ऐसे करें बारिश के मौसम में खीरे की उन्नत खेती

अगर आप खीरा की उन्नत खेती करना चाहते है तो आपको वैज्ञानिक तरीके से इसकी खेती करनी होगी | खीरा एक मौसमी फसल है, जो की गर्मी के मौसम में ज्यदातर किया जाता है | खीरे की खेती पुरे भारत में की जाती है यह एक Short term फसल है जो की अपना Life Cycle को 60 से 80 दिनों में पूरा करता है |

खीरा हमारे शरीर में पाचन शक्ति को बढ़ाने में मदद करता है, खीरे में Protein, vitamin C, Iron, Carbohydrate जैसे तत्व पाए जाते है  | वैसे तो खीरा गर्मी के मौसम में होता है पर वर्षा ऋतू में खीरे की फसल अधिक होती है |

यह हर प्रकार की भूमियों में जिनमें जल निकास का सही रास्ता हो, उगाया जाता है। अच्छी उपज के लिए जीवांश पदार्थयुक्त दोमट भूमि सबसे अच्छी होती है। इसकी फसल जायद और वर्षा में ली जाती है। अत: उच्च तापक्रम में अच्छी वृद्धि होती है, यह पाले को नहीं सहन कर पाता, इसलिए इसको पाले से बचाकर रखना चाहिए।

खीरे की उन्नत किस्मे

 

पंजाब नवीन : पंजाब नवीन खीरे की अच्छी किस्म है। इस किस्म में कड़वाहट कम होती है और इसका बीज भी खाने लायक होता है। इसकी फसल 70 दिन मे तुड़ाई लायक हो जाती हैं। इसकी औसत पैदावार 40 से 50 कुंतल प्रति एकड़ तक होती है।

इसके अलावा खीरे की प्रमुख प्रजातियां 

  • जापानी लौंग ग्रीन
  • स्ट्रेट एट
  • हिमांगी
  • पोइनसट
  • जोवईंट सेट

बीज की मात्रा :- एक किलो /एकर

बिजाई का ढंग :- बीज को ढाई मीटर की चौड़ी बेड पर  दो दो फुट के फासले  पर बीज सकते  हैं।  बीज दोनों साइड  लगाएं। एक जगह पर दो बीज लगाये।  खीरे की अगेती पैदावार के लिए इसे सुरंग मैं भी बीज सकते हैं। इस  से  कोहरे  से  बचाया  जा  सकता  है।

अगर बिजाई के लिए सुरंग बनानी है  तो दो मीटर  के सरिये को दोनों साइड  मैं ज़मीन मैं गाड़ दे। इसके बाद दोनों अर्ध गोलों पर सो गेज  की प्लास्टिक की शीट डाल  दें। और  दोनों साइड  से मिटटी से  ढक   दें।  और  फरबरी मैं  इन शीट  को हटा  दें।

खीरे के  लिए  खाद :-इस फसल  के लिए चालीस किलो न्यट्रोजन (नबे किलो यूरिया ), बीस किलो फ़ॉस्फ़ोरस ,(सवा क्वेंटल  सुपरफास्फेट ), और बीस किलो पोटास की  जरूरत  होती है। इसमें से एक तिहाई हिसा न्यट्रोजन सारी  फ़ॉस्फ़ोरस पोटाश  बिजाई के समय बेड़ो पे सामानांतर लाइन मैं  पांच इंच  की दूरी  पर  डालें।  बाकि बची काड बढ़ोतरी  के  टाइम पे  डालें।

सिंचाई :-पहले इसकी खाल मैं  पानी लगा  कर डौल के ऊपर  बीज लगाया  जाता है। इसके बाद दो तीन दिन बाद  पानी  दिया  जाता है।  गर्मिओं मैं पांच  छे दिन बाद पानी लगते  रहना  चाहिए।  आम तौर  पे  इसको दस  से  पन्द्र पानी लगते  हैं।

खरपतवार नियन्त्रण:- किसी भी फसल की अच्छी पैदावार लेने की लिए खेत में खरपतवारो का नियंत्रण करना बहुत जरुरी है। इसी तरह खीरे की भी अच्छी पैदावार लेने के लिए खेत को खरपतवारों से साफ रखना चाहिए। इसके लिए गर्मी में 2-3 बार तथा बरसात में 3-4 बार खेत की निराई-गुड़ाई करनी चाहिए।

फ्लो की तुड़ाई :- खीरे के फलों को कच्ची अवस्था में तोड़ लेना चाहिए जिससे बाजार में उनकी अच्छी कीमत मिल सके। फलों को एक दिन छोड़ कर तोड़ना अच्छा रहता है। फलों को तेजधार वाले चाकू या थोड़ा घुमाकर तोड़ना चाहिए ताकि बेल को किसी तरह का नुकसान न पहुंचे।खीरे की फसल को तोड़ते समय ये नरम होने चाहिए। पीले फल नहीं  होने देना चाहिए।

अगली फसल के लिए खीरे का बीज कैसे तैयार करें ?

खीरे का बीज तैयार करते समय खीरे की 2 किस्मो के बीच काम से काम 800 मीटर की दुरी होनी चाहिए।
जिन पौधें पर सही आकार, प्रकार और रंग के फल न आएं उन पौधों को तुरन्त निकाल देना चाहिए। बीज उत्पादन के लिए जब फल पीला पड़ जाए तथा बाहरी आवरण में दरारें पड़ जाएं उस समय तोड़ लेने चाहिए। फलों को लम्बाई में काटकर गुद्दे से बीज को हाथ से अलग करके साफ पानी से धेएं और बीजो को धूप में सुखाकर उनका भण्डारण करें

इतने रुपए बढ़ेगा धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य

सरकार जुलाई से शुर होने वाले आगामी फसल वर्ष 2017-18 के लिए धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.) को 80 रुपए प्रति क्विंटल बढ़ा कर 1,550 रुपए करने के बारे में विचार कर रही है।  चालू फसल वर्ष में साधारण किस्म के धान का एम.एस.पी. 1,470 रुपए  क्विंटल था।

‘ए’ ग्रेड धान का एम.एस.पी. थोड़ा उंचा रहता है जो इस वर्ष के लिए 1,510 रुपए निर्धारित किया गया था। सूत्रों के अनुसार कृषि मंत्रालय ने अंतर मंत्रालयीय विचार विमर्श के लिए एक मंत्रिमंडलीय परिपत्र को जारी किया है तथा इसे जल्द ही मंत्रिमंडल की मंजूरी मिलने की संभावना है।

मंत्रालय ने फसल वर्ष 2017-18 के लिए धान के एमएसपी को 80 रुपए प्रति क्विंटल बढ़ाने का प्रस्ताव किया है। एम.एस.पी. के बारे में जो सुझाव है वह कॉमन ग्रेड के लिए 1,550 रुपए  तथा ‘ए’ ग्रेड के लिए 1,590 रुपए का है। धान के लिए जो मूल्य वृद्धि का प्रस्ताव किया गया है वह फसल वर्ष 2016-17 के लिए प्रभावी 60 रुपए की वृद्धि से मामूली अधिक है।

प्रस्तावित दरें विशेषज्ञ निकाय कृषि लागत एवं मूल्य आयोग :सीएसीपी: की सिफारिशों के अनुरूप है।  चालू वर्ष में चावल उत्पादन सर्वकालिक उच्च स्तर 10 करोड़ 91.5 लाख टन होने का अनुमान है जिसमें से नौ करोड़ 50.9 लाख टन का उत्पादन खरीफ के धान का है इससे पहले का उच्चम रिकॉर्ड फसल वर्ष 2013-14 का है जबकि 10 करोड़ 66.5 लाख टन धान की पैदावार हुई थी।

गन्ना किसानो को राहत इतने रुपए बढ़ा गन्ने का समर्थन मूल्‍य

मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति (सीसीईए) ने 2017-18 के लिए गन्ने का समर्थन मूल्‍य (एफआरपी) 25 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ाने को मंजूरी दे दी है.
अक्‍टूबर से शुरू होने वाले 2017-18 के इस खरीद मौसम में गन्ना एफआरपी को 255 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया गया है. मौजूदा 2016-17 के खरीद मौसम में गन्ने का एफआरपी 230 रुपये प्रति क्विंटल है.

क्या है एफआरपी?

एफआरपी वह न्यूनतम मूल्य होता है, जिस पर गन्ना किसानों का कानूनन गारंटीशुदा अधिकार होता है. हालांकि राज्य सरकारों को अपने राज्य में राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) तय करने का अधिकार होता है या चीनी मिलें एफआरपी से अधिक किसी भी मूल्य की किसानों को पेशकश कर सकती हैं.

मंत्रालय ने उसी दर की सिफारिश की थी, जिसकी सिफारिश कृषि लागत और कीमत आयोग (सीएसीपी) ने की थी. यह एक सांविधिक निकाय है, जो सरकार को प्रमुख कृषि उत्पादों का मूल्य निर्धारित करने के बारे में सलाह देता है.

खाद्य मंत्रालय ने 2017-18 के खरीद मौसम के लिए गन्ना एफआरपी 255 रुपये प्रति क्विंटल करने और इसे चीनी प्राप्ति की दर 9.5 प्रतिशत से जोड़ने की सिफारिश की थी. प्राप्ति दर से मतलब गन्ना की पेराई से चीनी प्राप्त करने के अनुपात से है.

