लोहे की यह गाय कूड़ा और घास फूस खाकर देगी जैविक खाद

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) बरेली के वैज्ञानिकों ने आईआईटी रुड़की के साथ मिलकर एक मेकेनिकल काउ बनाई है। भले ही यह गाय की तरह न दिखे पर गाय की तरह खरपतवार खाती है और बदले में जैविक खाद देती है।

मशीन की संरचना गाय के पेट से मेल खाती है इसलिए इसका नाम मेकेनिकल काउ कंपोस्टिंग मशीन रखा गया है। आईवीआरआई के पशु आनुवांशिकी विभाग के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. रणवीर सिंह बताते हैं कि उन्होंने जयगोपाल वर्मीकल्चर तकनीक विकसित की थी। स्वदेशी प्रजाति के केंचुए जयगोपाल की मदद से जैविक खाद बनाने की प्रक्रिया 40 दिन हो गई।

इससे भी तेजी से खाद बनाने के बारे में शोध जारी थी। इस दौरान मेकेनिकल काउ कंपोस्टिंग मशीन का विचार आया। इसको लेकर आईआईटी रुड़की की मदद ली गई। मशीन तैयार होने के बाद से अब तक इसमें लगातार बेहतर रिजल्ट के लिए काम जारी है। मेकेनिकल काउ कंपोस्टिंग मशीन न्यूनतम सात दिन में यह खाद तैयार कर देती है।

रोज 100 किलो खरपतवार डालेंगे तो अगले सात दिनों के बाद से रोजाना 100 किलो खाद मिलनी शुरू हो जाएगी। 30 दिन में तैयार होते हैं सूक्ष्मजीवी, 7 से 10 दिन में बन जाती है खाद मैकेनिकल काउ कंपोस्टिंग मशीन से खाद बनाने से पहले सूक्ष्मजीवी विकसित करने में 40 से 50 दिन लगते हैं। रोटरी ड्रम में सूक्ष्मजीवीयों के विकास के बाद इसमें खरपतवार, सब्जियों के कचरे डाले जा सकते हैं।

साथ ही बीच बीच में गोबर, कूड़े, कचरे और पत्तियों को मिक्स कर उसपर सूक्ष्मजीवीयों का घोल डाला जाता है। मशीन के रोटरी ड्रम को दिन में कुछ मिनट के लिए घुमाना पड़ता है ताकि कूड़ा-कचरा आक्सीजन और सूक्ष्मजीवों के संपर्क में आ जाए। हर दिन 120 किलो कचरा डाला जा सकता है जिससे प्रतिदिन 100 किलो जैविक खाद निकाली जा सकती है।

गाय के पेट में मौजूद सूक्ष्मजीवी, मशीन में भी रहकर बनाते हैं खाद मैकेनिकल काउ कंपोस्टिंग मशीन का कांसेप्ट बिल्कुल गाय के पाचन तंत्र से मेल खाता है। जिस तरह गाय के पेट में कई भाग होते हैं उसी तरह से मैकेनिकल काऊ कंपोस्टिंग मशीन के रोटरी ड्रम में भी कई चरणों के खाद बनती है। बस मशीन को हर रोज कुछ मिनट के लिए घुमाना पड़ता है। यह मशीन एक कोण पर झुकी होती है।

आगे से खरपतवार डाली जाती है और पीछे से खाद निकलती है। डा. रणवीर बताते हैं कि दिन में एक बार मशीन को तीन मिनट के लिए घुमाते हैं सर्दियों में भी ड्रम का तापमान 70 डिग्री तक होता है रोटरी ड्रम में मौजूद माइक्रोआर्गनिज्म (जीवाणु और सूक्ष्मजीवी) की वजह से सर्दियों में भी जब तापमान छह डिग्री तक पहुंच जाता है, ड्रम के बीच के भाग का तापमान 70 डिग्री होता है।

डॉ. रणवीर कहते हैं कि यह सूक्ष्मजीवीयों की ओर से जारी अपघटन प्रक्रिया के कारण होता है। सबसे खास खाद की क्वालिटी है। इसमें कुल नाइट्रोजन 2.6 फीसदी और फासफोरस 6 ग्राम प्रति किलो होता है। अब किसानों को दी जा रही है ट्रेनिंग डॉ. रणवीर सिंह ने कहा कि केंद्र सरकार जैविक खेती को बढ़ावा दे रही है।

जैविक खाद बनाने के लिए किसानों को सब्सिडी भी दी जा रही है। ऐसे में मेकेनिकल काउ कंपोस्टिंग मशीन काफी कारगर होगी। यह मशीन 2014 में तैयार की गई थी और तब से इस मशीन को और बेहतर बनाने पर शोध चन रहा है।

अब मशीन रोजाना 100 किलो खाद मिलती है वहीं किसान इसका छोटा प्रतिरुप भी बनवा सकते हैं। जैविक खाद को लेकर किसानों को लगातार जागरुक किया जा रहा है। किसान चाहे तो इसे समूह में मिलकर तैयार करा सकते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *