अब पावर वीडर करेगा खरपतवार की रोकथाम वो भी बहुत कम खर्चे में

एक किसान के लिए खरपतवार की रोकथाम सबसे बड़ी मुसीबत होते है ।अगर वक़्त पर खरपतवार पर नियंत्रण ना क्या जाए तो यह आपकी पूरी फसल ख़राब कर देते है आपकी फसल के उत्पादन में 20 से 30 प्रतिशत तक की कमी आ जाती है ।

लेकिन खरपतवार की रोकथाम इतना आसान काम नहीं है अगर हाथ से खरपतवार की रोकथाम की जाए तो बहुत समय और मेहनत लगती है लेकिन अगर नदीननाशक दवाइओं का प्रयोग किया जाए तो बहुत महंगा पड़ जाता है ।

ऐसे में किसानो के लिए एक बहुत ही उपयोगी मशीन का अविष्कार क्या है जिस से आप मिन्टों में खेत से खरपतवार का सफाया कर सकते है । इतना ही नहीं इस मशीन के साथ और भी अटैचमेंट्स आती है।

जिस में एक पावर वीडर (खरपतवार निकलने के लिए ) आता है जिसकी कीमत 4250 रु होती है । एक पैडी कटर आता है जिस से आप धान की कटाई कर सकते है ।जिसकी कीमत 2000 रु है साथ में एक ब्रश कटर आता है जिस से आप घास काट सकते है । जिसकी कीमत 2000 रु है ।

सो इस तरह से आप एक मशीन से अलग अलग अटैचमेंट्स लगा कर अलग अलग तीन काम कर सकते है । इस मशीन को आप किराये पर भी दे सकते है । और अच्छा लाभ कमा सकते है ।

मशीन की जानकारी

इसमें 4 स्ट्रोक 52CC इंजन लगा होता है जो पेट्रोल पर चलता है । एक लीटर पेट्रोल से आप इस मशीन को दो घंटे तक चला सकते है । जिस से आप बहुत सा काम ख़तम कर सकते है ।इस मशीन की कीमत सिर्फ 16000 रु है और इसकी अटैचमेंट्स की कीमत अलग है ।अगर आप इस मशीन को खरीदना चाहते है तो 9830182243 नंबर पर संपर्क कर सकते है ।इसके इलवा आप इस लिंक https://dir.indiamart.com/impcat/power-weeder.html पर क्लिक करके और भी डीलर से संपर्क कर सकते है

पावर वीडर कैसे काम करता है वीडियो देखें

क्या कहता है मौसम का पूर्वानुमान

पंजाब, हरियाणा व उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में आने वाले दिनों में गरज-चमक के साथ बारिश के आसार हैं। अनुमान के मुताबिक इस हफ्ते जहाँ एक ओर पश्चिम बंगाल व हिमालयी क्षेत्र जैसे सिक्किम व हिमाचल में बारिश व गरज-चमक के आसार हैं तो वहीं पश्चिमी राजस्थान, महाराष्ट्र और उड़ीसा राज्यों में भी बारिश की संभावना है।

इसके अतिरिक्त राजधानी दिल्ली समेत हरियाणा व चंडीगढ़ में भी बारिश, धूल भरी आंधी की संभावना व्यक्त की गई है।

इस मौसम में वैज्ञानिक सलाह के तौर पर अनाज के भंडारण का विशेष ध्यान देने का सुझाव दिया गया है। भंडारगृहों में नमी आदि पर खास नजर रखनी होगी। इस समय भंडारण किए गए अनाज को रखने से पूर्व उसके पूरी तरह से सूखा होना जरूरी है। गेहूँ की जिस फसल में बाली में दूध आने की अवस्था है उसमें सिंचाईं करना आवश्यक है।

इसके साथ-साथ इन दिनों हरा चना की बुवाई करना जरूरी है। इसके लिए पूसा विशाल, पूसा रत्ना, पूसा 5931, पूसा बैसाखी, पीडीएम-11, SML-32, SML-668 हायब्रिड किस्मों की बुवाई की जा सकती है।

