मटर के साथ ऐसे कर सकते है गेहूं की खेती ,दोगुना होगा मुनाफा

उत्तर प्रदेश के सैकड़ों किसान सहफसली खेती करके लाभ कमा रहे हैं। इससे फसलों की संख्या बढ़ जाती है। लागत भी कम आ रही है। इस दौरान कई क्षेत्रों में मटर के साथ गेहूं खूब देखा जा सकता है।

कन्नौज से करीब आठ किमी दूर मानीमऊ निवासी 18 वर्षीय शैलेंद्र कुमार बताते हैं, ‘‘मटर के साथ गेहूं किया है। मटर उखड़ने को है। गेहूं 20 दिन का हो चुका है। साथ में फसल करने से पानी बचता है। खेत खाली नहीं रहता। जुतौनी व खाद का खर्च भी बच जाता है।’’

एक तरीके से यह लाभकारी है। मटर की 60-65 दिन में तुड़ाई षुरू हो जाती है। 100-110 दिन में खत्म हो जाती है।मटर जब बोया जाता है तो पहला पानी लगाने के दौरान गेहूं छिड़क दिया जाता है।मटर के दौरान ही साथ में गेहूं करने से बुवाई बचती है। खेत तैयार करने, सिंचाई और लेवर खर्च बच जाता है।

लेकिन मटर के बाद गेहूं बोने से विलम्ब हो जाता है। जिसके कारण गेहूं की उतनी पैदावार भी नहीं हो पाती है और साथ में 20-25 फीसदी उत्पादन कम होता है।

समय रहते बुवाई से एक हेक्टेयर में 35-36 क्विंटल गेहूं निकलता है। नही तो 30-35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन होगा। मटर के बाद जनवरी में गेहूं करने से उत्पादन कम मिलेगा। खाली गेहूं समय से करने पर 40-45 क्विंटल गेहूं निकलता है। मटर में उर्वरक ज्यादा पड़ता है, इसलिए सहफसल में नहीं पडे़गा।

लो टनल में ऐसे करें बे-मौसम सब्ज़ियों की खेती, कमाएं अधिक मुनाफा

बहुत कम लोग लो टनल  में खेती करने के बारे में जानते होंगे। यह खेती की एक ऐसी विधि है जिसके द्वारा किसान बे-मौसम सब्जियों की खेती कर सकते हैं, जिससे वो अधिक कमाई कर सकते हैं।

”इस तकनीक के जरिए किसान बे-मौसमी सब्जियां पैदा कर सकते हैं। इसमें सब्जियां उगाने पर सर्दी-गर्मी और बीमारियों का प्रभाव न के बराबर हो जाता है जिससे पैदावार भी काफी अच्छी होती है।” उद्यान विभाग के ज्वाइंट डायरेक्टर राघवेन्द्र प्रताप सिंह ने लो पॉली टनल विधि के बारे में बताया, ”बागवानी विभाग इस तकनीक को अपनाने वाले किसानों को प्रोत्साहित कर रहा है और लो पॉली-टनल बनाने पर सब्सिडी दे रहा है।”

उद्यान विभाग के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2016 में 27937 किसानों को लो पॉली टनल विधि के लिए सब्सिड़ी दी गई थी।

उन्होंने बताया, ”इस विधि से जब किसान सब्ज़ियों की खेती करते हैं बीजों का जमाव अच्छे से हो जाता है और एक महीने पहले सब्जिया आनी शुरू हो जाती हैं। इससे किसान को सब्ज़ियों के काफी अच्छे रेट मिल जाते हैं।” इसका लाभ यूपी के हर जिले के किसान ले सकते हैं।

पॉलीटनल तकनीक क्या हैं?

इस तकनीक में एक तरह से टनल (सुरंग) में सब्जियां पैदा की जाती हैं। लोहे के सरिये और पॉलीथिन शीट से छोटी व लंबी टनल बनाई जाती हैं। इन टनल में सब्जियों को बोने के बाद ड्रिप सिस्टम से सिंचाई की जाती है। टनल की मदद से सब्जी की फसल को ज्यादा गर्मी और सर्दी से बचाया जा सकता है। मौसम फसल के अनुकूल होने के बाद टनल को हटा दिया जाता है। इस तरह से किसान पॉली-टनल में अगेती फसल पैदा कर सकते हैं।

पॉलीटनल तकनीक से लाभ

  • पॉलीटनल तकनीक से वर्ष के किसी भी मौसम में चाहे अधिक गर्मी एवं ठंड हो उस समय भी सब्जियों की पौध सफलतापूर्वक तैयार की जा सकती है।
  • इस विधि से पौधे तैयार करने पर बीज का जमाव लगभग शत्-प्रतिषत होता है। जमाव के बाद पौधों का विकास समुचित ढंग से होता है ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पॉलीटनल के अन्दर का तापमान बीज के जमाव एवं पौधों के बढ़वार के लिए आदर्श होता है।
  • पॉलीटनल में पौध उगाने से बीज जमाव के बाद दिन में धूप के समय पॉलीथीन को हटा देते हैं, जिससे पौधों का धूप के सम्पर्क में आने से उनका कठोरीकरण होता है ऐसे पौधों को खेत में रोपाई करने से उनकी मृत्यु दर नहीं के बराबर होती है।
  • बीज का जमाव शीघ्र होने और पौधों का समुचित बढवार से पौध तेयार करने में समय कम लगता है।
  • पॉलीटनल तकनीक से पौध उगाने पर कीटों व बीमारियों का प्रकोप भी अपेक्षाकृत कम होता है।

एक जनवरी से पूरे देश में किसानों के सीधे खाते में जाएगी खाद सब्सिडी

एक जनवरी से पूरे देश में किसानों के सीधे खाते में जाएगी खाद सब्सिडीएक जनवरी से पूरे देश में किसानों के सीधे खाते में जाएगी खाद सब्सिडीनये वर्ष में किसानों को खाद की सब्सिडी अब सीधे उनके खाते में जमा होगी। सभी राज्यों में इसकी तैयारियां अंतिम चरण में हैं।

नये वर्ष में किसानों को खाद की सब्सिडी अब सीधे उनके खाते में जमा होगी। सभी राज्यों में इसकी तैयारियां अंतिम चरण में हैं। केंद्र सरकार पिछले सालभर से राज्यों के सहयोग से इसे पूरा करने की कवायद में जुटी है।

उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ समेत सभी खाद्यान्न उत्पादक राज्यों में इसे लागू करने के लिए पहले ही टाइम टेबल जारी कर दिया गया था। फर्टिलाइजर पर किसानों को मिलने वाली सब्सिडी में चोरी को लेकर लगातार सवाल खड़े होते रहे हैं।

इससे निपटने के लिए सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग का फैसला लेते हुए पहले चरण में 14 राज्यों के 17 जिलों में इसे लागू किया था। उसके उत्साहजनक नतीजों के मद्देनजर सरकार अब पूरे देश में इसे लागू करने का फैसला किया है। विभिन्न राज्यों में यह व्यवस्था लागू करने के लिए किसानों के बैंक खाते, उनकी जमीन का ब्यौरा और उनके आधार से जोड़ने का काम पूरा हो चुका है।

  • सभी राज्यों में तैयारियां पूरी, यूपी व बिहार में एक जनवरी से चालू
  • फर्टिलाइजर की दुकानों से अंगुली निशान से मिलेगी खाद
  • पायलट परियोजना की सफलता के बाद पूरे देश में लागू होगी योजना

मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक समूचे देश में इसे व्यापकता से लागू करने के लिए राज्यों के सहयोग से प्वाइंट आफ सेल ( पॉस ) मशीनें लगाई जाने लगी हैं। इन मशीनों को फर्टिलाइजर ( खाद ) की दुकानों पर लगाने का काम संबंधित फर्टिलाइजर कंपनियां कर रही हैं।

देश में खाद बेचने वाली दुकानों पर कुल ढाई लाख पॉस मशीनों की जरुरत है। इसमें से अब तक कुल लगभग डेढ़ लाख दुकानों पर मशीनें लगाई जा चुकी हैं। विभिन्न राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में एक सितंबर 2017 से इस दिशा में डीबीटी योजना चालू कर दी गई है।फर्टिलाइजर मंत्रालय ने इस योजना को प्रारंभ करने के लिए हर राज्य को उसकी सुविधा के अनुसार तिथि का निर्धारण कर दिया है।

डीबीटी की शुरुआत दिल्ली प्रदेश में एक सितंबर 2017 को चालू कर दी गई थी, जबकि मिजोरम, दमन व दीव, दादरा नगर हवेली, मणिपुर, नागालैंड, गोवा व पुडुचेरी में यह योजना एक अक्तूबर को प्रारंभ हो गई। राजस्थान, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, अंडमान व निकोबार, असम और त्रिपुरा में योजना को एक नवंबर से शुरु किया गया है।

देश की खाद्य सुरक्षा में अहम भूमिका निभाने वाली राज्य आंध्र प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में खाद की सब्सिडी सीधे खाते में जमा कराने की योजना एक दिसंबर 2017 को चालू हो गई है। जबकि गेहूं का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश, बिहार, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और तमिलनाडु में एक जनवरी 2018 को यह योजना शुरु की जाएगी। इसी तरह गुजरात व हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने की वजह से यहां तैयारियां हो जाने के बावजूद इसे एक जनवरी से शुरु किया जाएगा।

डीजल नहीं हवा से चलता है ये इंजन, अनपढ़ दोस्तों ने 11 साल में किया तैयार

गाड़ियों के टायरों में हवा भरने वाले दो अनपढ़ दोस्तों ने कुछ अलग करने की ठानी तो हवा से चलने वाला इंजन ही बना दिया। 80 फीट की गहराई से इसी हवा के इंजन से पानी तक खींचा जाता है। 11 साल की मेहनत के बाद यह इंजन बनकर तैयार हुआ है। अब वे बाइक को हवा से चलाने के लिए एक प्रोजेक्ट बना रहे हैं।

दरअसल, राजस्थान के भरतपुर जिले में रूपवास के खेड़िया विल्लोज के रहने वाले अर्जुन कुशवाह और मिस्त्री त्रिलोकीचंद गांव में ही एक दुकान पर मोटर गाड़ियों के टायरों में हवा भरने का काम करते थे।

करीब 11 साल पहले जून में एक दिन ट्रक के टायरों की हवा जांच रहे थे तो उनका इंजन खराब हो गया। उसे सही कराने तक के लिए जेब में पैसे नहीं थे। इतने में ही इंजन का वॉल खुल गया और टैंक में भरी हवा बाहर आने लगी। इंजन का पहिया दवाब के कारण उल्टा चलने लगा। फिर यहीं से दोनों ने शुरू की हवा से इंजन चलाने के आविष्कार की कोशिश की। साल 2014 में वे इसमें सफल भी हो गए। आज वे इसी हवा के इंजन से खेतों की सिंचाई करते हैं।

11 साल में साढ़े तीन लाख रुपए किए खर्च

  • त्रिलोकीचंद ने बताया कि 11 साल से वे लगातार हवा के इंजन पर ही शोध कर रहे हैं। अब तक बहुत कुछ सीख चुके हैं ।
  •  इसे बनाने में करीब 3.5 लाख रुपए के उपकरण सामान ला चुके हैं। अब दुपहिया चौपहिया वाहनों को हवा से चलाने की योजना बना रहे हैं।

ऐसे बनाया 8 हॉर्स पावर का इंजन

अर्जुन कुशवाह ने बताया, ”चमड़े के दो फेफड़े बनाए। इसमें एक छह फुट और दूसरा ढाई फुट का। इसमें से एक बड़े फेफड़े इंजन के ऊपर लगाया। जबकि इंजन के एक पहिए में गाड़ी के तीन पटा दूसरे बड़े पहिए में पांच पटा लगाकर इस तरह सेट किया कि वह थोड़ा से धक्का देने पर भार के कारण फिरते ही रहें। पिस्टन वॉल तो लगाई ही नहीं है।

जब इंजन के पहिए को थोड़ा सा घुमाते हैं तो वह बड़े फेफड़े में हवा देता है। इससे छोटे फेफड़े में हवा पहुंचती है और इंजन धीरे-धीरे स्पीड पकड़ने लगता है। इससे इंजन से पानी खिंचता है। बंद करने के लिए पहिए को ही फिरने से रोकते हैं। हवा से चल नहीं जाए, इसके लिए लोहे की रॉड फंसाते हैं।

”इसे बनाने में करीब 3.5 लाख रुपए के उपकरण सामान ला चुके हैं।आज वे इसी हवा के इंजन से खेतों की सिंचाई करते हैं।

गर्मी में बिना AC नहीं सोती यह डेढ़ करोड़ की गोड़ी,जाने इसकी खुराक और बाकि जानकारी

बड़वानी और महाराष्ट्र बॉर्डर के खेतिया-सारंगखेड़ा में अश्व मेले में आई करीब पांच साल की घोड़ी पद्मा लोगों के दिलों पर छा गई है। इंदौर के दतोदा की घोड़ी पद्मा के मालिक बालकृष्ण चंदेल ने बताया वे पद्मा को रोजाना 10 लीटर दूध, मिनरल पानी, 2 किलो चना, 5 किलो गेहूं की चापड़ व स्वाद अनुसार हरी घास खिलाते हैं। हर दिन उसे शैम्पू से नहलाया जाता है। गर्मियों में अगर AC कमरे में नहीं सुलाओ तो बैचेन रहती है।

दतोदा में रहने वाले बालकृष्ण चंदेल की घोड़ी पद्मा पुष्कर मेले में छाई हुई थी। इस घोड़ी ने तो सीएम वसुंधरा राजे सिंधिया को भी दिल जीत लिया था। पद्मा को खरीदने के लिए एक शख्स ने 72 लाख की बोली लगा दी थी, हालांकि उस समय चंदेल अपनी इस लाड़ली घोड़ी को 1.5 करोड़ से कम में बेचने के लिए तैयार नहीं थे।

घोड़ी मालिक का दावा है कि पद्मा की कीमत 2 करोड़ तक लग चुकी है, लेकिन वे इसे 10 करोड़ में भी बेचना नहीं चाहते हैं। उनके अनुसार अब तक कई ईनाम अपने नाम कर चुकी पद्मा की कद-काठी व नस्ल महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक की वंशज जैसी मानी जाती है।

छह फ़ीट ऊंची है पद्मा

करीब पांच साल की पद्मा का कद लगभग 6 फ़ीट है। चंदेल ने चार साल पहले आगरा के एक किसान से पद्मा को छह लाख रुपए में खरीदा था। चंदेल का पूरा परिवार पद्मा की देखरेख करता है। पद्मा को रोज़ 10 लीटर गाय का दूध पिलाते हैं। रोज उसको आधा किलो काजू और बादाम भी खिलाते हैं। चंदेल के मुताबिक़ पद्मा को नहाने का बहुत शौक है। जब तक उसे शैंपू से नहलाया ना जाए, तब तक वह सवारी के लिए तैयार नहीं होती।

वसुंधरा ने पहनाई थी माला, खरीदना चाहती थी पद्मा को

चंदेल बताते हैं कि पुष्कर मेले में पद्मा सबके आकर्षण का केंद्र थी। मेले का निरीक्षण करने आईं राजस्थान की सीएम वसुंधरा भी उसे देख काफी खुश हुईं। वसुंधरा जी का कहना था कि यदि पद्मा का रंग ब्राउन होता तो वे उसे तुरंत खरीद लेती। चंदेल बताते हैं कि एक ग्राहक तो पद्मा को खरीदने के लिए 72 लाख रुपए लेकर आ भी आ गया था, लेकिन  हम पद्मा को बेचना नहीं चाहते थे, इसलिए हमने उसकी कीमत डेढ़ करोड़ रखी थी।

ये है पद्मा की खुराक…

  • 10 लीटर दूध रोज
  • 05 किलो गेहूं चापड़ी
  • 02 किलो चना
  • 4.6 वर्ष आयु
  • 70 इंच ऊंचाई
  • 850 किलो वजन

मेले में खास

सारंगखेड़ा में एकमुखी गुरुदत्त भगवान का मंदिर है। इस मंदिर के पास ही अश्व मेला लगा है। इसमें 80 गांव के लोग आ रहे हैं। मेले में बड़ी-बड़ी पालकियां, सर्कस, पार्क, बच्चाें व ग्रामीणों के मनोरंजन के साधन हैं।

ये है अरहर का पेड़,एक पेड़ से मिलती है 12 किल्लो तक दाल

सरकार का प्रयास है कि देश के हर व्यक्ति की थाली में दाल हो और इसके लिए कई स्तरों पर प्रयास भी हो रहे हैं। इसी बीच अगर दाल की एक ऐसी प्रजाति जिससे दाल के उत्पादन को कई गुना बढ़ाया जा सके, और वो प्रजाति अगर अरहर की हो तो ये काफी अच्छी ख़बर हो सकती है।

अरहर की दाल की खपत देश में सबसे ज़्यादा है और इस दाल में प्रोटीन की मात्रा भी काफी अधिक होती है। आमतौर पर अरहर के लगभग 4 – 5 फीट के झाड़ जैसे दिखने वाले पौधे होते हैं और हर पौधे में लगभग 5-6 शाखाएं होती हैं लेकिन क्या आपने ऐसा अरहर का पौधा देखा है जो पेड़ जैसा दिखता हो। जी हां, अरहर का पेड़।

ये है खासियत

अरहर के इस पौधे का तना कुछ मोटा होता है और एक पेड़ में लगभग 60 शाखाएं होती हैं। इन शाखाओं पर फलियों के गुच्छे होते हैं जिनमें अधिक संख्या में फलिया होती हैं। कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर के प्रोफेसर डॉ. गजेंद्र सिंह तोमर बताते हैं, ”छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर के गाँव गगोली में कई खेतों की मेढ़ों पर इस अरहर के पेड़ देखने को मिल जाते हैं।

