मजदूरी पर होने वाले खर्च को आधा कर देगी यह पावर टिलर मशीन

पावर टिलर खेतीबारी की एक ऐसी मशीन है, जिस का इस्तेमाल खेत की जुताई से ले कर फसल की कटाई तक किया जाता है। इस के इस्तेमाल से खेतीबारी के अनेक काम आसानी से किए जा सकते हैं।

तकनीक

इस मशीन से खरपतवार का निबटान, सिंचाई, फसल की कटाई, मड़ाई और ढुलाई का काम भी लिया जाता है। इस के अलावा इस मशीन का बोआई और उस के बाद के कामों में भी खासा इस्तेमाल होता है।

इस तरह के कामों के लिए पहले कई मजदूर खेत में लगाने पड़ते थे, लेकिन पावर टिलर के प्रयोग से कम लागत और कम समय में सभी काम आसानी से खत्म हो जाते हैं।

आज किसान पावर टिलर के साथ अन्य यंत्रों को जोड़ कर खेती के कई काम आसानी से कर रहे?हैं। यह एक ऐसी खास मशीन है, जिस से अन्य यंत्रों को जोड़ कर खेती के तमाम काम लिए जा सकते हैं।

खासतौर से पहाड़ी इलाकों में खेती के काम के लिए यह मशीन काफी कारगर है।आज अनेक कंपनियां पावर टिलर बना रही?हैं। उन्हीं में से एक इटैलियन पावर टिलर के बारे में जानकारी दी जा रही है :

इटैलियन पावर टिलर

यह बीसीएस इंडिया प्रा। लि। द्वारा बनाया गया पावर टिलर है। इस से खेतों, बागानों व लाइनों में होने वाली फसलों की गुड़ाई आदि की जाती?है। यह पहाड़ी इलाकों में खेतों की जुताई करने वाला खास यंत्र है।

खासीयत : यह काफी हलका और चेनरहित होता है। यह चलने में बेहद आसान है। यह 4 मौडलों (एमसी 720, एमसी 730, एमसी 740, एमसी 750) में उपलब्ध है। इस के 2 मौडल पेट्रोल और डीजल दोनों से चलते हैं।

730 मॉडल की कीमत 165000 के करीब है इसके बाकि मॉडल की कीमत मॉडल के हिसाब से कम जा ज्यादा हो सकती है । इसके इलावा अगर आप किसी इंडियन कंपनी का बना हुआ मॉडल लेंगे तो उसकी कीमत और भी कम होगी ।

बीसीएस पावर टिलर की  अधिक जानकारी के लिए फोन नंबर : 0161-2848597 और मोबाइल नंबरों 08427755743 व 08427800753 पर बात कर सकते हैं।

यह पावर टिलर कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो भी देखें

अपनी गिरवी जमीन को ही कांट्रैक्‍ट पर लेकर बन गया लखपति ये किसान

बिहार के एक छोटे से किसान की कहानी जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे। एक सोच ने उसकी लाइफ बदल दी। अपनी गिरवी जमीन को ही कांट्रैक्‍ट पर लिया और उसमें पपीते की फसल लगा दी। महज 7 महीने में ही न सिर्फ अपनी जमीन मुक्‍त करा ली बल्कि 5 लाख का मुनाफा भी कमया।

भागलपुर जिले के रंगराचैक ब्‍लॉक के गांव चापर निवासी परशुराम दास की आर्थिक स्‍थिति ठीक न होने के कारण उन्‍होंने 10वीं में ही पढ़ाई छोड़ दी थी। जल्‍द शादी हो गई और इसके बाद बच्‍चे। सबका गुजारा करने को केवल 5 बीघा जमीन थी। लेकिन कुछ समय बाद जब गुजारा नहीं चला तो परशुराम को यह जमीन भी गिरवी रखनी पड़ गई।

उसके बाद परशुराम को जब कोई रास्‍ता न सूझा तो पड़ोस के मित्र ने उन्‍हें पपीते की खेती के बारे में बताया। 2011 में परशुराम ने अपनी गिरवी जमीन को ही किराए पर लिया और पपीते की फसल लगा दी।उन्‍होंने कुछ उन्नत किस्म के पपीते जैसे पूसा नन्हा, चड्ढा सिलेक्शन, रेड लेडी व अन्य की खेती शुरू कर दी। पहली बार फसल खराब हो गई मगर उसके बाद बंपर फसल हुई।

पपीते की फसल की उत्‍तम पैदावार के बाद उसकी बिक्री हुई तो परशुराम ने सब खर्च निकालकर जब मुनाफा जोड़ा तो 5 लाख रुपए हुआ। परशुराम ने तत्‍काल अपनी जमीन मुक्‍त कराई। अब परशुराम 5 साल से यही पपीते की खेती कर रहे हैं।

पपीते की फसल को साल में 3 बार फरवरी-मार्च, मानसून सीजन और नवंबर-दिसंबर में लगाया जा सकता है। रोपे जाने के बाद पपीता का पेड़ लगभग 3 से 4 साल तक लगभग 75 से 100 टन प्रति हेक्‍टेयर की पैदावार होती है।भारत के लगभग सभी राज्‍यों में पपीते की फसल होती है और लगभग सभी मंडियों में इसकी मांग है।भारत से हर साल लाखों टन पपीता एक्‍सपोर्ट भी किया जाता है।

सहजन की खेती से 10 महीने में कमायें एक लाख

सहजन की खेती लगाने के 10 महीने बाद एक एकड़ में किसान एक लाख रुपए कमा सकते हैं। कम लागत में तैयार होने वाली इस फसल की खासियत ये है कि इसकी एक बार बुवाई के बाद चार साल तक बुवाई नहीं करनी पड़ती है। साथ ही सहजन एक औषधीय फसल है।

गुजरात के मोरबी जिले से पूरब दिशा से 30 किलोमीटर दूर चूपनी गाँव में किसान प्रतिवर्ष 200 से 250 एकड़ खेत में सहजन की खेती करते हैं। यहां के किसान पिछले छह वर्षों से सहजन की खेती कर रहे हैं। उन्होंने इसकी शुरुआत एक एकड़ खेत से की थी और इसके बढ़ते मुनाफे को देखकर अब 250 एकड़ में सहजन की खेती की जा रही है। सहजन कमाई के साथ ही 300 रोगों की रोकथाम कर सकता है।

चूपनी गाँव में रहने वाले किसान रवि सारदीय (42 वर्ष) बताते हैं, “मैं पिछले तीन साल से सहजन की खेती कर रहा हूं। इसके एक एकड़ में खेती से किसान एक लाख से ज्यादा मुनाफा सिर्फ 10 महीने में कमा सकते हैं।” रवि सारदीय ने सहजन की एक नई प्रजाति की खोज की है, जिसका नाम है “ज्योति-1” है। इस प्रजाति को लगाने से एक पौधे में 700 फलियां लगती हैं, जबकि दूसरी प्रजाति में सिर्फ 250 ही फलियां लगती हैं।

रवि सारदीय आगे बताते हैं, “एक एकड़ खेत में सहजन के 250 ग्राम बीज की जरूरत होती है, लाइन से लाइन की दूरी 12 फिट और प्लांट से प्लांट की दूरी 7 फिट रखी जाती है, एक एकड़ खेत में 518 पौधे लगाए जाते हैं। अप्रैल महीने में बुवाई के बाद सितम्बर महीने में फलियां बाजार में बिकनी शुरू हो जाती हैं।” गर्मी के मौसम में 10 रुपए किलो और सर्दियों के मौसम में 40 रुपए किलो के हिसाब से बिकती हैं। बारिश के मौसम को छोड़कर सहजन के पेड़ में दो बार फलियां लगती हैं।

पशुओं के चारे के रूप में उपयोगी

चारे के रूप में इसकी पत्तियों के प्रयोग से पशुओं के दूध में डेढ़ गुना और वजन में एक तिहाई से अधिक की वृद्धि की रिपोर्ट है। कुपोषण, एनीमिया (खून की कमी) में सहजन फायेदमंद होता है।

औषधीय गुणों से भरपूर

डॉ. रजनीश मिश्र ने बताया कि सहजन को अंग्रेजी में ड्रमस्टिक कहा जाता है। इसका वनस्पति नाम मोरिंगा ओलिफेरा है। फिलीपीन्स, मैक्सिको, श्रीलंका, मलेशिया आदि देशों में भी सहजन का उपयोग बहुत अधिक किया जाता है। दक्षिण भारत में व्यंजनों में इसका उपयोग खूब किया जाता है। सेंजन, मुनगा या सहजन आदि नामों से जाना जाने वाला सहजन औषधीय गुणों से भरपूर है। इसके अलग-अलग हिस्सों में 300 से अधिक रोगों के रोकथाम के गुण हैं। इसमें 92 तरह के मल्टीविटामिन्स, 46 तरह के एंटी आक्सीडेंट गुण, 36 तरह के दर्द निवारक और 18 तरह के एमिनो एसिड मिलते हैं।

गर्मी में भी बंपर उत्पादन देगी गेहूं की यह नई किस्म

करनाल: भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (PUSA) ने गेहूं की पांच व जौ की तीन किस्में रिलीज की हैं। इसमें गेहूं की डीबीडब्ल्यू-173 गर्मी में भी बंपर उत्पादन देगी। शोध में एक हेक्टेयर में इसका उत्पादन 70 क्विंटल तक आया है। इस किस्म के लिए हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के ऊना जिला अनुकूल है।

इन क्षेत्रों में किए गए शोध के बाद आए सफल परिणाम के बाद इस वेरायटी को रिलीज कर दिया गया है। इसके अलावा पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा व असम के क्षेत्र के लिए एचआइ-1612, डीबीडब्ल्यू-168, यूएएस-375 और एचआइ-8777 को रिलीज किया गया है। इसके अलावा जौ की डीडब्ल्यूआरबी-137, आरडी-2899 और आरडी-2907 की किस्म रिलीज की गई है।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

संस्थान के निदेशक डॉ. ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि इन वेरायटी के रिलीज होने के बाद इनका सीड तैयार किया जाएगा। उसके बाद यह मार्केट में उपलब्ध होगी। किसी भी वेरायटी को रिलीज करने के बाद पूर्ण रूप से किसानों तक लाने के लिए करीब दो साल लग जाते हैं, क्योंकि किसानों की डिमांड के अनुसार बीज तैयार किया जाता है। डीबीडब्ल्यू 173 की बिजाई नवंबर के आखिरी सप्ताह से लेकर दिसंबर के दूसरे सप्ताह तक की जा सकती है। यह फसल 118 से 120 दिन में तैयार हो जाती है।

पर्यावरण के गर्म मिजाज से लड़ेगी नई किस्म

कई वेरायटी में यह देखने में आया है कि मार्च माह में जब तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है तो दाना पिचकना शुरू हो जाता है, लेकिन डीबीडब्ल्यू 173 में ऐसा नहीं होगा। यह किस्म दो से चार डिग्री सेल्सियस अधिक तापमान को भी सहन कर सकेगी। इसके अलावा इसमें रोग प्रतिरोधक क्षमता भी अन्य किस्मों से ज्यादा है। इसमें आयरन की मात्र 41 पीपीएम यानि पार्ट्स पर मिलियन है।

(दैनिक जागरण से साभार)

मुफत में अपने फ़ोन पर SMS के जरिए मौसम की जानकारी लेने के लिए ऐसे करें रजिस्टर

मौसम की सूचना देने वाले देश के भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने लोगों के लिए एक एसएमएस अलर्ट की सेवा शुरू की है। इससे न केवल मौसम के बारे में अलर्ट मिलेंगे, बल्कि चक्रवात, बाढ़ और भारी बारिश के बारे में भी पता चल सकेगा।

इस सेवा के तहत आईएमडी हर उस व्यक्ति को मौसम के बारे में एसएमएस भेजेगा, जो भी इसके साथ रजिस्टर होंगे। इसके रजिस्ट्रेशन के लिए आपको आईएमडी की वेबसाइट http://imdagrimet.gov.in/  पर जाना पड़ेगा और खुद को रजिस्टर करना पड़ेगा।

इसके जरिए सरकारी विभागों और लोगों को न केवल प्राकृतिक आपदाओं के बारे में बताया जाएगा, बल्कि यह भी बताया जाएगा कि उससे कैसे निपटा जा सकता है। यह सुविधा इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी की ‘मोबाइल सेवा’ का इस्तेमाल करके लोगों तक पहुंचाई जाएगी।

ऐसे करें रजिस्टर

इस सुविधा का फ़ायदा लेने के लिए सबसे पहले इस लिंक http://imdagrimet.gov.in/farmer/Form_Hindi.php पर क्लिक करें । उसके बाद एक (ऊपर दी हुई फोटो जैसा) फार्म खुलेगा जिसमे आप को अपना फ़ोन नंबर , अपना स्टेट ,अपना जिला ,और फसल के सम्बंधित बाकि जानकारी भरनी होगी एक बार सारी जानकारी भरने के बाद इस फार्म को सबमिट करें । उसके बाद आपके फ़ोन पर SMS सेवा शुरू कर दी जाएगी और आप को मौसम की जानकारी फ़ोन के जरिए मिलनी शुरू हो जयेगी ।

इस जरूरी जानकारी को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ताकि बाकि किसान भी इसका फ़ायदा उठा सकें ।

जाने बोलापल्ली श्रीकांत की जीरो से हीरो बनने की कहानी

40 वर्षीय बोलापल्ली श्रीकांत का जीवन पूरी तरह से खिले फूलों की तरह है। श्रीकांत जिन्होंने सोलह साल की उम्र में एक फूलों की फार्म में 1000 रूपये महीने की पगार में नौकरी किया, आज भारत में फूलों की खेती करने वालों की सूची में उन्होंने एक खास जगह बनाई है। इस खेल के वह माहिर खिलाड़ी बन गए हैं। आपको यकीन नहीं होगा आज उनका वार्षिक टर्न-ओवर करोड़ो का है।

दसवीं कक्षा की पढ़ाई छोड़कर, श्रीकांत तेलंगाना के निज़ामाबाद जिले में अपने गृहनगर से नालमंगला, जो बंगलुरू के बाहरी इलाके में स्थित है, एक परिचित के फूलों के फार्म में काम करने आ गए थे। उनका परिवार खेती पर निर्भर था और पूरी तरह से कर्ज में डूबा हुआ था। तब उन्होंने यह तय किया कि वह पढ़ाई छोड़ देंगे और नौकरी करेंगे

नालमंगला के फार्म में वह अठारह से बीस घंटे काम करते थे। दो साल तक काम करते हुए उन्होंने फूलों की खेती के बिज़नेस के बारे में पूरा ज्ञान हासिल कर लिया। कल्टीवेशन, हार्ववेस्टिंग, मार्केटिंग और उन्हें निर्यात करना सब में श्रीकांत ने महारथ हासिल कर ली।

जब वह 18 वर्ष के हुए तब उन्होंने 20,000 रुपयों से अपने फूलों के रिटेल का बिज़नेस शुरू किया। शुरुआत में उनके पिता उनके इस काम के लिए अनिच्छुक थे क्योंकि वह चाहते थे कि वह अपने घर की खेती में उनकी मदद करे। लेकिन श्रीकांत ने अपने मन की आवाज़ सुनी और अपनी योजना के साथ आगे बढ़े

1000 रुपये महीना सैलरी पर की माली की नौकरी

22 साल पहले, तेलंगाना के एक छोटे से शहर से ताल्लुक रखने वाले बोलापल्ली श्रीकांत का सपना था कि वह अपनी जमीन पर खेती करें। मगर गरीबी की वजह से घर-परिवार की स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह जमीन खरीद सकें। हालात बिगड़ने पर श्रीकांत को अपना शहर निजामाबाद छोड़ना पड़ा और वह वर्ष 1995 में बेंगलुरु अपना करियर बनाने के लिए आ गये। उस समय डोड्डाबल्लापुरा क्षेत्र के पास श्रीकांत को फूलों की खेती से जुड़ी एक कंपनी में नवस्थापित ग्रीन हाउस परियोजना में बतौर पर्यवेक्षक के रूप में काम मिला। उस समय श्रीकांत की सैलरी 1000 रुपये महीना थी।

ऐसे हुई शुरुआत

श्रीकांत ने दो साल तक इस कंपनी में काम किया और फूलों की खेती में वैज्ञानिक खेती के बारे में काफी जानकारी हासिल की। इस बीच श्रीकांत ने अपनी दो साल की सैलरी यानी 20000 हजार रुपये से जब वह 18 वर्ष के हुए तब बैंगलुरु में ही फूलों का छोटा सा व्यापार शुरू किया और विभिन्न कंपनियों, किसानों और वितरकों से संपर्क साधकर फूलों का व्यापार करना शुरू कर दिया।

उन्होंने बेंगलुरू के विल्सन गार्डन में स्थित अपने घर पर ही अपनी फूलों की दुकान खोली। 200 स्क्वायर फ़ीट की जगह पर इन्होंने काम शुरू किया। अपनी शॉप का नाम उन्होंने ओम श्री साई फ्लावर्स रखा। अपने पुराने अनुभव से और संपर्कों की बदौलत इन्होंने दो सालों में ही अपने बिज़नेस को अच्छी जगह पर खड़ा कर दिया। शुरू में तो वे फूल उत्पादकों और थोक डीलर्स से फूल लेकर उन्हें पैक कर खुद ही ग्राहकों तक पहुंचाया करते थे।

दिन-प्रतिदिन उनके ग्राहक बढ़ते चले गए और फिर उनके फूल बड़े-बड़े होटलों, शादी, जन्मदिन और बहुत सारे आयोजनों में जाने लगे।पहले श्रीकांत अकेले ही फूलों को एकत्र करते थे और फिर पैकिंग और पार्सल किया करते थे। मगर मांग बढ़ने पर उन्होंने दो और कर्मचारियों को अपने साथ जोड़ लिया।

वर्ष 2012 में खरीदी जमीन

काफी लंबे समय तक फूलों का व्यापार करने के बाद साल 2012 में श्रीकांत ने डोड्डाबल्लापुरा में ही 10 एकड़ जमीन खरीदी और इस जमीन पर आधुनिक कृषि तकनीक से फूलों की खेती करना शुरू की। मगर आज चार साल बाद श्रीकांत 30 एकड़ जमीन पर फूलों की वैज्ञानिक खेती कर रहे हैं। श्रीकांत ने फूलों की खेती से पिछले साल 9 करोड़ रुपये का बड़ा मुनाफा कमाया और अब इस वर्ष 12 करोड़ लाभ कमाने की अनुमान लगा रहे हैं।

मांग इतनी ज्यादा की विदेशों भी मंगवाते है फूल

उनके खेतों के फूलों से उनके बिज़नेस के लिए केवल 10% तक के फूल हो पाते है बाकि वह ऊटी, कोडाइकनाल से मंगाते हैं। ज्यादा मांग होने पर थाईलैंड, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और हॉलैंड से भी फूल आयात किया जाता है। श्रीकांत रेन वाटर हार्वेस्टिंग भी करते हैं अपने फार्म्स में। उनके यहाँ 300 कर्मचारी हैं जो उनके विल्सन गार्डन स्थित फार्म में काम करते हैं। और श्रीकांत 80 कर्मचारियों के रहने-खाने की व्यवस्था भी अपने फार्म में करते हैं।

महिन्द्रा लांच करेगा ट्रैक्टर का तीसरा ब्रांड ‘ट्रेकस्टार’

19 बिलियन अमरीकी डॉलर के महिन्द्रा समूह की कम्पनी महिन्द्रा एंड महिन्द्रा (एमएंडएम) ने आज अपनी सहायक कम्पनी महिन्द्रा गुजरात ट्रैक्टर लिमिटेड (एमजीटीएल) का नया नाम अब ग्रोमेक्स एग्री इक्विपटमेंट लिमिटेड होगा।

ग्रोमेक्टस किसानों को विशेष, बेहतर और किफायती कृषि उपकरण उपलब्ध करवाएगा। ग्रोमेक्स ने ट्रैक्टर के अपने नए ब्रांड ट्रेकस्टार को लांच किए जाने की घोषणा भी की।

यह ब्रांड उन किसानों के लिए होगा, जिन्हें बेहतर क्वालिटी चाहिए और यह उनकी समृद्धि बढ़ाने में उनका सहयोग करेगा। ट्रेकस्टार 30-50 एचपी श्रेणी में पांच एचपी पॉइन्ट्स में उपलब्ध होगा।

इस मौके पर महिन्द्रा एंड महिन्द्रा लिमिटेड के फार्म इक्विपमेंट सैक्टर के प्रेसीडैंट राजेश जेजुरीकर ने कहा कि कृषि यंत्रीकरण में गुणवत्ता बढ़ाकर किसानों की आय दोगुनी करने की हमारी यात्रा में ग्रोमेक्स एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

यह ब्रांड मूल्य बचत को इच्छुक किसानों पर केंद्रित होगा। उसने कहा कि ग्रोमैक्स कृषक समुदाय को किफायती प्रणाली और समाधान मुहैया कराएगी। इस संयुक्त उपक्रम में कंपनी की 60 फीसदी तथा गुजरात सरकार की 40 फीसदी हिस्सेदारी है।

सबसे महंगी कॉफी ऐसे होती है तैयार, जानकर पीना छोड़ देंगे!

अगर आप कॉफी पीने के शौकिन है तो हमारी यह ख़बर आपको निराश कर सकती है। जी हां, दुनिया की सबसे मंहगी कॉफी ‘कोपी लुवाक’ जो पीने में तो बेहद टेस्टी लगती हैं लेकिन इसको बनाने की प्रक्रिया काफी हैरान कर देने वाली है।

कॉफी ‘कोपी लुवाक’ जिसका जायका लेने के लिए लोग दुनिया भर से इंडोनेशिया आते हैं। लोगों की मानें तो इस कॉफी को जो एक बार टेस्ट कर ले फिर उसे कोई और कॉफी रास नहीं आती।
इस कॉफी की कीमत €550 / US$700 प्रति किलोग्राम होती है। यानि के 42000 रूपए प्रति किल्लो ।जो आम कॉफी की तुलना में बहुत ही ज्यादा है ।

आईए अब हम आपको बताते हैं कैसे बनाई जाती है दुनिया की सबसे महंगी कॉफी…

यह कॉफी किसी किसान के द्वारा खेतों में नहीं उगाई जाती बल्कि इस कॉफी का निर्माण जंगली रेड कॉफी बीन्स से होता है जो कि एशियन पाम सिवेट नाम के जानवर की पॉटी से निकलती है।यह जानवर पेड़ पर ही अपना आसियाना टिकाए रहता है। बेर खाने वाला यह जानवर बेर तो ज़रुर खाता है लेकिन यह पचा नहीं पाता।

आप सोच रहे होंगे एशियन पाम सिवेट के पेट में बेर ना पचने से कॉफी के तैयार होने से क्या लेना-देना… अब जो हम बताएंगे आप चौंक जाएंगे… दरअसल एशियन पाम सिवेट पेड़ो पर रहने वाला जानवर होता है जो कि बेरी खाता है लेकिन वो बेरी के बीजों को पचा नहीं पाता है और मल के जरिये उसे पेट से बाहर निकाल देता है जो कि बींस के रूप में वातावरण में आता है और इसी बींस को सुखाकर ‘कोपी लुवाक’ कॉफी बनायी जाती है, जो कि यह बहुत ज्यादा दुर्लभ होती है ।

पहले यह जानवर सिर्फ जंगल में मिलते थे और यह कॉफी बहुत ही दुर्लभ थी । लेकिन अब इसकी फार्मिंग होने लगी है लोग एशियन पाम सिवेट को अपने फार्म में उसका मल लेने के लिए पालते है।क्यों हैरान हो गए ना इस ख़बर को पढ़कर कि जिस कॉफी को सभी राजसी घरानों की पार्टी में शामिल किया जाता है वह ऐसे तैयार होता है।

अब बिना इंटरनेट के भी किसान इस एप से जाने कौन सी फसल में कितनी डालनी है खाद

देशभर के किसान अब अपने मोबाइल फोन पर यह मालूम कर सकेंगे कि उन्हें अपने क्षेत्र में किस फसल के लिए कितनी मात्रा में खाद डालनी है। यह जानकारी उन्हें कृषक एप पर मिलेगी। इसे एक बार डाउनलोड करने के बाद इसके इस्तेमाल के लिए इंटरनेट की कनेक्टिविटी भी जरूरी नहीं है।

इंडो यूराेपियन चेंबर ऑफ काॅमर्स एंड इंडस्ट्रीज (आईईसीसीआई) के एग्रीकल्चर नेटवर्क ने किसानों के लिए हाल ही में यह लाॅन्च किया है। इसमें पूरे देश के क्षेत्रों की मिट्टी का डेटा और 100 से ज्यादा फसलों की रिकमंडेड मेक्रो न्यूट्रिएंट वेल्यू फीड की गई है।

आईईसीसीअाई की डायरेक्टर अनुराधा सिंघई ने बताया कि पिछले साल केंद्र सरकार ने एक सर्कुलर जारी किया था। इसमें फर्टिलाइजर डीलर की शैक्षणिक योग्यता बीएससी एग्रीकल्चर, डिप्लोमा इन एग्रीकल्चर इनपुट या फिर केमेस्ट्री से एमएससी होने मापदंड तय किया था। इसका उद्देश्य यह था कि किसानों को यह डीलर सही खाद की सही मात्रा फसल और मिट्टी के अनुसार बताएं।

किसान मोबाइल फोन के प्ले स्टोर पर जाएं और krashak टाइप कर इसे इंस्टाल कर लें। फिर ओपन करें। कोई रजिस्ट्रेशन लॉग इन या ओटीपी नहीं। नाम-पता एक्सेस यानी कोई जानकारी नहीं मांगता है। एक बार डाउनलोड कर लिया तो पूरे समय इंटरनेट से कनेक्ट रहने की जरूरत नहीं है। हिंदी और अंग्रेजी दोनों में है।

अगला स्टेप : सबसे पहले फसल की श्रेणी का चयन करें, फिर फसल का चयन करें, आपका खेत एरिया हेक्टेयर या एकड़ में डालें। सॉइल टेस्ट यानी मिट्टी परीक्षा कार्ड है तो कार्ड के अनुसार एनपीके की वेल्यू डालें। नहीं है तो अपना राज्य, जिला और ब्लाक चुनें। इसके बाद सामान्य उर्वरक पर क्लिक करें। खाद के छह सम्मिश्रण उपलब्ध हैं। यह भी कि इन मिश्रणों को कब और कैसे डालना है।

यह होगा फायदा 

  • घर बैठे खाद की सटीक जानकारी फसल के अनुसार किसानों को मिल जाएगी।
  • मिट्टी परीक्षण कार्ड नहीं होने पर भी जानकारी मिल सकेगी।
  • इंटरनेट कनेक्शन नहीं होने पर भी जानकारी ले सकते हैं।
  • कृषि विभाग की बिना सलाह के भी फसल में खाद के बारे में निर्णय ले सकते हैं।

सोनीपत के इंजीनियर ने बनाई ईंट बनाने की मशीन , 120 मज़दूरों का काम करती है अकेले

सोनीपत में 10वीं पास सतीश नाम के युवा ने एक ऐसी मशीन का आविष्कार किया है, जो 120 मज़दूरों का काम अकेले ही कर लेती है। ये ईंट बनाने की मशीन है।

गांव लडरावन निवासी सतीश ने अपने इस आविष्कार से भट्टा उद्योग में एक नयी मिसाल पेश की है। दरअसल, सतीश गांव फिरोजपुर बांगड में लगाए अपने ईंट के भट्टे पर काम करने वाले मज़दूरों से काफी परेशान थे। वो पैसे लेने के बाद भी भट्टे पर काम करने नहीं आते थे। इसी के चलते सतीश के दिमाग में ऐसी मशीन बनाने का आइडिया आया और फिर उस पर सतीश ने काम करना शुरू किया।

सतीश ने साल 2007 में मशीन बनाने के लिए अलग-अलग जगह से पुर्जे और उपकरण लाकर मशीन बनाना शुरू कर दिया। मशीन बनाने में लाखों रुपये लगने के बाद भी सतीश की कोशिशें नाकाम होती रही लेकिन सतीश ने कभी हार नहीं मानी।

सतीश के हौंसलों को देखते हुए उसके चचेरे भाई राजेश, विकास, प्रवेश, राकेश और उसके दोस्तों ने उसका साथ देना शुरू किया। भाई और दोस्तों के सहयोग ने सतीश का मनोबल इतना बढ़ा दिया कि इन सब ने मिलकर ईंट बनाने वाली मशीन का आविष्कार कर डाला।

सतीश मशीन के बारे में बात करते हुए कहते हैं, “ये मशीन ईंट-भट्टे पर एक दिन में काम करने वाले 120 मज़दूरों के बराबर काम करती है। यह मशीन आसानी से ईंटें बना देती है। बी एम एम नाम की यह मशीन एक मिनट में 150 ईंटें बनाती है। दिन भर में इस मशीन से करीब 40000 ईंटें बनाई जाती है।

वहीं इस मॉडल के अलावा बी एम एम-300 मशीन भी तैयार की गई है, जो एक मिनट में 300 ईंटें तैयार करती है। यह मशीन दिनभर में करीब 85000 ईंटें तैयार करती है। इस मशीन से ईंट-भट्टों पर मज़दूरो की आ रही किल्लत को काफी हद तक खत्म कर दिया है।”

मशीन बनाने में सहयोगी इंजीनियर पंकज राणा कहते हैं कि ये मशीन सतीश की 8 सालों की मेहनत का फल है। मशीन पर आने वाली लागत को देखते हुए सतीश ने गांव के अपने मकान और पुश्तैनी जायदाद को दांव पर लगा दिया था।

लेकिन इतने सालों की मेहनत का फल 2013 में तीन मशीनें तैयार कर मिला। मशीन बनाने के हमारे जुनून को देखते हुए सभी लोगों ने हमें पागल कहना शुरू कर दिया था लेकिन अब सब लोग हमारी तारीफ करते नहीं थकते।

सतीश का कहना है कि अब इस मशीन की डिमांड दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। मशीन के आविष्कार का पेटेंट करा लिया गया है। मशीन के पार्ट्स अब जर्मन और इटली से मंगाये जाते हैं। अब तक हम करीब 25 मशीनें बेच चुके हैं। हरियाणा, यूपी, बिहार, तमिलनाडु, राजस्थान, बिहार और कर्नाटक के अलावा पड़ोसी देश नेपाल में भी हम इस मशीन की सप्लाई कर चुके हैं।

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यह मशीन कैसे काम करती है उसके लिए वीडियो देखें