आप भी कर सकते है हींग की खेती ,एक किल्लो की कीमत है 35000

देश में खेती को लेकर पहले कई प्रयोग किए जा चुके हैं और कई प्रयोगों में भारत को सफलता हासिल हो चुकी है. इसी के साथ देश को खेती की क्षेत्र में एक और सफलता हासिल हुई है. देश में पहली बार हिंग की खेती में सफलता दिखाई दे रही है. भारत में अभी तक हिंग की खेती संभव नहीं हो सकी थी या फीर यूं कहें की यहां एक ग्राम भी हिंग की उत्पादन नहीं हो सकी थी.

हींग की खपत हमारे देश में लगभग 40 प्रतिशत है. यह शायद थोड़ी अजीब भी है की जिस देश में हींग की खपत इतनी ज्यादा है उस देश में इसकी खेती नहीं होती और इसे दूसरे देश से आयात करना पड़ता है. वहीं हींग का बाजार भाव 35000 रुपए प्रति किलो ग्राम है.

इन देशों में होती है हींग की खेती

हिंग एक सौंफ प्रजाति का पौधा है और इसकी लम्बाई 1 से 1.5 मीटर तक होती है. इसकी खेती जिन देशों में प्रमुख तौर पर होती हैं वो है अफगानिस्तान, ईरान, तुर्कमेनिस्तान और ब्लूचिस्तान.

कब और कहां कर सकते हैं हींग की खेती

हींग की खेती के लिए 20 से 30 डिग्री सेल्सियस का तापमान उपयुक्त होता है. भारत में यह तापमान पहाड़ी क्षेत्रों में होता है और इन क्षेत्रों में इसकी खेती आसानी से की जा सकती है. अन्य शब्दों में कहें तो इसकी खेती के लिए न ज्यादा ठण्ड और न ही ज्यादा गर्मी की आवश्यक्ता होती है.

महत्वपूर्ण जानकारी

हींग की खेती के लिए ऐसी जमीन उपयुक्त मानी जाती है जिसमें रेत, मिठ्ठी के ठेले व चिकनी अधिक हो. इसके साथ ही सूरज की धूप सीधे उस जगह पड़नी चाहिए जहां इसकी खेती की जा रही है. जहां छाया पड़ती हो वहां पर इसे नहीं उगाया जा सकता है. पौधों के बीच में 5 फीट की दूरी का होना आवश्यक है.

हींग की खेती की प्रकिया

हींग के बीज को पहले ग्रीन हाऊस में 2-2 फीट की दूरी से बोया जाता है. पौध निकलने पर इसे फिर 5-5 फीट की दूरी पर लगाया जाता है. हाथ लगाकर जमीन की नमी को देख कर ही इसमें पानी का छिड़काव किया जा सकता है, अधिक पानी पौधे को नुकसान पहुंचा सकता है.

पौधों को नमी के लिए गीली घास का भी प्रयोग किया जा सकता है, एक खास बात यह है कि हींग पौधे को पेड़ बनने के लिए 5 वर्ष का समय लगता है. इसकी जड़ों व सीधे तनों से गौंद निकाला जाता है.

हींग के प्रकार और कुछ अन्य जानकारी

हींग मुख्य: दो प्रकार की होती हैं दुधिया सफेद जिसे काबूली सुफाइद बोला जाता है और दूसरी लाल हींग. सल्फर के मौजूद होने के कारण इसकी गंध बहुत तीखी होती है. इसके भी तीन रूप होते है टिमर्स, मास और पेस्ट. यह गोल, पतला राल शुद्ध रूप में होता है जोकि 30 मि.मि. का होता है यह भूरा और फीका पीला होता है. सफेद व पीला पानी में घुलनशील है. जबकि गहरे व काले रंग वाला तेल में ही घुलता है, स्टार्च व गोंद मिला कर ईट के रूप में बेचा जाता है.

भारत में कहां हो रही है हींग की खेती ?

भारत में हिंग की खेती की शुरुआत हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति से हुई है. इंडियन कॉफी बोर्ड के सदस्य डॉ.विक्रम शर्मा और हिमाचल सरकार के वजह से संभव हो पाया है. डॉ. शर्मा ने इसके बीज को इरान और तुर्की से मंगाकर यहां इसकी बीज तैयारल की है.

इसके साथ ही पहांड़ी इलाकों में रह रहे किसानों के लिए अच्छी खबर यह है की वहां के किसान आसानी से हींग की खेती कर सकते हैं. भारत में अभी तक हिंग की खेती संभव नहीं हो सकी थी या फीर यूं कहें की यहां एक ग्राम भी हिंग की उत्पादन नहीं हो सकी थी.

यह है ट्रेक्टर से चलने वाली मिनी कंबाइन ,पूरी जानकारी के लिए वीडियो पर क्लिक करें

भारत में फसल कटाई का काम कंबाइन से किया जाता है । कंबाइन चलाना बहुत ही मुश्किल काम होता है लेकिन अब ये काम बहुत आसान होने वाला है ।भारत में अब ऐसी कंबाइन आ चुकी है जिसे चलाना बहुत ही आसान है। कोई भी किसान इस कंबाइन को खुद चला सकता है । यह कंबाइन Gahir Agro Industries Limited द्वारा त्यार की गई है ।

इस कंबाइन का नाम Nippy 45 है । यह ट्रेक्टर से चलने वाली छोटी कंबाइन है ।इस कंबाइन की क्वालिटी बहुत ही बढ़िया है और इसके रख-रखाव का खर्च भी बहुत कम है । इसको चलाने के लिए कम से कम 45 डबल क्लच ट्रेक्टर जा उस से ऊपर की जरूरत पड़ती है । इस मशीन के कटर का साइज़ 7.5 फ़ीट है ।

वीडियो देखे

New Mini Combine Harvester on the Name of “NIPPY-45” Launched by Gahir Agro Industries.

Posted by Gahir Agro Industries Limited on Sunday, August 5, 2018

इसके अनाज निकलने वाले पाइप से किसी भी तरफ से अनाज निकला जा सकता है ।यह मिनी कंबाइन चलने मैं बहुत लाजवाब है और बहुत कम कीमत पर फसल काटती है । अगर आप इस मशीन की कीमत जा किसी प्रकार की और जानकारी चाहते है तो इस नंबर 097799 11580 पर संपर्क कर सकते है ।

गाजर घास से ऐसे त्यार करें यूरिया जैसी ताकतवर खाद

गाजर घास का वैज्ञानिक नाम पार्थेनियम हिस्टोफोरस है, इसमें प्रचुर मात्रा में नाइट्रोजन होती है। वैसे तो इसका पौधा इंसानों ही नहीं, जानवरों को भी कई तरह के रोग दे सकता है लेकिन इसके पौधे से अच्छी किस्म की कंपोस्ट खाद भी बनाई जा सकती है। यूपी समेत देश के अलग-अलग कृषि विज्ञान केंद्रों में इसके उपयोग के तरीके सिखाए जा रहे हैं।

इसी बीच कुछ किसानों ने इसके तरल खाद बनानी भी शुरू कर दी है। मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के करताज में रहने वाले प्रगतिशील किसान राकेश दुबे ने गोमूत्र और गाजर खास के स्वरस से तरल खाद बनानी शुरू की है, जो यूरिया का अच्छा विकल्प बन रही है।

राकेश दुबे बताते हैं, “कांग्रेस या गाजर खास किसानों को एलर्जी समेत कई बीमारियां दे रही है, इसकी रोकथाम भी बहुत मुश्किल है, खासकर जैविक खेती करने वाले किसान काफी परेशान रहते हैं, मगर ये किसान गाजर घास और गोमूत्र के स्वरस के जरिए अच्छी जैविक खाद बना सके हैं,

जो गेहूं, मक्का से लेकर कई फसलों में काम आएगी। जहर मुक्त खेती में नाइट्रोजन की आपूर्ति हमेशा समस्या रही है। कुछ किसान आंवला और मट्टा मिलाकर छिड़काव करते हैं, कुछ घनजीवामृत से लेकर वेस्टडीकंपोजर तक। लेकिन राकेश दुबे अब गाजर घास का रस छिड़क रहे हैं।

