मैदानी इलाकों में सर्दी में करें स्ट्रॉबेरी की खेती

अभी तक स्ट्रॉबेरी की खेती ठंडे प्रदेशों में की जाती थी, लेकिन हरियाणा के किसान इसके लिए अनुकूल भूमि और वातावरण न होते हुए भी स्ट्राबेरी की खेती कर रहे हैं। यही नहीं स्ट्राबेरी के साथ मिर्च की भी खेती सहफसल लेकर दोगुना फायदा हो रहा है।

हरियाणा के महेन्द्रगढ़ जिले के डिंगरोता गाँव के किसान अनिल बलोठिया (35 वर्ष) पिछले दो साल स्ट्राबेरी की खेती कर रहे हैं। दो साल पहले हिसार में उन्होंने स्ट्रॉबेरी की खेती के बारे में जानकारी मिली, उसके बाद इंटरनेट से सारी जानकारी इकट्ठा की।

वहां जाकर उन्होंने इसकी खेती शुरु कर दी। किसान अनिल बलोठिया बताते हैं, “दो साल पहले हिसार में एक किसान को स्ट्रॉबेरी की खेती करते देखा था, फिर वहीं से मैंने भी सोच लिया कि अपने गाँव में जाकर स्ट्राबेरी की खेती करूंगा। इंटरनेट की जानकारी लेने के बाद अपने गाँव में खेती शुरु कर दी है।”

महेन्द्रगढ़ के अलावा हिसार जिला धीरे-धीरे स्ट्रॉबेरी का हब बनता जा रहा है। यहां के कई गाँवों में स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे हैं। यहां के किसानों के लिए दूसरी फसलों के मुकाबले यह फायदे की फसल साबित हो रही है। खेती में ज्यादा मुनाफा देख दूसरे जिलों के किसान भी यहां पर जमीन ठेके पर लेकर स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे हैं।

अनिल स्ट्रॉबेरी के साथ ही मिर्च के पौधे भी लगा देते हैं। अनिल बताते हैं, “हम पहले स्ट्रॉबेरी के पौधे लगा देते हैं, जब पौधे पूरी तरह से तैयार हो जाते हैं तो उसी के साथ ही मिर्च के पौधे लगा देते हैं। स्ट्राबेरी आठ महीने की फसल होती है और मिर्च दस महीने की होती है।”

डेढ़ एकड़ स्ट्रॉबेरी की फसल में चार-पांच लाख की लागत आती है। पैदावार होने के बाद खर्च निकालकर सात-आठ लाख का फायदा हो जाता है। वहीं मिर्च से भी दो-तीन लाख की आमदनी हो जाती है। ऐसे में मिर्च और स्ट्राबेरी दोनों को बेचकर दस लाख तक आमदनी हो जाती है। स्ट्रॉबेरी की फसल खत्म होते होते मिर्च में फल लगने लगते हैं।

यहाँ बिकती है फसल

यहां से तैयार स्ट्रॉबेरी पैक करके दिल्ली भेज देते हैं, दिल्ली में इसकी बहुत बड़ी मार्किट है । इसका इस्तमाल टाफी ,कैंडी और बहुत सी खाने वाली चीजों में होता है । इसके इलवा साउथ इंडिया में भी इसकी मंडी है । अगर आप किसी बड़े शहर में रहते है तो खुद भी पैकेट बना कर सेल कर सकते है जिस से आप का मुनाफा कई गुना बढ़ जाता है ।अनिल बताते हैं, “स्ट्रॉबेरी पचास रुपए किलो से लेकर छह सौ रुपए किलो तक बिक जाती है। डेढ़ एकड़ में दो किलो वजन की पचास हजार ट्रे पैदा हो जाती है।”

डेढ़ एकड़ में 35 से 40 हजार पौधे लगते हैं, मिर्च में अलग से कोई खर्च नहीं लगता है। इसके पौधे हिमाचल से लाए जाते हैं, लेकिन अब अनिल नर्सरी यहीं पर तैयार करते हैं। किस्म के हिसाब से प्रति पौधा 10 रुपए से लेकर 30 रुपए तक के बीच पड़ते हैं। रोपाई का काम अक्टूबर-नवंबर में किया जाता है। जनवरी और फरवरी माह में यह तैयार होकर फल दे देती है।

कैसे होती है खेती

यह पौधा दोमट मिटटी में ही लगाया जा सकता है। पौध लगाने के बाद 20 दिन तक फव्वारा लगाया जाता है।रोपाई का काम अक्टूबर-नवंबर में किया जाता है। जनवरी और फरवरी माह में यह तैयार होकर फल दे देती है।

हिमाचल से आते हैं पौधे

इसके पौधे हिमाचल से लाए जाते हैं। वैरायटी के अनुसार प्रति पौधा 10 रुपए से लेकर 30 रुपए तक के बीच पड़ता है।स्ट्रॉबेरी में स्वीट चार्ली और विंटर डाउन कीमती वैरायटी में गिनी जाती है।जबकि काडलर, रानिया, मोखरा समेत कई वैरायटियां स्ट्रॉबेरी की होती हैं।

