अब राजस्थान में भी होने लगी सेब की खेती

राजस्थान में शेखावटी का मौसम सेब की खेती के अनुकूल नहीं है। यहां धूलभरी आंधियां, गर्मी में 45 डिग्री के पार पारा और सर्दियों में हाड़ कंपाकंपा देने वाली सर्दी। इन चुनौतियों के बाद भी यहां सेब उगाने का प्रयास किया जा रहा हैं।सब कुछ ठीक रहा तो इस बार सितम्बर में सीकर की सेब खाने को मिल सकती है।

हिमाचल और कश्मीर की मुख्य उपज सेब की राजस्थान के सीकर में खेती का नवाचार बेरी गांव के किसान हरमन सिंह कर रहे है। वे नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन से जुड़े हैं। सिंह बताते हैं कि राजस्थान की धरती पर सेब की खेती के प्रयास नए तो नहीं हैं, लेकिन सफलता नहीं मिल पाई।

अब तीन साल बाद यह सफलता मिलने की उम्मीद है। बेरी गांव से पहले सेब की खेती का प्रयास जयपुर के दुर्गापुरा में भी किया गया। वहां सौ पौधे लगाए गए थे, लेकिन वे नष्ट हो गए। इसी तरह सीकर के ही दो अन्य जगहों पर भी यह प्रयास किया गया, लेकिन उनमें अंकुर नहीं फूट पाया। फिर बेरी में यह प्रयास किया गया। बेरी में इसमें सफलता मिलती नजर आ रही है।

खेती फलने लगी है और सितंबर यहां सेब की फसल मिल जाएगी। इस सफलता को लेकर अधिकारी भी उत्साहित हैं। इस बारे में राज्य सरकार के उद्यानिकी मुख्यालय, जयपुर ने भी सीकर के अधिकारियों ने भी सूचना मांगी है।

सेब की खेती करने के लिए सबसे जरूरी थी उसे गर्मी से बचान, इसके लिए पौधों की टहनियों की कटिंग खास तरह से की गई, बिल्कुल उसी तरह जिस तरह अनार की अंब्रेला कटिंग की जाती है।

जैविक खाद का उपयोग किया गया। ड्रिप सिंचाई तकनीक को छह माह तक  अपनाया गया। जिसका परिणाम है कि हिमाचल और कश्मीर में बहुतायत में उगने वाली सेब रेगिस्तान में भी मिल सकेगी।

धान रोपण की इस तकनीक से बिहार के इस किसान ने तोडा वर्ल्ड रिकॉर्ड

देश के कथित रूप से ‘सबसे पिछड़े राज्य’ बिहार के किसानों ने वो कमाल कर दिखाया है जिससे उन्हें विश्व स्तर पर पहचान मिल रही है. नालंदा के युवा किसान सुमंत कुमार ने सिर्फ एक हेक्टेयर जमीन में 22 टन से ज्यादा चावल की पैदावार कर दुनियाभर के कृषि वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया है.

एक रिपोर्ट के अनुसार नालंदा के दरवेशपुर गाँव के इस युवा किसान ने बिना किसी रासायनिक खाद के प्रयोग के इतनी बड़ी मात्रा में चावल की पैदावार कर वर्ल्ड रिकॉर्ड बना दिया है. इससे पहले ये रिकॉर्ड ‘फादर ऑफ राइस’ कहे जानेवाले चीन के कृषि वैज्ञानिक युआन लोंगपिंग के नाम था जिन्होंने एक हेक्टेयर जमीन में 19.4 टन की फसल उगाई थी.

बिहार के इस गाँव में केवल सुमंत ही नहीं बल्कि उनके सभी साथी भी आर्गेनिक फार्मिंग के इस तकनीक के माध्यम से खेती कर चावल की बड़ी पैदावार पाने में सफल हुए हैं. इन सबने औसतन 17 टनों से अधिक धान की फसल उगाई है. इन उपलब्धियों को देखकर कहा जा सकता है ये लोग गरीबी से लड़ने और अपना जीवनस्तर सुधारने के साथ-साथ ख़ामोशी से एक नई कृषि क्रांति की ओर भी बढ़ रहे हैं.

अपनी खेती में ये लोग जिस तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं उसे SRI (The System of Rice Intensification) कहा जाता है. इसे 1983 में मेडागास्कर में पहली बार प्रयोग में लाया गया था जिसका मकसद स्थानीय किसानों को ‘कम से ज्यादा उत्पादन’ करने के लिए प्रेरित करना था. इस विधि में परंपरागत तरीकों से अलग हटकर थोड़ी मात्रा में बीज-पानी के इस्तेमाल और बिना हानिकारक रासायनों के प्रयोग के लगभग दुगुनी पैदावार प्राप्त की जाती है.

ब्रिटेन के The Guardian ने भी 2013 में नालंदा के सुमंत पर एक विशेष रिपोर्ट प्रकाशित की थी. इन किसानों की सफलता से प्रभावित होकर इसी साल नालंदा दौरे पर आये नोबेल प्राइज प्राप्त इकोनॉमिस्ट Joseph Stiglitz ने इन्हें वैज्ञानिकों से भी बेहतर बताया था. हालांकि कुछ लोगों को बिहार के इन प्रतिभाओं को उचित सम्मान न मिलने का भी दुःख है.

कृषि-अर्थशास्त्री अनिल वर्मा के अनुसार, ‘अगर कोई दूसरा वैज्ञानिक या संस्था किसी भी ऐसे तरीके के साथ सामने आता है ज्सिमे बिना किसी अतिरिक्त खर्च के 50% अधिक पैदावार की जा सकती हो तो उसे नोबेल प्राइज दे दिया जाता है मगर, जब यही काम हमारे युवा बिहारी करते हैं तो उन्हें बदले में कुछ नहीं मिलता. मैं बस ये चाहता हूँ कि इन गरीब किसानों को पेट भर खाना मिल सके.’

गुलाब का इत्र बना के यह किसान हर महीने करता है 6 एकड़ से 7 लाख की कमाई

किसान मेहनत करता है लेकिन उसको सफलता नहीं मिलती लेकिन कुश ऐसे किसान भी है जो अलग ही सोचते है और कुश ऐसा जुगाड़ कर लेते है के थोड़ी ज़मीन से ही वो बहुत सारा पैसा कमा लेते है ।

ऐसे ही हरियणा के बरोला में रहने वाले एक किसान कुशलपाल सिरोही दूसरे किसानों के लिए मिसाल बन गए हैं। आज वे गुलाब की एक किस्म बुल्गारिया की खेती कर प्रति एकड़ 7 लाख रु महीना कमा रहे हैं। वे पिछले कुछ सालों से इत्र व गुलाब जल बेच रहे हैं। अरब के देशों में बुल्गारिया गुलाब से बनाए इनके इत्र की खूब डिमांड है।

कैसे बनाते हैं गुलाब का इत्र

कुशलपाल सिरोही के अनुसार, तांबे के बड़े बर्तन में पानी और गुलाब के फूल डाल दिए जाते हैं।इसके बाद ऊपर से मिट्टी का लेप कर बर्तनों के नीचे आग जलाई जाती है।उसके बाद भाप के रूप में गुलाब जल व गुलाब इत्र एक बर्तन में एकत्रित हो जाते हैं, जिस बर्तन में भांप बनकर इत्र जाता है, उसे पानी में डाल दिया जाता है।

गुलाब का इत्र केवल तांबे के बर्तन में निकाला जाता है। कई जगह कंडेंसिंग विधि से भी अर्क निकाला जाता है।लेकिन आसवन विधि ज्यादा कारगर है। एक क्विंटल फूलों में मात्र 20 ग्राम इत्र निकलता है।इंटरनेशनल मार्केट में एक किलोग्राम इत्र का मूल्य करीब आठ लाख रुपए है।

सिर्फ छह एकड़ में करते हैं गुलाब की खेती

कुशलपाल ने बताया कि छह एकड़ में वह गुलाब की खेती कर रहे हैं। नवंबर व दिसंबर में इसकी कलम की कटाई होती है, इसी दौरान कलम लगाई जाती है। मार्च व अप्रैल माह मेें इस पर फूल आने शुरू हो जाते हैं।

गुलाब के फूलों की एक हजार किस्में हैं, लेकिन इत्र बुल्गारिया गुलाब में ही निकलता है।अगर फूलों की फसल ठीक-ठाक रहे तो इस किस्म से छह एकड़ पर तीन से आठ लाख रुपए कमा लेते हैं।

गुलाब की खेती पर कितना आता है खर्च

नवंबर व दिसंबर में गुलाब के पौधों की कटाई व छंटाई होती है। इसी दौरान नई कलमें भी लगाई जा सकती हैं। कुशपाल के मुताबिक, एक एकड़ में बुल्गारिया गुलाब लगाने में चार हजार रुपए के करीब खर्च आता है।

एक एकड़ में करीब दो हजार कलमें लगाई जा सकती हैं। यह तीन माह में तैयार हो जाता है। एक बार लगाया गुलाब 15 साल तक फूल देने के काम आता है।

ये है देश के 4 करोड़पति किसान, जाने कैसे किसी ने नौकरी और किसी ने चाय बेचना छोड़ कर बन गए सफल किसान

देश का किसान दिन बे दिन गरीब होता जा रहा है । एग्रीकल्‍चर को अक्‍सर लोग फायदे का सौदा नहीं मानते हैं। इस लिए कोई भी खेती में अपना भविष्य नहीं देखता यहाँ तक की खुद किसान खेती छोड़ कर कोई और काम करना चाहते है ।

लेकिन, इन सबके बीच आधुनिक तकनीकों का सहारा और नए तरीकों से खेती करने वाले किसान सफलता की नई कहानी बन रहे हैं। देश में एेसे चार किसान है जिनका नाम भारत के करोपड़पति किसानों में लिया जाता है। ये चारों किसान आज कांट्रेक्‍ट फार्मिंग को आधार बनाकर हर साल लाखों नहीं बल्कि करोड़ों रुपए में इनकम करते हैं।

परंपरागत खेती से की शुरआत

गुजरात के अमीरगढ़ ताललुका के रामपुर वदला गांव निवासी इस्‍माइलभाई रहीमभाई शेरू बीकॉम तक पढ़े थे। शुरुआत में माता पिता ने इनसे नौकरी कराना चाहा लेकिन, इनका मन अपनी खेती में ज्‍यादा रहा। परंपरागत खेती करते-करते शेरू लगभग 15 साल पहले मैक डोनाल्‍ड और फिर मैक केन जैसी कंपनियों के संपर्क में आए।

इन कंपनियों के साथ कांट्रेक्‍ट कर शेरू ने उत्‍तम क्‍वालिटी के फ्रेंच फ्राइज और आलू टिक्‍की के लिए आलू उगाना शुरू कर दिया। इनकम की गारंटी के चलते ये दिनोंदिन आगे बढ़ते गए। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक शेरू भाई के पास आज 400 एकड़ कृषि भूमि है। जिसमें वे हर साल करोड़ों रुपए कमाते हैं।

खेती करने के लिए नौकरी छोड़ी

गुजरात राज्‍य में ही पार्थीभाई जेठभाई चौधरी गुजरात पुलिस में काम करते थे, लेकिन, लगभग 18 साल पहले उन्‍होंने अपनी खेती करने के लिए नौकरी छोड़ दी। बनासकांठा के दांतीवाड़ा में पानी की दिक्‍कत होती है लेकिन, इन्‍होंने अपने खेतों पर ड्रिप इरीगेशन और स्प्रिंकलर लगवाए जिससे वे हर साल 750 एम.एम. पानी चाहने वाले स्‍थान पर बहुत कम पानी में ही काम चलाते हैं।

चौधरी का भी मैक केन के साथ आलू पैदा करने का ही कांट्रेक्‍ट है। चौधरी के खेतों में 2 किलोग्राम तक के आलू होते हैं जिन्‍हें वे हर साल निश्चित दर पर ही बेचते हैं। वर्तमान में उनके पास 87 एकड़ कृषि भूमि अपनी और इतनी ही किराए पर है। पिछले साल चौधरी ने 3.5 करोड़ रुपए के आलू बेचे थे।

20 साल पहले चलाते थे चाय की दुकान

महाराष्‍ट्र के जलगांव के रहने वाले तेनु डोंगर बोरोले 63 साल के हो चुके हैं। करीब 20 साल पहले तक वे चाय बचेने का काम करते थे लेकिन, उस दौरान उन्‍हें किसी ने केले की खेती के बारे में जानकारी दी। उनके पास कुछ जमीन तो अपनी थी और कुछ उन्‍होंने किराए पर ले ली।

इसके बाद उन्‍होंने इस पर केले की खेती शुरू कर दी। कुछ साल पहले ही उन्‍हें ग्रैंड नाइन वैराइटी के बारे में पता चला जिससे उनकी उपज 3 गुनी हो गई। बोरोले आज 100 एकड़ में खेती करते हैं।

प्राइमरी स्‍कूल की नौकरी छोड़ी

जलगांव महाराष्‍ट्र के ही रहने वलो ओंकार चौधरी प्राइमरी स्‍कूल में टीचर थे। उन्‍होंने बोरोले के साथ साथ ही केले की खेती शुरू की थी। आज चौधरी भी 120 एकड़ में केले की खेती कर रहे हैं।

उनका अमेरीका की एक कंपनी के साथ कांट्रेक्‍ट भी है जिसको वे हर साल निश्चित दर पर केला बेचते हैं। चौधरी की साल की इनकम भी करोडों रुपए में है।

गाय जो रोजाना देती है 65 लीटर दूध,खुराक जानकर रह जाओगे हैरान

एक दिन में 65 लीटर दूध देने वाली गाय देखी है क्या आपने। अगर नहीं तो आज देख लीजिए। इसकी खुराक आपको हैरान कर देगी । हरियाणा दूध के लिए अपनी अलग पहचान रखता है। शायद हरियाणा कुलदीप जैसे कई डेयरी फार्मर की वजह से आज भी अपनी पहचान को बरकरार रख पाया है।

कुलदीप की एक गाय हर रोज 65 लीटर दूध देती है। गाय का नाम एंडेवर है। गाय एंडेवर 5 साल की है वह । हर रोज 65 लीटर दूध देती है। दूध दिन में तीन बार 8 घंटे के अंतराल के बाद निकाला जाता है। वे सुबह 5 बजे फिर दोपहर 1 बजे और रात को 9 बजे दूध निकालते हैं।

कुलदीप 27 साल के युवा हैं और पुश्तैनी बिजनेस संभाल रहे हैं। करनाल के दादूपुर गांव के डेयरी फार्मर कुलदीप ने बताया कि उसकी । गाय की नस्ल होल्सटीन फ्रीजन है, जो विदेशी यानी हॉलैंड की नस्ल है। गाय के लिए उन्होंने यूएसए से सीमन मंगाया था।

इन गायों की खुराक सुनेंगे तो आप यकीन नहीं कर पाएंगे, एक गाय को हर रोज 35 किलो साइलेज, 20 किलो हरा चारा, 12 किलो फीड, 5 किलो चने खा जाती है। इसके अलावा मौसमी सब्जियां मिलती हैं वो अलग।

वे अपनी तीन गायों का दूध बेचकर अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। उन्होंने अभी तक किसी गाय की कीमत नहीं लगवाई है।कुलदीप के पास 3 गाय 26 बार अलग-अलग जगह दूध देने की प्रतियोगिताओं में चैंपियन रह चुकी हैं।

एप्पल बेर का बाग लगाएं ,15 साल बगैर पूंजी का उत्पादन पाएं

एप्पल बेर लांग टाइम इंवेस्टमेंट है। इससे एक बार फसल लेने के बाद करीब 15 साल तक फसल ले सकते हैं। कम रखरखाव व कम लागत में अधिक उत्पादन के कारण किसान इसकी ओर आकर्षित हो रहे हैं।

बेर… लगभग सबने खाया और देखा होगा, लेकिन एप्पल जैसा आकार और खाने में बेर का स्वाद, यह शायद पहली बार ही सुना होगा, लेकिन यह सच्चाई है।  थाईलैंड का यह फल इंडिया में थाई एप्पल बेर के नाम से प्रसिद्ध है। थाईलैंड में इसको जुजुबी भी कहते हैं।

राजस्थान के सीकर के  रसीदपुरा गांव के अरविन्द और आनंद ने ऐसे ही बेर अपने 21 बीघा खेत में उगा रखे हैं। आनंद बताते हैं कि 14 माह पहले इस फल के 1900 पेड़ खेत में लगाए गए थे। यह दूसरा मौका है जब पेड़़ों में फल आए हैं।

पांच वर्ष बाद उन्हें 21 बीघा के इस खेत से सालाना करीब 25 लाख रुपए की आय होने वाली है। उन्हें इस वर्ष करीब आठ लाख रुपए की आय होगी। उनकी प्रेरणा लेकर करीब 50 और खेतों में थाई एप्पल बेर के पेड़ लगाए गए हंै।

चार माह में फल

बकौल अरविन्द और आनंद पेड़ लगाने के चार माह बाद इसमें फल आना शुरू हो जाता है। पहली बार फल प्रति पेड़ में दो से पांच किलो, दूसरी बार में प्रति पेड़ 20 से 40 और पांच वर्ष बाद प्रति पेड़ में एक से सवा क्विटल फल आते हैं। इसके लिए सीकर का क्षेत्र अनुकूल है। यह माइनस डिग्री से +50 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी कारगर हुआ है। उनका कहना है कि अप्रेल माह में इसके पेड़ को नीचे से गन्ना की तरह काट दिया जाता है।

