सोने से भी महंगी है हिमालय की वायग्रा, एक किलो की कीमत 60 लाख रुपए से ज्‍यादा

यारसागुम्‍बा यानी गर्मी की घास। यह एक तरह की फफूंंद है। यह सोने से भी महंगी है। 1 किलो यारसागुम्‍बा की कीमत लगभग 1 लाख डॉलर यानी लगभग 65 लाख रुपए है। इसे हिमालय की वायग्रा भी कहा जाता है। लोगों का मानना है कि इससे अस्‍थमा कैंसर और खास तौर पर मर्दाना कमजोरी में फायदा होता है।

यारसागुम्‍बा सिर्फ हिमालय और तिब्‍बती पठार पर 3000 से 5000 मीटर की ऊंचाई पर मिलता है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हर साल मई से जून के माह में नेपाल के हजारों लोग पहाड़ की ओर चले जाते हैं। ये लोग यारसागुम्‍बा की तलाश में जाते हैं। ये लोग तीन हजार मीटर की ऊंचाई पर कैंप करके रहते हैं। पांच साल से यारसागुम्बा का व्यापार कर रहे कर्मा लांबा कहते हैं कि दूर दराज से गोरखा, धाधिंग, लामजुंग जि‍ले से लोग यहां यारसागुम्बा की तलाश में आते हैं।

मुश्किल जिंदगी जीते हैं यारसागुम्‍बा तलाशने वाले लोग

यारसागुम्‍बा की तलाश में आए लोग दो महीने तक बहुत मुश्किल जिंदगी जीते हैं। ये टेंट में रहते हैं। एक युवा दंपत्ति यहां तीन साल से आ रहा है। उनका कहना है कि पहले साल हमें एक भी यारसागुम्‍बा नहीं मिला था। फिर हमने उसकी डंठल को पहचानना सीखा। अब हम आसानी से रोज 10 से 20 यारसागुम्‍बा तलाश लेते हैं।

सुशीला और उनके पति की मई और जून के महीने में हर दिन यही दिनचर्या रहती है। यारसामगुम्बा के बदले जो पैसा उन्हें मिलता है उससे वो आसानी से आधा साल काट लेते हैं। पिछले साल उन्होंने दो हजार डॉलर कमाए थे। इस तरह से वे 2 माह में उतना कमा लेते हैं जितना वे छह माह में दूसरा काम करके कमाते।

यारसागुम्‍बा की उपलब्‍धता में आ रही है कमी

बढ़ती मांग और जलवायु परिवर्तन के असर की वजह से यारसागुम्‍बा की उपलब्‍धता में कमी आ रही है। नेपाल के मनांग क्षेत्र में 15 सालों से यारसागुम्बा तलाश रही सीता गुरुंग का कहना है कि पहले मैं हर दिन सौ यारसागुम्बा तक तलाश लेती थी लेकिन अब दिन भर में मुश्किल से दस-बीस ही मिल पाते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि ज्‍यादा मांग और जलवायु परिवर्तन की वजह से यारसागुम्बा की उपलब्धता में गिरावट आ रही है। सीता कहती हैं कि जब मुझे रोजाना सौ यारसागुम्बा मिलते थे तब कीमतें बहुत कम थीं। अब जब कीमतें बढ़ गई हैं तो बहुत कम यारसागुम्बा मिलते हैं।

यारसागुम्‍बा पर सरकार को रॉयल्‍टी चुकाते हैं लोग

नेपाल सेंट्रल बैंक के एक शोध के मुताबिक, जो लोग यारसागुम्बा तलाशते हैं उनकी सालाना आय का 56 फीसदी इसी से आता है। यारसागुम्बा की फसल काटने वाले सभी लोग सरकार को रॉयल्टी चुकाते हैं। साल 2014 में किए गए एक शोध के मुताबिक, यारसागुम्बा के कारोबार से नेपाल की अर्थव्यवस्था को 51 लाख रुपए की आमदनी हुई।

कई विशेषज्ञों का मानना है कि इस कैटरपिलर फफूंदी की तस्करी अन्य देशों में भी की जा रही है। 18 सालों से यारसागुम्बा का व्यापार कर रहे नागेंद्र बुद्धा थोकी कहते हैं कि इस व्यापार को इस तरह से रेगुलेट नहीं किया गया है जैसे इसे किया जाना चाहिए था। इसलिए यारसागुम्बा तलाशने वालों और सरकार की वास्तविक आय का पता करना मुश्किल हो जाता है।

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