कृत्रिम हाईड्रोजैल किसानों से धोखा, हर्बल हाईड्रोजैल कृषि की संजीवनी, हइड्रोजेल की मदद से सिर्फ एक सिंचाई से हो सकती है फसल

वर्षा आधारित कृषि व् गिरते जलस्तर की समस्या से जूझ रहे किसानों को राहत देने के नाम पर, कई प्राइवेट कम्पनियो के कृत्रिम रासायनिक हाईड्रोजैल(जलशक्ति, जेबा इत्यादि) बाजार में खूब बिक रहे है I इंडियन काउंसलिंग ऑफ एग्रीकल्चर रिर्सच (ICAR) ने भी पूसा हाईड्रोजैल नाम का एक कृत्रिम रासायनिक हाईड्रोजैल विकसित क़र, पिछले दस वर्ष से, उसे 1200-1500 रूपये प्रति किलो बेच रही हैI कृत्रिम रासायनिक हाईड्रोजैल के बारे में निम्नलिखित बड़े-2 झूठे दावे भी किये जा रहे है:-

  • एक ग्राम पूसा हाईड्रोजैल 500 ग्राम पानी अवशौषित करता है। इससे सिंचाई में पानी की 40 प्रतिशत तक बचत होती है। जो सिर्फ एक सिंचाई में फसलों को तैयार करेगा और जड़ों के पास पानी को सोखकर लंबे समय तक, पौधों को पानी की कमी भी नहीं होने देगा तथा बारिश व् सिंचाई के पानी को स्टोर करता है
  • पूसा हाईड्रोजैल एक एकड़ खेत में महज 1-2 किलोग्राम पर्याप्त है जो 2-5 वर्षों
    तक काम करता है ।
  • पूसा हाईड्रोजैल के इस्तेमाल से, मक्के, गेहूँ, आलू, सोयाबीन, सरसों, प्याज,
    टमाटर, धान, फूलगोभी, गाजर, गन्ने, हल्दी, जूट समेत अन्य फसलों में उत्पादकता बढ़ती है ।
  • पूसा हाईड्रोजैल, खाद के साथ तालमेल बिठा क़र, जमीन की सेहत सुधारने में भी
    मदद करता है।

अब अगर वैज्ञानिक सोच के साथ, पूसा हाईड्रोजैल और प्राइवेट कम्पनियो के हाईड्रोजैल के बारे में ऊपरलिखित झूठे दावों को परखा जाये, तो निष्कर्ष निकलता है की, कृत्रिम रासायनिक हाईड्रोजैल किसानों से सरासर धोखा है।

जिसे किसान भाई व् कोई भी वैज्ञानिक सोच का व्यक्ति अपने घर पर आसानी से परख सकता है जैसा की लेखक ने चित्र-1 में दिखाया है बाजार से दस ग्राम, ज़ेबा हाईड्रोजैल, पूसा हाईड्रोजैल और हर्बल हाईड्रोजैल (गूंद कतीरा-Tragacanth Gum) खरीद क़र ले आईये।

घर पर तीन कांच के गिलास ले और उन मे दो-2 ग्राम की दर से,एक गिलास में ज़ेबा हाईड्रोजैल, दूसरे में पूसा हाईड्रोजैल, तीसरे में हर्बल हाईड्रोजैल डाल क़र तीन चौथाई साफ पानी से भर दी जीये। आप देखेंगे की, ज़ेबा हाईड्रोजैल ने पांच मिनट में , पूसा हाईड्रोजैल ने 30 मिनट में, और हर्बल हाईड्रोजैल ने 60 मिनट में गिलास के सारे पानी को सोख कर, जैल में प्रवृतीत कर दिया।

अब सभी गिलास में दो-2 ग्राम की दर से जिप्सम पाऊडर ऊपर से छिड़क दीजिये। आप को जानकर आश्चर्य होगा की जिप्सम पाऊडर की रासायनिक क्रिया से, ज़ेबा जैल एक मिनट में, पूसा जैल 10 मिनट में, दूध की तरह फट कर, पानी में बदल जाता है

जब की हर्बल हाईड्रोजैल पर जिप्सम की रासायनिक क्रिया का कोई असर नहीं होता उसका जैल अपने स्वाभाविक रूप में ही रहता है।

इस साधारण से प्रयोग से ये साबित होता है की कृत्रिम रासायनिक हाईड्रोजैल कृषि उदेश्यो के लिये उपयुक्त तकनीक नहीं है कियोकि जिप्सम के रसायनिक तत्व लगभग सभी प्रकार की भूमि में मौजूद होते है शुष्क व् रेतली भूमि से तो जिप्सम को

निकाल कर व्यवसायिक व् औधोगिक कार्यो के लिये इस्तेमाल किया ही जाता है जबकि किसान सिचित भूमि में जिप्सम को खाद व् छारीय भूमि मिट्टी संशोधन के लिये वर्षो से  करते रहे है।

जबकि हर्बल हाईड्रोजैल (गूंद कतीरा-Tragacanth Gum) सभी प्रकार की भूमि के लिये उपयुक्त पाया गया है और आर्थिक रूप से सस्ता विकल्प ( सिर्फ दो सो रुपये प्रति किलो ग्राम) होने के साथ, पर्यावरण हितेषी भी है जिससे सिचाई पानी की बचतके साथ फसलों की लागत में भी बचत होती है ।

हरियाणा के रेतीले इलाके के गांव लिसना जिला रेवाड़ी के प्रगतिशील किसान श्री मनोज कुमार ने हर्बल हाईड्रोजैल लेपित बीज तकनीक अपनाकर अपने खेतो पर वर्षा आधारित धान सफलतापूर्वक उगा कर एक नयी मिसाल कायम की है । प्राकृतिक हाईड्रोजैल का प्रयोग सभी सभ्यताओं में आयुर्वेदिक चिकित्सा, कृषि इत्यादि कार्यो में आदि काल से हो रहा है।

कृत्रिम रासायनिक हाईड्रोजैल का प्रयोग भी लगभग सौ साल से चिकित्सा, प्रसाधन सामग्री, सैनिटरी नेपकिन, कृषि कार्यो के लिये पूरी दुनिया में हो रहा है। इस लिये हाईड्रोजैल कोई नया अविष्कार नहीं है जैसा की कुछ वैज्ञानिक व् प्राइवेट कंपनी अपने हाईड्रोजैल को बेचने के लालच में बढ़ा-चढ़ा क़र प्रसारित कर रही है।

कृषि में कृत्रिम रासायनिक हाईड्रोजैल के प्रयोग को लेकर दुनिया भर के पर्यावरणविद्ध बार-2 चेतावनी जारी करते रहे है कियोकि इस के निर्माण में उपयोग होने वाले पादर्थो से पर्यावरण दूषित होने और जीवो में कैंसर होने का खतरा बना रहता है। इस लिये कृषि कार्य के लिये प्राकृतिक हाईड्रोजैल के उपयोग की सलाह हमेशा दी जाती है ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *