किसान का कमाल : 3 बीघा जमीन में की 45 लाख की फसल की पैदावार

बेशक मध्यप्रदेश में किसानों की माली हालत दयनीय है और सरकारों से फसल के सही दाम मिलने की मांगे लगातार की जा रही है। लेकिन, शिवपुरी जिला के छोटे से गांव अगरा के किसान ने वो कारनामा किया है जिससे उसके चर्चे हर जुबान पर हैं।

दरअसल यहां एक किसान ने आम खेती से हटकर कुछ खास करते हुए तीन बीघा जमीन से 70 किलो केसर का उत्पादन किया है। ज्ञात रहे कि वर्तमान समय में बाजार में एक किलो केसर की कीमत लगभग 65 हजार रुपए है। इस कीमत से 70 किलो केसर की कीमत 45 लाख रुपए के करीब आंकी जा रही है।

ग्रेजुएट किसान ने किया कमाल

किसान का नाम सुरेश आदिवासी है। सुरेश ने कोलारस विधानसभा के छोटे से गांव अगरा में रह कर खेती करते हुए ये कमाल कर दिखाया है। सुरेश ने मतस्य पालन से ग्रेजुएशन किया है और इसके बाद उन्होंने कुछ न करते हुए खेती करना फायदेमद समझा,

जिसके बलबूते पर आज वे खास किसान होते हुए चर्चा का विषय बन गए हैं। गांव में रहकर खेती को फायदे का धंधा बनाने वाले सुरेश आज बहुत खुश है। इतना ही नहीं वे अन्य किसानों को खेती की इस तकनीक को अपनाने की सलाह भी देते हैं।

70 साल के किसान ने 3 साल तक तोड़ा पहाड़ और बना डाली नहर, गांव में पानी लाने की ठानी थी

ओडिशा में एक किसान ने अपनी मेहनत से गांव के सैकड़ों लोगों की मुश्किलें दूर कर दीं। 70 साल के दैत्री नायक ने तीन साल कड़ी मेहनत करके गांव में एक किलोमीटर लंबी नहर खोद डाली। वो भी तब जबकि ये इलाका बहुत ही पथरीला था। लिहाजा, पानी की कमी से जूझ रहे गांव के लोगों को नहर बनने के बाद रोजमर्रा के काम और खेती के लिए भरपूर पानी मिल सकेगा।

  • मामला केन्दुझर जिले का है। यहां बांसपाल, तेलकोई और हरिचंदपुर ब्लॉक में सिंचाई के लिए कोई इंतजाम नहीं था। खेती के लिए लोगों को बारिश के पानी पर ही निर्भर रहना पड़ता था। वहीं, रोजमर्रा के काम के लिए भी वो लोग तलाब के गंदे पानी का इस्तेमाल कर रहे थे।

  • प्रशासन ने इस पहाड़ी इलाके में पानी के लिए कोई इंतजाम नहीं कराया था। ऐसे में बैतरणी गांव के दैत्री नायक ने यहां पानी लाने की ठानी। दैत्री ने बताया, ”मैंने अपने परिवार के साथ नहर बनाने का काम शुरू किया। पानी के इंतजाम के लिए मैंने तीन साल तक पहाड़ों को तोड़ा और खुदाई की। मेरे परिवार वालों ने पत्थर हटाने में मेरी मदद की। नहर खुदने के बाद पिछले महीने गांव में पानी लाया जा सका है।”

अब नींद से जागा प्रशासन

केन्दुझर डिवीजन में माइनर इरिगेशन के इंजीनियर सुधाकर बेहरा ने बताया, ”हमें रिपोर्ट्स मिली हैं कि एक शख्स ने कर्नाटक नाला से पानी लाने के लिए नहर खोदी है, ताकि खेती में सुविधा हो सके। हम उस गांव का दौरा करेंगे और वहां सिंचाई की व्यवस्था के लिए जरूरी कदम उठाएंगे।”

इजरायल की तकनीक से खेती करेंगे यूपी के किसान

प्रदेश में उम्दा किस्म की फल और सब्जियां उगाने के लिए दो सेंटर ऑफ एक्सिलेंस इसी साल जुलाई से शुरू हो जाएंगे। इजरायल के तकनीकी सहयोग से फलों का सेंटर बस्ती में और सब्जियों का कन्नौज में शुरू होने जा रहा है। यहां किसानों को उन्नत किस्म की पौध तैयार करके दी जाएंगी। साथ ही किसानों को सब्जियों और फलों के रख-रखाव की सलाह और प्रशिक्षण भी दिया जाएगा।

भारत में फलों और सब्जियों का उत्पादन तो खूब होता है,लेकिन क्वॉलिटी को लेकर किसान ज्यादा जागरूक नहीं हैं। वे खुद बीज बोते हैं, पौध बनाते हैं। पौध कितनी दूरी पर लगाई जाए, कौन से कीटनाशक डाले जाएं और कैसे तोड़ाई की जाए, इस बारे में भी सभी किसानों को पर्याप्त जानकारी नहीं होती।

विशेषज्ञों का मानना है कि बीज से पौध बनाने के स्तर पर ही इतनी चूक हो जाती है कि अच्छी क्वॉलिटी के पौधे ही तैयार नहीं हो पाते। इन बातों को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने इजरायल सरकार के सहयोग से देशभर में फल और सब्जियों के सेंटर ऑफ एक्सिलेंस बनाने का प्रॉजेक्ट शुरू किया था। इसमें यूपी को दो सेंटर ऑफ एक्सिलेंस मिले।

केंद्र और प्रदेश सरकार दे रही आर्थिक सहयोग

उद्यान विभाग के निदेशक आरपी सिंह बताते हैं कि यूपी में दो सेंटर ऑफ एक्सिलेंस बनकर तैयार हो चुके हैं। बस्ती में फलों का सेंटर करीब 7.4 करोड़ रुपये की लागत से बन रहा है। कन्नौज में सब्जियों का सेंटर 7.6 करोड़ की लागत से तैयार हुआ है।

ये दोनों इस साल जुलाई से शुरू हो जाएंगे। इजरायल की तकनीक आधारित खेती का लाभ लेने के लिए यह योजना शुरू की गई है। इनमें केंद्र और राज्य सरकारें आर्थिक मदद कर रही हैं।

किसान बीज लाएंगे, सेंटर पौध तैयार करके देगा

आरपी सिंह ने बताया कि यहां पर किसानों को सर्विस और प्रशिक्षण दोनों मिलेगा। किसान अपना बीज लेकर यहां संपर्क करेंगे। उससे सेंटर पर पौध तैयार कर किसानों को दी जाएंगी। यह सुविधा नि:शुल्क होगी। इसके अलावा फल और सब्जियों को रोग से बचाव, कीटनाशकों के छिड़काव और अन्य जरूरी सलाह भी किसानों को यहां मिलेगी।

इस किसान की सब्जियां जाती हैं विदेश, सैकड़ों महिलाओं को दे रखा है रोजगार

खेती जिसमें एक किसान और उसके उपभोक्ता बीच अगर हजारों किलोमीटर का लंबा फासला हो, तो ज़ाहिर है इस फासले को पाटने का जज्बा हर किसी के बूते की बात नहीं होगी। यह तो 64 साल के करण वीर सिंह सिद्ध की हिम्मत, संकल्प और उनके पिता के सच्चे किसान का डीएनए ही था जिसकी वजह से वो इस जोखिम भरे माहौल यानी खेती के धंधे में कूद गए।

छोटी आयु में ही सिद्ध के सर से उनके पिता का साया उठ गया। सिद्ध के पिता मानसा जिले में किसान थे। उनके गुजर जाने के बाद, वो और उनकी मां पटियाला चली आईं। सन 1979 में वो राज्य में एक्साइज एंड टैक्सेसन ऑफिसर बन गए लेकिन वो खेती में कुछ रोमांचक करना चाहते थे।

कई सेमिनार और वर्कशॉप में जाने के बाद उन्हें समझ में आया कि विदेशी सब्जियों का बड़ा बाजार ना केवल भारत में है बल्कि विदेशों में भी है। सिद्ध बताते हैं, “खेती मेरे खून में था और मैं कुछ अलग करना चाह रहा था। मैं तीन दोस्तों और दूसरे साझेदारों के साथ मिलकर हमारी कंपनी, पटियाला हॉर्टिकल्चर के लिए शुरुआती पूंजी लगाई।

साल 1996 में मैंने नौकरी से पांच सालों का अध्ययन प्रोत्साहन अवकाश लिया और एक डच कंपनी के लिए तलवंडी साबू में सेम के फली की खेती शुरू कर दी।” पहले ही साल उन्हें बड़ा झटका लगा जब पंजाब सरकार के पैक हाउस ने उस वक्त काम करना बंद कर दिया जब 60 एकड़ में तैयार फसल को निर्यात करने से पहले संरक्षित किया जाना था।

“हमे 15 लाख का सामूहिक नुकसान पहुंचा, यद्यपि हमने सारा बकाया चुका दिया, जिसमे खेत का किराया और तीन गांवों के 40 किसानों पर हुआ लागत खर्च जो हमारे कार्य में जुड़े थे,शामिल था’, उसके बाद हम आगे बढ़ गए’।

बड़े ही शांत तरीके से आपबीती बताने का उनका लहजा आपको ये स्पष्ट कर देता है कि कितने शांत भाव से उन्होंने उन विपरीत परिस्थितियों का सामना किया होगा। बाद में वो अपने इस विचार को तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल को समझाने में सफल रहे और 59 लाख रुपये का सॉफ्ट लोन या सुलभ कर्ज भी पाने में सफल हो गए।

इस लोन का उपयोग पटियाला जिले के समाना तहसील के लालगढ़ गांव में पैक हाउस जैसी आधारभूत सुविधाएं तैयार करना था। उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। देश के 180 सबसे अच्छे पैक हाउस में से यह एक है। सिद्ध बताते हैं, “साल 2001 से साल दर साल यूरोप और ऑस्ट्रेलिया को सब्जियां निर्यात कर मैंने अच्छी कमाई की है।

