अब बिना इंटरनेट के भी किसान इस एप से जाने कौन सी फसल में कितनी डालनी है खाद

देशभर के किसान अब अपने मोबाइल फोन पर यह मालूम कर सकेंगे कि उन्हें अपने क्षेत्र में किस फसल के लिए कितनी मात्रा में खाद डालनी है। यह जानकारी उन्हें कृषक एप पर मिलेगी। इसे एक बार डाउनलोड करने के बाद इसके इस्तेमाल के लिए इंटरनेट की कनेक्टिविटी भी जरूरी नहीं है।

इंडो यूराेपियन चेंबर ऑफ काॅमर्स एंड इंडस्ट्रीज (आईईसीसीआई) के एग्रीकल्चर नेटवर्क ने किसानों के लिए हाल ही में यह लाॅन्च किया है। इसमें पूरे देश के क्षेत्रों की मिट्टी का डेटा और 100 से ज्यादा फसलों की रिकमंडेड मेक्रो न्यूट्रिएंट वेल्यू फीड की गई है।

आईईसीसीअाई की डायरेक्टर अनुराधा सिंघई ने बताया कि पिछले साल केंद्र सरकार ने एक सर्कुलर जारी किया था। इसमें फर्टिलाइजर डीलर की शैक्षणिक योग्यता बीएससी एग्रीकल्चर, डिप्लोमा इन एग्रीकल्चर इनपुट या फिर केमेस्ट्री से एमएससी होने मापदंड तय किया था। इसका उद्देश्य यह था कि किसानों को यह डीलर सही खाद की सही मात्रा फसल और मिट्टी के अनुसार बताएं।

किसान मोबाइल फोन के प्ले स्टोर पर जाएं और krashak टाइप कर इसे इंस्टाल कर लें। फिर ओपन करें। कोई रजिस्ट्रेशन लॉग इन या ओटीपी नहीं। नाम-पता एक्सेस यानी कोई जानकारी नहीं मांगता है। एक बार डाउनलोड कर लिया तो पूरे समय इंटरनेट से कनेक्ट रहने की जरूरत नहीं है। हिंदी और अंग्रेजी दोनों में है।

अगला स्टेप : सबसे पहले फसल की श्रेणी का चयन करें, फिर फसल का चयन करें, आपका खेत एरिया हेक्टेयर या एकड़ में डालें। सॉइल टेस्ट यानी मिट्टी परीक्षा कार्ड है तो कार्ड के अनुसार एनपीके की वेल्यू डालें। नहीं है तो अपना राज्य, जिला और ब्लाक चुनें। इसके बाद सामान्य उर्वरक पर क्लिक करें। खाद के छह सम्मिश्रण उपलब्ध हैं। यह भी कि इन मिश्रणों को कब और कैसे डालना है।

यह होगा फायदा 

  • घर बैठे खाद की सटीक जानकारी फसल के अनुसार किसानों को मिल जाएगी।
  • मिट्टी परीक्षण कार्ड नहीं होने पर भी जानकारी मिल सकेगी।
  • इंटरनेट कनेक्शन नहीं होने पर भी जानकारी ले सकते हैं।
  • कृषि विभाग की बिना सलाह के भी फसल में खाद के बारे में निर्णय ले सकते हैं।

घर की छत पर करें मोती की खेती, कमा सकते हैं सालाना लाखों रुपये

हिसार.  घाटे का सौदा बन रही परंपरागत खेती के बीच मोती की खेती किसानों के लिए नई उम्मीद लेकर आई है। थोड़ी सी लागत और जगह में काम शुरू करके किसान सालाना 3 से 4 लाख रुपए तक कमा सकते हैं। महाराष्ट्र के किसानों के बाद प्रदेश के किसानों में भी इस खेती प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है। महाराष्ट्र के नागपुर में मोती की खेती हर तीसरे घर में की जा रही है। इसे आप अपने घर की छत्त पर भी कर सकते है ।

इस खेती को शिक्षित और तकनीकी रूप से दक्ष युवा पीढ़ी भी इसे अपना रही है। इसे देखते हुए हरियाणा के किसानों में भी मोती की खेती की तरफ रुझान तेजी से बढ़ रहा है। विशेषकर जींद, हिसार, सिरसा, डबवाली, फतेहाबाद और रोहतक के किसानों ने यह खेती शुरू कर दी है।

50 वर्ग फीट में बनाएं तालाब

मोती की खेती के लिए कोई विशेष जमीन की जरूरत नहीं है। इसे घर में बने कमरे, छत से लेकर खेत तक में शुरू किया जा सकता है। इसके लिए 6 फुट गहरा 5 बाई 10 गुना का छोटा तालाब चाहिए। एक हजार सीप से इसकी शुरुआत कर सकते हैं, जिस पर 5 से 10 रुपए प्रति सीप के हिसाब से खर्चा आएगा। माह में एक बार इनको फीड देना पड़ेगा। विशेष ट्रेनिंग की जरूरत भी नहीं है।

ट्रेनर एवं आयुर्वेदाचार्य, डॉ. जगन मस्ताना ने बताया कि एक सीप से न्यूनतम दस माह में दो मोती निकलते हैं। जिसे बाजार में आसानी से बेचा जा सकता है। एक हजार सीप की खेती से सालाना 3 से 4 लाख रुपए की कमाई कर सकता है। नागपुर से सीखने के बाद अब तक 150 से अधिक किसानों को इस खेती की ट्रेनिंग दे चुका है। खुद भी यह खेती कर रहा है।

ऐसे शुरू करें पापड़ बनाने का उद्योग

पापड़ आमतोर पर स्नेक्स के रूप में लिया जाने वाला खाद्य पदार्थ हैं. भारत में पापड़ खाना काफी पसंद किया जाता हैं. इसलिए पापड़ की मांग हमेशा रहती हैं. आम तौर पर लगभग सभी मौकों और त्यौहारों में भोजन के बाद पापड़ परोसा जाता है. अत: इनकी खपत हर देश के हर शहर और गांव के हर घर में होती है यानी इस उद्योग में करियर उज्ज्वल है.

पहले महिलाएं घरों में ही एकत्रित होकर अपने परिवार के लिए पापड़ आदि सामान बना लेती थी लेकिन अब एकल परिवार के चलन के चलते महिलाओं के पास इतना समय ही नहीं बचता कि पापड़ घर पर ही तैयार किये जा सके ऐसे में पापड़ बनाने का उद्योग आपको अपना बिज़नस शुरू करने का एक बेहतर मौका दे सकता हैं.

कितना स्कोप हैं पापड़ बनाने के बिज़नस में

भारत के गाँव व शहरों में पापड़ समान रूप से लोकप्रिय हैं. भारत के अतिरिक्त पापड़ को विदेशों में भी निर्यात किया जाता हैं. ब्रिटेन, अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर, नाइजीरिया, ओमान, मलेशिया, कुवैत, कनाडा, बहरीन और ऑस्ट्रेलिया ऐसे कुछ देशों के नाम जहाँ हमारे यहाँ बने पापड़ की अधिक मांग होती हैं. इस लिहाज से देखें तो पापड़ उद्योग अवसरों से भरा हुआ हैं.

साथ ही पापड़ बनाने में किसी एक ब्रांड या कंपनी का नाम नहीं चलता. कुछ कंपनियां पुरे देश में फैली हुई हैं लेकिन 60 प्रतिशत बिज़नस लोकल पापड़ निर्माता द्वारा की किया जाता हैं. अपने बिज़नस को मजबूत आधार देने के लिए पापड़ के ब्रांड के विकास पर ध्यान केंद्रित करना महत्वपूर्ण है.

कैसे करें तैयारी व निवेश

पापड़ बनाने का उद्योग लगाने के लिए आपको लोकल लोगों की पसंद की जानकारी होना आवश्यक हैं. साथ ही आपके रीजन में एक अनुभवी डिस्ट्रीब्यूटर का भी आपको साथ चाहिए. पापड़ उद्योग लघु उद्योगों में गिना जाता हैं इसलिए इसमें बहुत अधिक निवेश की आवश्यकता नहीं होती. और आपको बैंक, ग्राम पंचायत आदि संस्थानों से आसनी से लोन मिल भी सकता हैं.

इसके लिए आप प्राइवेट स्तर पर या सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न स्कीमों के तहत नजदीकी बैंक में आवेदन कर सकते हैं. बैंक से भी आपको लोन इसी शर्त पर मिलेगा जब आपके पास उचित बिज़नस प्लान होगा, जिसमें कि आपकी उत्पादक क्षमता आदि की जानकारी दी गयी हो.

कच्चा माल व मशीनरी

पापड़ बनाने के लिए आवश्यक कच्चा मान अच्छी क्वालिटी का होना आवश्यक है क्यूंकि कच्चे माल की क्वालिटी पर आपके पापड़ की क्वालिटी निर्भर करेगी. पापड़ बनाने के लिए दालों, अट्टों, मसाले पाउडर, मिर्च , सोडियम बाई कार्बोनेट और नमक के मिश्रण का उपयोग किया जाता है, ये सभी सामान कहीं से भी आसानी से मिल सकता हैं.

पापड़ बनाने के लिए अगर आप लघु स्टार पर अपना बिज़नस सेट कर रहे हैं तो आपको बहुत बड़ी मशीनरी की आवश्यकता नहीं होगी.

 

 

  • Grinding Machine
  • Mixing Machine
  • Electric Papad press machine (इस मशीन के माध्यम से पापड़ को आसानी से आकार दिया जा सकता है )
  • Sieve Set (चलनी सेट)
  • Drying Machine with trolley या फिर यदि उद्यमी का बजट कम है तो वह पापड़ को धुप में भी सूखा सकता है |
  • पानी भरने और उसको रखने के लिए टैंक |
  • Packaging के लिए Pouch Sealing Machine
  • इसके अलावा BIS मानकों पर खरा उतरने के लिए कुछ Laboratory equipments की भी आवश्यकता हो सकती है |

ये मशीनें दिल्ली, मुंबई आदि शहरों में मिल जाती हैं. पानी भरने के टैंक की आवश्यकता भी होगी व पापड़ पैक करने के लिए पोलीथीन भी चाहिए. BIS मनको पर खरा उतरने के लिए कीच लैब से जुड़े उपकरण भी जरूरी हैं जो उत्पाद की क्वालिटी चेक कर सकें.

कैसे बनाएं पापड़

सबसे पहले, आप नमक, मसालों और सोडियम बाइकार्बोनेट को दालों के आटे में समान रूप से मिलाएं फिर इस मिश्रण में पर्याप्त मात्रा में पानी मिला कर गूँथ लें. पापड़ विभिन्न दालों से बनाये जा सकते हैं, जैसे अगर आपको उड़द की दाल से पापड़ बनाना हैं तो उसे रात भर भिगों कर रखें व सुबह ग्राइंडर में पिस कर दल की पिट्ठी में सभी मसालें मिलाकर मिश्रण तैयार कर लें.

लगभग 30 मिनट के बाद, छोटी-छोटी आटे की गोली बना लें. फिर इन गोलियों को पापड़ बनाने वाली मशीन में रखना हैं. यहां आप मोल्ड के आकार के अनुसार पपड़े का उत्पादन कर सकते हैं. अब पापड़ को धुप या ड्रायर की सहायता से सुखा लें. सूखने के बाद एक आकर्षक पैकिंग में पापड़ पैक कर लें.

अब आपके पापड़ बिकने के लिए तैयार हैं. लघु स्तर पर आप इस उद्योग से 20 से 25 हजार तक की कमाई कर सकते

आ गई तीन तरफ से पलटने वाली ट्राली

आमतौर पर देखा गया है कि ट्रॉली या तो समान्य होती है या फिर हाइड्रोलिक लिफ्ट वाली होती है जिस से ट्रॉली को पीछे की तरफ पलटा जा सकता है ।लेकिन अब ऐसी ट्राली (3 Way Tipping Trailer) आ चुकी है जो एक नहीं, दो नहीं बल्कि उससे तीन तरफ पलट सकते हैं ।

इस को हम दाएं और बाएं दोनों तरफ पलट सकते हैं । इसका फायदा यह होगा कि हम तीनों तरफ से सामान डाल और उतार सकते हैं ।

 

फील्ड किंग कंपनी द्वारा तैयार की गई यह ट्राली बहुत ही आधुनिक है इसमें जो मॅट्रिअल इस्तेमाल किया गया है वो बहुत ही बढ़िया क्वालिटी का लगा हुआ है ।

 

इसमें सिर्फ एक हाइड्रोलिक लिफ्ट से हम ट्राली को तीन तरफ से उठा सकते हैं । हमने ट्राली को जिस तरफ पलटना है उस हिसाब से ट्राली में थोड़ी सेटिंग्स करनी पड़ती है जो बहुत ही आसानी से हो जाती है ।

फीलड किंग कंपनी इसे तीन साइज में बनाती है ।सबसे का छोटी का जो तीन टन वज़न उठा सकती है उसका आकर है (8X6X2) फ़ीट , उससे बड़ी जो पांच टन वज़न उठा सकती है उसका आकर है (10X6X2) फ़ीट,जो सबसे बड़ी है वो 9 टन वज़न उठा सकती है उसका आकर है (12X6X2) फ़ीट ।

कीमत और बाकी जानकारी के लिए निचे दिए हुए पते और नंबर पर संपर्क कर सकते है

Plot No.235-236 & 238-240, Sec-3, HSIIDC, Karnal -132001
(Haryana), India
+91 184 2221571 / 72 / 73
+91 11 48042089

यह ट्राली कैसे काम करती है उसके लिए वीडियो भी देखें

इस इंजीनियर ने छोड़ा 30 लाख का पैकेज, अब चाय बेच कर कमा रहे है उस से भी ज्यादा

जिस जगह मन ना लगे वह काम छोड़ दो और दिल की सुनो. ऐसी ही एक कहानी है मधुर मल्होत्रा की जो पेशे से वैसे इंजीनियर हैं. अगर आपको लाखों का पैकेज मिले तो शायद ही आप उस नौकरी को छोड़ने के बारे में सोचेंगे.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक 33 साल के मधुर मल्होत्रा ने अपने जिंदगी को नया मोड़ देते हुए ऑस्ट्रेलिया के 30 लाख के पैकेज की नौकरी को छोड़ भारत लौट आए.

जहां उन्होंने वो काम शुरू किया, जिसकी शायद उन्होंने भी कल्पना नहीं की थी. 2009 में भारत लौटे मधुर ने नौकरी छोड़ चाय की दुकान खोल ली. उनका कहना है कि चाय सदाबहार पेय है. हालांकि सर्दी और बारिश में चाय की चुस्कियों का मजा ही कुछ और होता है.

आईटी और कम्यूनिकेशन में ऑस्ट्रेलिया से ही मास्टर्स कर चुके मधुर की मां एक बार गंभीर रूप से बीमार हो गईं, जिसके बाद उन्हें मां की देखभाल करने के लिए तुरंत ऑस्ट्रेलिया से इंडिया आना पड़ा. वह बताते हैं कि मेरी मां की ओपन हार्ट सर्जरी होनी थी. वह 72 साल की हैं और मेरे पिता 78 साल के.

इंडिया वापस लौटने के बाद मधुर ने फैमिली का कंस्ट्रक्शन बिजनेस शुरू किया, लेकिन पुराना काम होने की वजह से उन्हें मजा नहीं आ रहा था और वह इससे असंतुष्ट हो रहे थे.

एक बार वह अपनी दोस्त के साथ चाय पीने निकले. तब उन्होंने देखा कि चाय बनाने वाले के हाथ साफ नहीं है और वह उन्हीं खुले हाथों से दूध निकालकर चाय बना रहा था. इसके अलावा वहां चाय की दुकान पर अधिकतर लोग सिगरेट फूंकने वाले थे. इसके बाद मधुर ने सोचा कि क्यों न इससे बेहतर कोई चाय की दुकान खोली जाए.

फिर क्या था मधुर और उनके दोस्त ने मिलकर एक छोटा-सा चाय का कैफे खोलने का प्लान बनाया जहां अच्छे माहौल में लोग अपनी फैमिली या दोस्त के साथ सिर्फ चाय पीने आएं. उन्होंने चाय पर काफी रिसर्च की और पाया कि अगर कुल्हड़ में सामान्य चाय को बेहतर बनाकर बेचा जाए तो लोग आकर्षित हो सकते हैं.

फिर क्या था उन्होंने कुल्हड़ वाली चाय को एक अलग अंदाज में पेश किया. साथ ही पाया कि कुल्हड़ पर्यावरण के लिहाज से भी अच्छा विकल्प है. धीरे-धीरे मधुर ने चाय की 22 कैटिगरी बना दीं.सेल इतनी है के उनकी पास 50 लीटर का स्टोरेज है, जो एक ही घंटे में खत्म हो जाता है। इनमें तुलसी-इलाइची, तुलसी-अदरक, मसाला चाय जैसे देसी वैराइटीज के अलावा लेमन-हनी, लेमन-तुलसी और रॉ टी फ्लेवर्स भी शामिल हैं।

कैफे ‘चाय-34’ की 22 तरह के स्वाद की अलग-अलग खासियत वाली चाय वो भी कुल्हड़ में. भोपाल के शिवाजी नगर में चलने वाले चाय का ये कैफे मधुर की पहचान बन गई है. अब वो और जगह पर भी अपना कैफे कैफे ‘चाय-34’ खोलने जा रहे है . सिर्फ चाय बेच कर वो अपनी जॉब से ज्यादा कमाई कर रहे है .अभी उनकी सालाना टर्न ओवर लाखों में है लेकिन बहुत जल्द करोड़ों में हो जाएगी

ऐसे करें नीम का खेती में इस्तेमाल ,महंगे कीटनाशक से मिल जायगा छुटकारा

नीम का वृक्ष प्रकृति का अनुपम उपहार हैं। नीम से तैयार किये गए उत्पादों का कीट नियंत्रण अनोखा हैं, इस कारण नीम से बनाई गई दवा विश्व में सबसे अच्छी कीट नियंत्रण दवा मानी जाती हैं। लेकिन इसके उपयोग को लोग अब भूल रहे हैं। इसका फायदा अब बड़ी-बड़ी कम्पनिया उठा रही हैं ये कम्पनिया इसकी निम्बोलियों व पत्तियों से बनाई गई कीटनाशक दवाये महंगे दामों पर बेचती हैं।

इसकी कड़वी गन्ध से सभी जिव दूर भागते हैं। वे कीट जिनकी सुगंध क्षमता बहुत विकसित हो गयी हैं, वे इसको छोड़कर दूर चले जाते हैं जिन पर नीम के रसायन छिड़के गए हों।

इसके संपर्क में मुलायम त्वचा वाले कीट जैसे चेंपा, तैला, थ्रिप्स, सफेद मक्खी आदि आने पर मर जाते हैं। नीम का मनुष्य जीवन पर जहरीला प्रभाव नहीं पड़ना ही इसको दवाओं के रूप में उच्च स्थान दिलाता हैं। नीम की निम्बोलिया जून से अगस्त तक पक कर गिरती हैं निम्बोली का स्वाद हल्का मीठा होता हैं।

इसकी निम्बोली गिरने पर सड़कर समाप्त हो जाती हैं परन्तु गिरी सफेद गुठली से ढकी होने के कारण लम्बे समय तक सुरक्षित रहती हैं। निम्बोली को तोड़ने पर 55% भाग गुठली के रूप में अलग हो जाता हैं। तथा 45% गिरी के रूप में प्राप्त होता हैं। अच्छे ढंग से संग्रहित की गई गिरी हरे भूरे रंग की होती हैं।

नीम से तैयार दवाइयों के अनेक गुण
• रासायनिक दवाइयों की स्प्रे नीम में मिलाकर करें। इस तरह करने से रासायनिक दवाइयों के प्रयोग में 25-30 प्रतिशत तक कमी आती है।
• नीम की स्प्रे सुबह या शाम के समय करनी चाहिए।
• नीम केक पाउडर डालने से खेत में बहुत तरह के प्रभाव देखे जा सकते हैं जैसे कि इससे पौधे निमाटोड और फंगस से बचे रहते हैं। इस विधि से ज़मीन के तत्व आसानी से पौधे में मिल जाते हैं।
• नीम हानिकारक कीटों के जीवन चक्र को भी प्रभावित करती है, जैसे कि अंडे, लार्वा आदि। इसके अलावा भुंडियों, सुंडियों और टिड्डों आदि पर भी प्रभाव पड़ता है। यह रस चूसने वाले कीटों की ज्यादा रोधक नहीं है।
• यदि नीम का गुद्दा यूरिया के साथ प्रयोग किया जाये, तो खाद का प्रभाव बढ़ जाता है और ज़मीन के अंदरूनी हानिकारक बीमारियों और कीटों से बचाव होता है।
• दीमक से बचाव के लिए 3-5 किलो नीम पाउडर को बिजाई से पहले एक एकड़ मिट्टी में मिलायें।
• मूंगफली में पत्ते के सुरंगी कीट के लिए 1.0 प्रतिशत नीम के बीजों का रस या 2 प्रतिशत नीम के तेल की स्प्रे बिजाई के 35-40 दिनों के बाद करें।
• जड़ों में गांठे बनने की बीमारी की रोकथाम के लिए 50 ग्राम नीम पाउडर को 50 लीटर पानी में पूरी रात डुबोयें और फिर स्प्रे करें

मोदी सरकार के इस स्कीम से कमा सकते हैं 25 हजार रुपए महीना।

70वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले पर तिरंगा फहराया। इसके साथ ही उन्होंने देशवासियों को संबोधित करते हुए कुछ खास योजनाओं का जिक्र किया। इनयोजनाओं से आम लोगों को फायदा हो रहा है। पीएम मोदी ने जिन योजनाओं का जिक्र किया उसमे महत्वाकांक्षी जन औषधि योजना मुख्य रूप से शामिल है।

पीएम मोदी ने बताया इस महत्वाकांक्षी योजना के जरिये शहरों से लेकर गांवों तक लाभ पहुँच रहा है। सरकार इस ख़ास योजना के जरिये आम लोगों को लगातार कमाई का भी मौक़ा दे रही है जिसका फायदा आप भी उठा सकते हैं। इस योजना का लाभ उठाते हुए आप 25 से 30 हजार रूपये तक कमाई कर सकते हैं। ख़ास बात ये है कि इस स्कीम के तहत बिजनेस शुरू करने के लिए सरकार ने पिछले दिनों नियम में कुछ बदलाव किया है।

जनऔषधि सेंटर खोलने के लिए सरकार ने तीन कैटेगरी बनाई है। पहली कैटेगरी में कोई भी व्यक्ति बेरोजगार, फार्मासिस्ट, डॉक्टर, रजिस्टर्ड मेडिकल, प्रैक्टिशनर स्टोर खोल सकेगा। दूसरी कैटेगरी में ट्रस्ट, एनजीओ, प्राइवेट हॉस्पिटल, सोसायटी और सेल्फ हेल्प ग्रुप को स्टोर खोलने का मौका मिलेगा। तीसरी कैटेगरी में राज्य सरकारों द्वारा नॉमिनेट की गई एजेंसी होगी। वहीं, दुकान खोलने के लिए 120 वर्गफुट एरिया में दुकान होनी जरूरी है।

आप अपने सेंटर के जरिए महीने में जितनी दवाएं सेल करेंगे, उन दवाओं का 20 फीसदी आपको कमिशन के रूप में मिल जाएगा। ट्रेड मार्जिन के अलावा सरकार मंथली सेल पर 10 फीसदी इंसेंटिव देगी, जो आपके बैंक अकाउंट में आ जाएगा। इस तरह से दुकानदार को ट्रेड मार्जिन के अलावा इंसेटिव के रूप में डबल मुनाफा होगा।

यानी अगर वह एक महीने में 1 लाख रुपए तक की दवा सेल करते हैं तो 25 से 30 हजार रुपए तक मंथली इनकम होगी। सेंटर शुरू करने पर 1 लाख रुपए की दवाइयां पहले आपको दवा खरीदनी होगी। बाद में सरकार इसे मंथली बेसिस पर रीइंबर्समेंट करेगी।

कैसे करें आवेदन

स्टोर खोलने के लिए आपके पास रिटेल ड्रग सेल करने का लाइसेंस जन औषधि स्टोर के नाम से होना चाहिए। इसके अलावा कम से कम 120 वर्ग फुट का एरिया किराए पर या ओनरशिप में होना जरूरी है।

-जो व्यक्ति या एजेंसी स्टोरी खोलना चाहता है, वह http://janaushadhi.gov.in/ पर जाकर फार्म डाउनलोड कर सकता है। -उसे अपने एप्लीकेशन को 2000 रुपए के डिमांड ड्रॉफ्ट के साथ ब्यूरो ऑफ फॉर्मा पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग ऑफ इंडिया के जनरल मैनेजर(A&F)के नाम से भेजना होगा।

-ब्यूरो ऑफ फॉर्मा पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग ऑफ इंडिया का एड्रेस जनऔषधि की वेबसाइट पर और भी जानकारी उपलब्ध है।

क्यों आए भगवान शिव, महाकाली के पैरों के नीचे?

