परंपरागत खेती छोड़ने से चमकी किसानों की किस्मत

12 साल पहले यहां के किसान कर्ज में डूबे हुए थे। परिवार परंपरागत खेती पर निर्भर था। जिससे गुजारा लायक ही आमदनी होती थी। मात्र 12 साल में सब्जी की खेती में एक ऐसी क्रांित आई कि किसानों की किस्मत चकम उठी। किसान मालामाल तो हुए ही साथ ही विदेशी भी उनके यहां नई तकनीक से रूबरू होने के लिए आने लगे।

बेबीकार्न, स्वीटकार्न ने आठ गांवों के किसानों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दी। अटेरना गांव के अवार्डी किसान कंवल सिंह चौहान, ताहर सिंह चौहान, सोनू चौहान, मनौली के अरुण चौहान, दिनेश चौहान ने बताया कि 12 साज पहले एक समस था जब खादर के किसान केवल गेहूं व धान पर निर्भर थे। परिवार का गुजारा मुश्किल से चलता था। किसानों के मन में कुछ अलग करने की लालसा हुई।

अटेरना गांव के कंवल सिंह चौहान ने सबसे पहले बेबीकार्न व स्वीटकार्न की खेती को शुरू किया। जब मंडी में भाव अच्छे मिलने लगे तो बाकी किसान भी आकर्षित हुए। आज आठ गांव के किसान पूरी तरह से सब्जी की खेती को बिजनेस के तौर पर कर रहे हैं। पोल हाउस में तैयार सब्जी व मशरूम आजादपुर मंडी में हाथों हाथ बिक रही है।

एक सोच ने बदल दी जिंदगी : अरुण चौहान

मनाैली के किसान ताहर सिंह चौहान ने कहा कि एक सोच ने उनकी जिदंगी बदल दी। पहले वे आढ़ती के सामने कर्ज के लिए हाथ जोड़ते थे। आज आढ़ती उनके पास खेत में ही फसल खरीदने पहुंच रहे हैं। स्वीटकार्न व बेबीकार्न ने किसान की अंधेरी जिदंगी में रोशनी पैदा कर दी है। यहां के किसान संपन्न हो गए हैं।

पहले एक ट्रैक्टर को खरीदना सपना होता था। आज हर दूसरे किसान के पास महंगी कार हैं। किसानों के पास मजदूरी करने के लिए बाहर से लेबर आ रही है। एक समय था जब पूरा परिवार खेत में काम करता और दो जून की रोटी भी मुश्किल से खा पाता था। सब्जी ने उनके गांव की तकदीर बदल दी है।

दो गुना आमदनी ले रहे हैं यहां के किसान

New indian 2000 Rs Currency Note

किसान कंवल िसंह चौहान ने कहा कि धान व गेहूं की फसल से साल भर में किसान को 80 हजार रुपए की आमदनी होती है। किसान बेबीकाॅर्न, स्वीटकाॅर्न व मशरूम से साल में डेढ़ लाख से दो लाख रुपए तक प्रति एकड़ आमदनी ले रहे हैं। सब्जी की फसल में गेहूं व धान से कम खर्च आता है। यहां के आठ गांवों के अधिक्तर किसान जैविक खाद का प्रयोग कर रहे हैं। जिससे यूरिया की लागत कम हो रही है।

बेबीकाॅर्न को देखने आते हैं विदेशी डेलीगेट्स

दिल्ली पुसा संस्थान में जो भी वेज्ञानिक रिसर्च करने के लिए आते हैं, वे फील्ड वीजिट के लिए इन गांवों का दौरा करते हैं। गत दिनों भेटान, जापान, पाकिस्तान, कोरिया, चीन के किसानों का प्रतिनिधि मंडल अटेरना गांव में पहुंचा था। उन्होंने यहां की खेती की नई तकनीक को अपने देश में भी शुरू करने का विचार रखा था। यहां तक कि अटेरना के किसानों को निमंत्रण भी दिया था कि वे उनके देश के किसानों को भी नई तकनीक से अवगत कराए।

पॉली हाउस में उगाते हैं सब्जी

पॉली हाउस की सब्जी की फसल पूरी तरह से प्रदूषण, खरपतवार तथा कीट पतंगों से दूर रहती है। शिमला मिर्च, खीरा, टमाटर, स्ट्राब्रेरी, घीया जैसी फसल पॉली हाउस के अंदर तैयार हो रही हैं। छोटे से गांव में तैयार होने वाली स्वीटकाॅर्न, बेबीकाॅर्न देश व विदेश में काफी डिमांड हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *