ये है ट्रेक्टर चलित राइस मिल जो 1 घंटे में निकालती है 1200 किलो चावल

किसान धान उगता है और बाजार में बहुत कम भाव में बेच देता है । व्यापारी द्वारा उसका आर्थिक शोषण होता है । जहाँ तक की अगर उसे खुद खाने के लिए चावल की जरूरत होती है तो उसे अपने खाने के लिए चावल बाजार से खरीदना पड़ता है क्योंकि उसके द्वारा पैदा की हुई धान पर छिलका लगा होता जिसको खाने से पहले उतरना पड़ता है । इन दोनों बातों का हल अब निकल आया है ।

अब बाजार में ऐसी ट्रेक्टर से चलने वाली राइस मिल आ गई है जिस से आप चावल का छिलका आसानी से उतार सकते है । जिस से किसान चावल को सीधे बाजार में बेच सकता है । और अपने खाने के लिए भी रख सकता है । सीधे बाजार में बेचने से किसानो को दोगुना लाभ हो सकता है । इस मशीन को चलने के लिए ट्रेक्टर की पावर 34 से 50 H.P. तक होनी चाहिए । यह मिल एक घंटे में 1000-1200 किलो चावल साफ़ कर देती है ।

इस मिल की मुख्य विशेषता यह है, कि इसमें एक ही बार में धान की डिहस्किंग एवं पॉलिशिंग होती है तथा चावल भी कम टूटता है एवं ऊर्जा की खपत भी कम होती है। इस मिल को आसानी से ट्रेक्टर से एक गांव से दूसरे गांव ले जाया जा सकता है। इसके परिणाम अत्यंत उत्साह जनक पाए गए हैं, जिसके कारण कृषकों में इसकी मांग बढ़ रही है।

ये मिल कैसे काम करती है उसके लिए वीडियो देखें

इस मिल की पूरी जानकारी के लिए आप निचे दिए हुए नंबर पर संपर्क कर सकते है ।

पूर्वांचल कृषि यन्त्र उद्योग
Village– Mubarakpur, Tanda, Distt:-Ambedkar Nagar, Uttar Pradesh,
Phone : +917210113837

 

पहली ही फसल में किसान ने खजूर की खेती से कमाए 4 लाख रु

इराक से शुरू हुई खजूर की खेती अब मिस्र, लीबिया, पाकिस्तान, यूएसए, सूडान,सऊदी अरब और भारत तक में होती है। भारत खूजर के सबसे बड़े इम्पोर्टर देशों में से भी एक है। खजूर का इस्तेमाल अचार, जूस, चीनी, स्टार्च, छुहारा और शराब बनाने में भी किया जाता है। इसकी हर एक चीज काम की है।

खजूर की गुठली से पोल्ट्री आहार तैयार किया जाता है। इसकी पत्तियों से टोकरियां, कागज, रस्सी और झाड़ू बनाई जाती है। कई बीमारियों में भी खजूर दवा की तरह काम करता है। इस तरह से खजूर की खेती करना भी काफी फायदे का सौदा है। इसकी कई तरह की किस्म होती हैं।

राजस्थान के बाड़मेर जिले के चाइटन तहसील के आलमसर गांव के किसान सादुलाराम सियोल ने पहले ही साल में खूजर की खेती कर साढ़े तीन लाख रुपए कमाए थे। आज हम बता रहे हैं आप कैसे खजूर की खेती कर लाखों रुपए कमा सकते हैं।

50 साल से भी ज्यादा होती है लाइफ

  • खजूर के पेड़ सालों तक लगे होते हैं, इनकी लाइफ 50 साल से भी ज्यादा होती है ऐसे में जरूरी है कि इनके बीच में प्रॉपर स्पेस रखा जाए।
  • इन पेड़ों की अच्छी ग्रोथ के लिए हर रो (पंक्ति) के बीच 8 मीटर तक का डिस्टेंस रखा जाता है।
  • प्रति हेक्टेयर इसके करीब 160 प्लांट लगाए जाते हैं।

जमीन को कैसे तैयार करें

  • जिस जमीन पर खेती करना है उसकी 2 से 3 बार जुताई जरूरी होती है। बाद में मिट्टी को एक लेवल में करना होता है।
  • इसके लिए खोदे गए गड्ढों को करीब 2 हफ्ते तक ओपन रखने की सलाह दी जाती है।
  • जुलाई से सितंबर का टाइम प्लांटिंग के लिए बेस्ट होता है।
  • यदि जमीन में इरिगेशन की फेसिलिटी है तो फार्मर खजूर के प्लांट के बीच वाली जगह में दूसरी फसलें भी लगा सकते हैं। जैसे काला चना, हरा चना, मसूर, पपीता या सब्जियां भी उगा सकते हैं।

कितना पानी देना जरूरी

  • पेड़ों को कितना पानी देना है यह एरिया की क्लाइमेट कंडीशन और मिट्टी की मॉइश्चर होल्ड करने की कैपेसिटी पर डिपेंड करता है।
  • पेड़ों में लगातार मॉइश्चर बने रहना चाहिए लेकिन पानी ठहरना नहीं चाहिए। बारिश के मौसम में अलग से पानी देने की कोई जरूरत नहीं होती।
  • भारी बारिश से पानी जम जाए तो उसका निकलना सही होता है, वरना यह प्लांट को डैमेज कर सकता है।
  • हर साल 5 से 6 बार सिंचाई पर्याप्त होती है। प्लांटिंग के तुरंत बाद फ्रिक्वेंट इरिगेशन की जरूरत होती है।

अच्छी क्वालिटी के लिए क्या करना जरूरी

  • अच्छी क्वालिटी के लिए ओर्गेनिक फर्टिलाइजर्स का यूज करना चाहिए। इससे खजूर की पैदावार भी बढ़ती है।
  • केमिकल फर्टिलाइजर N: P: K को 30:20:50 के रेशो में अप्लाई करना चाहिए। यह मार्च और अप्रैल के महीने में यूज करना चाहिए।
  • इंडिया में ‘N’ का रिकमंडेड डोज 1.40kg/ट्री है। एक एडल्ट ट्री को 600ग्राम ‘N’, 100 ग्राम ‘P’ और 75 ग्राम ‘K’ की जरूरत हर साल होती है।
  • खजूर में मादा पौधों के बीच में 10 फीसदी नर पौधे होने चाहिए।

अब होती है हार्वेस्टिंग

  • खजूर प्लांटिंग के 6 से 7 साल में हार्वेस्टिंग के लिए तैयार हो जाते हैं। वैरायटी के हिसाब से खजूर अलग-अलग स्टेज में तोड़े जाते हैं। इसलिए हार्वेस्टिंग लोकल डिमांड पर भी डिपेंड करती है।
  • खजूर की पैदावार मिट्टी और क्लाइमेट पर डिपेंड करती है। 10 साल पुराना पेड़ हर साल 50 से 60 किलो खजूर देता है। साल दर साल इसकी खपत बढ़ती है। 15 साल तक एक पेड़ 80 किलो तक फल देता है।

विदर्भ के किसान की कहानी

68 साल के सवी थंगवाल विदर्भ के किसान हैं। जब खराब खेती से परेशान होकर विदर्भ के किसान आत्महत्या तक करने पर मजबूर हो गए थे तब थंगवाल ने एक अलग राह खोजी। उन्होंने ट्रेडीशनल खेती न करते हुए खजूर की खेती शुरू की। उन्होंने 2 एकड़ जमीन में खूजर के 130 प्लांट लगाए। एक प्लांट की कॉस्ट 6 हजार रुपए आई।

3 साल के बाद ही प्लांट में फ्रूट्स आना शुरू हो गए। चौथे साल 25 से 30 किलो खजूर प्रति पेड़ से प्राप्त होने लगे। खजूर बाजार में 300 रुपए किलो तक बिके। जिससे थंगवाल को बड़ा प्रॉफिट हुआ। अब उन्होंने 25 एकड़ जमीन में 300 प्लांट लगाए हैं। हर पेड़ से 100 किलो तक खजूर मिल रहा है। वे कहते हैं कि एक प्लांट को लगाने का खर्चा भी अब 3600 रुपए तक आ चुका है।

कितनी हुई इनकम

  • एक प्लांट की लागत 6 हजार रुपए।
  • इसी तरह 130 प्लांट की लागत 7 लाख 80 हजार रुपए।
  • एक प्लांट से 30 किलो खजूर एक सीजन में।
  • इसी तरह 130 प्लांट से 3900 किलो खजूर मिले।
  • एक किलो खजूर की कीमत 300 रुपए किलो।
  • इसी तरह 3900 किलो खजूर की कीमत 11 लाख 70 हजार रुपए।
  • इस तरह किसान को एक सीजन में ही 3 लाख 90 हजार रुपए का मुनाफा हुआ।
  • अगले सीजन से इसमें लागत की रकम भी नहीं जुड़ेगी और सौ प्रतिशत मुनाफा होगा।

कीड़े-मकोड़े पकड़ने का मिला नया आइडिया, सालाना लाखों में कर रही कमाई

कीड़े-मकोड़े फसल की पैदावार को अत्यधिक क्षति पहुंचाते हैं जिससे न सिर्फ किसानों की मेहनत बर्बाद होती है, बल्कि उनको आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है। इन समस्याओं से निपटने के लिए किसान कीटनाशकों का प्रयोग करते हैं,