खीरे की बुवाई के लिए पूसा उदय व भिंडी की A-4, परबनी क्रांति, अर्का अनामिका संकर किस्मों की बुवाई कर देनी चाहिए। भिंडी की फसल में माइट के प्रकोप पर निगरानी करने की आवश्यकता है। इथियान की 1.5 मिलि./लिटर पानी के साथ उपयोग करने की जरूरत है। रबी की फसल की कटाई के बाद खेत की गहरी जुताई करने की सलाह दी जाती है। साथ ही उन फसलों की बुवाई की जा सकती है जो हरी खाद बनाती है।

यह मशीन सिर्फ चारा ही नहीं काटती,आटा और दलिया भी त्यार करती है

हर किसान घर पर एक दो पशु जरूर पालता है और उसके लिए उसे एक अच्छी चारा मशीन की जरूरत होती है । और हर किसान के घर में एक चारा मशीन जरूर होती है ।

लेकिन क्या हो अगर चारा काटने वाली मशीन चारा काटने के साथ साथ आटा पीसने ,दलिया बनाने और फसलों के अवशेषों का चुरा बनाने का भी काम करे । ऐसी ही एक मशीन विधाता कंपनी द्वारा त्यार की गई है जो ये तीनो काम करने में सक्षम है ।

इस मशीन की दूसरी खास बात यह है की इस मशीन का आकार बहुत छोटा है जिस की सहयता से हम 20 गाय और 150 बकरी का चारा काट सकते है । इस मशीन के साथ मक्का ,जवार बाज़रा अदि का चारा त्यार कर सकते है ।

इसमें अलग अलग आकार की छाननी लगी होती है । जिस से हम दाने का आकार बड़ा जा छोटा कर सकते है । इसमें 2 से लेकर 10 की मोटर का इस्तमाल होता है ।और इसको डीज़ल इंजन से भी चला सकते है । इस मशीन की पूरी जानकारी के लिए निचे दिए हुए नंबर पर सम्पर्क कर सकते है । WhatsApp no + 91 562 2240765

यह चारा मशीन कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो देखें

फैशन डिजाइनिंग छोड़कर इस लड़की ने शुरू किया बकरी पालन

हर कोई पढ़ लिखकर अच्छी नौकरी करना चाहता है, कभी आपने ये सुना है कि पढ़ाई करने के बाद किसी ने बकरी पालन करना चुना हो। पशुपालन व खेती से तो हमारे युवा वैसे भी दूर भागते हैं ऐसे में ये बात तो मजाक ही लगेगी। लेकिन ऐसा हुआ है और समाज में इस बदलाव की कहानी को लिखा है श्वेता तोमर ने। श्वेता ने किसी छोटे नहीं बल्कि निफ्ट (NIIFT) जैसे देश के सर्वश्रेष्ठ फैशन डिजाइनिंग इंस्टीट्यूट से पढ़ाई की है और अब वह उत्तराखंड के अपने गांव में बकरीपालन कर रही हैं।

श्वेता का सफर 2015से शुरू होता है जब वो शादी करके अपने पति के साथ बैंग्लोर शिफ्ट हुईं। वो पहले से एक सफल फैशन डिजाइनर थीं। बैंग्लोर आने के बाद वो घर पर खाली नहीं बैठना चाहती थीं बल्कि खुद का कोई काम शुरू करना चाहती थीं।

एक दिन श्वेता अपने पति के साथ एक बकरी का फार्म देखने गईं। वहां उन्होंने कुछ समय बिताया और उन्हें बहुत अच्छा लगा। वो खाली समय में अक्सर वहां जाने लगीं, धीरे धीरे उन्होंने फार्म में बकरी पालन की सारे नियम समझ लिए। श्वेता ने भी बकरीपालन करने का मन बना लिया था।

एक गाँव में जन्मी और पली बढ़ी श्वेता को अच्छी तरह से पता था कि वो अपने इस शौक को इस शहर में नहीं पूरा कर सकती हैं और इसलिए उन्होंने बैंग्लोर शहर की अपनी अच्छी खासी लाइफस्टाइल छोड़कर उत्तराखंड के देहरादून के पास रानीपोखरी जैसे छोटे से गाँव में जाने का फैसला किया।

