गूंद कतीरा लेप से आधी सिंचाई में ही पक गया धान

खाद-लागत में पक गया धान, कोई अजूबा नहीं, परंतु सच्चाई है। जो संभव हुआ डॉ. वीरेंद्र सिंह लाठर, प्रधान वैज्ञानिक भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान,क्षेत्रीय स्टेशन करनाल द्वारा विकसित हर्बल हाइड्रोजेल गूंद कतीरा लेप बीज तकनीक को सीधी बिजाई धान में अपनाने से। यह सेक्टर -2 शहर करनाल में पांच एकड़ और हरियाणा पंजाब में सैकड़ों एकड़ खेतों पर तैयार की गई है।

तकनीक से धान की फसल सिर्फ 5-6 सिंचाई, 50 किलो डीएपी और 60-70 किलो यूरिया प्रति एकड़ से तैयार हो गई और अब तक सिर्फ 6000 रुपए प्रति एकड़ की लागत आई है। जबकि परंपरागत रोपाई धान पद्धति में 20-25 सिंचाई की जरूरत होती है और रोपाई तक की लागत ही 6000 रुपए प्रति एकड़ से ज्यादा हो जाती है और इतनी ही लागत रोपाई के बाद भी करनी पड़ती है।

नई तकनीक में रोपाई के लिए मजदूरों पर निर्भरता से किसानों को राहत मिलती है। क्योंकि धान की सीधी बिजाई, गेहूं दूसरी फसलों की तरह, खेत में पलेवा कर के बीज ड्रिल से की जाती है। उससे भी बड़ा फायदा, नयी तकनीक धान ग्रीन हाउस गैस (मीथेन वगैरह) पर्यावरण में कम छोड़ कर, पर्यावरण संरक्षण में भी बड़ा फायदा करती है। किसानों को इस तकनीक को अपनाना चाहिए, इससे काफी हद तक पानी की बचत की जा सकती है।

मशीन से मिलाकर सुखाएं: नईबीज लेपित तकनीक के उपयोग में आने वाली सारी सामग्री (गूंद-कतीरा, गुड़, कीकर-बबूल की गूंद) इंसानों के खाद्य पदार्थ है जो गावो, शहरों की दुकानों पर सस्ते भाव (250 रुपए प्रति किलो) में आसानी से मिल जाते हैं।

नई बीज तकनीक हर्बल हाइड्रोजल पर आधारित है जिसमे गूंद कतीरा लेपित बीज की बिजाई की जाती है जिससे सभी फसलों के पौधों जड़ें में जल्दी सूखा नहीं आता और सिंचाई की जरूरत कम रह जाती है फसलोंमें खरपतवार अन्य बीमारियां-कीड़े भी कम आते हैं और यह संभव हुआ,

पहली सिचाई देर से लगने लगाने पर, जो खरीफ फसलों(धान वगैरह) में बिजाई के 15-20 दिनों रबी फसलों (गेहूं वगैरह) में 40-50 दिनों की बाद की जाती है और बिजाई के तुरंत बाद एक लीटर प्रति एकड़ की दर से पेंडामेथलींन / स्टोम्प 200 लीटर पानी में छिड़काव करने के कारण से, सीधी बिजाई धान में बिजाई के बाद की सिंचाई 12-15 दिनों के अंतर पर और वर्षा गीला-सूखा चक्कर के आधार पर करनी होती है।

} नई तकनीक मे 50 किलो बीज के लिए, एक लीटर उबलते पानी मे 250 ग्राम गुड़ और 100 ग्राम बबूल की गोंद डाल कर, एक तार की चासनी बनाये।

}फिर इस चासनी को ठंडा छान कर, बीजों पर छिड़क कर हाथ से बीजों को चिपचिपा बनाएं।

}तब चिपचिपे बीजों पर 10 प्रतिशत(10 किलो बीज पर एक किलो गूंद कतीरे पाउडर-चूरा ग्रेड/पशुओं वाला) छिड़क कर हाथ घुमाने वाली

इस डेयरी की गाय सिर्फ दूध नहीं देती बिजली भी देती है

आप ने कभी सुना है के गाय दूध के साथ बिजली भी देती हो ? लेकिन ऐसा हो रहा है राजधानी लखनऊ से करीब 14 किलोमीटर दूर बिजनौर कस्बे से सटा सरवन गाँव के डेयरी में गाय दूध तो देती है साथ में उसके गोबर से बायोगैस प्लांट में डाल कर पहले सीएनजी और फिर उस से बिजली पैदा की जाती है ।

लखनऊ के सरवन गाँव निवासी प्रगतिशील पशुपालक जयसिंह डेयरी रोजगार को अपनाकर खुद के रोजगार के साथ ही दूसरे पशुपालकों के लिए भी आय के स्रोत बना रहे हैं। इनकी इस पहल से एक बार फिर क्षेत्र के पशुपालकों में अच्छी कमायी की आस जगने लगी है।

वहीं युवा पशुपालकों के लिए ये प्रेरणा के स्रोत भी बन रहे हैं। पशुपालक जयसिंह बताते हैं कि दूध डेयरी में नवाचारों के माध्यम से वे अच्छा मुनाफा कमा पाने में कामयाब हुए हैं। वर्तमान में उनकी डेयरी के माध्यम से लगभग 150 से ज्यादा पशुपालक आर्थिक रूप से सबल बन रहे हैं।

राजयसिंह छोटे स्तर के पशुपालकों से अच्छी कीमत पर दूध खरीदते हैं और उसे पैक करके बाजार में बेचने का कार्य करते हैं। इनकी डेयरी गांव में पूरे एक एकड़ में बनी हुई है। जयसिंह बताते हैं कि आस-पास के पशुपालकों से वे उनके दूध का फैट और एसएनएफ देखकर बाजार कीमत से ज्यादा में ही दूध खरीदते हैं ।

एक हजार लीटर दूध की खपत

जयसिंह के फार्म में खुद के 150 पशु हैं, जिनमें से 50 गाय और 100 भैंसे शामिल हैं। इनसे प्रतिदिन 500 लीटर दूध का उत्पादन होता है। जबकि 500 लीटर वे दूसरे पशुपालकों से खरीदते हैं। इस दूध को पाश्चराइज करके फिर पैकिंग करके बेचा जाता है।” जयसिंह अपने डेयरी संचालन के बारे में बताते हैं कि 140 क्यूब घनमीटर का बॉयोगैस प्लांट उन्होंने डेयरी में लगाया है, जिससे सीएनजी (कम्प्रेस नेचुरल गैस) उत्पादित करते हैं।

