इस डॉक्टर ने किया होम्योपैथिक दवा का इस्तेमाल,आए चौंकाने वाले नतीज़े

यूपी के पीलीभीत ज़िले के रहने वाले एक होम्योपैथिक के डॉक्टर ने अपने अमरूद के पेड़ों पर एक नए तरह का प्रयोग किया है। पीलीभीत के होम्योपैथिक डॉक्टर विकास वर्मा ने राजस्थान यूनिवर्सिटी से होम्योपैथिक में डिग्री हासिल की और करीब 18 वर्ष से बरेली में होम्योपैथिक विधि से मरीजों का इलाज कर रहे हैं।

डॉ. विकास वर्मा ने बताया, “यह 2003 की बात है। मैंने अपने घर के अहाते में लगे नींबू के पेड़ पर देखा कि उसमें फूल तो आते हैं लेकिन फल नहीं आते तो मैंने उस नींबू के पौधे पर होम्योपैथिक दवाइयों का प्रयोग किया। जिसका आश्चर्यजनक रिजल्ट सामने आया और कुछ ही समय में पेड़ों की रंगत बदलने लगी। फिर कुछ ही समय में जिस नींबू के पेड़ पर फल नहीं आ रहे थे। उन पर भारी मात्रा में फल आने लगे।” यहीं से उनके दिमाग में एक विचार आया कि फसलों पर होम्योपैथिक की दवाई के प्रयोग से आश्चर्यजनक परिवर्तन किए जा सकते हैं।”

इसके बाद उन्होंने गेहूं, धान, दलहन, तिलहन, फल और फुलवारी पर होम्योपैथिक दवाइयों का सफल प्रयोग किया। आज स्थिति यह है कि इनकी अमरूद के बाग में आधा किलो से लेकर सात-आठ सौ ग्राम और एक से डेढ़ किलो तक वजन के अमरुद की फसल होती है।

उन्होंने अपने इस प्रयोग को जनपद के किसानों के अतिरिक्त बरेली के किसानों को भी होम्योपैथिक दवाइयों के प्रयोग के लिए प्रेरित किया। लेकिन इसका रिजल्ट शून्य रहा। क्योंकि किसानों के गले से यह बात नहीं उतरी कि होम्योपैथिक दवा भी खेतों में कुछ चमत्कार कर सकती है। फिर उन्होंने बड़ी मुश्किल से अखा गाँव के किसान ऋषि पाल को इस बात के लिए तैयार किया कि एक बीघा खेत उन्हें प्रयोग के लिए दे दिया जाए।

यदि खेत में होम्योपैथिक दवाओं के प्रयोग से फायदा होता है तो फायदे में वह कोई हिस्सेदारी नहीं लेंगे। लेकिन यदि नुकसान होता है तो नुकसान की सारी भरपाई वह स्वयं करेंगे। इस पर ऋषि पाल ने उनकी बात मान ली और डॉक्टर विकास ने धान की फसल पर जैविक खाद और होम्योपैथिक दवाई का प्रयोग किया,

जिससे धान की फसल अच्छी पैदा हुई। इससे किसान ऋषि पाल को भी अच्छा मुनाफा हुआ। इसके बाद क्षेत्र के कई किसान डॉ. विकास के इस प्रयोग पर विश्वास करने लगे और उन्होंने अपनी मर्जी से अपने खेतों को डॉक्टर विकास को उनके प्रयोग हेतु देने लगे।

मज़बूत होता है पौधों का इम्यून सिस्टम

होम्योपैथिक दवाओं के प्रयोग के बारे में डॉक्टर विकास बताते हैं कि “उनका यह प्रयोग पौधों की इम्यून सिस्टम को मजबूत करने पर टिका है। इसके लिए पहले वह जैविक खाद से जमीन तैयार करते हैं। उसके बाद फिर पौधा लगाने के बाद जड़ों में होम्योपैथिक की दवा का प्रयोग करते हैं।

इसमें एक बड़े ड्रम में पानी भरकर आवश्यकतानुसार दवा की मात्रा डालकर अधिकतर वह ड्रिप इरीगेशन विधि से बूंद-बूंद कर सिंचाई करते हैं। इस तरह पौधों को एक मजबूत आधार मिलता है। यदि पौधों को आगे चलकर जरूरत पड़ती है तो दवा बदलते हैं या डोज़ बढ़ा देते हैं। उन्होंने बताया कि कीटनाशक तैयार करने के लिए गौमूत्र में लहसुन, हरी मिर्च मिलाते हैं।

सीधे फल विक्रेताओं को बेचते हैं अमरूद

डॉक्टर विकास से उनके अमरूदों की बिक्री के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि “मैं अपने फार्म पर तैयार की गई अमरूद की बिक्री सीधे फल विक्रेताओं को करता हूं। इसके अलावा टेलीफोन पर ही मेरे द्वारा तैयार किए गए जैविक अमरूदों का आर्डर मिल जाता है। मैं प्रतिदिन डेढ़ से दो कुंटल अमरुद का आर्डर फोन पर ऑर्डर बुककर होम डिलीवरी पहुंचा देता हूं। एक किलो अमरूद की कीमत 100-120 प्रति किलो है।”

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