इस ऑटो ड्राइवर ने लगाए आंवले के 60 पौधे और बन गया करोड़पति

अगर सफल होना चाहते हैं तो एक चीज जो आपके पास होनी चाहिए है वह है ‘धैर्य’. मेहनत और सच्ची लगन से किए हुए काम का अच्छा नतीजा तभी मिलता है जब आपके पास धैर्य हो. इसी का जीता-जागता उदाहरण है राजस्थान के किसान अमर सिंह. 57 साल के अमर सिंह सभी किसानों के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं है, जो खेती-बाड़ी कर पैसा कमाना चाहते है.

दरअसल अमर मूल रूप से किसान नहीं हैं बल्कि ऑटोड्राइवर हैं. इन्होंने सालों पहले महज 1200 रुपये में आंवला के 60 पौधे रोपे थे. 22 साल बाद ये पौधे बड़े हुए. आपको जानकर यकीन नहीं होगा लेकिन मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक आज अमर इन्हीं पेड़ों से 26 लाख का टर्नओवर कमा रहे हैं.

इस कारोबार में अमर सिंह की मदद करने वाले ल्यूपिन ह्यूमन वेलफेयर ऐंड रिसर्च फाउंडेशन के एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर सीताराम गुप्ता बताते हैं कि उनकी मेहनत के कारण आज कई लोगों को रोजगार प्राप्त हुआ है. जिसमें महिलाएं भी शामिल हैं.

ऑटोड्राइवर अमर सिंह ऐसे बने किसान

अमर सिंह का पैतृक पेशा खेती का था. साल 1977 में अमर सिंह के पिता का देहांत हो गया. हालांकि खेती से ही उनका घर चल रहा था. पर उस दौरान खेती से कुछ कमाई नहीं होती थी. घर के हालात ठीक नहीं थे इसलिए अमर ने ऑटो चलाना शुरू कर दिया.

हालांकि इसमें उनका मन नहीं लगा और 1985 में वह अपने ससुराल में, गुजरात, अहमदाबाद पहुंच गए. वहीं रास्ते में सड़क पर उन्हें अखबार का एक टुकड़ा मिला था, जिसमें आंवले की खेती के बारे में जानकारी दी गई थी.

वह उस आर्टिकल से इतने इंप्रेस हुए कि उन्होंने ठान लिया की वह अब आंवले की ही खेती करेंगे. उन्होंने 2 एकड़ जमीन पर आंवले के 60 पौधे बोए. उन्हीं बोए हुए पौधों का नतीजा है कि आज वे करोड़पति किसानों में गिने जाते हैं.

किसानो को लखपति बना रही है अमरुद की यह नई किसम VNR BIHI

इन दि‍नों इंसान के सि‍र जि‍तने मोटे अमरूद ने बाजार में काफी हलचल मचा रखी है। एक अमरूद का वजन डेढ़ कि‍लो तक पहुंच जाता है और इसकी पैदावार करने वाले कि‍सानों का माल हाथोंहाथ बि‍क रहा है।

यह भारी भरकम अमरूद न केवल देखने में सुंदर लगता है बल्‍कि इसका टेस्‍ट भी बेहतरीन है। अमरूद की इस कि‍स्‍म का नाम है VNR BIHI जि‍सने कई कि‍सानों को मालामाल कर दि‍या है। जि‍न भी इलाकों में यह पैदा हो रहा है वहां इसकी काफी मांग है। इसकी कीमत 150 रुपए से लेकर 370 रुपए कि‍लो तक है।

प्राइवेट जॉब छोड़ शुरू की खेती

नीरज एक सॉफ्टवेयर इंजीनि‍यर थे मगर अब वह जींद के संगतपुरा गांव में खेतीबाड़ी करते हैं। वह इस अमरूद की बड़े पैमाने पर खेती करते हैं। इन्‍होंने अमरूद के करीब 1600 पेड़ लगाए हैं और साल में दो बार फसल लेते हैं।

एक पेड़ पूरे साल में 75 से 100 कि‍लो अमरूद देता है। नीरज ऑनलाइन इनकी सप्‍लाई करते हैं। वह एक पैकेट 555 रुपए में देते हैं जि‍समें आमतौर पर तीन अमरूद होते हैं, जि‍नका कुल वजन 1600 ग्राम से 1800 ग्राम होता है।

कैसे की जाती है इसकी खेती

इसकी खेती करना आसान काम नहीं है। काफी रखरखाव करना होगा। जब फल आते हैं तब खासतौर पर देखभाल करनी होती है। फलों की बैगिंग करनी होती है। एक पेड़ से दूसरे पेड़ के बीच में 12 फुट सामने और आठ फुट की दूरी पर बगल में होनी चाहि‍ए। नीरज कि‍सानों को इस पौधे को लगाने और रखरखाव की ट्रेनिंग भी देते हैं, मगर ये फ्री नहीं है। वह इसके लि‍ए फीस लेते हैं। ट्रेनिंग आमतौर पर दो दि‍न की होती है।

कहां से मि‍ल सकता है पौधा

अमरूद की यह प्रजाति वैसे तो थाईलैंड से आई है। यहां अभी इसकी पौध मि‍लती है। इसे आप डायरेक्‍ट VNR की नर्सरी से खरीद सकते हैं। कंपनी की वेबसाइट पर रेट सहि‍त इसकी पूरी जानकारी दी गई है। कंपनी की वेबसाइट के मुताबि‍क, अगर आप 1 से 10 पौधे लेते हैं तो प्रति पौधा इसकी कीमत 330 रुपए है। पौधों की गि‍नती बढ़ने पर रेट कम हो जाते हैं।

पंजाब का ये किसान खीरे की फसल से 4 महीने में कमा रहा है 18 लाख रुपए

गांव बठोई खुर्द के युवा किसान धान की खेती न कर पॉली हाउस में देसी खीरे उगाकर अच्छ मुनाफा कमा रहे हैं। युवा किसान बलजिंदर सिंह का कहना है कि पंजाब में पानी के हालतों को देखते हुए, अब रिवायती खेती को कम कर देना चाहिए।

इसलिए उन्होंने पहली बार एक एकड़ एरिया में देसी खीरा लगाया है। वह इसकी खेती के लिए आर्गेनिक खाद खुद ही तैयार कर रहा है। इस खीरे की खास बात यह है कि इस पर किसी प्रकार के कीटनाशक का इस्तेमाल नहीं किया जाता।

खीरे की बेल को 15 दिन के अंदर 100 ग्राम कैल्शियम डाला जाता है। फसल साल में दो बार दो महीने चलती है और 22 से 25 रुपए के बीच रेट मिलता है। धान की फसल लगाने से पानी का लेवल तो नीचे जाता ही है, साथ में मुनाफा भी कम होता है।

देसी खीरा साल में दो बार जून-जुलाई आैर अक्टूबर-नवंबर में होता है, पानी की होती है बचत

चाइनीज खीरे से अलग है देसी खीरा, चार लाख रुपए आता है खर्च

साल में दो बार खीरे की फसल की खेती होती है। इससे पहले गर्मी के दो महीने जून व जुलाई और सर्दी के अक्तूबर आैर नवंबर में फसल लगती है। किसान की मानंे तो बीज से लेकर लेबर तक चार महीने में करीब 4 लाख रुपए खर्च अाता है और मुनाफा 18 लाख के करीब होता है।

चाइनीज खीरे से देसी खीरे की अलग पहचान है। चाइनीज खीरे की चमक ज्यादा होने के साथ ही बाहरी परत पर किसी प्रकार के रेशे नहीं होते। देसी खीरे में बाहरी परत पर कई जगह अलग-अलग निशान के साथ रेशे देखे जा सकते हैं। इस पर किसी प्रकार के पेस्टिसाइड का इस्तेमाल नहीं किया जाता।

पॉलीहाउस में खेती से होती है पानी की बचत

पॉलीहाउस में खीरे की खेती करने से पानी की बचत की जा सकती है। इसके लिए किसान तुपका प्रणाली से पानी बेल तक पहुंचाता है। इसमें उतना पानी ही इस्तेमाल किया जाता है, जितना पौधे को चाहिए। देसी खीरे की बेल 9 फीट तक बढ़ती है। जैसे-जैसे यह बढ़ती है वैसे ही पानी की मात्रा कम या ज्यादा हो सकती है। खीरे की बेल को 15 दिन के अंदर 100 ग्राम कैल्शियम डाला जाता है।

पंजाब के किसान ने इंग्लैंड जाकर बनाया यह अनोखा वर्ल्ड रिकॉर्ड

कहते हैं प्रार्थना करना से सभी काम पूरे होते हैं और भगवान हमारी सारी इच्छाएं भी पूरी करते हैं. ऐसे ही हमारे बड़े बुजुर्ग भी कहते थे हर दिन हमे प्रार्थना करना चाहिए. लेकिन कभी अापने सुना प्रार्थना करने का इतना बड़ा फल मिले कि रिकॉर्ड ही बन जाये.

जी हाँ, आज ऐसा ही एक किस्सा हम आपको बताने जा रहे हैं जिसे सुनकर आप भी हैरान तो होंगे ही. 75 साल के रघबीर सिंह संघेरा ने ये बता दिया कि प्रार्थना करने का कितना बड़ा फल मिल सकता है.

दरअसल, रघबीर सिंह संघेरा ने अपने घर में किचन गार्डेन बनाया है जिसमें उन्होंने कई तरह के फल, फूल और सब्जी लगा के रखे हैं. आपको बता दें, करीब 4 महीने उन्होंने अपने गार्डन में ककड़ी के बीज रोपे थे जिसके लिए वो रोज़ प्रार्थना करता था. जी हाँ, पानी और खाद देने के अलावा हर दिन तीन घंटे इन पौधों के पास बैठकर प्रार्थना करते थे.

इस प्रार्थना का असर ऐसा हुआ कि उनकी उगाई ककड़ी इतनी लम्बी हो गई जिसने रिकॉर्ड बना लिया है. आपको बता दें,ककड़ी की लंबाई 51 इंज हो चुकी है और यह अभी भी बढ़ रही है. गिनीज बुक में दर्ज सबसे लंबी ककड़ी करीब 42 इंच है लेकिन इस ककड़ी ने ये रिकॉर्ड तोड़ दिया.

इस पर विशेषज्ञ का कहना है कि संघेरा ने जिस अरमेनियन कुकुंबर प्रजाति नाम की ककड़ी उगाई है जो पहले भी वर्ल्ड रिकॉर्ड के लिए रिजेक्ट हो चुकी है. वहीं गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड के प्रवक्ता का कहना है ‘सबसे लंबे अरमेनियन कुकुंबर संबंधी कोई रिकॉर्ड दर्ज नहीं है,

मगर हमारी वेबसाइट पर जाकर कोई भी नए टाइटल के लिए आवेदन दे सकता है.’ आपको बता दें, रघबीर अब इस ककड़ी को लेकर नॉटिंगघम स्थित सिंह सभा गुरुद्वारा लेकर जायेंगे जहां पर वो सेवा करते हैं. उनका कहना है कि वहां ये इसलिए ले जायेंगे ताकि और भी ऐसी ही सब्जियां उगाई जा सके.

ये हैं किसानों के गुरू, केचुओं से कमाई के सिखाते हैं तरीके

अलीगढ़। तालों और अपने प्रसिद्ध विश्वविद्यालय के साथ अलीगढ़ इन दिनों किसानों के बीच भी चर्चा में आ रहा है। जिले का एक किसान तमाम किसानों को केचुए से कमाई के तरीके बता रहा है, जिसे सीखने के लिए कई जिलों के लोग आते हैं।

अलीगढ़ जिला मुख्यालय से 40 किलोमीटर दूर अतरौली तहसील ब्लाक अतरोली के गांव बैमवीरपुर में रिटायर्ड शिक्षक अपने जैसे तमाम किसानों को जैविक खाद के उत्पादन और बेहतर पैदावार की राह दिखा रहे हैं। 100 से भी अधिक किसान उनके साथ जुड चुके हैं और केंचुआ खाद का प्रयोग कर फसल में अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। उनकी जैविक खाद की सप्लाई तमाम जिलों में हो रही है।

जिला अलीगढ़ के तहसील अतरौली के गांव बैमवीरपुर के रहने वाले शंभूदयाल शर्मा वर्ष 2006 में प्राथमिक स्कूल के हेडमास्टर के पद से रिटायर्ड हुए थे। साल 2009 में अतरौली ब्लाक मुख्यालय से उन्हें केंचुआ खाद के उत्पादन और उसके प्रयोग से होने वाले लाभ की जानकारी मिली। उन्होंने प्रयोग के तौर पर केंचुआ खाद का उत्पादन शुरू किया।

उन्होंने खुद की ही फसल में इसका प्रयोग किया। कम लागत में मुनाफा देख उन्होंने इसका विस्तार किया। एक साल में ही दर्जनों गाँवों के कई किसान उनसे जुड़ गए। उनकी लगन और उत्पादन के तरीके को देखकर ब्लाक से उन्हें जिला मुख्यालय पर भेजा गया। सरकार से भी वह प्रोत्साहित हुए तो उन्होंने केंचुआ खाद को बिजनेस के रूप में अपना लिया।

शंभूदयाल शर्मा कहते हैं, ”अब इस खाद की सप्लाई हाथरस, कासगंज, औरेया, पीलीभीत, बरेली, मुरादाबाद, झांसी आदि जिलों में है। खाद के निकलने वाले सरकारी टेंडरों के माध्यम से उनकी सप्लाई इतनी अधिक है कि कभी कभी तो वह पूर्ति भी नहीं कर पाते। स्थानीय किसान भी जैविक खाद खरीद ले जाते हैं।”

लहलहा रही है पिपरमिंट और मक्का की फसल

जैविक खाद के उत्पादन से इस वक्त किसानों की मक्का और पिपरमिंट की फसल लहलहा रही है। मक्का और पिपरमिंट में किसानों को अच्छा मुनाफा मिलने की उम्मीद है। किसान जैविक खाद के प्रयोग से गेहूं और आलू की भी अच्छी पैदावार ले चुके हैं। किसान जगवीर सिंह (50वर्ष) का कहना है,

“रसायन खाद से पैदा होने वाली फसल स्वास्थ्य के लिए लाभदायक नहीं है। जैविक खाद से पैदा होने वाली स्वास्थ्य के लिए नुकसान दायक नहीं है। साथ ही कम लागत से अच्छी पैदावार मिलती है। मक्का और पिपरमिंट की फसल अच्छी हो रही हैं। हाल ही में गेहूं ने अच्छा मुनाफा दिया।”

आसपास के किसानों को दे रहे प्रेरणा

केंचुआ की खेती से हो रहे फायदे को देखकर आसपास के किसान भी प्रेरणा ले रहे हैं। जागरुक किसान अब रसायन खाद का प्रयोग छोड़कर केंचुआ की खाद से फसल पैदा कर रहे हैं।

ऐसे होता है केचुआ खाद का उत्पादन

सबसे पहले गोबर एकत्रित किया जाता है। गोबर को हिस्सों में बांटकर उसके बेड बनाए जाते हैं। जिन पर जिला मुख्यालय से मिलने वाला विशेष किस्म के केंचुआ छोड़ दिए जाते हैं। ऊपर से टाट का बोरा-पत्ता आदि डाल दिए जाते हैं।

दो महीने तक बस रोज सुबह शाम पानी का छिड़काव करते रहें। धीरे धीरे खाद उतारते जाएं। इस खाद में ही केंचुआ नर और मादा भी होते हैं, जिनसे केंचुओं की संख्या भी बढ़ती जाती है और खाद का उत्पादन भी। केंचुआ जितने बढ़ जाएं उसी हिसाब से गोबर के बेड बढ़ा लेने चाहिए।

नींबू का बाग है फायदे का सौदा, 2 एकड़ में होती है 6 लाख की कमाई

एक किसान अपने पौने दो एकड़ नीबू के बगीचे की लागत से परेशान था, सिर्फ लागत ही लाखों रुपए में पहुंच जाती थी। अभिषेक जैन ने इस बढ़ी लागत को कम करने के लिए बाजार से रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाएं लेनी बंद कर दी। पिछले डेढ़ साल से जैविक तरीके अपनाने से इनकी हजारों रुपए की लागत कम हो गयी है। लागत कम होने से ये नीबू के बगीचे से बाजार भाव के हिसाब से सालाना पांच से छह लाख रुपए बचा लेते हैं।

राजस्थान के भीलवाड़ा जिला मुख्यालय से 80 किलोमीटर दूर संग्रामपुर गाँव के अभिषेक जैन (34 वर्ष) बीकॉम करने के बाद मार्बल के बिजनेस से जुड़ गये। अभिषेक जैन गाँव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, “पिता के देहांत के बाद बिजनेस छोड़कर पुश्तैनी जमीन को सम्भालना पड़ा। खेती करने के दो तीन साल बाद मैंने ये अनुभव किया कि एक तिहाई खर्चा सिर्फ खाद और दवाइयों में निकल जाता है।

इस बढ़ती लागत को कम करने के लिए प्रयास करना शुरू कर दिया था।” वो आगे बताते हैं, “लागत कम करने के लिए पिछले डेढ़ साल पहले साकेत ग्रुप के बारे में पता चला, जो जैविक खेती के लिए किसानों को प्रशिक्षण देता है। इस ग्रुप से जुड़ने के बाद हम पूरी तरह से नीबू के बगीचे को जैविक ढंग से कर रहे हैं, इससे जो लागत 33 प्रतिशत आती थी अब वो 10 प्रतिशत पर आ गयी है।”

इस नीबू के बगीचे से अभिषेक बचा लेते हैं सालाना लाखों रुपए अभिषेक को खेती करने का पहले कोई अनुभव नहीं था। इनकी कुल छह एकड़ सिंचित जमीन है, पौने दो एकड़ जमीन में नीबू की बागवानी और दो एकड़ में अमरुद की बागवानी ये पिछले कई वर्षों से कर रहे हैं। साल 2007 में इनके पिता को हार्ट अटैक से देहांत हो गया।

पुश्तैनी जमीन को करने के लिए इन्होने अपने बिजनेस को बंद किया और 2008 से खेती करने लगे। “खेती को लेकर पहले मेरा कोई अनुभव नहीं था, पर जब खेती करना शुरू किया तो धीरे-धीरे चीजों को सीखने लगा था। हमारे यहाँ नीबू का बगीचा हमेशा से पिता जी खुद करते थे, अमरुद और बाकी की फसलें बटाई पर उठा दी जाती थी।”

अभिषेक बताते हैं, “नीबू की बागवानी में हर साल सात आठ लाख रुपए निकल आते थे लेकिन लागत भी डेढ़ से पौने दो लाख आती थी। इस लागत में सबसे ज्यादा पैसा खाद और कीटनाशक दवाइयों में खर्च हो रहा था। इस लागत को कम करने के लिए जब मैंने बहुत रिसर्च किया तो सोशल साइट के जरिये साकेत पेज पर पहुंचे, जहाँ किसानो को लागत कम करने के तौर तरीके सिखाए जाते थे।”

एक बार नीबू का बगीचा लगाने पर 30 साल तक रहता है जबकि अमरुद का बगीचा 25 साल तक रहता है। अभिषेक के पौने दो एकड़ खेत में नीबू के लगभग 300 पौधे 15 साल पहले से लगे हैं। 25 रुपए एक पौधा पर खर्चा आता है। नीबू के पौधे लगाने के तीन या साढ़े तीन साल बाद से फल निकलने शुरू हो जाते हैं। दो साल तक इसमे कोई भी फसल ले सकते हैं।

अभिषेक बताते हैं, “नीबू के बगीचे में अगर खाद और कीटनाशक दवाएं न डालनी पड़ें तो इसमे ज्यादा कोई खर्चा नहीं होता है। नीबू और गोबर की खाद का ही प्रयोग करें तो सिर्फ मजदूर खर्च ही आता है, बाकी की लागत बच जाती है। एक पौधे का एक साल में देखरेख में सिर्फ 100 रुपए का खर्चा आता है।”

जैविक खेती करने से इनकी लागत सिर्फ 10 प्रतिशत आती है वैसे तो नीबू की पैदावार सालभर होती रहती है। लेकिन सबसे ज्यादा नीबू जुलाई से अक्टूबर में निकलता है। अभिषेक का कहना है, “एक पौधे से एक साल में बाजार भाव के हिसाब से औसतन तीन हजार का प्रोडक्शन निकल आता है, नीबू बाजार भाव के अनुसार 20 रुपए से लेकर 150 रुपए किलो तक रहता है।

पिछले साल आठ लाख रुपए का नीबू बेचा था, इस साल छह साढ़े पांच लाख रुपए का बेच चुका हूँ।” वो आगे बताते हैं, “अमरुद के बगीचे से सालाना छह लाख रुपए निकल आते हैं, नीबू और अमरुद के बगीचे से लागत निकाल कर हर साल 12 से 14 लाख रुपए बच जाते हैं। बगीचे के अलावा मक्का, ज्वार, उड़द, मूंगफली, गेहूँ, जौ, चना सरसों उगाते हैं। सब्जियों में मिर्च, भिन्डी, ग्वारफली, बैंगन, टमाटर, फूलगोभी, पत्तागोभी बोई जाती हैं।”

अभिषेक सभी किसानो को ये सन्देश देते हैं, “अगर खेती में मुनाफा कमाना है तो बाजार पर अपनी निर्भरता को कम करना होगा। जैविक खादें और कीटनाशक दवाइयां घर पर बनानी होंगी, पुराने बीजों को बचा कर रखना होगा। तभी एक आम किसान की लागत कम होगी और बचत ज्यादा होगी।

पिछले डेढ़ साल में सिर्फ जैविक तौर तरीके अपनाकर हमने अपनी लाखों रुपए की लागत कम कर ली है, जबकि नीबू के उत्पादन में कोई असर नहीं पड़ा।” अभिषेक धीरे-धीरे अपनी पूरी खेती को जैविक तरीके से करने लगे हैं क्योंकि इसमे इनकी लागत बहुत कम हो रही है।

खेत नहीं, छत पर फसल उगाते दिल्ली के किसान

उत्तरी दिल्ली में स्थित तिब्बती रिफ्यूजी कॉलोनी के पीछे यमुना नदी के किनारे पिछले तीस साल से खेती करने वाले संतोष कहते हैं कि जमीन पर खेती करने के मुकाबले छत पर खेती करना ज्यादा आसान और कम मेहनत वाला है. वह संतोष खेती के परंपरागत तरीके से आगे वैकल्पिक खेती के कौशल प्राप्त कर उत्साहित हैं.

छत पर खेती का विचार अजीब लगता है लेकिन दिल्ली में कई इमारतों की छतों पर इस तरह की खेती हो रही है. अंबेडकर यूनिवर्सिटी में फेलो इन एक्शन रिसर्च, सेंटर फॉर डेवलेपमेंट प्रैक्टिस के निशांत चौधरी के दिमाग में दिल्ली के ऐसे किसानों की मदद करने का ख्याल आया, जिनकी जमीन पर दूषित पानी से खेती होती है और उस पर दिल्ली विकास प्राधिकरण गाहे-बगाहे कार्रवाई करता है. दिल्ली में राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने यमुना किनारे खेती और कृषि से जुड़ी अन्य गतिविधियों पर रोक लगा रखी है.

निशांत चौधरी ने डॉयचे वेले को बताया, “दिल्ली में जो किसान यमुना किनारे खेती करते हैं उन पर दिल्ली विकास प्राधिकरण की कार्रवाई का खतरा मंडराता रहता है, क्योंकि यमुना किनारे की जमीन पर केंद्र सरकार दावा करती है.” इसीलिए उन्होंने सोचा, क्यों ना विस्थापित होने वाले किसानों के लिए ऐसा मॉडल तैयार किया जाए जिससे उनकी आजीविका चलती रहे और वे आर्थिक तौर पर कमजोर होने से बचे.

कोकोपीट से खेती

निशांत बताते हैं, “मैंने जमीन की बजाय छत पर खेती के उपायों के बारे में सोचा और रिसर्च के बाद किसानों के साथ मिलकर मॉडल तैयार किया. मैंने इसका नाम क्यारी रखा. ” यह एक तरह का बस्ता होता है जो बहुत ही मजबूत मैटेरियल से बना होता है.

इसमें में नारियल का खोल (सूखा छिलका) मुख्य तौर पर डाला जाता है. छत पर ज्यादा वजन ना पड़े और पानी रिसने की समस्या ना हो इसके लिए मिट्टी का इस्तेमाल नहीं होता है. इस बस्ते में नारियल के खोल के अलावा कुछ मिश्रण और मिलाया जाता है जिससे फसल तेजी से और गुणवत्ता के साथ होती है.

इस खास बस्ते में नारियल के खोल के अलावा कई तरह के जैविक चीजें पड़ती हैं. नारियल का खोल मिट्टी के मुकाबले 10 से 15 गुणा ज्यादा हल्का होता है. इस मिश्रण में 12 और चीजें पड़ती हैं जिसे निशांत ने किसानों की मदद से तैयार किया है.

निशांत कृषि उत्पादों की मात्रा के मुकाबले गुणवत्ता पर ज्यादा जोर देते हैं. वह कहते हैं, “हम क्वालिटी का खास ध्यान रखते हैं. इन क्यारियों में केमिकल का इस्तेमाल नहीं होता है. हम केमिकल की जगह पारंपरिक कीटनाशक का इस्तेमाल करते हैं जैसे छाछ, नींबू, मिर्ची वगैरह, जो घर पर आसानी से पाई जाती है. इस कारण सब्जी की गुणवत्ता उच्चतम होती है.”

