चौथी क्लास में तीन बार फेल होने वाला आज दे रहा है दे रहे 700 को रोजगार

छत्तीसगढ़ के दुर्ग के सिरसा के किसान अशोक चंद्राकर चौथी क्लास में तीन बार फेल हो गए, तो 12 साल की उम्र में सब्जी बेचनी शुरू की। वे गली-गली घूमकर सब्जी बेचा करते थे। आज उनके पास 100 एकड़ जमीन है और रेंट के खेतों को मिलाकर कुल 900 एकड़ में खेती करते हैं। उन्होंने करीब 700 से ज्यादा लोगों को रोजगार भी दिया है।

अलग-अलग देशों में 10 करोड़ की सब्जियां कर रहे सप्लाई…

आज अशोक सालाना 10 करोड़ की सब्जियां देश के अलग-अलग हिस्सों में सप्लाई करते हैं। 1973 में जन्मे अशोक का पढ़ाई में मन लगा नहीं, इसलिए उन्होंने काम में मन लगाया। उनके माता-पिता गांव के ही एक घर में काम किया करते थे। अशोक ने 14 साल की उम्र में नानी से एक खेत बटाई पर लेकर सब्जी उगानी शुरू की। इसे वे खुद घूम-घूमकर चरोदा, सुपेला भिलाई, चंदखुरी की गलियों में बेचते। इसी पैसे से पहले तीन, फिर चार, पांच आगे चलकर दस एकड़ खेत रेघा में ले लिया। उनका कारोबार बढ़ने लगा।

इन जगहों पर है जमीन

अशोक के पास आज सौ एकड़ की मालिकाना जमीन सिरसा, तर्रा सहित कई जगहों पर है। इसके अलावा नगपुरा, सुरगी, मतवारी, देवादा, जंजगीरी, सिरसा जैसे गांवों में बटाई की जमीन है, जिस पर सब्जियां उगाई जा रही हैं। इसमें नगपुरा में सबसे अधिक दो सौ एकड़ पर टमाटर लगा है। आज उनके पास 25 से ज्यादा ट्रैक्टर व दूसरी गाड़ियां हैं। आधुनिक मशीनें हैं, जो दवा छिड़काव से लेकर सब्जियों को काटने का काम करती हैं।

मेहनत का कोई विकल्प नहीं

अशोक के मुताबिक, आजकल लोग शॉर्टकट के चक्कर में रहते हैं, अगर आप किसी प्लान पर लगातार चलते हैं और इंतजार करते हैं, तो आपको रिजल्ट जरूर मिलेंगे। मेहनत का कोई ऑप्शन हो ही नहीं सकता। कल तक मैं दो-दो हजार के लिए तरसता था और आज 15-15 हजार रुपए वेतन दे रहा हूं।

“गेहू को लम्बे समय तक परम्परागत तरीके से सुरक्षित कैसे रखे, जानिए”

मित्रों अभी गेंहू की फसल खेतो में तैयार हो गयी है। यदि हमें इसे लंबे समय तक भंडारण कर के सुरक्षित रखना हे तो कुछ परम्परागत और घरेलू तरीके बताने जा रहा हूँ।
ताकि गेहू को लंबे तरीके तक सुरक्षित रह सके।

गेहू के ख़राब होने के कारण:-

  • कच्ची गेहू की बालियों को का काटना
  • कवक का लगना
  • किट भृग और पतंग आटा घुन
  • चूहे के द्वारा

दोस्तों सबसे पहले जब भी हम खेत में फसल से गेहू को निकाले तब सबसे कोशिश करे की पूर्ण रूप से सूखे हो ।
यहाँ पर एक और परम्परागत बात बताना चाहुगा जो मुझे मेरे परिवार के बुर्जगो ने बतायी है की कभी भी रस के दिनों में गेहू कटाई ना करें और ना ही भंडारण करें
रस के दिनों का मतलब होता है। माह में जो तिथियाँ होती है जैसे ग्यारस,तेरस,चोहदस आदि जिनके पीछे रस लगा हो ।
इन दिनों को छोड़कर कटाई और भण्डारण करने पर गेहू को लंबे समय तक सुरक्षित रहता है ये मैने खुद भी प्रयोग कर के देखा है।
अब हम जानेंगे कैसे गेहू को परम्परागत तरीकों से ज्यादा समय तक सुरक्षित रखे।

 धुप में सुखा कर:-

  • यह एक बहुत सरल और अच्छी विधि हे। इसमे गेहू को धुप में फैला कर अच्छे से 1और 2 दिन तक सुखा लेने से कीटो में होने वाली प्रजनन क्रिया रुक जाती है। यदि आप अप्रैल मई में तेज़ धूप में सुखाते है तो और ज्यदा लाभ मिलता है।

 नीम की पत्तियों से :-

  • नीम में बहुत ही औषोधीय गुण होते है। नीम की पत्तियो को छाव में सुखाकर उन्हें गेहू के साथ मिलाकर अनाज की पेंटी में रख देते हे तो काफी समय तक वो कीटो और कवक से गेहू को सुरक्षित रखता है।
  • ज्यदातर ग्रामीण इसी विधि का उपयोग करते है।

पैक ढांचे की सफाई और कीटाणु नष्ट कर के:-

अधिकतर खाने के लिए गेहू को बंद पेटी या घर में बनी दी वालों की पेटी में रखा जाता है। जब भी आप उसमे अनाज भरे पहले उसे अच्छे से साफ कर ले पुराने अनाज के दाने निकाल ले उसे कुछ दिन ख़ाली रखे ताकि नमी नष्ट हो जाये फिर उसमे नीम के तेल का दिया लगा कर पैक कर दे ताकि उसमे सारे कीटाणु नष्ट हो जाये उसके बाद उस दिए को निकाल ले फिर भंडारण करे।

माचिस की डिब्बियों का उपयोग:-

अनाज की पेंटी के मध्य और ऊपरी सतह पर 5 या 7 माचिस की डिब्बिया रख दी जाती हे । जिससे माचिस की तिल्लीयो में फास्फोरस लगा होने से कीटो की व्रद्धि रुक जाती हे यह उपयोग खाने वाले गेहू के लिए सीमित मात्रा में ही करना चाहिए ।

 लहसुन के द्वारा :-

लहसुन की तीव्र गन्ध से कीड़े अनाज के पास नही आ पाते हे आप लसुन के गुच्छओ को सतह पर रख सकते है।

 हल्दी मिला कर:-

  • गेहू में हल्दी मिला कर भी लंबे समय तक उसे सुरक्षित रख सकते हे उसके लिए 100किलो गेहू में 2 से  किलो तक हल्दी काफी होती हे ।और खाने के हिसाब से भी सुरक्षित होती हे।
  • ये सारी विधिया गेहू को खाने के लिए इस्तेमाल करने के लिए पारम्परिक तरीके है । ताकि किसी भी प्रकार का नुक्सान ना हो ।

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ऐसे करे कीवी की खेती , 1 एकड़ से कमाए 8 लाख रुपये


कीवी का उत्पति स्थल चीन है, हालांकि कीवी को चीन के अलावा न्यूजीलैंड, इटली, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, पाकिस्तान, ईरान,नेपाल, चिली, स्पेन और भारत में भी उगाया जा रहा है.

भारत में इसकी खेती हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, मेघालय , सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर के पहाड़ी क्षेत्रों में उगाया जा रहा है. इसकी खेती मैदानी राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, केरल में भी की जाने लगी है. इस फल को 1000 मीटर से 2500 मीटर की समुन्द्र तल से ऊँचाई पर उगाया जा सकता है.

किस्में : इसकी प्रचलित किस्मों में अब्बोट, अलिसन, ब्रूनो, हेवर्ड और तोमुरी हैं.

कैसे उगायें :  कीवी का पौधा एक बेल होती है जो 9 मीटर तक बढ़ सकती है और यह 4 से 5 वर्ष के बाद फल देना शुरू कर देती है. फूल आने से फसल पकने तक की अवधि लगभग 100 दिन होती है. यह एकलिंगी पौधा होता है, इसलिए मादा कलमों के साथ नर की जड़ित कलमों को लगाया जाता है ताकि अच्छी तरीके से परागण हो सके और ज्यादा उत्पादन लिया जा सके.

आठ मादा बेलों के लिए एक नर बेल आवश्यक होती है. इसकी कलमों को बसंत ऋतु में लगाया जाता है. इसको अंगूर की तरह ही ढाँचे पर चढ़ाना चाहिए. इसकी कटाई-छटाई गर्मी और सर्दी दोनों मौसम में करनी चाहिए ताकि ज्यादा उत्पादन लिया जा सके. कीवी को पाले से बचाना बहुत जरुरी होता है. इसके फल नवम्बर महीने से पकने शुरू हो जाते हैं. कीवी को काफी पानी की आवश्यकता होती है इसलिए सिंचाई का उचित प्रबंध होना चाहिए.

500 ग्राम एनपीके मिश्रण प्रत्येक वर्ष प्रति बेल 5 साल की उम्र तक देना चाहिए उसके बाद 900 ग्राम नाईट्रोजन, 500 ग्राम फोस्फोरस और 900 ग्राम पोटाश को प्रति वर्ष प्रति बेल देना चाहिए. जड़ गलन से बचाने के लिए बाविस्टिन 2 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से पौधों में देना चाहिए. इसके फल औसतन 80 से 90 ग्राम के होते हैं.

इसके फलों को 0 डिग्री तापमान पर कोल्ड स्टोरेज में 4 से 6 महीने रखा जा सकता है पर सामान्य अवस्था में 8 हफ्ते तक फल ख़राब नहीं होता है. एक बेल से प्रत्येक वर्ष 40 से 60 किलो फल मिलते हैं. इसकी औसतन पैदावार 20 से 25 टन प्रति हेक्टेयर है. फलों को बाजार में भेजने से पहले 3 से 4 किलो की क्षमता वाले कार्ड बोर्ड में पैक करना चाहिए .बाजार के औसत भाव को देखते हुए 1 एकड़ बगीचे से लगभग 8 लाख रुपए प्रति वर्ष कमाये जा सकते हैं.

कलम मिलने के स्थान :

  • डॉ.वाई.एस. परमार यूनिवर्सिटी ऑफ़ हॉर्टिकल्चर एंड फॉरेस्ट्री, नौनी जिला सोलन हिमाचल प्रदेश,01792 252326, 252310
  • शेख गुलज़ार, श्री नगर, जम्मू कश्मीर , 9858986794

कीवी खाने के लाभ :

कीवी में विटामिन सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है. यह अनिंद्रा रोग को दूर करता है और पाचन क्रिया को सही करता है. आयरन का भी बेहतरीन स्त्रोत है.

कृषि यंत्रों पर सब्सिडी चाहिए तो पढ़े ये लेख…

किसानों की आय को बढाने के लिए वैसे तो हर कोई प्रयास कर रहा है. फिर चाहे सरकारी तंत्र हो या फिर निजी क्षेत्र की कंपनिया हो सभी किसानों की आय को बढाने के लिए प्रयास कर रहे हैं. लेकिन किसानों की आय बढाने के लिए जरुरी है उनके पास आधुनिक कृषि यंत्रों का होना. जो कंपनियां कृषि के अच्छे कृषि यन्त्र बना रही है, वो थोड़े महंगे होने की वजह से किसान उनको आसानी से नहीं खरीद पाता है. क्योंकि जब भी किसान उस कृषि यंत्र को खरीदने की सोचता है तो उससे पहले अपनी जेब देखता है.

लेकिन इन बड़ी कृषि मशीनों पर सरकार की और से अनुदान भी दिया जा रहा है, ताकि किसान अच्छे कृषि यंत्रों को आसानी से खरीद सके. लेकिन अधिकतर किसान इससे अनभिज्ञ है. उसको पता ही नहीं है कि सरकार द्वारा कृषि यंत्रो पर कोई अनुदान भी दिया जा रहा है या नहीं. और जिनको पता है वो किसान यह नहीं जानते की उनको किससे संपर्क करना है. बहरहाल इसके दो तरीके है जिससे किसानों को कृषि मशीनरी पर अनुदान की पूरी जानकारी उपलब्ध हो सकती है.

सरकारी तरीका :

यदि कोई किसान नया कृषि यन्त्र खरीदना चाहता है सबसे वो सबसे पहले तो यह सुनिश्चित करले कि उसको किस कंपनी का कृषि यन्त्र खरीदना है. उसके बाद किसान उस कृषि यंत्र पर अनुदान की जानकारी के लिए अपने जिले या ब्लाकस्तर के कृषि कार्यालय पर संपर्क करे. वहां से अनुदान की पूरी प्रक्रिया को समझे. उसके बाद ही उस कृषि यंत्र को ख़रीदे. यदि कोई भी कृषि अधिकारी जानकारी देने में जरा भी आनाकानी करता है तो इसके लिए जिलास्तर पर कृषि अधिकारीयों से मुलाकात कर किसान अपनी समस्या बता सकते है. किसान को कृषि यंत्रों के विषय में पूरी जानकारी जिला और ब्लाकस्तर कृषि कार्यालय पर आसानी से मिल जाएगी.

कृषि यंत्र डीलर द्वारा जानकारी :

नकारी:यदि किसान किसी भी यन्त्र को खरीदने की योजना बना रहा है. इसके लिए किसान को चाहिए की वो किसी अधिकृत कृषि यंत्र डीलर से ही ख़रीदे. इससे किसान को फायदा होगा. सबसे पहले सरकार द्वारा कृषि यंत्रों पर दी जाने वाली अनुदान राशी के विषय में किसान को सही जानकारी उस डीलर के पास से मिलेगी. दूसरा वह उत्पाद जो किसान खरीद रहा है. वह गुणवत्ता वाला होगा और उत्पाद की सही जानकारी के साथ लम्बे समय तक उसकी सर्विस की वारंटी भी मिलेगी.

सरकार द्वारा किन कृषि यंत्रों पर है सब्सिडी :

वैसे तो लगभग सभी कृषि यंत्रों पर सरकार द्वारा सब्सिडी दी जाती है. लेकिन यह राज्य सरकार पर भी निर्भर करता है कि वो किन कृषि यंत्रों पर सब्सिडी दे रही है. किसान सरकार द्वारा मैनुअल स्प्रेयर्स, पावर नैपसेक स्पेयर्स, मल्टीक्राप प्लांटर, सीडड्रिल, रोटावेटर, जीरोटिल मल्टीक्राप प्लांटर, पंपसेट, मल्टीक्राप थ्रेसर, रिज फैरो प्लांटर, ट्रैक्टर माऊंड स्पेयर्स, स्प्रिंकलर सेट, बखारी, एचडीपीई पाइप, पीवीसी पाइप, एचडीपीई लैमिनेटेड पाइप, बड़े तिरपाल, छोटा तिरपाल जैसे कृषि यंत्रों पर अनुदान पा सकते हैं।

सरकार द्वारा कितनी सब्सिडी दी जाती है :

सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी राज्य सरकारों पर निर्भर करती है. क्योंकि हर एक राज्य के कृषि विभाग की अलग योजना है जिसके हिसाब से अनुदान दिया जाता है. वैसे ज्यादातर राज्यों में 30 प्रतिशत से 50 प्रतिशत का अनुदान कृषि यंत्रों पर दिया जाता है.

किसान के बेटे ने पिता के लिए बनाया Remote से चलने वाला ट्रैक्टर

भारत में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, ये बात अक्सर लोग कहते हैं, साथ ही ये भी कहा जाता है कि भारत में प्रतिभाओं को उचित मंच नहीं मिल पाता है। उसके बाद भी अक्सर आप देखते होंगे कि प्रतिभा अपने आप चमक बिखेर देती है। कुछ बड़ा या फिर नया करने के लिए जरूरी नहीं कि आप किसी बड़े संस्थान में पढ़ाई करें, जो काम आईआईटी के छात्र नहीं कर सकते हैं वो काम एक किसान के बेटे ने कर दिखाया है। उसकी प्रतिभा का डंका आज पूरे देश में बज रहा है।

राजस्थान के बारां जिले के बमोरीकलां गांव में एक किसान के बेटे ने जो कारनामा किया है उस से उसके पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो गया है। 19 साल का ये युवक लगातार नए आविष्कार करने में लगा रहता है। उस ने अब जो चीज तैयार की है उस से खेती काफी आसान हो सकती है। छोटी सी उम्र में इस युवक ने अपनी बुद्धि के बल पर 27 से अधिक आविष्कार किए हैं। इस लड़के का नाम योगेश कुमार है। इसके आविष्कार देख कर आईआईटी में पढ़ने वाले लोग भी हैरान हैं। योगेश नागर फिलहाल मैथ्स से बीएससी कर रहा है। वो फर्स्ट ईयर का स्टूडेंट है।

योगेश के पिता राम बाबू नागर 15 बीघा जमीम पर खेती करते हैं. इसी से परिवार का खर्चा चलता है। अपने पिता की मुश्किलों को देख कर योगेश ने कुछ ऐसा करने की ठानी जिस से उनका काम आसान हो जाए, इसके लिए वो लगातार काम कर रहा था। उसके पिता को ट्रैक्टर चलाते समय पीठ में दर्द की शिकायत होती थी। पिता की तकलीफ को दूर करने के लिए योगेश ने रिमोट ऑपरेटिव सिस्टम डेवलप किया है। इससे खेत में एक जगह बैठकर रिमोट से ट्रैक्टर चलाकर जुताई की जा सकती है। बिना ड्राइवर के ट्रैक्टर को चलता देखकर गांव वाले भी हैरान रह जाते हैं।

अब योगेश के पिता का काम काफी आसान हो गया है। वो एक जगह खड़े हो कर ट्रैक्टर चलाते हैं। इस से उनका समय भी बचता है और पीठ दर्द की शिकायत से भी मुक्ति मिल गई है। योगेश के इस आविष्कार से गांव के लोग भी हैरान हैं, उनका कहना है कि योगेश में बहुत प्रतिभा है, उसे सही मार्गदर्शन मिले तो वो भारत का नाम रोशन कर सकता है। अब योगेश की चर्चा पूरे देश में हो रही है। रिमोट से ट्रैक्टर चला कर योगेश ने वो कारनामा किया जिस से भारत के किसानों की काफी मदद हो सकती है।अब योगेश को उम्मीद है कि उनके पिता को खेती के दौरान आने वाली समस्याओं का सामना नहीं करकना पड़ेगा।

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क्या अब धान की फसल लेने वाले किसान जाएंगे जेल?

मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार में किसानों के लगातार प्रदर्शन की खबरें तो आपने पढ़ी होंगी लेकिन प्रदेश सरकार अब ऐसा कदम उठाने जा रही है जिससे शिवराज सरकार फिर सुर्खियों में आ सकती है। राज्य प्रशासन ने गर्मी के मौसम में धान की फसल लेने वाले किसानों को उनकी जगह दिखा दी है।

दरअसल शुक्रवार को यहां संभागायुक्त टीसी महावर की अध्यक्षा में जल उपयोगिता समिति की बैठक हुई। जिसमें राज्य शासन के निर्देशों का हवाला देते हुए प्रशासनिक अमले से दो टूक कहा कि जलाशयों में उपलब्ध पानी सबसे पहले उद्योगों को दें। मनाही के बाद भी अगर किसान धान की फसल लेते हैं तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जिले में इस बार बहुत कम बारिश के कारण बांधों व जलाशयों में पानी की उपलब्धता बीते वर्ष की तुलना में कम है। राज्य शासन की चिंता इस इस बात को लेकर है कि जिले में संचालित होने वाले उद्योगों को अगले बारिश के मौसम में पानी की आपूर्ति हो पाएगी या नहीं शुक्रवार को बैठक के दौरान राज्य सरकार की चिंता की झलक दिखाई दी।

बैठक के दौरान पूरे समय इसी बात को लेकर चर्चा होती रही कि किस जलाशय में कितना पानी है। जिले में स्थापित उद्योगों को उनकी मांग के अनुसार पूरे गर्मी भर पानी दे पाएंगे या नहीं। जल भराव का आंकलन करने के बाद कमिश्नर ने कहा कि बांधों व जलाशयों में पानी का पहला उपयोग उद्योगों का होगा। इसके बाद पेयजल आपूर्ति के लिए रिजर्व वाटर रखा जाएगा। रिजर्व वाटर के बाद अगर जलाशयों व बांधों में पानी बच पाता है तो रबी फसल के रुप में दलहन व तिलहन की खेती करने वाले किसानों को जल आपूर्ति की जाएगी।

बैठक में कमिश्नर ने साफ कहा कि जल्द ही कृषि, सिंचाई व पीएचई विभाग के अधिकारियों की बैठक कर स्थिति के अनुसार जल भराव क्षेत्र घोषित करने और भूजल स्तर के दोहन को रोकने के लिए कड़े कानून बनाए जाए।

संभाग के चार वृहद जलाशयों मिनीमाता हसदेव बांगों, खारंग जलाशय, मनियारी जलाशय और केलो परियोजना तथा मध्यम जलाशय घोंघा, मांड, केदार, पुटका, किंकारी और ख्महार पाकुट जलाशयों में वर्तमान में 64.23 प्रतिशत जल उपलब्ध है तथा 337 लघु जलाशयों में 25.9 प्रतिशत जल भराव स्थिति है।

ऐसे शुरू करें ड्रैगन फ्रूट की उन्नत खेती

 

एक ड्रैगन फलों के पेड़ मूल रूप से जीसस हीलोसेरियस का कैक्टस बेल है। यह मध्य अमेरिका के मूल निवासी है, लेकिन अब पूरी दुनिया में विशेषकर उष्णकटिबंधीय देशों में उगता है। यह एक बढ़ती हुई बढ़ती हुई बेल है जिसके लिए एक ऊर्ध्वाधर पोल का समर्थन करने के लिए बढ़ने की आवश्यकता होती है और फिर एक छाता जैसा गिरने के लिए एक अंगूठी होती है। इसमें 15-20 साल का जीवन काल है, इसलिए पोल और रिंग का उचित चयन महत्वपूर्ण है।

एक मजबूत और स्थायी समर्थन सुनिश्चित करने के लिए विशेष आरसीसी पोल लगाए गए हैं आमतौर पर चार पोल प्रति पोल को अधिकतम उपज देने के लिए लगाए जाते हैं। कटाई और रखरखाव के काम के दौरान उचित ध्रुव को पोल और पंक्ति अंतर को रोके रखा जाता है। प्रत्येक व्यक्ति के वृक्षारोपण की मिट्टी और पानी की संपत्ति के अनुसार मूल पोषक तत्व और उर्वरक समय-समय पर लागू होते हैं। धातु तैयार करने से बचा जा सकता है क्योंकि इससे पौधों को धूप / गर्मी जल जाती है।

उष्णकटिबंधीय मौसमों में आम तौर पर उत्तर-दक्षिण पंक्तियों को प्राथमिकता दी जाती है, जहां गर्मियों में तापमान 40 डिग्री से ऊपर होता है। अधिक धूप की गर्मी का कारण सूर्य की रोशनी हो सकती है लेकिन उपचारात्मक कदम आसानी से स्थानीय रूप से उपलब्ध हैं। इस संयंत्र से ज्यादा बीमारी का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, आम समस्याओं जैसे जड़ सड़ांध, धूप की कालिमा, पक्षी हमलों आदि का आसानी से ध्यान रखा जा सकता है।

ड्रैगन फलों – पिठया, 21 वीं सदी की ‘आश्चर्यजनक फल’ भारतीय उद्यान परिदृश्य में एक क्रांति में रिंग के लिए सेट है। यह किसानों और उपभोक्ताओं के लिए एक बून है मूल रूप से मध्य अमेरिका से यह सफलतापूर्वक थाईलैंड, मलेशिया, वियतनाम, श्रीलंका, बांग्लादेश में वाणिज्यिक रूप से उगता है और भारत में हमारे दरवाजे पर अब दस्तक दे रहा है।

मुख्य विशेषताएं:

  • किसी भी प्रकार की मिट्टी में बढ़ता है
  • पानी की न्यूनतम आवश्यकता
  • रखरखाव की न्यूनतम आवश्यकता
  • भारतीय जलवायु स्थितियों को सहिष्णु बना सकता है
  • 2 एनडी / 3 आरडी वर्ष में निवेश रिटर्न
  • अधिक प्रसार / पुनर्विक्रय के लिए कटिगों का उपयोग किया जा सकता है
  • स्थानीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में भारी मांग
  • मूल्य संवर्धन उत्पाद कमांड प्रीमियम दरें

मिट्टी:

ड्रैगन फलों के पौधे किसी भी प्रकार की मिट्टी को बर्दाश्त कर सकते हैं, हालांकि वे अच्छी तरह से मिट्टी में सूखने में अच्छी तरह से बढ़ते हैं। जल को बनाए रखने वाली मिट्टी जड़ सड़ांध का कारण बन सकती है और इस घातक कारक से बचने के लिए, जल निकासी की सुविधा के लिए मिट्टी को रेत या छोटे पत्थर के कंकड़ों से मिलाया जा सकता है।

जलवायु:

भारत एक उष्णकटिबंधीय देश है, जिसमें हर साल मध्यम जलवायु होती है। ड्रैगन फल उष्णकटिबंधीय मौसम के लिए अच्छी तरह से अनुकूल है। चरम भारतीय मौसम के लिए मामूली समायोजन जहां तक ​​जलवायु स्थितियों का संबंध है, सभी बाधाएं दूर कर सकते हैं।

सिंचाई:

अन्य फसलों / फलों की तुलना में कैक्टस होने के कारण ड्रैगन फल को कम पानी की आवश्यकता होती है। यह महीनों के लिए पानी के बिना जीवित रह सकता है सिंचाई का सर्वोत्तम अनुशंसित तरीका ड्रिप सिंचाई है। बाढ़ से सिंचाई की सिफारिश नहीं की जाती क्योंकि यह पानी बर्बाद करता है और फूस का काम बढ़ाता है। प्रति दिन लगभग 1 से 2 लीटर पानी प्रति संयंत्र प्रतिदिन गर्मियों / सूखे दिनों के दौरान पर्याप्त है। आपकी मिट्टी, जलवायु और पौधे स्वास्थ्य के आधार पर जल की आवश्यकता बढ़ सकती है या कम हो सकती है

उपज और अर्थशास्त्र:

पौधरोपण के बाद 18-24 महीनों के बाद ड्रैगन फल सामान्य रूप से फल होता है। यह एक वनस्पति फल पौधे है, जो आम तौर पर मानसून के दौरान या बाद में फलों के फल के साथ होता है। यह एक सीजन के दौरान 3 से 4 तरंगों में फल होता है। प्रत्येक ध्रुव का फल प्रति लहर लगभग 40 से 100 फल होता है। प्रत्येक फल का वजन लगभग 300 से 1000 ग्राम होता है। एक पोल आम तौर पर लगभग 15 से 25 किलोग्राम फल पैदा करता है। (60 / 80kgs प्रति पोल की खेती भारत में दर्ज की गई है) इन फलों को बाजार में 3 से 400 रुपये प्रति किलोग्राम में बेची जाती है, लेकिन सामान्य फार्म की दर लगभग रु। 125 से 200 रुपये प्रति किलो

