एप्पल से उलट है एप्पल वुड यानी बेल की खेती

इंग्लिश में एप्पलवुड के नाम से मशहूर बिल की खेती के लिए एप्पल की खेती से उल्ट मौसम चाहिए। यानी सेब की फसल तभी होती है जब माइनस में टेंपरेचर हो आैर बेल जितनी गर्मी पड़ेगी उतना ही मीठा होगा।

सनौर इलाके के कई किसानों ने बिल के पेड़ लगा रखे हैं जो इनसे बिना किसी लागत मोटा मुनाफा कमा रहे हैं। इसकी खेती पूरे उतर भारत में की जाती है क्योंकि यह हर तरह की मिट्‌टी में पैदा हो जाता है।

किसान बिक्रमजीत सिंह ने बताया कि इसकी खेती ज्यादातर दोमट मिट्टी में की जाती है। इसके लिए पीएच मान 8.00 से 8.50 के बीच होना चाहिए। किसानों ने बताया की वह काफी समय से बिल की खेती करते आ रहे हैं और यह सर्दी-गर्मी दोनों मौसम में हो सकता है।

बेल से ऐसे बढ़ाइए पैसों की बेल

किस्में…बेल की दो किस्में हैं। एक हाईब्रिड और दूसरी देशी। देशी किस्म को देर होने में लंबा समय लगता है मगर हाईब्रिड तीन साल में तैयार हो जाती है। पके हुए बेल के बीज से भी पौध तैयार की जा सकती है। किसान ओमप्रकाश ने बताया की यह नर्सरी में मिल जाता है। बेल की बिजाई बारिश के दिनों में की जानी चाहिए।

बीमारियां…गांव मसीगन के ओम प्रकाश और बिक्रमजीत ने बताया कि वह लंबे समय से बेल की खेती करते आ रहे हैं। बेल में लैमन वटर फ्लाई, कीट, लीफ माईनर तथा तना सड़न गमोसिया आदी रोग लगते हैं।

औषधीय गुण…बेल के सेवन से बवासीर, दस्त खत्म होते हैं, भूख बढ़ती है। यह कब्ज की समस्या भी दूर करता है। बिल का शरबत नियमित रूप से रात को सेवन करना चाहिए इससे पेट की सभी समस्याएं दूर होती हैं। शुगर की समस्या में पत्तों का चूर्ण सेवन किया जाए तो लाभदायक होता है।

फल व फूल… बेल लगाने के बाद एक वर्ष के बाद अप्रैल-मई में फूल आते हैं। पर फल लगना काफी देर बाद शुरू होता है। बिल की खासियत यह है कि यह तुड़ाई के दो महीने तक खराब नहीं होता। तुड़ाई के बाद भी फल लगते रहते हैं।

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नाबार्ड के सहयोग से ये किसान कर रहे नेपाली सतावर की खेती

किसान अब फसल चक्र में परिवर्तन करने लगे हैं। 6 गांव के 150 किसानों ने पहले आलू की खेती कर रहे थे, लेकिन मौसम की वजह से नुकसान हो गया। अब किसानों ने पायलेट प्रोजेक्ट बनाकर औषधीय पौधों की खेती शुरू की है। जिसमें सफलता मिलने लगी है। पहली बार 20 एकड़ में नेपाली सतावर की खेती कर रहे हैं। आगे 100 एकड़ में खेती करने का लक्ष्य बनाया है। किसानों के प्रयास को देखते हुए डाबर कंपनी ने औषधीय पौधों को खरीदने के लिए अनुबंध भी कर लिया है।

कोरबा ब्लाक के किसानों ने मिलकर जय मां सर्वमंगला उत्पादक संघ बनाया था। जिसमें 13 गांव के 541 किसान शामिल हैं। केराकछार, ठाकुरखेता, पतरापाली, मुढुनारा व सरदुकला के किसानों ने जब सतावर के पौधे लगाए तो डर बना हुआ था कि यहां का वातावरण में तैयार होगा कि नहीं लेकिन सफलता मिल गई। अभी खेत में पौधे लहलहा रहे हैं। साथ ही प्रयोग के तौर पर 5 एकड़ में श्योनाक, पाढ़ल, बेल व गम्भारी की भी खेती कर रहे हैं।

उत्पादक संघ के अध्यक्ष गोविंद सिंह राठिया ने बताया कि और भी किसानों को औषधीय पौधे की खेती के लिए प्रेरित किया जा रहा है। इसमें नाबार्ड का भी काफी सहयोग रहा है। डाबर कंपनी ने कुछ और पौधों की खेती करने सलाह दी है। लेकिन पहले शुरूआत सतावर से ही की गई है।

बाजार में 250 से 400 रुपए किलो:

नेपाली सतावर का मार्केट में प्रोसेसिंग के बाद 250 से 400 रुपए किलो है। यह फसल डेढ़ साल में तैयार हो जाता है। नगदी फसल में किसानों को बेहतर आय होने की संभावना है। पौधे तैयार होने के बाद नुकसान होने का खतरा भी नहीं रहता है।

किसानों ने ग्राम केराकछार में 20 टन क्षमता का कोल्ड स्टोरेज बनाने का निर्णय लिया है। इसके लिए उद्यान व कृषि विभाग भी सहयोग कर रही है। स्टोरेज में वनौषधियों के साथ ही जैविक खेती से तैयार फसल को भी रखेंगे ताकि बाजार में अच्छी कीमत मिल सके।

वनांचल में 400 से अधिक औषधीय पौधों को पहचान की गई है। लेकिन जिन पौधों की डिमांड है उसका कलेक्शन भी करेंगे। इसमें 10 प्रकार के पौधे शामिल हैं। केवाच के पौधे बहुतायत है। इसका फल औषधी के रूप में उपयोग होता है। इसी तरह बेल भी मिल जाता है।

पराली से ऐसे करें कमाई , सरकार भी करेगी मदद

पुआल फायदेमंद भी है। एक टन पराली में 5.50 किलो नाइट्रोजन, 2.3 किलो फॉस्फोरस, 1.30 किलो सल्फर और 25 किलो पोटैशियम होता है। इससे गैस प्‍लांट भी बन सकता है जिससे खाना बनाना और गाड़ी चलाना संभव है। गैस के अलावा खाद भी बन सकती है, जिसकी बाजार में कीमत 5,000 रुपए प्रति टन है। इस तरह किसान पराली प्रबंधन कर उसे खाद व गैस बनाकर अपनी आमदनी का जरिया भी बना सकते हैं।

इन तरीकों से होता है पराली का निपटान

  • मलचिंग- धान के बचे हिस्से को मशीन से बाहर निकाल कर खेतों में छोड़ दिया जाता है। वह गलकर खाद का काम करते हैं।
  • पराली चार- मिट्टी और ईट के बने छोटे से घर में पराली भरकर जलाई जाती है। इस दौरान जमा हुई कालिख को मिट्टी में मिलाने से उर्वरा शक्ति बढ़ती है।
  • पराली से बने पेलेट- थर्मल पावर प्लांट में पराली से बने पेलेट कोयले के साथ जलाए जाते हैं। एनटीपीसी ने पेलेट की खरीदारी के लिए टेंडर भी निकाल दिया है।

पराली निपटान में सरकार कैसे करती है मदद

पराली प्रबंधन की मशीनें खरीदने के लि‍ए सरकारी की ओर से 80 फीसदी तक की आर्थि‍क मदद दी जाएगी। यही नहीं कृषि अवशेष न जलाने वालों को इनाम भी दि‍या जाएगा। इस साल मार्च में कैबिनेट ने पंजाब, हरियाणा , उत्‍तर प्रदेश और राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्‍ली में फसल अवशेषों के निपटान के लिए कृषि मशीनरी प्रोत्‍साहन को अपनी स्‍वीकृति दे दी है। इसके लि‍ए 1151.80 करोड़ रुपए मंजूर कि‍ए।

कैसे मि‍लेंगे पैसे

संबंधित राज्‍य सरकारें जिला स्तरीय कार्यकारी समितियों (डीएलईसी) के माध्यम से विभिन्न लाभार्थियों और स्थान- कृषि प्रणाली पर निर्भर विशेष कृषि उपकरण की पहचान करेगी और कस्टम हायरिंग और व्यक्तिगत मालिक स्वामित्व के आधार पर मशीनों की खरीद के लिए कृषि मशीनरी बैंक स्थापित करने के लिए लाभार्थियों की पहचान और चयन करेगी ताकि पारदर्शी रूप से समय पर लाभ प्राप्त किए जा सकें।

राज्‍य नोडल विभाग/ डीएलइसी लाभार्थी की ऋण आवश्‍यकता के लिए बैंकों के साथ गठबंधन करेंगे। चयनित लाभार्थियों के नाम एवं विवरण जिला स्‍तर पर दस्‍तावेजों में शामिल किए जायेगें जिसमें उनके आधार/यूआईडी नम्‍बर तथा प्रत्‍यक्ष लाभ अंतरण के माध्‍यम से दी गई वित्‍तीय सहायता दिखाई जाएगी।

खर्च 30 हजार, महज 4 महीने की मेहनत के बाद कमाए ये किसान कमाने लगा 8 लाख रु

अधिकतर लोग खेती को घाटे का सौदा मानते हैं और घटती जमीन के चलते किसान परिवारों का अपने पुस्तैनी काम से मोह भंग हो रहा है। ऐसे में राजस्थान के किसान ने खेती का नया रास्ता खोज कर बाकी लोगों को हैरान कर दिया।

सीदपुरा के किसान ने खेती से मुनाफे का नया रास्ता खोजा है। दुर्गाप्रसाद ओला ने नीदरलैंड खीरा की बुवाई कर सिर्फ चार महीने में आठ लाख रुपए की पैदावार की है। किसान का मानना है कि नीदरलैंड से बीज मंगवाकर खीरा की पैदावार करने वाला वह राजस्थान में पहला किसान है। इस खीरे में बीज नहीं होने की वजह से बड़े होटल-रेस्त्रां में डिमांड रहती है।

दुर्गाप्रसाद ने बताया कि उसने कुछ साल पहले उद्यान विभाग से 18 लाख रुपए का अनुदान लेकर खेत में सैडनेट हाउस लगाया। अनुदान मिलने के बाद छह लाख रुपए खुद को खर्च करने पड़े। एक कंपनी प्रतिनिधि से मिली जानकारी के बाद 72 हजार रुपए में नीदरलैंड से बीज मंगवाया। एक बीज के छह रुपए लगते हैं।

30 हजार रुपए बुवाई अन्य खर्चा लग गया। चार महीने के दौरान वह आठ लाख रुपए के खीरे बेच चुका है। खर्चा निकालकर सात लाख रुपए की आय हुई है। उद्यान विभाग के सहायक निदेशक भगवान सहाय यादव के मुताबिक शेखावाटी में पहला किसान है, जिसने नीदरलैंड किस्म का खीरा उगाया है।

बीज रहित और गुणवत्ता अच्छी होने से बाजार में खीरा की मांग भी देशी से ज्यादा रही। कारोबारियों के अनुसार मंडी में पहली बार नीदरलैंड का बीज रहित खीरा आया है। ऐसे में मंडी में खीरा के भाव भी देशी से दोगुना ज्यादा रहे।

स्थानीय खीरे के थोक भाव मंडी में किसान को 20 रुपए किलो मिल रहा है, वहीं नीदरलैंड का खीरा 40 से 45 रुपए प्रति किलो तक बिक रहा है। तो अगर आपके पास भी खाली जमीन या खेत है तो एक बार ये आइडिया अपना कर देखिए क्या पता कब किस्मत बदल जाए।

जुताई से लेकर पिसाई तक सारे काम करेगी यह मशीन

प्रधानमंत्री मोदी के स्टार्टअप योजना के तहत केरल शिवापुरम के ‘सेंट थामस कॉलेज ऑफ इंजीनियरिग’ के छात्रों ने खेतीब़ाडी के कई कामो को एकसाथ अंजाम देने वाली एक ऐसी अद्भभुत मशीन तैयार की है, जो किसानो के लिए और खेतीबाडी के क्षेत्र में वरदान साबित हो सकती है।

छात्रो ने इस मशीन को ‘मन्नीरा’ नाम दिया है। ‘मन्नीरा’ एकसाथ जुताई, रोपाई, सिंचाई, कटाई, सूप, पिसाई यह सारे कार्य कर सकती है।

इस मशीन को बनाने का एकमात्र मकसद लागत को कम करके मुनाफा डबल करना है। हमे उम्मीद है कि यह मशीन कृषि क्षेत्र में एक क्रांति साबित होगी। जब 10 एकड़ की जमीन पर 5 साल के अंतराल में यही सारे कार्य अलग-अलग मशीनो द्वारा किए गए तो लागत लगभग 27,08,500 रुपए रही, वहीं मन्नीरा का उपयोग किया तो यह लागत गिरकर 6,20,500 रुपए आ गई ।

इम मशीन को ब़डी उपल्बधि बताते हुए छात्रों ने कहा कि अगर अंतिम निरीक्षण के बाद इसका चयन हो जाता है। तो हमें 2 लाख का अनुदान मिलेगा। गौर करने वाली बात यह है कि इस मशीन को बनाने की कीमत भी 2 लाख रूपये ही है.

सिट्रोनेला घास की खेती से कमाएं प्रति एकड़ लाख रूपये

सिट्रोनेला घास की खेती कर आप अधिक लाभ कमा सकते हैं। दरअसल यह घास कई प्रकार से उपयोग में लायी जाती है। जहां एक ओर सौंदर्य के लिए क्रीम आदि बनाने में इसका उपयोग होता है तो वहीं दूसरी ओर मच्छर व मक्खियों को दूर भगाने के लिए इस घास की खास उपयोगिता है। यह काफी दिनों तक लगने वाली घास है जिसके फलस्वरूप किसान एक बार की लागत में कई गुना ज्यादा उत्पादन प्राप्त कर आसानी से अच्छा लाभ कमा सकते हैं।

इस घास की एक नई किस्म जोर लैब सी- 5 जावा जो कि असम के उत्तर-पूर्व विज्ञान एवं प्रौद्दोगिकी संस्थान द्वारा अनुसंधान की गई थी उसे खेती के लिए स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जारी की थी।

यह घास अधिक औषधीय गुण रखने के कारण आजकल काफी व्यापक पैमान पर खेती के अन्तर्गत किसानों को अधिक मुनाफा दे रही है। बताते हैं कि यह घास कम उर्वरा शक्ति वाली भूमि पर आसानी से उपजाई जा सकती है। इस घास से निकला हुआ तेल में मौजूद रसायन ही कई प्रकार के उत्पाद बनाने में लाभकारी होते हैं।

इसकी खेती भारत में पूर्वोत्तर राज्यों समेत यूपी, पश्चिम बंगाल मध्य प्रदेश के साथ-साथ दक्षिण में तमिलनाडु एवं केरल में बड़े स्तर पर की जाती है। यह बुवाई के तीन महीने बाद कटाई के लिए तैयार हो जाती है। एक कटाई के बाद बहुत जल्द कटाई के लिए तैयार होने के कारण यह साल में तीन से चार फसल देती है। जिससे सिंट्रोनेला व्यावसायिक खेती के लिए काफी लाभकारी है।

इस घास की एक एकड खेती से 80 किलोग्राम तक तेल प्राप्त किया जा सकता है जबकि इसकी तेल की कीमत डेढ़ हजार रुपए तक मिलती है।

बताते चलें कि दैनिक जीवन में इस्तेमाल किए जाने वाले साबुन, क्रीम, आदि के लिए इस घास के तेल में मौजूद रसायन काफी लाभकारी होते हैं। मच्छर व मक्खी आदि को भगाए जाने के लिए आज कल बनने वाले उत्पादों के निर्माण में यह लाभदायक होती है।

गन्ना किसानों के लिए खुशखबरी !

गन्ना किसानों के लिए अच्छी खबर है. सरकार ने किसानों को प्रोडक्शन लिंक्ड सब्सिडी के तहत 5.50 रुपये प्रति क्विंटल की सब्सिडी देने का फैसला किया है. आज कैबिनेट की बैठक में यह फैसला लिया गया.

