खरबूजे की फसल से किसान ने 70 दिन में कमाए 21 लाख रूपए

एक ओर जहां गुजरात में किसान आलू की फसल की अच्छी फसल न मिलने से परेशान हैं, वहीं एक किसान ने फसल बदलकर काफी मुनाफा कमा लिया है। गुजरात के बनासकांठा जिले के किसान खेताजी सोलंकी ने आलू की जगह खरबूजे की फसल लगाई है जो उनके लिए अच्छी साबित हुई है।

इलाके में आलू की फसल के अच्छे दाम न मिलने पर सभी किसान परेशान थे। ऐसे में अपने सात बीघा के खेत में सोलंकी ने आलू की जगह खरबूजे की फसल बोने का फैसला किया। सातवीं पास सोलंकी ने गांव के दूसरे लोगों को भी रास्ता दिखाया।

नई तकनीकों के इस्तेमाल से फायदा

उन्होंने आधुनिक तकनीकों का प्रयोग कर खरबूजा उगाया। उन्होंने बेहतर बीज, टपक सिंचाई और सोलर वॉटरपंप का इस्तेमाल किया। फरवरी में लगाई फसल अप्रैल में तैयार हो गई और 70 दिन में उन्होंने 21 लाख रुपये कमा लिए। उनके खेत में 140 टन खरबूजा पैदा हुआ।

उन्होंने 1.21 लाख रुपये खर्च किए थे। उनकी फसल इतनी अच्छी थी कि उन्हें उसे बेचने के लिए कहीं जाना भी नहीं पड़ा और दूसरे राज्यों से व्यापारी उनके पास आकर फसल खरीदकर गए। उन्हें इसके काफी अच्छे पैसे मिले।

खेताजी बहुत पढ़े-लिखे नहीं हैं लेकिन तकनीक का भरपूर इस्तेमाल करते हैं। वह मोबाइल ऐप के जरिये किसानों पर टिप्स लेते हैं और फलों की फसल के लिए नई तकनीकें सीखते रहते हैं। वह अब चेरी टमाटर की फसल लगाना चाहते हैं।

किसान ने 90 दिन में तरबूज की खेती से कमाए 3.5 लाख

देशभर में लगातार किसान सूखे और कर्ज की समस्‍याओं की वजह से आत्‍महत्‍या कर रहे हैं। वहीं कई ऐसे राज्‍य हैं जहां किसानों ने तरबूज की खेती कर अपने जीवन में मिठास भर रहे हैं। उन्‍हीं किसानों में से एक हैं तमिलनाडु के रहने वाले मुरुगा पेरुमल।

तरबूज की खेती से पेरुमल न सिर्फ लोगों को प्रेरित कर रहे हैं बल्कि लाखों में कमाई भी कर रहे हैं। दिलचस्‍प ये है कि उनकी कमाई लागत से करीब 8 गुना ज्‍यादा है। तो आइए समझते हैं पेरुमल के कमाई के गणित को।

तरबूज की खेती को चुना

तमिलनाडु के तिरुवन्नमलाई जिले के रहने वाले मुरुगा पेरुमल के गांव वेपुपुचेक्की के अधिकतर लोग खेती पर निर्भर हैं। सभी ने अलग – अलग फसल की खेती की है। वहीं पेरुमल ने ड्रिप इरीगेशन सिस्‍टम के जरिए तरबूज की खेती की है।

2.2 हेक्टेयर जमीन में की खेती

उन्‍होंने इस खेती के लिए 2.2 हेक्टेयर जमीन का इस्‍तेमाल किया। उन्होंने इसमें 1 हेक्टेयर जमीन का इस्‍तेमाल Pukeeza वैराइटी के लिए किया। जबकि 1.2 हेक्‍टेयर जमीन को अपूर्व वैराइटी के लिए इस्‍तेमाल किया।

कैसे की खेती

  • इसके बाद उन्होंने खेत की चार बार जुताई की ।
  • आखिरी बार जुताई से पहले उन्होंने 25 टन / हेक्टेयर की दर से खाद का इस्‍तेमाल किया।
  • 300 किलोग्राम डीएपी खाद
  • 150 किलो पोटाश एक बेसल डोज
  • एक हेक्टेयर के लिए 3.5 किलो बीज का इस्तेमाल किया ।
  • नवंबर में बीज बोया, ड्रिप सिस्टम के जरिए प्रति दिन 1 घंटे खेत की सिंचाई करते थे।

49 हजार रुपए का लोन

पेरुमल ने वेपुपुचेक्की को-ऑपरेटिव सोसाइटी से 1 हेक्‍टेयर जमीन के लिए 49 हजार रुपए का लोन लिया। पेरुमल पहली बार खेती कर रहे थे इसलिए सरकार की ओर से 50% फर्टिलाइजर सब्‍सिडी भी मिला। ऐसे में उनकी जेब से मामूली खर्च हुए।

