आवारा पशुओं को खेतों से दूर रखने के लिए अपनाएं यह 10 तरिके

भारत का हर एक किसान आवारा पशुओं के आतंक से परेशान हैं। हजारों रुपए की लागत और हड्डी तोड़ मेहनत से तैयार होती फसल को छुट्टा जानवर बर्बाद कर देते हैं, किसानों को सबसे अधिक नुकसान नीलगाय करती हैं। कई किसान रात-रात भर जागकर खेतों की रखवाली कर रहे हैं। इन छुट्टा जानवरों का असर खेती पर पड़ रहा है।

नीलगाय के आतंक से परेशान किसानों के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने कई घरेलू और परंपरागत नुस्ख़े बताए हैं जिससे काफी कम कीमत में किसानों को ऐसे पशुओं से आजादी मिल सकती है। गोमूत्र, मट्ठा और लालमिर्च समेत कई घरेलू चीजों से तैयार हर्बल घोल इस दिशा में कारगर साबित हो रहा है।

हर्बल घोल की गंध से नीलगाय,गाय और दूसरे जानवर 20-30 दिन तक खेत के आसपास नहीं फटकते हैं। कृषि के जानकार, वैज्ञानिक और केंद्रीय कृषि मंत्रालय द्वारा संचालित किसान कॉल सेंटर (1800-180-1551) के किसान सलाहकार किसानों को इऩ देसी नुस्ख़ों को आजमाने की सलाह दे रहे हैं।

नीलगाय झुंड में रहती हैं तो जितना ये फसलों को खाकर नुकसान करती हैं उससे ज्यादा इनके पैरों से नुकसान पहुंचता है। सरसों और आलू के पौधे एक बार टूट गए तो निकलना मुश्किल हो जाता है।

परंपरागत तरीके किसानों को जरुर आज़माने चाहिए। हालांकि लंबे समय के लिए ये कारगर नहीं है क्योंकि ये (नीलगाय) बहुत चालाक जानवर हैं तो बाड़ लगवाना सबसे बेहतर रहता है।

नीलगाय,गाय रोकने के लिए इस तरह बनायें हर्बल घोल

  • नीलगाय को खेतों की ओर आने से रोकने के लिए 4 लीटर मट्ठे में आधा किलो छिला हुआ लहसुन पीसकर मिलाकर इसमें 500 ग्राम बालू डालें। इस घोल को पांच दिन बाद छिड़काव करें। इसकी गंध से करीब 20 दिन तक नीलगाय खेतों में नहीं आएगी। इसे 15 लीटर पानी के साथ भी प्रयोग किया जा सकता है।
  • बीस लीटर गोमूत्र, 5 किलोग्राम नीम की पत्ती, 2 किग्रा धतूरा, 2 किग्रा मदार की जड़, फल-फूल, 500 ग्राम तंबाकू की पत्ती, 250 ग्राम लहसुन, 150 लालमिर्च पाउडर को एक डिब्बे में भरकर वायुरोधी बनाकर धूप में 40 दिन के लिए रख दें। इसके बाद एकलीटर दवा 80 लीटर पानी में घोलकर फसल पर छिड़काव करने से महीना भर तक नीलगाय फसलों को नुकसान नहीं पहुंचाती है। इससे फसल की कीटों से भी रक्षा होती है
  • खेत के चारों ओर कंटीली तार, बांस की फंटियां या चमकीली बैंड से घेराबंदी करें।
  • खेत की मेड़ों के किनारे पेड़ जैसे करौंदा, जेट्रोफा, तुलसी, खस, जिरेनियम, मेंथा, एलेमन ग्रास, सिट्रोनेला, पामारोजा का रोपण भी नीलगाय से सुरक्षा देंगे।
  • खेत में आदमी के आकार का पुतला बनाकर खड़ा करने से रात में नीलगाय देखकर डर जाती हैं।
  • नीलगाय के गोबर का घोल बनाकर मेड़ से एक मीटर अन्दर फसलों पर छिड़काव करने से अस्थाई रूप से फसलों की सुरक्षा की जा सकती है।
  • एक लीटर पानी में एक ढक्कन फिनाइल के घोल के छिड़काव से फसलों को बचाया जा सकता है।
  • गधों की लीद, पोल्ट्री का कचरा, गोमूत्र, सड़ी सब्जियों की पत्तियों का घोल बनाकर फसलों पर छिड़काव करने से नीलगाय खेतों के पास नहीं फटकती।
  • देशी जीवनाशी मिश्रण बनाकर फसलों पर छिड़काव करने से नीलगाय दूर भागती हैं।
  • कई जगह खेत में रात के वक्त मिट्टी के तेल की डिबरी जलाने से नीलगाय नहीं आती है।

सरकारी नौकरी छोड़ शुरू की एलोवेरा की खेती सिर्फ दो साल में होने लगी करोड़ों की कमाई

ये कहानी बदलते हुए भारत के एक ऐसे किसान की है जो पढ़ा-लिखा है, इंजीनियर है और फर्राटेदार अंग्रेजी भी बोलता है। इतना ही नहीं उन्होंने तो एमबीए की पढ़ाई के लिए दिल्ली के एक कॉलेज में दाख़िला भी लिया था, लेकिन शायद उनकी मंज़िल कहीं और थी। ये कहानी जैसलमेर के हरीश धनदेव की है जिन्होंने 2012 में जयपुर से बीटेक करने के बाद दिल्ली से एमबीए करने के लिए एक कॉलेज में दाख़िला लिया,

