किसान द्वारा सलेक्शन विधि से तैयार की 3 फीट लंबी काले रंग की देशी गाजर

झीगरबड़ी के प्रगतिशील किसान झाबर मल पचार द्वारा सलेक्शन विधि से तैयार की गई तीन फीट लंबी काले रंग की देशी गाजर की तर्ज पर देशभर में बुआई होगी। किसान द्वारा तैयार किया गया देशी गाजर का बीज राष्ट्रीय नवप्रवर्तन संस्थान अहमदाबाद की टीम ने कारगर माना है।

इस विधि की संस्थान द्वारा देशभर के किसानों के उपयोग के लिए सिफारिश की जाएगी। पचार ने प्रयोग सफल होने के बाद इस साल 200 किलो देशी गाजर का बीज तैयार किया। यह बीज शेखावाटी सहित देश के कई हिस्सों के किसानों को बुआई के लिए सप्लाई किया गया।

पचार ने बताया कि काली देशी गाजर की खासियत है कि किसान को सामान्य फसलों से पांच गुना ज्यादा पैदावार मिल रही है। एक कंद 400 से 500 ग्राम वजन तक है। कंद की मोटाई भी सामान्य है। नवप्रवर्तन संस्थान अहमदाबाद की टीम ने किसान के खेत से फसल का जायजा लिया है।

वहीं संस्थान द्वारा अपने स्तर पर पचार द्वारा तैयार गाजर को पूसा प्रदर्शनी में भी प्रदर्शित किया जा चुका है। उद्यान विभाग के क्षेत्रीय उपनिदेशक हरलाल सिंह बिजारणियां का कहना है कि झीगर के किसान झाबर मल पचार द्वारा तैयार किया गया देशी गाजर का बीज एक अनूठा प्रयोग है। यह किस्म देशी गाजर उत्पादन में महत्वपूर्ण साबित हो रही है।

मिठास शक्कर जैसी आती है |बीज की गुणवत्ता मिठास बढ़ाने के लिए किसान ने घी शहद से बीजोपचार किया है। उद्यान विभाग के अनुसार बीजोपचार के बाद खेत में तैयार गाजर के कंद में शक्कर जैसी मिठास रही है। बीज को किसान ने एक किलो बीज को पांच ग्राम घी पांच ग्राम शहद में मिलाकर उपचारित किया। इस विधि से बीज का अंकुरण भी जल्दी होता है।

यूं तैयार किया देशी गाजर का बीज

तीनसाल पहले काली गाजर के ज्यादा लंबाई वाले कंद की छंटनी शुरू कर दी। तीन साल बाद अक्टूबर में किसान ने लंबे बीज वाले कंद से 300 वर्ग फीट क्षेत्र में प्रायोगिक तौर पर गाजर की बुआई की। चार माह में किसान के खेत में तीन फीट लंबी काले रंग की देशी गाजर का कंद तैयार हो गया है।

1 बीघा बीज की खेती से 18 लाख की आय

झाबरमल पचार का कहना है वह देशी गाजर की खेती से सालाना 8 से 10 लाख रुपए कमा रहा है। इस बार उन्होंने एक बीघा में गाजर के बीज की खेती की है। करीब डेढ़ क्विंटल बीज उत्पादन की उम्मीद है। मार्केट भाव 1200 रुपए प्रतिकिलो तय किया है। इससे सीजन में 18 लाख की आमदनी की उम्मीद है।

एग्रीकल्चर युनिवर्सिटी एवं बीज एजेंसियों की प्रदर्शनियों में काबिलियत जानने के बाद बुआई सीजन शुरू होने से पहले ही दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात, कोलकाता सहित राजस्थान के कई जिलों से 3 हजार से ज्यादा किसानों ने बीज की एडवांस बुकिंग करा दी है। हालांकि अभी तक बीज सरकारी एजेंसी से प्रमाणित नहीं हुआ है। यह मांग कंद की गुणवत्ता और मिठास को देखते हुए बढ़ी है।

पाॅली हाउस में यह विदेशी सब्जियां ऊगा कर किसान ले रहा है चोखा मुनाफा

राजस्थान के नाथद्वारा शहर के पास शिशोदा पंचायत के दड़वल में आधुनिक तकनीक से पाॅली हाउस में विदेशी सब्जियां उगाई जा रही है। लाल पत्ता गोभी, लाल-पीली-हरी रंगीन शिमला मिर्च और ब्रोकली जैसी विदेशी सब्जियां कमाई का साधन बनी हुई है। क्षेत्र के युवा पारंपरिक खेती की जगह आधुनिक तकनीक को अपनाते हुए उन्नत खेती में भविष्य संवार रहे है।

दड़वल गांव के दिनेश जोशी ने 2013 में कुल 1016 वर्ग मीटर जमीन पर पाॅली हाउस लगवा विदेशी सब्जियों की खेती शुरू की, जो उनका जीविकोपार्जन है। उन्होंने लाल अौर पीली हरी मिर्च और ब्रोकली से शुरुआत की। पहली बार कुछ समस्या के बावजूद अच्छा मुनाफा हुआ तो उन्होंने खीरा, जुकनी, लाल पत्ता गोभी, सलाद पत्ता, अमेरिकन मक्का सहित सब्जियों को भी उगाना शुरू किया।

ऐसे की शुरुआत

जिला कृषि विभाग के सहयोग से मिट्टी का परीक्षण कर 2013 में कुल 1016 वर्ग मीटर में अत्याधुनिक तकनीक युक्त पाॅली हाउस लगाया गया।अच्छा मुनाफा होने पर 2015 में दूसरा पाॅली हाउस 2016 वर्ग मीटर पर लगवाया।

यह है दाम

ब्रोकली खेत पर 80 तथा बाजार में 200 से 250, लाल पत्ता गोभी 80 से 90 तथा बाजार में 100 से 130 तक मिल रही। शिमला मिर्च जहां किसान 70 में दे रहे वहीं बाजार में 120 से 150 में मिल रही है। सलाद पत्ता 70 में ले कर बाजार में 150 तक बेचा जा रहा है।

दूसरे लोगों को दे रहे है रोजगार

दड़वलके किसान दिनेश और तुलसीराम जोशी ने जहां आधुनिक खेती को अपनाया वहीं गांव के करीब 4 परिवार को भी रोजगार दिया है। पाॅली हाउस पर कटाई छटाई और पैकिंग के लिए जोशी ने कर्मचारी भी रखे है।

क्षेत्र के कई किसान जोशी से आधुनिक खेती के गुर भी सीख रहे है। किसान दिनेश जोशी का कहना है कि मनुष्य को यदि प्रतिदिन एक ही वस्तु खिलाई जाए तो वह भी नहीं खाएगा। फिर जमीन पर एक जैसी खेती क्यों करें, यहीं सोच कर नए प्रयोग किए।

पॉली हाउस में उगाई लाल गोबी।

पाॅली हाउस में पौधा रोपण के 3 माह बाद फसल तैयार होती है। बीज को नर्सरी में तैयार किया जाता है, पौधा उगने के बाद पाॅली हाउस में एक समान दूरी पर पौधे लगाएं जाते है। इसमें मौसम का इंतजार नहीं करना पड़ता है।

पाॅलीहाउस में सुरक्षा

पारंपरिकखेती की जगह पाॅली हाउस में फसल की गुणवत्ता और मात्रा में भी काफी अंतर है। पाॅली हाउस में गर्मी, सर्दी हवा को नियंत्रित किया जाता है। हवा अौर धूप के लिए पाॅली हाउस के पर्दे उठा लिए जाते है, वहीं सर्दी आैर तेज धूप पड़ने पर पौधों को उन्हीं पर्दों से बचाया जाता है।

विदेशी सब्जियों की स्थानीय स्तर पर खपत नहीं होने से बड़े शहरों में भेजा जाता है। मुंबई, बड़ौदा, सूरत, जयपुर, पूना और आगरा के बाजार तक क्षेत्र के किसानों ने पहुंच बनाई है। फाइव स्टार होटलों और पार्टियों में विदेशी सब्जियों की काफी मांग रहती है।

पशुओं के लिये बहुत उपयोगी ये नुस्खे, नहीं पड़ेगी डॉक्टर की जरूरत

फैट बढ़ाने का फार्मूला

पशु चारे के साथ 100 ग्राम कैल्शियम व 100 ग्राम सरसो का तेल तथा चुटकी भर काला नमक डालकर 7 दिन तक खिलाने से दूध में फेट बढ़ जाएगी ।

पशु को दस्त लगने पर

देसी आंकड़े के 10 फूल तोड़ कर एक रोटी में डालकर खिला देने से चार-पांच घंटे में दस्त ठीक हो जाएगा ।

पशु को हीट पर लाने का तरीका

  • 100ग्राम गुड पुराना वाला कम से कम एक साल पुराना हो..
  • 100 ग्राम सरसो का तेल..
  • 100 ग्राम कैल्शियम..

उपरोक्त तीनों चीजों को मिलाकर 18-20 दिन खिला दे जानवर हीट पर आ जाएगा पशुओं को क्रास या बीज डलवाने के बाद गुड व तेल बंद कर दें और कैल्शियम को ढाई सौ ग्राम जौ के दलिया के साथ पिलाएं

पशु की जड़ टूट जाने पर

1 किलो गुड़ वह साथ में 50 ग्राम अजवाइन 40 /50 आम के पत्तों को पांच लीटर पानी में खूब अच्छी तरह उबालो और उस पानी को ठंडा करके 100 ग्राम कैल्शियम डालकर पशु को पिला देने से आधे घंटे में जड़ बाहर फेंक देगा ।

पशु को चेक करने का फार्मूला

पशु ग्याबन है या नहीं जब पशु 40 – 45 दिन का गर्भ धारण किया हो जाए उस पशु का सुबह के टाइम का पहला पेशाब को कांच के गिलास में भरकर उसमें 2 बूंद सरसों के तेल की डाल दो अगर तेल की बूंद पेशाब पर बिखर जाती है तो पशु ग्याबन नहीं होगा और यदि तेल की बूंद पेशाब पर बनी रह जाती है तो पशु ग्याबन होगा ।

गैस अफारा के लिए

एक लीटर खट्टी छाछ में 50 ग्राम हींग व साथ में 20 ग्राम काला डालकर जानवर को पिलाए तथा सूती कपड़े को घासलेट में भिगोकर पशु को 4/5 मिनट तक सुघा देने से 15 /20 मिनट में ही अफारा उतर जाएगा ।

चौथी क्लास में तीन बार फेल होने वाला आज दे रहा है दे रहे 700 को रोजगार

छत्तीसगढ़ के दुर्ग के सिरसा के किसान अशोक चंद्राकर चौथी क्लास में तीन बार फेल हो गए, तो 12 साल की उम्र में सब्जी बेचनी शुरू की। वे गली-गली घूमकर सब्जी बेचा करते थे। आज उनके पास 100 एकड़ जमीन है और रेंट के खेतों को मिलाकर कुल 900 एकड़ में खेती करते हैं। उन्होंने करीब 700 से ज्यादा लोगों को रोजगार भी दिया है।

अलग-अलग देशों में 10 करोड़ की सब्जियां कर रहे सप्लाई…

आज अशोक सालाना 10 करोड़ की सब्जियां देश के अलग-अलग हिस्सों में सप्लाई करते हैं। 1973 में जन्मे अशोक का पढ़ाई में मन लगा नहीं, इसलिए उन्होंने काम में मन लगाया। उनके माता-पिता गांव के ही एक घर में काम किया करते थे। अशोक ने 14 साल की उम्र में नानी से एक खेत बटाई पर लेकर सब्जी उगानी शुरू की। इसे वे खुद घूम-घूमकर चरोदा, सुपेला भिलाई, चंदखुरी की गलियों में बेचते। इसी पैसे से पहले तीन, फिर चार, पांच आगे चलकर दस एकड़ खेत रेघा में ले लिया। उनका कारोबार बढ़ने लगा।

