खेती में अब यूरिया का उपयोग बंद करेगी सरकार,पंजाब पर होगा सबसे ज्यादा असर

खेती के उपयोग में लिए जाने वाले यूरिया के खतरनाक परिणामो को देखते हुए अब केन्द्र सरकर यूरिया का उपयोग को बंद करने की तैयारी कर रही है । प्रधानमंत्री की मंशा के बाद अब केन्द्र ने सभी राज्यो पत्र लिख कर यूरिया का उपयोग कम करने निर्देश दिए है ।

दरअसल प्रधानमंत्री ने पिछले दिनों निति आयोग की बैठक में निर्देश दिए थे के किसानो को यूरिया का कम से कम प्रयोग करने के सुचेत प्रयास किए जाएं । और प्रधानमंत्री ने सभी राज्यों को इन निर्देशों पर अमल करने को कहा ।

रसायनिक खाद और कीटनाशकों के अंधाधुध इस्तेमाल और गोबर-हरी खाद के कम उपयोग से देश की 32 फीसदी खेती योग्य जमीन बेजान होती जा रही है। जमीन में लगातार कम होते कार्बन तत्वों की तरफ अगर जल्द ही किसान और सरकारों ने ध्यान नहीं दिया तो इस जमीन पर फसलें उगना बंद हो सकती हैं।

देश में सबसे ज्यादा यूरिया का इस्तेमाल पंजाब के किसान करते है अगर केन्द्र सरकार यूरिया बंद करने के फैसले को अमल में लाती है तो सबसे ज्यादा नुकसान भी पंजाब के किसानो को ही होगा । क्योंकि अब पंजाब की मिट्टी ऐसी हो गई है की फसल उगाने के लिए यूरिया की जरूरत पड़ती है ।

जानकारी के अनुसार भारत में पिछले कुछ दशकों में यूरिया का इस्तेमाल कई गुना बढ़ गया है। 1960 के दशक में यह 10 प्रतिशत प्रयोग में लाया जाता था, वहीं 2015-16 में नाइट्रोजन फर्टीलाइजर का इस्तेमाल खेतीबाड़ी के लिए 80 प्रतिशत तक पहुंच गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस समय किसान अपने एक खेत में 200 किलो यूरिया प्रयोग में ला रहे हैं।

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यहां सड़क पर टमाटर फेंकने को मजबूर हुए किसान

क्या किया जाए साहब! मंडी में टमाटर प्रति रुपये किलो बिक रहा है, जबकि उस पर ढुलाई खर्च ही दो रुपया आता है। इसके अलावा पटवन व मेहनताना खर्च अलग से है। दिनोंदिन डीजल व बिजली महंगी होती जा रही है। ऐसी स्थिति में इसे बर्बाद करने के अलावा और कोई दूसरा उपाय भी नहीं बचा है।

कुछ ऐसा ही दर्द रविवार को स्थानीय पोस्ट ऑफिस चौक पर सब्जी उत्पादक किसान टमाटर को नष्ट करते हुए छलका। नोखा के कई किसानों ने आज मंडी लाए गए टमाटर को बेचने के बजाए सड़क पर फेंक कम मूल्य मिलने पर विरोध जताया। कहाकि अगर खाद्य प्रसंस्करण उद्योग लगा होता तो शायद यह दिन उन्हें देखने को नहीं मिलता।

टमाटर का उचित दाम नहीं मिलने से नाराज सदर प्रखंड के आकाशी गांव के एक दर्जन से अधिक सब्जी उत्पादक किसानों ने खेत से तोड़े गए टमाटर को पोस्ट आफिस चौराहे पर गाडिय़ां चला उसे नष्ट करने का काम किया। रास्ते से गुजरने वाले हर कोई किसानों की यह स्थिति देख कुछ समय के लिए चौक पर जरूर ठहर जाते थे।

शिमला मिर्च समेत कई प्रकार की सब्जियों के अच्छे उत्पादक माने जाने वाले किसान अकाशी गांव निवासी मनोज सिंह कहते हैं कि एक किलो टमाटर को तैयार कर उसे मंडी तक पहुंचाने में छह से आठ रुपये खर्च आता है। लेकिन बाजार में कीमत सिर्फ एक रुपया किलो ही मिलता है। ऐसी स्थिति में इसे नष्ट न किए जाए तो और क्या….? कहा कि दिनोंदिन डीजल महंगे हो रहे हैं व बिजली की कीमत भी बढ़ रही रही है।

सरकार सिर्फ किसान हितैषी बता रही है। लेकिन किसानों के हित के लिए की गई घोषणाओं पर अमल नहीं हुआ। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग लगाने की घोषणा वर्षों पूर्व हुई है। मेगा फूड पार्क का शिलान्यास भी तीन वर्ष पूर्व यहां किया गया। लेकिन निर्माण अबतक नहीं हो पाया। ऐसे में किसानों की आमदनी कैसे बढ़ेगी।

गौरतलब है कि कमोबेश यही स्थित आकाशी ही नहीं मनीपुर, मल्हीपुर, नोखा, बरांव समेत जिले के अन्य गांवों में टमाटर उत्पादन करने वाले किसानों की है। जिन्हें आज खर्च के अनुरूप आमदनी नहीं हो रही है। उनके लिए सब्जी की खेती कमरतोड़ व महंगी साबित होने लगी है। जिसके कारण बच्चों की पढ़ाई- लिखाई से लेकर परिवार का भरण-पोषण का कार्य भी बाधित हो रहा है।

शहर के पास है जमीन तो गुलाब से सालाना 6 लाख तक कमाएं, समझें पूरा गणि‍त

गुलाब की खेती के साथ सबसे अच्‍छी बात ये है कि‍ इसकी डिमांड कभी कम नहीं होती। एक बार बोने के बाद गुलाब का पौधा करीब 8 साल तक फूल देता है। इसमें शरुआती मेहनत के बाद केवल पौधों की छंटाई करनी होती है और सिंचाई पर ध्‍यान देना होगा। एक गुलाब का पौधा सालभर में 1 से 2 कि‍लो फूल देता है।

एक एकड़ गुलाब की खेती से आप 2 लाख से 6 लाख रुपए तक सालाना कमा सकते हैं। इतना अंतर इसलि‍ए हैं क्‍योंकि आपकी कमाई इस बात पर भी निर्भर करती है कि‍ आप कौन सी कि‍स्‍म के गुलाब की खेती कर रहे हैं, क्‍योंकि‍ सजावटी गुलाब, खुश्‍बू वाले गुलाब व इत्र तथा गुलकंद बनाने वाले गुलाब अलग-अलग होते हैं और इनका बाजार भी अलग अलग है।

सबसे पहले मार्केट देखें

अगर आपको इत्र, गुलकंद और गुलाबजल के लि‍हाज से गुलाब की खेती करनी है तो उसके लि‍ए बुल्गारिया रोजा डेमसेना सबसे अच्‍छा है, इसके अलावा देसी गुलाब की प्रजाति‍यां चुन सकते हैं, जो आपकी मि‍ट्टी के अनुकूल हो। अगर आपको फूलमाला के लि‍हाज से खेती करनी है तो गंगानगरी गुलाब अच्‍छा रहता है।

इसके अलावा अगर आपको सजावटी कि‍स्‍म के फूलों की खेती करनी है तो उसके लि‍ए दर्जनों प्रजाति‍यां हैं जैसे कॉन्‍फीडेंस, एवन, मि‍स्‍टर लिंकन। केअर-लेस, लव, अमेरि‍क हैरि‍टेज रंगबि‍रंबा गुलाब होता है। जिन कि‍सानों की जमीन शहरों के आसपास है वह सजावटी फूलों की खेती करें इन्‍हें कट फ्लावर भी कहते हैं। एक एकड़ में 4 बीघा होता है और एक बीघा में 1500 से 1800 पौधे लग जाते हैं।

लंबे टाइम तक मि‍लता है फूल

राजस्‍थान के दौसा में गुलाब की खेती करने वाले वसुंधरा हर्बल एंड एग्रीबायोटेक के कपि‍ल देवा शर्मा ने बताया कि‍ उन्‍होंने करीब एक एकड़ जमीन में गुलाब की पौध लगाई है। सीजन के दौरान फूलों की कीमत 300 रुपए प्रति‍कि‍लो तक चली जाती है।