दिसंबर तक इसके फलों को बाजार में सप्लाई किया जा सकता है। यह बेर 60 से 120 ग्राम वजनी होता है। आनंद के पिता किशोर सिंह थाईलैंड गए थे। वहां पर थाई एप्पल बेर की खेती देखकर आए थे। इसके बाद हम दोनों भाइयों ने नेट पर इसके बारे में पढ़ा। अहमदाबाद जाकर इसकी खेती देखी। सीकर में इसका प्रयोग किया तो सफल रहा।

सेब व बेर के मिश्रित स्वाद वाले फल की मांग इंदौर, अहमदाबाद, वडोदरा, मुंबई समेत बड़े शहरों में बढ़ रही है। बेर के खरीदार अधिकांश निजी कंपनियां है। वे इन्हें विदेशों में निर्यात करती हैं। इसके आकर्षक रूप व स्वाद के कारण स्थानीय बाजारों में इसकी मांग बढ़ रही हैं।  पहले साल में  एक पौधे से 60 से 70 किलो का उत्पादन मिला। बाजार में इसका भाव 45 से 50 रुपए किलो तक जाता है।

15 दिन में बने युवा किसान ने सिर्फ 40 दिन में किया 14 टन खीरे का उत्पादन

सुनने में थोड़ा फ़िल्मी सा लगता है लेकिन ये बात बिलकुल सच है । एक नए बने किसान ने वो कर दिखया जो शयद दूसरे किसान सोच भी ना सकें । एमबीए के बाद इस युवा की व्यवसायी बनने की ख्वाहिश थी।

लेकिन पिता के व्यवसाय में हाथ बंटाने के बाद उसे लगा कि हर सेक्टर में मंदी है, लेकिन कृषि में नहीं। इसी सोच ने उसे तमिलनाडु पहुंचा दिया। यहां टैरेस गार्डन और पॉली हाउस में फसलों का उत्पादन लेना सीखा।

15 दिन बाद खंडवा लौटा और सिहाड़ा रोड पर आधे एकड़ में पॉली हाउस और आधे में नेट हाउस खोल दिया। ये कहानी है 29 साल के युवक किसान श्रेय हूमड़ की। श्रेय ने पहले ही प्रयास में 14 टन खीरा का उत्पादन किया है। पढ़ें, श्रेय की सक्सेस स्टोरी…

– श्रेय ने बताया कि 2010-11 में इंदौर से एमबीए करने के बाद खंडवा में पिता का बिजनेस संभाला।
– इस दौरान देखा कि ऑटोमोबाइल से लेकर अन्य सेक्टरों में मंदी का दौर आया। लेकिन कृषि में आज तक कभी ऐसा नहीं आया।
– मैंने केलकुलेशन किया कि आने वाले दौर में फूड में अच्छा स्कोप है। मैं तमिलनाडु के मदुराई व अन्य शहरों में गया।
– यहां टैरेस गार्डन और पॉली हाउस देखे। आइडिया अच्छा लगा। खंडवा लौटकर इसके बारे में तीन महीने तक रिसर्च किया।
– इसके बाद लीज पर एक एकड़ जमीन ली। शासन की योजना का लाभ लिया। आधे एकड़ में पॉली हाउस और आधे में नेट हाउस खोल दिया।
– पॉली हाउस से श्रेय ने 40 दिन में 14 टन खीरा का उत्पादन लिया। उन्होंने कहा मार्केट में दूसरों की ककड़ी 10 से 12 रुपए किलो थोक में बिकती है।
– हमारी 18 से 20 रुपए तक बिक जाती है। इसी तरह श्रेय ने टमाटर, मैथी, लौकी व धनिया सहित अन्य सब्जियां भी ली हैं। उन्हें इनके दाम भी अच्छे मिले।
– श्रेय ने बताया कि इसके बीज उन्होंने पुणे से मंगवाए हैं, इसमें अंदर बीज नहीं निकलते हैं। जब ये पकने के कगार पर आ जाती है जब बीज बनते हैं।
– श्रेय ने कहा मेरे परिवार में कोई भी किसान नहीं है। मैंने भी कभी नहीं सोचा था कि मैं किसान बनूंगा। लेकिन इस क्षेत्र में अच्छा स्कोप है।

