बांस, बल्ली व छप्पर के सहारे मशरूम उगा रहा है किसान, 15 लाख तक होती है कमाई

न तो पॉली हाउस है और न ही अब तक कोई सरकारी सहायता मिली, लेकिन अपने दम पर इस किसान ने बांस-बल्लियों के सहारे तीन मंजिला स्ट्रक्चर खड़ा कर लिया, आज मशरूम की खेती से ये सालाना पंद्रह लाख की कमाई कर रहे हैं, यहीं नहीं अब दूसरे किसान भी इनसे प्रशिक्षण लेने आते हैं।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के बख्शी का तालाब तहसील में आने वाला गॉव अजरायलपुर (इटौंजा) जो कि लखनऊ मुख्यालय से 30 किमी की दूरी पर स्थित है। इस गाँव के युवा किसान अजय यादव की वजह से तब चर्चा में आया जब साल 2016-2017 में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक इस गाँव के युवा किसान अजय यादव को मशरूम की खेती के लिए पुरस्कार दिया।

अजय यादव बताते हैं, “जब खेती शुरु की तो इतने पैसे नहीं थे कि पाली हाउस लगा सकूं तो बांस घर के थे बांस से ही पॉलीहाउस की तर्ज पर बांस का तीन मंजिला स्ट्रक्चर बनाया जो जमीन और तीन मंजिला बॉस का स्ट्रक्चर मिलाकर चार लेयर बन गयी इसे ढकने के लिए घास फूस का 70 गुणा 30 फ़ीट का बंगला बना दिया।”

वो आगे बताते हैं, “सिंचाई के लिए देशी तकनीक से स्प्रे मशीन का प्रयोग कर रहा हुं पाली हाउस बनाया नहीं इसलिये सरकारी सहायता भी नही मिली, इस समय दो हिस्से में मशरूम की खेती कर रहा हुं एक बंगला 50 गुणा 30 का है, दूसरा बंगला 50 गुणा 30 का है इन दोनों बंगलों से नबम्बर से अप्रैल तक करीब 85 से 100 कुन्तल मशरूम उत्पादन मिल जाता है, जिसका बाजार मूल्य करीब पंद्रह लाख तक मिल जाता हैं।

मशरूम की खेती के साथ कम्पोस्ट बेचने का भी शुरु किया काम

अजय ने बताया कि पहले गेंहू के भूसे को सड़ाकर कम्पोस्ट बनाते हैं कम्पोस्ट बनने में 28 से 30 दिन का समय लगता है इसमें हम रासायनिक और उर्वरक खादों का प्रयोग करते है। गेंहू के भूसे को भिगोकर 30 से 48 घंटे बाद उसमें यूरिया, डीएपी, पोटाश तीनो चीजों को मिलाकर कम्पोस्ट को ढक देते हैं उसके बाद तीसरे दिन कम्पोस्ट में गेहूं का चोकर डालते है फिर उसके बाद डीएसपी पाउडर, कैलिशयम कार्बोरेट, नीम की खाली, जिप्सम, गुड़ का शिरा, फार्मोलिन, नुआन, आदि सब चीजों को हम मिलाते हैं और छोड़ देते है 28 से 30 दिन में कम्पोस्ट बनकर तैयार हो जाता है।

अधिक मुनाफा देती है यह प्रजाति

25 अगस्त से काम की शुरुआत होती है सितंबर तक हमारी कम्पोस्ट तैयार हो जाती है फिर एक से पांच अक्टूबर तक इसमे हम स्पानिंग कर देते हैं स्पानिंग करने के बाद लगभग 15 दिन में पूरे भुसे में बीज फैल जाता है।

इसके बाद इसके ऊपर एक से ढेड़ इंच गोबर की खाद डाल देते हैं उसी खाद के ऊपर 11 से 15 दिन के बाद मशरूम दिखने लगता है। तापमान कम होने पर उत्पादन थोड़ा कम रहता है पर 12 से 24 डिग्री सेक्सियस में मशरूम का अच्छा उत्पादन प्राप्त हो जाता है।

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एक Idea से चमकी किसान की किस्मत, हर साल कमाता है इतने लाख रुपए

लेट्यूस (सलाद पत्ता), गांठ गोभी, पत्ता गोभी, नारंगी हरे रंग की (ब्रोकली) गोभी, पुदीना, पालक, हल्दी, दो-तीन किस्म की मिर्च, टमाटर, बेलदार सब्जियों के अलावा कुष्मांड कुल की सब्जियां।

बैंगन, प्याज, मिर्च, गोभी, गेंदा, गुलाब, टमाटर सहित अनेक सब्जियों एवं फुलवारी के पौधों की नर्सरी। क्या आप सोच सकते हैं यह सारा काम कितने बीघा में होगा? महज दो बीघा में कई तरह की सब्जियों के साथ पौध तैयार कर बेचकर एक परिवार साल में 5 लाख रुपए कमाई करता है।

  • इतने छोटे से खेत में पानी संग्रह के लिए छोटी सी पक्की डिग्गी, स्प्रिंकलर, मिनी स्प्रिंकल, पाइप्स के जरिए पौधों की बूंद-बूंद सिंचाई करते हैं चक दो ई छोटी के ओमप्रकाश घोड़ेला और उनका परिवार।

  •  डिग्गी पर सोलर पंप, केंचुआ खाद तैयार करने का अलग से प्लांट। भूमि भी सबसे अलग, निराली। खेत का एक इंच भी बेकार नहीं जाने देते ओमप्रकाश। वे उन किसानों के लिए प्रेरणा दायक हैं जिनके पास बहुत छोटी जोत है।

बेलदार सब्जियां भूमि से ऊपर

ओमप्रकाश अपने खेत में बेलदार सब्जियाें का उत्पादन जमीन से ऊपर लेते हैं। खेत की क्यारियों की मेड़ पर बांस-बल्लियां लगाकर बेलें उपर चढ़ा देते हैं। हरा पत्ता, सुगंधित पत्ता, सेलरी पत्ता, ब्रोकली जैसी महंगी सब्जियाें की उपज का हुनर ओमप्रकाश ने पिता से सीखा। उनके खेत में मार्च-अप्रैल में पालक, दिसंबर-जनवरी में टिंडे और बारहमास पुदीना रहता है।

पौध तैयार करने का नायाब तरीका

  •  वे खेत में पौध तैयार कर किसानों को बेचते हैं। उनकी नर्सरी में मिर्च, गोभी, टमाटर आदि की पौध तैयार की जाती है। इसके लिए वे प्लास्टिक की ट्रे में कोकोपिट डालते हैं। प्रत्येक खाने में एक या दो बीज डालते हैं।
  • ओमप्रकाश के मुताबिक, कोकोपिट ऐसा चूर्ण है जिसमें पौध अंकुरण शीघ्र होती है।

मिर्च की खेती से नेक सिंह करते है 1 एकड़ से 2 लाख की कमाई

पटियाला जिले के नाभा से सटे गांव खोख के रहने वाले लगभग 71 वर्षीय नेक सिंह जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव देखे, मगर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। मार्केट की नब्ज पकड़ उन्होंने इतनी मेहनत की कि आज वह पंजाब के नंबर वन मिर्च उत्पादक हैं। इनकम टैक्स भरने वाले गिने-चुने किसानों की फेहरिस्त में उनका नाम शुमार है। वह मिर्च की खेती से एक एकड़ में दो लाख रुपए कमा लेते हैं और इसी के दम पर उन्होंने अपनी चार एकड़ की पैतृक जमीन को बढ़ाकर 65 एकड़ तक कर लिया है।

इस तरह रहा संघर्ष का सफर

  • अपने अनुभव के बारे में नेक सिंह बताते हैं कि बात साल 1965 की है। कुछ पारिवारिक कारणों के चलते दसवीं की पढाई के बाद आगे नहीं पढ़ पाए। तेरह एकड़ जमीन पर काम शुरू किया, जिसमें से उनके हिस्से लगभग 4 एकड़ जमीन ही आई।
  •  उनके शुरुआती दिन संघर्ष से भरे रहे। यहां तक कि उन्हें घर का खर्च चलाने के लिए पेप्सू रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन की बस में कंडक्टर की नौकरी भी करनी पड़ी, लेकिन हिम्मत नहीं हारी।
  •  नेक सिंह के साथ उनके बड़े भाई भी रहते थे और 1960 में सभी को विरासत में एक समान जमीन मिली थी, लेकिन अपनी उद्यमिता के बल पर उनमे से सबसे आगे निकलने में सिर्फ नेक सिंह ही कामयाब रहे।
  •  जिस वक्त राज्य में हरित क्रांति जोर पकड़ रही थी, उस करीब 20 साल की उम्र में नेक सिंह ने साहसिक कदम उठा खेती के लिए साढ़े 3 हजार रुपए के कर्ज से ट्यूबवेल लगाने का फैसला किया।
  •  सरकार की योजना के मुताबिक उन्होंने गेहूं और चावल की खेती शुरू की। हालांकि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की मदद से उन्हें एक स्थिर आमदनी जरूर मिल रही थी, लेकिन नेक सिंह संतुष्ट नहीं थे और वो और कमाना चाहते थे।
  •  इसी सिलसिले में सन 1980 से उन्होंने वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों से मिलना शुरू कर दिया। पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी(पीएयू) के संपर्क में आने के बाद कपास और टमाटर के पौधों का परीक्षण किया और नई तकनीक सीखी।
  •  इसी का नतीजा रहा कि 1988 से लेकर 2000 तक उन्हें टमाटर की खेती से काफी आमदनी हुई। टमाटर के साथ ही उन्होंने 1991 से मिर्च की खेती भी शुरू कर दी और उसके बाद से उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
  •  बीते सीजन में उन्होंने साढ़े तीन एकड़ में मिर्च के पौधे लगाए, लेकिन बताते हैं उनका टारगेट 10 एकड़ तक पहुंचने का है। नेक सिंह गेहूं की खेती नहीं करते हैं, बल्कि रबी के मौसम में ज्यादा कमाई वाली फसल आलू, सूरजमुखी और खरीफ मौसम में मिर्च और बासमती चावल की खेती करते हैं।
    इस तरह आया बदलाव
  •  पंजाब कृषि विश्वविद्यालय और भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) के प्रयोगों को दोहराते हुए 1991 में वो मिर्च की सफल खेती से परिचित हुए। इस काम को समझने में उन्हें बेंगलुरु के इंडियन इस्टीट्यूट ऑफ हॉर्टिकल्चर से भी काफी मदद मिली।
  •  नाभा के ये उद्यमी बताते हैं, “मैं देशभर के वैज्ञानिकों को जानता था जिन्होंने मुझे मिर्च की सीएच-1 प्रजाति के परीक्षण में शामिल होने का मौका दिया। साल दर साल मैंने विशेषज्ञों से मिल रही जानकारी की मदद से इस प्रजाति में सुधार करता रहा, जबकि मिर्च के आधिकांश किसान ये भी नहीं जानते हैं कि नर्सरी कैसे तैयार की जाती है।”
  •  बाद में उन्होंने मिर्च की खेती के लिए अनुकूल माहौल बनाने के लिए पॉली हाउस का विकास किया। ये पॉली हाउस राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब में काफी मशहूर था।