ऑफ सीजन में भी फूल 100 से 150 रुपए प्रति‍कि‍लो तक बि‍कते हैं। नवंबर से लेकर मई तक फूल मि‍लते हैं। कपि‍ल गंगानगरी कि‍स्‍म की खेती करती है, जि‍सका साइज बड़ा होता और शुश्‍बू भी होती है। यह फूल माला बनाने के काम में आता है।

सजावटी फूलों की कीमत ज्‍यादा है

शर्मा के मुताबि‍क, एक एकड़ से सालाना डेढ़ से दो लाख रुपए तक की कमाई हो जाती है। शुरू में थोड़ी मेहनत करनी होती है उसके बाद तो बस प्रूनिंग और सिंचाई पर ध्‍यान देना होता है। सजावटी फूलों की कीमत इस फूल से कहीं ज्‍यादा होती है। अगर आपके आसपास सजावटी गुलाब की मार्केट है तो उसकी खेती में तीन से 4 लाख तक सालाना कमाई हो सकती है।

किसान ने 20 किलो खाद से काम शुरू कर खड़ा किया करोड़ों रुपए का कारोबार

किसान ज्ञासी अहिरवार ने 20 किलो केंचुए से खाद बनाने का कारोबार शुरू किया था, आज इनके पास 50 टन खाद बनकर तैयार है जिसकी कीमत लाखों रुपए है। केंचुआ खाद, वर्मी कम्पोस्ट बनाने के साथ ही ये 20 एकड़ खेत में जैविक ढंग से खेती करते हैं।

इनकी खाद और जैविक सब्जियों की मांग दूसरे जिलों में रहती है जिससे इन्हें अच्छा मुनाफा मिलता है। बुन्देलखण्ड का जैविक खाद का ये सबसे बड़ा प्लांट है, एक साधारण किसान ने जैविक खाद बनाकर करोड़ों का कारोबार खड़ा कर दिया, इनके जज्बे को बुंदेलखंड सलाम करता है।

ललितपुर जिला मुख्यालय से 17 किलोमीटर दूर दक्षिण दिशा में आलापुर गांव में मेन रोड पर अम्बेडकर बायो फर्टिलाइजर के नाम से ज्ञासी अहिरवार का कई एकड़ में प्लांट लगा है। एक साधारण किसान ज्ञासी अहिरवार (59 वर्ष) जैविक खाद का कारोबार शुरू करने को लेकर अपना अनुभव साझा करते हुए बताते हैं,

“लोगों से जैविक खाद बनाने के बारे में अकसर सुना करता था, मै पढ़ा लिखा नहीं था इसलिए नौकरी की उम्मीद तो बिल्कुल नहीं थी, खेती में ज्यादा पैदा नहीं होता था, केचुआ और वर्मी कम्पोस्ट खाद का कई जगह प्रशिक्षण लिया।” देखिए वीडियो

इस कारोबार को शुरू करने के लिए इनके पास रूपए नहीं थे इनका कहना है, “बैंक से 10 लाख लोन लेकर 12 साल पहले 20 किलो केंचुआ से शुरुआत की थी, शुरुआत में कुछ संस्थाओं ने तीन लाख की खाद खरीद ली, इससे हमारा आत्मविश्वास बढ़ा तबसे लगातार इसका कारोबार कर रहे हैं, आज हमारे पास पांच करोड़ की खाद इकट्ठा है।”

इनके पास जैविक खाद की मांग मध्यप्रदेश के 14 जनपदों से आती है। अपनी बीस एकड़ खेती में ज्ञासी पुराने अनाज और सब्जियों की खेती जैविक ढंग से करते हैं। दिल्ली और देहरादून में इनकी सब्जियां और देशी अनाज जाते है जिनका इन्हें अच्छा मुनाफा मिलता है।

