कपास की फसल में सफेद मक्खी से निपटने के लिए क्या करें किसान भाई

किसानों से अपील की है कि वे अपने खेत का लगातार निरीक्षण करते रहें। यदि कपास की फसल में प्रति पत्ता सफेद मक्खी के व्यस्क 4-6 के आसपास या इससे अधिक दिखाई दें तो विभिन्न प्रकार के उपाय करके सफेद मक्खी का नियंत्रण किया जा सकता है।

कपास की फसल में पहला छिडक़ाव नीम आधारित कीटनाशक जैसे निम्बीसीडीन 300 पीपीएम या अचूक 1500 पीपीएम की 1.0 लीटर मात्रा को 150-200 लीटर पानी में घोलकर छिडक़ाव करें। इसके अतिरिक्त जिन किसानों ने अपनी कपास की फसल में नीम आधारित कीटनाशकों का प्रयोग कर लिया है तथा फिर भी खेत में सफेद मक्खी एवं हरे तेेले का प्रकोप दिखाई दे रहा है तो वे किसान अब फसल में 80 ग्राम प्रति एकड़ की दर से फ्लोनिकामिड उलाला नामक दवा का छिडक़ाव करके सफेद मक्खी पर नियंत्रण कर सकते हैं।

सफेद मक्खी के बच्चों की संख्या प्रति पत्ता 8 से ज्यादा दिखाई दे तो स्पाइरोमेसिफेन (ओबेरोन) 200 मि.ली. या पायरीप्रोक्सीफेन (लेनो) नामक दवा की 400-500 मि.ली. मात्रा को प्रति एकड़ की दर से 200 लीटर पानी में घोलकर छिडक़ाव करें। कपास की फसल में नीचे के पत्तों का चिपचिपा होकर काला होना खेत में सफेद मक्खी के बच्चों की संख्या ज्यादा होने को दर्शाता है।

यदि खेतों में सफेद मक्खी के व्यस्क ज्यादा दिखाई दें तो किसान डाईफेन्थाईयूरान (पोलो) नामक दवा की 200 ग्राम मात्रा को प्रति एकड़ की दर से 200 लीटर पानी में घोलकर छिडक़ाव करें। पोलो दवा के प्रयोग से पहले व प्रयोग करने के बाद खेत में नमी की मात्रा भरपूर होना आवश्यक है। अधिक जानकारी के लिए किसान केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान, क्षेत्रीय स्टेशन या अपने निकटतम कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क कर सकते हैं।

किसान भाई विभाग या अन्य सरकारी संस्थान द्वारा सिफारिश की गई दवाओं को ही खरीदे और इन दवाओं को खरीदते वक्त विक्रेता से बिल जरूरी लें। कपास की फसल में अपने आप से बदल-बदल कर दवाईयों का छिडक़ाव करना नुकसान देह हो सकता है।

किसान कपास की फसल पर प्रति एकड़ एक लीटर नीम के तेल को 200 लीटर पानी में मिलाकर इसका छिडक़ाव करे तो सफेद मक्खी के प्रकोप को समाप्त किया जा सकता है। इसके अलावा, दो किलोग्राम यूरिया में आधा किलोग्राम जिंक (21 प्रतिशत) के साथ इसे 200 लीटर पानी में मिलाकर भी इस बीमारी से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है

सफेद मक्खी छोटा सा तेज उडऩे वाला पीले शरीर और सफेद पंख का कीड़ा है। छोटा एवं हल्के होने के कारण ये कीट हवा द्वारा एक दूसरे से स्थान तक आसानी से चले जाते हैं। इसके अंडाकार शिशु पतों की निचली सतह पर चिपके रहकर रस चूसते रहते हैं। भूरे रंग के शिशु अवस्था पूरी होने के बाद वहीं पर यह प्यूपा में बदल जाते हैं। ग्रसित पौधे पीले व तैलीय दिखाई देते हैं। जिन काली फंफूदी लग जाती है। यह कीड़े न कवेल रस चूसकर फसल को नुकसान करते हैं।

कम पैसे में ऐसे करें अनार की खेती, हर साल होगी लाखों में कमाई

कम समय और पैसों में ज्‍यादा कमाई का सपना हर किसी का होता है। लेकिन देश में किसानों की बात करें तो पहली नजर में ऐसा मुश्किल नजर आता है।

ऐसे में जरूरी यह है कि ऐसी फसल या बिजनेस पर ध्‍यान दिया जाए, जिसमें खर्च कम हो और लंबे समय तक के लिए कमाई सुनिश्चित हो सके। अनार की खेती ऐसा ही काम है।अनार की खेती से लाखों तक की कमाई हो रही है। दिलचस्‍प बात यह है कि इसके लिए ज्‍यादा खर्च भी नहीं करने की जरूरत है।

मार्केट में अनार की है डिमांड

भारतीय मार्केट में अनार की अहमियत और कीमत से हर कोई वाकिफ है। ऊंची कीमत होने के बावजूद बीमारी से लेकर त्‍योहार तक में अनार का इस्‍तेमाल होता है। वहीं जूस मार्केट में करीब अनार का 70 फीसदी तक इस्‍तेमाल हो रहा है।

अनार की खेती को एक एकड़ खेत के मानक से समझा जा सकता है। राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड (NHB) के मुताबिक 1 एकड़ यानी कुल 43,560 वर्ग फुट जमीन पर अनार की खेती में कुल खर्च करीब 1,75,000 रुपए होते हैं। इसमें मजदूरी, खेत तैयारी, खाद आदि शामिल है।

कितना होगा कुल खर्च प्रति एकड़

खेती पर खर्च – 32000 रुपए ,सिंचाई पर खर्च –45000 रुपए, छिड़काव पर खर्च –20000 रुपए इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर –45000 रुपए ,लैंड डेवलेपमेंट –33600 रुपए , कुल – 1,75,000 रुपए

कब और कितने समय तक देगा फल

अनार का पौधा तीन-चार साल में पेड़ बनकर फल देने लगता है और एक पेड़ करीब 25 साल तक फल देता है। एक अनुमान के मुताबिक अगर अच्‍छी खेती की गई है, तो पौधा लगाने के 5वें साल में प्रति टन 4 टन प्रति एकड़ की पैदावार होती है, जबकि 8वें साल में 7 टन प्रति एकड़ तक की पैदावार हो जाती है ।

अनार की उन्नत किस्मे

कंधारी:इसका फल बड़ा और अधिक रसीला होता है,लेकिन बीज थोड़ा सा सख्त होता है। देखने में खूबसूरत होने के कारण इसे ऊंचाई वाले क्षेत्रों में व्यावसायिक तौर पर उगाने के कारण इसे ऊंचाई वाले क्षेत्रों में व्यावसायिक तौर पर उगाने के लिए उपयुक्त माना जाता है।

भगवा: यह निचले क्षेत्रों के लिए अधिक उपयुक्त है और देश में पैदा होने वाले अनार का 90 फीसदी यही किस्म उगाई जा रही है। इसके फल केसरी रंग और साइज में छोटे होते हैं, बीज नर्म होते हैं व खाने में सबसे बढ़िया माने जाते हैं।

गणेश: इसका फल पीला और थोड़ा पिंक होता है बीज नर्म होता है। इसके अलावा जी-137, मृदुला, जेलोर सेलेक्षन व चावला किस्में भी अनार की अच्छी फसल देने वाली हैं।

कैसे मिलता है फ़ायदा

फल की उत्पादकता बढ़ाने के लिए दो पौधों के बीच की दूरी को कम किया जा सकता है। इसके जरिए उत्पादन करीब डेढ़ गुना हो जाता है।

एक सीजन में अनार के पौधे से लगभग 80 किलो फल निकलते हैं। इस हिसाब से यदि आप अपनी फसल को बेचते हैं तो आराम से 8 से 10 लाख रुपए कमा सकते । इस तरह लागत निकलने के बाद भी अच्छी खासी कमाई हो सकती है

कहाँ बेचें फसल

अनार की फसल को आप देश की अलग – अलग फल मंडियों में इसे बेच सकते हैं। इसके अलावा जूस का कारोबार भी कर सकते हैं। जूस के कारोबार के लिए ज्‍यादा खर्च की जरूरत भी नहीं पड़ती है। यह मशीन आपको अच्‍छी क्‍वालिटी में ऑनलाइन 25 से 30 हजार रुपए में मिल जाएगी।

इसके जरिए आप जूस की दुकान भी कर सकते हैं। सेहत के लिहाज से भी यह परफेक्‍ट फसल है। यही नहीं, कई आयुर्वेदिक कंपनियां भी अनार और खरीदती हैं। अनार की खेती और उसके कारोबार से संबंधित जानकारी http://www.pomegranates.org की वेबसाइट सेमिल सकती है।

अरबी की जैविक (आर्गेनिक) खेती कैसे करें

अरबी के लिए पर्याप्त जीवांश वाली रेतीली दोमट मिटटी अच्छी रहती है इसके लिए गहरी भूमि होनी चाहिए ताकि इसके कंदों का समुचित विकास हो सके |

जलवायु

अरबी कि फसल को गर्म और आर्द्र जलवायु कि आवश्यकता होती है यह ग्रीष्म और वर्षा दोनों मौसमों में उगाई जा सकती है इसे उष्ण और उप उष्ण देशों में उगाया जा सकता है उत्तरी भारत कि जलवायु अरबी कि खेती के लिए सर्वोत्तम मानी गई है |

प्रजातियाँ

अरबी की उन्नत किस्मे

आजकल भी अरबी कि स्थानीय किस्मे उगाई जाती है देश के प्रत्येक क्षेत्र में कुछ स्थानीय किस्मे उगाई जाती है अब कुछ उन्नत किस्मे भी उगाई जाने लगी है |

स्थानीय किस्मे

  • फ़ैजाबाद ,
  • लाधरा वंशी ,
  • बंगाली बड़ा ,
  • देशी बड़ा ,
  • पंचमुखी ,
  • गुर्री काचू ,
  • आस काचू ,
  • काका काचू ,
  • सर काचू

नवीनतम किस्मे

  • नरेंद्र -1 अरबी
  • नरेंद्र अरबी -2

इन दोनों किस्मों का विकास नरेंद्र देव कृषि एवं प्रोद्योगिक वि 0 वि 0 द्वारा किया गया है दोनों किस्मे अधिक उपज देने वाली है |

बोने का समय

अरबी कि बाई साल में दो बार कि जाती है|

  • फरवरी मार्च ,
  • जून जुलाई

बीज कि मात्रा

अरबी के लिए 8-10 क्विंटल बीज प्रति हे 0 कि फदर से उप्योद करे बुबाई के लिए केवल अंकुरित बीज का उपयोग करे |

बोने विधि

अरबी कि बुबाई निम्नलिखित दो बिधियों से की जाती है |

समतल क्यारियों में

भली भाँती तैयार करके पंक्तियों कि आपसी 45 से 0 मि 0 और पौधों कि आपसी दुरी दुरी 30 से 0 मि 0 रखकर बीज बलि गांठों को 7.5 से 0 मि 0 गहराई पर मिटटी के अन्दर बो दे |

डौलों पर

45 से.मी. की दुरी पर डौलीयां बनायें डौलीयों के बिच दोनों किनारों 30 पर से.मी. की दुरी पर गांठे बो दें |

आर्गनिक जैविक खाद

गोबर की सड़ी हुयी खाद 25-30 टन प्रति हे . खेत में सामान मात्रा में बिखेर कर जुताई कर आर्गनिक 2 बैग भू पावर 50 किलो ग्राम , 2 – बैग माइक्रो फर्टी सिटी कम्पोस्ट वजन 40 किलो ग्राम , 2 – बैग माइक्रो भू पावर 10 किलोग्राम वजन , वजन खाद 2 बैग सुपर गोल्ड कैल्सी फर्ट वजन 10 किलो ग्राम , 2 बैग माइक्रो नीम वजन 20 किलो ग्राम और 50 किलो ग्राम अरंडी कि खली इन सब खादों को मिला कर मिश्रण तैयार कर प्रति एकड़ खेत में सामान मात्रा में बिखेर कर जुताई कर खेत तैयार कर बुवाई करे |

फसल 20 – 25 दिन कि हो जाये तब 2 किलो सुपर गोल्ड मैग्नीशियम 500 मी.ली. माइक्रो झाइम 400 लीटर पानी में मिलाकर अच्छी तरह घोलकर पम्प द्वारा तर बतर कर छिड़ काव करे दूसरा और जब – तीसरा हर छिड़काव 20 – 25 दिन पर लगातार करते रहें |

सिंचाई

ग्रीष्म ऋतू कि फसल को अधिक सिचाइयों कि आवश्यकता होती है जबकि वर्षा ऋतू वाली फसल को कम सिचाइयों कि आवश्यकता पड़ती है गर्मियों में सिचाई 6-7 दिन के अंतर से 10-12 करते रहना चाहिए और वर्षा वाली फसल कि सिचाई दिन या आवश्यकतानुसार करते रहना चहिये अंतिम जून या जुलाई के प्रथम सप्ताह तक मिटटी चढ़ा देनी चाहिए यदि तने अधिक मात्रा में निकल रहे हों तो एक या दो मुख्य तनों को छोड़कर शेष सभी छटाई कर देनी चाहिए |

खरपतवार नियंत्रण

आवश्यकतानुसार प्रत्येक सिचाई के बाद – निराई गुड़ाई करे आमतौर पर 2-3 बार निराई गुड़ाई करने से काम चल जाता है |

किट नियंत्रण

अरबी कि पत्तियां खाने वाले कीड़ों ( सुंडी व मक्खी ) द्वारा हानी होती है क्योंकि ये कीड़े नयी पत्तियों को खा जाते है |

रोकथाम

नीम का काढ़ा या गौ मूत्र का माइक्रो झाइम के साथमिलाकर छिडकाव करे |

रोग नियंत्रण

१.अरबी का झुलसा

यह रोग फाइटोफ्थोरा कोलोकेसी नामक फफूंदी के कारण होता है इसका प्रकोप – जुलाई अगस्त में होता है पत्तियों पर पहले गोल काले धब्बे पड़ जाते है बाद में पत्तियां गलकर गिर जाती है कंदों का निर्माण बिलकुल नहीं होता है |

रोकथाम

  • उचित फसल चक्र अपनाना चाहिए |
  • रोगी पौधों को उखाड़ कर जाला देना चाहिए |
  • नीम का काढ़ा या गौ मूत्र का माइक्रो झाइम के साथ मिलाकर लगातार 15 – 20 दिन के अंतराल पर छिड़काव करते रहना चाहिए |

 

नीम का काढ़ा

25 ग्राम नीम कि पत्ती ताजा हरा तोड़कर कुचल कर पिस कर किलो 50 लीटर पानी में पकाएं जब पानी 20 – 25 लीटर रह जाये तब उतार कर आधा लीटर प्रति पम्प पानी में मिलाकर प्रयोग करे |

गौ मूत्र

देसी गाय का गौ मूत्र 10 लीटर लेकर पारदर्शी बर्तन कांच या प्लास्टिक में लेकर 10 – 15 दिन धुप में रख कर आधा लीटर प्रति पम्प पानी मिलाकर प्रयोग करे |

खुदाई

अरबी कि जड़ों कि खुदाई का समय जड़ों के आकार , जाति , जलवायु और भूमि कि उर्बर शक्ति पर निर्भर करता है इसकी फसल बोने के लगभग 3 महीने बाद खुदाई के लिए तैयार हो जाती है पत्तियां सुख जाती है तब उनकी खुदाई करनी चाहिए |

उपज

प्रति हे 0 300-400 क्विंटल तक उपज मिल जाती है |

भण्डारण

अरबी कि गांठों को ऐसे कमरे में रखना चाहिए जहा गर्मी न हो गांठों को कमरे में फैला दे गाठों को कुछ दिन के अंतरसे पलटते रहना चाहिए सड़ी हुयी गांठों को निकालते रहें इस प्रक्रिया से मिटटी भी झड जाती है आवश्यकतानुसार बाजार में बिक्री के लिए भी निकालते रहे – कही कही अरबी को सुखाने बाद स्वच्छ बोरों में भरकर भंडार गृह में रखते|

जाने क्या है गन्ना उत्पादन की एस.एस.आई. तकनीक और इसके क्या फायदे है

हैदराबाद स्थित इक्रीसेट व डब्लू.डब्लू.एफ. प्रोजेक्ट ने गन्ना उत्पादन की एस.एस.आई. तकनीक का विकास किया है, जिसके उत्साहजनक परिणाम प्राप्त हो रहे है।एस.एस.आई.अर्थात सस्टेनेबल सुगरकेन इनीशियेटिव (दीर्धकालीन गन्ना उत्पादन तकनीक) गन्ना उत्पादन की वह विधि है जिसमें गन्ने से प्रति इकाई अधिकतम उत्पादन लेने न्यूनतम बीज और कम पानी में भूमि व उर्वरकों का कुशल उपयोग किया जाता है ।

 

वास्तव में यह बीज, जल और भूमि का गहन उपयोग करने वाली गन्ना उत्पादन की नवीन वैकल्पिक विधि है । दरअसल, पर्यावरण को क्षति पहुँचाये बिना प्रति इकाई जल, जमीन और श्रम से अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने की यह नवीन अवधारणा है, जिसके प्रमुख सूत्र इस प्रकार हैः

1. गन्ने की एकल कलिका वाले टुकडो का प्रयोग करते हुए पौधशाला स्थापित करना

2. कम आयु (25-35 दिन) की पौध रोपण

3. मुख्य खेत में पौधों के मध्य उचित फासला( 5 x 2 फीट) रखना

4. मृदा में आवश्यक नमीं कायम रखना तथा खेत में जलभराव रोकना

5. जैविक माध्यम से पोषक तत्व प्रबंधन व कीट-रोग प्रबंधन

6. भूमि और अन्य संसाधनो का प्रभावकारी उपयोग हेतु अन्तर्वर्ती फसलें लगाना ।

गन्ना लगाने की पारंपरिक विधि में रोपाई हेतु 2-3 आँख वाले टुकडॉ का उपयोग किया जाता है। एस.एस.आई. विधि में स्वस्थ गन्ने से सावधानी पूर्वक एक-एक कलिकाएं निकालकर पौधशाला (कोको पिथ से भरी ट्रे) में लगाया जाता है । मुख्य खेत में 25-35 दिन की पौध रोपी जाती है । पौधशाला में एक माह में पौधों की वृद्धि बहुत अच्छी हो जाती है। पारंपरिक विधि में एक एकड़ से 44000 गन्ना प्राप्त करने हेतु दो कतारों के मध्य 45 से 75 सेमी.(1.5-2.5 फीट) की दूरी रखी जाती है और प्रति एकड़ तीन आँख वाले 16000 टुकड़े (48000 आँखे) सीधे खेत में रोप दी जाती है ।

परन्तु अंत में सिर्फ 25000 पिराई योग्य गन्ना ही प्राप्त हो पाता है । जबकि एस.एस.आई. विधि में अधिक फासलें (कतारों के मध्य 5 फीट और पौधों के मध्य 2 फीट) में रो पाई करने से कंसे अधिक बनते है जिससे 45000 से 55000 पिराई योग्य गन्ना प्राप्त हो सकता है । इस प्रकार से कतारों व पौधों के मध्य चौड़ा फासला रखने से न केवल कम बीज ( तीन आँख वाले 16000 टुकड़¨ं की अपेक्षा एक आँख वाले 5000 टुकड़े) लगता है बल्कि इससे प्रत्येक पौधे को हवा व प्रकाश सुगमता से उपलब्ध होता रहता है जिससे उनका समुचित विकास होता है ।

एस.एस.आई. विधि में जल प्रबंध पर विशेष ध्यान दिया जाता है । खेत में पर्याप्त नमीं बनाये रखना लाभकारी पाया गया है । बाढ. विधि से सिंचाई करने से पानी कि अधिक मात्रा तो लगती ही है, पौधों की बढ़वार पर भी बिपरीत प्रभाव पड़ता है । पौधशाला में पौध तैयार करना, कूड़ या एकान्तर कूड़ विधि या टपक विधि से आवश्यकतानुसार सिंचाई करने से 40 प्रतिशत तक जल की वचत संभावित है ।

दीर्धकाल तक अधिक उत्पादन प्राप्त करने हेतु रासायनिक उर्वरको और कीटनाशको पर निर्भरता कम करने की आवश्यकता है । इसके लिए जैविक खाद व जैव उर्वरकों का प्रयोग किया जाना आवश्यक है । समन्वित पोषक तत्व प्रबंधन करना अधिक लाभकारी पाया गया है । एस.एस.आई. विधि में गन्ने की दो कतारों के बीच गेंहू, चना, आलू, राजमा, बरवटी, तरबूज, बैगन आदि फसलों की अन्र्तवर्ती खेती को प्रोत्साहित किया जाता है । इससे भूमि, जल आदि संसाधनों का कुशल उपयोग होने के साथ-साथ खरपतवार भी नियंत्रित रहते है और किसानो को अतिरिक्त आमदनी भी प्राप्त हो जाती है ।

इतने रुपया बढ़ सकता है खरीफ फसलों के समर्थन मूल्य

केंद्र सरकार जल्द ही खरीफ फसलों के समर्थन मूल्य का एलान कर सकती है। सूत्रों के मुताबिक चौदह फसलों का एम.एस.पी. बढ़ाने को लेकर मंजूरी मिल चुकी है।

लेकिन अगर किसानो की मांगो के हिसाब से देखा जाये तो लगता है ये समर्थन मूल्य बहुत कम है । ऐसे में किसानो का गुस्सा और बढ़ सकता है इस लिए  हो सकता है अब तक इस फैंसले को गुप्त रखा गया हो ।

खरीफ फसलों के समर्थन मूल्य का एलान कभी भी हो सकता है जिसमें कपास के एम.एस.पी. में 160 रुपए प्रति क्विंटल की बढ़त हो सकती है।इस बार फिर दालों की एम.एस.पी. में 400 रुपए क्विंटल के भारी बढ़त की संभावना है। साथ ही धान के एम.एस.पी. को 80 रुपए बढ़ाकर 1560-1590 रुपए करने की तैयारी है।

जबकि मध्यप्रदेश में खेती होने वाले सोयाबीन की एम.एस.पी. को करीब 6.5 फीसदी बढ़ाकर 2900 रुपए करने की तैयारी है

कम पानी में ज्यादा उत्पादन चाहिए तो लगाएं धान की यह किस्मे

 

धान की फसल को ज्यादा पानी वाली फसल माना जाता है और यह बिलकुल सच भी है लेकिन कुश ऐसी भी किस्मे है जिनके उपयोग से आप बहुत सारा पानी बचा सकते हो कुछ ऐसी ।

इन किस्मो की खास बात यह है की समय पर अच्छी बरिश न भी हो तो किसानों को परेशान होने की जरूरत नहीं है। किसान अगर सतर्कता से काम लें तो वह सूखे की स्थिति से निपट सकते हैं।इन किस्मों को सिंचाई की भी काफी कम जरूरत पड़ती है ।

धान की इन किस्मों में पूसा सुगंध-5, पूसा बासमती-1121, पूसा-1612, पूसा बासमती-1509, पूसा-1610 आदि शामिल हैं। धान की यह प्रजातियाँ लगभग चार माह में पैदावार दे देती हैं।

जुलाई माह में भी पर्याप्त बारिश नहीं होती है तो भी धान की इन किस्मो की पौध जुलाई में तैयार करके अगस्त में रोपाई की जा सकती है।

कम बरसात वाले क्षेत्रों में सरसों की पैदावार लेना भी एक अच्छा विकल्प साबित हो सकता है। इसकी फसल को अगस्त और सितम्बर के दौरान लगाकर कम बारिश और सिंचाई की सुविधाओं की कमी के बावजूद अच्छी पैदावार की जा सकती है।

वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि किसान विकल्प के तौर पर एक और प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। इस प्रौद्योगिकी के अनुसार धान की बुवाई गेहूँ की तरह खेतों में की जा सकती है। पौध तैयार करने की जरूरत नहीं है।

जहाँ सिंचाई सुविधाओं का अभाव है और बरसात भी कम होती हो वहाँ ड्रिप सिंचाई, फव्वारा सिंचाई, पॉली हाउस तथा नेट हाउस जैसी आधुनिक सिंचाई तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। इन आधुनिक तकनीकों का प्रयोग कर कम सिंचाई के बावजूद अच्छी फसलें तैयार की जा सकती हैं। इन तकनीकों के इस्तेमाल के लिये सरकारें भी अनुदान देकर प्रोत्साहित करती हैं।

ऐसे करें बारिश के मौसम में खीरे की उन्नत खेती

अगर आप खीरा की उन्नत खेती करना चाहते है तो आपको वैज्ञानिक तरीके से इसकी खेती करनी होगी | खीरा एक मौसमी फसल है, जो की गर्मी के मौसम में ज्यदातर किया जाता है | खीरे की खेती पुरे भारत में की जाती है यह एक Short term फसल है जो की अपना Life Cycle को 60 से 80 दिनों में पूरा करता है |

खीरा हमारे शरीर में पाचन शक्ति को बढ़ाने में मदद करता है, खीरे में Protein, vitamin C, Iron, Carbohydrate जैसे तत्व पाए जाते है  | वैसे तो खीरा गर्मी के मौसम में होता है पर वर्षा ऋतू में खीरे की फसल अधिक होती है |

यह हर प्रकार की भूमियों में जिनमें जल निकास का सही रास्ता हो, उगाया जाता है। अच्छी उपज के लिए जीवांश पदार्थयुक्त दोमट भूमि सबसे अच्छी होती है। इसकी फसल जायद और वर्षा में ली जाती है। अत: उच्च तापक्रम में अच्छी वृद्धि होती है, यह पाले को नहीं सहन कर पाता, इसलिए इसको पाले से बचाकर रखना चाहिए।

खीरे की उन्नत किस्मे

 

पंजाब नवीन : पंजाब नवीन खीरे की अच्छी किस्म है। इस किस्म में कड़वाहट कम होती है और इसका बीज भी खाने लायक होता है। इसकी फसल 70 दिन मे तुड़ाई लायक हो जाती हैं। इसकी औसत पैदावार 40 से 50 कुंतल प्रति एकड़ तक होती है।

इसके अलावा खीरे की प्रमुख प्रजातियां 

  • जापानी लौंग ग्रीन
  • स्ट्रेट एट
  • हिमांगी
  • पोइनसट
  • जोवईंट सेट

बीज की मात्रा :- एक किलो /एकर

बिजाई का ढंग :- बीज को ढाई मीटर की चौड़ी बेड पर  दो दो फुट के फासले  पर बीज सकते  हैं।  बीज दोनों साइड  लगाएं। एक जगह पर दो बीज लगाये।  खीरे की अगेती पैदावार के लिए इसे सुरंग मैं भी बीज सकते हैं। इस  से  कोहरे  से  बचाया  जा  सकता  है।

अगर बिजाई के लिए सुरंग बनानी है  तो दो मीटर  के सरिये को दोनों साइड  मैं ज़मीन मैं गाड़ दे। इसके बाद दोनों अर्ध गोलों पर सो गेज  की प्लास्टिक की शीट डाल  दें। और  दोनों साइड  से मिटटी से  ढक   दें।  और  फरबरी मैं  इन शीट  को हटा  दें।

खीरे के  लिए  खाद :-इस फसल  के लिए चालीस किलो न्यट्रोजन (नबे किलो यूरिया ), बीस किलो फ़ॉस्फ़ोरस ,(सवा क्वेंटल  सुपरफास्फेट ), और बीस किलो पोटास की  जरूरत  होती है। इसमें से एक तिहाई हिसा न्यट्रोजन सारी  फ़ॉस्फ़ोरस पोटाश  बिजाई के समय बेड़ो पे सामानांतर लाइन मैं  पांच इंच  की दूरी  पर  डालें।  बाकि बची काड बढ़ोतरी  के  टाइम पे  डालें।

सिंचाई :-पहले इसकी खाल मैं  पानी लगा  कर डौल के ऊपर  बीज लगाया  जाता है। इसके बाद दो तीन दिन बाद  पानी  दिया  जाता है।  गर्मिओं मैं पांच  छे दिन बाद पानी लगते  रहना  चाहिए।  आम तौर  पे  इसको दस  से  पन्द्र पानी लगते  हैं।

खरपतवार नियन्त्रण:- किसी भी फसल की अच्छी पैदावार लेने की लिए खेत में खरपतवारो का नियंत्रण करना बहुत जरुरी है। इसी तरह खीरे की भी अच्छी पैदावार लेने के लिए खेत को खरपतवारों से साफ रखना चाहिए। इसके लिए गर्मी में 2-3 बार तथा बरसात में 3-4 बार खेत की निराई-गुड़ाई करनी चाहिए।

फ्लो की तुड़ाई :- खीरे के फलों को कच्ची अवस्था में तोड़ लेना चाहिए जिससे बाजार में उनकी अच्छी कीमत मिल सके। फलों को एक दिन छोड़ कर तोड़ना अच्छा रहता है। फलों को तेजधार वाले चाकू या थोड़ा घुमाकर तोड़ना चाहिए ताकि बेल को किसी तरह का नुकसान न पहुंचे।खीरे की फसल को तोड़ते समय ये नरम होने चाहिए। पीले फल नहीं  होने देना चाहिए।

अगली फसल के लिए खीरे का बीज कैसे तैयार करें ?

खीरे का बीज तैयार करते समय खीरे की 2 किस्मो के बीच काम से काम 800 मीटर की दुरी होनी चाहिए।
जिन पौधें पर सही आकार, प्रकार और रंग के फल न आएं उन पौधों को तुरन्त निकाल देना चाहिए। बीज उत्पादन के लिए जब फल पीला पड़ जाए तथा बाहरी आवरण में दरारें पड़ जाएं उस समय तोड़ लेने चाहिए। फलों को लम्बाई में काटकर गुद्दे से बीज को हाथ से अलग करके साफ पानी से धेएं और बीजो को धूप में सुखाकर उनका भण्डारण करें

इतने रुपए बढ़ेगा धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य

सरकार जुलाई से शुर होने वाले आगामी फसल वर्ष 2017-18 के लिए धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.) को 80 रुपए प्रति क्विंटल बढ़ा कर 1,550 रुपए करने के बारे में विचार कर रही है।  चालू फसल वर्ष में साधारण किस्म के धान का एम.एस.पी. 1,470 रुपए  क्विंटल था।

‘ए’ ग्रेड धान का एम.एस.पी. थोड़ा उंचा रहता है जो इस वर्ष के लिए 1,510 रुपए निर्धारित किया गया था। सूत्रों के अनुसार कृषि मंत्रालय ने अंतर मंत्रालयीय विचार विमर्श के लिए एक मंत्रिमंडलीय परिपत्र को जारी किया है तथा इसे जल्द ही मंत्रिमंडल की मंजूरी मिलने की संभावना है।

मंत्रालय ने फसल वर्ष 2017-18 के लिए धान के एमएसपी को 80 रुपए प्रति क्विंटल बढ़ाने का प्रस्ताव किया है। एम.एस.पी. के बारे में जो सुझाव है वह कॉमन ग्रेड के लिए 1,550 रुपए  तथा ‘ए’ ग्रेड के लिए 1,590 रुपए का है। धान के लिए जो मूल्य वृद्धि का प्रस्ताव किया गया है वह फसल वर्ष 2016-17 के लिए प्रभावी 60 रुपए की वृद्धि से मामूली अधिक है।

प्रस्तावित दरें विशेषज्ञ निकाय कृषि लागत एवं मूल्य आयोग :सीएसीपी: की सिफारिशों के अनुरूप है।  चालू वर्ष में चावल उत्पादन सर्वकालिक उच्च स्तर 10 करोड़ 91.5 लाख टन होने का अनुमान है जिसमें से नौ करोड़ 50.9 लाख टन का उत्पादन खरीफ के धान का है इससे पहले का उच्चम रिकॉर्ड फसल वर्ष 2013-14 का है जबकि 10 करोड़ 66.5 लाख टन धान की पैदावार हुई थी।

गन्ना किसानो को राहत इतने रुपए बढ़ा गन्ने का समर्थन मूल्‍य

मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति (सीसीईए) ने 2017-18 के लिए गन्ने का समर्थन मूल्‍य (एफआरपी) 25 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ाने को मंजूरी दे दी है.
अक्‍टूबर से शुरू होने वाले 2017-18 के इस खरीद मौसम में गन्ना एफआरपी को 255 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया गया है. मौजूदा 2016-17 के खरीद मौसम में गन्ने का एफआरपी 230 रुपये प्रति क्विंटल है.

क्या है एफआरपी?

एफआरपी वह न्यूनतम मूल्य होता है, जिस पर गन्ना किसानों का कानूनन गारंटीशुदा अधिकार होता है. हालांकि राज्य सरकारों को अपने राज्य में राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) तय करने का अधिकार होता है या चीनी मिलें एफआरपी से अधिक किसी भी मूल्य की किसानों को पेशकश कर सकती हैं.

मंत्रालय ने उसी दर की सिफारिश की थी, जिसकी सिफारिश कृषि लागत और कीमत आयोग (सीएसीपी) ने की थी. यह एक सांविधिक निकाय है, जो सरकार को प्रमुख कृषि उत्पादों का मूल्य निर्धारित करने के बारे में सलाह देता है.

खाद्य मंत्रालय ने 2017-18 के खरीद मौसम के लिए गन्ना एफआरपी 255 रुपये प्रति क्विंटल करने और इसे चीनी प्राप्ति की दर 9.5 प्रतिशत से जोड़ने की सिफारिश की थी. प्राप्ति दर से मतलब गन्ना की पेराई से चीनी प्राप्त करने के अनुपात से है.

इस तकनीक से करें धान की खेती और आधे पानी के साथ बचाए 6000 प्रति एकड़

धान में सीधी बुआई (जीरो टिलेज) से कई महत्वपूर्ण फायदे क्षेत्र स्तर पर होते हैं जैसे समय पर धान की बुवाई हो जाती एंव लागत कम हो जाती है। पराम्परागत तरीके से नर्सरी उगाने, कादो करना तथा रोपनी करने पर धान की खेती में लागत बढ़ जाती है। घनहर क्षेत्रों में हमेशा कादो करने से वहाँ की मिट्टी की भैतिक दशा खराब हो जाती है जिससे रबी फसलों की पैदावार में कमी आती है।

फसलों में कम लागत लगाकर अधिक उत्पादन पाने के लिए किसानों को फसल चक्र को समझना एवं समय पर रोपाई या बुवाई के साथ-साथ उत्तम बीज और उर्वरकों की संतुलित मात्रा एवं नई तकनीकों को प्रयोग प्रतिदिन लागत में वृद्धि , समय पर पानी एवं मजदूरों की अनुपलब्धता एवं मृदा स्वास्थ में गिरावट की समस्या के समाधान हेतु धान की सीधी बुआई ही रोपाई का एक सही विकल्प है ।

समय से धान की बोआई से 6-10 प्रतिशत तक उत्पादन में वृद्धि होती है और 15-20 प्रतिशत उत्पादन लागत में में बचत होती है। साथ ही इस तकनीक का प्रयोग करने से समय, श्रम संसाधन एवं लागत की बचत होती है। बाकी बचत के साथ ही अगर आप डीज़ल से पंप चला कर सिंचाई करते है  तो कम से कम  6000 प्रति एकड़ तक बचत हो सकती है इन्हीं फायदे के मद्दे नजर किसानों का ज्यादा से ज्यादा रूझान सीधी बुआई की तरफ बढ़ रहा है।

धान की सीधी बुवाई के लिए कौन सी मशीन उपयुक्त है?

धान की सीधी बुवाई के लिए जीरो टिल ड्रिल अथवा मल्टीक्राप प्रयोग में लाया जाता है। जिन खेतों में फसलों के अवशेष हो और जमीन आच्छादित हो वहाॅ पर टरबो हैपी सीडर या रोटरी डिस्क ड्रिल जैसी मशीनों से धान की बुवाई करनी चाहिए। जीरो टिल ड्रिल अथवा मल्टीक्राॅप जीरो टील ड्रील 35-45 हार्स पावर टैªक्टर से चलती है। इस मशीन में मिट्टी चीरने वाले 9 या 11 भालानुमा फार 22 से.मी. की दूरी पर लगे होते है और इसे ट्रैक्टर के पीछे बाॅधकर चलाया जाता है।

नौ कतार वाली जीरो टिल ड्रिल से करीब प्रति घण्टा एक एकड़ में धान की सीधी बुवाई हो जाती है। ध्यान देने की योग्य बात है कि बुआई के समय खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए। बिना जुताई किए हुए खेतों में राईस ट्रान्सप्लान्टर द्वारा भी 15 दिन पुराने बिचड़ों की रोपाई की जा सकती है, वशर्तें की भूमि समतल एवं सपाट हो।

सीधी बुवाई का उचित समय:

सामान्यः धान की सीधी बुवाई मानसून आने के करीब एक से दो सप्ताह पूर्व करना अच्छा होता है। देश के मध्य पूर्वोत्तर इलाके में मानसून का आगमन 10-15 जून तक होता है अतः धान की सीधी बुवाई 31 मई तक हो जानी चाहिए। ऊपरी जमीन पर जहा पानी का भराव नहीं होता और अगात प्रजातिया लगाना है वहा पर धान की सीधी बुवाई 15 जुलाई तक कर सकते हैं। धान को सीधी बुवाई का समय इस प्रकार है:

पिछात प्रजातिया: 140-155 दिन, 25 मई से 10 जून

मध्यम प्रजातिया: 130-140 दिन, 10 जून से 25 जून

अगहनी एवं अगेत प्रजातिया: 100-140 दिन, 25 जून से 15 जुलाई

बीज की मात्रा एवं बीजोपचार:

सीधी बुवाई विधि में जीरो टिल ड्रिल मशीन के द्वारा मोटे आकार के दानो वाले धान की किस्मों के लिए बी की मात्रा 30-35 किलोग्राम, मध्यम धान की 25 से 30 किलोग्राम तथा छोटे महीन दाने वाले धान की 20 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होती है।

बुवाई से पूर्व धान के बीजों का उपचार अति आवश्यक है। सबसे पहले बीज को 8-10 घंटे पानी में भींगोकर उसमें से खराब बीज को निकाल देते हैं। इसके बाद एक किलोग्राम बीज की मात्रा के लिए 0.2 ग्राम सटेप्टोसाईकलीन के साथ 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम मिलाकर बीज को दो घंटे छाया में सुखाकर मशीन के द्वारा सीधी बुवाई करनी चाहिए।

धान की बुवाई की तैयारी:

बुवाई से पूर्व धान के खेत को यथासंभव समतल कर लेना चाहिए। यदि आर्थिक रूप से संभव हो तो भूमि को लेजर लेवलर मशीन से समतल कर लें। बुवाई के समय खेत में पर्याप्त नमी की मात्रा उपलब्ध होनी चाहिए। जिस खेत में नमी की कमी हो अथवा बहुत ही कम होे वहाॅ पहले खरपतवारनाशी का प्रयोग करना चाहिए इसके एक सप्ताह बाद हल्की सिंचाई कर दें एवं खेत में उचित नमी आने पर मशीन द्वारा बुवाई करना हितकर है।

बुवाई करने से पूर्व जीरो टिल ड्रिल मशीन का अंशशोधन कर लेना चाहिए जिससे बीज एवं खाद निर्धारित मात्रा एक कप से एवं गइराई में पड़े। धान की सीधी बुवाई करते समय बीज को 3-5 से.मी. गहराई पर ही बोना चाहिए। इससे ज्यादा गहरा करने पर अंकुरण कुप्रभावित होता है जिससे धान की पैदावार में कमी आती है। मशीन द्वारा सीधी बुवाई में कतार से कतार की दूरी 20 से.मी. तथा पौधे की दूरी 5-10 से.मी. होती है।

खरपतवार प्रबंधनः

नदीनों की भरमार से बचने के लिए बिजाई से 48 घंटे के अंदर लीटर सटोप प्रति एकड़ 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए। धान बिजाई से 20 से 25 दिन बाद 100 मिलीलीटर नोमनीगोल या माचो प्रति एकड़ का छिड़काव 150 लीटर पानी में मिलाकर करना चाहिए। चोड़े पत्ते वाले नदीनों की रोकथाम करने के लिए 16 ग्राम सैगमैट दवाई की स्प्रे प्रति एकड़ करनी चाहिए।

उर्वरक प्रबंधन:

सीधी बुवाई वाली धान में प्रति हेक्टेयर 80-100 कि.ग्रा. नेत्रजन (75-217 कि.ग्रा. यूरिया), 40 किलो फास्फोरस (250 कि.ग्रा. एस.एस.पी) और 20 किलो पोटास (33 किलो म्यूरेट आफ पोटाश) की जरूरत होती है। नेत्रजन की एक तिहाई और फास्फोरस तथा पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय प्रयोग करना चाहिए। नेत्रजन की बाकी मात्रा (शेष मात्रा दो बराबर हिस्सों में कल्ले फूटते समय तथा बाली निकलने के समय प्रयो करें।

अगर मिट्टी में गंधक की कमी पाई जाती है तो बुवाई के समय ही 30 कि.ग्रा. गंधक प्रति हेक्टेयर की दर से उपयोग करना चाहिए एवं धान-गेहूँ फसल चक्र वाले क्षेत्रों में हर दो साल पर 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर जिंक सल्फेट का प्रयोग बुवाई के समय करना चाहिए।

सिंचाई प्रबंधनः

शोध में यह पाया गया है कि धान की बुवाई सीधी विधि द्वारा करने पर 40 से 60 प्रतिशत पानी की बचत पारंपरिक तरीके द्वारा धान की खेती की अपेक्षा होती है। धान के खेत में लगातार जल भराब की जरूरत नहीं होती । धान की सीधी बुवाई के समय खेत में उचित नमी होना जरूरी है और सूखे बीज का प्रयोग किया गया है तो बुवाई के 12 घंटे के अंदर हल्की सिंचाई देनी चाहिए।

फसल के जमाव एवं 20-25 दिनों तक हल्की सिंचाई के द्वारा खेत में नमी बनाए रखना चाहिए। फूल आने से पहले से फूल आने की अवस्था (लगभग 25-30 दिन तक खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखे। दाना बनने की अवस्था (लगभग एक सप्ताह में पानी की कमी खेत में नहीं होनी चाहिए।

मुख्यतः कल्ला फूटने के समय वाली, गाभा फूटतें समय और दाना बनने वाली अवस्थाओं में धान के खेत में पर्याप्त नमी की कमी नहीं होने देना चाहिए। बिना कादो किए सीधी बुवाई वाले धान के खेत में पानी सूखने पर बड़ी -बड़ी दरारे नहीं पड़ती हैं अतः इन खेतों में महीन दरार आने पर सिंचाई कर देनी चाहिए। कटाई से 15-20 दिन पहले सिंचाई बंद कर देनी चाहिए जिससे फसल की कटाई आसानी से हो सके।

धान की सीधी बुवाई (जीरो टिलेज ) तकनीक से लाभः

धान की रोपाई विधि से खेती करने मे जो समस्याए। आती हैं उनका एक ही विकल्प है धान की सीधी बुवाई तकनीक को अपनाना। धान की सीधी बुवाई तकनीक के प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैः

  • 20 से 25 प्रतिशत पानी की बचत होती है क्योंकि इस इस विधि से धान की बुवाई करने पर खेत में लगातार पानी रखने की आवश्यकता नही पड़ती है।
  • मजदुरो एवं समय की बचत होती है क्योंकि इस विधि में रोपाई करने की जरूरत नहीं पड़ती है।
  • धान की नर्सरी उगाने, खेत का कादो करने तथा रोपनी का खर्च बच जाता है।
  • रोपाई वाली विधि के तुलना में इस तकनीक में उर्जा व इंधन की बचत होती है।
  • समय से धान की खेती शरू हो जाती है इससे इसकी उपज अधिक मिलने की संभावना होती है।
  • पानी, श्रम एवं इंधन की बचत के कारण सीधी बुवाई में लागत कम आती है
  • लगातार धान की खेती रोपाई विधि से करने पर कादो करने की जरूरत पड़ती है जिससे भूमी को भौतिक दशा पर बुरा असर पड़ता है जबकि लेकिन सीधी बुवाई
  • तकनीक मिट्टी की भौतिक गुणवत्ता को बनाई रखती है।
  • इस विधि से किसान जीरो टिलेज मशीन में खाद व बीज डालकर आसानी से बुवाई कर सकता है एवं कादो तथा रोपाई से निजात पा लेता है।
  • रोपाई विधि के अपेक्षा सीधी बुवाई सामयिक हो जाती है और अधिक पैदावर मिलती है।
  • रोपाई विधि के तुलना मंे सीधी बुवाई विधि से धान की खेती करने में बीज की मात्रा कम लगती है। इस विधि से धान की बुवाई सीधे खेत में 50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से की जाती हैं।
  • समय, श्रम, संसाधन एवं लागत की बचत होती है।