इस तकनीक से करें धान की खेती और आधे पानी के साथ बचाए 6000 प्रति एकड़

धान में सीधी बुआई (जीरो टिलेज) से कई महत्वपूर्ण फायदे क्षेत्र स्तर पर होते हैं जैसे समय पर धान की बुवाई हो जाती एंव लागत कम हो जाती है। पराम्परागत तरीके से नर्सरी उगाने, कादो करना तथा रोपनी करने पर धान की खेती में लागत बढ़ जाती है। घनहर क्षेत्रों में हमेशा कादो करने से वहाँ की मिट्टी की भैतिक दशा खराब हो जाती है जिससे रबी फसलों की पैदावार में कमी आती है।

फसलों में कम लागत लगाकर अधिक उत्पादन पाने के लिए किसानों को फसल चक्र को समझना एवं समय पर रोपाई या बुवाई के साथ-साथ उत्तम बीज और उर्वरकों की संतुलित मात्रा एवं नई तकनीकों को प्रयोग प्रतिदिन लागत में वृद्धि , समय पर पानी एवं मजदूरों की अनुपलब्धता एवं मृदा स्वास्थ में गिरावट की समस्या के समाधान हेतु धान की सीधी बुआई ही रोपाई का एक सही विकल्प है ।

समय से धान की बोआई से 6-10 प्रतिशत तक उत्पादन में वृद्धि होती है और 15-20 प्रतिशत उत्पादन लागत में में बचत होती है। साथ ही इस तकनीक का प्रयोग करने से समय, श्रम संसाधन एवं लागत की बचत होती है। बाकी बचत के साथ ही अगर आप डीज़ल से पंप चला कर सिंचाई करते है  तो कम से कम  6000 प्रति एकड़ तक बचत हो सकती है इन्हीं फायदे के मद्दे नजर किसानों का ज्यादा से ज्यादा रूझान सीधी बुआई की तरफ बढ़ रहा है।

धान की सीधी बुवाई के लिए कौन सी मशीन उपयुक्त है?

धान की सीधी बुवाई के लिए जीरो टिल ड्रिल अथवा मल्टीक्राप प्रयोग में लाया जाता है। जिन खेतों में फसलों के अवशेष हो और जमीन आच्छादित हो वहाॅ पर टरबो हैपी सीडर या रोटरी डिस्क ड्रिल जैसी मशीनों से धान की बुवाई करनी चाहिए। जीरो टिल ड्रिल अथवा मल्टीक्राॅप जीरो टील ड्रील 35-45 हार्स पावर टैªक्टर से चलती है। इस मशीन में मिट्टी चीरने वाले 9 या 11 भालानुमा फार 22 से.मी. की दूरी पर लगे होते है और इसे ट्रैक्टर के पीछे बाॅधकर चलाया जाता है।

नौ कतार वाली जीरो टिल ड्रिल से करीब प्रति घण्टा एक एकड़ में धान की सीधी बुवाई हो जाती है। ध्यान देने की योग्य बात है कि बुआई के समय खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए। बिना जुताई किए हुए खेतों में राईस ट्रान्सप्लान्टर द्वारा भी 15 दिन पुराने बिचड़ों की रोपाई की जा सकती है, वशर्तें की भूमि समतल एवं सपाट हो।

सीधी बुवाई का उचित समय:

सामान्यः धान की सीधी बुवाई मानसून आने के करीब एक से दो सप्ताह पूर्व करना अच्छा होता है। देश के मध्य पूर्वोत्तर इलाके में मानसून का आगमन 10-15 जून तक होता है अतः धान की सीधी बुवाई 31 मई तक हो जानी चाहिए। ऊपरी जमीन पर जहा पानी का भराव नहीं होता और अगात प्रजातिया लगाना है वहा पर धान की सीधी बुवाई 15 जुलाई तक कर सकते हैं। धान को सीधी बुवाई का समय इस प्रकार है:

पिछात प्रजातिया: 140-155 दिन, 25 मई से 10 जून

मध्यम प्रजातिया: 130-140 दिन, 10 जून से 25 जून

अगहनी एवं अगेत प्रजातिया: 100-140 दिन, 25 जून से 15 जुलाई

बीज की मात्रा एवं बीजोपचार:

सीधी बुवाई विधि में जीरो टिल ड्रिल मशीन के द्वारा मोटे आकार के दानो वाले धान की किस्मों के लिए बी की मात्रा 30-35 किलोग्राम, मध्यम धान की 25 से 30 किलोग्राम तथा छोटे महीन दाने वाले धान की 20 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होती है।

बुवाई से पूर्व धान के बीजों का उपचार अति आवश्यक है। सबसे पहले बीज को 8-10 घंटे पानी में भींगोकर उसमें से खराब बीज को निकाल देते हैं। इसके बाद एक किलोग्राम बीज की मात्रा के लिए 0.2 ग्राम सटेप्टोसाईकलीन के साथ 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम मिलाकर बीज को दो घंटे छाया में सुखाकर मशीन के द्वारा सीधी बुवाई करनी चाहिए।

धान की बुवाई की तैयारी:

बुवाई से पूर्व धान के खेत को यथासंभव समतल कर लेना चाहिए। यदि आर्थिक रूप से संभव हो तो भूमि को लेजर लेवलर मशीन से समतल कर लें। बुवाई के समय खेत में पर्याप्त नमी की मात्रा उपलब्ध होनी चाहिए। जिस खेत में नमी की कमी हो अथवा बहुत ही कम होे वहाॅ पहले खरपतवारनाशी का प्रयोग करना चाहिए इसके एक सप्ताह बाद हल्की सिंचाई कर दें एवं खेत में उचित नमी आने पर मशीन द्वारा बुवाई करना हितकर है।

बुवाई करने से पूर्व जीरो टिल ड्रिल मशीन का अंशशोधन कर लेना चाहिए जिससे बीज एवं खाद निर्धारित मात्रा एक कप से एवं गइराई में पड़े। धान की सीधी बुवाई करते समय बीज को 3-5 से.मी. गहराई पर ही बोना चाहिए। इससे ज्यादा गहरा करने पर अंकुरण कुप्रभावित होता है जिससे धान की पैदावार में कमी आती है। मशीन द्वारा सीधी बुवाई में कतार से कतार की दूरी 20 से.मी. तथा पौधे की दूरी 5-10 से.मी. होती है।

खरपतवार प्रबंधनः

नदीनों की भरमार से बचने के लिए बिजाई से 48 घंटे के अंदर लीटर सटोप प्रति एकड़ 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए। धान बिजाई से 20 से 25 दिन बाद 100 मिलीलीटर नोमनीगोल या माचो प्रति एकड़ का छिड़काव 150 लीटर पानी में मिलाकर करना चाहिए। चोड़े पत्ते वाले नदीनों की रोकथाम करने के लिए 16 ग्राम सैगमैट दवाई की स्प्रे प्रति एकड़ करनी चाहिए।

उर्वरक प्रबंधन:

सीधी बुवाई वाली धान में प्रति हेक्टेयर 80-100 कि.ग्रा. नेत्रजन (75-217 कि.ग्रा. यूरिया), 40 किलो फास्फोरस (250 कि.ग्रा. एस.एस.पी) और 20 किलो पोटास (33 किलो म्यूरेट आफ पोटाश) की जरूरत होती है। नेत्रजन की एक तिहाई और फास्फोरस तथा पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय प्रयोग करना चाहिए। नेत्रजन की बाकी मात्रा (शेष मात्रा दो बराबर हिस्सों में कल्ले फूटते समय तथा बाली निकलने के समय प्रयो करें।

अगर मिट्टी में गंधक की कमी पाई जाती है तो बुवाई के समय ही 30 कि.ग्रा. गंधक प्रति हेक्टेयर की दर से उपयोग करना चाहिए एवं धान-गेहूँ फसल चक्र वाले क्षेत्रों में हर दो साल पर 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर जिंक सल्फेट का प्रयोग बुवाई के समय करना चाहिए।

सिंचाई प्रबंधनः

शोध में यह पाया गया है कि धान की बुवाई सीधी विधि द्वारा करने पर 40 से 60 प्रतिशत पानी की बचत पारंपरिक तरीके द्वारा धान की खेती की अपेक्षा होती है। धान के खेत में लगातार जल भराब की जरूरत नहीं होती । धान की सीधी बुवाई के समय खेत में उचित नमी होना जरूरी है और सूखे बीज का प्रयोग किया गया है तो बुवाई के 12 घंटे के अंदर हल्की सिंचाई देनी चाहिए।

फसल के जमाव एवं 20-25 दिनों तक हल्की सिंचाई के द्वारा खेत में नमी बनाए रखना चाहिए। फूल आने से पहले से फूल आने की अवस्था (लगभग 25-30 दिन तक खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखे। दाना बनने की अवस्था (लगभग एक सप्ताह में पानी की कमी खेत में नहीं होनी चाहिए।

मुख्यतः कल्ला फूटने के समय वाली, गाभा फूटतें समय और दाना बनने वाली अवस्थाओं में धान के खेत में पर्याप्त नमी की कमी नहीं होने देना चाहिए। बिना कादो किए सीधी बुवाई वाले धान के खेत में पानी सूखने पर बड़ी -बड़ी दरारे नहीं पड़ती हैं अतः इन खेतों में महीन दरार आने पर सिंचाई कर देनी चाहिए। कटाई से 15-20 दिन पहले सिंचाई बंद कर देनी चाहिए जिससे फसल की कटाई आसानी से हो सके।

धान की सीधी बुवाई (जीरो टिलेज ) तकनीक से लाभः

धान की रोपाई विधि से खेती करने मे जो समस्याए। आती हैं उनका एक ही विकल्प है धान की सीधी बुवाई तकनीक को अपनाना। धान की सीधी बुवाई तकनीक के प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैः

  • 20 से 25 प्रतिशत पानी की बचत होती है क्योंकि इस इस विधि से धान की बुवाई करने पर खेत में लगातार पानी रखने की आवश्यकता नही पड़ती है।
  • मजदुरो एवं समय की बचत होती है क्योंकि इस विधि में रोपाई करने की जरूरत नहीं पड़ती है।
  • धान की नर्सरी उगाने, खेत का कादो करने तथा रोपनी का खर्च बच जाता है।
  • रोपाई वाली विधि के तुलना में इस तकनीक में उर्जा व इंधन की बचत होती है।
  • समय से धान की खेती शरू हो जाती है इससे इसकी उपज अधिक मिलने की संभावना होती है।
  • पानी, श्रम एवं इंधन की बचत के कारण सीधी बुवाई में लागत कम आती है
  • लगातार धान की खेती रोपाई विधि से करने पर कादो करने की जरूरत पड़ती है जिससे भूमी को भौतिक दशा पर बुरा असर पड़ता है जबकि लेकिन सीधी बुवाई
  • तकनीक मिट्टी की भौतिक गुणवत्ता को बनाई रखती है।
  • इस विधि से किसान जीरो टिलेज मशीन में खाद व बीज डालकर आसानी से बुवाई कर सकता है एवं कादो तथा रोपाई से निजात पा लेता है।
  • रोपाई विधि के अपेक्षा सीधी बुवाई सामयिक हो जाती है और अधिक पैदावर मिलती है।
  • रोपाई विधि के तुलना मंे सीधी बुवाई विधि से धान की खेती करने में बीज की मात्रा कम लगती है। इस विधि से धान की बुवाई सीधे खेत में 50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से की जाती हैं।
  • समय, श्रम, संसाधन एवं लागत की बचत होती है।

1000 प्रति किल्लो वाली पिस्ता की खेती कैसे करें

पिस्ता सबसे ज्यादा पसंद क्या जाना वाला ड्राई फ्रूट है इसकी इतनी ज्यादा मांग है की मांग के मुकाबले इसकी पूर्ति बहुत कम है इस लिए इसके इतने ज्यादा दाम है और ये हमेशा ऐसे ही रहेंगे आज हम इस महंगे ड्राई फ्रूट की खेती के बारे मैं आप को बताएंगे

मिट्टी

पिस्ता की खेती कई तरह की मिट्टी में हो सकती है। हालांकि इसके लिए अच्छी तरह से सूखी गहरी चिकनी बलुई मिट्टी उपयुक्त मिट्टी है। ऐसे पेड़ सूखे का आसानी से सामना करने में सक्षम हैं लेकिन जहां ज्यादा आर्द्रता होती है वहां अच्छा नहीं कर पाते हैं। बड़े पैमाने पर पिस्ता की खेती करने के लिए मिट्टी की जांच कराना काफी लाभदायक साबित होगा। जिस मिट्टी में पीएच की मात्रा 7.0 से 7.8 है वहां पिस्ता का पेड़ अच्छी किस्म का और ज्यादा मात्रा में पैदा होता है। ये पेड़ थोड़े कठोर जरूर होते हैं लेकिन उच्च क्षारीयता को काफी हद तक बर्दाश्त भी करते हैं।

जमीन की तैयारी

पिस्ता की खेती के लिए जमीन की तैयारी में भी दूसरे नट या बादाम जैसी स्थिति होती है। जमीन की अच्छी तरह से जुताई, कटाई और लाइन खींची होनी चाहिए ताकि अच्छी जुताई की स्थिति हासिल की जा सके। अगर मिट्टी में 6-7 फीट की लंबाई में कोई कठोर चीज है तो उसे तोड़ देना चाहिए। क्योंकि पिस्ता की जड़ें गहरे तक जाती है और पानी के जमाव से प्रभावित होती है।

आवश्यक जलवायु

पिस्ता की फसल के लिए मौसम की स्थिति बेहद अहम तत्व है। पिस्ता के बादाम को दिन का तापमान 36 डिग्री सेटीग्रेड से ज्यादा चाहिए। वहीं, ठंड के महीने में 7 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान उनके शिथिल अवधि के लिए पर्याप्त है। इसके पेड़ ज्यादा ऊंचाई वाली जगहों पर ठंडे तापमान की वजह से अच्छी तरह बढ़ नहीं पाते हैं।

खेती में प्रसारण 

सामान्यतौर पर पिस्ता के पेड़ को लगाने के लिए अनुकूल पिस्ता रुटस्टॉक के जरिए पौधारोपन किया जाता है। इस रुट स्टॉक या पौधे को नर्सरी में भी उगाया जा सकता है। सामान्यतौर पर पौधारोपन नीचे स्तर पर किया जाता है और अंकुरित पेड़ को उसी साल या अगले साल लगा दिया जाता है। यह सब कुछ रुट स्टॉक (पौधे) के आकार को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए।

 पौधों के बीच दूरियां

पौधारोपन के लिए बड़ा और पर्याप्त गड्ढा खोदा जाना चाहिए ताकि इसकी जड़ें अच्छी तरह इसमे समा सके। सामान्यतौर पर नर्सरी या डिब्बे के मुकाबले पिस्ता के पौधे को एक इंच नीचे लगाना चाहिए। और जब बात पौधों के बीच दूरियों की आती है तो वह सिंचाई पर निर्भर करता है। अगर सिंचिंत बाग है तो ग्रिड पैटर्न के लिए 6 मीटर गुणा 6 मीटर की दूरी रखी जानी चाहिए।

वैसे इलाके जहां सिंचाई की सुविधा उपलब्ध नहीं है वहां पौधों के बीच दूरी 8मीटर गुणा 10 मीटर होनी चाहिए। पिस्ता के बादाम(नट) के लिए नर और मादा पेड़ को लगाना चाहिए और इसका अनुपात1:8(एक नर और आठ मादा पेड़) से 1:10(एक नर और 10 मादा पेड़) का होना चाहिए।

सिंचाई

वैसे तो पिस्ता का पेड़ सूखे को बर्दाश्त कर लेता है लेकिन उनकी देखभाल पर्याप्त नमी के साथ होनी चाहिए(जब उन्हें इसकी आवश्यकता हो)। पानी हासिल करने के लिए गीले घास का इस्तेमाल एक बेहतर तरीका हो सकता है। पानी का अच्छी तरह से उपयोग हो सके इसके लिए ड्रिप सिंचाई का इस्तेमाल किया जा सकता है। यहां पानी के जमाव से भी बचना चाहिए। बारिश के मौसम में सिंचाई की जरूरत नहीं होती है। पिस्ता के लिए खाद और

ऊर्वरक 

दूसरे बादाम(नट) पेड़ की तरह ही पिस्ता को भी नाइट्रोजन की जरूरत होती है, क्योंकि बादाम जैसी फसल के लिए नाइट्रोजन एक महत्वपूर्ण ऊर्वरक माना जाता है। हालांकि पौधे में पहले साल ऊर्वरक का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए लेकिन उसके बाद अगले साल से की जा सकती है। आने वाले मौसम के दौरान प्रत्येक पिस्ता के पौधे में 450 ग्राम अमोनियम सल्फेट की मात्रा दो भाग में डाली जानी चाहिए। बाद के वर्षों में प्रति एकड़ 45 से 65 किलो वास्तविक नाइट्रोजन (एन) प्रयोग करना चाहिए। आनेवाले मौसम के दौरान नाइट्रोजन को दो भागों में बांटकर इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

पिस्ते की खेती में कार्यप्रणाली-

पिस्ता के पेड़ को इस तरह तैयार किया जाना चाहिए कि वो लगातार ऊपर की ओर बढ़ता जाए और उसका ओपन-वेस शेप में विकास हो। पेड़ के मध्य भाग को इस तरह खुला रखना चाहिए कि वो सूर्य की रोशनी को ग्रहण कर सके ताकि अच्छी तरह से फूल खिल सके और बेहतर फल लग सके। ऐसी जरूररत चौथे या पांचवें शीत ऋतु में पड़ सकती है। पेड़ों को पतला ऱखने के लिए दूसरे दर्जे की या कम महत्वपूर्ण शाखाओं की छंटाई कर देनी चाहिए।

एक बार जब पेड़ का ढांचा अच्छी तरह शक्ल ले ले तब हल्की-फुल्की कटाई-छटाई की ही जरूरत पड़ेगी। पेड़ के स्वस्थ विकास और अच्छी किस्म के बादाम(नट) के लिए खर-पतवार का नियंत्रण दूसरा कार्य है। इस बात को सुनिश्चित करें कि पेड़ों के बीच अच्छी तरह सफाई रहे, नहीं तो जंगली घास पोषक तत्वों को हासिल करने के लिए संघर्ष करना शुरू कर देते हैं। बर्म्स(berms) के लिए तृणनाशक प्रक्रिया या जंगली घास(पहले उगनेवाले या बाद में उगनेवाले घास के लिए) को खत्म करने की प्रक्रिया शुरू कर देनी चाहिए।

पिस्ता की फसल की कटाई-

पिस्ता का पेड़ बादाम या नट के उत्पादन के लिए काफी लंबा समय लेता है। इसके अंकुरित पेड़ अगले पांच साल तक फल देने के लिए तैयार हो जाते हैं और पौधारोपन के 12 साल के बाद से पर्याप्त फल देना शुरू कर देते हैं। (अंकुरण के पांच साल बाद पिस्ता का पेड़ फल देने लगता है। जब तक सातवां या आठवां सीजन नहीं हो जाता है तब तक इस फसल की कटाई नहीं की जाती है। पहला पूरी तरह से फल उत्पादन 12वें साल के आसपास शुरू होता है)।

जब इसके गोला से छिलका उतरने लगता है तब समझ लेना चाहिए कि फल पूरी तरह तैयार हो गया है। आमतौर पर ये अवधि 6 से 10 दिनों तक बढ़ सकती है। कटाई के दौरान सावधान रहने की जरूरत है और अविकसित केरनेल से बचना चाहिए। पिस्ता की पैदावार- पिस्ता बादाम (नट) की पैदावार मौसम, किस्में और फसल प्रबंधन के तौर-तरीके पर निर्भर करता है। पौधारोपन के 10 से 12 साल बाद पिस्ता का पौधा करीब 8 से 10 किलो का उत्पादन करता है।

जानिए किसान अच्छी पैदावार के लिए किस महीने में करें किस सब्ज़ी की खेती

किसी भी फसल से अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए सबसे जरूरी होता है फसल की समय पर बुवाई, अगर बुवाई लेट हो जाती है तो फसल के उत्पादन पर काफी असर पड़ता है, इस लिए आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि किसान को किस महींने में किस सब्ज़ी की बुवाई करनी चाहिए ?

जनवरी

राजमा, शिमला मिर्च, मूली, पालक, बैंगन, चप्‍पन कद्दू

फरवरी

राजमा, शिमला मिर्च, खीरा-ककड़ी, लोबिया, करेला, लौकी, तुरई, पेठा, खरबूजा, तरबूज, पालक, फूलगोभी, बैंगन, भिण्‍डी, अरबी, एस्‍पेरेगस, ग्‍वार

मार्च

ग्‍वार, खीरा-ककड़ी, लोबिया, करेला, लौकी, तुरई, पेठा, खरबूजा, तरबूज, पालक, भिण्‍डी, अरबी

अप्रैल

चौलाई, मूली

मई

फूलगोभी, बैंगन, प्‍याज, मूली, मिर्च

जून

फूलगोभी, खीरा-ककड़ी, लोबिया, करेला, लौकी, तुरई, पेठा, बीन, भिण्‍डी, टमाटर, प्‍याज, चौलाई, शरीफा

जुलाई

खीरा-ककड़ी-लोबिया, करेला, लौकी, तुरई, पेठा, भिण्‍डी, टमाटर, चौलाई, मूली

अगस्‍त

गाजर, शलगम, फूलगोभी, बीन, टमाटर, काली सरसों के बीज, पालक, धनिया, ब्रसल्‍स स्‍प्राउट, चौलाई

सितम्‍बर

गाजर, शलगम, फूलगोभी, आलू, टमाटर, काली सरसों के बीज, मूली, पालक, पत्‍ता गोभी, कोहीराबी, धनिया, सौंफ के बीज, सलाद, ब्रोकोली

अक्‍तूबर

गाजर, शलगम, फूलगोभी, आलू, टमाटर, काली सरसों के बीज, मूली, पालक, पत्‍ता गोभी, कोहीराबी, धनिया, सौंफ के बीज, राजमा, मटर, ब्रोकोली, सलाद, बैंगन, हरी प्‍याज, ब्रसल्‍स स्‍प्राउट, लहसुन

नवम्‍बर

चुकन्‍दर, शलगम, फूलगोभी, टमाटर, काली सरसों के बीज, मूली, पालक, पत्‍ता गोभी, शिमला मिर्च, लहसुन, प्‍याज, मटर, धनिया

दिसम्‍बर

टमाटर, काली सरसों के बीज, मूली, पालक, पत्‍ता गोभी, सलाद, बैंगन, प्‍याज

तुलसी की उन्नत खेती कैसे करें

ज्यादा वक्त नहीं गुजरा जब लगभग हर भारतीयघर के आंगन में आपको एक तुलसी का छोटा सा पेड़ मिल जाता था। लेकिन शहरीकरण की आंधी में ना आंगन रहे और ना ही तुलसी का पेड़। लेकिन फिर भी तुलसी की मांग दवाई बनाने वाली कंपनियों में कई गुना बढ़ गई। तुलसी का इस्तेमाल दवा बनाने वाली कंपनियां करीब 1 दर्जन से ज्यादा बिमारियों की दवा बनाने में करती हैं।

11 सबसे बड़े इस्तेमाल

  • इसके इस्तेमाल से त्वचा और बालों में काफी सुधार होता हैं।
  • मुंह के छालों की बिमारी के लिए ये काफी कारगर है।
  • बुखार, खांसी, ब्रोकाइटिस और पाचन से जुड़ी समस्या रहने पर इसकी पत्तियों के रस से बनी दवा दी जाती है।
  • कान के दर्द को भी इसी से बनी दवा से दूर किया जाता है।
  • डेंगू और मलेरिया जैसी हर साल फैलने वाली बिमारियों से बचाने में भी इसी से बनी दवा का इस्तेमाल होता है।
  • मूत्र से जुड़ी समस्याओं में तुलसी के बीज से बनी दवा कारगार साबित होती है।
  • गुर्दे से जुड़ी बिमारी और पेट में एेंठन जैसी समस्या के इलाज में भी काम आती है।
  • साबुन, इत्र, शैम्पू और लोशन बनाए जाते हैं।
  • मुंहासे की दवा और त्वचा के लिए मलहम भी इसी से बनता है।
  • मोटापा, मुधमेह जैसी बिमारियों का भी इलाज इसी से होता है।
  • भारत के उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखण्ड और पश्चिमी बंगाल जैसे कुछ राज्यों में तुलसी की खेती व्यावसायिक तौर पर की जाती है।

रोपाई

तुलसी के पौधे को खेत में लगाने का सही समय जुलाई का पहला हफ्ता होता है। पौधे 45 गुणा 45 सेंटीमीटर की दूरी पर लगाने चाहिए। जबक RRLOC 12 और RRLOC 14 किस्म के पौधे 50 गुणा 50 सेंटीमीटर की दूरी पर लगाए जाते हैं। इसके बाद हल्की सिंचाई कर देनी होती है।

सिंचाई

रोपण के तुरन्त बाद सिंचाई करनी जरूरी होती है। हर हफ्ते या जब जरूरत हो तब भी पानी देना जरुरी है। गर्मियों में हर 12-15 दिन में फसल को पानी देना होता है।जब पहली कटाई हो जाए, तो इसके तुरंत बाद सिंचाई जरुर कर दें। लेकिन ध्यान रहे कि कटाई से 10 दिन पहले पानी देना बंद कर दें।

फसल की कटाई कैसे होती है

तुलसी की कटाई सही समय पर करनी चाहिए क्योंकि इसका असर तेल की मात्रा पर पड़ता है। जब पौधों की पत्तियां हरे रंग की होने लगें, तभी इनकी कटाई की जाती है। इसके अलावा पौधे पर फूल आने की वजह से यूनीनोल और तेल मात्रा कम हो जाती है। इसलिए जैसे ही पौधे पर फूल आना शुरू हो जाए, तभी कटाई शुरु कर देनी चाहिए।

जमीन की सतह से 15-20 मी ऊँचाई पर कटाई की जानी चाहिए। इसका फायदा ये होगा कि जल्द ही नयी शाखाएं निकलने लगेंगी। कटाई के दौरान अगर पत्तियाँ तने पर छोडनी पड़े तो छोड़ दीजिए। इससे फायदा ही होगा।RRLOP 14 नाम के किस्म वाली तुलसी की फसल 3 बार ली जाती है।

लागत और कमाई

  • अगर 10 बीघा जमीन पर तुलसी की खेती करें, तो 10 किलो बीज की जरूरत होगी। जिसकी कीमत 3 हजार रुपए के लगभग होती है।
  • 10 हजार रुपए खाद और दो हजार रु. बाकी के खर्चे के।
  • सिंचाई भी सिर्फ 1 बार करना पड़ती है।
  • एक सीजन में करीब 8 कुंटल पैदावार होती है। इसकी बाजार कीमत करीब 3 लाख रुपए होती है।
  • नीमच मंडी में 30 से 40 हजार रुपए प्रति कुंटल के भाव तुलसी के बीज बिक जाते हैं।

कहां बेचें

दो रास्ते हैं। पहला अपने पास की मंडी में एजेंट्स से बात करें। दूसरा – गूगल पर तुलसी की कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग करवाने वाली दवा कंपनियां या एजेंसियों को सर्च करें। हर इलाके के हिसाब से अलग अलग कंपनियां तुलसी की फसल खरीदती हैं।