इस गैस के माध्यम से ही जेनरेटर चलाकर वो 24 घंटे बिजली पैदा करते हैं। इस बिजली के माध्यम से ही डेयरी में लगे उपकरण संचालित किए जाते हैं। साथ ही पास के नर्सिंग कॉलेज में भी बिजली देते हैं, जिससे इस कार्य में लगने वाला उनका खर्चा भी निकल आता है।” यही नहीं इस बिजली के द्वारा ही इन्होंने आटा चक्की भी स्थापीत कर रखी है, जिससे पूरे गांव का आटा पीसा जाता है।

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यूपी के 55 लाख किसानों को अब “अच्छे दिन” का इंतजार

लखनऊ। करीब 55 लाख लघु और सीमांत किसानों को अपने अच्छे दिनों के लिए प्रदेश की भावी भाजपा सरकार की पहली कैबिनेट मीटिंग का इंतजार है। 92121 करोड़ रुपये का फसली ऋण जो किसानों के लिए दिन रात की चिंता का सबब है। कर्जदार किसानों की आत्महत्याएं उनके खेतों का जब्त होना। उनकी बेटियों की शादियों में अड़चन और दिन रात का तनाव ऐसे ही न जाने कितने प्रश्नों से वे घिरे हैं। इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों का वह वादा रह रह कर किसानों को खुशियां दे रहा है कि पहली ही कैबिनेट मीटिंग में लघु और सीमातं किसानों का फसली ऋण माफ कर दिया जाएगा। उप्र में चुनाव से पहले जारी भाजपा के लोकसंकल्प पत्र में पार्टी ने घोषणा की थी कि लघु और सीमांत किसानों का फसली ऋण माफ किया जाएगा। बाद में नरेंद्र मोदी ने तो यहां तक घोषणा कर दी थी कि पहली कैबिनेट मीटिंग में ही ऋण माफ करने की घोषणा होगी। इसको लेकर प्रदेश के लाखों किसान इंतजार कर रहे हैं।

करीब एक अरब रुपये का माफ करना होगा फसली ऋण

विभिन्न बैंकों के संयुक्त आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में सीमांत और लघु किसानों पर 92212 करोड़ रुपये का फसली ऋण है। ये आंकड़ा सितंबर 2016 तक का है। जिसके बाद में अधिक ऋण किसानों ने नहीं लिया है। मगर ये इतना अधिक ऋण चुकाने के लिए बीजेपी सरकार को वार्षिक बजट का एक तिहाई हिस्सा किसानों पर ही लगा देना होगा। मगर भाजपा इसको लेकर खुद को कटिबध्द बताती है। भाजपा के भदोही से सांसद और राष्ट्रीय किसान संघ के अध्यक्ष वीरेंद्र सिंह मस्त बताते हैं कि “भाजपा के लिए इससे बड़ा वादा कोई नहीं है। हम बैंकों का कर्ज सरकार के बजट से उतारेंगे और किसानों को राहत देंगे। आगे से फसली ऋण बिना किसी ब्याज के लिए किसानों को देंगे।” दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने खासतौर पर पश्चिम उत्तर प्रदेश की अपनी रैलियों में जोर देकर कहा था कि “11 मार्च को हमारी सरकार बनेगी। कुछ दिन शपथग्रहण होने में लगेंगे। उसके बाद तत्काल पहली कैबिनेट मीटिंग में किसानों का कर्ज माफ करने की घोषणा कर दी जाएगी।”

कहीं आत्महत्याएं तो कहीं जमीन गिरवी गई

नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक देश में साल 2014 से 2016 के अंत तक करीब 2.50 लाख किसानों ने विभिन्न कारणों से आत्महत्या की है। जिनमें से उत्तर प्रदेश में भी संख्या करीब एक लाख की है। 2015 में जब साल भर मौसम खराब रहा था, तब किसानों पर सबसे अधिक तकलीफें झेली थीं। गेहूं और धान दोनों की फसलें खराब हुई थीं। राजधानी में ही नौबस्ता गांव के किसान शिवकुमार बताते हैं कि “1.10 लाख का कर्ज बैंक से लिया था। तीन बीघा जमीन गिरवी रख कर बैंक का कर्ज अभी एक लाख के करीब बाकी है।” इसी गांव के श्रवण कुमार बताते हैं कि, ”मैं भी कर्जदार हूं, अगर भाजपा सरकार किसानों का कर्ज माफ कर देगी तो समझ लीजिये किसानों का बहुत भला होगा। उनके सिर से बड़ा बोझ हट जाएगा।”

तुलसी की उन्नत खेती कैसे करें

ज्यादा वक्त नहीं गुजरा जब लगभग हर भारतीयघर के आंगन में आपको एक तुलसी का छोटा सा पेड़ मिल जाता था। लेकिन शहरीकरण की आंधी में ना आंगन रहे और ना ही तुलसी का पेड़। लेकिन फिर भी तुलसी की मांग दवाई बनाने वाली कंपनियों में कई गुना बढ़ गई। तुलसी का इस्तेमाल दवा बनाने वाली कंपनियां करीब 1 दर्जन से ज्यादा बिमारियों की दवा बनाने में करती हैं।

11 सबसे बड़े इस्तेमाल

  • इसके इस्तेमाल से त्वचा और बालों में काफी सुधार होता हैं।
  • मुंह के छालों की बिमारी के लिए ये काफी कारगर है।
  • बुखार, खांसी, ब्रोकाइटिस और पाचन से जुड़ी समस्या रहने पर इसकी पत्तियों के रस से बनी दवा दी जाती है।
  • कान के दर्द को भी इसी से बनी दवा से दूर किया जाता है।
  • डेंगू और मलेरिया जैसी हर साल फैलने वाली बिमारियों से बचाने में भी इसी से बनी दवा का इस्तेमाल होता है।
  • मूत्र से जुड़ी समस्याओं में तुलसी के बीज से बनी दवा कारगार साबित होती है।
  • गुर्दे से जुड़ी बिमारी और पेट में एेंठन जैसी समस्या के इलाज में भी काम आती है।
  • साबुन, इत्र, शैम्पू और लोशन बनाए जाते हैं।
  • मुंहासे की दवा और त्वचा के लिए मलहम भी इसी से बनता है।
  • मोटापा, मुधमेह जैसी बिमारियों का भी इलाज इसी से होता है।
  • भारत के उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखण्ड और पश्चिमी बंगाल जैसे कुछ राज्यों में तुलसी की खेती व्यावसायिक तौर पर की जाती है।

रोपाई

तुलसी के पौधे को खेत में लगाने का सही समय जुलाई का पहला हफ्ता होता है। पौधे 45 गुणा 45 सेंटीमीटर की दूरी पर लगाने चाहिए। जबक RRLOC 12 और RRLOC 14 किस्म के पौधे 50 गुणा 50 सेंटीमीटर की दूरी पर लगाए जाते हैं। इसके बाद हल्की सिंचाई कर देनी होती है।

सिंचाई

रोपण के तुरन्त बाद सिंचाई करनी जरूरी होती है। हर हफ्ते या जब जरूरत हो तब भी पानी देना जरुरी है। गर्मियों में हर 12-15 दिन में फसल को पानी देना होता है।जब पहली कटाई हो जाए, तो इसके तुरंत बाद सिंचाई जरुर कर दें। लेकिन ध्यान रहे कि कटाई से 10 दिन पहले पानी देना बंद कर दें।

फसल की कटाई कैसे होती है

तुलसी की कटाई सही समय पर करनी चाहिए क्योंकि इसका असर तेल की मात्रा पर पड़ता है। जब पौधों की पत्तियां हरे रंग की होने लगें, तभी इनकी कटाई की जाती है। इसके अलावा पौधे पर फूल आने की वजह से यूनीनोल और तेल मात्रा कम हो जाती है। इसलिए जैसे ही पौधे पर फूल आना शुरू हो जाए, तभी कटाई शुरु कर देनी चाहिए।

जमीन की सतह से 15-20 मी ऊँचाई पर कटाई की जानी चाहिए। इसका फायदा ये होगा कि जल्द ही नयी शाखाएं निकलने लगेंगी। कटाई के दौरान अगर पत्तियाँ तने पर छोडनी पड़े तो छोड़ दीजिए। इससे फायदा ही होगा।RRLOP 14 नाम के किस्म वाली तुलसी की फसल 3 बार ली जाती है।

लागत और कमाई

  • अगर 10 बीघा जमीन पर तुलसी की खेती करें, तो 10 किलो बीज की जरूरत होगी। जिसकी कीमत 3 हजार रुपए के लगभग होती है।
  • 10 हजार रुपए खाद और दो हजार रु. बाकी के खर्चे के।
  • सिंचाई भी सिर्फ 1 बार करना पड़ती है।
  • एक सीजन में करीब 8 कुंटल पैदावार होती है। इसकी बाजार कीमत करीब 3 लाख रुपए होती है।
  • नीमच मंडी में 30 से 40 हजार रुपए प्रति कुंटल के भाव तुलसी के बीज बिक जाते हैं।

कहां बेचें

दो रास्ते हैं। पहला अपने पास की मंडी में एजेंट्स से बात करें। दूसरा – गूगल पर तुलसी की कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग करवाने वाली दवा कंपनियां या एजेंसियों को सर्च करें। हर इलाके के हिसाब से अलग अलग कंपनियां तुलसी की फसल खरीदती हैं।

मिर्च की उन्नत खेती कैसे करें ?

हमारे यहां मिर्च एक नकदी फसल है. इस की व्यावसायिक खेती कर के ज्यादा लाभ कमाया जा सकता?है. यह हमारे खाने में इस्तेमाल होती है. मिर्च में विटामिन ए और सी पाए जाते हैं और कुछ लवण भी होते हैं. मिर्च का इस्तेमाल अचार, मसालों और सब्जी में भी किया जाता है. मिर्च पर पाले का असर ज्यादा होता है, इसलिए जहां पाला ज्यादा पड़ता?है उन इलाकों में इस की अगेती फसल लेनी चाहिए. ज्यादा गरमी होने पर फूलों व फलों का झड़ना शुरू हो जाता है. मिर्च की खेती के लिए मिट्टी का पीएच मान 6 से 7.5 के बीच होना अच्छा माना जाता?है. अच्छी फसल के लिए उपजाऊ दोमट मिट्टी जिस में पानी का अच्छा निकास हो अच्छी मानी जाती है.

उन्नत किस्में

चरपरी मसाले वाली : एनपी 46 ए, पूसा ज्वाला, मथानिया लोंग, पंत सी 1, जी 3, जी 5, हंगेरियन वैक्स (पीले रंग वाली), पूसा सदाबहार, पंत सी 2, जवाहर 218, आरसीएच 1, एक्स 235, एलएसी 206, बीकेए 2, एससीए 235. शिमला मिर्च (सब्जी वाली) : यलो वंडर, केलीफोर्निया वंडर, बुलनोज व अर्का मोहिनी.

नर्सरी तैयार करना : सब से पहले नर्सरी में बीजों की बोआई कर के पौध तैयार की जाती?है. खरीफ की फसल के लिए मई से जून में व गरमी की फसल के लिए फरवरी से मार्च में नर्सरी में बीजों की बोआई करें. 1 हेक्टेयर में पौध तैयार करने के लिए 1 से डेढ़ किलोग्राम बीज और संकर बीज 250 ग्राम प्रति हेक्टेयर काफी रहता है. नर्सरी वाली जगह की गहरी जुताई कर के खरपतवार रहित बना कर 1 मीटर चौड़ी, 3 मीटर लंबी और 10 से 15 सेंटीमीटर जमीन से उठी हुई क्यारियां तैयार कर लें. बीजों को बोआई से पहले केप्टान या बाविस्टिन की 2 ग्राम मात्रा से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें. पौधशाला में कीड़ों की रोकथाम के लिए 3 ग्राम फोरेट 10 फीसदी कण या 8 ग्राम कार्बोफ्यूरान 3 फीसदी कण प्रति वर्गमीटर के हिसाब से जमीन मिलाएं या मिथाइल डिमेटोन 0.025 फीसदी या एसीफेट 0.02 फीसदी का पौधों पर छिड़काव करें. बीजों की बोआई कतारों में करनी चाहिए. नर्सरी में विषाणु रोगों से बचाव के लिए मिर्च की पौध को सफेद नाइलोन नेट से ढक कर रखें.

रोपाई : नर्सरी में बोआई के 4 से 5 हफ्ते बाद पौधे रोपने लायक हो जाते हैं. तब पौधों की रोपाई खेत में करें. गरमी की फसल में कतार से कतार की दूरी 60 सेंटीमीटर व पौधे से पौधे की दूरी 30 से 45 सेंटीमीटर रखें. खरीफ की फसल के लिए कतार से कतार की दूरी 45 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 30 से 45 सेंटीमीटर रखें. रोपाई शाम के समय करें और रोपाई के तुरंत बाद सिंचाई कर दें. पौधों को 40 ग्राम एजोस्पाइरिलम 2 लीटर पानी के घोल में 15 मिनट डुबो कर रोपाई करें.

खाद व उर्वरक : खेत की अंतिम जुताई से पहले प्रति हेक्टेयर करीब 150 से 250 क्विंटल अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद खेत में डाल कर अच्छी तरह मिला दें. इस के अलावा मिर्च का अच्छा उत्पादन लेने के लिए 70 किलोग्राम नाइट्रोजन, 48 किलोग्राम फास्फोरस व 50 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की जरूरत होती है. नाइट्रोजन की आधी मात्रा रोपाई से पहले जमीन की तैयारी के समय व बची मात्रा आधीआधी कर के 30 व 45 दिनों बाद खेत में छिड़क कर तुरंत सिंचाई कर दें.

सिंचाई व निराईगुड़ाई : गरमी में 5 से 7 दिनों के अंतर पर और बरसात में जरूरत के हिसाब से सिंचाई करें. खरपतवार की रोकथाम के लिए समयसमय पर निराईगुड़ाई करनी चाहिए. खरपतवार नियंत्रण के लिए 200 ग्राम आक्सीफ्लूरोफेन प्रति हेक्टेयर का पौधों की रोपाई के?ठीक पहले छिड़काव (600 से 700 लीटर पानी में घोल कर) करें.

तोड़ाई व उपज : हरी मिर्च के लिए तोड़ाई फल लगने के 15 से 20 दिनों बाद कर सकते हैं. पहली तोड़ाई से दूसरी तोड़ाई का अंतर 12 से 15 दिनों का रखते?हैं. फलों की तोड़ाई उस के अच्छी तरह से तैयार होने पर ही करनी चाहिए. हरी चरपरी मिर्च तकरीबन 150 से 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और 15 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर सूखी लाल मिर्च प्राप्त की जा सकती है.

मिर्ची से माणक हुआ मालामाल

माणक लाल सिरोही जिले के उथमन गांव के रहने वाले सीमांत किसान हैं. माणक के पास मात्र 10 से 12 बीघे जमीन होने के कारण ज्यादा आमदनी नहीं हो पाती थी, लेकिन पिछले कुछ सालों से माणक मिर्च की उन्नत खेती कर के काफी फायदा कमा रहे हैं. माणक आज एक संपन्न किसान बन चुके हैं. माणक मिर्ची उत्पादन की उन्नत तकनीक के साथसाथ 1 हेक्टेयर मिर्च की बोआई को 4 भागों में बांट कर 15-15 दिनों के अंतर पर 4 बार रोपाई करते हैं, जिस से लंबे समय तक फलों की तोड़ाई चलती?है और अच्छा बाजार भाव मिलता है.

आज माणक 1 बीघा जमीन में तकरीबन 20 हजार रुपए का खर्च कर के 1.0-1.25 लाख रुपए की मिर्च बेच देते हैं. परिवार के सभी सदस्यों को रोजगार भी मिल रहा?है. साथ में अच्छी आमदनी भी हो रही?है और माणक के घर के सभी लोग काफी खुशहाल जिंदगी गुजार रहे?हैं. माणक के परिवार की औरतें तोड़ाई करती हैं, तो माणक मिर्च को आसपास के बाजार में बेचने के लिए ले जाते?हैं. मिर्च उत्पादन की सभी बातों की अच्छी जानकारी होने की वजह से गांव के दूसरे किसान भी उन से सलाह लेते?हैं.

कीड़े व रोग

सफेद लट : इस कीट की लटें पौधों की जड़ों को खा कर नुकसान पहुंचाती?हैं. इस पर काबू पाने के लिए फोरेट 10 जी या कार्बोफ्यूरान 3 जी 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से रोपाई से पहले जमीन में मिला देना चाहिए. सफेद मक्खी, पर्णजीवी (थ्रिप्स), हरा तेला व मोयला : ये कीट पौधों की पत्तियों व कोमल शाखाओं का रस चूस कर उन्हें कमजोर कर देते हैं. इन के असर से उत्पादन घट जाता?है. इन पर काबू पाने के लिए मैलाथियान 50 ईसी या मिथाइल डिमेटोन 25 ईसी 1 मिलीलीटर या इमिडाक्लोरोपिड 0.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़ाकव करें. 15-20 दिनों बाद दोबारा छिड़ाकव करें.

मूल ग्रंथि सूत्रकृमि : इस के असर से पौधों की जड़ों में गांठें बन जाती?हैं और पौधे पीले पड़ जाते हैं. पौधों की बढ़वार रुक जाती?है, जिस से पैदावार में कमी आ जाती है. इस की रोकथाम के लिए रोपाई के स्थान पर 25 किलोग्राम कार्बोफ्यूरान 3 जी प्रति हेक्टेयर की दर से जमीन में मिलाएं.

आर्द्र गलन : इस रोग का असर पौधे जब छोटे होते हैं, तब होता है. इस के असर से जमीन की सतह पर स्थित तने का भाग काला पड़ कर कमजोर हो जाता?है व नन्हे पौधे गिर कर मरने लगते हैं. रोकथाम के लिए बीजों को बोआई से पहले थाइरम या केप्टान 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें. नर्सरी में बोआई से पहले थाइरम या केप्टान 4 से 5 ग्राम प्रति वर्गमीटर की दर से जमीन में मिलाएं. नर्सरी आसपास की जमीन से 4 से 6 इंच उठी हुई जमीन में बनाएं.

श्याम ब्रण : इस रोग से पत्तियों पर छोटेछोटे काले धब्बे बन जाते हैं और पत्तियां झड़ने लगती?हैं. जब इस का असर ज्यादा होता है, तो शाखाएं ऊपर से नीचे की तरफ सूखने लगती हैं. पके फलों पर भी बीमारी के लक्षण दिखाई देते हैं. रोकथाम के लिए जाइनेब या मेंकोजेब 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल कर 2 से 3 बार छिड़काव 15 दिनों के अंतराल पर करें.

