क्या कपास के भाव होंगे 8000 के पार ? यह है वजह

क्या अबकि बार कपास(नरमा कोटन) का भाव होगा 8000 के पार ? सुनने में थोड़ा अजीब लग रहा है आज के भाव देख कर ऐसा लग नहीं रहा के कपास की कीमत बढ़ सकती है । लेकिन इसके पीछे एक बहुत बढ़ी वजह है ।

दरअसल कुश दिन पहले एक अंग्रेजी अख़बार इक्नोमिक्स टाइम के मुताबिक इस साल यू. एस. US अमरीका में पिछले दिनों तूफान आदि आने से कोटन की काफी फसल बर्बाद हो गई वहां की जो कोटन कंपनियां है और जो देश US से कोटन परचेज करते थे उन्हें अब कोटन वहां से मिल नहीं पाएगा जिसे उन्होंने कोटन भारत से ले सकती है ।

भारत में भी कोटन का बुवाई रकबा ज्यादा था लेकिन बिमारी आदि के कारण उत्पादन कम है। इस कारण इस बार कोटन का भाव काफी बढ़ सकते है और हो सकता है के कपास की कीमत 8000 के पार भी चली जाये। लेकिन हमेशा की तरह भाव बढ़ने का फ़ायदा सिर्फ व्यापारी ही उठता है ।

अगर आज के भाव देखें तो कपास के भाव बेशक बीते सीजन की अपेक्षा किसानों को इस बार कम मिले हों, लेकिन बीते कुछ दिनों की अपेक्षा इनके दामों में उछाल आया। सोमवार को कपास के भाव 4691 रुपए प्रति क्विंटल तक टॉप में रहे। चार दिनों में कपास के भाव में 450 रुपए प्रति क्विंटल तक की तेजी आई।

गरीब किसानो के लिए एटीएम की तरह है बकरी पालन ,बेहद कम निवेश में ऐसे करें शुरुआत

बकरी पालन गरीबों के लिए, यह एक एटीएम की तरह है। इसके लिए बेहद कम निवेश की जरूरत पड़ती है। आप एक नर और मादा बकरी का बच्चा पांच हजार से भी कम में खरीद सकते हैं और शुरुआत कर सकते हैं। इसके लिए आपको एक छोटा और अच्छी तरह से ढंके कमरा की जरूरत पड़ेगी। बकरियां खुले में चर सकती हैं, फसल कटे खेतों में और पेड़ की पत्तियां भी खा सकती हैं।’

एक औसत बकरी एक साल से भी कम समय में दो बच्चे को जन्म देती है और इस तरह बकरी का व्यवसाय चल निकलता है। बकरी को पालने के लिए अलग से किसी आश्रय स्थल की आश्यकता नहीं पड़ती। उन्हें अपने घर पर ही रखते हैं। बड़े पैमाने पर यदि बकरी पालन का कार्य किया जाए, तब उसके लिए अलग से बाड़ा बनाने की आवश्यकता पड़ती है।

यह उल्लेखनीय है कि देशी बकरियों के अलावा यदि बरबरी, जमुनापारी इत्यादि नस्ल की बकरियां होंगी तो उनके लिए दाना, भूसी, चारा की व्यवस्था करनी पड़ती है, पर वह भी सस्ते में हो जाता है। दो से पांच बकरी तक एक परिवार बिना किसी अतिरिक्त व्यवस्था के आसानी से पाल लेता है। घर की महिलाएं बकरी की देख-रेख करती हैं और खाने के बाद बचे जूठन से इनके भूसा की सानी कर दी जाती है। ऊपर से थोड़ा बेझर का दाना मिलाने से इनका खाना स्वादिष्ट हो जाता है। बकरियों के रहने के लिए साफ-सुथरी एवं सूखी जगह की आवश्यकता होती है।

एक सफल किसान की कहानी से जाने बकरी पालन का फ़ायदा

ये कहानी पंजाब के एक किसान की है जो किसी भी दूसरे चरवाहे या गड़ेरिए की तरह सड़क पर चलते हुए दिखते हैं। 32 साल के सुखचैन सिंह दूसरे चरवाहे की तरह दिखते हैं, लेकिन वो इन सबसे अलग हैं जिस तरह पंजाब में अधिकांश चरवाहे हैं।

दो एकड़ जमीन पर बकरी पालन का धंधा करने वाले वो एक छोटे किसान हैं, जिनके पास दो गांवों में बने दो शेड में 70 बकरियों का झुंड है। उनका मानना है कि, बकरियों को संभालना कठिन काम है, लेकिन साथ ही यह भी मानते हैं कि कोई भी धंधा बिना चुनौतियों के नहीं होता है ।

उनका बकरी पालन का धंधा बहुत अच्छी तरह चल रहा है। मोटी-तगड़ी बकरियों से उन्हें अच्छी कमाई हो जाती है। वो बताते हैं,’पिछली बिक्री में चापड़ मंडी में सबसे अच्छी बकरी से मुझे 60 हजार रुपये की कमाई हुई थी। आमतौर पर साधारण बकरियों से औसत कमाई 10 हजार से 35 हजार के बीच होती है, और बकरियों के बच्चे एक हजार से ढाई हजार में बिक जाती हैं। हम बकरियों की दूध की भी 30 से 40 रुपये प्रति लीटर की दर से बिक्री करते हैं।’

सुखचैन ने बतया के जब मैंने काम शुरू किया, तब मैंने बेचे हुए घर के पैसे से बकरियां और भेड़ें खरीदी। जब मेरे पास 105 पशुओं का झुंड हो गया, तब मैंने महसूस किया कि बकरियां और भेड़ें एक साथ अच्छी तरह से नहीं पाली जा सकती हैं, और यह बात मात्रा को लेकर नहीं थी बल्कि गुणवत्ता को लेकर थी। उसके बाद मैंने भेड़ें बेच दी और अच्छी गुणवत्ता वाली बकरियां पालने पर ध्यान केंद्रित किया। इसके लिए बेहतर जानकारी और अनुभव की जरूरत होती है लेकिन बदले में बहुत अच्छा रिटर्न भी मिलता है।’

दूध ही सफलता की चाबी

सुखचैन के मुताबिक, बकरियों से नियमित आमदनी मुख्यतौर पर दूध से होती है। बकरियों से हम रोज दो बार दूध ले सकते हैं, और 70 बकरियों से करीब 50 से 60 लीटर तक दूध रोज हो सकता है। वो इसे गांव के सरकारी संग्रहण केंद्रों पर 30 से 40 रुपये प्रति लीटर की दर से बेच देते हैं। हालांकि यह दूध साल में सिर्फ छह महीने के लिए ही बेचा जाता है, और इससे जो कमाई होती है उसका आधा फिर इसी व्यवसाय में लगा दिया जाता है।

एक बकरी एक साल में औसतन एक से दो बच्चे देती है, उनमे से बचे 50 से 60 बच्चों को बाद में एक से ढाई हजार रुपये में बेच दिया जाता है जिससे अतिरिक्त आमदनी हो जाती है।

खरगोश पालने के शौक ने बदली किस्मत ,अब रेबिट फार्मिंग से सालाना कमाता है 10 लाख रुपये

जींद के संजय कुमार देशभर के पेट शॉप्स में रैबिट सप्लाई करते हैं। उनके इस प्रोफेशन की कामयाब कहानी के पीछे बड़ी दिलचस्प कहानी है। संजय को बचपन से रैबिट पालने का शौक था और घरवाले इससे नाराज थे।

बावजूद इसके उन्होंने अपने शौक को जिंदा रखने के लिए इंटरनेट से जानकारी जुटाने के बाद ट्रेनिंग ली और 9 साल में शौक इतना बड़ा प्रोफेशन बन गया। अपने रैबिट फार्म से संजय कुमार लगभग 10 लाख सालाना कमा रहे हैं।

घरवालों ने कर दिया था पैसे देने से इनकार…

  • शहर के रोहतक रोड बाईपास पर आधा एकड़ जमीन पर बना उनका रैबिट फार्म प्रदेश में सबसे बड़ा रैबिट फार्म है। इन दिनों इस फार्म में 6 नस्लों के 500 से ज्यादा खरगोश हैं।
  • संजय कुमार बताते हैं कि वर्ष 2008 में सिर्फ 100 खरगोश से व्यवसाय शुरू किया था। इसके बाद धीरे-धीरे खरगोशों की संख्या बढ़ाई।
  • दूर-दूर से लोग उनसे रैबिट फार्मिंग के बारे में जानकारी लेने के लिए आते हैं। रैबिट फार्मिंग के इस कारोबार से संजय कुमार को आय भी अच्छी-खासी प्राप्त हो रही है।
  • संजय की मानें तो उनके यहां से हर महीने हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार समेत दूसरी यूनिवर्सिटी में रिसर्च के लिए खरगोश भेजे जाते हैं। वहीं, देश-विदेश के खरगोश पालने का शौक रखने वाले लोग भी यहीं से लेकर जाते हैं।
  • देशभर की पेट शॉप में उनके फार्म से खरगोश की सप्लाई होती है। साथ ही, अपने व्यवसाय के सिद्धांत के बारे में संजय बताते हैं कि वह मीट के लिए रैबिट की सप्लाई नहीं करते।

पहले इंटरनेट से जानकारी ली, फिर ट्रेनिंग

संजय कुमार के मुताबिक, उन्हें बचपन में ही खरगोश पालने का शौक था, लेकिन घरवाले इससे सख्त नाराज थे। बावजूद इसके उन्होंने जिद पाल ली कि वह एक दिन प्रदेश का सबसे बड़ा रैबिट फार्म बनाएंगे। एक-दो बार ऐसा भी हुआ, जब घरवालों ने खरगोश खरीदने के लिए उसे पैसे नहीं दिए तो चोरी-छुपे पैसे निकालकर खरगोश खरीद लाए।

फिर मैट्रिक करने के बाद संजय ने कुछ दिन गुड़गांव में ठेकेदारी की। इसी दौरान उन्होंने गूगल पर रैबिट फार्मिंग की जानकारी ली। इसके बाद वह राजस्थान के अविकानगर में भारत सरकार के ट्रेनिंग सेंटर से एक सप्ताह की ट्रेनिंग लेकर आए। शुरुआत में कर्नाटक से 100 रैबिट अपने फार्म पर रखे।

रैबिट फार्मिंग में देखभाल जरूरी, खर्च काफी कम

  • रैबिट फार्मिंग शुरू करने के इच्छुक किसानों के लिए संजय कुमार का कहना है कि शुरुआत में शेड तैयार करने, खरगोश खरीदने पर पैसा खर्च होता है, लेकिन उसके बाद खर्च काफी कम है।
  • पोल्ट्री व्यवसाय से काफी कम खर्च व कम जोखिम का यह कारोबार है। रैबिट फार्म से न कोई बदबू आती और न ही किसी प्रकार कोई और पॉल्यूशन होता है। बस रैबिट की देखभाल पर ध्यान देना काफी जरूरी है। एक खरगोश के लिए दिनभर में एक मुट्ठी फीड, एक मुट्ठी चारा और दो-तीन कटोरी पानी पीता है।
  • चार महीने में खरगोश दो किलो वजन से ज्यादा का हो जाता है और फिर 350 से लेकर 500 रुपए तक में बिक जाता है। रैबिट फार्मिंग के लिए सरकार द्वारा 25 से 30 प्रतिशत सब्सिडी दी जाती है।

जींद के ही एक और खरगोश पालक राजेश कुमार से जाने खरगोश पालने की जानकारी (वीडियो)

अब बिना इंटरनेट के भी किसान इस एप से जाने कौन सी फसल में कितनी डालनी है खाद

देशभर के किसान अब अपने मोबाइल फोन पर यह मालूम कर सकेंगे कि उन्हें अपने क्षेत्र में किस फसल के लिए कितनी मात्रा में खाद डालनी है। यह जानकारी उन्हें कृषक एप पर मिलेगी। इसे एक बार डाउनलोड करने के बाद इसके इस्तेमाल के लिए इंटरनेट की कनेक्टिविटी भी जरूरी नहीं है।

इंडो यूराेपियन चेंबर ऑफ काॅमर्स एंड इंडस्ट्रीज (आईईसीसीआई) के एग्रीकल्चर नेटवर्क ने किसानों के लिए हाल ही में यह लाॅन्च किया है। इसमें पूरे देश के क्षेत्रों की मिट्टी का डेटा और 100 से ज्यादा फसलों की रिकमंडेड मेक्रो न्यूट्रिएंट वेल्यू फीड की गई है।

आईईसीसीअाई की डायरेक्टर अनुराधा सिंघई ने बताया कि पिछले साल केंद्र सरकार ने एक सर्कुलर जारी किया था। इसमें फर्टिलाइजर डीलर की शैक्षणिक योग्यता बीएससी एग्रीकल्चर, डिप्लोमा इन एग्रीकल्चर इनपुट या फिर केमेस्ट्री से एमएससी होने मापदंड तय किया था। इसका उद्देश्य यह था कि किसानों को यह डीलर सही खाद की सही मात्रा फसल और मिट्टी के अनुसार बताएं।

किसान मोबाइल फोन के प्ले स्टोर पर जाएं और krashak टाइप कर इसे इंस्टाल कर लें। फिर ओपन करें। कोई रजिस्ट्रेशन लॉग इन या ओटीपी नहीं। नाम-पता एक्सेस यानी कोई जानकारी नहीं मांगता है। एक बार डाउनलोड कर लिया तो पूरे समय इंटरनेट से कनेक्ट रहने की जरूरत नहीं है। हिंदी और अंग्रेजी दोनों में है।

अगला स्टेप : सबसे पहले फसल की श्रेणी का चयन करें, फिर फसल का चयन करें, आपका खेत एरिया हेक्टेयर या एकड़ में डालें। सॉइल टेस्ट यानी मिट्टी परीक्षा कार्ड है तो कार्ड के अनुसार एनपीके की वेल्यू डालें। नहीं है तो अपना राज्य, जिला और ब्लाक चुनें। इसके बाद सामान्य उर्वरक पर क्लिक करें। खाद के छह सम्मिश्रण उपलब्ध हैं। यह भी कि इन मिश्रणों को कब और कैसे डालना है।

यह होगा फायदा 

  • घर बैठे खाद की सटीक जानकारी फसल के अनुसार किसानों को मिल जाएगी।
  • मिट्टी परीक्षण कार्ड नहीं होने पर भी जानकारी मिल सकेगी।
  • इंटरनेट कनेक्शन नहीं होने पर भी जानकारी ले सकते हैं।
  • कृषि विभाग की बिना सलाह के भी फसल में खाद के बारे में निर्णय ले सकते हैं।

घर की छत पर करें मोती की खेती, कमा सकते हैं सालाना लाखों रुपये

हिसार.  घाटे का सौदा बन रही परंपरागत खेती के बीच मोती की खेती किसानों के लिए नई उम्मीद लेकर आई है। थोड़ी सी लागत और जगह में काम शुरू करके किसान सालाना 3 से 4 लाख रुपए तक कमा सकते हैं। महाराष्ट्र के किसानों के बाद प्रदेश के किसानों में भी इस खेती प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है। महाराष्ट्र के नागपुर में मोती की खेती हर तीसरे घर में की जा रही है। इसे आप अपने घर की छत्त पर भी कर सकते है ।

इस खेती को शिक्षित और तकनीकी रूप से दक्ष युवा पीढ़ी भी इसे अपना रही है। इसे देखते हुए हरियाणा के किसानों में भी मोती की खेती की तरफ रुझान तेजी से बढ़ रहा है। विशेषकर जींद, हिसार, सिरसा, डबवाली, फतेहाबाद और रोहतक के किसानों ने यह खेती शुरू कर दी है।

50 वर्ग फीट में बनाएं तालाब

मोती की खेती के लिए कोई विशेष जमीन की जरूरत नहीं है। इसे घर में बने कमरे, छत से लेकर खेत तक में शुरू किया जा सकता है। इसके लिए 6 फुट गहरा 5 बाई 10 गुना का छोटा तालाब चाहिए। एक हजार सीप से इसकी शुरुआत कर सकते हैं, जिस पर 5 से 10 रुपए प्रति सीप के हिसाब से खर्चा आएगा। माह में एक बार इनको फीड देना पड़ेगा। विशेष ट्रेनिंग की जरूरत भी नहीं है।

ट्रेनर एवं आयुर्वेदाचार्य, डॉ. जगन मस्ताना ने बताया कि एक सीप से न्यूनतम दस माह में दो मोती निकलते हैं। जिसे बाजार में आसानी से बेचा जा सकता है। एक हजार सीप की खेती से सालाना 3 से 4 लाख रुपए की कमाई कर सकता है। नागपुर से सीखने के बाद अब तक 150 से अधिक किसानों को इस खेती की ट्रेनिंग दे चुका है। खुद भी यह खेती कर रहा है।

ऐसे शुरू करें पापड़ बनाने का उद्योग

पापड़ आमतोर पर स्नेक्स के रूप में लिया जाने वाला खाद्य पदार्थ हैं. भारत में पापड़ खाना काफी पसंद किया जाता हैं. इसलिए पापड़ की मांग हमेशा रहती हैं. आम तौर पर लगभग सभी मौकों और त्यौहारों में भोजन के बाद पापड़ परोसा जाता है. अत: इनकी खपत हर देश के हर शहर और गांव के हर घर में होती है यानी इस उद्योग में करियर उज्ज्वल है.

पहले महिलाएं घरों में ही एकत्रित होकर अपने परिवार के लिए पापड़ आदि सामान बना लेती थी लेकिन अब एकल परिवार के चलन के चलते महिलाओं के पास इतना समय ही नहीं बचता कि पापड़ घर पर ही तैयार किये जा सके ऐसे में पापड़ बनाने का उद्योग आपको अपना बिज़नस शुरू करने का एक बेहतर मौका दे सकता हैं.

कितना स्कोप हैं पापड़ बनाने के बिज़नस में

भारत के गाँव व शहरों में पापड़ समान रूप से लोकप्रिय हैं. भारत के अतिरिक्त पापड़ को विदेशों में भी निर्यात किया जाता हैं. ब्रिटेन, अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर, नाइजीरिया, ओमान, मलेशिया, कुवैत, कनाडा, बहरीन और ऑस्ट्रेलिया ऐसे कुछ देशों के नाम जहाँ हमारे यहाँ बने पापड़ की अधिक मांग होती हैं. इस लिहाज से देखें तो पापड़ उद्योग अवसरों से भरा हुआ हैं.

साथ ही पापड़ बनाने में किसी एक ब्रांड या कंपनी का नाम नहीं चलता. कुछ कंपनियां पुरे देश में फैली हुई हैं लेकिन 60 प्रतिशत बिज़नस लोकल पापड़ निर्माता द्वारा की किया जाता हैं. अपने बिज़नस को मजबूत आधार देने के लिए पापड़ के ब्रांड के विकास पर ध्यान केंद्रित करना महत्वपूर्ण है.

कैसे करें तैयारी व निवेश

पापड़ बनाने का उद्योग लगाने के लिए आपको लोकल लोगों की पसंद की जानकारी होना आवश्यक हैं. साथ ही आपके रीजन में एक अनुभवी डिस्ट्रीब्यूटर का भी आपको साथ चाहिए. पापड़ उद्योग लघु उद्योगों में गिना जाता हैं इसलिए इसमें बहुत अधिक निवेश की आवश्यकता नहीं होती. और आपको बैंक, ग्राम पंचायत आदि संस्थानों से आसनी से लोन मिल भी सकता हैं.

इसके लिए आप प्राइवेट स्तर पर या सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न स्कीमों के तहत नजदीकी बैंक में आवेदन कर सकते हैं. बैंक से भी आपको लोन इसी शर्त पर मिलेगा जब आपके पास उचित बिज़नस प्लान होगा, जिसमें कि आपकी उत्पादक क्षमता आदि की जानकारी दी गयी हो.

कच्चा माल व मशीनरी

पापड़ बनाने के लिए आवश्यक कच्चा मान अच्छी क्वालिटी का होना आवश्यक है क्यूंकि कच्चे माल की क्वालिटी पर आपके पापड़ की क्वालिटी निर्भर करेगी. पापड़ बनाने के लिए दालों, अट्टों, मसाले पाउडर, मिर्च , सोडियम बाई कार्बोनेट और नमक के मिश्रण का उपयोग किया जाता है, ये सभी सामान कहीं से भी आसानी से मिल सकता हैं.

पापड़ बनाने के लिए अगर आप लघु स्टार पर अपना बिज़नस सेट कर रहे हैं तो आपको बहुत बड़ी मशीनरी की आवश्यकता नहीं होगी.

 

 

  • Grinding Machine
  • Mixing Machine
  • Electric Papad press machine (इस मशीन के माध्यम से पापड़ को आसानी से आकार दिया जा सकता है )
  • Sieve Set (चलनी सेट)
  • Drying Machine with trolley या फिर यदि उद्यमी का बजट कम है तो वह पापड़ को धुप में भी सूखा सकता है |
  • पानी भरने और उसको रखने के लिए टैंक |
  • Packaging के लिए Pouch Sealing Machine
  • इसके अलावा BIS मानकों पर खरा उतरने के लिए कुछ Laboratory equipments की भी आवश्यकता हो सकती है |

ये मशीनें दिल्ली, मुंबई आदि शहरों में मिल जाती हैं. पानी भरने के टैंक की आवश्यकता भी होगी व पापड़ पैक करने के लिए पोलीथीन भी चाहिए. BIS मनको पर खरा उतरने के लिए कीच लैब से जुड़े उपकरण भी जरूरी हैं जो उत्पाद की क्वालिटी चेक कर सकें.

कैसे बनाएं पापड़

सबसे पहले, आप नमक, मसालों और सोडियम बाइकार्बोनेट को दालों के आटे में समान रूप से मिलाएं फिर इस मिश्रण में पर्याप्त मात्रा में पानी मिला कर गूँथ लें. पापड़ विभिन्न दालों से बनाये जा सकते हैं, जैसे अगर आपको उड़द की दाल से पापड़ बनाना हैं तो उसे रात भर भिगों कर रखें व सुबह ग्राइंडर में पिस कर दल की पिट्ठी में सभी मसालें मिलाकर मिश्रण तैयार कर लें.

लगभग 30 मिनट के बाद, छोटी-छोटी आटे की गोली बना लें. फिर इन गोलियों को पापड़ बनाने वाली मशीन में रखना हैं. यहां आप मोल्ड के आकार के अनुसार पपड़े का उत्पादन कर सकते हैं. अब पापड़ को धुप या ड्रायर की सहायता से सुखा लें. सूखने के बाद एक आकर्षक पैकिंग में पापड़ पैक कर लें.

अब आपके पापड़ बिकने के लिए तैयार हैं. लघु स्तर पर आप इस उद्योग से 20 से 25 हजार तक की कमाई कर सकते

आ गई तीन तरफ से पलटने वाली ट्राली

आमतौर पर देखा गया है कि ट्रॉली या तो समान्य होती है या फिर हाइड्रोलिक लिफ्ट वाली होती है जिस से ट्रॉली को पीछे की तरफ पलटा जा सकता है ।लेकिन अब ऐसी ट्राली (3 Way Tipping Trailer) आ चुकी है जो एक नहीं, दो नहीं बल्कि उससे तीन तरफ पलट सकते हैं ।

इस को हम दाएं और बाएं दोनों तरफ पलट सकते हैं । इसका फायदा यह होगा कि हम तीनों तरफ से सामान डाल और उतार सकते हैं ।

 

फील्ड किंग कंपनी द्वारा तैयार की गई यह ट्राली बहुत ही आधुनिक है इसमें जो मॅट्रिअल इस्तेमाल किया गया है वो बहुत ही बढ़िया क्वालिटी का लगा हुआ है ।

 

इसमें सिर्फ एक हाइड्रोलिक लिफ्ट से हम ट्राली को तीन तरफ से उठा सकते हैं । हमने ट्राली को जिस तरफ पलटना है उस हिसाब से ट्राली में थोड़ी सेटिंग्स करनी पड़ती है जो बहुत ही आसानी से हो जाती है ।

फीलड किंग कंपनी इसे तीन साइज में बनाती है ।सबसे का छोटी का जो तीन टन वज़न उठा सकती है उसका आकर है (8X6X2) फ़ीट , उससे बड़ी जो पांच टन वज़न उठा सकती है उसका आकर है (10X6X2) फ़ीट,जो सबसे बड़ी है वो 9 टन वज़न उठा सकती है उसका आकर है (12X6X2) फ़ीट ।

कीमत और बाकी जानकारी के लिए निचे दिए हुए पते और नंबर पर संपर्क कर सकते है

Plot No.235-236 & 238-240, Sec-3, HSIIDC, Karnal -132001
(Haryana), India
+91 184 2221571 / 72 / 73
+91 11 48042089

यह ट्राली कैसे काम करती है उसके लिए वीडियो भी देखें

इस इंजीनियर ने छोड़ा 30 लाख का पैकेज, अब चाय बेच कर कमा रहे है उस से भी ज्यादा

जिस जगह मन ना लगे वह काम छोड़ दो और दिल की सुनो. ऐसी ही एक कहानी है मधुर मल्होत्रा की जो पेशे से वैसे इंजीनियर हैं. अगर आपको लाखों का पैकेज मिले तो शायद ही आप उस नौकरी को छोड़ने के बारे में सोचेंगे.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक 33 साल के मधुर मल्होत्रा ने अपने जिंदगी को नया मोड़ देते हुए ऑस्ट्रेलिया के 30 लाख के पैकेज की नौकरी को छोड़ भारत लौट आए.

जहां उन्होंने वो काम शुरू किया, जिसकी शायद उन्होंने भी कल्पना नहीं की थी. 2009 में भारत लौटे मधुर ने नौकरी छोड़ चाय की दुकान खोल ली. उनका कहना है कि चाय सदाबहार पेय है. हालांकि सर्दी और बारिश में चाय की चुस्कियों का मजा ही कुछ और होता है.

आईटी और कम्यूनिकेशन में ऑस्ट्रेलिया से ही मास्टर्स कर चुके मधुर की मां एक बार गंभीर रूप से बीमार हो गईं, जिसके बाद उन्हें मां की देखभाल करने के लिए तुरंत ऑस्ट्रेलिया से इंडिया आना पड़ा. वह बताते हैं कि मेरी मां की ओपन हार्ट सर्जरी होनी थी. वह 72 साल की हैं और मेरे पिता 78 साल के.

इंडिया वापस लौटने के बाद मधुर ने फैमिली का कंस्ट्रक्शन बिजनेस शुरू किया, लेकिन पुराना काम होने की वजह से उन्हें मजा नहीं आ रहा था और वह इससे असंतुष्ट हो रहे थे.

एक बार वह अपनी दोस्त के साथ चाय पीने निकले. तब उन्होंने देखा कि चाय बनाने वाले के हाथ साफ नहीं है और वह उन्हीं खुले हाथों से दूध निकालकर चाय बना रहा था. इसके अलावा वहां चाय की दुकान पर अधिकतर लोग सिगरेट फूंकने वाले थे. इसके बाद मधुर ने सोचा कि क्यों न इससे बेहतर कोई चाय की दुकान खोली जाए.

