यह मशीन करती है गेहूं की नई तकनीक से बुवाई ,कम पानी में होती है अधिक सिंचाई

समय के साथ-साथ खेती में आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। अभी भी बहुत से किसान गेहूं की बुवाई बीज को हाथों से छिड़क कर ही करते हैं, लेकिन आज के समय ऐसी मशीन आ गई है जिससे किसान गेहूं की बुवाई कर सकते हैं, जिससे न सिर्फ समय की बचत होती है बल्कि इससे कई और फायदे भी होते हैं। आइये हम आपको बताते हैं कि ट्रैक्टर चालित रेज्ड बेड सीड ड्रिल से गेहूं की बुवाई कैसे होती है और इसके क्या फायदे हैं।

ट्रैक्टर चालित रेज्ड बेड सीड ड्रिल मशीन (Raised Bed Seed Drill Machine) मिट्टी उठा कर बुवाई करने की तकनीक पर आधारित है। इसमें मिट्टी उठाने के लिये रिजर तथा बेड बनाने के लिये बेड शेपर लगे होते हैं। रेजर बनने वाली नाली (बरे) की चौड़ाई घटाई-बढ़ाई जा सकती है। मशीन के अगले भाग में लगे रेजर मिट्टी उठाने के लिये का कार्य करते हैं, फरो ओपनर इस उठी हुई मिट्टी पर बुवाई करता हैं, तथा बेड शेपर उस उठी हुई मिट्टी को रूप देते हैं।इस प्लांटर के द्वारा बेड पर दो या तीन लाइन बीज एवं खाद की बुवाई की जाती है।

इस तकनीक से बुवाई करने से फसल वर्षा के पानी का भरपूर उपयोग करती है तथा सिंचाई की स्थिति में काफी कम पानी लगता है तथा कार्य जल्दी पूरा हो जाता है। इस मशीन के द्वारा 25 प्रतिशत खाद एवं बीज की बचत होती है। इस पद्धति से बुवाई करने से 4 एकड़ की सिंचाई करने में जितना पानी लगता है उतने ही पानी से 6 से 8 एकड़ की सिंचाई की जा सकती है।इस प्लांटर के द्वारा बुवाई करने के बाद निकाई गुड़ाई आसानी से की जा सकती है।

साथ ही इस विधि से गेहूं की बुवाई करने से आप ज्यादा उत्पादन ले सकते है और नदीन भी बहुत कम उगते है । रेज्ड बेड सीड ड्रिल से सिर्फ गेहूं ही नहीं और भी बहुत सारी फसलें जैसे मक्का ,सोयबीन,दालें आदि की बुवाई कर सकते है । बहुत सारी कंपनी यह मशीन बनाती है आप किसी भी बुवाई मशीन त्यार करने वाली वर्कशाप पर पता कर सकते है ।

यह मशीन कैसे बिजाई करती है उसके लिए वीडियो देखें

सिर्फ दो सिंचाई में ही तैयार हो जाएगा यह गेहूं, एक हेक्टेयर में देगा 45 क्विंटल उत्पादन

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) इंदौर ने गेहूं की नई वैरायटी ईजाद की है। इसे प्रमाणित करने के लिए सेंट्रल वैरायटी रिलीज कमेटी (सीवीआरसी) में जमा किया गया है। खासियत यह है कि यह दो सिंचाई में पककर तैयार हो जाएगी। गेरुआ और करनाल बंट रोग कभी नहीं आएगा।दूसरा इसमें बीटा कैरोटीन, आयरन, जिंक व प्रोटीन भरपूर मात्रा में है, जो एनिमिया से बचाने के साथ मनुष्यों में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं।

गेहूं में मुख्य रूप से पीला रतुआ, गेरूआ रोग और काला कंडुआ (खुली कांगियारी) रोग होता है। यह रोग फफूंद के रूप में फैलता है। तापमान में वृद्धि के साथ-साथ गेहूं को पीला रतुआ रोग लग जाता है।यह खासकर पहाड़ी क्षेत्रों में फैलता है, लेकिन रोकथाम के अभाव में यह मैदानी क्षेत्रों में फैल जाता है। उपज प्रभावित होती है, इससे किसानों को नुकसान होने की आशंका बढ़ जाती है।

यह रोग कृषि वैज्ञानिकों के लिए चुनौती बन गई है, इससे निपटने के लिए कृषि महाविद्यालय जबलपुर ने गेहूं की ऐसी प्रजाति विकसित की है जो 105 दिन में पककर तैयार हो जाएगी।

आईएआरआई के प्रधान वैज्ञानिक एसवी सांई प्रसाद ने बताया कि इसमें बीटा कैरोटीन, आयरन 48.7 पाट्स पर मिलियन (पीपीपी), जिंक 43.7 पीपीपी व प्रोटीन अधिक मात्रा में है। ये तत्व मानव शरीर के लिए बहुत लाभदायक हैं। बीटा कैरोटीन सन बर्न कम करने और त्वचा को स्वस्थ रखने के लिए लाभदायक है।