100 औरतें काम करती हैं नेक सिंह के फार्म पर, कमाती हैं 10 हजार तक

नेक सिंह इलाके की महिलाओं को काम करने का मौका देते हैं और उन्हें प्रति घंटा के लिए 40 रुपए देते हैं। नर्सरी की देखभाल, मिर्च चुनने, दूसरे काम में सहयोग करने जैसे काम के लिए हर साल 100 महिलाओं को काम पर रखते हैं। नेक सिंह बताते हैं कि उनके यहां काम करने का माहौल घर के जैसा है, वहीं उनके काम करने वाली महिलाएं हर महीने करीब 10 हजार रुपए कमा लेती हैं।

मिर्च की खेती संबंधी कुछ खास बातें

  •  एक एकड़ नर्सरी से 285 एकड़ खेती के लिए पौधे तैयार होते हैं।
  • मिर्च के पौधों (सैंपलिंग) से प्रति वर्ष 4500 रुपये से लेकर 6000 रुपए प्रति एकड़ तक आमदनी।
  •  हर साल पौधों (सैंपलिंग) से कुल आमदनी 26 से 50 लाख रुपए।
  •  प्रति एकड़ पौधे से करीब साढ़े सात लाख से 14 लाख रुपए की आमदनी।
  •  पौधे के बढ़ने का समय 5 महीना (नवंबर से मार्च तक)
  •  पैदावार लागत (श्रम, लॉजिस्टिक्स, इन्फ्रास्ट्रक्चर, पौधे के लिए बीज) ढाई लाख प्रति एकड़ श्रम लागत 40 रुपए प्रति घंटा।
  •  एक एकड़ में 180 से 220 क्विंटल हरी मिर्च के साथ 200 क्विंटल लाल मिर्च का उत्पादन होता है हरी मिर्च का बाजार मूल्य 12 से 25 रुपए प्रति किलो।
  • प्रति एकड़ सकल आय 6 लाख रुपए।
  •  प्रति एकड़ कुल आमदनी ( पैदावार लागत को घटाने के बाद) पांच लाख रुपए।
  •  प्रति एकड़ लैंड लीज 20 से 40 हजार रुपए (कुल आमदनी से घटाकर)

इस डॉक्टर ने किया होम्योपैथिक दवा का इस्तेमाल,आए चौंकाने वाले नतीज़े

यूपी के पीलीभीत ज़िले के रहने वाले एक होम्योपैथिक के डॉक्टर ने अपने अमरूद के पेड़ों पर एक नए तरह का प्रयोग किया है। पीलीभीत के होम्योपैथिक डॉक्टर विकास वर्मा ने राजस्थान यूनिवर्सिटी से होम्योपैथिक में डिग्री हासिल की और करीब 18 वर्ष से बरेली में होम्योपैथिक विधि से मरीजों का इलाज कर रहे हैं।

डॉ. विकास वर्मा ने बताया, “यह 2003 की बात है। मैंने अपने घर के अहाते में लगे नींबू के पेड़ पर देखा कि उसमें फूल तो आते हैं लेकिन फल नहीं आते तो मैंने उस नींबू के पौधे पर होम्योपैथिक दवाइयों का प्रयोग किया। जिसका आश्चर्यजनक रिजल्ट सामने आया और कुछ ही समय में पेड़ों की रंगत बदलने लगी। फिर कुछ ही समय में जिस नींबू के पेड़ पर फल नहीं आ रहे थे। उन पर भारी मात्रा में फल आने लगे।” यहीं से उनके दिमाग में एक विचार आया कि फसलों पर होम्योपैथिक की दवाई के प्रयोग से आश्चर्यजनक परिवर्तन किए जा सकते हैं।”

इसके बाद उन्होंने गेहूं, धान, दलहन, तिलहन, फल और फुलवारी पर होम्योपैथिक दवाइयों का सफल प्रयोग किया। आज स्थिति यह है कि इनकी अमरूद के बाग में आधा किलो से लेकर सात-आठ सौ ग्राम और एक से डेढ़ किलो तक वजन के अमरुद की फसल होती है।

उन्होंने अपने इस प्रयोग को जनपद के किसानों के अतिरिक्त बरेली के किसानों को भी होम्योपैथिक दवाइयों के प्रयोग के लिए प्रेरित किया। लेकिन इसका रिजल्ट शून्य रहा। क्योंकि किसानों के गले से यह बात नहीं उतरी कि होम्योपैथिक दवा भी खेतों में कुछ चमत्कार कर सकती है। फिर उन्होंने बड़ी मुश्किल से अखा गाँव के किसान ऋषि पाल को इस बात के लिए तैयार किया कि एक बीघा खेत उन्हें प्रयोग के लिए दे दिया जाए।

यदि खेत में होम्योपैथिक दवाओं के प्रयोग से फायदा होता है तो फायदे में वह कोई हिस्सेदारी नहीं लेंगे। लेकिन यदि नुकसान होता है तो नुकसान की सारी भरपाई वह स्वयं करेंगे। इस पर ऋषि पाल ने उनकी बात मान ली और डॉक्टर विकास ने धान की फसल पर जैविक खाद और होम्योपैथिक दवाई का प्रयोग किया,

जिससे धान की फसल अच्छी पैदा हुई। इससे किसान ऋषि पाल को भी अच्छा मुनाफा हुआ। इसके बाद क्षेत्र के कई किसान डॉ. विकास के इस प्रयोग पर विश्वास करने लगे और उन्होंने अपनी मर्जी से अपने खेतों को डॉक्टर विकास को उनके प्रयोग हेतु देने लगे।

मज़बूत होता है पौधों का इम्यून सिस्टम

होम्योपैथिक दवाओं के प्रयोग के बारे में डॉक्टर विकास बताते हैं कि “उनका यह प्रयोग पौधों की इम्यून सिस्टम को मजबूत करने पर टिका है। इसके लिए पहले वह जैविक खाद से जमीन तैयार करते हैं। उसके बाद फिर पौधा लगाने के बाद जड़ों में होम्योपैथिक की दवा का प्रयोग करते हैं।

इसमें एक बड़े ड्रम में पानी भरकर आवश्यकतानुसार दवा की मात्रा डालकर अधिकतर वह ड्रिप इरीगेशन विधि से बूंद-बूंद कर सिंचाई करते हैं। इस तरह पौधों को एक मजबूत आधार मिलता है। यदि पौधों को आगे चलकर जरूरत पड़ती है तो दवा बदलते हैं या डोज़ बढ़ा देते हैं। उन्होंने बताया कि कीटनाशक तैयार करने के लिए गौमूत्र में लहसुन, हरी मिर्च मिलाते हैं।

सीधे फल विक्रेताओं को बेचते हैं अमरूद

डॉक्टर विकास से उनके अमरूदों की बिक्री के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि “मैं अपने फार्म पर तैयार की गई अमरूद की बिक्री सीधे फल विक्रेताओं को करता हूं। इसके अलावा टेलीफोन पर ही मेरे द्वारा तैयार किए गए जैविक अमरूदों का आर्डर मिल जाता है। मैं प्रतिदिन डेढ़ से दो कुंटल अमरुद का आर्डर फोन पर ऑर्डर बुककर होम डिलीवरी पहुंचा देता हूं। एक किलो अमरूद की कीमत 100-120 प्रति किलो है।”

एप्पल बेर बेंच लखपति बन गया ये शख्स, इस ट्रिक ने यूं बदली किस्मत

पंजाब के मालवा में धान, गेहूं और कपास को छोड़कर किसान अब दूसरी फसलों और बागबानी की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। ऐसे ही एक किसान हैं फाजिल्का के चक्क बनवाला के महिंदर प्रताप धींगड़ा। उन्होंने पिछले साल अपनी साढ़े 6 एकड़ जमीन में थाई एप्पल बेर का बाग लगाया है। पहले साल उन्हें इससे 50 हजार रुपए प्रति एकड़ कमाई हुई जिसके इस साल बढ़कर प्रति एकड़ एक लाख रुपए से ज्यादा पहुंच जाने का अनुमान है।.

पश्चिम बंगाल से लाई थाई एप्पल बेर की पनीरी…

पूरी तरह जैविक खेती करने वाले महिंदर प्रताप धींगड़ा थाई एप्पल बेर की पनीरी पश्चिम बंगाल से लेकर आए थे। वह बताते हैं, बाग लगाने से पहले और बाद में मेरे मन में कई तरह के सवाल थे। पहली फसल देखकर थोड़ी तसल्ली हुई। इस बार फल और अच्छे नजर रहे हैं। भाव भी 30 से 35 रुपए प्रतिकिलो मिल रहा है।

इसकी अधिकांश खरीददार निजी कंपनियां है जो इसे विदेश भेजती हैं। अब हालांकि आकर्षक रूप और स्वाद के कारण स्थानीय बाजारों में भी इसकी मांग बढ़ रही हैं। उनके बाग का फल दिल्ली के अलावा लुधियाना, मोगा, जालंधर भी जाता है।

थाई एप्पल लॉन्ग टाइम इन्वेस्टमेंट…

महिंदर प्रताप धींगड़ा के अनुसार, उनके आसपास के कई गांवों के किसान थाई एप्पल बेर को देखने के लिए उनके बाग में रहे हैं। हाल ही में फाजिल्का जिले के ही झुमियांवाली गांव में भी एक किसान ने 12 एकड़ में इसका बाग लगाया है।

