मुर्रा भैंसों का कमाल : ठेकेदारी छोड़ ये आदमी अब हर साल कर रहा लाखों की कमाई

भोपाल (मध्यप्रदेश) रेलवे की ठेकेदारी छोड़कर दूध का व्यापार शुरू करने फैसला थोड़ा रिस्की ही कहा जा सकता है। वो भी तब जब ठेकेदारी से अच्छी कमाई हो रही हो, बिजनेस भी जमा जमाया हो, लेकिन रतलाम के मांगरोल निवासी अनिल सिसौदिया ने ये दिखा दिया कि जब आपके हौंसले बुलंद हो तो आप हर कमा में सफलता के झंडे गाड़ सकते हैं।

सिसौदिया ने साबित कर दिया कि बिजेनस अगर सही प्लान से किया जाए तो असफलता की संभावना कम ही हो जाती है। सिसौदिया इस समय दूध बाजार के स्थानीय ब्रांड बन गए हैं। बड़े आराम से हर महीने 70 से 80 हजार की कमाई हो रही है। सिसौदिया ने यह कमाल मुर्रा भैंसों की दम पर किया है।

उनका डेयरी फॉर्म मांगरोल में आधुनिक श्री सांई डेयरी के नाम से प्रसिद्ध हो चुका है। सिसौदिया ने बताया कि इस बिजनेस की शुरुआत उन्होंने 8 मुर्रा भैंसों से की और नौ माह में 30 मवेशियों को आधुनिक डेयरी फॉर्म तैयार है। सिसौदिया अपनी आधुनिकता के लिए आसपास के कई जिलों में लोकप्रिय हैं।

देशाटन से आया विचार

सिसौदिया बताते है कि जब वे रेलवे की ठेकेदारी कर रहे थे तो कई प्रदेशों में जाना होता था। पंजाब और हरियाणा के डेयरी बिजनेस ने मुझे काफी प्रभावित किया। तभी मैंने सोच लिया था कि दूध का व्यापार करना है। योजना बनाई और एक साल में डेयरी फॉर्म बन गया।

16 सितंबर 2016 से मैंने अपने डेयरी की शुरुआत की। 25 लाख रुपए लगाकर मैंने बिजनेस शुरू किया। इससे कम पैसे भी ये बिजनेस शुरू किया जा सकता है। पहले 8 मुर्रा भैंस हरियाणा से लेकर आया। अब मेरे पास 30 मवेशी हैं। एक भैंस की कीमत 90 से 1.5 लाख के बीच है। डेयरी में पूरा सिस्टम अत्याधुनिक है।

उच्च प्रजाति दुधारू पशु (मुर्रा बफेलो) द्वारा दूध में ज्यादा कैल्शियम और प्रोटीन होता है। मैंने शुरू से ही सोचा था कि अत्याधुनिक प्लांट ही बैठाना है और मैं इसमें सफल भी हुआ।

मशीनों से निकाल रहे दूध

डेयरी फॉर्म के संचालक सिसौदिया ने बताया कि दूध दुहने का पूरा काम मशीनों द्वारा किया जा रहा है। दूध निकालने से मात्र 2-3 घंटे के अंदर मिलावट रहित दूध एयर पाइट पैकिंग में ग्राहकों तक पहुंचाया जाता है।

कुछ ही दिनों में दोगुनी हुई मांग

इस बिजनेस की सफालता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कुछ ही दिनों में दूध की मांग दोगुनी हो गई। 250 से 300 लीटर दूध का उत्पादन प्रतिदिन हो रहा है। 500 से अधिक पैकेट शहर भेजे जा रहे हैं। सिसौदिया ने बताया बहुत जल्द वे गिर गाय का भी फॉर्म हाउस बनाने की तैयारी शुरू करेंगे।

