धर्मेंद्र यहां बिताते हैं फुर्सत के पल, ऐसा दिखता है उनका फार्म हाउस

गुजरे जमाने के हीरो धर्मेंद्र 82 साल (8 दिसंबर) के हो गए हैं। कई सुपरहिट फिल्मों में काम करने वाले धर्मेंद्र अभी भी फिल्मों में एक्टिव हैं। उनकी अपकमिंग फिल्म ‘यमला पगला दीवाना 3’ है, जिसकी शूटिंग जारी है। बता दें कि फेसबुक पर ‘धर्मेंद्र-ही मैन’ नाम से पेज है, जिस पर उन्होंने अपनी लाइफ की कई फोटोज शेयर कर रखी हैं।

लोनावला स्थित फार्म हाउस पर उनके फुर्सत के लम्हों की कुछ फोटोज भी इनमें शामिल हैं, जिनमें उन्हें कहीं गाय का दूध दूहते देखा जा सकता है तो कहीं वे अपने पालतू डॉग के साथ खेलते नजर आ रहे हैं। उनकी ये फोटोज आप आगे की स्लाइड्स में देख सकते हैं।

ज्यादातर समय फार्म हाउस पर ही बिताते हैं धर्मेंद्र…

एक इंटरव्यू के दौरान धर्मेंद्र ने कहा था, “मैं जाट हूं और जाट जमीन और अपने खेतों से प्यार करता है। मेरा ज्यादातर समय लोनावाला स्थित अपने फार्म हाउस पर ही बीतता है। हमारा फोकस ऑर्गनिक खेती पर है, हम चावल उगाते हैं। फार्म हाउस पर मेरी कुछ भैंसें भी हैं।

आखिरी बार ‘सेकंड हैंड हसबैंड’ में दिखे थे धर्मेंद्र

  •  धर्मेंद्र ने अपने करियर में ‘शोले’, ‘मां’, ‘चाचा भतीजा’, ‘धरम वीर’, ‘राज तिलक’, ‘सल्तनत’ और ‘यकीन’ जैसी कई पॉपुलर फिल्मों में काम किया।

  •  82 साल के हो चुके धर्मेंद्र को आखिरी बार साल 2015 में ‘सेकंड हैंड हसबैंड’ में देखा गया था, जिससे गोविंदा की बेटी टीना आहूजा ने बॉलीवुड डेब्यू किया था।

ऐसे करे कीवी की खेती , 1 एकड़ से कमाए 8 लाख रुपये


कीवी का उत्पति स्थल चीन है, हालांकि कीवी को चीन के अलावा न्यूजीलैंड, इटली, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, पाकिस्तान, ईरान,नेपाल, चिली, स्पेन और भारत में भी उगाया जा रहा है.

भारत में इसकी खेती हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, मेघालय , सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर के पहाड़ी क्षेत्रों में उगाया जा रहा है. इसकी खेती मैदानी राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, केरल में भी की जाने लगी है. इस फल को 1000 मीटर से 2500 मीटर की समुन्द्र तल से ऊँचाई पर उगाया जा सकता है.

किस्में : इसकी प्रचलित किस्मों में अब्बोट, अलिसन, ब्रूनो, हेवर्ड और तोमुरी हैं.

कैसे उगायें :  कीवी का पौधा एक बेल होती है जो 9 मीटर तक बढ़ सकती है और यह 4 से 5 वर्ष के बाद फल देना शुरू कर देती है. फूल आने से फसल पकने तक की अवधि लगभग 100 दिन होती है. यह एकलिंगी पौधा होता है, इसलिए मादा कलमों के साथ नर की जड़ित कलमों को लगाया जाता है ताकि अच्छी तरीके से परागण हो सके और ज्यादा उत्पादन लिया जा सके.

आठ मादा बेलों के लिए एक नर बेल आवश्यक होती है. इसकी कलमों को बसंत ऋतु में लगाया जाता है. इसको अंगूर की तरह ही ढाँचे पर चढ़ाना चाहिए. इसकी कटाई-छटाई गर्मी और सर्दी दोनों मौसम में करनी चाहिए ताकि ज्यादा उत्पादन लिया जा सके. कीवी को पाले से बचाना बहुत जरुरी होता है. इसके फल नवम्बर महीने से पकने शुरू हो जाते हैं. कीवी को काफी पानी की आवश्यकता होती है इसलिए सिंचाई का उचित प्रबंध होना चाहिए.

500 ग्राम एनपीके मिश्रण प्रत्येक वर्ष प्रति बेल 5 साल की उम्र तक देना चाहिए उसके बाद 900 ग्राम नाईट्रोजन, 500 ग्राम फोस्फोरस और 900 ग्राम पोटाश को प्रति वर्ष प्रति बेल देना चाहिए. जड़ गलन से बचाने के लिए बाविस्टिन 2 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से पौधों में देना चाहिए. इसके फल औसतन 80 से 90 ग्राम के होते हैं.

इसके फलों को 0 डिग्री तापमान पर कोल्ड स्टोरेज में 4 से 6 महीने रखा जा सकता है पर सामान्य अवस्था में 8 हफ्ते तक फल ख़राब नहीं होता है. एक बेल से प्रत्येक वर्ष 40 से 60 किलो फल मिलते हैं. इसकी औसतन पैदावार 20 से 25 टन प्रति हेक्टेयर है. फलों को बाजार में भेजने से पहले 3 से 4 किलो की क्षमता वाले कार्ड बोर्ड में पैक करना चाहिए .बाजार के औसत भाव को देखते हुए 1 एकड़ बगीचे से लगभग 8 लाख रुपए प्रति वर्ष कमाये जा सकते हैं.

कलम मिलने के स्थान :

  • डॉ.वाई.एस. परमार यूनिवर्सिटी ऑफ़ हॉर्टिकल्चर एंड फॉरेस्ट्री, नौनी जिला सोलन हिमाचल प्रदेश,01792 252326, 252310
  • शेख गुलज़ार, श्री नगर, जम्मू कश्मीर , 9858986794

कीवी खाने के लाभ :

कीवी में विटामिन सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है. यह अनिंद्रा रोग को दूर करता है और पाचन क्रिया को सही करता है. आयरन का भी बेहतरीन स्त्रोत है.

ऐसे शुरू करें ड्रैगन फ्रूट की उन्नत खेती

 

एक ड्रैगन फलों के पेड़ मूल रूप से जीसस हीलोसेरियस का कैक्टस बेल है। यह मध्य अमेरिका के मूल निवासी है, लेकिन अब पूरी दुनिया में विशेषकर उष्णकटिबंधीय देशों में उगता है। यह एक बढ़ती हुई बढ़ती हुई बेल है जिसके लिए एक ऊर्ध्वाधर पोल का समर्थन करने के लिए बढ़ने की आवश्यकता होती है और फिर एक छाता जैसा गिरने के लिए एक अंगूठी होती है। इसमें 15-20 साल का जीवन काल है, इसलिए पोल और रिंग का उचित चयन महत्वपूर्ण है।

एक मजबूत और स्थायी समर्थन सुनिश्चित करने के लिए विशेष आरसीसी पोल लगाए गए हैं आमतौर पर चार पोल प्रति पोल को अधिकतम उपज देने के लिए लगाए जाते हैं। कटाई और रखरखाव के काम के दौरान उचित ध्रुव को पोल और पंक्ति अंतर को रोके रखा जाता है। प्रत्येक व्यक्ति के वृक्षारोपण की मिट्टी और पानी की संपत्ति के अनुसार मूल पोषक तत्व और उर्वरक समय-समय पर लागू होते हैं। धातु तैयार करने से बचा जा सकता है क्योंकि इससे पौधों को धूप / गर्मी जल जाती है।

उष्णकटिबंधीय मौसमों में आम तौर पर उत्तर-दक्षिण पंक्तियों को प्राथमिकता दी जाती है, जहां गर्मियों में तापमान 40 डिग्री से ऊपर होता है। अधिक धूप की गर्मी का कारण सूर्य की रोशनी हो सकती है लेकिन उपचारात्मक कदम आसानी से स्थानीय रूप से उपलब्ध हैं। इस संयंत्र से ज्यादा बीमारी का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, आम समस्याओं जैसे जड़ सड़ांध, धूप की कालिमा, पक्षी हमलों आदि का आसानी से ध्यान रखा जा सकता है।

ड्रैगन फलों – पिठया, 21 वीं सदी की ‘आश्चर्यजनक फल’ भारतीय उद्यान परिदृश्य में एक क्रांति में रिंग के लिए सेट है। यह किसानों और उपभोक्ताओं के लिए एक बून है मूल रूप से मध्य अमेरिका से यह सफलतापूर्वक थाईलैंड, मलेशिया, वियतनाम, श्रीलंका, बांग्लादेश में वाणिज्यिक रूप से उगता है और भारत में हमारे दरवाजे पर अब दस्तक दे रहा है।

मुख्य विशेषताएं:

  • किसी भी प्रकार की मिट्टी में बढ़ता है
  • पानी की न्यूनतम आवश्यकता
  • रखरखाव की न्यूनतम आवश्यकता
  • भारतीय जलवायु स्थितियों को सहिष्णु बना सकता है
  • 2 एनडी / 3 आरडी वर्ष में निवेश रिटर्न
  • अधिक प्रसार / पुनर्विक्रय के लिए कटिगों का उपयोग किया जा सकता है
  • स्थानीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में भारी मांग
  • मूल्य संवर्धन उत्पाद कमांड प्रीमियम दरें

मिट्टी:

ड्रैगन फलों के पौधे किसी भी प्रकार की मिट्टी को बर्दाश्त कर सकते हैं, हालांकि वे अच्छी तरह से मिट्टी में सूखने में अच्छी तरह से बढ़ते हैं। जल को बनाए रखने वाली मिट्टी जड़ सड़ांध का कारण बन सकती है और इस घातक कारक से बचने के लिए, जल निकासी की सुविधा के लिए मिट्टी को रेत या छोटे पत्थर के कंकड़ों से मिलाया जा सकता है।

जलवायु:

भारत एक उष्णकटिबंधीय देश है, जिसमें हर साल मध्यम जलवायु होती है। ड्रैगन फल उष्णकटिबंधीय मौसम के लिए अच्छी तरह से अनुकूल है। चरम भारतीय मौसम के लिए मामूली समायोजन जहां तक ​​जलवायु स्थितियों का संबंध है, सभी बाधाएं दूर कर सकते हैं।

सिंचाई:

अन्य फसलों / फलों की तुलना में कैक्टस होने के कारण ड्रैगन फल को कम पानी की आवश्यकता होती है। यह महीनों के लिए पानी के बिना जीवित रह सकता है सिंचाई का सर्वोत्तम अनुशंसित तरीका ड्रिप सिंचाई है। बाढ़ से सिंचाई की सिफारिश नहीं की जाती क्योंकि यह पानी बर्बाद करता है और फूस का काम बढ़ाता है। प्रति दिन लगभग 1 से 2 लीटर पानी प्रति संयंत्र प्रतिदिन गर्मियों / सूखे दिनों के दौरान पर्याप्त है। आपकी मिट्टी, जलवायु और पौधे स्वास्थ्य के आधार पर जल की आवश्यकता बढ़ सकती है या कम हो सकती है

उपज और अर्थशास्त्र:

पौधरोपण के बाद 18-24 महीनों के बाद ड्रैगन फल सामान्य रूप से फल होता है। यह एक वनस्पति फल पौधे है, जो आम तौर पर मानसून के दौरान या बाद में फलों के फल के साथ होता है। यह एक सीजन के दौरान 3 से 4 तरंगों में फल होता है। प्रत्येक ध्रुव का फल प्रति लहर लगभग 40 से 100 फल होता है। प्रत्येक फल का वजन लगभग 300 से 1000 ग्राम होता है। एक पोल आम तौर पर लगभग 15 से 25 किलोग्राम फल पैदा करता है। (60 / 80kgs प्रति पोल की खेती भारत में दर्ज की गई है) इन फलों को बाजार में 3 से 400 रुपये प्रति किलोग्राम में बेची जाती है, लेकिन सामान्य फार्म की दर लगभग रु। 125 से 200 रुपये प्रति किलो

वार्षिक आय की एक सामान्य गणना शायद इस प्रकार की गणना की जा सकती है:
एक एकर x 300 पोल एक्स 15 किग्रा (कम) x रु .25 (न्यूनतम) = रु। 5,62,500 = 00 प्रति एकड़ प्रति वर्ष

ध्यान दें:

  • सभी गणना अच्छी तरह से बनाए गए खेत के लिए हैं
  • सभी उपरोक्त गणना सबसे कम ओर हैं
  • एक एकड़ में 400 पोल भी हो सकते हैं
  • उचित खेती के तरीके / पोषक तत्व अधिक पैदावार दे सकते हैं
  • उचित विपणन नेटवर्क या निर्यात बेहतर दरें ला सकते हैं
  • नाइट लाइटिंग पद्धति फ्राईटिंग के अतिरिक्त तरंगों को दे सकती है
  • मूल्य अतिरिक्त उत्पाद उच्च रिटर्न प्राप्त करेंगे

भारत में खेती की स्थिति और मांग:

महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु के राज्यों में बहुत कम किसानों ने भारत में दार्गन फलों की खेती की है। ड्रैगन फलों की खेती का कुल अखिल भारतीय क्षेत्र शायद 100 एकड़ से कम हो। भारत में इसके फल, पोषण और औषधीय गुणों के लिए जागरूकता और मांग बहुत बड़ी है। भारत थाईलैंड, मलेशिया, वियतनाम और श्रीलंका से इसकी आवश्यकता का 95% आयात करता है। इस फल में खाड़ी, यूरोपीय संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका के निर्यात के लिए भी काफी संभावना है।

क्यों किया जा रहा है गाय के पेट में सुराख ?

गाय की सर्जरी कर उसके पेट में सुराख किया जाता है। इस सुराख को एक प्लास्टिक की रिंग द्वारा बंद किया जाता है। इसमें एक ढक्कन का प्रयोग भी होता है, जो इस छेद को बंद करने के काम आता है। इस सर्जरी के बाद गाय को सामान्य स्थिति में लौटने के लिए महीने भर का समय लगता है।

इन गायों को fistulated गाय कहा जाता है। इनके पेट में जो माइक्रोब्स होते हैं, उन्हें किसी अन्य जानवर में ट्रान्सफर किया जा सकता है। लेकिन आखिर ऐसा करने की वजह क्या है, आइए जानते हैं?

सबसे हैरानी वाली बात यह है कि गाय इस पर बिलकुल सामान्य रहती है। विचलित नहीं होती। यदि उसके पेट में कोई बैक्टीरिया है भी तो इस छेद द्वारा उसका आसानी से पता लगाया जा सकता है।

छेद करने का मुख्य कारण यह है कि वैज्ञानिकों को इस छेद द्वारा जांच में सहायता मिलती है। वे गाय के अंदरूनी हिस्से की जांच आसानी से कर सकते हैं। जबकि पहले ये बहुत कठिन हुआ करता था। और भी हैं कई फायदे, आइये जानते हैं।

गाय के लिए उचित भोजन की जानकारी के लिए यह छेद सहायक है। इस छेद द्वारा यह देखा जाता है कि गाय को कौन-सा खाना पच रहा है और कौन सा उसके लिए हानिकारक है। इसके बाद गाय पूरी तरह से स्वस्थ हो जाती है।

इस छेद का एक सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि गाय को होने वाली बीमारियों का सटीकता के साथ पता चल जाता है। इस छेद की सहायता से गाय के स्वास्थ्य की जानकारी भी आसानी से हो जाती है।

गाय के पेट का निरिक्षण कर सीधे पेट में दवाई भी दी जा सकती है। यहाँ तक कि गाय के पेट में हाथ डालकर उसे वेटरनरी डॉक्टर खुद साफ भी कर लेते हैं।

आप शायद हैरान होंगे लेकिन यह छेद गाय की उम्र बढ़ाने में सहायक नज़र आ रहा है। कुछ लोग इसे गाय के साथ क्रूरता का नाम दे रहे हैं, जिससे लड़ने का कोई क़ानून नहीं है।

आलोचकों का कहना है कि गाय के पेट का एक हिस्सा काटकर अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है। साथ ही यह खेती के काम आने वाला जीव है, इस वजह से इस पर आविष्कार का कानूनी विरोध नहीं किया जा रहा है, जो कि पूर्ण रूप से गलत है।