लेकिन पढ़ाई के बीच में ही उन्हें 2013 में सरकारी नौकरी मिल गई सो वो दो साल की एमबीए की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए। हरीश जैसलमेर की नगरपालिका में जूनियर इंजीनियर के पद पर तैनात हुए। यहां महज दो महीने की नौकरी के बाद उनका मन नौकरी से हट गया।

हरीश दिन-रात इस नौकरी से अलग कुछ करने की सोचने लगे। कुछ अलग करने की चाहत इतनी बढ़ गई थी कि वो नौकरी छोड़कर अपने लिए क्या कर सकते हैं इस पर रिसर्च करना शुरु किया।

वह किसानों के परिवार से ताल्लुक रखता था और कुछ अलग हट कर करना चाहता था। एक बार दिल्ली में आयोजित एक कृषि प्रदर्शनी में उसे जाने का मौका मिला और यहीं से उसका जीवन बदल गया।

उसने अपनी नौकरी से त्यागपत्र दिया और अपने 120 एकड़ के खेत में एलोवेरा यानि की घृतकुमारी सहित अन्य फसलों की खेती शुरू कर दी। जैसलमेर से 45 किलोमीटर दूर धहीसर में हरीश ने अपनी कंपनी ‘नेचुरलो एग्रो’ की भी शुरूआत की । थार के मरूस्थल में हो रहे इस एलोवेरा को बड़ी मात्रा में पतंजली फूड प्रोडेक्ट्स को भेजा जाता है जहां उससे जूस बनाया जाता है।

इस रेगिस्तानी इलाके में होने वाले एलोवेरा की गुणवत्ता इतनी बेहतरीन है कि राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में इसकी बेहद मांग है। पतंजली के विशेषज्ञों ने यहां उपजाए जाने वाले एलोवेरा की गुणवत्ता को इतना अच्छा पाया कि उन्होंने इसकी पत्तियों का तुरंत आर्डर दे दिया। नौकरी से त्यागपत्र देकर खेती किसानी शुरू करने के धनदेव के इस साहसिक फैसले का सुखद परिणाम सामने आया।

आमतौर पर रेगिस्तान में बाजरा, गेंहू, मूंग और सरसों उपजाए जाते हैं लेकिन वो कुछ नया उपजाना चाहते थे। उन्होंने अपने 120 एकड़ के खेत में एलोवेरा की बेबी डेनसिस प्रजाति लगायी। एलोवेरा की यह प्रजाति इतनी बेहतरीन है कि ब्राजील, हांगकांग और अमेरिका जैसे देशों में भी इसकी बड़ी मांग है।

शुरूआत में उन्होंने एलोवेरा के 80 हजार पौधे लगाए जो आज बढ़कर तकरीबन सात लाख हो चुके हैं। वो बताते हैं कि पिछले चार महीनों में उन्होंने हरिद्वार के पतंजली फैक्ट्री में 125 से 150 टन तक एलोवेरा के पत्तियों के प्रसंस्कृत गुदे भेजे हैं। धनदेव ये भी बताते हैं कि एलोवेरा के पत्तों का प्रसंस्करण आधुनिकतम प्रणाली के जरिए होता है जिसके लिए उन्होंने एक संयंत्र भी स्थापित किया है।

नौकरी छोड़ बंजर जमीन पर शुरू की कीवी की खेती , ऑनलाइन बिक्री से कमा रहे लाखों

हिमाचल के जिला सोलन के शिल्ली गांव में तैयार कीवी का स्वाद पूरे देश को लुभा रहा है। हिमाचल से एक्सपोर्ट क्वालिटी की कीवी तैयार कर देशभर में मिसाल बन रहे मनदीप वर्मा की करामात कई युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई है।

खाने में लजीज और पाचन तंत्र समेत शारीरिक ऊर्जा देने वाले फल को अपनी सफलता का नया आधार बनाने वाले मनदीप एमबीए करने के बाद विप्रो कंपनी में मैनेजर पद पर कार्यरत थे।

नौकरी छोड़ बंजर जमीन पर कीवी की पैदावार में जुट गए। परिवार सदस्यों और बागवानी विशेषज्ञों के सहयोग से आज मनदीप वेबसाइट से देशभर में कीवी बेच रहे हैं।

14 लाख से बंजर जमीन पर तैयार किया बगीचा

उनकी पत्नी सुचेता वर्मा कंपनी सचिव हैं। साढ़े सात वर्ष पहले उन्होंने घर के पास बंजर जमीन पर बागवानी का विचार किया। इसके लिए उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ी और गांव लौट आए। उनके पिता राजेंद्र वर्मा, माता राधा वर्मा ने कीवी की खेती में उनका पूरा सहयोग दिया।

सोलन के बागवानी विभाग और डा. यशवंत सिंह परमार यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों से बात करने के बाद उन्होंने विशेषज्ञों की सलाह पर मध्यपर्वतीय क्षेत्र में कीवी का बाग तैयार करने का मन बना लिया। उन्होंने 14 बीघा जमीन पर कीवी का बगीचा लगाया।