” वह बताते हैं कि अरहर के इस पौधे में 8 से 12 किलोग्राम दाना निकल आता है। इसका दाना कुछ मोटा, बड़ा और चमकीला होता है। इसकी फलियां 2 – 3 बार तोड़ी जा सकती हैं। फसल के परिपक्व होने का समय जनवरी से अप्रैल के बीच का होता है।

है बहुवर्षीय फसल

डॉ. तोमर बताते हैं कि यह अरहर की बहुवर्षीय फसल होती है। जुलाई-अगस्त में खरीफ की फसल की बुवाई के समय इसका बीज डाल देना चाहिए। पौधे से पौधे की दूरी लगभग 2 से 3 मीटर होनी चाहिए। फसल 6 महीने में तैयार हो जाती है।

एक पेड़ से दो से तीन बार फलियों को तोड़ा जा सकता है। गर्मी तेज़ होने पर यह पौधा सूखने लगता है। उस वक्त इसके तने को ज़मीन से 4 से 5 इंच छोड़कर काट देना चाहिए और समय – समय पर एक-दो गिलास पानी डालते रहना चाहिए जिससे ये सूखे नहीं।

सघनीकरण विधि से अरहर की खेती करने से ज्यादा पैदावार होगी

जब बारिश होती है तो ये पौधा फिर से हरा होने लगता है और फिर धीरे -धीरे बड़ा होकर इसमें फलियां आने लगती हैं। एक पौधे की उम्र लगभग 3 से 4 साल होती है। इसके बाद दोबारा बीज डालकर इसे लगाया जा सकता है। इस फसल में बस 2 से 3 बार कीटनाशकों का छिड़काव करने की ज़रूरत पड़ती है।

अरहर का पौधा बहुवर्षीय होता है या अगर पानी-खाद देते रहे तो चार पांच साल तक चलता रहता है। छत्तीसगढ़ की अरहर की किस्म भी कोई जंगली किस्म होगी जिसे किसानों ने मेड़ों पर अरहर के पौधे लगाए हैं।

डॉ. पुरुषोत्तम, वैज्ञानिक, भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान

अब भारत में करें काले टमाटर की खेती ,शुगर के मरीजों के लिए है रामबाण

आगर आपसे कोई पूछे कि क्या आपने काले टमाटर के बारे में सुना है, तो ज्यादातर लोगों का जवाब नहीं में होगा। अपने आप में खास इस टमाटर को काफी पसंद किया जा रहा है और अब इसके बीज भारत में भी उपलब्ध हैं। अंग्रेजी में इसे इंडि‍गो रोज़ टोमेटो कहा जाता है। पहली बार भारत में काले टमाटर की खेती होने जा रही है।

हिमांचल प्रदेश के सोलन जिले के ठाकुर अर्जुन चौधरी बीज विक्रेता हैं। अर्जुन चौधरी के पास काले टमाटर के बीज उपलब्द हैं। उन्होंने बताया, ”मैने काले टमाटर के बीज ऑस्ट्रेलिया से मंगवाए हैं। इसकी खेती भी लाल टमाटर की तरह ही होती है। इसके लिए कुछ अलग से करने की जरूरत नहीं होगी।” उन्होंने ने बताया, ”अभी तक भारत में काले टमाटर की खेती नहीं की जाती है, इस वर्ष पहली बार इसकी खेती की जाएगी।” काले टमाटर के बीज का एक पैकेट जिसमें 130 बीज होते हैं 110 रुपए का मिलता है।

यह टमाटर भारत में पहली बार उगया जाएगा।

काला टमाटर की नर्सरी सबसे पहले ब्रिटेन में तैयार की गई थी, लेकिन आब इसके बीज भारत में भी उपल्बध हैं। किसान इसके बीज ऑनलाइन भी खरीद सकते हैं।

अर्जुन चौधरी ने इसकी खासियत बताते हुए कहा, ”इसकी खास बात यह है कि इसकों शुगर और दिल के मरीज भी खा सकते हैं।” यह बाहर से काला और अंदर से लाल होता है। इसको कच्‍चा खाने में न ज्यादा खट्टा है न ज्यादा मीठा, इसका स्वाद नमकीन जैसा है।

यह बाहर से काला और अंदर से लाल होता है।

”यह टमाटर गर्म क्षेत्रों के लिए अच्छे से उगाया जा सकता है। ठंढे क्षेत्रों में इसे पकने में दिक्कत होती है,” अर्जुन चौधरी बताते हैं, ”क्योंकि यह टमाटर भारत में पहली बार उगया जा रहा है इस लिए इसके रेट भी अच्छे मिलेंगे।”