इस गेहूं में गेरुआ व करनाल बंट रोग की आशंका भी कम रहती है।आईएआरआई ने वाराणसी वर्कशॉप में एचआई 8777 वैरायटी आइडेंटिफाइड की थी। इसे पूसा बीट 8777 नाम दिया गया। इसे आईएआरआई ने सीवीआरसी को भेजा है। अन्य गेहूं की अपेक्षा यह किस्म चमकदार और आकर्षक है।

वैज्ञानिक एके सिंह ने बताया पूसा 8777 समुद्र तटीय क्षेत्रों जैसे कर्नाटक व महाराष्ट्र में भी अच्छी पैदावार देगी। वहीं मध्यप्रदेश के ऐसे किसान जिनके पास पानी की कमी है वे एक या दो बार की सिंचाई में 40 से 45 क्विंटल पैदावार ले सकते हैं। इस फसल को 105 दिन में काटा जा सकता है।

जेडब्लू (एमपी) 3288 : ये किस्म वर्षा आधारित या सीमित सिंचाई में खेती के लिए उपयुक्त है। दाने बड़े होते है। पौधा झुकता नहीं है तथा इसके दाने छिंटकते नहीं है। कई कल्ले देती है। गेरूआ रोग के प्रतिरोधी तथा 2 सिंचाई मे उपज 45-47 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन होता है।

जेडब्लू (एमपी) 3173 : आंशिक सिंचाई मे खेती करने योग्य है। गर्मी के प्रति सहनशील, गेरूआ रोग के प्रतिरोधी, मोटे दानों वाली है। एक-दो सिंचाई में 45-47 क्विंटल उत्पादन होता है। सूखे तथा गेरुआ रोग के प्रति रोधी, चपाटी बनाने के लिए उत्तम है।

जेडब्लू (एमपी) 3211 : सूखे तथा गेरूआ रोग के प्रतिरोधी, चपाती बनाने के लिए उत्तम, एक-दो सिंचाई में पक जाती है। 40-45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन होता है।

नर्मदा 4: यह पिसी सरबती किस्म, काला और भूरा गेरूआ निरोधक है। यह असिंचित एवं सीमित सिंचाई क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। इसके पकने का समय 125 दिन हैं। पैदावार 12-19 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। दाना सरबती चमकदार होता है। यह चपाती बनाने के लिए विशेष उपयुक्त है।

एनपी-404 : यह काला और भूरा गेरूआ निरोधक कठिया किस्म असिंचित दशा के लिए उपयुक्त है। यह 135 दिन मे पककर तैयार होती है। पैदावार 10 से 11 क्विंटल प्रति हेक्टयर होती है। दाना बड़ा, कड़ा और सरबती रंग का होता है।

मेघदूत : यह काला और भूरा गेरूआ निरोधक कठिया जाति असिंचित अवस्था के लिए उपयुक्त है। पकने का समय 135 दिन है। पैदावार 11 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। इसका दाना एनपी 404 से कड़ा होता है। हाइब्रिड 65: यह पिसिया किस्म है, जो भूरा गेरूआ निरोधक है। यह 130 दिन में पकती है। इसकी पैदावार असिंचित अवस्था में 13 से 19.क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। इसका दाना, सरबती, चमकदार, 1000 बीज का भार 42 ग्राम होता है।

मुक्ता: यह पिसिया किस्म है जो भूरा गेरूआ निरोधक है। असिंचित अवस्था के लिये उपयुक्त है। यह 130 दिन में पकती है। इसकी पैदावार 13-15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। इसका दाना सरबती लम्बा और चमकदार होता है।

गेहूं की उन्नत किस्मों की विशेषताएं

ऐसे फैलता है ये रोग

पीला रतुआ, गेरूआ रोग और काला कंडुआ (खुली कांगियारी) गेहूं की फसल में फंफूद के रूप में फैलता है। रोग के प्रकोप से गेहूं की पत्तियों पर छोटे-छोटे अंडाकार फफोलो बन जाते हैं। ये पत्तियों की शिराओं के साथ रेखा सी बनाते हैं। रोगी पत्तियां पीली पड़कर सूख जाती हैं।

यह गेहूं लोगों के लिए भी फायदेमंद

बीटा कैरोटीन एक एंटी ऑक्सीडेंट और इम्यून सिस्टम बूस्टर के रूप में काम करता है। यह शरीर को नुकसान पहुंचाने वाले मुक्त कणों (फ्री रेडिकल्स) से रक्षा करता है और इम्यून सिस्टम (रोग प्रतिरोधक क्षमता) को मजबूत बनाता है। यह विटामिन-ए का अच्छा स्रोत है, जो त्वचा में सूर्य से होने वाले नुकसान को कम करता है। वहीं आयरन की कमी को दूर कर नवजात, किशोरों व गर्भवतियों में होने वाली खून की कमी को दूर करता है।.

अब इस मशीन से दो मिंट में जाने अपने खेत की फसल का हाल

इंसान के पास अपने शरीर का बुखार चैक करने के लिए थर्मामीटर और डायबीटिज चैक करने वाली मशीन भी है। शरीर में कैल्सियम की कमी है ये पता करने वाली मशीनें भी है। लेकिन खेत में खड़ी फसल को किस चीज की जरूरत है, क्या उसे खांसी हुई है या बुखार यानी उसे पानी की जरूरत है अभी या फिर किसी दवा की, इसे जांचने वाली मशीन की तलाश किसानों को लंबे समय से थी।

ऐसी ही एक छोटी सी मशीन को इस्तेमाल कर हरियाणा के किसान लवप्रीत सिंह फसल को होने वाले नुकसान से आसानी से बच जाते हैं और ज्यादा पैदावार कर ज्यादा कमाई कर रहे हैं।

बुआई और रोपाई के समय ही खेतों को पानी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। लेकिन तब बरसात नहीं होती। फिर जब फसल की कटाई का वक्त आता है, तो अनचाही बरसात सब बर्बाद कर देती है। सालों से किसान को इसी समस्या का सामना करना पड़ता आ रहा है।

लेकिन हरियाणा के किसान लवप्रीत सिंह को परेशानी से बच जाते हैं। दरअसल, ग्रीन सीकर जैसे छोटे गैजेट्स फसलों के लिए सेंसर की तरह काम करते हैं। लवप्रीत इसी मशीन का इस्तेमाल करते हैं। वो जैसे ही इस मशीन को खेत में खड़ी फसल के किसी भी हिस्से पर ले जाते हैं, तो मशीन से लाल रंग की तरंगे यानी रोशनी निकलती है।

फसल का स्वास्थ्य जांचने वाली मशीन

ये तरंगे पौधों से टकराकर खत्म हो जाती हैं, लेकिन खत्म होने से पहले वो मशीन को बता देती हैं कि फसल को किस चीज की अभी कमी है। इसी मदद से लवप्रीत खेत की मिट्टी में नाइट्रोजन की स्थिति का भी पता तुरंत लगा लेते हैं।

किसान लवप्रीत अपने 50 एकड़ के खेत की फसलों के लिए ऐसी कई नई तकनीक वाली मशीनें इस्तेमाल करते हैं। यह उनमें से एक है।

लवप्रीत के मुताबिक तकनीक की वजह से वो मौसम की बेहतर भविष्यवाणी जान लेते हैं। जिसकी वजह से वो बीजारोपण करने के सही समय और कीटनाशकों के छिकड़ने के समय की सही योजना आसानी से पहले ही बना लेते हैं।

लेकिन पहले ऐसा नहीं हो पाता था। इस वजह से उनको पहले मजदूरों पर अधिक खर्च करना पड़ता था। फिर गलत समय पर बरसात, फसल को बर्बाद कर दिया करती थी।

बाकी किसान छोटी जोत वाले हैं इसलिए वो 40 हजार रूपए की कीमत वाली ग्रीनसीकर मशीन को नहीं खरीद पाते। ऐसे में लोकर कृषि समितियों ने इनको खरीद लिया है और वो अब बाकी छोटे किसानों को इसे फ्री में इस्तेमाल करने देती है ताकि किसान को फायदा हो सके। ऐसे करता है काम

इसके सेंसर में लाल इंफ्रारेड लाइट लगी होती है जो पौधे के ऊपर पढ़ने वाले हर प्रकार के प्रकाश का का विश्लेषण कर पौधे के बारे में जानकारी हांसिल करती है ।सेंसर अपनी रिपोर्ट इस यंत्र की ऐल.सी.डी स्क्रीन पर देता है । जो NDVI (रीडिंग 0.00 से 0.99) स्क्रीन पर दिखाई देती है ।

रीडिंग के हिसाब से हम पौधे की सेहत के बारे में जान सकते है । इसको Connected Farm™ scout ऐप के साथ कनेक्ट किआ जा सकता है जिस से अगर कोई घर से दूर भी हो तो भी अपने खेत के बारे में जानकारी हांसिल कर सकता है ।

किसान द्वारा सलेक्शन विधि से तैयार की 3 फीट लंबी काले रंग की देशी गाजर

झीगरबड़ी के प्रगतिशील किसान झाबर मल पचार द्वारा सलेक्शन विधि से तैयार की गई तीन फीट लंबी काले रंग की देशी गाजर की तर्ज पर देशभर में बुआई होगी। किसान द्वारा तैयार किया गया देशी गाजर का बीज राष्ट्रीय नवप्रवर्तन संस्थान अहमदाबाद की टीम ने कारगर माना है।

इस विधि की संस्थान द्वारा देशभर के किसानों के उपयोग के लिए सिफारिश की जाएगी। पचार ने प्रयोग सफल होने के बाद इस साल 200 किलो देशी गाजर का बीज तैयार किया। यह बीज शेखावाटी सहित देश के कई हिस्सों के किसानों को बुआई के लिए सप्लाई किया गया।

पचार ने बताया कि काली देशी गाजर की खासियत है कि किसान को सामान्य फसलों से पांच गुना ज्यादा पैदावार मिल रही है। एक कंद 400 से 500 ग्राम वजन तक है। कंद की मोटाई भी सामान्य है। नवप्रवर्तन संस्थान अहमदाबाद की टीम ने किसान के खेत से फसल का जायजा लिया है।

वहीं संस्थान द्वारा अपने स्तर पर पचार द्वारा तैयार गाजर को पूसा प्रदर्शनी में भी प्रदर्शित किया जा चुका है। उद्यान विभाग के क्षेत्रीय उपनिदेशक हरलाल सिंह बिजारणियां का कहना है कि झीगर के किसान झाबर मल पचार द्वारा तैयार किया गया देशी गाजर का बीज एक अनूठा प्रयोग है। यह किस्म देशी गाजर उत्पादन में महत्वपूर्ण साबित हो रही है।

मिठास शक्कर जैसी आती है |बीज की गुणवत्ता मिठास बढ़ाने के लिए किसान ने घी शहद से बीजोपचार किया है। उद्यान विभाग के अनुसार बीजोपचार के बाद खेत में तैयार गाजर के कंद में शक्कर जैसी मिठास रही है। बीज को किसान ने एक किलो बीज को पांच ग्राम घी पांच ग्राम शहद में मिलाकर उपचारित किया। इस विधि से बीज का अंकुरण भी जल्दी होता है।

यूं तैयार किया देशी गाजर का बीज

तीनसाल पहले काली गाजर के ज्यादा लंबाई वाले कंद की छंटनी शुरू कर दी। तीन साल बाद अक्टूबर में किसान ने लंबे बीज वाले कंद से 300 वर्ग फीट क्षेत्र में प्रायोगिक तौर पर गाजर की बुआई की। चार माह में किसान के खेत में तीन फीट लंबी काले रंग की देशी गाजर का कंद तैयार हो गया है।

1 बीघा बीज की खेती से 18 लाख की आय

झाबरमल पचार का कहना है वह देशी गाजर की खेती से सालाना 8 से 10 लाख रुपए कमा रहा है। इस बार उन्होंने एक बीघा में गाजर के बीज की खेती की है। करीब डेढ़ क्विंटल बीज उत्पादन की उम्मीद है। मार्केट भाव 1200 रुपए प्रतिकिलो तय किया है। इससे सीजन में 18 लाख की आमदनी की उम्मीद है।

एग्रीकल्चर युनिवर्सिटी एवं बीज एजेंसियों की प्रदर्शनियों में काबिलियत जानने के बाद बुआई सीजन शुरू होने से पहले ही दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात, कोलकाता सहित राजस्थान के कई जिलों से 3 हजार से ज्यादा किसानों ने बीज की एडवांस बुकिंग करा दी है। हालांकि अभी तक बीज सरकारी एजेंसी से प्रमाणित नहीं हुआ है। यह मांग कंद की गुणवत्ता और मिठास को देखते हुए बढ़ी है।

पशु खरीदने जा रहे हैं तो रखें इन बातों का ध्यान ,नहीं तो हो सकते है ठगी का शिकार

ज्यादातर पशुपालक दूसरे राज्यों से महंगी कीमत पर दुधारू पशु तो खरीद लेते हैं। लेकिन बाद में पता चलता है कि दूध का उत्पादन उतना नहीं हो रहा जितना बिचौलिए या व्यापारी ने बताया था और कई बार पशु को कोई गंभीर बीमारी होती है जो कभी ठीक नहीं हो सकती ऐसे में पशुपालकों को आर्थिक नुकसान भी होता है।

ऐसे में आप निचे दी हुई बातों का ध्यान रख कर ठगी से बच सकते है और आपको सही नस्ल का पशु चुनने में भी आसानी होगी

शारीरिक बनावट : अच्छे दुधारू पशु का शरीर आगे से पतला और पीछे से चौड़ा होता है। उस के नथुने खुले हुए और जबड़े मजबूत होते हैं। उस की आंखें उभरी हुई, पूंछ लंबी और त्वचा चिकनी व पतली होती है। छाती का हिस्सा विकसित और पीठ चौड़ी होती है। दुधारू पशु की जांघ पतली और चौरस होती है और गर्दन पतली होती है। उस के चारों थन एकसमान लंबे, मोटे और बराबर दूरी पर होते हैं।

दूध उत्पादन कूवत : बाजार में दुधारू पशु की कीमत उस के दूध देने की कूवत के हिसाब से ही तय होती है, इसलिए उसे खरीदने से पहले 2-3 दिनों तक उसे खुद दुह कर देख लेना चाहिए. दुहते समय दूध की धार सीधी गिरनी चाहिए और दुहने के बाद थनों को सिकुड़ जाना चाहिए।

आयु : आमतौर पर पशुओं की बच्चा पैदा करने की क्षमता 10-12 साल की आयु के बाद खत्म हो जाती है। तीसरा चौथा बच्चा होने तक पशुओं के दूध देने की कूवत चरम पर होती है, जो धीरे धीरे घटती जाती है। दूध का कारोबार करने के लिए 2-3 दांत वाले कम आयु के पशु खरीदना काफी फायदेमंद होता है। पशुओं की उम्र का पता उन के दांतों की बनावट और संख्या को देख कर चल जाता है। 2 साल की उम्र के पशु में ऊपर नीचे मिला कर सामने के 8 स्थायी और 8 अस्थायी दांत होते हैं। 5 साल की उम्र में ऊपर और नीचे मिला कर 16 स्थायी और 16 अस्थायी दांत होते हैं। 6 साल से ऊपर की आयु वाले पशु में 32 स्थायी और 20 अस्थायी दांत होते हैं।

वंशावली : पशुओं की वंशावली का पता लगने से उन की नस्ल और दूध उत्पादन कूवत की सही परख हो सकती है। हमारे देश में पशुओं की वंशावली का रिकार्ड रखने का चलन नहीं है, पर बढि़या डेरी फार्म से पशु खरीदने पर उस की वंशावली का पता चल सकता है।

प्रजनन : सही दुधारू गाय या भैंस वही होती है, जो हर साल 1 बच्चा देती है। इसलिए पशु खरीदते समय उस का प्रजनन रिकार्ड जान लेना जरूरी है। प्रजनन रिकार्ड ठीक नहीं होने, बीमार और कमजोर होने से पाल नहीं खाने, गर्भपात होने, स्वस्थ बच्चा नहीं जनने, प्रसव में दिक्कतें होने जैसी परेशानियां सामने आ सकती हैं।

धर्मेंद्र यहां बिताते हैं फुर्सत के पल, ऐसा दिखता है उनका फार्म हाउस

गुजरे जमाने के हीरो धर्मेंद्र 82 साल (8 दिसंबर) के हो गए हैं। कई सुपरहिट फिल्मों में काम करने वाले धर्मेंद्र अभी भी फिल्मों में एक्टिव हैं। उनकी अपकमिंग फिल्म ‘यमला पगला दीवाना 3’ है, जिसकी शूटिंग जारी है। बता दें कि फेसबुक पर ‘धर्मेंद्र-ही मैन’ नाम से पेज है, जिस पर उन्होंने अपनी लाइफ की कई फोटोज शेयर कर रखी हैं।

लोनावला स्थित फार्म हाउस पर उनके फुर्सत के लम्हों की कुछ फोटोज भी इनमें शामिल हैं, जिनमें उन्हें कहीं गाय का दूध दूहते देखा जा सकता है तो कहीं वे अपने पालतू डॉग के साथ खेलते नजर आ रहे हैं। उनकी ये फोटोज आप आगे की स्लाइड्स में देख सकते हैं।

ज्यादातर समय फार्म हाउस पर ही बिताते हैं धर्मेंद्र…

एक इंटरव्यू के दौरान धर्मेंद्र ने कहा था, “मैं जाट हूं और जाट जमीन और अपने खेतों से प्यार करता है। मेरा ज्यादातर समय लोनावाला स्थित अपने फार्म हाउस पर ही बीतता है। हमारा फोकस ऑर्गनिक खेती पर है, हम चावल उगाते हैं। फार्म हाउस पर मेरी कुछ भैंसें भी हैं।

आखिरी बार ‘सेकंड हैंड हसबैंड’ में दिखे थे धर्मेंद्र

  •  धर्मेंद्र ने अपने करियर में ‘शोले’, ‘मां’, ‘चाचा भतीजा’, ‘धरम वीर’, ‘राज तिलक’, ‘सल्तनत’ और ‘यकीन’ जैसी कई पॉपुलर फिल्मों में काम किया।

  •  82 साल के हो चुके धर्मेंद्र को आखिरी बार साल 2015 में ‘सेकंड हैंड हसबैंड’ में देखा गया था, जिससे गोविंदा की बेटी टीना आहूजा ने बॉलीवुड डेब्यू किया था।

ब्याने से पहले पशुओं की देखभाल और खुराक के संबंधी जानकारी जरूरी पढ़े

यह जानकारिया पशु के ब्याने से पहले पता होनी चाहिए

ब्याने से पहले दुधारू पशुओं की देखभाल और खुराक के संबंधी जानकारी होनी बहुत जरूरी है। पशुओं को अपने शरीर को सेहतमंद रखने के अलावा, दूध देने के लिए और अपने पेट में पल रहे कटड़े/ बछड़े की वृद्धि के लिए खुराक की जरूरत होती है।

यदि गाभिन पशु को आवश्यकतानुसार खुराक ना मिले, तो इनकी अगले ब्याने में दूध देने की क्षमता कम हो जाती है और कमज़ोर कटड़े/बछड़े पैदा होते हैं जो कि इन बीमारियों का अधिक शिकार होते हैं।

  • ब्याने से कुछ दिन पहले यदि आप पशु को सरसों का तेल देते हो तो प्रतिदिन 100 ग्राम से अधिक नहीं देना चाहिए।
  •  ब्याने से 4-5 दिन पहले पशुओं को कब्ज नहीं होनी चाहिए। यदि ऐसा हो तो अलसी का दलिया देना चाहिए।

  • यदि पशु खुले स्थान में हों, तो उन्हें ब्याने से 15 दिन पहले बाकी पशुओं से अलग कर दें और साफ सुथरे कीटाणु रहित कमरे में रखें।
  • पशु से अच्छा व्यवहार करना चाहिए और दौड़ाना नहीं चाहिए और ना ही ऊंची नीची जगहों पर जाने देना चाहिए।
  • गर्भावस्था के आखिरी महीने में दुधारू पशुओं के हवानों को हर रोज़ कुछ मिनटों के लिए अपने हाथ से सिरहाना चाहिए ताकि उन्हें इसकी आदत पड़ जाए।

  • इस तरह करने से इनके ब्याने के उपरांत दूध निकालना आसान हो जाता है।
    ब्याने वाले पशु को हर रोज़ दिन में 5-7 बार ध्यान से देखना चाहिए।
  • पशुओं को हर रोज़ धातुओं का चूरा 50-60 ग्राम और 20-30 ग्राम नमक आदि भी देना चाहिए।

1800 रुपये किलो बिकती है काले चावल की यह किसम

मणिपुर में पैदा होने वाले विशेष काले चावल के दाम सुनकर कइयों के होश उड़ जाएंगे। 1800 रुपये प्रति किलो के आसपास के दाम पर बिकने वाले इस विशेष चाक हाओ (सेंटेड काला चावल) में पोषक तत्वों की मात्रा अन्य चावलों से ज्यादा है, इसलिए इसके गुणों को देखकर 1800 रुपये किलो का दाम भी सस्ता लगने लगता है।

राज्य के किसानों को आर्थिक लाभ पहुंचाने और इसमें पाए जाने वाले औषधीय गुणों से अधिकांश लोगों को लाभ प्रदान कराने के मकसद से मणिपुर सरकार का कृषि विभाग इस चावल की ब्रांडिंग में जुटा हुआ है। प्रदेश सरकार का कहना है कि चाक हाओ मणिपुर के संसाधन की आर्थिक थाती बन सकता है। सरकार इस चावल की जोर-शोर से ब्रांडिंग भी कर रही है।

 

मणिपुर में काले धान की पैदावार होती है, जिससे काला चावल निकलता है। मणिपुर सरकार के कृषि विभाग ने इसकी प्रजाति को उन्नत बनाते हुए इसमें औषधीय गुणों और पोषक तत्वों की प्रचुरता वाले काले धान की किस्म ईजाद की है। इससे निकलने वाला चावल सामान्य काले चावलों से ज्यादा गुणी है, इसलिए चाक हाओ की कीमत करीब 1800 रुपए प्रति किलो के आसपास है। अभी इसका व्यवसायिक उत्पादन उतना तेज नहीं हुआ है।

वैसे सामान्य काले चावल की बाजार में कीमत भी 150 से 200 रुपए किलो के आसपास है। मणिपुर कृषि विभाग के अनुसार 2015 के खरीफ सीजन के दौरान 60 से 70 हेक्टेयर खेत पर चाक हाओ की उपज हुई थी। राज्य सरकार ने इसकी खेती का दायरा बढ़ाने का निर्णय लिया है। मिशन ऑर्गेनिक वेल्यू चेन, एनई के तहत वर्ष 2016 के खरीफ सीजन में प्रदेश सरकार ने किसानों को करीब 2000 हेक्टेयर में इसकी पैदावार के लिए प्रेरित किया है। सरकार को उम्मीद है कि इसकी मांग देश-दुनिया के बाजार में तेजी से बढ़ेगी। राज्य के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने कहा कि देश-दुनिया में हमारे चावलों की मांग बढ़ रही है।

