मुनाफे की फसल: केला की जगह शुरू हुई ड्रैगन फ्रूट की खेती

आंधी-तूफान के साथ-साथ पनामा रोग के कारण केला की खेती किसानों के लिए मुफीद नहीं रही। नुकसान झेलने वाले किसान अब विकल्प के तौर पर ड्रैगन फ्रूट की खेती कर रहे हैं। पूर्णिया जिला में रूपौली प्रखंड अंतर्गत हरनाहा गांव के प्रगतिशील किसान विमल मंडल ने इसकी खेती की शुरुआत की है।

उनके पास दूसरे किसान भी ड्रैगन फ्रूट की खेती की जानकारी के लिए आते हैं। हालांकि अभी किसानों में इसके बाजार को लेकर आशंका है।

विमल मंडल ने बताया कि ड्रैगन फ्रूट का औषधीय महत्व है। इसमें कैल्शियम, फास्फोरस, विटामिन-ए की प्रचुर मात्रा पाई जाती है। मेट्रो सिटी में यह छह से आठ सौ रुपये प्रति किलो की दर से बिक रहा। स्थानीय बाजार में व्यापारी इसे दो सौ रुपये प्रति किलो की दर से खरीद रहे हैं। ड्रैगन फ्रूट की खेती में पहली बार प्रति एकड़ तीन लाख रुपये के करीब लागत आती है, लेकिन दूसरे साल से यह घटकर एक चौथाई रह जाती है। मुनाफा केले से कई गुना अधिक है।

एक कट्ठा में लगते हैं 40 पौधे जानकारी लेने पहुंचे मुखिया रामवती देवी सहित, पप्पू मंडल, महेंद्र मंडल, पिंटू यादव को विमल मंडल ने बताया कि दस कट्ठा जमीन में फसल उगाने के लिए नासिक से ड्रैगन फ्रूट के पौधे मंगवाए, जो 150 रुपये प्रति पौधा मिला। उसे दस फीट की दूरी पर लगाया। प्रति कट्ठा चालीस पौधे लगे। दो पौधों के बीच में आठ फीट लंबा सीमेंट का खंभा लगाया गया।

मई में इसमें फूल आया और फल भी लग गए। फूल लगने के 36 दिनों के बाद फल तैयार हो गया। एक पौधा से जून तक छह फल निकले। दिसंबर तक फल निकलता रहेगा। एक फल का वजन 200 से 400 ग्राम तक होता है।

पौधा उपलब्ध कराने वाले व्यवसायी ने 150 रुपये किलो की दर से फल को खरीद लिया है। केला में रासायनिक खाद और कीटनाशक का भरपूर उपयोग किया जाता है, जबकि ड्रैगन फ्रूट की खेती में इसका उपयोग नहीं होता। इस कारण इसका औषधीय और पादप गुण सुरक्षित रहता है।

‘ड्रैगन फ्रूट में औषधीय गुण होते हैं। इसमें कैल्शियम, फास्फोरस, विटामिन-ए और कैलोरी की प्रचुर मात्रा पाई जाती है। कम उपलब्धता के कारण इसकी कीमत अधिक मिलती है।’

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