उन्होंने अपने पति रॉबिन स्मिथ से जब ये बात बताई तो उन्होंने खुशी-खुशी श्वेता को ये काम करने के लिए स्वीकृति दे दी। श्वेता ने बकरी पालन शुरू करने के लिए अपनी सारी जमा पूंजी उसमें लगा दी। यहां तक बिजनेस को अच्छे स्तर तक पहुंचाने के लिए बैंक से लोन भी लिया।

श्वेता बताती हैं, उनके नजदीकी लोग उनके इस फैसले से हैरान थे। मेरी पढ़ाई और डिग्री को देखकर हर कोई सोचता था कि मुझे किसी बड़ी कंपनी में जॉब करनी चाहिए और अच्छे पैसे कमाने चाहिए। मेरा सबकुछ छोड़कर बकरी पालन करने का ये फैसला बिल्कुल गलत है और गाँव में कुछ नहीं रखा है करने को।

हर नस्ल की बकरियां हैं फार्म में

श्वेता ने अपना बिजनेस जिस जगह शुरू किया था वहां बहुत से जंगली जानवरों के आने का खतरा भी रहता था जो कभी भी बकरियों पर हमला कर सकते थे। लेकिन फिर भी श्वेता ने हार नहीं मानी और बैंक से लोन लेकर 250 बकरियों से बिजनेस शुरू कर दिया। इस समय श्वेता के फार्म में अलग अलग प्रजातियों की सौ से ज्यादा बकरियां पली हैं। इनमें सिरोही, बरबरी, जमना पारी और तोता पारी ब्रीड के पांच हजार से लेकर एक लाख तक के बकरे मौजूद हैं।

श्वेता बकरीपालन में पूरी तरह पारंगत हो चुकी हैं। बकरियों का दूध निकालने से लेकर उनकी देखभाल और छोटा-मोटा इलाज सब वो खुद ही करती हैं। जरूरत पड़ने पर वह खुद ही बकरों को बिक्री के लिए लोडर में लादकर मंडी ले जाती हैं। श्वेता के फार्म पर बकरियों की बिक्री इंटरनेट के माध्यम से भी होती है।

श्वेता बताती हैं शुरुआत में सरकारी स्तर पर छोटी-मोटी कई दिक्कतें आईं पर पशुपालन विभाग का उन्हें सहयोग समय-समय पर मिलता रहा। पिछले साल श्वेता का टर्नओवर 25 लाख रुपये का था। श्वेता अब अपना व्यवसाय शुरू करने के बाद दूसरों को प्रोत्साहित करने के लिए प्रशिक्षण भी देती हैं।

इस तरीके से टमाटर की खेती कर लखपति बन गया किसान, ये है तरीका

ईमानदारी से की गई मेहनत कभी बेकार नहीं जाती, अगर सही मार्गदर्शन में, सही दिशा में, पूरी लगन के साथ कोई काम किया जाए तो सफलता जरूर मिलती है। कुछ ऐसी ही सफलता की कहानी है पवन मिश्रा की, जिन्होंने अपनी कड़ी मेहनत के दम पर सफलता हासिल की है, और टमामटर की खेती से लखपति बन गए हैं।

 

उमरिया जिले के पाली विकास खंड के अंतर्गत ग्राम पंचायत घुनघुटी के रहने वाले पवन मिश्रा ने टमाटर की खेती करने की ठानी, और उसके लिए प्रयास करना शुरू किया। आलम ये रहा कि प्रयास सफल रहा और आज किसान पवन मिश्रा को वही टमाटर की खेती ने लखपति बना दिया है।

घुनघुटी के किसान पवन मिश्रा टमाटर की खेती कर आज लाखों रुपए हासिल कर रहे हैं, टमाटर की उन्नति खेती से किसान की आर्थिक स्थिति भी मजबूत हुई है, साथ ही जब सफलता मिल रही है तो अब सब्जी की खेती के प्रति उनका इंट्रेस्ट और बढ़ गया है। और अब सब्जी की खेती में अलग-अलग एक्सपेरीमेंट भी कर रहे हैं।