पॉली हाउस और नेट हाउस में उत्पादन ज्यादा

श्रेय ने बताया कि परंपरागत खेती के मुकाबले पॉली हाउस और नेट हाउस में उत्पादन भी ज्यादा और उन्नत क्वालिटी का होता है। पॉली हाउस में जो भी सब्जियां लगाई जाती हैं, उसे किसान जितना भी खाद, पानी और ऑक्सीजन देगा, उतना ही फसलों को मिलेगा।

इसमें बारिश का पानी भी अंदर नहीं जा सकता। नेट हाउस में भी प्रकाश और बारिश का पानी आधा अंदर आता है और आधा बाहर जाता है। यह गर्मी और ठंड में फसलों के लिए अच्छा होता है, जबकि पॉली हाउस सभी सीजन में फसलों के लिए फायदेमंद होता है।

व्यवसायी की तरह सोचना होगा किसानों को

सूखे और बेमौसम बारिश की मार झेल रहे किसान संकट के दौर से गुजर रहे हैं। कई किसान मौत को भी गले लगा चुके हैं। वहीं श्रेय का मानना है कि किसान इस संकट से बच सकता है। किसानों को व्यवसायी की दृष्टि से सोचना होगा। उसे एक बार में एक के बजाय तीन-चार फसलें लेना होगी।

श्रेय कहते हैं वर्तमान में किसान जिस भी खाद्य वस्तु के दाम बढ़ते हैं, उसे बड़ी मात्रा में बो देते हैं। ऐसे में निश्चित तौर पर उत्पादन ज्यादा होता है और मांग कम हो जाती है। दाम कम मिलते हैं फिर वह रोता है।

एक बिहारी पड़ा थाइलैंड और जापान पर भारी

एक बिहारी सब पर भारी वाली कहावत तो आप ने सुनी होगी वहीं एक बिहारी किसान ने गन्ने के उत्पादन का रिकॉर्ड तोड़ा जिसका लोहा आज थाइलैंड और जापान भी मान रहे हैं। वैसे ये यकीन करना थोड़ा मुश्किल है क्यूंकि जहां गन्ने का प्रति एकड़ औसत उत्पादन 250 से 500 क्विंटल तक हो, वहां कोई 1018 क्विंटल गन्ने का उत्पादन कर सकता है। पर ऐसा एक बिहारी किसान ने कर दिखाया

दो दशक पूर्व मैट्रिक पास करने के बाद जिसे रोजगार के लिए भटकना पड़ रहा था आज उसके खेतों की फल-सब्जियां बिक्री के लिए सीधे मॉल जा रही हैं। अपनी दो दशकों की मेहनत से उन्होंने न केवल अपनी बल्कि गांव के लोगों की जीवन दशा में बदलाव की पटकथा भी लिखी है।

इस बिहारी किसान की थाईलैंड-जापान यात्रा वाया हरियाणा शुरू हुई। मुजफ्फरपुर के छोटे से कस्बे सकरा के रहने वाले दिनेश प्रसाद ने मैट्रिक तक चंदनपट्टी हाईस्कूल में पढ़ाई की। बात 1996 की है। बिहारी मजदूरों का पलायन हो रहा था।

दिनेश भी गांव के लोगों के साथ रोजगार की तलाश में हरियाणा पहुंच गए। वहां के खेतों में बिहारी मजदूरों की तरह काम करने की बजाय उन्होंने बटाई पर खेती शुरू की। जैविक उर्वरक, जीरो टिलेज और सीड ट्रांसप्लांट तकनीक के इस्तेमाल से आधुनिक खेती की।

आरंभ में पांच एकड़ खेती के मुनाफे ने मनोबल बढ़ाया। आज हरियाणा में करीब 125 एकड़ और अपने गांव में 138 एकड़ भूमि पर खेती कर रहे हैं। गांव में तो उनकी मात्र आठ एकड़ भूमि है लेकिन 130 एकड़ जमीन लीज पर लेकर फलों और सब्जियों की आधुनिक और जैविक खेती से पैदावार का रिकॉर्ड बनाया। छह वर्षों के दौरान दिनेश प्रसाद ने हरियाणा में उन्नत खेती का ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया कि वे राज्य सरकार की नजर में आ गए।

दरअसल 2001 में हरियाणा सरकार ने चीनी मिलों से किसानों की सूची मंगाई थी। उस सूची में दिनेश प्रसाद एकलौते किसान थे जिन्होंने एक एकड़ में 1018 क्विंटल गन्ना उपजाकर चीनी मिल को बेचा था।

