आ गया बोलने वाला ट्रेक्टर अब बोल कर बताएगा अपना हाल

क्या होगा अगर आप का ट्रेक्टर बोलने लगे, जी हाँ यह सच हो चूका है अब ट्रेक्टर बोल कर अपनी जरूरत अपने मालिक को बताएगा। ट्रेक्टर बताएगा की उस को कब उसको तेल और सर्विस की जरूरत है ।अगर ट्रेक्टर गर्म हो रहा हो तो भी पता चल जायगा

यही नहीं अगर ट्रेक्टर चोरी हो जाए तो वो अपने मालिक को अपनी जगह बताएगा की वह कहाँ पर है । इतना ही नहीं और भी बहुत कुश बताएगा ।जो किसान ट्रेक्टर किराए पर देते है जा जिनके ड्राइवर ट्रेक्टर चलते है उन सब के लिए यह तकनीक बहुत ही लाभदायक है ।

यह सपना पूरा किया है न्यू हॉलैंड और जॉन डियर कंपनी ने । यहाँ न्यू हॉलैंड ट्रेक्टर कंपनी अपने ट्रैक्टर में sky watch तकनीक लांच की है ।वहीँ जॉन डियर कंपनी ने JDLINK तकनीक का अविष्कार क्या है । इन तकनीक में ट्रेक्टर में GPRS और GPS से काम करती है ।

इस तकनीक का फ़ायदा यह होता है की ट्रेक्टर में होने वाली कोई भी गड़बड़ी का पता पहले ही किसान को मिल जाती है । ट्रेक्टर इस बारे में जानकारी आप को SMS के जरिए आप के मोबाइल फ़ोन पर भेजता रहता है

यह तकनीक सिर्फ कुश चुने हुए मॉडल्स पर ही उपलब्द है जैसे न्यू हॉलैंड के 5500 और 3630 में और जॉन डियर कंपनी के 5045 डी , 5050 डी और सारे E मॉडल्स पर उपलब्द है ।नए ट्रैक्टर्स के इन मॉडल्स पर यह सुविधा फ्री में उपलब्द है लेकिन आप अपने पुराने ट्रेक्टर पर इस सुविधा का फ़ायदा उठाना चाहते है तो सिर्फ 18000 रु देकर इसे लगवा सकते है ।

यह तकनीक कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो देखें

आ गया 6750 रूपए कीमत का नैनो बायोगैस प्लांट

यह नैनो बायोगैस प्लांट (nano bio gas plant)बायोटेक इंडिया जो के केरला में है द्वारा त्यार क्या गया है । इसमें आप पशुओं का गोबर ,गली सड़ी सब्जियां ,या फिर कोई भी जैविक कचरा डाल सकते है ।

बायोटेक इंडिया की तरफ से नैनो बायोगैस प्लांट के दो मॉडल त्यार किए गए है । पहला मॉडल 45 लीटर का है और दूसरा मॉडल 160 लीटर का है । छोटा मॉडल 10 -20 लीटर गैस पैदा करता है जब की बड़ा मॉडल 30 – 50 लीटर बायोगैस पैदा करता है ।

दोनों मॉडल के ऊपर एक फ्लोटिंग टैंक है । जिसमे गैस भर जाने पर वो ऊपर आ जाता है । छोटे मॉडल का मूल्य 6750 रु और बड़े मॉडल का मूल्य 9950 रु है ।यह मॉडल इतने छोटे होते है के आप इन्हे अपनी रसोई में भी रख सकते है इसके इलावा आप इसको एक जगह से दूसरी जगह पर आसानी से ले कर जा सकते है ।

फ़िलहाल इन मॉडल को स्कूल,कॉलेज, यूनिवर्सिटी में बच्चों को जैविक ऊर्जा के बारे में जागरूक करने के लिए इस्तेमाल क्या जा रहा है । लेकिन आप इसे घर पर भी इस्तेमाल कर सकते है ।

इस दोनों नैनो मॉडल के इलावा भी बायोटेक कंपनी कुश बड़े मॉडल भी त्यार करती है जो इस से ज्यादा गैस पैदा कर सकते है और आपको किसी भी तरह की एलपीजी गैस की जरूरत नहीं पड़ती ।

 

बायोटेक इंडिया सारे भारत में होम डिलीवरी भी करती है जिसका कोई अलग से खर्चा नहीं लिया जाता । हर बायोगैस प्लांट के साथ एक चूल्हा और जरूरी सामान दिए जाता है ।

इस मॉडल और दूसरे मॉडल को आप ऑनलाइन इंटरनेट पर पैसे दे कर ले सकते है ।ज्यादा जानकारी के लिए बायोटेक इंडिया के वेबसाइट(biotech-india.org) पर चेक करें जा फोन 91-471-2331909 पर संपर्क करें ।इसके इलावा भी आप ई कॉमर्स वेब्सीटेस जैसे snapdeal ,Amazon India आदि वेब्सीटेस से भी मंगवा सकते है

ध्यान रहे यह सारी जानकारी इंटरनेट से ली गई है इस लिए कोई भी आर्डर करने से पहले अपनी तरफ से पूरी तसल्ली कर ले ।

नैनो बायोगैस कैसे काम  करता है वीडियो भी देखें 

रोज 33 किसान कर रहे है ख़ुदकुशी और किसान से जुड़े कारोबारी कमा रहे है करोड़ों

अब खेती करना बहुत मुश्किल हो गया है। पिछले 15 साल से हर बार नुकसान हो जाता है, इसलिए लगातार कर्ज में हैं। हालात इतने खराब हैं कि 10 साल (2001-2011) में देश में 90 लाख किसान कम हो गए हैं और 3.8 करोड़ खेतिहर मजदूर बढ़ गए हैं। वहीं, किसानी और खेती से जुड़े कारोबार तेजी से बढ़ रहे हैं। किसान को भले ही फायदा न हो रहा हो, लेकिन इनके जरिए कमाई करने वालों का कारोबार अच्छा चल रहा है। देश में पंपसेट, स्प्रिंकलर, पाइप और केबल का सालाना बिजनेस करीब एक लाख करोड़ रुपए का है। हर साल एवरेज 12000 किसान कर रहे खुदकुशी…

– हर साल किसान की खेती करने की लागत 7-8 फीसदी बढ़ गई है। जबकि इस साल पिछले चार साल की तुलना में अनाज और दालों की कीमतें सबसे नीचे चल रही हैं। वहीं दूसरी ओर खेती संबंधी तमाम कामों से जुड़ी कंपनियाें का लाभ हर साल करोड़ों रुपए में आ रहा है।
– केंद्र सरकार की ओर से मई में सुप्रीम कोर्ट में दी जानकारी के मुताबिक 2013 से लगातार हर साल एवरेज 12 हजार से ज्यादा किसान खुदकुशी कर रहे हैं। यानी रोजाना करीब 33 किसान।

किसानों के भरोसे चल रहे इन काराेबार में खूब मुनाफा:

1. फर्टिलाइजर

– सिर्फ तीन बड़ी कंपनियों की कमाई 1200 करोड़ रुपए
– देश में किसानों की हालत भले ही खराब हो, लेकिन फर्टिलाइजर की सबसे बड़ी तीन कंपनियों को 2016-17 के दौरान 1255.23 करोड़ का फायदा हुआ था। यह पिछले साल की तुलना में 37.45 फीसदी ज्यादा था। यानी साल दर साल इनकी आमदनी तो बढ़ रही है। सरकार इन्हें सब्सिडी भी देती है। इस बजट में 70 हजार करोड़ सब्सिडी का प्रावधान है।

2. पंप

कंपनियां 125 करोड़ के लाभ में, किसानों को महंगा लोन
– देश की तीन प्रमुख पंप सेट्स बनाने वाली कंपनियों का शुद्ध लाभ 2016-17 में 125.29 करोड़ रुपए हुआ। पंपसेट, स्प्रिंकलर, पाइप और केबल का बाजार सालाना करीब एक लाख करोड़ रुपए का है। कृषि उपकरण और ट्रैक्टर जैसी चीजों के लिए लोन 12% की दर पर मिलता है, जबकि कार के लिए 10% से कम पर ब्याज पर मिल जाता है।

