्य नवम्बर के आसपास कर देनी चाहिये। बुवाई आमतौर पर छिटकवां विधि से की जाती है। तैयार खेत में पहले क्यारियां बनाते है। उनमें बीजों को एक साथ छिटक कर क्यारियों में लोहे की दंताली इस प्रकार फीरा देनी चाहिए कि बीज के ऊपर मिट्टी की एक हल्की सी परत चढ़ जाये। कतारों में बुवाई के लिए क्यारियों में 25-30 सेन्टीमीटर की दूरी पर लोहे या लकड़ी के बने हुक से लाईने बना देते हैं। बीजों को इन्हीं लाईनों में डालकर दंताली चला दी जाती है।

सिंचाई- पहली हल्की सिंचाई बुवाई के तुरन्त बाद की जाती है। इस सिंचाई के समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि क्यारियों में पानी का बहाव अधिक तेज न हो। दूसरी सिंचाई बुवाई के एक सप्ताह पूरा होने पर जब बीज फूलने लगे तब करें। इसके बाद मृदा की संरचना तथा मौसम के अनुसार 15-25 दिन के अन्तराल पर 5 सिंचाईयां पर्याप्त होगी। फव्वारा विधि द्धारा बुवाई समेत पांच सिंचाईयां बुवाई के समय, दस, बीस, पचपन एवं अस्सी दिनों की अवस्था पर करें। फव्वारा तीन घण्टे ही चलायें।

निराई-गुड़ाई – प्रथम निराई-गुड़ाई बुवाई के 30-35 दिन बाद व दूसरी 55-60 दिन बाद करनी चाहिये।

कटाई- जीरे की फसल 120 दिन में पककर तैयार हो जाती है। फसल को दांतली से काटकर अच्छी तरह सूखा लेवें।

उपज – उपयुक्त उन्नत कृषि विधियां अपनाने से 6 से 10 क्विंटल प्रति हैक्टेयर जीरा की उपज प्राप्त की जा सकती है।

भण्डारण – भण्डारण करते समय दानों में नमी की मात्रा 8-9 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। संग्रहित जीरे को समय-समय पर धूप में रखें।

ईसबगोल की उन्नत खेती कैसे करें

जलवायु एवं भूमि- ईसबगोल के लिए सर्द एवं शुष्क जलवायु उपयुक्त रहती है। बीजों के अच्छे अंकुरण के लिए 20-25 सेल्सियस के मध्य का तापमान व मिट्टी का पी.एच. मान 7-8 सर्वोत्तम होता है। इसकी खेती के लिए दोमट, बलुई मिट्टी जिसमें जल निकास का उचित प्रबन्ध हो, उपयुक्त होती है।

खेत की तैयारी एवं भूमि उपचार- छिटक कर बुवाई करने से 4-5 किग्रा. प्रति हेक्टेयर बीज की आवश्यकता होती है। लेकिन तुलासिता रोग के प्रकोप से फसल को बचाने हेतु मेटालेक्सिल 35 एस.डी. 5 ग्राम प्रति किग्रा. बीज की दर से उपचारित करके बुवाई करें। ईसबगोल की बुवाई के लिए नवम्बर का प्रथम पखवाड़ा उत्तम पाया गया।


उन्नत किस्में-

आर.आई 89 – इस किस्म के पौधो की ऊँचाई 30-40 सेमी. होती है तथा 110-115 दिन में पक जाती है। इसकी उपज 12-16 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होती है।
आर.आई 1- शुष्क तथा अद्र्धशुष्क क्षेत्रों के लिए विकसित अधिक उपज देने वाली यह किस्म है। इस किस्म के पौधों की ऊँचाई 29-47 सेमी. होती है तथा 110-120 दिन में पक जाती है। इसकी औसत उपज क्षमता 12 से 16 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है।
जी. आई 2 – यह किस्म 118-125 दिन में पक जाती है। इसकी औसत उपज क्षमता 14 से 15 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है। इसमें भूसी की मात्रा 28-30 प्रतिशत तक पाई जाती हैं।

खाद एवं उर्वरक – ईसबगोल की फसल अधिक पैदावार लेने हेतु 15-20 गाड़ी सड़ी हुई गोबर की खाद अगर उपलब्ध हो तो आखिरी जुताई के समय खेत में मिलायें। इस फसल को 30 किग्रा. नत्रजन और 20 किग्रा. फॉस्फोरस की प्रति हेक्टेयर आवश्यकता होती है।

