एप्पल बेर का बाग लगाएं ,15 साल बगैर पूंजी का उत्पादन पाएं

एप्पल बेर लांग टाइम इंवेस्टमेंट है। इससे एक बार फसल लेने के बाद करीब 15 साल तक फसल ले सकते हैं। कम रखरखाव व कम लागत में अधिक उत्पादन के कारण किसान इसकी ओर आकर्षित हो रहे हैं।

बेर… लगभग सबने खाया और देखा होगा, लेकिन एप्पल जैसा आकार और खाने में बेर का स्वाद, यह शायद पहली बार ही सुना होगा, लेकिन यह सच्चाई है।  थाईलैंड का यह फल इंडिया में थाई एप्पल बेर के नाम से प्रसिद्ध है। थाईलैंड में इसको जुजुबी भी कहते हैं।

राजस्थान के सीकर के  रसीदपुरा गांव के अरविन्द और आनंद ने ऐसे ही बेर अपने 21 बीघा खेत में उगा रखे हैं। आनंद बताते हैं कि 14 माह पहले इस फल के 1900 पेड़ खेत में लगाए गए थे। यह दूसरा मौका है जब पेड़़ों में फल आए हैं।

पांच वर्ष बाद उन्हें 21 बीघा के इस खेत से सालाना करीब 25 लाख रुपए की आय होने वाली है। उन्हें इस वर्ष करीब आठ लाख रुपए की आय होगी। उनकी प्रेरणा लेकर करीब 50 और खेतों में थाई एप्पल बेर के पेड़ लगाए गए हंै।

चार माह में फल

बकौल अरविन्द और आनंद पेड़ लगाने के चार माह बाद इसमें फल आना शुरू हो जाता है। पहली बार फल प्रति पेड़ में दो से पांच किलो, दूसरी बार में प्रति पेड़ 20 से 40 और पांच वर्ष बाद प्रति पेड़ में एक से सवा क्विटल फल आते हैं। इसके लिए सीकर का क्षेत्र अनुकूल है। यह माइनस डिग्री से +50 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी कारगर हुआ है। उनका कहना है कि अप्रेल माह में इसके पेड़ को नीचे से गन्ना की तरह काट दिया जाता है।

दिसंबर तक इसके फलों को बाजार में सप्लाई किया जा सकता है। यह बेर 60 से 120 ग्राम वजनी होता है। आनंद के पिता किशोर सिंह थाईलैंड गए थे। वहां पर थाई एप्पल बेर की खेती देखकर आए थे। इसके बाद हम दोनों भाइयों ने नेट पर इसके बारे में पढ़ा। अहमदाबाद जाकर इसकी खेती देखी। सीकर में इसका प्रयोग किया तो सफल रहा।

सेब व बेर के मिश्रित स्वाद वाले फल की मांग इंदौर, अहमदाबाद, वडोदरा, मुंबई समेत बड़े शहरों में बढ़ रही है। बेर के खरीदार अधिकांश निजी कंपनियां है। वे इन्हें विदेशों में निर्यात करती हैं। इसके आकर्षक रूप व स्वाद के कारण स्थानीय बाजारों में इसकी मांग बढ़ रही हैं।  पहले साल में  एक पौधे से 60 से 70 किलो का उत्पादन मिला। बाजार में इसका भाव 45 से 50 रुपए किलो तक जाता है।

15 दिन में बने युवा किसान ने सिर्फ 40 दिन में किया 14 टन खीरे का उत्पादन

सुनने में थोड़ा फ़िल्मी सा लगता है लेकिन ये बात बिलकुल सच है । एक नए बने किसान ने वो कर दिखया जो शयद दूसरे किसान सोच भी ना सकें । एमबीए के बाद इस युवा की व्यवसायी बनने की ख्वाहिश थी।

लेकिन पिता के व्यवसाय में हाथ बंटाने के बाद उसे लगा कि हर सेक्टर में मंदी है, लेकिन कृषि में नहीं। इसी सोच ने उसे तमिलनाडु पहुंचा दिया। यहां टैरेस गार्डन और पॉली हाउस में फसलों का उत्पादन लेना सीखा।