किसान पवन मिश्रा ने बताया कि शुरुआत में उन्होंने 1 एकड़ में टमाटर की खेती की थी। इसके बाद धीरे-धीरे क्षेत्रफल बढ़ता गया और अब वो कई एकड़ में टमाटर की खेती कर रहे हैं। पवन की मानें तो उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों से मिलने के बाद उन्हें सब्जियों की खेती के उन्नत तरीके के बारे में जानकारी मिली। और जब विस्तार से इसकी जानकारी उन्होंने हासिल कर ली तो अहसास हुआ कि ये तो कमाई का अच्छा जरिया बन सकता है, इस खेती को लाभ का धंधा भी बनाया जा सकता था।

फिर क्या था उन्होंने विशेषज्ञों के बताए अनुसार खेती शुरू कर दी, सफलता मिलती रही, धीरे-धीरे और एक्सपेरीमेंट करते रहे, खेती का दायरा और बढ़ाया, जिसके बाद अब टमाटर की खेती से लाखों की कमाई कर रहे हैं। पवन मिश्रा के मुताबिक उद्यानिकी से ड्रिप सिंचाई योजना, रोड नेट हाउस जैसी योजनाओं का लाभ लिया है और लगातार उद्यानिकी विभाग के बताए अनुसार सब्जी की खेती कर रहे हैं जिससे उन्हें सफलता हासिल हो रही है।

तीन दोस्तों ने बंजर जमीन पर शुरू की एलोविरा की खेती

‘सोच को अपनी ले जाओ उस शिखर पर, ताकि उसके आगे सितारे भी झुक जाएं’, इसे सही साबित किया है तीन दोस्‍तों ने। हिसार ऑटो मार्केट के तीन दोस्त संतलाल चित्रा, राजा सोनी और मुकेश सोनी अपनी सोच को वाकई उस शिखर तक ले गए और कामयाबी के सितारे आज उनके कदमों में हैं। उन्‍होंने बंजर भूमि पर खेती कर सालाना 60 लाख रुपये कमा रहे हैं।

एक शुभचिंतक की सलाह पर तीनों ने एलोवेरा की खेती करने की ठानी। दिक्कत यह थी कि उनके पास जौ भर जमीन नहीं थी। लीज पर जमीन लेने का फैसला किया। बहुत मुश्किल से एक किसान ने अपनी दो एकड़ अनुपयोगी पड़ी जमीन दी। तीनों ने उसे अपने श्रम के पसीने से सींचा। आज 62 एकड़ जमीन लीज पर लेकर खुशहाली की फसल काट रहे हैं। रोहतक में आयोजित एग्री लीडरशिप समिट में पहुंचे ये तीनों किसान युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं।

तीनों दोस्तों में एक संतलाल चित्रा मोटर मैकेनिक थे। बाकी दो राजा और मुकेश टायर बेचते थे। तीनों के परिवार का बामुश्किल गुजर बसर होता था। एक दिन राजस्थान के चुरू के रहने वाले आबिद हसन अपनी गाड़ी ठीक कराने संतलाल के पास पहुंचे। संतलाल ने आबिद की गाड़ी ठीक कर दी तो आबिद की सलाह ने संतलाल और उनके दोनों दोस्तों की जिंदगी की गाड़ी पटरी पर ला दी।

आबिद ने तीनों को एलोवेरा की खेती के लिए प्रोत्साहित किया। तीनों दोस्तों ने आबिद की सलाह मान ली। पांच साल पहले 2013 में पहले हिसार के चौधरीवास गांव में दो एकड़ बंजर जमीन लीज पर लेकर एलोवेरा की खेती शुरू की। पहले ही साल इन्हें एक लाख रुपये का मुनाफा हुआ। अब ये गांव चौधरीवास में 40 एकड़ और बगला गांव में 22 एकड़ में एलोवेरा की खेती कर रहे हैं। प्रतिवर्ष तीनों को 60 लाख रुपये का मुनाफा होता है।

आबिद खुद करते हैं एलोवेरा की खेती

चुरू में करीब 200 एकड़ जमीन पर एलोवेरा की खेती करने वाले आबिद हसन तीनों को सलाह ही नहीं दी, मार्केट भी उपलब्ध कराया। खुद आबिद पिछले दस साल में एलोवेरा की खेती करके अब बड़े निर्यातक बन गए हैं।

संतलाल, राजा और मुकेश बताते हैं कि एलोवेरा की खेती ने हमें संपन्न बना दिया है। अब हमारा लक्ष्य है कि हम भी खेती से मुंह मोड़ चुके युवाओं को एलोवेरा की खेती के लिए प्रेरित करें। इस समय हमसे दस युवा एलोवेरा की खेती करना सीख रहे हैं। हम चाहते हैं कि सौ युवाओं को इसकी खेती से जोड़ें।

जिन गायों को बेकार समझ लोगों ने छोड़ दिया, उन्‍हीं से यहाँ होती है लाखों की कमाई

दूध नहीं दे पाने की स्थिति में जिन गायों को किसानों और गौपालकों ने अनुपयोगी समझकर लावारिस भूखा-प्यासा भटकने के लिए छोड़ दिया था। अब उन्हीं गायों के गोबर और पेशाब से नगर निगम की लालटिपारा गौशाला में कैचुआ खाद, नैचुरल खाद और धूपबत्ती बनाई जा रही है।

वहीं पेशाब से कैमिकल रहित गोनाइल और कीटनाशक दवाईयां व मच्छर भगाने की धूपबत्ती तैयार की जा रही है। कीटनाशक दवाईयां खेती और बागवानी के लिए बेहद उपयोगी हैं। इससे नगर निगम को भी अभी तक करीब 3 लाख रुपये का आर्थिक लाभ हो चुका है।

गौमूत्र से बन रहा गौनाइल

प्रकृति में गाय के गोबर और पेशाब को सबसे पवित्र और शुद्ध माना जाता है। हिन्दू धर्म में गाय के पेशाब और गोबर का उपयोग पंचगव्य में किया जाता है, कहा जाता है कि इसके पीने से मनुष्य के सभी दोष दूर हो जाते हैं। नगर निगम की लालटिपारा गौशाला में करीब 6000 गाय हैं, इन गायों से प्रतिदिन नगर निगम को 60 हजार किलो गोबर मिलता है।

इस गोबर का नगर निगम ने कई तरह से उपयोग करना शुरू कर दिया है। वहीं गाय की पेशाब जिसका अभी तक कोई उपयोग नहीं होता था उससे वहां पर अब फिनाइल के स्थान पर गौनाइल बन रहा है, जो फिनाइल से भी बेहतर कार्य करता है। साथ ही पेशाब से बनने वाले कीटनाशकों का उपयोग खेती में किया जा रहा है। जिससे खेती को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों का खात्मा तो होता ही है साथ ही मनुष्य के स्वास्थ्य पर भी इसका कोई विपरित असर नहीं पड़ता।

धूपबत्ती में आयुर्वेदिक औषधी और घी का उपयोग

नगर निगम की लालटिपारा गौशाला में बनाई जा रही धूपबत्ती में गाय का गोबर, लाल चंदन, नागरमोथा, जटामासी, कपूर काचरी, गौमूत्र और देशी घी डाला जाता है। इनको मिलाने के बाद इसे आकार देकर सूखने के लिए रखा जाता है।

गौनाइल ऐसे हो रही तैयार

गौनाइल बनाने के लिए गाय और बछियाओं का गौमूत्र एकत्रित किया जाता है, इसके बाद इसमें चीड़ का तेल और नीम मिलाया जाता है। इससे जहां भी पोछा लगाया जाता है वहां के कीटाणु खत्म हो जाते हैं।

सुगंधित व केमिकल रहित मच्छर भगाने वाली धूप

गोबर, गौमूत्र में जामारोजा, तुलसी, नीमगिरी, चीड़ का तेल, कपूर तेल, नीम तेल, नागरमोथा, मैंदा लकड़ी और रोहतक लकड़ी को मिलकर धूपबत्ती तैयार की जा रही है। बताया जाता है कि इसके जलाने से घर में सुगंध तो रहती ही है साथ ही मच्छर भी भाग जाते हैं।

कैचुआ खाद भी हो रही तैयार

गाय के गोबर से गौशाला में कैचुआ खाद भी तैयार की जा रही है, इस खाद को उद्यानों और किसानों को दिया जाएगा। गाय के गोबर को एकत्रित कर उसके स्ट्रक्चर बनाए गए हैं इन पर समय-समय पर पानी का छिड़काव किया जाता है। जब यह सूख जाता है तो इसे छान कर किसानों को जैविक खाद बेचने के लिए तैयार किया जा रहा है।

ताजे गोबर से बन रही गोबर गैस

गाय के ताजे गोबर से प्रदेश के सबसे बड़े गोबर गैस प्लांट से गैस तैयार हो रही है, इस गैस से गौशाला में कार्य करने वाले कर्मचारियों एवं गौशाला का भ्रमण करने के लिए आने वाले करीब 200 लोगों का भोजन तैयार होता है। वहीं इससे निकलने वाले गोबर को खाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

निगम आयुक्त विनोद शर्मा कहते हैं-

जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए गोबर गैस प्लांट और कैचुआ खाद को किसानों में बेचा जाता है। साथ ही गौनाइन का भी उत्पादन शुरू हो गया है जल्द ही इसे बड़े स्तर पर करने के लिए गौशाला में ही बाटलिंग प्लांट लगाया जाएगा। वहीं मार्केट में जल्द ही धूपबत्ती भी ला रहे हैं।

फैक्ट फाइल

  • वर्ष 2017-18 में किसानों को गौशाला से 2.5 लाख रुपये की खाद बेची गई।
  •  होली पर करीब 42 हजार रुपये के कण्डे बेचे गए, साथ ही श्मशान में भी अभी तक करीब 30 शवों का लकड़ी विहीन कण्डों से दाह संस्कार किया गया।
  • 40 हजार की अभी तक गौनाइल बिक चुकी है।
  • अभी तक करीब 10 हजार रुपये की धूपबत्ती बनायी जा चुकी है। इसे जल्द ही मार्केट में लाया जाएगा।

बोर कराने से पहले नारियल और अंडा टेस्ट से जाने जमीन में कहाँ है मीठा पानी

खेती के लिए सबसे जरूरी चीज़ होती है वो है पानी । लेकिन जमीन के अंदर मीठा पानी कहाँ मिलेगा ये पता लगाना काफी मुश्किल काम है । क्योंकि कई बार किसान ट्यूबवेल बोर करने पर बहुत सारा पैसा खर्च कर देता है लेकिन जा तो वहां पर पूरा पानी नहीं बनता जा फिर पानी बहुत ही खरा होता है जो फसलों के लिए बहुत ही नुकसानदायक होता है ।

ऐसे में बहुत से तरीकों है जिस के इस्तेमाल से ये पता लगाने की कोशिश की जाती है की आखिर खेत में मीठा पानी कहाँ मिल सकता है ।आज हम आपको ऐसे ही 2 तरीकों के बारे में बताएँगे जो भारत में बहुत प्रचलित है।

अंडे और नारियल के इस्तेमाल से -इस तरिके में एक अंडे जा नारियल को हथेली पर रख कर खेत में घुमा जाता है ।और जहाँ पर भी अंडा जा नारियल हथेली में ऊपर उठने लग जाता है तो समझा जाता है के वहां पर धरती के अंदर मीठा पानी है ।

अब इसके पीछे कोई वैज्ञानिक कारण है जा अन्धविश्वाश ये कहना मुश्किल है लेकिन इस विधि का इस्तेमाल करने वाले बताते है के ये तरीका काफी कामयाब है । हालाँकि की कुछ लोगों का मानना है के ये सब नारियल और अंडे के अंदर के पानी के कारण होता है जो उसे खड़ा कर देता है ।

ये तकनीक कैसे काम करती है उसके लिए वीडियो भी देखें

किसान भाई इन तरीकों से बचा सकते है ट्रैक्टर का डीजल…

मंहगाई की इस मार में प्रतिदिन रोजमर्रा की चीजें मंहगी होती जा रही है. मंहगाई की मार से कोई भी तबका बचा नहीं है. डीजल तथा पेट्रोल के दाम भी आसमान छू रहे हैं. कृषि कर्यो में खनिज तेल की खपत बहुत तेजी से हो रही है. ऐसे में किसान भाइयों के लिए भी मुनाफ़ा मिलना बड़ा मुश्किल हो जाता है.