बताया जाता है कि कर्नाटक में विधानसभा चुनावों को देखते हुए सरकार ने यह फैसला लिया है. कर्नाटक में इस महीने चुनाव होने वाले हैं. कर्नाटक यूपी, महाराष्ट्र के बाद तीसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक राज्य है.

इस फैसले के बाद कृषि मंत्रालय सीधे किसानों के खाते में प्रति क्विंटल पर 5.5 रुपये सब्सिडी देगा. इससे चीनी मिलों को भी राहत मिलेगी. गन्ना किसानों का चीनी मिलों पर बकाया बढ़कर 19 हजार करोड़ रुपये के करीब पहुंच गया है. यह अब तक का सर्वाधिक है. मिलों से समय पर भुगतान नहीं मिलने से गन्ना किसानों को भारी आर्थिक दिक्कत हो रही है.

अनाज और दालों का विवरण विस्तार से देखें

गन्ना किसानों की मुश्किलों को देखते हुए हाल ही में मंत्रियों के समूह ने तीन फॉर्मूलों पर विचार किया था. पहला. इसमें चीनी बिक्री पर सेस लगाने, दूसरा, किसानों को गन्ना बिक्री पर सब्सिडी देने और तीसरा एथेनॉल पर जीएसटी कम करने का प्रस्ताव शामिल था.

मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक, सेस के लिए 4 मई को होने वाली जीएसटी परिषद की बैठक में अंतिम निर्णय लिया जाएगा. इधर, किसानों को तत्काल राहत की जरूरत है. इसी के मद्देनजर, प्रति टन 55 रुपये की सब्सिडी मुहैया कराने का प्रस्ताव मंत्रालय ने कैबिनेट को भेजा था.

19000 करोड़ पहुंचा गन्ना बकाया

चालू पेराई सीजन में चीनी का रिकॉर्ड उत्पादन 310-315 लाख टन होने का अनुमान है. दूसरी ओर वैश्विक बाजार में कीमतें कम होने से निर्यात में भी तेजी नहीं है.

यही वजह है कि घरेलू बाजार में चीनी की कीमतें उत्पादन लागत की तुलना में काफी नीचे बनी हुई हैं. इसका सीधा असर गन्ना किसानों के बकाया भुगतान पर पड़ रहा है.

खरबूजे की फसल से किसान ने 70 दिन में कमाए 21 लाख रूपए

एक ओर जहां गुजरात में किसान आलू की फसल की अच्छी फसल न मिलने से परेशान हैं, वहीं एक किसान ने फसल बदलकर काफी मुनाफा कमा लिया है। गुजरात के बनासकांठा जिले के किसान खेताजी सोलंकी ने आलू की जगह खरबूजे की फसल लगाई है जो उनके लिए अच्छी साबित हुई है।

इलाके में आलू की फसल के अच्छे दाम न मिलने पर सभी किसान परेशान थे। ऐसे में अपने सात बीघा के खेत में सोलंकी ने आलू की जगह खरबूजे की फसल बोने का फैसला किया। सातवीं पास सोलंकी ने गांव के दूसरे लोगों को भी रास्ता दिखाया।

नई तकनीकों के इस्तेमाल से फायदा

उन्होंने आधुनिक तकनीकों का प्रयोग कर खरबूजा उगाया। उन्होंने बेहतर बीज, टपक सिंचाई और सोलर वॉटरपंप का इस्तेमाल किया। फरवरी में लगाई फसल अप्रैल में तैयार हो गई और 70 दिन में उन्होंने 21 लाख रुपये कमा लिए। उनके खेत में 140 टन खरबूजा पैदा हुआ।

उन्होंने 1.21 लाख रुपये खर्च किए थे। उनकी फसल इतनी अच्छी थी कि उन्हें उसे बेचने के लिए कहीं जाना भी नहीं पड़ा और दूसरे राज्यों से व्यापारी उनके पास आकर फसल खरीदकर गए। उन्हें इसके काफी अच्छे पैसे मिले।

खेताजी बहुत पढ़े-लिखे नहीं हैं लेकिन तकनीक का भरपूर इस्तेमाल करते हैं। वह मोबाइल ऐप के जरिये किसानों पर टिप्स लेते हैं और फलों की फसल के लिए नई तकनीकें सीखते रहते हैं। वह अब चेरी टमाटर की फसल लगाना चाहते हैं।

किसान ने 90 दिन में तरबूज की खेती से कमाए 3.5 लाख

देशभर में लगातार किसान सूखे और कर्ज की समस्‍याओं की वजह से आत्‍महत्‍या कर रहे हैं। वहीं कई ऐसे राज्‍य हैं जहां किसानों ने तरबूज की खेती कर अपने जीवन में मिठास भर रहे हैं। उन्‍हीं किसानों में से एक हैं तमिलनाडु के रहने वाले मुरुगा पेरुमल।

तरबूज की खेती से पेरुमल न सिर्फ लोगों को प्रेरित कर रहे हैं बल्कि लाखों में कमाई भी कर रहे हैं। दिलचस्‍प ये है कि उनकी कमाई लागत से करीब 8 गुना ज्‍यादा है। तो आइए समझते हैं पेरुमल के कमाई के गणित को।

तरबूज की खेती को चुना

तमिलनाडु के तिरुवन्नमलाई जिले के रहने वाले मुरुगा पेरुमल के गांव वेपुपुचेक्की के अधिकतर लोग खेती पर निर्भर हैं। सभी ने अलग – अलग फसल की खेती की है। वहीं पेरुमल ने ड्रिप इरीगेशन सिस्‍टम के जरिए तरबूज की खेती की है।

2.2 हेक्टेयर जमीन में की खेती

उन्‍होंने इस खेती के लिए 2.2 हेक्टेयर जमीन का इस्‍तेमाल किया। उन्होंने इसमें 1 हेक्टेयर जमीन का इस्‍तेमाल Pukeeza वैराइटी के लिए किया। जबकि 1.2 हेक्‍टेयर जमीन को अपूर्व वैराइटी के लिए इस्‍तेमाल किया।

कैसे की खेती

  • इसके बाद उन्होंने खेत की चार बार जुताई की ।
  • आखिरी बार जुताई से पहले उन्होंने 25 टन / हेक्टेयर की दर से खाद का इस्‍तेमाल किया।
  • 300 किलोग्राम डीएपी खाद
  • 150 किलो पोटाश एक बेसल डोज
  • एक हेक्टेयर के लिए 3.5 किलो बीज का इस्तेमाल किया ।
  • नवंबर में बीज बोया, ड्रिप सिस्टम के जरिए प्रति दिन 1 घंटे खेत की सिंचाई करते थे।

49 हजार रुपए का लोन

पेरुमल ने वेपुपुचेक्की को-ऑपरेटिव सोसाइटी से 1 हेक्‍टेयर जमीन के लिए 49 हजार रुपए का लोन लिया। पेरुमल पहली बार खेती कर रहे थे इसलिए सरकार की ओर से 50% फर्टिलाइजर सब्‍सिडी भी मिला। ऐसे में उनकी जेब से मामूली खर्च हुए।

70 दिन बाद काटी फसल

पेरुमल के मुताबिक करीब 70 दिन बाद उसने मजूदरों के साथ मिलकर फसल काटा। तब पेरुमल के खेत से Pukeeza वैराइटी के तरबूज 55 टन निकले जबकि अपूर्व वैराइटी में 61 टन तरबूज की पैदावार हुई। वहीं दो सप्‍ताह बाद एक बार फिर फसल काटी गई। इस बार उन्‍हें Pukeeza वैराइटी से 6 टन और अपूर्व वैराइटी से 4 टन तरबूज मिले ।

3 लाख 30 हजार रुपए का मुनाफा

पेरुमल ने तरबूज की पहली खेप 3100 रुप प्रति टन बेची। जबकि दूसरे खेप को 1000 रुपए प्रति टन बेचा। उन्‍होंने कुल 3 लाख 30 हजार रुपए का मुनाफा कमाया।