ज्ञासी अहिरवार पढ़े-लिखे भले ही न हो पर जैविक खाद बनाने को लेकर उनके अनुभव की चर्चा पूरे बुंदेलखंड में है। इनके जज्बे को सरकारी विभाग से लेकर किसान तक सभी सलाम करते हैं। ये इटली, जर्मनी जैसे कई देशों में अपना अनुभव साझा करने के लिए जा चुके हैं।

ज्ञासी अहिरवार का कहना है, “पुराने अनाज कोदो, कुटकी, ज्वार जैसे कई अनाज जो विलुप्त हो चुके हैं उनको पुन: बचाने का प्रयास है, अपनी बीस एकड़ जमीन में सिर्फ देशी अनाज और सब्जियां उगाते हैं।” वो आगे बताते हैं, “बीज, खाद, कीटनाशक दवाइयां कुछ भी बाजार से नहीं खरीदते हैं,

एक किलो केचुआ 610 रुपए किलो में बिकता है, वर्मी कम्पोस्ट के एक किलो के पैकिट 15-20 रुपए में बिक्री हो जाती है, कृषि विभाग से लेकर गैर सरकारी संस्थाएं इन पैकिटों को खरीदती हैं।” गमलों से लेकर अपने किचेन में इस जैविक खाद का लोग प्रयोग करते हैं।

जैविक खाद बनाने से लेकर जैविक खेती करने के अलावा ज्ञासी अहिरवार किसानो को हर महीने की 15 तारीख को नि:शुल्क प्रशिक्षण भी देते हैं। ज्ञासी ने पिछले साल लगभग 50 लाख का कारोबार किया था।

जिन किसानों को इनसे सलाह लेनी होती है वो कभी भी आकर सलाह ले सकते हैं। ज्ञासी अहिरवार इसकी बिक्री कैसे करते हैं इस पर उनका कहना है, “हमे बहार से मांग आती है जो एक बार खाद ले जाता है वो दूसरों को बताते हैं, एक दूसरे से जान पहचान बढ़ी है, 50 टन जो माल रखा है

उसका भाव अभी सही नहीं मिल रहा है जैसे ही भाव मिलेगा इसकी बिक्री कर देंगे, 45दिन में जैविक खाद बनकर तैयार हो जाती है।” जैविक खाद बनाने से लेकर जैविक खेती तक अगर कोई 15 दिन लगातार ट्रेनिंग लेना चाहता है तो उसे 500 रुपए जमा करने होंगे उसे प्रमाणपत्र भी दिया जाएगा।

ज्ञासी अहिरवार की मेहनत और कारोबार की कहानी का देखिए वीडियो

गर्मी में बिना AC नहीं सोती यह डेढ़ करोड़ की गोड़ी,जाने इसकी खुराक और बाकि जानकारी

बड़वानी और महाराष्ट्र बॉर्डर के खेतिया-सारंगखेड़ा में अश्व मेले में आई करीब पांच साल की घोड़ी पद्मा लोगों के दिलों पर छा गई है। इंदौर के दतोदा की घोड़ी पद्मा के मालिक बालकृष्ण चंदेल ने बताया वे पद्मा को रोजाना 10 लीटर दूध, मिनरल पानी, 2 किलो चना, 5 किलो गेहूं की चापड़ व स्वाद अनुसार हरी घास खिलाते हैं। हर दिन उसे शैम्पू से नहलाया जाता है। गर्मियों में अगर AC कमरे में नहीं सुलाओ तो बैचेन रहती है।

दतोदा में रहने वाले बालकृष्ण चंदेल की घोड़ी पद्मा पुष्कर मेले में छाई हुई थी। इस घोड़ी ने तो सीएम वसुंधरा राजे सिंधिया को भी दिल जीत लिया था। पद्मा को खरीदने के लिए एक शख्स ने 72 लाख की बोली लगा दी थी, हालांकि उस समय चंदेल अपनी इस लाड़ली घोड़ी को 1.5 करोड़ से कम में बेचने के लिए तैयार नहीं थे।

घोड़ी मालिक का दावा है कि पद्मा की कीमत 2 करोड़ तक लग चुकी है, लेकिन वे इसे 10 करोड़ में भी बेचना नहीं चाहते हैं। उनके अनुसार अब तक कई ईनाम अपने नाम कर चुकी पद्मा की कद-काठी व नस्ल महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक की वंशज जैसी मानी जाती है।

छह फ़ीट ऊंची है पद्मा

करीब पांच साल की पद्मा का कद लगभग 6 फ़ीट है। चंदेल ने चार साल पहले आगरा के एक किसान से पद्मा को छह लाख रुपए में खरीदा था। चंदेल का पूरा परिवार पद्मा की देखरेख करता है। पद्मा को रोज़ 10 लीटर गाय का दूध पिलाते हैं। रोज उसको आधा किलो काजू और बादाम भी खिलाते हैं। चंदेल के मुताबिक़ पद्मा को नहाने का बहुत शौक है। जब तक उसे शैंपू से नहलाया ना जाए, तब तक वह सवारी के लिए तैयार नहीं होती।

वसुंधरा ने पहनाई थी माला, खरीदना चाहती थी पद्मा को

चंदेल बताते हैं कि पुष्कर मेले में पद्मा सबके आकर्षण का केंद्र थी। मेले का निरीक्षण करने आईं राजस्थान की सीएम वसुंधरा भी उसे देख काफी खुश हुईं। वसुंधरा जी का कहना था कि यदि पद्मा का रंग ब्राउन होता तो वे उसे तुरंत खरीद लेती। चंदेल बताते हैं कि एक ग्राहक तो पद्मा को खरीदने के लिए 72 लाख रुपए लेकर आ भी आ गया था, लेकिन  हम पद्मा को बेचना नहीं चाहते थे, इसलिए हमने उसकी कीमत डेढ़ करोड़ रखी थी।

ये है पद्मा की खुराक…

  • 10 लीटर दूध रोज
  • 05 किलो गेहूं चापड़ी
  • 02 किलो चना
  • 4.6 वर्ष आयु
  • 70 इंच ऊंचाई
  • 850 किलो वजन

मेले में खास

सारंगखेड़ा में एकमुखी गुरुदत्त भगवान का मंदिर है। इस मंदिर के पास ही अश्व मेला लगा है। इसमें 80 गांव के लोग आ रहे हैं। मेले में बड़ी-बड़ी पालकियां, सर्कस, पार्क, बच्चाें व ग्रामीणों के मनोरंजन के साधन हैं।

धर्मेंद्र यहां बिताते हैं फुर्सत के पल, ऐसा दिखता है उनका फार्म हाउस

गुजरे जमाने के हीरो धर्मेंद्र 82 साल (8 दिसंबर) के हो गए हैं। कई सुपरहिट फिल्मों में काम करने वाले धर्मेंद्र अभी भी फिल्मों में एक्टिव हैं। उनकी अपकमिंग फिल्म ‘यमला पगला दीवाना 3’ है, जिसकी शूटिंग जारी है। बता दें कि फेसबुक पर ‘धर्मेंद्र-ही मैन’ नाम से पेज है, जिस पर उन्होंने अपनी लाइफ की कई फोटोज शेयर कर रखी हैं।

लोनावला स्थित फार्म हाउस पर उनके फुर्सत के लम्हों की कुछ फोटोज भी इनमें शामिल हैं, जिनमें उन्हें कहीं गाय का दूध दूहते देखा जा सकता है तो कहीं वे अपने पालतू डॉग के साथ खेलते नजर आ रहे हैं। उनकी ये फोटोज आप आगे की स्लाइड्स में देख सकते हैं।

ज्यादातर समय फार्म हाउस पर ही बिताते हैं धर्मेंद्र…

एक इंटरव्यू के दौरान धर्मेंद्र ने कहा था, “मैं जाट हूं और जाट जमीन और अपने खेतों से प्यार करता है। मेरा ज्यादातर समय लोनावाला स्थित अपने फार्म हाउस पर ही बीतता है। हमारा फोकस ऑर्गनिक खेती पर है, हम चावल उगाते हैं। फार्म हाउस पर मेरी कुछ भैंसें भी हैं।

