खेती में पेश की मिसाल, एक एकड़ से कमा रहे तीन लाख

हरियाणा के फरिदाबाद जिले के मनजीत ने खेती में एक सफल उदाहरण पेश किया है। जिले के मानव रचना विश्वविद्दालय से बीटेक करने के बाद इस युवा ने खेती की राह चुनी। पढ़ाई के दौरान उन्हें जौब की इच्छा थी लेकिन उन्होंने खेती करने की अपनी इच्छा जताई।

मनजीत ने मल्टीपल ऑर्गेनिक क्रॉपिंग के माध्यम से खेती शुरु की और एक एकड़ में बेड सिस्टम से आठ अलग-अलग तरह की फसलें उगाईं। वहीं इन आठ किसमों में अमेरिकी केसर की खेती सबसे ज्यादा सफल हुई। अगर इसकी उत्पादन की बात करें तो मनजीत ने केवल एक एकड़ जमीन से ढ़ाई से तीन किलो अमेरिकी केसर उगाया है।

मनजीत का मानना है कि एक एकड़ में अमेरिकन केसर की फसल औसतन ढ़ाई से तीन किलो पैदा होती है और यह दिल्ली के बाजार में 50 से 70 हजार रुपये किलो के हिसाब से बिकती है। इसके अलावा उन्होंने कहा की अभी गन्ना खेत में तैयार है जो मुनाफा को अधिक कर देगी। आगे मनजीत ने बताया की एक एकड़ में वो दाल की भी खेती करेंगे जिससे उनका मुनाफा ज्यादा हो सके।

मनजीत चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्दालय से एमबीए (एग्रीकल्चर) भी कर चुके हैं और यहां से उनकी खेती करने की इच्छा ज्यादा हुई। हालांकी उन्होंने बताया की उनकी खेती करने की इच्छा तो बचपन से ही थी लेकिन विश्वविद्दालय में कई तरह के मिले प्रशिक्षण ने उनकी राह आसान बना दी। वहीं वो मानते हैं कि उनकी नौकरी तो लग जाती लेकिन वो शायद उससे संतुष्ट नहीं होते तो उऩ्होंने ऑर्गेनिक खेती की तरफ कदम बढ़ाया।

खेती के वक्त मनजीत ने रसायनिक दवाओं का प्रयोग करना उचित नहीं समझा और केवल गोबर और अन्य अपशिष्ट पदार्थों से सभी फसलों के बीमीरीयों का निदान किया। मनजीत ने बताया कि उनहोंने एक एकड़ में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर अन्य फसलों को उगाया। एक एकड़ में गन्ने के साथ-साथ अमेरिकी केसर, सरसों, लहसुन, धनिया, मेथी, चना और गेहूं की फसल उगाई।

मणिपुर के एक किसान ने धान की खेती में किया अनोखा कमाल

मणिपुर के एक किसान ने ऐसा कमाल कर दिखाया है। जिसपर यकीन कर पाना आसान नहीं है। 5 साल पहले 63 साल के किसान देवकांत ने इम्फाल के अपने घर में चावल की 4 किस्मों की पैदावार शुरू की थी। और देखते ही देखते जैव विविधता को संजोने के माहिर पोतशंगबम देवकांत ने धान की सौ परंपरागत प्रजातियों की ऑर्गेनिक खेती कर एक नई मिसाल कायम कर ली।

वर्तमान समय में देवकांत सिर्फ धान की दुलर्भ प्रजातियों की ही खेती नहीं करते हैं, बल्कि यह प्रजातियां औषधीय गुणों से भी भरपूर होती हैं। उनमें से सबसे मशहूर है “चखाओ पोरेटन” नाम का काला चावल। इस काले चावल के औषधीय गुणों से वायरल फीवर, नजला, डेंगू, चिकनगुनिया और कैंसर जैसे रोग तक ठीक हो जाते हैं। देवकांत को उनके इस अनोखे काम के लिए 2012 में पीपीवीएफआरए संरक्षण अवार्ड (प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वैराइटीज एंड फारमर्स राइट्स एक्ट) भी मिल चुका है।

जुनून और लग्न से हासिल किया मुकाम

मणिपुर के 63 वर्षीय पोतशंगबम देवकांत ने अपने जुनून और लग्न के साथ एक दो नहीं बल्कि 165 तरह के चावलों की किस्मों की खोज कर डाली है। 5 साल पहले पी देवकांत ने इम्फाल के अपने घर में चावल की खेती अपने शौक के लिए शुरु की थी। लेकिन उनका यह जुनून बन गई यह वह खुद भी नहीं जानतें।

देवकांत धान की पारंपरिक किस्मों की तलाश में मणिपुर की पहाड़ियों पर बसे दूरदराज के गांवों की खाक छानते नजर आते हैं। देवकांत को धान की कई किस्मों के बीज मिले, हालांकि कई किस्मों के बीज अब तक वह नहीं जुटा पाए हैं। इस उम्र में भी धान को लेकर देवकांत का जज्बा कम नहीं है और उन्होंने जितनी हो सके, उतनी किस्मों के बीज इकट्ठा करने की ठानी है।

जलवायु नहीं करती सपोर्ट

मणिपुर के पहाड़ी इलाकों की जलवायु एक जैसी नहीं है, हर इलाके की जलवायु अलग किस्म को सपोर्ट करती है। धान की प्रजातियों के लिए मणिपुर बहुत ही समृद्ध राज्य है। अपने हरे-भरे खेतों में देवकांत ने धान की 25 प्रजातियों को उगाया है। हालांकि उन्होंने अब तक सौ देसी प्रजातियों को संरक्षित किया है। आयुर्वेदिक गुणों से भरपूर इन प्रजातियों को देश भर में उगाया जा सकता है।

इम्फाल के गांव में उनका धान का खेत प्रयोग करने की जगह का रूप ले चुका है। देवकांत को उनके इस अनोखे काम के लिए 2012 में पीपीवीएफआरए संरक्षण अवार्ड (प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वैराइटीज एंड फारमर्स राइट्स एक्ट) भी मिल चुका है।

धान की दुर्लभ प्रजातियों का संरक्षण

देवकांत ने पांच बेहद दुलर्भ, आयुर्वेदिक गुणों से भरपूर और पौष्टिक प्रजातियों को भी संरक्षित किया है, जिसमें चखाओ पोरेटन नाम का काला चावल भी शामिल है। उन्होंने कम पानी में उपजने वाले सफेद चावल के साथ ही भूरे चावल और काले चावल की कई प्रजातियों का प्रचार-प्रसार भी किया है।

खर्च 30 हजार, महज 4 महीने की मेहनत के बाद कमाए ये किसान कमाने लगा 8 लाख रु

अधिकतर लोग खेती को घाटे का सौदा मानते हैं और घटती जमीन के चलते किसान परिवारों का अपने पुस्तैनी काम से मोह भंग हो रहा है। ऐसे में राजस्थान के किसान ने खेती का नया रास्ता खोज कर बाकी लोगों को हैरान कर दिया।

सीदपुरा के किसान ने खेती से मुनाफे का नया रास्ता खोजा है। दुर्गाप्रसाद ओला ने नीदरलैंड खीरा की बुवाई कर सिर्फ चार महीने में आठ लाख रुपए की पैदावार की है। किसान का मानना है कि नीदरलैंड से बीज मंगवाकर खीरा की पैदावार करने वाला वह राजस्थान में पहला किसान है। इस खीरे में बीज नहीं होने की वजह से बड़े होटल-रेस्त्रां में डिमांड रहती है।

दुर्गाप्रसाद ने बताया कि उसने कुछ साल पहले उद्यान विभाग से 18 लाख रुपए का अनुदान लेकर खेत में सैडनेट हाउस लगाया। अनुदान मिलने के बाद छह लाख रुपए खुद को खर्च करने पड़े। एक कंपनी प्रतिनिधि से मिली जानकारी के बाद 72 हजार रुपए में नीदरलैंड से बीज मंगवाया। एक बीज के छह रुपए लगते हैं।

30 हजार रुपए बुवाई अन्य खर्चा लग गया। चार महीने के दौरान वह आठ लाख रुपए के खीरे बेच चुका है। खर्चा निकालकर सात लाख रुपए की आय हुई है। उद्यान विभाग के सहायक निदेशक भगवान सहाय यादव के मुताबिक शेखावाटी में पहला किसान है, जिसने नीदरलैंड किस्म का खीरा उगाया है।

बीज रहित और गुणवत्ता अच्छी होने से बाजार में खीरा की मांग भी देशी से ज्यादा रही। कारोबारियों के अनुसार मंडी में पहली बार नीदरलैंड का बीज रहित खीरा आया है। ऐसे में मंडी में खीरा के भाव भी देशी से दोगुना ज्यादा रहे।

स्थानीय खीरे के थोक भाव मंडी में किसान को 20 रुपए किलो मिल रहा है, वहीं नीदरलैंड का खीरा 40 से 45 रुपए प्रति किलो तक बिक रहा है। तो अगर आपके पास भी खाली जमीन या खेत है तो एक बार ये आइडिया अपना कर देखिए क्या पता कब किस्मत बदल जाए।

खरबूजे की फसल से किसान ने 70 दिन में कमाए 21 लाख रूपए

एक ओर जहां गुजरात में किसान आलू की फसल की अच्छी फसल न मिलने से परेशान हैं, वहीं एक किसान ने फसल बदलकर काफी मुनाफा कमा लिया है। गुजरात के बनासकांठा जिले के किसान खेताजी सोलंकी ने आलू की जगह खरबूजे की फसल लगाई है जो उनके लिए अच्छी साबित हुई है।

इलाके में आलू की फसल के अच्छे दाम न मिलने पर सभी किसान परेशान थे। ऐसे में अपने सात बीघा के खेत में सोलंकी ने आलू की जगह खरबूजे की फसल बोने का फैसला किया। सातवीं पास सोलंकी ने गांव के दूसरे लोगों को भी रास्ता दिखाया।

नई तकनीकों के इस्तेमाल से फायदा

उन्होंने आधुनिक तकनीकों का प्रयोग कर खरबूजा उगाया। उन्होंने बेहतर बीज, टपक सिंचाई और सोलर वॉटरपंप का इस्तेमाल किया। फरवरी में लगाई फसल अप्रैल में तैयार हो गई और 70 दिन में उन्होंने 21 लाख रुपये कमा लिए। उनके खेत में 140 टन खरबूजा पैदा हुआ।

उन्होंने 1.21 लाख रुपये खर्च किए थे। उनकी फसल इतनी अच्छी थी कि उन्हें उसे बेचने के लिए कहीं जाना भी नहीं पड़ा और दूसरे राज्यों से व्यापारी उनके पास आकर फसल खरीदकर गए। उन्हें इसके काफी अच्छे पैसे मिले।

खेताजी बहुत पढ़े-लिखे नहीं हैं लेकिन तकनीक का भरपूर इस्तेमाल करते हैं। वह मोबाइल ऐप के जरिये किसानों पर टिप्स लेते हैं और फलों की फसल के लिए नई तकनीकें सीखते रहते हैं। वह अब चेरी टमाटर की फसल लगाना चाहते हैं।

किसान ने 90 दिन में तरबूज की खेती से कमाए 3.5 लाख

देशभर में लगातार किसान सूखे और कर्ज की समस्‍याओं की वजह से आत्‍महत्‍या कर रहे हैं। वहीं कई ऐसे राज्‍य हैं जहां किसानों ने तरबूज की खेती कर अपने जीवन में मिठास भर रहे हैं। उन्‍हीं किसानों में से एक हैं तमिलनाडु के रहने वाले मुरुगा पेरुमल।

तरबूज की खेती से पेरुमल न सिर्फ लोगों को प्रेरित कर रहे हैं बल्कि लाखों में कमाई भी कर रहे हैं। दिलचस्‍प ये है कि उनकी कमाई लागत से करीब 8 गुना ज्‍यादा है। तो आइए समझते हैं पेरुमल के कमाई के गणित को।

तरबूज की खेती को चुना

तमिलनाडु के तिरुवन्नमलाई जिले के रहने वाले मुरुगा पेरुमल के गांव वेपुपुचेक्की के अधिकतर लोग खेती पर निर्भर हैं। सभी ने अलग – अलग फसल की खेती की है। वहीं पेरुमल ने ड्रिप इरीगेशन सिस्‍टम के जरिए तरबूज की खेती की है।

2.2 हेक्टेयर जमीन में की खेती

उन्‍होंने इस खेती के लिए 2.2 हेक्टेयर जमीन का इस्‍तेमाल किया। उन्होंने इसमें 1 हेक्टेयर जमीन का इस्‍तेमाल Pukeeza वैराइटी के लिए किया। जबकि 1.2 हेक्‍टेयर जमीन को अपूर्व वैराइटी के लिए इस्‍तेमाल किया।

कैसे की खेती

  • इसके बाद उन्होंने खेत की चार बार जुताई की ।
  • आखिरी बार जुताई से पहले उन्होंने 25 टन / हेक्टेयर की दर से खाद का इस्‍तेमाल किया।
  • 300 किलोग्राम डीएपी खाद
  • 150 किलो पोटाश एक बेसल डोज
  • एक हेक्टेयर के लिए 3.5 किलो बीज का इस्तेमाल किया ।
  • नवंबर में बीज बोया, ड्रिप सिस्टम के जरिए प्रति दिन 1 घंटे खेत की सिंचाई करते थे।