देश के अलग-अलग हिस्सों के किसान भी गाजर घास का सदुपयोग कर सकें, इसके लिए राकेश दुबे ने स्वरस बनाने का एक वीडियो और पूरी जानकारी सोशल मीडिया पर शेयर की है। जिसमें बनाने की पूरी विधि और छिड़काव के तरीके बताए गए हैं।

गाजर स्वरस बनाने की विधि आठ एकड़ मक्के के लिए राकेश दुबे की विधि:

30 किलो गाजर घास को बारीक काटकर 60 किलो गौमूत्र में मिला दिया। फिर उसमें 100 फिटकरी को 3-4 लीटर के गोमूत्र में घोलकर अच्छी तरह मिलाने के बाद गोमूत्र और गाजर घास वाले ड्रम में डाल देंगे। फिर इसे पूरे 3 दिन के लिए ड्रम में रख दिया जाएगा और जिसे समय-समय पर चलाना पड़ेगा। बाद में इसे महीन कपड़े से छानकर अलग कर लिया जाएगा। जिसे बाद फसल पर छिड़काव किया जा सकता है।

प्रति टंकी (20 लीटर वाली) में 2 लीटर गाजर घास स्वरस मिलाना है। इसे सुबह 10 बजे से पहले ही खेतों में छिड़काव करना चाहिए क्योंकि नाइट्रोजन उठाने और स्टोमेटा खुलने का ये उपयुक्त समय होता है।

एक एकड़ की विधि:

चार किलो गाजर घास, 8 लीटर गोमूत्र और 10 ग्राम फिटकरी के जरिए आप स्वरस बना सकते हैं

पाया जाता है विषाक्त रसायन

गाजर घास में रेस्क्युपटरपिन नामका विषाक्त रसायन पाया जाता है। जो फसलों की अंकुरण क्षमता पर विपरीत असर डालता है। इसे पराकरण अगर फसलों में ज्यादा पड़ जाएं तो उनमें दाना बनने की क्षमता कम हो जाती है। इनका दुष्प्रभाव इतना ज्यादा होता है कि दहलनी फसलों में नाइट्रोजन सोखने की जो क्षमता होती है ये उसे भी प्रभावित करते हैं। इसके संपर्क में आने पर किसानों को एग्जिमा, एलर्जी, बुखार और नजला जैसी बीमारियां हो जाती है।

अगर पशु इनके लपेटे में आ जाएं तो या दूसरी घास के साथ इसे खा जाएं तो उनके थनों और नथुनों में सूजन आ सकता है, समस्या ज्यादा गंभीर होने पर मौत भी हो सकती है।

रासायनिक तरीकों से रोकथाम के उपाय

गाजर घास को खत्म करना थोड़ा मुश्किल है लेकिन लगातार अगर कोशिश की जाए तो इसे नष्ट कर सकते है। सबसे जरुरी है इसके पौधों में फूल आने से पहले इन्हें काटकर जलाया जाए। या फिर उनकी खाद बनाई। तीसरा तरीका है।

खरपतवार नाशक का छिड़काव करें? गाजर घास के ऊपर 20 प्रतिशत साधारण नमक का घोल बनाकर छिड़काव करें। हर्बीसाइड जैसे शाकनाशी रसायनों में ग्लाईफोसेट, 2, 4-डी, मेट्रीब्युजिन, एट्राजीन, सिमेजिन, एलाक्लोर और डाइयूरान आदि प्रमुख हैं। अगर घास कुल की वनस्पतियों को बचाते हुए केवल गाजर घास को ही नष्ट करना है तो मेट्रीब्युजिन का उपयोग करना चाहिए।

मैक्सिकन बीटल (जाइगोग्रामा बाईकोलोराटा) जो इस खरपतवार को बहुत मजे से खाता है, इसके ऊपर छोड़ देना चाहिए। इस कीट के लार्वा और वयस्क पत्तियों को चटकर गाजर घास को सुखाकर मार देते हैं।

