ऐसे आप भी खुद त्यार करें कीटनाशक,दोगनी होगी पैदावार

किसान परंपरागत खेती कर मौसम की मार झेल घाटा सह रहे हैं, लेकिन जिले के कुछ किसान खेती में नए-नए प्रयोग कर अलग किस्म की खाद व कीटनाशक तैयार करने के साथ पैदावार तो बढ़ा ही रहे हैं। कृषि वैज्ञानिकों की मदद से खेती कर खूब मुनाफा भी कमा रहे हैं।

ये किसान खुद के बनाए कीटनाशक अौर खाद खेती में प्रयोग कर रहे हैं और कई प्रदेशों में इसकी सप्लाई भी कर रहे हैं। इनमें से कोई किसान बैंक मैनेजर की नौकरी छोड़कर खेती कर रहा है तो कोई मजदूरी छोड़कर। यही नहीं, वे आस-पास के किसानों को उच्च तकनीक और सरकारी योजनाओं की मदद से खेती करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

खेती को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं

पॉली हाउस या शेड नेट लगाने के लिए एक बार अधिक लागत लगती है, लेकिन बाद में किसान इससे काफी कमाई कर सकते हैं। छोटी जोत वाले किसान भी प्रशिक्षण लेकर परंपरागत खेती छोड़ आधुनिक तरीके से खेती शुरू करे तो आय काफी बढ़ सकती है।

गरीब किसान जो तकनीकी खेती में आने के लिए रुपए नहीं होने से डरते हैं, वे एमपीयूएटी या कृषि विभाग में जाकर सरकार के अनुदान के बारे में जानकारी ले सकते हैं।

कोई बैंक मैनेजर की नौकरी छोड़ कृषि से कर रहा दोगुनी कमाई, कोई बेटे को एग्रीकल्चर में एमबीए करा तकनीकी खेती कर रहा 

3 कहानियां : जो न खुद खेती कर रहे हैं… नई तकनीक बताकर औरों को भी कर रहे प्रेरित

पिता तैयार करते हैं कीटनाशक, बेटा कृषि में एमबीए, अब करते हैं ऑनलाइन व्यापार

बुझड़ा गांव निवासी किसान वरदीचंद पटेल ने कुछ साल पहले एमपीयूएटी में प्रशिक्षण लेकर वर्मीकंपोस्ट खाद बनाना शुरू किया। खुद की खेती में प्रयोग किया व आसपास भी सप्लाई किया।

फिर एग्रीकल्चर में एमबीए बेटा भी इस व्यापार से जुड़ा और ऑनलाइन ऑर्डर लेना शुरू किया। आज एमपी, हिमाचल प्रदेश तक खाद सप्लाई करते हैं। दोनों अन्य किसानों को प्रशिक्षण भी देते हैं। दोनों की सालभर की कमाई 12 लाख से अधिक है।

वर्मीकंपोस्ट खाद

बैंक की नौकरी छोड़ शुरू की खास मिर्च की खेती, नौकरी से दोगुनी कमाई कर रहे

फतहनगर के नारायण सिंह उर्फ राजू पहले बैंक मैनेजर थे। नौकरी के दौरान भीलवाड़ा में एक किसान का मिर्च फार्म देखा। उस किसान ने सालभर में मिर्च बेचकर 13 लाख से अधिक कमाए थे।

इसके बाद राजू ने नौकरी छोड़कर किसान से प्रशिक्षण लिया। फिर गोपालसागर में 85 हजार प्रतिवर्ष किराए पर चार बीघा जमीन ली और मिर्च की खेती शुरू की। पिछले साल डेढ़ लाख लगाकर इजराइली पैटर्न पर मलचिंग स्टाइल में मिर्च लगाई। चार माह में ही साढ़े तीन लाख कमाए।

मजदूरी छोड़ शुरू की खीरे की खेती, पहली फसल में 6-7 लाख का मुनाफा

सलूंबर जैताणा के कांतीलाल मेहता व सराड़ा चावंड के शिवराम जोशी महाराष्ट्र में मजदूरी करते थे। वहीं हाइटेक खेती का प्रशिक्षण लिया और यहां खेती में संभावनाएं तलाशी। फिर मजदूरी छोड़ वापस उदयपुर आए और पॉली हाउस में खेती करने का प्रशिक्षण लिया।

पिछले साल दोनों ने अलग-अलग अनुदान प्राप्त कर 4 हजार वर्ग मीटर का पॉली हाउस लगाया व खीरा-ककड़ी की खेती शुरू की। पहली फसल में ही कांतीलाल को 6 लाख व शिवराम को 7 लाख का मुनाफा हुआ।

यह गन्ना किसान एक एकड़ से कमाता है 2 लाख 80 हज़ार रुपए

 

युवाओं का कृषि के प्रति बढ़ते रुझान की मिसाल उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में रहने वाले किसान अचल मिश्रा ने पेश की है। इन्होंने गन्ने की आधुनिक तरीके से खेती करते हुए कई बार प्रदेश स्तरीय व जिला स्तरीय पुरुस्कार प्राप्त किए हैं। इस वर्ष भी इन्होंने गन्ना के अच्छे उत्पादन के मद्देनज़र जिले में प्रथम पुरुस्कार प्राप्त किया है।

उनका मानना है कि गन्ने की खेती के लिए उन्होंने केंद्रीय गन्ना अनुसंधान संस्थान लखनऊ व कोयबंटूर स्थिति अनुसंधान केंद्रों से सफल खेती की जानकारी प्राप्त की है। यदि उनकी शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो वह लखनऊ विश्वविद्दालय से एल.एल.बी की डिग्री हासिल की है।

वर्ष 2005 से खेती प्रारंभ करने वाले अचल ने साल 2007-08 में गन्ना की खेती से सर्वाधिक उत्पादन के पैमानों पर खरा उतरते हुए उत्तर प्रदेश में प्रथम स्थान प्राप्त किया। इस वर्ष भी उन्होंने गन्ने की COO- 238 किस्म से प्रति बीघे लगभग 250 क्विंटल से ऊपर की उपज प्राप्त की है। जिस दौरान गन्ने की लंबाई लगभग 18.5 फीट प्राप्त की साथ ही वजन भी अच्छा आंका गया।

बताते चलें कि गन्ने की खेती में वह गोबर की खाद,हरी खाद आदि का इस्तेमाल करते हैं। साथ ही कीटनाशकों आदि का इस्तेमाल कम से कम करते हैं। पेड़ी की फसल के दौरान वह गन्ने की पत्ती को सड़ाकर एक बेहतर खाद के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। यूरिया का इस्तेमाल वह स्प्रे के तौर पर करते हैं। जिस दौरान उसकी 2 से 3 किलोग्राम की मात्रा प्रति एकड़ स्प्रे करते हैं। तो वहीं उनका मानना है यह भी है कि गन्ने की खेती विशेषकर पानी पर निर्भर करती है।

उन्होंने 12 बीघे की खेती से यह साबित कर दिया कि कम रकबे में अच्छी खेती के द्वारा अच्छी कमाई की जा सकती है। शुरुआती दौर में उन्होंने खेती की अधिक जानकारी न होने के कारण महाराष्ट्र के किसानों से भी मुलाकात कर जानकारी ली और गन्ने की अच्छी खेती के गुर सीखे। एक एकड़ की खेती से अचल ने अब 2 लाख 80 हजार रुपए की शुद्ध बचत प्राप्त की।

खेती तो बहुत लोग करते है मगर इस लड़के की तरह करें तो होगी लाखों की कमाई

खेती की ओर लगातार युवाओं का रुझान बढ़ता रहा है. आज ऐसे ही लड़के की कहानी बताने जा रहे हैं. जिन्होंने हाइड्रोपोनिक फार्मिंग करने के लिए अपनी सॉफ्टवेयर कंपनी को बेच दिया. गोवा में रहने वाले अजय नायक को हमेशा ये बात परेशान करती थी अगर वह खेती करेंगे, तो लोग क्या कहेंगे. लेकिन उन्होंने अपने दिल की सुनी और खेती में करियर बनाया.

ऐसे शुरू किया करियर

अजय कर्नाटक के रहने वाले हैं. इंजीनियरिंग करने के बाद नौकरी की तलाश में वह गोवा पहुंच गए थे. जहां उन्होंने 2011 में अपनी मोबाइल एप्लीकेशन निर्माता कंपनी की शुरुआत की. जिसके बाद उनकी इस कंपनी ने काफी अच्छा बिजनेस किया. लेकिन एक सफल कंपनी के मालिक होने के बावजूद वे हमेशा रासायनिक तरीके से पैदा की गई सब्जियों को लेकर टेंशन में रहते थे. जिसके बाद उन्होंने सोचा कि जैविक विधि से खेती करने के साथ ही क्यों न किसानों को जागरूक भी किया जाए.

जिसके बाद वह खेती से संबंधित चीजों के बारे में पढ़ने लगे. उन्होंने पुणे (महाराष्ट्र) के एक हाइड्रोपोनिक फार्मर से ट्रेनिंग ली. ट्रेनिंग लेने के बाद साल 2016 में उन्होंने अपनी सॉफ्टवेयर कंपनी कोे खेती के लिए बेच दिया.

क्या है हाइड्रोपोनिक खेती

फसल उगाने की इस तकनीक में मिट्टी की जगह पानी ले लेता है. इसके अलावा इसमें पानी का भी उतना ही इस्तेमाल किया जाता है, जितनी फसल को जरूरत हो. पानी की सही मात्रा और सूरज के प्रकाश से पौधे अपना विकास करते हैं. इसमें अलग-अलग चैनल बना कर पोषक तत्त्वों युक्त पानी पौधों तक पहुंचाया जाता है.

लाखों रुपये में होती है कमाई

अजय को खेती के दौरान काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा. लेकिन कृषि फार्म में उन्होंने और उनकी टीम ने दिन-रात मेहनत की. आज अजय और उनकी टीम अपने कृषि फार्म की ऑर्गैनिक सब्जियों से हर महीने लाखों रुपए की कमाई करती है.

आज अजय की टीम हाइड्रोपोनिक फार्मिंग में अच्छे से जुट गई है. इस फार्म में फिलहाल वह सलाद से संबंधित वनस्पति ही उगा रहे हैं. आगे चल कर उसका खीरा, शिमला मिर्च और स्ट्राबेरी उगाने का भी इरादा है. उनके फार्म की सब्जियों की डिमांड राज्य के फाइव स्टार होटलों, सुपर मार्केट और कृषक बाजारों में काफी है.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अजय ने बताया कि खेती की इस तकनीक में शुरुआती समय में लागत काफी ज्यादा आती है, लेकिन बाद में फायदा जरूर होता है. उन्होंने कहा देश में खाना सब चाहते हैं, लेकिन उगाना कोई नहीं चाहता.

किसान ने 1.5 लाख रुपए खर्च कर शुरू की केसर की खेती

गुड़गांव के खंड के गांव खंडेवला के युवा जमीदार प्रदीप पुत्र रामकरण कटारिया द्वारा फसल चक्र में किए गए बदलाव के कारण वह चर्चा का विषय बना हुआ है। उसने गेंहू की आगेर्निक खेती को तो बढ़ावा दिया ही साथ में बेस कीमती फसल माने जाने वाली केसर की खेती करके सभी को आश्चर्य में डाल दिया है। केसर की खेती में सफलता मिलने से प्रदीप फूला नहीं समा रहा है।

वह जिले का पहला किसान है जिसने आधा एकड़ भूमि में केसर की खेती की और अपनी मेहनत और सच्ची लगन से केसर की चुटाई का कार्य कर रहा है। उसकी माने तो उसने कम खर्च में ज्यादा कमाई और रातो रात अमीर बनने के सपने को मानों पंख से लग गए है। आधा एकड में अभी तक करीब पांच किलो केसर की चुटाई कर चुका है और 10 से 12 किलों होने की और उम्मीद जताई है। जिसके कारण वह क्षेत्र के लोगों में चर्चा का विषय बना हुआ है।

प्रदीप कटारिया ने बताया कि उसके पास करीब 17 एकड़ भूमि है। वह हर बार गेंहू, सरसों, और जौ की खेती करता था। वह कृषि विभाग द्वारा चलाए जाने वाले जागरुकता सेमिनार में भाग लेता था । कृषि वैज्ञानिक आगेर्निंक खेती को तो बढ़ावा देने पर बल देते थे।

जिसके चलते पिछले तीन वर्षों में उसने अपने खेतों में डीएपी, यूरिया आदि का प्रयोग नहीं किया और केवल आगेर्निंक खाद का ही प्रयोग किया। जिसके कारण उसकी गेंहू, जौ, सरसों आदि की फसल भी बेहतरीन होने लगी। इसी दौरान एक सेवानिवृत कृषि चिकित्सक ने उसे केसर की खेती करने के लिए सुझाव दिए।

केसर की खेती करने के लिए कैनेडा से अमेरिकन केसर सैफरान का बीज 3 लाख 28 हजार रुपए किलों की दर से आधा किलों मंगवाया और आधा एकड़ भूमि में अक्टूबर माह में एक-एक फीट की दूरी पर बिजाई कर दी।

उसके बाद 20 से 25 दिनों में अन्य फसलों की तरह पानी से सिंचाई करते रहे। उन्होंने बताया कि इस फसल में फंगस का रोग होता है। उसके बचाव के लिए भी देशी उपाय के रुप में उसने नीम के पत्ते, आकडा और धतूरे के पत्तों को पानी में उबाल कर फसल पर छिडकाव और जडों में छोडा जिसके कारण उसकी केसर की फसल सुरक्षित रहीं।

 

इसमें तापमान 8 से 10 डिग्री तक होना चाहिए। इसमें बरसात काफी लाभकारी और तेज हवा और ओलावृष्टी नुकसानदायक है। उसने बताया कि मार्किट में केसर की कीमत ढ़ाई से तीन लाख रुपए किलो बताई जा रही है। इस खेती का सबसे बडा फायदा यह है कि इसके बीज, केसर तो मेहंगे बिकते ही है साथ में फसल के शेष बचे अवशेष भी हवन सामग्री में प्रयोग किए जाते है।

केसर को बेचने के लिए वह राजस्थान या गुजरात के व्यापारियों से सम्र्पक् करेंगे। साथ उसने क्षेत्र के किसानों से भी इस कम लागत वाली व अधिक मुनाफा देने वाली खेती को अपनाने के लिए आवाहन किया है।

उन्होंने बताया कि वह गेंहू, जौ, सरसों की के लिए जो कठिन परिश्रम करके भी नहीं कमा पाए वह मात्र आधा एकड भूमि में केसर की खेती से लाभ कमा चुके है। उन्होंने बताया कि यह खेती कम जमीन वाले किसानों के लिए काफी लाभदायक साबित होगी। मात्र 6 माह में ही लखपति होने का सपना साकार हो सकता है। इसमें सिर्फ मामली देखभल और फिर किसान मालामाल हो जाता है।

सब्जी की खेती ने बदली किस्मत, सालाना 3 फसलें और 3 गुना आमदनी

गांव अभोली के किसान गुरदीप सिंह ने अपने खेतों में उत्तम क्वालिटी का आलू उत्पादन कर न केवल खेती में बड़ा मुकाम हासिल किया है, बल्कि वह पारंपरिक खेती से तीन गुणा आमदनी सब्जियों से लेता है।

उसके खेत में उत्पादित आलू चौ. चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार में उत्तम क्वालिटी सब्जी कंपीटीशन में तीन बार प्रथम स्थान रहा है। इसी उपलब्धि पर किसान को बड़े किसान मेले में पांच बार मुख्यातिथि से सम्मान भी मिला है। वहीं गुरदीप सिंह अब दूसरे किसानों को सब्जी की खेती के लिए प्रेरित भी करता है।

किसान गुरदीप सिंह का सब्जी उत्पादन में कोई सानी नहीं है, क्याेंकि उसके खेत में उत्पादित सब्जियां उत्तम क्वालिटी की होती हैं। कृषि विभाग के अधिकारी भी इसकी पुष्टि करते हैं। किसान गुरदीप सिंह ने बताया कि उसके पास 14 एकड़ जमीन है। घाटे का सौदा बनी पारपंरिक खेती से उसके परिवार का गुजारा मुश्किल था, लेकिन 20 साल पहले वह कृषि विशेषज्ञों के संपर्क में आया, तो उसको सब्जियाें की खेती की सलाह मिली।

उसके बाद उसने सब्जियों की खेती करना शुरू कर दिया। सब्जियों के उत्पादन से पारंपरिक खेती के मुकाबले तीन गुणा प्रति एकड़ आमदन होती है, क्योंकि साल में वह तीन सब्जियों की फसलें लेता है। वहीं उसके खेतों में उत्पादित आलू चौ. चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार में उत्तम क्वालिटी में प्रथम रहता है। उसको हर साल किसान मेले में मुख्यातिथि की ओर से आलू की उत्तम क्वालिटी पर सम्मान मिलता है।

गांव अभोली के किसान गुरदीप सिंह के खेत में उत्पादित आलू अच्छी क्वालिटी में पांच बार हरियाणा में प्रथम रहा

भिंडी की फसल से खरपतवार की निराई करवाता किसान गुरदीप सिंह।

सब्जियों की खेती से दर्जनों को मिलता है रोजगार:गुरदीप सिंह ने बताया कि सब्जियों के उत्पादन से किसान अपनी आमदनी बढ़ा सकता है। इसके अलावा ग्रामीण स्तर पर लोगों को रोजगार भी मिलता है, क्योंकि वह अपने खेतों में 20 सालों से सब्जी उगाता है।

जहां रोजाना करीब 25 लोगों को रोजगार मिलता है। इसके अलावा उसके खेतों में प्रतिदिन दर्जनों किसान विजिट करने पहुंचते हैं। किसान उनको सब्जी उत्पादन के लिए प्रेरित करता है।

सब्जियों की खेती से किसान ले सकते हैं अच्छी आमदनी

कृषि विज्ञान केंद्र में मृदा विशेषज्ञ डॉ. देवेंद्र जांखड़ ने बताया कि सब्जियों के उत्पादन से जहां किसान अच्छी आमदन ले सकते हैं। वहीं भूमि की उपजाऊ शक्ति में भी इजाफा होता है। इसका उदाहरण गांव अभोली में किसान गुरदीप सिंह सब्जियों के उत्पादन से पारंपरिक खेती के मुकाबले तीन गुणा आमदन खेती से लेता है। यह किसान के खेत में उत्पादिक आलू उत्तम क्वालिटी का भी होता है, क्योंकि यह किसान की मेहनत व लग्न का नतीजा है।

तीन एकड़ में बुल्गारिया गुलाब की खेती कर किसान कमा रहा है 10 लाख सालाना

जिला कैथल के गांव बरोला का प्रगतिशील किसान कुशलपाल सिरोही तीन एकड़ में बुल्गारिया गुलाब की खेती कर दस लाख रुपए सालाना कमा रहा है। पहले छह एकड़ गुलाब की खेती करते थे, लेकिन अब तीन एकड़ में कर रहे हैं। कुशलपाल सिरोही पिछले करीब 15 सालों से बुल्गारिया गुलाब की खेती कर रहा है।

वैसे तो गुलाब की हजारों किस्म होती हैं, लेकिन इत्र बुल्गारिया गुलाब से ही निकलता है। वैसे इस किस्म का नाम दमस्त है। लेकिन बुल्गारिया देश में ज्यादा होने के कारण इसका नाम बुल्गारिया ही पड़ गया। नवंबर व दिसंबर में इसकी कलम लगाई जाती है।

प्रैल माह में यह तैयार हो जाता है। एक बार लगाने के बाद 15 साल तक दोबारा लगाने की जरुरत नहीं पड़ती। अप्रैल माह में जितनी ज्यादा गर्मी पड़ेगी, उतनी ही ज्यादा पैदावार होगी। गर्मी ज्यादा पड़ने से बुल्गारिया गुलाब ज्यादा खिलता है।

कैसे बनाते हैं इत्र…

  • कुशलपाल सिरोही के अनुसार तांबे के बड़े बर्तन में पानी और गुलाब के फूल डाल दिए जाते हैं।
  • इसके बाद ऊपर से मिट्टी का लेप कर बर्तनों के नीचे आग जलाई जाती है।
  • भाप के रूप में गुलाब जल व गुलाब इत्र एक बर्तन में एकत्रित हो जाते हैं, जिस बर्तन में भाप बनकर इत्र जाता है, उसे पानी में डाल दिया जाता है।
  • गुलाब का इत्र केवल तांबे के बर्तन में निकाला जाता है। कई जगह कंडेंसिंग विधि से भी अर्क निकाला जाता है।
  • लेकिन आसवन विधि ज्यादा कारगर है। एक क्विंटल फूलों में मात्र 20 ग्राम इत्र निकलता है।
  • इंटरनेशनल मार्केट में एक किलोग्राम इत्र का मूल्य करीब सात से आठ लाख रुपए है।

इंटरनेट के माध्यम से बेचते हैं विदेशों में

गुलाब के इत्र की अमेरिका सहित अरब के देशों में डिमांड है। किसान ने बताया कि भारत में इसकी कोई मार्केट नहीं है। इसलिए बाहर इंटरनेट के माध्यम से बेचना पड़ता है। साऊदी अरब में सबसे ज्यादा डिमांड है। प्रति एकड़ 400 से 500 ग्राम निकलता है। अंतरराष्ट्रीय मार्केट में इत्र 7 से 8 लाख रुपए प्रति एक किलोग्राम के हिसाब से बिकता है।

प्रति एकड़ खेती पर चार हजार रुपए आता है खर्च

नवंबर व दिसंबर में गुलाब के पौधों की कटाई व छंटाई होती है। इसी दौरान नई कलमें भी लगाई जा सकती हैं। कुशपाल के मुताबिक, एक एकड़ में बुल्गारिया गुलाब लगाने में चार हजार रुपए के करीब खर्च आता है। एक एकड़ में करीब दो हजार कलम लगाई जा सकती हैं। यह तीन माह में तैयार हो जाता है। एक बार लगाया गुलाब 15 साल तक फूल देने के काम आता है।

कुछ खास नहीं बस बदला खेती करने का तरीका और अब होती है 30 लाख की कमाई

परंपरागत खेती छोटे किसानों के लिए तो घाटे का सौदा थी ही लेकिन बड़े किसान भी सदैव कर्ज में डूबे रहते थे। मो. बड़ोदिया ब्लाक के गांव मोरटा मलोथर के 40 बीघा जमीन के बड़े किसान ओमप्रकाश पंवार ने परंपरागत खेती में कुछ इसी तरह महसूस किया।

कर्ज से तंग आकर इस किसान ने उद्यानिकी के साथ मिश्रित खेती को अपनाया और देखते ही देखते खेती को लाभ का धंधा बनाकर दिखा दिया। पिछले पांच सालों से यह किसान अपनी 40 बीघा जमीन में मिश्रित खेती कर सालाना 30 लाख से भी अधिक की कमाई कर पा रहे हैं।

किसान ने इस बार भी गेहूं, चना, मसूर, मेथी, रायड़ा, कलौंजी, चंद्रसुर, संतरा, आलू, प्याज, लहसुन, नीबू, मूंग, उड़द, मक्का व हरी सब्जी के साथ दर्जनभर से अधिक तरह की फसल उगाई है। इसके अलावा पूरी जमीन में रासायनिक खाद की जगह जैविक खाद का उपयोग किया गया है।

मोरटा मलोथर के किसान ओमप्रकाश पंवार ने 6 बीघा जमीन में संतरा व औषधि फसल चंद्रसुर की एक साथ पैदावारी ली। रबी की फसल की बोवनी के समय के पूर्व किसान ने संतरे के बगीचे में एक किलो प्रति बीघा के हिसाब से खेत में 6 किलो चंद्रसुर की बोवनी कर दी। कम सिंचाई व 1300 रुपए प्रति बीघा की लागत लगाकर किसान ने इस जमीन से 4 क्विंटल प्रति बीघा के मान से 24 क्विंटल चंद्रसुर की पैदावारी ली है।

वर्तमान बाजार भाव के हिसाब से जिसकी कीमत सवा लाख रुपए के करीब है। इसी खेत में लगे संतरे के पेड़ भी संतरे के फलों से लदालद हो रहे हैं। करीब 150 क्विंटल से अधिक संतरे की फसल की पैदावारी आने का अनुमान है। संतरे की फसल से भी किसान को लगभग साढ़े 7 लाख रुपए से अधिक की कमाई होगी। इस तरह किसान को 6 बीघा जमीन की एक साथ की गई दोनों फसलों से 9 लाख रुपए की आमदनी होगी।

ग्रामीण उद्यान विस्तार अधिकारी, मो. बड़ोदिया बीसी सौराष्ट्रीय का कहना है मो. बड़ोदिया विकासखंड में 5 वर्ष पहले कुछ चुनिंदा किसान ही 5 हेक्टेयर जमीन के रकबे में उद्यानिकी व औषधी खेती करते थे, लेकिन अब विकासखंड में 150 किसान 55 से 60 हेक्टेयर जमीन में उद्यानिकी के साथ तुलसी, अश्वगंधा, इसबगोल, चंद्रसुर, कालमेद, सफेद मूसली, एपल बैर, पुष्प व सीताफल के साथ कई प्रकार की औषधीय खेती कर रहे हैं।

विकासखंड में पांच सालों में उद्यानिकी व औषधि खेती का रकबा 10 गुना से भी अधिक बढ़ गया है। इसी बीच इस विकासखंड में नेट हाउस की संख्या भी बढ़कर 15 हो गई है।

फेसबुक पर सीखी अंजीर की खेती,एक फल की कीमत है 600 रुपये

जिले के एक किसान ने फेसबुक पर थाईलैंड के किसानों से दोस्ती की और फिर अंजीर की खेती के गुर सीख लिए। किसान अब अंजीर के साथ बिना मिट्टी के स्ट्रॉबेरी और अन्य उत्पादन भी कर रहे हैं। इससे जिले में उद्यानिकी को और बढ़ावा मिला है।

जावरा से 22 किलोमीटर दूर गांव रियावन में रहने वाले किसान अरविंद धाकड़ पिछले 10 वर्ष से खेती कर रहे हैं। बीते वर्ष वे फेसबुक के माध्यम से थाईलैंड के कुछ किसानों से जुड़े। बात करते-करते अंजीर की खेती के बारे में पता चला। फिर उनसे खेती की पूरी प्रक्रिया समझी।

थाईलैंड के किसानों द्वारा लातूर के किसान के बारे में बताया। उनसे संपर्क करने के बाद वहां से करीब 50 से 60 पौधे अंजीर के मंगाए। इसके बाद फेसबुक के जरिए प्रतिदिन खेती की हर एक जानकारी लेकर अपने खेत में बनाए गए पॉली हाउस के किनारे बचे स्थान पर यह पौधे लगाकर खेती शुरू कर दी।

8 माह पहले लगाए पौधे

करीब आठ माह पहले अंजीर के पौधे लगाए गए। वर्तमान में पौधे की लंबाई 4 से 5 फीट हो गई है। अंजीर के फल भी आने लगे हैं। पौधों की दूरी भी एक-दूसरे से तीन से चार फीट है। किसान धाकड़ द्वारा वर्तमान में फेसबुक व मैसेंजर के जरिए प्रतिदिन थाईलैंड से सुझाव लिए जाते हैं। किसान का दावा है कि इस तकनीक के अलावा सामान्य रूप से भी अंजीर की खेती प्रदेश में कहीं नहीं होती।

अंजीर के पौधे की खासियत

  • 45 डिग्री के तापमान पर भी पौधे खराब नहीं होते।
  • प्रतिदिन पौधों को पानी देने की जरूरत नहीं।
  • गर्मी में 3 से 4 दिन में एक बार तो ठंड के दिनों में 15 दिन में एक बार पानी देना पड़ता है।
  • इस तकनीक से अंजीर की खेती भारत में केवल 3 से 4 स्थान पर होती है।
  • अंजीर का फल 200 रुपए प्रति किलो बिकता है। सुखाने पर 500 से 600 रुपए किलो बिकता है।
  • 40 से 50 साल तक चलेगा पौधा।

बिना मिट्टी के उगाई सब्जियां

अरविंद द्वारा अंजीर के साथ ही बिना मिट्टी की स्ट्रॉबेरी की भी खेती कर रहे हैं। उनका खुद का स्ट्रॉबेरी का पॉली हाउस है। इस पॉली हाउस में बिना मिट्टी के स्ट्रॉबेरी के साथ फल और सब्जियों की पैदावर भी हो रही है। वर्ष 2015 में किसानों के एक दल के साथ वह इजराइल गए थे। वहां पर मिट्टी के बिना खेती की तकनीक को देखा और समझा।

इसके बाद यहां पर पिछले एक वर्ष से इजराइल की तकनीक का उपयोग कर स्ट्रॉबेरी का उत्पादन कर रहे हैं। वर्तमान में बैंगन, टमाटर व फूलगोभी भी बिना मिट्टी के उत्पादन किया जा रहा है। इसके अलावा उन्होंने इजराइल की तकनीक के साथ कैलिफॉर्निया में पैदावार होने वाली स्ट्रॉबेरी की भी खेती कर रहे हैं। यह खेती 1 बीघा में 10 बीघा के बराबर रहती है। इसका भी उन्होंने अलग से ग्रीन हाउस बना रखा है। इस तकनीक को टेबल-टॉप कहा जाता है।

2 लाख महीने की नौकरी छोड़ शुरू की खेती, आज है 2 Cr का टर्नओवर

आज के दौर में हर युवा की ख्वाहिश बेहतर डिग्री हासिल कर हैंडसम सैलरी और लग्जरियस लाइफस्टाइल जीने की होती है। खेती-किसानी के बारे में शायद ही वे सोचते हैं। लेकिन एक शख्स ऐसा भी है, जिसने 24 लाख का पैकेज छोड़ खेती करना शुरू किया।

आज उनकी खुद की एग्री कंपनी है, जिसका सालाना टर्नओवर लगभग 2 करोड़ रुपए है। यहां बात हो रही है छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के रहने वाले सचिन काले के बारे में। तो आइए जानते हैं उन्होंने कैसे हासिल की ये कामयाबी ?

दादा से मिली प्रेरणा

  • एजुकेशन के दौरान दादाजी की कही वो बात सचिन को हमेशा याद रहती है।
  • बिलासपुर जिले के मेधपर गांव में रहने वाले सचिन के दादा बसंत राव काले एक रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी हैं।
  • एक बार उन्होंने सचिन से कहा था- पैसे के बिना आप जिंदा तो रह सकते हैं, लेकिन भोजन के बगैर नहीं।
  • उन्होंने कहा था- अगर आप पेट भरने के लिए फसल उगाना जानते हैं, तो हालात कितने भी खराब क्यों न हो आप जिंदा रह सकते हैं।
  • दादा के इन्हीं बातों से मोटिवेट होकर सचिन ने विरासत में मिली 25 एकड़ जमीन को एक एग्रीफर्म में बदल दिया।

2 लाख महीने की नौकरी छोड़ करने लगे खेती

  • 2013 में सचिन ने जॉब छोड़ खेती करना शुरू किया।
  • बता दें कि तब उनकी सालाना पैकेज 24 लाख रुपए थी।
  • सचिन तब पुंजलॉयड नाम की एक कंपनी में काम करते थे।
  • उन्होंने तकरीबन 13 की नौकरी के बाद खेती की ओर रुख किया।

ऐसे हुई 25 एकड़ जमीन पर खेती की शुरुआत

  • सचिन ने 25 एकड़ जमीन पर सीजनल सब्जी और धान उगाना शुरू किया।
  • कुछ दिन खेती पर फोकस रहने के बाद उन्हें मजदूरों की समस्या से दो-चार होना पड़ा।
  • उन्हें लगा कि अगर वे मजदूरों को उतना पैसा दे दें, जिसके लिए वे बाहर जाते हैं तो वो बाहर भी नहीं जाएंगे और उनकी खेती का भी काम हो जाएगा।
  • सचिन काले की ये योजना काम आई और लोग उनसे जुड़ने लगे।

फिर बनाई खुद की कंपनी

  • एक साल बाद सचिन ने 2014 में खुद की कंपनी इनोवेटिव एग्रीलाइफ सॉल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड शुरू कर दी।
  • यह कंपनी किसानों को कॉन्ट्रैक्ट खेती करने में मदद करती है।
  • फिर धीरे-धीरे सचिन काले का कारोबार चल पड़ा।
  • जानकारी के मुताबिक, सचिन काले की कंपनी का सालाना टर्नओवर करीब 2 करोड़ रुपए है।

पत्नी देखती है फाइनेंस का काम

  • तेजी से बढ़ते कारोबार को देखते हुए सचिन ने पत्नी कल्याणी काले को भी इसमें शामिल कर लिया।
  •  मास कॉम से मास्टर्स डिग्री होल्डर कल्याणी कंपनी का फाइनेंशियल वर्क को देखती हैं।
  • सचिन का अब यही सपना है कि उनकी कंपनी बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में लिस्ट हो जाए।
  • बता दें कि छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा सचिन ‘उत्‍कृष्‍ट कृषक’ अवार्ड से भी सम्‍मानित किए जा चुके हैं।

पिता चाहते थे इंजीनियर बने बेटा

  • सचिन ने बताया कि उनके पिता उन्हें डॉक्टर या इंजीनियर बनाना चाहते थे।
  • उन्होंने पिता का यह सपना भी पूरा किया।
  • 2000 में आरईसी नागपुर में इंजीनियरिंग कॉलेज से मेकैनिकल इंजीरियरिंग में डिग्री हासिल की।
  • इसके बाद उन्होंने MBA फाइनेंस और फिर लॉ की पढ़ाई की।
  • 2007 में डेवलपमेंट इकोनॉमिक्‍स में पीएचडी करने के बाद पुंजलॉयड कंपनी में जॉब किया।

जगमोहन सिंह जो इस नई तकनीक से लेता है एक एकड़ में से आलु का 170 क्विंटल उत्पादन

किसान की लग्न और मेहनत दोनों ही रंग लाती है. जब एक किसान कड़ी मेहनत करता है तो वो कभी भी पीछे कदम नही खीचता है. यही कारण है कि परेशानी में होते हुए भी एक किसान अपने चेहरे पर एक मुस्कान बनाए रखता है. किसान में जब कुछ सीखने की ललक होती है तो वो पूरी शिद्दत के साथ सीखकर ही साँस लेता है. ऐसे एक किसान है जगमोहन सिंह.