आखिरी बार ‘सेकंड हैंड हसबैंड’ में दिखे थे धर्मेंद्र

  •  धर्मेंद्र ने अपने करियर में ‘शोले’, ‘मां’, ‘चाचा भतीजा’, ‘धरम वीर’, ‘राज तिलक’, ‘सल्तनत’ और ‘यकीन’ जैसी कई पॉपुलर फिल्मों में काम किया।

  •  82 साल के हो चुके धर्मेंद्र को आखिरी बार साल 2015 में ‘सेकंड हैंड हसबैंड’ में देखा गया था, जिससे गोविंदा की बेटी टीना आहूजा ने बॉलीवुड डेब्यू किया था।

ऐसे करे कीवी की खेती , 1 एकड़ से कमाए 8 लाख रुपये


कीवी का उत्पति स्थल चीन है, हालांकि कीवी को चीन के अलावा न्यूजीलैंड, इटली, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, पाकिस्तान, ईरान,नेपाल, चिली, स्पेन और भारत में भी उगाया जा रहा है.

भारत में इसकी खेती हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, मेघालय , सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर के पहाड़ी क्षेत्रों में उगाया जा रहा है. इसकी खेती मैदानी राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, केरल में भी की जाने लगी है. इस फल को 1000 मीटर से 2500 मीटर की समुन्द्र तल से ऊँचाई पर उगाया जा सकता है.

किस्में : इसकी प्रचलित किस्मों में अब्बोट, अलिसन, ब्रूनो, हेवर्ड और तोमुरी हैं.

कैसे उगायें :  कीवी का पौधा एक बेल होती है जो 9 मीटर तक बढ़ सकती है और यह 4 से 5 वर्ष के बाद फल देना शुरू कर देती है. फूल आने से फसल पकने तक की अवधि लगभग 100 दिन होती है. यह एकलिंगी पौधा होता है, इसलिए मादा कलमों के साथ नर की जड़ित कलमों को लगाया जाता है ताकि अच्छी तरीके से परागण हो सके और ज्यादा उत्पादन लिया जा सके.

आठ मादा बेलों के लिए एक नर बेल आवश्यक होती है. इसकी कलमों को बसंत ऋतु में लगाया जाता है. इसको अंगूर की तरह ही ढाँचे पर चढ़ाना चाहिए. इसकी कटाई-छटाई गर्मी और सर्दी दोनों मौसम में करनी चाहिए ताकि ज्यादा उत्पादन लिया जा सके. कीवी को पाले से बचाना बहुत जरुरी होता है. इसके फल नवम्बर महीने से पकने शुरू हो जाते हैं. कीवी को काफी पानी की आवश्यकता होती है इसलिए सिंचाई का उचित प्रबंध होना चाहिए.

500 ग्राम एनपीके मिश्रण प्रत्येक वर्ष प्रति बेल 5 साल की उम्र तक देना चाहिए उसके बाद 900 ग्राम नाईट्रोजन, 500 ग्राम फोस्फोरस और 900 ग्राम पोटाश को प्रति वर्ष प्रति बेल देना चाहिए. जड़ गलन से बचाने के लिए बाविस्टिन 2 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से पौधों में देना चाहिए. इसके फल औसतन 80 से 90 ग्राम के होते हैं.

इसके फलों को 0 डिग्री तापमान पर कोल्ड स्टोरेज में 4 से 6 महीने रखा जा सकता है पर सामान्य अवस्था में 8 हफ्ते तक फल ख़राब नहीं होता है. एक बेल से प्रत्येक वर्ष 40 से 60 किलो फल मिलते हैं. इसकी औसतन पैदावार 20 से 25 टन प्रति हेक्टेयर है. फलों को बाजार में भेजने से पहले 3 से 4 किलो की क्षमता वाले कार्ड बोर्ड में पैक करना चाहिए .बाजार के औसत भाव को देखते हुए 1 एकड़ बगीचे से लगभग 8 लाख रुपए प्रति वर्ष कमाये जा सकते हैं.

