जीएसटी बिल से इतने रुपए बढ़ जायगी ट्रेक्टर की कीमत

पूरे देश में जहां एक ओर किसान कर्ज माफी को लेकर आंदोलन कर रहे हैं दूसरी ओर उनके ऊपर एक और आफत आने जा रही है। यह नई आफत है जीएसटी की मार। जीएसटी के चलते ट्रैक्टर के इनपुट कास्ट में 25 हजार रुपये की बढ़ोत्तरी होने जा रही है।वस्तु एवं सेवाकर (जीएसटी) के प्रभाव से किसान भी अछूते नहीं रहेंगे। आधुनिक खेती में अहम बन चुके ट्रैक्टर पार्टस भी महंगे हो जाएंगे। इसके चलते अब किसानों को ट्रैक्टर खरीदना महंगा पड़ेगा।

ट्रैक्टर पर पहले कोई ड्यूटी नहीं लगती थी इसे अब 12 फीसदी के दायरे में रखा गया है। वहीं एसोसिएशन की मांग है कि कंपोनेंट ड्यूटी को 28 फीसदी की जगह रखा जाए। ऐसा करने से ट्रैक्टर पर पड़ने जा रहे 25 हजार रुपये के बोझ से बचा जा सकेगा। किसानों की कर्ज माफी आंदोलन के बाद यह बड़ा मुद्दा हो सकता है।

हाल ही में 66 आइटम पर जीएसटी के रेट रिलीज किए गए हैं जो कि 18 फीसदी के दायरे में आएंगे। इसके लागू करने में 28 फीसदी की इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर और 18 फीसदी का आउटपुट वास्तव में राहत कम दे रहा बल्कि मुसीबत ज्यादा ला रहा है।

इसके चलते प्रति ट्रैक्टर को बनाने में कीमत 25 हजार रुपये तक बढ़ जाएगा। जिसके वजह से ट्रैक्टर इंडस्‍ट्री पर 1600 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार आएगा। यह जानकारी ट्रैक्टर मैन्यूफैक्चरर एसोसिएशन के द्वारा एक रिलीज के जरिए जारी की गई है।

एसोसिएशन के मुताबिक कई कृषि संबंधी उपकरणों पर राहत है लेकिन ट्रैक्टर के अधिकतर पुर्जों जैसे की इंजन ट्रांसमिशन व अन्‍य उपकरण जीएसटी के 28 फीसदी के दायरे में आते हैं जिसके वजह से ट्रैक्टर की कीमत में बढ़ोत्तरी होनी तय है।

एसोसिएशन ने इसके तहत मांग की है कि ट्रैक्टर में प्रयोग होने वाले हर उपकरण को जीसएटी के 18 फीसदी के दायरे में ही रखा जाना चाहिए। क्योंकि सिर्फ एप्लीकेशन को टैक्स के कम स्लैब में रखकर किसानों को मदद नहीं की जा सकती।

 

ये है पेडल से चलने वाला पंप एक घंटे में निकलता है 5000 लीटर पानी

खेती के लिए जो सबसे ज्यादा जरूरी चीज है वो है पानी ।पानी के बिना खेती की कल्पना करना भी मुश्किल है । लेकिन सिंचाई के लिए जरूरी ईंधन और बिजली हर किसान नहीं खरीद सकता । ऐसे किसानो के लिए बिना खर्चा किये अब आ गया है पेडल पंप जा ट्रेडल पंप (treadle pump)। इस पंप की खसयत यह है के पानी निकलने के लिए आपको बस खड़े होकर पेडल दबाने होते है । जिस से पानी अपने आप निकलना शुरू हो जाता है ।

इस पंप को एक जगह से दूसरी जगह लेकर जाना बहुत आसान है क्योंकि इसका वजन सिर्फ 12 किल्लो है ।एक आदमी जिसका वजन 60 किल्लो है वो इस पंप से 15 फ़ीट गहरे पानी को उठा कर 45 फ़ीट तक सिंचाई कर सकता है । यह मशीन एक घंटे में 2000- 5000 लीटर पानी निकल सकती है ।

सिर्फ खेत में ही नहीं इसे आप अपने घर की छत पर पानी वाली टंकी में पानी पहुंचने के लिए भी इसका इस्तमाल कर सकते है । इसके इलावा आप इसके इस्तमाल से बगीची को भी पानी दे सकते है । इसके साथ हम फवारा सिंचाई भी कर सकते है । इसकी कीमत भी सिर्फ 4050 रुपये से शुरू हो जाती है ।

कहाँ से खरीदें यह ट्रेडल पंप (treadle pump)

यह ट्रेडल पंप (treadle pump) कई कम्पनियों द्वारा त्यार किया जाता है । आप इस लिंक https://dir.indiamart.com/impcat/treadle-pump.html के ऊपर क्लिक करके सभी कम्पनियों के नाम जान सकते है और किसी भी कंपनी से इसे खरीद सकते है । इसके इलावा हम आपको एक कंपनी का नाम और एड्रेस बताएँगे जिस से आप इस मशीन को खरीद सकते है उस कंपनी का नाम है “एकफ्लो ट्रेडले पंप (Ecoflo Treadle Pump)” यह नासिक महाराष्ट्र की कंपनी है । इसको खरीदने के लिए आप इस नंबर 08048402340 पर संपर्क कर सकते है ।

यह पंप कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो देखें

यह मशीन जो जमीन समतल करने के साथ फालतू मिट्टी भरे सीधा ट्रॉली में

अच्छी खेती के लिए जरूरत होती है उबड़-खाबड़ रहित यानी समतल जमीन की। कुदरती तौर पर समतल जमीन का मिलना लगभग असंभव है, ऐसे में इस तरह की जमीन हासिल करना कृषकों के लिए बेहद कड़ी चुनौती होती है।

इसी चुनौती को आसान बनाने में अहम योगदान दिया है किसान रेशम सिंह और कुलदीप सिंह ने जिन्होंने लैंड लेवलर कम लोडर मशीन यानी जमीन को समतल करने सह लोड करनेवाली मशीन बनाई जो ट्रैक्टर संचालित मशीन है।

लैंड लेवलर कम लोडर मशीन

  • स्क्रैपर ब्लेड की मदद से मिट्टी की कटाई, कनवेयर की मदद से मिट्टी या बालू को जमा कर ट्रैक्टर में रखना
  • कनवेयर की मदद से मिट्टी या बालू को जमा कर ट्रैक्टर में जमा करना
  • यह एक वक्त में 3 ईंच तक गहरी खुदाई कर सकता है
  • यह एक मिनट में 11गुना 6 गुना 2.25 फीट आकार के ट्रेलर को भर सकता है(मिट्टी कम कड़ा होने पर एक मिनट से कम वक्त लगता है)-(मिट्टी कम कड़ा होने पर एक मिनट से कम वक्त लगता है)
  • 50 एचपी या अधिक क्षमता वाले ट्रैक्टर में काम कर सकता ह – इसे भी किसी ट्रैक्टर से जोड़ा जा सकता है
  • एक घंटा में पांच से सात लीटर डीजल की खपत
  • मशीन से 4 फीट की चौड़ाई में खुदाई, साढ़े आठ फीट की ऊंचाई से मिट्टी गिराना
  • नोट- यह दावा किया जाता है कि दोनों मशीन से औसतन एक दिन में एक बीघा (5 एकड़) जमीन को समतल किया जा सकता है।

मशीन की तकनीक-

  • संवाहक पट्टिका (कनवेयर) में एक जोड़ा चेन होता है, यह एक वक्त में चार ईंच गहरी कटाई कर सकता है और 11 गुना, 6 गुना और 2.25 फीट के आकार के ट्रेलर को महज दो मिनट में भर सकता है।
  • इस मशीन का इस्तेमाल करने के दौरान ट्रैक्टर प्रति घंटा पांच से छह लीटर डीजल की खपत करता है।
  • मशीन में 4 ईंच तक की गहराई तक काटने की क्षमता और साढ़े आठ फीट की ऊंचाई से बालू गिराने की क्षमता है।

मशीन से जुड़ी मुख्य बातें-

  • कुछ क्षेत्रों में इस मशीन से बड़ी संभावनाएं हैं जैसे कि कनाल के पानी के लिए मिट्टी की कटाई, साथ ही सड़क और आवास निर्माण।
  • एक अनुमान के मुताबिक यह मशीन एक दिन में एक बीघा (5 से 8 एकड़) जमीन से 150 ट्रेलर बालू हटा कर समतल कर सकता है।
  • इसे किराये पर भी लगाया जा सकता है, इसके लिए दो वर्ग फीट गहरी खुदाई प्रति दो रुपये के हिसाब से दर तय की जा सकती है। जो बालू काट कर निकाला गया है उसे प्रति ट्रेलर 250 से 300 रुपये की दर से बेचा जा सकता है।
  • मशीन की कीमत- 1,50,000 रुपये (एक्स-फैक्ट्री, पैकेजिंग)। कीमत में परिवहन खर्च और कर इत्यादि शामिल नहीं।

यह मशीन कैसे काम करती है इसकी वीडियो देखें

और जानकारी के लिए इन से संपर्क करें

Resham Singh Virdi
Address -Jaideep Agriculture Works, Sangriya Road,
Bus Stand, Satipura, Hanumangarh,Rajsthan
Mobile: 09414535570

Kuldeep Singh
S/o Navrang Singh,Kanluall Chehllan,
Tehsil:Budhlada,Dis:Mansa,Punjab
Mobile: 9417629090, 9501286161

मोदी सरकार की तरफ से किसानो को बहुत बड़ी राहत

किसानों का कर्ज़ माफ करने के लिए मोदी सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है। मोदी सरकार ने किसानों को राहत देते हुए कहा है कि अब किसानों को सिर्फ 4 फीसदी की दर से कर्ज मिलेगा।

इस प्रस्ताव की मंजूरी आज दिल्ली में हुई कैबिनेट मीटिंग में मिला। सरकार ने किसानों को राहत देते हुए इसके लिए 19 हजार करोड़ रुपए का बजट भी निर्धारित किया है।

किसानों को मौजूदा समय में 9 प्रतिशत की ब्याज दर पर कर्ज मिलता था अब छोटे कर्जों पर यानी 3 लाख तक के कर्जों पर किसानों को 4 प्रतिशत के ब्याज दर पर कर्ज मिलेगा और कर्ज पर 5 प्रतिशत ब्याज का भुगतान सरकार चुकाएगी। सरकार अधिकतम 3 लाख रूपए तक के कर्ज़ 5 प्रतिशत की छूट मिलेगी।

स्वामिनाथन आयोग ने सिफारिश की थी कि किसानों को उनकी फ़सलों के दाम उसकी लागत में कम से कम 50 प्रतिशत जोड़ के दिया जाना चाहिए और ऐसे समय पर केन्द्र सरकार के इस फैसले के बाद लगता है कि किसान स्वामिनाथन रिपोर्ट को ध्यान में ले रही है।

मौजूदा समय में देश के कई प्रदेशों में किसान कर्ज़माफी को लेकर आंदोलन कर रहें हैं। ऐसे में ये खबर किसानों के लिए बड़ी राहत है।बता दें कि जिन राज्यों में सरकार ने कर्ज माफ किया है उन राज्यों की सरकार के ऊपर पहले से ही कर्ज है चाहे वो महाराष्ट्र हो या पंजाब।

ऐसे में ये तो साफ है कि किसानों की कर्जमाफी सरकार के साथ-साथ आम आदमी की भी जेब पर भारी पड़ेगी। देखना ये है कि इससे देश की अर्थव्यवस्था और महंगाई पर क्या असर पड़ेगा।

धान रोपण की इस तकनीक से बिहार के इस किसान ने तोडा वर्ल्ड रिकॉर्ड

देश के कथित रूप से ‘सबसे पिछड़े राज्य’ बिहार के किसानों ने वो कमाल कर दिखाया है जिससे उन्हें विश्व स्तर पर पहचान मिल रही है. नालंदा के युवा किसान सुमंत कुमार ने सिर्फ एक हेक्टेयर जमीन में 22 टन से ज्यादा चावल की पैदावार कर दुनियाभर के कृषि वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया है.

एक रिपोर्ट के अनुसार नालंदा के दरवेशपुर गाँव के इस युवा किसान ने बिना किसी रासायनिक खाद के प्रयोग के इतनी बड़ी मात्रा में चावल की पैदावार कर वर्ल्ड रिकॉर्ड बना दिया है. इससे पहले ये रिकॉर्ड ‘फादर ऑफ राइस’ कहे जानेवाले चीन के कृषि वैज्ञानिक युआन लोंगपिंग के नाम था जिन्होंने एक हेक्टेयर जमीन में 19.4 टन की फसल उगाई थी.

बिहार के इस गाँव में केवल सुमंत ही नहीं बल्कि उनके सभी साथी भी आर्गेनिक फार्मिंग के इस तकनीक के माध्यम से खेती कर चावल की बड़ी पैदावार पाने में सफल हुए हैं. इन सबने औसतन 17 टनों से अधिक धान की फसल उगाई है. इन उपलब्धियों को देखकर कहा जा सकता है ये लोग गरीबी से लड़ने और अपना जीवनस्तर सुधारने के साथ-साथ ख़ामोशी से एक नई कृषि क्रांति की ओर भी बढ़ रहे हैं.

अपनी खेती में ये लोग जिस तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं उसे SRI (The System of Rice Intensification) कहा जाता है. इसे 1983 में मेडागास्कर में पहली बार प्रयोग में लाया गया था जिसका मकसद स्थानीय किसानों को ‘कम से ज्यादा उत्पादन’ करने के लिए प्रेरित करना था. इस विधि में परंपरागत तरीकों से अलग हटकर थोड़ी मात्रा में बीज-पानी के इस्तेमाल और बिना हानिकारक रासायनों के प्रयोग के लगभग दुगुनी पैदावार प्राप्त की जाती है.

ब्रिटेन के The Guardian ने भी 2013 में नालंदा के सुमंत पर एक विशेष रिपोर्ट प्रकाशित की थी. इन किसानों की सफलता से प्रभावित होकर इसी साल नालंदा दौरे पर आये नोबेल प्राइज प्राप्त इकोनॉमिस्ट Joseph Stiglitz ने इन्हें वैज्ञानिकों से भी बेहतर बताया था. हालांकि कुछ लोगों को बिहार के इन प्रतिभाओं को उचित सम्मान न मिलने का भी दुःख है.

कृषि-अर्थशास्त्री अनिल वर्मा के अनुसार, ‘अगर कोई दूसरा वैज्ञानिक या संस्था किसी भी ऐसे तरीके के साथ सामने आता है ज्सिमे बिना किसी अतिरिक्त खर्च के 50% अधिक पैदावार की जा सकती हो तो उसे नोबेल प्राइज दे दिया जाता है मगर, जब यही काम हमारे युवा बिहारी करते हैं तो उन्हें बदले में कुछ नहीं मिलता. मैं बस ये चाहता हूँ कि इन गरीब किसानों को पेट भर खाना मिल सके.’

कमाई में चपरासी से भी पीछे हैं देश के किसान

देश का किसान हमारे लिए अन्न, फल और सब्जियां उगाता है इसके बावजूद देश का किसान सरकार और बैंकों के सामने कर्ज के लिए हाथ फैलाने को मजबूर है. देश के ज्यादातर किसान कमाई के मामले में सरकारी चपरासी से भी पीछे हैं. आज बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने कहा कि देश में किसान की आमदनी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से भी कम है.


किसान की आय पर क्या है जमीनी हकीकत?

किसान जगदीश ठाकुर  के पास 60 बीघा खेत है जिसमें आलू, सोयाबीन और प्याज की खेती होती है. जमीन के हिसाब से जगदीश ठाकुर बड़े किसानों की श्रेणी में आते हैं. अगर आपको लग रहा है कि बड़े किसान होने की वजह से जगदीश की जिंदगी आराम से कट रही होगी तो ऐसा नहीं है.

जगदीश ठाकुर ने बताया, ”पिछले साल बहुत नुकसान हुआ, फसल के दाम तक नहीं मिल पाए. फसल निकालने के बाद आलू का दाम नहीं मिला. आलू के बाद प्याज लगाया प्याज अब फेंक रहे हैं. एक कट्टे में 60-70 किलो प्याज आता है, 600-700 कट्टे प्याज के फेंकना पड़ा.”

बड़े किसान होने के बावजूद जगदीश ठाकुर बैंक और साहूकारों के कर्ज के बोझ तले दबे हैं. उनकी महीने की कोई फिक्स इनकम नहीं है. जबकि उसी गांव के तिलक पाटीदार प्राइवेट नौकरी करते हैं. महीने में 15 हजार रुपये तक कमा लेते हैं. तिलक के पिता किसान हैं लेकिन वो घटती कमाई की वजह से खेती नहीं करना चाहते हैं.

किसानों की और नौकरीपेशा की आय पर क्या कहते हैं आंकड़े

देश में किसानों और नौकरीपेशा के बीच आमदनी का अंतर इतना ज्यादा है कि अब युवा धीरे-धीरे खेती से दूर हो रहे हैं. 2016 के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक देश के 17 राज्यों के किसानों की सालाना औसत कमाई 20 हजार रुपये है. यानी महीने में 1700 रुपये से भी कम. जबकि ग्रुप डी के एक कर्मचारी की महीने की औसत कमाई करीब 24 हजार रुपये है.

वहीं सरकारी कर्मचारियों का वेतन हर साल बढ़ता है और हर 10 साल बाद नया वेतनमान लागू होता है जबकि किसानों की आमदनी इतनी रफ्तार से नहीं बढ़ती. उल्टा अगर प्रकृति ने निगाहें तिरछी कर ली किसानों को जेब से ही नुकसान उठाना पड़ जाता है.

1970 से 2015 के बीच गेहूं का खरीद मूल्य सिर्फ 19 गुना बढ़ा है. जबकि इसी दौरान सरकारी कर्मचारी का वेतन 150 गुना तक बढ़ गया है. कॉलेज के प्रोफेसर का वेतन 170 गुना और स्कूल शिक्षक का वेतन 320 गुना तक बढ़ गया. प्रधानमंत्री मोदी साल 2022 तक किसानों की आमदनी बढ़ाकर दोगुना करना चाहते हैं लेकिन किसानों की कमाई के हालात देखकर ऐसा दूर-दूर तक मुमकिन नहीं लगता.

 

नकली चावल के बाद बाजार में पहुंचा नकली अंडा

ऊधमसिंह नगर में मिलावटखोरी का काला कारोबार थमता नजर नहीं आ रहा है। रुद्रपुर-काशीपुर में मिलावटी चावल मिले दो दिन भी नहीं बीते थे थे कि सोमवार को लालपुर में नकली अंडे मिलने की शिकायत ने प्रशासन को सकते में डाल दिया। सूचना पर एसडीएम पंकज उपाध्याय की अगुवाई में खाद्य विभाग की टीम ने पड़ताल करने के बाद अंडे को जांच के लिए लैब भिजवा दिया। लालपुर स्थित फार्मेसी कॉलेज देवस्थली विद्यापीठ में डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेशन पद पर कार्यरत डीके सिंह ने बताया कि वह रोजाना की तरह सोमवार भी लालपुर स्थित किराना दुकान से नाश्ते के लिए चार अंडे खरीदे।

घर पहुंचकर अंडों से ऑमलेट बनाया तो उसकी हालत देखकर वे हैरत में पड़ गए। अंडों को फेंट कर पैन में डालने के बाद अंडे के किनारे प्लास्टिक की तरह सिकुड़ने लगे। घर में प्लास्टिक जलने की बदबू फैलने लगी। यह देखकर वह तुरंत ऑमलेट और बचे अंडे लेकर फार्मेसी कॉलेज पहुंचे। वहां उन्होंने उसी दुकान से कुछ और अंडे मंगवाए। इसके बाद उन्होंने संस्थान की लैब में अंडों की जांच की। डीके सिंह ने दावा कि कि जांच में इन अंडों में प्लास्टिक की मात्रा पाई गई।

इसके बाद सूचना तुरंत डीएम नीरज खैरवाल को दी गई। डीएम के निर्देश पर एसडीएम पंकज उपाध्याय खाद्य विभाग की टीम के साथ देवस्थली विद्यापीठ पहुंचे। डीके सिंह ने एसडीएम के सामने भी अंडों की लैब में जांच की। जांच का नतीजा देखकर खुद एसडीएम में हैरत में पड़ गए। हालांकि अंडों की विस्तृत जांच के लिए एसडीएम ने खाद्य विभाग की टीम को अंडों को जांच के लिए तत्काल फूड लैब रुद्रपुर भेजने के निर्देश दिए। एसडीएम पंकज उपाध्याय ने बताया कि देवस्थली विद्यापीठ कर्मी के नकली अंडे मिलने की शिकायत पर खाद्य विभाग की टीम के साथ लालपुर जाकर अंडों का सैंपल लेकर फूड लैब रुद्रपुर भेजा गया है।

जांच रिपोर्ट आने के बाद ही पुष्टि हो पाएगी कि अंडा प्लास्टिक का है या नहीं। ऑस्मोटिक टेस्ट से पता चली प्लास्टिक की मिलावटदेवस्थली विद्यापीठ के डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेशन डीके सिंह ने बताया कि अंडा नकली होने के शक पर उन्होंने संस्थान में अंडे का ऑस्मोटिक टेस्ट करवाया तो अंडे में प्लास्टिक की मिलावट की पुष्टि हुई।दुकानदार को अंडे न बेचने के निर्देश रुद्रपुर। नकली अंडा मिलने की शिकायत पर एसडीएम ने लालपुर दुकानदार को अंडे नहीं बेचने के निर्देश दिये। उन्होंने कहा कि अंडा प्लास्टिक का है या नहीं, इसकी पुष्टि जांच के बाद ही होगी।

अब अंगूठे के निशान से मशीन बताएगी खाद की जरूरत

किसान अब अपनी मर्जी से रासायनिक खाद की खरीदी नहीं कर सकेंगे। किसी भी सरकारी समिति से खाद खरीदने पर किसानों का मशीन में थंब इंप्रेशन लिया जाएगा। मशीन बता देगा कि उस किसान को कौन सी और कितने खाद की जरूरत है। उससे अधिक खाद किसान को नहीं दिया जाएगा। किसानों का पूरा डेटा कंप्यूटर में फीड कर दिया गया है। इस तरह की पहल से किसान अधिक मात्रा में रासायनिक खाद का उपयोग नहीं कर पाएंगे।

किसानों का स्वाइल हेल्थ कार्ड बनाया जा रहा है। इस कार्ड में किसानों की पूरी जमीन का विवरण है, कितनी जमीन में खेती हो रही है और कितनी जमीन परिया है। जिन खेत में फसल बोई जा रही है उस खेते में कौन सी और कितनी खाद की जरूरत है, यह सब जानकारी कृषि विभाग के सिस्टम में अपलोड की जा रही है।

स्वाइल कार्ड को आधार कार्ड से लिंक करने के बाद यह सिस्टम शुरू हो जाएगा। किसान अब मनमाने तरीके से अधिक मात्रा में रासायनिक खाद का उपयोग नहीं कर पाएंगे। नियमित रूप से खाद का उपयोग होने से जमीन की उर्वरक क्षमता पर भी कोई असर नहीं पड़ेगा।

निजी दुकानों में पीओएस मशीन से होगी खरीदी

सहकारी समितियों के अलावा लाइसेंसी निजी दुकानों में भी पीओएस मशीन लगाई जाएगी। कृषि विभाग किसानों के खेतों की मिट्टी का सैंपल ले रहे हैं, जिसके आधार पर विभाग के पास यह डाटा है कि किसान के पास कितनी जमीन है और खेत की मिट़्टी में कौन से उर्वरक की कमी या अधिकता है।