वार्षिक आय की एक सामान्य गणना शायद इस प्रकार की गणना की जा सकती है:
एक एकर x 300 पोल एक्स 15 किग्रा (कम) x रु .25 (न्यूनतम) = रु। 5,62,500 = 00 प्रति एकड़ प्रति वर्ष

ध्यान दें:

  • सभी गणना अच्छी तरह से बनाए गए खेत के लिए हैं
  • सभी उपरोक्त गणना सबसे कम ओर हैं
  • एक एकड़ में 400 पोल भी हो सकते हैं
  • उचित खेती के तरीके / पोषक तत्व अधिक पैदावार दे सकते हैं
  • उचित विपणन नेटवर्क या निर्यात बेहतर दरें ला सकते हैं
  • नाइट लाइटिंग पद्धति फ्राईटिंग के अतिरिक्त तरंगों को दे सकती है
  • मूल्य अतिरिक्त उत्पाद उच्च रिटर्न प्राप्त करेंगे

भारत में खेती की स्थिति और मांग:

महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु के राज्यों में बहुत कम किसानों ने भारत में दार्गन फलों की खेती की है। ड्रैगन फलों की खेती का कुल अखिल भारतीय क्षेत्र शायद 100 एकड़ से कम हो। भारत में इसके फल, पोषण और औषधीय गुणों के लिए जागरूकता और मांग बहुत बड़ी है। भारत थाईलैंड, मलेशिया, वियतनाम और श्रीलंका से इसकी आवश्यकता का 95% आयात करता है। इस फल में खाड़ी, यूरोपीय संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका के निर्यात के लिए भी काफी संभावना है।

अब इस मोबाइल ऐप से मिंटों में करें जमीन को नापने का मुश्किल काम

अगर आप अपने खेत ,प्लाट ,दुकान जा किसी और चीज जो नापना चाहते है तो आप सिर्फ एक मोबाइल के साथ कर सकते है और वो भी बहुत आसानी और सटीकता के साथ । बस उसके लिए आपके फ़ोन में मोबाइल इंटरनेट और जीपीएस सिस्टम होना चाहिए । जो की अब लगभग हर मोबाइल फ़ोन में होता ही है । जमीन को नापने के लिए बस आपको एक ऐप अपने फ़ोन पर करनी होगी और उसके बाद जिस जमीन को नापना है । उसके इर्द गिर्द चक्र लगाना है बस बाकि बाकि का काम ऐप ही करेगी ।

सबसे पहले Google Play Store पर जा कर “Distance and area measurement ” ऐप इंसटाल करो इस ऐप की रेटिंग 4.1 है जो काफी अच्छी है । उसके बाद इसका जीपीएस सिस्टम ऑन करें ।अब ऐप को OPEN करें ।

उसके बाद Distance : के लिए मीटर,फ़ीट ,यार्ड आदि में से चुने ,आप फ़ीट चुन सकते है क्यूंकि ज्यादतर हमारे ये ही इस्तेमाल होता है । अब अगर अपने अपने खेत का ज़मीन नापना है तो Area : के लिए acre चुने । एक और ऑप्शन Logging है जिसे Auto पर रहने दे ।

अब इसमें एक स्टार्ट का बटन दिया हुआ है उसको दबा कर जिस जमीन को नापना है उसके इर्द गिर्द पूरा एक चक्र लगायें । ध्यान रहे जिस जगह को नापना है उसके किनारों पर बिलकुल साथ साथ चलें नहीं तो एरिया ज्यादा आ ज्यागा । जहाँ से आप ने चलना शुरू क्या था वहां तक चक्र पूरा करें । बस जैसे ही आप चक्र पूरा करेंगे साथ की साथ आप को पता चल जायगा की टोटल एरिया कितना है ।

वैसे तो यह ऐप बहुत हद तक बिलकुल सही एरिया बताती है लेकिन कभी कभी इंटरनेट ठीक ना चलने के वजह से थोड़ी बहुत गड़बड़ हो जाती है इस लिए इस ऐप का का प्रयोग सिर्फ कच्चा अंदाज़ा लगाने के लिए करें । कल जब आप खेत जायेंगे तो इसका इस्तेमाल कर अपना खेत जरूर नाप के देखना ।

इस किसान से सीखें 2 एकड़ में 30 फसलें उगाने का फार्मूला,एक साल में कमाता है 22 लाख

ऐसे में जब खेती घाटे का सौदा बनकर रह गई है, अगर कोई खेती से एक साल में 22 लाख कमाने का दावा करे तो आसानी से भरोसा नहीं होता, लेकिन यह सच है। कर्नाटक के बेंगलुरु में एक किसान हैं एच. सदानंद, जो ऐसा करके दिखा रहे हैं। उनके पास केवल 2.1 एकड़ या लगभग 5.2 बीघा जमीन है। मतलब जमीन के क्षेत्रफल के लिहाज से उनकी हैसियत एक सीमांत किसान की है, लेकिन वह इतनी जमीन में ही लगभग 30 तरह की फसलें उगाकर सालाना 22 लाख रुपये कमा रहे हैं।

मुनाफे का गणित

वह ऐसा कैसे कर पाते हैं? यह पूछने पर सदानंद कहते हैं, “मेरी पॉलिसी एकदम साफ है। मैं मानकर चलता हूं कि मुझे अपने फॉर्म से हर रोज, हर हफ्ते, हर महीने, हर तीन महीने, हर छह महीने और हर साल आमदनी होनी चाहिए। अपने इसी सूत्र के हिसाब से मैं तय करता हूं कि मुझे अपनी जमीन पर कौन सी खेती करनी है।“ सदानंद आगे कहते हैं, “इसके लिए मैं पॉली हाउस (पॉलिथीन से बना एक किस्म का ग्रीन हाउस) में फल, फूल, देशी-विदेशी सब्जियां उगाता हूं। साथ में गाय-भैसें, सुअर, कुत्ते, मुर्गियां और मछली भी पालता हूं।“

आम के आम गुठलियों के दाम

इस तरह सदानंद की रोजाना आमदनी मुर्गियों और गाय-भैंसों से मिलने वाले अंडे और दूध से होती है, वहीं उन्हें हर हफ्ते फूलों से, हर तीन महीने पर सब्जियों से और हर छह महीने पर फलों से कमाई होती है। लेकिन मुनाफा यहीं नहीं रुकता, मतलब सदानंद आम के आम और गुठलियों के दाम भी वसूलते हैं। वर्मी कंपोस्ट, गोबर और बीट से उन्हें लगभग फ्री में खाद मिल जाती है, साथ में गोबरगैस भी बनती है, इस तरह खेती पर लागत और कम हो जाती है। सदानंद कहते हैं, सबसे अहम बात यह है कि मुझे और मेरे परिवार को शुद्ध और स्वास्थ्यवर्धक भोजन मिलता है।

पहले नौकरी करते थे फिर बने किसान

सदानंद शुरू में 15 सालों तक एक प्राइवेट फैक्ट्री में काम करते रहे। वह कहते हैं, “मैंने देखा कि व्यापारी खेती की जमीन तो खरीदते थे, लेकिन उनकी रुचि खेती में बिल्कुल भी नहीं होती थी। वे केवल निवेश के नजरिए से जमीन में पैसे लगाते थे। वहीं मेरा मन नौकरी की जगह खेती में लगता था। कुछ समय मैंने नौकरी के साथ खेती की पर बाद में नौकरी छोड़कर पूरी तरह किसान बन गया। यह मेरे जीवन का सबसे अच्छा फैसला था।“

ढेरों फसल और नित नए प्रयोग

दरअसल सदानंद की इस कामयाबी का राज है बहुफसली तकनीक। वह आधे एकड़ में टमाटर और सुपारी की खेती करते हैं। टमाटर से उन्हें 2 लाख और सुपारी से 50 हजार की आमदनी होती है। सुपारी के साथ सदानंद ने अदरक उगाने का सफल प्रयोग किया और उनसे एक साल में 70 हजार रुपये कमाए।

पालते हैं गिरिराजा नस्ल की मुर्गियां

अपने फार्म पर सदानंद गिरिराजा नस्ल की 250 मुर्गियां भी पालते हैं। इन मुर्गियों की खासियत है कि इस नस्ल में रोगों से लड़ने की काफी क्षमता होती है। इसके अलावा ये खेतों से निकलने वाले कूड़े-करकट को भी खा जाती हैं। सदानंद मुर्गियों को हर तीसरे महीने बेचकर साल में एक लाख रुपये कमा लेते हैं। इन मुर्गियों से निकली बीट सुपारी के पेड़ों के लिए बेहतरीन खाद भी साबित होती है।

और भी अपना रखे हैं तरीके

इसी छोटे से फार्म पर सदानंद ने गाय-भैसें भी पाल रखी हैं, जिनसे रोजाना 80 से 100 लीटर दूध मिलता है। यहीं एक छोटा सा तालाब है जिसमें रोहू और कतला मछलियां पाली गई हैं। मछलियों को तो बेचा जाता ही है, साथ ही इस तालाब में उगने वाले जलीय पौधे गाय-भैसों के लिए चारे के तौर पर इस्तेमाल होते हैं। इस तालाब से निकलने वाली गंदगी भी बहुत अच्छी खाद होती है। इतना ही नहीं इस फार्म पर सदानंद रॉटवीलर और ग्रेट डेन नस्ल के कुत्ते भी पालते हैं। इन्हें बेचकर उन्हें सालाना 1.2 लाख मिल जाते हैं।

गुलाब और सब्जियों की जुगलबंदी

सदानंद तीन-चौथाई एकड़ में 2 हजार गुलाबों की कलमें लगाते हैं। इनसे हर साल उन्हें 4 लाख रुपये मिल जाते हैं। एक चौथाई एकड़ में सदानंद ने ग्रीनहाउस बना रखा है जिसमें वह छह महीने गुलाब की एक किस्म बटन रोज और बाकी के छह महीने शिमला मिर्च, ब्रॉकली व सलाद पत्ता लगाते हैं। बटन रोज का चुनाव इसलिए किया गया क्योंकि इसमें ज्यादा कांटे नहीं होते और ये ऊंचे दाम पर बिकते हैं। इसके अलावा खाली जगह पर कॉफी, नारियल, कटहल, पपीते, चीकू, और नींबू उगाए गए हैं।

टेक्नोलॉजी ने बनाई राह आसान

जब सदानंद से पूछा गया कि अपने फार्म पर वह 30 तरह की अलग-अलग खेती कैसे कर पाते हैं तो उन्होंने कहा, “तकनीक के इस्तेमाल से।“ वह कहते हैं, “इससे मेरा काम जल्दी और आसानी से हो जाता है, साथ ही ज्यादा लोगों की भी जरूरत नहीं पड़ती। मैं दूध निकालने वाली मशीन, पावर वीडर जैसे यंत्रों के अलावा टपक सिंचाई, स्प्रिंकलर, रेन वॉटर हार्वेस्टिंग तकनीक का इस्तेमाल करता हूं। सब्जियों को ग्रीन हाउस में उगाता हूं जिससे फसलें तेज हवा, गर्मी व रोगों से बच पाती हैं।

पौधों की नमी बनी रहती है, जिससे कि उनसे मिलने वाली उपज की क्वॉलिटी अच्छी होती है। खुले में खेती करने की जगह ग्रीन हाउस में ज्यादा पैदावार मिलती है।“ ग्रीनहाउस में फसलें उगाने से पहले ही मैं खरीददारों से एग्रीमेंट कर लेता हूं, इसमें पहले से रेट तय कर लिए जाते हैं। सिंचाई बोरवेल से होती है, पानी को स्प्रिंकलर और टपक सिंचाई के जरिए फसलों तक पहुंचाया जाता है जिससे पानी की एक-एक बूंद का सदुपयोग होता है।

सरकार और बेंगलुरू यूनिवर्सिटी से मिली मदद

अपनी इस अनूठी पहल में सदानंद को सरकार से भी मदद मिली है। उनका ग्रीन हाउस 7 लाख की लागत से बनकर तैयार हुआ, इसमें 3 लाख रुपये सरकारी सब्सिडी के तौर पर मिले हैं। सदानंद समय-समय पर बेंगलुरू यूनिवर्सिटी से भी सलाह लेते रहते हैं। कृषि मंत्रालय सदानंद को कई बार सम्मानित भी कर चुका है। सदानंद की कामयाबी बताती है कि आज जरूरत है कि सही तकनीक और सूझबूझ से खेती की जाए। सदानंद देश के तमाम युवा और नई सोच वाले युवा किसानों के लिए एक सशक्त उदाहरण हैं।

देश में पहली बार उगेगा काला गेहूं ,दुगनी कीमत पर बिकेगा बाजार में

सात साल की रिसर्च के बाद नेशनल एग्री फूड बायोटेक्नोलाॅजी इंस्टीट्यूट (एनएबीआई) मोहाली ने ब्लैक व्हीट का पेटेंट करा लिया है। नाम दिया है ‘नाबी एमजी)। काले, नीले और जामुनी रंग में मिलने वाली ये गेहूं आम गेहूं से कहीं ज्यादा पौष्टिक है।

ये कैंसर, डायबिटीज, तनाव, मोटापा और दिल की बीमारियों की रोकथाम में मददगार साबित होगी। रोजाना खा सकते हैं। देश में पहली दफा ये पंजाब में उगाई जाएगी। हालांकि ट्रायल के तौर पर किसानों के जरिए इसका 850 क्विंटल उत्पादन किया जा चुका है। किसानों को भी इसका आम गेहूं के मुकाबिले दोगुना दाम मिलेगा। मोहाली में 2010 से चल रही रिसर्च साइंटिस्ट डाॅ. मोनिका गर्ग के नेतृत्व में की गई है।

शरीर से फ्री रेडिकल्स बाहर करता है

ब्लैक व्हीट में एंथोसाइनिन नामक पिग्मेंट आम गेहूं से काफी ज्यादा होता है। आम गेहूं में जहां एंथोसाइनिन की मात्रा 5 से 15 पास प्रति मिलियन (पीपीएम) होती है, वहीं ब्लैक व्हीट में 40 से 140 पीपीएम पाई जाती है। एंथोसाइनिन ब्लू बेरी जैसे फलों की तरह सेहत लाभ प्रदान करता है। एंथोसाइनिन एक एंटीआॅक्सीडेंट का भी काम करता है। यह शरीर से फ्री रेडिकल्स निकालकर हार्ट, कैंसर, डायबिटीज, मोटापा और अन्य बीमारियों की रोकथाम करता है। इसमें जिंक की मात्रा भी अधिक है।

कंपनियों से होगा करार

एनएबीआई ने ब्लैक व्हीट की मार्केटिंग के लिए बैंकिंग और मिलंग समेत कई बड़ी कंपनियों से करार करने की कार्रवाई शुरू कर दी है। डॉ. मोनिका गर्ग ने बताया, इसे उगाने के इच्छुक किसानों के लिए एनएबीआई जल्द ही वेबसाइट लांच करेगी। इस वेबसाइट पर किसान अप्लाई कर सकेंगे, जिन्हें बीज व अन्य सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी। किसानों की फसल भी एनएबीआई ही खरीदेगी।

ट्रायल पर 850 क्विंटल उगाई, किसानों को मिलेगा दोगुना रेट

टल उगाई, किसानों को मिलेगा दोगुना रेटएनएबीआई ने इसका उत्पादन गर्मी और सर्दी दोनों मौसम में किया है। सर्दी में यह फसल मोहाली के खेतों में उगाई गई, जबकि गर्मी में हिमाचल और केलोंग लाहौल स्पिति में। साइंटिस्ट डाॅ. मोनिका गर्ग ने बताया, इस साल विभिन्न किसानों के खेतों में 850 क्विंटल ब्लैक व्हीट उगाई है।

इसकी औसत उपज प्रति एकड़ 13 से 17 क्विंटल रही। सामान्य गेहूं की औसत उपज पंजाब में प्रति एकड़ करीब 18 से 20 क्विंटल है। किसानों को आम गेहूं मंडियों में बेचने पर न्यूनतम समर्थन मूल्य करीब 1625 रुपए प्रति क्विंटल मिलता है। जबकि ब्लैक व्हीट का रेट 3250 रुपए दिया गया है।