एक-एक मीटर की दूरी पर लगाए अनार, आंधी में भी नहीं गिरे पौधे

डीडीए उद्यानिकी अजय चौहान ने बताया अनार की खेती के लिए हल्की जमीन अत्यंत उपयुक्त होती है। ऐसी जमीन में क्यारी से क्यारी 5 मीटर व पौधे से पौधे की दूरी 3 मीटर रखना चाहिए। एक हेक्टेयर में 667 पौधे लगाए जाते हैं। पौधे लगाने के दूसरे वर्ष में प्रति पौधा 10-15 किलो का उत्पादन शुरू होता है। जो साल-दर-साल बढ़कर 30-35 किलो तक पहुंच जाता है। इस प्रकार एक बार पौधा लगाने के बाद वह आगामी 30 साल तक लगातार उत्पादन देता रहता है।

अनार के पौधे को विशेष काट-छांट की आवश्यकता पड़ती है। वही ड्रिप से पानी देने के कारण उत्पादन लागत भी कम हो जाती है। शासन भी राष्ट्रीय कृषि मिशन के तहत प्रति हेक्टेयर प्रथम वर्ष 45 हजार और दूसरे व तीसरे वर्ष 15-15 हजार रुपए का अनुदान देता है।

यह है हाईडेंसिटी प्लांटेशन तकनीक

अल्टाडेंसिटी प्लांटेशन तकनीक में पौधों को कम दूरी पर लगाया जाता है। ऊंचाई को नियंत्रित रखने के लिए समय-समय पर कटाई-छंटाई करना आवश्यक है। शाखा आने पर उसे ऊपर से काट दें। काटी शाखा में फिर तीन शाखाएं आती है। एक बढ़ने पर इसे फिर काट देते हैं। इस तरह यह पेड़ छतरीनुमा बन जाता है, इसकी ऊंचाई छह फीट रहती है। कृषि कॉलेज में हो रहे अनुसंधान में पौधे से पौधे की दूरी 1 मीटर और कतार से कतार की दूरी 3 मीटर रखी है। इस लिहाज से एक एकड़ में 674 पौधे आते हैं।

इसलिए हवा-आंधी से आड़ी नहीं होती है फसल 

उद्यानिकी विभाग के सेवानिवृत्त उद्यान विकास अधिकारी जवाहरलाल जैन ने बताया अल्ट्रा डेंसिटी प्लांटेशन तकनीक से पौधे रोपने पर तेज हवाओं का असर नहीं होता है। पेड़ अधिक व नुकसान कम होने के कारण चार गुना तक पैदावार में बढ़ोतरी होती है। किसानों की आय में बढ़ोतरी होगी। वहीं, सामान्य पद्धति से रोपे गए पौधे तेज हवा, बेमौसम बारिश होने से आड़े हो जाते हैं, फल झड़ने लगते हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

71 साल के किसान का कमल ,इस नई तकनीक से ऊगा दी सूखे में धान की फसल

छतीसगढ़: ग्राम रेड़ा के 71 वर्षीय ननकी दाऊ साहू द्वारा कृषि में कुछ नया करने की जुनून देखते ही बनता है। इनकी खेती के प्रति वैज्ञानिक सोच और एसआरआई पद्घति से धान की खेती कर रहें हैं। इस पद्घति से की जा रही खेती से सूखा के बाद भी हरियाली नजर आ रही है।

सारंगढ़ एवं बरमकेला अंचल के किसान धान की खेती में सूखे की मार झेल रहे हैं। इन ब्लाकों के तो कई-कई गांव में धान की फसल पुरी तरह से समाप्त हो चुकी है। लेकिन ननकी की धान की फसल लहलहा रही है। जो क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है। दरअसल ननकी दाऊ एसआरआई पद्घति से धान की खेती कर रहें हैं। इस पद्घति से की जा रही खेती से इनकी खेतों में एक अजीब सी हरियाली नजर आ रही हैं।

वहीं इनके एक खेत में लगे मकरंद धान की फसल के खेत के पास से गुजरने में एक भिनी भिनी खुशबू आती है। जिसे देखने के लिए आसपास गंाव के किसान ही नहीं दूर दराज के किसान भी देखने आ रहें हैं। कृषक ननकी दाऊ बताते है कि इस वर्ष जब पुरे देश में कमजोर मानसून होने की आशंका की खबर सुनने के बाद वह अपनी खेतों में एसआरआई पद्घति से धान की फसल लेने का निर्णय लिया।

इस विधि से धान की खेती में कई फायदे हैं। पारंपरिक खेती इसकी खेती बहुत अच्छी है। बीज दर में भी बहुत फर्क है। पारंपरिक खेती में प्रति एकड़ 30 किलो धान बीज लगता है। जबकि इसकी खेती में प्रति एकड़ 2.5 से 3 किलो धान बीज लग रहा है। पारंपरिक खेती में प्रति एकड़ 20 से 21 हजार खर्च आता है।

वर्तमान में इस खेती में अभी तक प्रति एकड़ की खेती में 5 हजार 800 रुपए खर्च आया है। 4 से 5 हजार कटाई के दौरान खर्च आएगा। वहीं रसायनिक खाद के स्थान पर वह केंचुआ डाल रहा है। इससे धान में होने वाले बीमारी एवं कीड़े नहीं हो रहे हैं। जिस कारण कीटनाशक एवं फफूंद नाशक दवाई का उपयोग नहीं हो रहा है। केंचुआ खाद से धान के लिए सभी पोषण तत्व होने से रसायनिक खाद डालने की आवश्यकता नहीं हो रही है।

एसआरआई विधि में कम पानी में अच्छी धान की फसल 

एसआरआई विधि में लगातार खेत में पानी नहीं रखा जाता है जड़ों को आर्द्र रखने लायक पानी दिया जाता है। आमतौर पर पारंपरिक धान की खेती में एक किलो के धान के उत्पादन में करीब 3 हजार 5 सौ लीटर की आवश्यकता होती है। कृषि अधिकारियों द्वारा इस पद्घति में खेती करने से करीब 1 हजार लीटर पानी में ही एक किलो धान उत्पादन बताया जा रहा है।

ननकी को मिल चुके हैं कई सम्मान 

नककी दाऊ को खेती करने का अजीब सा जिद व जुनून सवार रहता है। 71 वर्ष के उम्र में भी रोजाना खेतों में 8 घंटा तक का समय देता है। यही कारण है कि इनकी खेती की चर्चा होनी लगी है। 10 नवम्बर 2014 को भारतीय किसान संघ अधिवेशन नई दिल्ली में केंद्रीय मंत्री व वर्तमान के उपराष्ट्रपति वैंकैया नायडू ने कृषि क्षेत्र में अच्छे कार्य को लेकर सम्मानित हुए। वही जयपुर में 20 फरवरी 2016 आयोजित भारतीय किसान संघ अधिवेशन में भी सम्मान किया गया। सारंगढ़ ब्लाक के ग्राम रेड़ा के कृषक ननकी दाऊ की लहलहा रही है जबकि सारंगढ़ अंचल सूखे के चपेट से जूझ रहा है।

एसआरआई विधि से की गई धान की खेती से बीज दर न्यूनतम मात्रा में आता है। वही कम पानी व कम लागत से अच्छी पैदावार किसान पा सकते है। इस विधि में किस्सों की संख्या 45 से 50 तक जाती है। इससे उत्पादन में फर्क आता है। वहीं इस खेती में देशी खादों का उपयोग होता है। ” जीपी गोस्वामी, वरिष्ठ कृषि अधिकारी, सारंगढ़

27 साल की वल्लरी चंद्राकर कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर रह चुकी है

जिला मुख्यालय से करीब 40 किमी दूर छोटा सा गांव है सिर्री (बागबाहरा) । यहां की बेटी वल्लरी चंद्राकर को अपनी धरती से इस कदर प्रेम हुआ कि वह राजधानी रायपुर के एक प्राख्यात कालेज से नौकरी छोड़कर आ गई ।

धरती का कर्ज चुकाने और ‘अपने लोग-अपनी जहां” का नारा बुलंद करते हुए वल्लरी कहती है कि नौकरी कितनी भी बड़ी क्यों न हो, खेती से श्रेष्ठ नहीं हो सकती है। खेती में परिश्रम थोड़ा अधिक करना पड़ता है। किंतु, अन्‍नदाता होने का जो सुकून खेती में है, वह भाव किसी भी नौकरी में आ ही नहीं सकता । उन्‍नत तकनीक को अपनाकर खेती किया जाए तो यह घाटे का सौदा नहीं है।

वल्लरी के पिता जल मौसम विज्ञान विभाग रायपुर में उपअभियंता हैं । उनका पैतृक ग्राम सिर्री है। वल्लरी अपनी पुश्तैनी जमीन में खेती को देखने पिता के साथ कभी-कभी रायपुर से बागबाहरा के पास सिर्री गांव आती थी ।अपनी धरती से वल्लरी को इस कदर लगाव हुआ कि वह रायपुर के दुर्गा कालेज में सहायक प्राध्यापक की नौकरी छोड़कर गांव आ गई ।

बीई (आईटी) और एम टेक (कंप्यूटर साइंस) तक उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बावजूद सफ्टवेयर इंजीनियर इस बेटी ने खेती को अपना व्यवसाय बनाकर सबको चौंका दिया है। इतना ही नहीं वल्लरी खुद ट्रैक्टर चलाकर खेती कर लेती है । इन दिनों उनकी बाड़ी में मिर्ची, करेला, बरबट्टी और खीरा आदि की फसल लहलहा रही है।

अपनी शिक्षा का सदुपयोग आधुनिक तकनीक से उन्न्त खेती में करने पर जोर देते हुए वल्लरी कहती हैं कि उनकी प्रतिभा को गांव वालों और समाज के लोगों ने प्रोत्साहित किया, इससे हौसला बढ़ता गया। अब तो जिस धरती पर जन्म ली, वहां खेती करके उन्नतशील कृषक बनना ही उनका सपना है।

वल्लरी बताती हैं कि उनके दादा स्वर्गीय तेजनाथ चंद्राकर राजनांदगांव में प्राचार्य थे। शासकीय सेवा में होने से उनके घर में तीन पीढ़ियों से खेती किसी ने स्वयं नहीं किया । दादा और पिता नौकरीपेशा होने से खेती नौकर भरोसे होती रही । वल्लरी को खेती की प्रेरणा अपने नाना स्वर्गीय पंचराम चंद्राकर से मिली है। वह अपने ननिहाल सिरसा (भिलाई) जाती थी, तो वहां की खेती देखकर व भाव विभोर हो उठती थी । बचपन का उनका खेती के प्रति लगाव उन्हें अपनी धरती पर खेती करने खींच लाया । वल्लरी की छोटी बहन पल्लवी भिलाई के कालेज में सहायक प्राध्यापक हैं।

मां-बाप को है इस बेटी पर गर्व

वल्लरी की मां युवल चंद्राकर गृहणी है । वे कहती हैं कि उनकी दो बेटियां हैं। दोनों ही इस कदर होनहार हैं कि उन्हें कभी बेटे की कमी महसूस नहीं हुई । हमें बेटा और बेटी में कोई फर्क नहीं करना चाहिए । अब जब बड़ी बेटी वल्लरी खुद खेती कर सिर्री के 26 एकड़ और घुंचापाली (तुसदा) के 12 एकड़ खेत में सब्जी-भाजी की उन्नत फसलें ले रही हैं, तब उन्हें और भी ज्यादा गर्व होता है। अब तो समाज में लोग उन्हें वल्लरी की मां के नाम से पहचानते हैं।

खेती के साथ फैला रही ज्ञान का उजियारा

शहर से गांव आई वल्लरी कंप्यूटर की खास जानकार हैं। गांव के गरीब बच्चे आगे बढ़ सकें, सूचना क्रांति के क्षेत्र में उनका नाम हो। इसके लिए वह गांव के दर्जनभर बच्चों को नि:शुल्क कंप्यूटर शिक्षा भी दे रही है। दिनभरखेत में कामकाज और प्रबंधन देखने के बाद देर शाम से रात तक बच्चों को कंप्यूटर की शिक्षा देना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है।

सालाना आय करीब 20 लाख रूपए

युवा सोच और ड्रीप ऐरिगेशन (टपक पद्धति से सिंचाई) से सब्जी-भाजी की खेती को वल्लरी ने लाभदायक बनाया है। उनका कहना है कि शुरूआत में प्रति एकड़ करीब डेढ़ लाख स्र्पए खर्च करना पड़ा। इस तरह उनके दो फार्म हाउस में करीब 55 से 60 लाख स्र्पए खर्च हुआ । यह वन टाइम इन्वेस्टमेंट है । इससे फार्म हाउस खेती के लिए पूरी तरह विकसित हो चुका है। सालभर में सभी खर्च काटकर प्रति एकड़ करीब 50 हजार स्र्पए शुद्ध आय हुई। इस तरह उनकी खेती से वार्षिक आय 19 से 20 लाख स्र्पए हो रहा है। वल्लरी का कहना है कि खेती को व्यवसायिक और सामुदायिक सहभागिता से उन्नत बनाने की दिशा में वे प्रयास कर रही हैं।

जाने कैसे करोड़पतियों का गांव बना महराष्ट्र का हिवरे बाजार

इस गांव में न पानी की कमी है, न हरियाली की। ये है हिवरे बाजार गांव। यह महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में आता है। यहां की आबादी 300 लोगों से ज्यादा है, जिसमें से 80 से ज्यादा लोग करोड़पति हैं। महाराष्ट्र फिलहाल सूखे की चपेट में है, पर इस गांव में न पानी की कमी है, न हरियाली की। जानें कैसे

बदली गांव की किस्मत…

  • इस गांव की किस्मत यहां के लोगों ने खुद लिखी है। क्योंकि 1990 में यहां 90 फीसदी     परिवार गरीब थे।
  •  इस बारे में गांव के सरंपच पोपट राव कहते हैं कि हिवरे बाजार 80-90 के दशक में भयंकर   सूखे से जूझा। पीने तक के लिए पानी नहीं बचा।
  •  कुछ लोग अपने परिवारों के साथ दूसरी जगहों पर चले गए। गांव में महज 93 कुएं ही थे।
  •  वाटर लेवल भी 82-110 फीट नीचे पहुंच गया था। लेकिन फिर लोगों ने खुद को बचाने की   कवायद शुरू की।

ऐसे बदली गांव की तस्वीर

  • सूखे से निपटने के लिए 1990 में एक कमेटी, ज्वाइंट फॉरेस्ट मैनेजमेंट कमेटी बनाई गई।   इसके तहत गांव में कुआं खोदने और पेड़ लगाने का काम श्रमदान के जरिए शुरू किया गया।
  • इस काम में, महाराष्ट्र इम्प्लॉयमेंट गारंटी स्कीम के तहत फंड मिला, जिससे काफी मदद     मिली। साल 1994-95 में आदर्श ग्राम योजना आई, जिसने इस काम को और रफ्तार दे दी।
  • फिर कमेटी ने गांव में उन फसलों को बैन कर दिया, जिनमें ज्यादा पानी की जरूरत थी।
  • पोपट राव ने बताया कि अब गांव में 340 कुएं है। ट्यूबवेल खत्म हो गए हैं और जमीन का   वाटर लेवल भी 30-35 फीट पर आ गया है।