ऐसे में किस खाद को कितनी मात्रा में डालना है, यह सब ऑनलाइन पता चल जाएगा। इससे निजी दुकानदार मनमाने तरीके से खाद नहीं बेच पाएंगे। इससे किसानों को रासायनिक खाद के लिए अधिक रुपए खर्च नहीं करना पड़ेगा और उनके पैसे बचेंगे। जिससे वे दूसरा काम कर सकेंगे।

इस पहल से खाद की नहीं हो सकेगी कालाबाजारी

हर साल सरकारी सब्सिडी से हजारों मैट्रिक टन यूरिया, डीएपी और अन्य खाद सोसायटियों में पहुंचती है। लेकिन कालाबाजारी के चलते किसानों का इसका पूरा लाभ नहीं मिलता है। इस प्रकार की गड़बड़ी को रोकने के लिए यह पहल किया जा रहा है। इसके लिए सभी सोसायटियों में पीओएस मशीन दी जाएगी।

इससे किसानों पर विभाग मॉनिटरिंग भी कर पाएगा कि उसने साल में कितनी बार खाद खरीदी है और कितनी जमीन है। अगर बार-बार खाद खरीद रहा है, तो उसका क्या उपयोग हो रहा है। इससे बड़े किसान खाद की कालाबाजारी नहीं कर पाएंगे।

अगर अच्छी फ़सल चाहिए, तो न जोतें खेत

कोई भी जंगल की ज़मीन को नहीं जोतता पर तो भी वहां पेड़-पौधे उगते हैं. संरक्षित खेती के तहत माना जाता है कि खेती के लिए ज़मीन जोतने की ज़रूरत नहीं खेत जोतने से ज़मीन सूख जाती है. कई फ़सलों में उनकी जड़ों को ज़मीन से पोषक तत्व लेने में रोक लगाती है और इससे मिट्टी के माइक्रोबियल गुणों पर भी असर पड़ता है.

इसलिए बोरलॉग इंस्टीट्यूट ऑफ़ साउथ एशिया भारत में कुछ बदलाव के साथ संरक्षित खेती की सलाह देता है.इस इंस्टीट्यूट का नाम नॉरमन बोरलॉग के नाम पर रखा गया है जिन्हें हरित क्रांति का जनक कहा जाता है.

इस इंस्टीट्यूट की शाखाएं लुधियाना, समस्तीपुर और जबलपुर में हैं.यह इंस्टीट्यूट उत्तरी-पश्चिमी भारत में जहां बाढ़ के पानी से सिंचाई होती है, बुआई से पहले लेज़र लेवलिंग की सलाह देता है ताकि थोड़े से पानी से बड़े खेत का काम चल जाए.

मगर मध्य भारत में जहां बड़े पैमाने पर सिंचाई के साधनों का इस्तेमाल होता है और ज़मीन की सतह लहरदार है, वहां लेज़र लेवलिंग की ज़रूरत नहीं है.संरक्षित खेती के तीन नियम हैं. पहला, बिल्कुल भी जुताई न करें या बहुत कम जुताई करें. दूसरा नियम कि पिछली फ़सल के डंठल खेत में ही छोड़ दें ताकि वह खेत की नमी बरकरार रखें और खेत में खरपतवार को दबाकर रखें और मिट्टी के जैविक गुण में इज़ाफ़ा करें.

 

तीसरे नियम के तहत मिट्टी में नाइट्रोज़न की मात्रा बढ़ाने के लिए फल लगने वाले फ़सलों की खेती की जाए. खेती का यह तरीका कम ख़र्चीला है क्योंकि इसमें जुताई की ज़रूरत नहीं पड़ती.मगर इसमें नए ज़माने के खरपतवार नाशकों की ज़रूरत पड़ती है जो अपने प्रभावों में मारक हों और मिट्टी में ज़्यादा दिनों तक जिसका असर न हो.