जिसका प्रतिकूल असर खेती पर पड़ता है और प्रोडक्शन घट जाता है। किसानों की इस समस्या से निजात दिलाने के लिए महाराष्ट्र के वर्धा की रहने वाली निलिशा जिभकाटे को एक नया आइडिया मिला और आज वो अपने खास आइडिया से सालाना लाखों में कमाई कर रही हैं।

क्या मिला नया आइडिया

निलिशा ने मनी भास्कर को बताया कि कीट-पतंगों का प्रकोप बढ़ जाता है, ऐसे में किसान कीटनाशक का प्रयोग करते हैं, जो कि फसल और पर्यावरण दोनों के लिए नुकसानदायक होता है। ऐसे में स्टिकी ट्रैप के इस्तेमाल से फसलों में होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है।

स्टिकी ट्रैप एक पीले रंग की शीट होती हैं जो फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए खेत में लगाई जाती है। इससे फसलों पर कीटों से रक्षा हो जाती है। एक ऐसी तकनीक है कि ये कीड़े खुद व खुद जाल में फंस जाएंगे।

कैसे करता है काम

हर कीट पीले रंग की ओर आकर्षित होता है। अब अगर उसी रंग की शीट पर कोई चिपचिपा पदार्थ लगाकर फसल की ऊंचाई से करीब एक फीट और ऊंचे पर टांग दिया जाए तो कीट रंग से आकर्षित होकर इस शीट पर चिपक जाता है।

फिर यह फसल को नुकसान नहीं पहुंचा पाते हैं। मकसद यह है कि कीड़ों से न सिर्फ फसलों की सुरक्षा हो, बल्कि रसायन का इस्तेमाल भी घटे व बंपर उत्पादन भी हो। इसका प्रयोग बेहद आसान व सस्ता है। यह हर मौसम के लिए कारगर है।

सिर्फ दो दिन की किसान हड़ताल से ही लोग बेहाल

कर्ज माफी और उपज के लाभकारी मूल्य को लेकर किसानों के आंदोलन के तीसरे दिन रविवार को सब्जी-फल की कीमतों में तेजी आनी शुरू हो गई। राष्ट्रीय किसान महासंघ के बैनर तले 172 संगठनों के आह्वान पर किसानों ने अपनी उपज मंडियों तक भेजना बंद कर दिया है। इस कारण मंडियों में आवक कम हो गई है और सब्जियों की खुदरा कीमतों में 10-20 रुपये प्रति किग्रा की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र सहित सात राज्यों में इस आंदोलन का खासा असर दिख रहा है।दूध मार्किट में ना पहुँचने से भी दूध के दाम लगभग दोगने हो गए है । लोग दोगने दाम पर दूध खरीद रहे है ।

पंजाब में जालंधर की सबसे बड़ी सब्जी मंडी में 20 किग्रा का टमाटर का क्रेट 40-47 रुपये में मिल रहा था वह 300 रुपये से ज्यादा में बिका। इसमें पांच गुना से ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज की गई। चंडीगढ़ में 10-15 रुपये प्रति किग्रा के भाव बिक रहा टमाटर 20-25 रुपये पर पहुंच गया है। सप्लाई कम होने से टमाटर के अलावा आलू, शिमला मिर्च, लौकी और खीरे के भाव भी चढ़ गए हैं।

एक दिन पहले दिल्ली की थोक मंडी में 10-50 रुपये कैरेट बिकने वाला टमाटर 250-300 रुपया तक पहुंच गया। आजादपुर मंडी के बिक्रेता अनिल मल्होत्रा के अनुसार टमाटर की खेप मंडी में शनिवार को काफी कम पहुंची।

दो-तीन दिन बाद ही पता चलेगा कि अन्य सब्जियों व फलों पर आंदोलन का क्या असर पड़ता है, क्योंकि किसानों ने अभी चक्का जाम नहीं किया है। आलू-प्याज के थोक बिक्रेता श्रीकांत मिश्रा का कहना है कि प्याज के भाव में 2-3 रुपये की बढ़ोतरी हुई है। अभी इसका भाव और बढ़ेगा क्योंकि प्याज इन दिनों मध्य प्रदेश से ही आ रहा है।

किसान के बेटे ने पिता के लिए बनाया Remote से चलने वाला ट्रैक्टर

भारत में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, ये बात अक्सर लोग कहते हैं, साथ ही ये भी कहा जाता है कि भारत में प्रतिभाओं को उचित मंच नहीं मिल पाता है। उसके बाद भी अक्सर आप देखते होंगे कि प्रतिभा अपने आप चमक बिखेर देती है। कुछ बड़ा या फिर नया करने के लिए जरूरी नहीं कि आप किसी बड़े संस्थान में पढ़ाई करें, जो काम आईआईटी के छात्र नहीं कर सकते हैं वो काम एक किसान के बेटे ने कर दिखाया है। उसकी प्रतिभा का डंका आज पूरे देश में बज रहा है।

राजस्थान के बारां जिले के बमोरीकलां गांव में एक किसान के बेटे ने जो कारनामा किया है उस से उसके पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो गया है। 19 साल का ये युवक लगातार नए आविष्कार करने में लगा रहता है। उस ने अब जो चीज तैयार की है उस से खेती काफी आसान हो सकती है। छोटी सी उम्र में इस युवक ने अपनी बुद्धि के बल पर 27 से अधिक आविष्कार किए हैं। इस लड़के का नाम योगेश कुमार है। इसके आविष्कार देख कर आईआईटी में पढ़ने वाले लोग भी हैरान हैं। योगेश नागर फिलहाल मैथ्स से बीएससी कर रहा है। वो फर्स्ट ईयर का स्टूडेंट है।

योगेश के पिता राम बाबू नागर 15 बीघा जमीम पर खेती करते हैं. इसी से परिवार का खर्चा चलता है। अपने पिता की मुश्किलों को देख कर योगेश ने कुछ ऐसा करने की ठानी जिस से उनका काम आसान हो जाए, इसके लिए वो लगातार काम कर रहा था। उसके पिता को ट्रैक्टर चलाते समय पीठ में दर्द की शिकायत होती थी। पिता की तकलीफ को दूर करने के लिए योगेश ने रिमोट ऑपरेटिव सिस्टम डेवलप किया है। इससे खेत में एक जगह बैठकर रिमोट से ट्रैक्टर चलाकर जुताई की जा सकती है। बिना ड्राइवर के ट्रैक्टर को चलता देखकर गांव वाले भी हैरान रह जाते हैं।

अब योगेश के पिता का काम काफी आसान हो गया है। वो एक जगह खड़े हो कर ट्रैक्टर चलाते हैं। इस से उनका समय भी बचता है और पीठ दर्द की शिकायत से भी मुक्ति मिल गई है। योगेश के इस आविष्कार से गांव के लोग भी हैरान हैं, उनका कहना है कि योगेश में बहुत प्रतिभा है, उसे सही मार्गदर्शन मिले तो वो भारत का नाम रोशन कर सकता है। अब योगेश की चर्चा पूरे देश में हो रही है। रिमोट से ट्रैक्टर चला कर योगेश ने वो कारनामा किया जिस से भारत के किसानों की काफी मदद हो सकती है।अब योगेश को उम्मीद है कि उनके पिता को खेती के दौरान आने वाली समस्याओं का सामना नहीं करकना पड़ेगा।

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वैज्ञानिकों ने बनाया चलता-फिरता सौर कोल्ड स्टोरेज, अब नहीं खराब होंगी सब्जियां

भंडारण के अभाव में बड़ी मात्रा में फल और सब्जियां समय से पहले खराब हो जाती हैं। वैज्ञानिकों ने ऐसा कोल्ड स्टोरेज यूनिट बनायी है, जिसे किसान अपने यहां भी लगा सकता है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के कृषि इंजीनियरिंग विभाग के वैज्ञानिकों ने सौर ऊर्जा से संचालित मोबाइल कोल्ड-स्टोरेज यूनिट बनायी है, जो फल तथा सब्जियों को नष्ट होने से बचाने में मददगार हो सकती है।

इस कोल्ड-स्टोरेज को विकसित करने वाले वैज्ञानिक डॉ. पी.के. शर्मा ने बताते हैं, “सौर ऊर्जा से चलने वाले इस नए कोल्ड-स्टोरेज से बिजली की समस्या से जूझ रहे किसानों को सबसे अधिक राहत मिल सकती है।

बिजली की बचत के साथ-साथ इससे कृषि उत्पादों के खराब होने की समस्या दूर होगी।कोल्ड-स्टोरेज के भीतर निम्न तापमान और उच्च सापेक्ष आर्द्रता के कारण टमाटर जैसे उत्पादों को बीस दिन तक ताजा बनाए रखा जा सकता है। इसके अलावा अन्य सब्जियों और फलों, जैसे- पालक, शिमला मिर्च, ककड़ी, लौकी, तोरई और पपीते को भी बीस दिनों तक सुरक्षित रख सकते हैं।”

न्यूनतम लागत पर फलों और सब्जियों के लंबे समय तक भंडारण के लिए बनाए गए इस कोल्ड-स्टोरेज की भंडारण क्षमता 4.85 घनमीटर है। इसमें 1000 किलोग्राम फल तथा सब्जियों का भंडारण इसमें किया जा सकता है।

इसकी लंबाई 1.83 मीटर, चौड़ाई 1.34 मीटर और ऊंचाई 1.98 मीटर है। इसे गैल्वनी कृत लोहे, पॉली-कार्बोनेट और प्लाईवुड की चादरों और ग्लास-वूल से बनाया गया है। इस कोल्ड-स्टोरेज में 40 क्रेट्स हैं और प्रत्येक क्रेट में 25 किलोग्राम फल और सब्जियां रखे जा सकते हैं।

इस कोल्ड-स्टोरेज में लगे पहियों द्वारा इसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर आसानी से ले जाया जा सकता है। इसमें सौर ऊर्जा चालित 0.8 टन का एक एयर कंडीशनर लगाया गया है, जिससे कोल्ड-स्टोरेज के भीतर का तापमान 9.5 से 11 डिग्री सेल्सियस और आर्द्रता 73 से 92 प्रतिशत तक बनी रहती है।

यह एयरकंडीशनर एक सौर फोटो वोल्टिक सिस्टम द्वारा चलाया जाता है। इस सिस्टम को कुल आठ सौर पैनलों, एक सौर इन्वर्टर और चार बैटरियों वाले एक बैटरी-बैंक को मिलाकर बनाया गया है। इसे इस तरह तैयार किया गया है, जिससे दिन में अधिक से अधिक सौर ऊर्जा का उपयोग किया जा सके।

डॉ. शर्मा के अनुसार, “सौर संचालित शीत कोल्ड-स्टोरेज का निर्माण भारत में अभी प्रयोगात्मक चरण में है। फिलहाल उपलब्ध शीत भंडारण ज्यादातर सुविधाएं बिजली चालित हैं। इनका उपयोग एक निश्चित तापमान पर सीमित उत्पादों जैसे- आलू, संतरा, सेब, अंगूर, अनार, फूलों इत्यादि के भंडारण के लिए ही हो पाता है। इससे फलों व सब्जियों की गुणवत्ता, ताजगी और जीवन अवधि बनाए रखने में मदद मिलेगी। किसानों और छोटे सब्जी तथा फल-विक्रेताओं की आय भी बढ़ेगी।”

भारत विश्व में फल और सब्जियों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। लेकिन, पर्याप्त शीत भंडारण सुविधाएं नहीं होने से 30 से 35 प्रतिशत फल और सब्जियां लोगों तक पहुंचने से पहले ही खराब हो जाती हैं। किसानों को फलों और सब्जियों को तुरंत बाजार ले जाकर बेचने और गुणवत्ता खराब होने का नियमित दबाव बना रहता है।

इस नए कोल्ड-स्टोरेज के उपयोग से किसान उत्तम गुणवत्ता की भंडारण सुविधाओं का लाभ छोटे स्तर पर अपनी आवश्यकतानुसार उठा सकेंगे। अध्ययनकर्ताओं के अनुसार, उनके द्वारा बनाए गए इस कोल्ड स्टोरेज की लागत लगभग 1.72 लाख रुपये तक हो सकती है।

इसमें 1000 किलोग्राम फलों तथा सब्जियों को भंडारित करने की लागत प्रतिदिन 6.07 रुपये आती है। सिर्फ बिजली के खर्च की बचत से ही नौ सालों में इस कोल्ड-स्टोरेज की लागत निकल आती है। अध्ययनकर्ताओं में डॉ. पी.के. शर्मा के अलावाडॉ. एच.एस. अरुण कुमार भी शामिल थे।

देश के इन 7 राज्यों में आज से शुरू हुआ किसान आंदोलन

पंजाब और मध्य प्रदेश समेत देश के 7 राज्यों में आज 1 जून से किसनों के अपनी मांगों को लेकर आंदोलन शुरू कर दिया है| मध्यप्रदेश में 1 जून से 10 जून तक प्रशासन ने हाई अलर्ट जारी किया है और पुलिसकर्मियों की छुट्टियाँ रद्द कर दी हैं|

मध्य प्रदेश के मंदसौर में किसानों ने रोजमर्या की जरूरतमंद चीजें सब्जियाँ और दूध को शहर से बाहर न भेजने का ऐलान किया है जिससे आम जनता को परेशानी हो सकती है| किसान यूनियनों ने अपनी मांगों को लेकर केंद्र सरकार के खिलाफ 10 दिन का आंदोलन का आह्वान किया है जिसकी शुरुआत आज से हो गयी है|

मध्यप्रदेश 6 जून को राहुल गांधी की रैली है और 1 से 10 जून के बीच किसानों द्वारा आंदोलन की घोषणा की है इसी को देखते हुए पुलिस प्रशासन सतर्क हो गया है।