हरियाणा सरकार के नुमाइंदे दिनेश के खेत पहुंचे। उन्हें मंच पर आमंत्रित कर वहां के मुख्यमंत्री ने सम्मानित किया। इसके बाद फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। अपने गांव सकरा में हरियाणा पैटर्न पर पहले अपनी जमीन पर ही खेती शुरू की।

पड़ोसी किसानों से बातचीत कर उन्हें भी आधुनिक कृषि के लिए प्रेरित किया। अब गांव में अपनी आठ एकड़ भूमि के अलावा करीब 130 एकड़ लीज जमीन पर फल- सब्जी उपजा रहे हैं। आधुनिक और जैविक खेती की शोहरत फैली तो रिलायंस फ्रेश सहित अन्य कृषि उत्पाद का कारोबार करने वाली कंपनियों ने दिनेश प्रसाद से उनकी उपज खरीदने का करार कर लिया। अब इनके खेत की सब्जी और फल सीधे एग्री-मार्केट और मॉल में पहुंच रहे हैं।

तीन महीने जापान में रहे : हरियाणा सरकार से सम्मान मिलने के बाद दिनेश प्रसाद पर केंद्र सरकार की नजर भी गई। 2003 में केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने उन्हें कृषि के क्षेत्र में अपने अनुभव व शोध साझा करने के लिए जापान भेजा।

करीब तीन माह तक दोभाषिये (ट्रांसलेटर) के साथ जापान में कृषि विकास का अध्ययन किया। 2006 में थाइलैंड जाकर उन्होंने वहां खेती के आधुनिक तौर तरीकों का अध्ययन किया। अमरूद, केला, पपीता, कंद, पुदीना, धनिया, गेहूं, गन्ना, बाजरा से लेकर वे ऐसी सब्जियों की खेती कर रहे हैं।

73 वर्षीय एक बुज़ुर्ग किसान ने किया ऐसा कमाल जानकर हैरान रह जायंगे आप

छत्तीसगढ़ के 73 वर्षीय एक बुज़ुर्ग को खेती करने का शौक तो था लेकिन उनके पास खेती करने के लिए जमीन नहीं थी। सन 2004 में एफसीआई से रिटायर होने के बाद उस शख्स को खेती करना था लेकिन रिटायरमेंट से मिले पैसे इतने ज्यादा नहीं थे कि खेत खरीद सकें।

खेती के लिए ज़मीन तो नहीं थी, लेकिन खेती करने का जज़्बा तो उस बुर्जुग में कूट कूट कर भरा था। लिहाज़ा उन्होंने बड़ी योजनाबद्ध तरीके से उम्र के आखिरी पड़ाव पर भी एक जोखिम लेने का साहस लिया। उनका प्रयोग काम कर गया।

उन्होंने अपने घर की छत को ही खेत बना लिया। रायपुर से 45 किलोमीटर दूर महासमुंद में भागीरथी बिसई नाम के इस शख़्स ने अपने घर की छत पर ही धान की खेती कर के वैज्ञानिकों के तमाम दावों को चुनौती देकर हैरान कर दिया।

खेती करने के लिए उनके पास एक छत थी, ऐसे में सबसे पहले छत पर रेत और सीमेंट की ढलाई कराई, फ़िर लोहे की सरिया के साथ बांस की लकड़ी लगवाई, ताकि छत को नुकसान न पहुंचे।

रिटायरमेंट के बाद पहले घर की 100 वर्ग फुट छत पर धान बोया और ठीक ठाक तरीके से खेती कर उत्पादन भी लिया। प्रयोग सफल रहा। फिर घर को दो मंजिला किया। तीन हजार वर्गफीट की छत पर छह इंच मिट्‌टी की परत बिछाई। छत को मजबूती देने के लिए देशी नुस्खा अपनाया।

आशंका थी कि पानी छत के ढलाई के बेस तक पहुंचेगा। लोहे में जंग लग जाएगी। सीलन और जंग की वजह से छत गिर जाएगी। इसलिए लोहे की सरिया के साथ बांस की लकड़ी लगवाई। बांस जल्दी नहीं सड़ता है। नुस्खा काम कर गया।

भागीरथी दो क्विंटल धान की पैदावार ले रहे हैं। सब्जी और पेड़-पौधे की नर्सरी भी तैयार कर रहे हैं। पत्नी और बेटा भी भागीरथी की मदद करते हैं। वे कहते हैं कि हम सब मिलकर परिवार की जरूरत पूरी कर लेते हैं।

भारत में भले ही इस तरह का पहला प्रयोग हो, लेकिन हमारे पड़ोसी देश चीन में इस तरह का प्रयोग हो चुका है और वो सफ़ल भी रहा है।

युवक किसान ने इंटरनेट से सीखी स्ट्रौबेरी की खेती और फिर दिया ऐसा कमाल आप सोच भी नहीं सकते

हरियाणा के महेन्द्रगढ़ जिले के डिंगरोता गाँव के किसान अनिल बलोठिया (35 वर्ष) पिछले दो साल स्ट्राबेरी की खेती कर रहे हैं। दो साल पहले हिसार में उन्होंने स्ट्रॉबेरी की खेती के बारे में सुना ,बस उन्होंने ने मन मैं ठान ली की अब बस स्ट्रॉबेरी की खेती ही करनी है ।

उसके बाद इंटरनेट से सारी जानकारी इकट्ठा की।और फिर उन्होंने खेती से यही नहीं स्ट्राबेरी के साथ मिर्च की भी खेती सहफसल ऊगा के सिर्फ डेढ़ एकड़ से ही 10 लाख की फसल पैदा की । अभी तक स्ट्रॉबेरी की खेती ठंडे प्रदेशों में की जाती थी, लेकिन लेकिन नवंबर से अप्रैल तक ठण्ड होने के कारण इसकी खेती उत्तर भारत में हो सकती है।

वहां जाकर उन्होंने इसकी खेती शुरु कर दी। किसान अनिल बलोठिया बताते हैं, “दो साल पहले हिसार में एक किसान को स्ट्रॉबेरी की खेती करते देखा था, फिर वहीं से मैंने भी सोच लिया कि अपने गाँव में जाकर स्ट्राबेरी की खेती करूंगा। इंटरनेट की जानकारी लेने के बाद अपने गाँव में खेती शुरु कर दी है।”

महेन्द्रगढ़ के अलावा हिसार जिला धीरे-धीरे स्ट्रॉबेरी का हब बनता जा रहा है। यहां के कई गाँवों में स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे हैं। यहां के किसानों के लिए दूसरी फसलों के मुकाबले यह फायदे की फसल साबित हो रही है।

खेती में ज्यादा मुनाफा देख दूसरे जिलों के किसान भी यहां पर जमीन ठेके पर लेकर स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे हैं। अनिल स्ट्रॉबेरी के साथ ही मिर्च के पौधे भी लगा देते हैं। अनिल बताते हैं, “हम पहले स्ट्रॉबेरी के पौधे लगा देते हैं, जब पौधे पूरी तरह से तैयार हो जाते हैं तो उसी के साथ ही मिर्च के पौधे लगा देते हैं। स्ट्राबेरी आठ महीने की फसल होती है और मिर्च दस महीने की होती है।”

डेढ़ एकड़ स्ट्रॉबेरी की फसल में चार-पांच लाख की लागत आती है। पैदावार होने के बाद खर्च निकालकर सात-आठ लाख का फायदा हो जाता है। वहीं मिर्च से भी दो-तीन लाख की आमदनी हो जाती है। ऐसे में मिर्च और स्ट्राबेरी दोनों को बेचकर दस लाख तक आमदनी हो जाती है।

स्ट्रॉबेरी की फसल खत्म होते होते मिर्च में फल लगने लगते हैं। यहां से तैयार स्ट्रॉबेरी पैक करके दिल्ली भेज देते हैं, जहां से दूसरी जगह से सप्लाई की जाती है। अनिल बताते हैं, “स्ट्रॉबेरी पचास रुपए किलो से लेकर छह सौ रुपए किलो तक बिक जाती है। डेढ़ एकड़ में दो किलो वजन की पचास हजार ट्रे पैदा हो जाती है।”

डेढ़ एकड़ में 35 से 40 हजार पौधे लगते हैं, मिर्च में अलग से कोई खर्च नहीं लगता है। इसके पौधे हिमाचल से लाए जाते हैं, लेकिन अब अनिल नर्सरी यहीं पर तैयार करते हैं। किस्म के हिसाब से प्रति पौधा 10 रुपए से लेकर 30 रुपए तक के बीच पड़ते हैं। रोपाई का काम अक्टूबर-नवंबर में किया जाता है। जनवरी और फरवरी माह में यह तैयार होकर फल दे देती है।