70 दिन बाद काटी फसल

पेरुमल के मुताबिक करीब 70 दिन बाद उसने मजूदरों के साथ मिलकर फसल काटा। तब पेरुमल के खेत से Pukeeza वैराइटी के तरबूज 55 टन निकले जबकि अपूर्व वैराइटी में 61 टन तरबूज की पैदावार हुई। वहीं दो सप्‍ताह बाद एक बार फिर फसल काटी गई। इस बार उन्‍हें Pukeeza वैराइटी से 6 टन और अपूर्व वैराइटी से 4 टन तरबूज मिले ।

3 लाख 30 हजार रुपए का मुनाफा

पेरुमल ने तरबूज की पहली खेप 3100 रुप प्रति टन बेची। जबकि दूसरे खेप को 1000 रुपए प्रति टन बेचा। उन्‍होंने कुल 3 लाख 30 हजार रुपए का मुनाफा कमाया।

2 माह के कोर्स ने बदली कि‍स्‍मत, हर माह 1.2 लाख कमा रहे रेड्डी

आई वॉक फार्मिंग, आई टॉक फार्मिंग, आई ब्रीद फार्मिंग – कुछ ऐसा कहते हैं 52 साल के श्री के रंगा रेड्डी, जो आज बेहद सफलतापूर्वक ‘ताजी-ताजी सब्‍जी’ के नाम से एग्री बि‍जनेस कर रहे हैं। फरवरी 2010 में उन्‍होंने नई तकनीकों और ट्रेनिंग का सहारा लेते हुए सब्‍जि‍यों की फार्मिंग शुरू की और आज उनका सालाना टर्नओवर 1 करोड़ रुपए पहुंच गया है।

तेलंगाना के चंदापुर गांव के रहने वाले रेड्डी अब इलाके के लोगों के लि‍ए मि‍साल बन गए हैं। वह हैराबाद के कृषि‍ विश्‍वविद्यालयों व इंस्‍टीट्यूट में फाइनल ईयर के छात्रों को लेक्‍चर भी देते हैं। वह आसपास के कि‍सानों को खेतीबाड़ी के आधुनि‍क तौर तरीकों से वाकि‍फ कराते हैं।
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काम की तलाश में गए सऊदी

रेड्डी ने एग्रीकल्‍चर में ग्रेजुएशन की मगर भारत में खेती उतनी लाभदायक साबि‍त नहीं हुई। काम की तलाश में वह सऊदी चले गए। उनके पास कोई टेक्‍नि‍कल डि‍ग्री तो थी नहीं इसलि‍ए उन्‍हें वहां फार्म हाउस पर काम मि‍ल गया। खेतीबाड़ी की जानकारी होने की वजह से यहां उन्‍हें तवज्‍जो मि‍ली और वह खेतीबाड़ी के काम में जुटी कंपनी में प्रोडक्‍शन मैनेजर हो गए।

रेड्डी ने देखा कि कैसे खेती के लि‍ए अनुकूल माहौल न होने के बावजूद सऊदी में तकनीक की बदौलत सब्‍जि‍यां पैदा की जा रही हैं। वर्ष 2010 में उन्‍होंने भारत लौटने का मन बना लि‍या। रेड्डी के दि‍माग में सब्‍जि‍यों वाली बात घूमती रही और यहां आकर उन्‍होंने सब्‍जी की खेती शुरू कर दी।

कि‍या दो महीने का कोर्स

रेड्डी के पास खेतीबाड़ी का करीब 25 साल का अनुभव है। मगर उन्‍होंने इसकी बारीकि‍यां सीखने के लि‍ए पार्टि‍सि‍पेटरी रूरल डेवलपमेंट इनि‍शि‍एटि‍व सोसायटी से दो महीने का कोर्स कि‍या। यह कोर्स नि‍शुल्‍क था। इसके बाद उन्‍होंने पंडाल और शेड का यूज करते हुए सब्‍जि‍यों की हाईटेक खेती शुरू की।

उन्‍होंने एक मोबाइल वैन तयार की जि‍ससे वह सब्‍जयों को नजदीकी दुकानों और बाजार तक पहुंचाते हैं। जब सब्‍जि‍यों का प्रोडक्‍शन ज्‍यादा हो जाता है तो वह अपनी वैन लेकर सरकारी दफ्तरों के बाहर पहुंच जाते हैं। यहां सरकारी कर्मचारी शाम को दफ्तर से लौटते हुए सस्‍ती सब्‍जि‍यां ले पाते हैं। इसके अलावा वह सब्‍जि‍यों और फलों की खेती करने वाले कि‍सानों को सलाह भी मुहैया कराते हैं।

आसपास के इलाकों के कई कि‍सान इनके खेतों को देखने के लि‍ए यहां आते हैं। उनकी सफलता को देखते हुए बैंक ऑफ बड़ौदा ने उन्‍हें 25 लाख का लोन भी दि‍या है ताकि वह अपने काम का वि‍स्‍तार कर सकें। रेड्डी से इस मेल आईडी पर संपर्क कर सकते हैं krreddy28@yahoo.com

युवा किसान का कमाल 550 रुपये किलो की दर से बेच रहा है अमरूद

अमरूद एक ऐसा फल है जो मात्र दो-तीन दिन तक ही ताज़ा रह सकता है। बासी होने पर खाना तो दूर उसे घर में रखना भी मुश्किल है। ऐसे फल को ऑनलाइन 550 रुपए किलो के हिसाब से बेचकर इंजीनियर से किसानी को अपनाने वाले नीरज ढांडा के बारे में भला कौन नहीं जानना चाहेगा जिन्होंने असंभव काम को संभव कर दिखाया। लेकिन इंजीनियर के करियर को अलविदा कर खेती-किसानी से कामयाबी की कहानी लिखना इतना आसान नहीं था।

नीरज ने इंजीनियरिंग के बाद नौकरी करके कुछ पैसा बचाया और जींद से 7 किलोमीटर आगे संगतपुरा में अपने 7 एकड़ खेतों में चेरी की खेती करने का मन बनाया। पहले प्रयास में असफल होने पर परिवार वालों ने उन्हें नौकरी ही करने की सलाह दी। लेकिन उनके मन में तो कुछ और ही चल रहा था। कुछ समय बाद नीरज ने इलाहाबाद के कायमगंज की नर्सरी से अमरूद के कुछ पौधे खरीदें और अपने खेतों में लगाए। अमरूद की काफी अच्छी फसल हुई।

मंडी में जब वह अपनी फसल लेकर पहुंचे तो सभी बिचौलिये एक हो गए और 7 रुपए किलो का दाम लगाया। नीरज भी अपनी जिद पर अड़ गए उन्होंने गांव की चौपालों और गांव से सटे शहर के चौराहों पर कुल मिलाकर 6 काउंटर बनाए और मंडी से दोगुने दामों में इन अमरूदों को बेचा। काफी थोक विक्रेता भी इन काउंटरों के जरिए नीरज के खेतों तक पहुंचे। अब नीरज को इस बात का अंदाजा हो गया था कि जल्दी खराब होने वाले फल यदि जल्दी नहीं बिके तो लाभ होना बहुत मुश्किल है।

उन्होंने अपने आगे के सफर के लिए छत्तीसगढ़ का रुख किया। वहां एक नर्सरी से थाईलैंड के जम्‍बो ग्‍वावा के कुछ पौधे खरीद कर लाए और उसे अपने खेतों में रोपा। डेढ़ किलो तक के अमरूदों की बंपर फसल का तोहफा नीरज को अपनी मेहनत के रूप में मिला। अपने ही खेतों के वेस्ट से बनी ऑर्गेनिक खाद के कारण अमरूदों में इलाहाबाद के अमरूद जैसी मिठास बनी रही। फिर नीरज ने अपनी कंपनी बनाई और हाईवे बेल्ट पर अमरूदों की ऑनलाइन डिलीवरी की शुरुआत की।

जम्‍बो अमरूद की खास बात यह है कि इनकी ताजगी 10 से 15 दिन तक बनी रहती है। नीरज ने अपनी वेबसाइट पर ऑर्डर देने से डिलीवरी मिलने तक ग्राहकों के लिए ट्रैकिंग की व्यवस्था भी की जिससे वह पता लगा सकते हैं कि अमरूद किस दिन बाग से टूटा और उन तक कब पहुंचा है। इंजीनियर किसान की हाईटैक किसानी के अंतर्गत 36 घंटे की डिलीवरी का टारगेट सेट किया गया है।

आजकल नीरज जिस समस्या से जूझ रहे हैं उसका हल भी उन्‍होंने निकाल लिया है। दरअसल मशहूर होने के कारण दूर-दूर से लोग उनके अमरूद के बाग देखने आ रहे हैं। कुछ किसान यह तकनीक सीखना भी चाहते हैं।

इसके लिए अब उन्होंने एक समय सारणी बनाकर मूल्‍य निर्धारित कर दिया है, जिसे लेकर वह यह तकनीक किसानों को सिखाएंगे। अब पर्यटन खेती के माध्यम से भी नीरज अपनी कमाई में इजाफा करेंगे। इतना ही नहीं भविष्य में नीरज ने ग्रीन टी, आर्गेनिक गुड और शक्‍कर भी ऑनलाइन बेचने की योजना पूरी कर ली है जिसे वह जल्द ही शुरू करने वाले हैं।