49 हजार रुपए का लोन

पेरुमल ने वेपुपुचेक्की को-ऑपरेटिव सोसाइटी से 1 हेक्‍टेयर जमीन के लिए 49 हजार रुपए का लोन लिया। पेरुमल पहली बार खेती कर रहे थे इसलिए सरकार की ओर से 50% फर्टिलाइजर सब्‍सिडी भी मिला। ऐसे में उनकी जेब से मामूली खर्च हुए।

70 दिन बाद काटी फसल

पेरुमल के मुताबिक करीब 70 दिन बाद उसने मजूदरों के साथ मिलकर फसल काटा। तब पेरुमल के खेत से Pukeeza वैराइटी के तरबूज 55 टन निकले जबकि अपूर्व वैराइटी में 61 टन तरबूज की पैदावार हुई। वहीं दो सप्‍ताह बाद एक बार फिर फसल काटी गई। इस बार उन्‍हें Pukeeza वैराइटी से 6 टन और अपूर्व वैराइटी से 4 टन तरबूज मिले ।

3 लाख 30 हजार रुपए का मुनाफा

पेरुमल ने तरबूज की पहली खेप 3100 रुप प्रति टन बेची। जबकि दूसरे खेप को 1000 रुपए प्रति टन बेचा। उन्‍होंने कुल 3 लाख 30 हजार रुपए का मुनाफा कमाया।

2 माह के कोर्स ने बदली कि‍स्‍मत, हर माह 1.2 लाख कमा रहे रेड्डी

आई वॉक फार्मिंग, आई टॉक फार्मिंग, आई ब्रीद फार्मिंग – कुछ ऐसा कहते हैं 52 साल के श्री के रंगा रेड्डी, जो आज बेहद सफलतापूर्वक ‘ताजी-ताजी सब्‍जी’ के नाम से एग्री बि‍जनेस कर रहे हैं। फरवरी 2010 में उन्‍होंने नई तकनीकों और ट्रेनिंग का सहारा लेते हुए सब्‍जि‍यों की फार्मिंग शुरू की और आज उनका सालाना टर्नओवर 1 करोड़ रुपए पहुंच गया है।

तेलंगाना के चंदापुर गांव के रहने वाले रेड्डी अब इलाके के लोगों के लि‍ए मि‍साल बन गए हैं। वह हैराबाद के कृषि‍ विश्‍वविद्यालयों व इंस्‍टीट्यूट में फाइनल ईयर के छात्रों को लेक्‍चर भी देते हैं। वह आसपास के कि‍सानों को खेतीबाड़ी के आधुनि‍क तौर तरीकों से वाकि‍फ कराते हैं।
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काम की तलाश में गए सऊदी

रेड्डी ने एग्रीकल्‍चर में ग्रेजुएशन की मगर भारत में खेती उतनी लाभदायक साबि‍त नहीं हुई। काम की तलाश में वह सऊदी चले गए। उनके पास कोई टेक्‍नि‍कल डि‍ग्री तो थी नहीं इसलि‍ए उन्‍हें वहां फार्म हाउस पर काम मि‍ल गया। खेतीबाड़ी की जानकारी होने की वजह से यहां उन्‍हें तवज्‍जो मि‍ली और वह खेतीबाड़ी के काम में जुटी कंपनी में प्रोडक्‍शन मैनेजर हो गए।

रेड्डी ने देखा कि कैसे खेती के लि‍ए अनुकूल माहौल न होने के बावजूद सऊदी में तकनीक की बदौलत सब्‍जि‍यां पैदा की जा रही हैं। वर्ष 2010 में उन्‍होंने भारत लौटने का मन बना लि‍या। रेड्डी के दि‍माग में सब्‍जि‍यों वाली बात घूमती रही और यहां आकर उन्‍होंने सब्‍जी की खेती शुरू कर दी।

कि‍या दो महीने का कोर्स

रेड्डी के पास खेतीबाड़ी का करीब 25 साल का अनुभव है। मगर उन्‍होंने इसकी बारीकि‍यां सीखने के लि‍ए पार्टि‍सि‍पेटरी रूरल डेवलपमेंट इनि‍शि‍एटि‍व सोसायटी से दो महीने का कोर्स कि‍या। यह कोर्स नि‍शुल्‍क था। इसके बाद उन्‍होंने पंडाल और शेड का यूज करते हुए सब्‍जि‍यों की हाईटेक खेती शुरू की।