गांव में 80 करोड़पति परिवार

  • सरपंच पोपट राव के मुताबिक, गांव के 305 परिवार रहते हैं। इनमें से करीब 80 करोड़पति परिवार हैं।
  •  वे बताते हैं कि यहां सभी लोगों की मुख्य आय खेती से ही होती है। यह लोग सब्जी उगाकर   ज्यादातर कमाई करते हैं।
  •  हर साल इनकी आय बढ़ रही है। खेती के जरिए जहां 80 परिवार करोड़पति के दायरे में आ   गए हैं। वहीं, 50 से अधिक परिवारों की सालाना इनकम 10 लाख रुपए से ज्यादा है।
  •  गांव की प्रति व्यक्ति आय देश के टॉप 10 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों के औसत आय (890 रुपए    प्रति माह) की दोगुनी है। यानी पिछले 15 वर्षों में औसत आय 20 गुनी हो गई है।

पीएम मोदी ने मन की बात में की थी तारीफ…

पीएम नरेंद्र मोदी ने 24 अप्रैल को ‘मन की बात’ में हिवरे बाज़ार की तारीफ करते हुए कहा था कि पानी का मूल्य क्या है, वो तो वही जानते हैं, जिन्होनें पानी की तकलीफ झेली है। और इसलिए ऐसी जगह पर, पानी के संबंध में एक संवेदनशीलता भी होती है और कुछ-न-कुछ करने की सक्रियता भी होती है। महाराष्ट्र के अहमदनगर ज़िले के हिवरे बाज़ार ग्राम पंचायत पानी की समस्या से निपटने के लिए क्रॉपिंग पैर्टन को बदला और पानी ज्यादा उपयोग करने वाली फसलों को छोड़ने का फैसला लिया। सुनने में बात बहुत सरल लगती है, लेकिन इतनी सरल नहीं है।

पांच साल का प्लान बनाया

  • पोपट राव ने बताया कि गांव को बचाने के लिए यशवंत एग्री वाटर शेड डेवलपर्स एनजीओ के   साथ मिलकर पांच साल का प्लान बनाया गया था।
  •  इसके तहत गांव में कुएं खोदे जाने थे। पेड़ लगाने थे। गांव को 100 फीसदी शौचालय वाले   गांव में शुमार करना था।
  •  उन्होंने बताया कि एक बार लोग जुड़े तो जुनून कुछ ऐसा हो गया कि पांच साल का प्लान 2     साल में ही खत्म हो गया।

 

सेब की खेती से किसान ऐसे कमाते है सलाना 75 लाख रुपए

शोफियां ( कश्मीर)। सेब की खेती भारत के कई प्रांतों में होती है। कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में सेब की कई नस्लें पैदा की जाती हैं। इन प्रदेशों में उन्नत किस्म के सेब की खेती होती है। पर अगर अनुकूल वातावरण मिले तो यह सेब कहीं भी पैदा हो सकते हैं। उत्तर प्रदेश में भी कई स्थानों पर किसान सेब पैदा करते हैं। तस्वीरों में देखें कश्मीर में सेब की खेती।

पूरी दुनिया मे साल 2013 में आठ करोड़ टन सेब पैदा हुआ था। इसमें से भी आधा तो केवल चीन में पैदा किया गया। अकेले अमरीका मे सेब का कारोबार क़रीब चार अरब डॉलर का माना जाता है।

सेब की विश्व में 7500 से अधिक नस्लें पाई जाती हैं। मतलब साफ है अगर एक दिन में एक सेब का स्वाद आप चखेंगे तो तकरीबन 25 साल खर्च हो जाएंगे। सेब में औसतन 10 बीज पाए जाते हैं।

आपको एक और जानकारी बताता हूं कि सेब का एक पेड़ चार-पांच साल की उम्र में फल देना शुरू कर देता है और लगभग सौ साल तक फल देता रहता है।

हिमाचल प्रदेश सेब की खेती के लिए पूरे विश्व में मशहूर है। यहां एक ऐसा गांव है जहां के एक-एक किसान सेब खेती से करीब 75 लाख रुपए सालाना कमाते हैं। सेब की खेती ने इस गांव को इतना विकसित कर दिया है कि यह कहा तो गांव जाता है पर यहां पर आलीशान मकानों की कमी नहीं है। यहां हर साल करीब 150 करोड़ रुपए का सेब पैदा होता है। अब आप को हम इसका नाम बताते हैं इसका नाम है मड़ावग गांव।

 

खेती से हर दिन कैसे कमाएं मुनाफा, ऑस्ट्रेलिया से लौटी इस महिला किसान से समझिए

वो अपने फेसबुक पेज पर इंट्रो में लिखती हैं ‘Farmer’, एक शब्‍द का यह इंट्रो ही उनके बारे में सबकुछ बता देता है। आज के जमाने में जब लोग खेती किसानी का मतलब भूलने लगे हैं उस समय में कोई सोशल मीडिया पर अपना इंट्रो इस तरह देता है तो वो काबिलेतारीफ है। ये कहानी है पूर्वी व्‍यास की, जिन्‍होंने 1999 में ऑस्‍ट्रेलिया में पढ़ाई पूरी करने के बाद वहां नौकरी की बजाय भारत में किसानी करने की सोची।