बिना मिट्टी और कम पानी से खेती

निशांत ने रिसर्च कर ऐसा मॉडल तैयार किया जिसमें मिट्टी की खपत नहीं होती और पानी भी कम से कम लगता है. निशांत बताते हैं कि उन्हें इस मॉडल की प्रेरणा केरल से मिली. छत पर खेती करने के लिए निशांत ने ऐसी क्यारी बनाई है जो वॉटर प्रूफ होती है और उससे पानी का छत पर टपकने का खतरा नहीं रहता है.

हर क्यारी में नारियल का खोल, कंपोस्ट और कुछ खास तरह की सामग्री डाली जाती है जिससे फसल अच्छी होती है. नारियल के खोल की वजह से छत पर इस खास बस्ते का वजन नहीं पड़ता है, साथ ही इस बस्ते में पानी भी कम लगता है.

उदाहरण के तौर पर चार फीट के एक बस्ते में गर्मियों के दिनों में 5 लीटर पानी दिन में दो बार लगता है जबकि सर्दियों में दो दिन में एक बार 5 लीटर पानी से काम चल जाता है. जैविक पदार्थ होने की वजह से मेहनत भी कम लगता है.

क्यारी बनाने की ट्रेनिंग लेने वाले और उस पर काम करने वाले किसान संतोष बताते हैं, “इस क्यारी की खास बात ये है कि इसमें गैरजरूरी चीजें नहीं होती, चाहे घास हो या जंगली पेड़, ये काफी हल्का होता जिससे बार-बार खुदाई की जरूरत नहीं होती. जब हम जमीन पर खेती करते हैं तो उसमें मेहनत कई गुना ज्यादा लगती है, पानी का इस्तेमाल भी ज्यादा होता है लेकिन मुझे लगता है कि भविष्य में हमें इस तरह की खेती पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए.”

छत पर खेत बनाकर बस 19 हजार में उगाते हैं 700kg सब्ज़ियां

छत पर खेती का विचार अजीब लगता है, लेकिन दिल्ली समेत कई बड़े शहरों में आजकल इमारतों की छत पर इस तरह की खेती हो रही है. कुछ इसी तरह के आइडिया को आईआईटी ग्रेजुएट कौस्तुभ खरे और साहिल पारिख ने अपनाकर अपना बिजनेस शुरू किया है. उनकी कंपनी खेतीफाई सिर्फ 19 हजार रुपये में 200 वर्ग मीटर की छत को खेत बनाकर 700 किलोग्राम तक सब्जियां उगाती है. आइए जानें उनके बारे में…

बिना मिट्टी और कम पानी से खेती

इन दोनों ने ऐसा मॉडल तैयार किया है, जिसमें मिट्टी की खपत नहीं होती और पानी भी कम से कम लगता है. छत पर खेती करने के लिए ऐसी क्यारी बनाई है जो वॉटर प्रूफ होती है और उससे पानी का छत पर टपकने का खतरा नहीं रहता है.

जैविक सामग्री से लैस इन क्यारियों में भिंडी, टमाटर, बैंगन, मेथी, पालक, चौलाई, पोई साग और मिर्च उगता हैं. पानी मीठा होने की वजह से सब्जियां भी स्वादिष्ट होती हैं.

इसमें में नारियल का खोल (सूखा छिलका) मुख्य तौर पर डाला जाता है. छत पर ज्यादा वजन ना पड़े और पानी रिसने की समस्या ना हो इसके लिए मिट्टी का इस्तेमाल नहीं होता है. इस बस्ते में नारियल के खोल के अलावा कुछ मिश्रण और मिलाया जाता है, जिससे फसल तेजी से और गुणवत्ता के साथ होती है.

आप भी कर सकते हैं ऐसा

जिस तरह से खेती के लिए जमीन कम हो रही हैं, भविष्य में इन क्यारियों की मांग बढ़ेगी, 4 फीट गुणा 4 फीट की चार क्यारियों लगाने पर एक परिवार अपने महीने भर की जरूरत की सब्जी उगा सकता है. एक घंटा इन क्यारियों में समय लगाने से मन लायक सब्जी उगाई जा सकती है.

एक तरीका ये भी हैं

खेतों के घटने और ऑर्गनिक फूड प्रोडक्ट की मांग बढ़ने से अर्बन फार्मिंग में नई और कारगर तकनीकों का चलन बढ़ता जा रहा है. मांग पूरी करने के लिए कारोबारी और शहरी किसान छतों पर, पार्किंग में या फिर कहीं भी उपलब्ध सीमित जगह का इस्तेमाल पैदावार के लिए कर रहे हैं.

इन तकनीकों में फिलहाल जो तकनीक सबसे ज्यादा सफल है उसमें मिट्टी का इस्तेमाल ही नहीं होता. मिट्टी न होने से इसे छतों पर छोटी जगह में आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है. ये तकनीक इतनी सफल है कि सही जानकारी, सही सलाह से लगभग 1 लाख रुपए के खर्च से से आप घर बैठे सालाना 2 लाख रुपए तक की सब्जियां उगा सकते हैं.

छत पर खेती

इस तकनीक को हाइड्रोपानिक्स कहा जाता है. इस तकनीक की खास बात यह है कि इसमें मिट्टी का इस्तेमाल बिल्कुल भी नहीं होता है. इससे पौधों के लिए जरूरी पोषक तत्वों को पानी के सहारे सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है.