जिस हवा में हम सांस लेते हैं उसके लिए भी यह अच्छा है. छोटे-छोटे धूल के कण हवा को गंदा करते हैं. ठंड के दिनों में अलाव जलाने से यह प्रदूषण और भी बढ़ता है.

पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के खेतों में धान के पुआल जलाने के कारण इस तरह का प्रदूषण बढ़ता है.धान के पुआल में सिलिका ज़्यादा होता है, जिसे जानवर खाना पसंद नहीं करते. प्रतिबंध के बावजूद पूरे क्षेत्र में खेतों में अलाव जलाए जाते हैं. इसे अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के नक्शे में रेड स्पॉट के रूप में देखा जा सकता है.

अगर पुआल को खेत में ही छोड़ दें, तो प्रदूषण होने से बचाया जा सकता है.हरित क्रांति के दौरान भारत ने मिट्टी की गुणवत्ता को लेकर लापरवाही बरती क्योंकि उस वक़्त सारा ध्यान खाद्य सुरक्षा को लेकर था. लेकिन ये दोनों एक-दूसरे के विरोधाभासी नहीं हैं.

असल में मिट्टी की गुणवत्ता नज़रअंदाज करने से आगे खेती पर बुरा असर पड़ता है. भारत को बड़े पैमाने पर संरक्षित खेती अपनाने की ज़रूरत है.

समर्थन मूल्य के नीचे कृषि उत्पादों की खरीद मानी जाएगी अपराध

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किसानों के समर्थन में शुरू किया उपवास 28 घंटों बाद खत्म कर दिया। इस दौरान सीएम ने ऐलान किया कि केन्द्र द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के नीचे कृषि उत्पादों की खरीद को मध्यप्रदेश में आपराधिक कृत्य माना जाएगा।

इस दौरान सीएम ने यह भी घोषणा की कि खेती जमीन किसान की सहमति के बिना अधिग्रहित नहीं की जाएगी। पिछले कई दिनों से किसानों के आंदोलन का सामना कर रहे शिवराज सिंह चौहान ने 28 घंटे बाद रविवार को नारियल पानी पीकर अपना उपवास खत्म किया। सीएम ने कहा कि उन्होंने 2002 में सब्मिट की गई स्वामीनाथन कमिटी की रिपोर्ट पढ़ी, इसके आधार पर वह कई फैसले लेंगे। राज्य सरकार सभी म्यूनिसिपल इलाकों में ‘किसान बाजार’ खोलेगी। इसके अलावा दूध खरीदने के लिए अमूल डेयरी कॉपरेटिव्स की प्रणाली अपनाएगी।

उन्होंने ऐलान किया कि खसरा की कॉपी किसान को उसके घर पर पहुंचाई जाएगी। सीएम ने कहा, ‘किसानों को अब खसरा की कॉपी के लिए अधिकारियों और दफ्तरों के चक्कर नहीं काटने होंगे।’ अपना उपवास खत्म करने के बाद चौहान ने कहा कि वह एसी कमरों में बैठने वाले सीएम नहीं हैं।

उन्होंने कहा, ‘जब-जब किसानों पर संकट आया, मैं मंत्रालय, सीएम हाउस से निकलकर खेतों तक गया।’ सीएम ने अपने संबोधन में भारतीय किसान संघ जैसे संगठनों को साथ देने के लिए शुक्रिया भी कहा। गौरतलब है कि एमपी में किसान आंदोलन के शुरुआती दिनों में सीएम से आश्वासन मिलने के बाद भारतीय किसान यूनियन ने अपना आंदोलन वापस ले लिया था।

मध्यप्रदेश के सीएम ने एक बार फिर मध्य प्रदेश में हिंसक प्रदर्शन करने वालों को अराजक तत्व कहा। शिवराज सिंह ने कहा कि कोई भी किसान दूध नहीं फेंक सकता। दूध फेंकने का काम अराजक तत्वों का है। उन्होंने मंदसौर घटना की उच्चस्तरीय जांच करा दोषियों पर कार्रवाई की बात कही, साथ ही कहा कि निर्दोष किसानों को चिंता करने की जरूरत नहीं है।