चाक हाओ है फायदे का सौदा

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मणिपुर सरकार के कृषि मंत्रालय के जरिए दिए गए आंकड़ों के अनुसार अन्य काले चावलों के मुकाबले चाक हाओ किसान, व्यापारियों से लेकर उपभोक्ता तक के लिए लाभ का सौदा है। इसकी खेती में प्रति हेक्टेयर 60 हजार रुपये की लागत आती है।

इससे करीब 2880 किलो धान का उत्पादन होता है और उस धान से यदि 65 प्रतिशत चावल की रिकवरी मानें तो प्रति हेक्टेयर के धान से 1872 किलो चावल निकलता है। सरकार ने 100 किलो के चावल का बिक्री मूल्य 182720 रुपये निर्धारित किया है। इस हिसाब से देखा जाए तो तो एक  हेक्टेयर से 35 लाख और एक एकड़ से 14 लाख की धान की फसल होगी ।

काले चावल को स्वास्थ्य के लिए सबसे लाभकारी

यूं तो काले चावल को स्वास्थ्य के लिए सबसे लाभकारी माना जाता है। सफेद और भूरे चावल के मुकाबले काले चावल में विटामिन और खनिज तत्वों की प्रचुरता ज्यादा रहती है। एंथोसायनिन पाए जाने की वजह से इस चावल का रंग काला होता है जो कि इसमें एंटी ऑक्सिडेंट को बढ़ाता है। एंटी ऑक्सिडेंट हमारे शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर करने में मदद करता है।

इस विशेष चावल में एंटीऑक्सिडेंट की मात्रा ज्यादा है। इसके अलावा इसमें विटामिन ई, फाइबर और प्रोटीन की प्रचुरता सामान्य काले चावलों से भी ज्यादा है जबकि सामान्य काले चावल में यह तत्व सफेद और भूरे चावल से ज्यादा है।अगर गुणवत्ता की बात करें तो इसके 100 ग्राम में कार्बोहाइड्रेट-34, प्रोटीन-8.7, आयरन-3.5, फाइबर-4.9 और सर्वाधिक एंटी ऑक्सिडेंट मौजूद रहता है।

मणिपुर सरकार ने दावा किया है कि तमाम शोधों के बाद यह प्रमाणित हुआ है कि इस काले चावल के खाने से गंभीर ऐथिरोस्क्लेरोसिस बीमारी, उच्च रक्तचाप, तनाव, उच्च कोलेस्ट्रॉल, आर्थराइटिस, कैंसर और एलर्जी सरीखी बीमारियों से पीड़ितों को बचाव एवं राहत प्रदान करता है।

 

 

 

पाॅली हाउस में यह विदेशी सब्जियां ऊगा कर किसान ले रहा है चोखा मुनाफा

राजस्थान के नाथद्वारा शहर के पास शिशोदा पंचायत के दड़वल में आधुनिक तकनीक से पाॅली हाउस में विदेशी सब्जियां उगाई जा रही है। लाल पत्ता गोभी, लाल-पीली-हरी रंगीन शिमला मिर्च और ब्रोकली जैसी विदेशी सब्जियां कमाई का साधन बनी हुई है। क्षेत्र के युवा पारंपरिक खेती की जगह आधुनिक तकनीक को अपनाते हुए उन्नत खेती में भविष्य संवार रहे है।

दड़वल गांव के दिनेश जोशी ने 2013 में कुल 1016 वर्ग मीटर जमीन पर पाॅली हाउस लगवा विदेशी सब्जियों की खेती शुरू की, जो उनका जीविकोपार्जन है। उन्होंने लाल अौर पीली हरी मिर्च और ब्रोकली से शुरुआत की। पहली बार कुछ समस्या के बावजूद अच्छा मुनाफा हुआ तो उन्होंने खीरा, जुकनी, लाल पत्ता गोभी, सलाद पत्ता, अमेरिकन मक्का सहित सब्जियों को भी उगाना शुरू किया।

ऐसे की शुरुआत

जिला कृषि विभाग के सहयोग से मिट्टी का परीक्षण कर 2013 में कुल 1016 वर्ग मीटर में अत्याधुनिक तकनीक युक्त पाॅली हाउस लगाया गया।अच्छा मुनाफा होने पर 2015 में दूसरा पाॅली हाउस 2016 वर्ग मीटर पर लगवाया।