परंपरागत खेती छोड़ने से चमकी किसानों की किस्मत

12 साल पहले यहां के किसान कर्ज में डूबे हुए थे। परिवार परंपरागत खेती पर निर्भर था। जिससे गुजारा लायक ही आमदनी होती थी। मात्र 12 साल में सब्जी की खेती में एक ऐसी क्रांित आई कि किसानों की किस्मत चकम उठी। किसान मालामाल तो हुए ही साथ ही विदेशी भी उनके यहां नई तकनीक से रूबरू होने के लिए आने लगे।

बेबीकार्न, स्वीटकार्न ने आठ गांवों के किसानों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दी। अटेरना गांव के अवार्डी किसान कंवल सिंह चौहान, ताहर सिंह चौहान, सोनू चौहान, मनौली के अरुण चौहान, दिनेश चौहान ने बताया कि 12 साज पहले एक समस था जब खादर के किसान केवल गेहूं व धान पर निर्भर थे। परिवार का गुजारा मुश्किल से चलता था। किसानों के मन में कुछ अलग करने की लालसा हुई।

अटेरना गांव के कंवल सिंह चौहान ने सबसे पहले बेबीकार्न व स्वीटकार्न की खेती को शुरू किया। जब मंडी में भाव अच्छे मिलने लगे तो बाकी किसान भी आकर्षित हुए। आज आठ गांव के किसान पूरी तरह से सब्जी की खेती को बिजनेस के तौर पर कर रहे हैं। पोल हाउस में तैयार सब्जी व मशरूम आजादपुर मंडी में हाथों हाथ बिक रही है।

एक सोच ने बदल दी जिंदगी : अरुण चौहान

मनाैली के किसान ताहर सिंह चौहान ने कहा कि एक सोच ने उनकी जिदंगी बदल दी। पहले वे आढ़ती के सामने कर्ज के लिए हाथ जोड़ते थे। आज आढ़ती उनके पास खेत में ही फसल खरीदने पहुंच रहे हैं। स्वीटकार्न व बेबीकार्न ने किसान की अंधेरी जिदंगी में रोशनी पैदा कर दी है। यहां के किसान संपन्न हो गए हैं।

पहले एक ट्रैक्टर को खरीदना सपना होता था। आज हर दूसरे किसान के पास महंगी कार हैं। किसानों के पास मजदूरी करने के लिए बाहर से लेबर आ रही है। एक समय था जब पूरा परिवार खेत में काम करता और दो जून की रोटी भी मुश्किल से खा पाता था। सब्जी ने उनके गांव की तकदीर बदल दी है।

दो गुना आमदनी ले रहे हैं यहां के किसान

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किसान कंवल िसंह चौहान ने कहा कि धान व गेहूं की फसल से साल भर में किसान को 80 हजार रुपए की आमदनी होती है। किसान बेबीकाॅर्न, स्वीटकाॅर्न व मशरूम से साल में डेढ़ लाख से दो लाख रुपए तक प्रति एकड़ आमदनी ले रहे हैं। सब्जी की फसल में गेहूं व धान से कम खर्च आता है। यहां के आठ गांवों के अधिक्तर किसान जैविक खाद का प्रयोग कर रहे हैं। जिससे यूरिया की लागत कम हो रही है।

बेबीकाॅर्न को देखने आते हैं विदेशी डेलीगेट्स

दिल्ली पुसा संस्थान में जो भी वेज्ञानिक रिसर्च करने के लिए आते हैं, वे फील्ड वीजिट के लिए इन गांवों का दौरा करते हैं। गत दिनों भेटान, जापान, पाकिस्तान, कोरिया, चीन के किसानों का प्रतिनिधि मंडल अटेरना गांव में पहुंचा था। उन्होंने यहां की खेती की नई तकनीक को अपने देश में भी शुरू करने का विचार रखा था। यहां तक कि अटेरना के किसानों को निमंत्रण भी दिया था कि वे उनके देश के किसानों को भी नई तकनीक से अवगत कराए।

पॉली हाउस में उगाते हैं सब्जी

पॉली हाउस की सब्जी की फसल पूरी तरह से प्रदूषण, खरपतवार तथा कीट पतंगों से दूर रहती है। शिमला मिर्च, खीरा, टमाटर, स्ट्राब्रेरी, घीया जैसी फसल पॉली हाउस के अंदर तैयार हो रही हैं। छोटे से गांव में तैयार होने वाली स्वीटकाॅर्न, बेबीकाॅर्न देश व विदेश में काफी डिमांड हैं।

अमरुद और निम्बू की खेती से बदली किस्मत

तराना के एक किसान ने परम्परागत फसलों से आगे बढ़ बागवानी फसलों को अपनाकर खेती में एक सफल उदहारण प्रस्तुत किया है. उन्होंने अमरुद और निम्बू की फसल में पसीना बहाया और उनकी मेहनत रंग लायी और वे बागवानी फसलों से सालाना करीब 5 लाख रूपये कमा रहे है. उनकी इस मेहनत को सार्वजानिक रूप से भी सम्मानित किया जाएगा.

खंडाखेड़ी निवासी हरिशंकर देवड़ा ने सरकार की फल क्षेत्र विस्तार योजना के अंतर्गत उद्यानिकी विभाग से अमरुद और निम्बू के पौधे प्राप्त कर बगीचा लगाया था. उनकी कड़ी मेहनत से मात्र 10 वर्षों में 6 बीघा जमीन से कुल 250 कुंतल अमरुद और 150 कुंतल नीम्बू की बम्पर उपज से उन्हें सालाना 5 लाख रूपये प्राप्त हो रहा है. हरिशंकर देवड़ा को आत्मा योजना के अंतर्गत 26 जनवरी को श्रेष्ठ उद्यानिकी कृषक का पुरूस्कार राशि 10 हजार रूपये कलेक्टर द्वारा दी जाएगी.

हरिशंकर ने बताया पहले परम्परागत खेती में उन्हें सीमित मुनाफा प्राप्त होता था. उस आय से परिवार का भरण पोषण और बच्चों को शिक्षा दिलाने में काफी कठिनाई होती थी. उद्यनिकि विभाग की सलाह से उन्होंने फलोद्यान लगाया और तब उन्हें बिलकुल भी उम्मीद नहीं थी कि उद्द्यानिकी फसल से वो अपनी आय को इतना बढ़ा सकतें हैं.

देवड़ा के पास कुल 11 बीघा जमीन है जिनमें वो 4 बीघा में अमरुद और 2 बीघा में निम्बू की फसल व बाकी जमीन पर पारम्परिक फसलों को उगाते हैं. लेकिन उद्यानिकी फसल को उगाने के बाद प्राप्त फायदे को देखकर वो उद्यानिकी फसलों का रकबा बढ़ने की सोच रहे हैं.

हरिशंकर देवड़ा की बहु संगीता महिलाओं के लिए मिसाल बनी हुई है. संगीता ने कठोर परिश्रम से घर में पशुपालन के माध्यम से दूध का व्यवसाय शुरू किया है. उनके यहाँ 7 भैंसे और 2 गाय है जिनसे उन्हें सुबह और शाम 25-25 लीटर दूध प्राप्त होता है. इसके अलावा गोबर से बनी हुई प्राक्रतिक खाद का उपयोग खेतों में किया जाता है. संगीता ने दूध का व्यवसाय शुरू किया जिसके कारण वो भी आत्मनिर्भर हो गई है.

फैशन डिजाइनिंग छोड़कर इस लड़की ने शुरू किया बकरी पालन

हर कोई पढ़ लिखकर अच्छी नौकरी करना चाहता है, कभी आपने ये सुना है कि पढ़ाई करने के बाद किसी ने बकरी पालन करना चुना हो। पशुपालन व खेती से तो हमारे युवा वैसे भी दूर भागते हैं ऐसे में ये बात तो मजाक ही लगेगी। लेकिन ऐसा हुआ है और समाज में इस बदलाव की कहानी को लिखा है श्वेता तोमर ने। श्वेता ने किसी छोटे नहीं बल्कि निफ्ट (NIIFT) जैसे देश के सर्वश्रेष्ठ फैशन डिजाइनिंग इंस्टीट्यूट से पढ़ाई की है और अब वह उत्तराखंड के अपने गांव में बकरीपालन कर रही हैं।

श्वेता का सफर 2015से शुरू होता है जब वो शादी करके अपने पति के साथ बैंग्लोर शिफ्ट हुईं। वो पहले से एक सफल फैशन डिजाइनर थीं। बैंग्लोर आने के बाद वो घर पर खाली नहीं बैठना चाहती थीं बल्कि खुद का कोई काम शुरू करना चाहती थीं।

एक दिन श्वेता अपने पति के साथ एक बकरी का फार्म देखने गईं। वहां उन्होंने कुछ समय बिताया और उन्हें बहुत अच्छा लगा। वो खाली समय में अक्सर वहां जाने लगीं, धीरे धीरे उन्होंने फार्म में बकरी पालन की सारे नियम समझ लिए। श्वेता ने भी बकरीपालन करने का मन बना लिया था।

एक गाँव में जन्मी और पली बढ़ी श्वेता को अच्छी तरह से पता था कि वो अपने इस शौक को इस शहर में नहीं पूरा कर सकती हैं और इसलिए उन्होंने बैंग्लोर शहर की अपनी अच्छी खासी लाइफस्टाइल छोड़कर उत्तराखंड के देहरादून के पास रानीपोखरी जैसे छोटे से गाँव में जाने का फैसला किया।

उन्होंने अपने पति रॉबिन स्मिथ से जब ये बात बताई तो उन्होंने खुशी-खुशी श्वेता को ये काम करने के लिए स्वीकृति दे दी। श्वेता ने बकरी पालन शुरू करने के लिए अपनी सारी जमा पूंजी उसमें लगा दी। यहां तक बिजनेस को अच्छे स्तर तक पहुंचाने के लिए बैंक से लोन भी लिया।

श्वेता बताती हैं, उनके नजदीकी लोग उनके इस फैसले से हैरान थे। मेरी पढ़ाई और डिग्री को देखकर हर कोई सोचता था कि मुझे किसी बड़ी कंपनी में जॉब करनी चाहिए और अच्छे पैसे कमाने चाहिए। मेरा सबकुछ छोड़कर बकरी पालन करने का ये फैसला बिल्कुल गलत है और गाँव में कुछ नहीं रखा है करने को।

हर नस्ल की बकरियां हैं फार्म में

श्वेता ने अपना बिजनेस जिस जगह शुरू किया था वहां बहुत से जंगली जानवरों के आने का खतरा भी रहता था जो कभी भी बकरियों पर हमला कर सकते थे। लेकिन फिर भी श्वेता ने हार नहीं मानी और बैंक से लोन लेकर 250 बकरियों से बिजनेस शुरू कर दिया। इस समय श्वेता के फार्म में अलग अलग प्रजातियों की सौ से ज्यादा बकरियां पली हैं। इनमें सिरोही, बरबरी, जमना पारी और तोता पारी ब्रीड के पांच हजार से लेकर एक लाख तक के बकरे मौजूद हैं।

श्वेता बकरीपालन में पूरी तरह पारंगत हो चुकी हैं। बकरियों का दूध निकालने से लेकर उनकी देखभाल और छोटा-मोटा इलाज सब वो खुद ही करती हैं। जरूरत पड़ने पर वह खुद ही बकरों को बिक्री के लिए लोडर में लादकर मंडी ले जाती हैं। श्वेता के फार्म पर बकरियों की बिक्री इंटरनेट के माध्यम से भी होती है।

श्वेता बताती हैं शुरुआत में सरकारी स्तर पर छोटी-मोटी कई दिक्कतें आईं पर पशुपालन विभाग का उन्हें सहयोग समय-समय पर मिलता रहा। पिछले साल श्वेता का टर्नओवर 25 लाख रुपये का था। श्वेता अब अपना व्यवसाय शुरू करने के बाद दूसरों को प्रोत्साहित करने के लिए प्रशिक्षण भी देती हैं।

इस तरीके से टमाटर की खेती कर लखपति बन गया किसान, ये है तरीका

ईमानदारी से की गई मेहनत कभी बेकार नहीं जाती, अगर सही मार्गदर्शन में, सही दिशा में, पूरी लगन के साथ कोई काम किया जाए तो सफलता जरूर मिलती है। कुछ ऐसी ही सफलता की कहानी है पवन मिश्रा की, जिन्होंने अपनी कड़ी मेहनत के दम पर सफलता हासिल की है, और टमामटर की खेती से लखपति बन गए हैं।

 

उमरिया जिले के पाली विकास खंड के अंतर्गत ग्राम पंचायत घुनघुटी के रहने वाले पवन मिश्रा ने टमाटर की खेती करने की ठानी, और उसके लिए प्रयास करना शुरू किया। आलम ये रहा कि प्रयास सफल रहा और आज किसान पवन मिश्रा को वही टमाटर की खेती ने लखपति बना दिया है।

घुनघुटी के किसान पवन मिश्रा टमाटर की खेती कर आज लाखों रुपए हासिल कर रहे हैं, टमाटर की उन्नति खेती से किसान की आर्थिक स्थिति भी मजबूत हुई है, साथ ही जब सफलता मिल रही है तो अब सब्जी की खेती के प्रति उनका इंट्रेस्ट और बढ़ गया है। और अब सब्जी की खेती में अलग-अलग एक्सपेरीमेंट भी कर रहे हैं।

किसान पवन मिश्रा ने बताया कि शुरुआत में उन्होंने 1 एकड़ में टमाटर की खेती की थी। इसके बाद धीरे-धीरे क्षेत्रफल बढ़ता गया और अब वो कई एकड़ में टमाटर की खेती कर रहे हैं। पवन की मानें तो उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों से मिलने के बाद उन्हें सब्जियों की खेती के उन्नत तरीके के बारे में जानकारी मिली। और जब विस्तार से इसकी जानकारी उन्होंने हासिल कर ली तो अहसास हुआ कि ये तो कमाई का अच्छा जरिया बन सकता है, इस खेती को लाभ का धंधा भी बनाया जा सकता था।

फिर क्या था उन्होंने विशेषज्ञों के बताए अनुसार खेती शुरू कर दी, सफलता मिलती रही, धीरे-धीरे और एक्सपेरीमेंट करते रहे, खेती का दायरा और बढ़ाया, जिसके बाद अब टमाटर की खेती से लाखों की कमाई कर रहे हैं। पवन मिश्रा के मुताबिक उद्यानिकी से ड्रिप सिंचाई योजना, रोड नेट हाउस जैसी योजनाओं का लाभ लिया है और लगातार उद्यानिकी विभाग के बताए अनुसार सब्जी की खेती कर रहे हैं जिससे उन्हें सफलता हासिल हो रही है।

तीन दोस्तों ने बंजर जमीन पर शुरू की एलोविरा की खेती

‘सोच को अपनी ले जाओ उस शिखर पर, ताकि उसके आगे सितारे भी झुक जाएं’, इसे सही साबित किया है तीन दोस्‍तों ने। हिसार ऑटो मार्केट के तीन दोस्त संतलाल चित्रा, राजा सोनी और मुकेश सोनी अपनी सोच को वाकई उस शिखर तक ले गए और कामयाबी के सितारे आज उनके कदमों में हैं। उन्‍होंने बंजर भूमि पर खेती कर सालाना 60 लाख रुपये कमा रहे हैं।

एक शुभचिंतक की सलाह पर तीनों ने एलोवेरा की खेती करने की ठानी। दिक्कत यह थी कि उनके पास जौ भर जमीन नहीं थी। लीज पर जमीन लेने का फैसला किया। बहुत मुश्किल से एक किसान ने अपनी दो एकड़ अनुपयोगी पड़ी जमीन दी। तीनों ने उसे अपने श्रम के पसीने से सींचा। आज 62 एकड़ जमीन लीज पर लेकर खुशहाली की फसल काट रहे हैं। रोहतक में आयोजित एग्री लीडरशिप समिट में पहुंचे ये तीनों किसान युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं।

तीनों दोस्तों में एक संतलाल चित्रा मोटर मैकेनिक थे। बाकी दो राजा और मुकेश टायर बेचते थे। तीनों के परिवार का बामुश्किल गुजर बसर होता था। एक दिन राजस्थान के चुरू के रहने वाले आबिद हसन अपनी गाड़ी ठीक कराने संतलाल के पास पहुंचे। संतलाल ने आबिद की गाड़ी ठीक कर दी तो आबिद की सलाह ने संतलाल और उनके दोनों दोस्तों की जिंदगी की गाड़ी पटरी पर ला दी।

आबिद ने तीनों को एलोवेरा की खेती के लिए प्रोत्साहित किया। तीनों दोस्तों ने आबिद की सलाह मान ली। पांच साल पहले 2013 में पहले हिसार के चौधरीवास गांव में दो एकड़ बंजर जमीन लीज पर लेकर एलोवेरा की खेती शुरू की। पहले ही साल इन्हें एक लाख रुपये का मुनाफा हुआ। अब ये गांव चौधरीवास में 40 एकड़ और बगला गांव में 22 एकड़ में एलोवेरा की खेती कर रहे हैं। प्रतिवर्ष तीनों को 60 लाख रुपये का मुनाफा होता है।

आबिद खुद करते हैं एलोवेरा की खेती

चुरू में करीब 200 एकड़ जमीन पर एलोवेरा की खेती करने वाले आबिद हसन तीनों को सलाह ही नहीं दी, मार्केट भी उपलब्ध कराया। खुद आबिद पिछले दस साल में एलोवेरा की खेती करके अब बड़े निर्यातक बन गए हैं।

संतलाल, राजा और मुकेश बताते हैं कि एलोवेरा की खेती ने हमें संपन्न बना दिया है। अब हमारा लक्ष्य है कि हम भी खेती से मुंह मोड़ चुके युवाओं को एलोवेरा की खेती के लिए प्रेरित करें। इस समय हमसे दस युवा एलोवेरा की खेती करना सीख रहे हैं। हम चाहते हैं कि सौ युवाओं को इसकी खेती से जोड़ें।

सरकारी नौकरी में नहीं लगा मन तो शुरू किया ये काम

आज के दौर में युवाओं को खेतों में काम करना अच्छा नहीं लगता और हर कोई नौकरी करना चाहता है। वहीं कुछ शख्स ऐसे भी हैं जो नौकरी छोड़ खेती की ओर लौट रहे हैं या इससे जुड़ा बिजनेस शुरू कर रहे हैं।

गुजरात के जूनागढ़ के रहने वाले ऐसे ही एक शख्स हैं तुलसीदास लुनागरिया जिन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ अपना खुद का बिजनेस शुरू किया और सिर्फ 6 साल में वो करोड़पति बन गए। इतना ही इस शख्स ने एक नहीं बल्कि चार बिजनेस की शुरुआत की। आइए जानते हैं इस शख्स ने कैसे की शुरुआत…

नौकरी छोड़कर शुरू किया बिजनेस

तुलसीदास लुनागरिया ने बातचीत में बताया कि जूनागढ़ के कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर से एग्रीकल्चरल साइंस में ग्रैजुएशन करने के बाद उन्होंने नौकरी की तैयारी की। इसके बाद उन्हें ग्रामीण बैंक में नौकरी लगी, जो सरकारी नौकरी थी।

उनका कहना है कि नौकरी के दौरान उनको काम में मन नहीं लगा। उन्हें महसूस हुआ कि वो बिना महत्वाकांक्षा और चुनौती के एक रूटिव वर्क कर रहे हैं। वो खुद के एग्रीवेंचर की शुरुआत करने का सपना देखने लगे। इसलिए 4 महीने बाद ही उन्होंने नौकरी छोड़ दी और अपना खुद का बिजनेस शुरू किया।

एक-दो नहीं 4 बिजनेस किया शुरू

नौकरी छोड़ने के बाद तुलसीदास को एग्री सेंटर एंड एग्री बिजनेस स्कीम के बारे में पता चला। उन्होंने एसीएंडएबीसी के दो महीने के कोर्स में दाखिला लिया और अहमदाबाद में इंटरनेशनल स्कूल ऑफ पब्लिक लीडरशिप (आईएसपीएल) से ट्रेनिंग ली। ट्रेनिंग के दौरान उन्होंने मार्केटिंग, अकाउंटिंग और डीपीआर बनाना सीखा। इस दौरान उन्होंने एग्री बिजनेस से एक्सपर्ट्स से मिलने-सुनने का मौका मिला।

ट्रेनिंग खत्म होने के बाद उन्होंने चार बिजनेस की शुरुआत की। कितना है कंपनियों का टर्नओवर कॉटन सीड्स ऑयल एक्सप्लोरेशन और कॉटन सीड्स केक बनाने वाली कंपनी अविरत कॉटन इंडस्ट्रीज का सालाना टर्नओवर 60 करोड़ रुपए है। एडवेंता एक्सपोट प्राइवेट लिमिटेड वाटर सॉल्यूएबल फर्टिलाइजर, प्लांट ग्रोथ प्रोमोटर औऱ स्वाइल कंडिशनर जैसे पोटैसियम ह्यूमेट, फूलविक एसिड्स का देश भर में सप्लाई करती है। साथ ही एग्रो कमोडिटीज जैसे रॉ कॉटन बेल्स, मसाले, फल और सब्जी का एक्सपोर्ट करती है।

कंपनी का सालाना टर्नओवर 2 करोड़ रुपए है। इसके अलावा रेनो एग्री-जेनेटिक्स प्राइवेट लिमिटेड का टर्नओवर 5 करोड़ और विमैक्स कॉर्प साइंस लिमिटेड का टर्नओवर 28 करोड़ रुपए है। चार कंपनियों का कुल टर्नओवर 95 करोड़ रुपए है। आगे भी पढ़ें

8 राज्यों में फैला है बिजनेस

तुलसीदास का कहना है कि उनका बिजनेस देश के 8 राज्यों में फैला है। यूपी, बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में उनके ग्राहक हैं। विमैक्स कॉर्प साइंस एग्रोकेमिलकल्स की मैन्युफैक्चरिंग और मार्केटिंग करती है।

एग्रो केमिकल्स में इंसेक्टिसाइड्स, फंगीसाइड्स, विडीसाइड्स, प्लांट ग्रोथ रेगुलेटर्स और माइक्रो नूट्रीएंट्स के साथ ऑर्गेनिक पेस्टिसाइट्स बनाती है। 120 लोगों को दे रखा है रोजगार कमाई के साथ वो लोगों को रोजगार भी उपलब्ध करा रहे हैं। उनकी कंपनी में 120 कर्मचारी काम करते हैं। उन्होंने हरके साल एक लाख किसानों तक पहुंच बनाने का लक्ष्य बनाया है जिसके लिए वो प्रयासरत हैं।

5 करोड़ रु है सालाना इनकम

तुलसीदास बताते हैं कि चारों बिजनेस से उनको अच्छी कमाई हो जाती है। वो करीब 5 करोड़ रुपए सालाना इनकम कर लेते हैं। प्रोडक्ट खरीदने वाले किसानों को वो खेती के बारे में ज्ञान भी देते हैं। कब उस फसल को पानी देना है, कब नूट्रीएंट्स देने हैं और पेस्टिसाइड्स का छिड़काव करना है। वो कहते हैं कि उनके इस सर्विस से किसान खुश हैं।