कीवी की उन्नत किस्में एलिसन और हैबर्ड के पौधे ही लगाए। करीब 14 लाख रुपये से बगीचा तैयार करने के बाद मनदीप ने वेबसाइट बनाई। मनदीप के मुताबिक बाग से उत्पाद सीधे उपभोक्ता तक पहुंचाने की उनकी कोशिश कारगर साबित हुई।

350 रुपये प्रति बॉक्स बिक रहा कीवी

कीवी की सप्लाई वेबसाइट पर ऑनलाइन बुकिंग के बाद की जाती है। कीवी ऑनलाइन हैदराबाद, बंगलूरू, दिल्ली, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ में बेचा जा रहा है।

डिब्बे पर कब फल टूटा, कब डिब्बा पैक हुआ सारी डिटेल दी जा रही है। एक डिब्बे में एक किलो किवी पैक होती है और इसके दाम 350 रुपये प्रति बॉक्स है। जबकि सोलन में कीवी 150 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बिक रहा है।

हिमाचल में है कीवी की अपार संभावना

डा. वाईएस परमार यूनिवर्सिटी नौणी में कीवी पर दशकों से काम कर रहे विशेषज्ञ डा. विशाल राणा ने बताया कि शिल्ली गांव के मनदीप वर्मा कीवी की ऑनलाइन बिक्री कर रहे हैं। उनकी पैकिंग और ग्रेडिंग भी एक्सपोर्ट क्वालिटी की है।

उन्होंने कहा कि देश में कीवी की शुरुआत हिमाचल प्रदेश से हुई है। आज देश के कुल कीवी उत्पादन का 60 फीसदी कीवी अरुणाचल प्रदेश तैयार कर रहा है।

सिक्किम, मेघालय में भी कीवी की बागवानी की जा रही है। हिमाचल में कीवी उत्पादन की अपार संभावना है। सरकार कीवी को बढ़ावा देने के लिए 50 फीसदी सब्सिडी दे रही है। हिमाचल में अभी करीब 150 हेक्टेयर भूमि पर ही कीवी उगाई जा रही है।

अब आपके गांव के सरपंच नहीं कर सकेंगे गोलमाल

आज हम आप को एक  ऐसी सरकारी वेबसाइट (gov.in)  का लिंक बताने जा रहे है , जिसका उपयोग कर के आप अपने गांव , अपने मोहले और अपने देश के विकाश में मत्वपूर्ण  योगदान कर सकते है , यह पर आप देख सकते है की भररत सरकार  ने आप के गांव के निर्माण कार्यों के लिए कितना पैसा दिया है ( यह डाटा पूरी तरह से ऑथेंटिकेट है ), अगर आप को कोई अनियमितता लगती है तो इसकी शिकायत आप जनसुनवाई में सीधे कर सकते है

Step 1 .  सर्वप्रथम नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

http://www.planningonline.gov.in/ReportData.do?ReportMethod=getAnnualPlanReport

Step 2  .आप होनी सुबिधा के अनुसार अपनी भाषा चुन सकते है , अभी यहाँ पर इंग्लिश,हिंदी और पंजाबी का ऑप्शन है। …इमेज देखें

Step 3  .यहाँ पर आप अपना योजना बर्ष और अपने राज्य  का नाम चुन कर GET REPORT पर क्लिक करें , इसके  बाद आप से योजना इकाई के बारे में पूछेगा , For Example अगर आप को ये देखना है की आप के गांव  में इस बर्ष कितना पैसा सरकार  की तरफ से आया है तो आप GRAM PANCHYAT का ऑप्शन चुनेँगे

Step 4 . उसके बाद आप से ये पूछा जायेगा की आप किस जिला पंचायत में रहते है, आप अपने जिले का नाम सेलेक्ट कर लेंगे

Step 5  . जिला पंचायत सेलेक्ट करने के बाद आप अपने जनपद पंचायत  या ब्लॉक का नाम सेलेक्ट कर लेंगे, For Example – अगर मुझे ये देखना है की 2017-2018 में मेरे गांव में किस मद में सरकार ने  कितना पैसा दिया है ,

Step 6  .जनपद पंचायत के बाद आप से ग्राम PANCHYAT का नाम पुछा  जायेगा , उसके बाद आप GET REPORT पर क्लिक करेंगे।

यहाँ पर आप के सामने आप के गाँव / मोहल्ले / बार्ड में अभी तक कितना पैसा आया है  और आप के मुखिया( ग्राम PANCHYAT प्रद्यान), आप के बार्ड के मेंबर ने कितना काम किया है और सरकार से कितना पैसा लिया है, इसकी पूरी जानकारी ले सकते है, यदि आप को कुछ ऐसा डेटा मिलता  है जो आप को सही नहीं लगता है तो इसकी शिकायत आप जनसुनवाई पर जा कर कर सकते है , जहा पर आप के शिकायत पर सीधे मुखयमंती की सीधे नजर रहेगी

अब हमको जागरूक होने की जरूरत है। सभी जानकारियां सरकार ने ऑनलाइन वेबसाइट पे उपलब्ध करा दी है बस हमें उन्हें जानने की जरूरत है, यदि हर गांव के सिर्फ 2-3 युवा ही इस जानकारी को अपने गांव के लोगो को बताने लगे, समझ लो 50% भ्रष्टाचार तो ऐसे ही कम हो जाएगा।

इसलिए आपसे गुजारिश है कि आप अपने गांव में वर्ष 2016-17 मे हुए कार्यो को जरूर देखें और इस लिंक को देश के हर गांव तक भेजने की कोशिश करे ताकि गांव के लोग अपना अधिकार पा सके।

ईरान ने चावल आयात पर लगी रोक हटाई, 1121 धान में 200 रुपए तक आया उछाल

ईरान ने चावल आयात पर लगी रोक हटा दी है। इससे 1121 धान के रेट में 200 रुपए तक का उछाल आया है। इसका सीधा फायदा चावल निर्यातकों किसानों को होगा। ईरान सीजन में आयात पर अस्थाई रोक लगा देता है, ताकि लोकल किसानों का धान खरीदा जा सके। इस बार वहां लोकल पैदावार कम है और डिमांड ज्यादा है। इसलिए रोक हटा दी गई है।

ईरान ने 22 नवंबर से 22 जुलाई 2018 तक चावल निर्यात खोल दिया है। ईरान में हर साल तीन मिलियन टन चावल की खपत है, जबकि उसका घरेलू उत्पादन 2.2 मिलियन टन है। इसलिए उसे 8 से 10 लाख टन का आयात करना पड़ता है। ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स के पूर्व प्रधान विजय सेतिया ने बताया कि देश के लिए यह अच्छी खबर है। इसका राइस एक्सपोर्टर्स को फायदा होगा। एक्सपोर्टर्स को परमिट देना शुरू कर दिया है।

एक लाख टन चावल ईरान के पोर्ट पर पड़ा है, यह भी अब जल्द उठ जाएगा। सेतिया ने बताया कि भारत से 40 लाख टन चावल का निर्यात होता है। इसमें से 25 प्रतिशत निर्यात ईरान में होता है। इस बार चावल निर्यातकों ने महंगे दाम पर धान खरीदी हुई है, अब चावल बाहर जाने से निर्यातकों को फायदा होगा। अगले कुछ दिनों मेें इसका और किसान दोनों को फायदा होगा। पूसा-1121 का चावल ईरान में सबसे ज्यादा जाता है। अरब के देशों में ज्यादातर 1121 की खपत है। यूरोप में सुपर बासमती चावल की डिमांड ज्यादा होती है।

1121 में ऐसे आया उछाल 

ईरानमें चावल का निर्यात खुलते ही 1121 जीरी के भाव में 200 रुपए प्रति क्विंटल का उछाल आया है। पहले 1121 धान 3200 रुपए प्रति क्विंटल तक बिकी थी, लेकिन गुरुवार को नरवाना मंडी में 1121 जीरी 3390 रुपए प्रति क्विंटल, पिल्लूखेड़ा 3379, जींद 3380, निसिंग 3400, हांसी 3351, चीका मंडी 3350 , कलायत 3411, खन्ना मंडी 3470, अमृतसर 3485, करनाल 3370, कैथल 3380 रुपए प्रति क्विंटल बिकी। बासमती जीरी में 30 से 40 रुपए प्रति क्विंटल का उछाल आया है।

 

किसानों को मिला अच्छा भाव 

इसबार किसानों को धान का भाव सीजन की शुरुआत से ही अच्छा मिल रहा है। पीआर धान समर्थन मूल्य से ज्यादा भाव में बिकी। 1509 किस्म का भाव 2300 रुपए से लेकर 2600 रुपए प्रति क्विंटल मिला। डुप्लीकेट बासमती भी 2800 रुपए, 1121 का रेट 2800 से 3300 रुपए, परंपरागत बासमती का रेट 3500 रुपए से लेकर 4000 रुपए प्रति क्विंटल मिल रहा है। विदेशों में ज्यादा सौदे होते हैं तो रेटों में उछाल सकता है।

तीन नस्लों के मेल से गाय की नई प्रजाति विकसित, देगी 55 लीटर तक दूध

वैज्ञानिकों ने तीन नस्लों के मेल से गाय की नई प्रजाति विकसित की है। इसे नाम दिया है ‘हरधेनू’। यह 50 से 55 लीटर तक दूध दे सकती है। 48 डिग्री तापमान में सामान्य रहती है। यह 18-19 महीने में प्रजनन करने के लिए सक्षम है। जबकि अन्य नस्ल करीब 30 माह का समय लेती है। ‘हरधेनू’ प्रजाति में 62.5% खून हॉलस्टीन व बाकी हरियाना व शाहीवाल नस्ल का है। यह कमाल किया हिसार के लुवास विवि के अनुवांशिकी एवं प्रजनन विभाग के वैज्ञानिकों ने।

कामधेनू की तर्ज पर नाम :डॉ. बीएल पांडर के अनुसार कामधेनू गाय का शास्त्रों में जिक्र है कि वह कामनाओं को पूर्ण करती है। इसी तर्ज पर ‘हरधेनू’ नाम रखा गया है। नाम के शुरुआत में हर लगने के कारण हरियाना की भी पहचान होगी।

