धान को रोग, कीटों से बचाने के लिए करें ये उपाय

किसान महंगे बीज, खाद इस्तेमाल कर धान की खेती करता है, ऐसे में सही प्रबंधन न होने से कीट और रोगों से काफी नुकसान उठाना पड़ता है। इसलिए सही समय से ही इनका प्रबंधन कर नुकसान से बचा जा सकता है।

धान की फसल को विभिन्न बीमारियों में जैसे धान का झोंका, भूरा धब्बा, शीथ ब्लाइट, आभासी कंड व जिंक कि कमी आदि की समस्या प्रमुख समस्या होती है। क्षतिकर कीटों जैसे तना छेदक, गुलाबी तना छेदक, पत्ती लपेटक, धान का फूदका और गंधीबग कीटों से नुकसान पहुंचता है।

धान का तना छेदक

इस कीट की सूड़ी अवस्था ही क्षतिकर होती है। सबसे पहले अंडे से निकलने के बाद सूड़ियां मध्य कलिकाओं की पत्तियों में छेदकर अन्दर घुस जाती हैं और अन्दर ही अन्दर तने को खाती हुई गांठ तक चली जाती हैं। पौधों की बढ़वार की अवस्था में प्रकोप होने पर बालियां नहीं निकलती हैं। बाली वाली अवस्था में प्रकोप होने पर बालियां सूखकर सफ़ेद हो जाती हैं और दाने नहीं बनते हैं।

कीट प्रबंध:

फसल की कटाई जमीन की सतह से करनी चाहिए और ठूठों को एकत्रित कर जला देना चाहिए। जिंक सल्फेट+बुझा हुआ चूना (100 ग्राम+ 50 ग्राम) प्रति नाली की दर से 15-20 ली. पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। पौध रोपाई के समय पौधों के ऊपरी भाग की पत्तियों को थोड़ा सा काटकर रोपाई करें, जिससे अंडे नष्ट हो जाते हैं। धतूरा के पत्ते नीम के पती तम्बाकू को 20 लीटर पानी में उबालें यह पानी 4-5 लीटर रह जाए तो ठंडा करके 10 लीटर गौमूत्र में मिलाकर छिड़काव करें।

रासायनिक विधि – तना छेदक की रोकथाम के लिए कार्बोफूरान तीन जी 20 किलोग्राम प्रति हेक्टर की दर से 3-5 सेमी स्थिर पानी में अथवा कारटाप हाइड्रोेक्लोराइड चार प्रतिशत 18 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 3-5 सेमी स्थिर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।

धान का पत्ती लपेटक कीट

मादा कीट धान की पत्तियों के शिराओं के पास समूह में अंडे देती हैं। इन अण्डों से छह-आठ दिनों में सूड़ियां बाहर निकलती हैं। ये सूड़ियां पहले मुलायम पत्तियों को खाती हैं और बाद में अपने लार से रेशमी धागा बनाकर पत्ती को किनारों से मोड़ देती हैं और अन्दर ही अन्दर खुरच कर खाती है।

धान की गंधीबग

वयस्क लम्बा, पतले और हरे-भूरे रंग का उड़ने वाला कीट होता है। इस कीट की पहचान कीट से आने वाली दुर्गन्ध से भी कर सकते हैं। इसके व्यस्क और शिशु दूधिया दानों को चूसकर हानि पहुंचाते हैं, जिससे दानों पर भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं और दाने खोखले रह जाते हैं।

देसी तरिके से –यदि कीट की संख्या एक या एक से अधिक प्रति पौध दिखायी दे तो मालाथियान पांच प्रतिशत विष धूल की 500-600 ग्राम मात्रा प्रति नाली की दर से छिड़काव करें। खेत के मेड़ों पर उगे घास की सफाई करें क्योंकि इन्ही खरपतवारों पर ये कीट पनपते रहते हैं और दुग्धावस्था में फसल पर आक्रमण करते हैं।

रासायनिक विधि –10 प्रतिशत पत्तियां क्षतिग्रस्त होने पर केल्डान 50 प्रतिशत घुलनशील धूल का दो ग्राम/ली. पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें।

भूरी चित्ती रोग

इस रोग के लक्षण मुख्यतया पत्तियों पर छोटे- छोटे भूरे रंग के धब्बे के रूप में दिखाई देतें है। उग्र संक्रमण होने पर ये धब्बे आपस में मिल कर पत्तियों को सूखा देते हैं और बालियां पूर्ण रूप से बाहर नहीं निकलती हैं। इस रोग का प्रकोप धान में कम उर्वरता वाले क्षेत्रों में अधिक दिखाई देता है।

इस रोग के रोकथाम के लिए बुवाई से पहले बीज को ट्राईसाइक्लेजोल दो ग्राम प्रति किग्रा. बीज की दर से उपचारित करें। पुष्पन की अवस्था में जरुरत पड़ने पर कार्बेन्डाजिम का छिड़काव करें। रोग के लक्षण दिखाई देने पर 10-20 दिन के अन्तराल पर या बाली निकलते समय दो बार आवश्यकतानुसार

रासायनिक विधि –कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत घुलनशील धूल की 15-20 ग्राम मात्रा को लगभग 15 ली पानी में घोल बनाकर प्रति नाली की दर से छिड़काव करें।

पर्णच्छाद अंगमारी

इस रोग के लक्षण मुख्यत: पत्तियों पर दिखाई देते हैं। संतुलित मात्रा में नत्रजन, फास्फोरस और पोटाश का प्रयोग करें। बीज को थीरम 2.5 ग्राम/किग्रा. बीज की दर से उपचारित करके बुवाई करें। जुलाई महीने में रोग के लक्षण दिखाई देने पर मैकोजेब (0.24 प्रतिशत) का छिड़काव करें।

आभासी कंड

यह एक फफूंदीजनित रोग है। रोग के लक्षण पौधों में बालियों के निकलने के बाद ही स्पष्ट होते हैं। रोगग्रस्त दाने पीले से लेकर संतरे के रंग के हो जाते हैं जो बाद में जैतूनी- काले रंग के गोलों में बदल जाते हैं। फसल काटने के बाद अवशेषों को जला दें। खेतों में अधिक जलभराव नहीं होना चाहिए। रोग के लक्षण दिखाई देने पर प्रोपेकोनेजोल 20 मिली. मात्रा को 15-20 ली. पानी में घोल बनाकर प्रति नाली की दर से छिड़काव करें।

जाने 17 रुपये किलो में 19:19:19 स्प्रे को घर पर त्यार करने का तरीका

19:19:19 स्प्रे को पौधों के लिए बहुत ही उपयोगी माना जाता है | इसके इस्तेमाल से फसल की ग्रोथ बढ़िया होती है इस लिए बहुत सारी फसलों में इसका प्रयोग होता है | लेकिन यह उपयोगी उर्वरक बहुत ही महंगा पड़ता है |बाजार में इसकी कीमत 150 रुपये किलो के करीब है | लेकिन आप इसको घर पर सिर्फ 17 रुपये किलो के हिसाब से भी त्यार कर सकते है |

बाजार में किसान की इस 19:19:19 स्प्रे से बहुत लूट की जाती है क्योंकि इसको एक किलो बनाने का खर्च सिर्फ 15-17 के करीब होता है |

कैसे त्यार करें 19:19:19 स्प्रे

इस स्प्रे को बनाने के लिए हमे यूरिया,डी.ऐ,पी और पोटाश चाहिए जो हर किसान के पास आसानी से मिल जाती है | 19:19:19 स्प्रे इन तीनो से मिलकर ही बना होता है बस अब यूरिया,डी.ऐ,पी और पोटाश को एक खास अनुपात में मिलाकर पानी में घोलना होता है और हमारी 19:19:19 स्प्रे त्यार

19:19:19 स्प्रे के लिए हमे चाहिए

  • यूरिया =500 ग्राम
  • डी.ऐ,पी = 1 किलो
  • पोटाश =500 ग्राम

इन तीनो में से डी.ऐ,पी एक दिन पहले पानी में घोल ले क्योंकि यह घुलने में ज्यादा समय लेती है साथ ही इसके घोल को एक बार छान ले क्योंकि यह नोज़ल जाम कर देती है | बाकि दोनों का घोल मौके पर त्यार कर सकते है तीनो का घोल त्यार करके तीनो को मिला सकते है और ऐसे आपका 19:19:19 स्प्रे त्यार हो जयेगा |

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बासमती की इस किस्म में नहीं लगेगा रोग, होगा अच्छा उत्पादन

दुनिया भर में बासमती चावल उत्पादन में नंबर एक भारत में पिछले कई वर्षों से बासमती चावल में रसायनों की अधिक मात्रा निर्यात में रोड़ा बन रही है, लेकिन बासमती की ये नई किस्म रोग अवरोधी होने के कारण इसमें रसायन का छिड़काव नहीं करना पड़ेगा।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने पूसा बासमती-1 से नई किस्म पूसा बासमती 1637 विकसित की है। ये किस्म रोग अवरोधी हैं, इनमें गर्दन तोड़ (ब्लास्ट) रोग नहीं लगता है, जिससे इसमें रसायन का स्प्रे नहीं करना पड़ेगा या बहुत कम मात्रा में करना पड़ेगा।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय पादप जैव प्रौद्योगिकी संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. दीपक सिंह बताते हैं, “इस किस्म को हमने पूसा बासमती-1 से विकसित किया है, जिसमें फंजाई से होने वाला रोग गर्दन तोड़ और ब्लास्ट रोग नहीं लगेगा, जिससे किसानों को फायदा होने वाला है।” वो आगे बताते हैं, “इस किस्म के बीज के लिए किसान पूसा में सम्पर्क कर सकते हैं, जहां से किसानों को सही दाम पर बीज मिल जाएगा।”

किसान व बासमती निर्यातकों को इसका फायदा होने वाला है। दोनों किस्मों के चावल यूरोप में एक्सपोर्ट होते हैं। बीमारी आने पर किसान ज्यादा स्प्रे करते थे, इस कारण जहर की मात्रा चावल में भी बढ़ जाती थी। इससे चावल यूरोप में कई बार रिजेक्ट हो जाता था, लेकिन अब नई किस्म में ऐसा नहीं होगा। इससे किसानों की आय भी बढ़ेगी।

इस किस्म को हमने पूसा बासमती-1 से विकसित किया है, जिसमें फंजाई से होने वाला रोग गर्दन तोड़ और ब्लास्ट रोग नहीं लगेगा, जिससे किसानों को फायदा होने वाला है। डॉ. दीपक सिंह, राष्ट्रीय पादप जैव प्रौद्योगिकी संस्थान ऑल इंडिया चावल एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अनुसार हर वर्ष देश में लगभग 8773.78 हजार टन बासमती चावल का उत्पादन होता है।

भारत बासमती चावल में विश्व बाज़ार का अग्रणी निर्यातक है। देश ने वर्ष 2016-2017 के दौरान विश्व को 21,604.58 करोड़ रुपए (यानि 3,230.24 अमेरिकी मिलियन डॉलर) मूल्य का 40,00,471.56 मीट्रिक टन बासमती चावल निर्यात किया था जिसमें प्रमुख रूप से सउदी अरब, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, इराक और कुवैत में बड़ी मात्रा में बासमती चावल गया था।

ऐसे में इस सला बासमती धान की खेती और पैदावार घटने से चावल के निर्यात पर असर पड़ेगा। ये भी पढ़ें- फेफड़े व स्तन कैंसर के खात्मे में मददगार छत्तीसगढ़ के ये तीन धान पूसा बासमती 1637 पूसा बासमती-1 का सुधरा हुआ रूप है। पूसा बासमती- 1 में ब्लास्ट (झोंका) रोग आने की संभावना ज्यादा रहती थी, लेकिन 1637 में यह बीमारी नहीं आएगी। इस किस्म में रोग रोधी क्षमता हैं, इसका प्रति एकड़ 22 से 25 कुंतल तक हो सकता है।

इन प्रदेशों में होती है बासमती की खेती

देश में पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली में किसान बासमती की खेती करते हैं, जिसमें पंजाब बासमती उत्पादन में अग्रणी राज्य है।

ये हैं बासमती की अन्य किस्में

भारत सरकार के बीज अधिनियम तहत वर्ष 1966 से अभी तक बासमती चावल की 29 किस्में खेती के लिए अधिसूचित की गई हैं, जिनका देश के 7 राज्यों के लगभग 81 जिलों में खेती की जाती है।बासमती चावल की प्रमुख किस्में में बासमती 217, बासमती 370, टाइप 3 (देहरादूनी बासमती) पंजाब बासमती 1 (बउनी बासमती), पूसा बासमती 1, कस्तूरी, हरियाणा बासमती 1, माही सुगंधा, तरोरी बासमती (एच.बी.सी 19/ करनाल लोकल), रणबीर बासमती, बासमती 386,

इम्प्रूव्ड पूसा बासमती 1 (पूसा 1460), पूसा बासमती 1121 (संशोधन के पश्चात्), वल्लभ बासमती 22, पूसा बासमती 6 (पूसा 1401), पंजाब बासमती 2, बासमती सी.एस.आर 30 (संशोधन के पश्चात्), मालविया बासमती धान 10-9 (आई.ई.टी 21669), वल्लभ बासमती 21 (आई.ई.टी 19493), पूसा बासमती 1509 (आई.ई.टी 21960), बासमती 564, वल्लभ बासमती 23, वल्लभ बासमती 24, पूसा बासमती 1609, पंत बासमती 1 (आई.ई.टी 21665), पंत बासमती 2(आई.ई.टी 21953), पंजाब बासमती 3, पूसा बासमती 1637 और पूसा बासमती 1728 जिनकी खेती की जाती है।

इस तरह करे धान में सरसों की खली का उपयोग, 7 क्विंटल उत्पादन में होगी बढ़ोतरी

सरसों का तेल निकालने के बाद जो अवशेष प्राप्त होता है उसको खली कहते हैं । इसका प्रयोग धान के साथ साथ अन्य फसलों में करने से काफी मात्रा में तत्वों के प्राप्त होने के साथ ही साथ मृदा में पनपने वाले हानिकारक कीटाणुओं को नष्ट करते हैं । फसल की आवश्यकतानुसार इनका प्रयोग करना चाहिए ।

धान में सरसों की खली का उपयोग बहुत फायदेमंद है। यह एक जैविक तरीका है जिसके साथ हम धान की उपज बढ़ा कर सकते हैं। इसके परिणाम धान के पौधे की ग्रोथ के लिए बहुत अच्छे हैं। 2006 में, बांग्लादेश विश्वविद्यालय ने धान में सरसों की खली के उपयोग के संबंधित एक ट्रायल लगाया था, जिसमें बहुत अच्छे परिणाम आये थे। परीक्षणों के बाद, धान उपज में प्रति हेक्टेयर 7 क्विंटल की पैदावार में बढ़ोतरी हुई थी।

रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया है कि सरसों की खली के उपयोग से चावल के अनाज की मोटाई बड़ी है, धान की बाली की संख्या बड़ी है और अनाज के वजन में बढ़ोतरी हुई है। फसल की उत्पादन में भी बढ़ोतरी हुई है, धान उपज बढ़ने का कारण सरसों की खली में पाए गए छह मुख्य तत्व हैं। विशेष रूप से, नाइट्रोजन, पोटेशियम और फास्फोरस के साथ-साथ सल्फर, ज़िंक और ब्रोन भी पाए जाते हैं। इन तत्वों के लिए, हमें खेतों में यूरिया, डीएपी और अन्य की आवश्यकता होती है।

रिपोर्ट के अनुसार, एक एकड़ में 32 किलोग्राम खल का उपयोग किया गया था , लेकिन मिट्टी अच्छी होने के कारण, हम एक एकड़ में केवल 16 किलोग्राम का उपयोग कर सकते हैं।  मिटटी अच्छी नहीं है वहाँ 20 किलोग्राम उपयोग कर सकते हैं। धान में खली का उपयोग करने के दो तरीके हैं। पहली विधि ड्रम में लगातार 5-6 दिनों तक रखे और जब ये पानी मे घुल जाए तब इसे खेत मे पानी लगाते समय डाल दे। दूसरा तरीका है आप इसे सूखा ही खेत मे डाल सकते हैं। जब धान की फसल 15-20 दिन की होती है तो इसका उपयोग करने का सही समय होता है,

ऐसे करें काजू की खेती , एक पेड़ से एक बार में होगी 12000 रु की फसल

काजू का नाम सुनते ही मुंह में पानी आ जाता है ।काजू को ड्राई फ्रूट्स का राजा कहा जाए तो गलत नहीं होगा ।काजू बहुत तेजी से बढ़ने वाला पेड़ है इसमे पौधारोपन के तीन साल बाद फूल आने लगते हैं और उसके दो महीने के भीतर पककर तैयार हो जाता है। काजू की उत्पत्ति ब्राजील से हुआ है। हालांकि आजकल इसकी खेती दुनिया के अधिकाश देशों में की जाती है। सामान्य तौर पर काजू का पेड़ 13 से 14 मीटर तक बढ़ता है। हालांकि काजू की बौना कल्टीवर प्रजाति जो 6 मीटर की ऊंचाई तक बढ़ता है, जल्दी तैयार होने और ज्यादा उपज देने की वजह से बहुत फायदेमंद व्यावसायिक उत्पादकों के लिए साबित हो सकती है ।

काजू कुछ मशहूर किस्में-

काजू की कई उन्नत और हाइब्रिड या वर्णसंकर किस्मे उपलब्ध हैं। अपने क्षेत्र के स्थानीय कृषि, बागबानी या वन विभाग से काजू की उपयुक्त किस्मों का चुनाव करें।

Kaju4वेनगुर्ला- 1 एम वेनगुर्ला- 2, वेनगुर्ला-3, वेनगुर्ला-4, वेनगुर्ला-5, वृर्धाचलम-1, वृर्धाचलम-2, चिंतामणि-1,एनआरसीसी-1, एनआरसीसी-2, उलाल-1, उलाल-2, उलाल-3, उलाल-4, यूएन-50, वृद्धाचलम-3, वीआआई(सीडब्लू) एचवन, बीपीपी-1, अक्षय(एच-7-6),अमृता(एच-1597), अन्घा(एच-8-1), अनाक्कयाम-1 (बीएलए-139), धना(एच 1608), धाराश्री(एच-3-17), बीपीपी-2, बीपीपी-3, बीपीपीपी-4, बीपीपीपी-5, बीपीपीपी-6,बीपीपीपी-8,(एच2/16).

काजू की खेती के लिए आवश्यक जलवायु-

काजू मुख्यत: उष्णकटिबंधीय फसल है और उच्च तापमान में भी अच्छी तरह बढ़ता है। इसका नया या छोटा पौधा तेज ठंड या पाला के सामने बेहद संवेदनशील होता है। समुद्र तल से 750 मीटर की ऊंचाई तक काजू की खेती जा सकती है। काजू की खेती के लिए आदर्श तापमान 20 से 35 डिग्री के बीच होता है। इसकी वृद्धि के लिए सालाना 1000 से 2000 मिमी की बारिश आदर्श मानी जाती है। अच्छी पैदावार के लिए काजू को तीन से चार महीने तक पूरी तरह शुष्क मौसम चाहिए। फूल आने और फल के विकसित होने के दौरान अगर तापमान 36 डिग्री सेंटीग्रेड के उपर रहा तो इससे पैदावार प्रभावित होती है।

मिट्टी की किस्में-

काजू की खेती कई तरह की मिट्टी में हो सकती है क्योंकि यह अलग-अलग प्रकार की मिट्टी में खुद को समायोजित कर लेती है और वो भी बिना पैदावार को प्रभावित किये। हालांकि काजू की खेती के लिए लाल बलुई दोमट (चिकनी बलुई मिट्टी) मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है। मैदानी इलाके के साथ-साथ600 से 750 मीटर ऊंचाई वाले ढलवां पहाड़ी इलाके भी इसकी खेती के लिए अनुकूल है।

काजू की खेती के लिए कार्बनिक पदार्थ से भरपूर गहरी और अच्छी सूखी हुई मिट्टी चाहिए। व्यावसायिक उत्पादकों को काजू की खेती के लिए उर्वरता का पता लगाने के लिए मिट्टी की जांच करानी चाहिए। मिट्टी में किसी पोषक अथवा सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी दूर की जानी चाहिए। 5.0 से 6.5 तक के पीएच वाली बलुई मिट्टी काजू की खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है।

काजू के पौधारोपन का मौसम-

जून से दिसंबर तक दक्षिण एशियाई क्षेत्र में इसकी खेती सबसे ज्यादा होती है। हालांकि, अच्छी सिंचाई की व्यवस्था होने पर इसकी खेती पूरे साल भर की जा सकती है।

जमीन की तैयारी और पौधारोपन-

जमीन की अच्छी तरह जुताई कर उसे बराबर कर देना चाहिए और समान ऊंचाई में क्यारियां खोदनी चाहिए। मृत पेड़, घास-फूस और सूखी टहनियों को हटा दें। सामान्य पौधारोपन पद्धति में प्रति हेक्टेयर 200 पौधे और सघन घनत्व में प्रति हेक्टेयर 500 पौधे (5मीटर गुना 4 मीटर की दूरी) लगाए जाने चाहिए। एक ही क्षेत्र में उच्च घनत्व पौधारोपन में ज्यादा पौधे की वजह से ज्यादा पैदावार होती है।

खेत की तैयारी और पौधों के बीच दूरी क्या हो ?

सबसे पहले 45 सेमी गुना 45 सेमी गुना 45 सेमी की ऊंचाई, लंबाई और गहराई वाले गड्ढे खोदें और इन गड्ढों को 8 से 10 किलो के अपघटित (अच्छी तरह से घुला हुआ) फार्म यार्ड खाद और एक किलो नीम केक से मिली मिट्टी के मिश्रण से भर दें। यहां 7 से 8 मीटर की दूरी भी अपनाई जाती है।

काजू खेती के लिए सिंचाई के तरीके-

आमतौर पर काजू की फसल वर्षा आधारित मजबूत फसल है। हालांकि, किसी भी फसल में वक्त पर सिंचाई से अच्छा उत्पादन होता है। पौधारोपन के शुरुआती एक दो साल में मिट्टी में अच्छी तरह से जड़ जमाने तक सिंचाई की जरूरत पड़ती है। फल के गिरने को रोकने के लिए सिंचाई का अगला चरण पल्लवन और फल लगने के दौरान चलाया जाता है।

काजू की खेती में अंतर फसल-

काजू की खेती में अंतर फसल के द्वारा किसान अतिरिक्त कमाई कर सकते हैं। अंतर फसल मिट्टी की ऊर्वरता को भी बढ़ाता है। ऐसा शुरुआती सालों में ही संभव है जब तक कि काजू के पौधे का छत्र कोने तक न पहुंच जाए और पूरी तरह छा न जाए। बरसात के मौसम में अंदर की जगह की अच्छी तरह जुताई कर देनी चाहिए और मूंगफली, दाल या फलियां या जौ-बाजरा या सामान्य रक्ताम्र (कोकुम) जैसी अंतर फसलों को लगाना चाहिए।

प्रशिक्षण और कटाई-छंटाई-

काजू के पेड़ को अच्छी तरह से लगाने या स्थापित करने के लिए लिए ट्रेनिंग के साथ-साथ पेड़ की कटाई-छंटाई की जरूरत होती है। पेड़ के तने को एक मीटर तक विकसित करने के लिए नीचे वाली शाखाओं या टहनियों को हटा दें। जरूरत के हिसाब से सूखी और मृत टहनियों और शाखाओं को हटा देना चाहिए।

जंगली घास-फूस पर निंयत्रण का तरीका-

काजू के पौधे की अच्छी बढ़त और अच्छी फसल के लिए घास-फूस पर नियंत्रण करना बागबानी प्रबंधन के कार्य का ही एक हिस्सा है। ऊर्वरक और खाद की पहली मात्रा डालने से पहले घास-फूस को निकालने की पहली प्रक्रिया जरूर पूरी कर लें। घास-फूस निकालने की दूसरी प्रक्रिया मॉनसून के मौसम के बाद की जानी चाहिए। दूसरे तृणनाशक तरीकों में मल्चिंग यानी पलवार घास-फूस पर नियंत्रण करने का अगला तरीका है।

काजू उत्पादन की मात्रा

फसल की पैदावार कई तत्वों, जैसे कि बीज के प्रकार, पेड़ की उम्र, बागबानी प्रबंध के तौर-तरीके, पौधारोपन के तरीके, मिट्टी के प्रकार और जलवायु की स्थिति पर निर्भर करता है। हालांकि कोई भी एक पेड़ से औसतन 8 से 10 किलो काजू के पैदावार की उम्मीद कर सकता है। हाइब्रिड या संकर और उच्च घनत्व वाले पौधारोपन की स्थिति में और भी ज्यादा पैदावार की संभावना होती है।एक पौधे से 10 किल्लो की फसल होती है तो 1000-1200 रु किल्लो के हिसाब से एक पौधे से एक बार में 12000 रुपये की फसल होगी ।

जापान के इस वैज्ञानिक के फार्मूले से आप कर सकते है सूखे खेत में धान की खेती

अगर आप सोचते है के धान की खेती के लिए बहुत ज्यादा पानी की जरूरत होती है तो आप गलत सोच रहे है ।आप सूखे खेत में भी धान की खेती कर सकते है । ऐसा संभव किया था जापान के शिकोकु द्वीप पर रहने वाले मासानोबू फुकुओका (1913-2008) एक किसान और दार्शनिक ने अपने जीवन के अगले पैंसठ सालों तक उन्होंने प्राकृतिक खेती को समृद्ध बनाने में लगा दिए।

वो अपने खेत की जुताई नहीं करते, कोई रासायनिक उर्वरक या खाद का इस्तेमाल नहीं करते, और एशिया के तकरीबन सभी भागों में धान की खेती करने वाले किसानों की तरह वो अपने धान के खेत में पानी भी नहीं भरते और तब भी उनके खेतों का उत्पादन जापान के इसी तरह के अन्य खेतों के उत्पादन से ज्यादा या तकरीबन बराबर होता था।

मासानोबू ने कहते थे की उनके पड़ोसी के खेत में चावल के पौधे की ऊंचाई अगस्त के महीने में उनकी कमर तक या उससे ऊफर तक आ जाती थी। जबकि उनके खुद के खेत में ये ऊंचाई करीब आधी ही रहती थी। लेकिन फिर भी वो खुश रहते थे क्योंकि उनको मालूम होता था कि उनका कम ऊंचाई वाला पौधा बाकियों के बराबर या ज्यादा पैदावार देगा।

मासानोबू के मुताबिक आमतौर पर साइज में बड़े पौधे से अगर 1 हजार किलो पुआल निकलता है तो करीब 500 से 600 किलो चावल का उत्पादन होता है। जबकि मासानोबू की तकनीक में 1 हजार किलो पुआल से 1 हजार किलो ही चावल निकलता है। फसल अच्छी रहने पर ये 1200 किलो तक चला जाता है।

क्या है फार्मूला

  • दरअसल, अगर आप चावल के पौधे को सूखे खेत में उगाते हैं तो ये ज्यादा ऊंचे नहीं हो पाते। कम ऊंचाई का फायदा मिलता है। इससे सूरज की रोशनी पौधे के हर हिस्से पर पड़ती है। पौधे के पत्ते से लेकर जड़ तक सूरज की रोशनी जाती है।
  • 1 वर्ग इंच की पत्ती से 6 दाने पैदा होने की संभावता ज्यादा बन जाती है। जबकि पौधे के सबसे ऊपरी हिस्से पर आने 3-4 वाली पत्तियों से ही करीब 100 दाने आ जाते हैं।
  • मासानोबू बीज को थोड़ी ज्यादा गहराई में बोते थे, जिससे 1 वर्ग गज में करीब 20 से 25 पौधे उगते हैं।
  • इनसे करीब 250 से लेकर 300 तक दानों का उत्पादन हो जाता है।
  • खेत में पानी नहीं भरने से पौधे की जड़ ज्यादा मजबूत होती है। इससे बिमारियों और कीड़ों से लड़ने में पौधे को काफी मदद मिलती है।
  • जून महीने में मासानोबू करीब 1 हफ्ते के लिए खेत में पानी को जाने से रोक देते हैं। इसका फायदा ये मिलता है कि खेत के खतरपतवार पानी की कमी की वजह से जल्दी मर जाते हैं। इसका फायदा ये होता है कि इससे चावल के अंकुर ज्यादा अच्छे से स्थापित हो पाते हैं।
  • मासानोबू, मौसम के शुरु में सिंचाई नहीं करते। अगस्त के महीने में थोड़ा थोड़ा पानी जरूर देते हैं लेकिन उस पानी को वो खेत में रूकने नहीं देते।
  • इस सबसे बावजूद उनकी इस तकनीक से चावल की पैदावार कम नहीं होती।

इस तकनीक से करें धान की खेती और आधे पानी के साथ बचाए 6000 प्रति एकड़

धान में सीधी बुआई (जीरो टिलेज) से कई महत्वपूर्ण फायदे क्षेत्र स्तर पर होते हैं जैसे समय पर धान की बुवाई हो जाती एंव लागत कम हो जाती है। पराम्परागत तरीके से नर्सरी उगाने, कादो करना तथा रोपनी करने पर धान की खेती में लागत बढ़ जाती है। घनहर क्षेत्रों में हमेशा कादो करने से वहाँ की मिट्टी की भैतिक दशा खराब हो जाती है जिससे रबी फसलों की पैदावार में कमी आती है।

फसलों में कम लागत लगाकर अधिक उत्पादन पाने के लिए किसानों को फसल चक्र को समझना एवं समय पर रोपाई या बुवाई के साथ-साथ उत्तम बीज और उर्वरकों की संतुलित मात्रा एवं नई तकनीकों को प्रयोग प्रतिदिन लागत में वृद्धि , समय पर पानी एवं मजदूरों की अनुपलब्धता एवं मृदा स्वास्थ में गिरावट की समस्या के समाधान हेतु धान की सीधी बुआई ही रोपाई का एक सही विकल्प है ।

समय से धान की बोआई से 6-10 प्रतिशत तक उत्पादन में वृद्धि होती है और 15-20 प्रतिशत उत्पादन लागत में में बचत होती है। साथ ही इस तकनीक का प्रयोग करने से समय, श्रम संसाधन एवं लागत की बचत होती है। बाकी बचत के साथ ही अगर आप डीज़ल से पंप चला कर सिंचाई करते है तो कम से कम 6000 प्रति एकड़ तक बचत हो सकती है इन्हीं फायदे के मद्दे नजर किसानों का ज्यादा से ज्यादा रूझान सीधी बुआई की तरफ बढ़ रहा है।

धान की सीधी बुवाई के लिए कौन सी मशीन उपयुक्त है?

धान की सीधी बुवाई के लिए जीरो टिल ड्रिल अथवा मल्टीक्राप प्रयोग में लाया जाता है। जिन खेतों में फसलों के अवशेष हो और जमीन आच्छादित हो वहाॅ पर टरबो हैपी सीडर या रोटरी डिस्क ड्रिल जैसी मशीनों से धान की बुवाई करनी चाहिए। जीरो टिल ड्रिल अथवा मल्टीक्राॅप जीरो टील ड्रील 35-45 हार्स पावर टैªक्टर से चलती है। इस मशीन में मिट्टी चीरने वाले 9 या 11 भालानुमा फार 22 से.मी. की दूरी पर लगे होते है और इसे ट्रैक्टर के पीछे बाॅधकर चलाया जाता है।

नौ कतार वाली जीरो टिल ड्रिल से करीब प्रति घण्टा एक एकड़ में धान की सीधी बुवाई हो जाती है। ध्यान देने की योग्य बात है कि बुआई के समय खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए। बिना जुताई किए हुए खेतों में राईस ट्रान्सप्लान्टर द्वारा भी 15 दिन पुराने बिचड़ों की रोपाई की जा सकती है, वशर्तें की भूमि समतल एवं सपाट हो।

सीधी बुवाई का उचित समय:

सामान्यः धान की सीधी बुवाई मानसून आने के करीब एक से दो सप्ताह पूर्व करना अच्छा होता है। देश के मध्य पूर्वोत्तर इलाके में मानसून का आगमन 10-15 जून तक होता है अतः धान की सीधी बुवाई 31 मई तक हो जानी चाहिए। ऊपरी जमीन पर जहा पानी का भराव नहीं होता और अगात प्रजातिया लगाना है वहा पर धान की सीधी बुवाई 15 जुलाई तक कर सकते हैं। धान को सीधी बुवाई का समय इस प्रकार है:

पिछात प्रजातिया: 140-155 दिन, 25 मई से 10 जून

मध्यम प्रजातिया: 130-140 दिन, 10 जून से 25 जून

अगहनी एवं अगेत प्रजातिया: 100-140 दिन, 25 जून से 15 जुलाई

बीज की मात्रा एवं बीजोपचार:

सीधी बुवाई विधि में जीरो टिल ड्रिल मशीन के द्वारा मोटे आकार के दानो वाले धान की किस्मों के लिए बी की मात्रा 30-35 किलोग्राम, मध्यम धान की 25 से 30 किलोग्राम तथा छोटे महीन दाने वाले धान की 20 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होती है।

बुवाई से पूर्व धान के बीजों का उपचार अति आवश्यक है। सबसे पहले बीज को 8-10 घंटे पानी में भींगोकर उसमें से खराब बीज को निकाल देते हैं। इसके बाद एक किलोग्राम बीज की मात्रा के लिए 0.2 ग्राम सटेप्टोसाईकलीन के साथ 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम मिलाकर बीज को दो घंटे छाया में सुखाकर मशीन के द्वारा सीधी बुवाई करनी चाहिए।

धान की बुवाई की तैयारी:

बुवाई से पूर्व धान के खेत को यथासंभव समतल कर लेना चाहिए। यदि आर्थिक रूप से संभव हो तो भूमि को लेजर लेवलर मशीन से समतल कर लें। बुवाई के समय खेत में पर्याप्त नमी की मात्रा उपलब्ध होनी चाहिए। जिस खेत में नमी की कमी हो अथवा बहुत ही कम होे वहाॅ पहले खरपतवारनाशी का प्रयोग करना चाहिए इसके एक सप्ताह बाद हल्की सिंचाई कर दें एवं खेत में उचित नमी आने पर मशीन द्वारा बुवाई करना हितकर है।

बुवाई करने से पूर्व जीरो टिल ड्रिल मशीन का अंशशोधन कर लेना चाहिए जिससे बीज एवं खाद निर्धारित मात्रा एक कप से एवं गइराई में पड़े। धान की सीधी बुवाई करते समय बीज को 3-5 से.मी. गहराई पर ही बोना चाहिए। इससे ज्यादा गहरा करने पर अंकुरण कुप्रभावित होता है जिससे धान की पैदावार में कमी आती है। मशीन द्वारा सीधी बुवाई में कतार से कतार की दूरी 20 से.मी. तथा पौधे की दूरी 5-10 से.मी. होती है।

खरपतवार प्रबंधनः

नदीनों की भरमार से बचने के लिए बिजाई से 48 घंटे के अंदर लीटर सटोप प्रति एकड़ 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए। धान बिजाई से 20 से 25 दिन बाद 100 मिलीलीटर नोमनीगोल या माचो प्रति एकड़ का छिड़काव 150 लीटर पानी में मिलाकर करना चाहिए। चोड़े पत्ते वाले नदीनों की रोकथाम करने के लिए 16 ग्राम सैगमैट दवाई की स्प्रे प्रति एकड़ करनी चाहिए।

उर्वरक प्रबंधन:

सीधी बुवाई वाली धान में प्रति हेक्टेयर 80-100 कि.ग्रा. नेत्रजन (75-217 कि.ग्रा. यूरिया), 40 किलो फास्फोरस (250 कि.ग्रा. एस.एस.पी) और 20 किलो पोटास (33 किलो म्यूरेट आफ पोटाश) की जरूरत होती है। नेत्रजन की एक तिहाई और फास्फोरस तथा पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय प्रयोग करना चाहिए। नेत्रजन की बाकी मात्रा (शेष मात्रा दो बराबर हिस्सों में कल्ले फूटते समय तथा बाली निकलने के समय प्रयो करें।

अगर मिट्टी में गंधक की कमी पाई जाती है तो बुवाई के समय ही 30 कि.ग्रा. गंधक प्रति हेक्टेयर की दर से उपयोग करना चाहिए एवं धान-गेहूँ फसल चक्र वाले क्षेत्रों में हर दो साल पर 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर जिंक सल्फेट का प्रयोग बुवाई के समय करना चाहिए।

सिंचाई प्रबंधनः

शोध में यह पाया गया है कि धान की बुवाई सीधी विधि द्वारा करने पर 40 से 60 प्रतिशत पानी की बचत पारंपरिक तरीके द्वारा धान की खेती की अपेक्षा होती है। धान के खेत में लगातार जल भराब की जरूरत नहीं होती । धान की सीधी बुवाई के समय खेत में उचित नमी होना जरूरी है और सूखे बीज का प्रयोग किया गया है तो बुवाई के 12 घंटे के अंदर हल्की सिंचाई देनी चाहिए।

फसल के जमाव एवं 20-25 दिनों तक हल्की सिंचाई के द्वारा खेत में नमी बनाए रखना चाहिए। फूल आने से पहले से फूल आने की अवस्था (लगभग 25-30 दिन तक खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखे। दाना बनने की अवस्था (लगभग एक सप्ताह में पानी की कमी खेत में नहीं होनी चाहिए।

मुख्यतः कल्ला फूटने के समय वाली, गाभा फूटतें समय और दाना बनने वाली अवस्थाओं में धान के खेत में पर्याप्त नमी की कमी नहीं होने देना चाहिए। बिना कादो किए सीधी बुवाई वाले धान के खेत में पानी सूखने पर बड़ी -बड़ी दरारे नहीं पड़ती हैं अतः इन खेतों में महीन दरार आने पर सिंचाई कर देनी चाहिए। कटाई से 15-20 दिन पहले सिंचाई बंद कर देनी चाहिए जिससे फसल की कटाई आसानी से हो सके।

धान की सीधी बुवाई (जीरो टिलेज ) तकनीक से लाभः

धान की रोपाई विधि से खेती करने मे जो समस्याए। आती हैं उनका एक ही विकल्प है धान की सीधी बुवाई तकनीक को अपनाना। धान की सीधी बुवाई तकनीक के प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैः

  • 20 से 25 प्रतिशत पानी की बचत होती है क्योंकि इस इस विधि से धान की बुवाई करने पर खेत में लगातार पानी रखने की आवश्यकता नही पड़ती है।
  • मजदुरो एवं समय की बचत होती है क्योंकि इस विधि में रोपाई करने की जरूरत नहीं पड़ती है।
  • धान की नर्सरी उगाने, खेत का कादो करने तथा रोपनी का खर्च बच जाता है।
  • रोपाई वाली विधि के तुलना में इस तकनीक में उर्जा व इंधन की बचत होती है।
  • समय से धान की खेती शरू हो जाती है इससे इसकी उपज अधिक मिलने की संभावना होती है।
  • पानी, श्रम एवं इंधन की बचत के कारण सीधी बुवाई में लागत कम आती है
  • लगातार धान की खेती रोपाई विधि से करने पर कादो करने की जरूरत पड़ती है जिससे भूमी को भौतिक दशा पर बुरा असर पड़ता है जबकि लेकिन सीधी बुवाई
  • तकनीक मिट्टी की भौतिक गुणवत्ता को बनाई रखती है।
  • इस विधि से किसान जीरो टिलेज मशीन में खाद व बीज डालकर आसानी से बुवाई कर सकता है एवं कादो तथा रोपाई से निजात पा लेता है।
  • रोपाई विधि के अपेक्षा सीधी बुवाई सामयिक हो जाती है और अधिक पैदावर मिलती है।
  • रोपाई विधि के तुलना मंे सीधी बुवाई विधि से धान की खेती करने में बीज की मात्रा कम लगती है। इस विधि से धान की बुवाई सीधे खेत में 50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से की जाती हैं।
  • समय, श्रम, संसाधन एवं लागत की बचत होती है।

ऐसे करें गूंद कतीरा लेप से धान की खेती, आधे खर्च और आधे पानी की पडेगी जरूरत

खाद-लागत में पक गया धान, कोई अजूबा नहीं, परंतु सच्चाई है। जो संभव हुआ डॉ. वीरेंद्र सिंह लाठर, प्रधान वैज्ञानिक भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान,क्षेत्रीय स्टेशन करनाल द्वारा विकसित हर्बल हाइड्रोजेल गूंद कतीरा लेप बीज तकनीक को सीधी बिजाई धान में अपनाने से। यह सेक्टर -2 शहर करनाल में पांच एकड़ और हरियाणा पंजाब में सैकड़ों एकड़ खेतों पर तैयार की गई है।

तकनीक से धान की फसल सिर्फ 5-6 सिंचाई, 50 किलो डीएपी और 60-70 किलो यूरिया प्रति एकड़ से तैयार हो गई और अब तक सिर्फ 6000 रुपए प्रति एकड़ की लागत आई है। जबकि परंपरागत रोपाई धान पद्धति में 20-25 सिंचाई की जरूरत होती है और रोपाई तक की लागत ही 6000 रुपए प्रति एकड़ से ज्यादा हो जाती है और इतनी ही लागत रोपाई के बाद भी करनी पड़ती है।

नई तकनीक में रोपाई के लिए मजदूरों पर निर्भरता से किसानों को राहत मिलती है। क्योंकि धान की सीधी बिजाई, गेहूं दूसरी फसलों की तरह, खेत में पलेवा कर के बीज ड्रिल से की जाती है। उससे भी बड़ा फायदा, नयी तकनीक धान ग्रीन हाउस गैस (मीथेन वगैरह) पर्यावरण में कम छोड़ कर, पर्यावरण संरक्षण में भी बड़ा फायदा करती है। किसानों को इस तकनीक को अपनाना चाहिए, इससे काफी हद तक पानी की बचत की जा सकती है।

मशीन से मिलाकर सुखाएं: नईबीज लेपित तकनीक के उपयोग में आने वाली सारी सामग्री (गूंद-कतीरा, गुड़, कीकर-बबूल की गूंद) इंसानों के खाद्य पदार्थ है जो गावो, शहरों की दुकानों पर सस्ते भाव (250 रुपए प्रति किलो) में आसानी से मिल जाते हैं।

नई बीज तकनीक हर्बल हाइड्रोजल पर आधारित है जिसमे गूंद कतीरा लेपित बीज की बिजाई की जाती है जिससे सभी फसलों के पौधों जड़ें में जल्दी सूखा नहीं आता और सिंचाई की जरूरत कम रह जाती है फसलोंमें खरपतवार अन्य बीमारियां-कीड़े भी कम आते हैं और यह संभव हुआ,

पहली सिचाई देर से लगने लगाने पर, जो खरीफ फसलों(धान वगैरह) में बिजाई के 15-20 दिनों रबी फसलों (गेहूं वगैरह) में 40-50 दिनों की बाद की जाती है और बिजाई के तुरंत बाद एक लीटर प्रति एकड़ की दर से पेंडामेथलींन / स्टोम्प 200 लीटर पानी में छिड़काव करने के कारण से, सीधी बिजाई धान में बिजाई के बाद की सिंचाई 12-15 दिनों के अंतर पर और वर्षा गीला-सूखा चक्कर के आधार पर करनी होती है।

नई तकनीक मे 50 किलो बीज के लिए, एक लीटर उबलते पानी मे 250 ग्राम गुड़ और 100 ग्राम बबूल की गोंद डाल कर, एक तार की चासनी बनाये।

फिर इस चासनी को ठंडा छान कर, बीजों पर छिड़क कर हाथ से बीजों को चिपचिपा बनाएं।

तब चिपचिपे बीजों पर 10 प्रतिशत(10 किलो बीज पर एक किलो गूंद कतीरे पाउडर-चूरा ग्रेड/पशुओं वाला) छिड़क कर हाथ घुमाने वाली

किसान ने त्यार की धान की नई किसम

अच्छी पैदावार और स्वाद वह दो सबसे महत्वपूर्ण खूबियां हैं जिनकी किसान बुवाई के लिए बीज का चयन करते समय तलाश करता है। अगर बीज रासायनिक आदानों की आवश्यकता के बिना अच्छी तरह विकास कर सकता है, तो यह किसान और उपभोक्ता दोनों के लिए बोनस है।

मैसूर के एम.के. शंकर गुरू, जिन्‍हें धान उगाने का 50 साल से भी अधिक का अनुभव है, ने धान की ऐसी किस्म विकसित की है जिसमें उपरोक्त सभी गुण हैं। उन्होंने इस बीज को एनएमएस-2 नाम दिया है।

गुरु 1992 से ही विभिन्न किस्मों के बीज एकत्र और संरक्षित करने में लगे हुए हैं। बीजों के प्रति उनके आकर्षण ने एनएमएस-2 नामक इस नई किस्म का विकास करने में उनकी मदद की। उन्हें राष्ट्रीय नवाचार फाउंडेशन-भारत, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार द्वारा सम्मानित किया गया है।

एनएमएस-2 के बारे में अधिक जानें

एनएमएस-2, 130-135 दिन की फसल है। एक एकड़ के लिए, 10-15 किलो बीज की आवश्यकता होती है। पैदावार 28-30 क्विंटल होती है। जैविक खेती की पद्धतियों का उपयोग कर इसे उगाया जाता है।

यह रोग प्रतिरोधी किस्म है जो सफेद रंग का चावल देती है। बीज का आकार मध्यम होता है। कटाई के बाद चावल में संसाधित करने पर, धान की अन्‍य किस्‍मों की तुलना में हानि का प्रतिशत तुलनात्मक रूप से कम होता है।

अगर आप इसका बीज खरीदना चाहते है तो 3000-3500 रुपये प्रति क्विंटल की दर से ख़रीदने के लिए एमके शंकर गुरू मोबाइल- 09900658921 पर संपर्क करें । इसकी फसल 2000 प्रति क्विंटल के हिसाब से बिकती है ।

1000 रुपए प्रति किल्लो वाली पिस्ता की खेती कैसे करें

पिस्ता सबसे ज्यादा पसंद क्या जाना वाला ड्राई फ्रूट है इसकी इतनी ज्यादा मांग है की मांग के मुकाबले इसकी पूर्ति बहुत कम है इस लिए इसके इतने ज्यादा दाम है और ये हमेशा ऐसे ही रहेंगे आज हम इस महंगे ड्राई फ्रूट की खेती के बारे मैं आप को बताएंगे

मिट्टी

पिस्ता की खेती कई तरह की मिट्टी में हो सकती है। हालांकि इसके लिए अच्छी तरह से सूखी गहरी चिकनी बलुई मिट्टी उपयुक्त मिट्टी है। ऐसे पेड़ सूखे का आसानी से सामना करने में सक्षम हैं लेकिन जहां ज्यादा आर्द्रता होती है वहां अच्छा नहीं कर पाते हैं।

बड़े पैमाने पर पिस्ता की खेती करने के लिए मिट्टी की जांच कराना काफी लाभदायक साबित होगा। जिस मिट्टी में पीएच की मात्रा 7.0 से 7.8 है वहां पिस्ता का पेड़ अच्छी किस्म का और ज्यादा मात्रा में पैदा होता है। ये पेड़ थोड़े कठोर जरूर होते हैं लेकिन उच्च क्षारीयता को काफी हद तक बर्दाश्त भी करते हैं।

जमीन की तैयारी

पिस्ता की खेती के लिए जमीन की तैयारी में भी दूसरे नट या बादाम जैसी स्थिति होती है। जमीन की अच्छी तरह से जुताई, कटाई और लाइन खींची होनी चाहिए ताकि अच्छी जुताई की स्थिति हासिल की जा सके।