यह है दाम

ब्रोकली खेत पर 80 तथा बाजार में 200 से 250, लाल पत्ता गोभी 80 से 90 तथा बाजार में 100 से 130 तक मिल रही। शिमला मिर्च जहां किसान 70 में दे रहे वहीं बाजार में 120 से 150 में मिल रही है। सलाद पत्ता 70 में ले कर बाजार में 150 तक बेचा जा रहा है।

दूसरे लोगों को दे रहे है रोजगार

दड़वलके किसान दिनेश और तुलसीराम जोशी ने जहां आधुनिक खेती को अपनाया वहीं गांव के करीब 4 परिवार को भी रोजगार दिया है। पाॅली हाउस पर कटाई छटाई और पैकिंग के लिए जोशी ने कर्मचारी भी रखे है।

क्षेत्र के कई किसान जोशी से आधुनिक खेती के गुर भी सीख रहे है। किसान दिनेश जोशी का कहना है कि मनुष्य को यदि प्रतिदिन एक ही वस्तु खिलाई जाए तो वह भी नहीं खाएगा। फिर जमीन पर एक जैसी खेती क्यों करें, यहीं सोच कर नए प्रयोग किए।

पॉली हाउस में उगाई लाल गोबी।

पाॅली हाउस में पौधा रोपण के 3 माह बाद फसल तैयार होती है। बीज को नर्सरी में तैयार किया जाता है, पौधा उगने के बाद पाॅली हाउस में एक समान दूरी पर पौधे लगाएं जाते है। इसमें मौसम का इंतजार नहीं करना पड़ता है।

पाॅलीहाउस में सुरक्षा

पारंपरिकखेती की जगह पाॅली हाउस में फसल की गुणवत्ता और मात्रा में भी काफी अंतर है। पाॅली हाउस में गर्मी, सर्दी हवा को नियंत्रित किया जाता है। हवा अौर धूप के लिए पाॅली हाउस के पर्दे उठा लिए जाते है, वहीं सर्दी आैर तेज धूप पड़ने पर पौधों को उन्हीं पर्दों से बचाया जाता है।

विदेशी सब्जियों की स्थानीय स्तर पर खपत नहीं होने से बड़े शहरों में भेजा जाता है। मुंबई, बड़ौदा, सूरत, जयपुर, पूना और आगरा के बाजार तक क्षेत्र के किसानों ने पहुंच बनाई है। फाइव स्टार होटलों और पार्टियों में विदेशी सब्जियों की काफी मांग रहती है।

पशुओं के लिये बहुत उपयोगी ये नुस्खे, नहीं पड़ेगी डॉक्टर की जरूरत

फैट बढ़ाने का फार्मूला

पशु चारे के साथ 100 ग्राम कैल्शियम व 100 ग्राम सरसो का तेल तथा चुटकी भर काला नमक डालकर 7 दिन तक खिलाने से दूध में फेट बढ़ जाएगी ।

पशु को दस्त लगने पर

देसी आंकड़े के 10 फूल तोड़ कर एक रोटी में डालकर खिला देने से चार-पांच घंटे में दस्त ठीक हो जाएगा ।

पशु को हीट पर लाने का तरीका

  • 100ग्राम गुड पुराना वाला कम से कम एक साल पुराना हो..
  • 100 ग्राम सरसो का तेल..
  • 100 ग्राम कैल्शियम..

उपरोक्त तीनों चीजों को मिलाकर 18-20 दिन खिला दे जानवर हीट पर आ जाएगा पशुओं को क्रास या बीज डलवाने के बाद गुड व तेल बंद कर दें और कैल्शियम को ढाई सौ ग्राम जौ के दलिया के साथ पिलाएं

पशु की जड़ टूट जाने पर

1 किलो गुड़ वह साथ में 50 ग्राम अजवाइन 40 /50 आम के पत्तों को पांच लीटर पानी में खूब अच्छी तरह उबालो और उस पानी को ठंडा करके 100 ग्राम कैल्शियम डालकर पशु को पिला देने से आधे घंटे में जड़ बाहर फेंक देगा ।

पशु को चेक करने का फार्मूला

पशु ग्याबन है या नहीं जब पशु 40 – 45 दिन का गर्भ धारण किया हो जाए उस पशु का सुबह के टाइम का पहला पेशाब को कांच के गिलास में भरकर उसमें 2 बूंद सरसों के तेल की डाल दो अगर तेल की बूंद पेशाब पर बिखर जाती है तो पशु ग्याबन नहीं होगा और यदि तेल की बूंद पेशाब पर बनी रह जाती है तो पशु ग्याबन होगा ।

गैस अफारा के लिए

एक लीटर खट्टी छाछ में 50 ग्राम हींग व साथ में 20 ग्राम काला डालकर जानवर को पिलाए तथा सूती कपड़े को घासलेट में भिगोकर पशु को 4/5 मिनट तक सुघा देने से 15 /20 मिनट में ही अफारा उतर जाएगा ।