पर्णकुंचन व मोजेक विषाणु रोग : पर्णकुंचन रोग के असर से पत्ते सिकुड़ कर छोटे रह जाते हैं व उन पर झुर्रियां पड़ जाती?हैं. मोजेक विषाणु रोग के कारण पत्तियों पर गहरे व हलका पीलापन लिए हुए धब्बे बन जाते हैं. रोगों को फैलाने में कीट सहायक होते?हैं. रोकथाम के लिए रोग लगे पौधों को उखाड़ कर जला देना चाहिए. रोग को आगे फैलने से रोकने के लिए डाइमिथोएट 30 ईसी 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें.

नर्सरी तैयार करते समय बोआई से पहले कार्बोफ्यूरान 3 जी 8 से 10 ग्राम प्रति वर्गमीटर के हिसाब से जमीन में मिलाएं. रोपाई के समय निरोगी पौधे काम में लें. रोपाई के 10 से 12 दिनों बाद मिथाइल डिमेटोन 25 ईसी 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें. छिड़काव 15 से 20 दिनों के अंतर पर जरूरत के हिसाब से दोहराएं. फूल आने पर मैलाथियान 50 ईसी 1 मिलीलीटर प्रति लीटर के हिसाब से छिड़कें.

तना गलन : गरमी में पैदा होने वाली मिर्च में तना गलन को रोकने के लिए टोपसिन एम 0.2 फीसदी से बीजोपचार कर के बोआई करें.

 

 

पंजाब के इन दो भाइयों से सीखिए, खेती से कैसे कमाया जाता है मुनाफा

एक कहावत है कि ‘एक वक्त के अच्छे खाने के लिए एक किसान को धन्यवाद करना चाहिए।’ कैसा हो कि अगर आपको मौका मिल जाए उस किसान से मिलने का जिसने आपके लिए खाद्यान्न उगाया है।

अब ऐसा मुमकिन हो सकता है, अमृतसर के दो भाईयों ने मिलकर एक ऐसा इंटरप्राइज बनाया है, जिससे आप सीधे किसानों से जुड़ सकते हैं। से दो किसान कृषि के क्षेत्र में बदलते भारत की तस्वीर भी हैं। यह कहानी शुरू होती है सूबेदार बलकार सिंह संधू से जिन्होंने 32 साल आर्मी में काम किया।

2008 में सेवानिवृत्त होने के बाद वह अमृतसर वापस आए और अपनी पुश्तैनी ज़मीन में खेती करना शुरू कर दिया। उनके परिवार का मुख्य काम खेती करना ही था और बलकार सिंह भी चाहते थे कि वह अपने पिता की अपनी जड़ों में वापस लौट सकें। 40 एकड़ खेती का मालिक होने के कारण उनका परिवार काफी समृद्ध था लेकिन बलकार सिंह ने देखा की उनके इलाके के छोट किसानों को बिचौलिए काफी ठग रहे हैं। उन्होंने देखा कि कुछ किसान परिवार तो ऐसे हैं जो कई पीढ़ियों से लगातार कर्ज़ में डूबे हुए हैं।

इसके बाद बलकार सिंह ने किसानों के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाना शुरू किया, उन्हें अमृतसर और तरनतारन ज़िले की किसान संघर्ष समिति का क्षेत्रीय प्रमुख चुना गया। उनके बेटे पवित्र पाल सिंह, एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं जिन्होंने कुछ साल विदेश में काम किया और फिर नीदरलैंड व बेल्जियम में अपने परिवार के रेस्त्रां के बिजनेस को संभाल लिया। एक किसान परिवार में जन्म लेने के कारण और अपने परिवार में होने वाली खेती-किसानी की बातों को सुनकर वह बड़े हुए थे।

यही वजह थी कि उन्हें भारतीय कृषि की अच्छाइयों और बुराइयों, दोनों के बारे में अच्छी तरह पता था। इस कहानी में मोड़ तब आया जब पवित्र सिंह को पता चला कि उनके पिता द्वारा किए जा रहे विरोध प्रदर्शन में एक किसान की मौत हो गई, वह तीन दिन से लगातार रेल की पटरी पर बैठा था।

किसानों की बिगड़ती दशा के बारे में सुनकर पवित्र ने फैसला किया कि वह भारत वापस आएंगे और अपने पिता के अभियान का हिस्सा बनेंगे। उनके चाचा का बेटा हरजप सिंह, लगभग छह साल तक किसानी करने के बाद देश छोड़कर बाहर चला गया था, उसने भी पवित्र सिंह की मदद करने का फैसला लिया और उनके साथ वापस आ गया। इसके बाद दोनों भाइयों ने डेढ़ साल तक देश के तमाम हिस्सों में घूमकर किसानों की परेशानियों के बारे में पता किया।

इसके बाद वे इस नतीज़े पर पहुंचे कि किसानों के कर्ज़ लेने के पीछे दो कारण हैं। पहला, अपने उत्पाद की क़ीमत वे खुद तय नहीं कर सकते। दूसरा, उन्हें अपनी फसल को बिचौलियों को बेचना पड़ता है क्योंकि उनके पास फसल को सुरक्षित रखने की कोई जगह नहीं है।

इन मुश्किलों का समाधान निकालने के लिए किसान मित्र(farmer friend) नाम की एक योजना लेकर आए। इन दोनों भाईयों ने 20 लोगों की एक मज़बूत टीम बनाई जिसका काम गाँव-गाँव जाकर वहां के प्रधानों को अपनी योजना के बारे में समझाना था जिससे किसान उपभोक्ताओं से सीधे रूप से जुड़ सकें।

वेबसाइट बेटर इंडिया की खबर के मुताबिक, एक बार जब पंचायत इस बात के लिए तैयार हो गई फिर किसानों को इस अभियान का हिस्सा बनाने के लिए उनका पंजीकरण शुरू हुआ। पवित्र और हरजप ने हरियाणा व पंजाब में दो किसान सेवा केंद्र भी खोले, जहां किसानों को उनकी समस्याओं से जुड़े सवालों के जवाब मिलते हैं। 2 साल के समय में इस अभियान में 30,000 किसान अपना पंजीकरण करा चुके हैं।

अपने काम की सफलता से प्रेरित होकर पवित्र और हरजप ने एक वेबसाइट भी शुरू की जिससे किसान सीधे उपभोक्ताओं से जुड़ सकते हैं। उन्होंने कुछ रेस्त्रां और होटलों में भी बात की ताकि वे कुछ उत्पाद मंडी से खरीदने के बजाय सीधे किसानों से खरीद सकें। आज 350 से ज्य़ादा होटल और 2500 से ज्य़ादा लोग किसान मित्र से सीधे अनाज, दूध, पॉल्ट्री उत्पाद और सब्जि़यां खरीदते हैं।

यह उपभोक्ताओं और किसानों दोनों के लिए फायदे का सौदा है। इससे किसान अपने उपभोक्ताओं को ऐसा कुछ नहीं बेच सकता जो उनकी सेहत के लिए हानिकारक हो और उपभोक्ताओं को भी कम दाम में सामान मिल जाता है।

चावल और मछली की एक साथ खेती से आप ले सकते है दोगुना लाभ

खेत में चावल और मछलियों का पालन एक साथ करें – ये सुनकर पहले तो आप भरोसा नहीं करेंगे। फिर जब भरोसा करेंगे तो मन में सवाल जरूर आएगा कि कैसे होता है ये, क्या है फायदा और कैसे मछलियां के पालन से चावल की फसल की लागत कम हो जाती है, जबकि उत्पादन कम नहीं होता।

भारत के पूर्वी राज्यों में साल 2010 के बाद धान के खेत से मुनाफा बढ़ाने के लिए एक नई तकनीक अपनाने की शुरूआत हुई थी वो है धान के खेत में मछली पालना। लेकिन ये तकनीक किसानों के बीच अभी ज्यादा मशहूर नहीं हो पाई है।

खेती की ये तकनीक कोई बहुत कठिन नहीं, करना बस इतना होता है कि धान के पानी भरे खेत में जल्दी बढ़ने वाली मछलियों के बीज डाल देने होते हैं। इससे धान की फसल के साथ ही मछलियां भी बाज़ार में बेचने को तैयार हो जाती हैं, यानि दोहरा मुनाफा।

देश के लगभग 04 करोड़ दस लाख हेक्टेयर ज़मीन पर धान की खेती होती है, लेकिन इसमें से धान के साथ मछली उत्पादन करने वाली तकनीक से एक लाख हेक्टेयर से भी कम हिस्सा ही प्रभावित हो पाया है। कारण यह है कि किसान इस विदेशी तकनीक को अच्छी तरह समझ नहीं पाते।

दरअसल इस तकनीक की शुरुआत चीन, फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे धान उत्पादक बड़े राज्यों से हुई थी। इन देशों के किसानों ने वैज्ञानिकों द्वारा सुझाई गई इस तकनीक को हाथों हाथ लिया।

किसानों को चावल और मछली पालन के फायदे-

  • चावल-मछली की खेती से किसान मुख्य फसल के साथ-साथ अतिरिक्त आमदनी प्राप्त कर सकता है
  • धान(चावल) को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़े को चावल-मछली की खेती नियंत्रित करता है
  • चावल-मछली की खेती फसल के फेल हो जाने के खतरे को कम करता है
  • चावल-मछली की खेती घास-फूस पर रोक लगाने में उपयोगी
  • चावल-मछली की खेती चावल की उपज को बढ़ाती है क्योंकि मछलियां मिट्टी के पोषक तत्वों को जगा देती हैं जो चावल की खेती के लिए सहायक होती है।

किसानों को चावल और मछली पालन के नुकसान-

  • चावल और मछली की खेती में नियंत्रित तरीके से कीटनाशक के इस्तेमाल की आवश्यकता होती है
  • सिर्फ धान(चावल) की खेती के मुलाबले इस एकीकृत चावल और मछली वाली व्यवस्था में ज्यादा पानी की जरूरत पड़ती है
  • इस व्यवस्था में चावल की पैदावार कम होती है क्योंकि जरूरी धान की फसल से करीब 45 सेमी नीचे क्यारियां(ट्रेन्चेज) बनाने की जरूरत पड़ती है, जिसकी वजह से धान की उपज का क्षेत्र कम हो जाता है, जिससे कम पैदावार होती है। क्यारियों की खुदाई की वजह से पानी को निकालने में परेशानी होती है।
  • सिर्फ चावल की खेती के मुकाबले धान के खेतों में मछली उत्पादन के कार्य के लिए ज्यादा निवेश की जरूरत पड़ सकती है।
  • सिर्फ धान की खेती के मुकाबले चावल और मछली की खेती में ज्यादा श्रम की आवश्यकता होती है।

चावल और मछली की खेती के लिए उपयुक्त जगह कौन सी है

  • धान के खेत में चावल और मछली की खेती के लिए जगह का चुनाव बेहद अहम भूमिका निभाता है।आप हर जगह पर इसकी खेती नहीं कर सकते
  • करीब 70 से 80 सेमी की बारिश की जरूरत होती है जो इस तरह की एकीकृत व्यवस्था के लिए आदर्श होता है।
  • चावल और मछली की खेती में उच्च पानी की वहन क्षमता और एक समान क्षेत्र वाली मिट्टी को प्रमुखता दी जाती है।
  • एकीकृत फसल व्यवस्था के लिए जगह के चुनाव में अच्छी पानी निकासी की व्यवस्था भी प्रमुख तत्वों में से एक है जिस पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
  • जगह का चुनाव बाढ़ प्रभावित इलाके से हटकर होना चाहिए नहीं तो यहां की मछलियां निकल कर भाग सकती हैं।
  • एकीकृत चावल और मछली उत्पादन के लिये मछली का उपयुक्त प्रकार कौन सा है –

धान की तैयारी, चावल और मछली की खेती का प्रबंधन-

अगर आप धान की खेती के साथ मछली उत्पादन करना चाहते हैं तो पारंपरिक चावल के खेत में कुछ बदलाव करने होंगे, जैसे कि अच्छा मछली आश्रय और कटाई के क्षेत्र में बदलाव करने होंगे। इस तरह के धान के खेत के लिए गहरी खाइयां(ट्रेंचेज), नहर या हौज की जरूरत होती है। चावल के खेत में ये गहरी खाइयां अच्छी और सफल चावल-मछली खेती के लिए अच्छे मौके देती है। ज

ब पानी का स्तर कम हो, गलियारा में भोजन की तलाश, मछली इकट्ठा करने के आसान उपाय जब चावल के खेत सूखे हैं, ऐसे में यह सब काफी मददगार साबित होता है। जब बात चावल की प्रजाति की बात आती है तो धान और मछली की खेती में गहरी पानी की किस्म (प्रकार) सबसे बेहतर होता है।

गहरी खाइयां को 0.5 मीटर गहरा और कम से कम एक मीटर चौड़ा बनाया जाना चाहिए। इस बात को सुनिश्चित किया जाना चाहिए की गहरी खाइयां धान के पौधे से 10 मीटर के दायरे में हो। चावल की अच्छी पैदावार के लिए इस बात को सुनिश्चित करें कि गहरी खाइयां धान के क्षेत्र से 10 फीसदी से ज्यादा ना हो।

मछली के भंडारण के बाद 10 से 15 सेमी पानी की गहराई सुनिश्चित की जानी चाहिए ताकि मछली के जीवन को पक्का किया जा सके। चावल-मछली की खेती में दूसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि खेत का पानी विषैले तत्वों (कीटनाशक पदार्थ) से दूर रहना चाहिए।

अब दिल्ली शहर के अंदर होगी खेती

क्या दिल्ली में रहते हुए आप अपने घर में खेती करने में बारे में सोचते हैं? आपको भले ही यह कल्पना लगे, लेकिन यह मुमकिन है। खेती को तकनीक से जोड़ने में मिसाल कायम कर चुके देश इजरायल में शहरी खेती की विशेषज्ञ गैलिआ क्यूकीरमान पिछले दिनों दिल्ली में थीं।

उन्होंने दिल्ली को शहरी खेती के लिए बहुत मुफीद बताते हुए कहा कि यहां इसका इस्तेमाल न होना क्राइम है। हिब्रू यूनिवर्सिटी में लेक्चरर गैलिया ने शहरी खेती के कई और पहलुओं के बारे में बताया।

शहरी खेती का कॉन्सेप्ट क्या है और ग्रामीण खेती से किस तरह अलग है?

शहर का चाहे कोई भी कोना क्यों न हो, खेती मुमकिन है। छतों पर, दीवारों पर, सार्वजनिक भवनों (स्कूलों, थिअटर आदि) और यहां तक कि सड़कों के बीच और रेलवे पटरियों की बगल में। शहरी खेती किसी तरह से परंपरागत खेती की जगह नहीं ले सकती, लेकिन इसकी पूरक बन सकती है।

परंपरागत खेती की तुलना में शहरी खेती बहुत कम जगह लेती है। फसलों के विकास में कम समय लगता है। भारी उपकरणों के साथ काम की जरूरत नहीं है। इसकी उपज में वजन कम और मात्रा ज्यादा होती है।

क्या दिल्ली जैसे बिजी शहर में खेती मुमकिन है?

बेशक! ऐसे कई गरीब लोग हैं जिन्हें खाद्य सुरक्षा की जरूरत है। शहर में हर जगह शहरी खेती विकसित नहीं करना वास्तव में एक अपराध है। आप किसी भी प्रकार के भारतीय भोजन को विकसित कर सकते हैं, जिसका बढ़ना आसान हो। शहरी कृषि का सबसे अच्छा उत्पादन हरी पत्तियों का है, जिसका विकास चक्र छोटा है। यहां तक कि किराये पर रहने वाले भी यह काम कर सकते हैं। हर कोई एक छोटे कंटेनर में भोजन उगा सकता है, जिसे एक अपार्टमेंट से दूसरे में ले जाया जा सकता है।

शहरी खेती के कॉन्सेप्ट में इजरायल के पास क्या नया है?

इजरायल खेती में अगुआ देश है और यह स्टार्ट-अप नेशन के रूप में भी जाना जाता है। खेती में वहां जो ज्ञान विकसित किया गया है, उसे तकनीक के साथ जोड़ा गया है। इससे आप ऑटोमेशन के जरिए खुद बेहद आसानी के साथ भोजन उगा सकेंगे। इस तरह के सिस्टम हैं कि परंपरागत खेती के मुकाबले महज 10 फीसदी पानी का इस्तेमाल कर खेती की जा सके।

यहां तक कि खारे पानी में भी खेती का इंतजाम है। तकनीक के जरिए उपज की ऑटोमैटिक देखभाल और विकास के लिए संकेत मिलते हैं। उन चिंताओं को मिटाया जा सकता है कि पौधा किस माध्यम (पानी या मिट्टी) में रखा जाए।

अपने घर में खेती के लिए जानकारी कैसे हासिल की जा सकती है? क्या इंटरनेट मददगार होगा?
हर कोई कैसे भोजन उगा सकता है, इसे समझाने के लिए शॉर्ट कोर्सेज हैं। इंटरनेट कोर्स की जानकारी या सवालों के जवाब ढूंढने में मदद कर सकता है।

आप रेडी टु यूज सिस्टम खरीद सकते हैं या अपना सिस्टम भी बना सकते हैं। तकनीकें ऑटोमैटिक हैं, सेमी ऑटोमैटिक भी। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 200 साल पहले औद्योगिक क्रांति से पहले, ज्यादातर लोग किसान थे, और भोजन उगाने का ज्ञान आम था। शहरी खेती नया काम नहीं, बल्कि जड़ों की ओर लौटना है।

शहरी खेती के फायदे

शहर की आबादी के आसपास के क्षेत्र में फसलें उगाने से इसके उपयोग पर असर पड़ता है। ताजा फल और सब्जियों से ज्यादा पोषक तत्व मिलते हैं, आबादी की सेहत बेहतर होती है। खान-पान की आदतों में भी बदलाव होता है।

जो आबादी हरी पत्तेदार सब्जियां ज्यादा उगाएगी, वहां के बच्चे ये सब्जियां ज्यादा खाएंगे। भोजन की बर्बादी भी कम होगी। परंपरागत खेती की उपज और इसके उपभोग करने वालों में दूरी के कारण भावनात्मक जुड़ाव नहीं होता। किसानों की मेहनत की इज्जत नहीं होती। भोजन की बर्बादी भी होती है। पश्चिमी यूरोप में परिवारों में 40% से अधिक भोजन फेंक दिया जाता है।

शहरी खेती में कुछ ही घंटों में भोजन खेत से लेकर प्लेट तक की दूरी तय कर लेगा। जनता भोजन को अपने पास ज्यादा समय तक रख सकेगी। इसे मार्केटिंग और ट्रांसपोर्टेशन चेन से नहीं गुजरना होगा। ट्रांसपोर्टेशन कम होने से वायुप्रदूषण घटेगा।

प्लांट्स की मौजूदगी से शहर के क्लाइमेट में भी बदलाव आएगा। शहरी खेतों के आस-पास की प्रॉपर्टी के दाम बढ़ते देखे गए हैं। न्यू यॉर्क शहर में एक औद्योगिक इमारत में 30% ऑक्यपेंसी थी, लेकिन छत पर खेत बनते ही वेटिंग लिस्ट हो गई। बिल्डिंग के सामने रेस्तरां भी खुल गया, जहां छत की खेती का उत्पाद इस्तेमाल होता था।

अब आधार कार्ड पर मिलेगी यूरिया, किसान के खाते में आएगी सब्सिडी

यूरियाखाद के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य कर दिया गया है। बिना आधार कार्ड के किसान को एक बैग भी यूरिया नहीं मिलेगा। सरकार ने मौजूदा सीजन से यह व्यवस्था कर दी है। कृषि विभाग ने इसे लागू कर दिया है। सरकार की तरफ से यह कदम यूरिया के अवैध इस्तेमाल और कालाबाजारी को रोकने के लिए उठाया गया है। योजना के अनुसार आधार कार्ड से यूरिया देने के बाद सब्सिडी सीधे किसान के बैंक खाते में चली जाएगी।

कृषि विभाग के सूत्रों ने बताया कि यूरिया खाद के अवैध इस्तेमाल को रोकने के लिए सरकार ने डीलर से किसान का आधार कार्ड लिंक करने की योजना तैयार की है। हांसी उपमंडल इलाके में 30 से 35 तक खाद के डीलर हैं। सरकार की योजना के मुताबिक अब जो किसान डीलर के पास खाद लेने आएगा, उसे आधार कार्ड लेकर आना होगा। आधार कार्ड लिंक होने के बाद किसान का अंगूठा लगाया जाएगा। इसके बाद किसान को यूरिया खाद उपलब्ध करवाया जाएगा। योजना के अनुसार जून तक सभी किसानों के आधार लिंक करने होंगे।

सूत्रों के अनुसार योजना लागू होने के बाद यूरिया खाद के अवैध प्रयोग पर रोक लगेगी। ही इसे अन्य किसी प्रदेश में सप्लाई किया जा सकेगा। क्योंकि इसका पूरा रिकार्ड ऑनलाइन रहेगा। उपमंडल इलाके में करीब 35 हजार ऐसे किसान हैं, जो यूरिया खाद का प्रयोग करते हैं। जिन किसानों के पास आधार कार्ड नहीं है, उन्हें तत्काल प्रभाव से इसे बनवाना होगा। सूत्रों ने बताया कि योजना को सफलतापूर्वक अमलीजामा पहनाने के लिए खाद डीलरों आधार कार्ड लिंक करने (पीओएस मशीन को इंस्टॉल) का बाकायदा प्रशिक्षण दिया जाएगा।

^योजना खाद का स्टाक जमा होने कालाबाजारी रोकने के उद्देश्य से लागू की गई है। अब सिर्फ उन किसानों को यूरिया उपलब्ध होगा, जिन्हें वास्तव में इसकी जरूरत है। कोई और व्यक्ति इसे नहीं ले सकेगा। साथ ही खाद के स्टाक और बिक्री की पल-पल की जानकारी रहेगी। कीमतें बढ़ने और घटने की स्थिति में भी स्टाक की पूरी जानकारी मिलती रहेगी।”

अर्थी में इस्तेमाल होने के बाद भी चिता में  क्यों नहीं जलाई जाती बांस की लकड़ी ?

मृत्यु संस्कार कार्यों में लाश को रखने के लिए “अर्थी”  में तो इस लकड़ी को प्रयोग किया जाता है  लेकिन जलाते समय उसे हटा दिया जाता है। यकीन मानिए इसका वैज्ञानिक कारण बेहद भयभीत करने वाला है, जो शायद ही कभी आपने सोचा हो। शास्त्रों में भी वृक्षों की रक्षा को विशेष महत्व दिया गया है।
 
वृक्षों की पूजा इसका उदाहरण है, लेकिन चंदन आदि सुगंधित वृक्षों की लकड़ियां  कुछ विशेष कार्यों या मतलब से जलाने की बात कही गई है। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि शास्त्रानुसार बांस की लकड़ी जलाना विशेष रूप से वर्जित है। ऐसा करना भारी पितृ दोष देने वाला माना गया है।
 
बांस की लकड़ी पर्यावरण संतुलन में आम वृक्षों की तरह ही उपयोगी है। मजबूत होने के कारण इसे फर्नीचर तथा कई प्रकार के सजावटी सामानों में भी उपयोग किया जाता है। इसे जलाना आम पेड़ों से ज्यादा खतरनाक क्यों है?
 
आपको जानकर हैरानी होगी कि बांस की लकड़ी में “लेड”  और कई प्रकार के भारी धातु होते हैं जो जलने के बाद ऑक्साइड बनाते हैं। “लेड” जलकर “लेड ऑक्साइड” बनाते हैं जो न सिर्फ वातावरण को दूषित करता है बल्कि यह इतना खतरनाक है कि आपकी सांसों में जाकर लिवर और न्यूरो संबंधित परेशानियां भी दे सकता है।
 
लाश भारी होती है, इसके अलावा बांस की पतली कमानियों से शैय्या तैयार करना भी आसान होता है, इसलिए अर्थी में इसका इस्तेमाल किया जाता है  लेकिन जलाने की मनाही है। संभवत: इसके ये वैज्ञानिक दुष्परिणाम ही इसका कारण रहे हों।
 
आपको जानकर हैरानी होगी कि बांस को भले ही आप समान्य रूप में जलाने में इस्तेमाल नहीं करते, लेकिन आज लगभग हर दिन लोग इसका प्रयोग घरों में जलाने में कर रहे हैं जिसका आपको पता भी नहीं है।
 
अगरबत्ती में जो स्टिक प्रयोग की जाती है वह बांस ही होता है। इसके अलावा इसे बनाने में “फेथलेट केमिकल” का प्रयोग किया जाता है जो फेथलिक एसिड का ईस्टर होता है। इसलिए अगरबत्ती का धुआं न्यूरोटॉक्सिक और हेप्टोटॉक्सिक होता है जो मस्तिष्क आघात और कैंसर का बड़ा कारण बनता है। हेप्टोटॉक्सिक लीवर को भी बुरी तरह प्रभावित करता है।
 
शास्त्रों में भी अगरबत्ती के इस्तेमाल का कोई भी जिक्र नहीं है, बल्कि धूप और दिया जलाने की बात कही गई है। तो मित्रों अब आप जान ही गए होंगे कि बांस को जलाना कितना हानिकारक है। अच्छा लगे तो इसे अपने दोस्तों और परिवारजनों के साथ शेयर कीजियेगा और हमें कमेंट में जरुर बताइएगा।