मध्यप्रदेश के ये जिले हैं सबसे ज्यादा संवेनशील

आगर-मालवा, खंडवा, खरगोन, ग्वालियर, छिंदवाड़ा, देवास, नरसिंहपुर, नीमच, बालाघाट, बुरहानपुर, भोपाल, मंदसौर, मुरैना, रतलाम, राजगढ़, रायसेन, शाजापुर, श्योपुर, सीहोर, हरदा और होशंगाबाद शामिल हैं। मध्यप्रदेश पुलिस ने अंदरूनी रिपोर्ट में किसानों की सक्रियता के बाद इन्हें इस लिस्ट में शामिल किया है।

आम लोगों को हो सकती है परेशानी

किसानों के इस आंदोलन से रोजमर्रा की चीजें शहर में नहीं पहुँच पर रही है जिससे लोगों को मुश्‍किलों का सामना करना पड़ सकता है. पिछले ही साल किसान संगठनों ने मध्य प्रदेश के मंदसौर में अपनी मांगों लेकर आंदोलन किया था, जिसमें राज्य पुलिस की फायरिंग में पांच किसानों की मौत हो गई थी.

आखिर क्यों कर रहे हैं किसान आंदोलन?

भारत के किसान स्वामीनाथन कमीशन को लागू करने और कर्ज माफ़ी को लेकर आंदोलन कर रहे हैं, किसानों के आंदोलन के कारण 1 तरफ जहाँ आम आदमी को परेशानी उठानी पद रही है तो वहीँ यह आंदोलन केंद्र सरकार के लिये भी चिंता का विषय है| किसान आंदोलन को लेकर बीजेपी और कांग्रेस के कार्यकर्ता आमने-सामने आ गए हैं, जिससे पुलिसकर्मी को भी काफी जद्दोजहद करनी पद सकती है|

कांग्रेस प्रेसिडेंट राहुल गाँधी करेंगे मंदसौर का दौरा

कांग्रेस पार्ट्री के प्रेसिडेंट 6 जून को मंदसौर का दौरा करने वाले हैं वे 1 सरकारी स्कूल में जनसभा को संबोधित करेंगे. बीजेपी इस जनसभा को राजनीती से प्रेरित बता रही है|

किसान आंदोलन का कार्यक्रम

  • किसान आंदोलन के पहले चरण में 1 से 4 जून तक गांवों में युवाओं के सांस्कृतिक कार्यक्रम और पुरानी खेल गतिविधियां होंगी।
  • 5 जून को किसान धिक्कार दिवस के रूप में मनायेंगे इसमें सरकार द्वारा किसानों के खिलाफ लिये गए फैसलों के बारे में चर्चा की जाएगी।
  • 6 जून को श्रद्धांजलि के रूप में मनाया जायेगा, 6 जून को ही राहुल गाँधी की मंदसोर में सभा होनी है
  • 8 जून को असहयोग दिवस के रूप में मनाया जाएगा।
  • 10 जून को भारत बंद रहेगा।

किसान आंदोलन पर हरियाणा के मुख्यमंत्री खट्टर का अजीब बयान

देश का अन्नदाता कथित किसान विरोधी नीतियों के विरोध में सड़कों पर उतर आया है। शुक्रवार से शुरू हुआ आंदोलन के दूसरे दिन भी जारी है। कर्जमाफी और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने सहित 32 मांगों के समर्थन में राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश में किसानों ने सड़कों पर दूध बहाया और सब्जियां फेंकीं।

इसकी वजह से आने वाले दिनों में शहरों में दूध-सब्जी की कीमतों में तेजी आने की आशंका है। वहीं, किसान आंदोलन पर हरियाणा के मनोहर लाल खट्टर ने बयान देकर इस मामले को और गहरा दिया है। उन्होंने कहा, ‘हड़ताल से किसान अपना ही नुकसान कर रहे हैं। किसानों के पास कोई मुद्दा नहीं है।

उनका मकसद, अनावश्यक ही मीडिया और लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचना है। अगर वे अपने उत्पाद नहीं बेच रहे हैं तो इसमें उन्हीं का नुकसान है।’उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय किसान संघ के बैनर तले 110 और किसान एकता मंच के बैनर तले 62 किसान संगठनों ने सरकारी नीतियों के विरोध में शुक्रवार को 1 से 10 जून तक ‘गांव बंद’ आंदोलन का ऐलान किया था।

महासंघ के अनुसार, किसान सब्जियों के न्यूनतम मूल्य, खाद्यान्न के समर्थन मूल्य और किसानों के लिए न्यूनतम आय समेत कई मुद्दों को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।शुक्रवार को किसानों के आंदोलन के साथ बंद का असर 7 राज्यों में दिखा। हालांकि कोई हिंसक घटना होने की सूचना नहीं मिली। हालांकि कुछ ऐसे संगठन भी इसके पक्ष नहीं हैं।

एआईकेएससीसी के वीएम सिंह ने कहा कि उनका संगठन बंद के पक्ष में नहीं है, क्योंकि इससे किसानों को सीधे तौर पर आर्थिक नुकसान होता है। कई अन्य संगठन भी हड़ताल को समर्थन नहीं दे रहे हैं। यूपी, दिल्ली समेत पूरे उत्तर भारत में हालात सामान्य हैं और महासंघ के आह्वान का कोई असर नहीं है।

दूसरी ओर, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में राज्य सरकारों ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए शहरों में पुलिस की तैनाती कर दी गई। माना जा रहा है कि अगर 10 दिन तक किसानों का यह आंदोलन चलता है तो शहर में सब्जियों और खाद्य पदार्थ को लेकर संकट खड़ा हो सकता है।

आंदोलन के दौरान किसानों ने कोई भी उत्पाद बाजार तक पहुंचाने से मना किया है, चाहे वह सब्जी हो दूध हो या फिर कुछ और। पुणे में किसानों ने खेडशिवापुर टोल प्लाजा पर 40 हजार लीटर दूध बहाया और सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया।

पंजाब में कई इलाकों में विरोध प्रदर्शन किया गया। फरीदकोट में किसानों ने सड़कों पर फल और सब्जियों को फेंककर विरोध जताया। जबकि होशियारपुर में किसानों का जबर्दस्त प्रदर्शन किया। सड़कों पर दूध के टैंकर खाली कर दिए और सब्जियां भी फेंकी। बरनाला में निषेधाज्ञा तोड़कर ट्रैक्टर-ट्रालियों में सवार होकर किसान डीसी कॉम्प्लेक्स पहुंचे।

वहां किसानों की पुलिस मुलाजिमों से धक्कामुक्की हुई। पुलिस ने हल्का बल प्रयोग कर उन्हें खदेड़ दिया। हड़ताल के पहले दिन मंडी में खूब सब्जियां बिकीं। लुधियाना में रोजाना की तुलना में महज चालीस फीसदी ही सब्जियां मंडी में पहुंची। मुक्तसर में किसान आंदोलन फीका रहा।

अर्थशास्त्र के गुरु ने जल प्रबंधन से बंजर भूमि में उगाया सोना

जिला मुख्यालय उत्तरकाशी से नौ किमी दूर स्थित कंकराड़ी गांव के दलवीर सिंह चौहान ने जल प्रबंधन के बूते अपनी ढलानदार असिंचित भूमि को सोना उगलने वाली बना दिया। टपक खेती व माइक्रो स्प्रिंकलर और मेहनत की तकनीक से वह इस 0.75 हेक्टेयर भूमि पर पिछले 17 साल से सब्जी उत्पादन कर रहे हैं। इससे दलवीर हर वर्ष 3.5 लाख रुपये से अधिक की कमाई कर लेते हैं।

दलवीर सिंह ने वर्ष 1994 में गढ़वाल विवि श्रीनगर से अर्थशास्त्र में एमए करने के बाद वर्ष 1996 में बीएड किया। सामान्य किसान परिवार से ताल्लुक रहने वाले दलवीर पर भाई-बहनों में सबसे बड़ा होने के कारण परिवार चलाने की जिम्मेदारी भी थी। इसलिए उन्होंने गांव के निकट मुस्टिकसौड़ में एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया। लेकिन, स्कूल से मिलने वाला मानदेय परिवार चलाने के लिए नाकाफी था।

वर्ष 2001 में उत्तरकाशी के उद्यान अधिकारी कंकराड़ी गांव पहुंचे तो उन्होंने दलवीर को आंगन के आसपास नकदी फसलों के उत्पादन को प्रेरित किया। दलवीर ने डरते हुए पहले वर्ष एक छोटे-से खेत में छप्पन कद्दू लगाए। घर के नल से पानी भर कर एक-एक पौध की सिंचाई की। संयोग देखिए कि तीन माह के अंतराल में उनके 45 हजार रुपये के छप्पन कद्दू बिक गए।

नौकरी छोड़ प्रगतिशील किसान बने

खेती से लाभ होते देख दलवीर ने प्राइवेट स्कूल की नौकरी छोड़कर सब्जी उत्पादन शुरू कर दिया। पानी के इंतजाम के लिए वर्ष 2008 में एक लाख रुपये की विधायक निधि से दो किमी लंबी लाइन मुस्टिकसौड़ के एक स्रोत से जोड़ी। वहां भी पानी कम होने के कारण घर के पास ही एक टैंक बनाया। इसी बीच कृषि विज्ञान केंद्र चिन्यालीसौड़ में दलवीर ने खेती के साथ जल प्रबंधन की तकनीक सीखी।

फिर वर्ष 2008 में ही सिंचाई के लिए टपक खेती अपनाई। इसके लिए सिस्टम लगाने में कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने दलवीर की मदद की। सूखी भूमि पर जब लाखों रुपये की आमदनी होने लगी तो दलवीर ने वर्ष 2011 में माइक्रो स्प्रिंकलर की तरकीब सीखी।

इसका उपयोग दलवीर ने गोभी, पालक, राई व बेमौसमी सब्जी उत्पादन के लिए बनाए गए पॉली हाउस में किया। आज इन्हीं तकनीकों और अपनी मेहनत के बूते दलवीर जिले के प्रगतिशील किसानों की सूची में हैं।

घर ही बना बाजार

दलवीर की खेती में खास बात यह है कि सब्जी विक्रेता सब्जी लेने के लिए सीधे उनके गांव कंकराड़ी पहुंचते हैं। इसलिए दलवीर के सामने बाजार का संकट भी नहीं है।

कम पानी में बेहतर उद्यानी का गुर सिखा रहे दलवीर

दलवीर की मेहनत को देखने और कम पानी में अच्छी उद्यानी के गुर सीखने के लिए जिले के 45 गांवों के ग्रामीणों को कृषि विभाग व विभिन्न संस्थाएं कंकराड़ी का भ्रमण करा चुकी हैं। दलवीर जिले के 30 से अधिक गांवों में कम पानी से अच्छी उद्यानी का प्रशिक्षण भी दे चुके हैं। इसी काबिलियत के बूते दलवीर को ‘कृषि पंडित’, ‘प्रगतिशील किसान’ सहित कई राज्यस्तरीय पुरस्कार भी मिल चुके हैं।

ऐसी होती है टपक खेती

कम पानी से अच्छी किसानी करने का वैज्ञानिक तरीका टपक खेती है। इसमें पानी का 90 फीसद उपयोग पौधों की सिंचाई में होता है। इसके तहत पानी के टैंक से एक पाइप को खेतों में जोड़ा जाता है। उस पाइप पर हर 60 सेमी की दूरी पर बारीक-बारीकछेद होते हैं। जिनसे पौधों की जड़ के पास ही पानी की बूंदें टपकती हैं। इस तकनीक को ड्रॉप सिस्टम भी कहते हैं।

70 फीसद पानी का उपयोग

माइक्रो स्प्रिंकलर एक फव्वारे का तरह काम करता है। इसके लिए टपक की तुलना में टैंकों में कुछ अधिक पानी की जरूरत होती हैं। इस तकनीक से खेती करने में 70 फीसद पानी का उपयोग होता है। जबकि, नहरों व गूल के जरिये सिंचाई करने में 75 फीसद पानी बरबाद हो जाता है।

दलवीर की बागवानी

ब्रोकली, टमाटर, आलू, छप्पन कद्दू, शिमला मिर्च, पत्ता गोभी, बैंगन, फ्रासबीन, फूल गोभी, राई, पालक, खीरा, ककड़ी के अलावा आडू़, अखरोट, खुबानी, कागजी नींबू आदि।

बेलों को बांधने के लिए बहुत ही उपयोगी है यह यंत्र ,यहाँ से खरीदें

फल जैसे अंगूर और ज्यादतर सब्जियां बेल पर ही उगती है । लेकिन पहले की तरह अब खेती करने का तरीका बदल गया है । पहले सब्जी की बेलों को जमीन पर ही बढ़ने दिया जाता था जिस से पैदावार कम होती थी और साथ में जो फल पैदा होता था वो जल्दी ख़राब हो जाता था ।

लेकिन अब इन बेलों को एक डंडे के साथ बांध दिया जाता है जिस से वो बहुत तेज़ी से बढ़ती है और साथ में उनका फल भी ख़राब नहीं होता । इस तकनीक से फल और सब्जी का आकार भी बड़ा होता है और उसे तोड़ने में भी कोई समस्या नहीं आती ।

लेकिन बांधने का काम बहुत मुश्किल भरा और मेहनत वाला होता है । लेकिन अब एक ऐसा यंत्र (Plant Tying Tapetool Tapener Machine) आ गया है जो बेलों को छड़ी के साथ बांधने का काम मिंटो में कर देता है । सिर्फ इतना ही नहीं अगर आप बाग़ बगीचे का शौंक रखते है तो भी यह यंत्र आपके लिए बहुत काम की चीज़ है । इस से आप फूलों की शाखाओं को बांध सकते है ।

इस यंत्र को आप ऑनलाइन खरीद सकते है । इस यंत्र के लिए जरूरी टेप भी आप ऑनलाइन खरीद सकते है । इस यंत्र को खरीदने के लिए निचे दिए हुए लिंक पर क्लिक करें । इस मशीन की कीमत 2400 रुपये है ।

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यह मशीन कैसे काम करती है उसके लिए वीडियो भी देखें