अब भारत की देसी गाय भी देंगी एक दिन में 80 लीटर दूध

पशुपालन के क्षेत्र में सरकार को एक बड़ी कामयाबी मिली है। अब तक भारतीय पशुपालक का देसी नस्ल की गायों की ओर रूझान इसलिए कम था कि उनकी दूध उत्पादन क्षमता कम थी।

सरकार ने पशुपालकों की समस्या को समझा और भारतीय नस्ल की उत्पादन क्षमता को बढ़ाने के लिए अनेक कदम उठाएं हैं। इसी के अंतर्गत, देसी गायों की नस्ल सुधार के लिए अब सॉटेंड सेक्सड सीमन तकनीक का उपयोग मध्यप्रदेश में किया जाएगा।

इससे जहां दुधारू गाय की नस्ल में सुधार होगा तो वहीं उसका दूध उत्पादन भी बढ़ेगा।जिस से आप की देसी गाय भी 80 लीटर तक दूध दे सकेगी । देसी नस्ल की गायों में इस तकनीक के प्रयोग से केंद्र सरकार मादा अथवा नर बछड़े पैदा करने को लेकर अनुसंधान (रिसर्च) करवा रही है।

इसी क्रम में, मध्यप्रदेश में ज्यादा दूध देने वाली गायों की संख्या बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश राज्य पशुधन एवं कुक्कुट विकास निगम ने ब्राजील से गिर और जर्सी नस्ल के सांडों के आठ हजार सीमन डोज मंगवाए हैं।

पशुपालन विभाग की माने तो ब्राजील में गिर और जर्सी नस्ल की गाय 35-40 लीटर दूध एक समय में देती है। जबकि भारत में इन नस्लों की गायों से एक समय में अधिकतम पांच लीटर दूध ही मिलता है। राज्यों की गायों में दुग्ध उत्पादन की क्षमता बढ़ाने के लिए गिर और जर्सी नस्ल की सांड के आठ हजार सीमन डोज ब्राजील से मंगवाए हैं।

सरकार द्वारा ब्राजील नस्ल के सांड का सीमन सैंपल लेकर उसे देसी गाय में प्रत्यारोपित कराया गया है, जिसके बहुत अच्छे परिणाम आ रहे हैं। अब यह गाय प्रतिदिन एक समय में अधिकतम 40 लीटर दूध देगी। इस कार्यक्रम का लक्ष्य 2022 तक किसान की आमदनी को दुगुना करना है।

पशुपालन विभाग के डॉक्टरों की माने तो सीमन से अधिक पशुओं का गर्भाधान कराया जा सकता है। इसकी लागत भी अधिक नहीं आती है। यही कारण है कि सरकार ने सीमन लाने का फैसला किया है।

इस सीमन का उपयोग पशु चिकित्सालयों और कृत्रिम गर्भाधान क्लीनिकों द्वारा अधिक दूध देने वाली अच्छी गायों के गर्भाशय में स्थापित कर भ्रूण तैयार किए जाएंगे ताकि गायों में नस्ल सुधार किया जा सके। इसके बाद इन भ्रूणों को सामान्य गाय के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाएंगा। इससे गाय में नस्ल सुधार के साथ-साथ दूध उत्पादन भी बढ़ेगा।

 

 

एक लाख रु से शुरू की नर्सरी, पौध बेच कर अब कमा रहा है 3 करोड़

खेती इतनी भी बुरी नहीं है कि जितना इसका नाम खराब कर दिया है। दरअसल, जो भी व्यक्ति थोड़ी बहुत समझ बूझ से और धैर्य से खेती करे, तो हरियाणा के हरबीर सिंह की तरह करोड़ों में कमाई कर सकता है।

हरियाणा में खेती से मुनाफा कमाना चौखी कमाई का जरिया बनता जा रहा है। हम आपको कुरुक्षेत्र जिले के एक ऐसे ही किसान से रूबरू करा रहे हैं, जो महज कुछ एकड़ में खेती कर सालाना करोड़ों रुपए की कमाई कर रहा है।

हम बात कर रहे हैं कुरुक्षेत्र जिले के गांव शाहाबाद में रहने वाले किसान हरबीर सिंह की। हरबीर ने मास्टर डिग्री लेने के बाद नौकरी नहीं की और खेती में ज्यादा रूचि दिखाई। इसी का नतीजा है कि आज वे करोड़पति किसान हैं।

 

2005 में हरबीर ने सिर्फ 2 कनाल क्षेत्र (जमीन का एकड़ से भी छोटा हिस्सा) में 1 लाख रूपए की लागत से सब्जियों की नर्सरी लगाई। इससे उन्हें अच्छा-खासा फायदा होने लगा। उन्होंने इसके बाद और जमीन खरीदी। अब 2015 में 11 एकड़ खेत में हरबीर सिंह की नर्सरी है, जिससे सालाना लगभग 3 करोड़ का लाभ होता है।

हरबीर सिंह के मुताबिक उन्होंने वैज्ञानिक तरीके से खेती शुरु की थी।उन्होंने टमाटर, गोभी, हरी मिर्च, प्याज, शिमला मिर्च, बैंगन सहित अन्य पौध तैयार की।पौध अच्छी निकली तो यूपी, हिमाचल, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों के किसान पौध खरीदने के लिए आने लगे।

अब उनकी मिर्च की पौध इटली जाती है। पिछले दो साल से लगभग 20 हजार पौधे इटली भेजते हैं।उन्होंने अपनी नर्सरी को बिल्कुल हाईटेक बना दिया है। उनका दावा है कि उनकी 16 एकड़ की नर्सरी में एक भी पौधा बीमारी वाला नहीं है। पौध की कीमत 45 पै. प्रति पौधा से लेकर 1.50 पै. प्रति पौधा वैरायटी के साथ तय की गई है।

इंटरनेशनल बी-रिसर्च एसोसिएशन के वो सदस्य भी हैं। साल 2004 में एसोसिएशन की ओर से हरबीर सिंह इंग्लैंड दौरे पर गए थे। नर्सरी के अलावा बहरबीर ने साल 1996 में 5 बॉक्स से मुधमक्खी पालन का काम शुरू किया था। अब वो 470 बॉक्स मधुमक्खी पालन करते हैं।

एडवांस बुकिंग पर ही मिलती है पौध

क्षेत्र में हरबीर की नर्सरी बहुत मशहूर है। यही वजह है कि एडवांस बुकिंग के बिना हरबीर की नर्सरी से तुरंत पौधा मिल पाना बहुत मुश्किल है। पौध को खरीदने से पहले कम से कम 3 दिन पहले एडवांस बुक करवाना पड़ता है।

3 दिन के बाद ही पौध मिल पाता है। इस वजह से हरबीर सिंह के फार्म हाउस पर लोगों की भीड़ लगी रहती है। लेकिन इसी वजह से उनको करोड़ों की कमाई भी होती है।

हरबीर सिंह ने बताया कि इस बार उन्होंने ताइवान से पपीते का बीज मंगाया और यहां 50 हजार पौधे तैयार किए हैं। इन पौधों को वे खुद भी एक एकड़ में लगाएंगे, ताकि पौध लेने आने वाले किसानों को सैंपल दिखा सकें।  इसके अलावा इस महीने के अंत में गोभी की पौध भी तैयार करेंगे। उन्होंने बताया कि मुख्य सीजन अक्टूबर से मार्च तक होता है।

सैंकड़ों लोगों को दे रहे रोजगार

हरबीर सिंह की नर्सरी में एक-दो नहीं बल्कि 121 महिला- पुरूष काम पर लगे हुए हैं। पिछले साल उन्होंने 4 करोड़ पौध बेचे थे, जबकि इस बार ये लक्ष्य 10 करोड़ पौधे बेचने का है।

ऐसे बनाएं घर पर साइलेज,पुरे साल के लिए हरे चारे की टेंशन ख़तम

अपने दुधारु पशुओं को पूरे साल हरा चारा उपलब्ध करा पाना पशुपालकों के लिए एक बड़ी चुनोती बनता जा रहा है। ऐसे में पशुपालक घर पर ही साइलेज बनाकर अपने पशुओं को पूरे साल हरा चारा उपलब्ध करा सकते है। इसके लिए सरकारी मदद भी मिलती है।साइलेज से पशुओं के दुग्ध उत्पादन भी अच्छा होता है।इसमें ज्यादा लागत भी नहीं आती है।

शुरुआत में पशु साइलेज ज्यादा नहीं खा पाता है लेकिन बार-बार देने से वह उसे चाव से खाने लगता है। जब चारे की कमी हो तो साइलेज खिलाकर पशुओं का दूध उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। पशु को साइलेज खिलाने के बाद बचे हुए हिस्से को भी हटा देना चाहिए। अगर भूसा दे रहे हो तो उस हिस्से को उस में मिलाकर दें।

अच्छे दुग्ध उत्पादन के लिए दुधारु पशुओं के लिए पौष्टिक दाने और चारे के साथ हरा चारा खिलाना बहुत जरुरी है। हरे चारा पशुओं के अंदर पोषक तत्वों की कमी को पूरा करता है। एक दुधारू पशु जिस का औसत वजन 550 किलोग्राम हो, उसे 25 किलोग्राम की मात्रा में साइलेज खिलाया जा सकता है। भेड़-बकरियों को खिलाई जाने वाली मात्रा 5 किलोग्राम तक रखी जाती है।

साइलेज बनाने के लिए सरकार द्वारा यूरिया ट्रीटमेंट किट और साइलेज बनाने के लिए किट दी जाती है। अगर कोई पशुपालक साइलेज बनाना चाहता है तो उसका प्रशिक्षण भी ले सकता है। साइजेल बनाने लिए कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK Center) में भी प्रशिक्षण भी दिया जाता है।

पशुपालक इस तरह बना सकते है साइलेज

साइलेज बनाने के लिए जिस भी हरे चारे का इस्तेमाल आप कर रहे हो उसको 2 से 5 सेन्टीमीटर के टुकड़ों में काट कर कुटटी बना लेना चाहिए। ताकि ज्यादा से ज्यादा चारा साइलो पिट में दबा कर भरा जा सके। अब उस कुट्टी किए हुए चारे को दबा-दबा भर दें।

ताकि बरसात का पानी अंदर न जा सके। फिर इसके ऊपर पोलीथीन की शीट बिछाकर ऊपर से 18-20 सेमी मोटी मिट्टी की पर्त बिछा देनी चाहिए। इस परत को गोबर व चिकनी मिट्टी से लीप दिया जाता है और दरारें पड़ जाने पर उन्हें मिट्टी से बन्द करते रहना चाहिए ताकि हवा व पानी गड्ढे में न पहुंच सके।

लगभग 50 से 60 दिनों में यह साइलेज बनकर तैयार हो जाता है। गड्ढे को एक तरफ से खोलकर मिट्टी और पोलोथीन शीट हटाकर आवश्यकतानुसार पशु को खिलाया जा सकता है। साइलेज को निकालकर गड्ढे को फिर से पोलीथीन शीट और मिटटी से ढ़क देना चाहिए और धीरे-धीरे पशुओं केा इसका स्वाद लग जाने पर इसकी मात्रा 20-30 किलो ग्राम पति पशु तक बढ़ायी जा सकती है ।

किन-किन फसलों से बना सकते है साइलेज

साइलेज बनाने के लिए सभी घासों से या जिन फसलों में घुलनशील कार्बोहार्इडे्रटस अधिक मात्रा में होती हैं जैसे ज्वार मक्की, गिन्नी घास नेपियर सिटीरिया आदि से तैयार किया जा सकता है। साइलेज बनाते समय चारे में नमी की मात्रा 55 प्रतिशत तक होनी चाहिए।

साइलेज जिन गड्ढ़ों में भरा जाता है। उन गड्ढ़ों को साइलोपिटस कहते है। गड्ढा (साइलो) ऊंचा होना चाहिए और इसे काफी सख्त बना लेना चाहिए। साइलो के फर्श और दीवारें पक्की बनानी चाहिए और अगर पशुपालक पक्की नहीं कर सकता तो लिपाई भी कर सकता है।

इन बातों को रखें ध्यान

  • साइलेज बनाने के लिए जो यूरिया है उसको साफ पानी में और सही मात्रा के साथ बनाना चाहिए।
  • घोल में यूरिया पूरी तरह से घुल जाना चाहिए।
  • पूरी तरह जब तैयार हो जाए तभी पशुओं को साइलेज खिलाएं।
  • यूरिया के घोल का चारे के ऊपर समान रूप से छिड़काव करना चाहिए।

गरीब किसानो के लिए एटीएम की तरह है बकरी पालन ,बेहद कम निवेश में ऐसे करें शुरुआत

बकरी पालन गरीबों के लिए, यह एक एटीएम की तरह है। इसके लिए बेहद कम निवेश की जरूरत पड़ती है। आप एक नर और मादा बकरी का बच्चा पांच हजार से भी कम में खरीद सकते हैं और शुरुआत कर सकते हैं। इसके लिए आपको एक छोटा और अच्छी तरह से ढंके कमरा की जरूरत पड़ेगी। बकरियां खुले में चर सकती हैं, फसल कटे खेतों में और पेड़ की पत्तियां भी खा सकती हैं।’

एक औसत बकरी एक साल से भी कम समय में दो बच्चे को जन्म देती है और इस तरह बकरी का व्यवसाय चल निकलता है। बकरी को पालने के लिए अलग से किसी आश्रय स्थल की आश्यकता नहीं पड़ती। उन्हें अपने घर पर ही रखते हैं। बड़े पैमाने पर यदि बकरी पालन का कार्य किया जाए, तब उसके लिए अलग से बाड़ा बनाने की आवश्यकता पड़ती है।

यह उल्लेखनीय है कि देशी बकरियों के अलावा यदि बरबरी, जमुनापारी इत्यादि नस्ल की बकरियां होंगी तो उनके लिए दाना, भूसी, चारा की व्यवस्था करनी पड़ती है, पर वह भी सस्ते में हो जाता है। दो से पांच बकरी तक एक परिवार बिना किसी अतिरिक्त व्यवस्था के आसानी से पाल लेता है। घर की महिलाएं बकरी की देख-रेख करती हैं और खाने के बाद बचे जूठन से इनके भूसा की सानी कर दी जाती है। ऊपर से थोड़ा बेझर का दाना मिलाने से इनका खाना स्वादिष्ट हो जाता है। बकरियों के रहने के लिए साफ-सुथरी एवं सूखी जगह की आवश्यकता होती है।

एक सफल किसान की कहानी से जाने बकरी पालन का फ़ायदा

ये कहानी पंजाब के एक किसान की है जो किसी भी दूसरे चरवाहे या गड़ेरिए की तरह सड़क पर चलते हुए दिखते हैं। 32 साल के सुखचैन सिंह दूसरे चरवाहे की तरह दिखते हैं, लेकिन वो इन सबसे अलग हैं जिस तरह पंजाब में अधिकांश चरवाहे हैं।

दो एकड़ जमीन पर बकरी पालन का धंधा करने वाले वो एक छोटे किसान हैं, जिनके पास दो गांवों में बने दो शेड में 70 बकरियों का झुंड है। उनका मानना है कि, बकरियों को संभालना कठिन काम है, लेकिन साथ ही यह भी मानते हैं कि कोई भी धंधा बिना चुनौतियों के नहीं होता है ।

उनका बकरी पालन का धंधा बहुत अच्छी तरह चल रहा है। मोटी-तगड़ी बकरियों से उन्हें अच्छी कमाई हो जाती है। वो बताते हैं,’पिछली बिक्री में चापड़ मंडी में सबसे अच्छी बकरी से मुझे 60 हजार रुपये की कमाई हुई थी। आमतौर पर साधारण बकरियों से औसत कमाई 10 हजार से 35 हजार के बीच होती है, और बकरियों के बच्चे एक हजार से ढाई हजार में बिक जाती हैं। हम बकरियों की दूध की भी 30 से 40 रुपये प्रति लीटर की दर से बिक्री करते हैं।’

सुखचैन ने बतया के जब मैंने काम शुरू किया, तब मैंने बेचे हुए घर के पैसे से बकरियां और भेड़ें खरीदी। जब मेरे पास 105 पशुओं का झुंड हो गया, तब मैंने महसूस किया कि बकरियां और भेड़ें एक साथ अच्छी तरह से नहीं पाली जा सकती हैं, और यह बात मात्रा को लेकर नहीं थी बल्कि गुणवत्ता को लेकर थी। उसके बाद मैंने भेड़ें बेच दी और अच्छी गुणवत्ता वाली बकरियां पालने पर ध्यान केंद्रित किया। इसके लिए बेहतर जानकारी और अनुभव की जरूरत होती है लेकिन बदले में बहुत अच्छा रिटर्न भी मिलता है।’

दूध ही सफलता की चाबी

सुखचैन के मुताबिक, बकरियों से नियमित आमदनी मुख्यतौर पर दूध से होती है। बकरियों से हम रोज दो बार दूध ले सकते हैं, और 70 बकरियों से करीब 50 से 60 लीटर तक दूध रोज हो सकता है। वो इसे गांव के सरकारी संग्रहण केंद्रों पर 30 से 40 रुपये प्रति लीटर की दर से बेच देते हैं। हालांकि यह दूध साल में सिर्फ छह महीने के लिए ही बेचा जाता है, और इससे जो कमाई होती है उसका आधा फिर इसी व्यवसाय में लगा दिया जाता है।

एक बकरी एक साल में औसतन एक से दो बच्चे देती है, उनमे से बचे 50 से 60 बच्चों को बाद में एक से ढाई हजार रुपये में बेच दिया जाता है जिससे अतिरिक्त आमदनी हो जाती है।

खरगोश पालने के शौक ने बदली किस्मत ,अब रेबिट फार्मिंग से सालाना कमाता है 10 लाख रुपये

जींद के संजय कुमार देशभर के पेट शॉप्स में रैबिट सप्लाई करते हैं। उनके इस प्रोफेशन की कामयाब कहानी के पीछे बड़ी दिलचस्प कहानी है। संजय को बचपन से रैबिट पालने का शौक था और घरवाले इससे नाराज थे।

बावजूद इसके उन्होंने अपने शौक को जिंदा रखने के लिए इंटरनेट से जानकारी जुटाने के बाद ट्रेनिंग ली और 9 साल में शौक इतना बड़ा प्रोफेशन बन गया। अपने रैबिट फार्म से संजय कुमार लगभग 10 लाख सालाना कमा रहे हैं।

घरवालों ने कर दिया था पैसे देने से इनकार…

  • शहर के रोहतक रोड बाईपास पर आधा एकड़ जमीन पर बना उनका रैबिट फार्म प्रदेश में सबसे बड़ा रैबिट फार्म है। इन दिनों इस फार्म में 6 नस्लों के 500 से ज्यादा खरगोश हैं।
  • संजय कुमार बताते हैं कि वर्ष 2008 में सिर्फ 100 खरगोश से व्यवसाय शुरू किया था। इसके बाद धीरे-धीरे खरगोशों की संख्या बढ़ाई।
  • दूर-दूर से लोग उनसे रैबिट फार्मिंग के बारे में जानकारी लेने के लिए आते हैं। रैबिट फार्मिंग के इस कारोबार से संजय कुमार को आय भी अच्छी-खासी प्राप्त हो रही है।
  • संजय की मानें तो उनके यहां से हर महीने हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार समेत दूसरी यूनिवर्सिटी में रिसर्च के लिए खरगोश भेजे जाते हैं। वहीं, देश-विदेश के खरगोश पालने का शौक रखने वाले लोग भी यहीं से लेकर जाते हैं।
  • देशभर की पेट शॉप में उनके फार्म से खरगोश की सप्लाई होती है। साथ ही, अपने व्यवसाय के सिद्धांत के बारे में संजय बताते हैं कि वह मीट के लिए रैबिट की सप्लाई नहीं करते।

पहले इंटरनेट से जानकारी ली, फिर ट्रेनिंग

संजय कुमार के मुताबिक, उन्हें बचपन में ही खरगोश पालने का शौक था, लेकिन घरवाले इससे सख्त नाराज थे। बावजूद इसके उन्होंने जिद पाल ली कि वह एक दिन प्रदेश का सबसे बड़ा रैबिट फार्म बनाएंगे। एक-दो बार ऐसा भी हुआ, जब घरवालों ने खरगोश खरीदने के लिए उसे पैसे नहीं दिए तो चोरी-छुपे पैसे निकालकर खरगोश खरीद लाए।

फिर मैट्रिक करने के बाद संजय ने कुछ दिन गुड़गांव में ठेकेदारी की। इसी दौरान उन्होंने गूगल पर रैबिट फार्मिंग की जानकारी ली। इसके बाद वह राजस्थान के अविकानगर में भारत सरकार के ट्रेनिंग सेंटर से एक सप्ताह की ट्रेनिंग लेकर आए। शुरुआत में कर्नाटक से 100 रैबिट अपने फार्म पर रखे।

रैबिट फार्मिंग में देखभाल जरूरी, खर्च काफी कम

  • रैबिट फार्मिंग शुरू करने के इच्छुक किसानों के लिए संजय कुमार का कहना है कि शुरुआत में शेड तैयार करने, खरगोश खरीदने पर पैसा खर्च होता है, लेकिन उसके बाद खर्च काफी कम है।
  • पोल्ट्री व्यवसाय से काफी कम खर्च व कम जोखिम का यह कारोबार है। रैबिट फार्म से न कोई बदबू आती और न ही किसी प्रकार कोई और पॉल्यूशन होता है। बस रैबिट की देखभाल पर ध्यान देना काफी जरूरी है। एक खरगोश के लिए दिनभर में एक मुट्ठी फीड, एक मुट्ठी चारा और दो-तीन कटोरी पानी पीता है।
  • चार महीने में खरगोश दो किलो वजन से ज्यादा का हो जाता है और फिर 350 से लेकर 500 रुपए तक में बिक जाता है। रैबिट फार्मिंग के लिए सरकार द्वारा 25 से 30 प्रतिशत सब्सिडी दी जाती है।

जींद के ही एक और खरगोश पालक राजेश कुमार से जाने खरगोश पालने की जानकारी (वीडियो)

खेतों में 19 फीट का गन्ना उगाता है ये किसान , लेता है 1000 कुंटल तक गन्ने की पैदावार

भारत के किसान हमेशा से ही अपनी फसल को लेकर चिंतित रहते हैं और चिंतित हों भी क्यों न! कभी उनकी फसल बर्बाद हो जाती है तो कभी उनकी फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पाता।

खासतौर गन्ना किसान अपनी फसल का उचित मूल्य न मिल पाने के कारण ज्यादा तकलीफ में रहते हैं।  वह हर वक्त यही सोचता रहता है कि काश इस बार की फसल से वो इतना कमा सके कि पिछली फसल के लिए लिया गया कर्ज वापिस कर सके।

लेकिन मुंबई से करीब 400 किलोमीटर दूर सांगली जिले की तहसील वाल्वा में कारनबाड़ी के सुरेश की कहानी कुछ और है।

गन्ने की पैदावार कर सबको कर दिया चकिंत 

यह किसान अन्य किसानों की तुलना में ज्यादा पैसा कमा रहा है और वो भी महज अपने खेतों में थोड़ा सा बदलाव करने के बाद। इन्होंने अपने खेत में बदलाव किया और फिर पहले से ज्यादा खेती से मुनाफा होने लगा। आज आलम यह है कि यह किसान अब करोड़ों रूपये कमा रहा है।

सुरेश अपने खेतों में ऐसा करिश्मा कर रहे हैं कि महाराष्ट्र, कर्नाटक, यूपी तक के किसान उनका अनुसरण करते हैं। उनकी ईजाद तकनीकी का इस्तेमाल करने वालों में पाकिस्तान के भी कई किसान शामिल हैं।

करोड़ों में कर रहे है कमाई

सुरेश गन्ने से सलाना 50-70 लाख की कमाई करते हैं, जबकि हल्दी और केले को मिलाकर वो साल में एक करोड़ से ज्यादा का काम करते हैं। पिछले वर्ष उन्होंने एक एकड़ गन्ना बीज के लिए 2 लाख 80 हजार में बेचा था। 2016 में एक एकड गन्ने का बीज वो 3 लाख 20 हजार में भी बेच चुके हैं। लेकिन कुछ साल पहले तक वो भी उन्हीं पऱेशान किसानों में शामिल थे जो भरपूर पैसे लगाने के बावजूद बेहतर उत्पादन नहीं ले पाते थे।

खेती में किए कुछ बदलाव

सुरेश नौंवी पास हैं लेकिन खेती को किसी वैज्ञानिक की तरह करते हैं। अच्छी वैरायटी (किस्म) के गन्ने की बुआई के लिए वो अप्रैल-मई से लेकर जुलाई तक खेत तैयार करते हैं। 15 अगस्त से ट्रे में बड (अंकुर) उगाना शुरु कर देते हैं, जिसके बाद 15 सितंबर से खेत में निश्चित दूरी प्लांटेशन कर देते हैं। “अब मैं टिशू कल्चर से भी गन्ना उगाने लगाने लगा हूं। मेरे एरिया में केले का टिशू कल्चर बनाने वाले वाली फर्म है मैं उससे अपने खेत में सबसे बढ़िया एक गन्ने से टिशू बनवाना हूं, जिससे तीन साल तक फसल लेता हूं।”

वो बताते हैं किसी भी फसल के लिए जमीन और अच्छा बीज होने बहुत अहम होते हैं, “मैं इन दोनों को काफी अहमियत देता हूं। मैं अपने बीज खुद तैयार करता हूं, बेहतर तरीके से खेतों की जुताई, खाद पानी का इंतजाम करता हूं।” सुरेश बीज के लिए खेत में 9-11 महीने फसल रखते हैं तो मिल के लिए 18 महीने तक गन्ना खेत में रखते हैं। वो कहते हैं किसान को पेड़ी का गन्ना नहीं बोना चाहिए। महाराष्ट्र में तमाम किसान उनकी तकनीकि अपना रहे हैं।

पूरे खेत से चुने हुए 100 गन्नों में से एक से बनता है टिशु कल्चर

टिशु कल्चर यानि एक किसी पौधे के ऊतक अथवा कोशिशाएं प्रयोगशाला की विशेष परिस्थितियों में रखी जाती हैं, जिनमें खुद रोग रहित बढ़ने और अपने समान दूसरे पौधे पैदा करने की क्षमता होती है। सुरेश अपने पूरे खेत से 100 अच्छे (मोटे, लंबे और रोगरहित) गन्ने चुनते हैं, उनमें 10 वो स्थानीय लैब ले जाते हैं, जहां वैज्ञानिक एक गन्ना चुनते हैं और उससे एक साल में टिशु बनाकर देते हैं।

सुरेश बताते हैं, इसके लिए करीब 8 हजार रुपये मैं लेब को देता हूं, वो जो पौधे बनाकर देते हैं, जिसे एफ 1 कहा जाता है से पहले साल में कम उत्पादन होता है लेकिन दूसरे साल के एफ-2 पीरियड और तीसरे एफ-3 में बहुत अच्छा उत्पादन होता है। इसके बाद मैं उस गन्ने को दोबारा बीज नहीं बनाता। टिशू कल्चर से उगाए गए गन्ने की पेड़ी में खरपतवार नहीं होता है।

मजदूरी पर होने वाले खर्च को आधा कर देगी यह पावर टिलर मशीन

पावर टिलर खेतीबारी की एक ऐसी मशीन है, जिस का इस्तेमाल खेत की जुताई से ले कर फसल की कटाई तक किया जाता है। इस के इस्तेमाल से खेतीबारी के अनेक काम आसानी से किए जा सकते हैं।

तकनीक

इस मशीन से खरपतवार का निबटान, सिंचाई, फसल की कटाई, मड़ाई और ढुलाई का काम भी लिया जाता है। इस के अलावा इस मशीन का बोआई और उस के बाद के कामों में भी खासा इस्तेमाल होता है।

इस तरह के कामों के लिए पहले कई मजदूर खेत में लगाने पड़ते थे, लेकिन पावर टिलर के प्रयोग से कम लागत और कम समय में सभी काम आसानी से खत्म हो जाते हैं।

आज किसान पावर टिलर के साथ अन्य यंत्रों को जोड़ कर खेती के कई काम आसानी से कर रहे?हैं। यह एक ऐसी खास मशीन है, जिस से अन्य यंत्रों को जोड़ कर खेती के तमाम काम लिए जा सकते हैं।

खासतौर से पहाड़ी इलाकों में खेती के काम के लिए यह मशीन काफी कारगर है।आज अनेक कंपनियां पावर टिलर बना रही?हैं। उन्हीं में से एक इटैलियन पावर टिलर के बारे में जानकारी दी जा रही है :

