अब फसल अवशेषों से बनेगा पशुओं के लिए पौष्टिक चारा 

फसलों की कटाई के बाद ज्यादातर किसान फसल अवशेषों को खेत में ही जला देते हैं, जिससे मिट्टी की सेहत पर असर पड़ता है।नरवाई में आग लगाने से मिट्टी की 6 इंच ऊपर की परत जो उपजाऊ व कृषि योग्य होती है वह कठोर हो जाती है।

साथ ही मिट्टी में पड़े कार्बनिक पदार्थ, सूक्ष्म पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। मिट्टी में पाए जाने वाले सूक्ष्म जीवाणु जो उपज बढ़ाने में सहायक होते हैं वह नष्ट हो जाते हैं। भूमि का तापक्रम बढ़ने से आसपास के वातावरण पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। जैव विविधता भी बुरी तरह प्रभावित होती है। इस लिए किसानों को नरवाई को जलाकर नष्ट करने का प्रयास नहीं करना चाहिए।

अब विज्ञानकों ने एक ऐसी तकनीक का इज़ाद क्या जिस से फसल अवशेषों को जलने की जगह पर इस से पशुओं के लिए पौष्टिक चारा बन सकेगा । नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट ने नया तरीका निकाला है, जिसमें फसल अवशेष को अमोनिया से ट्रीट करके दुधारू पशुओं के लिए पौष्टिक आहार बनाया जा रहा है।

नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट करनाल के वैज्ञानिकों का कहना है यदि रिसर्च में सफलता मिली तो दूसरे चरण में इसकी गोलियां बनाई जाएगी। यह न केवल पौष्टिक होगी व इनके स्वाद के कारण पशुओं को खिला सकते हैं। इसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर भूसा अथवा अवशेषों के मुकाबले आसानी से ले जाना अासान होगा। इसे मवेशियों को खली की तरह खिलाया जा सकेगा।

दल के प्रमुख और पशु पोषण विभाग अध्यक्ष डॉ. त्यागी ने बताया, “अभी 100 गाय-भैंस को अमोनिया ट्रीटमेंट का पौष्टिक चारा दिया जा रहा है। इसके बाद उनके स्वास्थ्य पर नजर रखी जा रही है। दूध निकालकर रोजाना रीडिंग नोट की जा रही है। अभी तक दूध उत्पादन 10-15 फीसदी बढ़ा है। दूध की गुणवत्ता में भी सुधार हुआ है।”

साइथ यंत्र से एक मजदूर काट सकता है तीन मजदूरों जितनी फसल

फसल की कटाई के दौरान मजदूरों की भारी कमी और हंसिया की मजबूरी से मुक्ति का औजार ‘साइथ-आमतौर पर खेती के लिए मजदूरों की मांग बुआई के समय और फसल की कटाई के दिनों में ज्यादा होती है।

सीमांत किसानों या छोटे रकबे या जोत वाले किसानों को फसलों की कटाई के दौरान ज्यादा समस्या आती है। एक तो मजदूरों की कमी की समस्या और दूसरी आज भी वो फसलों की कटाई के लिए परंपरागत तरीके ही इस्तेमाल करने को मजबूर हैं।

परंपरागत रूप से फसल की कटाई करने में एक तो वक्त बहुत लगता है दूसरा बेहद मेहनत करनी होती है। आस पड़ोस के मजदूरों के नखरे सो अलग। ऐसे में यूरोपीय देशों में परंपरागत तौर पर फसल की कटाई के लिए उपयोग किए जाने वाले आला जिसे अंग्रेजी में साइथ कहते हैं, भारतीय कृषकों के लिए भी बेहद उपयोगी हो सकता है। भारत में हाल के दिनों में साइथ के प्रचलन को हाथों हाथ लिया भी जा रहा है।

अंग्रेजी के एल अक्षर के आकार का ये साइथ न केवल कटाई जैसे महत्वपूर्ण कृषि कार्य में खेतिहर को मजदूरों की कमी का एक बेहतरीन विकल्प उपलब्ध कराता है बल्कि परंपरागत कटाई उपकरणों की तुलना में बेहद कम समय में खेत के खेत में लगी फसल को काट कर जमीन पर करीने से बिछा भी देता है। इसमें सिर्फ एक मजदूर तीन मजदूरों जितनी फसल काट सकता है ।

बनावट : तकरीबन 170 सेंटीमीटर लंबे लकड़ी के एक डंडे (हाल फिलहाल लकड़ी की जगह धातु या प्लास्टिक का भी इस्तेमाल किया जा रहा है) को साइथ कहते हैं जिसकी आकृति या तो सीधी हो सकती है या अंग्रेजी के एस आकार की होती है जिसके ठीक नीचे एल आकार में एक दरांती लगी होती है जिससे फसल या घास की कटाई को अंजाम दिया जाता है।

साइथ में पकड़ने के लिए एक या दो हैंडल लगे होते हैं। पहला हैंडल सबसे उपर और दूसरा डंडे के बीच में होता है। डंडे के सबसे नीचले हिस्से पर लंबबत रुप में तकरीबन साठ से नब्बे सेंटीमिटर लंबी सी ब्लेड या दरांती लगी होती है जो फसल के काटने के काम आती है।

साइथ में ये ब्लेड काम करने के दौरान हमेशा बायीं तरफ होती है। फसल या घास की कटाई के लिए इसके इस्तेमाल के पहले इससे कटाई करने का प्रशिक्षण लेना जरूरी होता है। अनाड़ी व्यक्ति इसकी मदद से कटाई नहीं कर सकता।

खास बात ये है कि थोड़े से ध्यान से देखने पर एक आम व्यक्ति भी साइथ को अपने घर में ही बना सकता है और थोड़े से प्रैक्टीस के बाद बड़ी आसानी से खेत के खेत कटाई भी कर सकता है। साइथ की मदद से कैसे फसल की कटाई की जा सकती है

साइथ से प्रभावित होकर भारत में भी हैदराबाद स्थित सीईसी में विभिन्न प्रकार के साइथ का निर्माण किया जा रहा है जिसकी कीमत तकरीबन 1200 रुपये है।

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बगीचे में काम करते वक़्त मिली ऐसी चीज़ के माली हो गया मालोमाल

किसकी किस्मत कब खुल जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। आपको भी जानकर विश्वास नहीं होगा कि काम करते वक्त उस माली को क्या मिला। दरअसल उस माली के हाथ ऐसी कीमती चीज लगी है जिससे उसकी किस्मत का पिटारा खुल सकता है।

हर दिन की तरह वह उस दिन भी मालिक के कहने पर बागीचे में काम करने गया, उसे नहीं पता था कि उसकी किस्मत खुलने वाली है। उसने काम शुरू किया और जैसे ही बागीचे के एक पुराने पेड़ (ओक) के पास जमी मिट्टी को साफ करने गया, उसे कीमती चीज मिली।

दरअसल वो आदमी ब्रिटेन का रहने वाला है, उसके मालिक ने अपना खेत और बागीचा उसके हवाले कर रखा है। जिसकी हर दिन की सफाई और देख रेख 60 साल का वो माली ही करता है जिसका नाम Steve Fletcher है।

पहले तो उसे लगा कि कोई फालतू चीज उसे मिली है लेकिन बाद में उसे सच्चाई पता चली।  जी हां, उसके हाथ ‘ब्लैक गोल्ड’ लगा है। दरअसल ये ब्लैक गोल्ड एक फंगस (कवक) का होता है। जिसकी कीमत भारतीय बाजार में लगभग 20 लाख रुपए है। अगली स्लाइड में जानिए क्या होता है ब्लैक गोल्ड।

एक तरह का फंगस जिसे ‘ब्लैक ट्रफल’ कहते हैं जिसे फ्रांस, जर्मनी, इटली और विदेशों में बड़ा चाव से लोग खाते हैं। इस ब्लैक ट्रफल को ब्लैक गोल्ड भी कहते हैं। ये बहुत कीमती होता है। इसे तरह तरह के खाद्य पद्वार्थ भी बनाए जाते हैं।

किसान जो सीड बाल से खेती कर कमा रहा है पचास लाख सालाना की कमाई

मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में मूल रूप से खोजनपुर गांव के रहने वाले राजू टाईटस ने पिछले 30 वर्षों से 12 एकड़ जमीन में न कभी हल चलाया और न ही मिट्टी के प्राकृतिक रूप से छेड़छाड़ की है। ये अपने खेतों में बाजार से खरीदी गयी खाद और कीटनाशक का इस्तेमाल नहीं करते हैं, बीजों की सीड बाँल बनाकर खेतों में बुआई करते हैं। इस खेती से राजू टाईटस सालाना पचास से साठ लाख की कमाई भी करते है।

बीजों को जब क्ले मिटटी की परत से 1/2 इंच से लेकर 1 इंच तक की गोल गोल गोलियां से सुरक्षित कर लिया जाता है उसे सीड बॉल कहते हैं।सीड बाँल बनाने के लिए अगर ये मिट्टी गीली है तो बीज के साइज के हिसाब से इसकी गोलियां बना लेते हैं उसके अन्दर बीज भी भर देते हैं, इन गोलियों को सूखा लेते हैं और बरसात आने पर अपने खेतों में फेंक देते हैं।

गर्मियों की छुट्टियों में आसपास के बच्चे खेल-खेल में ये सीड बाँल बनाने के लिए हमारे फॉर्म पर आ जाते हैं, ये बाँल साल भर तक खराब नहीं होती हैं और बीज सुरक्षित रहता है, बरसात से पहले इन बालों को बनाकर सुखाने के बाद इन्हें खेतों में बिखरा देते हैं, बीज चिड़ियां और चूहे नही खा सकते।

इस तरह से बोआई करने से एक एकड़ में लगभग 20 कुंतल की उपज हो जाती है जिससे चार पांच लाख की वार्षिक आय हो जाती है, अब तो कई जगह के किसान इसे देखने आते हैं, बकरी पालन भी किया है इससे शुद्ध दूध मिल जाता है और आसपास जमे खरपतवार ये साफ़ कर देती हैं।

होशंगाबाद जिले से डेढ़ किलोमीटर दूर ‘टाईटस फॉर्म’ के नाम से मशहूर इनके फॉर्म को सब जानते हैं। बिना रसायन 30 वर्षों से लगातार खेती कर रहे राजू बताते हैं के अगर हम प्रकृति के साथ छेड़छाड़ न करें तो हमे खेती करने में किसी भी प्रकार की कोई असुविधा नहीं होगी, जुताई करने से असंख्य जीवाणु तो नष्ट होते ही है साथ ही झाड़ियाँ भी काट देते हैं

झाड़ियाँ काटने से असंख्य जीव-जन्तु, कीड़े-मकोड़े मर जाते हैं, पेड़ो के साथ झाड़ियाँ और झाड़ियों के साथ घास और अनेक वनस्पतियां रहती हैं जो एक दूसरे की पूरक होती हैं, अगर हम जुताई नहीं करते हैं तो हमारे खेत असंख्य वनस्पतियों से भर जाते हैं, बकरी पालन करते हैं जिससे खरपतवार का नियंत्रण होता है।

 

 

जीएसटी बिल से इतने रुपए बढ़ जायगी ट्रेक्टर की कीमत

पूरे देश में जहां एक ओर किसान कर्ज माफी को लेकर आंदोलन कर रहे हैं दूसरी ओर उनके ऊपर एक और आफत आने जा रही है। यह नई आफत है जीएसटी की मार। जीएसटी के चलते ट्रैक्टर के इनपुट कास्ट में 25 हजार रुपये की बढ़ोत्तरी होने जा रही है।वस्तु एवं सेवाकर (जीएसटी) के प्रभाव से किसान भी अछूते नहीं रहेंगे। आधुनिक खेती में अहम बन चुके ट्रैक्टर पार्टस भी महंगे हो जाएंगे। इसके चलते अब किसानों को ट्रैक्टर खरीदना महंगा पड़ेगा।

ट्रैक्टर पर पहले कोई ड्यूटी नहीं लगती थी इसे अब 12 फीसदी के दायरे में रखा गया है। वहीं एसोसिएशन की मांग है कि कंपोनेंट ड्यूटी को 28 फीसदी की जगह रखा जाए। ऐसा करने से ट्रैक्टर पर पड़ने जा रहे 25 हजार रुपये के बोझ से बचा जा सकेगा। किसानों की कर्ज माफी आंदोलन के बाद यह बड़ा मुद्दा हो सकता है।

हाल ही में 66 आइटम पर जीएसटी के रेट रिलीज किए गए हैं जो कि 18 फीसदी के दायरे में आएंगे। इसके लागू करने में 28 फीसदी की इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर और 18 फीसदी का आउटपुट वास्तव में राहत कम दे रहा बल्कि मुसीबत ज्यादा ला रहा है।

इसके चलते प्रति ट्रैक्टर को बनाने में कीमत 25 हजार रुपये तक बढ़ जाएगा। जिसके वजह से ट्रैक्टर इंडस्‍ट्री पर 1600 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार आएगा। यह जानकारी ट्रैक्टर मैन्यूफैक्चरर एसोसिएशन के द्वारा एक रिलीज के जरिए जारी की गई है।

एसोसिएशन के मुताबिक कई कृषि संबंधी उपकरणों पर राहत है लेकिन ट्रैक्टर के अधिकतर पुर्जों जैसे की इंजन ट्रांसमिशन व अन्‍य उपकरण जीएसटी के 28 फीसदी के दायरे में आते हैं जिसके वजह से ट्रैक्टर की कीमत में बढ़ोत्तरी होनी तय है।

एसोसिएशन ने इसके तहत मांग की है कि ट्रैक्टर में प्रयोग होने वाले हर उपकरण को जीसएटी के 18 फीसदी के दायरे में ही रखा जाना चाहिए। क्योंकि सिर्फ एप्लीकेशन को टैक्स के कम स्लैब में रखकर किसानों को मदद नहीं की जा सकती।

 

ये है पेडल से चलने वाला पंप एक घंटे में निकलता है 5000 लीटर पानी

खेती के लिए जो सबसे ज्यादा जरूरी चीज है वो है पानी ।पानी के बिना खेती की कल्पना करना भी मुश्किल है । लेकिन सिंचाई के लिए जरूरी ईंधन और बिजली हर किसान नहीं खरीद सकता । ऐसे किसानो के लिए बिना खर्चा किये अब आ गया है पेडल पंप जा ट्रेडल पंप (treadle pump)। इस पंप की खसयत यह है के पानी निकलने के लिए आपको बस खड़े होकर पेडल दबाने होते है । जिस से पानी अपने आप निकलना शुरू हो जाता है ।

इस पंप को एक जगह से दूसरी जगह लेकर जाना बहुत आसान है क्योंकि इसका वजन सिर्फ 12 किल्लो है ।एक आदमी जिसका वजन 60 किल्लो है वो इस पंप से 15 फ़ीट गहरे पानी को उठा कर 45 फ़ीट तक सिंचाई कर सकता है । यह मशीन एक घंटे में 2000- 5000 लीटर पानी निकल सकती है ।

सिर्फ खेत में ही नहीं इसे आप अपने घर की छत पर पानी वाली टंकी में पानी पहुंचने के लिए भी इसका इस्तमाल कर सकते है । इसके इलावा आप इसके इस्तमाल से बगीची को भी पानी दे सकते है । इसके साथ हम फवारा सिंचाई भी कर सकते है । इसकी कीमत भी सिर्फ 4050 रुपये से शुरू हो जाती है ।

कहाँ से खरीदें यह ट्रेडल पंप (treadle pump)

यह ट्रेडल पंप (treadle pump) कई कम्पनियों द्वारा त्यार किया जाता है । आप इस लिंक https://dir.indiamart.com/impcat/treadle-pump.html के ऊपर क्लिक करके सभी कम्पनियों के नाम जान सकते है और किसी भी कंपनी से इसे खरीद सकते है । इसके इलावा हम आपको एक कंपनी का नाम और एड्रेस बताएँगे जिस से आप इस मशीन को खरीद सकते है उस कंपनी का नाम है “एकफ्लो ट्रेडले पंप (Ecoflo Treadle Pump)” यह नासिक महाराष्ट्र की कंपनी है । इसको खरीदने के लिए आप इस नंबर 08048402340 पर संपर्क कर सकते है ।

यह पंप कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो देखें

यह मशीन जो जमीन समतल करने के साथ फालतू मिट्टी भरे सीधा ट्रॉली में

अच्छी खेती के लिए जरूरत होती है उबड़-खाबड़ रहित यानी समतल जमीन की। कुदरती तौर पर समतल जमीन का मिलना लगभग असंभव है, ऐसे में इस तरह की जमीन हासिल करना कृषकों के लिए बेहद कड़ी चुनौती होती है।

इसी चुनौती को आसान बनाने में अहम योगदान दिया है किसान रेशम सिंह और कुलदीप सिंह ने जिन्होंने लैंड लेवलर कम लोडर मशीन यानी जमीन को समतल करने सह लोड करनेवाली मशीन बनाई जो ट्रैक्टर संचालित मशीन है।

लैंड लेवलर कम लोडर मशीन

  • स्क्रैपर ब्लेड की मदद से मिट्टी की कटाई, कनवेयर की मदद से मिट्टी या बालू को जमा कर ट्रैक्टर में रखना
  • कनवेयर की मदद से मिट्टी या बालू को जमा कर ट्रैक्टर में जमा करना
  • यह एक वक्त में 3 ईंच तक गहरी खुदाई कर सकता है
  • यह एक मिनट में 11गुना 6 गुना 2.25 फीट आकार के ट्रेलर को भर सकता है(मिट्टी कम कड़ा होने पर एक मिनट से कम वक्त लगता है)-(मिट्टी कम कड़ा होने पर एक मिनट से कम वक्त लगता है)
  • 50 एचपी या अधिक क्षमता वाले ट्रैक्टर में काम कर सकता ह – इसे भी किसी ट्रैक्टर से जोड़ा जा सकता है
  • एक घंटा में पांच से सात लीटर डीजल की खपत
  • मशीन से 4 फीट की चौड़ाई में खुदाई, साढ़े आठ फीट की ऊंचाई से मिट्टी गिराना
  • नोट- यह दावा किया जाता है कि दोनों मशीन से औसतन एक दिन में एक बीघा (5 एकड़) जमीन को समतल किया जा सकता है।

मशीन की तकनीक-

  • संवाहक पट्टिका (कनवेयर) में एक जोड़ा चेन होता है, यह एक वक्त में चार ईंच गहरी कटाई कर सकता है और 11 गुना, 6 गुना और 2.25 फीट के आकार के ट्रेलर को महज दो मिनट में भर सकता है।
  • इस मशीन का इस्तेमाल करने के दौरान ट्रैक्टर प्रति घंटा पांच से छह लीटर डीजल की खपत करता है।
  • मशीन में 4 ईंच तक की गहराई तक काटने की क्षमता और साढ़े आठ फीट की ऊंचाई से बालू गिराने की क्षमता है।

मशीन से जुड़ी मुख्य बातें-

  • कुछ क्षेत्रों में इस मशीन से बड़ी संभावनाएं हैं जैसे कि कनाल के पानी के लिए मिट्टी की कटाई, साथ ही सड़क और आवास निर्माण।
  • एक अनुमान के मुताबिक यह मशीन एक दिन में एक बीघा (5 से 8 एकड़) जमीन से 150 ट्रेलर बालू हटा कर समतल कर सकता है।
  • इसे किराये पर भी लगाया जा सकता है, इसके लिए दो वर्ग फीट गहरी खुदाई प्रति दो रुपये के हिसाब से दर तय की जा सकती है। जो बालू काट कर निकाला गया है उसे प्रति ट्रेलर 250 से 300 रुपये की दर से बेचा जा सकता है।
  • मशीन की कीमत- 1,50,000 रुपये (एक्स-फैक्ट्री, पैकेजिंग)। कीमत में परिवहन खर्च और कर इत्यादि शामिल नहीं।

यह मशीन कैसे काम करती है इसकी वीडियो देखें

और जानकारी के लिए इन से संपर्क करें

Resham Singh Virdi
Address -Jaideep Agriculture Works, Sangriya Road,
Bus Stand, Satipura, Hanumangarh,Rajsthan
Mobile: 09414535570

Kuldeep Singh
S/o Navrang Singh,Kanluall Chehllan,
Tehsil:Budhlada,Dis:Mansa,Punjab
Mobile: 9417629090, 9501286161

मोदी सरकार की तरफ से किसानो को बहुत बड़ी राहत

किसानों का कर्ज़ माफ करने के लिए मोदी सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है। मोदी सरकार ने किसानों को राहत देते हुए कहा है कि अब किसानों को सिर्फ 4 फीसदी की दर से कर्ज मिलेगा।

इस प्रस्ताव की मंजूरी आज दिल्ली में हुई कैबिनेट मीटिंग में मिला। सरकार ने किसानों को राहत देते हुए इसके लिए 19 हजार करोड़ रुपए का बजट भी निर्धारित किया है।

किसानों को मौजूदा समय में 9 प्रतिशत की ब्याज दर पर कर्ज मिलता था अब छोटे कर्जों पर यानी 3 लाख तक के कर्जों पर किसानों को 4 प्रतिशत के ब्याज दर पर कर्ज मिलेगा और कर्ज पर 5 प्रतिशत ब्याज का भुगतान सरकार चुकाएगी। सरकार अधिकतम 3 लाख रूपए तक के कर्ज़ 5 प्रतिशत की छूट मिलेगी।

स्वामिनाथन आयोग ने सिफारिश की थी कि किसानों को उनकी फ़सलों के दाम उसकी लागत में कम से कम 50 प्रतिशत जोड़ के दिया जाना चाहिए और ऐसे समय पर केन्द्र सरकार के इस फैसले के बाद लगता है कि किसान स्वामिनाथन रिपोर्ट को ध्यान में ले रही है।

मौजूदा समय में देश के कई प्रदेशों में किसान कर्ज़माफी को लेकर आंदोलन कर रहें हैं। ऐसे में ये खबर किसानों के लिए बड़ी राहत है।बता दें कि जिन राज्यों में सरकार ने कर्ज माफ किया है उन राज्यों की सरकार के ऊपर पहले से ही कर्ज है चाहे वो महाराष्ट्र हो या पंजाब।

ऐसे में ये तो साफ है कि किसानों की कर्जमाफी सरकार के साथ-साथ आम आदमी की भी जेब पर भारी पड़ेगी। देखना ये है कि इससे देश की अर्थव्यवस्था और महंगाई पर क्या असर पड़ेगा।

धान रोपण की इस तकनीक से बिहार के इस किसान ने तोडा वर्ल्ड रिकॉर्ड

देश के कथित रूप से ‘सबसे पिछड़े राज्य’ बिहार के किसानों ने वो कमाल कर दिखाया है जिससे उन्हें विश्व स्तर पर पहचान मिल रही है. नालंदा के युवा किसान सुमंत कुमार ने सिर्फ एक हेक्टेयर जमीन में 22 टन से ज्यादा चावल की पैदावार कर दुनियाभर के कृषि वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया है.

एक रिपोर्ट के अनुसार नालंदा के दरवेशपुर गाँव के इस युवा किसान ने बिना किसी रासायनिक खाद के प्रयोग के इतनी बड़ी मात्रा में चावल की पैदावार कर वर्ल्ड रिकॉर्ड बना दिया है. इससे पहले ये रिकॉर्ड ‘फादर ऑफ राइस’ कहे जानेवाले चीन के कृषि वैज्ञानिक युआन लोंगपिंग के नाम था जिन्होंने एक हेक्टेयर जमीन में 19.4 टन की फसल उगाई थी.

बिहार के इस गाँव में केवल सुमंत ही नहीं बल्कि उनके सभी साथी भी आर्गेनिक फार्मिंग के इस तकनीक के माध्यम से खेती कर चावल की बड़ी पैदावार पाने में सफल हुए हैं. इन सबने औसतन 17 टनों से अधिक धान की फसल उगाई है. इन उपलब्धियों को देखकर कहा जा सकता है ये लोग गरीबी से लड़ने और अपना जीवनस्तर सुधारने के साथ-साथ ख़ामोशी से एक नई कृषि क्रांति की ओर भी बढ़ रहे हैं.

अपनी खेती में ये लोग जिस तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं उसे SRI (The System of Rice Intensification) कहा जाता है. इसे 1983 में मेडागास्कर में पहली बार प्रयोग में लाया गया था जिसका मकसद स्थानीय किसानों को ‘कम से ज्यादा उत्पादन’ करने के लिए प्रेरित करना था. इस विधि में परंपरागत तरीकों से अलग हटकर थोड़ी मात्रा में बीज-पानी के इस्तेमाल और बिना हानिकारक रासायनों के प्रयोग के लगभग दुगुनी पैदावार प्राप्त की जाती है.

ब्रिटेन के The Guardian ने भी 2013 में नालंदा के सुमंत पर एक विशेष रिपोर्ट प्रकाशित की थी. इन किसानों की सफलता से प्रभावित होकर इसी साल नालंदा दौरे पर आये नोबेल प्राइज प्राप्त इकोनॉमिस्ट Joseph Stiglitz ने इन्हें वैज्ञानिकों से भी बेहतर बताया था. हालांकि कुछ लोगों को बिहार के इन प्रतिभाओं को उचित सम्मान न मिलने का भी दुःख है.

कृषि-अर्थशास्त्री अनिल वर्मा के अनुसार, ‘अगर कोई दूसरा वैज्ञानिक या संस्था किसी भी ऐसे तरीके के साथ सामने आता है ज्सिमे बिना किसी अतिरिक्त खर्च के 50% अधिक पैदावार की जा सकती हो तो उसे नोबेल प्राइज दे दिया जाता है मगर, जब यही काम हमारे युवा बिहारी करते हैं तो उन्हें बदले में कुछ नहीं मिलता. मैं बस ये चाहता हूँ कि इन गरीब किसानों को पेट भर खाना मिल सके.’

कमाई में चपरासी से भी पीछे हैं देश के किसान

देश का किसान हमारे लिए अन्न, फल और सब्जियां उगाता है इसके बावजूद देश का किसान सरकार और बैंकों के सामने कर्ज के लिए हाथ फैलाने को मजबूर है. देश के ज्यादातर किसान कमाई के मामले में सरकारी चपरासी से भी पीछे हैं. आज बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने कहा कि देश में किसान की आमदनी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से भी कम है.


किसान की आय पर क्या है जमीनी हकीकत?

किसान जगदीश ठाकुर  के पास 60 बीघा खेत है जिसमें आलू, सोयाबीन और प्याज की खेती होती है. जमीन के हिसाब से जगदीश ठाकुर बड़े किसानों की श्रेणी में आते हैं. अगर आपको लग रहा है कि बड़े किसान होने की वजह से जगदीश की जिंदगी आराम से कट रही होगी तो ऐसा नहीं है.

जगदीश ठाकुर ने बताया, ”पिछले साल बहुत नुकसान हुआ, फसल के दाम तक नहीं मिल पाए. फसल निकालने के बाद आलू का दाम नहीं मिला. आलू के बाद प्याज लगाया प्याज अब फेंक रहे हैं. एक कट्टे में 60-70 किलो प्याज आता है, 600-700 कट्टे प्याज के फेंकना पड़ा.”

बड़े किसान होने के बावजूद जगदीश ठाकुर बैंक और साहूकारों के कर्ज के बोझ तले दबे हैं. उनकी महीने की कोई फिक्स इनकम नहीं है. जबकि उसी गांव के तिलक पाटीदार प्राइवेट नौकरी करते हैं. महीने में 15 हजार रुपये तक कमा लेते हैं. तिलक के पिता किसान हैं लेकिन वो घटती कमाई की वजह से खेती नहीं करना चाहते हैं.

किसानों की और नौकरीपेशा की आय पर क्या कहते हैं आंकड़े

देश में किसानों और नौकरीपेशा के बीच आमदनी का अंतर इतना ज्यादा है कि अब युवा धीरे-धीरे खेती से दूर हो रहे हैं. 2016 के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक देश के 17 राज्यों के किसानों की सालाना औसत कमाई 20 हजार रुपये है. यानी महीने में 1700 रुपये से भी कम. जबकि ग्रुप डी के एक कर्मचारी की महीने की औसत कमाई करीब 24 हजार रुपये है.

वहीं सरकारी कर्मचारियों का वेतन हर साल बढ़ता है और हर 10 साल बाद नया वेतनमान लागू होता है जबकि किसानों की आमदनी इतनी रफ्तार से नहीं बढ़ती. उल्टा अगर प्रकृति ने निगाहें तिरछी कर ली किसानों को जेब से ही नुकसान उठाना पड़ जाता है.

1970 से 2015 के बीच गेहूं का खरीद मूल्य सिर्फ 19 गुना बढ़ा है. जबकि इसी दौरान सरकारी कर्मचारी का वेतन 150 गुना तक बढ़ गया है. कॉलेज के प्रोफेसर का वेतन 170 गुना और स्कूल शिक्षक का वेतन 320 गुना तक बढ़ गया. प्रधानमंत्री मोदी साल 2022 तक किसानों की आमदनी बढ़ाकर दोगुना करना चाहते हैं लेकिन किसानों की कमाई के हालात देखकर ऐसा दूर-दूर तक मुमकिन नहीं लगता.