इसको पकने में करीब चार महीने का समय लगता है।

उन्होंने बताया कि जनवरी महीने में इसकी नर्सरी की बुवाई की जा सकती है और मार्च के अंत तक इसकी नर्सरी की रोपाई की जा सकती है। यहा टमाटर लाल टमाटर के मुकाबले थोड़ा देर से होता है। लाल टमाटर करीब तीन महीने में पक कर निकलना शुरू हो जाता है और इसको पकने में करीब चार महीने का समय लगता है।

शुगर के मरीजों के लिए है रामबाण

अगर आप शुगर से लड़कर थक चुके हैं तो काला टमाटर आपके लिए रामबाण साबित हो सकता है। इस टमाटर को जेनेटिक म्यूटेशन के द्वारा बनाया गया है। काले टमाटर में फ्री रेडिकल्स से लड़ने की क्षमता होती है। फ्री रेडिकल्स बहुत ज्यादा सक्रिय सेल्स होते हैं जो स्वस्थ सेल्स को नुकसान पहुंचाते हैं। इस तरह ये टमाटर कैंसर से रोकथाम करने में सक्षम है।

ये टमाटर आंखों के लिए भी बहुत फायदेमंद हैं। ये शरीर की विटामिन ए और विटामिन सी की जरुरत को पूरा करता है। विटामिन ए आंखों के लिए बहुत फायदेमंद होता है।अगर आप नियमित रूप से काले टमाटरों का सेवन करते हैं तो आप दिल से जुड़ी बीमारियों से भी बचे रह सकते हैं। इसमें पाया जाने वाले एंथोसाइनिन आपको हार्ट अटैक से बचाता है और आपके दिल को सुरक्षा प्रदान करता है।

गाय भैंस का दूध बढाने का रामबाण घरेलु उपाय

जो लोग गाय भैंस का अधिक दूध लेने के लिए उनको टीके लगाते हैं वो मानवता के सबसे बड़े दुश्मन हैं. वो कभी सुखी नहीं रह पाएंगे. वो दुसरो को ज़हर देते हैं तो भगवान् उनके घर भी कभी अमृत से नहीं भरेगा. वो ज़हर एक दिन उनको ले डूबेगा.

आज हम आपको बताने जा रहें हैं गाय भैंस का दूध बढाने के रामबाण घरेलु उपाय. ये उपाय बिलकुल सरल है और आपको बहुत जल्दी ही इसके नतीजे भी मिलेंगे. ज़रूर जाने और अपनाएं.

सामग्री :-

  • 250 ग्राम गेहू दलिया,
  • 100 ग्राम गुड सर्बत(आवटी),
  • 50ग्राम मैथी ,
  • 1 कच्चा नारियल ,
  • 25-25 ग्राम जीरा व अजवाईन.

उपयोग:-

  • सबसे पहले दलिये ,मैथी व गुड को पका ले बाद मे उसमे नारियल को पिसकर डाल दे.ठण्डा होने पर खिलाये.
  • ये सामग्री 2 महीने तक केवल सुबह खाली पेट ही खिलाये.
  • इसे गाये को बच्चा देने से एक महीने पहले शूरू करना और बच्चा देने के एक महीने बाद तक देना.
  •  नोट :- 25-25 ग्राम अजवाईन व जीरा गाये के ब्याने के बाद केवल 3 दिन ही देना. बहुत अच्छा परिणाम ले सकते हे.
  • ब्याने के 21 दिन तक गाये को सामान्य खाना ही दे.
  •  गाये का बच्चा जब 3 महीने का हो जाये या जब गाये का दूध कम हो जाये तो उसे 30 gm/दिन जवस औषधि खिलाये दूध कम नही होगा।

काले गेहूं की खेती होती है, लेकिन बाकी सच्चाई भी जान लीजिए

पिछले कुछ महीनों से सोशल मीडिया में काले गेहूं को लेकर लगातार ख़बरें शेयर हो रही हैं। जिसमें ये कहा जा रहा है भारत में पहली बार काले गेहूं की खेती हो रही है और ये सामान्य गेहूं के मुकाबले न सिर्फ कई गुना महंगा बिकता है बल्कि इसमें कैंसर और डायबिटीज समेत कई बीमारियों से लड़ने की क्षमता होती है।

लेकिन यह पूरा सच नहीं है। आज आप को बताते हैं, ये गेहूं कहां पैदा होता है, इसका रंग काला क्यों होता है, क्या काले रंग के अलावा भी किसी रंग का गेहूं होता है और इसके चिकित्सकीय गुण क्या हैं ?