ज्यादा जानकारी के लिए वीडियो देखे

गाजर घास से कंपोस्ट बनाने के उपाय

जौनपुर के बक्शा कृषि विज्ञान केन्द्र के कृषि वैज्ञानिक डॉ. संदीप कन्नोजिया हैं,”इस घास से यदि किसान खाद बना लें तो उनकी परेशानी का हल निकल आएगा। गाजर घास से खाद बनाने के लिए किसानों को एक गड्ढा खोदना होता है। गड्ढे की लम्बाई 12 फीट, चौड़ाई चार फीट और घहराई पांच फीट होनी चाहिए। इस गड्ढे में नौ इंच चौड़ी की दीवार बनानी होगी। इसे सीधा जोड़ेंगे। जब तीन स्टेप तीन रदृा ईंट रखने के बाद सात इंच चारों ओर जाली बनाई जाएगी।

इसी तरह ईंट की जोड़ाई सीधी और जालीदार करते रहेंगे। इसके बाद सूखी गाजर घास को अलग और हरी गाजर घास को अलग रख लेंगे। छह इंच तक हरा और सूखा वाला डंठल नीचे भर देंगे। इसके बाद 5 किलो गोबर पानी में ढीला घोलकर इसमें डाल देंगे। साथ में 2 इंच मिट्टी भी डालेंगे। भराई करने के बाद उसके ऊपर से मुलायम वाला डंठल डाला जाएगा। फिर पांच किलो गोबर पानी के साथ मिक्स करके तर करेंगे। इसी तरह गड्ढे को उपर तक भरना होगा।”. संदीप कन्नोजिया कहते हैं, “गाजर घास से बनी 20 टन खाद एक हेक्टेयर खेत के लिए मुफीद है।

news sources: gaonconnection.

पंजाब के किसान ने इंग्लैंड जाकर बनाया यह अनोखा वर्ल्ड रिकॉर्ड

कहते हैं प्रार्थना करना से सभी काम पूरे होते हैं और भगवान हमारी सारी इच्छाएं भी पूरी करते हैं. ऐसे ही हमारे बड़े बुजुर्ग भी कहते थे हर दिन हमे प्रार्थना करना चाहिए. लेकिन कभी अापने सुना प्रार्थना करने का इतना बड़ा फल मिले कि रिकॉर्ड ही बन जाये.

जी हाँ, आज ऐसा ही एक किस्सा हम आपको बताने जा रहे हैं जिसे सुनकर आप भी हैरान तो होंगे ही. 75 साल के रघबीर सिंह संघेरा ने ये बता दिया कि प्रार्थना करने का कितना बड़ा फल मिल सकता है.

दरअसल, रघबीर सिंह संघेरा ने अपने घर में किचन गार्डेन बनाया है जिसमें उन्होंने कई तरह के फल, फूल और सब्जी लगा के रखे हैं. आपको बता दें, करीब 4 महीने उन्होंने अपने गार्डन में ककड़ी के बीज रोपे थे जिसके लिए वो रोज़ प्रार्थना करता था. जी हाँ, पानी और खाद देने के अलावा हर दिन तीन घंटे इन पौधों के पास बैठकर प्रार्थना करते थे.

इस प्रार्थना का असर ऐसा हुआ कि उनकी उगाई ककड़ी इतनी लम्बी हो गई जिसने रिकॉर्ड बना लिया है. आपको बता दें,ककड़ी की लंबाई 51 इंज हो चुकी है और यह अभी भी बढ़ रही है. गिनीज बुक में दर्ज सबसे लंबी ककड़ी करीब 42 इंच है लेकिन इस ककड़ी ने ये रिकॉर्ड तोड़ दिया.

इस पर विशेषज्ञ का कहना है कि संघेरा ने जिस अरमेनियन कुकुंबर प्रजाति नाम की ककड़ी उगाई है जो पहले भी वर्ल्ड रिकॉर्ड के लिए रिजेक्ट हो चुकी है. वहीं गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड के प्रवक्ता का कहना है ‘सबसे लंबे अरमेनियन कुकुंबर संबंधी कोई रिकॉर्ड दर्ज नहीं है,

मगर हमारी वेबसाइट पर जाकर कोई भी नए टाइटल के लिए आवेदन दे सकता है.’ आपको बता दें, रघबीर अब इस ककड़ी को लेकर नॉटिंगघम स्थित सिंह सभा गुरुद्वारा लेकर जायेंगे जहां पर वो सेवा करते हैं. उनका कहना है कि वहां ये इसलिए ले जायेंगे ताकि और भी ऐसी ही सब्जियां उगाई जा सके.

एग्री बिजनेस के गुर के साथ ऑर्गेनिक फार्मिंग सीख ऐसे कमाए पैसा , सरकार दे रही है ट्रेनिंग, ऐसे करे अप्लाई

पिछले कुछ सालों में एग्री प्रोडक्‍ट्स (Agri Business) खासकर ऑर्गेनिक (Organic) की डिमांड काफी बढ़ी है। एक रिपोर्ट बताती है कि साल 2020 तक देश में ऑर्गेनिक मार्केट 12 हजार करोड़ रुपए को छू लेगा। देश ही नहीं, विदेशों में भी ऑर्गेनिक प्रोडक्‍ट्स की डिमांड बढ़ रही है। इसी संभावना को देखते हुए केंद्र सरकार द्वारा बेरोजगार युवाओं को एग्री बिजनेस के गुर सिखाए जा रहे हैं। इसमें,ऑर्गेनिक फार्मिंग की बारीकियां भी बताई जाएंगी।

आप भी दो दिन की यह ट्रेनिंग ले सकते हैं। ट्रेनिंग मिनिस्‍ट्री ऑफ स्किल डेवलपमेंट द्वारा संचालित निसबड इंस्‍टीट्यूट द्वारा दी जा रही है। इस दो दिन की ट्रेनिंग के लिए 7000 रुपए फीस ली जा रही है। आइए, आज आज हम आपको बताएंगे कि ऑर्गेनिक फार्मिंग क्‍या है और इसका बिजनेस कैसे किया जा सकता है।

क्‍या है ऑर्गेनिक फार्मिंग

ऑर्गेनिक फार्मिंग टॉक्सिक लोड कम करती है। हवा, पानी, मिट्टी से केमिकल को हटाकर फसल पैदा करने की प्रक्रिया को ऑर्गेनिक फार्मिंग कहा जाता है। जो इन्‍वायरमेंट फ्रेडली होती है, नेचर को नुकसान नहीं पहुंचाती और हमारे शरीर के लिए पूरी तरह फिट होती है।

पिछले कुछ सालों में हमारे देश वासी अपनी हेल्‍थ के प्रति काफी जागरूक हो गए हैं और ऐसे प्रोडक्‍ट्स को अपना रहे हैं, जो उनके शरीर के साथ-साथ इन्‍वायरमेंट को नुकसान नहीं पहुंचाते हों। हालांकि कैमिकल के इस्‍तेमाल से पैदा होने वाले फूड प्रोडक्‍ट्स सस्‍ते होते हैं। बावजूद इसके, जागरूकता के चलते ऑर्गेनिक फार्मिंग से पैदा प्रोडक्‍ट्स की डिमांड बढ़ रही है।

सरकार दे रही है ट्रेनिंग

सरकार ने देश में ऑर्गेनिक फार्मिंग बिजनेस को प्रमोट करने के लिए ट्रेनिंग प्रोग्राम तैयार किया है। केंद्र सरकार की मिनिस्‍ट्री ऑफ स्किल डेवलपमेंट के अंतर्गत चल रहे इंस्टिट्यूट निसबड ने यह प्रोग्राम तैयार किया है। निसबड द्वारा 18 व 19 अगस्‍त को इसकी ट्रेनिंग दी जाएगी। जिसकी फीस 7000 रुपए रखी गई है।