कैसे शुरू हुआ पूर्वी का सफर

पूर्वी ऑस्ट्रेलिया से 1999 में अपना पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद पूर्वी लौटकर भारत आ गईं और उन्होंने कुछ गैर सरकारी संगठनों के साथ मिलकर स्थिरता और विकास के लिए काम करना शुरू कर दिया। 2002 में उन्हें प्रसिद्ध पर्यावरणविद् बीना अग्रवाल के साथ एक प्रोजेक्ट पर किसान समुदाय के लिए काम करने का पहला मौका मिला। इस रिसर्च के लिए वह दक्षिणी गुजरात के नेतरंग और देडियापाड़ा जैसे आदिवासी इलाकों में गईं।

इस काम ने पूर्वी के सोचने का पूरा तरीका ही बदल दिया, उन्‍होंने बताया क‍ि यहां रहने से मुझे समझ में आया कि शहर में रहने वाले लोगों की पर्यावरण के प्रति गंभीरता की बातों और उनके रहन-सहन में पर्यावरण को शामिल करने के बीच कितनी गहरी खाई है, और इसमें मैं भी शामिल हूं। और मैंने एक ऐसे तरीके की खोज करना शुरू कर दिया जिससे मैं उस तरीके को अपना सकूं जिसे गांव के ये लोग अपना रहे हैं।

घर से मिली प्रेरणा

वहां से लौटने के कुछ ही दिनों बाद उन्हें उनकी इस समस्या का समाधान मिल जाएगा। उनकी मां और दादी हमेशा से ही किचन गार्डन को महत्व देती थीं। वह रसोई के कामों में इस्तेमाल होने वाली जड़ी बूटियां और कुछ मसाले घर में ही उगाती थीं। अपने परिवार की इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए पूर्वी की मां ने अहमदाबाद से 45 किलोमीटर दूर मतार गांव में अपने 5 एकड़ के खेत में कुछ सब्जियों और फलों की खेती करना शुरू कर दिया। वह हर सप्ताह के अंत में इस खेत में जाकर फसल की देखरेख करती थीं।

अहमदाबाद में जिस खुली और ताज़ी हवा के लिए पूर्वी तरसती थीं, मतार में उन्हें वही हवा अपनी ओर आकर्षित कर रही थी। वह बाताती हैं कि यही वह चीज़ थी जिसे मैं शहर में खोज रही थी। यहीं से उन्होंने निर्णय लिया कि वो अपनी नौकरी छोड़कर पूरी तरह से किसान बन जाएंगी।

किसानी की दुनिया को नजदीक से देखा

किसानी की दुनिया में शुरुआती दिन पूर्वी के लिए बहुत कठिनाइयों भरे थे। उन्हें खेती-किसानी के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं थी। यहां तक कि जब वह खेती की बहुत आम सी बातें समझने की कोशिश करती थीं तो छोटे बच्चे तक उन पर हंसते थे लेकिन पूर्वी ने हार नहीं मानी और वह पूरी लगन के साथ खेती की बारीकियों को समझती रहीं।

वह कहती हैं समय के साथ मैंने खेती की कई तकनीकों के बारे में सीख लिया। मैंने यह भी जाना कि उर्वरकों और कीटनाशकों के इस्तेमाल से फसल को कितना नुकसान होता है इसलिए मैंने जैविक खेती के नए तरीकों की खोज करना शुरू किया। साल 2002 में यह इतना ज़्यादा प्रचलित नहीं था।

ऑर्गेनिक खेती की शुरुआत की

उन्हें समझ आ गया कि जैविक खेती करके पर्यावरणीय असंतुलन को काफी हद तक कम किया जा सकता है। उन्होंने यह भी निष्कर्ष निकाला कि यह किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए फायदेमंद है क्योंकि इसमें लागत लगभग नगण्य थी और उत्पादन बहुत स्वस्थ था।

उन्होंने अपने ही खेत में एक आत्मनिर्भर मॉडल बनाया, जहां खेती के उत्पादों से जीवन की सभी बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा किया जा सकता था। इसके बाद पूर्वी ने एक डेयरी फार्म की शुरुआत की, जो जैविक खेती के लिए बहुत ज़रूरी था। एक समय में उनके पास 15 भैंस, छह गाय, छह बकरियां थीं और उनकी डेरी से गांव में सबसे ज़्यादा दूध सप्लाई होता था।

किसानों को जैविक खेती से जोड़ा

पारंपरिक किसान जैविक खेती को तरजीह नहीं देते क्योंकि उनका मानना है कि सिर्फ आर्थिक रूप से मज़बूत किसान ही जैविक खेती कर सकते हैं। इसके अलावा जैविक खेती से वास्तविक लाभ हासिल करने के लिए कम से कम तीन साल का समय लगता है और एक छोटा किसान इतने समय तक सीमित आय में गुजारा नहीं कर सकता। इसके लिए पूर्वी ने दूसरा तरीका निकाला।