पंजाब के मोगा स्थित जय सिंह वाला गांव के एक किसान और सरपंच जगमोहन सिंह की की आज बल्ले-बल्ले है. उनका दावा है कि आलू की खेती के लिए अभिनव तकनीक के इस्तेमाल के जरिए इनके खेत में जहां आलू की पैदावार अच्छी हुई है, वहीं उन्होंने 83 एकड़ के अपने खेत में इसी अभिनव विधि से आलू की खेती करके दोगुनी आय भी अर्जित की है.

इसके बारे में जगमोहन बताते हैं, “सामान्य रूप से 1 एकड़ खेत में रिज प्लान्टेशन विधि (नली पौधारोपण विधि) से आलू की पैदावार जहां 100-125 क्विंटल होती है, वहीं बेड प्लान्टेशन विधि से मैंने प्रति एकड़ करीब 170 क्विंटल आलू की पैदावार हासिल की है”.

जगमोहन का कहना है कि पहले उन्होंने 36 इंच की बेड प्लान्टेशन तकनीक को अपनाया था, जिसमें वे दो पंक्तियों के बीच आलू बोया करते थे और दोनों ओर से फसलों की सिंचाई परंपरागत पद्धति से की जाती थी. 36 इंच बेड प्लांटेशन की इस विधि से प्रति एकड़ 32-35 आधा क्विंटल वाले बीज से आलू की पैदावार 135 क्विंटल होती थी.

नई तकनीक से पिछले दो सालों से आलू उपजा रहे जगमोहन बताते हैं,” अब हमनें एक नए परीक्षण के तहत रिज यानी क्यारी की चौड़ाई 36 इंच से बढ़ाकर 72 इंच कर दिया और पानी की छिड़काव वाली सिंचाई विधि को इस्तेमाल में लाया”.

जगमोहन बताते हैं कि वो पिछले दो सालों से आलू की खेती कर रहा हैं. इस विधि में चौड़ाई बढ़ाने से बीज बोए गए क्यारियों के बीच ट्रैक्टर को चलाने का स्थान मिल गया. जिससे अब खेतों में एक बेड वाली बड़ी क्यारियों में पांच पंक्तियां बना कर आलू की रोपाई की जाने लगी.

परिणामस्वरूप प्रति एकड़ आलू की पैदावार बढ़कर 170 क्विंटल हो गई. 40-45 आधा क्विंटल बीज वाले बैग से प्रति एकड़ 1 लाख रूपये का फायदा हुआ. जबकि रिज प्लान्टेशन विधि से आप ज्यादा से ज्यादा प्रति एकड़ 40,000 रूपये का मुनाफा कमा सकते हैं, जबकि इस विधि से खेती करने में पानी से सिंचाई के लिए ज्यादा ऊर्जा यानी बिजली की जरुरत होती है और साथ में अतिरिक्त खाद और कीटनाशक की आवश्यकता पड़ती है.

इस तकनीक से मिला अधिक फायदा

बेड प्लांटेशन विधि केवल फसल की पैदावार में वृद्धि करने में मदद करती है, बल्कि स्वस्थ फसल के उत्पादन के लिए भी बहुत मददगार साबित होती है. यह विधि फसल में पानी उपयोग की दक्षता को बढ़ाता है, जिससे फसल को मिट्टी से पोषक तत्वों को अवशोषित करने में मदद मिलती है और फसल की वातन सुविधा बेहतर हो जाती है जो अंततः अच्छे परिणाम देता है”.

जबकि विशेषज्ञों का कहना है कि रिज (नली) सिंचाई पद्धति न केवल पानी बर्बाद करती है, बल्कि पानी की बाढ़ फसल के पोषक तत्वों को अवशोषित करने में बाधा बनती है.

जगमोहन कहते हैं, “बेड प्लान्टेंशन विधि के तहत मैं एक एकड़ फसल के लिए 15 किलो यूरिया खाद का इस्तेमाल करता हूं, जबकि दूसरे किसान एक एकड़ की फसल के लिए करीब एक क्विंटल यूरिया का इस्तेमाल करते हैं, जिससे फसलों में नाइट्रोजन की मात्रा काफी बढ़ जाती है, जो उपभोक्ता के स्वास्थ्य लिए हानिकारक है”.

धान की पुआल खेतों के लिए वरदान

अब,यहां के किसानों ने पुआल जलाने की प्रथा भी बंद कर दी है. अब धान की फसल की कटाई के बाद पुआल खेतों में छोड़ दी जाती है और ये खेतों के लिए बढिया उर्वरक बन खेतों की उर्वरकता को बढ़ा देता है जिससे फसल का उत्पादन बेहतर हो पाता है.

जगमोहन ने बताया कि उन्होंने इटली से एक पुआल काटने वाली अत्याधुनिक मशीन मंगवाई है, जो पुआल की महीन कटाई करने में मदद करती है और इसके भूसे को मिट्टी में डिकम्पोज कर दिया जाता है, जो मिट्टी में सूक्ष्म-पौधों और सूक्ष्मजीवों को स्वस्थ बनाने में मदद करता है, जिससे पैदावार अच्छी होती है.

इस समय किसान जगमोहन सिंह अपने खेतो में नयी तकनीक को अपनाकर अच्छी फसल ले रहे हैं और अपने साथ-साथ दुसरे किसानों को भी इसके विषय में जागरूक कर रहे हैं