इस पद्धति का इस्तेमाल केवल अमेरिका में ही किया जाता है। इसे भारत में अभी नहीं लाया गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस पद्धति से कई सकारात्मक चीजें सामने आई हैं।

27 साल की वल्लरी चंद्राकर कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर रह चुकी है

जिला मुख्यालय से करीब 40 किमी दूर छोटा सा गांव है सिर्री (बागबाहरा) । यहां की बेटी वल्लरी चंद्राकर को अपनी धरती से इस कदर प्रेम हुआ कि वह राजधानी रायपुर के एक प्राख्यात कालेज से नौकरी छोड़कर आ गई ।

धरती का कर्ज चुकाने और ‘अपने लोग-अपनी जहां” का नारा बुलंद करते हुए वल्लरी कहती है कि नौकरी कितनी भी बड़ी क्यों न हो, खेती से श्रेष्ठ नहीं हो सकती है। खेती में परिश्रम थोड़ा अधिक करना पड़ता है। किंतु, अन्‍नदाता होने का जो सुकून खेती में है, वह भाव किसी भी नौकरी में आ ही नहीं सकता । उन्‍नत तकनीक को अपनाकर खेती किया जाए तो यह घाटे का सौदा नहीं है।

वल्लरी के पिता जल मौसम विज्ञान विभाग रायपुर में उपअभियंता हैं । उनका पैतृक ग्राम सिर्री है। वल्लरी अपनी पुश्तैनी जमीन में खेती को देखने पिता के साथ कभी-कभी रायपुर से बागबाहरा के पास सिर्री गांव आती थी ।अपनी धरती से वल्लरी को इस कदर लगाव हुआ कि वह रायपुर के दुर्गा कालेज में सहायक प्राध्यापक की नौकरी छोड़कर गांव आ गई ।

बीई (आईटी) और एम टेक (कंप्यूटर साइंस) तक उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बावजूद सफ्टवेयर इंजीनियर इस बेटी ने खेती को अपना व्यवसाय बनाकर सबको चौंका दिया है। इतना ही नहीं वल्लरी खुद ट्रैक्टर चलाकर खेती कर लेती है । इन दिनों उनकी बाड़ी में मिर्ची, करेला, बरबट्टी और खीरा आदि की फसल लहलहा रही है।

अपनी शिक्षा का सदुपयोग आधुनिक तकनीक से उन्न्त खेती में करने पर जोर देते हुए वल्लरी कहती हैं कि उनकी प्रतिभा को गांव वालों और समाज के लोगों ने प्रोत्साहित किया, इससे हौसला बढ़ता गया। अब तो जिस धरती पर जन्म ली, वहां खेती करके उन्नतशील कृषक बनना ही उनका सपना है।

वल्लरी बताती हैं कि उनके दादा स्वर्गीय तेजनाथ चंद्राकर राजनांदगांव में प्राचार्य थे। शासकीय सेवा में होने से उनके घर में तीन पीढ़ियों से खेती किसी ने स्वयं नहीं किया । दादा और पिता नौकरीपेशा होने से खेती नौकर भरोसे होती रही । वल्लरी को खेती की प्रेरणा अपने नाना स्वर्गीय पंचराम चंद्राकर से मिली है। वह अपने ननिहाल सिरसा (भिलाई) जाती थी, तो वहां की खेती देखकर व भाव विभोर हो उठती थी । बचपन का उनका खेती के प्रति लगाव उन्हें अपनी धरती पर खेती करने खींच लाया । वल्लरी की छोटी बहन पल्लवी भिलाई के कालेज में सहायक प्राध्यापक हैं।

मां-बाप को है इस बेटी पर गर्व

वल्लरी की मां युवल चंद्राकर गृहणी है । वे कहती हैं कि उनकी दो बेटियां हैं। दोनों ही इस कदर होनहार हैं कि उन्हें कभी बेटे की कमी महसूस नहीं हुई । हमें बेटा और बेटी में कोई फर्क नहीं करना चाहिए । अब जब बड़ी बेटी वल्लरी खुद खेती कर सिर्री के 26 एकड़ और घुंचापाली (तुसदा) के 12 एकड़ खेत में सब्जी-भाजी की उन्नत फसलें ले रही हैं, तब उन्हें और भी ज्यादा गर्व होता है। अब तो समाज में लोग उन्हें वल्लरी की मां के नाम से पहचानते हैं।

खेती के साथ फैला रही ज्ञान का उजियारा

शहर से गांव आई वल्लरी कंप्यूटर की खास जानकार हैं। गांव के गरीब बच्चे आगे बढ़ सकें, सूचना क्रांति के क्षेत्र में उनका नाम हो। इसके लिए वह गांव के दर्जनभर बच्चों को नि:शुल्क कंप्यूटर शिक्षा भी दे रही है। दिनभरखेत में कामकाज और प्रबंधन देखने के बाद देर शाम से रात तक बच्चों को कंप्यूटर की शिक्षा देना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है।

सालाना आय करीब 20 लाख रूपए

युवा सोच और ड्रीप ऐरिगेशन (टपक पद्धति से सिंचाई) से सब्जी-भाजी की खेती को वल्लरी ने लाभदायक बनाया है। उनका कहना है कि शुरूआत में प्रति एकड़ करीब डेढ़ लाख स्र्पए खर्च करना पड़ा। इस तरह उनके दो फार्म हाउस में करीब 55 से 60 लाख स्र्पए खर्च हुआ । यह वन टाइम इन्वेस्टमेंट है । इससे फार्म हाउस खेती के लिए पूरी तरह विकसित हो चुका है। सालभर में सभी खर्च काटकर प्रति एकड़ करीब 50 हजार स्र्पए शुद्ध आय हुई। इस तरह उनकी खेती से वार्षिक आय 19 से 20 लाख स्र्पए हो रहा है। वल्लरी का कहना है कि खेती को व्यवसायिक और सामुदायिक सहभागिता से उन्नत बनाने की दिशा में वे प्रयास कर रही हैं।

ऐसे करें तीन माह में 2 लाख कमाई देने वाली तुलसी की खेती

कम लागत, कम मेहनत और मुनाफा कई गुना। सुनने में भले अटपटा लगे लेकिन तुलसी की खेती करने वाले किसान इसकी हकीकत जानते हैं। तुलसी आमतौर पर घरों के आंगन में दिखाई देती है। तुलसी को घर के आंगन में लगाने की परंपरा उसके औषधीय गुणों के कारण है। यह गुण अब किसानों को भी मालामाल कर रहा है।वर्तमान में इसे ओषीधिय खेती के रूप में किया जाने लगा है।यह पुरे भारत में पाया जाता है। इसकी कई प्रकार की जातीया होती है जेसे:- ओसेसिम बेसिलिकम,ग्रेटीसिमम,सेकटम,मिनिमम,अमेरिकेनम।

तुलसी की खेती करने वाले किसानों की मानें तो 10 बीघा जमीन में तीन महीने में 15 हजार रु. की लागत से तैयार तुलसी की खेती से तीन लाख रु. का मुनाफा हो रहा है। तुलसी ने उनके भाग्य बदल दिए हैं।

तुलसी की फसल से दो तरह के प्रॉडक्‍ट प्राप्‍त तोते हैं। पहला बीज और दूसरा पत्तियां। इसके बीज को सीधे मंडी में बेचा जाता है जबकि, पत्तियों से तेल निकालकर कमाई की जाती है। एक हेक्‍टेयर फसल में लगभग 120 से 150 किलोग्राम तक बीज मिल जाता है।

जबकि, अच्‍छी फसल में 170 से 200 किलोग्राम तक पत्तियों से तेल प्राप्‍त किया जा सकता है। नीमच मंडी मध्‍य प्रदेश में बीज की कीमत लगभग 200 रुपए प्रति किलोग्राम के आसपास है। वहीं, तेल कीमत वर्तमान में 700 से 800 रुपए प्रति किलोग्राम है। यदि कम से कम प्रोडक्‍शन और कीमत को आधार बनाएं तो इनसे लगभग 2 से 2.25 लाख रुपए इनकम हो जाती है।

तुलसी लगाने के लिए खेत की तेयारी केसे करे:-

खेत में प्रथम जुताई से पहले 200 से 300 किवंटल अच्छी पक्की हुई खाद को खेत में बिखर दे ताकि वह मिटटी में अच्छी तरहा से गुलमिल जाये। अंतिम जुताई करते वक्त आप रासयनिक खाद जिसमे यूरिया 100kg और 500kg सुपर फास्फ़ेट और 125 kg म्यूरेट ऑफ़ पोटाश प्रति हेक्टर के हिसाब से एक समान पुरे खेत में बिखेर दे।तुलसी के रुपाई के 20 दिनों के बाद खेत में आवश्यक नमी का ध्यान रखकर 50kg यूरिया देवे। दूसरी और तीसरी कटाई के तुरंत बाद भी 50kg यूरिया फसल को देवे यूरिया देते वक्त ध्यान रखे की यूरिया पोधो के पत्तो पर ना गिरे।

तुलसी को खेत में केसे लगाये:-

नर्सरी में पोधे तेयार कर के

एक हेक्टेयर के लिए अच्छी किस्म का 300 या 400 ग्राम बीज ले फिर नर्सरी लगाने वाली जमीन की अच्छी जुताई और खाद दे कर उसमे 1 मीटर की 8 से 10 क्यारिया 1 हेक्टर के लिए तेयार कर ले। क्यारी को जमीन से 75सेमी ऊपर उठाना चाहिए और क्यारी से क्यारी की दुरी 30सेमी रखे ताकि खतपतवार को आसानी से निकला जा सके। प्रति क्यारी में 15सेमी की दुरी से बिजो को लगाये लगभग 100 बीज एक क्यारी में आ जायेगे।

बीजो को मिटटी में से ढक देने के बाद उसे पर्याप्त पानी छिडकते रहे 8 से 12 दिनों के बाद बीज अंकुरित हो जाते है। फिर समय समय पर निदाई गुड़ाई और सिचाई करते रहे। जब पोधे 12 से 15सेमी की लम्बाई के हो जाये तो उन्हें सावधानी पूर्वक निकाल के खेतो में रोप सकते है।

शाखाओ द्वारा रोपण

तुलसी का प्रसारण बीज के अलावा टहनियों से भी किया जाता है। उसके लिए तुलसी की 10 से 15सेमी की टहनी को काटकर उसे छाया में रखकर सुबह साम हजारे से पानी देते रहे भूमि में एक माह के भीतर उसकी जडे विकसित हो जाती है और नई पत्तिया निकलने लगती है। उसके बाद उसे वहा से निकाल कर खेत में रोप सकते है।

पोधे की रोपाई केसे करे

जब पोधे नर्सरी में तेयार हो जाये तो उनमे से स्वस्थ पोधो को जुलाई के प्रथम सप्ताह में 45×45सेमी की दुरी पर पोधे रोपे। यदि आप आर.आर.ओ.एल.सी.किस्म की तुलसी लगा रहे हो तो 50×50सेमी की दुरी जरुर रखे।

तुलसी की सिचाई केसे करे

पोधे रोपन के बाद हलकी सिचाई की आवश्यकता होती हे।गर्मी के दिनों में 15 दिन के अंतराल में सिचाई करे। पहली फसल कटाई के बाद भी तुरतं बाद सिचाई आवश्यक होती हे। सिचाई से पहले यूरिया उपर लिखे अनुसार देवे। जब भी फसल कटाई हो उसके 10 दिन पहले सिचाई बंद कर देना चाहिए।

खतपतवार नियन्त्रण और खुदाई निदाई

तुलसी के खेत में बहुत प्रकार के खतपतवार उग जाते है जो फसल की पैदावार में दिक्कत करते है और पोषक तत्वों के का नाश करते है इसलिए उन्हें रोपाई के 20 दिन बाद खतपतवार को निकाल लेना चाहिए फिर जब भी खतपतवार उगे तो उन्हें नष्ट करना चाहिए। यदि आप एक से अधिक फसल लेना हो तो 10 दिन के अन्तराल में खतपतवार निकालते रहना चाहिए।

फसल की कटाई

तुलसी की फसल में कटाई का बहुत महत्व होता है क्यों की कटाई का सीधा असर तेल की मात्रा पर पड़ता है। इसलिए जब पोधो की पत्तियों का रंग पूरा हरा हो जाये तो कटाई कर लेना चाहिए। फुल आने के बाद तेल की मात्रा और गुणवक्ता पर असर पड़ता है। कटाई हमेशा ऊपरी भाग में करना चाहिए ताकि फिर से नए शाखाये और पत्ते आ सके।कटाई हमेशा दराती की मदद से काटना चाहिए।

तुलसी की उन्नतशील किस्म जेसे R.R.L.O.P हे जिसकी तिन बार तक कटाई हो सकती है। जिसकी पहली कटाई जून और दूसरी कटाई दिसम्बर और तीसरी नवम्बर में की जाती है। इस किस्म की फसल की कटाई सतह से 30सेमी ऊपर से कटना चाहिए।

तुलसी की आसवन प्रक्रया

इस विधि में फसल से तुलसी का तेल निकाला जाता है जिसका प्रयोग बहुत से माउथ वाश सलाद मुररबा आदि में तुलसी का फेलेवेर लाने के लिए उपयोग होता है।आसवन हमेशा ताज़ा फसल से ही किया जाना चाहिए ताकि तेल और गुणवक्ता अधिक मिले।एक हेक्टर तुलसी की फसल से तकरीबन 170kg तक तेल निकल सकता हे।आसवन विधि से तेल निकलने के बाद बची हुई पत्तियों से खाद और बची हुई लकड़ी जलाने के काम आ जाती हे।

तुलसी का उत्पादन 

तुलसी की खेती करने से प्रथम वर्ष में किसान को 400 किवंटल और उसके बाद वाले वर्षो में लगभग 700 किवंटल शाकीय उत्पादन मिलता है।

कबाड़ से तैयार किया ट्रैक्टर, इंजन ऑटो का और टायर मारुति के

अाम तौर पर एक ट्रैक्टर एक लीटर डीजल में 12 किलोमीटर दौड़ता है। लेकिन हरियाणा के हिसार के मिस्त्री कृष्ण जांगड़ा ने ऐसा ट्रैक्टर तैयार किया है, जो एक लीटर में 22 किलोमीटर दौड़ता है। इसकी स्पीड 50 किलोमीटर प्रति घंटा है।

खास बात है कि इस छुटकू ट्रैक्टर की सामने आैर पीछे दोनों तरफ की स्पीड की एवरेज भी एक समान है। कृष्ण को इसे तैयार करने में डेढ़ महीना ही लगा।यह ट्रैक्टर 100 रुपये के खर्च में ही एक एकड़ गेहूं की कटाई कर देता है।

कृष्ण का मिनी ट्रैक्टर लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। मात्र 45 हजार रुपए की लागत से तैयार इस मिनी ट्रैक्टर में पीटीओ सिस्टम सहित वे सभी खासियत हैं जो नामी कंपनियों के बड़े ट्रैक्टरों में होती है।

कबाड़ के सामान से बनाया जुगाड़

कृष्ण का कहना है कि मिनी ट्रैक्टर में इंजन पुराने ऑटो का लगाया गया है, वहीं टायर और स्टेयरिंग मारुति कार के हैं। अन्य स्पेयर पार्ट्स भी कबाड़ से ही एकत्रित किए गए हैं।

तीन घंटे में करेगा एक एकड़ फसल की कटाई

मिनी ट्रैक्टर मात्र तीन घंटे में एक एकड़ की गेहूं की फसल की कटाई कर देता है। तीन घंटे में केवल 100 रुपए का डीजल खर्च होता है। कृष्ण का कहना है कि बड़े ट्रैक्टरों से एक एकड़ की गेहूं की कटाई पर करीब 300 से 400 रुपए प्रति एकड़ के तेल का खर्च हो जाता है। छोटी रिपर मशीन भी कृष्ण ने खुद ही तैयार की है।

अधिक जानकारी के लिए वीडियो देखें :

क्या कपास के भाव होंगे 8000 के पार ? यह है वजह

क्या अबकि बार कपास(नरमा कोटन) का भाव होगा 8000 के पार ? सुनने में थोड़ा अजीब लग रहा है आज के भाव देख कर ऐसा लग नहीं रहा के कपास की कीमत बढ़ सकती है । लेकिन इसके पीछे एक बहुत बढ़ी वजह है ।

दरअसल कुश दिन पहले एक अंग्रेजी अख़बार इक्नोमिक्स टाइम के मुताबिक इस साल यू. एस. US अमरीका में पिछले दिनों तूफान आदि आने से कोटन की काफी फसल बर्बाद हो गई वहां की जो कोटन कंपनियां है और जो देश US से कोटन परचेज करते थे उन्हें अब कोटन वहां से मिल नहीं पाएगा जिसे उन्होंने कोटन भारत से ले सकती है ।

भारत में भी कोटन का बुवाई रकबा ज्यादा था लेकिन बिमारी आदि के कारण उत्पादन कम है। इस कारण इस बार कोटन का भाव काफी बढ़ सकते है और हो सकता है के कपास की कीमत 8000 के पार भी चली जाये। लेकिन हमेशा की तरह भाव बढ़ने का फ़ायदा सिर्फ व्यापारी ही उठता है ।

अगर आज के भाव देखें तो कपास के भाव बेशक बीते सीजन की अपेक्षा किसानों को इस बार कम मिले हों, लेकिन बीते कुछ दिनों की अपेक्षा इनके दामों में उछाल आया। सोमवार को कपास के भाव 4691 रुपए प्रति क्विंटल तक टॉप में रहे। चार दिनों में कपास के भाव में 450 रुपए प्रति क्विंटल तक की तेजी आई।

गरीब किसानो के लिए एटीएम की तरह है बकरी पालन ,बेहद कम निवेश में ऐसे करें शुरुआत

बकरी पालन गरीबों के लिए, यह एक एटीएम की तरह है। इसके लिए बेहद कम निवेश की जरूरत पड़ती है। आप एक नर और मादा बकरी का बच्चा पांच हजार से भी कम में खरीद सकते हैं और शुरुआत कर सकते हैं। इसके लिए आपको एक छोटा और अच्छी तरह से ढंके कमरा की जरूरत पड़ेगी। बकरियां खुले में चर सकती हैं, फसल कटे खेतों में और पेड़ की पत्तियां भी खा सकती हैं।’

एक औसत बकरी एक साल से भी कम समय में दो बच्चे को जन्म देती है और इस तरह बकरी का व्यवसाय चल निकलता है। बकरी को पालने के लिए अलग से किसी आश्रय स्थल की आश्यकता नहीं पड़ती। उन्हें अपने घर पर ही रखते हैं। बड़े पैमाने पर यदि बकरी पालन का कार्य किया जाए, तब उसके लिए अलग से बाड़ा बनाने की आवश्यकता पड़ती है।

यह उल्लेखनीय है कि देशी बकरियों के अलावा यदि बरबरी, जमुनापारी इत्यादि नस्ल की बकरियां होंगी तो उनके लिए दाना, भूसी, चारा की व्यवस्था करनी पड़ती है, पर वह भी सस्ते में हो जाता है। दो से पांच बकरी तक एक परिवार बिना किसी अतिरिक्त व्यवस्था के आसानी से पाल लेता है। घर की महिलाएं बकरी की देख-रेख करती हैं और खाने के बाद बचे जूठन से इनके भूसा की सानी कर दी जाती है। ऊपर से थोड़ा बेझर का दाना मिलाने से इनका खाना स्वादिष्ट हो जाता है। बकरियों के रहने के लिए साफ-सुथरी एवं सूखी जगह की आवश्यकता होती है।

एक सफल किसान की कहानी से जाने बकरी पालन का फ़ायदा

ये कहानी पंजाब के एक किसान की है जो किसी भी दूसरे चरवाहे या गड़ेरिए की तरह सड़क पर चलते हुए दिखते हैं। 32 साल के सुखचैन सिंह दूसरे चरवाहे की तरह दिखते हैं, लेकिन वो इन सबसे अलग हैं जिस तरह पंजाब में अधिकांश चरवाहे हैं।

दो एकड़ जमीन पर बकरी पालन का धंधा करने वाले वो एक छोटे किसान हैं, जिनके पास दो गांवों में बने दो शेड में 70 बकरियों का झुंड है। उनका मानना है कि, बकरियों को संभालना कठिन काम है, लेकिन साथ ही यह भी मानते हैं कि कोई भी धंधा बिना चुनौतियों के नहीं होता है ।

उनका बकरी पालन का धंधा बहुत अच्छी तरह चल रहा है। मोटी-तगड़ी बकरियों से उन्हें अच्छी कमाई हो जाती है। वो बताते हैं,’पिछली बिक्री में चापड़ मंडी में सबसे अच्छी बकरी से मुझे 60 हजार रुपये की कमाई हुई थी। आमतौर पर साधारण बकरियों से औसत कमाई 10 हजार से 35 हजार के बीच होती है, और बकरियों के बच्चे एक हजार से ढाई हजार में बिक जाती हैं। हम बकरियों की दूध की भी 30 से 40 रुपये प्रति लीटर की दर से बिक्री करते हैं।’

सुखचैन ने बतया के जब मैंने काम शुरू किया, तब मैंने बेचे हुए घर के पैसे से बकरियां और भेड़ें खरीदी। जब मेरे पास 105 पशुओं का झुंड हो गया, तब मैंने महसूस किया कि बकरियां और भेड़ें एक साथ अच्छी तरह से नहीं पाली जा सकती हैं, और यह बात मात्रा को लेकर नहीं थी बल्कि गुणवत्ता को लेकर थी। उसके बाद मैंने भेड़ें बेच दी और अच्छी गुणवत्ता वाली बकरियां पालने पर ध्यान केंद्रित किया। इसके लिए बेहतर जानकारी और अनुभव की जरूरत होती है लेकिन बदले में बहुत अच्छा रिटर्न भी मिलता है।’

दूध ही सफलता की चाबी

सुखचैन के मुताबिक, बकरियों से नियमित आमदनी मुख्यतौर पर दूध से होती है। बकरियों से हम रोज दो बार दूध ले सकते हैं, और 70 बकरियों से करीब 50 से 60 लीटर तक दूध रोज हो सकता है। वो इसे गांव के सरकारी संग्रहण केंद्रों पर 30 से 40 रुपये प्रति लीटर की दर से बेच देते हैं। हालांकि यह दूध साल में सिर्फ छह महीने के लिए ही बेचा जाता है, और इससे जो कमाई होती है उसका आधा फिर इसी व्यवसाय में लगा दिया जाता है।

एक बकरी एक साल में औसतन एक से दो बच्चे देती है, उनमे से बचे 50 से 60 बच्चों को बाद में एक से ढाई हजार रुपये में बेच दिया जाता है जिससे अतिरिक्त आमदनी हो जाती है।

खरगोश पालने के शौक ने बदली किस्मत ,अब रेबिट फार्मिंग से सालाना कमाता है 10 लाख रुपये

जींद के संजय कुमार देशभर के पेट शॉप्स में रैबिट सप्लाई करते हैं। उनके इस प्रोफेशन की कामयाब कहानी के पीछे बड़ी दिलचस्प कहानी है। संजय को बचपन से रैबिट पालने का शौक था और घरवाले इससे नाराज थे।

बावजूद इसके उन्होंने अपने शौक को जिंदा रखने के लिए इंटरनेट से जानकारी जुटाने के बाद ट्रेनिंग ली और 9 साल में शौक इतना बड़ा प्रोफेशन बन गया। अपने रैबिट फार्म से संजय कुमार लगभग 10 लाख सालाना कमा रहे हैं।

घरवालों ने कर दिया था पैसे देने से इनकार…

  • शहर के रोहतक रोड बाईपास पर आधा एकड़ जमीन पर बना उनका रैबिट फार्म प्रदेश में सबसे बड़ा रैबिट फार्म है। इन दिनों इस फार्म में 6 नस्लों के 500 से ज्यादा खरगोश हैं।
  • संजय कुमार बताते हैं कि वर्ष 2008 में सिर्फ 100 खरगोश से व्यवसाय शुरू किया था। इसके बाद धीरे-धीरे खरगोशों की संख्या बढ़ाई।
  • दूर-दूर से लोग उनसे रैबिट फार्मिंग के बारे में जानकारी लेने के लिए आते हैं। रैबिट फार्मिंग के इस कारोबार से संजय कुमार को आय भी अच्छी-खासी प्राप्त हो रही है।
  • संजय की मानें तो उनके यहां से हर महीने हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार समेत दूसरी यूनिवर्सिटी में रिसर्च के लिए खरगोश भेजे जाते हैं। वहीं, देश-विदेश के खरगोश पालने का शौक रखने वाले लोग भी यहीं से लेकर जाते हैं।
  • देशभर की पेट शॉप में उनके फार्म से खरगोश की सप्लाई होती है। साथ ही, अपने व्यवसाय के सिद्धांत के बारे में संजय बताते हैं कि वह मीट के लिए रैबिट की सप्लाई नहीं करते।

पहले इंटरनेट से जानकारी ली, फिर ट्रेनिंग

संजय कुमार के मुताबिक, उन्हें बचपन में ही खरगोश पालने का शौक था, लेकिन घरवाले इससे सख्त नाराज थे। बावजूद इसके उन्होंने जिद पाल ली कि वह एक दिन प्रदेश का सबसे बड़ा रैबिट फार्म बनाएंगे। एक-दो बार ऐसा भी हुआ, जब घरवालों ने खरगोश खरीदने के लिए उसे पैसे नहीं दिए तो चोरी-छुपे पैसे निकालकर खरगोश खरीद लाए।

फिर मैट्रिक करने के बाद संजय ने कुछ दिन गुड़गांव में ठेकेदारी की। इसी दौरान उन्होंने गूगल पर रैबिट फार्मिंग की जानकारी ली। इसके बाद वह राजस्थान के अविकानगर में भारत सरकार के ट्रेनिंग सेंटर से एक सप्ताह की ट्रेनिंग लेकर आए। शुरुआत में कर्नाटक से 100 रैबिट अपने फार्म पर रखे।

रैबिट फार्मिंग में देखभाल जरूरी, खर्च काफी कम

  • रैबिट फार्मिंग शुरू करने के इच्छुक किसानों के लिए संजय कुमार का कहना है कि शुरुआत में शेड तैयार करने, खरगोश खरीदने पर पैसा खर्च होता है, लेकिन उसके बाद खर्च काफी कम है।
  • पोल्ट्री व्यवसाय से काफी कम खर्च व कम जोखिम का यह कारोबार है। रैबिट फार्म से न कोई बदबू आती और न ही किसी प्रकार कोई और पॉल्यूशन होता है। बस रैबिट की देखभाल पर ध्यान देना काफी जरूरी है। एक खरगोश के लिए दिनभर में एक मुट्ठी फीड, एक मुट्ठी चारा और दो-तीन कटोरी पानी पीता है।
  • चार महीने में खरगोश दो किलो वजन से ज्यादा का हो जाता है और फिर 350 से लेकर 500 रुपए तक में बिक जाता है। रैबिट फार्मिंग के लिए सरकार द्वारा 25 से 30 प्रतिशत सब्सिडी दी जाती है।

जींद के ही एक और खरगोश पालक राजेश कुमार से जाने खरगोश पालने की जानकारी (वीडियो)