उन्होंने किसानों से जैविक खेती को करने के लिए कहने के बजाय उपभोक्ताओं को जागरूक करना शुरू किया कि वे जैविक उत्पादों को खरीदें। अपने परिवार की सहायता से पूर्वी ने 50 से 60 परिवारों को इस बात के लिए मना लिया कि वे अब जैविक उत्पादों को पैदा करने वालों से सीधे सामान खरीदें और तीन साल तक उनकी इस काम में मदद करें, जब तक वे सीधे तौर पर जैविक खेती से मुनाफा कमाने के ज़ोन में नहीं आ जाते। जब किसानों को इस बात का भरोसा हो गया कि उनकी फसल की उन्हें नियमित तौर पर कीमत मिलेगी तो वे भी जैविक खेती करने के लिए तैयार हो गए।

युवाओं को किया प्रेरित

खेतों में काम करते हुए पूर्वी हमेशा सोचती थीं कि कैसे शहरी युवाओं को अच्छी और स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। उन्होंने पंडित दीन दयाल उपाध्याय पेट्रोलियम विश्वविद्यालय के लिबरल आर्ट के छात्रों को अपने खेत में एक दिन के कार्यक्रम के लिए बुलाया। उन छात्रों को यह कार्यक्रम इतना पसंद आया कि उन्होंने मांग की कि इस तरह की खेतों की यात्रा को उनके पाठ्यक्रम का नियमित हिस्सा बनाया जाए।

इसके बाद पूर्वी गांधी नगर और अहमदाबाद के कई कॉलेजों में जाकर गेस्ट फैकल्टी के तौर पर पढाने लगीं। आज, पूर्वी मुनाफे की खेती के मॉडल पर 2,000 से अधिक किसानों के साथ पांच से छः गांवों को बदलने की दिशा में काम कर रही हैं। ये किसान खाद्य मेला और गैर सरकारी संगठनों की सहायता से सीधे उपभोक्ताओं से जुड़ते हैं और अच्छा मुनाफा कमाते हैं।

किसान जो सीड बाल से खेती कर कमा रहा है पचास लाख सालाना की कमाई

बहुत से किसान आज भी ये ही समझते है की अगर ज्यादा जुताई करेंगे तो ज्यादा फसल भी पैदा होगी लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं है । अब भी कुश ऐसे किसान है जो नई तकनीक लगा कर ज्यादा उत्पादन ले रहे है । मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में मूल रूप से खोजनपुर गांव के रहने वाले राजू टाईटस ने पिछले 30 वर्षों से 12 एकड़ जमीन में न कभी हल चलाया और न ही मिट्टी के प्राकृतिक रूप से छेड़छाड़ की है ।

ये अपने खेतों में बाजार से खरीदी गयी खाद और कीटनाशक का इस्तेमाल नहीं करते हैं, बीजों की सीड बाँल (seed ball ) बनाकर खेतों में बुआई करते हैं। इस खेती से राजू टाईटस सालाना पचास से साठ लाख की कमाई भी करते है।

बीजों को जब क्ले मिटटी की परत से 1/2 इंच से लेकर 1 इंच तक की गोल गोल गोलियां से सुरक्षित कर लिया जाता है उसे सीड बॉल कहते हैं।सीड बाँल बनाने के लिए अगर ये मिट्टी गीली है तो बीज के साइज के हिसाब से इसकी गोलियां बना लेते हैं उसके अन्दर बीज भी भर देते हैं, इन गोलियों को सूखा लेते हैं और बरसात आने पर अपने खेतों में फेंक देते हैं।

गर्मियों की छुट्टियों में आसपास के बच्चे खेल-खेल में ये सीड बाँल बनाने के लिए हमारे फॉर्म पर आ जाते हैं, ये बाँल साल भर तक खराब नहीं होती हैं और बीज सुरक्षित रहता है, बरसात से पहले इन बालों को बनाकर सुखाने के बाद इन्हें खेतों में बिखरा देते हैं, बीज चिड़ियां और चूहे नही खा सकते।
इस तरह से बोआई करने से एक एकड़ में लगभग 20 कुंतल की उपज हो जाती है जिससे चार पांच लाख की वार्षिक आय हो जाती है, अब तो कई जगह के किसान इसे देखने आते हैं, बकरी पालन भी किया है इससे शुद्ध दूध मिल जाता है और आसपास जमे खरपतवार ये साफ़ कर देती हैं।

होशंगाबाद जिले से डेढ़ किलोमीटर दूर ‘टाईटस फॉर्म’ के नाम से मशहूर इनके फॉर्म को सब जानते हैं। बिना रसायन 30 वर्षों से लगातार खेती कर रहे राजू बताते हैं के अगर हम प्रकृति के साथ छेड़छाड़ न करें तो हमे खेती करने में किसी भी प्रकार की कोई असुविधा नहीं होगी, जुताई करने से असंख्य जीवाणु तो नष्ट होते ही है साथ ही झाड़ियाँ भी काट देते हैं

झाड़ियाँ काटने से असंख्य जीव-जन्तु, कीड़े-मकोड़े मर जाते हैं, पेड़ो के साथ झाड़ियाँ और झाड़ियों के साथ घास और अनेक वनस्पतियां रहती हैं जो एक दूसरे की पूरक होती हैं, अगर हम जुताई नहीं करते हैं तो हमारे खेत असंख्य वनस्पतियों से भर जाते हैं, बकरी पालन करते हैं जिससे खरपतवार का नियंत्रण होता है।

पढ़ाई की खातिर ये लड़की बाइक पर दूध बेचकर बनना चाहती है टीचर

गांव में लड़कियों को इतनी छूट नहीं दी जाती है. उन्हें घर पर बैठा दिया जाता है या फिर शादी करवा दी जाती है. लेकिन आज हम ऐसी लड़की की कहानी बताने जा रहे हैं, जो राजस्थान के एक गांव की रहने वाली है लेकिन सपना देखा है आगे बढ़ने का.

टीचर बनने का है सपना

नीतू शर्मा का सपना टीचर बनना है. लेकिन पिता के पास इतने पैसे नहीं है कि वह अपनी बेटी का पढ़ाई का खर्चा उठा पाएं. लेकिन वो कहते हैं ना कि अगर सपने को पूरा करने की जिद्द कर लो तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको रोक नहीं सकती.

इसलिए नीतू रोज सुबह 4 बजे उठकर मोटरसाइकल पर दूध बेचने का काम करती है ताकि पढ़ाई के लिए कुछ पैसे जुटा पाएं. अपनी बहन को स्कूल छोड़ने के बाद वह Bhandor Khurd गांव से दूध इकट्ठा करती है और शहरों डोर टू डोर जाकर बेचतीं है.दूध बेचकर आने के बाद वह कंप्यूटर क्लास जाती है.

नीतू अभी बी.ए प्रोग्राम सब्जेक्ट में ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रही है. अपने मिल्क बिजनेस के चलते वह रेगुलर कॉलेज में पढ़ाई नहीं कर पा रही है. बतादें नीतू दूध बेचकर 12 हजार महीना कमा लेती है.नीतू कहती है कि गांव में सब बातें बनाते हैं. क्योंकि ‘मैं एक लड़की होकर मोटरसाइकिल पर दूध बेचती हूं’, यहां तक की सब मेरा मजाक भी बनाते हैं लेकिन इन सब के बावजूद मैनें पढ़ना नहीं छोड़ा.

कॉन्ट्रैक्ट खेती ने बदली किस्मत ,अब ऑडी में घूमता है यह किसान

यमुनानगर:अधिकतर लोग गांव से खेतीबाड़ी का काम छोड़कर शहर में कार्य करने के लिए आ रहे हैं। कुछ लोगों की धारणा है कि डिग्री पाने के बाद खेती करना घाटे का सौदा हैं। लेकिन यमुनानगर के निकटपुर गांव के निर्मल सिंह ऐसी धारणा रखने वाले लोगों के विपरीत खेती से अच्छी कमाई करके आज 40 लाख की अॉडी में घूम रहे हैं। वे ट्रिपल एम.ए, एम.एड, एम.फिल और पी.एच.डी. होते हुए भी खेती कर रहे हैं। उन्होंने यूनिवर्सिटी में लेक्चरर की नौकरी का अॉफर छोड़कर खेती को अपनाया।

कॉन्ट्रैक्ट खेती से बासमती चावल की पैदावार

निर्मल सिंह 100 एकड़ में हर साल सिर्फ बासमती चावल की ही पैदावार लेते हैं। निर्मल सिंह ने 1997 से अब तक धान की फसल कभी मंडी में नहीं बेची। दरअसल वर्ष 1997 से ही लंदन की टिल्डा राइस लैंड (https://www.tilda.com/) कंपनी से निर्मल सिंह का कॉन्ट्रैक्ट(करार) है। खेत में लगी फसल को ही कंपनी महंगे दामों पर खरीद लेती है। इसी वजह से मंडी में फसल ले जाने का खर्च बच जाता है।

पिता की मृत्यु के बाद संभाला परिवार को

छोटी सी उम्र में पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। परिवार का बोझ कंधों पर आते ही निर्मल सिंह ने नौकरी की बजाए खेती को अपनाया। उनका कहना है कि अगर सही ढंग से खेती की जाए तो इससे बढ़िया कोई कारोबार नहीं है। वे ही किसान कर्ज की वजह से आत्महत्या करते हैं जो कर्ज का सही इस्तेमाल नहीं करते।

अत्याधुनिक तकनीक से करते हैं खेती

निर्मल सिंह खेती के लिए अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। धान की रोपाई से पहले ट्रैक्टर से खेत को समतल नहीं करते, इससे खर्च की बचत होती है। रोपाई से पहले खेत में पानी छोड़ दिया जाता है। लेकिन ट्रैक्टर कभी नहीं चलाया।

निर्मल सिंह बताते हैं कि इस तकनीक से जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है। पानी की खपत भी आधी रह जाती है। वे फव्वारा तकनीक से सिंचाई करते हैं। इससे भी खर्च कम होता है। इसके लिए वे स्वयं दो बार ब्रिटेन हो आए हैं। उन्होंने 1997 से लेकर अब तक कभी अपने खेतों में आग नहीं लगाई। निर्मल सिंह की कामयाबी को देख अब दूसरे किसान भी कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को तरजीह देने लगे हैं।