पहले 30 किसानों को दी : वैज्ञानिकों ने पहले करीब 30 किसानों को इस नस्ल की गाय दीं। वैज्ञानिकों ने अब यह नस्ल रिलीज की है। अभी इस नस्ल की 250 गाय फार्म में हैं। कोई भी किसान वहां से इस नस्ल के सांड का सीमन ले सकता है।

जर्सी को पीछे छोड़ा :‘हरधेनू’ ने दूध के मामले में आयरलैंड की नस्ल ‘जर्सी’ को भी पीछे छोड़ दिया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि ‘जर्सी’ नस्ल की गाय आैसत 12 लीटर और अिधकतम 30 लीटर तक दूध दे सकती है। वहीं, ‘हरधेनू’ औसत 16 लीटर और अधिकतम 50 से 55 लीटर दूध दे सकती है।

ऐसे तैयार की नस्ल : हरियाना नस्ल की गाय के अंदर यूएसए व कनाडा की हॉलस्टीन और प्रदेश की शाहीवाल और हरियाना नस्ल का सीमन छोड़ा गया। तीन नस्लों के मेल से तैयार हुए गाय के बच्चे को ‘हरधेनू ‘ नाम दिया गया।

45 साल शोध :1970 में हरियाणा कृषि विवि की स्थापना हुई। तभी गाय की नस्ल सुधार के लिए ‘इवेलेशन ऑफ न्यू ब्रीड थ्रू क्राॅस ब्रीडिंग एंड सिलेक्शन’ को लेकर प्रोजेक्ट शुरू हुआ। 2010 में वेटनरी कॉलेज को अलग कर लुवास विश्वविद्यालय बनाया गया। शंकर नस्ल की गाय की नई प्रजाति ‘हरधेनू ‘ को लेकर चल रही रिसर्च का परिणाम 45 साल बाद अब सामने आया है।

 

पशुओं में आस करवाने के बावजूद भी गर्भ ना ठहरना की समस्या के कारण और इलाज ।

जिस गाभिन में तीन बार आस करवाने के बावजूद भी गर्भ नहीं ठहरता, वह रिपीटर करार दी जाती है। इस समस्या को अक्सर रिपीट ब्रीडर भी कहा जाता है। यह समस्या आजकल बहुत ज्यादा आ रही है। इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे कि बच्चेदानी में गांठ आदि।

किसान भाई यह नहीं देखते कि आस करवाते समय ताप 22 दिन बाद है या समय से पहले है या बाद में। यदि 17-18वें दिन बोलती है तो बीमारी और है यदि 26-28वें दिन बोलती है तो बीमारी और है। क्या बीमारी मिली।

क्या वैटरनी डॉक्टर आया और टीका लगाकर चला गया, क्या उसने पूछा कि पिछले महीने कब ताप में आई थी। बहुत सारी ऐसी जानकारियां होती हैं जिनका किसान भाइयों को खुद रिकॉर्ड रखना चाहिए जैसे कि ताप में आने का समय, कितने दिन बाद ताप में आई आदि।

बाकी आपको शायद पता ही हो कि तारें सिर्फ शीशे की तरह बनी होनी चाहिए। यदि तारें घुसमैली हों या तारों में छेद हो तो पशु को कभी नए दूध नहीं करवाना चाहिए। बल्कि एक अच्छे माहिर डॉक्टर से बच्चेदानी की जांच करवाके दवाई भरवा देनी चाहिए।

इसके अलावा गाभिनों के बार बार गर्भपात के कुछ अन्य कारण जैसे :

  •  जनन अंगों में जमांदरू नुक्स
  •  कम शारीरिक भार
  •  शरीर में हारमोन का संतुलन बिगड़ जाना
  •  गर्म वातावरण
  •  आस करवाने का प्रबंध
  •  ताप के लक्षणों और आस करवाने के सही समय की कम जानकारी

इलाज :
इस तरह की समस्या के इलाज के लिए कुछ इलाज आपसे शेयर कर रहे हैं जो कि पशु पलन क व्यवसाय में काफी महत्तवपूर्ण हैं।

  •  पहली बात आप पशु को संतुलित डाइट ज़रूर दें। जब आप पशु को क्रॉस करवायें उससे 5 मिनट के अंदर अंदर 125 ग्राम रसौद जो कि पंसारी की दुकान या आयुर्वेदिक सामान वाली दुकान से मिल जाएगी उसे पशु को दें।
  •  यदि तारें साफ आ रही हैं तो एक होमियोपैथिक दवाई को सीरिंज से सीधे मुंह के द्वारा पशु को दिन में तीन टाइम देते रहें।

किसान ने निकाली एक ऐसी स्कीम के पैसे भी बच गए और लेबर भी फ्री

यह कहानी सबक देती है कि हमारे पास जितने भी सीमित संसाधन हैं, उन्हीं का सही इस्तेमाल करके हम न केवल कामयाबी हासिल कर सकते हैं, बल्कि दूसरों के लिए भी मॉडल स्थापित कर सकते हैं। इसके लिए जरूरत होती है सही नेतृत्व और टीम वर्क की।

बेंगलुरु से करीब 100 किलोमीटर दूर एक जगह है मांड‍या। पिछले साल जुलाई की बात है, यहां गन्ने की खेती करने वाले 20 से ज्यादा किसानाें ने मौत को गले लगा लिया। इन किसानों की आत्महत्या की वजह यह नहीं थी कि खेती नहीं हुई, वजह थी वह भारी कर्ज जो उन्होंने कभी लिया था और अब बढ़ते-बढ़ते इतना हो चुका था कि उसे चुकाना उनके वश की बात नहीं रही थी। फसल की सही कीमत न मिलना, भारी स्टॉक और सही सलाह के अभाव में ये किसान हालात के सामने हार चुके थे।

इधर, मांडया से हजारों मील दूर बैठा एक शख्स इन हालात से दुखी था। वह रोजाना मांडया में किसानों की आत्महत्या की खबरें सुनता और मन मसोस कर रह जाता। कैलिफोर्निया में आईटी प्रोफेशनल मधुचंद्रन चिक्कादैवेया मांडया में ही जन्मे थे। उनका संबंध भी किसान परिवार से है, उनका बचपन 300 एकड़ में फैली बेंगलुरु एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के प्रांगण में बीता था, उनके पिता यहां वाइस चांसलर थे।

वर्ष 2014 में उन्होंने अपनी नौकरी से त्यागप्ात्र दे दिया और मांडया लौट आए। मधु कहते हैं- मेरा एक ही मकसद था, मांडया के किसानों को बचाना, उनकी मदद करना। उनके मुताबिक देश के हालात ऐसे हैं कि किसान अपनी खेती को छोड़कर छोटे-मोटे काम-धंधों के लिए शहर की तरफ दौड़ रहे हैं, ऐसा इसलिए है क्योंकि खेती अब फायदे की चीज नहीं रही।

मधु कहते हैं, जब मैं मांडया आया तो मैंने पाया कि यहां किसान आर्गेनिक तरीके से खेती कर रहे हैं, लेकिन समस्या यह थी कि यहां कोई बेहतर मार्केट नहीं थी और न ही किसानों को गाइड करने वाला। तब हमने पहला काम यही किया- मंडया आर्गेनिक फार्मर्स को-ऑपरेटिव सोसायटी स्थापित की।

मधु ने अपने दोस्तों, पूर्व सहयोगियों के साथ मिलकर करीब 1 करोड़ रुपये जुटा कर इस सोसायटी का गठन किया, उन्हें सरकार से मंजूरी लेने और आर्गेनिक मांडया नाम से एक ब्रांड शॉप खोलने में 8 महीने का समय लगा। इस ब्रांड के जरिये किसान अपने आर्गेनिक फल-सब्िजयों को बेचते हैं। मधु के मुताबिक हमने बेंगलुरु-मैसूर हाईवे पर आर्गेनिक मांडया नाम से इस शॉप को स्थापित किया है। मेरा मकसद था कि एक किसान सीधे अपने ग्राहक से बात कर सके, उसकी जरूरत को समझ सके वहीं एक ग्राहक किसान की मेहनत को जान सके। हाईवे पर शॉप स्थापित करने का फायदा यह हुआ कि वहां से गुजरने वाले लोग उन आर्गेनिक फल-सब्जियों को खरीदने लगे। किसानों को वहां से कहीं और नहीं जाना पड़ा। इसकी कामयाबी के बाद एक आर्गेनिक रेस्टोरेंट खोल दिया गया।

क्या है फार्म शेअर (farm share)प्रोग्राम

मधु कहते हैं, लोग आर्गेनिक पदार्थों से जुड़ते हुए हिचकते हैं,हमारे लिए यह बेहद जरूरी था कि हम लोगों को बताएं कि आर्गेनिक खाद्य पदार्थों का सेवन ही क्यों जरूरी है। इसके लिए हमने लोगों को मांडया में बुलाकर उन्हें इस काम से जोड़ने की सोची। जिन लोगों की खेती में रुचि है या जो प्रकृति के साथ रहकर अपना समय बीताना चाहते हैं, उन्हें आमंत्रित किया गया। मधुचंद्रन का यह आइडिया काम कर गया है, चार महीनों के अंदर उनकी सोसायटी ने एक करोड़ रुपये का बिजनेस किया है, किसानों की आर्थिक स्थिति सुधर गई है, वे अपने कर्ज चुका पा रहे हैं, उनकी जिंदगी में बदलाव आ गया है।

इसके लिए उन्होंने “फार्म शेअर” नाम का प्रोग्राम शुरू किआ जिसमे वह शहर में रहने वाले परिवारों को 35000 \ रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से जमीन मुहैया करवाते है।यहाँ पर लोग खुद के लिए और परिवार के लिए आधे से 2 एकड़ तक जमीन किराये पर लेते है  ।उनकी मदद के लिए एक गांव का एक किसान हर वक़्त उनके साथ रहता है और खेतीबाड़ी में शहरी परिवार की मदद करता है ।

तीन महीने बाद परिवार की मर्जी हो तो वो उत्पाद बाजार में बेच सकता है और अगर चाहे तो अपने लिए भी रख सकता है । इस प्रोग्राम की खासियत यह है यहाँ पर लोग ख़ुशी -ख़ुशी काम करते है जिस के लिए खेत एक मौजमस्ती और पिकनिक मानाने की जगह बन गया है ।

