ये किसान यू-ट्यूब से नई-नई ट्रिक ले करता है खेती, फिर ऐसे बेचता है फसल

कहा जाता है आज के दौर में इंटरनेट युवाओं को गलत कामों में फंसा रहा है, लेकिन दूसरी ओर एक किसान ऐसा भी है, जो इंटरनेट का सही मायनों में इस्तेमाल कर रहा है। फतेहाबाद के जिले के गांव चूहड़पुर के रहने वाले युवा किसान हरविन्द्र सिंह लाली ने सोशल मीडिया में व्हाट्सऐप्प, फेसबुक, ट्विटर व यू-टयूब से जुड़कर हर्बल खेती को आधुनिक तकनीक से जोड़ दिया और आज उसके दिखाए रास्ते पर गांव के अन्य किसान भी चल रहे हैं। यू-ट्यूब से लेता है नई-नई ट्रिक, एफबी और व्हाट्सऐप्प पर बेचता है फसल

किसान हरविन्द्र सिंह का कहना है कि ऐसी खेती की प्रेरणा उन्हें अपने चाचा से मिली। हर्बल खेती में काफी अनुभव हासिल किया। यू-टयूब के माध्यम से खेती की आधुनिक मशीनों व तकनीक का ज्ञान प्राप्त किया।हरविंद्र कीटनाशक का प्रयोग नहीं करता, क्योंकि उसका मानना है कि हर्बल खेती में कीट प्रवेश नहीं करते।

हरविन्द्र ने बताया कि, उसे फेसबुक पर खरीददार हर्बल खेती को उपज को मुंह मांगी कीमत देने को तैयार है। जहां अन्य किसान पराली जलाने पर जोर दे रहे हैं वहीं किसान हरविन्द्र ने पिछले लगभग 15 साल से अपने खेतों में पराली नहीं जलाई।पराली न जलाने से खेती की उर्वरक क्षमता में जबरदस्त इजाफा हुआ है। जब तक दूसरे किसान गेहूं बोने की तैयारी कर रहे होते हैं, तब तक उसके खेत में गेहूं अंकुरित हो जाता है।

लोगों की सेहत से खिलवाड़ नहीं है पसंद

हरविंद्र का कहना है कि इस खेती में लागत कम लगती है बस उत्पादन दूसरे से कम होता है, पर उसका वाजिब दाम मिलने से हरविन्द्र सिंह को इसका कोई मलाल नहीं है, उसका मानना है कि अपने मुनाफे के लिए दूसरे की सेहत से खिलवाड़ बिल्कुल भी सही नहीं है।

गौरतलब है कि, इस आधुनिक व पुरातन खेती के समावेश के सफल प्रयोग पर हरविन्द्र को सम्मानित करने के लिए न तो कभी कोई मंत्री आया न ही कोई अधिकारी और उसे इस बात का मलाल भी नहीं है। फिलहाल वो मित्रों की प्रंशसा से खुश रहता है।

40 हज़ार रुपये /किल्लो वाली केसर ने किसान को कर दिया मालोमाल

27 साल के संदेश पाटिल ने केवल ठंडे मौसम में फलने-फूलने वाली केसर की फसल को महाराष्ट्र के जलगांव जैसे गर्म इलाके में उगाकर लोगों को हैरत में डाल दिया है। उन्होंने मेडिकल की पढ़ाई छोड़कर जिद के बलबूते अपने खेतों में केसर की खेती करने की ठानी और अब वे हर महीने लाखों का मुनाफा भी कमा रहे हैं। इसके लिए उन्होंने लोकल और ट्रेडिशनल फसल के पैटर्न में बदलाव किए।

इंटरनेट से ली खेती की जानकारी

  • जलगांव जिले के मोरगांव खुर्द में रहने वाले 27 साल के संदेश पाटिल ने मेडिकल ब्रांच के बीएएमएस में एडमिशन लिया था, लेकिन इसमें उनका मन नहीं लगा।
  • उनके इलाके में केला और कपास जैसी लोकल और पारंपरिक फसलों से किसान कुछ खास मुनाफा नहीं कमा पाते थे।
  • इस बात ने संदेश को फसलों में एक्सपेरिमेंट करने के चैलेजिंग काम को करने इंस्पायर किया।
  • इसके बाद उन्होंने सोइल फर्टिलिटी की स्टडी की। उन्होंने मिट्टी की उर्वरक शक्ति (फर्टिलिटी पावर) को बढ़ाकर खेती करने के तरीके में एक्सपेरिमेंट करने की सोची।
  • इसके लिए उन्होंने राजस्थान में की जा रही केसर की खेती की जानकारी इंटरनेट से ली।

 

पिता और चाचा ही थे उनके खिलाफ

  • सारी जानकारी जुटाकर संदेश ने इस बारे में अपनी फैमिली में बात की। शुरुआत में उनके परिवार में उनके पिता और चाचा ही उनके खिलाफ थे।
  • लेकिन संदेश अपने फैसले पर कायम रहे। आखिरकार उनकी जिद और लगन को देखते हुए घरवालों ने उनकी बात मान ली।
  • इसके बाद उन्होंने राजस्थान के पाली शहर से 40 रुपए के हिसाब से 9.20 लाख रुपए के 3 हजार पौधे खरीदे आैर इन पौधों को उन्होंने अपनी आधा एकड़ जमीन में रोपा।
  • संदेश ने अमेरिका के कुछ खास इलाकों और इंडिया के कश्मीर घाटी में की जाने वाली केसर की खेती को जलगांव जैसे इलाकों में करने का कारनामा कर दिखाया है।

दूसरे किसान भी ले रहे दिलचस्पी

  • संदेश पाटिल ने अपने खेतों में जैविक खाद का इस्तेमाल किया। मई 2016 में संदेश ने 15.5 किलो केसर का प्रोडक्शन किया।
  • इस फसल के उन्हें 40 हजार रुपए किलो के हिसाब से कीमत मिली। इस तरह टोटल 6.20 लाख रुपए की पैदावार हुई।
  • पौधों, बुआई, जुताई और खाद पर कुल 1.60 लाख की लागत को घटाकर उन्होंने साढ़े पांच महीने में 5.40 लाख रुपए का नेट प्रॉफिट कमाया।
  • मुश्किल हालात में भी संदेश ने इस नमुमकिन लगने वाले काम को अंजाम दिया।
  • जिले के केन्हाला, रावेर, निभोंरा, अमलनेर, अंतुर्की, एमपी के पलासुर गांवों के 10 किसानों ने संदेश पाटिल के काम से मोटीवेट होकर केसर की खेती करने का फैसला किया है।

News Source- Dainik Bhasker News

जानिए ऐसा क्या उगाते है प्रेम सिंह, जो विदेशी भी आते है इनसे ट्रेनिंग करने

 

बुंदेलखंड के ज्यादातर इलाकों से किसान पलायन कर रहे हैं। दो वर्षों से प्राकृतिक आपदाओं और सूखे का सामना कर रहे इस क्षेत्र के हजारों किसानों के घर में अनाज का एक दाना नहीं हुआ है। रोजी-रोटी की तलाश में वो दिल्ली जैसे शहरों में रोजगार की संभावनाएं तलाश रहे हैं।

लेकिन बुंदेलखंड के ही बांदा जिले के बड़ोखर खुर्द गाँव में रहने वाले प्रेम सिंह (57 वर्ष) खेती से हर साल 15 लाख रुपये की कमाई करते हैं। इतना ही नहीं हर वर्ष 3000-4000 किसान उनसे खेती के गुर भी सीखने आते हैं, जिनमें सैकड़ों विदेशी होते हैं। प्रेम सिंह बुंदेलखंड के दूसरे तमाम किसानों से अलग तरीके से खेती करते हैं।

बाकी किसान जहां रासायनिक खादों के सहारे बाजार के लिए खेती करते हैं वहीं प्रेम सिंह खेती, पशुपालन और बागवानी का अनूठा मॉडल अपनाए हुए हैं। प्रेम सिंह ने अपनी कुल जमीन को तीन भागों में बांट रहा है। जमीन के एक तिहाई हिस्से में उन्होंने बाग लगाई है तो दूसरा भाग पशुओं के चरने के लिए है। जबकि बाकी एक तिहाई हिस्से में वो जैविक विधि से खेती करते हैं। प्रेम सिंह ने उसे आवर्तनशील खेती का नाम दिया है।

बांदा जिला मुख्यालय से पूरब-दक्षिण दिशा में बांदा-इलाहाबाद मार्ग पर लगभग 6 किमी दूरी पर बड़ोखर खुर्द में बैठे प्रेम सिंह भारतीय जैविक खेती संगठन से जुड़े हैं वे तीस वर्षों से अपने 25 एकड़ खेत में पूरी तरह से जैविक खेती कर रहे हैं।

अपनी सफलता का सूत्र बताते हैं, ”मैं बाजार के लिए खेती नहीं करता। अपने लिए बाग लगाए हैं, अपने लिए पशु पाले हैं, जैविक तरीके से खेती करता हूं। खेतों में पैदा हुए अनाज़ को सीधे बेचने की बजाय उसके प्रोडक्ट बनाकर बेचता हूं, जैसे गेहूं की दलिया और आटा, जो दिल्ली समेत कई शहरों में ऊंची कीमत पर जाते हैं।”

प्रेम सिंह के इसी फार्मूले की बदौलत अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों से किसान उनके यहां ये सफल फार्मूला सीखने आते हैं। फार्म हाउस की बांस की एक झोपड़ी में बैठे प्रेम सिंह बताते हैं, “जब आप समाधान की बात करते हैं, और उसके लिए प्रयास करते हैं, तो उसकी ख्याति दूर तक जाती है। दुनिया में बहुत से किसान हैं जो मेरी तरह मुनाफे और सेहतमंद खेती करना चाहते थे, लेकिन वो कर नहीं पाते। जब उन्हें पता चलता है कहीं इसका सफल प्रयोग हो रहा है, तो वो खुद चले आते हैं, मेरे यहां आने वाले किसान और विदेशी उसी का हिस्सा है।”

अपनी बात को जारी रखते हुए वो बताते हैं, “मेरे यहां हर साल में 3000-4000 किसान आते हैं, जिसनें कृषि में शोध करने वाले छात्र, प्रगतिशील किसान, कृषि के जानकार होते हैं। अब तक अमेरिका, फ्रांस समेत 18 देशों के किसान और रिसर्चर, पर्यावरण प्रेमी भी बड़ोखर खुर्द आ चुके हैं। अभी फिलहाल ऑस्ट्रेलिया की उल्लरिके आई हैं, जो कृषि की जानकार हैं और मध्यप्रदेश के आदिवासी इलाकों में एक स्कूल खोलना चाहती हैं, जहां कक्षा छह से ही छात्रों को खेती सिखाई जाएगी।”

ग्रामोदय विश्वविद्यालय चित्रकूट, जनपद सतना (म.प्र.) से एमआरडीएम के फाउंडर छात्र रहे प्रेम सिंह की बदौलत उनके जिले के तमाम किसानों ने बागवानी शुरू की है। खुद उनके गाँव के 28 फीसदी क्षेत्रफल पर में बाग लगे हैं। दूसरे तमाम किसानों के लिए प्रेरणस्त्रोत बने प्रेम सिंह बुंदेलखंड समेत देश के दूसरे किसानों की दशा के लिए सरकार को जिम्मेदार मानते हैं।

नाराजगी के साथ वो कहते हैं, ”मेरे मॉडल से किसान प्रभावित हुए, उन्होंने तरीके अपनाएं भी लेकिन सरकार पर असर नहीं पड़ा। अगर नीतिगत स्तर पर ऐसे कृषि व्यवस्था शुरू की जाए तो बुंदेलखंड देश के करोड़ों की हालत सुधर सकती है। लेकिन देश में किसानी की बात होती है, कोई किसान की बात नहीं करना चाहता है। देश के सभी कृषि विश्वविद्यालय और अनुसंधान

संस्थान किसानी की नई तकनीकें विकसित कर रहे हैं, लेकिन किसान दिनों दिन निराशा के गर्त में जा रहा है। इसीलिए मैंने किसानों के हित में सोचने वाले कुछ साथियों और बेल्जियम के एक साथी की मदद से “ह्मेन एग्रेयिशन सेंटक, किसान विद्यापीठ” भी खोला है, जहां किसानों को स्वावलंबी, समृद्धि और आत्मनिर्भर बनाने के तरीकों पक काम होता है।”

ऐसे करे खेती में नई तकनिक प्लास्टिक मल्चिंग का उपयोग, पूरी जानकारी पढ़े।

प्लास्टिक मल्चिंग क्या है।

खेत में लगे पोधों की जमीन को चारों तरफ से प्लास्टिक फिल्म के द्वारा सही तरीके से ढकने की प्रणाली को प्लास्टिक मल्चिंग कहते है। यह फिल्म कई प्रकार और कई रंग में आती है।

इस तकनीक का क्या फ़ायदा होता है।

इस तकनीक से खेत में पानी की नमी को बनाए रखने और वाष्पीकरण रोका जाता है। ये तकनीक खेत में मिटटी के कटाव को भी रोकती है। और खेत में खरपतवार को होने से बचाया जाता है। बाग़वानी में होने वाले खरपतवार नियंत्रण एवं पोधों को लम्बे समय तक सुरक्षित रखने में बहुत सहायक होती है।क्यों की इसमे भूमि के कठोर होने से बचाया जा सकता है और पोधों की जड़ों का विकास अच्छा होता है।

सब्जियों की फसल में इसका प्रयोग कैसे करे।

जिस खेत में सब्जी वाली फसल लगानी है उसे पहले अच्छे से जुताई कर ले फिर उसमे गोबर की खाद् और मिटटी परीक्षण करवा के उचित मात्रा में खाद् दे। फिर खेत में उठी हुई क्यारी बना ले। फिर उनके उपर ड्रिप सिंचाई की पाइप लाइन को बिछा ले।फिर 25 से 30 माइक्रोन प्लास्टिक मल्च फिल्म जो की सब्जियों के लिए बेहतर रहती है उसे उचित तरीके से बिछा दे फिर फिल्म के दोनों किनारों को मिटटी की परत से दबा दिया जाता हे। इसे आप ट्रैक्टर चालित यंत्र से भी दबा सकते है। फिर उस फिल्म पर गोलाई में पाइप से पोधों से पोधों की दूरी तय कर के छिद्र कर ले। किये हुए छेदों में बीज या नर्सरी में तैयार पोधों का रोपण कर ले।

फल वाली फसल में इसका प्रयोग।

फलदार पोधों के लिए इसका उपयोग जहाँ तक उस पौधे की छाँव रहती है। वाह तक करना उचित रहता है।इसके लिये फिल्म मल्च की लम्बाई और चौड़ाई को बराबर कर के कटिंग करे।उसके बाद पोधों के नीचे उग रही घास और खरपतवार को अच्छी तरह से उखाड़ के सफाई कर ले उसके बाद सिंचाई की नली को सही से सेट करने के बाद 100 माइक्रोन की प्लास्टिक की फिल्म मल्च जो की फल वाले पोधों के लिए उपयुक्त रहती है। उसे हाथों से पौधे के तने के आसपास अच्छे से लगनी है। फिर उसके चारों कोनों को 6 से 8 इंच तक मिटटी की परत से ढँकना है।

खेत में प्लास्टिक मल्चिंग करते समय सावधानियां।

  •  प्लास्टिक फिल्म हमेशा सुबह या शाम के समय लगानी चाहिए।
  •  फिल्म में ज्याद तनाव नही रखना चाहिए।
  •  फिल्म में जो भी सल हो उसे निकलने के बाद ही मिटटी चढ़ा वे।
  •  फिल्म में छेद करते वक्त सावधानी से करे सिंचाई नली का ध्यान रख के।
  •  छेद एक जैसे करे और फिल्म न फटे एस बात का ध्यान रखे।
  • मिटटी चढाने में दोनों साइड एक जेसी रखे
  • फिल्म की घड़ी हमेशा गोलाई में करे
  • फिल्म को फटने से बचाए ताकि उसका उपयोग दूसरी बार भी कर पाए और उपयोग होने के बाद उसे चाव में सुरक्षित रखे।

प्लास्टिक मल्चिंग की लागत कितनी आती है।

मल्चिंग की लागत कम ज्यादा हो सकती हे क्यों की इसका कारण खेत में क्यारी के बनाने के ऊपर होता हे क्यों की अलग अलग फसल के हिसाब से क्यारिया सकड़ी और चौड़ी होती हे और प्लास्टिक फिल्म का बाज़ार में मूल्य भी कम ज्यादा होता रहता है।
प्रति बीघा लगभग 8000 रूपये की लागत हो सकती है और मिटटी चढ़ाने में यदि यंत्रो का प्रयोग करे तो वो ख़र्चा भी होता है।

प्लास्टिक मल्चिग में शासन का अनुदान कितना है।

कृषि को उन्नत करने और इसे बढावा देने लिए मध्यप्रदेश सरकार द्वारा उधानिकी विभाग में इसके लिये समस्त किसानो को 50%या अधिकतम 16000 रूपये प्रति हेक्टेयर के हिसाब से अनुदान उपलब्ध कराया जाता है। इस योजना का लाभ पहले आओ पहले पाओ की तर्ज पर दिया जाता है।इसके अनुदान पाने के लिए आपको अपने जिले के विकास खंड में विरिष्ट उधान विकास अधिकारी को अपने आवेदन जमा करवा सकते हें। और जानकरी आप अपने ग्राम सेवक से भी ले सकते है।

खेती संग पोपलर लगाएं और डबल मुनाफा कमाएं

कृषि वानिकी तकनीक अब तेजी से बढ़ रही है। उत्तर प्रदेश , हरियाणा, पंजाब और हिमाचल प्रदेश के मैदानी भागों में यह तकनीक बहुत तेजी से किसानों में अपनी पैठ जमा रही है। इन इलाकों में पोपलर बहुत ज्यादा पोपुलर हो रहा है। राजस्थान के कुछ इलाकों में भी पोपलर की कतारों के बीच फसलें लहलहाती दिख जाती हैं या फिर फसलों के बीच सिर उठाते पोपलर के पेड़ फसल के प्रहरी बने खड़े नजर आते हैं।

पोपलर जल्दी से बढ़ने वाला वह पेड़ है, जो किसानों को अच्छा मुनाफा देता है। यह जंगलों की कमी को पूरा करता है और लकड़ी उद्योग की मांग को भी पूरा करता है।भारत में पोपलर साल 1950 में अमेरिका से लाया गया था। उत्तर भारत में यह बड़े पैमाने पर उगाया जाता है। यह पेड़ कार्बन डाईआक्साइड गैस को आबोहबा से सोख कर उसे लकड़ी और जैविक पदार्थ को तैयार करने में इस्तेमाल करता है।

पोपलुर के फायदेः

तेजी से बढ़ने की वजह से पोपुलर 5 से 8 साल में 90 से सौ सेंटीमीटर मोटा हो कर तकरीबन 2 सौ घनमीटर प्रति हेक्टेयर लकड़ी तैयार करता है। इस के अलावा यह उन नर्सरियों के लिए वरदान साबित हुआ है, जिन में बीज से फूल या सब्जी वाली पौध तैयार की जाती है और जहां ज्यादा गरमी में पौध के झुलसने का खतरा बना रहता है। यह पेड़ ओले, तेज बूंदों और आंधी से होने वाले नुकसान से भी फसल को बचाता है।

पोपलर की 1 साल पुरानी पौध तकरीबन 3 से 5 मीटर लंबी हो जाती है, जो बाजार में 15 से 20 रुपए में आसानी से बेची जा सकती है। 1 पेड़ के लट्ठे या लकड़ी 8 सौ से 24 सौ रुपए तक में बिकती है। किसान 1 हेक्टेयर पोपलर से साढ़े 5 से 9 लाख रुपए की कमाई कर सकते हैं और दूसरी फसलों से कमाई कर सकते हैं।

हरे चारे की कमी के समय पोपलर की पत्तियां गाय-भैंसों को सूखे चारे के साथ दी जा सकती हैं। भेड़-बकरियों को आधा किलो पोपलर रोजाना खिलान से खनिज प्रोटीन और विटामिन मिल जाते हैं।
पोपलुर की लकड़ी पैकिंग पेटी, कागज माचिस, खेल का सामान और फर्नीचर वगैरह बनाने में इस्तमाल होती है।

पौध और किस्मः

उत्तर भारत को आबोहवा के लिए जी-3, जी-4बी, एल-34, एस-7, सी-15, उदय क्रांति और बहार पोपलर की अच्छी किस्में हैं। डी-61, डी-66, एस-7सी8, एस-7सी 15, एस-7सी 4, एस 7 सी सी 20 एल-49, एल-247, एल-154 और एल-143 ऐसी किस्में हैं, जो फसलों के बढ़ने और पैदावार पर कम असर डालती हैं।

किसान इन किस्मों को कृषि विश्वविद्यालय, वन विभाग या प्राइवेट नर्सरियों से खरीद कर लगा सकते हैं या अपनी नर्सरी भी तैयार कर सकते हैं।

 

नर्सरी तैयार करनाः

पोपलर की नर्सरी भुरभुरी, रेतीली और उपजाऊ मिट्टी में बनाएं, इस की पौध कटिंग से तैयार की जाती है। अच्छी पौध के लिए 1-2 साल के पौधे से कटिंग करें। कटिंग में 3-4 आंखें हों, जिन की लंबाई 18-20 सेंटीमीटर और मोटाई 2-3 सेंटीमीटर हो। यह कटिंग जनवरी महीने में कर सकते हैं। कटिंग के बाद उन कलमांं को 24 घंटे के लिए पानी में भिगो कर रखें।

कलम कटिंग करने के साथ हम क्यारी भी तैयार करते हैं। क्यारी का साइज 15-5 मीटर होना चाहिए। क्यारी में कटिंग को मिट्टी में खड़ा कर के 50ग50 सेंटीमीटर की दूरी पर लगा देना चाहिए। इस साइज में 1 हेक्टेयर रकबे में 96 क्यारियां तैयार हो जाती हैं और हर क्यारी में 30 कटिंग लग जाती हैं। इस तरह 1 हेक्टेयर खेत में 28 हजार 8 सौ कटिंग लग जाती है।

रोपाईः

नर्सरी में उगने वाला पौधा 1 साल बाद खेत में रोपने के लिए तैयार हो जाता है। पौधे लगाने के लिए गड्ढे 4×4 या 3×3 मीटर की दूरी पर 90 सेंटीमीटर गहरे और 15 सेंटीमीटर चौड़े खोदने चाहिए।

गड्ढे से निकली मिट्टी में 2-3 किलो गोबर की खाद, 50 ग्राम डीएपी और 25 ग्राम म्यूरेट आफ पोटाश मिला कर मिट्टी तैयार कर लें, अगर मिट्टी में जिंक की कमी हो, तो 1 गड्ढे में 15-20 ग्राम जिंक सल्फेट और 10 ग्राम एल्डेक्स पाउडर मिलाएं।

पौधे को गड्ढे में सीधा खड़ा कर मिट्टी को इस तरह भरें कि गड्ढा ऊपर से 6 इंच खाली रहे। पौधे लगाने का समय जनवरी फरवरी होता है। इस के बाद हर 15 दिनांं पर सिंचाईं करते रहें। मानसून आने से पहले तक सिंचाई करना जरूरी होता है।

देखभालः

पोपलर की पहले साल हर 15 दिनों बाद नीचे से 3 मीटर तक आंखें तोड़तें रहें, दूसरे व तीसरे साल जनवरी में जो टहनियां बीच वाली टहनी के साथ-साथ चल रहीं हो या दूसरी टहनियों में उलझ रहीं हों, उन्हें निकाल दें, चौथे साल मई व अगस्त में 2 बार निराई करें, इस के बाद पांचवे और छठे साल नीचे के एक तिहाई व आधे हिस्से से टहनियां छांट दें|

कृषि वानिकीः

पोपलर की यह खासियत है कि यह पौधा पतझड़ होने पर दिसंबर से मार्च-अप्रैल के महीनां तक पत्तियां को गिरा देता है। नंगा पेड़ खेत में खड़ा रहता है। इसलिए गेहूं, जौ, जई, बरसीम, मटर, आलू, सरसों, गोभी, टमाटर, बैंगन या मिर्च वगैरह की फसलें पोपलर के नीचे आसानी से उगाई जा सकती हैं।

खरीफ की फसलों में मक्का, ज्वार, अरहर, उड़द, मूंग और सूरजमुखी शुरू के 3 सालों तक आसानी से उगाई जा सकती है। जायद में लौकी, टिंडा, टमाटर, खीरा, ककड़ी, और खरबूजे की खेती की जा सकती है। 4-5 साल पुराने पापुलर के नीचे हल्दी, अदरक, पुदीना और छाया में पनपने वाली फसलें उगा सकते हैं।

पांचवी पास महिला आज करती हैं 56 हजार लीटर दूध का कारोबार

हमारे आस-पास कई ऐसे लोग हैं, जिन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि कामयाबी के लिए बड़ी डिग्रियों की जरूरत नहीं होती। जरूरत होती है, तो सिर्फ लगन और सच्ची मेहनत की। आज हम आपको एक ऐसी महिला की कहानी बताने जा रहे हैं, जो गाँव में रहने के बाद भी बाकी महिलाओं के लिए मिसाल बन चुकी हैं। लखनऊ की बिटाना देवी ने सीमित संसाधन में अपनी कामयाबी की जो कहानी लिखी है वह सच में बेहद प्रेरणादायक है।

बिटाना की शादी सिर्फ 15 साल की उम्र में ही हो गयी थी, शिक्षा के नाम पर उनके पास सिर्फ पिता का आर्शीवाद था। शादी में पिता से भेंट स्वरुप मिले एक गाय और एक भैंस ही उनकी कमाई का एकमात्र जरिया था। अपनी गायों और बछड़ों को बच्चों जैसा प्यार देकर बिटाना आज एक सफल डेयरी फर्म की संचालिका हैं।

गांव में रहने वाली औरतों को लोग अक्सर असहाय समझते हैं। परन्तु पांचवी पास बिटाना देवी ने इस मिथ को गलत ठहरा दिया। उन्होंने महिला सशक्तिकरण की एक नई परिभाषा गढ़ते हुए दूसरी ग्रामीण महिलाओं को भी नई राह दिखाई है। निगोहां के मीरकनगर गांव से ताल्लुकात रखने वाली बिटाना ने अपने पिता के भेंट स्वरुप दिए गाय और भैंस का दूध बेचना प्रारंभ किया।

गाय और भैंस का दूध बेंचकर उसने एक गाय खरीद ली। सीमित संसाधनों के बीच दूध बेचकर अर्जित कमाई से वो निरंतर दुधारू मवेशियों की संख्या बढ़ाती चलीं गईं। साल 1996 में उन्होंने दुग्ध उत्पादन का व्यवसाय शुरू किया। धीरे-धीरे उन्होंने इस कारोबार में एक वर्चस्व स्थापित किया और 2005 से लगातार 10 बार सर्वाधिक दुग्ध उत्पादन के लिए गोकुल पुरूस्कार भी जीत रहीं।

अपने घर का खर्च भी वो अपने कमाए हुए पैसे से ही चलाती है। इन्हें देखकर और भी महिलाएं प्रेरित हुई और दुग्ध उत्पादन का व्यवसाय शुरू किया। इस समय बिटाना के पास 40 दुधारू पशु हैं। बिटाना रोज सुबह 5 बजे उठकर जानवरों को चारा पानी देती है, उनका दूध निकालती हैं और डेरी तक दूध पहुँचाने का काम भी वह स्वयं करती हैं।

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि इन्होंने साल 2014-2015 में कुल 56,567 लीटर दूध का उत्पादन किया। धीरे-धीरे बिटाना ने इसे व्यापार बना लिया, लगभग 155 लीटर दूध रोजाना पराग डेयरी को सप्लाई करती हैं। वर्तमान में उनके फार्म से रोजाना 188 लीटर दूध का उत्पादन होता है। उनके प्रयासों को देखते उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें गोकुल पुरस्कार से भी सम्मानित किया है। बिटाना बताती हैं कि औपचारिक रूप से उन्होंने साल 1985 से इस काम की शुरूआत की थी।

दरअसल आज लाखों का कारोबार करने वाली बिटाना को शुरुआती समय में आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा था लेकिन उन्होंने कठिन मेहनत के दम पर परिस्थितियों को बदल कर रख दिया और एक सफल उद्यमी के रूप में हमारे सामने खड़ी हैं।

News Source- hindi.kenfolios.com

करते है एलोविरा,लेमनग्रास, मेंथा, तुलसी,अश्वगंधा जैसी औषधीय पौधों की खेती

खेती घाटे का सौदा कही जाती है। दुनिया में सबसे ज्यादा खेती वाले देश में हजारों किसान खेती छोड़ रहे हैं, क्योंकि किसानी में बढ़ती लागत के अनुपात में मुनाफा नहीं हो रहा। लेकिन इसी देश में कुछ ऐसे प्रगतिशील किसान भी हैं जो अपनी सूझबूझ और मेहनत से खेती से फायदे का सौदा बना रहे हैं।

ऐसे ही एक किसान गुजरात के हरसुख राणा भाई पटेल भी हैं। जिस उम्र में लोग आराम करना चाहते हैं हरसुख भाई देशभर में घूम-घूम कर औषधीय खेती के नए तरीके सीखते हैं और खुद उन्हें खेती में आजमाते तो हैं ही दूसरों को सिखाते भी हैं। वो देश के प्रगतिशील किसानों में शामिल हैं।यही नहीं उन्हें तीन बार गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सम्मानित भी किया गया है। उन्होंने खेती-किसानी को फायदे का सौदा साबित किया है।

तुलसी की भी करते हैं खेती

गुजरात के राजकोट जिले के धोराजी गाँव के किसान हरसुख राणाभाई पटेल (60 वर्ष) पिछले 17 वर्षों से एलोवेरा व दूसरी औषधीय फसलों की खेती कर रहे हैं। हरसुख राणाभाई पटेल खेती की शुरुआत के बारे में कहते हैं, “साल 2002 में सीमैप के वैज्ञानिकों ने अहमदाबाद में ट्रेनिंग कार्यक्रम किया था, वहीं पर औषधीय फसलों की खेती शुरु की आज मुझे 17 साल हो गए खेती करते हुए।”

गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी हरसुख भाई पटेल को सम्मानित करते हुए। गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी हरसुख भाई पटेल को सम्मानित करते हुए।

हरसुख भाई पटेल इस समय पामरोज, लेमनग्रास, मेंथा, तुलसी, खस, पचौली, सिट्रोला, नेपाली सतावर, अश्वगंधा जैसी औषधीय व सगंध पौधों की 45 एकड़ में खेती करते हैं। हरसुख भाई समय-समय पर केन्द्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान (सीमैप) में प्रशिक्षण लेते रहते हैं।औषधीय पौधों की खेती के फायदों के बारे में हरसुख भाई कहते हैं, “इन फसलों की सबसे खास बात होती है, इसे पशु नहीं खाते हैं और इसका भाव भी किलो में मिलता है। इसकी मार्केटिंग में भी परेशानी नहीं होती है।

हरसुख भाई पटेल के खेत में तुलसी

गुजरात में खेती की शुरुआत सबसे पहले मैंने ही की थी, आज बहुत से किसान मेरे पास ट्रेनिंग लेने आते हैं।”हरसुख भाई पटेल ने सभी फसलों के आसवन के लिए आसवन टैंक भी लगायी है, दूसरे किसान भी अपनी फसल लेकर आते हैं। अब वो एलोवेरा की भी फसल की खेती करने लगे हैं।

हरसुख भाई बताते हैं, “एलोवेरा की एक एकड़ खेती से आसानी से पांच-सात लाख रुपए कमाए जा सकते हैं। वर्ष 2002 में गुजरात में इसकी बड़े पैमाने पर खेती हुई लेकिन खरीदार नहीं मिले। इसके बाद मैंने रिलायंस कंपनी से करार किया।

राष्ट्रीय औषधीय पौधा बोर्ड के अनुसार भारत में 17000-18000 प्रजातियों पौधे हैं, जिनमें से 6000-7000 लोगों का औषधीय उपयोग में लाए जाते हैं और आयुर्वेद, सिद्ध, यूनानी और होमियोपैथी दवाओं की चिकित्सा पद्धति, में इनका प्रयोग होता है।

औषधीय पौधे न केवल पारंपरिक औषधि एवं हर्बल उद्योग के लिए एक प्रमुख संसाधन आधार हैं, बल्कि भारतीय आबादी के एक बड़े हिस्से के लिए आजीविका और स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान करते हैं। देश में 80 से 90 बिलियन औषधीय पौधों का कारोबार होता है। हर वर्ष लगभग 10 अरब रुपए की औषधीय पौधों का निर्यात होता है।

खस की जड़ें निकालती महिलाएं।

शुरू में उन्हें पत्तियां बेचीं लेकिन बाद में पल्प बेचने लगे। आजकल मेरा रामदेव की पतंजलि से करार है और रोजाना 5000 किलो पल्प का आर्डर है। इसलिए मैं दूसरी जगहों पर भी इसकी संभावनाएं तलाश रहा हूं। वो आगे बताते है, “किसान अगर थोड़ा जागरूक हो तो पत्तियों की जगह उसका पल्प निकालकर बेचें। पत्तियां जहां पांच-सात रुपए प्रति किलो में बिकती है वहीं पल्प 20-30 रुपए में जाता है।”

हरसुख भाई को तीन बार प्रदेश स्तर पर तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खेती के क्षेत्र में बेहतर काम करने के लिए सम्मानित भी किया है। हरसुख भाई आज गुजरात के दूसरे किसानों के लिए मिसाल बन रहे हैं।

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एमपी के इस किसान ने 7 हज़ार रुपये लगाकर एक एकड़ गेहूं से कमाए 90 हज़ार

मध्यप्रदेश के 23 वर्षीय एक युवा किसान ने सेल्स ऑफिसर की नौकरी छोड़कर पिछले तीन वर्षों से सात बीघे जैविक खेती करना शुरू किया। इनके खेत में इस वर्ष एक एकड़ ‘बंशी’ गेहूं में लागत सात हजार आयी और मुनाफा 90 हजार हुआ, क्योंकि जैविक ढंग से किया गया बंशी गेहूं तीन गुना अधिक कीमत पर बिका।

इस तरह तैयार की खाद

वो आगे बताते हैं, “पोषक तत्वों से भरपूर बंशी गेहूँ को जैविक ढंग से करने की वजह से खाने के लिए इसे खरीदने वालों ने 5000 कुंतल में खरीदा, अपने खेतों में हमने सिर्फ गाय के गोबर, गोमूत्र, बेसन और गुण के मिश्रण से तैयार खाद का ही प्रयोग किया।” डाक्टर ईश्वर गुर्जरमंदसौर जिले के पहले किसान नहीं हैं जो जैविक ढंग से खेती कर अपनी फसल से अच्छा मुनाफा कमा रहे हों बल्कि मंदसौर जिले के सैकड़ों किसानो का मानना है कि जैविक ढंग से की गयी किसी भी फसल को सामान्य दाम से तीन गुना ज्यादा कीमत पर बेच सकते हैं।

5000 रुपये कुंतल में बिका गेहूं

गेहूं के सही मूल्य के लिए जहां एक ओर किसान आन्दोलन कर रहे हैं वहीं आयुर्वेदिक डॉक्टर ईश्वर गुर्जर अपने खेत के गेहूं को पांच हजार प्रति कुंतल बेच रहे हैं। मध्यप्रदेश शासन के ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी पीएस बारचे देशी बीज की महत्ता बताते हैं, “देशी बीज किसी भी फसल का हो उसे संरक्षित करने की जरूरत है, बंशी गेहूं वर्षों पुराना गेहूं है पंजाब और महाराष्ट्र की लैब में इस गेहूं का परिक्षण कराया जिसमे 18 पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं जबकि बाकी गेहूं में आठ नौ प्रतिशत ही पोषक तत्व होते हैं।”

उन्होंने आगे बताया, “इस समय देश कुपोषण से गुजर रहा है इसलिए देशी बीजों को बचाना बहुत जरूरी है क्योंकि सबसे ज्यादा पोषक तत्व देशी बीजों में ही पाए जाते हैं, किसान अपने खेतों में देशी बीजों का प्रयोग कर जीरों बजट से खेती करें, जैविक ढंग से की गयी फसलों की मांग देश के साथ-साथ विदेशों में भी बहुत हैं और इन फसलों की कीमत भी सामान्य कीमत से ज्यादा होती है।”

                                                                                                                                                

खेत में नहीं करते कीटनाशक का प्रयोग

ये अपने खेतों में बाजार से खरीदी गयी किसी भी खाद या कीटनाशक का प्रयोग नहीं करते। बोआई से पहले बीज शोधन जरुर करते हैं। भूमि के पोषक तत्व और उपजाऊंपन को बनाये रखने के लिए डॉक्टर गुर्जर जैविक खाद बनाने से लेकर कीटनाशक दवाइयां भी खुद ही बना लेते हैं। उनका मानना है, “अगर हमारे पास अपने देशी बीज संरक्षित हो, खुद की बनाई खाद हो तो हमारी निर्भरता बाजार से कम होगी, देशी बीज और जैविक खेती दोनों ही हमारे स्वास्थ्य के लिए बेहतर हैं, हमारे भोजन में पोषक तत्वों की भरपूर मात्रा मिलेगी साथ बाजार भाव भी अच्छा मिलेगा।”

ग्लूकोज की मात्रा होती है कम

महाराष्ट्र के प्रगतिशील किसान पद्मश्री सुभाष पालेकर अपने शिविरों में किसानों को देशी बीज और जीरो बजट खेती करने के लिए प्रेरित करते हैं। बंशी गेहूं के बारे में उनका कहना है कि इस गेहूं को खाने में मधुमेह के रोगियों को लाभ मिलता है, क्योंकि इसमें ग्लूकोज की मात्रा काफी कम रहती है। साथ ही यह अन्य गंभीर बीमारियों में भी गेहूं कारगर है। यह आसानी से पच जाता है।

बीज शोधन के लिए बीजामृत (100 किलो बीज के लिए सामग्री)-

पांच किलो देशी गाय का गोबर, पांच किलो गोमूत्र, 20 लीटर पानी, 50 ग्राम चूना, 50 ग्राम मेड या बरगद के पेड़ के नीचे की मिट्टी।

सभी सामग्री को मिलाकर 24 घंटे प्लास्टिक के ड्रम में भरकर रख देते हैं। इसके बाद इस बीजामृत को 100 किलो बीज में मिलाकर फर्श पर कपड़े के ऊपर बिछाकर छांव में एक दिन के लिए सुखा देते हैं, ये बीज शोधन की प्रक्रिया है इसके बड़ा बीज की बोआई करते हैं।

पौधों का भोजन जीवामृत

10 किलो गोबर, 10 किलो गोमूत्र, दो किलो गुड़ या फलों का गूदा, दो किलो बेसन, 200 लीटर पानी, 50 ग्राम मेड या बरगद के पेड़ के नीचे की मिट्टी।

सभी सामग्री को मिलाकर 48 घंटे सीमेंट या प्लास्टिक के ड्रम में भरकर रख देते हैं। 48 घंटे बाद फसल की सिंचाई के दौरान इसका प्रयोग करते हैं। जीवामृत बनाने के 15 दिन तक ही इसका इस्तेमाल कर सकते हैं, किसी भी फसल में 21 दिन बाद इसको पानी के साथ या छिड़काव करके प्रयोग कर सकते हैं। ये फसल में खाद का काम करता है इसका प्रयोग पूरी फसल में तीन से चे बार किया जा सकता है।

100 किलो गाय का गोबर, एक लीटर गोमूत्र, एक किलो गुड़ या फलों का गूदा, दो किलो बेसन(किसी भी डाल का), 50 ग्राम मेड या बरगद के पेड़ के नीचे की मिट्टी।सभी सामग्री को एक साथ मिलाकर पालीथिन पर फैला देते हैं, 48 घंटे छायादार जगह पर रखकर जूट के बोरे से ढक देते हैं, इसके बाद 48 घंटे और रखकर इसे सुखाकर इसका भंडारण भी कर सकते हैं, ये खाद एक एकड़ के लिए पर्याप्त है। इससे खेत में पोषण और जीवाणु की पूर्ति होती है।

कीटनाशक और फसल की सुरक्षा के लिए अग्नियास्त्र (तनो के अन्दर कीट, इल्ली सफेद मच्छर, माहू)—

20 लीटर गोमूत्र, पांच किलो नीम के पत्ते, 500 ग्राम तम्बाकू पाउडर, 500 ग्राम हरी तीखी मिर्च, 500 ग्राम लहसुन की चटनी।

सभी सामग्री को मिट्टी के बर्तन में डालकर तीन चार उबाल लगाते हैं, इसके बाद इसे ठंडा होने के लिए 48 घंटे के लिए रख देते हैं। इसके बाद इसे छानकर किसी बर्तन में रख देते हैं। 16 लीटर की टंकी में 250 एमएल अग्नियास्त्र डालते हैं, एक एकड़ में जितनी पानी की टंकी का छिड़काव करेंगे हर टंकी में 250 एमएल अग्नियास्त्र डाल देंगे। इसके छिड़काव से फसल में कोई भी कीट नहीं लगेंगे। तीन महीने तक ही इसका उपयोग कर सकते हैं।

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मैदानी इलाकों में सर्दी में करें स्ट्रॉबेरी की खेती

अभी तक स्ट्रॉबेरी की खेती ठंडे प्रदेशों में की जाती थी, लेकिन हरियाणा के किसान इसके लिए अनुकूल भूमि और वातावरण न होते हुए भी स्ट्राबेरी की खेती कर रहे हैं। यही नहीं स्ट्राबेरी के साथ मिर्च की भी खेती सहफसल लेकर दोगुना फायदा हो रहा है।

हरियाणा के महेन्द्रगढ़ जिले के डिंगरोता गाँव के किसान अनिल बलोठिया (35 वर्ष) पिछले दो साल स्ट्राबेरी की खेती कर रहे हैं। दो साल पहले हिसार में उन्होंने स्ट्रॉबेरी की खेती के बारे में जानकारी मिली, उसके बाद इंटरनेट से सारी जानकारी इकट्ठा की।

वहां जाकर उन्होंने इसकी खेती शुरु कर दी। किसान अनिल बलोठिया बताते हैं, “दो साल पहले हिसार में एक किसान को स्ट्रॉबेरी की खेती करते देखा था, फिर वहीं से मैंने भी सोच लिया कि अपने गाँव में जाकर स्ट्राबेरी की खेती करूंगा। इंटरनेट की जानकारी लेने के बाद अपने गाँव में खेती शुरु कर दी है।”