उन्‍होंने एक मोबाइल वैन तयार की जि‍ससे वह सब्‍जयों को नजदीकी दुकानों और बाजार तक पहुंचाते हैं। जब सब्‍जि‍यों का प्रोडक्‍शन ज्‍यादा हो जाता है तो वह अपनी वैन लेकर सरकारी दफ्तरों के बाहर पहुंच जाते हैं। यहां सरकारी कर्मचारी शाम को दफ्तर से लौटते हुए सस्‍ती सब्‍जि‍यां ले पाते हैं। इसके अलावा वह सब्‍जि‍यों और फलों की खेती करने वाले कि‍सानों को सलाह भी मुहैया कराते हैं।

आसपास के इलाकों के कई कि‍सान इनके खेतों को देखने के लि‍ए यहां आते हैं। उनकी सफलता को देखते हुए बैंक ऑफ बड़ौदा ने उन्‍हें 25 लाख का लोन भी दि‍या है ताकि वह अपने काम का वि‍स्‍तार कर सकें। रेड्डी से इस मेल आईडी पर संपर्क कर सकते हैं krreddy28@yahoo.com

युवा किसान का कमाल 550 रुपये किलो की दर से बेच रहा है अमरूद

अमरूद एक ऐसा फल है जो मात्र दो-तीन दिन तक ही ताज़ा रह सकता है। बासी होने पर खाना तो दूर उसे घर में रखना भी मुश्किल है। ऐसे फल को ऑनलाइन 550 रुपए किलो के हिसाब से बेचकर इंजीनियर से किसानी को अपनाने वाले नीरज ढांडा के बारे में भला कौन नहीं जानना चाहेगा जिन्होंने असंभव काम को संभव कर दिखाया। लेकिन इंजीनियर के करियर को अलविदा कर खेती-किसानी से कामयाबी की कहानी लिखना इतना आसान नहीं था।

नीरज ने इंजीनियरिंग के बाद नौकरी करके कुछ पैसा बचाया और जींद से 7 किलोमीटर आगे संगतपुरा में अपने 7 एकड़ खेतों में चेरी की खेती करने का मन बनाया। पहले प्रयास में असफल होने पर परिवार वालों ने उन्हें नौकरी ही करने की सलाह दी। लेकिन उनके मन में तो कुछ और ही चल रहा था। कुछ समय बाद नीरज ने इलाहाबाद के कायमगंज की नर्सरी से अमरूद के कुछ पौधे खरीदें और अपने खेतों में लगाए। अमरूद की काफी अच्छी फसल हुई।

मंडी में जब वह अपनी फसल लेकर पहुंचे तो सभी बिचौलिये एक हो गए और 7 रुपए किलो का दाम लगाया। नीरज भी अपनी जिद पर अड़ गए उन्होंने गांव की चौपालों और गांव से सटे शहर के चौराहों पर कुल मिलाकर 6 काउंटर बनाए और मंडी से दोगुने दामों में इन अमरूदों को बेचा। काफी थोक विक्रेता भी इन काउंटरों के जरिए नीरज के खेतों तक पहुंचे। अब नीरज को इस बात का अंदाजा हो गया था कि जल्दी खराब होने वाले फल यदि जल्दी नहीं बिके तो लाभ होना बहुत मुश्किल है।

उन्होंने अपने आगे के सफर के लिए छत्तीसगढ़ का रुख किया। वहां एक नर्सरी से थाईलैंड के जम्‍बो ग्‍वावा के कुछ पौधे खरीद कर लाए और उसे अपने खेतों में रोपा। डेढ़ किलो तक के अमरूदों की बंपर फसल का तोहफा नीरज को अपनी मेहनत के रूप में मिला। अपने ही खेतों के वेस्ट से बनी ऑर्गेनिक खाद के कारण अमरूदों में इलाहाबाद के अमरूद जैसी मिठास बनी रही। फिर नीरज ने अपनी कंपनी बनाई और हाईवे बेल्ट पर अमरूदों की ऑनलाइन डिलीवरी की शुरुआत की।

जम्‍बो अमरूद की खास बात यह है कि इनकी ताजगी 10 से 15 दिन तक बनी रहती है। नीरज ने अपनी वेबसाइट पर ऑर्डर देने से डिलीवरी मिलने तक ग्राहकों के लिए ट्रैकिंग की व्यवस्था भी की जिससे वह पता लगा सकते हैं कि अमरूद किस दिन बाग से टूटा और उन तक कब पहुंचा है। इंजीनियर किसान की हाईटैक किसानी के अंतर्गत 36 घंटे की डिलीवरी का टारगेट सेट किया गया है।

आजकल नीरज जिस समस्या से जूझ रहे हैं उसका हल भी उन्‍होंने निकाल लिया है। दरअसल मशहूर होने के कारण दूर-दूर से लोग उनके अमरूद के बाग देखने आ रहे हैं। कुछ किसान यह तकनीक सीखना भी चाहते हैं।

इसके लिए अब उन्होंने एक समय सारणी बनाकर मूल्‍य निर्धारित कर दिया है, जिसे लेकर वह यह तकनीक किसानों को सिखाएंगे। अब पर्यटन खेती के माध्यम से भी नीरज अपनी कमाई में इजाफा करेंगे। इतना ही नहीं भविष्य में नीरज ने ग्रीन टी, आर्गेनिक गुड और शक्‍कर भी ऑनलाइन बेचने की योजना पूरी कर ली है जिसे वह जल्द ही शुरू करने वाले हैं।

परंपरागत खेती छोड़ने से चमकी किसानों की किस्मत

12 साल पहले यहां के किसान कर्ज में डूबे हुए थे। परिवार परंपरागत खेती पर निर्भर था। जिससे गुजारा लायक ही आमदनी होती थी। मात्र 12 साल में सब्जी की खेती में एक ऐसी क्रांित आई कि किसानों की किस्मत चकम उठी। किसान मालामाल तो हुए ही साथ ही विदेशी भी उनके यहां नई तकनीक से रूबरू होने के लिए आने लगे।

बेबीकार्न, स्वीटकार्न ने आठ गांवों के किसानों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दी। अटेरना गांव के अवार्डी किसान कंवल सिंह चौहान, ताहर सिंह चौहान, सोनू चौहान, मनौली के अरुण चौहान, दिनेश चौहान ने बताया कि 12 साज पहले एक समस था जब खादर के किसान केवल गेहूं व धान पर निर्भर थे। परिवार का गुजारा मुश्किल से चलता था। किसानों के मन में कुछ अलग करने की लालसा हुई।

अटेरना गांव के कंवल सिंह चौहान ने सबसे पहले बेबीकार्न व स्वीटकार्न की खेती को शुरू किया। जब मंडी में भाव अच्छे मिलने लगे तो बाकी किसान भी आकर्षित हुए। आज आठ गांव के किसान पूरी तरह से सब्जी की खेती को बिजनेस के तौर पर कर रहे हैं। पोल हाउस में तैयार सब्जी व मशरूम आजादपुर मंडी में हाथों हाथ बिक रही है।

एक सोच ने बदल दी जिंदगी : अरुण चौहान

मनाैली के किसान ताहर सिंह चौहान ने कहा कि एक सोच ने उनकी जिदंगी बदल दी। पहले वे आढ़ती के सामने कर्ज के लिए हाथ जोड़ते थे। आज आढ़ती उनके पास खेत में ही फसल खरीदने पहुंच रहे हैं। स्वीटकार्न व बेबीकार्न ने किसान की अंधेरी जिदंगी में रोशनी पैदा कर दी है। यहां के किसान संपन्न हो गए हैं।

पहले एक ट्रैक्टर को खरीदना सपना होता था। आज हर दूसरे किसान के पास महंगी कार हैं। किसानों के पास मजदूरी करने के लिए बाहर से लेबर आ रही है। एक समय था जब पूरा परिवार खेत में काम करता और दो जून की रोटी भी मुश्किल से खा पाता था। सब्जी ने उनके गांव की तकदीर बदल दी है।

दो गुना आमदनी ले रहे हैं यहां के किसान

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किसान कंवल िसंह चौहान ने कहा कि धान व गेहूं की फसल से साल भर में किसान को 80 हजार रुपए की आमदनी होती है। किसान बेबीकाॅर्न, स्वीटकाॅर्न व मशरूम से साल में डेढ़ लाख से दो लाख रुपए तक प्रति एकड़ आमदनी ले रहे हैं। सब्जी की फसल में गेहूं व धान से कम खर्च आता है। यहां के आठ गांवों के अधिक्तर किसान जैविक खाद का प्रयोग कर रहे हैं। जिससे यूरिया की लागत कम हो रही है।

