खेत नहीं, छत पर फसल उगाते दिल्ली के किसान

उत्तरी दिल्ली में स्थित तिब्बती रिफ्यूजी कॉलोनी के पीछे यमुना नदी के किनारे पिछले तीस साल से खेती करने वाले संतोष कहते हैं कि जमीन पर खेती करने के मुकाबले छत पर खेती करना ज्यादा आसान और कम मेहनत वाला है. वह संतोष खेती के परंपरागत तरीके से आगे वैकल्पिक खेती के कौशल प्राप्त कर उत्साहित हैं.

छत पर खेती का विचार अजीब लगता है लेकिन दिल्ली में कई इमारतों की छतों पर इस तरह की खेती हो रही है. अंबेडकर यूनिवर्सिटी में फेलो इन एक्शन रिसर्च, सेंटर फॉर डेवलेपमेंट प्रैक्टिस के निशांत चौधरी के दिमाग में दिल्ली के ऐसे किसानों की मदद करने का ख्याल आया, जिनकी जमीन पर दूषित पानी से खेती होती है और उस पर दिल्ली विकास प्राधिकरण गाहे-बगाहे कार्रवाई करता है. दिल्ली में राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने यमुना किनारे खेती और कृषि से जुड़ी अन्य गतिविधियों पर रोक लगा रखी है.

निशांत चौधरी ने डॉयचे वेले को बताया, “दिल्ली में जो किसान यमुना किनारे खेती करते हैं उन पर दिल्ली विकास प्राधिकरण की कार्रवाई का खतरा मंडराता रहता है, क्योंकि यमुना किनारे की जमीन पर केंद्र सरकार दावा करती है.” इसीलिए उन्होंने सोचा, क्यों ना विस्थापित होने वाले किसानों के लिए ऐसा मॉडल तैयार किया जाए जिससे उनकी आजीविका चलती रहे और वे आर्थिक तौर पर कमजोर होने से बचे.

कोकोपीट से खेती

निशांत बताते हैं, “मैंने जमीन की बजाय छत पर खेती के उपायों के बारे में सोचा और रिसर्च के बाद किसानों के साथ मिलकर मॉडल तैयार किया. मैंने इसका नाम क्यारी रखा. ” यह एक तरह का बस्ता होता है जो बहुत ही मजबूत मैटेरियल से बना होता है.

इसमें में नारियल का खोल (सूखा छिलका) मुख्य तौर पर डाला जाता है. छत पर ज्यादा वजन ना पड़े और पानी रिसने की समस्या ना हो इसके लिए मिट्टी का इस्तेमाल नहीं होता है. इस बस्ते में नारियल के खोल के अलावा कुछ मिश्रण और मिलाया जाता है जिससे फसल तेजी से और गुणवत्ता के साथ होती है.

इस खास बस्ते में नारियल के खोल के अलावा कई तरह के जैविक चीजें पड़ती हैं. नारियल का खोल मिट्टी के मुकाबले 10 से 15 गुणा ज्यादा हल्का होता है. इस मिश्रण में 12 और चीजें पड़ती हैं जिसे निशांत ने किसानों की मदद से तैयार किया है.

निशांत कृषि उत्पादों की मात्रा के मुकाबले गुणवत्ता पर ज्यादा जोर देते हैं. वह कहते हैं, “हम क्वालिटी का खास ध्यान रखते हैं. इन क्यारियों में केमिकल का इस्तेमाल नहीं होता है. हम केमिकल की जगह पारंपरिक कीटनाशक का इस्तेमाल करते हैं जैसे छाछ, नींबू, मिर्ची वगैरह, जो घर पर आसानी से पाई जाती है. इस कारण सब्जी की गुणवत्ता उच्चतम होती है.”

बिना मिट्टी और कम पानी से खेती

निशांत ने रिसर्च कर ऐसा मॉडल तैयार किया जिसमें मिट्टी की खपत नहीं होती और पानी भी कम से कम लगता है. निशांत बताते हैं कि उन्हें इस मॉडल की प्रेरणा केरल से मिली. छत पर खेती करने के लिए निशांत ने ऐसी क्यारी बनाई है जो वॉटर प्रूफ होती है और उससे पानी का छत पर टपकने का खतरा नहीं रहता है.

हर क्यारी में नारियल का खोल, कंपोस्ट और कुछ खास तरह की सामग्री डाली जाती है जिससे फसल अच्छी होती है. नारियल के खोल की वजह से छत पर इस खास बस्ते का वजन नहीं पड़ता है, साथ ही इस बस्ते में पानी भी कम लगता है.

उदाहरण के तौर पर चार फीट के एक बस्ते में गर्मियों के दिनों में 5 लीटर पानी दिन में दो बार लगता है जबकि सर्दियों में दो दिन में एक बार 5 लीटर पानी से काम चल जाता है. जैविक पदार्थ होने की वजह से मेहनत भी कम लगता है.

क्यारी बनाने की ट्रेनिंग लेने वाले और उस पर काम करने वाले किसान संतोष बताते हैं, “इस क्यारी की खास बात ये है कि इसमें गैरजरूरी चीजें नहीं होती, चाहे घास हो या जंगली पेड़, ये काफी हल्का होता जिससे बार-बार खुदाई की जरूरत नहीं होती. जब हम जमीन पर खेती करते हैं तो उसमें मेहनत कई गुना ज्यादा लगती है, पानी का इस्तेमाल भी ज्यादा होता है लेकिन मुझे लगता है कि भविष्य में हमें इस तरह की खेती पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए.”

छत पर खेत बनाकर बस 19 हजार में उगाते हैं 700kg सब्ज़ियां

छत पर खेती का विचार अजीब लगता है, लेकिन दिल्ली समेत कई बड़े शहरों में आजकल इमारतों की छत पर इस तरह की खेती हो रही है. कुछ इसी तरह के आइडिया को आईआईटी ग्रेजुएट कौस्तुभ खरे और साहिल पारिख ने अपनाकर अपना बिजनेस शुरू किया है. उनकी कंपनी खेतीफाई सिर्फ 19 हजार रुपये में 200 वर्ग मीटर की छत को खेत बनाकर 700 किलोग्राम तक सब्जियां उगाती है. आइए जानें उनके बारे में…

बिना मिट्टी और कम पानी से खेती

इन दोनों ने ऐसा मॉडल तैयार किया है, जिसमें मिट्टी की खपत नहीं होती और पानी भी कम से कम लगता है. छत पर खेती करने के लिए ऐसी क्यारी बनाई है जो वॉटर प्रूफ होती है और उससे पानी का छत पर टपकने का खतरा नहीं रहता है.

जैविक सामग्री से लैस इन क्यारियों में भिंडी, टमाटर, बैंगन, मेथी, पालक, चौलाई, पोई साग और मिर्च उगता हैं. पानी मीठा होने की वजह से सब्जियां भी स्वादिष्ट होती हैं.

इसमें में नारियल का खोल (सूखा छिलका) मुख्य तौर पर डाला जाता है. छत पर ज्यादा वजन ना पड़े और पानी रिसने की समस्या ना हो इसके लिए मिट्टी का इस्तेमाल नहीं होता है. इस बस्ते में नारियल के खोल के अलावा कुछ मिश्रण और मिलाया जाता है, जिससे फसल तेजी से और गुणवत्ता के साथ होती है.

आप भी कर सकते हैं ऐसा

जिस तरह से खेती के लिए जमीन कम हो रही हैं, भविष्य में इन क्यारियों की मांग बढ़ेगी, 4 फीट गुणा 4 फीट की चार क्यारियों लगाने पर एक परिवार अपने महीने भर की जरूरत की सब्जी उगा सकता है. एक घंटा इन क्यारियों में समय लगाने से मन लायक सब्जी उगाई जा सकती है.

एक तरीका ये भी हैं

खेतों के घटने और ऑर्गनिक फूड प्रोडक्ट की मांग बढ़ने से अर्बन फार्मिंग में नई और कारगर तकनीकों का चलन बढ़ता जा रहा है. मांग पूरी करने के लिए कारोबारी और शहरी किसान छतों पर, पार्किंग में या फिर कहीं भी उपलब्ध सीमित जगह का इस्तेमाल पैदावार के लिए कर रहे हैं.

इन तकनीकों में फिलहाल जो तकनीक सबसे ज्यादा सफल है उसमें मिट्टी का इस्तेमाल ही नहीं होता. मिट्टी न होने से इसे छतों पर छोटी जगह में आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है. ये तकनीक इतनी सफल है कि सही जानकारी, सही सलाह से लगभग 1 लाख रुपए के खर्च से से आप घर बैठे सालाना 2 लाख रुपए तक की सब्जियां उगा सकते हैं.

छत पर खेती

इस तकनीक को हाइड्रोपानिक्स कहा जाता है. इस तकनीक की खास बात यह है कि इसमें मिट्टी का इस्तेमाल बिल्कुल भी नहीं होता है. इससे पौधों के लिए जरूरी पोषक तत्वों को पानी के सहारे सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है.

क्या है हाइड्रपानिक्स तकनीक

हाइड्रपॉनिक्स तकनीक में सब्जियां बिना मिट्टी की मदद से उगाई जातीं हैं.इससे पौधों के लिए जरूरी पोषक तत्वों को पानी के सहारे सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है. पौधे एक मल्टी लेयर फ्रेम के सहारे टिके पाइप में उगते हैं और इनकी जड़े पाइप के अंदर पोषक तत्वों से भरे पानी में छोड़ दी जाती हैं.मिट्टी न होने की वजह से न छतों पर भार बढ़ता है. वहीं, बिल्कुल अलग सिस्टम होने की वजह से छत में कोई बदलाव भी नहीं करने पड़ते.

नई टेक्नोलॉजी

हाइड्रपानिक्स एक पौधों को उगाने का बिल्कुल नया तरीका है और इसे किसान या कारोबारी अलग अलग तरह से इस्तेमाल में ला सकते हैं. वहीं इस क्षेत्र में काम कर रही कई कंपनियां भी आपको शौकिया गार्डन से लेकर कमर्शियल फार्म तक स्थापित करने में मदद कर सकती हैं.

इस बारे में हाइड्रपानिक्स कंपनी ‘हमारी कृषि’ बताती हैं कि उपज के लिए तैयार फ्रेम और टावर गार्डेन ऑनलाइन बेच रही है.कंपनी के 2 मीटर ऊंचे टावर में 40 पौधे लगाने की जगह है. कंपनी के मुताबिक करीब 400 पौधे वाले 10 टावर की लागत 1 लाख के करीब है. इस कीमत में टावर, सिस्टम और जरूरी पोषक तत्व शामिल हैं.

कंपनी के मुताबिक अगर सिस्टम को सही ढंग से इस्तेमाल किया जाए तो इसके बाद सिर्फ बीज और न्यूट्रिएंट का ही खर्च आता है. ये 10 टावर आपकी छत के 150 से 200 वर्ग फुट एरिया में आसानी से खड़े हो जाएंगे. छोटी जगह पर रखे फ्रेम को नेट शेड और बड़े स्तर पर खेती के लिए पॉली हाउस बनाकर ढकने से मौसम से सुरक्षा मिलती है.

कमाई का बड़ा मौका

  • कंपनी हमारी कृषि के मुताबिक, ये तकनीक लोगों को रोजगार देने का अच्छा जरिये हो सकती है, क्योंकि परंपरागत कृषि के मुकाबले इसके मार्जिन बेहतर हैं.
  • शर्मा के मुताबिक, एक पॉड से साल भर में 5 किलो लेटिस (सलाद पत्ता) की उपज मिल सकी है। ऐसे में 10 टावर यानि 400 पॉड से 2000 किलो सालाना तक उपज मिल सकती है. फिलहाल लेटिस की कीमत भारत में 180 रुपए किलो है, शर्मा के मुताबिक अगर थोक में 100 रुपए किलो भी मिलते हैं तो अच्छी कंडीशन में साल में 2 लाख रुपए की उपज संभव है.
  • वहीं उनके मुताबिक आम स्थितियों में आप आसानी से एक साल में अपना निवेश निकाल सकते हैं. अगले साल रिटर्न ज्यादा होगा क्योकिं आपको सिर्फ रखरखाव, बीज और न्यूट्रिएंट का खर्च ही करना है. यानी आप अपनी छत के सिर्फ 150 से 200 वर्ग फुट के इस्तेमाल से एक साल में ही अपना एक लाख का निवेश निकाल कर प्रॉफिट में आ सकते हैं.

नौकरी नहीं मिली तो शुरू की गुलाब की खेती, हर महीने 50 हजार रु कर रही इनकम, लोन लेकर शुरू किया बिजनेस

इजहार-ए-मोहब्बत का प्रतीक माना जाने वाला गुलाब अपनी विभिन्न रंगों और दिलकश खुशबू के चलते सबके दिलों पर राज करता है। बच्चे से लेकर बूढ़े तक इसके दीवाने हैं। Rose के प्रति दिनोंदिन बढ़ रहे लोगों के प्यार ने महाराष्ट्र के नागपुर के माणेवाडा की रहने वाली प्रणाली शेवाले को इसकी खेती के लिए आकर्षित किया। एग्रीकल्चर में डिप्लोमा करने बाद नौकरी नहीं मिली तो उसने गुलाब की खेती शुरू की और आज वह हर महीने इससे 50 हजार रुपए की इनकम कर रही हैं।

दो महीने की ली ट्रेनिंग

प्रणाली ने मनीभास्कर को बताया कि उन्होंने हॉर्टिकल्चर में डिप्लोमा किया है। डिप्लोमा करने के बाद नौकरी की तलाश की, लेकिन इसमें सफलता नहीं मिली। बचपन से गुलाब के प्रति प्यार के चलते उनको इसमें बिजनेस का मौका दिखा।

उन्होंने देखा कि बाजार में गुलाब की मांग काफी ज्यादा है। जन्मदिन, सालगिरह, वैलेंटाइन डे और मदर्स डे जैसे अवसर पर गुलाब के इस्तेमाल का चलन बढ़ा है। इसलिए उन्होंने नागपुर स्थित एग्री क्लिनिक एंड एग्री बिजनेस सेंटर्स से दो महीने की ट्रेनिंग ली। ट्रेनिंग पूरी होने के बाद प्रणाली पॉलीहाउस एंड फ्लोरिकल्चर की शुरुआत की।

13 लाख का लोन ले शुरू की गुलाब की खेती

ट्रेनिंग पूरी करने के बाद प्रणाली ने अपने पिता की मदद से एक एकड़ जमीन लीज पर लेकर गुलाब की खेती के लिए पॉलीहाउस का निर्माण किया। शुरुआत में उनके इस प्रोजेक्ट पर किसी बैंक को भरोसा नहीं होने की वजह से 6 महीने तक लोन मिलने का इंतजार किया।

