40 हज़ार रुपये /किल्लो वाली केसर ने किसान को कर दिया मालोमाल

27 साल के संदेश पाटिल ने केवल ठंडे मौसम में फलने-फूलने वाली केसर की फसल को महाराष्ट्र के जलगांव जैसे गर्म इलाके में उगाकर लोगों को हैरत में डाल दिया है। उन्होंने मेडिकल की पढ़ाई छोड़कर जिद के बलबूते अपने खेतों में केसर की खेती करने की ठानी और अब वे हर महीने लाखों का मुनाफा भी कमा रहे हैं। इसके लिए उन्होंने लोकल और ट्रेडिशनल फसल के पैटर्न में बदलाव किए।

इंटरनेट से ली खेती की जानकारी

  • जलगांव जिले के मोरगांव खुर्द में रहने वाले 27 साल के संदेश पाटिल ने मेडिकल ब्रांच के बीएएमएस में एडमिशन लिया था, लेकिन इसमें उनका मन नहीं लगा।
  • उनके इलाके में केला और कपास जैसी लोकल और पारंपरिक फसलों से किसान कुछ खास मुनाफा नहीं कमा पाते थे।
  • इस बात ने संदेश को फसलों में एक्सपेरिमेंट करने के चैलेजिंग काम को करने इंस्पायर किया।
  • इसके बाद उन्होंने सोइल फर्टिलिटी की स्टडी की। उन्होंने मिट्टी की उर्वरक शक्ति (फर्टिलिटी पावर) को बढ़ाकर खेती करने के तरीके में एक्सपेरिमेंट करने की सोची।
  • इसके लिए उन्होंने राजस्थान में की जा रही केसर की खेती की जानकारी इंटरनेट से ली।

 

पिता और चाचा ही थे उनके खिलाफ

  • सारी जानकारी जुटाकर संदेश ने इस बारे में अपनी फैमिली में बात की। शुरुआत में उनके परिवार में उनके पिता और चाचा ही उनके खिलाफ थे।
  • लेकिन संदेश अपने फैसले पर कायम रहे। आखिरकार उनकी जिद और लगन को देखते हुए घरवालों ने उनकी बात मान ली।
  • इसके बाद उन्होंने राजस्थान के पाली शहर से 40 रुपए के हिसाब से 9.20 लाख रुपए के 3 हजार पौधे खरीदे आैर इन पौधों को उन्होंने अपनी आधा एकड़ जमीन में रोपा।
  • संदेश ने अमेरिका के कुछ खास इलाकों और इंडिया के कश्मीर घाटी में की जाने वाली केसर की खेती को जलगांव जैसे इलाकों में करने का कारनामा कर दिखाया है।

दूसरे किसान भी ले रहे दिलचस्पी

  • संदेश पाटिल ने अपने खेतों में जैविक खाद का इस्तेमाल किया। मई 2016 में संदेश ने 15.5 किलो केसर का प्रोडक्शन किया।
  • इस फसल के उन्हें 40 हजार रुपए किलो के हिसाब से कीमत मिली। इस तरह टोटल 6.20 लाख रुपए की पैदावार हुई।
  • पौधों, बुआई, जुताई और खाद पर कुल 1.60 लाख की लागत को घटाकर उन्होंने साढ़े पांच महीने में 5.40 लाख रुपए का नेट प्रॉफिट कमाया।
  • मुश्किल हालात में भी संदेश ने इस नमुमकिन लगने वाले काम को अंजाम दिया।
  • जिले के केन्हाला, रावेर, निभोंरा, अमलनेर, अंतुर्की, एमपी के पलासुर गांवों के 10 किसानों ने संदेश पाटिल के काम से मोटीवेट होकर केसर की खेती करने का फैसला किया है।

News Source- Dainik Bhasker News

जानिए ऐसा क्या उगाते है प्रेम सिंह, जो विदेशी भी आते है इनसे ट्रेनिंग करने

बुंदेलखंड के ज्यादातर इलाकों से किसान पलायन कर रहे हैं। दो वर्षों से प्राकृतिक आपदाओं और सूखे का सामना कर रहे इस क्षेत्र के हजारों किसानों के घर में अनाज का एक दाना नहीं हुआ है। रोजी-रोटी की तलाश में वो दिल्ली जैसे शहरों में रोजगार की संभावनाएं तलाश रहे हैं।

लेकिन बुंदेलखंड के ही बांदा जिले के बड़ोखर खुर्द गाँव में रहने वाले प्रेम सिंह (57 वर्ष) खेती से हर साल 15 लाख रुपये की कमाई करते हैं। इतना ही नहीं हर वर्ष 3000-4000 किसान उनसे खेती के गुर भी सीखने आते हैं, जिनमें सैकड़ों विदेशी होते हैं। प्रेम सिंह बुंदेलखंड के दूसरे तमाम किसानों से अलग तरीके से खेती करते हैं।

बाकी किसान जहां रासायनिक खादों के सहारे बाजार के लिए खेती करते हैं वहीं प्रेम सिंह खेती, पशुपालन और बागवानी का अनूठा मॉडल अपनाए हुए हैं। प्रेम सिंह ने अपनी कुल जमीन को तीन भागों में बांट रहा है। जमीन के एक तिहाई हिस्से में उन्होंने बाग लगाई है तो दूसरा भाग पशुओं के चरने के लिए है। जबकि बाकी एक तिहाई हिस्से में वो जैविक विधि से खेती करते हैं। प्रेम सिंह ने उसे आवर्तनशील खेती का नाम दिया है।

बांदा जिला मुख्यालय से पूरब-दक्षिण दिशा में बांदा-इलाहाबाद मार्ग पर लगभग 6 किमी दूरी पर बड़ोखर खुर्द में बैठे प्रेम सिंह भारतीय जैविक खेती संगठन से जुड़े हैं वे तीस वर्षों से अपने 25 एकड़ खेत में पूरी तरह से जैविक खेती कर रहे हैं।

अपनी सफलता का सूत्र बताते हैं, ”मैं बाजार के लिए खेती नहीं करता। अपने लिए बाग लगाए हैं, अपने लिए पशु पाले हैं, जैविक तरीके से खेती करता हूं। खेतों में पैदा हुए अनाज़ को सीधे बेचने की बजाय उसके प्रोडक्ट बनाकर बेचता हूं, जैसे गेहूं की दलिया और आटा, जो दिल्ली समेत कई शहरों में ऊंची कीमत पर जाते हैं।”

प्रेम सिंह के इसी फार्मूले की बदौलत अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों से किसान उनके यहां ये सफल फार्मूला सीखने आते हैं। फार्म हाउस की बांस की एक झोपड़ी में बैठे प्रेम सिंह बताते हैं, “जब आप समाधान की बात करते हैं, और उसके लिए प्रयास करते हैं, तो उसकी ख्याति दूर तक जाती है। दुनिया में बहुत से किसान हैं जो मेरी तरह मुनाफे और सेहतमंद खेती करना चाहते थे, लेकिन वो कर नहीं पाते। जब उन्हें पता चलता है कहीं इसका सफल प्रयोग हो रहा है, तो वो खुद चले आते हैं, मेरे यहां आने वाले किसान और विदेशी उसी का हिस्सा है।”

अपनी बात को जारी रखते हुए वो बताते हैं, “मेरे यहां हर साल में 3000-4000 किसान आते हैं, जिसनें कृषि में शोध करने वाले छात्र, प्रगतिशील किसान, कृषि के जानकार होते हैं। अब तक अमेरिका, फ्रांस समेत 18 देशों के किसान और रिसर्चर, पर्यावरण प्रेमी भी बड़ोखर खुर्द आ चुके हैं। अभी फिलहाल ऑस्ट्रेलिया की उल्लरिके आई हैं, जो कृषि की जानकार हैं और मध्यप्रदेश के आदिवासी इलाकों में एक स्कूल खोलना चाहती हैं, जहां कक्षा छह से ही छात्रों को खेती सिखाई जाएगी।”

ग्रामोदय विश्वविद्यालय चित्रकूट, जनपद सतना (म.प्र.) से एमआरडीएम के फाउंडर छात्र रहे प्रेम सिंह की बदौलत उनके जिले के तमाम किसानों ने बागवानी शुरू की है। खुद उनके गाँव के 28 फीसदी क्षेत्रफल पर में बाग लगे हैं। दूसरे तमाम किसानों के लिए प्रेरणस्त्रोत बने प्रेम सिंह बुंदेलखंड समेत देश के दूसरे किसानों की दशा के लिए सरकार को जिम्मेदार मानते हैं।

नाराजगी के साथ वो कहते हैं, ”मेरे मॉडल से किसान प्रभावित हुए, उन्होंने तरीके अपनाएं भी लेकिन सरकार पर असर नहीं पड़ा। अगर नीतिगत स्तर पर ऐसे कृषि व्यवस्था शुरू की जाए तो बुंदेलखंड देश के करोड़ों की हालत सुधर सकती है। लेकिन देश में किसानी की बात होती है, कोई किसान की बात नहीं करना चाहता है। देश के सभी कृषि विश्वविद्यालय और अनुसंधान

संस्थान किसानी की नई तकनीकें विकसित कर रहे हैं, लेकिन किसान दिनों दिन निराशा के गर्त में जा रहा है। इसीलिए मैंने किसानों के हित में सोचने वाले कुछ साथियों और बेल्जियम के एक साथी की मदद से “ह्मेन एग्रेयिशन सेंटक, किसान विद्यापीठ” भी खोला है, जहां किसानों को स्वावलंबी, समृद्धि और आत्मनिर्भर बनाने के तरीकों पक काम होता है।”

दोगुनी कमाई करने के लिए ऐसे करें मिर्च की उन्नत खेती

मिर्च भारत के अनेक राज्यों में पहाड़ी व मैदानी क्षेत्रों में फल के लिए उगायी जाती है।  मिर्चों में तीखापन या तेज़ी ओलियोरेजिल कैप्सिसिन नामक एक उड़नशील एल्केलॉइड के कारण तथा उग्रता कैप्साइसिन नामक एक रवेदार उग्र पदार्थ के कारण होती है।  भारत में मिर्च का प्रयोग हरी मिर्च की तरह एवं मसाले के रूप में किया जाता है।  इसे सब्जियों और चटनियों में डाला जाता है।

मिर्च के सुखाए हुए फलों में 0.16 से 0.39 प्रतिशत तक था सूखे बीजों में 26.1 प्रतिशत तेल पाया जाता है।  बाजार में आमतौर पर मिलने वाली मिर्चो में कैप्सीसिन की केवल 0.1 प्रतिशत मात्रा पायी जाती है।  मिर्च में अनेक औषधीय गुण भी होते हैं।  एक एस्कार्बिक अम्ल, विटामिन-सी की धनी होती है।

दोगुनी कमाई

हरी मिर्च की खेती से किसान लागत की तुलना में दोगुनी कमाई कर सकते हैं। शर्त यह है कि वे कृषि जलवायु क्षेत्र के अनुसार उन्नत प्रजातियों का प्रयोग करने के साथ ही फसल सुरक्षा के उचित उपाय करें।

फैजाबाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय से संबद्ध कृषि विज्ञान केंद्र बेलीपार के सब्जी वैज्ञानिक डा.एसपी सिंह के अनुसार प्रति एकड़ खेती की लागत करीब 35-40 हजार रुपये आती है। इतने रकबे में करीब 60 क्विंटल तक उपज संभव है। बाजार में यह 20 रुपये प्रति किग्रा के भाव से भी बिके, तो भी किसान को करीब एक लाख 20 हजार रुपये मिलेंगे। 40 हजार की लागत निकालने के बाद भी करीब दो गुने का लाभ होगा

जलवायु

मिर्च गर्म और आर्द्र जलवायु में भली-भाँति उगती है।  लेकिन फलों के पकते समय शुष्क मौसम का होना आवश्यक है।  गर्म मौसम की फ़सल होने के कारण इसे उस समय तक नहीं उगाया जा सकता, जब तक कि मिट्टी का तापमान बढ़ न गया हो और पाले का प्रकोप टल न गया हो।  बीजों का अच्छा अंकुरण 18-30 डि सें. ग्रे. तापामन पर होता है।

यदि फूलते समय और फल बनते समय भूमि में नमी की कमी हो जाती है, तो फलियाँ, फल व छोटे फल गिरने लगते हैं।  मिर्च के फूल व फल आने के लिए सबसे उपयुक्त तापमान 25-30 डि सें. ग्रे. है. तेज़  मिर्च अपेक्षाकृत अधिक गर्मी सह लेती है।  फूलते समय ओस गिरना या तेज़  वर्षा होना फ़सल के लिए नुकसानदाई होता है।  क्योंकि इसके कारण फूल व छोटे फल टूट कर गिर जाते हैं |

क़िस्में

पूसा ज्वाला : इसके पौधे छोटे आकार के और पत्तियॉ चौड़ी होती हैं।  फल 9-10 सें०मी० लम्बे ,पतले, हल्के हरे रंग के होते हैं जो पकने पर हल्के लाल हो जाते हैं।  इसकी औसम उपज 75-80 क्विंटल  प्रति  हेक्टेअर , हरी मिर्च के लिए तथा 18-20 क्विंटल  प्रति  हेक्टेअर सूखी मिर्च के लिए होती है।

पूसा सदाबाहर : इस क़िस्म के पौधे सीधे व लम्बे ; 60 – 80 सें०मी० होते हैं।  फल 6-8 सें मी. लम्बे, गुच्छों में , 6-14 फल  प्रति  गुच्छा में आते हैं तथा सीधे ऊपर की ओर लगते हैं पके हुए फल चमकदार लाल रंग ले लेते है।  औसत पैदावार 90-100 क्विंटल, हरी मिर्च के लिए तथा 20 क्विंटल प्रति  हेक्टेअर , सूखी मिर्च के लिए होती है।  यह क़िस्म मरोडिया, लीफ कर्लद्ध और मौजेक रोगों के लिए प्रतिरोधी है।

नर्सरी प्रबन्ध

नर्सरी बैंगन व टमाटर की तरह ही तैयारी की जाती है नर्सरी के लिए मिट्टी हल्की , भुरभुरी व पानी को जल्दी सोखने वाली होनी चाहिए।  पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्वों का होना भी जरूरी है।  नर्सरी में पर्याप्त मात्रा में धूप का आना भी जरूरी है।  नर्सरी को पाले से बचाने के लिए , नवम्बर-दिसम्बर बुआई में पानी का अच्छा प्रबन्ध होना चाहिए ।  नर्सरी की लम्बाई 10-15 फुट तथा चौड़ाई 2.3-3 फुट से अधिक नहीं होनी चाहिए क्योंकि निराई व अन्य कार्ये में कठिनाई आती है।  नर्सरी की उंचाई 6 इंच या आधा फीट रखनी चाहिए।  बीज की बुआई कतारों में करें।  कतारों का फासला 5-7 सें०मी० रखा जाता है।  पौध लगभग 6 सप्ताह में तैयार हो जाती है।

मृदा एवं खेती की तैयारी

मिर्च यद्यपि अनेक प्रकार की मिट्टियों में उगाई जा सकती है, तो भी अच्छी जल निकास व्यवस्था वाली कार्बनिक तत्वों से युक्त दुमट मिट्टियाँ इसके लिए सर्वेतम होती हैं। जहाँ फ़सल काल छोटा है, वहां बलुई तथा बलुई दोमट मिट्टयों को प्राथमिकता दी जाती है।  बरसाती फ़सल भारी तथा अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी में बोई जानी चाहिए।

जमीन पांच-छः बार जोत कर व पाटा फेर कर समतल कर ली जाती है।  गोबर की सड़ी हुई खाद 300-400 क्विंटल, जुताई के समय मिला देनी चाहिए।  खेती की ऊपरी मिट्टी को महीन और समतल कर लिया जाना चाहिए तथा उचित आकार की क्यारियां बना लेते हैं।

बीज-दर

एक से डेढ़ किलोग्राम अच्छी मिर्च का बीज लगभग एक हेक्टेअर में रोपने लायक पर्याप्त पौध बनाने के लिए काफ़ी होता है।

निराई-गुड़ाई

पौधों की वृद्धि की आरम्भिक अवस्था में खरपतवारो पर नियंत्रण पाने के लिए दो तीन बाद निराई करना आवश्य होता है।  पौध रोपण के दो या तीन सप्ताह बाद मिट्टी चढाई जा सकती है।

सिंचाई

पहली सिंचाई पौध प्रतिरोपण के तुरन्त बाद की जाती है।  बाद में गर्म मौसम में हर पाँच-सात दिन तथा सर्दी में 10-12 दिनों के अन्तर पर फ़सल को सींचा जाता है।

बुआई

मैदानी और पहाड़ी ,दोनो ही इलाकों में मिर्च बोने के लिए सर्वोतम समय अप्रैल-जून तक का होता है।  बडे फलों वाली क़िस्में मैदानी में अगस्त से सितम्बर तक या उससे पूर्व जून-जुलाई में भी बोई जा सकती है।  पहाडों में इसे अप्रैल से मई के अन्त तक बोया जा सकता है।

उत्तर भारत में जहां सिंचाई की सुविधाएं उपलब्ध हैं, मिर्च का बीज मानसून आने से लगभग 6 सप्ताह पूर्व बोया जता है और मानसून आने के साथ-साथ इसकी पौध खेतों में प्रतिरोपित कर दी जाती है।  इसके अलावा दूसरी फ़सल के लिए बुआई जाता नवम्बर-दिसम्बर में की जाती है और फ़सल मार्च से मई तक ली जाती है।

खाद एवं उर्वरक

गोबर की सड़ी हुई खाद लगभग 300-400 क्विंटल जुताई के समय गोबर मृदा में मिला देना चाहिए रोपाई से पहले 150 किलोग्राम यूरिया ,175 किलोग्राम सिंगल सुपर फ़ॉस्फ़ेट तथा 100 किलोग्राम म्यूरिएट ऑफ पोटाश तथा 150 किलोग्राम यूरिया बाद में लगाने की सिफारिश की जाती है।  यूरिया उर्वरक फूल आने से पहले अवश्य दे देना चाहिए।

पौध संरक्षण

आर्द्रगलन रोग  यह रोग ज्यादातर नर्सरी की पौध में आता है।  इस रोग में सतह , ज़मीन के पास द्धसे हुआ तना गलने लगता है तथा पौध मर जाती है।  इस रोग से बचाने के लिए बुआई से पहले बीज का उपचार फफंदूनाशक दवा कैप्टान 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से करना चाहिए।  इसके अलावा कैप्टान 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर सप्ताह में एक बार नर्सरी में छिड़काव किया जाना चाहिए।

एन्थ्रेक्नोज रोग  इस रोग में पत्तियों और फलों में विशेष आकार के गहरे, भूरे और काले रंग के घब्बे पड़ते है।  इसके प्रभाव से पैदावार बहुत घट जाती है इसके बचाव के लिए वीर एम-45 या बाविस्टन नामक दवा 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव  करना चाहिए।

मरोडिया लीफ कर्ल रोग  यह मिर्च की एक भंयकर बीमारी है।  यह रोग बरसात की फ़सल में ज्यादातर आता है।  शुरू में पत्ते मुरझा जाते है।  एवं वृद्धि रुक जाती है।  अगर इसके समय रहते नहीं नियंत्रण किया गया हो तो ये पैदावार को भारी नकुसान पहुँचाता है।  यह एक विषाणु रोग है जिसका कोई दवा द्धारा नित्रंयण नहीं किया जा सकता है।

यह रोग विषाणु, सफेद मक्खी से फैलता है।  अतः इसका नियंत्रण भी सफेद मक्खी से छुटकारा पा कर ही किया जा सकता है।  इसके नियंत्रण के लिए रोगयुक्त पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर दें तथा 15 दिन के अतंराल में कीटनाशक रोगर या मैटासिस्टाक्स 2 मि०ली० प्रति ली की दर से छिड़काव करें।  इस रोग की प्रतिरोधी क़िस्में जैसे-पूसा ज्वाला, पूसा सदाबाहर और पन्त सी-1 को लगाना चाहिए।

मौजेक रोग  इस रोग में हल्के पीले रंग के घब्बे पत्तों पर पड़ जाते है।  बाद में पत्तियाँ पूरी तरह से पीली पड़ जाती है।  तथा वृद्धि रुक जाती है।  यह भी एक विषाणु रोग है जिसका नियंत्रण मरोडिया रोग की तरह ही है।

थ्रिप्स एवं एफिड  ये कीट पत्तियों से रस चूसते है और उपज के लिए हानिकारक होते है।  रोगर या मैटासिस्टाक्स 2 मि. ली.  प्रति ली. पानी में घोल बनाकर छिड़काव करने से इनका नियंत्रण किया जा सकता है।

उपज

सिंचित क्षेत्रों में हरी मिर्च की औसत पैदावार लगभग 80-90 क्विंटल प्रति  हेक्टेअर और सूखें फल की उपज 18-20 क्विंटल प्रति  हेक्टेअर होती है।

ऐसे करे खेती में नई तकनिक प्लास्टिक मल्चिंग का उपयोग, पूरी जानकारी पढ़े।

प्लास्टिक मल्चिंग क्या है।

खेत में लगे पोधों की जमीन को चारों तरफ से प्लास्टिक फिल्म के द्वारा सही तरीके से ढकने की प्रणाली को प्लास्टिक मल्चिंग कहते है। यह फिल्म कई प्रकार और कई रंग में आती है।

इस तकनीक का क्या फ़ायदा होता है।

इस तकनीक से खेत में पानी की नमी को बनाए रखने और वाष्पीकरण रोका जाता है। ये तकनीक खेत में मिटटी के कटाव को भी रोकती है। और खेत में खरपतवार को होने से बचाया जाता है। बाग़वानी में होने वाले खरपतवार नियंत्रण एवं पोधों को लम्बे समय तक सुरक्षित रखने में बहुत सहायक होती है।क्यों की इसमे भूमि के कठोर होने से बचाया जा सकता है और पोधों की जड़ों का विकास अच्छा होता है।

सब्जियों की फसल में इसका प्रयोग कैसे करे।

जिस खेत में सब्जी वाली फसल लगानी है उसे पहले अच्छे से जुताई कर ले फिर उसमे गोबर की खाद् और मिटटी परीक्षण करवा के उचित मात्रा में खाद् दे। फिर खेत में उठी हुई क्यारी बना ले। फिर उनके उपर ड्रिप सिंचाई की पाइप लाइन को बिछा ले।फिर 25 से 30 माइक्रोन प्लास्टिक मल्च फिल्म जो की सब्जियों के लिए बेहतर रहती है उसे उचित तरीके से बिछा दे फिर फिल्म के दोनों किनारों को मिटटी की परत से दबा दिया जाता हे। इसे आप ट्रैक्टर चालित यंत्र से भी दबा सकते है। फिर उस फिल्म पर गोलाई में पाइप से पोधों से पोधों की दूरी तय कर के छिद्र कर ले। किये हुए छेदों में बीज या नर्सरी में तैयार पोधों का रोपण कर ले।

फल वाली फसल में इसका प्रयोग।

फलदार पोधों के लिए इसका उपयोग जहाँ तक उस पौधे की छाँव रहती है। वाह तक करना उचित रहता है।इसके लिये फिल्म मल्च की लम्बाई और चौड़ाई को बराबर कर के कटिंग करे।उसके बाद पोधों के नीचे उग रही घास और खरपतवार को अच्छी तरह से उखाड़ के सफाई कर ले उसके बाद सिंचाई की नली को सही से सेट करने के बाद 100 माइक्रोन की प्लास्टिक की फिल्म मल्च जो की फल वाले पोधों के लिए उपयुक्त रहती है। उसे हाथों से पौधे के तने के आसपास अच्छे से लगनी है। फिर उसके चारों कोनों को 6 से 8 इंच तक मिटटी की परत से ढँकना है।

खेत में प्लास्टिक मल्चिंग करते समय सावधानियां।

  •  प्लास्टिक फिल्म हमेशा सुबह या शाम के समय लगानी चाहिए।
  •  फिल्म में ज्याद तनाव नही रखना चाहिए।
  •  फिल्म में जो भी सल हो उसे निकलने के बाद ही मिटटी चढ़ा वे।
  •  फिल्म में छेद करते वक्त सावधानी से करे सिंचाई नली का ध्यान रख के।
  •  छेद एक जैसे करे और फिल्म न फटे एस बात का ध्यान रखे।
  • मिटटी चढाने में दोनों साइड एक जेसी रखे
  • फिल्म की घड़ी हमेशा गोलाई में करे
  • फिल्म को फटने से बचाए ताकि उसका उपयोग दूसरी बार भी कर पाए और उपयोग होने के बाद उसे चाव में सुरक्षित रखे।

प्लास्टिक मल्चिंग की लागत कितनी आती है।

मल्चिंग की लागत कम ज्यादा हो सकती हे क्यों की इसका कारण खेत में क्यारी के बनाने के ऊपर होता हे क्यों की अलग अलग फसल के हिसाब से क्यारिया सकड़ी और चौड़ी होती हे और प्लास्टिक फिल्म का बाज़ार में मूल्य भी कम ज्यादा होता रहता है।
प्रति बीघा लगभग 8000 रूपये की लागत हो सकती है और मिटटी चढ़ाने में यदि यंत्रो का प्रयोग करे तो वो ख़र्चा भी होता है।

प्लास्टिक मल्चिग में शासन का अनुदान कितना है।

कृषि को उन्नत करने और इसे बढावा देने लिए मध्यप्रदेश सरकार द्वारा उधानिकी विभाग में इसके लिये समस्त किसानो को 50%या अधिकतम 16000 रूपये प्रति हेक्टेयर के हिसाब से अनुदान उपलब्ध कराया जाता है। इस योजना का लाभ पहले आओ पहले पाओ की तर्ज पर दिया जाता है।इसके अनुदान पाने के लिए आपको अपने जिले के विकास खंड में विरिष्ट उधान विकास अधिकारी को अपने आवेदन जमा करवा सकते हें। और जानकरी आप अपने ग्राम सेवक से भी ले सकते है।

खेती संग पोपलर लगाएं और डबल मुनाफा कमाएं

कृषि वानिकी तकनीक अब तेजी से बढ़ रही है। उत्तर प्रदेश , हरियाणा, पंजाब और हिमाचल प्रदेश के मैदानी भागों में यह तकनीक बहुत तेजी से किसानों में अपनी पैठ जमा रही है। इन इलाकों में पोपलर बहुत ज्यादा पोपुलर हो रहा है। राजस्थान के कुछ इलाकों में भी पोपलर की कतारों के बीच फसलें लहलहाती दिख जाती हैं या फिर फसलों के बीच सिर उठाते पोपलर के पेड़ फसल के प्रहरी बने खड़े नजर आते हैं।

पोपलर जल्दी से बढ़ने वाला वह पेड़ है, जो किसानों को अच्छा मुनाफा देता है। यह जंगलों की कमी को पूरा करता है और लकड़ी उद्योग की मांग को भी पूरा करता है।भारत में पोपलर साल 1950 में अमेरिका से लाया गया था। उत्तर भारत में यह बड़े पैमाने पर उगाया जाता है। यह पेड़ कार्बन डाईआक्साइड गैस को आबोहबा से सोख कर उसे लकड़ी और जैविक पदार्थ को तैयार करने में इस्तेमाल करता है।