खरपतवार नियंत्रण एवं निराई गुड़ाई-ईसबगोल में दो निराइयों की आवश्यकता होती है, पहली निराई, बुवाई के करीब 20 दिन बाद एवं दूसरी 40-50 दिन बाद करें। खरपतवार नियंत्रण के लिए बुवाई के बाद लेकिन पौधे उगने से पहले या 15-20 दिन की फसल अवस्था पर आइसोप्रोट्यूरॉन 600 ग्राम तत्व का 600 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।

सिंचाई- ईसबगोल में चार सिंचाई को बुवाई के समय, बुवाई के 8 दिन, 35 दिन व 65 दिन बाद सिंचाई देने से अच्छी उपज प्राप्त होती है। ईसबगोल में क्यारी विधि की अपेक्षा फव्वारा विधि द्वारा छह सिंचाईयां (बुवाई के समय, बुवाई के 8, 20, 40, 55 व 70 दिनों बाद) तीन घण्टे  फव्वारा चलाने से अधिक उपज प्राप्त होती है।

कटाई मंडाई- ईसबगोल में 25-125 तक कल्ले निकलते है तथा पौधों में 60 दिन बाद बालियाँ निकलना शुरू होती हैं और करीब 115-130 दिन में फसल पक कर तैयार हो जाती है। कटी हुई फसल को 2-3 दिन खलिहान में सुखाकर झड़का लें या बैलों द्वारा मंडाई कर निकाल लें।

उपज एवं उपयोगी भाग- ईसबगोल की औसत उपज 9 से 10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। इसकी भूसी जिसकी मात्रा बीज के भार में 30 प्रतिशत होती है जो सबसे कीमती एवं उपयोगी भाग है, बाकी 65  से 70 प्रतिशत गोली, 3 प्रतिशत खली और 2 प्रतिशत खारी होती है।

लहसुन की उन्नत खेती कैसे करे

लहसुन एक महत्त्वपूर्ण व पौष्टिक कंदीय सब्जी है। इस का प्रयोग आमतौर पर मसाले के रूप में कियाजाता है। लहसुन दूसरी कंदीय सब्जियों के मुकाबले अधिक पौष्टिक गुणों वाली सब्जी है। यह पेट के रोग, आँखों की जलन, कण के दर्द और गले की खराश वगैरह के इलाज में कारगर होता है। हरियाणा की जलवायु लहसुन की खेती हेतु अच्छी है।

उन्नत किस्में

जी 1– इस किस्म के लहसुन की गांठे सफेद, सुगठित व मध्यम के आकार की होती हैं। हर गांठ में 15-20 कलियाँ पाई जाती हैं। यह किस्म बिजाई के 160 – 180 दिनों में पक कर तैयार होती है। इस की पैदावार 40 से 45 क्विंटल प्रति एकड़ है।
एजी 17– यह किस्म हरियाणा के लिए अधिक माकूल है। इस की गांठे सफेद व सुगठित होती है। गांठ का वजन 25-30 ग्राम होता है। हर गांठ में 15-20 कलियाँ पाई जाती हैं। यह किस्म बिजाई के 160-170 दिनों में पक कर तैयार होती है। पैदावार लगभग 50 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

मिट्टी और जलवायु

वैसे लहसुन की खेती कई किस्म की जमीन में की जा सकती है, फिर भी अच्छी जल निकास व्यवस्था वाली रेतीली दोमट मिट्टी जिस में जैविक पदार्थों की मात्रा अधिकं हो तथा जिस का पीएच मान 6 से 7 के बीच हो, इस के लिए सब से अच्छी हैं। लहसुन की अधिक उपज और गुणवत्ता के लिए मध्यम ठंडी जलवायु अच्छी होती है।

खेती की तैयारी

खेत में 2 या 3 गहरी जुताई करें इस के बाद खेत को समतल कर के क्यारियाँ व सिंचाई की नालियाँ बना लें।

बिजाई का समय

लहसुन की बिजाई का सही समय सितंबर के आखिरी हफ्ते से अक्टूबर तक होता है।

बीज की मात्रा

लहसुन की अधिक उपज के लिए डेढ़ से 2 क्विंटल स्वस्थ कलियाँ प्रति एकड़ लगती हैं। कलियों का व्यास 8-10 मिली मीटर होना चाहिए।