जिस तरह किसान रुचि दिखा रहे हैं, उससे लगता है कि अगले कुछ बरसों के दौरान इसका रकबा और बढ़ेगा। धींगड़ा कहते हैं, थाई एप्पल लॉन्ग टाइम इन्वेस्टमेंट है। एक बार इसका बाग लगाने के बाद 15 साल तक फसल ले सकते हैं।

थाईलैंड में इसे जुजुबी भी कहा जाता है…

थाई एप्पल का नाम आते ही जेहन में सेब का ख्याल आता है लेकिन यह बेर की एक किस्म है जो थाईलैंड में होती है। वहां इसे जुजुबी भी कहा जाता है। इसका स्वाद बेर जैसा ही होता है। थाईलैंड से ही यह किस्म भारत आई।

सेब जैसा दिखने वाला इसका फल 30 से 50 ग्राम तक का हो सकता है जबकि दूसरी किस्मों में बेर का वजन 5 से 10 ग्राम होता है। इसके एक पेड़ पर 40 से 50 किलो तक बेर लगते हैं। यह क्षारीय, अम्लीय और शुष्क, सभी तरह की मिट्टी में हो जाता है। फाजिल्का जिले की मिट्टी और जलवायु इसके लिए सबसे मुफीद है।

मटर के साथ ऐसे कर सकते है गेहूं की खेती ,दोगुना होगा मुनाफा

उत्तर प्रदेश के सैकड़ों किसान सहफसली खेती करके लाभ कमा रहे हैं। इससे फसलों की संख्या बढ़ जाती है। लागत भी कम आ रही है। इस दौरान कई क्षेत्रों में मटर के साथ गेहूं खूब देखा जा सकता है।

कन्नौज से करीब आठ किमी दूर मानीमऊ निवासी 18 वर्षीय शैलेंद्र कुमार बताते हैं, ‘‘मटर के साथ गेहूं किया है। मटर उखड़ने को है। गेहूं 20 दिन का हो चुका है। साथ में फसल करने से पानी बचता है। खेत खाली नहीं रहता। जुतौनी व खाद का खर्च भी बच जाता है।’’

एक तरीके से यह लाभकारी है। मटर की 60-65 दिन में तुड़ाई षुरू हो जाती है। 100-110 दिन में खत्म हो जाती है।मटर जब बोया जाता है तो पहला पानी लगाने के दौरान गेहूं छिड़क दिया जाता है।मटर के दौरान ही साथ में गेहूं करने से बुवाई बचती है। खेत तैयार करने, सिंचाई और लेवर खर्च बच जाता है।

लेकिन मटर के बाद गेहूं बोने से विलम्ब हो जाता है। जिसके कारण गेहूं की उतनी पैदावार भी नहीं हो पाती है और साथ में 20-25 फीसदी उत्पादन कम होता है।

समय रहते बुवाई से एक हेक्टेयर में 35-36 क्विंटल गेहूं निकलता है। नही तो 30-35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन होगा। मटर के बाद जनवरी में गेहूं करने से उत्पादन कम मिलेगा। खाली गेहूं समय से करने पर 40-45 क्विंटल गेहूं निकलता है। मटर में उर्वरक ज्यादा पड़ता है, इसलिए सहफसल में नहीं पडे़गा।

इस शख्स को टमाटर ने बना दिया करोड़पति

शहडोल। बढ़ता कैरियर अब लोगों के जीवन का महत्वपूर्ण लक्ष्य बन गया है। कैरियर बनाना एक बहुत बड़ी यात्रा है और आपको इसे सही बनाने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है। तेजी से आगे बढ़ने की होड़ में लोग नौकरी से ज्यादा स्वयं के रोजगार को करने के लिए आगे बढ़ रहे हैं। अगर आप भी इसी राह में आगे बढ़ना चाहते हैं तो आपके पास भी कई ऑप्शन मौजूद हैं।

आप भी अपना व्यवसाय शुरू करके घर बैठे लाखों रुपए कमा सकते हैं। इसी राह में एक शख्स टमाटर की खेती करके 3 से 4 करोड़ रुपए सालाना टर्न ओवर कर रहा है। 10 एकड़ की जमीन से सब्जी उत्पादन के व्यवसाय की शुरुआत करने वाले पुरानी बस्ती निवासी किसान पवन मिश्रा बीते कई सालों से ये काम कर रहे हैं।

देश भर में पहुंचाए जा रहे टमाटर

आपको बता दें बउमरिया जिले के घुनघुटी में लगभग 125 एकड़ क्षेत्र में मां कंकाली कृषि समूह के आठ किसानों ने सब्जी की खेती कर सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। किसानों द्वारा उत्पादित सब्जी उत्पादों ने शहडोल संभाग ही नहीं देश के दिल्ली, बैंगलोर, रीवा, सतना, जबलपुर, रायपुर आदि महानगरों के बाजार में अपनी पहचान बनाई है। इन किसानों के द्वारा उत्पादित टमाटर और अन्य सब्जियां ट्रकों में भरकर दिल्ली, बैंगलोर और देश के अन्य बड़े बाजारों में पहुंचाई जा रही है, जिससे किसानों को सीधा लाभ हो रहा है।

बैंक ने दिए 5 लाख रुपए

अपने रोजगार में सफल होने वाले किसान पवन मिश्रा ने बताया कि उन्होंने टमाटर की खेती की शुरूआत सबसे पहले विचारपुर और सिंदुरी क्षेत्र से की थी। यहां पर सफल होने के बाद उद्यानिकी विभागों के अधिकारियों से सलाह लेने के बाद उन्होंने आज से दस साल पहले उन्होंने ग्राम सिंदुरी और विचारपुर में 10 एकड़ भूमि पर टमाटर के खेती की शुरूआत की।

इस काम को करने के लिए कृषि विभाग के अधिकारियों ने अपनी सलाह के साथ ही ड्रिप एरीकेशन के लिए 5 लाख रुपए भी बैंक के माध्यम से दिए गए। इस खेती को शुरू करने के बाद लगातार पवन मिश्रा को इससे लाभ हुआ है। उनका कहना है कि टमाटर की खेती से बहुत लाभ हो रहा है। जिस कारण उन्होंने बाद में टमाटर के साथ मिर्ची, लौकी, खीरा, बरबटी, आलू, लहसुन और प्याज की खेती शुरू की। उन्होंने बताया कि सब्जियों की खेती करने से उन्हें काफी लाभ हुआ जिसके कारण उन्होने अन्य किसानों को भी समूह बनाकर सब्जी की खेती करने की सलाह दी।

लोगों को दिया रोजगार

टमाटर की खेती से लाभ होने के बाद उमरिया जिले के लगभग 8 किसानों द्वारा मां कंकाली कृषि समूह का निर्माण किया गया साथ ही लगभग 125 एकड़ भूमि पर सब्जी की उन्नत खेती करने की कार्य योजना बनाई। पवन मिश्रा ने बताया कि लगातार सजगता एवं कृषि वैज्ञानिकों की सलाह के कारण संभाग के ग्राम पंचायत सिंदुरी, विचारपुर और घुनघुटी में सब्जी उत्पादन के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित किए हैं।

सब्जी उत्पादन का वार्षिक टर्नओवर लगभग 3 से 4 करोड़ रुपए है। क्षेत्र के लगभग 200 लोगों को रोजगार मिला है। उन्होंने बताया कि संभाग के टमाटर की बहुत ज्यादा मांग है। सब्जी व्यापारियों के ट्रक खेतों में पहुंचकर सब्जियों का उठाव करते हैं। उन्होंने बताया कि संभाग के अन्य किसान भी सब्जी उत्पादन के क्षेत्र में आगे आ रहे हैं। इससे सभी को लाभ हो रहा है।

सिर्फ एक केंचुआ एक किसान के बचा देता है 4800 रू,जाने कैसे

केंचुए मिट्टी को नरम बनाते है पोला बनाते है उपजाऊ बनाते हैं केंचुए का कम क्या है ?? ऊपर से नीचे जाना ,नीचे से ऊपर आना पूरे दिनमे तीन चार चक्कर वो ऊपर से नीचे ,नीचे से ऊपर लगा देता है ! अब जब केंचुआ नीचे जाता तो एक रास्ता बनाते हुए जाता है और जब फिर ऊपर आता है तो फिर एक रास्ता बनाते हुए ऊपर आता है ! तो इसका परिणाम ये होता है की ये छोटे छोटे छिद्र जब केंचुआ तैयार कर देता है तो बारिश का पानी एक एक बूंद इन छिद्रो से होते हुए तल मे जमा हो जाता है !

साथ ही अगर एक केंचुआ साल भर जिंदा रहे तो एक वर्ष मे 36 मीट्रिक टन मिट्टी को उल्ट पलटकर देता है और उतनी ही मिट्टी को ट्रैक्टर से उल्ट पलट करना पड़े तो सौ लीटर डीजललग जाता है 100 लीटर डीजल 4800 का है ! मतलब एक केंचुआ एक किसान का 4800 रूपये बचा रहा है ऐसे करोड़ो केंचुए है सोचो कितना लाभ हो रहा है इस देश को !

गोबर खाद डालने से फाइदा क्या होता है ?

रसायनिक खाद डालो केंचुआ मर जाताहै गोबर का खाद डालो केंचुआ ज़िंदा हो जाता है क्योंकि गोबर केंचुए का भोजन है केंचुए को भोजन मिले वह अपनी जन संख्या बढ़ाता है और इतनी तेज बढ़ाता है की कोई नहीं बढ़ा सकता भारत सरकार कहती है हम दो हमारे दो ! केंचुआ नहीं मानता इसको !एक एक केंचुआ 50 50 हजार बच्चे पैदा करके मरता है एक प्रजाति का केंचुआ तो 1 लाख बच्चे पैदा करता है ! तो वो एक ज़िंदा है तो उसने एक लाख पैदा कर दिये अब वो एक एक लाख आगे एक एक लाख पैदा करेंगे करोड़ो केंचुए हो जाएंगे अगर गोबर डालना शुरू किया !!

ज्यादा केंचुआ होंगे तो ज्यादा मिट्टी उलट पलट होगी तो फिर छिद्र भी ज्यादा होंगे तो बारिश का सारा पानी मिट्टी मे धरती मे चला जाएगा ! पानी मिट्टी मे चला गया तो फालतू पानी नदियो मे नहीं जाएगा ,नदियो मे फालतू पानी नहीं गया तो बाढ़ नहीं आएगी तो समुद्र मे फालतू पानी नहीं जाएगा इस देश का करोड़ो करोड़ो रूपये का फाइदा हो जाएगा !! इसलिए आप किसानो को समझाओ की भाई गोबर की खाद डालो एक ग्राम भी उत्पादन कम नहीं हो

दरअसल गोबर जो है वो बहुत तरह केजीव जन्तुओ का भोजन है और यूरिया भोजन नहीं जहर है आपके खेत मे एक जीव होता है जिसे केंचुआ कहते हैं केंचुआ को कभी पकड़ना और उसके ऊपर थोड़ा यूरिया डाल देना आप देखोगे केंचुआ तरफना शुरू हो जाएगा और तुरंत मर जाएगा ! जब हम टनों टन यूरिया खेत मे डालते है करोड़ो केंचुए मार डाले हमने यूरिया डाल डाल के !!

जिस किसान के खेत मे यूरिया डालेगा तो केंचुआ मर जाएगा केंचुआ मर गया तो मिट्टी मे ऊपर नीचे कोई जाएगा नहीं तो मिट्टी कठोर होती जाएगी कड़क होती जाएगी मिट्टी और रोटी के बारे एक बात कही जाती है की इन्हे फेरतेरहो नहीं तो खत्म हो जाती है रोटी को फेरना बंद किया तो जल जाती है मिट्टी को फेरना बंद करो पत्थर जैसी हो जाती है !मिट्टी को फेरने का मतलब समझते है ?? ऊपर की मिट्टी नीचे ! नीचे की ऊपर !ऊपर की नीचे ,नीचे की ऊपर ये केंचुआ ही करता है ! केंचुआ किसान का सबसे बड़ा दोस्त है

ये शख्स नौ वर्षों से छत पर उगा रहा है सब्जिया

पिछले नौ वर्षों से महेंद्र सचान ने बाजार से कोई सब्जी नहीं खरीदी, क्योंकि वो घर की छत पर ही जैविक सब्जियों को उगाकर उसका उपयोग करते है। लखनऊ के मुंशीपुलिया इलाके में रहने वाले महेंद्र ने 600 स्कवायर फीट की छत पर सेम, पालक, लौकी, बैंगन, पत्तागोभी, मूली समेत कई सब्जियां लगा रखी है। महेंद्र बताते हैं, “वर्ष 2008 में मैंने छत पर बागवानी शुरु की थी। पहले कुछ ही सब्जियां थी। धीरे-धीरे मौसम के हिसाब सब्जियां उगाने लगे। आज हम 20 वैराइटी की सब्जियां उगा रहे हैं।”

किचन के वेस्ट मटेरियल से तैयार करते है खाद।

महेंद्र की छत पर लगी सब्जियों में कोई मंहगी चीज़ों का प्रयोग नहीं हुआ है। डिब्बें, टोकरियों बड़े गमलों में उन्होंने सब्जियों को लगा रखा है। छत पर बागवानी के फायदे के बारे में महेंद्र बताते हैं, “आजकल बाजारों में जैविक सब्जियों के दाम दिन पर दिन बढ़ते जा रहे है। घर में सब्जियां उगाने से पैसे की तो बचत होती है साथ ही शुद् सब्जी मिलती है।”

महेंद्र ने अपनी छत पर बैंगन, पत्तागोभी, मूलीसमेत कई सब्जियां लगा रखी है।महेंद्र ने अपनी छत पर बैंगन, पत्तागोभी, मूलीसमेत कई सब्जियां लगा रखी है।

खेतों में सब्जियों की पैदावार में किए जाने वाले रासायनिक खाद और कीटनाशकों के प्रयोग से कई तरह की बीमरियां हो रही है। ऐसे में किचन गार्डन का चलन बढ़ है। कई लोग ऐसे है जो घर पर ही जैविक सब्जियां उगा रहे हैं और खुद की जरुरते पूरी कर रहे हैं। इसके लिए अब कई ऐसी कंपनी भी आ गई जो घर-घर जाकर पूरा सेटअप करती है।

दिन प्रतिदिन बढ़ रही मंहगाई को देखते हुए घर की छतों पर लोग सब्जियां उगाने में रुचि लेने लगे हैं। घर-घर में किचन गार्डन, हर्बल गार्डन व और्नामेंटल गार्डन को सेटअप करने के लिए काम कर रही वेगे फ्लोरा इंटरनेशनल कंपनी के सलाहकार एच. के प्रसाद बताते हैं, “लखनऊ शहर में मैंने अभी तक 45 घरों में किचन गार्डन हर्बल गार्डन व और्नामेंटल गार्डन को सेटअप किया है। साथ ही छतों पर बागवानी कैसे की जाए इसकी पूरी जानकारी दी जाती है।”

अपनी बात को जारी रखते हुए प्रसाद आगे बताते हैं, “जहां-जहां कृषि मेला लगता है। हम वहां-वहां अपना स्टॉल लगाते है। अभी हमारे पास सब्जियों और फलों की 100 तरह की वैराइटी हमारे पास है। शहरी लोग इसको लगातार अपना रहे हैं।

आप भी शुरू कर सकते हैं छत पर बागवानी

  • घर के पिछले हिस्से में ऐसी जगह का चुनाव करें जहां सूरज की रोशनी पहुंचती हो। क्योंकि सूरज की रोशनी से ही पौधे का विकास संभव है। पौधों को रोज 5-6 घंटे सूरज की रोशनी मिलना बहुत जरूरी होता है। इसलिए अपना गार्डन छांव वाले जगह पर न बनाएं।
  • यह जान ले कि किचन गार्डन की मिट्टी में पानी की पर्याप्त मात्रा है। साथ ही नियमित रूप से पानी निकास की भी व्यवस्था है क्योंकि बहुत ज्यादा या बहुत कम पानी पौधों के लिए नुकसानदायक होता है।
  • मिट्टी को अच्छे से तैयार कर लें। मिट्टी में अगर पत्थर हो तो उसे हटा लें। साथ ही मिट्टी में खाद आदि भी मिलाएं।
  • ऐसे फलों और सब्जियों का चुनाव करें जिसे आप सबसे पहले उगाना चाहते हैं। पौधे का चुनाव करते समय मिट्टी, जलवायु और उनके प्रतिदिन की जरूरतों का ध्यान जरूर रखें।
  • पौधो को देखते हुए ही गार्डन तैयार करे। इसे आपके गार्डन का रखरखाव भी आसान होगा और गार्डन व्यवस्थित दिखेगा।
  • आपके पौधों को शुरुआती दौर में बहुत अधिक पालन-पोषण की जरूरत पड़ेगी। आपको पौधे के अनुसार ही उन्हें पोषक तत्व देना चाहिए।
  • पौधों को नियमित पानी देना बेहद जरूरी है। खासकर पौधा जब छोटा होता है तो उसे पानी की की खास जरूरत होती है, क्योंकि उनकी जड़ें इतनी गहरी नहीं होती है कि मिट्टी से पानी सोख सकें।

3 महीने में 1.5 लाख की कमाई कराएगी इस प्‍लांट की खेती

बिजनेस करने के लिए आप अगर किसी आइडिया की तलाश में है तो मेडिसिनल प्‍लांट फार्मिंग से जुड़ा बिजनेस भी आपके लिए अच्‍छा मौका हो सकता है। इन्‍हीं में से एक है इसबगोल खेती और इससे जुड़ा बिजनेस।

इसमें आप शुरुआत में 10 से 15 हजार रुपए इन्‍वेस्‍टमेंट करने पर आप केवल तीन महीने 1.5 लाख रुपए तक कमा सकते हैं। इसके लिए आपके पास एक हेक्टेयर जमीन होना जरूरी है। यदि आप ज्‍यादा खेती कर सकते हैं या प्रोसेसिंग कर सकते हैं तो इतनी ही खेती पर करीब 2.5 लाख रुपए कमा सकते हैं।

80 फीसदी बाजार पर है भारत का कब्‍जा ईसबगोल एक मेडिसिनल प्‍लांट है। इसके बीज तमाम तरह की आयुर्वेदिक और एलोपैथिक दवाओं में इस्‍तमाल होता है। विश्‍व के कुल उत्‍पादन का लगभग 80 फीसदी सिर्फ भारत में ही पैदा होता है।

इसकी खेती शुरूआत में राजस्‍थान और गुजरात में होती थी। लेकिन, अब उत्‍तर भारत के राज्‍यों हरियाणा, उत्‍तर प्रदेश, पंजाब और उत्‍तराखंड में ही यह बड़ी मात्रा में पैदा किया जाता है। भारत में करीब 3 तरह की ईसबगोल पैदा की जाती है। हरियाणा -2 किस्‍म की फसल 100 से 115 दिनों के भीतर पक कर तैयार हो जाती है। इसके बाद इसे काटकर इसके बीजों को बाजार में बेचा जाता है।

2.5 लाख रुपए तक की हो जाती है उपज

यदि एक हेक्‍टेयर में खेती के आधार पर गणना करें तो एक हेक्‍टेयर से लगभग 15 क्विंटल बीज उत्‍पादित होते हैं। उंझा मंडी में ताजा दामों को लें तो इस वक्‍त लगभग 10700 रुपए प्रति क्विंटल का भाव मिल रहा है। इस लिहाज से केवल बीज ही 160500 रुपए के हो जाते हैं। सर्दियों में प्राइस बढ़ने पर यह आमदनी और अधिक हो सकती है। प्रोसेसिंग के बाद बढ़ जाता है फायदा। ईसबगोल के बीज को प्रोसेस कराने पर और ज्‍यादा फायदा हो सकता है।

दरअलस, प्रोसेस के बाद इसके बीज में लगभग 30 फीसदी भूसी निकलती है और यही भूसी इसका सबसे महंगा हिस्‍सा है। भारतीय बाजार में भूसी का थोक भाव 25 हजार रुपए प्रति क्विंटल है। यानी एक हेक्‍टेयर में उत्‍पादित फसल की भू‍सी का दाम 1.25 लाख रुपए बैठता है। इसके अलावा इसमें अन्‍य खली, गोली आदि बचती है जो करीब डेढ़ लाख रुपए की बिक जाती है।