इन जगहों पर है जमीन

अशोक के पास आज सौ एकड़ की मालिकाना जमीन सिरसा, तर्रा सहित कई जगहों पर है। इसके अलावा नगपुरा, सुरगी, मतवारी, देवादा, जंजगीरी, सिरसा जैसे गांवों में बटाई की जमीन है, जिस पर सब्जियां उगाई जा रही हैं। इसमें नगपुरा में सबसे अधिक दो सौ एकड़ पर टमाटर लगा है। आज उनके पास 25 से ज्यादा ट्रैक्टर व दूसरी गाड़ियां हैं। आधुनिक मशीनें हैं, जो दवा छिड़काव से लेकर सब्जियों को काटने का काम करती हैं।

मेहनत का कोई विकल्प नहीं

अशोक के मुताबिक, आजकल लोग शॉर्टकट के चक्कर में रहते हैं, अगर आप किसी प्लान पर लगातार चलते हैं और इंतजार करते हैं, तो आपको रिजल्ट जरूर मिलेंगे। मेहनत का कोई ऑप्शन हो ही नहीं सकता। कल तक मैं दो-दो हजार के लिए तरसता था और आज 15-15 हजार रुपए वेतन दे रहा हूं।

इस किसान से सीखें 2 एकड़ में 30 फसलें उगाने का फार्मूला,एक साल में कमाता है 22 लाख

ऐसे में जब खेती घाटे का सौदा बनकर रह गई है, अगर कोई खेती से एक साल में 22 लाख कमाने का दावा करे तो आसानी से भरोसा नहीं होता, लेकिन यह सच है। कर्नाटक के बेंगलुरु में एक किसान हैं एच. सदानंद, जो ऐसा करके दिखा रहे हैं। उनके पास केवल 2.1 एकड़ या लगभग 5.2 बीघा जमीन है। मतलब जमीन के क्षेत्रफल के लिहाज से उनकी हैसियत एक सीमांत किसान की है, लेकिन वह इतनी जमीन में ही लगभग 30 तरह की फसलें उगाकर सालाना 22 लाख रुपये कमा रहे हैं।

मुनाफे का गणित

वह ऐसा कैसे कर पाते हैं? यह पूछने पर सदानंद कहते हैं, “मेरी पॉलिसी एकदम साफ है। मैं मानकर चलता हूं कि मुझे अपने फॉर्म से हर रोज, हर हफ्ते, हर महीने, हर तीन महीने, हर छह महीने और हर साल आमदनी होनी चाहिए। अपने इसी सूत्र के हिसाब से मैं तय करता हूं कि मुझे अपनी जमीन पर कौन सी खेती करनी है।“ सदानंद आगे कहते हैं, “इसके लिए मैं पॉली हाउस (पॉलिथीन से बना एक किस्म का ग्रीन हाउस) में फल, फूल, देशी-विदेशी सब्जियां उगाता हूं। साथ में गाय-भैसें, सुअर, कुत्ते, मुर्गियां और मछली भी पालता हूं।“

आम के आम गुठलियों के दाम

इस तरह सदानंद की रोजाना आमदनी मुर्गियों और गाय-भैंसों से मिलने वाले अंडे और दूध से होती है, वहीं उन्हें हर हफ्ते फूलों से, हर तीन महीने पर सब्जियों से और हर छह महीने पर फलों से कमाई होती है। लेकिन मुनाफा यहीं नहीं रुकता, मतलब सदानंद आम के आम और गुठलियों के दाम भी वसूलते हैं। वर्मी कंपोस्ट, गोबर और बीट से उन्हें लगभग फ्री में खाद मिल जाती है, साथ में गोबरगैस भी बनती है, इस तरह खेती पर लागत और कम हो जाती है। सदानंद कहते हैं, सबसे अहम बात यह है कि मुझे और मेरे परिवार को शुद्ध और स्वास्थ्यवर्धक भोजन मिलता है।

पहले नौकरी करते थे फिर बने किसान

सदानंद शुरू में 15 सालों तक एक प्राइवेट फैक्ट्री में काम करते रहे। वह कहते हैं, “मैंने देखा कि व्यापारी खेती की जमीन तो खरीदते थे, लेकिन उनकी रुचि खेती में बिल्कुल भी नहीं होती थी। वे केवल निवेश के नजरिए से जमीन में पैसे लगाते थे। वहीं मेरा मन नौकरी की जगह खेती में लगता था। कुछ समय मैंने नौकरी के साथ खेती की पर बाद में नौकरी छोड़कर पूरी तरह किसान बन गया। यह मेरे जीवन का सबसे अच्छा फैसला था।“

ढेरों फसल और नित नए प्रयोग

दरअसल सदानंद की इस कामयाबी का राज है बहुफसली तकनीक। वह आधे एकड़ में टमाटर और सुपारी की खेती करते हैं। टमाटर से उन्हें 2 लाख और सुपारी से 50 हजार की आमदनी होती है। सुपारी के साथ सदानंद ने अदरक उगाने का सफल प्रयोग किया और उनसे एक साल में 70 हजार रुपये कमाए।

पालते हैं गिरिराजा नस्ल की मुर्गियां

अपने फार्म पर सदानंद गिरिराजा नस्ल की 250 मुर्गियां भी पालते हैं। इन मुर्गियों की खासियत है कि इस नस्ल में रोगों से लड़ने की काफी क्षमता होती है। इसके अलावा ये खेतों से निकलने वाले कूड़े-करकट को भी खा जाती हैं। सदानंद मुर्गियों को हर तीसरे महीने बेचकर साल में एक लाख रुपये कमा लेते हैं। इन मुर्गियों से निकली बीट सुपारी के पेड़ों के लिए बेहतरीन खाद भी साबित होती है।

और भी अपना रखे हैं तरीके

इसी छोटे से फार्म पर सदानंद ने गाय-भैसें भी पाल रखी हैं, जिनसे रोजाना 80 से 100 लीटर दूध मिलता है। यहीं एक छोटा सा तालाब है जिसमें रोहू और कतला मछलियां पाली गई हैं। मछलियों को तो बेचा जाता ही है, साथ ही इस तालाब में उगने वाले जलीय पौधे गाय-भैसों के लिए चारे के तौर पर इस्तेमाल होते हैं। इस तालाब से निकलने वाली गंदगी भी बहुत अच्छी खाद होती है। इतना ही नहीं इस फार्म पर सदानंद रॉटवीलर और ग्रेट डेन नस्ल के कुत्ते भी पालते हैं। इन्हें बेचकर उन्हें सालाना 1.2 लाख मिल जाते हैं।

गुलाब और सब्जियों की जुगलबंदी

सदानंद तीन-चौथाई एकड़ में 2 हजार गुलाबों की कलमें लगाते हैं। इनसे हर साल उन्हें 4 लाख रुपये मिल जाते हैं। एक चौथाई एकड़ में सदानंद ने ग्रीनहाउस बना रखा है जिसमें वह छह महीने गुलाब की एक किस्म बटन रोज और बाकी के छह महीने शिमला मिर्च, ब्रॉकली व सलाद पत्ता लगाते हैं। बटन रोज का चुनाव इसलिए किया गया क्योंकि इसमें ज्यादा कांटे नहीं होते और ये ऊंचे दाम पर बिकते हैं। इसके अलावा खाली जगह पर कॉफी, नारियल, कटहल, पपीते, चीकू, और नींबू उगाए गए हैं।

टेक्नोलॉजी ने बनाई राह आसान

जब सदानंद से पूछा गया कि अपने फार्म पर वह 30 तरह की अलग-अलग खेती कैसे कर पाते हैं तो उन्होंने कहा, “तकनीक के इस्तेमाल से।“ वह कहते हैं, “इससे मेरा काम जल्दी और आसानी से हो जाता है, साथ ही ज्यादा लोगों की भी जरूरत नहीं पड़ती। मैं दूध निकालने वाली मशीन, पावर वीडर जैसे यंत्रों के अलावा टपक सिंचाई, स्प्रिंकलर, रेन वॉटर हार्वेस्टिंग तकनीक का इस्तेमाल करता हूं। सब्जियों को ग्रीन हाउस में उगाता हूं जिससे फसलें तेज हवा, गर्मी व रोगों से बच पाती हैं।

पौधों की नमी बनी रहती है, जिससे कि उनसे मिलने वाली उपज की क्वॉलिटी अच्छी होती है। खुले में खेती करने की जगह ग्रीन हाउस में ज्यादा पैदावार मिलती है।“ ग्रीनहाउस में फसलें उगाने से पहले ही मैं खरीददारों से एग्रीमेंट कर लेता हूं, इसमें पहले से रेट तय कर लिए जाते हैं। सिंचाई बोरवेल से होती है, पानी को स्प्रिंकलर और टपक सिंचाई के जरिए फसलों तक पहुंचाया जाता है जिससे पानी की एक-एक बूंद का सदुपयोग होता है।

सरकार और बेंगलुरू यूनिवर्सिटी से मिली मदद

अपनी इस अनूठी पहल में सदानंद को सरकार से भी मदद मिली है। उनका ग्रीन हाउस 7 लाख की लागत से बनकर तैयार हुआ, इसमें 3 लाख रुपये सरकारी सब्सिडी के तौर पर मिले हैं। सदानंद समय-समय पर बेंगलुरू यूनिवर्सिटी से भी सलाह लेते रहते हैं। कृषि मंत्रालय सदानंद को कई बार सम्मानित भी कर चुका है। सदानंद की कामयाबी बताती है कि आज जरूरत है कि सही तकनीक और सूझबूझ से खेती की जाए। सदानंद देश के तमाम युवा और नई सोच वाले युवा किसानों के लिए एक सशक्त उदाहरण हैं।

सरकारी नौकरी छोड़ शुरू की एलोवेरा की खेती सिर्फ दो साल में होने लगी करोड़ों की कमाई

ये कहानी बदलते हुए भारत के एक ऐसे किसान की है जो पढ़ा-लिखा है, इंजीनियर है और फर्राटेदार अंग्रेजी भी बोलता है। इतना ही नहीं उन्होंने तो एमबीए की पढ़ाई के लिए दिल्ली के एक कॉलेज में दाख़िला भी लिया था, लेकिन शायद उनकी मंज़िल कहीं और थी। ये कहानी जैसलमेर के हरीश धनदेव की है जिन्होंने 2012 में जयपुर से बीटेक करने के बाद दिल्ली से एमबीए करने के लिए एक कॉलेज में दाख़िला लिया,

लेकिन पढ़ाई के बीच में ही उन्हें 2013 में सरकारी नौकरी मिल गई सो वो दो साल की एमबीए की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए। हरीश जैसलमेर की नगरपालिका में जूनियर इंजीनियर के पद पर तैनात हुए। यहां महज दो महीने की नौकरी के बाद उनका मन नौकरी से हट गया।

हरीश दिन-रात इस नौकरी से अलग कुछ करने की सोचने लगे। कुछ अलग करने की चाहत इतनी बढ़ गई थी कि वो नौकरी छोड़कर अपने लिए क्या कर सकते हैं इस पर रिसर्च करना शुरु किया।