छह महीने बाद बैंक ऑफ इंडिया से उन्हें 13 लाख रुपए का लोन लिया। 13 लाख का लोन और कुछ जमा पूंजी से 10,000 वर्ग फुट में पॉलीहाउस बनाकर टॉप सीक्रेट वैरायटी के साथ गुलाब की खेती शुरू की। इस प्रोजेक्ट पर उनको कुल 16 लाख रुपए का खर्च आया। उन्होंने नवंबर 2016 में प्रणाली पॉलीहाउस एंड फ्लोरिकल्चर की नींव रखी थी।

सब्सिडी मिलने का इंतजार

प्रणाली कहती हैं कि बैंक लोन पर उनको नाबार्ड से 44 फीसदी की सब्सिडी मिली थी। लेकिन डेढ़ साल से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद उनको अभी तक सब्सिडी नहीं मिली है। इसलिए लोन का इंटरेस्ट भरना भारी पड़ रहा है।

मंथली 50 हजार हो जाती है इनकम

प्रणाली के मुताबिक, गुलाब की खेती से वह हरेक महीने 50 हजार रुपए की कमाई कर लेती हैं। कभी-कभी कमाई कम भी होती है। पहली बार उनको गुलाब की खेती से 35 हजार रुपए का मुनाफा हुआ था।

गेहूं और धान के बीच के समय लगाए यह फसल , एक एकड़ से होगी 35 हजार की फसल

तलवंडी साबो ब्लॉक के अधीन पड़ते गांव गोलेवाला का किसान निर्मल सिंह गेहूं की कटाई करने के बाद सट्‌ठी मूंगी की बिजाई करके अपनी आमदनी में मुनाफा कर रहा है। फसल से होने वाले शानदार मुनाफे को देखते हुए इस साल उसने 10 एकड़ में मूंग फसल की बिजाई की है।

निर्मल सिंह धान व बासमती से पहले सट्‌ठी मूंगी की काश्त करता है, इससे जहां एक अतिरिक्त फसल के जरिए ज्यादा आमदनी होती है, वहीं मूंगी की फसल अपनी जड़ों के प्राकृतिक गुण के कारण जमीन में नाइट्रोजन फिक्सेशन के जरिए जमीन में नाइट्रोजन खाद की मात्रा बढ़ाती है। इस तरह से अगली फसल को कम यूरिया खाद डालने की जरूरत पड़ती है।

जमीन की सेहत में हुआ सुधार

निर्मल सिंह बताया कि फसली चक्कर का हिस्सा बनाने से उसकी जमीन की सेहत में सुधार हुआ है। उन्होंने बताया कि जिस खेत में मूंगी की फसल की बिजाई की जाती है, उस खेत में बासमती धान लगभग 20 जुलाई के बाद ही लगाया जाता है। इससे जहां पानी की बचत होती है, वहीं बिजली की भी बचत होती है तथा यह धान परमल धान जोकि 20 जून को बताया जाता है, के बराबर ही पक कर तैयार हो जाता है।

मुख्य खेतीबाड़ी अफसर डॉ. गुरदित्ता सिंह सिधू ने बताया कि जिले में लगभग 2500 एकड़ से ज्यादा क्षेत्रफल में सट्‌ठी मूंगी की बिजाई करके खेतीबाड़ी विभाग जिले में फसल विभिन्नता को प्रोत्साहित कर रहा है। इससे मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाकर उसे और उपजाऊ बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं।

उन्होंने बताया कि सट्‌ठी मूंगी 60 दिन की फसल जोकि गेहूं व धान की दरम्यान खाली समय में बिजाई की जाती है और किसानों को अच्छा फायदा देती है। इस किस्म का औसतन झाड़ 4 से 5 क्विंटल प्रति एकड़ है। उन्होंने बताया कि सट्‌ठी मूंगी का बीज 10 किलो प्रति एकड़ के हिसाब से बरता जाता है।

गेहूं काटने के बाद गर्मी के मौसम की मूंगी बिना खेत में हल चलाए ही बिजाई की जा सकती है। अगर खेत में गेहूं का नाड़ नहीं है तो मूंगी जीरो टिल ड्रिल के जरिए बिजाई की जाए। उन्होंने बताया कि विभाग की ओर से किसानों को सट्‌ठी मूंगी के बीज की फ्री आफ कास्ट मिनी किट बांटी जाती हैं। मूंगी की फसल 20 मार्च से अप्रैल के तीसरे सप्ताह तक बिजाई की जाती है।

22 एकड़ में आमों का बाग़ लगा कर यह किसान ले रहा प्रति एकड़ 1.75 लाख का मुनाफा

प्रगतिशील किसान बलजिंदर सिंह आम रिवायती खेती से हटकर आम के बाग लगाकर इलाके में काफी पहचान बना चुके हैं और काफी आमदन कमा रहे हैं। रणजीत बाग के रहने वाले किसान बलजिंदर सिंह ने बताया कि बागबानी विभाग के सहयोग से इस क्षेत्र में काफी तरक्की हासिल की है।

उन्होंने बताया कि शुरू में 10-12 एकड़ से शुरू किए इस व्यवसाय को बलजिंदर सिंह ने 22 एकड़ मे तबदील किया और अपनी मेहनत और विभाग के सहयोग से अब वार्षिक एक एकड़ में से 1 लाख 75 हजार रुपए की आमदन प्राप्त कर रहा है। उन्होंने बताया कि बाग लगाकर शुरुआत के दौर में बाग में से आमदन एक पेंशन के रूप में मिलनी शुरू हो जाती है। इसलिए पानी और दवाइयों की अधिक जरूरत नहीं पड़ती है।

उन्होंने बताया कि समय-समय पर विभाग की ओर से दवाइयां आदि उपलब्ध करवाई जाती हैं। वहीं, एक एकड़ बाग लगाने पर राष्ट्रीय बागबानी मिशन के तहत बागबानी विभाग की ओर से 75 प्रतिशत सब्सिडी दी जाती है, जबकि स्प्रे पंप पर 50 प्रतिशत।

वहीं, बागबानी विभाग के डिप्टी डायरेक्टर बलविंदर सिंह व बागवानी अधिकारी प्रितपाल सिंह ने बताया कि किसानों को रिवायती फसलों के चक्कर से बाहर निकालने के लिए फसली विभिन्नता से जोड़ा जा रहा है। दिनों-दिन घटते पानी के स्तर के चलते किसानों को सहायक व्यवसाय अपनाने चाहिए। उन्होंने सलाह दी कि फसली विभिन्नता संबंधी किसी प्रकार की जानकारी के लिए बागबानी दफ्तर गुरदासपुर संपर्क किया जा सकता है।

किसान ने तैयार की हवा से बिजली बनाने वाली मशीन, 1.50 लाख रुपए का आया ख़र्च

चौथी कक्षा तक पढ़ाई करने वाले मथुरा के एक 36 वर्षीय किसान उदयवीर ने एक ऐसी मशीन बनाने का दावा किया है जो हवा से बिजली बनाएगी। इस खोज के लिए जिले में किसान की तारीफ हो रही है। उदयवीर का कहना है कि उसे इस प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए सरकार से कोई मदद नहीं मिली लेकिन अब भी वह सरकारी मदद की उम्मीद किए हुए हैं।

  • जिले से करीब 45 किलोमीटर दूर छाता क्षेत्र के गांव गढ़ी-डड्डी के रहने वाले उदयवीर ने हवा से बिजली को बानकर दिखाई है। उदयवीर ने बताया कि उसके पिता किसानी के साथ-साथ गांव के ट्रैक्टर को ठीक किया करते थे और मैं उन्हें इस काम को करते हुए देखता रहता था।एक दिन मैं और मेरी पत्नी खेत पर गेंहू काटने गए। जब हम लोग घर वापस आये तो घर आकर देखा की लाइट नहीं है और इन्वर्टर भी डाउन पड़ा था।

मैंने एक छोटी सी मशीन पर अपना काम करना शुरू किया और जैसे जैसे मुझे सफलता मिलती गयी मैंने और बड़ा करने की ठान ली और 2010 से मैंने इस प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू किया और 8 साल 7 महीने की कड़ी मेहनत के बाद मैंने एक ऐसी मशीन तैयार कर दी जिससे बिना पानी के बिजली बनाई जा सकती है।

  • इस मशीन को उदय भास्कर इलेक्ट्रिक जनरेशन नाम दिया गया है। इस पूरे प्रोजेक्ट को बनाते समय उदयवीर की पैर की नशे ब्लॉक हो गईं थी। 2015 में उनका एक पैर डॉक्टर को काटना पड़ा।

कैसे बनती है बिजली

उदयवीर ने बताया की मशीन में चार बैटरी लगी हुई हैं। डीसी से मोटर, मोटर से रोटर और रोटर से अल्टीनेटर में सप्लाई जाती है। जैसे ही ऑक्सीजन बनने लगती है वैसे ही बिजली का बनना भी शुरू हो जाता है।

पूरे दिन में एक व्यक्ति जितनी ऑक्सीजन लेता है उतनी ही मशीन ऑक्सीजन अपने अंदर लेती है लगातार इससे बिजली बनाई जाती है। इस पूरी मशीन को बनाने में 1.50 लाख रुपए खर्च हुआ।

पीएम को भी भेज चुका हूं लेटर

उदयवीर ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी अपने प्रोजेक्ट के बारे में लेटर लिखकर भेजा है जिसका अभी तक जवाब नहीं आया है।

किसान का कमाल : 3 बीघा जमीन में की 45 लाख की फसल की पैदावार

बेशक मध्यप्रदेश में किसानों की माली हालत दयनीय है और सरकारों से फसल के सही दाम मिलने की मांगे लगातार की जा रही है। लेकिन, शिवपुरी जिला के छोटे से गांव अगरा के किसान ने वो कारनामा किया है जिससे उसके चर्चे हर जुबान पर हैं।

दरअसल यहां एक किसान ने आम खेती से हटकर कुछ खास करते हुए तीन बीघा जमीन से 70 किलो केसर का उत्पादन किया है। ज्ञात रहे कि वर्तमान समय में बाजार में एक किलो केसर की कीमत लगभग 65 हजार रुपए है। इस कीमत से 70 किलो केसर की कीमत 45 लाख रुपए के करीब आंकी जा रही है।

ग्रेजुएट किसान ने किया कमाल

किसान का नाम सुरेश आदिवासी है। सुरेश ने कोलारस विधानसभा के छोटे से गांव अगरा में रह कर खेती करते हुए ये कमाल कर दिखाया है। सुरेश ने मतस्य पालन से ग्रेजुएशन किया है और इसके बाद उन्होंने कुछ न करते हुए खेती करना फायदेमद समझा,

जिसके बलबूते पर आज वे खास किसान होते हुए चर्चा का विषय बन गए हैं। गांव में रहकर खेती को फायदे का धंधा बनाने वाले सुरेश आज बहुत खुश है। इतना ही नहीं वे अन्य किसानों को खेती की इस तकनीक को अपनाने की सलाह भी देते हैं।

70 साल के किसान ने 3 साल तक तोड़ा पहाड़ और बना डाली नहर, गांव में पानी लाने की ठानी थी

ओडिशा में एक किसान ने अपनी मेहनत से गांव के सैकड़ों लोगों की मुश्किलें दूर कर दीं। 70 साल के दैत्री नायक ने तीन साल कड़ी मेहनत करके गांव में एक किलोमीटर लंबी नहर खोद डाली। वो भी तब जबकि ये इलाका बहुत ही पथरीला था। लिहाजा, पानी की कमी से जूझ रहे गांव के लोगों को नहर बनने के बाद रोजमर्रा के काम और खेती के लिए भरपूर पानी मिल सकेगा।

  • मामला केन्दुझर जिले का है। यहां बांसपाल, तेलकोई और हरिचंदपुर ब्लॉक में सिंचाई के लिए कोई इंतजाम नहीं था। खेती के लिए लोगों को बारिश के पानी पर ही निर्भर रहना पड़ता था। वहीं, रोजमर्रा के काम के लिए भी वो लोग तलाब के गंदे पानी का इस्तेमाल कर रहे थे।

  • प्रशासन ने इस पहाड़ी इलाके में पानी के लिए कोई इंतजाम नहीं कराया था। ऐसे में बैतरणी गांव के दैत्री नायक ने यहां पानी लाने की ठानी। दैत्री ने बताया, ”मैंने अपने परिवार के साथ नहर बनाने का काम शुरू किया। पानी के इंतजाम के लिए मैंने तीन साल तक पहाड़ों को तोड़ा और खुदाई की। मेरे परिवार वालों ने पत्थर हटाने में मेरी मदद की। नहर खुदने के बाद पिछले महीने गांव में पानी लाया जा सका है।”

अब नींद से जागा प्रशासन

केन्दुझर डिवीजन में माइनर इरिगेशन के इंजीनियर सुधाकर बेहरा ने बताया, ”हमें रिपोर्ट्स मिली हैं कि एक शख्स ने कर्नाटक नाला से पानी लाने के लिए नहर खोदी है, ताकि खेती में सुविधा हो सके। हम उस गांव का दौरा करेंगे और वहां सिंचाई की व्यवस्था के लिए जरूरी कदम उठाएंगे।”

इजरायल की तकनीक से खेती करेंगे यूपी के किसान

प्रदेश में उम्दा किस्म की फल और सब्जियां उगाने के लिए दो सेंटर ऑफ एक्सिलेंस इसी साल जुलाई से शुरू हो जाएंगे। इजरायल के तकनीकी सहयोग से फलों का सेंटर बस्ती में और सब्जियों का कन्नौज में शुरू होने जा रहा है। यहां किसानों को उन्नत किस्म की पौध तैयार करके दी जाएंगी। साथ ही किसानों को सब्जियों और फलों के रख-रखाव की सलाह और प्रशिक्षण भी दिया जाएगा।

भारत में फलों और सब्जियों का उत्पादन तो खूब होता है,लेकिन क्वॉलिटी को लेकर किसान ज्यादा जागरूक नहीं हैं। वे खुद बीज बोते हैं, पौध बनाते हैं। पौध कितनी दूरी पर लगाई जाए, कौन से कीटनाशक डाले जाएं और कैसे तोड़ाई की जाए, इस बारे में भी सभी किसानों को पर्याप्त जानकारी नहीं होती।

विशेषज्ञों का मानना है कि बीज से पौध बनाने के स्तर पर ही इतनी चूक हो जाती है कि अच्छी क्वॉलिटी के पौधे ही तैयार नहीं हो पाते। इन बातों को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने इजरायल सरकार के सहयोग से देशभर में फल और सब्जियों के सेंटर ऑफ एक्सिलेंस बनाने का प्रॉजेक्ट शुरू किया था। इसमें यूपी को दो सेंटर ऑफ एक्सिलेंस मिले।

