ऐसे करें नीम का खेती में इस्तेमाल ,महंगे कीटनाशक से मिल जायगा छुटकारा

नीम का वृक्ष प्रकृति का अनुपम उपहार हैं। नीम से तैयार किये गए उत्पादों का कीट नियंत्रण अनोखा हैं, इस कारण नीम से बनाई गई दवा विश्व में सबसे अच्छी कीट नियंत्रण दवा मानी जाती हैं। लेकिन इसके उपयोग को लोग अब भूल रहे हैं। इसका फायदा अब बड़ी-बड़ी कम्पनिया उठा रही हैं ये कम्पनिया इसकी निम्बोलियों व पत्तियों से बनाई गई कीटनाशक दवाये महंगे दामों पर बेचती हैं।

इसकी कड़वी गन्ध से सभी जिव दूर भागते हैं। वे कीट जिनकी सुगंध क्षमता बहुत विकसित हो गयी हैं, वे इसको छोड़कर दूर चले जाते हैं जिन पर नीम के रसायन छिड़के गए हों।

इसके संपर्क में मुलायम त्वचा वाले कीट जैसे चेंपा, तैला, थ्रिप्स, सफेद मक्खी आदि आने पर मर जाते हैं। नीम का मनुष्य जीवन पर जहरीला प्रभाव नहीं पड़ना ही इसको दवाओं के रूप में उच्च स्थान दिलाता हैं। नीम की निम्बोलिया जून से अगस्त तक पक कर गिरती हैं निम्बोली का स्वाद हल्का मीठा होता हैं।

इसकी निम्बोली गिरने पर सड़कर समाप्त हो जाती हैं परन्तु गिरी सफेद गुठली से ढकी होने के कारण लम्बे समय तक सुरक्षित रहती हैं। निम्बोली को तोड़ने पर 55% भाग गुठली के रूप में अलग हो जाता हैं। तथा 45% गिरी के रूप में प्राप्त होता हैं। अच्छे ढंग से संग्रहित की गई गिरी हरे भूरे रंग की होती हैं।

नीम से तैयार दवाइयों के अनेक गुण

  •  रासायनिक दवाइयों की स्प्रे नीम में मिलाकर करें। इस तरह करने से रासायनिक दवाइयों के प्रयोग में 25-30 प्रतिशत तक कमी आती है।
  • नीम की स्प्रे सुबह या शाम के समय करनी चाहिए।
  • नीम केक पाउडर डालने से खेत में बहुत तरह के प्रभाव देखे जा सकते हैं जैसे कि इससे पौधे निमाटोड और फंगस से बचे रहते हैं। इस विधि से ज़मीन के तत्व आसानी से पौधे में मिल जाते हैं।
  •  नीम हानिकारक कीटों के जीवन चक्र को भी प्रभावित करती है, जैसे कि अंडे, लार्वा आदि। इसके अलावा भुंडियों, सुंडियों और टिड्डों आदि पर भी प्रभाव पड़ता है। यह रस चूसने वाले कीटों की ज्यादा रोधक नहीं है।
  • यदि नीम का गुद्दा यूरिया के साथ प्रयोग किया जाये, तो खाद का प्रभाव बढ़ जाता है और ज़मीन के अंदरूनी हानिकारक बीमारियों और कीटों से बचाव होता है।
  • दीमक से बचाव के लिए 3-5 किलो नीम पाउडर को बिजाई से पहले एक एकड़ मिट्टी में मिलायें।
  • मूंगफली में पत्ते के सुरंगी कीट के लिए 1.0 प्रतिशत नीम के बीजों का रस या 2 प्रतिशत नीम के तेल की स्प्रे बिजाई के 35-40 दिनों के बाद करें।
  • जड़ों में गांठे बनने की बीमारी की रोकथाम के लिए 50 ग्राम नीम पाउडर को 50 लीटर पानी में पूरी रात डुबोयें और फिर स्प्रे करें

क्यों आए भगवान शिव, महाकाली के पैरों के नीचे?

भगवती दुर्गा की दस महाविद्याओं में से एक हैं महाकाली। जिनके काले और डरावने रूप की उत्पति राक्षसों का नाश करने के लिए हुई थी। यह एक मात्र ऐसी शक्ति हैं जिन से स्वयं काल भी भय खाता है। उनका क्रोध इतना विकराल रूप ले लेता है की संपूर्ण संसार की शक्तियां मिल कर भी उनके गुस्से पर काबू नहीं पा सकती। उनके इस क्रोध को रोकने के लिए स्वयं उनके पति भगवान शंकर उनके चरणों में आ कर लेट गए थे। इस संबंध में शास्त्रों में एक कथा वर्णित हैं जो इस प्रकार है-

दैत्य रक्तबिज ने कठोर तप के बल पर वर पाया था की अगर उसके खून की एक बूंद भी धरती पर गिरेगी तो उस से अनेक दैत्य पैदा हो जाएंगे। उसने अपनी शक्तियों का प्रयोग निर्दोष लोगों पर करना शुरू कर दिया। धीरे धीरे उसने अपना आतंक तीनों लोकों पर मचा दिया। देवताओं ने उसे युद्ध के लिए ललकारा। भयंकर युद्ध का आगाज हुआ। देवता अपनी पूरी शक्ति लगाकर रक्तबिज का नाश करने को तत्पर थे मगर जैसे ही उसके शरीर की एक भी बूंद खून धरती पर गिरती उस एक बूंद से अनेक रक्तबीज पैदा हो जाते।

सभी देवता मिल कर महाकाली की शरण में गए। मां काली असल में सुन्दरी रूप भगवती दुर्गा का काला और डरावना रूप हैं, जिनकी उत्पत्ति राक्षसों को मारने के लिए ही हुई थी। महाकाली ने देवताओं की रक्षा के लिए विकराल रूप धारण कर युद्ध भूमी में प्रवेश किया। मां काली की प्रतिमा देखें तो देखा जा सकता है की वह विकराल मां हैं। जिसके हाथ में खप्पर है,लहू टपकता है तो गले में खोपड़ीयों की माला है मगर मां की आंखे और ह्रदय से अपने भक्तों के लिए प्रेम की गंगा बहती है।

महाकाली ने राक्षसों का वध करना आरंभ किया लेकिन रक्तबीज के खून की एक भी बूंद धरती पर गिरती तो उस से अनेक दानवों का जन्म हो जाता जिससे युद्ध भूमी में दैत्यों की संख्या बढ़ने लगी। तब मां ने अपनी जिह्वा का विस्तर किया।

दानवों का एक बूंद खून धरती पर गिरने की बजाय उनकी जिह्वा पर गिरने लगा। वह लाशों के ढेर लगाती गई और उनका खून पीने लगी। इस तरह महाकाली ने रक्तबीज का वध किया लेकिन तब तक महाकाली का गुस्सा इतना विक्राल रूप से चुका था की उनको शांत करना जरुरी था मगर हर कोई उनके समीप जाने से भी डर रहा था।

सभी देवता भगवान शिव के पास गए और महाकाली को शांत करने के लिए प्रार्थना करने लगे। भगवान् शिव ने उन्हें बहुत प्रकार से शांत करने की कोशिश करी जब सभी प्रयास विफल हो गए तो वह उनके मार्ग में लेट गए। जब उनके चरण भगवान शिव पर पड़े तो वह एकदम से ठिठक गई। उनका क्रोध शांत हो गया। आदि शक्ति मां दुर्गा के विविध रूपों का वर्णन मारकण्डेय पुराण में वर्णित है।

खेती में अब यूरिया का उपयोग बंद करेगी सरकार,पंजाब पर होगा सबसे ज्यादा असर

खेती के उपयोग में लिए जाने वाले यूरिया के खतरनाक परिणामो को देखते हुए अब केन्द्र सरकर यूरिया का उपयोग को बंद करने की तैयारी कर रही है । प्रधानमंत्री की मंशा के बाद अब केन्द्र ने सभी राज्यो पत्र लिख कर यूरिया का उपयोग कम करने निर्देश दिए है ।