साफ-सफाई कर रखा जाता है ध्यान

सिसौदिया बताते हैं कि सभी भैंसों को डेटॉल फ्लोरिंग-लाईजोल से सफाई की जाती है ताकि उनमें किसी प्रकार का इंफेक्शन न हो। पशु विशेषज्ञ नियमित पशुओं की जांच करते हैं। परिसर की भी विशेष सफाई की जाती है ताकि पूरा वातारण प्रदूषण मुक्त रहे। मवेशियों के लिए फोगर्स लगाए गए हैं।

अब इस राज्य किसानों को मिलेगा बिना किसी गारंटी के तीन लाख तक कृषि ऋण

बिहार के किसानों को अब बिना किसी गारंटी के तीन लाख रुपए तक कृषि ऋण मिल सकता है। अभी इसकी अधिकतम सीमा एक लाख रुपए है। राज्य मे 1.61 करोड़ किसान हैं, जिनमें 60 लाख के पास ही केसीसी है। केसीसी को बढाने के लिए प्रखंडों में शिविर लगाए जाएंगे। कृषि मंत्री डॉ. प्रेम कुमार से बैंक प्रतिनिधियों के साथ बैठक के बाद जानकारी दी। 23 जनवरी को हुई इस बैठक में फैसला लिया गया।

उन्होंने कहा कि प्रखंड स्तर पर तिथि तय कर कैंप लगा कर किसान क्रेडिट कार्ड बनाए जाएंगे। कैं में सभी संबंधित पदाधिकारी मौजूद रहेंगे। किसान चैपाल में बैंक खाते की जानकारी ली जाए, ताकि किसानों को योजनाओं का लाभ डीबीटी के माध्यम से आसानी से मिल सके।

किसानों के ज्वाइंट लाइबिलिटी ग्रुप (जेएलजी) के माध्यम से पिछले वर्षों में बैंकों द्वापरा ऋण देने में कमी आई है। जेएलजी के माध्यम से अधिकतर बटाईदारों, भूमिहीन किसानों को ऋण की सुविधा मिलती है। पर जब से खाता-खेसरा की मांग होने लगी है, बटाईदार व भूमिहीन किसानों को ऋण मिलने में परेशानी हो रही है।

कृषि मंत्री ने बैंक प्रतिनिधियों से कहा कि राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत 200 प्रोजेक्ट में मात्र 15 प्रोजेक्ट स्वीकृत होना दुखद है। उन्होंने कहा कि सरकार किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य के तहत लेकर काम कर रही है। 21 जिलों में बाढ़ से हुए फसल नुकसान के लिए 894 करोड़ रुपये में से 80 प्रतिशत राशि किसानों के खाते में चली गई है।

 

बेकार प्लास्टिक की बोतल से ऐसे बनायें चूहा पकड़ने का ट्रैप

चूहों की संख्या मई-जून माह में कम होती है, यही समय चूहा नियंत्रण अभियान के लिए सही समय होता है, यह अभियान सामूहिक रूप में चलाना चाहिए। चूहे खेत खलिहानो, घरों और गोदामों में अनाज खाने के साथ-साथ ही अपने मलमूत्र से अनाज बर्बाद कर देते हैं।

एक जोड़ी चूहा एक वर्ष में 800-1000 की संख्या में बढ़ जाते हैं,अगर चूहों के संख्या कम हो तो आप प्लास्टिक की बोतल का ट्रैप बना कर भी चूहों को पकड़ सकते है ।इस तरिके से आप को कोई खर्चा भी नहीं होगा और किसी खतरनाक दवाई की भी जरूरत नहीं पड़ेगी ।

इस तरीके से आप घर पर भी आसानी से चूहों को पकड़ सकते हैं। आज हम आपको बताते है कि कैसे आप घर पर चूहे पकड़ने की मशीन बना सकते है।

जरूरत का सामान

  • प्लास्टिक की बोतल
  • कैंची
  • स्टिकस
  • रबड़ बैंड
  • थ्रेड
  • यू क्लिप

बनाने का तरीका

  1. सबसे पहले प्लास्टिक की बोतल का ऊपरी हिस्सा कैंची से काट लें। ध्यान रखें कि उसे सिर्फ एक ही साइड से काटना है।
  2. अब बोतल के दोनों हिस्सों पर दो इंच के गेप से दाए और बाए साइड होल करके दो स्टिक्स आड़ी फंसा दें।
  3. ध्यान रखें कि ये दोनों स्टिक्स पैरेलर हो। अब इन दोनों स्टिक्स पर रबड़ बैंड दोनों ओर फंसा दें।
  4. अब एक मजबूत धागा लें और बोतल के मुंह में लगाकर ढक्कन बंद कर दें। इस बात का ध्यान रखें कि धागे की लंबाई इतनी होनी चाहिए कि उसेे खिंचने पर बोतल का कटा हिस्सा खुल सकें।
  5. अब यू क्लिप का किनारा सीधा करके उसमें खाने की चीज फंसा दें। इसे बोतल के अंदर हाथ डालकर तली से बाहर निकालें।
  6.  धागे के हिस्से पर नॉट बनाकर इस यू क्लिप के बाहर निकले नुकीले हिस्से पर लटका दें।

इस ट्रैप को कैसे बनाते है इसके लिए वीडियो देखें

फसल की रखवाली के लिए किसान ने बनाया जुगाड़ साइरन,ऐसे करता है काम

फसल की रखवाली के लिए एक किसान ने जुगाड़ साइरन बनाया है। 9 वीं कक्षा तक पढ़े गोपाल ने साइरन विशेषकर अफीम फसल की सुरक्षा के लिए बनाया है। उसके बनाए जुगाड़ साइरन नीमच, चित्तौड़गढ़, शाहपुरा तक के किसान लेकर जाते हैं।

  • रूपपुरा गांव निवासी गोपाल धाकड़ पुत्र नारायणलाल धाकड़ बेगूं में बिजली के उपकरणों की दुकानदार चलाता है।
  • दो साल पहले गोपाल को यह आइडिया आया। गोपाल ने सोचा क्यों न ऐसा साइरन बना दिया जाए जो रातभर बजता रहे। जिससे जानवर भी भाग जाएं और किसान की रात की नींद खराब न हो। गोपाल ने अपनी दुकान से तरह-तरह के सामान जुटाए और जुगाड़ साइरन बना डाला।

बेटे से ली राय

  • गोपाल ने इंजीनियरिंग स्टूडेंट अपने बेटे महेश धाकड़ से भी तकनीकी राय ली। बेगूं क्षेत्र के अधिकांश अफीम खेतों में अब यह जुगाड़ साइरन लगे हैं, जो रातभर चार प्रकार की आवाज निकालते हैं।
  •  जुगाड़ साइरन भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, शाहपुरा, मध्यप्रदेश के नीमच जिले के कई किसान खरीद ले जाते हैं।

6 वॉल्ट की बैट्री से 12 घंटे बजता है साइरन

  • गोपाल ने बताया कि जुगाड़ साइरन में 10 ट्रांजिस्टर पीसीपी, 6 वाॅल्ट की बैट्री, 9 वाॅल्ट का ट्रांसफार्मर एक प्लास्टिक के डिब्बे में लगाए जाते हैं।
  •  डिब्बे के बाहर चारों दिशाओं में 12 वॉल्ट के चार साइरन लगाकर जुगाड़ तैयार किया जाता है।
  •  700-800 रुपए के उपकरणों से यह बनता है। एक बैट्री से यह जुगाड़ पूरी रात यानि 12 घंटे तक बजता रहता है।

इजरायल की पावरफुल मशीनें, इनकी टेक्नोलॉजी का लोहा मानती है दुनिया

इस समय दुनिया के कई देश सूखे का सामना कर रहे हैं। वहीं, इजरायल ने आधुनिक टेक्नोलॉजी से न सिर्फ खेती से जुड़ी कई समस्याएं खत्म कीं, बल्कि दुनिया के सामने खेती को फायदे का सौदा बनाने के उदाहरण रखे हैं।