केंद्र और प्रदेश सरकार दे रही आर्थिक सहयोग

उद्यान विभाग के निदेशक आरपी सिंह बताते हैं कि यूपी में दो सेंटर ऑफ एक्सिलेंस बनकर तैयार हो चुके हैं। बस्ती में फलों का सेंटर करीब 7.4 करोड़ रुपये की लागत से बन रहा है। कन्नौज में सब्जियों का सेंटर 7.6 करोड़ की लागत से तैयार हुआ है।

ये दोनों इस साल जुलाई से शुरू हो जाएंगे। इजरायल की तकनीक आधारित खेती का लाभ लेने के लिए यह योजना शुरू की गई है। इनमें केंद्र और राज्य सरकारें आर्थिक मदद कर रही हैं।

किसान बीज लाएंगे, सेंटर पौध तैयार करके देगा

आरपी सिंह ने बताया कि यहां पर किसानों को सर्विस और प्रशिक्षण दोनों मिलेगा। किसान अपना बीज लेकर यहां संपर्क करेंगे। उससे सेंटर पर पौध तैयार कर किसानों को दी जाएंगी। यह सुविधा नि:शुल्क होगी। इसके अलावा फल और सब्जियों को रोग से बचाव, कीटनाशकों के छिड़काव और अन्य जरूरी सलाह भी किसानों को यहां मिलेगी।

इस किसान की सब्जियां जाती हैं विदेश, सैकड़ों महिलाओं को दे रखा है रोजगार

खेती जिसमें एक किसान और उसके उपभोक्ता बीच अगर हजारों किलोमीटर का लंबा फासला हो, तो ज़ाहिर है इस फासले को पाटने का जज्बा हर किसी के बूते की बात नहीं होगी। यह तो 64 साल के करण वीर सिंह सिद्ध की हिम्मत, संकल्प और उनके पिता के सच्चे किसान का डीएनए ही था जिसकी वजह से वो इस जोखिम भरे माहौल यानी खेती के धंधे में कूद गए।

छोटी आयु में ही सिद्ध के सर से उनके पिता का साया उठ गया। सिद्ध के पिता मानसा जिले में किसान थे। उनके गुजर जाने के बाद, वो और उनकी मां पटियाला चली आईं। सन 1979 में वो राज्य में एक्साइज एंड टैक्सेसन ऑफिसर बन गए लेकिन वो खेती में कुछ रोमांचक करना चाहते थे।

कई सेमिनार और वर्कशॉप में जाने के बाद उन्हें समझ में आया कि विदेशी सब्जियों का बड़ा बाजार ना केवल भारत में है बल्कि विदेशों में भी है। सिद्ध बताते हैं, “खेती मेरे खून में था और मैं कुछ अलग करना चाह रहा था। मैं तीन दोस्तों और दूसरे साझेदारों के साथ मिलकर हमारी कंपनी, पटियाला हॉर्टिकल्चर के लिए शुरुआती पूंजी लगाई।

साल 1996 में मैंने नौकरी से पांच सालों का अध्ययन प्रोत्साहन अवकाश लिया और एक डच कंपनी के लिए तलवंडी साबू में सेम के फली की खेती शुरू कर दी।” पहले ही साल उन्हें बड़ा झटका लगा जब पंजाब सरकार के पैक हाउस ने उस वक्त काम करना बंद कर दिया जब 60 एकड़ में तैयार फसल को निर्यात करने से पहले संरक्षित किया जाना था।

“हमे 15 लाख का सामूहिक नुकसान पहुंचा, यद्यपि हमने सारा बकाया चुका दिया, जिसमे खेत का किराया और तीन गांवों के 40 किसानों पर हुआ लागत खर्च जो हमारे कार्य में जुड़े थे,शामिल था’, उसके बाद हम आगे बढ़ गए’।

बड़े ही शांत तरीके से आपबीती बताने का उनका लहजा आपको ये स्पष्ट कर देता है कि कितने शांत भाव से उन्होंने उन विपरीत परिस्थितियों का सामना किया होगा। बाद में वो अपने इस विचार को तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल को समझाने में सफल रहे और 59 लाख रुपये का सॉफ्ट लोन या सुलभ कर्ज भी पाने में सफल हो गए।

इस लोन का उपयोग पटियाला जिले के समाना तहसील के लालगढ़ गांव में पैक हाउस जैसी आधारभूत सुविधाएं तैयार करना था। उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। देश के 180 सबसे अच्छे पैक हाउस में से यह एक है। सिद्ध बताते हैं, “साल 2001 से साल दर साल यूरोप और ऑस्ट्रेलिया को सब्जियां निर्यात कर मैंने अच्छी कमाई की है।

साल 2015 को छोड़कर, जब केंद्र ने नियम में बदलाव किया था,तब हमने एक साल का ब्रेक लेने का फैसला किया था ताकि तब तक परिस्थितियां हमारे अनुकूल हो जाए।” सामना, अमलोह और भादसों के 35 किलोमीटर के दायरे में 40 छोटे किसानों ने जिन्होंने हमें संयुक्त पूल के लिए एक से डेढ़ एकड़ जमीन दी वो सभी किसान सिद्ध जितना ही कमाते हैं।