दरअसल प्रधानमंत्री ने पिछले दिनों निति आयोग की बैठक में निर्देश दिए थे के किसानो को यूरिया का कम से कम प्रयोग करने के सुचेत प्रयास किए जाएं । और प्रधानमंत्री ने सभी राज्यों को इन निर्देशों पर अमल करने को कहा ।

रसायनिक खाद और कीटनाशकों के अंधाधुध इस्तेमाल और गोबर-हरी खाद के कम उपयोग से देश की 32 फीसदी खेती योग्य जमीन बेजान होती जा रही है। जमीन में लगातार कम होते कार्बन तत्वों की तरफ अगर जल्द ही किसान और सरकारों ने ध्यान नहीं दिया तो इस जमीन पर फसलें उगना बंद हो सकती हैं।

देश में सबसे ज्यादा यूरिया का इस्तेमाल पंजाब के किसान करते है अगर केन्द्र सरकार यूरिया बंद करने के फैसले को अमल में लाती है तो सबसे ज्यादा नुकसान भी पंजाब के किसानो को ही होगा । क्योंकि अब पंजाब की मिट्टी ऐसी हो गई है की फसल उगाने के लिए यूरिया की जरूरत पड़ती है ।

जानकारी के अनुसार भारत में पिछले कुछ दशकों में यूरिया का इस्तेमाल कई गुना बढ़ गया है। 1960 के दशक में यह 10 प्रतिशत प्रयोग में लाया जाता था, वहीं 2015-16 में नाइट्रोजन फर्टीलाइजर का इस्तेमाल खेतीबाड़ी के लिए 80 प्रतिशत तक पहुंच गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस समय किसान अपने एक खेत में 200 किलो यूरिया प्रयोग में ला रहे हैं।

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यहां सड़क पर टमाटर फेंकने को मजबूर हुए किसान

क्या किया जाए साहब! मंडी में टमाटर प्रति रुपये किलो बिक रहा है, जबकि उस पर ढुलाई खर्च ही दो रुपया आता है। इसके अलावा पटवन व मेहनताना खर्च अलग से है। दिनोंदिन डीजल व बिजली महंगी होती जा रही है। ऐसी स्थिति में इसे बर्बाद करने के अलावा और कोई दूसरा उपाय भी नहीं बचा है।

कुछ ऐसा ही दर्द रविवार को स्थानीय पोस्ट ऑफिस चौक पर सब्जी उत्पादक किसान टमाटर को नष्ट करते हुए छलका। नोखा के कई किसानों ने आज मंडी लाए गए टमाटर को बेचने के बजाए सड़क पर फेंक कम मूल्य मिलने पर विरोध जताया। कहाकि अगर खाद्य प्रसंस्करण उद्योग लगा होता तो शायद यह दिन उन्हें देखने को नहीं मिलता।

टमाटर का उचित दाम नहीं मिलने से नाराज सदर प्रखंड के आकाशी गांव के एक दर्जन से अधिक सब्जी उत्पादक किसानों ने खेत से तोड़े गए टमाटर को पोस्ट आफिस चौराहे पर गाडिय़ां चला उसे नष्ट करने का काम किया। रास्ते से गुजरने वाले हर कोई किसानों की यह स्थिति देख कुछ समय के लिए चौक पर जरूर ठहर जाते थे।

शिमला मिर्च समेत कई प्रकार की सब्जियों के अच्छे उत्पादक माने जाने वाले किसान अकाशी गांव निवासी मनोज सिंह कहते हैं कि एक किलो टमाटर को तैयार कर उसे मंडी तक पहुंचाने में छह से आठ रुपये खर्च आता है। लेकिन बाजार में कीमत सिर्फ एक रुपया किलो ही मिलता है। ऐसी स्थिति में इसे नष्ट न किए जाए तो और क्या….? कहा कि दिनोंदिन डीजल महंगे हो रहे हैं व बिजली की कीमत भी बढ़ रही रही है।

सरकार सिर्फ किसान हितैषी बता रही है। लेकिन किसानों के हित के लिए की गई घोषणाओं पर अमल नहीं हुआ। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग लगाने की घोषणा वर्षों पूर्व हुई है। मेगा फूड पार्क का शिलान्यास भी तीन वर्ष पूर्व यहां किया गया। लेकिन निर्माण अबतक नहीं हो पाया। ऐसे में किसानों की आमदनी कैसे बढ़ेगी।

गौरतलब है कि कमोबेश यही स्थित आकाशी ही नहीं मनीपुर, मल्हीपुर, नोखा, बरांव समेत जिले के अन्य गांवों में टमाटर उत्पादन करने वाले किसानों की है। जिन्हें आज खर्च के अनुरूप आमदनी नहीं हो रही है। उनके लिए सब्जी की खेती कमरतोड़ व महंगी साबित होने लगी है। जिसके कारण बच्चों की पढ़ाई- लिखाई से लेकर परिवार का भरण-पोषण का कार्य भी बाधित हो रहा है।

शहर के पास है जमीन तो गुलाब से सालाना 6 लाख तक कमाएं, समझें पूरा गणि‍त

गुलाब की खेती के साथ सबसे अच्‍छी बात ये है कि‍ इसकी डिमांड कभी कम नहीं होती। एक बार बोने के बाद गुलाब का पौधा करीब 8 साल तक फूल देता है। इसमें शरुआती मेहनत के बाद केवल पौधों की छंटाई करनी होती है और सिंचाई पर ध्‍यान देना होगा। एक गुलाब का पौधा सालभर में 1 से 2 कि‍लो फूल देता है।

एक एकड़ गुलाब की खेती से आप 2 लाख से 6 लाख रुपए तक सालाना कमा सकते हैं। इतना अंतर इसलि‍ए हैं क्‍योंकि आपकी कमाई इस बात पर भी निर्भर करती है कि‍ आप कौन सी कि‍स्‍म के गुलाब की खेती कर रहे हैं, क्‍योंकि‍ सजावटी गुलाब, खुश्‍बू वाले गुलाब व इत्र तथा गुलकंद बनाने वाले गुलाब अलग-अलग होते हैं और इनका बाजार भी अलग अलग है।

सबसे पहले मार्केट देखें

अगर आपको इत्र, गुलकंद और गुलाबजल के लि‍हाज से गुलाब की खेती करनी है तो उसके लि‍ए बुल्गारिया रोजा डेमसेना सबसे अच्‍छा है, इसके अलावा देसी गुलाब की प्रजाति‍यां चुन सकते हैं, जो आपकी मि‍ट्टी के अनुकूल हो। अगर आपको फूलमाला के लि‍हाज से खेती करनी है तो गंगानगरी गुलाब अच्‍छा रहता है।

इसके अलावा अगर आपको सजावटी कि‍स्‍म के फूलों की खेती करनी है तो उसके लि‍ए दर्जनों प्रजाति‍यां हैं जैसे कॉन्‍फीडेंस, एवन, मि‍स्‍टर लिंकन। केअर-लेस, लव, अमेरि‍क हैरि‍टेज रंगबि‍रंबा गुलाब होता है। जिन कि‍सानों की जमीन शहरों के आसपास है वह सजावटी फूलों की खेती करें इन्‍हें कट फ्लावर भी कहते हैं। एक एकड़ में 4 बीघा होता है और एक बीघा में 1500 से 1800 पौधे लग जाते हैं।

लंबे टाइम तक मि‍लता है फूल

राजस्‍थान के दौसा में गुलाब की खेती करने वाले वसुंधरा हर्बल एंड एग्रीबायोटेक के कपि‍ल देवा शर्मा ने बताया कि‍ उन्‍होंने करीब एक एकड़ जमीन में गुलाब की पौध लगाई है। सीजन के दौरान फूलों की कीमत 300 रुपए प्रति‍कि‍लो तक चली जाती है।

ऑफ सीजन में भी फूल 100 से 150 रुपए प्रति‍कि‍लो तक बि‍कते हैं। नवंबर से लेकर मई तक फूल मि‍लते हैं। कपि‍ल गंगानगरी कि‍स्‍म की खेती करती है, जि‍सका साइज बड़ा होता और शुश्‍बू भी होती है। यह फूल माला बनाने के काम में आता है।

सजावटी फूलों की कीमत ज्‍यादा है

शर्मा के मुताबि‍क, एक एकड़ से सालाना डेढ़ से दो लाख रुपए तक की कमाई हो जाती है। शुरू में थोड़ी मेहनत करनी होती है उसके बाद तो बस प्रूनिंग और सिंचाई पर ध्‍यान देना होता है। सजावटी फूलों की कीमत इस फूल से कहीं ज्‍यादा होती है। अगर आपके आसपास सजावटी गुलाब की मार्केट है तो उसकी खेती में तीन से 4 लाख तक सालाना कमाई हो सकती है।

किसान ने 20 किलो खाद से काम शुरू कर खड़ा किया करोड़ों रुपए का कारोबार

किसान ज्ञासी अहिरवार ने 20 किलो केंचुए से खाद बनाने का कारोबार शुरू किया था, आज इनके पास 50 टन खाद बनकर तैयार है जिसकी कीमत लाखों रुपए है। केंचुआ खाद, वर्मी कम्पोस्ट बनाने के साथ ही ये 20 एकड़ खेत में जैविक ढंग से खेती करते हैं।

इनकी खाद और जैविक सब्जियों की मांग दूसरे जिलों में रहती है जिससे इन्हें अच्छा मुनाफा मिलता है। बुन्देलखण्ड का जैविक खाद का ये सबसे बड़ा प्लांट है, एक साधारण किसान ने जैविक खाद बनाकर करोड़ों का कारोबार खड़ा कर दिया, इनके जज्बे को बुंदेलखंड सलाम करता है।

ललितपुर जिला मुख्यालय से 17 किलोमीटर दूर दक्षिण दिशा में आलापुर गांव में मेन रोड पर अम्बेडकर बायो फर्टिलाइजर के नाम से ज्ञासी अहिरवार का कई एकड़ में प्लांट लगा है। एक साधारण किसान ज्ञासी अहिरवार (59 वर्ष) जैविक खाद का कारोबार शुरू करने को लेकर अपना अनुभव साझा करते हुए बताते हैं,

“लोगों से जैविक खाद बनाने के बारे में अकसर सुना करता था, मै पढ़ा लिखा नहीं था इसलिए नौकरी की उम्मीद तो बिल्कुल नहीं थी, खेती में ज्यादा पैदा नहीं होता था, केचुआ और वर्मी कम्पोस्ट खाद का कई जगह प्रशिक्षण लिया।” देखिए वीडियो

इस कारोबार को शुरू करने के लिए इनके पास रूपए नहीं थे इनका कहना है, “बैंक से 10 लाख लोन लेकर 12 साल पहले 20 किलो केंचुआ से शुरुआत की थी, शुरुआत में कुछ संस्थाओं ने तीन लाख की खाद खरीद ली, इससे हमारा आत्मविश्वास बढ़ा तबसे लगातार इसका कारोबार कर रहे हैं, आज हमारे पास पांच करोड़ की खाद इकट्ठा है।”

इनके पास जैविक खाद की मांग मध्यप्रदेश के 14 जनपदों से आती है। अपनी बीस एकड़ खेती में ज्ञासी पुराने अनाज और सब्जियों की खेती जैविक ढंग से करते हैं। दिल्ली और देहरादून में इनकी सब्जियां और देशी अनाज जाते है जिनका इन्हें अच्छा मुनाफा मिलता है।

ज्ञासी अहिरवार पढ़े-लिखे भले ही न हो पर जैविक खाद बनाने को लेकर उनके अनुभव की चर्चा पूरे बुंदेलखंड में है। इनके जज्बे को सरकारी विभाग से लेकर किसान तक सभी सलाम करते हैं। ये इटली, जर्मनी जैसे कई देशों में अपना अनुभव साझा करने के लिए जा चुके हैं।

ज्ञासी अहिरवार का कहना है, “पुराने अनाज कोदो, कुटकी, ज्वार जैसे कई अनाज जो विलुप्त हो चुके हैं उनको पुन: बचाने का प्रयास है, अपनी बीस एकड़ जमीन में सिर्फ देशी अनाज और सब्जियां उगाते हैं।” वो आगे बताते हैं, “बीज, खाद, कीटनाशक दवाइयां कुछ भी बाजार से नहीं खरीदते हैं,

एक किलो केचुआ 610 रुपए किलो में बिकता है, वर्मी कम्पोस्ट के एक किलो के पैकिट 15-20 रुपए में बिक्री हो जाती है, कृषि विभाग से लेकर गैर सरकारी संस्थाएं इन पैकिटों को खरीदती हैं।” गमलों से लेकर अपने किचेन में इस जैविक खाद का लोग प्रयोग करते हैं।

जैविक खाद बनाने से लेकर जैविक खेती करने के अलावा ज्ञासी अहिरवार किसानो को हर महीने की 15 तारीख को नि:शुल्क प्रशिक्षण भी देते हैं। ज्ञासी ने पिछले साल लगभग 50 लाख का कारोबार किया था।

जिन किसानों को इनसे सलाह लेनी होती है वो कभी भी आकर सलाह ले सकते हैं। ज्ञासी अहिरवार इसकी बिक्री कैसे करते हैं इस पर उनका कहना है, “हमे बहार से मांग आती है जो एक बार खाद ले जाता है वो दूसरों को बताते हैं, एक दूसरे से जान पहचान बढ़ी है, 50 टन जो माल रखा है

उसका भाव अभी सही नहीं मिल रहा है जैसे ही भाव मिलेगा इसकी बिक्री कर देंगे, 45दिन में जैविक खाद बनकर तैयार हो जाती है।” जैविक खाद बनाने से लेकर जैविक खेती तक अगर कोई 15 दिन लगातार ट्रेनिंग लेना चाहता है तो उसे 500 रुपए जमा करने होंगे उसे प्रमाणपत्र भी दिया जाएगा।

ज्ञासी अहिरवार की मेहनत और कारोबार की कहानी का देखिए वीडियो

गर्मी में बिना AC नहीं सोती यह डेढ़ करोड़ की गोड़ी,जाने इसकी खुराक और बाकि जानकारी

बड़वानी और महाराष्ट्र बॉर्डर के खेतिया-सारंगखेड़ा में अश्व मेले में आई करीब पांच साल की घोड़ी पद्मा लोगों के दिलों पर छा गई है। इंदौर के दतोदा की घोड़ी पद्मा के मालिक बालकृष्ण चंदेल ने बताया वे पद्मा को रोजाना 10 लीटर दूध, मिनरल पानी, 2 किलो चना, 5 किलो गेहूं की चापड़ व स्वाद अनुसार हरी घास खिलाते हैं। हर दिन उसे शैम्पू से नहलाया जाता है। गर्मियों में अगर AC कमरे में नहीं सुलाओ तो बैचेन रहती है।

दतोदा में रहने वाले बालकृष्ण चंदेल की घोड़ी पद्मा पुष्कर मेले में छाई हुई थी। इस घोड़ी ने तो सीएम वसुंधरा राजे सिंधिया को भी दिल जीत लिया था। पद्मा को खरीदने के लिए एक शख्स ने 72 लाख की बोली लगा दी थी, हालांकि उस समय चंदेल अपनी इस लाड़ली घोड़ी को 1.5 करोड़ से कम में बेचने के लिए तैयार नहीं थे।

घोड़ी मालिक का दावा है कि पद्मा की कीमत 2 करोड़ तक लग चुकी है, लेकिन वे इसे 10 करोड़ में भी बेचना नहीं चाहते हैं। उनके अनुसार अब तक कई ईनाम अपने नाम कर चुकी पद्मा की कद-काठी व नस्ल महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक की वंशज जैसी मानी जाती है।

छह फ़ीट ऊंची है पद्मा

करीब पांच साल की पद्मा का कद लगभग 6 फ़ीट है। चंदेल ने चार साल पहले आगरा के एक किसान से पद्मा को छह लाख रुपए में खरीदा था। चंदेल का पूरा परिवार पद्मा की देखरेख करता है। पद्मा को रोज़ 10 लीटर गाय का दूध पिलाते हैं। रोज उसको आधा किलो काजू और बादाम भी खिलाते हैं। चंदेल के मुताबिक़ पद्मा को नहाने का बहुत शौक है। जब तक उसे शैंपू से नहलाया ना जाए, तब तक वह सवारी के लिए तैयार नहीं होती।

वसुंधरा ने पहनाई थी माला, खरीदना चाहती थी पद्मा को

चंदेल बताते हैं कि पुष्कर मेले में पद्मा सबके आकर्षण का केंद्र थी। मेले का निरीक्षण करने आईं राजस्थान की सीएम वसुंधरा भी उसे देख काफी खुश हुईं। वसुंधरा जी का कहना था कि यदि पद्मा का रंग ब्राउन होता तो वे उसे तुरंत खरीद लेती। चंदेल बताते हैं कि एक ग्राहक तो पद्मा को खरीदने के लिए 72 लाख रुपए लेकर आ भी आ गया था, लेकिन  हम पद्मा को बेचना नहीं चाहते थे, इसलिए हमने उसकी कीमत डेढ़ करोड़ रखी थी।

ये है पद्मा की खुराक…

  • 10 लीटर दूध रोज
  • 05 किलो गेहूं चापड़ी
  • 02 किलो चना
  • 4.6 वर्ष आयु
  • 70 इंच ऊंचाई
  • 850 किलो वजन

मेले में खास

सारंगखेड़ा में एकमुखी गुरुदत्त भगवान का मंदिर है। इस मंदिर के पास ही अश्व मेला लगा है। इसमें 80 गांव के लोग आ रहे हैं। मेले में बड़ी-बड़ी पालकियां, सर्कस, पार्क, बच्चाें व ग्रामीणों के मनोरंजन के साधन हैं।

धर्मेंद्र यहां बिताते हैं फुर्सत के पल, ऐसा दिखता है उनका फार्म हाउस

गुजरे जमाने के हीरो धर्मेंद्र 82 साल (8 दिसंबर) के हो गए हैं। कई सुपरहिट फिल्मों में काम करने वाले धर्मेंद्र अभी भी फिल्मों में एक्टिव हैं। उनकी अपकमिंग फिल्म ‘यमला पगला दीवाना 3’ है, जिसकी शूटिंग जारी है। बता दें कि फेसबुक पर ‘धर्मेंद्र-ही मैन’ नाम से पेज है, जिस पर उन्होंने अपनी लाइफ की कई फोटोज शेयर कर रखी हैं।

लोनावला स्थित फार्म हाउस पर उनके फुर्सत के लम्हों की कुछ फोटोज भी इनमें शामिल हैं, जिनमें उन्हें कहीं गाय का दूध दूहते देखा जा सकता है तो कहीं वे अपने पालतू डॉग के साथ खेलते नजर आ रहे हैं। उनकी ये फोटोज आप आगे की स्लाइड्स में देख सकते हैं।

ज्यादातर समय फार्म हाउस पर ही बिताते हैं धर्मेंद्र…

एक इंटरव्यू के दौरान धर्मेंद्र ने कहा था, “मैं जाट हूं और जाट जमीन और अपने खेतों से प्यार करता है। मेरा ज्यादातर समय लोनावाला स्थित अपने फार्म हाउस पर ही बीतता है। हमारा फोकस ऑर्गनिक खेती पर है, हम चावल उगाते हैं। फार्म हाउस पर मेरी कुछ भैंसें भी हैं।

आखिरी बार ‘सेकंड हैंड हसबैंड’ में दिखे थे धर्मेंद्र

  •  धर्मेंद्र ने अपने करियर में ‘शोले’, ‘मां’, ‘चाचा भतीजा’, ‘धरम वीर’, ‘राज तिलक’, ‘सल्तनत’ और ‘यकीन’ जैसी कई पॉपुलर फिल्मों में काम किया।

  •  82 साल के हो चुके धर्मेंद्र को आखिरी बार साल 2015 में ‘सेकंड हैंड हसबैंड’ में देखा गया था, जिससे गोविंदा की बेटी टीना आहूजा ने बॉलीवुड डेब्यू किया था।