आज हम आपको बताएंगे कि डीजल की खपत को कम करने के लिए वो कौन से प्रमुख बिंदु है, जिनपर अगर आप ध्यान दे तो आप डीजल की खपत को कम कर सकतें है…

1- किसान भाई जब भी ट्रैक्टर खरीदतें है, तो उसके साथ आपको एक निर्देशन पुस्तिका मिलती है. मशीन के उपयोग से पहले आप इस पुस्तिका को एक बार ध्यान से जरूर पढ़ लें और जो निर्देश पुस्तिका में दिए गए, आप उसी के अनुसार मशीन का उपयोग करें.

2- जब आप इंजन को चालू करते है तो अगर टैपित का शोर ज्यादा सुनाई दे रहा है तो आप समझ जाइए इंजन में कम हवा जा रही है, और अगर इंजन में हवा कम मात्रा में जा रही है तो इससे डीजल की खपत बढ़ जाती है. इससे निपटने के लिए आपको टैपित को दोबारा से बंधवाना चाहिए.

3- अगर ट्रैक्टर के इंजन से निकले धुंए का रंग काला ज्यादा है तो यह भी एक कारण है कि डीजल की खपत ज्यादा हो रही है. इसलिए 600 घंटे तक ट्रैक्टर चलाने के बाद एक बार आप इंजेक्टर की जाँच करवाइए और उसे फिर से बंधवाइए.

4- एक बार जब आपने इंजेक्शन पम्प और इंजेक्टर को भी बढ़िया रूप से रखा है, उसके बाद भी काला धुआं लगातार निकलता है तो आप समझ लीजिये यह इंजन पर पड़ रहे बोझ की निशानी है. किसान भाइयों ट्रैक्टर से लेने वाले काम के बोझ को उतना ही रखे जितना उसकी क्षमता है, अन्यथा भार ज्यादा पड़ने पर डीजल की खपत तो ज्यादा होगी है.

5- अगर इंजन ठंडा है और आप उससे काम कर रहें है तो उसके पुर्जों में ज्यादा घिसावट होती है और डीजल की खपत भी जयादा मात्रा में हीनी शुरू हो जाती है. इसलिए जब भी आप काम करें इंजन को गर्म होने का समय होने दें.

6- डीजल की जयादा खपत का एक कारण ट्रैक्टर की पहियों की हवा भी हो सकती है, इसलिए निर्देश पुस्तिका में पहियों की हवा का जो दाब बताया गया है उसी अनुसार हवा को कायम रखे.

किसान भाइयों ये वो बिंदु है जिनपर अगर आप अमल करें तो निश्चित तौर पर डीजल की खपत को काफी हद तक कम कर सकतें है.

इस जानकारी को बाक़ी लोगों के साथ शेयर करें, जिससे खनिज तेल की खपत को कम करके मुनाफे को बढाया जा सके.

सरकारी नौकरी में नहीं लगा मन तो शुरू किया ये काम

आज के दौर में युवाओं को खेतों में काम करना अच्छा नहीं लगता और हर कोई नौकरी करना चाहता है। वहीं कुछ शख्स ऐसे भी हैं जो नौकरी छोड़ खेती की ओर लौट रहे हैं या इससे जुड़ा बिजनेस शुरू कर रहे हैं।

गुजरात के जूनागढ़ के रहने वाले ऐसे ही एक शख्स हैं तुलसीदास लुनागरिया जिन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ अपना खुद का बिजनेस शुरू किया और सिर्फ 6 साल में वो करोड़पति बन गए। इतना ही इस शख्स ने एक नहीं बल्कि चार बिजनेस की शुरुआत की। आइए जानते हैं इस शख्स ने कैसे की शुरुआत…

नौकरी छोड़कर शुरू किया बिजनेस

तुलसीदास लुनागरिया ने बातचीत में बताया कि जूनागढ़ के कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर से एग्रीकल्चरल साइंस में ग्रैजुएशन करने के बाद उन्होंने नौकरी की तैयारी की। इसके बाद उन्हें ग्रामीण बैंक में नौकरी लगी, जो सरकारी नौकरी थी।