3. पेस्टीसाइड्स

टॉप कंपनियों काे हुआ 900 करोड़ मुनाफा, 22% ज्यादा
– इस क्षेत्र की टॉप तीन कंपनियों ने 2016-17 में 895.89 करोड़ रुपए का शुद्ध लाभ कमाया। पिछले साल के मुकाबले यह 22.8 फीसदी अधिक था। पिछले फाइनेंशियल ईयर में इन्हीं कंपनियों ने 729.46 करोड़ रुपए का शुद्ध मुनाफा कमाया था। 2014-15 में ही देश इसका कारोबार 28,600 करोड़ रु. पहुंच गया था। जो 7.5 फीसदी से हर साल बढ़ रहा है।

4. बीज

– प्रमुख कंपनियों को 85 करोड़ का फायदा, टैक्स में भी छूट
– देश की बीज तैयार करने वाली तीन बड़ी कंपनियों को 2015-16 में 85.47 करोड़ रुपए का मुनाफा हुआ है। ब्रांडेड बीज कारोबार हर साल करीब 10% की रफ्तार से बढ़ रहा है। बीज का कारोबार 35 हजार करोड़ रुपए पर पहुंच गया है। किसान की फसलें सस्ती बिकती हैं, लेकिन बीज महंगा होता जा रहा है। सरकार बीज कंपनियों को टैक्स में भारी छूट भी देती है।

5. ट्रैक्टर्स

इन्होंने ट्रैक्टर बेचकर कमाया किसानों से 5300 करोड़
– देश में ट्रैक्टर बनाने वाली प्रमुख तीन कंपनियों की 2016-17 में कुल आय करीब 5300 करोड़ रुपए रही। इससे पहले के साल में यह करीब 4500 करोड़ रुपए थी। कंपनियों की आय करीब 17 फीसदी बढ़ी। देश में हर माह 50 लाख ट्रैक्टर बिक रहे हैं। जीएसटी लागू होने के बाद किसानों को प्रति ट्रैैक्टर करीब 30 हजार रुपए और चुकाने पड़ सकते हैं। सीआईआई के मुताबिक 2016-17 के दौरान देश में कुल 6,61,195 ट्रैक्टर बिके। अप्रैल 2017 में 54217 ट्रैक्टर खरीदे गए।

कर्ज ही नहीं, इन वजहों से भी खेती से हाथ खड़े कर रहे हैं किसान

पिछले कुछ दिनों से मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के किसान अपनी फसलों के बेहतर मूल्य और कर्ज माफी के लिए विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। हालांकि कृषि उत्पादों पर कम मूल्य और कर्ज का बढ़ता बोझ ही उनकी मुख्य समस्याएं नहीं हैं। दरअसल कृषि के ढांचे में ही कुछ ऐसी समस्याएं हैं, जिनका कर्ज माफी जैसे अस्थाई उपायों से समाधान नहीं हो सकता। कृषि क्षेत्र की वर्तमान हालत पर नाबार्ड के पूर्व चेयरमैन प्रकाश बक्शी कहते हैं, ‘ऐसा लगता है कि यह अव्यवस्था हाल ही में हुई गड़बड़ियों की वजह से पैदा हुई है, लेकिन इस समस्या की जड़ें काफी गहरी हैं।’ जानें, क्या हैं खेती की समस्याएं और क्या हो सकते हैं उनके समाधान…

जोत छोटी होती गई और समस्या बढ़ती रही
पीढ़ी दर पीढ़ी खेती के विभाजित होने से खेतों का आकार घटता जा रहा है। खेतों का आकार छोटा होने से कृषि उत्पादन और फसलों से होने वाली बचत में कमी आ रही है। 1970-71 में 7 करोड़ किसानों के पास 16 करोड़ हेक्टेयर जमीन थी। इन किसानों में से 4.9 करोड़ किसान छोटे और सीमांत किसान थे, जिनके पास 2 हेक्टेयर तक की खेती थी। 2010-11 में किसानों की संख्या लगभग दोगुनी होकर 13.8 करोड़ तक पहुंच गई, जबकि छोटे और सीमांत किसानों की संख्या भारी उछाल के साथ 17.7 करोड़ हो गई। इन आंकड़ो से खेतों के विभाजन की दर को आसानी से समझा जा सकता है। इस दर के साथ 2040 तक भूस्वामियों की संख्या 18.6 करोड़ हो जाएगी।

छोटे खेत क्यों हैं घाटे का सौदा?
छोटे खेत वाले किसानों के पास खेती के पर्याप्त साधन, सिंचाई की व्यवस्था आदि का अभाव होता है और इस सब के लिए उन्हें बड़े किसानों पर निर्भर रहना पड़ता है। वहीं, बड़े किसानों की संख्या भी समय के साथ घट रही है। ऐसे में छोटे किसानों के लिए खेती के साधन जुटाना बेहद मुश्किल होता जा रहा है। इसके अलावा क्रय-विक्रय में छोटे किसानों की मोलभाव क्षमता भी कम होती है। ऐसे में जैसे-जैसे खेतों का आकार छोटा होता जा रहा है, किसानों को होने वाला फायदा भी कम होता जा रहा है। हर 5 साल में कृषि क्षेत्र में 1 करोड़ छोटे किसान जुड़ रहे हैं। अगर यह दर बरकरार रही तो आने वाले समय में कृषि क्षेत्र के हालात बेकाबू हो सकते हैं।

लैंड लीज पॉलिसी बदलना जरूरी

यदि सरकार ऐग्रिकल्चर लैंड लीज पॉलिसी में सुधार करती है और जमीन के मालिकाना हक से जुड़े कानून को बदलती है तो छोटे किसान लंबे समय तक अपनी जमीन को बटाई या फिर लीड पर दे सकेंगे। फिलहाल इस नियम के चलते छोटे किसान जमीन का मालिकाना हक गंवाने के डर से खेती लीज पर नहीं देते। यदि लैंड को लीज पर देना वैध हो जाए तो छोटे किसान अपनी जमीन पर खेती के प्रति आकर्षित होंगे।

किसानों के लिए विकल्पों की तलाश जरूरी
खेती अकेले किसानों और ग्रामीण मजदूरों को रोजगार नहीं दे सकती है। सरकार को खेती से जुड़े लोगों को दूसरे व्यवसायों में अवसर देने के उपाय करने होंगे। ऐसे लोगों में वैकल्पिक स्किल्स पैदा करने और रोजगार के अवसर मुहैया कराने होंगे। यही नहीं ऐसे लोगों को अस्थायी रोजगार देने पर भी फोकस करना होगा।

किसान ने देसी जुगाड़ से बना लिया अपना कोल्ड स्टोर अब ख़राब नहीं होता प्याज

किसान रोहित पटेल मध्य प्रदेश के धार जिले के रहने वाले हैं। देशी तकनीक के जरिए रोहित पटेल ने प्याज स्टोरेज का ऐसा कारगर जुगाड़ निकाला है कि हर साल प्याज बेच कर ठीक ठाक लाभ कमा रहे हैं। कोल्ड स्टोरेज की वजह से रवि पटेल अपने प्याज खेत से निकालकर तुरंत नहीं बेचते, कुछ दिन

अपने देशी जुगाड़ तकनीक के कोल्ड स्टोरेज में रखकर प्याज के ठीक ठाक दाम मिलने का इंतजार करते हैं और फिर बेचते हैं। प्याज को खेत से निकालते ही 2 से 3 रुपए किलो के भाव पर बेचने के बजाय बारिश का मौसम बीत जाने के बाद रवि पटेल 30 से 35 रुपए किलो में बेच कर लाभ कमा रहे हैं। तीसरे साल भी उन्होंने प्याज का इसी तकनीक से स्टोरेज किया है।

दरअसल रोहित ने प्याज के कोल्ड स्टोरेज तैयार करने के लिए कोई भारी भरकम इंतजाम नहीं किया है। थोड़ा सा दीमाग लगा कर उन्होंने उपोयगी बंदोवस्त किया है। बंद कमरे में लोहे की जाली को जमीन से 8 इंच ऊंचा बिछा देते हैं रवि। ऐसा करने के लिए कुछ-कुछ दूरी पर दो-दो ईंटें रखते हैं।

उसके ऊपर प्याज का स्टोरेज करते हैं। लगभग 100 स्क्वेयर फीट की दूरी पर एक बिना पेंदे की कोठी रखते हैं। ड्रम के ऊपरी हिस्से में एग्जॉस्ट पंखे लगा देते हैं। पंखे की हवा जाली के नीचे से प्याज के निचले हिस्से से उठ कर ऊपर तक आती है। इससे पूरे प्याज में ठंडक रहती है। दोपहर में हवा गर्म होती है, इसलिए दिन की बजाय रातभर पंखे चलाते हैं।

पटेल ने इस तकनीक से 1000 क्विंटल प्याज का भंडारण किया है। 2000 क्विंटल और खेतों में हैं, जो इसी तरह भंडारण करने वाले हैं। पिछले साल उन्होंने बारिश बाद 200 क्विंटल प्याज 35 रु. किलो के भाव बेचे थे।

पटेल बताते हैं कि इस तकनीक से 80 फ़ीसदी तक प्याज को सड़ने से बचाया जा सकता है। रोहित के मुताबिक कोल्ड स्टोरेज तैयार करने से पहले जहां 10 प्याज खराब होते थे, तो अब 2 होते हैं। इसकी वजह बताते हुए रवि कहते हैं कि किसी प्याज में सड़न लगती थी, तो आसपास के प्याज खराब कर देता था। अब कोई प्याज सड़ता है तो पंखे की हवा से वहीं सूख जाता है।

अपनी जुगाड़ पर फुले नहीं समा रहे रोहित बतात हैं कि प्याज की फसल अमूमन मार्च-अप्रैल में निकलती है। इस समय आवक अधिक होने से प्याज का मंडी भाव 2 से 3 रु. किलो तक पहुंच जाता है। बारिश के बाद यही भाव 30 से 35 रु. किलो न्यूनतम होता है लेकिन प्याज गर्मी से जल्दी खराब होने के कारण इसका स्टोरेज किसान के लिए चुनौती होता है।

ज़ाहिर है अपने जुगाड़ से रवि ने अपने लिए एक लाभकारी रास्ता तो तैयार कर लिया। जरा जोर आप भी लगाएंगे तो आप भी ऐसा कुछ कर पाएंगे। फिलहाल आप अपने प्याज को इस तरीके से सड़ने से बचाइए और बेहतर आमदनी का इंतजाम कीजिए।

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बेकार प्लास्टिक की बोतल से ऐसे बनायें चूहा पकड़ने का ट्रैप

चूहों की संख्या मई-जून माह में कम होती है, यही समय चूहा नियंत्रण अभियान के लिए सही समय होता है, यह अभियान सामूहिक रूप में चलाना चाहिए। चूहे खेत खलिहानो, घरों और गोदामों में अनाज खाने के साथ-साथ ही अपने मलमूत्र से अनाज बर्बाद कर देते हैं।

एक जोड़ी चूहा एक वर्ष में 800-1000 की संख्या में बढ़ जाते हैं,अगर चूहों के संख्या कम हो तो आप प्लास्टिक की बोतल का ट्रैप बना कर भी चूहों को पकड़ सकते है ।इस तरिके से आप को कोई खर्चा भी नहीं होगा और किसी खतरनाक दवाई की भी जरूरत नहीं पड़ेगी ।

इस तरीके से आप घर पर भी आसानी से चूहों को पकड़ सकते हैं। आज हम आपको बताते है कि कैसे आप घर पर चूहे पकड़ने की मशीन बना सकते है।

जरूरत का सामान

  • प्लास्टिक की बोतल
  • कैंची
  • स्टिकस
  • रबड़ बैंड
  • थ्रेड
  • यू क्लिप

बनाने का तरीका

  1. सबसे पहले प्लास्टिक की बोतल का ऊपरी हिस्सा कैंची से काट लें। ध्यान रखें कि उसे सिर्फ एक ही साइड से काटना है।
  2. अब बोतल के दोनों हिस्सों पर दो इंच के गेप से दाए और बाए साइड होल करके दो स्टिक्स आड़ी फंसा दें।
  3. ध्यान रखें कि ये दोनों स्टिक्स पैरेलर हो। अब इन दोनों स्टिक्स पर रबड़ बैंड दोनों ओर फंसा दें।
  4. अब एक मजबूत धागा लें और बोतल के मुंह में लगाकर ढक्कन बंद कर दें। इस बात का ध्यान रखें कि धागे की लंबाई इतनी होनी चाहिए कि उसेे खिंचने पर बोतल का कटा हिस्सा खुल सकें।
  5. अब यू क्लिप का किनारा सीधा करके उसमें खाने की चीज फंसा दें। इसे बोतल के अंदर हाथ डालकर तली से बाहर निकालें।
  6.  धागे के हिस्से पर नॉट बनाकर इस यू क्लिप के बाहर निकले नुकीले हिस्से पर लटका दें।

इस ट्रैप को कैसे बनाते है इसके लिए वीडियो देखें

अब फसल अवशेषों से बनेगा पशुओं के लिए पौष्टिक चारा 

फसलों की कटाई के बाद ज्यादातर किसान फसल अवशेषों को खेत में ही जला देते हैं, जिससे मिट्टी की सेहत पर असर पड़ता है।नरवाई में आग लगाने से मिट्टी की 6 इंच ऊपर की परत जो उपजाऊ व कृषि योग्य होती है वह कठोर हो जाती है।

साथ ही मिट्टी में पड़े कार्बनिक पदार्थ, सूक्ष्म पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। मिट्टी में पाए जाने वाले सूक्ष्म जीवाणु जो उपज बढ़ाने में सहायक होते हैं वह नष्ट हो जाते हैं। भूमि का तापक्रम बढ़ने से आसपास के वातावरण पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। जैव विविधता भी बुरी तरह प्रभावित होती है। इस लिए किसानों को नरवाई को जलाकर नष्ट करने का प्रयास नहीं करना चाहिए।

अब विज्ञानकों ने एक ऐसी तकनीक का इज़ाद क्या जिस से फसल अवशेषों को जलने की जगह पर इस से पशुओं के लिए पौष्टिक चारा बन सकेगा । नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट ने नया तरीका निकाला है, जिसमें फसल अवशेष को अमोनिया से ट्रीट करके दुधारू पशुओं के लिए पौष्टिक आहार बनाया जा रहा है।

नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट करनाल के वैज्ञानिकों का कहना है यदि रिसर्च में सफलता मिली तो दूसरे चरण में इसकी गोलियां बनाई जाएगी। यह न केवल पौष्टिक होगी व इनके स्वाद के कारण पशुओं को खिला सकते हैं। इसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर भूसा अथवा अवशेषों के मुकाबले आसानी से ले जाना अासान होगा। इसे मवेशियों को खली की तरह खिलाया जा सकेगा।

दल के प्रमुख और पशु पोषण विभाग अध्यक्ष डॉ. त्यागी ने बताया, “अभी 100 गाय-भैंस को अमोनिया ट्रीटमेंट का पौष्टिक चारा दिया जा रहा है। इसके बाद उनके स्वास्थ्य पर नजर रखी जा रही है। दूध निकालकर रोजाना रीडिंग नोट की जा रही है। अभी तक दूध उत्पादन 10-15 फीसदी बढ़ा है। दूध की गुणवत्ता में भी सुधार हुआ है।”