इटैलियन पावर टिलर

यह बीसीएस इंडिया प्रा। लि। द्वारा बनाया गया पावर टिलर है। इस से खेतों, बागानों व लाइनों में होने वाली फसलों की गुड़ाई आदि की जाती?है। यह पहाड़ी इलाकों में खेतों की जुताई करने वाला खास यंत्र है।

खासीयत : यह काफी हलका और चेनरहित होता है। यह चलने में बेहद आसान है। यह 4 मौडलों (एमसी 720, एमसी 730, एमसी 740, एमसी 750) में उपलब्ध है। इस के 2 मौडल पेट्रोल और डीजल दोनों से चलते हैं।

730 मॉडल की कीमत 165000 के करीब है इसके बाकि मॉडल की कीमत मॉडल के हिसाब से कम जा ज्यादा हो सकती है । इसके इलावा अगर आप किसी इंडियन कंपनी का बना हुआ मॉडल लेंगे तो उसकी कीमत और भी कम होगी ।

बीसीएस पावर टिलर की  अधिक जानकारी के लिए फोन नंबर : 0161-2848597 और मोबाइल नंबरों 08427755743 व 08427800753 पर बात कर सकते हैं।

यह पावर टिलर कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो भी देखें

अपनी गिरवी जमीन को ही कांट्रैक्‍ट पर लेकर बन गया लखपति ये किसान

बिहार के एक छोटे से किसान की कहानी जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे। एक सोच ने उसकी लाइफ बदल दी। अपनी गिरवी जमीन को ही कांट्रैक्‍ट पर लिया और उसमें पपीते की फसल लगा दी। महज 7 महीने में ही न सिर्फ अपनी जमीन मुक्‍त करा ली बल्कि 5 लाख का मुनाफा भी कमया।

भागलपुर जिले के रंगराचैक ब्‍लॉक के गांव चापर निवासी परशुराम दास की आर्थिक स्‍थिति ठीक न होने के कारण उन्‍होंने 10वीं में ही पढ़ाई छोड़ दी थी। जल्‍द शादी हो गई और इसके बाद बच्‍चे। सबका गुजारा करने को केवल 5 बीघा जमीन थी। लेकिन कुछ समय बाद जब गुजारा नहीं चला तो परशुराम को यह जमीन भी गिरवी रखनी पड़ गई।

उसके बाद परशुराम को जब कोई रास्‍ता न सूझा तो पड़ोस के मित्र ने उन्‍हें पपीते की खेती के बारे में बताया। 2011 में परशुराम ने अपनी गिरवी जमीन को ही किराए पर लिया और पपीते की फसल लगा दी।उन्‍होंने कुछ उन्नत किस्म के पपीते जैसे पूसा नन्हा, चड्ढा सिलेक्शन, रेड लेडी व अन्य की खेती शुरू कर दी। पहली बार फसल खराब हो गई मगर उसके बाद बंपर फसल हुई।

पपीते की फसल की उत्‍तम पैदावार के बाद उसकी बिक्री हुई तो परशुराम ने सब खर्च निकालकर जब मुनाफा जोड़ा तो 5 लाख रुपए हुआ। परशुराम ने तत्‍काल अपनी जमीन मुक्‍त कराई। अब परशुराम 5 साल से यही पपीते की खेती कर रहे हैं।

पपीते की फसल को साल में 3 बार फरवरी-मार्च, मानसून सीजन और नवंबर-दिसंबर में लगाया जा सकता है। रोपे जाने के बाद पपीता का पेड़ लगभग 3 से 4 साल तक लगभग 75 से 100 टन प्रति हेक्‍टेयर की पैदावार होती है।भारत के लगभग सभी राज्‍यों में पपीते की फसल होती है और लगभग सभी मंडियों में इसकी मांग है।भारत से हर साल लाखों टन पपीता एक्‍सपोर्ट भी किया जाता है।

सहजन की खेती से 10 महीने में कमायें एक लाख

सहजन की खेती लगाने के 10 महीने बाद एक एकड़ में किसान एक लाख रुपए कमा सकते हैं। कम लागत में तैयार होने वाली इस फसल की खासियत ये है कि इसकी एक बार बुवाई के बाद चार साल तक बुवाई नहीं करनी पड़ती है। साथ ही सहजन एक औषधीय फसल है।

गुजरात के मोरबी जिले से पूरब दिशा से 30 किलोमीटर दूर चूपनी गाँव में किसान प्रतिवर्ष 200 से 250 एकड़ खेत में सहजन की खेती करते हैं। यहां के किसान पिछले छह वर्षों से सहजन की खेती कर रहे हैं। उन्होंने इसकी शुरुआत एक एकड़ खेत से की थी और इसके बढ़ते मुनाफे को देखकर अब 250 एकड़ में सहजन की खेती की जा रही है। सहजन कमाई के साथ ही 300 रोगों की रोकथाम कर सकता है।