मधुचंद्रन का यह आइडिया काम कर गया है, चार महीनों के अंदर उनकी सोसायटी ने एक करोड़ रुपये का बिजनेस किया है, किसानों की आर्थिक स्थिति सुधर गई है, वे अपने कर्ज चुका पा रहे हैं, उनकी जिंदगी में बदलाव आ गया है।

ये है गन्ने की बिजाई का नया तरीका, 3 गुणा ज्यादा होती है उपज

उत्तर भारत में गन्ने में लगभग 33 प्रतिशत अंकुरण हो पाता है, जिससे मातृ गन्नों की संख्या लगभग 33000 हो पाती है, शेष गन्ने कल्लों से बनते है जो अपेक्षाकृत कम वजन के होते है। इसलिये यह आवश्यक है कि प्रति हैक्टेयर अधिक से अधिक मातृ गन्ने प्राप्त करने के लिए प्रति इकाई अधिक से अधिक गन्ने के टुकड़ों को बोया जाए। गोल आकार के गड्ढों में गन्ना बुवाई करने की विधि को गड्ढा बुवाई विधि कहते हैं।

इस विधि को कल्ले रहित तकनीक भी कहते हैं। इस विधि से गन्ना लगाने के लिए सबसे पहले खेत के चारों तरफ 65 सेमी. जगह छोड़े तथा लंबाई व चौड़ाई में 105 सेमी. की दूरी पर पूरे खेत में रस्सी से पंक्तियों के निशान बना लें।

इन पंक्तियों के कटान बिंदु पर 75 सेमी. व्यास व 30 सेमी. गहराई वाले 8951 गड्ढे तैयार कर लें। गड्ढे आप लेबर से भी करवा सकते है उसके लिए आपको ज्यादा खर्चा देना पड़ेगा और टाइम भी ज्यादा लगेगा इस लिए आप यह गड्ढे बनवाने के लिए ट्रेक्टर से चलने वाली मशीन का प्रयोग करें

अब संस्तुत स्वस्थ गन्ना किस्म के ऊपरी आधे भाग से दो आँख वाले टुकड़े सावधानी पूर्वक काट लें। इसके पश्चात 200 ग्राम बावस्टिन का 100 लीटर पानी में घोल बनाकर 10-15 मिनट तक डुबों कर रखें। बुवाई पूर्व प्रत्येक गड्ढे में 3 किग्रा. गोबर की खाद 8 ग्राम यूरिया, 20 ग्राम डी.ए.पी., 16 ग्राम पोटाश, और 2 ग्राम जिंक सल्फेट डालकर मिट्टी में अच्छी प्रकार मिलाते है।

अब प्रत्येक गड्ढे में साइकिल के पहिये में लगे स्पोक की भांति, दो आँख वाले उपचारित गन्ने के 20 टुकड़ों को गड्ढे में विछा दें। तत्पश्चात 5 लीटर क्लोरपायरीफास 20 ईसी को 1500-1600 लीटर पानी में घोल कर प्रति हैक्टेयर की दर से गन्ने के टुकड़ों के ऊपर छिड़क दें ।

इसके अलावा ट्राइकोडर्मा 20 किग्रा. को 200 किग्रा. गोबर की खाद के साथ मिलाकर प्रति हैक्टेयर की दर से टुकड़ों के ऊपर डाल दें। प्रत्येक गड्ढे में सिंचाई करने के लिए गड्ढों को एक दूसरे से पतली नाली बनाकर जोड़ दें । अब गड्ढो में रखे गन्ने के टुकड़ो पर 2-3 सेमी. मिट्टी डालकर ढंक दें। यदि मिट्टी में नमी कम हो तो हल्की सिंचाई करें। खेत में उचित ओट आने पर हल्की गुड़ाई करें जिससे टुकड़ो का अंकुरण अच्छा होता हैं।

चार पत्ती की अवस्था आ जाने पर (बुवाई के 50-55 दिन बाद) प्रत्येक गड्ढे में 5-7 सेमी. मिट्टी भरें और हल्की सिंचाई करें तथा ओट आने पर प्रत्येक गड्ढे में 16 ग्राम यूरिया खााद डालें। मिट्टी की नमी तथा मौसम की परिस्थितियों के अनुसार 20-25 दिनों के अन्तराल पर हल्की सिंचाई और आवश्यकतानुसार निराई-गुड़ाई भी करते रहें।

जून के तीसरे सप्ताह में प्रत्येक गड्ढे में 16 ग्राम यूरिया डालें। जून के अंतिम सप्ताह तक प्रत्येक गड्ढे को मिट्टी से पूरी तरह भर दें। मानसून शुरू होने से पूर्व प्रत्येक थाल में मिट्टी चढ़ा दें। अगस्त माह के प्रथम पखवाड़े में प्रत्येक गड्ढे के गन्नों को एक साथ नीचे की सूखी पत्तियों से बांध दें।

सितम्बर माह में दो पंक्तियों के आमने-सामने के गन्ने के थालों को आपस में मिलाकर (केंचीनुमा आकार में )बांधे तथा गन्ने की निचली सूखी पत्तियों को निकाल दें। अच्छी पेड़ी के लिए जमीन की सतह से कटाई करें। ऐसा करने से उपज में भी बढ़ोत्तरी होती हैं। सामान्य विधि की अपेक्षा इस विधि द्वारा डेढ से 3 गुना अधिक उपज प्राप्त होती है।

