मेंथा किसानों की बल्ले-बल्ले, इतने रुपए किलो में बिका तेल

मौजूदा सीजन मेंथा किसानों के लिए कमाई वाला साबित हो रहा है। इस पेराई सीजन में मेंथा की कीमतें 1600 रुपए प्रति किलो तक पहुंच चुकी हैं। पिछले 15 दिनों से ये कीमतें 1400 से 1600 रुपए के बीच बनी हुई हैं। मेंथा से इस साल हुई आय से न सिर्फ अगले वर्ष मेंथा का रकबा बढ़ेगा, बल्कि इस वर्ष आलू की फसल ज्यादा बोई जाएगी।

“ये सीजन मेंथा के लिए बहुत अच्छा गया है। जिन किसानों ने सीमैप या दूसरी उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल किया है, उनका उत्पादन प्रति एकड़ 60 किलो तक उत्पादन हुआ है, अगर 1500 रुपए का भी रेट मिला तो करीब 90 हजार रुपए मिले, जिसमें से अगर 31,250 रुपए की लागत निकाल दें तो भी करीब 58000 रुपए का किसानों को शुद्ध मुनाफा होने की उम्मीद है।”

डॉ. सौदान सिंह कहते हैं। डॉ. सिंह मेंथा की नई किस्में और तकनीकी विकसित करने वाली सरकारी संस्था सीमैप में मुख्य वैज्ञानिक हैं। यूपी, बिहार, उत्तराखंड और पंजाब समेत कई राज्यों में इस बार मेंथा की फसल ली गई। मेंथा के गढ़ यूपी के बाराबंकी समेत कई जिलों में किसान पहली चक्र की कटाई कर दूसरे की तैयारी में लगे हुए। मेंथा की रोपाई फरवरी-मार्च में की जाती है।

जिससे 90 दिन में पहली कटाई हो जाती है। मेंथा की सूखी पत्तियों का आसवन कर तेल निकाला जाता है। एक मोटे अनुमान के मुताबिक दुनिया में प्रति वर्ष करीब 40,000 टन तेल की मांग है, जबकि भारत में अभी भी सिर्फ 25,000 टन का उत्पादन हो रहा है, जिसका सीधा मतलब है कि आगे बहुत संभावनाएं हैं। भारत दुनिया में प्राकृतिक मेंथा का सबसे बड़ा निर्यातक बनकर उभरा है।

सीमैप के एक और वरिष्ठ वैज्ञानिक संजय सिंह के मुताबिक, “इस बार सीमैप द्वारा दी गई जड़ों और किसानों के पास की पौध के आसार पर करीब 2 लाख 80 हजार हेक्टेयर में मेंथा की बुआई हुई थी, अगले साल ये आंकड़ा साढ़े तीन लाख हेक्टेयर को पार कर सकता है। जर्मनी में सिंथेटिक मेंथा बनाने वाली फर्म इस सीजन भी चालू नहीं हो पाई है। जिसके चलते प्राकृतिक मेंथा की मांग बढ़ी है।”

हालांकि मौसम की बेरुखी के चलते उत्पादन पर असर पड़ा है। संजय सिंह के मुताबिक कई राज्यों के शुरुआती दिनों में 10 फीसदी तक तेल कम निकला है। मेंथा कल्टीवेशन और प्रोडक्शन से जुड़ी फर्म एग्रीबिजनेस सिस्टम इंटरनेशनल में शुभ मिंट प्रोजेक्ट के प्रोजेक्ट मैनेजर अभिजीत शर्मा गांव कनेक्शन को बताते हैं,

“जिन किसानों ने जून से पहले पेराई की, उनमें तेल कम निकला है, क्योंकि पुरवा हवाओं के चलते पर्याप्त गर्मी नहीं थी। उसके बाद का उत्पादन अच्छा रहा, जो हमारे किसानों के बीच भी 60-62 किलो प्रति एकड़ तक गया है।” मेंथा का उत्पादन उसकी अच्छी किस्म की पौध और नई तकनीकों और वैज्ञानिक सलाहों पर निर्भर करता है। पुरानी जड़ों से पौध तैयार करने, जलभराव, वक्त पर सिंचाई और रोग का निदान न करने पर ये उत्पादन 40 से 50 किलो या उससे कम प्रति एकड़ उत्पादन होता है।

मेंथा का तेल उसकी पत्तियों की सतह पर उपस्थित ग्रंथियों में होता है। करीब 85-90 दिन की फसल तेज गर्मी होने पर ये तेल जमीन से पत्तियों में जमा हो जाता है। कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक मेंथा ऐसी फसल है, जिसमें अच्छे उत्पादन के लिए जरूरी है कि पेराई से पहले पौधों को (तनाव) टेंशन हों, जिसके लिए तेज गर्मी और सिंचाई का न होना अच्छा माहौल होता है।

इसीलिए पेराई से एक हफ्ते पहले से सिंचाई बंद कर दी जाती है। बाराबंकी के जिला उद्यान अधिकारी महेंद्र कुमार बताते हैं, “इस बार जिले में करीब 80 लाख हेक्टेयर में मेंथा था, मेंथा के सीजन में यहां ज्यादातर जगह मेंथा होता है।

किसानों को इसका अच्छा लाभ हुआ है, लेकिन सामान्य पेराई टंकियों के चलते कई हादसे हुए हैं, इसलिए मेरी किसान भाइयों से अपील है कि अगली बार अच्छी गुणवत्ता वाले पेराई संयंत्र लगवाएं, जिसमें सेफ्टी वाल्व हो, ताकि हादसे का डर न रहे, दूसरा आधुनिक संयंत्र से 10-15 फीसदी तेल ज्यादा निकलता है।” मेंथा के तेल में हुए मुनाफे से न सिर्फ आगामी वर्ष में मेंथा रकबा बढ़ने की उम्मीद है, बल्कि इससे आलू का भी रकबा बढ़ेगा।

किसानों में मेंथा काटकर खेत तैयार कर आलू बोएंगे और फिर अगैती आलू की फसल निकालकर मेंथा। सीमैप के वैज्ञानिक डॉ. सैदान सिंह गांव कनेक्शन को बताते हैं, “90-100 दिनों में किसान को औसतन प्रति हेक्टेयर पौने दो लाख तक मुनाफा हुआ है। जो किसी फसल के अनुपात में काफी ज्यादा है। इसलिए पहले आलू और फिर मेंथा का रकबा बढ़ना लगभग तय है, अभी किसान नर्सरी के लिए पौधों के लिए दौड़भाग कर रहे हैं।”

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