पोपलुर के फायदेः

तेजी से बढ़ने की वजह से पोपुलर 5 से 8 साल में 90 से सौ सेंटीमीटर मोटा हो कर तकरीबन 2 सौ घनमीटर प्रति हेक्टेयर लकड़ी तैयार करता है। इस के अलावा यह उन नर्सरियों के लिए वरदान साबित हुआ है, जिन में बीज से फूल या सब्जी वाली पौध तैयार की जाती है और जहां ज्यादा गरमी में पौध के झुलसने का खतरा बना रहता है। यह पेड़ ओले, तेज बूंदों और आंधी से होने वाले नुकसान से भी फसल को बचाता है।

पोपलर की 1 साल पुरानी पौध तकरीबन 3 से 5 मीटर लंबी हो जाती है, जो बाजार में 15 से 20 रुपए में आसानी से बेची जा सकती है। 1 पेड़ के लट्ठे या लकड़ी 8 सौ से 24 सौ रुपए तक में बिकती है। किसान 1 हेक्टेयर पोपलर से साढ़े 5 से 9 लाख रुपए की कमाई कर सकते हैं और दूसरी फसलों से कमाई कर सकते हैं।

हरे चारे की कमी के समय पोपलर की पत्तियां गाय-भैंसों को सूखे चारे के साथ दी जा सकती हैं। भेड़-बकरियों को आधा किलो पोपलर रोजाना खिलान से खनिज प्रोटीन और विटामिन मिल जाते हैं।
पोपलुर की लकड़ी पैकिंग पेटी, कागज माचिस, खेल का सामान और फर्नीचर वगैरह बनाने में इस्तमाल होती है।

पौध और किस्मः

उत्तर भारत को आबोहवा के लिए जी-3, जी-4बी, एल-34, एस-7, सी-15, उदय क्रांति और बहार पोपलर की अच्छी किस्में हैं। डी-61, डी-66, एस-7सी8, एस-7सी 15, एस-7सी 4, एस 7 सी सी 20 एल-49, एल-247, एल-154 और एल-143 ऐसी किस्में हैं, जो फसलों के बढ़ने और पैदावार पर कम असर डालती हैं।

किसान इन किस्मों को कृषि विश्वविद्यालय, वन विभाग या प्राइवेट नर्सरियों से खरीद कर लगा सकते हैं या अपनी नर्सरी भी तैयार कर सकते हैं।

 

नर्सरी तैयार करनाः

पोपलर की नर्सरी भुरभुरी, रेतीली और उपजाऊ मिट्टी में बनाएं, इस की पौध कटिंग से तैयार की जाती है। अच्छी पौध के लिए 1-2 साल के पौधे से कटिंग करें। कटिंग में 3-4 आंखें हों, जिन की लंबाई 18-20 सेंटीमीटर और मोटाई 2-3 सेंटीमीटर हो। यह कटिंग जनवरी महीने में कर सकते हैं। कटिंग के बाद उन कलमांं को 24 घंटे के लिए पानी में भिगो कर रखें।

कलम कटिंग करने के साथ हम क्यारी भी तैयार करते हैं। क्यारी का साइज 15-5 मीटर होना चाहिए। क्यारी में कटिंग को मिट्टी में खड़ा कर के 50ग50 सेंटीमीटर की दूरी पर लगा देना चाहिए। इस साइज में 1 हेक्टेयर रकबे में 96 क्यारियां तैयार हो जाती हैं और हर क्यारी में 30 कटिंग लग जाती हैं। इस तरह 1 हेक्टेयर खेत में 28 हजार 8 सौ कटिंग लग जाती है।

रोपाईः

नर्सरी में उगने वाला पौधा 1 साल बाद खेत में रोपने के लिए तैयार हो जाता है। पौधे लगाने के लिए गड्ढे 4×4 या 3×3 मीटर की दूरी पर 90 सेंटीमीटर गहरे और 15 सेंटीमीटर चौड़े खोदने चाहिए।

गड्ढे से निकली मिट्टी में 2-3 किलो गोबर की खाद, 50 ग्राम डीएपी और 25 ग्राम म्यूरेट आफ पोटाश मिला कर मिट्टी तैयार कर लें, अगर मिट्टी में जिंक की कमी हो, तो 1 गड्ढे में 15-20 ग्राम जिंक सल्फेट और 10 ग्राम एल्डेक्स पाउडर मिलाएं।

पौधे को गड्ढे में सीधा खड़ा कर मिट्टी को इस तरह भरें कि गड्ढा ऊपर से 6 इंच खाली रहे। पौधे लगाने का समय जनवरी फरवरी होता है। इस के बाद हर 15 दिनांं पर सिंचाईं करते रहें। मानसून आने से पहले तक सिंचाई करना जरूरी होता है।

देखभालः

पोपलर की पहले साल हर 15 दिनों बाद नीचे से 3 मीटर तक आंखें तोड़तें रहें, दूसरे व तीसरे साल जनवरी में जो टहनियां बीच वाली टहनी के साथ-साथ चल रहीं हो या दूसरी टहनियों में उलझ रहीं हों, उन्हें निकाल दें, चौथे साल मई व अगस्त में 2 बार निराई करें, इस के बाद पांचवे और छठे साल नीचे के एक तिहाई व आधे हिस्से से टहनियां छांट दें|

कृषि वानिकीः

पोपलर की यह खासियत है कि यह पौधा पतझड़ होने पर दिसंबर से मार्च-अप्रैल के महीनां तक पत्तियां को गिरा देता है। नंगा पेड़ खेत में खड़ा रहता है। इसलिए गेहूं, जौ, जई, बरसीम, मटर, आलू, सरसों, गोभी, टमाटर, बैंगन या मिर्च वगैरह की फसलें पोपलर के नीचे आसानी से उगाई जा सकती हैं।

खरीफ की फसलों में मक्का, ज्वार, अरहर, उड़द, मूंग और सूरजमुखी शुरू के 3 सालों तक आसानी से उगाई जा सकती है। जायद में लौकी, टिंडा, टमाटर, खीरा, ककड़ी, और खरबूजे की खेती की जा सकती है। 4-5 साल पुराने पापुलर के नीचे हल्दी, अदरक, पुदीना और छाया में पनपने वाली फसलें उगा सकते हैं।

पांचवी पास महिला आज करती हैं 56 हजार लीटर दूध का कारोबार

हमारे आस-पास कई ऐसे लोग हैं, जिन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि कामयाबी के लिए बड़ी डिग्रियों की जरूरत नहीं होती। जरूरत होती है, तो सिर्फ लगन और सच्ची मेहनत की। आज हम आपको एक ऐसी महिला की कहानी बताने जा रहे हैं, जो गाँव में रहने के बाद भी बाकी महिलाओं के लिए मिसाल बन चुकी हैं। लखनऊ की बिटाना देवी ने सीमित संसाधन में अपनी कामयाबी की जो कहानी लिखी है वह सच में बेहद प्रेरणादायक है।

बिटाना की शादी सिर्फ 15 साल की उम्र में ही हो गयी थी, शिक्षा के नाम पर उनके पास सिर्फ पिता का आर्शीवाद था। शादी में पिता से भेंट स्वरुप मिले एक गाय और एक भैंस ही उनकी कमाई का एकमात्र जरिया था। अपनी गायों और बछड़ों को बच्चों जैसा प्यार देकर बिटाना आज एक सफल डेयरी फर्म की संचालिका हैं।

गांव में रहने वाली औरतों को लोग अक्सर असहाय समझते हैं। परन्तु पांचवी पास बिटाना देवी ने इस मिथ को गलत ठहरा दिया। उन्होंने महिला सशक्तिकरण की एक नई परिभाषा गढ़ते हुए दूसरी ग्रामीण महिलाओं को भी नई राह दिखाई है। निगोहां के मीरकनगर गांव से ताल्लुकात रखने वाली बिटाना ने अपने पिता के भेंट स्वरुप दिए गाय और भैंस का दूध बेचना प्रारंभ किया।

गाय और भैंस का दूध बेंचकर उसने एक गाय खरीद ली। सीमित संसाधनों के बीच दूध बेचकर अर्जित कमाई से वो निरंतर दुधारू मवेशियों की संख्या बढ़ाती चलीं गईं। साल 1996 में उन्होंने दुग्ध उत्पादन का व्यवसाय शुरू किया। धीरे-धीरे उन्होंने इस कारोबार में एक वर्चस्व स्थापित किया और 2005 से लगातार 10 बार सर्वाधिक दुग्ध उत्पादन के लिए गोकुल पुरूस्कार भी जीत रहीं।

अपने घर का खर्च भी वो अपने कमाए हुए पैसे से ही चलाती है। इन्हें देखकर और भी महिलाएं प्रेरित हुई और दुग्ध उत्पादन का व्यवसाय शुरू किया। इस समय बिटाना के पास 40 दुधारू पशु हैं। बिटाना रोज सुबह 5 बजे उठकर जानवरों को चारा पानी देती है, उनका दूध निकालती हैं और डेरी तक दूध पहुँचाने का काम भी वह स्वयं करती हैं।

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि इन्होंने साल 2014-2015 में कुल 56,567 लीटर दूध का उत्पादन किया। धीरे-धीरे बिटाना ने इसे व्यापार बना लिया, लगभग 155 लीटर दूध रोजाना पराग डेयरी को सप्लाई करती हैं। वर्तमान में उनके फार्म से रोजाना 188 लीटर दूध का उत्पादन होता है। उनके प्रयासों को देखते उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें गोकुल पुरस्कार से भी सम्मानित किया है। बिटाना बताती हैं कि औपचारिक रूप से उन्होंने साल 1985 से इस काम की शुरूआत की थी।

दरअसल आज लाखों का कारोबार करने वाली बिटाना को शुरुआती समय में आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा था लेकिन उन्होंने कठिन मेहनत के दम पर परिस्थितियों को बदल कर रख दिया और एक सफल उद्यमी के रूप में हमारे सामने खड़ी हैं।

News Source- hindi.kenfolios.com

क्यों किया जा रहा है गाय के पेट में सुराख ?

गाय की सर्जरी कर उसके पेट में सुराख किया जाता है। इस सुराख को एक प्लास्टिक की रिंग द्वारा बंद किया जाता है। इसमें एक ढक्कन का प्रयोग भी होता है, जो इस छेद को बंद करने के काम आता है। इस सर्जरी के बाद गाय को सामान्य स्थिति में लौटने के लिए महीने भर का समय लगता है।

इन गायों को fistulated गाय कहा जाता है। इनके पेट में जो माइक्रोब्स होते हैं, उन्हें किसी अन्य जानवर में ट्रान्सफर किया जा सकता है। लेकिन आखिर ऐसा करने की वजह क्या है, आइए जानते हैं?

सबसे हैरानी वाली बात यह है कि गाय इस पर बिलकुल सामान्य रहती है। विचलित नहीं होती। यदि उसके पेट में कोई बैक्टीरिया है भी तो इस छेद द्वारा उसका आसानी से पता लगाया जा सकता है।

छेद करने का मुख्य कारण यह है कि वैज्ञानिकों को इस छेद द्वारा जांच में सहायता मिलती है। वे गाय के अंदरूनी हिस्से की जांच आसानी से कर सकते हैं। जबकि पहले ये बहुत कठिन हुआ करता था। और भी हैं कई फायदे, आइये जानते हैं।

गाय के लिए उचित भोजन की जानकारी के लिए यह छेद सहायक है। इस छेद द्वारा यह देखा जाता है कि गाय को कौन-सा खाना पच रहा है और कौन सा उसके लिए हानिकारक है। इसके बाद गाय पूरी तरह से स्वस्थ हो जाती है।

इस छेद का एक सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि गाय को होने वाली बीमारियों का सटीकता के साथ पता चल जाता है। इस छेद की सहायता से गाय के स्वास्थ्य की जानकारी भी आसानी से हो जाती है।

गाय के पेट का निरिक्षण कर सीधे पेट में दवाई भी दी जा सकती है। यहाँ तक कि गाय के पेट में हाथ डालकर उसे वेटरनरी डॉक्टर खुद साफ भी कर लेते हैं।

आप शायद हैरान होंगे लेकिन यह छेद गाय की उम्र बढ़ाने में सहायक नज़र आ रहा है। कुछ लोग इसे गाय के साथ क्रूरता का नाम दे रहे हैं, जिससे लड़ने का कोई क़ानून नहीं है।

आलोचकों का कहना है कि गाय के पेट का एक हिस्सा काटकर अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है। साथ ही यह खेती के काम आने वाला जीव है, इस वजह से इस पर आविष्कार का कानूनी विरोध नहीं किया जा रहा है, जो कि पूर्ण रूप से गलत है।

इस पद्धति का इस्तेमाल केवल अमेरिका में ही किया जाता है। इसे भारत में अभी नहीं लाया गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस पद्धति से कई सकारात्मक चीजें सामने आई हैं।

इस तकनीक से गेहूं बोने पर कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी बेमौसम बारिश

खेती में पहली बार ये सिद्ध हुआ है कि ज़ीरो टिलेज तकनीक से गेहूं की बुआई करने पर उत्पादन बढ़ जाता है। ये तरीका खासतौर पर मौसम के बदलावों और अनियमितताओं से लड़ रहे छोटे किसानों के खेती में अच्छे भविष्य के लिए एक सशक्त विकल्प हो सकता है।

ज़ीरो टिलेज तकनीक में किसान धान की कटाई के बाद बिना खेत से खरपतवार हटाए और बिना जुताई किये सीधे नई फसल के बीज बो देता है।

