प्रोफेसर का अनोखा जुगाड़, घास काटने वाली मशीन से बना दी धान काटने वाली मशीन

जेरोम सोरेंगे को-ऑपरेटिव कॉलेज और वर्कर्स कॉलेज में मनोविज्ञान के प्रोफेसर रहे हैं. रिटायरमेंट के बाद उन्होंने बालीगुमा गोड़गोड़ा में फार्म हाउस खोला. यहां वे सूकर, मुर्गी, ऐमु और मछली पालन कर रहे हैं. थोड़ी जमीन पर खेती-बाड़ी भी है. उन्हें खेत में धान काटने-कटवाने में बहुत परेशानी होती थी.

इससे बचने के लिए वह दिमाग लगाते रहते थे. अंतत: उन्होंने धान काटने की मशीन बना डाली. उन्होंने अलग से कुछ किया नहीं. मवेशी को खिलाने के लिए उनके पास पहले से घास मशीन हेच कटर थी. इस मशीन में ही उन्होंने विज्ञान ढूंढ़ निकाला.

तर्क भिड़ाया कि इससे घास कट सकता है तो धान क्यों नहीं. धान तो कट जा रहा था लेकिन इसकी बालियां बिखर जा रही थीं. उनके मुताबिक इस समस्या का हल उनकी बेटी नीरा मृदुला सोरेंग ने ढूंढ़ निकाला. नीरा चिरीमिरी (छत्तीसगढ़) में रहती हैं. वहां से उन्होंने पापा को धान काटने वाली मशीन का फोटो ह्वाट्सएप किया. इससे प्रो सोरेंग को आइडिया मिल गया.

उन्होंने हेच कटर में प्रोटेक्टर की जगह धान की बाली समेटने के लिए प्लास्टिक की पुरानी बाल्टी काटकर लगा दी. हो गयी मशीन तैयार. जेरोम बताते हैं कि तीन मजदूर तीन दिन में जितना काम कर सकता है, उतना काम कुछ घंटे में यह मशीन कर देती है.

मशीन में सिर्फ दो लीटर डीजल खर्च होगा. दो लीटर डीजल की कीमत 120 से 130 रुपये होती है. मान लिया जाये दो घंटे मशीन चलाने के लिए आप एक व्यक्ति को 150 रुपये देते हैं. इस तरह हिसाब लगाया जाये तो कुल खर्च 280 रुपये या अधिक-से-अधिक 300 रुपये होता है.

धान काटने के लिए एक मजदूर की प्रतिदिन की मजदूरी 150 रुपये होती है. तो तीन मजदूर की तीन दिनों की मजदूरी 1350 रुपये होती है. इस तरह समय के साथ-साथ एक हजार रुपये से अधिक की बचत भी हो रही है.इनके इस प्रयोग के बाद बहुत सारी कंपनी यह मशीन बनाने लगी है .जिनमे बाल्टी की जगह पर धातु लगाई जाती है .और ब्लेड भी बदल दिया है . जिससे अब यह मशीन पूरी तरह से कामयाब बन गई है

इसी सिद्धांत पर बनी मशीन कैसे काम करती है उसके लिए वीडियो देखें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *