वाटर एटीएम से करें हर महीने 25-50 हजार रुपए तक की कमाई

पानी एक ऐसी चीज़ है जिसके बिना दुनिआ का कोई भी इंसान जिन्दा नहीं रह सकता । इस लिए पानी से जुड़ा हुआ कोई भी बिजनेस कभी फेल नहीं हो सकता ।शुद्ध पानी की होती कमी आपके लिए एक बेहतर बिजनेस और पैसा कमाने का मौका दे रही हैं।

क्योंकि अब भारतीय रेलवे, मेट्रो, रोड ट्रांसपोर्ट से लेकर प्राइवेट कंपनियां भी वॉटर एटीएम इन्स्टॉल करा रही है। ऐसे में आप वाटर एटीएम की फ्रेंचाइजी लेने से लेकर एटीएम लगाने के लिए स्पेस देने का बिजनेस कर हर महीने आसानी 25-50 हजार रुपए तक की हर महीने कमाई हो सकती।स्कूलों ,मार्केट, हाईवे पर पेट्रोल पंप्स,अस्पताल,बस स्टॉप,शॉपिंग मॉल,ऑफिस में भी आप वाटर एटीएम इन्स्टालेशन कर सकते हैं।

क्या है वाटर एटीएम

जिस तरह अभी पैसे निकालने के लिए जगह-जगह बैंक एटीएम लगाते हैं। उसी तरह आप वाटर एटीएम लगा सकते हैं। जिसके जरिए यूजर आसानी से शुद्ध पानी ले सकता है। यूजर वाटर एटीएम में क्वॉइन या नोट के जरिए पानी को छोटे गिलास से लेकर 20 लीटर तक तक के जार में ले सकता है। इस तरह के एटीएम में इनबिल्ट आरओ सिस्टम होता है।

सप्लाई का कर सकते है बिजनेस

वाटर एटीएम अभी बहुत कम जगहों पर लगे हैं। ऐसे में आपके लिए मौके काफी है। इसके तहत आप कंपनियों के लिए वाटर सप्लाई का भी बिजनेस कर सकते हैं। जिसके तहत आप सीधे ही वॉटर एटीएम बनाने वाली कंपनियों से खरीद कर सप्लाई कर सकते हैं।

महाराष्ट्र, गुजरात में कई कंपनियां है, जो वॉटर एटीएम बनाती हैं। साइज के आधार पर वाटर एटीएम की कीमत 25 हजार रुपए से लेकर 6 लाख रुपए तक औसतन है। इसके अलावा वाटर एटीएम लगाकर आप शुद्ध पानी की सप्लाई भी घरों और ऑफिस में कर सकते हैं। स्कूलों में भी आप वाटर इन्स्टालेशन कर सकते हैं।

 

फ्रेंचाइजी बिजनेस का भी है मौका

वाटर एटीएम के लिए आप फ्रेंचाइजी भी ले सकते हैं। इसके तहत अब कंपनियां फ्रेंचाइजी का ऑप्शन दे रही हैं। पिरामल सर्वजल कंपनी वाटर एटीएम के लिए अभी फ्रेंचाइजी दे रही हैं। जो कि 12 राज्यों में एक्सपेंशन कर रही है। इसके तहत कंपनी ने करीब 570 इन्स्टॉलेशन किए हैं। कंपनी की वेबसाइट पर जाकर आप फ्रेंचाइजी लेने के लिए संपर्क कर सकते हैं।

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नौकरी छोड़ 60 हज़ार की लागत से शुरू की मोती की खेती अब कमा रहा है लाखों

जब किसी में कुछ करने की चाह होती है तो वह छोटे कामों से भी अपनी पहचान बना लेते हैं। ऐसा ही कुछ गुड़गांव के फरूखनगर तहसील के गांव जमालपुर के रहने वाले विनोद कुमार ने कर दिखाया। विनोद ने इंजीनियर की नौकरी छोड़कर मोती की खेती शुरू की। जिससे वह 5 लाख रुपए सलाना कमा रहा है। इतना ही नहीं वह दूसरे किसानों को भी इस खेती का प्रशिक्षण दे रहा है।

27 वर्षीय विनोद कुमार का कहना है कि उन्होंने वर्ष 2013 में मानेसर पॉलिटेक्निक से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया। इसके बाद दो साल तक नौकरी की। उनके पिता भी किसान थे। प्राइवेट नौकरी के साथ थोड़ी रूचि खेती में भी थी। इंटरनेट पर खेती की नई-नई तकनीक के बारे में पढ़ते-पढ़ते मोती की खेती के बारे में पढ़ा।

कुछ जानकारी इंटरनेट से जुटाई तो पता चला कि कम पैसे और कम जगह में यह काम किया जा सकता है। मोती की खेती का प्रशिक्षण देने वाला देश का एक मात्र संस्थान सेंट्रल इंस्टिट्यूट ऑफ फ्रेश वॉटर एक्वाकल्चर (सीफा) भुवनेश्वर से मई 2016 में एक सप्ताह का प्रशिक्षण लिया और 20 गुणा 10 फुट एरिया में 1 हजार सीप के साथ मोती की खेती शुरू कर दी।

विनोद कुमार ने बताया कि यह खेती शुरू करने के लिए पानी के टैंक की जरूरत पड़ती है। मेरठ, अलीगढ़ व साउथ से 5 रुपए से 15 रुपए में सीप खरीदी जा सकती हैं। यह मछुआरों के पास मिलती है। इन सीप को 10 से 12 महीने तक पानी के टैंक में रखा जाता है। जब सीप का कलर सिल्वर हो जाता है तो मानो मोती तैयार हो गया है।

पूरा सैटअप खड़ा करने में लगभग 60 हजार रुपए खर्च आ जाता है। इस खेती में सबसे अहम काम सीप की सर्जरी करना है। इसके लिए ही विशेष प्रशिक्षण लेना पड़ता है। सीप के अंदर दो मोती पैदा हो सकते हैं। जैसी आकृति उसके अंदर रखी जाती है वैसा ही मोती पैदा हो जाता है। वे भगवान गणेश, शिव, 786 आदि के मोती भी पैदा करते हैं।

विनोद ने बताया कि मोती की कीमत उसकी क्वालिटी देकर तय की जाती है। एक मोती की कीमत 300 रुपए से शुरू होकर 1500 रुपए तक है। इसकी मार्केट सूरत, दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद और कलकत्ता में है। वे वर्ष 2016 से ही अलग-अलग जगह अपने मोती भेजते हैं। एक बार माल जाने लगे तो खरीदार खुद संपर्क में रहते हैं।

विदेशों में भी खासी मांग है लेकिन उसके लिए आपके पास पैदावार अधिक होनी चाहिए तभी एक्सपोर्ट का काम कर सकते हैं। वे खुद 2000 सीप के व्यवसाय से 5 लाख रुपए से ज्यादा की आमदनी ले रहे हैं। विनोद खुद भी किसानों को प्रशिक्षण देते हैं। किसान उनके पास इस खेती का प्रशिक्षण लेने के लिए आते हैं।

जाने क्या है स्वामीनाथन रिपोर्ट और किसानो को इसका क्या लाभ होगा

किसानों की मांग है कि कृषि पर स्वामीनाथन कमीशन की सिफारिशों को लागू किया जाए। साल 2014 की स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को लागू करने का बीजेपी ने वादा किया था।

लेकिन एक आरटीआई के जवाब में केंद्र ने कहा कि  लागत मूल्य पर 50 फीसदी बढ़ोतरी से मंडी में दिक्कतें आ सकती है। लिहाजा इसे लागू करना अभी संभव नहीं है।

क्यों बना था स्वामीनाथन आयोग ?

अन्न की आपूर्ति को भरोसेमंद बनाने और किसानों की आर्थिक हालत को बेहतर करने, इन दो मकसदों को लेकर 2004 में केंद्र सरकार ने एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में नेशनल कमीशन ऑन फार्मर्स का गठन किया। इस आयोग ने अपनी पांच रिपोर्टें सौंपी। अंतिम व पांचवीं रिपोर्ट 4 अक्तूबर, 2006 में सौंपी गयी।

अयोग की सिफारिशों

अयोग की सिफारिशों में किसान आत्महत्या की समस्या के समाधान, राज्य स्तरीय किसान कमीशन बनाने, सेहत सुविधाएं बढ़ाने व वित्त-बीमा की स्थिति पुख्ता बनाने पर भी विशेष जोर दिया गया है। एमएसपी औसत लागत से 50 फीसदी ज्यादा रखने की सिफारिश भी की गई है ताकि छोटे किसान भी मुकाबले में आएं । मतलब की लागत का 50 फीसदी जोड़ कर एमएसपी रखना होगा ।

लागत से 50 फीसदी ज्यादा का मतलब यह होगा जैसे धान का समर्थन मूल्य अभी 1450 रु प्रति क्विंटल है और आपका इस पर लागत आती है 1300 रु तो अगर हम इसका 50 फीसदी जोड़े तो समर्थन मूल्य बनता है 1950 रु जो अब के समर्थन मूल्य से 650 रु ज्यादा होगा ।

इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि सस्ती दरों पर क्रॉप लोन मिले यानि ब्याज़ दर सीधे 4 प्रतिशत कम कर दी जाए। कर्ज उगाही में नरमी यानि जब तक किसान कर्ज़ चुकाने की स्थिति में न आ जाए तब तक उससे कर्ज़ न बसूला जाए।

उन्हें प्राकृतिक आपदाओं में बचाने के लिए कृषि राहत फंड बनाया जाए।और किसानो को फसल बीमा भी देना जरूरी होगा साथ ही आयोग ने कहा था कि किसानों के स्वास्थय को लेकर खास ध्यान देने की जरूरत है. इससे उनकी आत्महत्याओं में कमी आएगी.

गुलाब का इत्र बना के यह किसान करता है 6 एकड़ से 8 लाख की कमाई

किसान मेहनत करता है लेकिन उसको सफलता नहीं मिलती लेकिन कुश ऐसे किसान भी है जो अलग ही सोचते है और कुश ऐसा जुगाड़ कर लेते है के थोड़ी ज़मीन से ही वो बहुत सारा पैसा कमा लेते है ।

ऐसे ही हरियणा के बरोला में रहने वाले एक किसान कुशलपाल सिरोही दूसरे किसानों के लिए मिसाल बन गए हैं। आज वे गुलाब की एक किस्म बुल्गारिया की खेती कर प्रति एकड़ 8 लाख रु  कमा रहे हैं। वे पिछले कुछ सालों से इत्र व गुलाब जल बेच रहे हैं। अरब के देशों में बुल्गारिया गुलाब से बनाए इनके इत्र की खूब डिमांड है।

कैसे बनाते हैं गुलाब का इत्र

कुशलपाल सिरोही के अनुसार, तांबे के बड़े बर्तन में पानी और गुलाब के फूल डाल दिए जाते हैं।इसके बाद ऊपर से मिट्टी का लेप कर बर्तनों के नीचे आग जलाई जाती है।उसके बाद भाप के रूप में गुलाब जल व गुलाब इत्र एक बर्तन में एकत्रित हो जाते हैं, जिस बर्तन में भांप बनकर इत्र जाता है, उसे पानी में डाल दिया जाता है।

गुलाब का इत्र केवल तांबे के बर्तन में निकाला जाता है। कई जगह कंडेंसिंग विधि से भी अर्क निकाला जाता है।लेकिन आसवन विधि ज्यादा कारगर है। एक क्विंटल फूलों में मात्र 20 ग्राम इत्र निकलता है।इंटरनेशनल मार्केट में एक किलोग्राम इत्र का मूल्य करीब आठ लाख रुपए है।

सिर्फ छह एकड़ में करते हैं गुलाब की खेती

कुशलपाल ने बताया कि छह एकड़ में वह गुलाब की खेती कर रहे हैं। नवंबर व दिसंबर में इसकी कलम की कटाई होती है, इसी दौरान कलम लगाई जाती है। मार्च व अप्रैल माह मेें इस पर फूल आने शुरू हो जाते हैं।

गुलाब के फूलों की एक हजार किस्में हैं, लेकिन इत्र बुल्गारिया गुलाब में ही निकलता है।अगर फूलों की फसल ठीक-ठाक रहे तो इस किस्म से छह एकड़ पर तीन से आठ लाख रुपए कमा लेते हैं।

गुलाब की खेती पर कितना आता है खर्च

नवंबर व दिसंबर में गुलाब के पौधों की कटाई व छंटाई होती है। इसी दौरान नई कलमें भी लगाई जा सकती हैं। कुशपाल के मुताबिक, एक एकड़ में बुल्गारिया गुलाब लगाने में चार हजार रुपए के करीब खर्च आता है।

एक एकड़ में करीब दो हजार कलमें लगाई जा सकती हैं। यह तीन माह में तैयार हो जाता है। एक बार लगाया गुलाब 15 साल तक फूल देने के काम आता है।

वीडियो देखने के लिए दिए गए लिंक पर क्लिक करे,

Sh. Kushal Pal Sirohi s/o Harender Singh
Village -Barola (Chandana)
Phone -01746-222222

इतने रुपया बढ़ सकता है खरीफ फसलों के समर्थन मूल्य

केंद्र सरकार जल्द ही खरीफ फसलों के समर्थन मूल्य का एलान कर सकती है। सूत्रों के मुताबिक चौदह फसलों का एम.एस.पी. बढ़ाने को लेकर मंजूरी मिल चुकी है।

लेकिन अगर किसानो की मांगो के हिसाब से देखा जाये तो लगता है ये समर्थन मूल्य बहुत कम है । ऐसे में किसानो का गुस्सा और बढ़ सकता है इस लिए  हो सकता है अब तक इस फैंसले को गुप्त रखा गया हो ।

खरीफ फसलों के समर्थन मूल्य का एलान कभी भी हो सकता है जिसमें कपास के एम.एस.पी. में 160 रुपए प्रति क्विंटल की बढ़त हो सकती है।इस बार फिर दालों की एम.एस.पी. में 400 रुपए क्विंटल के भारी बढ़त की संभावना है। साथ ही धान के एम.एस.पी. को 80 रुपए बढ़ाकर 1560-1590 रुपए करने की तैयारी है।

जबकि मध्यप्रदेश में खेती होने वाले सोयाबीन की एम.एस.पी. को करीब 6.5 फीसदी बढ़ाकर 2900 रुपए करने की तैयारी है

गर्मियों में करे Soft Drink का बिज़नस और कमाए 30 से 50 हजार महिना

इस बात से तो आप वाकिफ हैं ही की हमारे भारत में गर्मिओं का मौसम 8 महीने का होता है ऐसे में धुप में आते जाते सबका मन होता है की कुछ ठंडा पीने को मिल जाये तो शरीर को राहत मिल जाएगी ऐसे में उनके काम आता है सोडा मशीन वाली कोल्ड ड्रिंक सस्ता का सस्ता भी और अपनी मनपसंद का भी यही वजह है की गर्मियों के मौसम में इसका बिज़नेस धड़ल्ले से चलता है तो अगर आप भी कम लागत में बिज़नेस शुरू करना चाहते हैं तो सॉफ्ट ड्रिंक यानी शीतल पेय का बिज़नेस अच्छा ऑप्शन है

सोडा मशीन के बारे में

तो इस बिज़नेस को शुरू करने के इए सबसे पहले आपको एक सोडा मशीन लेनी पड़ेगी यह मशीने भी अलग अलग तरह की अलग अलग कीमत पर मार्किट में उपलब्ध हैं इसमें आपको 6+2,  8+2,  10+2, अब आप यहाँ पर confuse हो गए होंगे की यह क्या है तो आपका डाउट यही पर ख़तम कर के आपको बता देते हैं की यह क्या है

6+2- इसका मतलब है की उस से 6 तरह के सोडा फ्लेवर निकलेंगे और 2 तरह के जूस फ्लेवर इसी तरह
8+2- का मतलब है की उस से 8 तरह के सोडा फ्लेवर निकलेंगे और 2 तरह के जूस फ्लेवर
10+2- का मतलब है की उस से 10 तरह के सोडा फ्लेवर निकलेंगे और 2 तरह के जूस फ्लेवर

आप अपने हिसाब से मशीन और बजट का चुनाव कर सकते हैं मशीनों की कीमत 50000 से लेकर 2 लाख तक रखी हुई है मगर इसमें भी डीलर से बात चीत करके मोल भाव उपर नीचे किया जा सकता .planet soda company फ्रैंचाइज़ी भी देती है या आप इस कंपनी की मशीन भी खरीद सकते हैं इनकी वेबसाइट के अनुसार अगर आप इस कंपनी की फ्रैंचाइज़ी लेते हैं तो यह कंपनी आपसे कोई फीस नहीं लेती है आप फ्री में फ्रैंचाइज़ी ले सकते हैं

मशीन खरीदते वक़्त इन बातो का रखें ध्यान और जगह 

उसकी वारंटी या गारंटी कितनी  है , क्या वह उस मशीन को सेट करने में आपकी मदद कर रहे हैं या नहीं , क्या वो शुरू में आपको कच्चे माल की किट आपको दे रहे हैं या नहीं , ये मैं इसलिए बता रहा हूँ क्योंक कई डीलर यह सब मुफ्त में आपको दे देते हैं

इसके लिए मशीन , पानी की टंकी, पानी, छोटा गैस सिलेंडर, शुगर, पेपर कप प्रोडक्ट तैयार करने के लिए आपको इन चीजो की जरूरत पड़ेगी और बाकी जगह आपकी मशीन पर निर्भर करती है यदि आप बड़ी मशीन लेते हैं तो बड़ी जगह की जरूरत पड़ेगी छोटी हो तो छोटी जगह की जरूरत पड़ेगी वैसे 10*10 की दुकान में बड़ी मशीन भी आसानी से आ जाती है

लागत 

मोटे मोटे तौर पर देखे तो 5 रुपये के गिलास की कीमत करीब 2.5 रुपये होगी यानी इसमें आपको 50% का प्रॉफिट होगा यदि आप हर दिन 500 ग्लास भी बेचते हैं तो आप हर दिन 2500 रूपये कमा सकते हैं इसमें से अगर 1250 रुपये की खर्चा निकाल दे तो हर रोज 1250 रुपये की कमाई होगी इस हिसाब से आप महीने में करीब 37500 रूपये कम सकते हैं अगर आप 300 ग्लास भी रोज बेचते है तो आप 20000 से 25000 तक कमा सकते हैं

और ज्यादा जानकारी के लिए वीडियो भी देखे 

 

पेपर ग्लास बनाने का व्यवसाय शुरू कर 2.5 लाख महीना कमाएं

आजकल हर शहर में अब उपभोक्ता ज्यादा से ज्यादा कागज के कप का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके चलते शहर में कागज के कप की कमी आ गई। बाहर से सप्लाई भी कम हो रही है। अगर कोई 10 से 12 लाख रुपए में कागज के कप बनाने की फैक्ट्री लगा सकता है।

बस थोड़ी से 200 से 300 गज की जगह चाहिए। कप बना कर बेचने पर प्रति कम से कम कप 25 से 30 पैसे की बचत है।जिस से हर महीने आप 2.5 लाख महीना तक कमा सकते है ।

शहर के होलसेल विक्रेताओं के अनुसार इस समय शहर में रोजाना जहां चार लाख कप बिकते हैं। उनमें से 75 प्रतिशत कागज के कप बिक रहे हैं। बाकी 25 प्रतिशत ही प्लास्टिक के डिस्पोजेबल कप बिक रहे हैं।

कैसे लगाएं कागज का कप बनाने का उद्योग: इंटरनेट पर कागज का कप बनाने की मशीन निर्माताओं की जानकारी मिल जाएगी। जिस तरह की मशीन आपको लगानी है, उसकी डिटेल एवं विक्रेता के कॉन्टैक्ट नंबर और मशीन का आकार, उत्पादन क्षमता आदि सब लिखी होती है।

उद्योग लगाने के लिए प्रोजेक्ट रिपोर्ट बना लें। अगर आपको अपने उद्योग के लिए बैंक से फाइनेंस कराना है तो एमएसएमई (माइक्रो स्माल मीडियम एंटरप्राइजेज) की वेबसाइट पर अपने उद्योग का रजिस्ट्रेशन करा लें। इसके बाद बैंक में फाइनेंस के लिए आवेदन कर सकते हैं। इससे लोन मिलने में आसानी होगी।

कहां मिलती है मशीन

कागज के कप बनाने की मशीन दिल्ली, हैदराबाद, आगरा एवं अहमदाबाद समेत कई शहरों में मिलती है। आप कितने कप बनाने की क्षमता की मशीन चाहते हैं। उसी हिसाब से मशीन मंगाएं। अगर फाइनेंस कराया है तो बैंक के जरिए ही मशीन आएगी, उसका पेमेंट भी बैंक के माध्यम से होगा।

कितनी लागत

दिल्ली में कागज के कप बनाने की मशीन के निर्माता ए खलील रहमान ने बताया कि सामान्यतया मशीन की कीमत 7.25 लाख रुपए की है। जो प्रति घंटे छोटी साइज के तीन हजार कप बनाती है। साथ ही पांच लाख रुपए की कार्यशील पूंजी की जरूरत है। एक छोटी साइज के कप बनाने की लागत 35 पैसे आती है। जिसे आप 50 पैसे से लेकर 60 पैसे तक बेच सकते हैं।

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कम पानी में ज्यादा उत्पादन चाहिए तो लगाएं धान की यह किस्मे

 

धान की फसल को ज्यादा पानी वाली फसल माना जाता है और यह बिलकुल सच भी है लेकिन कुश ऐसी भी किस्मे है जिनके उपयोग से आप बहुत सारा पानी बचा सकते हो कुछ ऐसी ।

इन किस्मो की खास बात यह है की समय पर अच्छी बरिश न भी हो तो किसानों को परेशान होने की जरूरत नहीं है। किसान अगर सतर्कता से काम लें तो वह सूखे की स्थिति से निपट सकते हैं।इन किस्मों को सिंचाई की भी काफी कम जरूरत पड़ती है ।

धान की इन किस्मों में पूसा सुगंध-5, पूसा बासमती-1121, पूसा-1612, पूसा बासमती-1509, पूसा-1610 आदि शामिल हैं। धान की यह प्रजातियाँ लगभग चार माह में पैदावार दे देती हैं।

जुलाई माह में भी पर्याप्त बारिश नहीं होती है तो भी धान की इन किस्मो की पौध जुलाई में तैयार करके अगस्त में रोपाई की जा सकती है।

कम बरसात वाले क्षेत्रों में सरसों की पैदावार लेना भी एक अच्छा विकल्प साबित हो सकता है। इसकी फसल को अगस्त और सितम्बर के दौरान लगाकर कम बारिश और सिंचाई की सुविधाओं की कमी के बावजूद अच्छी पैदावार की जा सकती है।

वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि किसान विकल्प के तौर पर एक और प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। इस प्रौद्योगिकी के अनुसार धान की बुवाई गेहूँ की तरह खेतों में की जा सकती है। पौध तैयार करने की जरूरत नहीं है।

जहाँ सिंचाई सुविधाओं का अभाव है और बरसात भी कम होती हो वहाँ ड्रिप सिंचाई, फव्वारा सिंचाई, पॉली हाउस तथा नेट हाउस जैसी आधुनिक सिंचाई तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। इन आधुनिक तकनीकों का प्रयोग कर कम सिंचाई के बावजूद अच्छी फसलें तैयार की जा सकती हैं। इन तकनीकों के इस्तेमाल के लिये सरकारें भी अनुदान देकर प्रोत्साहित करती हैं।

7 दिन में ऐसे पकड़ी किसान आंदोलन ने आग

भारत में किसान आक्रोश में हैं. महाराष्ट्र में उन्होंने सात ज़िलों में कमोबेश हफ़्ते भर हड़ताल की, सड़कों पर दूध बहाया, बाज़ार बंद करवाए, प्रदर्शन किया औऱ सब्ज़ियां ले जाने वाले ट्रकों पर हमले किए.पड़ोस के मध्य प्रदेश में मंगलवार को पुलिस से झड़प के बाद पांच प्रदर्शनकारी किसानों की गोली लगने से मौत हो गई, जिसके बाद कर्फ़्यू लगा दिया गया.

पिछले महीने तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के किसानों ने अपनी लाल मिर्च की फ़सल जलाकर विरोध जताया था.

मध्य प्रदेश में कर्ज माफी और फसल के वाजिब दाम की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे किसानों पर मंगलवार को मंदसौर में पुलिस द्वारा कथित तौर पर की गई गोलीबारी में छह किसानों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए हैं. फायरिंग के विरोध में किसान संगठनों ने बुधवार को मध्यप्रदेश बंद का एलान किया.

मंदसौर में पुलिस फायरिंग में किसानों की मौत के बाद हिंसा दूसरे जिलों में भी फैल गई. वहीं अब खबर आ रही है कि राहुल गांधी स्थानीय जिला प्रशासन की मंजूरी न मिलने के बावजूद मंदसौर के लिए रवाना हो गए है. किसान हिंसा की आग मंदसौर के अलावा धार, हरदा और सिहोर जिले तक पहुंच गई है. आज मध्य प्रदेश के किसानों के आंदोलन का आठवां दिन है.
मध्यप्रदेश में एक जून से 10 जून तक किसानों ने हड़ताल का एलान किया था.

1 जून 2017

– एक जून को सभी जिला मुख्यालय पर सभा का आयोजन किया गया.
– हड़ताल का मध्यप्रदेश के मालवा और निमाड़ अंचल में सबसे ज्यादा असर देखा गया.
– यहां जगह जगह सब्जियों और दूध की सप्लाई रोक दी गई,
– जगह जगह सड़कों पर दूध धोला गया
– शाजापुर में वाहनों में तोड़फोड़ की गई
– इंदौर, धार, उज्जैन और हरदा सहित कुछ जगहों पर भारी विरोध प्रदर्शन
– शाजापुर में पुलिस पर पथराव में आठ पुलिसकर्मी घायल
– पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े
– मंदसौर, नीमच और झाबुआ में भी विरोध प्रदर्शन

दो जून 2017

– इंदौर में हिंसक हुआ आंदोलन, रात तक हिंसक झड़पें
– एसडीएम और पुलिस की गाड़ियां फोड़ी
– धार के सरदारपुर में व्यापारी और किसान आमने-सामने
– व्यापारियों ने बाजार बंद करा रहे किसानों को खदेड़ा, छह बाइक जलाई
– कालाबजारी शुरू, कई जगहों पर दूध 80 से 100 रुपए लीटर बिका
– उज्जैन में पुलिसकर्मी की पिटाई
– सीएम ने की अपील, किसान किसी के बहकावे में नहीं आए

तीन जून 2017

– इंदौर में हालात बेकाबू, बिजलपुर में बवाल, कई वाहनों को आग लगाई, पुलिस पर पथराव, आंदोलनकारियों पर काबू पाने के लिए पुलिस ने दागे आंसू गैस के गोले.
– मालवा अंचल रतलाम जिले में भी फैली आंदोलन की आग, जिले के ताल में हिंसा भड़की, पुलिस को हालात पर काबू पाने के लिए हवाई फायरिंग करनी पड़ी.
– उज्जैन जिले के ग्रामीण अंचलों में भी फैला किसान आंदोलन, नागदा और उन्हेल में भी लूटपाट और तोड़फोड़

चार जून 2017

– सीएम शिवराज ने किसानों की मांगे मानी भारतीय किसान संघ और किसान सेना आंदोलन से पीछे हटी, किसान यूनियन हड़ताल पर कायम रही
– इंदौर के बाद रतलाम जिले में भारी हिंसा, तीन पुलिस वाहनों को आग लगाई
– भोपाल भी पहुंची आंदोलन की आग, मिसरोद में सड़कों पर दूध फेंका
– इंदौर के आसपास के जिलों खंडवा, खरगोन, देवास, शाजापुर के अलावा मंदसौर में भी विरोध प्रदर्शन तेज हुआ

पांच जून 2017

– शिवराज सिंह चौहान ने साफ किया कि किसानों का कर्ज माफ नहीं होगा, 1000 करोड़ का मूल्य स्थिरीकरण कोष बनाने का ऐलान
– इंदौर और आसपास के कस्बों में विरोध प्रदर्शन जारी, लेकिन हिंसा की छुटपुट घटना – मंदसौर और नीमच अंचल में जमकर बवाल
– मंदसौर के दलौदा में रेलवे फाटक तोड़ा, रेलवे कैबिन को नुकसान पहुंचाया, पटरियों को उखाड़ने की कोशिश
– रतलाम-चित्तौड़ रेलवे ट्रैक पर यातायात बाधित
– नीमच में भी भारी बवाल, पुलिस और प्रदर्शनकारी आमने-सामने, पथराव के बाद कई वाहनों में तोड़फोड़, पुलिस ने लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े

छह जून 2017

– मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले के पिपलिया मंडी में भारी हिंसा
– एक हजार से ज्यादा लोगों ने फोरनले पर चक्काजाम किया
– पुलिस ने खदेड़ने की कोशिस की तो हालात बेकाबू हो गए
– उग्र भीड़ ने 25 ट्रकों को आग के हवाले कर दिया
– पुलिस ने काबू पाने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े, तो किसान खेतों में फैल गए और पुलिस को घेरकर पथराव शुरू कर दिया
– इस दौरान फायरिंग में छह लोगों की मौत
– कई वाहनों में आग लगाई, मंदसौर और पिपल्यामंडी इलाके में कर्फ्यू लागू
– मंदसौर और नीमच में इंटरनेट बंद

जाने कैसे सरकार की यूरिया सबसिडी बचाने की योजना से किसानो को होगा नुकसान

सरकार ने यूरिया की खपत में कटौती का एक नया रास्ता ढूंढा है, जो वार्षिक 6000-7000 करोड़ रुपए की सबसिडी को बचाने में मदद कर सकता है। अगले 6 महीनों में सभी यूरिया बैग 50 की बजाय 45 किलो में उपलब्ध होंगे।

उर्वरक मंत्रालय का मानना है कि इसके परिणामस्वरूप किसान अगर 2 बैग यूरिया जिसका वजन 90 किलो होगा, का प्रयोग करेंगे। इससे उपभोग के पैटर्न में एक महत्वपूर्ण बदलाव आएगा और महंगी यूरिया आयात में तेज गिरावट आएगी। सरकार ने 2017-18 में यूरिया आयात के लिए 14,000 करोड़ रुपए अलग रखे हैं।

इसका किसानो को नुकसान यह हो सकता है जैसे किसी किसान को अपने खेत के लिए 100 किल्लो यूरिया चाहिए होती थी अब उसे 2 की जगह 3 बैग यूरिया की जरूरत पड़ेगी लेकिन तीसरा बैग सबसिडी के बिना पुरे मूल्य पर ही मिलेगा जिस से किसानो को काफी नुकसान हो सकता है ।

सरकार ने चालू वित्त वर्ष में उर्वरक सबसिडी के लिए 70,000 करोड़ रुपए का बजट दिया है और खजाने पर भारी बोझ को कम करने के लिए कई समाधान मांगे हैं। सूत्रों ने बताया कि कृषि मंत्रालय द्वारा किए गए विश्लेषण में यह संकेत दिया गया है कि यूरिया का उपयोग प्रति एकड़ 4-6 प्रतिशत तक कम हो गया है।

अधिकारियों ने कहा कि यूरिया खपत में कुल कमी मिट्टी पोषक तत्व की 100 प्रतिशत नीम कोटिंग के कारण हो सकती है। एक अधिकारी ने कहा, ‘‘एक निर्णय ने औद्योगिक गतिविधियों के लिए अत्यधिक सबसिडी वाले यूरिया का उतार-चढ़ाव बंद कर दिया है।’’ यद्यपि भारत ने 2016-17 में 24.2 मिलियन टन यूरिया का उत्पादन किया था लेकिन घरेलू मांग को पूरा करने के लिए उसे 8 मिलियन टन आयात करना पड़ा था।

सरकार ने 2022 तक उत्पादन बढ़ाने के लिए बंद यूरिया निर्माण संयंत्रों को पुनर्जीवित करने के लिए काम शुरू कर दिया है ताकि उर्वरक आयात करने की कोई आवश्यकता न पड़े।