इस तरीके की पुष्टि हरियाणा के करनाल में 200 छोटे-मंझोले किसानों के साथ खेती के शोध के बाद की गई। इन 200 किसानों ने ज़ीरो टिलेज तकनीक से खेती करके ये पाया कि पहले पारम्परिक तकनीक के मुकाबले गेंहू की उपज औसतन 16 प्रतिशत ज़्यादा हुई। इस तकनीक का दूसरा फायदा ये पाया गया कि मौसम की अनियमितताओं के चलते दिसम्बर-फरवरी के दौरान की बेमौसम बारिश की स्थिति में भी गेहूं खराब नहीं हुए।

पारंपरिक तरीके से गेंहू की खेती किसानों के लिए एक खर्चीला व्यवसाय बन चुका है। पारम्परिक तरीके से खेती का मतलब ये हुआ कि किसान धान की फसल हटने के बाद पहले मजदूर लगाकर खरपतवार खेत से हटाएं, फिर दो-तीन पर ट्रैक्टर किराए पर लेकर पूरे खेत की जुताई करें। फिर अकेले या मजदूरों के माध्यम से छिड़काव करके बीज की बुआई होती है। इन प्रक्रियाओं के बाद एक राउंड रोटरी से फिर जुताई करनी पड़ती है।

बेमौसम बारिश से नहीं पड़ेगा गेहूं को फर्क

ज़ीरो टिलेज तकनीक से गेहूं की खेती करने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें बेमौसम बारिश से फसल बर्बाद नहीं होती। हाल के कुछ वर्षों में विश्व भर के मौसम में आ रहे बदलावों का असर भारत की खेती पर भी पड़ा है। लगातार कुछ वर्षों से जनवरी से मार्च के दौरान होने वाली बारिश से देश की रबी की फसल में काफी नुकसान देखा गया है। लेकिन नई तकनीक गेहूं की फसल बर्बाद होने का ख़तरा कम हो जाता है।

‘पारम्परिक तरीके से बोए गए गेहूं के बीज तेज़ बारिश से पानी भर जाने पर खराब हो जाते हैं,” करनाल में हुई रिसर्च के मुखिया जीतेंद्र प्रकाश आर्यल ने बताया। जीतेंद्र की रिसर्च को गेहूं पर शोध करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था सीमिट ने अपनी पत्रिका में प्रकाशित किया है।

जीतेंद्र ने बताया कि ज़ीरों टिलेज तकनीक में होता यह है कि गेहूं को बिना जुताई सीधे धान के खरपतवार के साथ एक निश्चित गहराई पर बो दिया जाता है। बुवाई में खास तरह की मशीन का इस्तेमाल होता है। धान के खरपतवार बारिश होन की स्थिति में न सिर्फ बीजों की रक्षा करते हैं बल्कि पानी तेजी से सोखकर फसल को बचाते हैं।

विश्व की बड़ी आबादी को रोज़गार देने वाले गेहूं के लिए ज़रूरी है ये नई तकनीक

भारत में लगभग तीन करोड़ हेक्टेयर में गेहूं की खेती की जाती है। एशिया महाद्वीप के दक्षिणी भाग में गेहूं करोड़ों लोगों को रोज़ाना खाना उपलब्ध कराने के लिए ज़रूरी फसल है। इस फसल पर करोड़ों किसानों की कमाई भी निर्भर है।

इतनी ज़रूरी फसल को मौसम के बदलावों से बचाने की बहुत ज़रूरत है। शोध में प्रकाशित जानकारी के अनुसार एशिया महाद्वीप के दक्षिणी हिस्से में तापमान में वृद्धि हो रही है और बेमौसम बारिश स्थिति और खराब बना रही है।

गेहूं जैसी फसल पर रात के तापमान में एक डिग्री सेल्सियस का अंतर भी उपज में 6 प्रतिशत तक प्रभाव डालता है। ऐसे में गेहूं की फसल को मौसम के बदलावों से बचाने के लिए इस तरह की नई तकनीकों को अपनाना किसानों के लिए ज़रूरी होता जा रहा है।इस मशीन की कीमत 35000 से शुरू हो जाती है यह मशीन बहुत आम है इस लिए आप इस मशीन को कहीं से भी खरीद सकते है ।

यह मशीन कैसे काम करती है उसके लिए वीडियो देखें

अच्छी आमदनी के लिए नवंबर में ऐसे करें अजवाइन की उन्नत खेती

यह धनिया कुल (आबेलीफेरा) की एक महत्वपूर्ण मसाला फसल है। इसका वानस्पतिक नाम टेकिस्पर्मम एम्मी है तथा अंग्रेजी में यह बिशप्स वीड के नाम से जाना जाता है। अजवाइन के पौधे के प्रत्येक भाग को औषधी के रूप में काम में लाया जाता हैं।

अजवाइन पेट के वायुविकार, पेचिस, बदहजमी, हैजा, कफ, ऐंठन जैसी समस्याओं और सर्दी जुखाम आदि के लिए काम में लिया जाता हैं, तथा गले में खराबी, आवाज फटने, कान दर्द, चर्म रोग, दमा आदि रोगों की औषधी बनाने के काम में लिया जाता हैं।

जलवायु

उत्तरी अमेरिका, मिस्त्र ईरान, अफगानिस्तान तथा भारत में महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, मध्य्प्रदेश, उत्तरप्रदेश, पंजाब, तमिलनाडु, बिहार, आंध्रप्रदेश तथा राजस्थान के कुछ हिसों में अजवाइन की व्यावसायिक खेती की जाती हैं। अजवाइन की बुवाई के समय मौसम शुष्क होना चाहिए। अत्यधिक गर्म एवं ठंडा मौसम इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं होता हैं। अजवाइन पाले को कुछ स्तर तक सहन कर सकती हैं।

अजवाइन की उन्नत खेती

राजस्थान राज्य में इसकी खेती 15483 हेक्टेयर क्षेत्र में की जाती हैं जिससे 5450 टन उत्पादन एवं 352 की.ग्रा. प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती हैं (वर्ष 2009-10 के अनुसार)। इसकी खेती मुख्यतः चित्तौडगढ, उदयपुर, झालावाड़, राजसमंद, भीलवाड़ा एवं कोटा में की जाती हैं।

अजवाइन कम लागत की मसाला फसल हैं तथा इसका उत्पादन बढ़ाने के लिए यदि उन्नत तकनीकी से खेती की जाये तो इसके उत्पादन एवं गुणवत्ता दोनों में वृद्धि की जा सकती हैं। इसके लिए ध्यान देने योग्य बिंदुओं का विवरण इस प्रकार से हैं:-