फिर क्या था मधुर और उनके दोस्त ने मिलकर एक छोटा-सा चाय का कैफे खोलने का प्लान बनाया जहां अच्छे माहौल में लोग अपनी फैमिली या दोस्त के साथ सिर्फ चाय पीने आएं. उन्होंने चाय पर काफी रिसर्च की और पाया कि अगर कुल्हड़ में सामान्य चाय को बेहतर बनाकर बेचा जाए तो लोग आकर्षित हो सकते हैं.

फिर क्या था उन्होंने कुल्हड़ वाली चाय को एक अलग अंदाज में पेश किया. साथ ही पाया कि कुल्हड़ पर्यावरण के लिहाज से भी अच्छा विकल्प है. धीरे-धीरे मधुर ने चाय की 22 कैटिगरी बना दीं.सेल इतनी है के उनकी पास 50 लीटर का स्टोरेज है, जो एक ही घंटे में खत्म हो जाता है। इनमें तुलसी-इलाइची, तुलसी-अदरक, मसाला चाय जैसे देसी वैराइटीज के अलावा लेमन-हनी, लेमन-तुलसी और रॉ टी फ्लेवर्स भी शामिल हैं।

कैफे ‘चाय-34’ की 22 तरह के स्वाद की अलग-अलग खासियत वाली चाय वो भी कुल्हड़ में. भोपाल के शिवाजी नगर में चलने वाले चाय का ये कैफे मधुर की पहचान बन गई है. अब वो और जगह पर भी अपना कैफे कैफे ‘चाय-34’ खोलने जा रहे है . सिर्फ चाय बेच कर वो अपनी जॉब से ज्यादा कमाई कर रहे है .अभी उनकी सालाना टर्न ओवर लाखों में है लेकिन बहुत जल्द करोड़ों में हो जाएगी

ऐसे करें नीम का खेती में इस्तेमाल ,महंगे कीटनाशक से मिल जायगा छुटकारा

नीम का वृक्ष प्रकृति का अनुपम उपहार हैं। नीम से तैयार किये गए उत्पादों का कीट नियंत्रण अनोखा हैं, इस कारण नीम से बनाई गई दवा विश्व में सबसे अच्छी कीट नियंत्रण दवा मानी जाती हैं। लेकिन इसके उपयोग को लोग अब भूल रहे हैं। इसका फायदा अब बड़ी-बड़ी कम्पनिया उठा रही हैं ये कम्पनिया इसकी निम्बोलियों व पत्तियों से बनाई गई कीटनाशक दवाये महंगे दामों पर बेचती हैं।

इसकी कड़वी गन्ध से सभी जिव दूर भागते हैं। वे कीट जिनकी सुगंध क्षमता बहुत विकसित हो गयी हैं, वे इसको छोड़कर दूर चले जाते हैं जिन पर नीम के रसायन छिड़के गए हों।

इसके संपर्क में मुलायम त्वचा वाले कीट जैसे चेंपा, तैला, थ्रिप्स, सफेद मक्खी आदि आने पर मर जाते हैं। नीम का मनुष्य जीवन पर जहरीला प्रभाव नहीं पड़ना ही इसको दवाओं के रूप में उच्च स्थान दिलाता हैं। नीम की निम्बोलिया जून से अगस्त तक पक कर गिरती हैं निम्बोली का स्वाद हल्का मीठा होता हैं।

इसकी निम्बोली गिरने पर सड़कर समाप्त हो जाती हैं परन्तु गिरी सफेद गुठली से ढकी होने के कारण लम्बे समय तक सुरक्षित रहती हैं। निम्बोली को तोड़ने पर 55% भाग गुठली के रूप में अलग हो जाता हैं। तथा 45% गिरी के रूप में प्राप्त होता हैं। अच्छे ढंग से संग्रहित की गई गिरी हरे भूरे रंग की होती हैं।

नीम से तैयार दवाइयों के अनेक गुण
• रासायनिक दवाइयों की स्प्रे नीम में मिलाकर करें। इस तरह करने से रासायनिक दवाइयों के प्रयोग में 25-30 प्रतिशत तक कमी आती है।
• नीम की स्प्रे सुबह या शाम के समय करनी चाहिए।
• नीम केक पाउडर डालने से खेत में बहुत तरह के प्रभाव देखे जा सकते हैं जैसे कि इससे पौधे निमाटोड और फंगस से बचे रहते हैं। इस विधि से ज़मीन के तत्व आसानी से पौधे में मिल जाते हैं।
• नीम हानिकारक कीटों के जीवन चक्र को भी प्रभावित करती है, जैसे कि अंडे, लार्वा आदि। इसके अलावा भुंडियों, सुंडियों और टिड्डों आदि पर भी प्रभाव पड़ता है। यह रस चूसने वाले कीटों की ज्यादा रोधक नहीं है।
• यदि नीम का गुद्दा यूरिया के साथ प्रयोग किया जाये, तो खाद का प्रभाव बढ़ जाता है और ज़मीन के अंदरूनी हानिकारक बीमारियों और कीटों से बचाव होता है।
• दीमक से बचाव के लिए 3-5 किलो नीम पाउडर को बिजाई से पहले एक एकड़ मिट्टी में मिलायें।
• मूंगफली में पत्ते के सुरंगी कीट के लिए 1.0 प्रतिशत नीम के बीजों का रस या 2 प्रतिशत नीम के तेल की स्प्रे बिजाई के 35-40 दिनों के बाद करें।
• जड़ों में गांठे बनने की बीमारी की रोकथाम के लिए 50 ग्राम नीम पाउडर को 50 लीटर पानी में पूरी रात डुबोयें और फिर स्प्रे करें