क्या है हाइड्रपानिक्स तकनीक

हाइड्रपॉनिक्स तकनीक में सब्जियां बिना मिट्टी की मदद से उगाई जातीं हैं.इससे पौधों के लिए जरूरी पोषक तत्वों को पानी के सहारे सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है. पौधे एक मल्टी लेयर फ्रेम के सहारे टिके पाइप में उगते हैं और इनकी जड़े पाइप के अंदर पोषक तत्वों से भरे पानी में छोड़ दी जाती हैं.मिट्टी न होने की वजह से न छतों पर भार बढ़ता है. वहीं, बिल्कुल अलग सिस्टम होने की वजह से छत में कोई बदलाव भी नहीं करने पड़ते.

नई टेक्नोलॉजी

हाइड्रपानिक्स एक पौधों को उगाने का बिल्कुल नया तरीका है और इसे किसान या कारोबारी अलग अलग तरह से इस्तेमाल में ला सकते हैं. वहीं इस क्षेत्र में काम कर रही कई कंपनियां भी आपको शौकिया गार्डन से लेकर कमर्शियल फार्म तक स्थापित करने में मदद कर सकती हैं.

इस बारे में हाइड्रपानिक्स कंपनी ‘हमारी कृषि’ बताती हैं कि उपज के लिए तैयार फ्रेम और टावर गार्डेन ऑनलाइन बेच रही है.कंपनी के 2 मीटर ऊंचे टावर में 40 पौधे लगाने की जगह है. कंपनी के मुताबिक करीब 400 पौधे वाले 10 टावर की लागत 1 लाख के करीब है. इस कीमत में टावर, सिस्टम और जरूरी पोषक तत्व शामिल हैं.

कंपनी के मुताबिक अगर सिस्टम को सही ढंग से इस्तेमाल किया जाए तो इसके बाद सिर्फ बीज और न्यूट्रिएंट का ही खर्च आता है. ये 10 टावर आपकी छत के 150 से 200 वर्ग फुट एरिया में आसानी से खड़े हो जाएंगे. छोटी जगह पर रखे फ्रेम को नेट शेड और बड़े स्तर पर खेती के लिए पॉली हाउस बनाकर ढकने से मौसम से सुरक्षा मिलती है.

कमाई का बड़ा मौका

  • कंपनी हमारी कृषि के मुताबिक, ये तकनीक लोगों को रोजगार देने का अच्छा जरिये हो सकती है, क्योंकि परंपरागत कृषि के मुकाबले इसके मार्जिन बेहतर हैं.
  • शर्मा के मुताबिक, एक पॉड से साल भर में 5 किलो लेटिस (सलाद पत्ता) की उपज मिल सकी है। ऐसे में 10 टावर यानि 400 पॉड से 2000 किलो सालाना तक उपज मिल सकती है. फिलहाल लेटिस की कीमत भारत में 180 रुपए किलो है, शर्मा के मुताबिक अगर थोक में 100 रुपए किलो भी मिलते हैं तो अच्छी कंडीशन में साल में 2 लाख रुपए की उपज संभव है.
  • वहीं उनके मुताबिक आम स्थितियों में आप आसानी से एक साल में अपना निवेश निकाल सकते हैं. अगले साल रिटर्न ज्यादा होगा क्योकिं आपको सिर्फ रखरखाव, बीज और न्यूट्रिएंट का खर्च ही करना है. यानी आप अपनी छत के सिर्फ 150 से 200 वर्ग फुट के इस्तेमाल से एक साल में ही अपना एक लाख का निवेश निकाल कर प्रॉफिट में आ सकते हैं.

नौकरी नहीं मिली तो शुरू की गुलाब की खेती, हर महीने 50 हजार रु कर रही इनकम, लोन लेकर शुरू किया बिजनेस

इजहार-ए-मोहब्बत का प्रतीक माना जाने वाला गुलाब अपनी विभिन्न रंगों और दिलकश खुशबू के चलते सबके दिलों पर राज करता है। बच्चे से लेकर बूढ़े तक इसके दीवाने हैं। Rose के प्रति दिनोंदिन बढ़ रहे लोगों के प्यार ने महाराष्ट्र के नागपुर के माणेवाडा की रहने वाली प्रणाली शेवाले को इसकी खेती के लिए आकर्षित किया। एग्रीकल्चर में डिप्लोमा करने बाद नौकरी नहीं मिली तो उसने गुलाब की खेती शुरू की और आज वह हर महीने इससे 50 हजार रुपए की इनकम कर रही हैं।

दो महीने की ली ट्रेनिंग

प्रणाली ने मनीभास्कर को बताया कि उन्होंने हॉर्टिकल्चर में डिप्लोमा किया है। डिप्लोमा करने के बाद नौकरी की तलाश की, लेकिन इसमें सफलता नहीं मिली। बचपन से गुलाब के प्रति प्यार के चलते उनको इसमें बिजनेस का मौका दिखा।