केवल गड्ढों में ही सिंचाई करने के कारण 30-40 प्रतिशत तक सिंचाई जल की बचत ह¨ती है। मातृ गन्नों में शर्करा की मात्रा कल्लों से बने गन्ने की अपेक्षा अधिक होती है । इस विधि से लगाये गये गन्ने से 3-4 पेड़ी फसल आसानी से ली जा सकती हैं।

क्षेत्र विशेष के अनुसार उन्नत किस्म के गन्ने का चयन और बुआई की नवीनतम वैज्ञानिक विधि के अलावा गन्ना फसल की बुआई उपयुक्त समय पर (शरद्कालीन बुआई सर्वश्रेष्ठ ) करें तथा आवश्कतानुसार उर्वरकों एवं सिचाई का प्रयोग करें और पौध सरंक्षण उपाय भी अपनाएँ। समस्त सस्य कार्य समय पर सम्पन्न करने पर गन्ने से 100 टन प्रति हेक्टेयर उपज लेकर भरपूर मुनाफा कमाने का मूलमन्त्र यही है।

By :-

डाँ.गजेन्द्र सिंह तोमर

अब इंटरनेट पर 5 मिंट में निकालें किसी भी खेत का खाता नकल(जमाबंदी)

दोस्तों किसान का हर काम अपने खेत से जुडा हुआ रहता है। इसलिए उसे अपने खेत की पूरी जानकारी होना जरुरी होता है। आज की पोस्ट में में आपको आपके खेत की जानकारी घर बेठे अपने खेतों की जानकारी सिर्फ 5 मिंट में हांसिल कर सकते है ताकि आपको खेत की खसरा नकल नक्शा और किस बेंक का ऋण है।

इस के बारे में जानकारी मील सके।इसके लिए आपके फ़ोन जा कंप्यूटर पर इंटरनेट की सुविधा होना जरूरी है आज हम मध्यप्रदेश और राजस्थान के किसान के लिए जानकारी लायें है।बाकि राज्य के लिए इस से अगली पोस्ट में जानकारी देंगे

मध्य प्रदेश के किसान ऐसे देखें अपनी जमीन की जानकारी

सबसे पहले आप m.p. govt की website http://landrecords.mp.gov.in/ पर जाये जेसे ही आप इस साइड पर जायेगे आपको मध्यप्रदेश शासन की भूअभिलेख एवं बंदोबस्त के होम पेज दिखेगा।

उसमे साइड के बीचो बिच मध्यप्रदेश का नक्शा दिखेगा जिसमे अलग अलग कलर में mp के सभी जिले दिखेगे अब आप आपका जिला चुने उस जिले पर cilik करे जेसे ही आप अपने जिले पर ok करेगे

आपके सामने उस जिले की जितनी भी तहसील हे वो आपके सामने आ जाएगी उसमे से आप आपकी जो भी तहसील हो उसे सलेक्ट करे।

उसके बाद में आपके सामने हल्का आ जायेगा यानी आप अपने गाव को चुनिये।गाव चुनने के बाद आपके सामने विकल्प ई आयेगे के आप किस तरह देखना चाहेगे

  • खसरा नाम के अनुसार
  • खसरा नंबर के अनुसार
  • खसरा खाते के समस्त
  • किश्त बंदी खेतानी
  • एरया सम्बधित रिपोर्ट
  • भूमि का प्रकार
  • शासकीय नंबर की सुची
  • भूमी का ब्यौरा
  • फसल का ब्यौरा

आप इनमे से जो विकल्प ठीक लगे चुने यदी आपका गाव छोटा है। तो आप खसरा नाम के अनुसार भी आसनी से देख सकते है। फिर आप उसको सलेक्ट करोगे तो आपके सामने फिर सभी खातेदारों की लिस्ट आ जाएगी आप अपना नाम सलेक्ट करे और ओके करे उसके बाद आपके सामने दस्तावेज की जानकारी दिखने लगेगी ।

मध्य प्रदेश राज्य में खेत जमीन की ऑनलाइन नक़ल निकालने के लिए यहाँ क्लिक करे।

और ज्यादा जानकारी के लिए निचे दी हुई वीडियो देखें

राजस्थान के किसान ऐसे देखें अपनी जमीन की जानकारी

राजस्थान में रहने वाले किसान भाई अपनी ज़मींन की जानकरी ऑनलाइन देखेने के लिए ऊपर दी गयी प्रोसिसर को अपनाये वो अपनी जमींन की नकल निकलने के लिए निचे दी गयी लिंक को खोले फिर अपने जिले का चुनाव करे फिर जिले में लगने वाली तहसील को ओके करे बाद में अपने गाव को सलेक्ट करे फिर खसरा अनुसार या अपने नाम के 3 अक्षर हिंदी में टाइप कर के नक़ल को आसानी से ले सकते है।

राजस्थान राज्य में खेत जमीन की ऑनलाइन नक़ल निकालने के लिए यहाँ क्लिक करे।

और ज्यादा जानकारी के लिए निचे दी हुई वीडियो देखें