किसान ने निकाली एक ऐसी स्कीम के पैसे भी बच गए और लेबर भी फ्री

यह कहानी सबक देती है कि हमारे पास जितने भी सीमित संसाधन हैं, उन्हीं का सही इस्तेमाल करके हम न केवल कामयाबी हासिल कर सकते हैं, बल्कि दूसरों के लिए भी मॉडल स्थापित कर सकते हैं। इसके लिए जरूरत होती है सही नेतृत्व और टीम वर्क की।

बेंगलुरु से करीब 100 किलोमीटर दूर एक जगह है मांड‍या। पिछले साल जुलाई की बात है, यहां गन्ने की खेती करने वाले 20 से ज्यादा किसानाें ने मौत को गले लगा लिया। इन किसानों की आत्महत्या की वजह यह नहीं थी कि खेती नहीं हुई, वजह थी वह भारी कर्ज जो उन्होंने कभी लिया था और अब बढ़ते-बढ़ते इतना हो चुका था कि उसे चुकाना उनके वश की बात नहीं रही थी। फसल की सही कीमत न मिलना, भारी स्टॉक और सही सलाह के अभाव में ये किसान हालात के सामने हार चुके थे।

इधर, मांडया से हजारों मील दूर बैठा एक शख्स इन हालात से दुखी था। वह रोजाना मांडया में किसानों की आत्महत्या की खबरें सुनता और मन मसोस कर रह जाता। कैलिफोर्निया में आईटी प्रोफेशनल मधुचंद्रन चिक्कादैवेया मांडया में ही जन्मे थे। उनका संबंध भी किसान परिवार से है, उनका बचपन 300 एकड़ में फैली बेंगलुरु एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के प्रांगण में बीता था, उनके पिता यहां वाइस चांसलर थे।

वर्ष 2014 में उन्होंने अपनी नौकरी से त्यागप्ात्र दे दिया और मांडया लौट आए। मधु कहते हैं- मेरा एक ही मकसद था, मांडया के किसानों को बचाना, उनकी मदद करना। उनके मुताबिक देश के हालात ऐसे हैं कि किसान अपनी खेती को छोड़कर छोटे-मोटे काम-धंधों के लिए शहर की तरफ दौड़ रहे हैं, ऐसा इसलिए है क्योंकि खेती अब फायदे की चीज नहीं रही।

मधु कहते हैं, जब मैं मांडया आया तो मैंने पाया कि यहां किसान आर्गेनिक तरीके से खेती कर रहे हैं, लेकिन समस्या यह थी कि यहां कोई बेहतर मार्केट नहीं थी और न ही किसानों को गाइड करने वाला। तब हमने पहला काम यही किया- मंडया आर्गेनिक फार्मर्स को-ऑपरेटिव सोसायटी स्थापित की।

मधु ने अपने दोस्तों, पूर्व सहयोगियों के साथ मिलकर करीब 1 करोड़ रुपये जुटा कर इस सोसायटी का गठन किया, उन्हें सरकार से मंजूरी लेने और आर्गेनिक मांडया नाम से एक ब्रांड शॉप खोलने में 8 महीने का समय लगा। इस ब्रांड के जरिये किसान अपने आर्गेनिक फल-सब्िजयों को बेचते हैं। मधु के मुताबिक हमने बेंगलुरु-मैसूर हाईवे पर आर्गेनिक मांडया नाम से इस शॉप को स्थापित किया है। मेरा मकसद था कि एक किसान सीधे अपने ग्राहक से बात कर सके, उसकी जरूरत को समझ सके वहीं एक ग्राहक किसान की मेहनत को जान सके। हाईवे पर शॉप स्थापित करने का फायदा यह हुआ कि वहां से गुजरने वाले लोग उन आर्गेनिक फल-सब्जियों को खरीदने लगे। किसानों को वहां से कहीं और नहीं जाना पड़ा। इसकी कामयाबी के बाद एक आर्गेनिक रेस्टोरेंट खोल दिया गया।

क्या है फार्म शेअर (farm share)प्रोग्राम

मधु कहते हैं, लोग आर्गेनिक पदार्थों से जुड़ते हुए हिचकते हैं,हमारे लिए यह बेहद जरूरी था कि हम लोगों को बताएं कि आर्गेनिक खाद्य पदार्थों का सेवन ही क्यों जरूरी है। इसके लिए हमने लोगों को मांडया में बुलाकर उन्हें इस काम से जोड़ने की सोची। जिन लोगों की खेती में रुचि है या जो प्रकृति के साथ रहकर अपना समय बीताना चाहते हैं, उन्हें आमंत्रित किया गया। मधुचंद्रन का यह आइडिया काम कर गया है, चार महीनों के अंदर उनकी सोसायटी ने एक करोड़ रुपये का बिजनेस किया है, किसानों की आर्थिक स्थिति सुधर गई है, वे अपने कर्ज चुका पा रहे हैं, उनकी जिंदगी में बदलाव आ गया है।

इसके लिए उन्होंने “फार्म शेअर” नाम का प्रोग्राम शुरू किआ जिसमे वह शहर में रहने वाले परिवारों को 35000 \ रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से जमीन मुहैया करवाते है।यहाँ पर लोग खुद के लिए और परिवार के लिए आधे से 2 एकड़ तक जमीन किराये पर लेते है  ।उनकी मदद के लिए एक गांव का एक किसान हर वक़्त उनके साथ रहता है और खेतीबाड़ी में शहरी परिवार की मदद करता है ।

तीन महीने बाद परिवार की मर्जी हो तो वो उत्पाद बाजार में बेच सकता है और अगर चाहे तो अपने लिए भी रख सकता है । इस प्रोग्राम की खासियत यह है यहाँ पर लोग ख़ुशी -ख़ुशी काम करते है जिस के लिए खेत एक मौजमस्ती और पिकनिक मानाने की जगह बन गया है ।

मधुचंद्रन का यह आइडिया काम कर गया है, चार महीनों के अंदर उनकी सोसायटी ने एक करोड़ रुपये का बिजनेस किया है, किसानों की आर्थिक स्थिति सुधर गई है, वे अपने कर्ज चुका पा रहे हैं, उनकी जिंदगी में बदलाव आ गया है।

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