चूपनी गाँव में रहने वाले किसान रवि सारदीय (42 वर्ष) बताते हैं, “मैं पिछले तीन साल से सहजन की खेती कर रहा हूं। इसके एक एकड़ में खेती से किसान एक लाख से ज्यादा मुनाफा सिर्फ 10 महीने में कमा सकते हैं।” रवि सारदीय ने सहजन की एक नई प्रजाति की खोज की है, जिसका नाम है “ज्योति-1” है। इस प्रजाति को लगाने से एक पौधे में 700 फलियां लगती हैं, जबकि दूसरी प्रजाति में सिर्फ 250 ही फलियां लगती हैं।

रवि सारदीय आगे बताते हैं, “एक एकड़ खेत में सहजन के 250 ग्राम बीज की जरूरत होती है, लाइन से लाइन की दूरी 12 फिट और प्लांट से प्लांट की दूरी 7 फिट रखी जाती है, एक एकड़ खेत में 518 पौधे लगाए जाते हैं। अप्रैल महीने में बुवाई के बाद सितम्बर महीने में फलियां बाजार में बिकनी शुरू हो जाती हैं।” गर्मी के मौसम में 10 रुपए किलो और सर्दियों के मौसम में 40 रुपए किलो के हिसाब से बिकती हैं। बारिश के मौसम को छोड़कर सहजन के पेड़ में दो बार फलियां लगती हैं।

पशुओं के चारे के रूप में उपयोगी

चारे के रूप में इसकी पत्तियों के प्रयोग से पशुओं के दूध में डेढ़ गुना और वजन में एक तिहाई से अधिक की वृद्धि की रिपोर्ट है। कुपोषण, एनीमिया (खून की कमी) में सहजन फायेदमंद होता है।

औषधीय गुणों से भरपूर

डॉ. रजनीश मिश्र ने बताया कि सहजन को अंग्रेजी में ड्रमस्टिक कहा जाता है। इसका वनस्पति नाम मोरिंगा ओलिफेरा है। फिलीपीन्स, मैक्सिको, श्रीलंका, मलेशिया आदि देशों में भी सहजन का उपयोग बहुत अधिक किया जाता है। दक्षिण भारत में व्यंजनों में इसका उपयोग खूब किया जाता है। सेंजन, मुनगा या सहजन आदि नामों से जाना जाने वाला सहजन औषधीय गुणों से भरपूर है। इसके अलग-अलग हिस्सों में 300 से अधिक रोगों के रोकथाम के गुण हैं। इसमें 92 तरह के मल्टीविटामिन्स, 46 तरह के एंटी आक्सीडेंट गुण, 36 तरह के दर्द निवारक और 18 तरह के एमिनो एसिड मिलते हैं।

गर्मी में भी बंपर उत्पादन देगी गेहूं की यह नई किस्म

करनाल: भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (PUSA) ने गेहूं की पांच व जौ की तीन किस्में रिलीज की हैं। इसमें गेहूं की डीबीडब्ल्यू-173 गर्मी में भी बंपर उत्पादन देगी। शोध में एक हेक्टेयर में इसका उत्पादन 70 क्विंटल तक आया है। इस किस्म के लिए हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के ऊना जिला अनुकूल है।

इन क्षेत्रों में किए गए शोध के बाद आए सफल परिणाम के बाद इस वेरायटी को रिलीज कर दिया गया है। इसके अलावा पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा व असम के क्षेत्र के लिए एचआइ-1612, डीबीडब्ल्यू-168, यूएएस-375 और एचआइ-8777 को रिलीज किया गया है। इसके अलावा जौ की डीडब्ल्यूआरबी-137, आरडी-2899 और आरडी-2907 की किस्म रिलीज की गई है।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

संस्थान के निदेशक डॉ. ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि इन वेरायटी के रिलीज होने के बाद इनका सीड तैयार किया जाएगा। उसके बाद यह मार्केट में उपलब्ध होगी। किसी भी वेरायटी को रिलीज करने के बाद पूर्ण रूप से किसानों तक लाने के लिए करीब दो साल लग जाते हैं, क्योंकि किसानों की डिमांड के अनुसार बीज तैयार किया जाता है। डीबीडब्ल्यू 173 की बिजाई नवंबर के आखिरी सप्ताह से लेकर दिसंबर के दूसरे सप्ताह तक की जा सकती है। यह फसल 118 से 120 दिन में तैयार हो जाती है।

पर्यावरण के गर्म मिजाज से लड़ेगी नई किस्म

कई वेरायटी में यह देखने में आया है कि मार्च माह में जब तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है तो दाना पिचकना शुरू हो जाता है, लेकिन डीबीडब्ल्यू 173 में ऐसा नहीं होगा। यह किस्म दो से चार डिग्री सेल्सियस अधिक तापमान को भी सहन कर सकेगी। इसके अलावा इसमें रोग प्रतिरोधक क्षमता भी अन्य किस्मों से ज्यादा है। इसमें आयरन की मात्र 41 पीपीएम यानि पार्ट्स पर मिलियन है।

(दैनिक जागरण से साभार)