भगवती दुर्गा की दस महाविद्याओं में से एक हैं महाकाली। जिनके काले और डरावने रूप की उत्पति राक्षसों का नाश करने के लिए हुई थी। यह एक मात्र ऐसी शक्ति हैं जिन से स्वयं काल भी भय खाता है। उनका क्रोध इतना विकराल रूप ले लेता है की संपूर्ण संसार की शक्तियां मिल कर भी उनके गुस्से पर काबू नहीं पा सकती। उनके इस क्रोध को रोकने के लिए स्वयं उनके पति भगवान शंकर उनके चरणों में आ कर लेट गए थे। इस संबंध में शास्त्रों में एक कथा वर्णित हैं जो इस प्रकार है-

दैत्य रक्तबिज ने कठोर तप के बल पर वर पाया था की अगर उसके खून की एक बूंद भी धरती पर गिरेगी तो उस से अनेक दैत्य पैदा हो जाएंगे। उसने अपनी शक्तियों का प्रयोग निर्दोष लोगों पर करना शुरू कर दिया। धीरे धीरे उसने अपना आतंक तीनों लोकों पर मचा दिया। देवताओं ने उसे युद्ध के लिए ललकारा। भयंकर युद्ध का आगाज हुआ। देवता अपनी पूरी शक्ति लगाकर रक्तबिज का नाश करने को तत्पर थे मगर जैसे ही उसके शरीर की एक भी बूंद खून धरती पर गिरती उस एक बूंद से अनेक रक्तबीज पैदा हो जाते।

सभी देवता मिल कर महाकाली की शरण में गए। मां काली असल में सुन्दरी रूप भगवती दुर्गा का काला और डरावना रूप हैं, जिनकी उत्पत्ति राक्षसों को मारने के लिए ही हुई थी। महाकाली ने देवताओं की रक्षा के लिए विकराल रूप धारण कर युद्ध भूमी में प्रवेश किया। मां काली की प्रतिमा देखें तो देखा जा सकता है की वह विकराल मां हैं। जिसके हाथ में खप्पर है,लहू टपकता है तो गले में खोपड़ीयों की माला है मगर मां की आंखे और ह्रदय से अपने भक्तों के लिए प्रेम की गंगा बहती है।

महाकाली ने राक्षसों का वध करना आरंभ किया लेकिन रक्तबीज के खून की एक भी बूंद धरती पर गिरती तो उस से अनेक दानवों का जन्म हो जाता जिससे युद्ध भूमी में दैत्यों की संख्या बढ़ने लगी। तब मां ने अपनी जिह्वा का विस्तर किया।

दानवों का एक बूंद खून धरती पर गिरने की बजाय उनकी जिह्वा पर गिरने लगा। वह लाशों के ढेर लगाती गई और उनका खून पीने लगी। इस तरह महाकाली ने रक्तबीज का वध किया लेकिन तब तक महाकाली का गुस्सा इतना विक्राल रूप से चुका था की उनको शांत करना जरुरी था मगर हर कोई उनके समीप जाने से भी डर रहा था।

सभी देवता भगवान शिव के पास गए और महाकाली को शांत करने के लिए प्रार्थना करने लगे। भगवान् शिव ने उन्हें बहुत प्रकार से शांत करने की कोशिश करी जब सभी प्रयास विफल हो गए तो वह उनके मार्ग में लेट गए। जब उनके चरण भगवान शिव पर पड़े तो वह एकदम से ठिठक गई। उनका क्रोध शांत हो गया। आदि शक्ति मां दुर्गा के विविध रूपों का वर्णन मारकण्डेय पुराण में वर्णित है।

ऐसे शुरू करें अपना कॉपी बनाने (Notebook making ) का बिज़नेस

कॉपी अध्ययन क्षेत्र में सबसे अधिक महत्वपूर्ण वस्तु है. इसके बिना पढाई लिखाई किया जाना संभव नहीं है. विभिन्न विषयों की आवश्यकताओं के अनुसार विभिन्न तरह के कॉपी का निर्माण किया जाता है, जो कि बाज़ार में अलग अलग कीमतों पर बेचे जाते हैं.

ये नोटबुक अलग अलग ब्रांड और क्वालिटी के साथ मौजूद होते हैं, जिन्हें इनकी क्वालिटी के साथ विभिन्न कीमतों पर बेचीं जाती है. आप भी बहुत कम पैसे में नोटबुक का व्यापार शुरू कर सकते हैं और अपने ब्रांडिंग के साथ इन्हें बेच कर ख़ूब लाभ कमा सकते है. यहाँ पर इस व्यापार से जुडी सभी आवश्यक जानकारियाँ दी जायेंगी. इसी तरह आप कम खर्च में पेपर प्लेट बनाने का व्यापार शुरू कर सकते है.

नोटबुक बनाने का व्यापार कैसे शुरू करें

नोटबुक बनाने के लिए आवश्यक रॉ मटेरियल (Notebook making raw materials)
नोटबुक बनाने के लिए आवश्यक रॉ मटेरियल के विषय में नीचे दिया जा रहा है. इसके लिए विभिन्न कोटेड अथवा अनकोटेड पेपर यानि दिस्ता पेपर और गत्ता की आवश्यकता होती है.