वह किसानों के परिवार से ताल्लुक रखता था और कुछ अलग हट कर करना चाहता था। एक बार दिल्ली में आयोजित एक कृषि प्रदर्शनी में उसे जाने का मौका मिला और यहीं से उसका जीवन बदल गया।

उसने अपनी नौकरी से त्यागपत्र दिया और अपने 120 एकड़ के खेत में एलोवेरा यानि की घृतकुमारी सहित अन्य फसलों की खेती शुरू कर दी। जैसलमेर से 45 किलोमीटर दूर धहीसर में हरीश ने अपनी कंपनी ‘नेचुरलो एग्रो’ की भी शुरूआत की । थार के मरूस्थल में हो रहे इस एलोवेरा को बड़ी मात्रा में पतंजली फूड प्रोडेक्ट्स को भेजा जाता है जहां उससे जूस बनाया जाता है।

इस रेगिस्तानी इलाके में होने वाले एलोवेरा की गुणवत्ता इतनी बेहतरीन है कि राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में इसकी बेहद मांग है। पतंजली के विशेषज्ञों ने यहां उपजाए जाने वाले एलोवेरा की गुणवत्ता को इतना अच्छा पाया कि उन्होंने इसकी पत्तियों का तुरंत आर्डर दे दिया। नौकरी से त्यागपत्र देकर खेती किसानी शुरू करने के धनदेव के इस साहसिक फैसले का सुखद परिणाम सामने आया।

आमतौर पर रेगिस्तान में बाजरा, गेंहू, मूंग और सरसों उपजाए जाते हैं लेकिन वो कुछ नया उपजाना चाहते थे। उन्होंने अपने 120 एकड़ के खेत में एलोवेरा की बेबी डेनसिस प्रजाति लगायी। एलोवेरा की यह प्रजाति इतनी बेहतरीन है कि ब्राजील, हांगकांग और अमेरिका जैसे देशों में भी इसकी बड़ी मांग है।

शुरूआत में उन्होंने एलोवेरा के 80 हजार पौधे लगाए जो आज बढ़कर तकरीबन सात लाख हो चुके हैं। वो बताते हैं कि पिछले चार महीनों में उन्होंने हरिद्वार के पतंजली फैक्ट्री में 125 से 150 टन तक एलोवेरा के पत्तियों के प्रसंस्कृत गुदे भेजे हैं। धनदेव ये भी बताते हैं कि एलोवेरा के पत्तों का प्रसंस्करण आधुनिकतम प्रणाली के जरिए होता है जिसके लिए उन्होंने एक संयंत्र भी स्थापित किया है।

नौकरी छोड़ बंजर जमीन पर शुरू की कीवी की खेती , ऑनलाइन बिक्री से कमा रहे लाखों

हिमाचल के जिला सोलन के शिल्ली गांव में तैयार कीवी का स्वाद पूरे देश को लुभा रहा है। हिमाचल से एक्सपोर्ट क्वालिटी की कीवी तैयार कर देशभर में मिसाल बन रहे मनदीप वर्मा की करामात कई युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई है।

खाने में लजीज और पाचन तंत्र समेत शारीरिक ऊर्जा देने वाले फल को अपनी सफलता का नया आधार बनाने वाले मनदीप एमबीए करने के बाद विप्रो कंपनी में मैनेजर पद पर कार्यरत थे।

नौकरी छोड़ बंजर जमीन पर कीवी की पैदावार में जुट गए। परिवार सदस्यों और बागवानी विशेषज्ञों के सहयोग से आज मनदीप वेबसाइट से देशभर में कीवी बेच रहे हैं।

14 लाख से बंजर जमीन पर तैयार किया बगीचा

उनकी पत्नी सुचेता वर्मा कंपनी सचिव हैं। साढ़े सात वर्ष पहले उन्होंने घर के पास बंजर जमीन पर बागवानी का विचार किया। इसके लिए उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ी और गांव लौट आए। उनके पिता राजेंद्र वर्मा, माता राधा वर्मा ने कीवी की खेती में उनका पूरा सहयोग दिया।

सोलन के बागवानी विभाग और डा. यशवंत सिंह परमार यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों से बात करने के बाद उन्होंने विशेषज्ञों की सलाह पर मध्यपर्वतीय क्षेत्र में कीवी का बाग तैयार करने का मन बना लिया। उन्होंने 14 बीघा जमीन पर कीवी का बगीचा लगाया।

कीवी की उन्नत किस्में एलिसन और हैबर्ड के पौधे ही लगाए। करीब 14 लाख रुपये से बगीचा तैयार करने के बाद मनदीप ने वेबसाइट बनाई। मनदीप के मुताबिक बाग से उत्पाद सीधे उपभोक्ता तक पहुंचाने की उनकी कोशिश कारगर साबित हुई।

350 रुपये प्रति बॉक्स बिक रहा कीवी

कीवी की सप्लाई वेबसाइट पर ऑनलाइन बुकिंग के बाद की जाती है। कीवी ऑनलाइन हैदराबाद, बंगलूरू, दिल्ली, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ में बेचा जा रहा है।

डिब्बे पर कब फल टूटा, कब डिब्बा पैक हुआ सारी डिटेल दी जा रही है। एक डिब्बे में एक किलो किवी पैक होती है और इसके दाम 350 रुपये प्रति बॉक्स है। जबकि सोलन में कीवी 150 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बिक रहा है।

हिमाचल में है कीवी की अपार संभावना

डा. वाईएस परमार यूनिवर्सिटी नौणी में कीवी पर दशकों से काम कर रहे विशेषज्ञ डा. विशाल राणा ने बताया कि शिल्ली गांव के मनदीप वर्मा कीवी की ऑनलाइन बिक्री कर रहे हैं। उनकी पैकिंग और ग्रेडिंग भी एक्सपोर्ट क्वालिटी की है।

उन्होंने कहा कि देश में कीवी की शुरुआत हिमाचल प्रदेश से हुई है। आज देश के कुल कीवी उत्पादन का 60 फीसदी कीवी अरुणाचल प्रदेश तैयार कर रहा है।

सिक्किम, मेघालय में भी कीवी की बागवानी की जा रही है। हिमाचल में कीवी उत्पादन की अपार संभावना है। सरकार कीवी को बढ़ावा देने के लिए 50 फीसदी सब्सिडी दे रही है। हिमाचल में अभी करीब 150 हेक्टेयर भूमि पर ही कीवी उगाई जा रही है।

वाह ! खेती से हर महीने कैसे कमाए जाएं लाखों रुपए, पूर्वांचल के इस किसान से सीखिए

खेती में लागत कम करे कोई कैसे लाखों रुपए कमा सकता है और खेती को फायदे का सौदा बना सकत है, पूर्वांचल के नागेंद्र पांडेय से सीखिए। अपने खेत, गाय-भैंस, गोबर और ज्ञान का उपयोग कर वो देश के चुनिंदा जैविक खेती और कंपोस्ट खाद बनाकर लाखों रुपए की कमाई करने वाले किसान और ट्रेनर बन गए हैं।

उत्तर प्रदेश के ज़िला महाराजगंज मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर अंजना गाँव के किसान नागेंद्र पाण्डेय ने न सिर्फ खेती की विधि में सुधार किया बल्कि आस-पास के कई परिवारों को रोज़गार भी उपलब्ध कराया।

नागेंद्र ने कृषि विषय में स्नातक किया और फिर नौकरी की तलाश शुरू कर दी। 15 साल तक उन्होंने एक अच्छी नौकरी ढूंढी लेकिन उनकी ये तलाश पूरी नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने अपनी पुश्तैनी ज़मीन पर खेती करना शुरू कर दिया। उन्हें पता था कि सिर्फ सामान्य तरीके से खेती करके इनती कम ज़मीन पर वो इतनी कमाई नहीं कर सकते, इसलिए उन्होंने सोचा कि क्यों न खेती में ही कुछ ऐसा किया जाए कि आमदनी भी अच्छी हो और खेती में नया प्रयोग भी हो।

उन्होंने देखा की अक्सर छोटे जोत के किसान खाद व रसायनों की किल्लत से दो चार हो रहे है। इसके बावजूद महंगी खादों का प्रयोग करने से भी किसानों को अपेक्षित उत्पादन व लाभ नही मिल पा रहा है। नागेंद्र ने इसका भी तोड़ निकाल लिया। उन्होंने फैसला लिया कि वह ज़मीन के कुछ हिस्से पर जैविक खाद तैयार करेंगे और बाकी बचे हिस्से पर जैविक तरीके से खेती करेंगे।

इस तरह की वर्मी कंपोस्ट बनाने की शुरुआत

नागेंद्र बताते हैं कि वर्मी खाद तैयार करने के लिए उन्हें केंचुओं की ज़रूरत थी। इसके लिए उन्होंने कृषि व उद्यान विभाग से संपर्क किया लेकिन उन्हें यहां से केंचुए नहीं मिल पाए। इसके बाद उनके एक दोस्त ने उन्हें लगभग 40-50 केंचुए दिए। नागेंद्र ने इन केचुओं को चारा खिलाने वाली नाद में गोबर व पत्तियों के बीच डाल दिया। 45 दिनों में इनसे लगभग 2 किलो केचुए तैयार हो गए। उन्होंने इसकी शुरुआत साल 2000 में की थी और अब वह 120 फीट जगह में वर्मी कम्पोस्ट तैयार कर रहे हैं। इसमें 750 कुंतल खाद तैयार होती है। इस खाद की पैकेजिंग और मार्केटिंग का काम भी यहीं से होता है। यहां मिलने वाली खाद की 25 किलो की बोरी की कीमत 200 रुपये होती है। इसके अलावा व किसानों को मुफ्त में केंचुआ भी उपलब्ध कराते हैं।

खाद की यूनिट से कई परिवारों को दिया रोजगार

नागेंद्र बताते हैं कि उनके यहां लगभग 35 लोग अलग-अलग काम कर रहे हैं। यहां लोग खाद की छंटाई, बिनाई, ढुलाई जैसे काम करते हैं। कई महिलाएं भी यहां पैकेजिंग का काम करती हैं। यहां इन्हें प्रतिदिन 150 रुपये मजदूरी दी जाती है। इस समय नागेंद्र पूर्वी उत्तर प्रदेश में सबसे बड़े वर्मी खाद उत्पादक हैं। वह महाराजगंज व गोरखपुर ज़िले में वर्मी खाद बनाने की तीन बड़ी यूनिट स्थापित कर चुके हैं।

करवाते हैं खाद की लैब टेस्टिंग

नागेंद्र बताते हैं कि उनके यहां बनाई जाने वाली खाद की यह खास बात है कि वह इसकी गुणवत्ता का पूरा ख्याल रखते हैं। वह समय समय पर खाद की गुणवत्ता की जांच कराने के लिए उसका लैब टेस्ट भी कराते रहते हैं। इस खाद में 1.8 प्रतिशत नाइट्रोजन, 2.5 प्रतिशत फास्फोरस और 3.23 प्रतिशत पोटाश पाया गया है। इसलिए इस खाद से पौधो की बढवार व उपज दोनों अच्छी होती है।

शहतूत की नर्सरी से अच्छी कमाई

वर्मी कम्पोस्ट के अलावा नागेन्द्र पाण्डेय एक एकड़ खेती में शहतूत की नर्सरी भी तैयार करते हैं जिसमें 10 लाख 50 हजार पौधे प्राप्त होते हैं। एस 1 (64) नाम की यह प्रजाति न केवल सामान्य प्रजातियों से अधिक पत्तियों का उत्पादन देती है बल्कि इसको रेशम कीट पालन के लिए सबसे अच्छा भी माना जा सकता है। इस नर्सरी को भी पूरी तरह से जैविक विधि से ही तैयार किया जाता है। यही कारण है कि यहां तैयार पौधे मध्य प्रदेश सरकार 2.5 रुपये प्रति पौधे की दर से खरीद लेती है। इस तरह नागेंद्र 6 महीने में सिर्फ शहतूत की नर्सरी से 26 लाख 25 हजार रुपये की कर लेते हैं। अगर लागत को निकाल दिया जाए तो भी 6 महीने में इनकी औसत आमदनी करीब 15 लाख रुपये हो जाती है।

वाटर हार्वेस्टिंग का नायाब तरीका

किसान नागेन्द्र पाण्डेय ने खेतों की सिंचाई में प्रयोग आने वाले पानी व वर्षा के पानी के लिए एक तालाब खुदवा रखा है। जिसमें खेत से सीधा पाइप लगाकर जोड़ा गया है। वहां से अतिरिक्त पानी पाइप के रास्ते गड्ढे में इकट्ठा हो जाता है। जिसका प्रयोग वह दोबारा वर्मी पिट की नमी बनाने व खेतों की सिंचाई के लिए करते हैं।

आधुनिक विधि से करते हैं खेती

बाकी फसलों में भी नागेन्द्र खेती की आधुनिक विधि का इस्तेमाल करते हैं। वह वह धान को श्री विधि रोपाई कर अधिक आमदनी प्राप्त करते हैं। वहीं गेहू की बुआई सीड ड्रिल से करते हैं जिससे लागत में कमी आती है। वह अपने खेतों में वर्मी खाद व वर्मी वास का ही इस्तेमाल करते हैं।

किस तरह बनता है वर्मीवास

वर्मीवास भी केंचुए से ही बनाया जाता है। इस विधि मेंं मटके में गोबर मिलाकर उसमें केंचुए डालकर उसे ऊपर टांगकर पानी डाल दिया जाता है। जिसमें इन केचुओं के हार्मोनस मिलकर बूंद-बूंद बाहर आता है। जो फसलों में छिड़काव के काम आता है। नागेन्द्र पाण्डेय स्थायी कृषि के लिए जो प्रयास कर रहे हैं उनके बारे में जानकर गोरखपुर जिले के कमिश्नर, उपनिदेशक कृषि, सीडीओ सहित तमाम लोग इनके युनिट का भ्रमण कर चुके है और इनके प्रयासों की सराहना भी की।

(वृहस्पति कुमार पाण्डेय के इनपुट के साथ)

News Source : Gaonconnection News

डेढ़ सौ रुपए का एक अमरूद बेचता है ये किसान,जाने इसके अमरुद में ऐसा क्या है खास

आपने कभी डेढ़ से दो किलो का एक बड़ा अमरूद देखा है ? बहुत कम लोग ऐसे होंगे जिन्होंने देखा होगा। आज हम आपको एक ऐसे ही किसान से मिलवाने जा रहे हैं जो अमरूद की खेती करते हैं और डेढ़ से दो किलो का एक अमरूद पैदा करते हैं, इस एक अमरूद को किसान 80 से 150 रुपए का बेचता है। हालांकि सभी फल इतने बड़े नहीं होते हैं।

मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले के किसान सुभाष जैन कई फसलों की खेती करते हैं लेकिन अमरूद की खेती उन्हें दूसरे किसानों से एक अलग पहचान दिलाती है। सुभाष 25 एकड़ जमीन पर खेती करते हैं, जिसमें से तीन एकड़ जमीन पर अमरूद की खेती करते हैं।


सुभाष बताते हैं, ”चार साल पहले बीएनआर किस्म के अमरूद के पौधे लगाए थे। इसे थाई ग्वावा भी कहते हैं। इसके एक एकड़ में 400 पौधे लगते हैं।” वो बताते हैं, ”एक पेड़ से दूसरे पेड़ के बीच में 12 फुट सामने और आठ फुट की दूरी पर बगल में पौधे लगाने चाहिए। एक एकड़ में पहली बार पौधे लगाने में कुल एक लाख रुपए का खर्च आता है।” एक पेड़ से 25 से 30 किलो ग्राम फसल निकलते हैं जो 80 से 150 रुपए किलो तक बिकता है।

सुभाष आगे बताते हैं, ”पौधों में जब फल आते हैं उस समय देखरेख सबसे ज्यादा करनी होती है। जहां पर एक साथ कई फसल होते हैं उसमें से सिर्फ एक फल ही रखा जाता है बाकी सभी फलों को तोड़ कर फेक दिया जाता है। जब फसल थोड़े बड़े हो जाते हैं तो उनकी बैगिंग करनी होती है, जिसमें हर फल पर 5 से 7 रुपए का खर्च आता है।” सुभाष बताते हैं कि फलों की बैगिंग इस लिए करते है ताकि फलों पर दाग न पड़ें पक्षी नुकसान न पहुंचाए। बैगिंग करने से फल पूरी तरह से सुरक्षित रहता है।


सुभाष बताते हैं, ”फल जब पूरी तरह से पक जाता है उस समय इसका वजह 1700 ग्राम तक हो जाता है। मैं तौल कर देख चुका हूं।” सुभाष का अमरूद दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हरियाणा समेत कई राज्यों में बिकने के लिए जाता है।80 से 150 रुपए प्रर्ति किलो बिकाता है यह अमरूद।

किसान ने निकाली एक ऐसी स्कीम के पैसे भी बच गए और लेबर भी फ्री

यह कहानी सबक देती है कि हमारे पास जितने भी सीमित संसाधन हैं, उन्हीं का सही इस्तेमाल करके हम न केवल कामयाबी हासिल कर सकते हैं, बल्कि दूसरों के लिए भी मॉडल स्थापित कर सकते हैं। इसके लिए जरूरत होती है सही नेतृत्व और टीम वर्क की।