कलम मिलने के स्थान :

  • डॉ.वाई.एस. परमार यूनिवर्सिटी ऑफ़ हॉर्टिकल्चर एंड फॉरेस्ट्री, नौनी जिला सोलन हिमाचल प्रदेश,01792 252326, 252310
  • शेख गुलज़ार, श्री नगर, जम्मू कश्मीर , 9858986794

कीवी खाने के लाभ :

कीवी में विटामिन सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है. यह अनिंद्रा रोग को दूर करता है और पाचन क्रिया को सही करता है. आयरन का भी बेहतरीन स्त्रोत है.

ऐसे शुरू करें ड्रैगन फ्रूट की उन्नत खेती

 

एक ड्रैगन फलों के पेड़ मूल रूप से जीसस हीलोसेरियस का कैक्टस बेल है। यह मध्य अमेरिका के मूल निवासी है, लेकिन अब पूरी दुनिया में विशेषकर उष्णकटिबंधीय देशों में उगता है। यह एक बढ़ती हुई बढ़ती हुई बेल है जिसके लिए एक ऊर्ध्वाधर पोल का समर्थन करने के लिए बढ़ने की आवश्यकता होती है और फिर एक छाता जैसा गिरने के लिए एक अंगूठी होती है। इसमें 15-20 साल का जीवन काल है, इसलिए पोल और रिंग का उचित चयन महत्वपूर्ण है।

एक मजबूत और स्थायी समर्थन सुनिश्चित करने के लिए विशेष आरसीसी पोल लगाए गए हैं आमतौर पर चार पोल प्रति पोल को अधिकतम उपज देने के लिए लगाए जाते हैं। कटाई और रखरखाव के काम के दौरान उचित ध्रुव को पोल और पंक्ति अंतर को रोके रखा जाता है। प्रत्येक व्यक्ति के वृक्षारोपण की मिट्टी और पानी की संपत्ति के अनुसार मूल पोषक तत्व और उर्वरक समय-समय पर लागू होते हैं। धातु तैयार करने से बचा जा सकता है क्योंकि इससे पौधों को धूप / गर्मी जल जाती है।

उष्णकटिबंधीय मौसमों में आम तौर पर उत्तर-दक्षिण पंक्तियों को प्राथमिकता दी जाती है, जहां गर्मियों में तापमान 40 डिग्री से ऊपर होता है। अधिक धूप की गर्मी का कारण सूर्य की रोशनी हो सकती है लेकिन उपचारात्मक कदम आसानी से स्थानीय रूप से उपलब्ध हैं। इस संयंत्र से ज्यादा बीमारी का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, आम समस्याओं जैसे जड़ सड़ांध, धूप की कालिमा, पक्षी हमलों आदि का आसानी से ध्यान रखा जा सकता है।

ड्रैगन फलों – पिठया, 21 वीं सदी की ‘आश्चर्यजनक फल’ भारतीय उद्यान परिदृश्य में एक क्रांति में रिंग के लिए सेट है। यह किसानों और उपभोक्ताओं के लिए एक बून है मूल रूप से मध्य अमेरिका से यह सफलतापूर्वक थाईलैंड, मलेशिया, वियतनाम, श्रीलंका, बांग्लादेश में वाणिज्यिक रूप से उगता है और भारत में हमारे दरवाजे पर अब दस्तक दे रहा है।

मुख्य विशेषताएं:

  • किसी भी प्रकार की मिट्टी में बढ़ता है
  • पानी की न्यूनतम आवश्यकता
  • रखरखाव की न्यूनतम आवश्यकता
  • भारतीय जलवायु स्थितियों को सहिष्णु बना सकता है
  • 2 एनडी / 3 आरडी वर्ष में निवेश रिटर्न
  • अधिक प्रसार / पुनर्विक्रय के लिए कटिगों का उपयोग किया जा सकता है
  • स्थानीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में भारी मांग
  • मूल्य संवर्धन उत्पाद कमांड प्रीमियम दरें

मिट्टी:

ड्रैगन फलों के पौधे किसी भी प्रकार की मिट्टी को बर्दाश्त कर सकते हैं, हालांकि वे अच्छी तरह से मिट्टी में सूखने में अच्छी तरह से बढ़ते हैं। जल को बनाए रखने वाली मिट्टी जड़ सड़ांध का कारण बन सकती है और इस घातक कारक से बचने के लिए, जल निकासी की सुविधा के लिए मिट्टी को रेत या छोटे पत्थर के कंकड़ों से मिलाया जा सकता है।

जलवायु:

भारत एक उष्णकटिबंधीय देश है, जिसमें हर साल मध्यम जलवायु होती है। ड्रैगन फल उष्णकटिबंधीय मौसम के लिए अच्छी तरह से अनुकूल है। चरम भारतीय मौसम के लिए मामूली समायोजन जहां तक ​​जलवायु स्थितियों का संबंध है, सभी बाधाएं दूर कर सकते हैं।

सिंचाई:

अन्य फसलों / फलों की तुलना में कैक्टस होने के कारण ड्रैगन फल को कम पानी की आवश्यकता होती है। यह महीनों के लिए पानी के बिना जीवित रह सकता है सिंचाई का सर्वोत्तम अनुशंसित तरीका ड्रिप सिंचाई है। बाढ़ से सिंचाई की सिफारिश नहीं की जाती क्योंकि यह पानी बर्बाद करता है और फूस का काम बढ़ाता है। प्रति दिन लगभग 1 से 2 लीटर पानी प्रति संयंत्र प्रतिदिन गर्मियों / सूखे दिनों के दौरान पर्याप्त है। आपकी मिट्टी, जलवायु और पौधे स्वास्थ्य के आधार पर जल की आवश्यकता बढ़ सकती है या कम हो सकती है

उपज और अर्थशास्त्र:

पौधरोपण के बाद 18-24 महीनों के बाद ड्रैगन फल सामान्य रूप से फल होता है। यह एक वनस्पति फल पौधे है, जो आम तौर पर मानसून के दौरान या बाद में फलों के फल के साथ होता है। यह एक सीजन के दौरान 3 से 4 तरंगों में फल होता है। प्रत्येक ध्रुव का फल प्रति लहर लगभग 40 से 100 फल होता है। प्रत्येक फल का वजन लगभग 300 से 1000 ग्राम होता है। एक पोल आम तौर पर लगभग 15 से 25 किलोग्राम फल पैदा करता है। (60 / 80kgs प्रति पोल की खेती भारत में दर्ज की गई है) इन फलों को बाजार में 3 से 400 रुपये प्रति किलोग्राम में बेची जाती है, लेकिन सामान्य फार्म की दर लगभग रु। 125 से 200 रुपये प्रति किलो

वार्षिक आय की एक सामान्य गणना शायद इस प्रकार की गणना की जा सकती है:
एक एकर x 300 पोल एक्स 15 किग्रा (कम) x रु .25 (न्यूनतम) = रु। 5,62,500 = 00 प्रति एकड़ प्रति वर्ष

ध्यान दें:

  • सभी गणना अच्छी तरह से बनाए गए खेत के लिए हैं
  • सभी उपरोक्त गणना सबसे कम ओर हैं
  • एक एकड़ में 400 पोल भी हो सकते हैं
  • उचित खेती के तरीके / पोषक तत्व अधिक पैदावार दे सकते हैं
  • उचित विपणन नेटवर्क या निर्यात बेहतर दरें ला सकते हैं
  • नाइट लाइटिंग पद्धति फ्राईटिंग के अतिरिक्त तरंगों को दे सकती है
  • मूल्य अतिरिक्त उत्पाद उच्च रिटर्न प्राप्त करेंगे

भारत में खेती की स्थिति और मांग:

महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु के राज्यों में बहुत कम किसानों ने भारत में दार्गन फलों की खेती की है। ड्रैगन फलों की खेती का कुल अखिल भारतीय क्षेत्र शायद 100 एकड़ से कम हो। भारत में इसके फल, पोषण और औषधीय गुणों के लिए जागरूकता और मांग बहुत बड़ी है। भारत थाईलैंड, मलेशिया, वियतनाम और श्रीलंका से इसकी आवश्यकता का 95% आयात करता है। इस फल में खाड़ी, यूरोपीय संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका के निर्यात के लिए भी काफी संभावना है।