ऐसे करें पपीते की खेती,एक हेक्‍टेयर में होगी 10 लाख की कमाई

खेती से कमाई कराने के मामले में पपीता आपके लिए एक बेहतर विकल्‍प हो सकता है। हाल के दौर में मार्केट में आई हाईब्रिड किस्‍मों के चलते पपीते से कमाई करना पहले से ज्‍यादा आसान हुआ है। आप एक हेक्‍टेयर पपीते की खेती से एक सीजन में करीब 10 लाख रुपए तक की कमाई कर सकते हैं।

पपीते की खासियत यह है कि इसकी फसल जल्‍दी तैयार होती है और साल भर मे फसल देने लगती है। एक ही फसल से आप 3 साल तक उपज भी ले सकते हैं। इसके चलते एक बार पेड़ तैयार होने पर लागत भी कम होती जाती है। आइए जानते हैं पपीते की खेती के बारे में और इसके जरिए कमाई कैसे संभव है।

भारत के ज्‍यादातर हिस्‍सों में कर सकते हैं पपीते की खेती 

पपीते की खेती के लिहाज से भारत एक उपयुक्‍त देश है। इसे अधिकतम 38 से 44 डिग्री सेल्सियस तक तापमान में उगाया जा सकता है। ऐसा तापामान कमोबेश पूरे भारत में पाया जाता है। पतीते की खेती के लिए न्‍यूनतम तापमान 5 डिग्री होना चाहिए। मतलब आप इसे पहाड़ों से सटे इलाकों में भी उगा सकते हैं। इस लिहाज से आप भारत के किसी भी कोने में रहते हैं तो पपीते की खेती कर सकते हैं।

कौन कौन सी किस्‍मे हैं बाजार में

पपीते की कई देसी और कई विदेशी दोनों तरह की हाईब्रिड किस्‍में आपको मार्केट में मिल सकती हैं। पूसा की ओर से पपीते की कई किस्‍मे विकसित की गई हैं।  इन डेवलप किस्‍मों में पूसा मेजस्‍टी एवं पूसा जाइंट, वाशिंगटन, सोलो, कोयम्‍बटूर, हनीड्यू, कुंर्ग‍हनीड्यू, पूसा ड्वार्फ, पूसा डेलीसियस, सिलोन, पूसा नन्‍हा आदि शामिल हैं। विदेशी किस्‍मों में ताईवनी red lady और कुछ इस्राइली किस्‍में भी अच्‍छी पैदावार देती हैं।

पैदावार

इलाहाबाद के रामपुर गांव में पपीते की खेती करने वाले किसान हर्षेश ओझा के मुताबिक, पपीते का एक स्‍वस्‍थ पेड़ आपको एक सीजन में करीब 40 किलो तक फल देता है। हर्षेश के मुताबिक, आप दो पड़ों के बीच करीब 6 फिट का गैप रख सकते हैं और इस हिसाब से आप एक हेक्‍टेयर में करीब 2250 पेड़ तैयार कर सकते हैं। इस हिसाब से आप एक सीजन में एक हेक्‍टेयर पपीते की फसल से 900 क्विंटल पपीता पैदा कर सकते हैं।

ये सावधानियां जरूर बरतें

हर्षेश के मुताबिक, पपीते का पौधा काफी सेंसिटिव हो‍ता है, इसलिए इसके आसपास तापमान का खास खयाल रखें। गर्मी में चलने वाली लू और सर्दी का पाला दोनों पपीते को नुकसान पहुंचाते हैं। बचने के लिए खेत के उत्‍तर , पश्चिम में हवा रोकने का इंतजाम जरूर करें। पाला पड़ने की दशा में खेत में धुंआ करके सिंचाई करने की देसी तकनीक का यूज कर सकते हैं। ज्‍यादा पानी भी पपीते के लिए नुकसान दायक होता है। इसलिए खेत में पानी की निकाली का इंतजाम जरूर करें। पानी लगने की दशा में कॉलर रॉट बिमारी लगने की सम्‍भावना रहती है।

इतनी होगी कमाई

पपीते की एक हेक्‍टेयर खेजी आपको एक सीजन मे करीब 10 लाख रुपए तक की कमाई आप कर सकते हैं। हर्षेश के मुताबिक, आप एक हेक्‍टेयर के खेत से एक सीजन में करीब 900 क्विंटल पपीता पैदा करते हैं। थोक भाव में आप इसे 15 रुपए प्रति केजी के हिसाब से भी बेचेंगे तो आपको एक क्विंटल पर आपको 1500 रुपए मिलेंगे।

इस हिसाब से आपके पास करीब 13.5 लाख रुपए की फसल तैयार होती है। हर्षेश के मुताबिक, एक हेक्‍टेयर पपीते की खेती में आपकी लागत करीब 3 लाख रुपए आती है। साथ ही 20 हजार रुपए आपको बीज में खर्च करने पड़ेंगे। 30 हजार रुपए अन्‍य खर्च निकालने के बाद भी आप करीब 10 लाख रुपए एक सीजन में कमा सकते हैं।

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किसान से बात करने के लिए इस नंबर पर संपर्क करें

हरियाणा के किसान देश और विदेश में अपनी खेती के लिए फेमस है। पलवल जिले के प्रगतिशील किसान बिजेंद्र दलाल उन्हीं में से एक है। वह तकनीक के साथ फूलों की खेती कर लाखों रुपए की आमदनी ले रहे हैं। हरियाणा, पंजाब व उत्तरप्रदेश के किसानों के लिए वे रोल मॉडल से कम नहीं हैं। दूर-दूर से लोग उनसे जानकारी लेने पहुंचते हैं। गुलाब और ब्राॅसिका की करते हैं खेती…

  • 1984 से खेती कर रहे बिजेंद्र दलाल बताते हैं कि शुरुआत में तो उन्होंने परंपरागत खेती की लेकिन धीरे-धीरे जानकारी बढ़ी तो फूलों की खेती शुरू की।
  • आज वह बड़े स्तर पर गुलाबों की खेती कर रहे हैं। उन्होंने नेट हाउस में साढ़े आठ एकड़ जमीन पर 25 से 30 हजार गुलाब के पौधे लगा रखे हैं।
  • इन पर उनकी कोस्ट लगभग 25 लाख रुपए आई। फसल आने के पहले साल 5 लाख रुपए मुनाफा लिया और अगले 4 साल तक 10 लाख रुपए मुनाफा आने का अनुमान है।

जापान से बीज मंगाकर उगाया ब्राॅसिका

  • बिजेंद्र दलाल ने अपने खेतों में ब्राॅसिका का फूल भी उगाया था, जिसका बीज उन्होंने जापान से मंगाया था।
  • फूल की चमक भी मेहमानों को आकर्षित करती है। इसकी खेती करके किसान एक एकड़ भूमि में दस लाख रुपए तक की आमदनी ले सकता है। पौध करीब 10-13 रुपए की लागत आती है, जबकि वह 30 से 35 रुपए प्रति पीस व्यापारी को बेचते हैं।
  • परिवहन व अन्य खर्चों को हटाने के बाद किसान को प्रति एकड़ न्यूनतम 10 लाख रुपए की आय होती है। व्यापारी इन्हें 70 से 150 रुपए प्रति पीस बेचता है। ब्राॅसिका फूल की बड़ी खासियत इसकी महंगी कीमत, मगर उगाने में आसानी है। यह सर्दियों के सीजन में बहुत कम समय में तैयार हो जाता है।

ग्रुप बनाकर करते हैं खेती

बिजेंद्र के पास पारिवारिक जमीन है। वह तीन भाई हैं, लेकिन खेती एक साथ करते हैं। उनका कहना है कि इससे खर्च कम आता है। सामूहिक प्रयास से काम भी बंट जाता है और ज्यादा जमीन में पैदावार भी अधिक आती है।

इसी तरह वह दूसरे किसानों के साथ मिलकर भी खेती कर रहे हैं और अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं।
किसान बिजेंद्र दलाल से जानकारी लेने के लिए मोबाइल नंबर 09416103573 पर संपर्क कर सकते हैं।

क्यों करोड़ों का बिजनेस छोड़ किसानो को जैविक खेती सिखा रहा है ये इंजीनियर?

मुंबई के श्यामलाल कॉलेज से बीटेक और कैलिफोर्निया की सैन जॉस यूनिवर्सिटी से इलेक्ट्रोनिक्स में मास्टर्स डिग्री हासिल करने के बाद श्रीगंगानगर के रणदीप सिंह कंग ने बिजनेस को चुना। क्यों गांव वालों को खेती सिखा रहा एक इंजीनियर…

  •  2006 में वहां पहला डिपार्टमेंटल स्टोर खोला। फिर एक-एक कर तीन खोल लिए।
  • सालाना करीब चार करोड़ रुपए का मुनाफा दे रहे थे। लेकिन एक बात रणदीप को परेशान करती रहती।
  • गांव से या रिश्तेदारी से जब कभी मौत की खबर आती, कारण एक ही रहता, कैंसर।
  • वे इसके कारणों के पीछे गए तो पता चला खेतों में अंधाधुंध पेस्टीसाइड्स का इस्तेमाल खेतों और फसलों को जहरीला बना रहा है।
  • जमीन की प्राकृतिक उर्वरता खत्म हो रही है। रणदीप के अनुसार बरसों से लोग खेतों में पेस्टीसाइड और खाद के नाम पर जहर डाल रहे थे।

गांव लौटे, किसानों को प्रैक्टिकल फायदे दिखाए

पढ़ाई और बिजनेस के बाद रणदीप ने गांव के किसानों के लिए काम करने की ठान ली। 2012 में बिजनेस समेटकर श्रीगंगानगर आ गए। श्रीकरणपुर के अपने 100 बीघा के खेत को प्रयोगशाला बनाया। गोमूत्र इकठ्ठा करते। उसमें आक, नीम, तूंबा, लहसुन उबाल कर बोतलों में भरते और किसानों को समझाने निकल पड़ते। किसानों ने फायदे देखे तो रणदीप की बात को मान गए।

कंपनियां प्रॉडक्ट खरीदने को बेताब

रणदीप कहते हैं- किसानों तक मैंने गोमूत्र उर्वरक पहुंचाया है। उन्होंने उपयोग किया है और नतीजे सामने आ रहे हैं। यह बात पेस्टीसाइड व उर्वरक कंपनियों तक पहुंचनी ही थी। फिर क्या, कंपनियों ने उनसे संपर्क करना शुरू किया। कंपनियां 50 रुपए प्रति लीटर तक के मुनाफे पर उनका पेस्टीसाइड खरीदने को तैयार हैं लेकिन रणदीप कहते हैं- मेरा उद्देश्य कुछ और है। पैसा तो मैं अमेरिका में इससे कहीं ज्यादा कमा ही रहा था।

अब उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ अपने देश के किसानों के लिए खुशहाली लाना है और मैं इस पर ध्यान दे रहा हूं। गोमूत्र में 16 पाेषण पर पौधों को चाहिए सिर्फ 14 रणदीप के अनुसार गोमूत्र में 16 प्रकार के न्यूट्रशंस होते हैं जबकि पौधों को 14 प्रकार के ही चाहिए होते हैं। गोमूत्र फंगस और दीमक को खत्म करता है और पोषण बढ़ाता है। इसके बाद किसी प्रकार की खाद की जरूरत नहीं होती।

फिर, कृत्रिम पेस्टीसाइड्स डाले गए खेत में जहां 2-3 दिन में पानी देने की जरूरत होती है वहीं गोमूत्र पेस्टीसाइड्स वाले खेत में 7-8 दिन से पानी देना पड़ता है। इस कसरत का एक पहलू और है। रणदीप अब एक गौशाला से प्रतिदिन 500 लीटर गोमूत्र 5 रुपए लीटर के भाव से खरीद रहे हैं। इससे उस गौशाला को दान पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं रही।

अगर आप रणदीप सिंह कंग से संपर्क करना चाहते है तो 95095-24124 ,94130-44000 नंबर पर कर सकते है ।

5 लाख रुपए में शुरू की बिना मिट्टी के खेती, सिर्फ दो साल में कमा लिए 4 करोड़

बहुत से लोग सोचते है खेती घाटे का काम है और बहुत से युवा लोग खेती करने से कतराते है । लेकिन बहुत से ऐसे लोग है जिसने यह धरना को गलत साबित क्या है । चेन्नई के रहने वाले एक शख्स को मिट्टी के बिना खेती का तरीका इतना भाया कि अब उसे अपनी रोजी-रोटी का जरिया बना लिया। इस शख्स ने बिना मिट्टी के खेती करने वाले एक स्टार्ट अप की शुरुआत की और उनका टर्नओवर 2 करोड़ तक पहुंच चुका है। यह शख्स हैं चेन्नई के रहने वाले श्रीराम गोपाल।

श्रीराम गोपाल ने कहा कि 5 साल पहले उनके एक दोस्त ने एक वीडियो दिखाया, जिसमें बिना मिट्टी के खेती का तरीका बताया गया था। मैं इससे काफी प्रभावित हुआ। इस तकनीक में खेत की आवश्यकता नहीं है। बिना मिट्टी के खेती करने वाले इस तरीके का नाम है- हाइड्रोपोनिक्स। इसकी शुरुआत मैंने पिताजी की फैक्टरी से की।

मिट्टी के बिना छत पर खेती

  • हाइड्रोपोनिक्स तकनीक में हर्ब्स बिना मिट्टी की मदद से उगाई जाती हैं। इससे पौधों के लिए जरूरी पोषक तत्वों को पानी के सहारे सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है।
  • पौधे एक मल्टी लेयर फ्रेम के सहारे टिके पाइप में उगते हैं और इनकी जड़ें पाइप के अंदर पोषक तत्वों से भरे पानी में छोड़ दी जाती हैं।
  • मिट्टी न होने की वजह से न छतों पर भार बढ़ता है। वहीं बिल्कुल अलग सिस्टम होने की वजह से छत में कोई बदलाव भी नहीं करने पड़ते।

 5 लाख रुपए में शुरू हुआ कारोबार

श्रीराम ने बताया कि उन्होंने सिर्फ 5 लाख रुपए में तीन दोस्तों के साथ मिलकर फ्यूचर फॉर्म्स की शुरुआत की। उनके पिता की पुरानी फैक्ट्री में काफी जगह पड़ी हुई थी। वहां उन्होंने हाइड्रोपोनिक तकनीक से खेती करने की सोची।

उनके पिता की फैक्ट्री में फोटो फिल्म डेवलप करने का काम होता था, लेकिन डिजिटल फोटोग्राफी आने से फैक्ट्री बंद हो गई। यहीं से फ्यूचर फार्म्स की शुरुआत हुई। अब उनकी कंपनी का टर्नओवर 8 करोड़ रुपए सालाना तक पहुंचने की उम्मीद है।

हाइड्रोपोनिक खेती को दे रहे हैं बढ़ावा

श्रीराम कहते हैं कि बिना मिट्टी की खेती में सामान्य खेती के मुकाबले 90 फीसदी कम पानी लगता है। फिलहाल, हमारी कंपनी हाइड्रोपोनिक किट्स बेचती है। किट्स की शुरुआती कीम 999 रुपए से है। एरिया के हिसाब और जरूरत के मुताबिक किट्स की कीमत तय होती है। इस तकनीक को एक एकड़ में लगाने का खर्च 50 लाख रुपए आएगा। वहीं अगर अपने घर में यदि 80 स्क्वॉयर फुट में इस तकनीक को बिठाने का खर्च 40 हजार से 45 हजार रुपए बैठता है। इसमें 160 पौधे लगाए जा सकते हैं।