उनका कहना है कि नौकरी के दौरान उनको काम में मन नहीं लगा। उन्हें महसूस हुआ कि वो बिना महत्वाकांक्षा और चुनौती के एक रूटिव वर्क कर रहे हैं। वो खुद के एग्रीवेंचर की शुरुआत करने का सपना देखने लगे। इसलिए 4 महीने बाद ही उन्होंने नौकरी छोड़ दी और अपना खुद का बिजनेस शुरू किया।

एक-दो नहीं 4 बिजनेस किया शुरू

नौकरी छोड़ने के बाद तुलसीदास को एग्री सेंटर एंड एग्री बिजनेस स्कीम के बारे में पता चला। उन्होंने एसीएंडएबीसी के दो महीने के कोर्स में दाखिला लिया और अहमदाबाद में इंटरनेशनल स्कूल ऑफ पब्लिक लीडरशिप (आईएसपीएल) से ट्रेनिंग ली। ट्रेनिंग के दौरान उन्होंने मार्केटिंग, अकाउंटिंग और डीपीआर बनाना सीखा। इस दौरान उन्होंने एग्री बिजनेस से एक्सपर्ट्स से मिलने-सुनने का मौका मिला।

ट्रेनिंग खत्म होने के बाद उन्होंने चार बिजनेस की शुरुआत की। कितना है कंपनियों का टर्नओवर कॉटन सीड्स ऑयल एक्सप्लोरेशन और कॉटन सीड्स केक बनाने वाली कंपनी अविरत कॉटन इंडस्ट्रीज का सालाना टर्नओवर 60 करोड़ रुपए है। एडवेंता एक्सपोट प्राइवेट लिमिटेड वाटर सॉल्यूएबल फर्टिलाइजर, प्लांट ग्रोथ प्रोमोटर औऱ स्वाइल कंडिशनर जैसे पोटैसियम ह्यूमेट, फूलविक एसिड्स का देश भर में सप्लाई करती है। साथ ही एग्रो कमोडिटीज जैसे रॉ कॉटन बेल्स, मसाले, फल और सब्जी का एक्सपोर्ट करती है।

कंपनी का सालाना टर्नओवर 2 करोड़ रुपए है। इसके अलावा रेनो एग्री-जेनेटिक्स प्राइवेट लिमिटेड का टर्नओवर 5 करोड़ और विमैक्स कॉर्प साइंस लिमिटेड का टर्नओवर 28 करोड़ रुपए है। चार कंपनियों का कुल टर्नओवर 95 करोड़ रुपए है। आगे भी पढ़ें

8 राज्यों में फैला है बिजनेस

तुलसीदास का कहना है कि उनका बिजनेस देश के 8 राज्यों में फैला है। यूपी, बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में उनके ग्राहक हैं। विमैक्स कॉर्प साइंस एग्रोकेमिलकल्स की मैन्युफैक्चरिंग और मार्केटिंग करती है।

एग्रो केमिकल्स में इंसेक्टिसाइड्स, फंगीसाइड्स, विडीसाइड्स, प्लांट ग्रोथ रेगुलेटर्स और माइक्रो नूट्रीएंट्स के साथ ऑर्गेनिक पेस्टिसाइट्स बनाती है। 120 लोगों को दे रखा है रोजगार कमाई के साथ वो लोगों को रोजगार भी उपलब्ध करा रहे हैं। उनकी कंपनी में 120 कर्मचारी काम करते हैं। उन्होंने हरके साल एक लाख किसानों तक पहुंच बनाने का लक्ष्य बनाया है जिसके लिए वो प्रयासरत हैं।

5 करोड़ रु है सालाना इनकम

तुलसीदास बताते हैं कि चारों बिजनेस से उनको अच्छी कमाई हो जाती है। वो करीब 5 करोड़ रुपए सालाना इनकम कर लेते हैं। प्रोडक्ट खरीदने वाले किसानों को वो खेती के बारे में ज्ञान भी देते हैं। कब उस फसल को पानी देना है, कब नूट्रीएंट्स देने हैं और पेस्टिसाइड्स का छिड़काव करना है। वो कहते हैं कि उनके इस सर्विस से किसान खुश हैं।