उन्नत किस्में

  • लाम सलेक्शन-1 – 135 से 145 दिन में पक कर तैयार होने वाली इस किस्म की औसत उपज 8-9 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती हैं।
  • लाम सलेक्शन-2 -इसके पौधे झाड़ीदार होते हैं इसकी औसत उपज 10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती हैं।
  • आर.ए. 1-80 -यह किस्म 170-180 दिन में पककर तैयार हो जाती हैं। दाने बारीक़ परन्तु अधिक सुगंधित होते हैं इसमें 10-11 क्विंटल/हेक्टेयर तक उपज प्राप्त होती हैं। इस किस्म पर सफेद चूर्णिल आसिता रोग का प्रकोप अधिक रहता हैं।

भूमि

अजवाइन एक रबी की मसाला फसल हैं। इसकी खेती के लिए अच्छे जल निकास वाली दोमट मिटटी सर्वोत्तम होती हैं। सामान्यतः बलुई दोमट मिटटी जिसका पि.एच. मान 6.5 से 8.2 तक है, में अजवाइन सफलतापूर्वक उगाई जा सकती हैं। जहां भूमि में नमी कम हो वहां सिंचाई की व्यवस्था आवश्यक हैं।

खेती की तैयारी

खेत तैयार करने के लिए मिटटी पलटने वाले हल से जुताई करें तथा इसके बाद 2 जुताई देशी हल से कर खेत को भली-भांति तैयार करें। अजवाइन का बीज बारीक़ होता हैं। अतः खेत की मिट्टी को अच्छी तरह भरभूरा होने तक जुताई करें।

खाद एवं उर्वरक

अजवाइन की भरपूर पैदावार लेने के लिए 15-20 दिन पूर्व 20-25 टन सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट प्रति हेक्टेयर की दर से अच्छी तरह मिलाए। उर्वरक के रूप में इस फसल को 20 किग्रा. नत्रजन, 30 किग्रा फास्फोरस एवं 20 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से देवें। फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा एवं नत्रजन की आधी मात्रा बुवाई से पूर्व खेत में डाल देवें। नत्रजन की शेष आधी मात्रा बुवाई के लगभग 25-30 दिन बाद खड़ी फसल में देवें।

बीज दर एवं बुवाई

अजवाइन की बुवाई का उचित समय सितम्बर से नवम्बर होता है। इसे छिड़काव या क़तर विधि से बोया जाता है। एक हेक्टेयर के लिए 4-5 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। छिड़काव विधि के लिए बीजों को इसकी बीज दर से आठ से दस गुना बारीक छनि हुई मिट्टी के साथ मिलाकर बुवाई करे इससे बीज दर सही रखने में मदद मिलती है। कतारों में बुवाई करना ज्यादा उपयुक्त है। इस विधि में कतार से कतार की दुरी 30-40 से.मी. तथा पौधे से पौधे की दुरी 15-25 से.मी. रखें। इसमें बीजों का अंकुरण 10-15 दिनों में पूर्ण होता है।

सिंचाई एवं निराई-गुड़ाई

अजवाइन की फसल काफी हद तक सूखा सहन कर सकती है। इसका सिंचित और असिंचित दोनों ही परीस्थितियों में उत्पादन किया जा सकता है। सामान्यतया अजवाइन के लिए 2-5 सिंचाई की आवश्यकता होती है। जब पौधे 15-20 से.मी. तक बड़े हो जाये तब पौधों की छंटाई करके पौधे से पौधे की दुरी में पर्याप्त अंतर रखें। फसल में जल निकासी की भी उचित व्यवस्था करे ताकि पौधों को उचित बढ़वार के लिए पर्याप्त स्थान एवं वातावरण मिल सके।

फसल कटाई एवं उपज

कटाई की उपयुक्त अवस्था में फसल पीली पड़ जाती है तथा दाने सुखकर भूरे रंग के हो जाते है। अजवाइन की फसल लगभग 140-150 दिन में पककर तैयार हो जाती है। कटाई पश्चात फसल को खलिहान में सुखावें तथा बाद में गहाई और औसाई की जाय। साफ बीजों को 5-6 दिन सूखा कर बोरों में भर कर भंडारण करे।

 

उपज

सामन्यतः एक हेक्टेयर में अजवाइन की उपज 10-12 क्विंटल तक की पैदावार प्राप्त होती है। अजवाइन बहुउपयोगी होने के साथ विदेशों में विक्रय कर विदेशी मुद्रा कमाने का अच्छा स्रोत है।अजवाइन का एक क्विंटल का भाव 10000 से 12000 होता है जिस से आप को एक हेक्टेयर से एक लाख से ज्यादा की आमदन हो जाती है ।

अगर किसान भाई अजवाइन की खेती संबंधित मुख्य बिंदुओं को ध्यान में रखकर खेती करें तो अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है। साथ ही वह कम लागत में अधिक मुनाफा प्राप्त कर सकते है।

यह है टॉप 5 मिनी ट्रेक्टर जाने कीमत और दूसरी जानकारी

भारत में करीब 85 प्रतिशत परिवार कुल खेती योग्य जमीन के करीब 36 प्रतिशत भाग में खेती करते हैं। छोटे किसानों की औसत जोत एक हेक्टेयर से अधिक की नहीं होती है।

इसलिए औसत किसान के लिए 35 एचपी या इससे अधिक के मानक ट्रैक्टर का इस्तेमाल करते हुए मशीनीकृत खेती करना काफी मुश्किल होता है जिसके कारण खेती में उत्पादकता और खेत की प्रति इकाई उपज प्रभावित होती है।

इस लिए किसानो के लिए 10 से 12 एचपी की क्षमता के ट्रैक्टर ऐसे छोटे और टुकड़ों में बंटे खेतों के लिए उपयुक्त होते हैं । आज हम आपको टॉप ट्रेक्टर कम्पनिओं द्वारा निर्मित कुश मिनी ट्रैक्टरों के बारे में बताएँगे जिसको छोटा किसान आसानी से खरीद सकता है ।

1. स्वराज 717

  • पावर – 17 HP
  • सिलिंडर – 1
  • गेअर – 6 आगे 3 रिवर्स
  • कीमत – 2.50 लाख

2. कप्तान 200DI

  • पावर – 20 HP
  • सिलिंडर – 1
  • गेअर – 8 आगे 2 रिवर्स
  • कीमत – 4 लाख

3. सोनालिका गरडेंटरक 20

 

  • पावर – 20 HP
  • सिलिंडर – 3
  • गेअर – 6 आगे 2 रिवर्स
  • कीमत – 3 लाख

4. महिंद्रा युवराज 215

  • पावर – 15 HP
  • सिलिंडर – 1
  • गेअर – 6 आगे 3 रिवर्स
  • कीमत – 2 लाख

5. EICHER 241 मिनी ट्रेक्टर  

 

  • पावर – 25 HP
  • सिलिंडर – 1
  • गेअर – 5 आगे 1 रिवर्स
  • कीमत – 4.41 लाख

नोट: इन सभी ट्रेक्टर की कीमत की जानकारी इंटरनेट से ली गई है जो आपके इलाके के हिसाब से कम जा ज्यादा हो सकती है