महेन्द्रगढ़ के अलावा हिसार जिला धीरे-धीरे स्ट्रॉबेरी का हब बनता जा रहा है। यहां के कई गाँवों में स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे हैं। यहां के किसानों के लिए दूसरी फसलों के मुकाबले यह फायदे की फसल साबित हो रही है। खेती में ज्यादा मुनाफा देख दूसरे जिलों के किसान भी यहां पर जमीन ठेके पर लेकर स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे हैं।

अनिल स्ट्रॉबेरी के साथ ही मिर्च के पौधे भी लगा देते हैं। अनिल बताते हैं, “हम पहले स्ट्रॉबेरी के पौधे लगा देते हैं, जब पौधे पूरी तरह से तैयार हो जाते हैं तो उसी के साथ ही मिर्च के पौधे लगा देते हैं। स्ट्राबेरी आठ महीने की फसल होती है और मिर्च दस महीने की होती है।”

डेढ़ एकड़ स्ट्रॉबेरी की फसल में चार-पांच लाख की लागत आती है। पैदावार होने के बाद खर्च निकालकर सात-आठ लाख का फायदा हो जाता है। वहीं मिर्च से भी दो-तीन लाख की आमदनी हो जाती है। ऐसे में मिर्च और स्ट्राबेरी दोनों को बेचकर दस लाख तक आमदनी हो जाती है। स्ट्रॉबेरी की फसल खत्म होते होते मिर्च में फल लगने लगते हैं।

यहाँ बिकती है फसल

यहां से तैयार स्ट्रॉबेरी पैक करके दिल्ली भेज देते हैं, दिल्ली में इसकी बहुत बड़ी मार्किट है । इसका इस्तमाल टाफी ,कैंडी और बहुत सी खाने वाली चीजों में होता है । इसके इलवा साउथ इंडिया में भी इसकी मंडी है । अगर आप किसी बड़े शहर में रहते है तो खुद भी पैकेट बना कर सेल कर सकते है जिस से आप का मुनाफा कई गुना बढ़ जाता है ।अनिल बताते हैं, “स्ट्रॉबेरी पचास रुपए किलो से लेकर छह सौ रुपए किलो तक बिक जाती है। डेढ़ एकड़ में दो किलो वजन की पचास हजार ट्रे पैदा हो जाती है।”

डेढ़ एकड़ में 35 से 40 हजार पौधे लगते हैं, मिर्च में अलग से कोई खर्च नहीं लगता है। इसके पौधे हिमाचल से लाए जाते हैं, लेकिन अब अनिल नर्सरी यहीं पर तैयार करते हैं। किस्म के हिसाब से प्रति पौधा 10 रुपए से लेकर 30 रुपए तक के बीच पड़ते हैं। रोपाई का काम अक्टूबर-नवंबर में किया जाता है। जनवरी और फरवरी माह में यह तैयार होकर फल दे देती है।

कैसे होती है खेती

यह पौधा दोमट मिटटी में ही लगाया जा सकता है। पौध लगाने के बाद 20 दिन तक फव्वारा लगाया जाता है।रोपाई का काम अक्टूबर-नवंबर में किया जाता है। जनवरी और फरवरी माह में यह तैयार होकर फल दे देती है।

हिमाचल से आते हैं पौधे

इसके पौधे हिमाचल से लाए जाते हैं। वैरायटी के अनुसार प्रति पौधा 10 रुपए से लेकर 30 रुपए तक के बीच पड़ता है।स्ट्रॉबेरी में स्वीट चार्ली और विंटर डाउन कीमती वैरायटी में गिनी जाती है।जबकि काडलर, रानिया, मोखरा समेत कई वैरायटियां स्ट्रॉबेरी की होती हैं।

एक-एक मीटर की दूरी पर लगाए अनार, आंधी में भी नहीं गिरे पौधे

डीडीए उद्यानिकी अजय चौहान ने बताया अनार की खेती के लिए हल्की जमीन अत्यंत उपयुक्त होती है। ऐसी जमीन में क्यारी से क्यारी 5 मीटर व पौधे से पौधे की दूरी 3 मीटर रखना चाहिए। एक हेक्टेयर में 667 पौधे लगाए जाते हैं। पौधे लगाने के दूसरे वर्ष में प्रति पौधा 10-15 किलो का उत्पादन शुरू होता है। जो साल-दर-साल बढ़कर 30-35 किलो तक पहुंच जाता है। इस प्रकार एक बार पौधा लगाने के बाद वह आगामी 30 साल तक लगातार उत्पादन देता रहता है।

अनार के पौधे को विशेष काट-छांट की आवश्यकता पड़ती है। वही ड्रिप से पानी देने के कारण उत्पादन लागत भी कम हो जाती है। शासन भी राष्ट्रीय कृषि मिशन के तहत प्रति हेक्टेयर प्रथम वर्ष 45 हजार और दूसरे व तीसरे वर्ष 15-15 हजार रुपए का अनुदान देता है।

यह है हाईडेंसिटी प्लांटेशन तकनीक

अल्टाडेंसिटी प्लांटेशन तकनीक में पौधों को कम दूरी पर लगाया जाता है। ऊंचाई को नियंत्रित रखने के लिए समय-समय पर कटाई-छंटाई करना आवश्यक है। शाखा आने पर उसे ऊपर से काट दें। काटी शाखा में फिर तीन शाखाएं आती है। एक बढ़ने पर इसे फिर काट देते हैं। इस तरह यह पेड़ छतरीनुमा बन जाता है, इसकी ऊंचाई छह फीट रहती है। कृषि कॉलेज में हो रहे अनुसंधान में पौधे से पौधे की दूरी 1 मीटर और कतार से कतार की दूरी 3 मीटर रखी है। इस लिहाज से एक एकड़ में 674 पौधे आते हैं।

इसलिए हवा-आंधी से आड़ी नहीं होती है फसल 

उद्यानिकी विभाग के सेवानिवृत्त उद्यान विकास अधिकारी जवाहरलाल जैन ने बताया अल्ट्रा डेंसिटी प्लांटेशन तकनीक से पौधे रोपने पर तेज हवाओं का असर नहीं होता है। पेड़ अधिक व नुकसान कम होने के कारण चार गुना तक पैदावार में बढ़ोतरी होती है। किसानों की आय में बढ़ोतरी होगी। वहीं, सामान्य पद्धति से रोपे गए पौधे तेज हवा, बेमौसम बारिश होने से आड़े हो जाते हैं, फल झड़ने लगते हैं।