इजरायल ने न केवल अपने मरुस्थलों को हराभरा किया, बल्कि अपनी तकनीक को दूसरे देशों तक भी पहुंचाया। खेती-किसानी के लिए इजरायल ने बाग-बगीचों और पेड़ों को एक जगह से दूसरी जगह शिफ्ट करने जैसी कई ऐसी मशीनें बनाईं, जिनकी आज दुनिया भर में तूती बोल रही है।

कुछ ही घंटों में ही जोत ली जाती हैं सैकड़ों एकड़ जमीन

इजरायल में बहुत कम बारिश होती है। इसके चलते यहां बारिश का फायदा जल्द से जल्द उठाना होता है। आमतौर पर खेत जोतने में ही काफी समय लग जाता है। इसके लिए इजरायल ने इटली से खेत जोतने वाली ये विशालकाय मशीनें खरीदी थीं।

इसके बाद इजरायली कंपनी ‘एग्रोमॉन्ड लि.’ ने इससे भी आधुनिक मशीनों का प्रोडक्शन शुरू किया। इस तरह अब इजरायल में ये मशीनें अधिकतर किसानों के पास है। इसके अलावा किसान इन्हें किराए पर भी ले सकते हैं। इन मशीनों से कुछ ही घंटों में सैकड़ों एकड़ जमीन जोत ली जाती है।

कारपेट की तरह शिफ्ट कर देती हैं बगीचे

फोटो में दिखाई दे रही यह मशीन इजरायल के इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग द्वारा डवलप की गई है। इसका उपयोग बाग-बगीचों और पौधों को एक जगह से दूसरी जगह शिफ्ट करने के लिए किया जाता है। इससे घास-फूंस और पौधों की जड़ों तक को नुकसान नहीं पहुंचता। अब ऐसी मशीनों का उपयोग कई देशों में होने लगा है।

पानी की बचत के लिए अनोखी मशीन

इजरायल में पानी की कमी होने के चलते यहां नहरों की व्यवस्था नहीं है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए इजरायल के रमत नेगेव डिजर्ट एग्रो रिसर्च सेंटर ने खेतों की सिंचाई के लिए इन स्पेशल मशीनों को डिजाइन किया। इससे न सिर्फ खेतों की सिंचाई होती है, बल्कि पानी की भी काफी बचत हो जाती है। मशीन का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसे कहीं भी आसानी से ले जाया जा सकता है।

मूंगफली जमीन से निकालकर साफ भी कर देती है

इजरायल के इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग द्वारा डवलप की गई यह मशीन मूंगफली और जमीन के अंदर होने वाली सब्जियों व अनाज को निकालने का काम करती है। मशीन की खासियत यह है कि यह सिर्फ मूंगफली को जमीन से निकालने के बाद उसे साफ भी करती जाती है।

इसके बाद मशीन में ही बने ड्रमों में भरती चली जाती है। इससे न सिर्फ किसानों की मेहनत ही बचती है, बल्कि कम समय में ढेर सारा काम हो जाता है। बता दें कि इजरायल में मूंगफली की काफी खेती होती है।

पेड़ों को जड़ सहित उखाड़कर दूसरी जगह कर कर देती है शिफ्ट

सूखा होने के बाद भी इजरायल हरा-भरा देश है। दरअसल, इजरायल ने अन्य देशों की तरह विकास के नाम पर पेड़-पौधों को नाश नहीं होने दिया। इसके लिए यहां पेड़ काटने के बजाय उन्हें शिफ्ट करने की प्रक्रिया अपनाई गई।

इसके लिए इजरायली कंपनी ‘एग्रोमॉन्ड लि.’ ने ऐसी मशीनों का निर्माण किया, जो बड़े से बड़े पेड़ को जड़ सहित उखाड़कर उन्हें दूसरी जगह शिफ्ट कर देती है। इससे पेड़ों को किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचता।