बेबीकाॅर्न को देखने आते हैं विदेशी डेलीगेट्स

दिल्ली पुसा संस्थान में जो भी वेज्ञानिक रिसर्च करने के लिए आते हैं, वे फील्ड वीजिट के लिए इन गांवों का दौरा करते हैं। गत दिनों भेटान, जापान, पाकिस्तान, कोरिया, चीन के किसानों का प्रतिनिधि मंडल अटेरना गांव में पहुंचा था। उन्होंने यहां की खेती की नई तकनीक को अपने देश में भी शुरू करने का विचार रखा था। यहां तक कि अटेरना के किसानों को निमंत्रण भी दिया था कि वे उनके देश के किसानों को भी नई तकनीक से अवगत कराए।

पॉली हाउस में उगाते हैं सब्जी

पॉली हाउस की सब्जी की फसल पूरी तरह से प्रदूषण, खरपतवार तथा कीट पतंगों से दूर रहती है। शिमला मिर्च, खीरा, टमाटर, स्ट्राब्रेरी, घीया जैसी फसल पॉली हाउस के अंदर तैयार हो रही हैं। छोटे से गांव में तैयार होने वाली स्वीटकाॅर्न, बेबीकाॅर्न देश व विदेश में काफी डिमांड हैं।

अमरुद और निम्बू की खेती से बदली किस्मत

तराना के एक किसान ने परम्परागत फसलों से आगे बढ़ बागवानी फसलों को अपनाकर खेती में एक सफल उदहारण प्रस्तुत किया है. उन्होंने अमरुद और निम्बू की फसल में पसीना बहाया और उनकी मेहनत रंग लायी और वे बागवानी फसलों से सालाना करीब 5 लाख रूपये कमा रहे है. उनकी इस मेहनत को सार्वजानिक रूप से भी सम्मानित किया जाएगा.

खंडाखेड़ी निवासी हरिशंकर देवड़ा ने सरकार की फल क्षेत्र विस्तार योजना के अंतर्गत उद्यानिकी विभाग से अमरुद और निम्बू के पौधे प्राप्त कर बगीचा लगाया था. उनकी कड़ी मेहनत से मात्र 10 वर्षों में 6 बीघा जमीन से कुल 250 कुंतल अमरुद और 150 कुंतल नीम्बू की बम्पर उपज से उन्हें सालाना 5 लाख रूपये प्राप्त हो रहा है. हरिशंकर देवड़ा को आत्मा योजना के अंतर्गत 26 जनवरी को श्रेष्ठ उद्यानिकी कृषक का पुरूस्कार राशि 10 हजार रूपये कलेक्टर द्वारा दी जाएगी.

हरिशंकर ने बताया पहले परम्परागत खेती में उन्हें सीमित मुनाफा प्राप्त होता था. उस आय से परिवार का भरण पोषण और बच्चों को शिक्षा दिलाने में काफी कठिनाई होती थी. उद्यनिकि विभाग की सलाह से उन्होंने फलोद्यान लगाया और तब उन्हें बिलकुल भी उम्मीद नहीं थी कि उद्द्यानिकी फसल से वो अपनी आय को इतना बढ़ा सकतें हैं.

देवड़ा के पास कुल 11 बीघा जमीन है जिनमें वो 4 बीघा में अमरुद और 2 बीघा में निम्बू की फसल व बाकी जमीन पर पारम्परिक फसलों को उगाते हैं. लेकिन उद्यानिकी फसल को उगाने के बाद प्राप्त फायदे को देखकर वो उद्यानिकी फसलों का रकबा बढ़ने की सोच रहे हैं.

हरिशंकर देवड़ा की बहु संगीता महिलाओं के लिए मिसाल बनी हुई है. संगीता ने कठोर परिश्रम से घर में पशुपालन के माध्यम से दूध का व्यवसाय शुरू किया है. उनके यहाँ 7 भैंसे और 2 गाय है जिनसे उन्हें सुबह और शाम 25-25 लीटर दूध प्राप्त होता है. इसके अलावा गोबर से बनी हुई प्राक्रतिक खाद का उपयोग खेतों में किया जाता है. संगीता ने दूध का व्यवसाय शुरू किया जिसके कारण वो भी आत्मनिर्भर हो गई है.