सुगर स्नैप्स और स्नो पी के उत्पादन से सिद्ध की सालाना बिक्री सवा करोड़ से तीन करोड़ के बीच है। साल 2015 में बदले हुए क्वारेंटाइन नॉर्म्स की वजह से सालाना बिक्री घटकर महज 11 लाख रह गई। यहां तक कि उन्हें काफी सारे उत्पादों को छोड़ना भी पड़ा।

जिंदगी में खुशियां भरनेवाली प्याज

सिद्ध अपने प्याज के बारे में अच्छी तरह से जानते हैं। पिछले दो साल से उन्होंने 50 एकड़ में प्याज की खेती शुरू की है, जो कि राज्य में इस फसल की सबसे बड़ी खेती है। वो बताते हैं, “पंजाब सालाना साढ़े सात लाख टन प्याज की खपत करता है और उत्पादन महज डेढ़ टन ही करता है।

मेरा लक्ष्य किसानों को प्रति एकड़ 50,000 रुपये शुद्ध मुनाफा दिलवाना है, यह एक बड़ी चुनौती है लेकिन मैंने इसे स्वीकर किया है”। सरकार से प्राप्त सब्सिडी की मदद से उन्होंने 50 में से 20 एकड़ क्षेत्र में ड्रिप सिंचाई व्यवस्था लगवा दी है।उनके लिए प्याज की तीन ऋतुएं हैं।

“सबसे अच्छा रबी है, जिसमे मध्य दिसंबर में पौधारोपण होता है और अप्रैल में कटाई। खरीफ फसल में बुआई जुलाई-अगस्त में होती है और कटाई नवंबर महीने में और विलंबित खरीफ फसल का मौसम सितंबर-अक्टूबर में शुरू होता है। विलंबित खरीफ फसल के सामने कई खतरे होते हैं लेकिन हम लोग तीन सीजन पर प्रयोग कर रहे हैं।”

सिद्ध की कंपनी विस्टा फूड के साथ मैकडोनल्ड्स (हैमबर्गर फास्ट फूड रेस्टोरेंट की दुनिया में सबसे बड़ी श्रृंखला) के साथ प्याज की आपूर्ति की बात कर रही है। इसके लिए उन्होंने एकीकृत हाइब्रिड किस्म विकसित की है। अगर करार पर बात बन जाती है तो उन्हें उम्मीद है कि 25 रुपये प्रति किलोग्राम का मूल्य उन्हें मिलेगा।

लहसुन और ऐस्परैगस (एक प्रकार की साग) के साथ प्रयोग

चीन की एक कंपनी के लिए सिद्ध पहली बार पांच एकड़ जमीन में लहसुन की खेती कर रहे हैं, जिसे अमेरिका में बेचा जाएगा। अगर प्रयोग सफल रहा तो वो अमेरिकन कंपनी से सीधा संपर्क करेंगे। एक एकड़ क्षेत्र में वो ऐस्परैगस (एक प्रकार की साग) को उगाने को लेकर भी प्रयोग कर रहे हैं।

फसल तीन साल में पूरी तरह तैयार हो जाएगी, उसके बाद उन्हें उम्मीद है कि उन्हें प्रति किलोग्राम 300 रुपये मिलेंगे और प्रति एकड़ तीन लाख का मुनाफा होगा। यह फसल अगले 20 साल तक उन्हें फल देता रहेगा।

उद्यमी या व्यवसायी गांव के गरीब परिवार के करीब 100 भूमिहीन महिलाओं को मजदूरी पर रखते हैं और उन्हें प्रतिदिन डेढ़ सौ रुपये देते हैं। अधिकांश मामले में एक परिवार की सभी महिलाएं काम पर आती हैं और मिलकर प्रति महीने करीब 20,000 रुपये तक कमा लेती हैं।

नौकरी में घाटा, लेकिन कोई मलाल नहीं

कृषि में सिद्ध की सफलता सरकारी नौकरी में विकास नहीं होने की कीमत देकर चुकानी पड़ी है। वो बताते हैं, ” मैंने सात बार वेतनमान में इजाफा और एक प्रमोशन खो दिया। मेरे जूनियर मुझसे आगे निकल गए। अगर मैं लगातार काम कर रहा होता तो मैं ज्वाइंट कमिश्नर के पद से रिटायर होता।”

उन्होंने यह भी जोड़ा कि, “अगर मैं नौकरी नहीं कर रहा होता तो खेती में और भी अच्छा करता। लेकिन ये भी सच है कि मैंने ईटीओ की नौकरी से कई संपर्क हासिल किया”। किसानों की पटियाला हॉर्टिकल्चर कंपनी तापमान नियंत्रित सब्जियों की खुदरा दुकान खोलने की योजना बना रहा है, जिसकी शुरुआत अप्रैल में पटियाला से दो दुकानों से होने जा रही है।

दो साल में 15 करोड़ के निवेश के साथ फूड पार्क के लिए उन्होंने पंजाब सरकार के साथ एक करार पर हस्ताक्षर किया है। वो बताते हैं, “सब्जी पैदा करनेवाले हमारी पहल या प्रस्ताव की प्रतीक्षा कर रहे हैं।’