एक-एक बूंद के लिए तरसने वाले किसान अब ऐसे कर रहे है विदेशों में अनार का निर्यात

रेतीले धोरों में पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसने वाले बाड़मेर के किसानों ने कम समय में ऐसा करिश्मा कर दिखाया है कि अब विदेशों तक पहचान कायम है। किसानों ने एक सपना देखा कि क्या रेतीले धोरों में भी अनार हो सकता है। बस इसी आस के साथ 2010 में बालोतरा के बूड़ीवाड़ा में अनार का पहला प्लांट लगाया था।

बस 4 साल में अनार तैयार हो गया। अनार की क्वालिटी व स्वादिष्टता के चर्चे दूर-दूर तक छा गए। इसके बाद बाद तो किसानों ने अनार की बंपर बुवाई शुरू कर दी। अब वर्तमान में 4500 हैक्टेयर में अनार की खेती हो रही है। केवल 7 साल में बाड़मेर के किसानों ने वो करिश्मा कर दिखाया, मुश्किल तो था लेकिन असंभव नहीं। अब अनार की खेती और उत्पादन में बाड़मेर प्रदेश में पहले पायदान पर है।

बाड़मेर में कम आर्द्रता के कारण अनार में बीमारियां कम फेल रही है। इसी वजह से अनार की साइज, क्वालिटी और स्वाद अनोखा है। बाड़मेर का अनार नेपाल सहित कई देशों में निर्यात हो रहा है। सिंदुरी किस्म का अनार की बंपर पैदावार हो रही है। इसी वजह से अब अनार की खेती में बाड़मेर का प्रदेश में पहला स्थान है। 4500 हैक्टेयर में अरबों रुपए के अनार की खेती हो रही है।

7 साल में किसानों ने रचा इतिहास, प्रदेश में सबसे अधिक अनार उत्पादन वाला जिला बना बाड़मेर

नेपाल भेजने के लिए अनार की पैकिंग

धोरीमन्ना के गडरा में कृषि फार्म हाउस में इन दिनों अनार की पैकिंग के लिए टेंट लगाकर श्रमिक रात-दिन जुटे हुए है। किसान बालूराम विश्नोई व सुरेश ढाका ने बताया कि यह अनार नेपाल के लिए जाएगा। पैकिंग के लिए मजदूर लगाए गए है। 2500 पौधों का साढ़े तीन हैक्टेयर में बगीचा लगाया था। अब तो हर गांव-गांव अनार की खेती होने लगी है, किसान रुचि दिखा रहे है। नेपाल के लिए निर्यात करने वाले व्यापारी ने 52 रुपए प्रति किलो के हिसाब से अनार की बोली लगाकर खरीदा है।

4500 हैक्टेयर में 135 करोड़ का अनार : बाड़मेर में अनार की 4500 हेक्टयेर में 135 करोड़ के अनार का उत्पादन हो रहा है। एक हैक्टेयर में 625 पौधे लगाए जाते है। इससे एक हैक्टेयर में 3 से 3.5 लाख का अनार उत्पादन होता है।

अनार के उत्पादन में बाड़मेर प्रदेश में पहले नंबर पर है। 2010 में बुड़ीवाड़ा में अनार का पहला प्लांट लगाया। इसके बाद अब 4500 हेक्टयेर में अनार की खेती हो रही है। सिंदुरी किस्म का अनार यहां की कम आर्द्रता के कारण प्रसिद्ध है। अनार की साइज, क्वालिटी और स्वाद भी अलग है। -पदमसिंह, सहायक कृषि अधिकारी, बाड़मेर

पौने 2 एकड़ नींबू के बाग से सालाना कमाई 5-6 लाख रुपए

एक किसान अपने पौने दो एकड़ नीबू के बगीचे की लागत से परेशान था, सिर्फ लागत ही लाखों रुपए में पहुंच जाती थी। अभिषेक जैन ने इस बढ़ी लागत को कम करने के लिए बाजार से रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाएं लेनी बंद कर दी।

पिछले डेढ़ साल से जैविक तरीके अपनाने से इनकी हजारों रुपए की लागत कम हो गयी है। लागत कम होने से ये नीबू के बगीचे से बाजार भाव के हिसाब से सालाना पांच से छह लाख रुपए बचा लेते हैं। राजस्थान के भीलवाड़ा जिला मुख्यालय से 80 किलोमीटर दूर संग्रामपुर गाँव के अभिषेक जैन (34 वर्ष) बीकॉम करने के बाद मार्बल के बिजनेस से जुड़ गये।

अभिषेक जैन गाँव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, “पिता के देहांत के बाद बिजनेस छोड़कर पुश्तैनी जमीन को सम्भालना पड़ा। खेती करने के दो तीन साल बाद मैंने ये अनुभव किया कि एक तिहाई खर्चा सिर्फ खाद और दवाइयों में निकल जाता है।

इस बढ़ती लागत को कम करने के लिए प्रयास करना शुरू कर दिया था।” वो आगे बताते हैं, “लागत कम करने के लिए पिछले डेढ़ साल पहले साकेत ग्रुप के बारे में पता चला, जो जैविक खेती के लिए किसानों को प्रशिक्षण देता है। इस ग्रुप से जुड़ने के बाद हम पूरी तरह से नीबू के बगीचे को जैविक ढंग से कर रहे हैं, इससे जो लागत 33 प्रतिशत आती थी अब वो 10 प्रतिशत पर आ गयी है।”

अभिषेक को खेती करने का पहले कोई अनुभव नहीं था। इनकी कुल छह एकड़ सिंचित जमीन है, पौने दो एकड़ जमीन में नीबू की बागवानी और दो एकड़ में अमरुद की बागवानी ये पिछले कई वर्षों से कर रहे हैं। साल 2007 में इनके पिता को हार्ट अटैक से देहांत हो गया।

पुश्तैनी जमीन को करने के लिए इन्होने अपने बिजनेस को बंद किया और 2008 से खेती करने लगे। “खेती को लेकर पहले मेरा कोई अनुभव नहीं था, पर जब खेती करना शुरू किया तो धीरे-धीरे चीजों को सीखने लगा था। हमारे यहाँ नीबू का बगीचा हमेशा से पिता जी खुद करते थे, अमरुद और बाकी की फसलें बटाई पर उठा दी जाती थी।”

अभिषेक बताते हैं, “नीबू की बागवानी में हर साल सात आठ लाख रुपए निकल आते थे लेकिन लागत भी डेढ़ से पौने दो लाख आती थी। इस लागत में सबसे ज्यादा पैसा खाद और कीटनाशक दवाइयों में खर्च हो रहा था। इस लागत को कम करने के लिए जब मैंने बहुत रिसर्च किया तो सोशल साइट के जरिये साकेत पेज पर पहुंचे, जहाँ किसानो को लागत कम करने के तौर तरीके सिखाए जाते थे।”

एक बार नीबू का बगीचा लगाने पर 30 साल तक रहता है जबकि अमरुद का बगीचा 25 साल तक रहता है। अभिषेक के पौने दो एकड़ खेत में नीबू के लगभग 300 पौधे 15 साल पहले से लगे हैं। 25 रुपए एक पौधा पर खर्चा आता है। नीबू के पौधे लगाने के तीन या साढ़े तीन साल बाद से फल निकलने शुरू हो जाते हैं। दो साल तक इसमे कोई भी फसल ले सकते हैं।

अभिषेक बताते हैं, “नीबू के बगीचे में अगर खाद और कीटनाशक दवाएं न डालनी पड़ें तो इसमे ज्यादा कोई खर्चा नहीं होता है। नीबू और गोबर की खाद का ही प्रयोग करें तो सिर्फ मजदूर खर्च ही आता है, बाकी की लागत बच जाती है। एक पौधे का एक साल में देखरेख में सिर्फ 100 रुपए का खर्चा आता है।”

वैसे तो नीबू की पैदावार सालभर होती रहती है। लेकिन सबसे ज्यादा नीबू जुलाई से अक्टूबर में निकलता है। अभिषेक का कहना है, “एक पौधे से एक साल में बाजार भाव के हिसाब से औसतन तीन हजार का प्रोडक्शन निकल आता है, नीबू बाजार भाव के अनुसार 20 रुपए से लेकर 150 रुपए किलो तक रहता है।