फैशन डिजाइनिंग छोड़कर इस लड़की ने शुरू किया बकरी पालन

हर कोई पढ़ लिखकर अच्छी नौकरी करना चाहता है, कभी आपने ये सुना है कि पढ़ाई करने के बाद किसी ने बकरी पालन करना चुना हो। पशुपालन व खेती से तो हमारे युवा वैसे भी दूर भागते हैं ऐसे में ये बात तो मजाक ही लगेगी। लेकिन ऐसा हुआ है और समाज में इस बदलाव की कहानी को लिखा है श्वेता तोमर ने। श्वेता ने किसी छोटे नहीं बल्कि निफ्ट (NIIFT) जैसे देश के सर्वश्रेष्ठ फैशन डिजाइनिंग इंस्टीट्यूट से पढ़ाई की है और अब वह उत्तराखंड के अपने गांव में बकरीपालन कर रही हैं।

श्वेता का सफर 2015से शुरू होता है जब वो शादी करके अपने पति के साथ बैंग्लोर शिफ्ट हुईं। वो पहले से एक सफल फैशन डिजाइनर थीं। बैंग्लोर आने के बाद वो घर पर खाली नहीं बैठना चाहती थीं बल्कि खुद का कोई काम शुरू करना चाहती थीं।

एक दिन श्वेता अपने पति के साथ एक बकरी का फार्म देखने गईं। वहां उन्होंने कुछ समय बिताया और उन्हें बहुत अच्छा लगा। वो खाली समय में अक्सर वहां जाने लगीं, धीरे धीरे उन्होंने फार्म में बकरी पालन की सारे नियम समझ लिए। श्वेता ने भी बकरीपालन करने का मन बना लिया था।

एक गाँव में जन्मी और पली बढ़ी श्वेता को अच्छी तरह से पता था कि वो अपने इस शौक को इस शहर में नहीं पूरा कर सकती हैं और इसलिए उन्होंने बैंग्लोर शहर की अपनी अच्छी खासी लाइफस्टाइल छोड़कर उत्तराखंड के देहरादून के पास रानीपोखरी जैसे छोटे से गाँव में जाने का फैसला किया।

उन्होंने अपने पति रॉबिन स्मिथ से जब ये बात बताई तो उन्होंने खुशी-खुशी श्वेता को ये काम करने के लिए स्वीकृति दे दी। श्वेता ने बकरी पालन शुरू करने के लिए अपनी सारी जमा पूंजी उसमें लगा दी। यहां तक बिजनेस को अच्छे स्तर तक पहुंचाने के लिए बैंक से लोन भी लिया।

श्वेता बताती हैं, उनके नजदीकी लोग उनके इस फैसले से हैरान थे। मेरी पढ़ाई और डिग्री को देखकर हर कोई सोचता था कि मुझे किसी बड़ी कंपनी में जॉब करनी चाहिए और अच्छे पैसे कमाने चाहिए। मेरा सबकुछ छोड़कर बकरी पालन करने का ये फैसला बिल्कुल गलत है और गाँव में कुछ नहीं रखा है करने को।

हर नस्ल की बकरियां हैं फार्म में

श्वेता ने अपना बिजनेस जिस जगह शुरू किया था वहां बहुत से जंगली जानवरों के आने का खतरा भी रहता था जो कभी भी बकरियों पर हमला कर सकते थे। लेकिन फिर भी श्वेता ने हार नहीं मानी और बैंक से लोन लेकर 250 बकरियों से बिजनेस शुरू कर दिया। इस समय श्वेता के फार्म में अलग अलग प्रजातियों की सौ से ज्यादा बकरियां पली हैं। इनमें सिरोही, बरबरी, जमना पारी और तोता पारी ब्रीड के पांच हजार से लेकर एक लाख तक के बकरे मौजूद हैं।

श्वेता बकरीपालन में पूरी तरह पारंगत हो चुकी हैं। बकरियों का दूध निकालने से लेकर उनकी देखभाल और छोटा-मोटा इलाज सब वो खुद ही करती हैं। जरूरत पड़ने पर वह खुद ही बकरों को बिक्री के लिए लोडर में लादकर मंडी ले जाती हैं। श्वेता के फार्म पर बकरियों की बिक्री इंटरनेट के माध्यम से भी होती है।

श्वेता बताती हैं शुरुआत में सरकारी स्तर पर छोटी-मोटी कई दिक्कतें आईं पर पशुपालन विभाग का उन्हें सहयोग समय-समय पर मिलता रहा। पिछले साल श्वेता का टर्नओवर 25 लाख रुपये का था। श्वेता अब अपना व्यवसाय शुरू करने के बाद दूसरों को प्रोत्साहित करने के लिए प्रशिक्षण भी देती हैं।