क्‍या मिलेगी ट्रेनिंग

  • ऑर्गेनिक फार्मिंग का सिद्धांत
  • ऑर्गेनिक एग्रीकल्‍चर का वर्तमान परिदृश्‍य
  •  ऑर्गेनिक फार्मिंग क्‍यों
  • ऑर्गेनिक फार्मिंग के फायदे
  •  पारंपरिक खेती को ऑर्गेनिक खेती में कैसे बदलें
  • इनपुट मैनेजमेंट
  • सीड एवं प्‍लांटिंग मैनेजमेंट
  •  ऑर्गेनिक फार्मिंग सर्टिफिकेशन कैसे हासिल करें
  •  न्‍यूट्रिशियन मैनेजमेंट
  • ऑफ फार्म टैक्‍नोलॉजी इनपुट
  • ऑर्गेनिक फील्‍ड एवं क्रॉप मैनेजमेंट

कैसे शुरू करें बिजनेस

आप ऑर्गेनिक फार्मिंग की बेसिक बातें सीखकर एग्री बिजनेस शुरू कर सकते हैं। ट्रेनिंग के दौरान एग्री बिजनेस के बारे में बताया जाएगा। जैसे कि –

  • स्‍टार्ट अप इंडिया मुहिम के तहत एग्री बिजनेस को कैसे जोड़ा जाए
  • एग्री एंटरप्रेन्‍योर कौन हो सकते हैं
  •  एग्री बिजनेस का ओवरव्‍यू, मार्केट साइज, संभावनाएं, डेयरी, ऑर्गेनिक फार्मिंग प्रोडक्‍ट्स, फूड प्रोसेसिंग, पॉल्‍यूटरी एवं सहायक मार्केट
  •  कैसे शुरू किया जाए एग्री बिजनेस
  • फार्म से रिटेल यूनिट तक सप्‍लाई चेन कैसे बनाएं
  • अपने प्रोडक्‍ट्स को बेचने के लिए सोशल मीडिया का इस्‍तेमाल कैसे करें
  • ऑर्गेनिक फूड प्रोडक्‍ट्स के लिए फॉरेन मार्केट तक कैसे पहुंच बनाएं
  • अपने बिजनेस का बढ़ाने के लिए सरकारी स्‍कीमों का लाभ कैसे लें।
  • इसके अलावा ट्रेनिंग के दौरान डेयरी बिजनेस की भी बारीकियां बताई जाएंगी।

कैसे करें अप्‍लाई

अगर आप इस ट्रेनिंग प्रोग्राम में शामिल होना चाहते हैं तो आप इस लिंक पर क्लिक करके रजिस्‍ट्रेशन संबंधी जानकारी ले सकते हैं या फार्म भर सकते हैं।

https://www.niesbud.nic.in/

बहुत ही कमल का है ये आधुनिक थ्रेशर,वीडियो देखें

फसलों की गहाई में मशीन (थ्रेशर) का बड़ा योगदान है। गहाई मशीनों के उपयोग से समय पर गहाई पूरी करके पैदावार की क्षति को जहां काफी हद तक कम किया जा सका है वहीं गहाई का कार्य जो पारम्परिक तरीके से बहुत श्रमसाध्य हुआ करता था, अब बहुत आसान हो गया है।

महीनों तक चलने वाला गहाई का कार्य अब कुछ दिनों में ही सम्पन्न हो जाता है। देश में गहाई मशीनों की संख्या लगभग 25 लाख से ज्यादा है।

यह थ्रेशर कैसे काम करता है उसके लये वीडियो देखें

यह थ्रेशर बहुत ही आधुनिक है और बड़ी ही सफाई से काम करता है ।यह थ्रेशर GS AUTO FEED MULTI CROP THRESHER ,नंदयाल,आंध्रा प्रदेश द्वारा त्यार किया गया है ।

इस थ्रेशर की सहयता से विभिन्न फसलों जैसे सोयाबीन, मक्का, ज्वार, बाजरा आदि तथा तिलही व दलहनी फसलों जैसे अलसी, सरसों, मूंग, चना, उड़द आदि की गहाई की जाती है।

अगर आप इस मशीन की कीमत और दूसरी जानकारी चाहिए तो निचे दिए हुए नंबर पर संपर्क करें 9010889900 ,9010801581 ,9849751998

गन्ने की 25% ज्यादा पैदवार के लिए गन्ने के साथ ऐसे उगाएं चना

गन्ने-चने की शरदकालीन मिश्रित खेती से श्री भगत सिंह (M: 9466941251) गांव कहानगड़- शाहबाद जिला कुरूक्षेत्र (हरिय़ाना ) ने पिछले तीन सालो मे अपनी आमदनी को दुगना कर दिखाया है !

शरदकालीन बीजाई मे (अक्तुबर माह) गन्ने की पैदवार लगभग 25% ज्यादा होती हैं ! पर किसान गेहू की फसल के लालच मे, गन्ने की बीजाई अप्रेल मे देर से करते हैं !

यह फसल भगत सिंह ने 4 एकड़ में उगाई है। चना बैड पर तीन लाइन में है, चौथी नाली में गन्ने की फसल अक्टूबर अंत में बिजाई की गई। मार्च के प्रथम सप्ताह में चने का छोलिया होगा, चने की फसल के साथ गन्ने का उत्पादन होगा।

क्या होता है फायदा:

किसान के अनुसार सर्दकालीन गन्ने की खेती दो साल से कर रहे है। इससे 25 फीसदी अधिक पैदावार होती है। यही नहीं धरती की उर्वरा शक्ति भी खूब बनी रहती है। गन्ने में पानी हलका नालियाें में ही देते हैं।

इसका समाधान हैं गन्ने- चने की शरदकालीन मिश्रित खेती, ज़िसे चने की सीधी बढवार वाली किसम HC-5 ने ज्यादा आसान कर दिया हैं ! क्योंकि किसान को गन्ने की फसल के पूरी पैदवार के साथ , 8 किवटल प्रति एंकड़ चने की फसल भी मिलती हैं और ज़मीन की उपजाऊ शक्ती भी बनी रहती हैं !

चने की ह्च सी -5 ( HC-5) किसम के बीज के लिये सम्पर्क करे : श्री जगदीप सिंह ढ़िल्लों, पंजाब ( 9915463033) य़ा श्री राजिन्द्र पवार मध्य प्रदेश ( 9907236006)

विडिओ देखें .

बहुत कमाल की है यह गन्ना काटने वाली मशीन,जाने पूरी जानकारी

भारत में गन्ने की फसल मुख्या फसलों में से एक है इस लिए देश के बहुत सारे किसान गन्ने की खेती पर निर्भर है । लेकिन सब से मुश्किल काम गन्ने की कटाई का होता है। अगर इसको हाथ से करें तो बहुत वक़्त और मेहनत लगती है इस लिए अब एक ऐसी मशीन आ गई है जिस से गन्ने को काटने का काम बहुत आसानी से किया जा सकता है ।

यह मशीन एक घंटे में 900 से 1000 क्विंटल की कटाई कर देती है । यहाँ लेबर का खर्चा प्रति क्विंटल आता है वहीँ इस मशीन से इसका खर्चा सिर्फ 6 रुपये आता है । इस मशीन के साथ सिर्फ ट्रिंच विधि से ही गन्ने की कटाई की जा सकती है । आम तरिके से लगाए गए खेतों में इस मशीन को नहीं चलाया जा सकता ।

शक्तिमान कंपनी द्वारा गन्ना काटने वाली मशीन त्यार की गई है जो गन्ना काटने का काम बहुत तेज़ी से कर सकती है । इस मशीन का इंजन बहुत ही ताकतवर है इसमें 6 सिलिंडर वाला 173 हॉर्स पॉवर का इंजन लगा है ।यह मशीन पूरी तरह से आटोमेटिक है इसके केबिन में डिस्प्ले लगा हुआ है जिस पर हम मशीन की सारी गतिविधि देख सकते है ।

इस मशीन को चलना बहुत ही आसान है । केबिन में AC भी लगा होता है पूरी मशीन को सिर्फ एक लिवर (जॉय स्टिक) से चल्या जाता है ।अगर आप इस मशीन की कीमत जा फिर कोई और जानकारी चाहते है तो निचे दिए नंबर और पते पर संपर्क कर सकते है ।

  • TIRTH AGRO TECHNOLOGY PVT. LTD.
    Dist.: Rajkot.State: Gujarat- INDIA
    Pincode-360311.
  • +91 (2827) 661637 (30 Lines) / +91 (2827) 270 537
  • SMS +91 9925250169 /
  • mail– info@shaktimanagro.com

यह मशीन कैसे काम करती है उसके लिए वीडियो देखें

यह मशीन सिर्फ चारा ही नहीं काटती, आटा और दलिया भी त्यार करती है

हर किसान घर पर एक दो पशु जरूर पालता है और उसके लिए उसे एक अच्छी चारा मशीन की जरूरत होती है । और हर किसान के घर में एक चारा मशीन जरूर होती है ।

लेकिन क्या हो अगर चारा काटने वाली मशीन चारा काटने के साथ साथ आटा पीसने ,दलिया बनाने और फसलों के अवशेषों का चुरा बनाने का भी काम करे । ऐसी ही एक मशीन विधाता कंपनी द्वारा त्यार की गई है जो ये तीनो काम करने में सक्षम है ।

इस मशीन की दूसरी खास बात यह है की इस मशीन का आकार बहुत छोटा है जिस की सहयता से हम 20 गाय और 150 बकरी का चारा काट सकते है । इस मशीन के साथ मक्का ,जवार बाज़रा अदि का चारा त्यार कर सकते है ।

इसमें अलग अलग आकार की छाननी लगी होती है । जिस से हम दाने का आकार बड़ा जा छोटा कर सकते है । इसमें 2 से लेकर 10 की मोटर का इस्तमाल होता है ।और इसको डीज़ल इंजन से भी चला सकते है । इस मशीन की पूरी जानकारी के लिए निचे दिए हुए नंबर पर सम्पर्क कर सकते है । WhatsApp no + 91 562 2240765

यह चारा मशीन कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो देखें

इस राज्य में दूध से महंगा बिक रहा है गौमूत्र, किसानों को बढ़ सकता है मुनाफा

किसानों के लिए डेयरी उद्दोग भी एक अच्छी आमदनी का जरिया बनता जा रहा है. पिछले कुछ वर्षों में किसानों के बीच डेयरी उद्दोग रफतार पकड़ता दिखाई दिया है.

एसे कई उदाहरण देखन को मिले हैं जिसमें युवाओं ने मल्टीनेश्नल कंपनी की जॉब छोड़कर डेयरी उद्दोग को व्यवसाय के तौर पर अपनाया है. वहीं डेयरी किसान गायों के जरिए कई तरह से कमाई कर सकते हैं यह बात तो लगभग सभी डेयरी किसानों ने सुना है. और यह बात सच भी साबित हो रही है.

राजस्थान के डेयरी किसान अब गाय के दूध को नहीं बल्कि गौमूत्र को भी अपनी मुनाफे का जरिया बना रहे हैं… गौमूत्र की मांग इतनी ज्यादा बढ़ रही है कि किसान थोक बाजार में गिर और थारपारकर जैसी हाई ब्रीड गायों के मूत्र को बेचकर मुनाफा कमा रहे हैं.

किसान गौमूत्र को 15 से 30 रुपए प्रति लीटर पर बेच रहे हैं. वहीं राज्य में गाय के दूध की कीमत 22 से 25 रुपए प्रति लीटर ही है. किसान गौमूत्र उन किसानों को बेच रहे हैं जो किसान जैविक खेती करते हैं. किसान ऐसा मान रहे हैं कि जब से वह गौमूत्र बेच रहे हैं तब से उनकी कमाई लगभग 30 प्रतिशत बढ़ गई है.

जैविक खेती करने वाले किसान गौमूत्र का प्रयोग कीटनाशकों के विकल्प में करते हैं… इसके साथ ही लोग औषधिक उद्देश्यों और अनुष्ठानों में भी इसका उपयोग करते हैं. राज्य में ऐसे एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी भी हैं जो गौमूत्र का प्रयोग अपने ऑर्गेनिक फार्मिंग प्रोजेकेट के लिए करती हैं और लगभग हर महीने 300 से 500 लीटर गौमूत्र का प्रयोग करते हैं.