उन्होंने देखा कि बाजार में गुलाब की मांग काफी ज्यादा है। जन्मदिन, सालगिरह, वैलेंटाइन डे और मदर्स डे जैसे अवसर पर गुलाब के इस्तेमाल का चलन बढ़ा है। इसलिए उन्होंने नागपुर स्थित एग्री क्लिनिक एंड एग्री बिजनेस सेंटर्स से दो महीने की ट्रेनिंग ली। ट्रेनिंग पूरी होने के बाद प्रणाली पॉलीहाउस एंड फ्लोरिकल्चर की शुरुआत की।

13 लाख का लोन ले शुरू की गुलाब की खेती

ट्रेनिंग पूरी करने के बाद प्रणाली ने अपने पिता की मदद से एक एकड़ जमीन लीज पर लेकर गुलाब की खेती के लिए पॉलीहाउस का निर्माण किया। शुरुआत में उनके इस प्रोजेक्ट पर किसी बैंक को भरोसा नहीं होने की वजह से 6 महीने तक लोन मिलने का इंतजार किया।

छह महीने बाद बैंक ऑफ इंडिया से उन्हें 13 लाख रुपए का लोन लिया। 13 लाख का लोन और कुछ जमा पूंजी से 10,000 वर्ग फुट में पॉलीहाउस बनाकर टॉप सीक्रेट वैरायटी के साथ गुलाब की खेती शुरू की। इस प्रोजेक्ट पर उनको कुल 16 लाख रुपए का खर्च आया। उन्होंने नवंबर 2016 में प्रणाली पॉलीहाउस एंड फ्लोरिकल्चर की नींव रखी थी।

सब्सिडी मिलने का इंतजार

प्रणाली कहती हैं कि बैंक लोन पर उनको नाबार्ड से 44 फीसदी की सब्सिडी मिली थी। लेकिन डेढ़ साल से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद उनको अभी तक सब्सिडी नहीं मिली है। इसलिए लोन का इंटरेस्ट भरना भारी पड़ रहा है।

मंथली 50 हजार हो जाती है इनकम

प्रणाली के मुताबिक, गुलाब की खेती से वह हरेक महीने 50 हजार रुपए की कमाई कर लेती हैं। कभी-कभी कमाई कम भी होती है। पहली बार उनको गुलाब की खेती से 35 हजार रुपए का मुनाफा हुआ था।

गेहूं और धान के बीच के समय लगाए यह फसल , एक एकड़ से होगी 35 हजार की फसल

तलवंडी साबो ब्लॉक के अधीन पड़ते गांव गोलेवाला का किसान निर्मल सिंह गेहूं की कटाई करने के बाद सट्‌ठी मूंगी की बिजाई करके अपनी आमदनी में मुनाफा कर रहा है। फसल से होने वाले शानदार मुनाफे को देखते हुए इस साल उसने 10 एकड़ में मूंग फसल की बिजाई की है।

निर्मल सिंह धान व बासमती से पहले सट्‌ठी मूंगी की काश्त करता है, इससे जहां एक अतिरिक्त फसल के जरिए ज्यादा आमदनी होती है, वहीं मूंगी की फसल अपनी जड़ों के प्राकृतिक गुण के कारण जमीन में नाइट्रोजन फिक्सेशन के जरिए जमीन में नाइट्रोजन खाद की मात्रा बढ़ाती है। इस तरह से अगली फसल को कम यूरिया खाद डालने की जरूरत पड़ती है।

जमीन की सेहत में हुआ सुधार

निर्मल सिंह बताया कि फसली चक्कर का हिस्सा बनाने से उसकी जमीन की सेहत में सुधार हुआ है। उन्होंने बताया कि जिस खेत में मूंगी की फसल की बिजाई की जाती है, उस खेत में बासमती धान लगभग 20 जुलाई के बाद ही लगाया जाता है। इससे जहां पानी की बचत होती है, वहीं बिजली की भी बचत होती है तथा यह धान परमल धान जोकि 20 जून को बताया जाता है, के बराबर ही पक कर तैयार हो जाता है।

मुख्य खेतीबाड़ी अफसर डॉ. गुरदित्ता सिंह सिधू ने बताया कि जिले में लगभग 2500 एकड़ से ज्यादा क्षेत्रफल में सट्‌ठी मूंगी की बिजाई करके खेतीबाड़ी विभाग जिले में फसल विभिन्नता को प्रोत्साहित कर रहा है। इससे मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाकर उसे और उपजाऊ बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं।

उन्होंने बताया कि सट्‌ठी मूंगी 60 दिन की फसल जोकि गेहूं व धान की दरम्यान खाली समय में बिजाई की जाती है और किसानों को अच्छा फायदा देती है। इस किस्म का औसतन झाड़ 4 से 5 क्विंटल प्रति एकड़ है। उन्होंने बताया कि सट्‌ठी मूंगी का बीज 10 किलो प्रति एकड़ के हिसाब से बरता जाता है।

गेहूं काटने के बाद गर्मी के मौसम की मूंगी बिना खेत में हल चलाए ही बिजाई की जा सकती है। अगर खेत में गेहूं का नाड़ नहीं है तो मूंगी जीरो टिल ड्रिल के जरिए बिजाई की जाए। उन्होंने बताया कि विभाग की ओर से किसानों को सट्‌ठी मूंगी के बीज की फ्री आफ कास्ट मिनी किट बांटी जाती हैं। मूंगी की फसल 20 मार्च से अप्रैल के तीसरे सप्ताह तक बिजाई की जाती है।