बेंगलुरु से करीब 100 किलोमीटर दूर एक जगह है मांड‍या। पिछले साल जुलाई की बात है, यहां गन्ने की खेती करने वाले 20 से ज्यादा किसानाें ने मौत को गले लगा लिया। इन किसानों की आत्महत्या की वजह यह नहीं थी कि खेती नहीं हुई, वजह थी वह भारी कर्ज जो उन्होंने कभी लिया था और अब बढ़ते-बढ़ते इतना हो चुका था कि उसे चुकाना उनके वश की बात नहीं रही थी। फसल की सही कीमत न मिलना, भारी स्टॉक और सही सलाह के अभाव में ये किसान हालात के सामने हार चुके थे।

इधर, मांडया से हजारों मील दूर बैठा एक शख्स इन हालात से दुखी था। वह रोजाना मांडया में किसानों की आत्महत्या की खबरें सुनता और मन मसोस कर रह जाता। कैलिफोर्निया में आईटी प्रोफेशनल मधुचंद्रन चिक्कादैवेया मांडया में ही जन्मे थे। उनका संबंध भी किसान परिवार से है, उनका बचपन 300 एकड़ में फैली बेंगलुरु एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के प्रांगण में बीता था, उनके पिता यहां वाइस चांसलर थे।

वर्ष 2014 में उन्होंने अपनी नौकरी से त्यागप्ात्र दे दिया और मांडया लौट आए। मधु कहते हैं- मेरा एक ही मकसद था, मांडया के किसानों को बचाना, उनकी मदद करना। उनके मुताबिक देश के हालात ऐसे हैं कि किसान अपनी खेती को छोड़कर छोटे-मोटे काम-धंधों के लिए शहर की तरफ दौड़ रहे हैं, ऐसा इसलिए है क्योंकि खेती अब फायदे की चीज नहीं रही।

मधु कहते हैं, जब मैं मांडया आया तो मैंने पाया कि यहां किसान आर्गेनिक तरीके से खेती कर रहे हैं, लेकिन समस्या यह थी कि यहां कोई बेहतर मार्केट नहीं थी और न ही किसानों को गाइड करने वाला। तब हमने पहला काम यही किया- मंडया आर्गेनिक फार्मर्स को-ऑपरेटिव सोसायटी स्थापित की।

मधु ने अपने दोस्तों, पूर्व सहयोगियों के साथ मिलकर करीब 1 करोड़ रुपये जुटा कर इस सोसायटी का गठन किया, उन्हें सरकार से मंजूरी लेने और आर्गेनिक मांडया नाम से एक ब्रांड शॉप खोलने में 8 महीने का समय लगा। इस ब्रांड के जरिये किसान अपने आर्गेनिक फल-सब्िजयों को बेचते हैं। मधु के मुताबिक हमने बेंगलुरु-मैसूर हाईवे पर आर्गेनिक मांडया नाम से इस शॉप को स्थापित किया है। मेरा मकसद था कि एक किसान सीधे अपने ग्राहक से बात कर सके, उसकी जरूरत को समझ सके वहीं एक ग्राहक किसान की मेहनत को जान सके। हाईवे पर शॉप स्थापित करने का फायदा यह हुआ कि वहां से गुजरने वाले लोग उन आर्गेनिक फल-सब्जियों को खरीदने लगे। किसानों को वहां से कहीं और नहीं जाना पड़ा। इसकी कामयाबी के बाद एक आर्गेनिक रेस्टोरेंट खोल दिया गया।

क्या है फार्म शेअर (farm share)प्रोग्राम

मधु कहते हैं, लोग आर्गेनिक पदार्थों से जुड़ते हुए हिचकते हैं,हमारे लिए यह बेहद जरूरी था कि हम लोगों को बताएं कि आर्गेनिक खाद्य पदार्थों का सेवन ही क्यों जरूरी है। इसके लिए हमने लोगों को मांडया में बुलाकर उन्हें इस काम से जोड़ने की सोची। जिन लोगों की खेती में रुचि है या जो प्रकृति के साथ रहकर अपना समय बीताना चाहते हैं, उन्हें आमंत्रित किया गया। मधुचंद्रन का यह आइडिया काम कर गया है, चार महीनों के अंदर उनकी सोसायटी ने एक करोड़ रुपये का बिजनेस किया है, किसानों की आर्थिक स्थिति सुधर गई है, वे अपने कर्ज चुका पा रहे हैं, उनकी जिंदगी में बदलाव आ गया है।

इसके लिए उन्होंने “फार्म शेअर” नाम का प्रोग्राम शुरू किआ जिसमे वह शहर में रहने वाले परिवारों को 35000 \ रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से जमीन मुहैया करवाते है।यहाँ पर लोग खुद के लिए और परिवार के लिए आधे से 2 एकड़ तक जमीन किराये पर लेते है  ।उनकी मदद के लिए एक गांव का एक किसान हर वक़्त उनके साथ रहता है और खेतीबाड़ी में शहरी परिवार की मदद करता है ।

तीन महीने बाद परिवार की मर्जी हो तो वो उत्पाद बाजार में बेच सकता है और अगर चाहे तो अपने लिए भी रख सकता है । इस प्रोग्राम की खासियत यह है यहाँ पर लोग ख़ुशी -ख़ुशी काम करते है जिस के लिए खेत एक मौजमस्ती और पिकनिक मानाने की जगह बन गया है ।

मधुचंद्रन का यह आइडिया काम कर गया है, चार महीनों के अंदर उनकी सोसायटी ने एक करोड़ रुपये का बिजनेस किया है, किसानों की आर्थिक स्थिति सुधर गई है, वे अपने कर्ज चुका पा रहे हैं, उनकी जिंदगी में बदलाव आ गया है।