300 फीसदी सालाना दर से बढ़ा

श्रीराम बताते हैं कि 2015-16 में कंपनी का टर्नओवर सिर्फ 38 लाख रुपए था, लेकिन एक साल में ही यह बढ़कर 2 करोड़ रुपए हो गया। हमारा कारोबार 300 फीसदी सालाना दर से बढ़ रहा है। मौजूदा फाइनेंशियल ईयर के पहले क्वार्टर में टर्नओवर 2 करोड़ रुपए रहा। उम्मीद है इस साल हमारा टर्नओवर 6 करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है।

ट्रांसपरेंसी मार्केट रिसर्च के मुताबिक, ग्लोबल हाइड्रोपोनिक्स मार्केट 2016 में 693.46 करोड़ डॉलर (45,000 करोड़ रुपए) का है और 2025 में इसके 1,210.65 करोड़ डॉलर (78500 करोड़ रुपए) तक पहुंचने की उम्मीद है।

एक लाख रु से शुरू की नर्सरी, पौध बेच कर अब कमा रहा है 3 करोड़

खेती इतनी भी बुरी नहीं है कि जितना इसका नाम खराब कर दिया है। दरअसल, जो भी व्यक्ति थोड़ी बहुत समझ बूझ से और धैर्य से खेती करे, तो हरियाणा के हरबीर सिंह की तरह करोड़ों में कमाई कर सकता है।

हरियाणा में खेती से मुनाफा कमाना चौखी कमाई का जरिया बनता जा रहा है। हम आपको कुरुक्षेत्र जिले के एक ऐसे ही किसान से रूबरू करा रहे हैं, जो महज कुछ एकड़ में खेती कर सालाना करोड़ों रुपए की कमाई कर रहा है।

हम बात कर रहे हैं कुरुक्षेत्र जिले के गांव शाहाबाद में रहने वाले किसान हरबीर सिंह की। हरबीर ने मास्टर डिग्री लेने के बाद नौकरी नहीं की और खेती में ज्यादा रूचि दिखाई। इसी का नतीजा है कि आज वे करोड़पति किसान हैं।

 

2005 में हरबीर ने सिर्फ 2 कनाल क्षेत्र (जमीन का एकड़ से भी छोटा हिस्सा) में 1 लाख रूपए की लागत से सब्जियों की नर्सरी लगाई। इससे उन्हें अच्छा-खासा फायदा होने लगा। उन्होंने इसके बाद और जमीन खरीदी। अब 2015 में 11 एकड़ खेत में हरबीर सिंह की नर्सरी है, जिससे सालाना लगभग 3 करोड़ का लाभ होता है।

हरबीर सिंह के मुताबिक उन्होंने वैज्ञानिक तरीके से खेती शुरु की थी।उन्होंने टमाटर, गोभी, हरी मिर्च, प्याज, शिमला मिर्च, बैंगन सहित अन्य पौध तैयार की।पौध अच्छी निकली तो यूपी, हिमाचल, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों के किसान पौध खरीदने के लिए आने लगे।

अब उनकी मिर्च की पौध इटली जाती है। पिछले दो साल से लगभग 20 हजार पौधे इटली भेजते हैं।उन्होंने अपनी नर्सरी को बिल्कुल हाईटेक बना दिया है। उनका दावा है कि उनकी 16 एकड़ की नर्सरी में एक भी पौधा बीमारी वाला नहीं है। पौध की कीमत 45 पै. प्रति पौधा से लेकर 1.50 पै. प्रति पौधा वैरायटी के साथ तय की गई है।

इंटरनेशनल बी-रिसर्च एसोसिएशन के वो सदस्य भी हैं। साल 2004 में एसोसिएशन की ओर से हरबीर सिंह इंग्लैंड दौरे पर गए थे। नर्सरी के अलावा बहरबीर ने साल 1996 में 5 बॉक्स से मुधमक्खी पालन का काम शुरू किया था। अब वो 470 बॉक्स मधुमक्खी पालन करते हैं।

एडवांस बुकिंग पर ही मिलती है पौध

क्षेत्र में हरबीर की नर्सरी बहुत मशहूर है। यही वजह है कि एडवांस बुकिंग के बिना हरबीर की नर्सरी से तुरंत पौधा मिल पाना बहुत मुश्किल है। पौध को खरीदने से पहले कम से कम 3 दिन पहले एडवांस बुक करवाना पड़ता है।

3 दिन के बाद ही पौध मिल पाता है। इस वजह से हरबीर सिंह के फार्म हाउस पर लोगों की भीड़ लगी रहती है। लेकिन इसी वजह से उनको करोड़ों की कमाई भी होती है।

हरबीर सिंह ने बताया कि इस बार उन्होंने ताइवान से पपीते का बीज मंगाया और यहां 50 हजार पौधे तैयार किए हैं। इन पौधों को वे खुद भी एक एकड़ में लगाएंगे, ताकि पौध लेने आने वाले किसानों को सैंपल दिखा सकें।  इसके अलावा इस महीने के अंत में गोभी की पौध भी तैयार करेंगे। उन्होंने बताया कि मुख्य सीजन अक्टूबर से मार्च तक होता है।

सैंकड़ों लोगों को दे रहे रोजगार

हरबीर सिंह की नर्सरी में एक-दो नहीं बल्कि 121 महिला- पुरूष काम पर लगे हुए हैं। पिछले साल उन्होंने 4 करोड़ पौध बेचे थे, जबकि इस बार ये लक्ष्य 10 करोड़ पौधे बेचने का है।

अपनी गिरवी जमीन को ही कांट्रैक्‍ट पर लेकर बन गया लखपति ये किसान

बिहार के एक छोटे से किसान की कहानी जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे। एक सोच ने उसकी लाइफ बदल दी। अपनी गिरवी जमीन को ही कांट्रैक्‍ट पर लिया और उसमें पपीते की फसल लगा दी। महज 7 महीने में ही न सिर्फ अपनी जमीन मुक्‍त करा ली बल्कि 5 लाख का मुनाफा भी कमया।

भागलपुर जिले के रंगराचैक ब्‍लॉक के गांव चापर निवासी परशुराम दास की आर्थिक स्‍थिति ठीक न होने के कारण उन्‍होंने 10वीं में ही पढ़ाई छोड़ दी थी। जल्‍द शादी हो गई और इसके बाद बच्‍चे। सबका गुजारा करने को केवल 5 बीघा जमीन थी। लेकिन कुछ समय बाद जब गुजारा नहीं चला तो परशुराम को यह जमीन भी गिरवी रखनी पड़ गई।

उसके बाद परशुराम को जब कोई रास्‍ता न सूझा तो पड़ोस के मित्र ने उन्‍हें पपीते की खेती के बारे में बताया। 2011 में परशुराम ने अपनी गिरवी जमीन को ही किराए पर लिया और पपीते की फसल लगा दी।उन्‍होंने कुछ उन्नत किस्म के पपीते जैसे पूसा नन्हा, चड्ढा सिलेक्शन, रेड लेडी व अन्य की खेती शुरू कर दी। पहली बार फसल खराब हो गई मगर उसके बाद बंपर फसल हुई।

पपीते की फसल की उत्‍तम पैदावार के बाद उसकी बिक्री हुई तो परशुराम ने सब खर्च निकालकर जब मुनाफा जोड़ा तो 5 लाख रुपए हुआ। परशुराम ने तत्‍काल अपनी जमीन मुक्‍त कराई। अब परशुराम 5 साल से यही पपीते की खेती कर रहे हैं।

पपीते की फसल को साल में 3 बार फरवरी-मार्च, मानसून सीजन और नवंबर-दिसंबर में लगाया जा सकता है। रोपे जाने के बाद पपीता का पेड़ लगभग 3 से 4 साल तक लगभग 75 से 100 टन प्रति हेक्‍टेयर की पैदावार होती है।भारत के लगभग सभी राज्‍यों में पपीते की फसल होती है और लगभग सभी मंडियों में इसकी मांग है।भारत से हर साल लाखों टन पपीता एक्‍सपोर्ट भी किया जाता है।

जाने बोलापल्ली श्रीकांत की जीरो से हीरो बनने की कहानी

40 वर्षीय बोलापल्ली श्रीकांत का जीवन पूरी तरह से खिले फूलों की तरह है। श्रीकांत जिन्होंने सोलह साल की उम्र में एक फूलों की फार्म में 1000 रूपये महीने की पगार में नौकरी किया, आज भारत में फूलों की खेती करने वालों की सूची में उन्होंने एक खास जगह बनाई है। इस खेल के वह माहिर खिलाड़ी बन गए हैं। आपको यकीन नहीं होगा आज उनका वार्षिक टर्न-ओवर करोड़ो का है।

दसवीं कक्षा की पढ़ाई छोड़कर, श्रीकांत तेलंगाना के निज़ामाबाद जिले में अपने गृहनगर से नालमंगला, जो बंगलुरू के बाहरी इलाके में स्थित है, एक परिचित के फूलों के फार्म में काम करने आ गए थे। उनका परिवार खेती पर निर्भर था और पूरी तरह से कर्ज में डूबा हुआ था। तब उन्होंने यह तय किया कि वह पढ़ाई छोड़ देंगे और नौकरी करेंगे

नालमंगला के फार्म में वह अठारह से बीस घंटे काम करते थे। दो साल तक काम करते हुए उन्होंने फूलों की खेती के बिज़नेस के बारे में पूरा ज्ञान हासिल कर लिया। कल्टीवेशन, हार्ववेस्टिंग, मार्केटिंग और उन्हें निर्यात करना सब में श्रीकांत ने महारथ हासिल कर ली।

जब वह 18 वर्ष के हुए तब उन्होंने 20,000 रुपयों से अपने फूलों के रिटेल का बिज़नेस शुरू किया। शुरुआत में उनके पिता उनके इस काम के लिए अनिच्छुक थे क्योंकि वह चाहते थे कि वह अपने घर की खेती में उनकी मदद करे। लेकिन श्रीकांत ने अपने मन की आवाज़ सुनी और अपनी योजना के साथ आगे बढ़े

1000 रुपये महीना सैलरी पर की माली की नौकरी

22 साल पहले, तेलंगाना के एक छोटे से शहर से ताल्लुक रखने वाले बोलापल्ली श्रीकांत का सपना था कि वह अपनी जमीन पर खेती करें। मगर गरीबी की वजह से घर-परिवार की स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह जमीन खरीद सकें। हालात बिगड़ने पर श्रीकांत को अपना शहर निजामाबाद छोड़ना पड़ा और वह वर्ष 1995 में बेंगलुरु अपना करियर बनाने के लिए आ गये। उस समय डोड्डाबल्लापुरा क्षेत्र के पास श्रीकांत को फूलों की खेती से जुड़ी एक कंपनी में नवस्थापित ग्रीन हाउस परियोजना में बतौर पर्यवेक्षक के रूप में काम मिला। उस समय श्रीकांत की सैलरी 1000 रुपये महीना थी।

ऐसे हुई शुरुआत

श्रीकांत ने दो साल तक इस कंपनी में काम किया और फूलों की खेती में वैज्ञानिक खेती के बारे में काफी जानकारी हासिल की। इस बीच श्रीकांत ने अपनी दो साल की सैलरी यानी 20000 हजार रुपये से जब वह 18 वर्ष के हुए तब बैंगलुरु में ही फूलों का छोटा सा व्यापार शुरू किया और विभिन्न कंपनियों, किसानों और वितरकों से संपर्क साधकर फूलों का व्यापार करना शुरू कर दिया।

उन्होंने बेंगलुरू के विल्सन गार्डन में स्थित अपने घर पर ही अपनी फूलों की दुकान खोली। 200 स्क्वायर फ़ीट की जगह पर इन्होंने काम शुरू किया। अपनी शॉप का नाम उन्होंने ओम श्री साई फ्लावर्स रखा। अपने पुराने अनुभव से और संपर्कों की बदौलत इन्होंने दो सालों में ही अपने बिज़नेस को अच्छी जगह पर खड़ा कर दिया। शुरू में तो वे फूल उत्पादकों और थोक डीलर्स से फूल लेकर उन्हें पैक कर खुद ही ग्राहकों तक पहुंचाया करते थे।

दिन-प्रतिदिन उनके ग्राहक बढ़ते चले गए और फिर उनके फूल बड़े-बड़े होटलों, शादी, जन्मदिन और बहुत सारे आयोजनों में जाने लगे।पहले श्रीकांत अकेले ही फूलों को एकत्र करते थे और फिर पैकिंग और पार्सल किया करते थे। मगर मांग बढ़ने पर उन्होंने दो और कर्मचारियों को अपने साथ जोड़ लिया।

वर्ष 2012 में खरीदी जमीन

काफी लंबे समय तक फूलों का व्यापार करने के बाद साल 2012 में श्रीकांत ने डोड्डाबल्लापुरा में ही 10 एकड़ जमीन खरीदी और इस जमीन पर आधुनिक कृषि तकनीक से फूलों की खेती करना शुरू की। मगर आज चार साल बाद श्रीकांत 30 एकड़ जमीन पर फूलों की वैज्ञानिक खेती कर रहे हैं। श्रीकांत ने फूलों की खेती से पिछले साल 9 करोड़ रुपये का बड़ा मुनाफा कमाया और अब इस वर्ष 12 करोड़ लाभ कमाने की अनुमान लगा रहे हैं।

मांग इतनी ज्यादा की विदेशों भी मंगवाते है फूल

उनके खेतों के फूलों से उनके बिज़नेस के लिए केवल 10% तक के फूल हो पाते है बाकि वह ऊटी, कोडाइकनाल से मंगाते हैं। ज्यादा मांग होने पर थाईलैंड, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और हॉलैंड से भी फूल आयात किया जाता है। श्रीकांत रेन वाटर हार्वेस्टिंग भी करते हैं अपने फार्म्स में। उनके यहाँ 300 कर्मचारी हैं जो उनके विल्सन गार्डन स्थित फार्म में काम करते हैं। और श्रीकांत 80 कर्मचारियों के रहने-खाने की व्यवस्था भी अपने फार्म में करते हैं।

एक शख्स, जो कभी साइकिल पर किन्नू बेचते थे, आज कमाते हैं करोड़ों

 

यह दिलचस्प कहानी है एक ऐसे किसान की जो कभी साइकिल पर टोकरी में फल बेचा करते थे लेकिन आज दुनिया भर के 12 देशों में इनका कारोबार फैला हुआ है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि इन्होंने महज़ प्राथमिक विद्यालय तक की पढ़ाई पूरी की,

फिर चंद पैसों से फल बेचने के धंधे को गले लगाया और आज देश के सबसे सफल किसानों में से एक हैं। एक ऐसा देश जहाँ हर साल हजारों की तादात में किसान आत्महत्या करते हैं और जहाँ के युवा खेती-बाड़ी के धंधों को गिरी नजरों से देखतें हैं, उन तमाम लोगों के लिए इस किसान की कहानी एक सीख साबित होगा

हम बात कर रहें हैं पंजाब के अबोहर निवासी सुरिंदर कुमार की सफलता के बारे में। एक गरीब परिवार में जन्में और पले-बढ़े सुरिंदर ने गांव के ही सरकारी स्कूल से पढ़ाई पूरी करने के बाद फल बेचने शुरू कर दिए। साल 1997 में किसानों या मंडी से किन्नू खरीदकर लाते और गली-गली उसे बेचा करते। कई सालों तक यह सिलसिला चलता रहा।

कुछ दिनों बाद सुरिंदर को इस फल के बिज़नेस में अपार सभावनाओं का अहसास हुआ। फिर उन्होंने बाज़ार में फल की एक स्टाल लगा ली। इसके बाद इन्होंने बिज़नेस के दायरे को बढ़ाने के बारे में सोचा लेकिन सबसे बड़ी अरचन पूंजी को लेकर थी। कुछ पैसे लोन लेकर इन्होंने पंजाब की मंदी में एक होलसेल दूकान खोल ली। उनका यह सफर चुनौती भरा रहा, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी।

कारोबार को बड़ा करने के लिए सुरिंदर के दिमाग में एक आइडिया सूझा। फिर उन्होंने पंजाब के आस-पास के शहरों की मंडियों मन किन्नू भेजने शुरू कर दिए। इनका यह आइडिया बेहद कारगर साबित हुआ और काफी मुनाफा हुआ।शुरूआती सफलता के बाद इन्होंने विदेश में भी अपना कारोबार फैलाने की सोची। आज दुबई, बांग्लादेश, ब्राजील, यूक्रेन जैसे कई देशों में उनका कारोबार फैला हुआ है

अपनी सफलता को लेकर सुरिंदर बतातें हैं कि वैसे तो किन्नू का सीजन केवल साढ़े तीन महीने का होता है, लेकिन उक्त कारोबार को बढ़िया तरीके से चलाने के लिए उन्होंने खुद ही करोड़ों रुपये की लागत से पैक हाउस व कोल्ड स्टोर विकसित किया।

आज सुरिंदर के पास 40-40 लाख की चार एसी ट्रक भी है। इस ट्रक का इस्तेमाल कर वह ऑफ सीजन में किन्नू दक्षिण भारत में बेचते हैं। आज सुरिंदर के फल कारोबार का सालाना टर्नओवर करोड़ों में है। इतना ही नहीं करीब 400 लोगों को रोजगार मुहैया करा सुरिंदर ने भारत जैसे कृषि प्रधान देश में अन्य किसान भाइयों के सामने मिसाल पेश की है।

जानो कैसे खाजू की खेती ने बदली आदिवासी किसानो की किस्मत

आम लोगों की पहुंच से दूर रहने वाला काजू यदि आदिवासी किसानों के घरों में बोरियों में रखा मिले तो चौंकना लाजिमी है। लेकिन यह हकीकत है और बैतूल जिले के शाहपुर ब्लाक में आने वाले ग्राम अड़माढाना के लगभग हर घर में एक- दो नहीं क्विंटलों से काजू भरा पड़ा है।

ड्राय फूड्स में सबसे मंहगा मिलने वाला काजू छोटे से गांव के हर घर में बाड़ी परियोजना के माध्यम से 6 साल पहले कराए गए पौधरोपण के कारण मिल रहा है। यह बात अलग है कि काजू की खेती से अपनी किस्मत संवरने की उम्मीद लगाए बैठे किसानों को इसे बेचने की कोई राह नहीं मिल पा रही है जिससे उन्हें खासा मुनाफा नहीं हो पा रहा है।

जिले के मौसम को देखते हुए काजू का उत्पादन किया जाना संभव है, इसी के चलते बाड़ी परियोजना की शुरूआत में किसानों को आम और काजू के पौधे देकर उनके खेतों में रोपे गए हैं। 6 साल बीत जाने के बाद काजू के पौधों में फूल और फल लगने शुरू हो गए।

अब तो यह हालत है कि हर किसान के पास अन्य फसलों की तरह ही काजू की भी उपज घर में भरी हुई है।ग्राम पंचायत देसावाड़ी के अंतर्गत आने वाले अड़माढाना के 70 वर्षीय किसान पांडे सलाम ने बताया कि उनके एक एकड़ खेत में काजू के 30 और आम के 20 पौधे लगाए थे। पांच साल बीतने के बाद ही काजू के पेड़ में फूल आने शुरू हो गए। पहले साल तो फल बेहद कम लग पाए थे लेकिन इस साल भरपूर उत्पादन मिला है।

एक पेड़ से 5 किलो काजू

ग्राम के रामजी पेन्द्राम ने बताया कि पहले तो यही लगा कि यहां बंजर जमीन में इतना मंहगा फल कैसे लग पाएगा। लेकिन दो साल से काजू की फसल अच्छी हो रही है। ठंड की शुरूआत के साथ ही पेड़ो में फूल लगने शुरू हो जाते हैं औ मार्च के महीने में फल लग जाते हैं। अप्रैल में इनके पक जाने पर तुड़ाई कर ली जाती है। हर पौधे से करीब 5 किलो काजू निकल जाते है।

फूल भी देते हैं मुनाफा

काजू के फूल के साथ ही फल भी लगा होता है। जब तुड़ाई की जाती है तो फल को अलग निकालकर फूल के हिस्से को भी सुरक्षित रख लिया जाता है। इस फूल का उपयोग फैनी बनाने में किया जाता है। काजू की फसल पैदा कर रहे किसान शिवकिशोर धुर्वे ने बताया कि जैसे-जैसे पेड़ बड़ा होगा उससे उत्पादन भी अधिक मिलेगा।

50 किसान कर रहे खेती

शाहपुर ब्लाक के ग्राम अड़माढाना में 50 किसानों के द्वारा 50 एकड़ में काजू के पौधे लगाए गए हैं। सभी के पास दो साल से काजू का उत्पादन हो रहा है। किसान मुन्न्ा सलाम ने बताया कि काजू की खेती में कोई खास मशक्कत नहीं करनी होती है। सप्ताह में एक दिन पौधों को पानी देकर महीने में एक बार वर्मी कम्पोस्ट डाला जाता है।

उत्पादन तो ले लिया बेचने का टेंशन

काजू उत्पादक किसानों ने इस साल भरपूर उपज तो ले ली है, लेकिन इसे बेचने के लिये कोई राह ही नहीं मिल पा रही है। बाजार उपलब्ध न होने के कारण यहां के किसान केवल आसपास के क्षेत्रों से जो लोग गांव पहुंचकर बाजार से कम दाम पर काजू खरीदकर ले जाते हैं उसी के भरोसे पर निर्भर हैं। किसानों का कहना है कि बाड़ी परियोजना के अधिकारियों से भी इसे बेचने की व्यवस्था करने के लिये कहा गया लेकिन उन्होंने भी कोई मदद नहीं की है।

एक्सपर्ट व्यू

जिले के वरिष्ठ उद्यान अधीक्षक एम आर साबले के मुताबिक जिले का मौसम काजू की फसल के अनुकूल तो नहीं है। इसकी फसल के लिये मौसम में आर्दत्रा और ठंड के साथ गर्मी भी जरूरी होती है। देसावाड़ी क्षेत्र में फसल हो रही है, इससे लग रहा है कि जिले में इसका उत्पादन अब संभव हो रहा है।

धान रोपण की इस तकनीक से बिहार के इस किसान ने तोडा वर्ल्ड रिकॉर्ड

देश के कथित रूप से ‘सबसे पिछड़े राज्य’ बिहार के किसानों ने वो कमाल कर दिखाया है जिससे उन्हें विश्व स्तर पर पहचान मिल रही है. नालंदा के युवा किसान सुमंत कुमार ने सिर्फ एक हेक्टेयर जमीन में 22 टन से ज्यादा चावल की पैदावार कर दुनियाभर के कृषि वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया है.

एक रिपोर्ट के अनुसार नालंदा के दरवेशपुर गाँव के इस युवा किसान ने बिना किसी रासायनिक खाद के प्रयोग के इतनी बड़ी मात्रा में चावल की पैदावार कर वर्ल्ड रिकॉर्ड बना दिया है. इससे पहले ये रिकॉर्ड ‘फादर ऑफ राइस’ कहे जानेवाले चीन के कृषि वैज्ञानिक युआन लोंगपिंग के नाम था जिन्होंने एक हेक्टेयर जमीन में 19.4 टन की फसल उगाई थी.

बिहार के इस गाँव में केवल सुमंत ही नहीं बल्कि उनके सभी साथी भी आर्गेनिक फार्मिंग के इस तकनीक के माध्यम से खेती कर चावल की बड़ी पैदावार पाने में सफल हुए हैं. इन सबने औसतन 17 टनों से अधिक धान की फसल उगाई है. इन उपलब्धियों को देखकर कहा जा सकता है ये लोग गरीबी से लड़ने और अपना जीवनस्तर सुधारने के साथ-साथ ख़ामोशी से एक नई कृषि क्रांति की ओर भी बढ़ रहे हैं.

अपनी खेती में ये लोग जिस तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं उसे SRI (The System of Rice Intensification) कहा जाता है. इसे 1983 में मेडागास्कर में पहली बार प्रयोग में लाया गया था जिसका मकसद स्थानीय किसानों को ‘कम से ज्यादा उत्पादन’ करने के लिए प्रेरित करना था. इस विधि में परंपरागत तरीकों से अलग हटकर थोड़ी मात्रा में बीज-पानी के इस्तेमाल और बिना हानिकारक रासायनों के प्रयोग के लगभग दुगुनी पैदावार प्राप्त की जाती है.

ब्रिटेन के The Guardian ने भी 2013 में नालंदा के सुमंत पर एक विशेष रिपोर्ट प्रकाशित की थी. इन किसानों की सफलता से प्रभावित होकर इसी साल नालंदा दौरे पर आये नोबेल प्राइज प्राप्त इकोनॉमिस्ट Joseph Stiglitz ने इन्हें वैज्ञानिकों से भी बेहतर बताया था. हालांकि कुछ लोगों को बिहार के इन प्रतिभाओं को उचित सम्मान न मिलने का भी दुःख है.

कृषि-अर्थशास्त्री अनिल वर्मा के अनुसार, ‘अगर कोई दूसरा वैज्ञानिक या संस्था किसी भी ऐसे तरीके के साथ सामने आता है ज्सिमे बिना किसी अतिरिक्त खर्च के 50% अधिक पैदावार की जा सकती हो तो उसे नोबेल प्राइज दे दिया जाता है मगर, जब यही काम हमारे युवा बिहारी करते हैं तो उन्हें बदले में कुछ नहीं मिलता. मैं बस ये चाहता हूँ कि इन गरीब किसानों को पेट भर खाना मिल सके.’