साल 2015 को छोड़कर, जब केंद्र ने नियम में बदलाव किया था,तब हमने एक साल का ब्रेक लेने का फैसला किया था ताकि तब तक परिस्थितियां हमारे अनुकूल हो जाए।” सामना, अमलोह और भादसों के 35 किलोमीटर के दायरे में 40 छोटे किसानों ने जिन्होंने हमें संयुक्त पूल के लिए एक से डेढ़ एकड़ जमीन दी वो सभी किसान सिद्ध जितना ही कमाते हैं।

सुगर स्नैप्स और स्नो पी के उत्पादन से सिद्ध की सालाना बिक्री सवा करोड़ से तीन करोड़ के बीच है। साल 2015 में बदले हुए क्वारेंटाइन नॉर्म्स की वजह से सालाना बिक्री घटकर महज 11 लाख रह गई। यहां तक कि उन्हें काफी सारे उत्पादों को छोड़ना भी पड़ा।

जिंदगी में खुशियां भरनेवाली प्याज

सिद्ध अपने प्याज के बारे में अच्छी तरह से जानते हैं। पिछले दो साल से उन्होंने 50 एकड़ में प्याज की खेती शुरू की है, जो कि राज्य में इस फसल की सबसे बड़ी खेती है। वो बताते हैं, “पंजाब सालाना साढ़े सात लाख टन प्याज की खपत करता है और उत्पादन महज डेढ़ टन ही करता है।

मेरा लक्ष्य किसानों को प्रति एकड़ 50,000 रुपये शुद्ध मुनाफा दिलवाना है, यह एक बड़ी चुनौती है लेकिन मैंने इसे स्वीकर किया है”। सरकार से प्राप्त सब्सिडी की मदद से उन्होंने 50 में से 20 एकड़ क्षेत्र में ड्रिप सिंचाई व्यवस्था लगवा दी है।उनके लिए प्याज की तीन ऋतुएं हैं।

“सबसे अच्छा रबी है, जिसमे मध्य दिसंबर में पौधारोपण होता है और अप्रैल में कटाई। खरीफ फसल में बुआई जुलाई-अगस्त में होती है और कटाई नवंबर महीने में और विलंबित खरीफ फसल का मौसम सितंबर-अक्टूबर में शुरू होता है। विलंबित खरीफ फसल के सामने कई खतरे होते हैं लेकिन हम लोग तीन सीजन पर प्रयोग कर रहे हैं।”

सिद्ध की कंपनी विस्टा फूड के साथ मैकडोनल्ड्स (हैमबर्गर फास्ट फूड रेस्टोरेंट की दुनिया में सबसे बड़ी श्रृंखला) के साथ प्याज की आपूर्ति की बात कर रही है। इसके लिए उन्होंने एकीकृत हाइब्रिड किस्म विकसित की है। अगर करार पर बात बन जाती है तो उन्हें उम्मीद है कि 25 रुपये प्रति किलोग्राम का मूल्य उन्हें मिलेगा।

लहसुन और ऐस्परैगस (एक प्रकार की साग) के साथ प्रयोग

चीन की एक कंपनी के लिए सिद्ध पहली बार पांच एकड़ जमीन में लहसुन की खेती कर रहे हैं, जिसे अमेरिका में बेचा जाएगा। अगर प्रयोग सफल रहा तो वो अमेरिकन कंपनी से सीधा संपर्क करेंगे। एक एकड़ क्षेत्र में वो ऐस्परैगस (एक प्रकार की साग) को उगाने को लेकर भी प्रयोग कर रहे हैं।

फसल तीन साल में पूरी तरह तैयार हो जाएगी, उसके बाद उन्हें उम्मीद है कि उन्हें प्रति किलोग्राम 300 रुपये मिलेंगे और प्रति एकड़ तीन लाख का मुनाफा होगा। यह फसल अगले 20 साल तक उन्हें फल देता रहेगा।

उद्यमी या व्यवसायी गांव के गरीब परिवार के करीब 100 भूमिहीन महिलाओं को मजदूरी पर रखते हैं और उन्हें प्रतिदिन डेढ़ सौ रुपये देते हैं। अधिकांश मामले में एक परिवार की सभी महिलाएं काम पर आती हैं और मिलकर प्रति महीने करीब 20,000 रुपये तक कमा लेती हैं।

नौकरी में घाटा, लेकिन कोई मलाल नहीं

कृषि में सिद्ध की सफलता सरकारी नौकरी में विकास नहीं होने की कीमत देकर चुकानी पड़ी है। वो बताते हैं, ” मैंने सात बार वेतनमान में इजाफा और एक प्रमोशन खो दिया। मेरे जूनियर मुझसे आगे निकल गए। अगर मैं लगातार काम कर रहा होता तो मैं ज्वाइंट कमिश्नर के पद से रिटायर होता।”

उन्होंने यह भी जोड़ा कि, “अगर मैं नौकरी नहीं कर रहा होता तो खेती में और भी अच्छा करता। लेकिन ये भी सच है कि मैंने ईटीओ की नौकरी से कई संपर्क हासिल किया”। किसानों की पटियाला हॉर्टिकल्चर कंपनी तापमान नियंत्रित सब्जियों की खुदरा दुकान खोलने की योजना बना रहा है, जिसकी शुरुआत अप्रैल में पटियाला से दो दुकानों से होने जा रही है।

दो साल में 15 करोड़ के निवेश के साथ फूड पार्क के लिए उन्होंने पंजाब सरकार के साथ एक करार पर हस्ताक्षर किया है। वो बताते हैं, “सब्जी पैदा करनेवाले हमारी पहल या प्रस्ताव की प्रतीक्षा कर रहे हैं।’

कभी ईंट ढोकर चलाते थे घर, अब सालाना कमा रहे 5 लाख रु., इनके संघर्ष पर इंग्लैंड में लिखी जा रही किताब

यह कहानी बिहार के एक किसान मो. इरफान की है। इनके पास पांच एकड़ जमीन थी लेकिन वह उपजाऊ नहीं थी। घर चलाने के लिए ईंट-भट्‌ठा पर मजदूरी करते थे। गाय पालकर व दूध बेचकर किसी तरह परिवार चलाते थे। 2004 में गांव में कुछ वैज्ञानिक आए।

उनसे मो. इरफान ने वर्मी कंपोस्ट बनाने के बारे में जानकर इसपर काम शुरू कर दिया। पहले ही साल उन्होंने 2 लाख रु. कमाए। इसके बाद उन्होंने 5 एकड़ जमीन खरीदी और ऑर्गेनिक खेती शुरू कर दी। अब इरफान सालाना पांच लाख रु. कमा रहे हैं।

इरफान पर बनी फिल्म देख इंग्लैंड से चले आए वैज्ञानिक

अब दूसरे किसानों को जागरूक करने के लिए कृषि विभाग ने इरफान पर शार्ट फिल्म बनाई। इस फिल्म को देखकर इंग्लैंड से वैज्ञानिकों की टीम इनकी खेती का तरीका देखने इनके गांव आ पहुंची। वर्मी कंपोस्ट प्लांट का विजिट किया। अब ये टीम इनकी सफलता की कहानी किताबों के पन्नों पर उतार रही है।

सफलता से हौसला बढ़ा, केले व मक्के की भी शुरू की खेती

मो. इरफान ने बताया, आमदनी नहीं होने के कारण अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा नहीं दे पा रहा था। 2004 में गांव में कुछ वैज्ञानिक आए तो उनसे वर्मी कंपोस्ट बनाना सीखा।

पूरी मेहनत के साथ वर्मी कंपोस्ट बनाना शुरू किया। सफलता मिलने लगी तो हौसला बढ़ा और केले व मक्के की खेती भी शुरू की। आज मेरे बच्चे कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ रहे हैं। पैसे जमा कर पांच एकड़ जमीन खरीदी और ऑर्गेनिक खेती करनी शुरू कर दी। अब तो गांव के कई किसान भी यह खेती शुरू कर चुके हैं।

जैविक खाद बनाने के साथ ही केंचुआ की भी कर रहे मार्केटिंग

  • माे. इरफान वर्मी कंपोस्ट प्लांट लगाने के साथ ही केंचुए की भी मार्केटिंग कर रहे हैं। सूबे के करीब 50 किसानों को केंचुआ मुहैया करा रहे हैं। 12 सदस्यों के समूह को ऑर्गेनिक खेती के लिए जागरूक किया है।
  • हर सदस्य 12 किसानों को यह टेक्निक सिखा रहे हैं। केंचुए से होने वाले फायदे बता रहे हैं। एक माह में 400 केजी तक केंचुआ बेचकर करीब 1 लाख तक कमा लेते हैं।

सिंगापुर से लौटकर शुरू किया बिजनेस, नए आइडिया से हो रही करोड़ों की कमाई

अखबार में एक खबर पढ़कर क्या कोई अपना 30 साल का सुनहरा कैरियर छोड़ सकता है। हां एक इंडियन ने ऐसा ही किया। इस शख्स ने सिंगापुर से भारत के सफर के दौरान एक खबर पढ़ने के बाद सिंगापुर के एक शख्स ने अपना 30 साल का सुनहरा करियर छोड़ दिया और भारत आकर 20 एकड़ के फार्म में डेयरी चलाने लगा।

इस शख्स का नाम है दीपक गुप्ता, जो पंजाब के नाभा में सफलता से हिमालय क्रीमी नाम से डेयरी फार्म चला रहे हैं, जो सालाना करोड़ों रुपए की कमाई कर रही है। इस डेयरी में कई खासियतें भी हैं।

चंडीगढ़ से की थी पढ़ाई

दीपक गुप्ता फिलहाल अपने इस नए कैरियर से काफी खुश हैं। दीपक ने 30 साल सिंगापुर में मल्‍टीनेशनल कंपनी में बिताए, लेकिन देश से जुड़ने की इच्‍छा हरदम बनी रही। उन्‍होंने अपनी पढ़ाई चंडीगढ़ के डीएवी कॉलेज से पूरी की थी और फिर कैरियर बनाने के लिए सिंगापुर चले गए। हालांकि उनके मन में हरदम से था कि एक हाईटेक डेयरी खोली जाए।

सिंगापुर से आते जाते मिला आइडिया

उन्‍होंने बताया कि बिना हाथ लगाए दूध की पैकिंग का आइडिया उन्‍हें सिंगापुर से भारत के सफर के दौरान मिला था। उन्‍होंने बताया कि वह अक्‍सर भारत में अखबारों में मिलावटी दूध के बारे में पढ़ते थे, तभी उनके मन में कुछ नया करने की बात आई।

नौकरी छोड़कर पूरा किया सपना

दीपक दो साल पहले सिंगापुर से लौटे और अपने सपने का पूरा करने में जुट गए। इन दो साल में उन्‍होंने मेहनत की और अब सपना पूरा हो गया है। उन्‍होंने पंजाब में नाभा में हिमालया क्रीमी के नाम से डेयरी की स्थापना की है। नाभा चंडीगढ़ से दो घंटे की ड्राइव पर है। उनके अनुसार उनका सपना भारत में ऐसी डेयरी स्‍थापित करना था, जो बिना हाथ लगाए दूध को पैक करे, जिससे उसकी शुद्धता बनी रहे।

विदेश का करियर छोड़ने का पछतावा नहीं

54 साल के दीपक को कहना है कि उनको अपने विदेश के शानदार कैरियर को छोड़ने का बिल्‍कुल भी पछतावा नहीं है। उन्‍होंने अपनी 20 एकड़ जमीन पर डेयरी तैयार की और जर्सी सहित अच्‍छी नस्‍ल की गायों को यहां पर पाला।

इस वक्‍त इनकी डेयरी में करीब 200 गाय हैं,‍ जिनका दूध मशीनों से निकाला जाता है। उनके अनुसार इस डेयरी में दूध को बिना हाथ लगाए पैक किया जाता है। इससे दूध की शुद्धता बनी रहती है।

प्‍योर दूध उपलब्‍ध कराना ध्‍येय

उनके अनुसार उनका सपना लोगों को प्‍योर दूध उपलब्‍ध कराना था। उनके अनुसार विदेश में बिना हाथ लगाए सामान को डेयरी पर पैक करने का सिस्‍टम आम है, लेकिन भारत में ऐसा नहीं होता है। उन्‍होंने ही यहां इसकी शुरुआत की।

विदेश का अनुभव काम आया

उन्‍होंने बताया कि विदेश में वह ऐसी मल्‍टीनेशनल कंपनी में काम करते थे जो एग्रीकल्‍चर के कारोबार से जुड़ी हुई थी। उनका इस कंपनी में काम करने का अनुभव काम आया। इसके बाद उन्‍होंने सीधे फार्म से पैक दूध लोगों को उपलब्‍ध कराने की योजना पर काम किया और सफलता पाई।

पौधों के लिए बनाता है ‘टॉनिक’, कमाता है 50 हजार रुपए महीना

जिस तरह इंसान को नूट्रीएंट्स की जरूरत होती है, उसी तरह से पौधों को भी बढ़ने के लिए कुछ नूट्रीएंट्स की जरूरत होती है। इन नूट्रीएंट्स के न मिल पाने से पौधों का विकास रूक जाता है। यदि ये नूट्रीएंट्स एक निश्चित समय तक न मिलें तो पौधा सूख जाता है।

किसानों के साथ खुद इस परेशानी का सामना करने वाले हरिदास कुंभर ने पौधों के लिए एक खास ‘टॉनिक’ तैयार करने की सोची और फिर कई सालों के रिसर्च के बाद प्लांट ग्रोथ रेग्युलेटर्स (PGR) बनाने में सफलता हासिल की। टॉनिक बेचकर आज वो अच्छी खासी कमाई कर रहे हैं।

कैसे मिला ‘टॉनिक’ बनाने का आइडिया

महाराष्ट्र के सांगली जिले के निवासी हरिदास कुंभर ने मनी भास्कर को बताया कि वो खुद अंगूर की खेती करते हैं। खेती के दौरान उन्होंने गौर किया कि जितनी मेहनत वो कर रहे हैं, उस हिसाब से उनको रिटर्न नहीं मिल रहा है।

समय पर खाद, पानी देने के बावजूद पौधे अच्छी तरह विकसित नहीं हो रहे हैं। साथ ही उनमें फल भी ज्यादा नहीं आ रहे हैं और उपज की क्वालिटी भी अच्छी नहीं है। इसलिए उनको उपज का वाजिब दाम नहीं मिल रहा था। इसके निदान के लिए उन्होंने कुछ रिसर्च किए और फिर पौधों के लिए टॉनिक बनाने का आइडिया मिला।

एग्री बिजनेस सेंटर से ली ट्रेनिंग

पौधों के लिए पीजीआर बनाने के वास्ते हरिदास ने सरकार द्वारा किसानों के लिए चलाए जा रहे प्रोग्राम एग्री क्लिनिक एंड एग्री बिजनेस सेंटर्स से ट्रेनिंग ली। वहां पर उन्होंने विभिन्न पौधों के ग्रोथ के लिए आवश्यक पोषक तत्वों के बारे में जाना।

उन्हें मालूम चला कि इंसान की तरह ही पौधों को भी बढ़ने, प्रजनन और अन्य कार्यों के लिए अतिरिक्त नूट्रीएंट्स की जरूरत होती है। इसके मिलने पर पौधों की ग्रोथ बेहतर होती है और फल भी ज्यादा मिलते हैं।

1 लाख रुपए से की शुरुआत

ट्रेनिंग लेने के बाद हरिदास ने प्लांट ग्रोथ रेग्युलेटर्स बनाने के प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया। खुद की जमीन पर 1 लाख रुपए से मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाए। फिर मल्टीएक्सेल नाम से पीजीआर बनाने का काम शुरू किया।

उनका कहना है कि बाजार में उनके प्रोडक्ट को अच्छा रिस्पॉन्स मिला है। महाराष्ट्र के दो जिलों में 1500 से ज्यादा किसानों ने इस प्रोडक्ट का इस्तेमाल किया है और उनकी उपज 30 फीसदी बढ़ी है।

सालाना कमाते हैं 6 लाख रुपए

हरिदास प्लांट ग्रोथ रेग्युलेटर्स बनाकर सालाना 6 लाख रुपए की कमाई कर रहे हैं। उनकी कंपनी का सालाना टर्नओवर 20 लाख रुपए है। उनका कहना है कि सारे खर्च काटकर इस पर उनको 30 फीसदी तक प्रॉफिट मिल जाता है।

उनका यह प्रोडक्ट फिलहाल सांगली के आप-पास के जिलों में ही बिक्री के लिए उपलब्ध है। अपने बिजनेस को बढ़ाने की उनकी कोई प्लानिंग नहीं है। उनका कहना है कि वो छोटे स्तर पर यह प्रोडक्ट बना रहे हैं। वृहद स्तर पर प्रोडक्शन के लिए ज्यादा इन्वेस्टमेंट की जरूरत होगी। इसलिए अभी इस पर ध्यान नहीं है।

इस्तेमाल करने की क्या है विधि

पीजीआर का इस्तेमाल करने का सबसे आसान तरीका ड्रेंचिंग है। इस विधि से पीजीआर का इस्तेमाल करने पर पौधों का समुचित विकास होता है।

इस शख्स ने अपनाई ऐसी तरकीब, एक ही पेड़ पर उगने लगे 51 तरह के आम

एक इंजीनियर कब क्या कर जाए कोई नहीं कह सकता। अब देखिए ना, 10 साल से जो शख्स ओमान में बतौर सिविल इंजीनियर काम कर रहा था, गांव में खेती की बदतर हालात को देखते हुए किसान बन गया। फिर ऐसी तरकीब अपनाई कि देखते ही देखते एक ही पेड़ पर 51 तरह के आम उगा डाले।

एक तरफ जहां खराब फसल की वजह से कर्ज चुकाने में नाकाम होने पर किसान आत्महत्या कर रहे हैं। वहीं, दूसरी तरफ महाराष्ट्र के विदर्भ से ताल्लुक रखने वाले रवि मारशेटवार की खेती ना सिर्फ फल-फूल रही है बल्कि देशभर में उनका नाम भी रौशन कर रही है। अब यह सब जानना चाहते हैं कि 50 साल पुराने पेड़ पर उन्होंने ऐसा क्या जादू कर दिया कि उस पर दर्जनों किस्म के आम फलने लगे?

दरअसल, रवि ने ग्राफ्टिंग की तकनीक से यह करिश्मा कर दिखाया है। उन्हें यह सफलता रातों-रात नहीं मिली है। 1350 बार रिसर्च के बाद रवि को यह मुकाम हासिल हुआ है। साल 2001 में गांव लौटने के बाद उन्होंने खेती की बारीकियां सीखने के लिए कुल 500 जगहों का दौरा किया। इसी दौरान उनकी मुलाकात एक खास शख्स से हुई।

एग्रो ट्रिप्स के दौरान रवि की मुलाकात महाराष्ट्र के उस्मानाबाद जिले के किसान देवरीकर से हुई। देवरीकर ने ग्राफ्टिंग तकनीक का इस्तेमाल कर एक ही पेड़ पर 15 अलग तरीके के आम उगाए थे। उनसे ही रवि ने यह तकनीक सीखी। ग्राफ्टिंग की तकनीक सीखने का बाद रवि ने आम की दुर्लभ और विलुप्तप्राय: होने वाली प्रजातियों को इकट्ठा किया और सालों की मेहनत के बाद एक ही पेड़ पर उन्हें उगाने में सफलता पाई।

रवि के चमत्कारी आम के पेड़ ने ना सिर्फ नाम और दाम दिलाया बल्कि उनकी एक और तमन्ना भी पूरी की। उन्होंने बताया,’इस तकनीक के जरिए मैं आमों की विलुप्त हो रही प्रजातियों को बचाना चाहता था।’ रवि जुलाई से लेकर सितंबर तक किसानों को ग्राफ्टिंग तकनीक की ट्रेनिंग देते हैं।

अर्थशास्त्र के गुरु ने जल प्रबंधन से बंजर भूमि में उगाया सोना

जिला मुख्यालय उत्तरकाशी से नौ किमी दूर स्थित कंकराड़ी गांव के दलवीर सिंह चौहान ने जल प्रबंधन के बूते अपनी ढलानदार असिंचित भूमि को सोना उगलने वाली बना दिया। टपक खेती व माइक्रो स्प्रिंकलर और मेहनत की तकनीक से वह इस 0.75 हेक्टेयर भूमि पर पिछले 17 साल से सब्जी उत्पादन कर रहे हैं। इससे दलवीर हर वर्ष 3.5 लाख रुपये से अधिक की कमाई कर लेते हैं।

दलवीर सिंह ने वर्ष 1994 में गढ़वाल विवि श्रीनगर से अर्थशास्त्र में एमए करने के बाद वर्ष 1996 में बीएड किया। सामान्य किसान परिवार से ताल्लुक रहने वाले दलवीर पर भाई-बहनों में सबसे बड़ा होने के कारण परिवार चलाने की जिम्मेदारी भी थी। इसलिए उन्होंने गांव के निकट मुस्टिकसौड़ में एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया। लेकिन, स्कूल से मिलने वाला मानदेय परिवार चलाने के लिए नाकाफी था।

वर्ष 2001 में उत्तरकाशी के उद्यान अधिकारी कंकराड़ी गांव पहुंचे तो उन्होंने दलवीर को आंगन के आसपास नकदी फसलों के उत्पादन को प्रेरित किया। दलवीर ने डरते हुए पहले वर्ष एक छोटे-से खेत में छप्पन कद्दू लगाए। घर के नल से पानी भर कर एक-एक पौध की सिंचाई की। संयोग देखिए कि तीन माह के अंतराल में उनके 45 हजार रुपये के छप्पन कद्दू बिक गए।

नौकरी छोड़ प्रगतिशील किसान बने

खेती से लाभ होते देख दलवीर ने प्राइवेट स्कूल की नौकरी छोड़कर सब्जी उत्पादन शुरू कर दिया। पानी के इंतजाम के लिए वर्ष 2008 में एक लाख रुपये की विधायक निधि से दो किमी लंबी लाइन मुस्टिकसौड़ के एक स्रोत से जोड़ी। वहां भी पानी कम होने के कारण घर के पास ही एक टैंक बनाया। इसी बीच कृषि विज्ञान केंद्र चिन्यालीसौड़ में दलवीर ने खेती के साथ जल प्रबंधन की तकनीक सीखी।

फिर वर्ष 2008 में ही सिंचाई के लिए टपक खेती अपनाई। इसके लिए सिस्टम लगाने में कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने दलवीर की मदद की। सूखी भूमि पर जब लाखों रुपये की आमदनी होने लगी तो दलवीर ने वर्ष 2011 में माइक्रो स्प्रिंकलर की तरकीब सीखी।

इसका उपयोग दलवीर ने गोभी, पालक, राई व बेमौसमी सब्जी उत्पादन के लिए बनाए गए पॉली हाउस में किया। आज इन्हीं तकनीकों और अपनी मेहनत के बूते दलवीर जिले के प्रगतिशील किसानों की सूची में हैं।

घर ही बना बाजार

दलवीर की खेती में खास बात यह है कि सब्जी विक्रेता सब्जी लेने के लिए सीधे उनके गांव कंकराड़ी पहुंचते हैं। इसलिए दलवीर के सामने बाजार का संकट भी नहीं है।

कम पानी में बेहतर उद्यानी का गुर सिखा रहे दलवीर

दलवीर की मेहनत को देखने और कम पानी में अच्छी उद्यानी के गुर सीखने के लिए जिले के 45 गांवों के ग्रामीणों को कृषि विभाग व विभिन्न संस्थाएं कंकराड़ी का भ्रमण करा चुकी हैं। दलवीर जिले के 30 से अधिक गांवों में कम पानी से अच्छी उद्यानी का प्रशिक्षण भी दे चुके हैं। इसी काबिलियत के बूते दलवीर को ‘कृषि पंडित’, ‘प्रगतिशील किसान’ सहित कई राज्यस्तरीय पुरस्कार भी मिल चुके हैं।

ऐसी होती है टपक खेती

कम पानी से अच्छी किसानी करने का वैज्ञानिक तरीका टपक खेती है। इसमें पानी का 90 फीसद उपयोग पौधों की सिंचाई में होता है। इसके तहत पानी के टैंक से एक पाइप को खेतों में जोड़ा जाता है। उस पाइप पर हर 60 सेमी की दूरी पर बारीक-बारीकछेद होते हैं। जिनसे पौधों की जड़ के पास ही पानी की बूंदें टपकती हैं। इस तकनीक को ड्रॉप सिस्टम भी कहते हैं।

70 फीसद पानी का उपयोग

माइक्रो स्प्रिंकलर एक फव्वारे का तरह काम करता है। इसके लिए टपक की तुलना में टैंकों में कुछ अधिक पानी की जरूरत होती हैं। इस तकनीक से खेती करने में 70 फीसद पानी का उपयोग होता है। जबकि, नहरों व गूल के जरिये सिंचाई करने में 75 फीसद पानी बरबाद हो जाता है।

दलवीर की बागवानी

ब्रोकली, टमाटर, आलू, छप्पन कद्दू, शिमला मिर्च, पत्ता गोभी, बैंगन, फ्रासबीन, फूल गोभी, राई, पालक, खीरा, ककड़ी के अलावा आडू़, अखरोट, खुबानी, कागजी नींबू आदि।

खेती से हर महीने 1.5 लाख कमाता है रमेश

एक ओर जहां युवा इंजीनियरिंग, मेडिकल और मैनेजमेंट में अपना करियर बनाने पर जोर दे रहे हैं। वहीं कुछ ऐसे भी नौजवान हैं जो खेती-बाड़ी में हाथ आजमा रहे हैं। इस क्षेत्र में वो न सिर्फ अपना करियर बना रहे हैं, बल्कि अच्छी-खासी कमाई भी कर रहे हैं।

महाराष्ट्र के पुणे के रहने वाले रमेश खलदकर ऐसे ही युवा हैं जो खेती से जुड़कर हर महीने लाखों में कमाई कर रहे हैं। साथ ही किसानों को खेती के गुर सिखाने के साथ उनका मार्गदर्शन भी कर रहे हैं। आइए जानते हैं कैसे यह शख्स कर रहा है कमाई…

नौकरी छोड़ शुरू किया बिजनेस

पुणे के खलदकर गांव के रहने वाले रमेश खलदकर ने मनी भास्कर को बताया कि उसने फॉरेस्ट्री में बीएससी किया है। बीएससी करने के बाद उन्होंने एक आयुर्वेदिक कंपनी में 3 महीने तक नौकरी। यहां से नौकरी छोड़ने के बाद उनको सरकार के टूरिज्म डिपार्टमेंट में नौकरी लगी।

नौकरी के दौरान उनको काफी कुछ सीखने को मिला। उसके बाद उन्होंने खुद का बिजनेस शुरू का मन बनाया और 2014-15 में अपनी कंपनी शुरू की। जिसका सालाना टर्नओवर आज 2 करोड़ रुपए हो गया है।

2 महीने के कोर्स ने बदली जिंदगी

रमेश का कहना है कि नीम गुणों से भरा पौधा है। नीम को कीटनाशक के रूप में इस्तेमाल करने से मिट्टी की सेहत भी अच्छी रहती है। साथी ही कीड़े-मकौड़े भी खत्म हो जाते हैं। नीम के इसी गुण ने उनको प्रेरित किया।

इसके बारे में और जानकारी लेने के लिए उन्होंने एग्री क्लिनिक एंड एग्री बिजनेस सेंटर्स द्वारा चलाए जा रहे 2 महीने का कोर्स ज्वाइन किया। ट्रेनिंग के दौरान उनको नीम केक मैन्युफैक्चरिंग यूनिट का दौरा करने का मौका मिला और यहां से मिली जानकारी से उनकी जिंदगी बदल गई।

48 लाख लगाकर शुरू किया बिजनेस

ट्रेनिंग पूरी होने के बाद रमेश ने अपने परिवार वाले से 48 लाख रुपए लेकर बिजनेस की शुरुआत की। नीम ऑयल औऱ नीम सीड केक बनाने की यूनिट शुरू करने के बाद लोकल स्तर पर कंपनी का प्रचार किया और फिर उनको तीन ऑर्गेनिक कंपनियों से लोकल किसानों के लिए कुछ टन का ऑर्डर मिला।

पहले लॉट में उन्होंने 300 एमटी नीम केक मैन्योर और 500 लीटर नीम ऑयल का प्रोडक्शन किया। सारे खर्चे काटकर उन्होंने 22 लाख रुपए का प्रॉफिट कमाया। इससे उनको प्रोत्साहन मिला और नीम से अन्य प्रोडक्ट भी बनाने लगे। आज उनके पास 21 ऑर्गेनिक प्रोडक्ट हैं।

कंसल्टिंग के काम पर ज्यादा है जोर

इसके अलावा रमेश वर्मी कम्पोस्ट और कीटनाशक बनाने का भी काम कर रहे हैं। बिजनेस के विस्तार के लिए अब वो एग्री कंसल्टिंग पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। उनका कहना है कि एग्री सेक्टर की कंपनियों को कंसल्टेंट की जरूरत होती है और उनके पास इस क्षेत्र में अनुभव भी अच्छा हो गया जिसका फायदा कंपनियों के साथ मैं भी उठाना चाहता हूं।

कंपनियों के लिए मैं मार्केटिंग स्ट्रैटजी बनाता हूं। इस काम में मुझे अच्छी कमाई हो जाती है। प्लांट, कंसल्टिंग और डेवलपमेंट के लिए रमेश ने अलग से आरके एग्री बिजनेस कॉरपोरेशन की शुरुआत की है। वो अपने बिजनेस सालाना 16 लाख रुपए तक की कमाई कर रहे हैं।