मोदी सरकार के इस स्कीम से कमा सकते हैं 25 हजार रुपए महीना।

70वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले पर तिरंगा फहराया। इसके साथ ही उन्होंने देशवासियों को संबोधित करते हुए कुछ खास योजनाओं का जिक्र किया। इनयोजनाओं से आम लोगों को फायदा हो रहा है। पीएम मोदी ने जिन योजनाओं का जिक्र किया उसमे महत्वाकांक्षी जन औषधि योजना मुख्य रूप से शामिल है।

पीएम मोदी ने बताया इस महत्वाकांक्षी योजना के जरिये शहरों से लेकर गांवों तक लाभ पहुँच रहा है। सरकार इस ख़ास योजना के जरिये आम लोगों को लगातार कमाई का भी मौक़ा दे रही है जिसका फायदा आप भी उठा सकते हैं। इस योजना का लाभ उठाते हुए आप 25 से 30 हजार रूपये तक कमाई कर सकते हैं। ख़ास बात ये है कि इस स्कीम के तहत बिजनेस शुरू करने के लिए सरकार ने पिछले दिनों नियम में कुछ बदलाव किया है।

जनऔषधि सेंटर खोलने के लिए सरकार ने तीन कैटेगरी बनाई है। पहली कैटेगरी में कोई भी व्यक्ति बेरोजगार, फार्मासिस्ट, डॉक्टर, रजिस्टर्ड मेडिकल, प्रैक्टिशनर स्टोर खोल सकेगा। दूसरी कैटेगरी में ट्रस्ट, एनजीओ, प्राइवेट हॉस्पिटल, सोसायटी और सेल्फ हेल्प ग्रुप को स्टोर खोलने का मौका मिलेगा। तीसरी कैटेगरी में राज्य सरकारों द्वारा नॉमिनेट की गई एजेंसी होगी। वहीं, दुकान खोलने के लिए 120 वर्गफुट एरिया में दुकान होनी जरूरी है।

आप अपने सेंटर के जरिए महीने में जितनी दवाएं सेल करेंगे, उन दवाओं का 20 फीसदी आपको कमिशन के रूप में मिल जाएगा। ट्रेड मार्जिन के अलावा सरकार मंथली सेल पर 10 फीसदी इंसेंटिव देगी, जो आपके बैंक अकाउंट में आ जाएगा। इस तरह से दुकानदार को ट्रेड मार्जिन के अलावा इंसेटिव के रूप में डबल मुनाफा होगा।

यानी अगर वह एक महीने में 1 लाख रुपए तक की दवा सेल करते हैं तो 25 से 30 हजार रुपए तक मंथली इनकम होगी। सेंटर शुरू करने पर 1 लाख रुपए की दवाइयां पहले आपको दवा खरीदनी होगी। बाद में सरकार इसे मंथली बेसिस पर रीइंबर्समेंट करेगी।

कैसे करें आवेदन

स्टोर खोलने के लिए आपके पास रिटेल ड्रग सेल करने का लाइसेंस जन औषधि स्टोर के नाम से होना चाहिए। इसके अलावा कम से कम 120 वर्ग फुट का एरिया किराए पर या ओनरशिप में होना जरूरी है।

-जो व्यक्ति या एजेंसी स्टोरी खोलना चाहता है, वह http://janaushadhi.gov.in/ पर जाकर फार्म डाउनलोड कर सकता है। -उसे अपने एप्लीकेशन को 2000 रुपए के डिमांड ड्रॉफ्ट के साथ ब्यूरो ऑफ फॉर्मा पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग ऑफ इंडिया के जनरल मैनेजर(A&F)के नाम से भेजना होगा।

-ब्यूरो ऑफ फॉर्मा पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग ऑफ इंडिया का एड्रेस जनऔषधि की वेबसाइट पर और भी जानकारी उपलब्ध है।