रॉ मटेरियल की कीमत (Price of raw materials):

दिस्ता पेपर : दिस्ता पेपर की क़ीमत 62 रू प्रति किलोग्राम है.
गत्ता : कवर के लिए इस्तेमाल होने वाला गत्ता 1 रूपया प्रति पीस होता है.

कहाँ से ख़रीदें रॉ मटेरियल (Place to buy of raw materials): निम्न वेबसाईट के माध्यम से ऑनलाइन ख़रीदा जा सकता है.
https://dir.indiamart.com/search.mp?ss=notebook+paper&source=autosuggest

नोटबुक बनाने के लिए मशीनरी (Notebook making machines)

  • पिन अप मशीन
  • एज स्क्वायर मशीन
  • कटिंग मशीन

ये मशीनें 4 किलोवाट बिजली लेती है और इसे घरेलु बिजली से भी चलाया जा सकता है.
नोटबुक बनाने के लिए मशीनरी की क़ीमत (Price of Notebook making Machine) :
इन मशीनों की कुल क़ीमत 5.5 लाख से 6 लाख के बीच में होती है.

कहाँ से ख़रीदें :

इसे इस वेबसाईट के माध्यम से ऑनलाइन ख़रीदा जा सकता है:

https://dir.indiamart.com/impcat/notebook-making-machines.html?price

नोटबुक बनाने की प्रक्रिया (Notebook making process)

नोट बुक्स बनाने की प्रक्रिया बहुत ही सरल है, यदि एक बार इसकी मशीनरी समझ ली जाए, तो बहुत आसानी से नोटबुक बनाए जा सकते हैं. इसकी संपूर्ण प्रक्रिया नीचे दी जा रही है.

  • सबसे पहले शीट को (जोकि कॉपी के लिए कवर का काम करता है) उसे अच्छे से इस तरह मोड़ें कि वह कॉपी के अनुसार कवर के आकार में आ जाए.
  • इसके बाद इसमें जितने पन्ने की कॉपी बनानी हो, उतने कागज को भी मोड़ कर उसके अन्दर डाल दें. इसके बाद पिनिंग की प्रक्रिया शुरू होती है.
  • इस प्रक्रिया में इन कवर और उसके अन्दर डाले गये दिस्ता काग़ज़ को पिन करना होता है. इसके लिए फोल्ड किये गये दिस्ता को पिंनिंग मशीन की सहायता से पिन करना होता है. पिंनिंग मशीन की सहायता से यह काम आसानी से हो जाता है.
  • तत्पश्चात इसे एज स्क्वायर मशीन पर ले जाकर इसकी फिनिशिंग करनी होती है. फिनिशिंग यानि कवर से बाहर निकले अतिरिक्त पन्ने आदि की छंटाई वगैरह. फिनिशिंग के बाद नोट बुक पूरी तरह स्क्वायर में हो जाती है.
  • एज स्क्वायर मशीन में पहले इसके पिनिंग का स्थान अच्छे आकार में आ जाता है. इसके बाद इसकी कट्टिंग की बारी आती है. पहले बने हुए कॉपी को सामने से काटें और इसके बाद आवश्यकता हो तो बीच से काट के दो भागों में बाँट दें. पिनिंग किये गये क्षेत्र के अलावा सामने के तीनों भागों को काटना होता है. इस तरह कुछ ही समय में नोटबुक बन के बिकने के लिए तैयार हो जाता है.
  • 15 से 20 मिनट के अन्दर कम से कम 6 से 8 कापियां बन के तैयार हो जाती हैं.

नोटबुक की पैकेजिंग (Notebook packaging)

कॉपी बन के तैयार हो जाने पर इसे आवश्यकतानुसार पैक करना पड़ता है, यदि पैकिंग की बात की जाए तो इसे व्होलसेल अथवा रिटेल के रूप में पैक किया जा सकता है. होलसेल में पैक करने के लिए बड़े पैकेट्स बनाए जा सकते हैं, बड़े बड़े बैग्स में डीलर की आवश्यकता के अनुसार कॉपी पैक किया जा सकता है. यदि रिटेल में अपना ब्रांड सीधे सीधे उतारना चाहते हैं तो इसके लिए प्रति पैकेट 6 कॉपी का पैक बनाएं और विभिन्न स्टेशनरी दुकानों पर पहुंचाएं.

नोटबुक बनाने के व्यापार के लिए कुल खर्च (Notebook manufacturing business cost)
इस व्यव्साय की स्थापना के लिए कुल कर्च 10 लाख रूपए का आता है. इस पैसे में आप ये मशीन भी ख़रीद सकते हैं और साथ ही रॉ मटेरियल भी पा सकते है. इसके अलावा इलेक्ट्रिसिटी वायरिंग वगैरह भी इसी पैसे में हो जायेगी.

इस तरह 10 लाख रुपय की लागत के साथ इस व्यापार की शुरुआत बड़ी आसानी से करके अपना नोटबुक ब्रांड बाज़ार में उतार सकते हैं और मुनाफा कमा सकते हैं.

नोटबुक बनाने के व्यापार में लाभ (Notebook manufacturing business profit)

एक किलो पेपर में लगभग 6 से 7 नोटबुक बनाई जा सकती है. यदि इसे रिटेल में बेचें तो 15 रूपए प्रति पीस बिकता है. एक नोट बुक बनाने में कुल लागत 11 रूपए की पड़ती है. व्होलसेल में इस तरह की नोटबुक की क़ीमत 12 से 13 रूपए की होती है. इस तरह से व्होलसेल में प्रत्येक नोटबुक में 2 रू का लाभ कमाया जा सकता है.

सरसों के साग को विदेशों में बेच कर लाखों रुपया कमा रहा है पंजाब का यह किसान

अमृतसर के पास वेरका गांव को फतेहपुर शुकराचक से जोड़ने वाली लिंक रोड पर चलते हुए तकरीबन आधे एकड़ में फैले फ़ूड प्रोसेसिंग की एक इकाई गोल्डन ग्रेन इंक को शायद ही कोई नोटिस कर पाता है लेकिन इसने सरसों की पत्तियों से बनने वाली पंजाब की सुप्रसिद्ध व्यंजन – सरसों दा साग की धमक से पंजाब के बाहर ही नहीं बल्कि भारत के बाहर भी हलचल मचा दी है।

इस गोल्डन ग्रेन इंक यूनिट के लिए कच्ची सामग्री की कोई कमी नहीं है। इसकी खरीद आमतौर पर यहां के इच्छुक किसानों से बाजार की खुदरा कीमतों से भी ज्यादा दर पर की जाती है। हालांकि इसे तैयार करने का कार्य इतना आसान नहीं है जितना कि दिखता है, यही वजह है कि इस यूनिट के मालिक 59 साल के जगमोहन सिंह हर वक्त व्यस्त नजर आते हैं। वह ब्रिटेन के बर्मिंघम विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग और अनाज पिसाई में डिग्री हासिल करने के बाद 1986 में जगमोहन अपने गृह नगर अमृतसर लौटे।

वो मोबाइल फोन पर लगातार किसानों से बात करते रहते हैं जो ज्यादातर गुरदासपुर जिले के आसपास के रहनेवाले हैं। ये किसान उन्हें सरसों के तोड़े जाने की जानकारी देते हैं। इसके बाद उनकी यूनिट में सरसों की पत्तियों की साग तैयार कर, कैन में बंद कर दुबई, इंग्लैंड और यहां तक कि कनाडा और अमेरिका जैसे देशों में भेजा जाता है।

वो अपना कारोबार संपर्क के जरिए करते हैं। वो बताते हैं, ”सरसों पैदा करनेवाले बटाला इलाके के गावों के करीब 30 किसानों से मेरा मौखिक समझौता है। सभी छोटे और सीमांत किसान हैं और उनके पास पांच एकड़ से भी कम जमीन है।”

हिसार किस्म की औसत ऊपज 80 क्विंटल प्रति एकड़ है, जबकि स्थानीय पंजाबी किस्म महज 50 क्विंटल प्रति एकड़ की ऊपज दे पाती है और वो भी दो बार तुड़ाई के बाद। अमृतसर के बाजार में साग की पत्तियों की कीमत घटती-बढ़ती रहती है।

इसलिए अगर अमृतसर के खुदरा बाजार में इसकी औसत दर 7 रुपये प्रति किलो है तो एक एकड़ से किसान को 56,000 रुपये की तक कमाई हो जाती है। लेकिन अगर गोल्डन ग्रेन के लिए दो रुपये ज्यादा मिल रहा है तो कमाई बढ़कर 72,000 रुपये प्रति एकड़ हो जाती है।

प्राथमिक तौर पर साग के प्रसंस्करण का दो हिस्सा होता है, पहला- अलग करना और दूसरा- उबालना जो कि स्टीम बॉयलर में किया जाता है। एक दिन में दो टन साग तैयार किया जाता है। टिन के जार में पैक रेडी टू ईट यानी तैयार साग में किसी प्रिजर्वेटिव या परिरक्षक का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। दूसरे उत्पाद के साथ इन जार को नरैन फूड के ब्रांड नाम(जगमोहन के पिता का नाम नरैन सिंह है) के साथ निर्यात कर दिया जाता है।

मार्ग की कठिनाइयां

उन्हें इस बात का अफसोस है कि अमृतसर से कोई कार्गो या मालवाहक विमान नहीं है और जो यात्री विमान यहां से उड़ान भरते हैं उसमें माल ढुलाई के लिए जगह बहुत सीमित होता है। जगमोहन बताते हैं कि उन्होंने मध्य पूर्व के बाजार का अध्ययन किया है और ये पाया कि “अमृतसर से ताजी तोड़ी गई हरी सब्जियों और फल के निर्यात की बड़ी संभावना है।” ”फ्लाइट से अमृतसर से दुबई का रास्ता महज दो घंटे का है, अगर यहां से प्रतिदिन कार्गो या मालवाहक उड़ान की सेवा मिल जाए तो किसानों, खासकर छोटे और सीमांत किसान की जिंदगी में अच्छा बदलाव आ सकता है।”