पिछले साल आठ लाख रुपए का नीबू बेचा था, इस साल छह साढ़े पांच लाख रुपए का बेच चुका हूँ।” वो आगे बताते हैं, “अमरुद के बगीचे से सालाना छह लाख रुपए निकल आते हैं, नीबू और अमरुद के बगीचे से लागत निकाल कर हर साल 12 से 14 लाख रुपए बच जाते हैं।

बगीचे के अलावा मक्का, ज्वार, उड़द, मूंगफली, गेहूँ, जौ, चना सरसों उगाते हैं। सब्जियों में मिर्च, भिन्डी, ग्वारफली, बैंगन, टमाटर, फूलगोभी, पत्तागोभी बोई जाती हैं।”

बहुत ही कम ख़र्चे में फसल काटती है यह मिनी कंबाइन ,जाने पूरी जानकारी

भारत में अब भी गेहूं जा दूसरी फसलें काटने का काम हाथ से ही होता है क्योंकि भारत में किसानो के पास जमीन बहुत ही कम है और वो बड़ी कंबाइन से फसल कटवाने का खर्च नहीं उठा सकते इस लिए अब एक ऐसी कंबाइन आ गई है जो बहुत कम खर्च में फसल काटती है ।

साथ ही अब बारिश से ख़राब हुई फसल वाले किसानो को घबरने की जरूरत नहीं क्योंकि अब आ गई है मिनी कंबाइन Multi Crop हार्वेस्टर यह कंबाइन छोटे किसानो के लिए बहुत फयदेमंद है इस मशीन से कटाई करने से बहुत कम खर्च आता है और फसल के नुकसान भी नहीं होता।

बड़ी कंबाइन से फसल का बहुत ही नुकसान होता है । लेकिन इस मशीन के इस्तेमाल करने के बहुत से फायदे है जैसे यह बहुत कम जगह लेता है ।साथ में इस कंबाइन से आप गिरी हुई फसल भी फसल को नुकसान पहुंचाए बिना अच्छे तरीके से काट सकते है ।

अगर जमीन गीली भी है तो भी हल्का होने के कारण यह कंबाइन गीली जमीन पर आसानी से चलती है ज़मीन में धस्ती नहीं । छोटा होने के कारण हर जगह पर पहुँच जाता है । यह मशीन 1 घंटे मे 2 एकड़ फसल की कटाई करती है ,यह मशीन एक दिन मे 14 एकड़ तक फसल की कटाई करती हैऔर इसमें अनाज का नुकसान भी बहुत कम होता है।इस से आप बाकी की अनाज फसलें जैसे गेहूं ,धान,मक्का अदि भी काट सकते है ।

यह कंबाइन कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो देखें

अगर आप इस कंबाइन को खरीदना चाहते है तो नीचे दिए हुए पते और नंबर पर संपर्क करें

Address–  Karnal -132001 (Haryana), India
phone -+91 184 2221571 / 72 / 73
+91 11 48042089
Email-exports@fieldking.com

जाने यूरिया के ईस्तमाल से पराली को प्रोटीन पशु खुराक बनाने का तरीका

पशुओं के लिए तूड़ी/पराली को यूरिया से उपचार करने का तरीका भैंसों/गायों के रोयों में स्थित सूक्ष्म जीव यूरिया को तोड़कर अपनी जीव प्रोटीन बनाने के लिए प्रयोग कर लेते हैं जो पशु की ज़रूरतों को पूरा करती है।

इसलिए पशुओं के वितरण में 1 प्रतिशत यूरिये का प्रयोग करने से वितरण में यूरिया अच्छी तरह मिक्स होना चाहिए और यूरिया की डलियां नहीं होनी चाहिए। पशुओं के चारे के लिए यदि तूड़ी/पराली को यूरिये से उपचार करके प्रयोग करते हैं तो तूड़ी/ पराली के खुराकी गुणों में वृद्धि की जा सकती है और उपचारित पराली को सूखे तौर पर प्रयोग करके पशुओं की खुराक में प्रोटीन की कमी को दूर भी किया जा सकता है।

यूरिये से कैसे उपचारित की जाये तूड़ी?

तूड़ी/पराली को यूरिये से उपचार करने के लिए 4 क्विंटल तूड़ी या कुतरी हुई पराली लें और इसे ज़मीन पर बिछा लें। फिर 14 किलो यूरिये को 200 लीटर पानी में घोल लें और तूड़ी/पराली पर छिड़क लें ताकि सारी तूड़ी/पराली गीली हो जाये।

अच्छी तरह मिलाने के बाद इसे दबाकर 9 दिनों के लिए रखें। 9 दिनों के बाद उपचारित की हुई तूड़ी तैयार हो जाती है। यह गुणकारी और नर्म हो जाती है।

किस तरह खिलानी है?

खिलाते समय तूड़ी को एक तरफ से ही खोलें और कुछ देर हवा लगने दें। यदि हवा नहीं लगवाते तो अमोनिया गैस जो बनी होती है वह पशु की आंखों में चुभने लगती है। फिर पशु को थोड़ा थोड़ा रिझाओ। उपचारित तूड़ी को प्रति 4 किलो के हिसाब से हरे चारे में मिलाकर बड़े पशुओं को खिलई जा सकती है।

नोट – इसका प्रयोग, घोड़े, सुअरों और 6 महीने से कम उम्र के पशुओं के लिए ना किया जाये

स्त्रोत – गुरू अंगद देव वैटनरी यूनिवर्सिटी, लुधियाना

किसान का अनोखा फार्मूला ,फसलों को बुरी नज़र से बचाएगी सनी लियोनी

क्या सनी लियोनी का पोस्टर खेतों में लगी फसलों को बुरी नजर से बचा सकता है? आप सोच रहे होंगे ये बकवास है. लेकिन आन्ध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले में एक किसान ने फसलों को बुरी नजर से बचाने के ऐसी ही एक अजीबोगरीब तरकीब अपनाई है.

यहां किसान ने खेत में बॉलीवुड एक्ट्रेस सनी लियोनी के पोस्टर लगाए हैं. ये पोस्टर भी छोटा नहीं है…. दो बड़े पोस्टर में सनी लियोनी लाल बिकनी में नजर आ रही हैं. इस पोस्टर को लगाने में किसान ने 600 रुपये खर्च किए हैं.

ये पोस्टर हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है. पोस्टर खेत के दोनों किनारों पर लगाए हैं. इनपर तेलुगू में लिखा है, ‘मुझसे जलना मत’. साथ ही किसान ने दावा किया है कि इसे लगाने के बाद से उनकी फसल की पैदावार भी बढ़ गई है.

रेड्डी ने बताया कि उनके एक दोस्त ने सनी लियोनी के पोस्टर लगाने की सलाह दी. दोस्त के इस सुझाव पर उन्होंने अमल किया और अब हर कोई सिर्फ सनी लियोनी को देखता है न कि उनके फसल को. उन्होंने कहा, “इस साल 10 एकड़ में अच्छी पैदावर हुई है. मेरी फसल की तरफ लोगों की नजर नहीं जाती. अब मेरी फसलें अच्छी हो रही हैं.”

ये कोई पहला मौका नहीं है जब सनी लियोनी के पोस्टर का इस्तेमाल किया गया हो. इससे पहले साल 2016 में भी केरल के कोल्लम जिले में श्री नारायण पॉलिटेक्निक कॉलेज ने नए बैच के स्टूडेंट्स के स्वागत के लिए एडल्ट फिल्म स्टार मिया खलीफा और सनी लियोनी का बैनर लगाया था. बैनर पर मलयालम में लिखा था ‘नए छात्र-छात्राओं का स्वागत है.’