अगर मिट्टी में 6-7 फीट की लंबाई में कोई कठोर चीज है तो उसे तोड़ देना चाहिए। क्योंकि पिस्ता की जड़ें गहरे तक जाती है और पानी के जमाव से प्रभावित होती है।

आवश्यक जलवायु

पिस्ता की फसल के लिए मौसम की स्थिति बेहद अहम तत्व है। पिस्ता के बादाम को दिन का तापमान 36 डिग्री सेटीग्रेड से ज्यादा चाहिए। वहीं, ठंड के महीने में 7 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान उनके शिथिल अवधि के लिए पर्याप्त है। इसके पेड़ ज्यादा ऊंचाई वाली जगहों पर ठंडे तापमान की वजह से अच्छी तरह बढ़ नहीं पाते हैं।

खेती में प्रसारण 

सामान्यतौर पर पिस्ता के पेड़ को लगाने के लिए अनुकूल पिस्ता रुटस्टॉक के जरिए पौधारोपन किया जाता है। इस रुट स्टॉक या पौधे को नर्सरी में भी उगाया जा सकता है। सामान्यतौर पर पौधारोपन नीचे स्तर पर किया जाता है और अंकुरित पेड़ को उसी साल या अगले साल लगा दिया जाता है। यह सब कुछ रुट स्टॉक (पौधे) के आकार को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए।

 पौधों के बीच दूरियां

पौधारोपन के लिए बड़ा और पर्याप्त गड्ढा खोदा जाना चाहिए ताकि इसकी जड़ें अच्छी तरह इसमे समा सके। सामान्यतौर पर नर्सरी या डिब्बे के मुकाबले पिस्ता के पौधे को एक इंच नीचे लगाना चाहिए। और जब बात पौधों के बीच दूरियों की आती है तो वह सिंचाई पर निर्भर करता है। अगर सिंचिंत बाग है तो ग्रिड पैटर्न के लिए 6 मीटर गुणा 6 मीटर की दूरी रखी जानी चाहिए।

वैसे इलाके जहां सिंचाई की सुविधा उपलब्ध नहीं है वहां पौधों के बीच दूरी 8मीटर गुणा 10 मीटर होनी चाहिए। पिस्ता के बादाम(नट) के लिए नर और मादा पेड़ को लगाना चाहिए और इसका अनुपात1:8(एक नर और आठ मादा पेड़) से 1:10(एक नर और 10 मादा पेड़) का होना चाहिए।

सिंचाई

वैसे तो पिस्ता का पेड़ सूखे को बर्दाश्त कर लेता है लेकिन उनकी देखभाल पर्याप्त नमी के साथ होनी चाहिए(जब उन्हें इसकी आवश्यकता हो)। पानी हासिल करने के लिए गीले घास का इस्तेमाल एक बेहतर तरीका हो सकता है। पानी का अच्छी तरह से उपयोग हो सके इसके लिए ड्रिप सिंचाई का इस्तेमाल किया जा सकता है। यहां पानी के जमाव से भी बचना चाहिए। बारिश के मौसम में सिंचाई की जरूरत नहीं होती है। पिस्ता के लिए खाद और

ऊर्वरक 

दूसरे बादाम(नट) पेड़ की तरह ही पिस्ता को भी नाइट्रोजन की जरूरत होती है, क्योंकि बादाम जैसी फसल के लिए नाइट्रोजन एक महत्वपूर्ण ऊर्वरक माना जाता है। हालांकि पौधे में पहले साल ऊर्वरक का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए लेकिन उसके बाद अगले साल से की जा सकती है।

आने वाले मौसम के दौरान प्रत्येक पिस्ता के पौधे में 450 ग्राम अमोनियम सल्फेट की मात्रा दो भाग में डाली जानी चाहिए। बाद के वर्षों में प्रति एकड़ 45 से 65 किलो वास्तविक नाइट्रोजन (एन) प्रयोग करना चाहिए। आनेवाले मौसम के दौरान नाइट्रोजन को दो भागों में बांटकर इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

पिस्ते की खेती में कार्यप्रणाली-

पिस्ता के पेड़ को इस तरह तैयार किया जाना चाहिए कि वो लगातार ऊपर की ओर बढ़ता जाए और उसका ओपन-वेस शेप में विकास हो। पेड़ के मध्य भाग को इस तरह खुला रखना चाहिए कि वो सूर्य की रोशनी को ग्रहण कर सके ताकि अच्छी तरह से फूल खिल सके और बेहतर फल लग सके। ऐसी जरूररत चौथे या पांचवें शीत ऋतु में पड़ सकती है। पेड़ों को पतला ऱखने के लिए दूसरे दर्जे की या कम महत्वपूर्ण शाखाओं की छंटाई कर देनी चाहिए।

एक बार जब पेड़ का ढांचा अच्छी तरह शक्ल ले ले तब हल्की-फुल्की कटाई-छटाई की ही जरूरत पड़ेगी। पेड़ के स्वस्थ विकास और अच्छी किस्म के बादाम(नट) के लिए खर-पतवार का नियंत्रण दूसरा कार्य है। इस बात को सुनिश्चित करें कि पेड़ों के बीच अच्छी तरह सफाई रहे, नहीं तो जंगली घास पोषक तत्वों को हासिल करने के लिए संघर्ष करना शुरू कर देते हैं। बर्म्स(berms) के लिए तृणनाशक प्रक्रिया या जंगली घास(पहले उगनेवाले या बाद में उगनेवाले घास के लिए) को खत्म करने की प्रक्रिया शुरू कर देनी चाहिए।

पिस्ता की फसल की कटाई-

पिस्ता का पेड़ बादाम या नट के उत्पादन के लिए काफी लंबा समय लेता है। इसके अंकुरित पेड़ अगले पांच साल तक फल देने के लिए तैयार हो जाते हैं और पौधारोपन के 12 साल के बाद से पर्याप्त फल देना शुरू कर देते हैं। (अंकुरण के पांच साल बाद पिस्ता का पेड़ फल देने लगता है। जब तक सातवां या आठवां सीजन नहीं हो जाता है तब तक इस फसल की कटाई नहीं की जाती है। पहला पूरी तरह से फल उत्पादन 12वें साल के आसपास शुरू होता है)।

जब इसके गोला से छिलका उतरने लगता है तब समझ लेना चाहिए कि फल पूरी तरह तैयार हो गया है। आमतौर पर ये अवधि 6 से 10 दिनों तक बढ़ सकती है। कटाई के दौरान सावधान रहने की जरूरत है और अविकसित केरनेल से बचना चाहिए। पिस्ता की पैदावार- पिस्ता बादाम (नट) की पैदावार मौसम, किस्में और फसल प्रबंधन के तौर-तरीके पर निर्भर करता है। पौधारोपन के 10 से 12 साल बाद पिस्ता का पौधा करीब 8 से 10 किलो का उत्पादन करता है।