बगीचे में काम करते वक़्त मिली ऐसी चीज़ के माली हो गया मालोमाल

किसकी किस्मत कब खुल जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। आपको भी जानकर विश्वास नहीं होगा कि काम करते वक्त उस माली को क्या मिला। दरअसल उस माली के हाथ ऐसी कीमती चीज लगी है जिससे उसकी किस्मत का पिटारा खुल सकता है।

हर दिन की तरह वह उस दिन भी मालिक के कहने पर बागीचे में काम करने गया, उसे नहीं पता था कि उसकी किस्मत खुलने वाली है। उसने काम शुरू किया और जैसे ही बागीचे के एक पुराने पेड़ (ओक) के पास जमी मिट्टी को साफ करने गया, उसे कीमती चीज मिली।

दरअसल वो आदमी ब्रिटेन का रहने वाला है, उसके मालिक ने अपना खेत और बागीचा उसके हवाले कर रखा है। जिसकी हर दिन की सफाई और देख रेख 60 साल का वो माली ही करता है जिसका नाम Steve Fletcher है।

पहले तो उसे लगा कि कोई फालतू चीज उसे मिली है लेकिन बाद में उसे सच्चाई पता चली।  जी हां, उसके हाथ ‘ब्लैक गोल्ड’ लगा है। दरअसल ये ब्लैक गोल्ड एक फंगस (कवक) का होता है। जिसकी कीमत भारतीय बाजार में लगभग 20 लाख रुपए है। अगली स्लाइड में जानिए क्या होता है ब्लैक गोल्ड।

एक तरह का फंगस जिसे ‘ब्लैक ट्रफल’ कहते हैं जिसे फ्रांस, जर्मनी, इटली और विदेशों में बड़ा चाव से लोग खाते हैं। इस ब्लैक ट्रफल को ब्लैक गोल्ड भी कहते हैं। ये बहुत कीमती होता है। इसे तरह तरह के खाद्य पद्वार्थ भी बनाए जाते हैं।

किसान जो सीड बाल से खेती कर कमा रहा है पचास लाख सालाना की कमाई

मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में मूल रूप से खोजनपुर गांव के रहने वाले राजू टाईटस ने पिछले 30 वर्षों से 12 एकड़ जमीन में न कभी हल चलाया और न ही मिट्टी के प्राकृतिक रूप से छेड़छाड़ की है। ये अपने खेतों में बाजार से खरीदी गयी खाद और कीटनाशक का इस्तेमाल नहीं करते हैं, बीजों की सीड बाँल बनाकर खेतों में बुआई करते हैं। इस खेती से राजू टाईटस सालाना पचास से साठ लाख की कमाई भी करते है।

बीजों को जब क्ले मिटटी की परत से 1/2 इंच से लेकर 1 इंच तक की गोल गोल गोलियां से सुरक्षित कर लिया जाता है उसे सीड बॉल कहते हैं।सीड बाँल बनाने के लिए अगर ये मिट्टी गीली है तो बीज के साइज के हिसाब से इसकी गोलियां बना लेते हैं उसके अन्दर बीज भी भर देते हैं, इन गोलियों को सूखा लेते हैं और बरसात आने पर अपने खेतों में फेंक देते हैं।

गर्मियों की छुट्टियों में आसपास के बच्चे खेल-खेल में ये सीड बाँल बनाने के लिए हमारे फॉर्म पर आ जाते हैं, ये बाँल साल भर तक खराब नहीं होती हैं और बीज सुरक्षित रहता है, बरसात से पहले इन बालों को बनाकर सुखाने के बाद इन्हें खेतों में बिखरा देते हैं, बीज चिड़ियां और चूहे नही खा सकते।

इस तरह से बोआई करने से एक एकड़ में लगभग 20 कुंतल की उपज हो जाती है जिससे चार पांच लाख की वार्षिक आय हो जाती है, अब तो कई जगह के किसान इसे देखने आते हैं, बकरी पालन भी किया है इससे शुद्ध दूध मिल जाता है और आसपास जमे खरपतवार ये साफ़ कर देती हैं।

