एक शहर जिसने छत पर सब्ज़ी उगाकर दूर की बेरोज़गारी

दक्षिण अफ्रीका के शहरों में खेती की एक विधा शांति से देश की शहरी गरीबी और बेरोज़गारी से लड़ रही है। दक्षिण अफ्रीका में लोग इसे शहरी खेती कहते हैं। जोहेनसबर्ग जैसे शहरों में 60 प्रतिशत तक सब्जी इसी छत वाली खेती से आती है।

शहरी खेती और कुछ नहीं, बल्कि घरों की छत पर की जाने वाली खेती ही है जिसे शौकिया तौर पर भारत में भी बहुत से शहरी करते हैं। लेकिन बस अंतर तकनीक और फसलों के चुनाव और प्रबंधन का है।

बेरोजगारी मिटाने के लिए एक गंभीर औजार

अफ्रीका में छत पर की जाने वाली या रूफटॉप खेती का शौक नहीं, बल्कि बेराज़गारी मिटाने के एक गंभीर औज़ार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके लिए वहां के प्रशासन और शोधकर्ताओं ने मिलकर ऐसी फसलों और सब्ज़ियों के सुझाव और उन्नत बीज जारी किये जो आसानी से छत पर उगाई जा सकें। इसका असर भी जल्द ही दिखने लगा।

एक छोटी सी सोच ने दिया रोजगार

अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ चैनल अलजज़ीरा के अनुसार, अफ्रीका जैसे देश में जहां हर चार में से एक व्यक्ति बेरोज़गार है, इस छोटी सी सोच ने बहुतों को रोज़गार दिया है। भारत में भी रूफटॉप खेती को लेकर कई प्रयास किये गए। साल 2014-15 में कर्नाटक सरकार ने नागरिकों को बढ़ावा देने के लिए रूफटॉप तकनीक में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं पर छूट की घोषणा की थी।

भारत के लोगों को फिलहाल फायदा नहीं

इसी तरह राजस्थान में भी घर की छत पर सब्ज़ियां उगाने वाले लोगों को सब्सिडी की तोहफा देने की घोषणा की गई थी। हालांकि भारत में ये प्रयास एकीकृत रूप से अभी तक लागू नहीं किये जा सके हैं। संगठित न होने के कारण ही इनसे लोगों और बाज़ार को फायदा नहीं हो पा रहा है

एमबीए और इंजीनियरिंग करने के बाद शुरू की खेती, 6 साल में टर्नओवर हो गया 11 करोड़ रूपये …

जहां आज गांव के नौजवान खेती को छोडते जा रहें है वहीं उत्तर प्रदेश के दो भाईयों ने एमबीए और इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद खेती-बाड़ी को अपना लिया है. 4 साल की मेहनत के बाद अब इनका 11 करोड़ का सालाना टर्नओवर है.

दोनों भाइयों ने बातचीत में बताया कि 2011 में इन्हें जॉब के लिए 4 लाख का पैकेज मिला था. लेकिन ये बिजनेस करना चाहते थे, इसलिए इन्होंने टेक्नॉलजी के माध्यम से खेती करने की ठान ली.

ऐसे आया खेती करने का ख्याल

लखनऊ के रहने वाले अभिषेक भट्ट कहते हैं, मेरे पिता की इंजीनियरिंग की नौकरी थी. इसलिए हम दोनों भाइयों को भी इसी फील्ड के लिए प्रोत्साहित किया गया. 2011 में मैंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डि‍ग्री हासिल की, जबकि भाई ने एमबीए कम्पलीट किया. पासआउट होते ही मुझे 4 लाख पैकेज की जॉब ऑफर हुई थी, लेकिन मैंने नहीं की. हम सिर्फ जॉब के भरोसे नहीं रहना चाहते थे. कुछ अलग करने की चाह थी.

एक बार मैं बैगलोर अपने अंकल के पास गया. उस वक्त वो किराए पर जमीन लेकर कैप्सकम यानी शि‍मला मिर्च की खेती करते थे. जिससे उनको लाखों की इनकम हो रही थी. वो देख मुझे बड़ा अजीब लगा क्योंकि हमारे यहां लोगों के पास जमीन होने के बावजूद वो खेती नहीं करते.

वहीं से मुझे खेती का ख्याल आया और हम दोनों भाइयों ने एग्रीकल्चर बिजनेस की बारीकियां सीखीं. इसके बाद हम अंकल के साथ महाराष्ट्र गए और वहां के किसानों के खेती करने का तरीका और उससे होने वाले बिजनेस को समझा.

वहां के किसानों की मार्केटिंग देख हमारे अंदर थोड़ा बहुत जो डर था, वो भी खत्म हो गया और हम अपनी तैयारी में जुट गए. मैंने टेक्निकल काम और खेती पर ध्यान दिया. भाई शशांक ने उसकी ब्रांडिग और मार्केटिंग पर काम किया.

बिजनेस पहुंचा सालाना 11 करोड़ टर्नओवर

साल 2011 में हमने ‘एग्रीप्लास्ट’ नाम से फर्म का पंजीकरण कराया. लखनऊ से थोड़ी दूर देवां रोड पर 3 एकड़ जमीन किराए पर ली, जिसका किराया प्रति एकड़ के हिसाब से 1 लाख रुपए सालाना है.

पहले कैप्सिकम की खेती शुरू की, फिर उसके आसपास अन्य सब्जियां उगाने लगे. थोड़े समय में ही छोटे-छोटे व्यापारी हमारे पास सब्ज‍ियां खरीदने आने लगे. 6 महीने में हमारे सेटअप को देखने के लिए आसपास के कई गांवों से लोग आने लगे.

3 साल तक शिमला मिर्च की खेती की. पहले साल 5 लाख रुपए की लागत आई, 8 लाख का टर्नओवर हुआ. 3 लाख का शुद्ध मुनाफा हुआ. दूसरे साल 7 लाख, तीसरे साल 12 लाख का मुनाफा हुआ.

प्रॉफिट से मिले पैसे से हमने और जमीनें किराए पर ली और उनपर भी खेती शुरू कर दी. हम इजराइली टेक्नॉलिजी से विदेशों में डिमांड होने वाले फूल और सब्ज‍ियों की खेती करते हैं. साल 2017-18 में हमारा टर्नओवर 11 करोड़ का रहा. यह दोनों भाई उन युवाओं के लिए प्रेरणास्त्रोत है जो कृषि को छोड़कर शहरो का रुख करते हैं .

इस किसान ने बिना खर्च किये खोजा अनोखा फार्मूला

15 साल पहले जिस जमीन को बंजर समझा गया, उस जमीन पर एक किसान ने जैविक खेती करके ढाई किलो वजन वाली मौसम्बी पैदा की। यही नहीं किसान ने मेहनत करके जमीन को इस लायक कर दिया, जहां पर अब 20 किलो को कटहल और सवा किलो वजन वाला आम हो रहा है।

उनका प्रयोग रुका नहीं है, बल्कि वे एक ही पेड़ में नींबू, संतरा और मौसम्बी लगाने की कोशिश कर रहे हैं। अब उन्हें एग्रीकल्चर कॉलेज में हॉर्टीकल्चर पर लेक्चर देने के लिए बुलाते हैं।

  • ये किसान हैं प्राण सिंह। ग्वालियर से 25 किमी दूर जहानपुर गांव। आसपास खेत हैं, लेकिन ज्यादातर खेत बंजर पड़े हैं। केवल प्राण सिंह अपने खेत और बगीचे में काम करते नजर आते हैं।
  • वे बताते हैं कि 15 साल पहले जमीन की उर्वरा शक्ति खत्म हो गई, क्योंकि किसानों ने जमकर यूरिया और केमिकल का इस्तेमाल किया। उसके बाद यहां के ज्यादातर किसान ने फसल लगाना बंद कर दी।
  • प्राण सिंह पीछे हटने को तैयार नहीं थे। उन्होंने खुद ही खेत में मेहनत करना शुरू की। यूरिया और केमिकल का उपयोग बंद किया। खेत के आसपास 3 तालाब बनाए, जिसमें बारिश का पानी एकत्र किया।

बंजर जमीन को बनाया उपजाऊ

  • इससे जमीन का वाटर लेबल सही हुआ। फिर उन्होंने गोबर, घास-फूस की खाद का इस्तेमाल किया। वर्मी कंपोस्ट की ट्रेनिंग ली। इसके बाद खेत की उर्वरा शक्ति वापस लौट आई।
  • उन्होंने खेत में नींबू, संतरा और मौसम्बी के पौधे लगाए। इस साइट्रस वैरायटी के पौधों के साथ कई प्रयोग प्राण सिंह ने किए। इसका नतीजा यह निकला कि उनके पेड़ में मौसम्बी का वजन ढाई किलो तक पहुंच गया।

कई नयी वैरायटी विकसित की प्राण सिंह ने

  • यही नहीं उन्होंने कटहल, अमरूद सहित कई पौधों की ग्राफटिंग की, जिससे नयी वैरायटी विकसित हुई। प्राण सिंह बताते हैं कि यह सब प्राकृतिक तरीके से खेती करने का नतीजा है।
  • केमिकल और दूसरी रसायनिक खादों से जमीन और फसल को नुकसान होता है। प्राण सिंह अब कोशिश कर रहे हैं कि एक ही पेड़ में नींबू, संतरा और मौसम्बी की फल लगें। उनके मुताबिक यह संभव है, क्योंकि ये तीनों एक प्रजाति के फल हैं।
  • प्राण सिंह की मेहनत देखकर आसपास बंजर खेतों वाले किसान भी अपनी जमीन में वापस खेती करने के लिए लौट रहे हैं। अब तो एग्रीकल्चर कॉलेज के साथ कृषि विभाग के अफसर प्राण सिंह को जैविक खेती की टिप्स देने के लिए बुलाते हैं।

पंजाब के किसान ने शुरू की ‘ड्रैगन फ्रूट’ की खेती , एक बार की मेहनत-कमाई 15 साल तक

गुजरात के कच्छ जिले में होने वाला ड्रैगन फ्रूट अब प्रदेश के किसानों के लिए आय का अच्छा जरिया बन गया है। बरनाला के गांव ठुल्लेवाल के किसान हरबंत सिंह इसकी खेती से खूब मुनाफा कमा रहे हैं। अब वह दूसरे किसानों को भी इसकी खेती के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

बड़ी बात यह है कि इसकी कलमें एक बार लगाने पर यह 15 साल तक फल देती हैं। यानी एक बार बिजाई के बाद 15 साल कमाई ही कमाई। इसके साथ ही इसे पानी खड़ा होने वाली जमीन के अलावा किसी भी किस्म की मिट्‌टी में लगाया जा सकता है। ड्रैगन फ्रूट की खेती में पानी की भी नाममात्र जरूरत रहती है।

गर्मी के सीजन में 10 दिन में एक बार और सर्दियों में एक महीने में एक बार सिंचाई की आवश्यकता रहती है। किसान इस फ्रूट के साथ धान को छोड़कर कोई भी फसल लगाकर कमाई दोगुनी कर सकते हैं। एक किला जमीन में इसकी 1600 कलमें लगती हैं।

15 साल तक इसमें फ्रूट लगेगा जो तीसरे साल से भरपूर उत्पादन देने लगेगा। मेहनत के बल पर एक एकड़ से 50 क्विंटल फल हो सकते हैं जिसे बेचकर पांच लाख रुपए कमाए जा सकते हैं। अन्य कोई फसल इतनी कमाई नहीं दे पाती।

ड्रैगन फ्रूट के यह फायदे:

सिविल अस्पताल बरनाला के डॉक्टर मनप्रीत सिद्धू ने बताया कि ड्रैगन फ्रूट शरीर में एंटीऑक्सीडेंट का काम करता है। शरीर में खून, चर्बी, दिल व चमडी में हर तरह की समस्या ऑक्सीडेंट से पैदा होती है। ड्रैगन फ्रूट खून को साफ करने, शरीर की फालतू चर्बी को रिमूव करने, प्लेटनेट सेंल बढाने आदि का काम करता है।

कब लगाएं :

हरबंत सिंह ने बताया कि ड्रैगन फ्रूट की कलम को दो महीने तक गमले में तैयार की जाती है। अप्रैल से लेकर सिंतबर तक इसे किसी भी समय लगाया जा सकता है। गर्मियां इसके लिए अनुकूल समय है।

अब…दो एकड़ में कलमें लगाने की तैयारी

डेढ़ साल पहले की बात है। मैंने सोशल मीडिया पर ड्रैगन फ्रूट के बारे जाना और कच्छ (गुजरात) से 400 पौधे ले आया। इसकी खेती की जानकारी नहीं थी, लेकिन रिस्क लेकर एक पौधे की 70 रुपए कीमत चुकाई। 28 हजार रुपए खर्च करके 400 पौधे लेकर आया और दो कनाल में इन्हें लगाया।

पहले साल 58 हजार रुपए खर्च करके एक साल तक इन्हें पाला। इससे मुझे 40 हजार के फल प्राप्त हुए। इसके अलावा मैनें करीब 50-60 कलमें भी बेचीं। सफल प्रयोग के बाद अब मैं खुश हूं तथा दो एकड़ में कलमें लगाने की तैयारी कर रहा हूं।’ -हरबंत सिंह, किसान

किसान ने 20 किलो खाद से काम शुरू कर खड़ा किया करोड़ों रुपए का कारोबार

किसान ज्ञासी अहिरवार ने 20 किलो केंचुए से खाद बनाने का कारोबार शुरू किया था, आज इनके पास 50 टन खाद बनकर तैयार है जिसकी कीमत लाखों रुपए है। केंचुआ खाद, वर्मी कम्पोस्ट बनाने के साथ ही ये 20 एकड़ खेत में जैविक ढंग से खेती करते हैं।

इनकी खाद और जैविक सब्जियों की मांग दूसरे जिलों में रहती है जिससे इन्हें अच्छा मुनाफा मिलता है। बुन्देलखण्ड का जैविक खाद का ये सबसे बड़ा प्लांट है, एक साधारण किसान ने जैविक खाद बनाकर करोड़ों का कारोबार खड़ा कर दिया, इनके जज्बे को बुंदेलखंड सलाम करता है।

ललितपुर जिला मुख्यालय से 17 किलोमीटर दूर दक्षिण दिशा में आलापुर गांव में मेन रोड पर अम्बेडकर बायो फर्टिलाइजर के नाम से ज्ञासी अहिरवार का कई एकड़ में प्लांट लगा है। एक साधारण किसान ज्ञासी अहिरवार (59 वर्ष) जैविक खाद का कारोबार शुरू करने को लेकर अपना अनुभव साझा करते हुए बताते हैं,

“लोगों से जैविक खाद बनाने के बारे में अकसर सुना करता था, मै पढ़ा लिखा नहीं था इसलिए नौकरी की उम्मीद तो बिल्कुल नहीं थी, खेती में ज्यादा पैदा नहीं होता था, केचुआ और वर्मी कम्पोस्ट खाद का कई जगह प्रशिक्षण लिया।” देखिए वीडियो

इस कारोबार को शुरू करने के लिए इनके पास रूपए नहीं थे इनका कहना है, “बैंक से 10 लाख लोन लेकर 12 साल पहले 20 किलो केंचुआ से शुरुआत की थी, शुरुआत में कुछ संस्थाओं ने तीन लाख की खाद खरीद ली, इससे हमारा आत्मविश्वास बढ़ा तबसे लगातार इसका कारोबार कर रहे हैं, आज हमारे पास पांच करोड़ की खाद इकट्ठा है।”

इनके पास जैविक खाद की मांग मध्यप्रदेश के 14 जनपदों से आती है। अपनी बीस एकड़ खेती में ज्ञासी पुराने अनाज और सब्जियों की खेती जैविक ढंग से करते हैं। दिल्ली और देहरादून में इनकी सब्जियां और देशी अनाज जाते है जिनका इन्हें अच्छा मुनाफा मिलता है।

ज्ञासी अहिरवार पढ़े-लिखे भले ही न हो पर जैविक खाद बनाने को लेकर उनके अनुभव की चर्चा पूरे बुंदेलखंड में है। इनके जज्बे को सरकारी विभाग से लेकर किसान तक सभी सलाम करते हैं। ये इटली, जर्मनी जैसे कई देशों में अपना अनुभव साझा करने के लिए जा चुके हैं।

ज्ञासी अहिरवार का कहना है, “पुराने अनाज कोदो, कुटकी, ज्वार जैसे कई अनाज जो विलुप्त हो चुके हैं उनको पुन: बचाने का प्रयास है, अपनी बीस एकड़ जमीन में सिर्फ देशी अनाज और सब्जियां उगाते हैं।” वो आगे बताते हैं, “बीज, खाद, कीटनाशक दवाइयां कुछ भी बाजार से नहीं खरीदते हैं,

एक किलो केचुआ 610 रुपए किलो में बिकता है, वर्मी कम्पोस्ट के एक किलो के पैकिट 15-20 रुपए में बिक्री हो जाती है, कृषि विभाग से लेकर गैर सरकारी संस्थाएं इन पैकिटों को खरीदती हैं।” गमलों से लेकर अपने किचेन में इस जैविक खाद का लोग प्रयोग करते हैं।

जैविक खाद बनाने से लेकर जैविक खेती करने के अलावा ज्ञासी अहिरवार किसानो को हर महीने की 15 तारीख को नि:शुल्क प्रशिक्षण भी देते हैं। ज्ञासी ने पिछले साल लगभग 50 लाख का कारोबार किया था।

जिन किसानों को इनसे सलाह लेनी होती है वो कभी भी आकर सलाह ले सकते हैं। ज्ञासी अहिरवार इसकी बिक्री कैसे करते हैं इस पर उनका कहना है, “हमे बहार से मांग आती है जो एक बार खाद ले जाता है वो दूसरों को बताते हैं, एक दूसरे से जान पहचान बढ़ी है, 50 टन जो माल रखा है

उसका भाव अभी सही नहीं मिल रहा है जैसे ही भाव मिलेगा इसकी बिक्री कर देंगे, 45दिन में जैविक खाद बनकर तैयार हो जाती है।” जैविक खाद बनाने से लेकर जैविक खेती तक अगर कोई 15 दिन लगातार ट्रेनिंग लेना चाहता है तो उसे 500 रुपए जमा करने होंगे उसे प्रमाणपत्र भी दिया जाएगा।

ज्ञासी अहिरवार की मेहनत और कारोबार की कहानी का देखिए वीडियो

बांस, बल्ली व छप्पर के सहारे मशरूम उगा रहा है किसान, 15 लाख तक होती है कमाई

न तो पॉली हाउस है और न ही अब तक कोई सरकारी सहायता मिली, लेकिन अपने दम पर इस किसान ने बांस-बल्लियों के सहारे तीन मंजिला स्ट्रक्चर खड़ा कर लिया, आज मशरूम की खेती से ये सालाना पंद्रह लाख की कमाई कर रहे हैं, यहीं नहीं अब दूसरे किसान भी इनसे प्रशिक्षण लेने आते हैं।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के बख्शी का तालाब तहसील में आने वाला गॉव अजरायलपुर (इटौंजा) जो कि लखनऊ मुख्यालय से 30 किमी की दूरी पर स्थित है। इस गाँव के युवा किसान अजय यादव की वजह से तब चर्चा में आया जब साल 2016-2017 में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक इस गाँव के युवा किसान अजय यादव को मशरूम की खेती के लिए पुरस्कार दिया।

अजय यादव बताते हैं, “जब खेती शुरु की तो इतने पैसे नहीं थे कि पाली हाउस लगा सकूं तो बांस घर के थे बांस से ही पॉलीहाउस की तर्ज पर बांस का तीन मंजिला स्ट्रक्चर बनाया जो जमीन और तीन मंजिला बॉस का स्ट्रक्चर मिलाकर चार लेयर बन गयी इसे ढकने के लिए घास फूस का 70 गुणा 30 फ़ीट का बंगला बना दिया।”

वो आगे बताते हैं, “सिंचाई के लिए देशी तकनीक से स्प्रे मशीन का प्रयोग कर रहा हुं पाली हाउस बनाया नहीं इसलिये सरकारी सहायता भी नही मिली, इस समय दो हिस्से में मशरूम की खेती कर रहा हुं एक बंगला 50 गुणा 30 का है, दूसरा बंगला 50 गुणा 30 का है इन दोनों बंगलों से नबम्बर से अप्रैल तक करीब 85 से 100 कुन्तल मशरूम उत्पादन मिल जाता है, जिसका बाजार मूल्य करीब पंद्रह लाख तक मिल जाता हैं।

मशरूम की खेती के साथ कम्पोस्ट बेचने का भी शुरु किया काम

अजय ने बताया कि पहले गेंहू के भूसे को सड़ाकर कम्पोस्ट बनाते हैं कम्पोस्ट बनने में 28 से 30 दिन का समय लगता है इसमें हम रासायनिक और उर्वरक खादों का प्रयोग करते है। गेंहू के भूसे को भिगोकर 30 से 48 घंटे बाद उसमें यूरिया, डीएपी, पोटाश तीनो चीजों को मिलाकर कम्पोस्ट को ढक देते हैं उसके बाद तीसरे दिन कम्पोस्ट में गेहूं का चोकर डालते है फिर उसके बाद डीएसपी पाउडर, कैलिशयम कार्बोरेट, नीम की खाली, जिप्सम, गुड़ का शिरा, फार्मोलिन, नुआन, आदि सब चीजों को हम मिलाते हैं और छोड़ देते है 28 से 30 दिन में कम्पोस्ट बनकर तैयार हो जाता है।

अधिक मुनाफा देती है यह प्रजाति

25 अगस्त से काम की शुरुआत होती है सितंबर तक हमारी कम्पोस्ट तैयार हो जाती है फिर एक से पांच अक्टूबर तक इसमे हम स्पानिंग कर देते हैं स्पानिंग करने के बाद लगभग 15 दिन में पूरे भुसे में बीज फैल जाता है।

इसके बाद इसके ऊपर एक से ढेड़ इंच गोबर की खाद डाल देते हैं उसी खाद के ऊपर 11 से 15 दिन के बाद मशरूम दिखने लगता है। तापमान कम होने पर उत्पादन थोड़ा कम रहता है पर 12 से 24 डिग्री सेक्सियस में मशरूम का अच्छा उत्पादन प्राप्त हो जाता है।

वीडिओ देखे :

एक Idea से चमकी किसान की किस्मत, हर साल कमाता है इतने लाख रुपए

लेट्यूस (सलाद पत्ता), गांठ गोभी, पत्ता गोभी, नारंगी हरे रंग की (ब्रोकली) गोभी, पुदीना, पालक, हल्दी, दो-तीन किस्म की मिर्च, टमाटर, बेलदार सब्जियों के अलावा कुष्मांड कुल की सब्जियां।

बैंगन, प्याज, मिर्च, गोभी, गेंदा, गुलाब, टमाटर सहित अनेक सब्जियों एवं फुलवारी के पौधों की नर्सरी। क्या आप सोच सकते हैं यह सारा काम कितने बीघा में होगा? महज दो बीघा में कई तरह की सब्जियों के साथ पौध तैयार कर बेचकर एक परिवार साल में 5 लाख रुपए कमाई करता है।

  • इतने छोटे से खेत में पानी संग्रह के लिए छोटी सी पक्की डिग्गी, स्प्रिंकलर, मिनी स्प्रिंकल, पाइप्स के जरिए पौधों की बूंद-बूंद सिंचाई करते हैं चक दो ई छोटी के ओमप्रकाश घोड़ेला और उनका परिवार।

  •  डिग्गी पर सोलर पंप, केंचुआ खाद तैयार करने का अलग से प्लांट। भूमि भी सबसे अलग, निराली। खेत का एक इंच भी बेकार नहीं जाने देते ओमप्रकाश। वे उन किसानों के लिए प्रेरणा दायक हैं जिनके पास बहुत छोटी जोत है।

बेलदार सब्जियां भूमि से ऊपर

ओमप्रकाश अपने खेत में बेलदार सब्जियाें का उत्पादन जमीन से ऊपर लेते हैं। खेत की क्यारियों की मेड़ पर बांस-बल्लियां लगाकर बेलें उपर चढ़ा देते हैं। हरा पत्ता, सुगंधित पत्ता, सेलरी पत्ता, ब्रोकली जैसी महंगी सब्जियाें की उपज का हुनर ओमप्रकाश ने पिता से सीखा। उनके खेत में मार्च-अप्रैल में पालक, दिसंबर-जनवरी में टिंडे और बारहमास पुदीना रहता है।

पौध तैयार करने का नायाब तरीका

  •  वे खेत में पौध तैयार कर किसानों को बेचते हैं। उनकी नर्सरी में मिर्च, गोभी, टमाटर आदि की पौध तैयार की जाती है। इसके लिए वे प्लास्टिक की ट्रे में कोकोपिट डालते हैं। प्रत्येक खाने में एक या दो बीज डालते हैं।
  • ओमप्रकाश के मुताबिक, कोकोपिट ऐसा चूर्ण है जिसमें पौध अंकुरण शीघ्र होती है।

मिर्च की खेती से नेक सिंह करते है 1 एकड़ से 2 लाख की कमाई

पटियाला जिले के नाभा से सटे गांव खोख के रहने वाले लगभग 71 वर्षीय नेक सिंह जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव देखे, मगर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। मार्केट की नब्ज पकड़ उन्होंने इतनी मेहनत की कि आज वह पंजाब के नंबर वन मिर्च उत्पादक हैं। इनकम टैक्स भरने वाले गिने-चुने किसानों की फेहरिस्त में उनका नाम शुमार है। वह मिर्च की खेती से एक एकड़ में दो लाख रुपए कमा लेते हैं और इसी के दम पर उन्होंने अपनी चार एकड़ की पैतृक जमीन को बढ़ाकर 65 एकड़ तक कर लिया है।

इस तरह रहा संघर्ष का सफर

  • अपने अनुभव के बारे में नेक सिंह बताते हैं कि बात साल 1965 की है। कुछ पारिवारिक कारणों के चलते दसवीं की पढाई के बाद आगे नहीं पढ़ पाए। तेरह एकड़ जमीन पर काम शुरू किया, जिसमें से उनके हिस्से लगभग 4 एकड़ जमीन ही आई।
  •  उनके शुरुआती दिन संघर्ष से भरे रहे। यहां तक कि उन्हें घर का खर्च चलाने के लिए पेप्सू रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन की बस में कंडक्टर की नौकरी भी करनी पड़ी, लेकिन हिम्मत नहीं हारी।
  •  नेक सिंह के साथ उनके बड़े भाई भी रहते थे और 1960 में सभी को विरासत में एक समान जमीन मिली थी, लेकिन अपनी उद्यमिता के बल पर उनमे से सबसे आगे निकलने में सिर्फ नेक सिंह ही कामयाब रहे।
  •  जिस वक्त राज्य में हरित क्रांति जोर पकड़ रही थी, उस करीब 20 साल की उम्र में नेक सिंह ने साहसिक कदम उठा खेती के लिए साढ़े 3 हजार रुपए के कर्ज से ट्यूबवेल लगाने का फैसला किया।
  •  सरकार की योजना के मुताबिक उन्होंने गेहूं और चावल की खेती शुरू की। हालांकि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की मदद से उन्हें एक स्थिर आमदनी जरूर मिल रही थी, लेकिन नेक सिंह संतुष्ट नहीं थे और वो और कमाना चाहते थे।
  •  इसी सिलसिले में सन 1980 से उन्होंने वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों से मिलना शुरू कर दिया। पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी(पीएयू) के संपर्क में आने के बाद कपास और टमाटर के पौधों का परीक्षण किया और नई तकनीक सीखी।
  •  इसी का नतीजा रहा कि 1988 से लेकर 2000 तक उन्हें टमाटर की खेती से काफी आमदनी हुई। टमाटर के साथ ही उन्होंने 1991 से मिर्च की खेती भी शुरू कर दी और उसके बाद से उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
  •  बीते सीजन में उन्होंने साढ़े तीन एकड़ में मिर्च के पौधे लगाए, लेकिन बताते हैं उनका टारगेट 10 एकड़ तक पहुंचने का है। नेक सिंह गेहूं की खेती नहीं करते हैं, बल्कि रबी के मौसम में ज्यादा कमाई वाली फसल आलू, सूरजमुखी और खरीफ मौसम में मिर्च और बासमती चावल की खेती करते हैं।
    इस तरह आया बदलाव
  •  पंजाब कृषि विश्वविद्यालय और भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) के प्रयोगों को दोहराते हुए 1991 में वो मिर्च की सफल खेती से परिचित हुए। इस काम को समझने में उन्हें बेंगलुरु के इंडियन इस्टीट्यूट ऑफ हॉर्टिकल्चर से भी काफी मदद मिली।
  •  नाभा के ये उद्यमी बताते हैं, “मैं देशभर के वैज्ञानिकों को जानता था जिन्होंने मुझे मिर्च की सीएच-1 प्रजाति के परीक्षण में शामिल होने का मौका दिया। साल दर साल मैंने विशेषज्ञों से मिल रही जानकारी की मदद से इस प्रजाति में सुधार करता रहा, जबकि मिर्च के आधिकांश किसान ये भी नहीं जानते हैं कि नर्सरी कैसे तैयार की जाती है।”
  •  बाद में उन्होंने मिर्च की खेती के लिए अनुकूल माहौल बनाने के लिए पॉली हाउस का विकास किया। ये पॉली हाउस राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब में काफी मशहूर था।

100 औरतें काम करती हैं नेक सिंह के फार्म पर, कमाती हैं 10 हजार तक

नेक सिंह इलाके की महिलाओं को काम करने का मौका देते हैं और उन्हें प्रति घंटा के लिए 40 रुपए देते हैं। नर्सरी की देखभाल, मिर्च चुनने, दूसरे काम में सहयोग करने जैसे काम के लिए हर साल 100 महिलाओं को काम पर रखते हैं। नेक सिंह बताते हैं कि उनके यहां काम करने का माहौल घर के जैसा है, वहीं उनके काम करने वाली महिलाएं हर महीने करीब 10 हजार रुपए कमा लेती हैं।

मिर्च की खेती संबंधी कुछ खास बातें

  •  एक एकड़ नर्सरी से 285 एकड़ खेती के लिए पौधे तैयार होते हैं।
  • मिर्च के पौधों (सैंपलिंग) से प्रति वर्ष 4500 रुपये से लेकर 6000 रुपए प्रति एकड़ तक आमदनी।
  •  हर साल पौधों (सैंपलिंग) से कुल आमदनी 26 से 50 लाख रुपए।
  •  प्रति एकड़ पौधे से करीब साढ़े सात लाख से 14 लाख रुपए की आमदनी।
  •  पौधे के बढ़ने का समय 5 महीना (नवंबर से मार्च तक)
  •  पैदावार लागत (श्रम, लॉजिस्टिक्स, इन्फ्रास्ट्रक्चर, पौधे के लिए बीज) ढाई लाख प्रति एकड़ श्रम लागत 40 रुपए प्रति घंटा।
  •  एक एकड़ में 180 से 220 क्विंटल हरी मिर्च के साथ 200 क्विंटल लाल मिर्च का उत्पादन होता है हरी मिर्च का बाजार मूल्य 12 से 25 रुपए प्रति किलो।
  • प्रति एकड़ सकल आय 6 लाख रुपए।
  •  प्रति एकड़ कुल आमदनी ( पैदावार लागत को घटाने के बाद) पांच लाख रुपए।
  •  प्रति एकड़ लैंड लीज 20 से 40 हजार रुपए (कुल आमदनी से घटाकर)

एप्पल बेर बेंच लखपति बन गया ये शख्स, इस ट्रिक ने यूं बदली किस्मत

पंजाब के मालवा में धान, गेहूं और कपास को छोड़कर किसान अब दूसरी फसलों और बागबानी की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। ऐसे ही एक किसान हैं फाजिल्का के चक्क बनवाला के महिंदर प्रताप धींगड़ा। उन्होंने पिछले साल अपनी साढ़े 6 एकड़ जमीन में थाई एप्पल बेर का बाग लगाया है। पहले साल उन्हें इससे 50 हजार रुपए प्रति एकड़ कमाई हुई जिसके इस साल बढ़कर प्रति एकड़ एक लाख रुपए से ज्यादा पहुंच जाने का अनुमान है।.