15 दिन बाद खंडवा लौटा और सिहाड़ा रोड पर आधे एकड़ में पॉली हाउस और आधे में नेट हाउस खोल दिया। ये कहानी है 29 साल के युवक किसान श्रेय हूमड़ की। श्रेय ने पहले ही प्रयास में 14 टन खीरा का उत्पादन किया है। पढ़ें, श्रेय की सक्सेस स्टोरी…

– श्रेय ने बताया कि 2010-11 में इंदौर से एमबीए करने के बाद खंडवा में पिता का बिजनेस संभाला।
– इस दौरान देखा कि ऑटोमोबाइल से लेकर अन्य सेक्टरों में मंदी का दौर आया। लेकिन कृषि में आज तक कभी ऐसा नहीं आया।
– मैंने केलकुलेशन किया कि आने वाले दौर में फूड में अच्छा स्कोप है। मैं तमिलनाडु के मदुराई व अन्य शहरों में गया।
– यहां टैरेस गार्डन और पॉली हाउस देखे। आइडिया अच्छा लगा। खंडवा लौटकर इसके बारे में तीन महीने तक रिसर्च किया।
– इसके बाद लीज पर एक एकड़ जमीन ली। शासन की योजना का लाभ लिया। आधे एकड़ में पॉली हाउस और आधे में नेट हाउस खोल दिया।
– पॉली हाउस से श्रेय ने 40 दिन में 14 टन खीरा का उत्पादन लिया। उन्होंने कहा मार्केट में दूसरों की ककड़ी 10 से 12 रुपए किलो थोक में बिकती है।
– हमारी 18 से 20 रुपए तक बिक जाती है। इसी तरह श्रेय ने टमाटर, मैथी, लौकी व धनिया सहित अन्य सब्जियां भी ली हैं। उन्हें इनके दाम भी अच्छे मिले।
– श्रेय ने बताया कि इसके बीज उन्होंने पुणे से मंगवाए हैं, इसमें अंदर बीज नहीं निकलते हैं। जब ये पकने के कगार पर आ जाती है जब बीज बनते हैं।
– श्रेय ने कहा मेरे परिवार में कोई भी किसान नहीं है। मैंने भी कभी नहीं सोचा था कि मैं किसान बनूंगा। लेकिन इस क्षेत्र में अच्छा स्कोप है।

पॉली हाउस और नेट हाउस में उत्पादन ज्यादा

श्रेय ने बताया कि परंपरागत खेती के मुकाबले पॉली हाउस और नेट हाउस में उत्पादन भी ज्यादा और उन्नत क्वालिटी का होता है। पॉली हाउस में जो भी सब्जियां लगाई जाती हैं, उसे किसान जितना भी खाद, पानी और ऑक्सीजन देगा, उतना ही फसलों को मिलेगा।

इसमें बारिश का पानी भी अंदर नहीं जा सकता। नेट हाउस में भी प्रकाश और बारिश का पानी आधा अंदर आता है और आधा बाहर जाता है। यह गर्मी और ठंड में फसलों के लिए अच्छा होता है, जबकि पॉली हाउस सभी सीजन में फसलों के लिए फायदेमंद होता है।

व्यवसायी की तरह सोचना होगा किसानों को

सूखे और बेमौसम बारिश की मार झेल रहे किसान संकट के दौर से गुजर रहे हैं। कई किसान मौत को भी गले लगा चुके हैं। वहीं श्रेय का मानना है कि किसान इस संकट से बच सकता है। किसानों को व्यवसायी की दृष्टि से सोचना होगा। उसे एक बार में एक के बजाय तीन-चार फसलें लेना होगी।

श्रेय कहते हैं वर्तमान में किसान जिस भी खाद्य वस्तु के दाम बढ़ते हैं, उसे बड़ी मात्रा में बो देते हैं। ऐसे में निश्चित तौर पर उत्पादन ज्यादा होता है और मांग कम हो जाती है। दाम कम मिलते हैं फिर वह रोता है।

एक बिहारी पड़ा थाइलैंड और जापान पर भारी

एक बिहारी सब पर भारी वाली कहावत तो आप ने सुनी होगी वहीं एक बिहारी किसान ने गन्ने के उत्पादन का रिकॉर्ड तोड़ा जिसका लोहा आज थाइलैंड और जापान भी मान रहे हैं। वैसे ये यकीन करना थोड़ा मुश्किल है क्यूंकि जहां गन्ने का प्रति एकड़ औसत उत्पादन 250 से 500 क्विंटल तक हो, वहां कोई 1018 क्विंटल गन्ने का उत्पादन कर सकता है। पर ऐसा एक बिहारी किसान ने कर दिखाया

दो दशक पूर्व मैट्रिक पास करने के बाद जिसे रोजगार के लिए भटकना पड़ रहा था आज उसके खेतों की फल-सब्जियां बिक्री के लिए सीधे मॉल जा रही हैं। अपनी दो दशकों की मेहनत से उन्होंने न केवल अपनी बल्कि गांव के लोगों की जीवन दशा में बदलाव की पटकथा भी लिखी है।

इस बिहारी किसान की थाईलैंड-जापान यात्रा वाया हरियाणा शुरू हुई। मुजफ्फरपुर के छोटे से कस्बे सकरा के रहने वाले दिनेश प्रसाद ने मैट्रिक तक चंदनपट्टी हाईस्कूल में पढ़ाई की। बात 1996 की है। बिहारी मजदूरों का पलायन हो रहा था।

दिनेश भी गांव के लोगों के साथ रोजगार की तलाश में हरियाणा पहुंच गए। वहां के खेतों में बिहारी मजदूरों की तरह काम करने की बजाय उन्होंने बटाई पर खेती शुरू की। जैविक उर्वरक, जीरो टिलेज और सीड ट्रांसप्लांट तकनीक के इस्तेमाल से आधुनिक खेती की।

आरंभ में पांच एकड़ खेती के मुनाफे ने मनोबल बढ़ाया। आज हरियाणा में करीब 125 एकड़ और अपने गांव में 138 एकड़ भूमि पर खेती कर रहे हैं। गांव में तो उनकी मात्र आठ एकड़ भूमि है लेकिन 130 एकड़ जमीन लीज पर लेकर फलों और सब्जियों की आधुनिक और जैविक खेती से पैदावार का रिकॉर्ड बनाया। छह वर्षों के दौरान दिनेश प्रसाद ने हरियाणा में उन्नत खेती का ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया कि वे राज्य सरकार की नजर में आ गए।

दरअसल 2001 में हरियाणा सरकार ने चीनी मिलों से किसानों की सूची मंगाई थी। उस सूची में दिनेश प्रसाद एकलौते किसान थे जिन्होंने एक एकड़ में 1018 क्विंटल गन्ना उपजाकर चीनी मिल को बेचा था।

हरियाणा सरकार के नुमाइंदे दिनेश के खेत पहुंचे। उन्हें मंच पर आमंत्रित कर वहां के मुख्यमंत्री ने सम्मानित किया। इसके बाद फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। अपने गांव सकरा में हरियाणा पैटर्न पर पहले अपनी जमीन पर ही खेती शुरू की।

पड़ोसी किसानों से बातचीत कर उन्हें भी आधुनिक कृषि के लिए प्रेरित किया। अब गांव में अपनी आठ एकड़ भूमि के अलावा करीब 130 एकड़ लीज जमीन पर फल- सब्जी उपजा रहे हैं। आधुनिक और जैविक खेती की शोहरत फैली तो रिलायंस फ्रेश सहित अन्य कृषि उत्पाद का कारोबार करने वाली कंपनियों ने दिनेश प्रसाद से उनकी उपज खरीदने का करार कर लिया। अब इनके खेत की सब्जी और फल सीधे एग्री-मार्केट और मॉल में पहुंच रहे हैं।

तीन महीने जापान में रहे : हरियाणा सरकार से सम्मान मिलने के बाद दिनेश प्रसाद पर केंद्र सरकार की नजर भी गई। 2003 में केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने उन्हें कृषि के क्षेत्र में अपने अनुभव व शोध साझा करने के लिए जापान भेजा।

करीब तीन माह तक दोभाषिये (ट्रांसलेटर) के साथ जापान में कृषि विकास का अध्ययन किया। 2006 में थाइलैंड जाकर उन्होंने वहां खेती के आधुनिक तौर तरीकों का अध्ययन किया। अमरूद, केला, पपीता, कंद, पुदीना, धनिया, गेहूं, गन्ना, बाजरा से लेकर वे ऐसी सब्जियों की खेती कर रहे हैं।

73 वर्षीय एक बुज़ुर्ग किसान ने किया ऐसा कमाल जानकर हैरान रह जायंगे आप

छत्तीसगढ़ के 73 वर्षीय एक बुज़ुर्ग को खेती करने का शौक तो था लेकिन उनके पास खेती करने के लिए जमीन नहीं थी। सन 2004 में एफसीआई से रिटायर होने के बाद उस शख्स को खेती करना था लेकिन रिटायरमेंट से मिले पैसे इतने ज्यादा नहीं थे कि खेत खरीद सकें।

खेती के लिए ज़मीन तो नहीं थी, लेकिन खेती करने का जज़्बा तो उस बुर्जुग में कूट कूट कर भरा था। लिहाज़ा उन्होंने बड़ी योजनाबद्ध तरीके से उम्र के आखिरी पड़ाव पर भी एक जोखिम लेने का साहस लिया। उनका प्रयोग काम कर गया।

उन्होंने अपने घर की छत को ही खेत बना लिया। रायपुर से 45 किलोमीटर दूर महासमुंद में भागीरथी बिसई नाम के इस शख़्स ने अपने घर की छत पर ही धान की खेती कर के वैज्ञानिकों के तमाम दावों को चुनौती देकर हैरान कर दिया।

खेती करने के लिए उनके पास एक छत थी, ऐसे में सबसे पहले छत पर रेत और सीमेंट की ढलाई कराई, फ़िर लोहे की सरिया के साथ बांस की लकड़ी लगवाई, ताकि छत को नुकसान न पहुंचे।

रिटायरमेंट के बाद पहले घर की 100 वर्ग फुट छत पर धान बोया और ठीक ठाक तरीके से खेती कर उत्पादन भी लिया। प्रयोग सफल रहा। फिर घर को दो मंजिला किया। तीन हजार वर्गफीट की छत पर छह इंच मिट्‌टी की परत बिछाई। छत को मजबूती देने के लिए देशी नुस्खा अपनाया।

आशंका थी कि पानी छत के ढलाई के बेस तक पहुंचेगा। लोहे में जंग लग जाएगी। सीलन और जंग की वजह से छत गिर जाएगी। इसलिए लोहे की सरिया के साथ बांस की लकड़ी लगवाई। बांस जल्दी नहीं सड़ता है। नुस्खा काम कर गया।

भागीरथी दो क्विंटल धान की पैदावार ले रहे हैं। सब्जी और पेड़-पौधे की नर्सरी भी तैयार कर रहे हैं। पत्नी और बेटा भी भागीरथी की मदद करते हैं। वे कहते हैं कि हम सब मिलकर परिवार की जरूरत पूरी कर लेते हैं।

भारत में भले ही इस तरह का पहला प्रयोग हो, लेकिन हमारे पड़ोसी देश चीन में इस तरह का प्रयोग हो चुका है और वो सफ़ल भी रहा है।

युवक किसान ने इंटरनेट से सीखी स्ट्रौबेरी की खेती और फिर दिया ऐसा कमाल आप सोच भी नहीं सकते

हरियाणा के महेन्द्रगढ़ जिले के डिंगरोता गाँव के किसान अनिल बलोठिया (35 वर्ष) पिछले दो साल स्ट्राबेरी की खेती कर रहे हैं। दो साल पहले हिसार में उन्होंने स्ट्रॉबेरी की खेती के बारे में सुना ,बस उन्होंने ने मन मैं ठान ली की अब बस स्ट्रॉबेरी की खेती ही करनी है ।

उसके बाद इंटरनेट से सारी जानकारी इकट्ठा की।और फिर उन्होंने खेती से यही नहीं स्ट्राबेरी के साथ मिर्च की भी खेती सहफसल ऊगा के सिर्फ डेढ़ एकड़ से ही 10 लाख की फसल पैदा की । अभी तक स्ट्रॉबेरी की खेती ठंडे प्रदेशों में की जाती थी, लेकिन लेकिन नवंबर से अप्रैल तक ठण्ड होने के कारण इसकी खेती उत्तर भारत में हो सकती है।

वहां जाकर उन्होंने इसकी खेती शुरु कर दी। किसान अनिल बलोठिया बताते हैं, “दो साल पहले हिसार में एक किसान को स्ट्रॉबेरी की खेती करते देखा था, फिर वहीं से मैंने भी सोच लिया कि अपने गाँव में जाकर स्ट्राबेरी की खेती करूंगा। इंटरनेट की जानकारी लेने के बाद अपने गाँव में खेती शुरु कर दी है।”

महेन्द्रगढ़ के अलावा हिसार जिला धीरे-धीरे स्ट्रॉबेरी का हब बनता जा रहा है। यहां के कई गाँवों में स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे हैं। यहां के किसानों के लिए दूसरी फसलों के मुकाबले यह फायदे की फसल साबित हो रही है।

खेती में ज्यादा मुनाफा देख दूसरे जिलों के किसान भी यहां पर जमीन ठेके पर लेकर स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे हैं। अनिल स्ट्रॉबेरी के साथ ही मिर्च के पौधे भी लगा देते हैं। अनिल बताते हैं, “हम पहले स्ट्रॉबेरी के पौधे लगा देते हैं, जब पौधे पूरी तरह से तैयार हो जाते हैं तो उसी के साथ ही मिर्च के पौधे लगा देते हैं। स्ट्राबेरी आठ महीने की फसल होती है और मिर्च दस महीने की होती है।”

डेढ़ एकड़ स्ट्रॉबेरी की फसल में चार-पांच लाख की लागत आती है। पैदावार होने के बाद खर्च निकालकर सात-आठ लाख का फायदा हो जाता है। वहीं मिर्च से भी दो-तीन लाख की आमदनी हो जाती है। ऐसे में मिर्च और स्ट्राबेरी दोनों को बेचकर दस लाख तक आमदनी हो जाती है।

स्ट्रॉबेरी की फसल खत्म होते होते मिर्च में फल लगने लगते हैं। यहां से तैयार स्ट्रॉबेरी पैक करके दिल्ली भेज देते हैं, जहां से दूसरी जगह से सप्लाई की जाती है। अनिल बताते हैं, “स्ट्रॉबेरी पचास रुपए किलो से लेकर छह सौ रुपए किलो तक बिक जाती है। डेढ़ एकड़ में दो किलो वजन की पचास हजार ट्रे पैदा हो जाती है।”

डेढ़ एकड़ में 35 से 40 हजार पौधे लगते हैं, मिर्च में अलग से कोई खर्च नहीं लगता है। इसके पौधे हिमाचल से लाए जाते हैं, लेकिन अब अनिल नर्सरी यहीं पर तैयार करते हैं। किस्म के हिसाब से प्रति पौधा 10 रुपए से लेकर 30 रुपए तक के बीच पड़ते हैं। रोपाई का काम अक्टूबर-नवंबर में किया जाता है। जनवरी और फरवरी माह में यह तैयार होकर फल दे देती है।

इस डेयरी की गाय सिर्फ दूध नहीं देती बिजली भी देती है

आप ने कभी सुना है के गाय दूध के साथ बिजली भी देती हो ? लेकिन ऐसा हो रहा है राजधानी लखनऊ से करीब 14 किलोमीटर दूर बिजनौर कस्बे से सटा सरवन गाँव के डेयरी में गाय दूध तो देती है साथ में उसके गोबर से बायोगैस प्लांट में डाल कर पहले सीएनजी और फिर उस से बिजली पैदा की जाती है ।

लखनऊ के सरवन गाँव निवासी प्रगतिशील पशुपालक जयसिंह डेयरी रोजगार को अपनाकर खुद के रोजगार के साथ ही दूसरे पशुपालकों के लिए भी आय के स्रोत बना रहे हैं। इनकी इस पहल से एक बार फिर क्षेत्र के पशुपालकों में अच्छी कमायी की आस जगने लगी है।

वहीं युवा पशुपालकों के लिए ये प्रेरणा के स्रोत भी बन रहे हैं। पशुपालक जयसिंह बताते हैं कि दूध डेयरी में नवाचारों के माध्यम से वे अच्छा मुनाफा कमा पाने में कामयाब हुए हैं। वर्तमान में उनकी डेयरी के माध्यम से लगभग 150 से ज्यादा पशुपालक आर्थिक रूप से सबल बन रहे हैं।

राजयसिंह छोटे स्तर के पशुपालकों से अच्छी कीमत पर दूध खरीदते हैं और उसे पैक करके बाजार में बेचने का कार्य करते हैं। इनकी डेयरी गांव में पूरे एक एकड़ में बनी हुई है। जयसिंह बताते हैं कि आस-पास के पशुपालकों से वे उनके दूध का फैट और एसएनएफ देखकर बाजार कीमत से ज्यादा में ही दूध खरीदते हैं ।

एक हजार लीटर दूध की खपत

जयसिंह के फार्म में खुद के 150 पशु हैं, जिनमें से 50 गाय और 100 भैंसे शामिल हैं। इनसे प्रतिदिन 500 लीटर दूध का उत्पादन होता है। जबकि 500 लीटर वे दूसरे पशुपालकों से खरीदते हैं। इस दूध को पाश्चराइज करके फिर पैकिंग करके बेचा जाता है।” जयसिंह अपने डेयरी संचालन के बारे में बताते हैं कि 140 क्यूब घनमीटर का बॉयोगैस प्लांट उन्होंने डेयरी में लगाया है, जिससे सीएनजी (कम्प्रेस नेचुरल गैस) उत्पादित करते हैं।

इस गैस के माध्यम से ही जेनरेटर चलाकर वो 24 घंटे बिजली पैदा करते हैं। इस बिजली के माध्यम से ही डेयरी में लगे उपकरण संचालित किए जाते हैं। साथ ही पास के नर्सिंग कॉलेज में भी बिजली देते हैं, जिससे इस कार्य में लगने वाला उनका खर्चा भी निकल आता है।” यही नहीं इस बिजली के द्वारा ही इन्होंने आटा चक्की भी स्थापीत कर रखी है, जिससे पूरे गांव का आटा पीसा जाता है।

वीडियो भी देखे (वीडियो और न्यूज़  -गांव कनेक्शन )

पंजाब के इन दो भाइयों से सीखिए, खेती से कैसे कमाया जाता है मुनाफा

एक कहावत है कि ‘एक वक्त के अच्छे खाने के लिए एक किसान को धन्यवाद करना चाहिए।’ कैसा हो कि अगर आपको मौका मिल जाए उस किसान से मिलने का जिसने आपके लिए खाद्यान्न उगाया है।

अब ऐसा मुमकिन हो सकता है, अमृतसर के दो भाईयों ने मिलकर एक ऐसा इंटरप्राइज बनाया है, जिससे आप सीधे किसानों से जुड़ सकते हैं। से दो किसान कृषि के क्षेत्र में बदलते भारत की तस्वीर भी हैं। यह कहानी शुरू होती है सूबेदार बलकार सिंह संधू से जिन्होंने 32 साल आर्मी में काम किया।

2008 में सेवानिवृत्त होने के बाद वह अमृतसर वापस आए और अपनी पुश्तैनी ज़मीन में खेती करना शुरू कर दिया। उनके परिवार का मुख्य काम खेती करना ही था और बलकार सिंह भी चाहते थे कि वह अपने पिता की अपनी जड़ों में वापस लौट सकें। 40 एकड़ खेती का मालिक होने के कारण उनका परिवार काफी समृद्ध था लेकिन बलकार सिंह ने देखा की उनके इलाके के छोट किसानों को बिचौलिए काफी ठग रहे हैं। उन्होंने देखा कि कुछ किसान परिवार तो ऐसे हैं जो कई पीढ़ियों से लगातार कर्ज़ में डूबे हुए हैं।

इसके बाद बलकार सिंह ने किसानों के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाना शुरू किया, उन्हें अमृतसर और तरनतारन ज़िले की किसान संघर्ष समिति का क्षेत्रीय प्रमुख चुना गया। उनके बेटे पवित्र पाल सिंह, एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं जिन्होंने कुछ साल विदेश में काम किया और फिर नीदरलैंड व बेल्जियम में अपने परिवार के रेस्त्रां के बिजनेस को संभाल लिया। एक किसान परिवार में जन्म लेने के कारण और अपने परिवार में होने वाली खेती-किसानी की बातों को सुनकर वह बड़े हुए थे।

यही वजह थी कि उन्हें भारतीय कृषि की अच्छाइयों और बुराइयों, दोनों के बारे में अच्छी तरह पता था। इस कहानी में मोड़ तब आया जब पवित्र सिंह को पता चला कि उनके पिता द्वारा किए जा रहे विरोध प्रदर्शन में एक किसान की मौत हो गई, वह तीन दिन से लगातार रेल की पटरी पर बैठा था।

किसानों की बिगड़ती दशा के बारे में सुनकर पवित्र ने फैसला किया कि वह भारत वापस आएंगे और अपने पिता के अभियान का हिस्सा बनेंगे। उनके चाचा का बेटा हरजप सिंह, लगभग छह साल तक किसानी करने के बाद देश छोड़कर बाहर चला गया था, उसने भी पवित्र सिंह की मदद करने का फैसला लिया और उनके साथ वापस आ गया। इसके बाद दोनों भाइयों ने डेढ़ साल तक देश के तमाम हिस्सों में घूमकर किसानों की परेशानियों के बारे में पता किया।

इसके बाद वे इस नतीज़े पर पहुंचे कि किसानों के कर्ज़ लेने के पीछे दो कारण हैं। पहला, अपने उत्पाद की क़ीमत वे खुद तय नहीं कर सकते। दूसरा, उन्हें अपनी फसल को बिचौलियों को बेचना पड़ता है क्योंकि उनके पास फसल को सुरक्षित रखने की कोई जगह नहीं है।

इन मुश्किलों का समाधान निकालने के लिए किसान मित्र(farmer friend) नाम की एक योजना लेकर आए। इन दोनों भाईयों ने 20 लोगों की एक मज़बूत टीम बनाई जिसका काम गाँव-गाँव जाकर वहां के प्रधानों को अपनी योजना के बारे में समझाना था जिससे किसान उपभोक्ताओं से सीधे रूप से जुड़ सकें।

वेबसाइट बेटर इंडिया की खबर के मुताबिक, एक बार जब पंचायत इस बात के लिए तैयार हो गई फिर किसानों को इस अभियान का हिस्सा बनाने के लिए उनका पंजीकरण शुरू हुआ। पवित्र और हरजप ने हरियाणा व पंजाब में दो किसान सेवा केंद्र भी खोले, जहां किसानों को उनकी समस्याओं से जुड़े सवालों के जवाब मिलते हैं। 2 साल के समय में इस अभियान में 30,000 किसान अपना पंजीकरण करा चुके हैं।

अपने काम की सफलता से प्रेरित होकर पवित्र और हरजप ने एक वेबसाइट भी शुरू की जिससे किसान सीधे उपभोक्ताओं से जुड़ सकते हैं। उन्होंने कुछ रेस्त्रां और होटलों में भी बात की ताकि वे कुछ उत्पाद मंडी से खरीदने के बजाय सीधे किसानों से खरीद सकें। आज 350 से ज्य़ादा होटल और 2500 से ज्य़ादा लोग किसान मित्र से सीधे अनाज, दूध, पॉल्ट्री उत्पाद और सब्जि़यां खरीदते हैं।

यह उपभोक्ताओं और किसानों दोनों के लिए फायदे का सौदा है। इससे किसान अपने उपभोक्ताओं को ऐसा कुछ नहीं बेच सकता जो उनकी सेहत के लिए हानिकारक हो और उपभोक्ताओं को भी कम दाम में सामान मिल जाता है।