होशंगाबाद जिले से डेढ़ किलोमीटर दूर ‘टाईटस फॉर्म’ के नाम से मशहूर इनके फॉर्म को सब जानते हैं। बिना रसायन 30 वर्षों से लगातार खेती कर रहे राजू बताते हैं के अगर हम प्रकृति के साथ छेड़छाड़ न करें तो हमे खेती करने में किसी भी प्रकार की कोई असुविधा नहीं होगी, जुताई करने से असंख्य जीवाणु तो नष्ट होते ही है साथ ही झाड़ियाँ भी काट देते हैं

झाड़ियाँ काटने से असंख्य जीव-जन्तु, कीड़े-मकोड़े मर जाते हैं, पेड़ो के साथ झाड़ियाँ और झाड़ियों के साथ घास और अनेक वनस्पतियां रहती हैं जो एक दूसरे की पूरक होती हैं, अगर हम जुताई नहीं करते हैं तो हमारे खेत असंख्य वनस्पतियों से भर जाते हैं, बकरी पालन करते हैं जिससे खरपतवार का नियंत्रण होता है।

 

 

जीएसटी बिल से इतने रुपए बढ़ जायगी ट्रेक्टर की कीमत

पूरे देश में जहां एक ओर किसान कर्ज माफी को लेकर आंदोलन कर रहे हैं दूसरी ओर उनके ऊपर एक और आफत आने जा रही है। यह नई आफत है जीएसटी की मार। जीएसटी के चलते ट्रैक्टर के इनपुट कास्ट में 25 हजार रुपये की बढ़ोत्तरी होने जा रही है।वस्तु एवं सेवाकर (जीएसटी) के प्रभाव से किसान भी अछूते नहीं रहेंगे। आधुनिक खेती में अहम बन चुके ट्रैक्टर पार्टस भी महंगे हो जाएंगे। इसके चलते अब किसानों को ट्रैक्टर खरीदना महंगा पड़ेगा।

ट्रैक्टर पर पहले कोई ड्यूटी नहीं लगती थी इसे अब 12 फीसदी के दायरे में रखा गया है। वहीं एसोसिएशन की मांग है कि कंपोनेंट ड्यूटी को 28 फीसदी की जगह रखा जाए। ऐसा करने से ट्रैक्टर पर पड़ने जा रहे 25 हजार रुपये के बोझ से बचा जा सकेगा। किसानों की कर्ज माफी आंदोलन के बाद यह बड़ा मुद्दा हो सकता है।

हाल ही में 66 आइटम पर जीएसटी के रेट रिलीज किए गए हैं जो कि 18 फीसदी के दायरे में आएंगे। इसके लागू करने में 28 फीसदी की इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर और 18 फीसदी का आउटपुट वास्तव में राहत कम दे रहा बल्कि मुसीबत ज्यादा ला रहा है।

इसके चलते प्रति ट्रैक्टर को बनाने में कीमत 25 हजार रुपये तक बढ़ जाएगा। जिसके वजह से ट्रैक्टर इंडस्‍ट्री पर 1600 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार आएगा। यह जानकारी ट्रैक्टर मैन्यूफैक्चरर एसोसिएशन के द्वारा एक रिलीज के जरिए जारी की गई है।

एसोसिएशन के मुताबिक कई कृषि संबंधी उपकरणों पर राहत है लेकिन ट्रैक्टर के अधिकतर पुर्जों जैसे की इंजन ट्रांसमिशन व अन्‍य उपकरण जीएसटी के 28 फीसदी के दायरे में आते हैं जिसके वजह से ट्रैक्टर की कीमत में बढ़ोत्तरी होनी तय है।

एसोसिएशन ने इसके तहत मांग की है कि ट्रैक्टर में प्रयोग होने वाले हर उपकरण को जीसएटी के 18 फीसदी के दायरे में ही रखा जाना चाहिए। क्योंकि सिर्फ एप्लीकेशन को टैक्स के कम स्लैब में रखकर किसानों को मदद नहीं की जा सकती।