पश्चिम बंगाल से लाई थाई एप्पल बेर की पनीरी…

पूरी तरह जैविक खेती करने वाले महिंदर प्रताप धींगड़ा थाई एप्पल बेर की पनीरी पश्चिम बंगाल से लेकर आए थे। वह बताते हैं, बाग लगाने से पहले और बाद में मेरे मन में कई तरह के सवाल थे। पहली फसल देखकर थोड़ी तसल्ली हुई। इस बार फल और अच्छे नजर रहे हैं। भाव भी 30 से 35 रुपए प्रतिकिलो मिल रहा है।

इसकी अधिकांश खरीददार निजी कंपनियां है जो इसे विदेश भेजती हैं। अब हालांकि आकर्षक रूप और स्वाद के कारण स्थानीय बाजारों में भी इसकी मांग बढ़ रही हैं। उनके बाग का फल दिल्ली के अलावा लुधियाना, मोगा, जालंधर भी जाता है।

थाई एप्पल लॉन्ग टाइम इन्वेस्टमेंट…

महिंदर प्रताप धींगड़ा के अनुसार, उनके आसपास के कई गांवों के किसान थाई एप्पल बेर को देखने के लिए उनके बाग में रहे हैं। हाल ही में फाजिल्का जिले के ही झुमियांवाली गांव में भी एक किसान ने 12 एकड़ में इसका बाग लगाया है।

जिस तरह किसान रुचि दिखा रहे हैं, उससे लगता है कि अगले कुछ बरसों के दौरान इसका रकबा और बढ़ेगा। धींगड़ा कहते हैं, थाई एप्पल लॉन्ग टाइम इन्वेस्टमेंट है। एक बार इसका बाग लगाने के बाद 15 साल तक फसल ले सकते हैं।

थाईलैंड में इसे जुजुबी भी कहा जाता है…

थाई एप्पल का नाम आते ही जेहन में सेब का ख्याल आता है लेकिन यह बेर की एक किस्म है जो थाईलैंड में होती है। वहां इसे जुजुबी भी कहा जाता है। इसका स्वाद बेर जैसा ही होता है। थाईलैंड से ही यह किस्म भारत आई।

सेब जैसा दिखने वाला इसका फल 30 से 50 ग्राम तक का हो सकता है जबकि दूसरी किस्मों में बेर का वजन 5 से 10 ग्राम होता है। इसके एक पेड़ पर 40 से 50 किलो तक बेर लगते हैं। यह क्षारीय, अम्लीय और शुष्क, सभी तरह की मिट्टी में हो जाता है। फाजिल्का जिले की मिट्टी और जलवायु इसके लिए सबसे मुफीद है।

मटर के साथ ऐसे कर सकते है गेहूं की खेती ,दोगुना होगा मुनाफा

उत्तर प्रदेश के सैकड़ों किसान सहफसली खेती करके लाभ कमा रहे हैं। इससे फसलों की संख्या बढ़ जाती है। लागत भी कम आ रही है। इस दौरान कई क्षेत्रों में मटर के साथ गेहूं खूब देखा जा सकता है।

कन्नौज से करीब आठ किमी दूर मानीमऊ निवासी 18 वर्षीय शैलेंद्र कुमार बताते हैं, ‘‘मटर के साथ गेहूं किया है। मटर उखड़ने को है। गेहूं 20 दिन का हो चुका है। साथ में फसल करने से पानी बचता है। खेत खाली नहीं रहता। जुतौनी व खाद का खर्च भी बच जाता है।’’

एक तरीके से यह लाभकारी है। मटर की 60-65 दिन में तुड़ाई षुरू हो जाती है। 100-110 दिन में खत्म हो जाती है।मटर जब बोया जाता है तो पहला पानी लगाने के दौरान गेहूं छिड़क दिया जाता है।मटर के दौरान ही साथ में गेहूं करने से बुवाई बचती है। खेत तैयार करने, सिंचाई और लेवर खर्च बच जाता है।

लेकिन मटर के बाद गेहूं बोने से विलम्ब हो जाता है। जिसके कारण गेहूं की उतनी पैदावार भी नहीं हो पाती है और साथ में 20-25 फीसदी उत्पादन कम होता है।

समय रहते बुवाई से एक हेक्टेयर में 35-36 क्विंटल गेहूं निकलता है। नही तो 30-35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन होगा। मटर के बाद जनवरी में गेहूं करने से उत्पादन कम मिलेगा। खाली गेहूं समय से करने पर 40-45 क्विंटल गेहूं निकलता है। मटर में उर्वरक ज्यादा पड़ता है, इसलिए सहफसल में नहीं पडे़गा।