सोशल मीडिया में वायरल होने वाली इस पोस्ट में दावा किया गया था कि, सात बरसों के रिसर्च के बाद गेहूं की इस नई किस्म को पंजाब के मोहाली स्थित नैशनल एग्री फूड बायोटेक्नॉलजी इंस्टीट्यूट या नाबी ने विकसित किया है। नाबी के पास इसका पेटेंट भी है।

इस गेहूं की खास बात यह है कि इसका रंग काला है। वायरल हो रही पोस्ट में कहा गया है कि काले गेहूं में कैंसर, डायबिटीज, तनाव, दिल की बीमारी और मोटापे जैसी बीमारियों की रोकथाम करने की क्षमता है।

इस दावे की जांच के लिए जब न्यूज चैनल एबीपी के प्रतिनिधि मोहाली स्थित नाबी पहुंचे तो वहां उन्होंने इस गेहूं की फसल देखी। उन्होंने पाया कि शुरू में इसकी बालियां भी आम गेहूं जैसी हरी होती हैं, पकने पर दानों का रंग काला हो जाता है।

ज्यादा जानकारी के लिए जब नाबी की साइंटिस्ट और काले गेहूं की प्रोजेक्ट हेड डॉ. मोनिका गर्ग से बातचीत की तो उन्होंने बताया कि नाबी ने काले के अलावा नीले और जामुनी रंग के गेहूं की किस्म भी विकसित की है।

काले रंग की वजह एंथोसाएनिन

इस गेहूं के अनोखे रंग के बारे में पूछने पर डॉ. गर्ग ने बताया कि फलों, सब्जियों और अनाजों के रंग उनमें मौजूद प्लांट पिगमेंट या रंजक कणों की मात्रा पर निर्भर होते हैं। काले गेहूं में एंथोसाएनिन नाम के पिगमेंट होते हैं।

एंथोसाएनिन की अधिकता से फलों, सब्जियों, अनाजों का रंग नीला, बैंगनी या काला हो जाता है। एंथोसाएनिन नेचुरल एंटीऑक्सीडेंट भी है। इसी वजह से यह सेहत के लिए फायदेमंद माना जाता है। आम गेहूं में एंथोसाएनिन महज 5पीपीएम होता है, लेकिन काले गेहूं में यह 100 से 200 पीपीएम के आसपास होता है।

एंथोसाएनिन के अलावा काले गेहूं में जिंक और आयरन की मात्रा में भी अंतर होता है। काले गेहूं में आम गेहूं की तुलना में 60 फीसदी आयरन ज्यादा होता है। हालांकि, प्रोटीन, स्टार्च और दूसरे पोषक तत्व समान मात्रा में होते हैं।

सेहत के लिए है फायदेमंद

तब क्या काला गेहूं खाने से कैंसर, डायबिटीज जैसी बीमारियां नहीं होतीं। इस पर डॉ. गर्ग का कहना है, चूहों पर किए गए प्रयोगों में देखा गया कि ब्लड कॉलस्ट्रॉल और शुगर कम हुआ, वजन भी कम हुआ लेकिन इंसानों पर भी यह इतना ही कारगर होगा यह नहीं कहा जा सकता।

पर यह तो तय है कि अपनी एंटीऑक्सीडेंट खूबियों की वजह से इंसानों के लिए भी यह फायदेमंद साबित होगा। नाबी इसके बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए कंपनियों से करार कर रहा है।

कुछ वेबसाइट बेच रही हैं काले गेहूं का आटा

देखने में आया है कि कुछ ई कॉमर्स वेबसाइट काले गेहूं का आटा बेच रही हैं। इसकी कीमत साइट पर 2 हजार रुपये प्रति किलो से 4 हजार रुपये प्रति किलो तक बताई गई है। साथ ही इनमें बीमारियां दूर करने वाले वे सभी दावे भी किए गए हैं जो सोशल मीडिया में वायरल हो रहे हैं।

काला चावल भी होता है

गेहूं ही नहीं काला चावल भी होता है। इंडोनेशिअन ब्लैक राइस और थाई जैसमिन ब्लैक राइस इसकी दो जानीमानी वैरायटी हैं। म्यामांर और मणिपुर के बॉर्डर पर भी ब्लैक राइस या काला चावल उगाया जाता है। इसका नाम है चाक-हाओ। इसमें भी एंथोसाएनिन की मात्रा ज्यादा होती है।

इस शख्स को टमाटर ने बना दिया करोड़पति

शहडोल। बढ़ता कैरियर अब लोगों के जीवन का महत्वपूर्ण लक्ष्य बन गया है। कैरियर बनाना एक बहुत बड़ी यात्रा है और आपको इसे सही बनाने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है। तेजी से आगे बढ़ने की होड़ में लोग नौकरी से ज्यादा स्वयं के रोजगार को करने के लिए आगे बढ़ रहे हैं। अगर आप भी इसी राह में आगे बढ़ना चाहते हैं तो आपके पास भी कई ऑप्शन मौजूद हैं।

आप भी अपना व्यवसाय शुरू करके घर बैठे लाखों रुपए कमा सकते हैं। इसी राह में एक शख्स टमाटर की खेती करके 3 से 4 करोड़ रुपए सालाना टर्न ओवर कर रहा है। 10 एकड़ की जमीन से सब्जी उत्पादन के व्यवसाय की शुरुआत करने वाले पुरानी बस्ती निवासी किसान पवन मिश्रा बीते कई सालों से ये काम कर रहे हैं।

देश भर में पहुंचाए जा रहे टमाटर

आपको बता दें बउमरिया जिले के घुनघुटी में लगभग 125 एकड़ क्षेत्र में मां कंकाली कृषि समूह के आठ किसानों ने सब्जी की खेती कर सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। किसानों द्वारा उत्पादित सब्जी उत्पादों ने शहडोल संभाग ही नहीं देश के दिल्ली, बैंगलोर, रीवा, सतना, जबलपुर, रायपुर आदि महानगरों के बाजार में अपनी पहचान बनाई है। इन किसानों के द्वारा उत्पादित टमाटर और अन्य सब्जियां ट्रकों में भरकर दिल्ली, बैंगलोर और देश के अन्य बड़े बाजारों में पहुंचाई जा रही है, जिससे किसानों को सीधा लाभ हो रहा है।

बैंक ने दिए 5 लाख रुपए

अपने रोजगार में सफल होने वाले किसान पवन मिश्रा ने बताया कि उन्होंने टमाटर की खेती की शुरूआत सबसे पहले विचारपुर और सिंदुरी क्षेत्र से की थी। यहां पर सफल होने के बाद उद्यानिकी विभागों के अधिकारियों से सलाह लेने के बाद उन्होंने आज से दस साल पहले उन्होंने ग्राम सिंदुरी और विचारपुर में 10 एकड़ भूमि पर टमाटर के खेती की शुरूआत की।

इस काम को करने के लिए कृषि विभाग के अधिकारियों ने अपनी सलाह के साथ ही ड्रिप एरीकेशन के लिए 5 लाख रुपए भी बैंक के माध्यम से दिए गए। इस खेती को शुरू करने के बाद लगातार पवन मिश्रा को इससे लाभ हुआ है। उनका कहना है कि टमाटर की खेती से बहुत लाभ हो रहा है। जिस कारण उन्होंने बाद में टमाटर के साथ मिर्ची, लौकी, खीरा, बरबटी, आलू, लहसुन और प्याज की खेती शुरू की। उन्होंने बताया कि सब्जियों की खेती करने से उन्हें काफी लाभ हुआ जिसके कारण उन्होने अन्य किसानों को भी समूह बनाकर सब्जी की खेती करने की सलाह दी।

लोगों को दिया रोजगार

टमाटर की खेती से लाभ होने के बाद उमरिया जिले के लगभग 8 किसानों द्वारा मां कंकाली कृषि समूह का निर्माण किया गया साथ ही लगभग 125 एकड़ भूमि पर सब्जी की उन्नत खेती करने की कार्य योजना बनाई। पवन मिश्रा ने बताया कि लगातार सजगता एवं कृषि वैज्ञानिकों की सलाह के कारण संभाग के ग्राम पंचायत सिंदुरी, विचारपुर और घुनघुटी में सब्जी उत्पादन के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित किए हैं।

सब्जी उत्पादन का वार्षिक टर्नओवर लगभग 3 से 4 करोड़ रुपए है। क्षेत्र के लगभग 200 लोगों को रोजगार मिला है। उन्होंने बताया कि संभाग के टमाटर की बहुत ज्यादा मांग है। सब्जी व्यापारियों के ट्रक खेतों में पहुंचकर सब्जियों का उठाव करते हैं। उन्होंने बताया कि संभाग के अन्य किसान भी सब्जी उत्पादन के क्षेत्र में आगे आ रहे हैं। इससे सभी को लाभ हो रहा है।