बिजाई की विधि

बिजाई के लिए क्यारियों में कतारों दूरी 15 सेंटीमीटर व कतारों में कलियों का नुकीला भाग ऊपर की ओर होना चाहिए और बिजाई के बाद कलियों को 2 सेंटीमीटर मोटी मिट्टी की तह से ढक दें।

खाद व उर्वरक

खेत की तैयारी के समय 20 टन गोबर की सड़ी हुई खाद देने के अलावा 20 किलोग्राम नाइट्रोजन, 20 किलोग्राम फास्फोरस व 20 किलोग्राम पोटाश रोपाई से पहले आखिरी जुताई के समय मिट्टी में अच्छी तरह मिलाएँ। 20 किलोग्राम नाइट्रोजन बिजाई के 30-40 दिनों के बाद दें।

सिंचाई

लहसुन की गांठों के अच्छे विकास के लिए सर्दियों में 10-15 दिनों के अंतर पर और गर्मियों में 5-7 दिनों के अंतर पर सिंचाई होनी चाहिए।

अन्य कृषि क्रियाएँ व खरपतवार नियंत्रण

लहसुन की जड़ें कम गहराई तक जाती हैं। लिहाजा खरपतवार की रोकथाम हेतु 2-3 बार खुरपी से उथली निराई गुड़ाई करें। इस के अलावा फ्लूक्लोरालिन 400-500 ग्राम (बासालिन 45 फीसदी, 0.9-1.1 लीटर) का 250 लीटर पानी में घोल बना कर प्रति एकड़ के हिसाब से बिजाई से पहले छिड़काव करें या पेंडीमैथालीन 400-500 ग्राम (स्टोम्प 30 फीसदी, 1.3-1.7 लीटर) का 250 लीटर पानी में घोल बना कर बिजाई के 8-10 दिनों बाद जब पौधे सुव्यवस्थित हो जाएँ और खरपतवार निकलने लगे, तब प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव करें।

गांठो की खुदाई

फसल पकने के समय जमीन में अधिक नमी नहीं रहनी चाहिए, वर्ना पत्तियाँ फिर से बढ़ने लगती हैं और कलियाँ का अंकुरण हो जाता है। इस से इस का भंडारण प्रभावित हो सकता है।
पौधों की पत्तियों में पीलापन आने व सूखना शुरू होने पर सिंचाई बंद कर दें। इस के कुछ दिनों बाद लहसुन की खुदाई करें। फिर गांठों को 3 से 4 दिनों तक छाया में सुखाने के बाद पत्तियों को 2-3 सेंटीमीटर छोड़ कर काट दें या 25-30 गांठों की पत्तियों को बांध कर गूछियों बना लें।

भंडारण

लहसुन का भंडारण गूच्छीयों के रूप में या टाट की बोरियों में या लकड़ी की पेटियों में रख कर सकते हैं। भंडारण कक्ष सूखा व हवादार होना चाहिए। शीतगृह में इस का भंडारण 0 से 0.2 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान व 65 से 75 फीसदी आर्द्रता पर 3-4 महीने तक कर सकते हैं।

पैदावार

इस की औसतन उपज 4-8 टन प्रति हेक्टेयर ली जा सकती है।

बीमारियाँ व लक्षण

आमतौर पर लहसुन की फसल में बैगनी धब्बा का प्रकोप हो जाता है। इस के असर से पत्तियों परGarlicजामुनी या गहरे भूरे धब्बे बनने लगते हैं। इन धब्बों के ज्यादा फैलाव से पत्तियाँ नीचे गिरने लगती हैं। इस बीमारी का असर ज्यादा तापमान और ज्यादा आर्द्रता में बढ़ता जाता है। इस बीमारी की रोकथाम के लिए इंडोफिल एम् 45 या कॉपर अक्सिक्लोराइड 400-500 ग्राम प्रति एकड़ के हिसाब से ले कर 200-500 लीटर पानी में घोल कर और किसी चपकने वाले पदार्थ (सैलवेट 99, 10 ग्राम, ट्रीटान 50 मिलीलीटर प्रति 100 लीटर ) के साथ मिला कर 10-15 दिनों के अन्तराल पर छिड़कें।